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विनम्र कुछ नहीं बोला । बह सोच तक नहीं सकता था श्वेता 'कहां' बोल रही है ।
"क्या बात है । तुम इतने गुमसुम क्यों हो?" कहने के साथ श्वेता ने अपना हाथ वालों से भरे विनम्र के बलिष्ठ सीने पर रख दिया ।।
" कुछ बोल क्यों नहीं रहे तुम ?"
"मामा की हरकत से शॉक लगा है ।"
"मानती हूं । बात है भी शोक लगने की ।" इस बार अागे बढ़कर उसने अपना मुखड़ा बालों पर रख दिया ।
"मगर विनम्र, अच्छा ही हुआ ।। वक्त रहते मामा की असलियत सामने आ गई ऐसे लोगों का भेद जितनी देर से खुलता है, उतना ही ज्यादा नुकसान पहुचा चुकें होते हैं ।"
अब, विनम्र का ध्यान श्वेता के शब्दों पर नहीं, उसकी हरकतों पर था । वे हरकतें उसे वड़ीं विचित्र लग रही थी ।
यह सोचकर तो कुछ ज्यादा बिचित्र कि वे हरकतें श्वेता कर रही थी ।
वह श्वेता जिसने कभी शालीनता की सीमाएं नहीं लाघीं थी ।
"श्वेता । आज हो क्या गया है तुम्हें?" विनम्र ने अपने दोनों हाथ उसके कंधों पर रखे-----“क्यों इतनी लिपटी जा रही ही?”
श्वेता ने अपना चेहरा ऊपर उठाया । उसके चेहरे की तरफ । आंखों में निमन्त्रण भरा । होंठ सैक्सी अंदाज में कंपकंपाए । उनके बीच से वासना में डूबी आवाज निकली ।
"इस रूप मे पहले तुम्हें कभी देखा भी तो नहीं था ।"
" क-किस रूप में?" विनम्र खुद को दुनिया के सबसे ज्यादा 'वोल्टेज' वाले करेंट से धिर गया महसूस कर रहा था ।
"जिस रूप में आज़ हो । बगैर कपडों के ।" सैक्सी आवाज में कहने के साथ श्वेता ने जानबूझकर अपने बगैर 'ब्रा' वाले बक्ष उसके सीने पर टिका दिए------"विनम्र अाज पहली बार जाना-----"तुम्हारा जिस्म इतना ठोस है । पत्थर जैसा । क्या तुम जानते हो----हम लड़कीयां ऐसे ही जिस्म की दिवानी होती है ।"
विनम्र ने 'निप्पल्स' की चुभन सीने में महसूस की तो---------
जहन मे विस्फोट हुआ ।
वहीं विस्फोट जो इन खास हालात में होता था ।
"मार डाल विनम्र । मार डाल इसे!" दिमाग से अज्ञात आवाज़ टकराई।
विनम्र घबरा गया ।
खुद को आवाज के प्रभाव से मुक्त के लिए सिर को जोर से झटका दिया ।
"मुझें अपनी बांहों में भींच जो विनम्र ।" श्वेता अपने उठानों को उसके सीने पर रगड़ रहीं थी ।"
"मुझे तो तुम्हें इस रूप मे देख कर आज पहली बार पता लगा कि मैं कितनी प्यासी हूं ।"
"ये भी वही है । ये भी वही है विनम्र ।' आवाज ने उसके मस्तिष्क में शोर मचा दिया ।
" सारी लड़कियाँ मर्दों को बेवकूफ वनाने वाली होती हैं । यह भी रूबी, बिदू ओर क्रिस्टी की तरह मार डालने लायक है । वाह !! मरने के बाद कितनी खूबसूरत लगी थी । यह भी उतनी ही खूबसूरत लगेगी । उनसे भी ज्यादा । हाथ बढा विनम्र । गर्दन दबा दे । देख । इसकी गर्दन तेरे हाथों के कितने नज़दीक है । मार डाल ।। मार डाल ।। मार डाल इसे !"
"नहीं ।' वह अज्ञात आवाज से लड़ा-'यह वैसी नहीं है । यह श्वेता है । मेरी श्वेता । पाक । साफ । मैं इससे प्यार करता हूं ।"
'प्यारा हू! क्या है तू! बेवकूफ़ है! ये अलग होती तो क्या वही सब कर रही होती जो इस वक्त कर रही है ??
सचमुच श्वेता बिंदू ओर क्रिस्टी की हरकतों से भी अागे निकल गई थी । बोंहे फैलाकर उसने विनम्र को कस लिया ।
विनम्र का जी चाहा----वह भी ऐसा ही करे । श्वेता की अपनी बांहों में भींच ले ।। बाहें अागे बढ़ी भी लेकिन तभी आवाज जेहन की दीवारों से टकराई-----'क्या कर रहा है विनम्र । यही कर दिया तो यह जीत जाएगी । क्या फर्क रह जाएगा तुझमें और तेरे बाप में ???????
उसने भी तो यही किया था जब रूबी उससे लिपटी तो उसने भी उसे बाहों में भरकर खुद से लिपटा लिया था । अंजाम कया हुआ उसका?
रूबी ने तेरे बाप 'बहका' कर कोरे स्टाम्प पेपर पर साईन ले लिए । यही पेशा है सब लड़कियों का ।
ये मर्द को बेवकूफ बनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करती हैं । श्वेता भी उन्हीं में से है । ये भी मार डालने लायक है । विनम्र । मार डाल ।। किस्सा खत्म कर दे इसका भी !'
'हरगिज़ नहीं ।' दिमाग ही दिमाग में यह चिल्लाया-' मेरी श्वेता ऐसी नहीं हो सकती ।'
इस प्रकार, विनम्र के मस्तिष्क में जबरदस्त युद्ध छिड़ गया ।
एक तरफ उसे श्वेता की हत्या कर देने के लिए उकसाने वाली आवाज थी ।
दुसरी तरफ उसकी अपनी आवाज । श्वेता से प्यार करने वाली विनम्र की आबाज ।
हत्या के लिए उकसाने वाली आवाज से श्वेता को प्यार करने वाला विनम्र बुरी तरफ भिड़ा पड़ा था ।
दिमाग में जबरदस्त संघर्ष चल रहा था ।
उस संघर्ष से पूरी तरह बेखबर श्वेता यह जांचने पर आमादा थी---------------विनम्र जुनूनी हत्यारा हैं या नहीं?
उसने धीरे से, अपने ब्लाऊज की गांठ खोल ही थी ।
अज्ञात आवाज से संधर्ष करता श्वेता का प्रेमी जीत गया ।
उसने श्वेता के दोनों कंधे पकड़कर वहुत जोर से धक्का दिया ।
उधर , श्वेता ने लडखड़ाकर खुद को बड्री मुश्किल से गिरने से बचाया ।
इधर, विनम्र हलक फाड़कर चीखा था------"ये तुम क्या कर रही हो श्वेता । मुझे यह सब बिल्कुल पसंद नहीं है ।
भाग जाओ यहां..........
और ।
विनम्र बस इतना ही कह पाया ।
मुंह खुला का खुला रह गया था ।
आंखे स्थिर । वे श्वेता के उठानों को देख रही थीं ।
उसके सीने पर आंदोलित से नग्न उठानों को । इस बार, हत्या के लिए उकसाने वाली आवाज़ पुरजोर अंदाज मे चीखी-----'देख ! देख बिनम्र क्या कमी है इसमे और रूबी में । इसमे और बिंदू में ।। इससे और क्रिस्टी में । है कोई कमी? अगर वे मर जाने लायक थी तो श्वेता उस लायक क्यों नहीं है? '
' इधर उसके दिमाग में शोर मच रहा था उधर श्वेता बिनम्र के चेहरे को देख रही थी ।
दहककर आग का गोला बन गया था । आंखें सुलग लग रही थी । बिनम्र दरिंदा नजर अ रहा था । ठीक वैसी ही मुद्रा थी वह जैसी श्वेता ने स्वीमिंग पूल पर देखी थी ।
मारे खौफ के यह कांप उठी ।
चीखने के लिए मुंह खुला ही था कि…
विनम्र बाज की तरह झपटा ।
फौलाद के शिकंजो की तरह उसके हाथ श्वेता की गर्दन पर जम गए ।
हलक से चीख निकालनी चाही तो मुह खुला होने के बावजूद उसी में घुटकर रह गई ।
दम घुटने लगा ।
छटपटा उठी यह ।
जबकि हाथों का कसाव लगातार बड़ाते विनम्र के हलक से भेडिए जेसी गुर्राहट निकली-------'" नंगी होकर दिखाती है मुझे । मुझे बाप समझती है विनम्र का? मैं जानता हूं.....…मरने के बाद तेरे ये उठान और ज्यादा सुन्दर लगेंगे । पत्थर की तरह सख्त हो जाएंगे ये । कठोर ! कठोर और कठोर ! और कठोर , दांत भीचे वह बार - बार यही कहता हाथो का दवाब.....अौर दवाब बढ़ाता चला गया ।
श्वेता गर्म रेत पर पडी़ मछली की मानिन्द फड़फड़ा रही थी ।