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चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल compleet



सड़क के पार खडी टैक्सी की तरफ बढते हुए शेखर ने कहा---आओ किरन ।"

“नहीं शेखर, हम टैक्सी से नहीं, बस से चलेंगे ।"

"वजह ?-"'

"वस में भीड़ होगी और क्राइम करने वाले भीड़ से कतराते हैं ।"'

“मैं सहमत हूँ और तुम्हारे दिमाग की दाद भी देता हैं ।" मुस्कुराता हुआ शेखर तुरन्त कह उठा ।

मुस्कान का जवाब मुस्कान से देती किरन ने कहा… "तो आओ, बस-सटॉप की तरफ चलें ।"

कुछ देर वाद वे भीड़ से ठसाठस, भरी बस में यात्रा कर रहे थे । दो स्टॉप बाद दो व्यक्तियों के लिए बनाई गई एक सीट मिल गई थी उसे तब शेखर ने कहा----"मैं यह नहीं समझ ' पाया किरन कि तुम हत्यारा किसे मानकर चल रही हो… रमन को या शहजाद राय को ?"

किरन के होंठों पर मोहक मुस्कान उभर आई, बीली !!!

इन्वेस्टीगेटर किसी के सामनें बाते कुछ और कर रहा होता है और दिमाग में कुछ और सोच रहा होता है-बैसे मेरे ख्याल से कल मुझे यह बात पता लग जानी चाहिए कि हत्यारा कौन है ???"

"क-कल .......कल तुम्हें यह बात पता लग जाएगी है"' शेखर उछल पड़ा है !!

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किरन की मुस्कुराहट रहस्यमय हो उठी, बोली--. "सम्भावना तो है ।"

" क-- केसे ।" प्रसन्नता की ज्यादती के कारण शेखर का लहजा कांप रहा था।

"मैँने सबके फोटो मांगे हैं, वे बता देगे कि हत्यारा कौन है ?"

. "फ-फोटो तुम्हें संगीता का हत्यारा बता देगे । मैं कुछ समझा नहीं ।"

रहस्य से लबालब भरी मुस्कान के साथ किरन ने .कहा---"'हर चीज बोलती है शेखर, सुनने वाले के पास दिमाग होना चाहिए और मजे की बात ये कि कुदरत ने मुझे दिमाग देते वक्त किसी किस्म की कंजूसी नहीं वरती ।"

"कहां चली गई थी तू ??"' सुलोचना देबी किरन को देखते ही चढ़ दोड़ी----“और अपने पापा से फोन पर ऐसा क्या कहा था जिसे सुनते ही वे पागल हो गए, इतने उत्तेजित, उद्धलित, घबराये हुए और बोखलाये हुए मैंने उसे कभी नहीं देखा ।"

मुस्कुरा उठी किरन, बोली--, "पापा हैं कहाँ ?"

"शहजाद राय के यहाँ गए हैं ।"

"श-शहजाद राय के यहां…क्यों ??"'

"तुझे देखने ........ और क्यों ?" सुलोचना दैवी गुर्रां उठी----“तेरे फोन के तुरन्त बाद से वे शहजाद राय को फोन मिलाने की कोशिशे करते रहे परन्तु नहीं मिला-----बेल जा रही थीं लेकिन रिसीवर नहीं उठाया जा रहा था-----वे इस नतीजे पर पहुचे कि शहजाद राय का फोन खराब है और फिर फियेट लेकर आंधी… तूफान की तरह निकल गये !!!!"

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"ओह" !" किरन को अफसोस हुआ----“मेरे फोन की वजह से पापा को इतनी परेशानी हूई ?"'

"फोन पर तूने कहा क्या था और--- तेरी गाड़ी कहां गई?"

"वर्कशॉप में है ।"

"क्यों ?"

"एक्सीडेन्ट हो गया था ।" कहने के बाद किरन ने रिसीवर उठाकर टैक्सी यूनियन के आँफिस का नम्बर डायल किया सम्बन्थ स्थापित होने पर बोली----बैरिस्टर विश्वनाथ की बेटी बोल रही हूं पता नोट कीजिए ।"

"क्यों ??"' दूसरी तरफ़ से पूछा था ।

“नोट कीजिए, काम भी बताऊंगी ।"

"बोलिए ।"

पता लिखवाने के बाद किरन ने कहा-----"टैक्सी नम्बर यू वी एक्स 4889 जब भी आँफिस पहुंचे अाप उसे लिखवाये पते पर भेज दे और ड्राइवर से कहें कि इनाम के पांच सौ

रुपये मिलेगे ।"

"" एेसा क्या काम किया है ड्राइवर ने है"' चकित स्वर !!!!

"इस सवाल का जबाव तो अभी उस बेचारे को भी मालूम नहीं है----यहां अाने पर ही पता लगेगा कि उसने अनजाने में कितना महान् काम कर दिया !!!" कहने के साथ किरन ने रिसीवर क्रेडिल पर रख दिया ।

इस वक्त वह अपनी कोठी के ड्राइंग-कम-डायनि'ग हॉल में थी…उसमें , जिसकी दो, दीवारें चौखटों में लगे पारदर्शी शीशों की थी.....…पर्स को लापरवाही के साथ सोफे पर डालने के बाद वह डायनिंग टेबल की तरफ बडी और एक कुर्सी खींचकर उस पर बैठ गई । ......

सुलोचना देवी को अभी अपने दिमाग मैं घुमड़ रहे सबालों में से किसी एक का भी जबाब नहीं मिला था इसलिए उसके नजदीक पहुची और सवाल करने के लिए मुंह खोला ही था कि--------------

“छनाक ...... छनाक ...... छनाक !"

“धम्म ...... धम्म ...... धम्म !"

कांच टूटने और कुछ व्यक्तियों के फर्श पर आ गिरने की आवाजें गूंजी ।

दोनों महिलाओं की हलक से चीखें निकली, और अभी कुछ समझ भी नहीं पाई थी कि एक साथ चार नकाबपोश फर्श पर कलाबाजियां खाते और फिर नटों की मानिन्द उछल---उछलकर खड़े होते नजर आये ।

सारे हाँल में कांच बिखरा हुआ था ।

दो एक दीवार का कांच तोड़ते हुए हाँल में पहुंचे थे, दो दूसरी तरफ़ से !

पहले तो किरन कुछ समझ ही न पाई------जव तक समझी तब तक चारों के हाथ में चमक रहे रिवॉल्वरों पर नजर पड़ चुकी थी !!!!

सुलोचना देबी चीखने वाली मशीन की तरह चीखें जा रही ।

"खामोश !" उनमें से एक दहाड़ा ।

सुलोचना देबी की सीट्टी-पिटी तुरन्त गुम हो गई ।

मानो बिजली से चल रही मशीन गुल हो जाने की वजह से चुप हो गई हो !

" किरन अपनी मम्मी की तरह चीख तो नहीं रही थी परन्तु मारे खौफ के बुरा हाल था उसका।

"तू मानेगी नहीं लड़की ?" एक नकाबपोश नकाब से झांकती सुर्ख आंखें किरन पर जमाकर गुर्राया ------ " गाड़ी की धज्जियां उडाकर हमने जो इशारा किया था, उसे शायद तू समझी नहीं ?"

" क-कौन-सा इशारा ?" किरन ने हकलाकर पूछा ।

तभी !!

कोठी में ऐसी आवाज गूंजू जैसे कुछ लोग लोग दौड़ कर आ रहें हों !

एक नकाबपोश ने कहा---"नौकर आ रहे है सरदार, जल्दी करो !"

तब !!

सुर्ख आंखों वाले नकाबपोश ने रिवॉल्वर ताना और जल्दी से गुर्राया----“तेरा पर्स कहां है…फौरन बता वर्ना गोली मार दूंगा ।"

अातंकित किरन ने सोफे पर पड़े पर्स की तरफ इशारा का दिया ।

भागते कदमों की आवाज नजदीक आ गई ।

एक नकाबपोश ने झपटकर पर्स उठा लिया ।

सुर्ख आंखों वाला गुर्राया----अगर इशारा नहीं समझती तो सीधे--सीधे सुन…।"

परन्तु । "

वाक्य पूरा न हो सका !!

" भागते हुम नौकर दरवाजा पार करके हाल में पहुंचे ही थे कि एक नकाबपोश दहाड़ा-"रुक जाओ, वरना एक-- एक की खोपड़ी में सुराख वना दिए जायेंगे ।"

हाय--तौबा में अाए नौकर बौखलाकर ठिठक गए ।

 


वे तीन थे, तीनों की सांसें धौकनी की मानिन्द चल रही थी ।

और चेहरे !!

चेहरों पर हो रहा था--- मौत का कत्थक !!!

अपनी तरफ तने रिवॉल्वरों देखकर उनके प्राण खुश्क को गए थे !!

आंखों में खौफ-ही-खौफ !!

"चलो सरदार ।" एक अन्य नकाबपोश ने कहा ।

सुर्ख आंखों वाला किरन पर नजर टिकाये, अपने साथियों के साथ पीछे हटता हुआ बोला…"अगर तूने इस मामले में दिलचस्पी लेनी बंद नहीं की तो तुझ अकेली को नहीं बल्कि तेरे मां-बाप को भी मीत के बाट उतार दिया जायेगा ।"

किरन सिहर गई, मुह से बोल न फूटा !!

। और फिर !

चारों एक साथ----ठीक इस तरह कलाबाजियां खाकर टूटे कांच से गुजरते हुए हाल से गायब हो गए जैसे एक ही स्विच से हरकत में आने वाली चार मशीने हों ।

नौकर कांच की दीवारों की तरफ दौडे ।

"रुक जाओ!" किरन चीखीं-----" कोई फायदा नहीं है । उन सबके पास रिवॉल्वर है ।"

नकाबपोश हातिमताई के जिन्न की तरह हाल में आये थे और उसी तरह गायब हो गए ।

टाक् ......चटाक......चटाक !!

सुर्ख आंखों वाले के गाल पर एक ऐसा शख्स चांटे पर चांटे बरसाता चला गया जिसका चेहरा सफेद नकाब के पीछे छुपा था और जब मारता-मारता थक गया तो चीखा…“मैंने तुमसे फोटो और चिट्टियां लाने के लिए कहा था हरामजादे या पर्स ?"

"म-मगर बॉस ।" सुर्ख आंखों वाला बोला----“आप ही ने तो कहा था कि चिट्ठियां उसके पर्स में हैं ।"

"चुप रह उल्लू के पटृठे !" सफेद नकाबपोश दहाड़ा----" कहां है बता......कहां है चिट्ठियां और फोटो ?"

सुर्ख आंखों वाले ने जमीन पर खुले पड़े पर्स की तरफ़ देखा । उसके तीनों साथियों की नजर पाले ही जमीन पर 'मुह बायें' पड़े पर्स पर स्थिर थी…पर्स के अन्दर से निकला सामान भी उसी के इर्द-गिर्द बिखरा पड़ा था परन्तु उसमें काम की कोई न थी ।

सुर्ख आंखों बाले उनके उन साथियों के चेहरों पर इस वक्त नकाबे नहीं थी जो उनके साथ बैरिस्टर विश्वनाथ के ड्रॉइग रूम डायनिंग हाल में हंगामा मचाकर अाये थे-नकाब थी तो सिर्फ उसके चेहरे पर जिससे मार खाने के बावजूद सुई आंखों वाला गिड़गिड़ा रहा था ।

वह और उसके साथी शक्ल से ही शहर के छटे हुए गुन्डे नजर आ रहे थे ।

गर्दन झुकाये सुर्ख आंखों वाला बोल----“गलती हो गई बॉस ।"

"गलती हो गई हैं' नकाबपोश भड़का-----“बस.......कहकर छुट गये कमीने कि गलती हो गई…...इतना तक नहीं सोचेंगे कि गलती हो क्यों गई, चिट्ठियां और फोटो गये तो कहाँ गये । जग्गा उस्ताद! "

"एक राय पेश करू बॉस ?"' डरते हुए जग्गा उस्ताद ने पूछा ।

“बक !"

"कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि फोटो और चिट्टियां उसने शेखर मल्होत्रा को दे दी हों ?"

सफेद नकाब के अन्दर झांकतीं आँखे सोचने वाले अन्दाज में सिकुड़ गयी और फिरें लगातार एक मिनट तक सोचते रहने के बाद बोला वह-“हो सकता है, विल्कुल हो सकता है और फिर मान लिया कि फोटो और चिट्ठियां उस हरामी के पास न भी हुई तो उसे मालूम जरूर होगा कि कहाँ हैं ?

-------------

---------

"म-मगर अाप तो 'चुन्नु पहलवान' को हुक्म दे चुके है बॉस कि अपने साथियों के साथ शेखर मल्होत्रा का सफाया कर दे?"

"ओह !' उसके मुंह से ऐसी अवाज निकली जैसे गलती का अहसास हुआ हो तथा फौरन पैंट की जेब से पांच किलोमीटर की रेंज' वाला 'वाकी-टाकी' निकालकर किसी से सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयत्न करने लगा ।

थोडी देर बाद दूसरी तरफ से आवाज़ उभरी !

"पहलवान बोल रहा हूं ।"

"हम एक्स वाई जेड बोल रहे हैं पहलवान ।" सफेद नकाबपोश ने कहा ।

"क्या हुक्म है बॉस?”

"शेखर मल्होत्रा अभी तक तुम्हारे चंगुल में नहीं फंसा?

अभी वह यहां पहुंचा ही नहीं बाँस ।"

"कहां से बोल रहे हो ?"

"हम उसकी कोठी के बाहर सड़क के दोनों तरफ छुपे हैं…-आप फिक्र न करें, अपने पेरों से चलकर वह कोठी अन्दर दाखिल नहीं हो सकेगा---हां नोकरों को उसकी लाश उठाकर ले जाने से मैं रोक नहीं सकता।”

"तुम उसे एकदम से शूट नहीं करोगे चुन्नु पहलवान ।"

"पहले तो आपने वही हुक्म दनंदनाया था बॉस !"

"हुक्म अब भी उसका काम तमाम करने का ही है, मगर एकदम से नहीं बल्कि आराम से, थोडा ठहरकर ।"

"वजह ? "

"उसके पास या उसकी जानकारी में कुछ फोटो और चिट्टियां हैं-दाम उसे तब लक खत्म नहीं करोगे जब तक कि फोटो औरे चिट्ठियां बरामद न कर तो अथवा यह न उगलवा तो कि वे कहाँ हैं----" फोटो और चिट्ठियों का पता लगने के बाद उसे एक पल के लिए भी जीवित नहीं छोड़ना है ?"

"ओ. के . बॉस !"

किरन की सलाह के मुताबिक शेखर मल्होत्रा उसके घर से अपनी कोठी के लिए टैक्सी के स्थान पर बस में रवाना हुआ । इस रूट की यह अन्तिम बस थी !! इसलिए भीड़ जरूरत से ज्यादा थी !! सीट न मिल सकी, खड़े-खड़े सफर करना पड़ा उसे । बसो के सफ़र का अभ्यस्त वेसे ही ना था !!

सो !

लोगों की धक्का--मुक्की में फंसे-फंसे 'चूं' बोल गया ।

किसी तरह बस उसके 'स्टॉप' पर पहुंची, वह यूं उतरा जैसे बहुत बड्री मुसीबत से पीछा छूटा हो…स्टॉप से उसकी कोठी करीब डेढ फ्लॉग दूर थी---सो, बस अपने रूट पर भागे चली गयी और वह पैदल ही कोठी की तरफ़ बढ गया ।

कोठी के ठीक नजदीक पहुचा ही था कि…

दायें बायें हल्की-स्री हलचल महसूस हुई ।

तेजी से पलटकर दोनों तरफ़ देखा और फिर दोनों ही तरफ से खुद पर लपकते दो काले नकाबपोशों को देखकर रिवॉल्वर से छूटी गोली की मानिन्द कोठी के लोहे वाले गेट की तरफ़ दौड़ा ।

दोनों नकाबपोश उससे ज्यादा रफ्तार के साथ भाग रहे थे, मगर फिर भी वह उनके खुद तक पहुंचने से पहले ही कोठी के लोहे वाले द्वार पर पहुच जाता परन्तु -------

दो नकाबपोश ठीक सामने नजर अाये!

उनके हाथों में दबे रिवॉल्वर भी शेखर मल्होत्रा ने साफ--साफ देख लिये थे !!

आतंकित अन्दाज में वह हलक फाड़कर चिल्लाया-----" हैल्प ...... हैल्प ...... हैल्प !''

सन्नाटे में आवाज दूर…दूर तक गूंज गयी ।

किन्तु ।

मदद के लिए किसी भी तरफ़ कोई हलचल नजर नहीं आयी ।

लगातार चिल्लाते हुए शेखर ने दौड़ लगानी शुरू की भी लेकिन अभी सडक पर ही था यानि फुटपाथ पर भी नहीं पहुच सका था कि चारों नकाबपोश अत्यन्त निकट आ गए ।

एक गुर्राया----" अगर हलक फाडने की कोशिश की तो गोली मार दी जायेगी ।"

चीखने के लिए मुंह खुला ही रह गया ।

बुरी तरह आतंकित था वह, भयभीत स्वर में बोला--- "कौन हो तुम लोग ?"

"फोटो और चिट्टियां कहां हैं ?" पीछे से गुर्राकर किसी ने पूछा ।

शेखर तेजी से पलटा !

हाथ में रिवॉल्वर लिए कुम्भकरण सरीखा नकाबपोश खतरनाक अन्दाज में उसकी तरफ़ बढ़ रहा था !

पीछे हटते हुए शेखर मल्होत्रा ने 'पुछा---"कोन से फोटो और चिट्टियां?"

"जिनकी हमें तलाश है ।"

"म-मुझे क्या मालूम कि आपको ।"

वाक्य अधूरा रह गया ।

बल्कि अगर यह कहा जाये कि अागे के शब्द हलक से उबल पड़ने वाली लम्बी चीख में तबदील हो गए तो गलत न होगा ।

पीछे वाले नकाबपोश ने अपने बूट की ठोकर उसकी पीठ में इतनी जोर से मारी थी कि 'पट्ठा' सड़क पर सीधा उस नकाबपोश के कदमों में जाकर गिरा जिसने फोटो और चिट्टियों के बारे में पूछा था !!

शेखर अभी सड़क से उठने की कोशिश शुरू भी नहीं कर पाया था कि जिसके कदमों में गिरा था उसने झुककर बाल पकडे तथा पूरी बेरहमी के साथ ऊपर उठाता हुआ गुर्राया----""ज्यादा चालाक बनने के कोशिश करोगे तो जिस्म से छलनी कर दिया जाएगा और लाश यहीं इसी सडक पर आवारा कुत्ते की लाश की तरह डाल दी जाएगी ।"

 


शेखर के हलक से चीखें उबल रही थीं ।

कुम्भकरण सरीखा नकाबपोश गुर्राया----“तुम अच्छी तरह जानते हो कि हम कौन से फोटो और चिट्ठियों की बात कर रहे हैं?"

"म-मैं-मैं ........।" शेखर मिमियाकर रह गया ।

तभी एक नकाबपोश ने कहा-इससकी तलाशी लेनी चाहिए पहलवान !"

"'लो।" कुम्भकरण सरीखा नकाबपोश चुन्दू पहलवान था ।

तब !

दो नकाबपोशों ने आगे बढ़कर तलाशी ली किन्तु जिन फोटो और चिट्ठियों की तलाश थी वे न मिले----इस निराशा ने चुग्नू पहलवान को कुछ ज्यादा ही उग्र कर दिया-वह अभी तक शेखर मल्होत्रा के बाल कब्जाये हुए था । दांतों पर दांत जमाकर गुर्राया---“बता दे बेटे, बता दे कि फोटो और चिट्टियां कहां हैं ?"

" मुझे नहीं ......!"

रिवाल्वर का दस्ता 'फटाक' से शेखर के पेट में पडा, अभी इसी चोट की पीड़ा से विलविला रहा था कि चुन्नू पहलवान के कसरती घुटने की चोट सीने पर पडी ।

इस बार चीख के साथ शेखर मल्होत्रा सड़क पर चारों खाने चित्त जा गिरा ।

उठने के चेष्टा कर ही रहा था कि चारों का एक-एक बूट उसके जिस्म पर अाकर टिक गया ।

बिलबिलाकर रह गया वह ।

चुग्नू पहलवान झुका , अपने रिवॉल्वर की नाल शेखर की कनपटी पर रख दी उसने और बर्फ की मानिन्द ठ'डे स्वर में गुर्राया----"आखरी वार पूछ रहा हूं ---बता दे, नहीं बतायेगा तो गोली भेजे के अार-पार हो जाएगी ।"

"बताता हूं .... बताता हू।” शेखर मल्होत्रा चीखा तभी !

दाई तरफ हेडलाइंट नजर अाई ।

"कोई आ रहा है पहलवान ।" एक नकाबपोश चिल्लाया !"

"प-पुलिस !" दूसरा चीखा--वह पुलिस की जीप है!

चुन्नू पहलवान दहाड़ा---“तुझें कैसे पता ?"

"व-वह अभी-अभी एक 'पोल' के नीचे से गुजरी थी, मैंने उस पर लिखा "पुलिस" पढ़ा है ।"

“भागो पहलवान ।" दूसरा चिल्लाया---"जीप नजदीक आ रही है ।"

"और !"

एक झटके से चारों के पैर शेखर मल्होत्रा के जिस्म से हट गए ।

जव उसे भी सड़क पर फैला जीप की हैडलाईंट का प्रकाश दिखाई देने लगा था और उसी प्रकाश में दिखाई दिए सिर पर पैर रखकर भागते चारों नकाबपोश ।

जीप की तरफ से अक्षय की दहाड़ सुनाई दी----“कौन है, रुक जाओ ।"

परन्तु ।

रूकना किसे था ?

भागते हुए वे सडक के पास हैडलाइटृस की रेंज से बाहर चले गए ।

जिस्म का जोड़-जोड़ दुख रहा होने के बावजूद शेखर मल्होत्रा उछलकर इस तरह खडा हो गया जैसे कुछ हुआ ही न हो----सम्पूर्ण जिस्म पुलिस जीप की हैडलाइटृस में नहाया हुआ-सड़क के वीचों-बीच ख़ड़ा वह दोनों हाथ हवा में नचाता हुआ 'मदद' के लिए रुकने की दुहाई करने लगा ।

अचानक एक गाडी का इंजन जाग उठा ।

"धांय.......धांय !"

दो गोलियों चली ।

'झनाक-झनाक' की जोरदार आवाजों के साथ जीप की हैडलाईट बिखर गई !

शेखर मल्होत्रा ने खुद को न सिर्फ सड़क पर गिरा लिया बल्कि किसी तरह फुटपाथ की तरफ लुढ़कता चला गया-अधंकार से एक काली एम्बेसेडर प्रकट होकर सडक पर आई और कमान से छूटे तीर की तरह विपरीत दिशा में दौड़ ली ।

"धांय.......धांय .......धांय.......धांय !"

जीप से एम्बेसेडर के पिछले हिस्से पर गोलियां बरसाईं गयी ।

शक्तिशाली टॉर्चों के प्रकाश फेंके गए !

परन्तु व्यर्थ !

न कोई गोली उसके किसी टायर को 'शहीद' कर सकी, न ही नम्बर पढा जा सका, प्लेट गायब थी…पीछा करने में जीप इसलिए असमर्थ थी क्योंकि हैडलाइंट के अभाव से किसी भी तरह बिना नम्बर वाली काली एम्बेसेडर की रफ्तार के साथ नहीं दौड़ सकती थी---- हां बायरलैस पर अक्षय दहाड़ निःसन्देह रहा था !

आसपास की कोठियों में जाग होगयी थी !!!!

विश्वनाथ ने गाडी मैरेज में खडी करके कदम नाहर निकाला ही था कि सुलोचना देबी ने उन्हें लपक लिया और भयभीत स्वर में लगी उस घटना को बयान करने जो कुछ देर पहले घटी यी ।

वे चौंक पड़े ।

हॉल में पहुंच वहां की हालत देखी ।

टूटी हुई कांच की दीवारें और फर्श पर किरचे-किरचे बिखरा कांच ।

बैरिस्टर विश्वनाथ ने धीर--गंभीर स्वर में पूछा----“किरन कहाँ , कहाँ है ?"

"बिटिया तो तभी से अपने बेडरूम में है मालिक ।" सबसे पुराने नौकर ने बताया ।

विश्वनाथ ने किरन के बेडरूम की तरफ बढने के लिए कदम बड़ाया ही था कि ड्राइंग-कम-डाइनिंग हॉल में किरन की आवाज गूंजी…“मैं आ गई हूं पापा ।"

विश्वनाथ सहित सबकी दृष्टि आवाज की दिशा मैं घूम गई !

दरवाजे, मैं प्रविष्ट होती किरन के अधरों' पर 'चित्ताकर्षक' मुस्कान थी ।

विश्वनाथ ने मुकम्मल गम्भीरता के साथ फर्श पर बिखरे कांच की तरफ इशारा करते हुए पुछा--"' सब क्या है

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"संगीता के हत्यारे का पेट दर्द ।" किरन ने ज़वाब दिया है !

“क्या मतलब ? "

“मैंने रि-इंवेस्टीगेशन शुरू की थी---शेखर मल्होत्रा की कोठी की तरफ जा ही रही थी कि "अम्बेडकर मार्ग' पर मेरी गाडयी पर हमला हुआ, अंधाधुंध गोलियां चलाकर पहले उसके टायर 'शहीद' कर दिए गए और गोलियों की दूसरी 'खेप' में शीशे-अब यह हमला हुआ है, मुजरिम समझा कि मैं उसका इशारा नहीं समझती हूं, अत: इस बार उसके चमचे साफ-साफ कह गए कि अगर मैंने संगीता मर्डर कैस में दिलचस्पी लेनी बंद नहीं की तो अकेली को नहीं, बल्कि मेरे मां-बाप को भी मार डालेंगे । अाप तो बैरिस्टर है अनुभवी हैं-समझ सकते हैं कि इन शब्दों में मुजरिम की बौखलाहट छुपी है-क्या मैं आपसे सवाल कर सकती हू कि अगर संगीता का हत्यारा शेखर मल्होत्रा है तो किसी के पेट में इसलिए दर्द क्यों हो रहा है कि मैं इस केस में दिलचस्पी ले रही हुं ?"

"तो म यह सोच रही हो कि हत्यारा शेखर नहीं है और तुम्हारे 'एक्टिव' होते ही असल हत्यारे के पेट में दर्द शुरू गया है तथा वह तुम्हें डरा'-धमकाकर इस केस में दिलचस्पी न लेने से रोकना चाहता है ?"

"जाहिर है ।" किरन कहती चली गई-----"और केवल सोलह घंटे की मेहनत के बाद मैं ऐसी स्थिति में पहुंच गई पापा कि फैसले वाली डेट पर संगीता का मर्डर का फैसला नहीं होने दूगी, बल्कि इस केस के सम्बन्थ में हुई अब तक की अदालती कार्यवाही को निरस्त करा दुंगी , मुक्म्मल मुकदमें को ही गैरकानूनी साबित कर दूंगी मैं !

"वह कैसे ?"

"ये फोटो और चिट्ठियां देखिए ।" कहने के साथ ही किरन ने अपना दायां पांव डायनिंग टेबल के साथ ही एक कुर्सी पर रखा, सलवार का पायंचा थोड़ा ऊपर सरकाया 'हेयर-बैण्ड' की मदद से अपनी पिंडली के साथ चिपकाया लिफाफा निकालकर उसे पकड़ाती हुई बोली----"यह वह लिफाफा है जिसमें वे फोटो और चिट्टियां हैं जिनके चक्कर में हमलावर मेरा पर्स ले गए…ऐसी घटना का मुझे अंदेशा था, लिफाफा पर्स से निकालकर तभी यहां रख लिया था जब राय अंकल के घर से बस द्वारा यहाँ आ रही थी ।"

"इस लिफाफे में वे फोटों और चिट्ठियां हैं न जिनसे यह स्पष्ट होता है कि संगीता की मां के मिस्टर राय से अवैध सम्बन्ध थे और संगीता मिस्टर राय की बेटी थी ?"

“आप राय अंकल के यहाँ से अा रहे हैं ।" किरन ने कहा---“ओर आपकी इस बात का अर्थ ये हुआ कि राय अंक्ल ने आपको फोटो और चिट्ठियों के बारे में बता दिया है ?"

 


"हां ।" बैरिस्टर साहब ने गम्भीर स्वर में क्या…"उन्होंने हमें सब कुछ बता दिया है--फोटो और चिट्ठियों के बारे में भी, तुमसे हुई बातों के बारे में भी और यह भी कि तुम क्या सोच रही हो…उनका कहना है कि इसमें कोई शक नहीं कि संगीता उनकी बेटी है, मगर यह गलत है कि उन्होंने संगीता का मर्डर इसलिए कर दिया क्योंकि वह इस रिश्ते को सार्वजनिक बना देना चाहती थी---संगीता को तो हकीकत मालूम भी न थी और शेखर के केस के बारे में वे कहते हैं कि जानबूझकर कुछ नहीं किया बल्कि जब शेखर ने अपनी कहानी सुनाई थी तो उन्हें वाकई ऐसा लगा कि कहानी में दम नहीं है, कोर्ट में नहीं चलेगी और इसीलिए उन्होंने अपनी बनाई हुई कहानी पर केस लड़ा ।"

"अगर कल कोर्ट में खडी होकर मैं अपनी बात कहू और वे अपनी, तो जज को कौन-सी ज्यादा सटीक लगेगी ?"

“तुम्हारी ।"

"बस ।" किरन मुस्कुरा उठी---"ये है मेरी आपक्रो पहली पटकी ।"

"क्या मतलब ?"

"फैसले की तारीख वाले दिन मैं इन चिट्ठियों और फोटो के बूते पर कोर्ट से विशेष अनुमति लेकर यह साबित कर दूंगी कि मुकम्मल केस के दरम्यान शेखर मल्होत्रा का बचाव किसी वकील ने नहीं किया----दोनों वकीलों का मकसद शेखर को मुजरिम साबित करना था-क्या ऐसे केस की अब तक सम्पूर्ण अदालती कार्यवाही निरस्त नहीं हो जाएगी पापा, और क्या वह केस पुन: ए बी भी डी से शुरू नहीं होगा । जिसमें यह साबित हो जाये कि बचाव पक्ष का वकील बचाव नहीं बल्कि बचाव का नाटक कर रहा था, उसका असली मकसद भी वही था जो सरकारी वकील का था ।"

"'निसन्देह तुम इस केस की अब तक के सम्पूर्ण अदालती कार्यवाही को निरस्त करा सकती हो ।"

.""आदाब अर्ज है पापा ।" बेहद प्यारी मुस्कुराहट के साथ किरन 'आदाब' के अन्दाज में झुकी और इसी अन्दाज में झुके-झुके बोली---" साथ ही इस बात के लिए भी बधाई देती हूं आपने इस पहले प्वाँइन्ट पर खुले दिल से शिकस्त कुबूल की ।"

"यह सब तो ठोक है, मगर क्या तुम यह सोच रही हो कि हमले मिस्टर राय ने कराये हैं ?"

किरन ने कहा---पहले वह सुन लिजिए जो मैंने सुबह से अब तक किया है अथवा मेरे साथ घटा है क्योंकि उस सबको जाने विना आपके पल्ले यह नहीं पडेगा कि मैं क्या कर रही हूं !!!

“बोलो ।"

एक बार शुरू होने के बाद किरन ने सांस तक न ली---सब कुछ धाराप्रवाह बताती चली गई वह और जैसे-जैसे बताती गई वैसे-वेसे बैरिस्टर विश्वनाथ के चेहरे पर हैरत के भाव स्थायी होते चले गए ।

लम्बी सीस लेने के बाद वह बोली…“अब बस पहले यह बताइये कि सारे दिन की वारदातें सुनने के बाद भी क्या आप शेखर मलहोत्रा को उतनी ही दृढ़ता के साथ हत्यारा मानते हैं जितना दृढता के साथ सुबह तक मान रहे ये ?"

"यह सवाल हमसे क्यों पूछ रही हो ?"

“अगर आप इस वक्त भी शेखर मल्होत्रा को उतनी ही दृढता के साथ हत्यारा मानते हैं तो बाकी किरदारों के वारे में सोचना या विचार करना बेकार है और यदि आपकी द्रुढ़ता में कहीं कमी आई हो तो बात पर गोर किया जाये कि अन्य किरदारों में से कोई हत्यारा हो सकता है या नहीं और अगर हो सकता है तो कौन ?"'

"तो सबसे पहले किस किरदार को ले रही हो ?"

"आपको !"

"ह-हमें ?" बैरिस्टर साहब उछल पडे़।

किरन उनकी आंखों में झांकती हुई बोली---"क्यों, क्या अाप इस केस के एक अहम किरदार नहीं हैं ?"

"संगीता हमारे दोस्त की बेटी थी--------- अगर हम दोस्त के लिए करना चाहते थे तो संगीता का नहीं वल्कि शेखर का मर्डर करते यानि उदेश्य नदारद है और कोई भी हत्या निरुद्देश्य नहीं हो सकती अर्थात् नहीं लगता कि हम कातिल हैं ।"

किरन मुस्कुराकर बोली…“अपने-आपक्रो बड़ी जल्दी बरी कर लिया आपने ?"

"क्या दलील स्वीकार नहीं की गई है"'

"सम्भावित हत्यारों की लिस्ट में से किसी का भी नाम तव तक नहीं कट सकता जब तक असती हत्यारा पकडा न जाये !"

“अगला प्रत्याशी कौन है ?"

"राय अंकल ।"

" उनके बोरे में अपने पवित्र विचार प्रस्तुत कर ही चुकी !"

"अभी उनसे इस सवाल का जवाब हासिल करना है फोटो और चिट्टियां रधिया के कमरे में क्या कर रहे ?!!

"जवाब वे हमें दे चुके हैं ।"

"क्या ? "

“कोई रहस्यमय शख्स इन फोटुओं और चिट्ठियों के बूते पर उसे ब्लैकमेल कर रहा था--कई बार मोटी रकम ऐंठ भी चुका था वह…काफी कोशिश के बावजूद मिस्टर राय न जान सके कि ब्लेकमेलर कौन है, इस सवाल का उनके पास कोई जवाब नहीं है कि सारा माल रधिया के कमरे में कैसे था ?"

खेर ! इस वक्त हमारा विषय यह जानना नहीं है कि ब्लैकमेलर कौन था, अत: इस मुद्दे पर कभी फिर विचार करेंगे-"फिलहाल हमारा अगला प्रत्याशी है इंस्पेक्टर अक्षय ।"

"क्या वह तुम्हारे सन्देह के दायरे में है !"

"है !"

"कैसे ?"

"अपनी इन्वेस्टीगेशन के दरम्यान उसने रधिया से वह सवाल क्यों नहीं किया जो कि सबसे पहले किया जाना चाहिए था--यह कि रधिया को थाने का नम्बर कैसे मालूम था ?"

उसके द्वारा संगीता की हत्या का उद्देश्य ?"

"अभी तक अज्ञात है ।"

"'अगला प्रत्याशी ?"

" गुलाब चन्द जैन ?"

"ग-गुलाब चन्द जैन ?" बैरिस्टर साहब उछल पडे़---"यानि तुम्हें मरे हुओं पर भी शक हो रहा है ?"

"मत भूलिए कि गुलाब चन्द की लाश ठीक से पहचानी नहीं गई थी-क्या ऐसा नहीं हो सकता कि संगीता का मर्डर करने से पहले उन्होंने खुद अपनी मौत का नाटक रचा हो ?"

"संगीता की हत्या वह क्यों करेगा ?"

“शायद पता लग गया हो कि संगीता वास्तव में राय अंकल की बेटी है ।"

"कारण मजबूत है मगर है जरा दूर. की अगला प्रत्याशी ? "

"स्वयं संगीता ।"

" क- क्या बात है ?" बैरिस्टर साहब उछल पड़े-“तुम तो मुर्दों को जिन्दा करने पर आमादा हो गई हो ।"

“लाश अगर पहचानी न जा सके तो इन्वेस्टीगेटर को लगातार इस बात पर गोर करते रहना चाहिए कि लाश उसकी थी या नहीं जिसको दर्शाने की कोशिश की जा रही है !"

"यानि संगीता ने खुद अपने मर्डर का नाटक स्टेज किया हो सकता है ?"

"जरा सोचिये पापा कि यह बात कितनी रोमांचकारी होगी कि "संगीता मर्डर केस' की मुजरिम खुद संगीता निकले--क्या आपके जीवन में कभी ऐसा हुआ है कि जिसके हत्यारे की आप खोज कर रहे हो, हत्यारा वहीं

निकले ?"

"मगर संगीता को यह सब करने की क्या जरूरत थी?"

"भारत में आकर वह सती सावित्री भले ही बन गई हो, पर लंदन में उसका जो कैरेक्टर मैंने अपनी आंखो से देखा , अगर उस पर गोर फरमाया जाये तो दावे के साथ कह सकती हुं, कि संगीता कुछ भी कर सकती है, कहने का मतलब यह कि फिलहाल उसे अपने सन्देह के दायरे से बाहर नहीं रख सकती ।"

"यह कौडी गुलाब चन्द के कातिल होने से भी ज्यादा ऊंची है---खेर, अगला प्रत्याशी ?"

"अतर एन्ड फेमिली का कोई मेम्बर, विशेष रूप से मेरा शक कमल पर है ।"

“इसीलिए न कि वे वारिस नम्बर दो हैं ?"

"यह एक सशक्त वजह है !"

"बून्दू निक्कू तुम्हारे सन्देह से बाहर है ?"

" सन्देह के दायरे से बाहर मैं तब तक किसी को नहीं निकाल सकती जब तक कि मुजरिम पकड़ न लिया जाये---इतना अवश्य कह सकती हूं कि बुन्दू-निवकू के हत्यारा होने की सम्भावना सबसे कम है ।"

"अगला प्रत्याशी है"'

"रमन आहूजा ।" किरन कहती चली गई-----" इस शख्स के हत्यारे होने की सस्थावनाएं काफी ज्यादा हैं----पहती बात ये कि हमले के तुरन्त बाद उससे हुई मुलाकात को मैं इत्तेफाक मानने के लिए तेयार नहीं हूं---दूसरी ये कि शेखर मल्होत्रा के 'फर्स्ट अप्रैल' प्लान की जानकारी उसे होने की सम्भावनाएं सबसे ज्यादा हैं ।"

"अगला प्रत्याशी है"'

"सुब्रत जेन या उसका बेटा जिसकी उमर इस वक्त पच्चीस साल होगी ।"

"ये कहां से पैदा हो गए !”

"हमें नहीं भूलना चाहिए कि सुव्रत जैन ने गुलाब चन्द और उनके सम्पूर्ण परिवार को खत्म करने की कसम खाई थी-- जहर उसने अपने बेटे में भी भर दिया हो सकता है ।"

“अगला प्रत्याशी ?"

 


" मेंरे ख्याल से बस.........लगभग सभी प्रमुख किरदारों पर हम गौर कर चुके हैं ।"

बैरिस्टर साहब के होंठों पर व्यंग्यात्मक मुस्कान उभरी बोले-तुम सबसे मुख्य किरदार को भूल गई ।”

" किसे ?"

"शेखर मल्होत्रा को ।"

"और आप शेखर मल्होत्रा को भूल नहीं सकते ।" किरन के होंठों पर उनसे ज्यादा व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट उभरी----इतने झमेले के बावजूद नहीं भूले ।"

"इसलिए नहीं भूले क्योंकि अभी भी उसके हत्यारा होने की सम्भावनायें ज्यादा हैं !"

"बह कैसे ?"

"हम तुम्हें एक कहानी सुनाते है ।" लम्बी सांस लेने ने बाद बैरिस्टर साहब ने कहना शुरू किया…“यू मानकर चलो कि हत्यारा शेखर मल्होत्रा ही है…संगीता की जुबानी उसे यह घटना मालूम थी कि एक बार जब वह चोर साबित हो चुकी थी तो तुम्हारे पास आई-पैरों में पडकर रोई-गिड़गिड़ीाई, कहा कि वह चोर नहीं है और तब तुम भावुक होकर उसे बेगुनाह साबित करने निकल पड़ी-केहने का मतलब ये कि शेखर मल्होत्रा को तुम्हारा 'कैरेक्टर' मालूम था-वह जानता था कि तुम भावुक हो और अगर कोई तुमसे प्रभावशाली ढंग से कहे कि वह बेगुनाह है तो तुम उसे बेगुनाह मान लेती हो----ते वह ठीक संगीता की-सी तर्ज पर तुम्हें फंसाने आँफिस में अाया ।"

"'आप तो बडी ऊंची उडान भर रहे है पापा हैं'

"टोको मत, सुनती रहो किरन-तुम उसके जाल में फंस गई यानि रि'-इन्वेस्टीशन करने निकल पडी । दिमाग में बस बैठाने के लिए कि तुम्हारे रि-इन्वेस्टीगेशन पर निकल पड़ने से ‘असली हत्यारे' के पेट में दर्द शुरू हो गया है, उसने किराये के आदमियों द्वारा अम्बेडकर मार्ग पर हमला करवाया-तुम्हारे शेखर की कोठी पर पहुंचने और अतर एन्ड फेमिली के सामने यह कहने से उनमें खलबली मचनी ही थी कि तुम शेखर को बेगुनाह साबित करने के अभियान पर निकली हो-इसलिए नहीं कि संगीता की हत्या से उसका कोई सम्बन्थ है बल्कि इसलिए कि अगर शेखर बेगुनाह साबित हो गया तो जो दौलत भगवान ने उन्हें छप्पर फाड़कर दी है वह हाथ से निकल जाएगी-इत्तेफाक से उनकी बाते बुन्दू ने सुन ली और तुम्हें आकर बता दीं…तुम उनसे बात करने कोठी के ड्राइंग हॉल में गई…वहां शेखर ने अपने किसी राजदार अथवा मददगार द्वारा पहले ही गुलाब चन्द की ताश बाला ड्रामा "स्टेज" कर रखा था जो_ बुन्दू की गर्दन दबाने की नाकाम कोशिश के साथ तुम तक लाया गया…पुलिस की मदद से तुम स्टडी का दरवाजा तोडकर तहखाने तक पहुंची जहाँ तुम्हें दिखाने के लिए शेखर ने पहले ही रधिया का काल करके लाश डाल रखीं थी और ऐसे सबूत छोडे हुए थे कि जिन्हें तुम आसानी से पकड तो-शेखर ने तुम्हें संगीता के काल्पनिक हत्यारे का वही 'कद' बताया जो कि उसने रधिया के हत्यारे का तहखाने में 'प्लांट' किया गया था----यहाँ तुम्हें पूरा यकीन हो गया कि हत्यारा शेखर मल्होत्रा नहीं है-यही वह चाहता था-इतना समझदार वह है कि यह समझ सके कि तुम कब क्या सोचोगी और क्या "स्टेप लोगी' यानि वह जानता वा कि रधिया की मौत के बाद तुम उसके कमरे की तलाशी ले सकती हो ------सो, वहाँ मिस्टर राय के फोटो और चिट्ठियों का लिफाफा प्लांट कर दिया यानि जिन फोटो और चिट्ठियों के बूते पर वह मिस्टर राय को ब्लैकमेल किया करता था उनका इस्तेमाल अब उसने तुम्हारा ध्यान मिस्टर राय पर केन्दित करने में किया-जिस सवाल की तुमने इतनी हाय-तीजा मचा रखी है उसका जवाब बडा सीधा-सा है, यह कि रधिया को थाने का नम्बर इसलिए मालूम था क्योंकि गहने चोरी होने के बाद संगीता अक्सर अक्षय से फोन पर बात करती धी और उसके लिए नम्बर मिलाती थी रधिया-यहीं हम यह भी कहेगे कि गहनों का चोर भी कोई नहीं बल्कि खुद शेखर मल्होत्रा ही था, इसलिए अक्षय आज तक चोर पकड़ नहीं पाया…सुब्रत जैन से जुडी कहानी भी उसने तुम्हें बुरी तरह उलझाने के लिए सुनाई-वह यह भी जानता था कि लन्दन में संगीता को चोरी के इल्ताम में पकड़वाने वाला रमन आहूजा ही है और अच्छी तरह जानता था कि उसे पहचानते ही तुम्हारे दिमाग पर क्या प्रतिक्रिया होगी-उस प्रतिक्रिया को होने देने के लिए वह तुम्हें वहां ले गया…अम्बेडकर मार्ग पर रमन आहूजा का तुम्हें मिलना इसलिए इत्तेफाक नहीं था क्योंकि शेखर मल्होत्रा जानता था कि उसकी फैवट्री का लंच टाइम क्या है और रमन आहूजा वहां से लगभग कितने बजे गुजरेगा अपने किराये के गुन्डों से शेखर ने हमला ठीक उसी समय कराया जबकि वहाँ से रमन आहूजा को गुजरना था…सोचा तो शेखर ने यही होगा कि तुम रमन को वहीं पहचान जाओगी मगर इत्तेफाक से वैसा न होकर रमन आहूजा के फ्लैट पर हुअी----मिस्टर राय की कोठी से बस द्वारा यहाँ अाते वक्त तुमने शेखर के सामने ही लिफाफा पिंडली पर लगाया होगा----सो, उसे मालूम था कि पर्स में कुछ नहीं है मगर अपने आदमी भेजकर उसने तुम पर यह जता दिया कि अपराधी फोटो और चिट्ठियां हासिल करने के लिए मरा जा रहा हे-अपनी इस हरकत से उसने अपने दो उल्लू सीथे किये-पहला यह कि तुम यह सोचने लगी कि अगर हत्यारा शेखर होता तो उन फोटो और चिट्ठियों को तुम्हारे चंगुल से निकालने की कोशिश क्यो करता जिनसे तुम अब तक के मुकदमें की कार्यवाही निरस्त करा दोगी-----दूसरा ये कि तुम्हारे दिमाग में यह सब ठूंसनै के बावजूद मुकदमें को निरस्त कराने का मसला तुम्हारे पास पहुचा ही दिया-तात्पर्य ये कि तुम्हारे दिमाग को विभिन्न किरदारों में उलझाकर वह खुद को तुम्हारे जरिए : एक ऐसे केस से निकल लेना चाहता है जिसमें गर्दन तक फंस चुका था ।"

“ गुड पापा, वेरी गुड !" किरन इस वार व्यंग्य से केवल मुस्कुराई ही नहीं बल्कि ताली बजा 'उठी-"अपनी बेटी को तो आपने दिमाग से बिल्कुल ही पैदल साबित कर दिया-आपको तो हर तरफ शेखर मल्होत्रा ही शेखर मल्होत्रा नजर आ रहा है, मैं जो कर रही हु, वह शेखर मल्होत्रा ही करा रहा है-मैं सोच रही हूं वह भी शेखर मल्होत्रा सुचवा रहा है-आपकी इस कहानी का तो सीधा- साधा मतलब यह निकला कि किरन अग्निहोत्री न अपने दिमाग से कुछ कर रही है, न सोच रही है---' किसी को अपने विचारों पर दृढ रहना सीखना हो तो वह आपसे मिले ---अापने एक बार जिसे मुजरिम मान लिया, सो मान लिया, आप उसके फेवर में कोई दलील सुनने तक की गुंजाइश अपने दिमाग में नहीं रखते मगर ।"

"मगर ? "

"संगीता मर्डर केस की रि'-इन्वेस्टीगेशन के पीछे मेरा मकसद केवल शेखर मल्होत्रा को बेगुनाह साबित करना नहीं बल्कि चक्रव्यूह के पीछे छुपे असली हत्यारे को बेनकाब करके सामने लाना है ......

और जो बात मैं नहीं समझा पा रही हू वह बात आपको उस दिन समझा दूंगी जिस दिन असली मुजरिम को कानून के हवाले करूंगी ।"

बैरिस्टर साहब कुछ कहना ही चाहते थे कि फोन की घन्टी घनघना उठी ।

विश्वनाथ ने रिसीवर उठाया और कहा---“बैरिस्टर विश्वनाथ हियर ।"

"इंस्पेक्टर अक्षय बोल रहा हू ।" दूसरी तरफ़ से कहा गया …"क्या किरन जी घर पर हैं ?"

"हां, बोलो क्या बात है ?"

और फिर !

जो दूसरी तरफ़ से कहा गया उसे सुनकर बैरिस्टर साहब उछल पड़े बोले----" क्या.....कब हुआ ये, कहां और केसे हुआ, क्या हमलावर पकडे़ गये ?"

"दूसरी तरफ़ से उसके सभी सवालों का जवाब मिला ।

किरन ने तब पूछा जबकि रिसीवर क्रेहिल पर रख चुके…"क्या हुआ पापा ?"

"इंस्पेक्टर अक्षय का फोन था…शेखर मल्होत्रा पर उसकी कोठी के ठीक बाहर उस वक्त हमला हुआ जब वह बस स्टॉप से कोठी की तरफ जा रहा था, अक्षय के हमलावर विना नम्बर प्लेट वाली वाली एम्बेसेडर में सवार थे और मल्होत्रा का बयान ये है कि वे उनसे किन्हें फोटो और चिट्ठियों का पता पूछ रहे थे ।"

चिंतित किरन ने सवाल किया…“इस वक्त शेखर कहा' है ?"

"अस्पताल में ।"

किरन के होंठों पर जहर बुझी व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट नाच 'उठी-"आप थोडा गलत बोल गए पापा ।”

"क-क्या ?"

" आपको ये कहना चाहिए था कि शेखर मलहोत्रा ने खुद को इसलिये जख्मी करा लिया ताकि किरन अग्निहोत्री यह सोचे कि वे गुन्डे भला उसके कैसे हो सकते हैं !"

बैरिस्टर साहब सकपकाकर रह गये !

किरन तेज कदमों के साथ हॉल से बाहर निकल गई !

"अरे !" बैरिस्टर साहब चोंकै-“रात के इस वक्त तुम कहाँ चल दीं ?"

"अस्पताल ।" किरन ने संक्षिप्त जवाब दिया ।

"दिमाग खराब हो गया है क्या ?" बैरिस्टर साहब बिगड गए-“ये कोई टाइम है कहीं जाने का और उस पर भी तब जबकि आज ही अाज में तुम पर दो हमले हो चुके हैं ! "

एकाएक किरन उनके नजदीक आईं, बोली--"आपको यकीन है न कि वे हमले मल्डोत्रा ने कराए थे ?"

" फिर ? ”

"तब तो आपको मेरे बाहर जाने से डरना ही नहीं चाहिए !"

" क्यों ?"

" कयोंकि शेखर मल्होत्रा हमले चाहे जितने करवाए मरवा नहीं सकता मुझे , अगर मैं मर गई तो क्रोर्ट में अव तक हुई संगीता मर्डर केस की कार्यवाही को निरस्त कौन करायेगा , बेगुनाह कौन साबित करेगा उसे ?”

बैरिस्टर साहब सकपका गये !

" मगर मैं इतना इतेफाक नहीं रखती पापा,

मैं ये समझती हूं कि हमलावर जो भी है वह ज्यादा परेशान होकर मुझे खत्म भी कर सकता है इसलिए आपकी सेफ से ये रिवॉल्वर निकाल कर अपने साथ ले जा रही हूं ।" कहने के साथ उसने जपने दाये हाथ में मौजूद रिवॉल्वर उनहें दिखाया ।

किरन के भभकते चेहरे पर नजर पड़ते ही जाने क्यो ब्रैरिरटर साहब के सम्पूर्ण जिस्म में सनसनी-सी दौड़ गई, गुस्से को काबू करके बोले---समझने की कोशिश करों वेटी तुम एक ऐसे चवकर में उलझ गयी हो जिसमें उलझने की तुम्हारी उम्र नहीं है, भूल जाओं इस चक्कर को, अपने दिमाग को इस सनक से आजाद कर तो ।"

इस बार किरन के होंठों पर ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण चेहरे पर व्यंग्यात्मक भाव फैल गए-आंखें जुगनुओं की मानिन्द चमक रही थी, बैरिस्टर साहब के बेहद नजदीक पहुंचकर बोली वह…“मैं एक किरदार के बारे में नए सिरे से अपनी राय व्यक्त करना चाहती हूं पापा !"

"किसके वारे में हैं"'

"किरदार नम्बर एक के बारे में, अपके बारे में ।"

"प-पागल हो गयी हो क्या है"'

"आप भी शुरू से वही चाहते हैं जो मुजरिम चाहता है…यह कि मैं इस मामले में दिलचस्पी न लूं , यह कि रि'-इन्वेस्टीगेशन छोड़ दूं और यह कि मैं अपने कदम वापिस खींच लूं ।"

"हम नहीं, एक बाप का दिल ऐसा चाहता है किरन ।"

"बाप का दिल एक आड़ भी हो सकती है ।" किरन कहती चली गई…"मुझे इंक्वायरी करनी होगी कि कहीं मुजरिम बाप के दिल की आड़ तो नहीं ले रहा है---कम-से-कम अापसे मैंने ऐसी अपेक्षा नहीं की थी कि अाप मुझें सच्चाई की खोज करने से रोकेंगे-----आपसे तो सहयोग मिलने की उम्मीद थी मुझे और यह कहते हुए अफसोस हो रहा कि----

इस मामले में आपकी हर गतिविधि मेरी उम्मीदों के एकदम विपरीत है ।" कहते ही वह एक झटके के साथ पलटी और ऊची ऐडी वाली सैंडिल से "खट -- खट" करती दरवाजे की तरफ बढ़ गई ।

अभी वह आधा ही रास्ता तय कर पाइं थी कि बैरिस्टर विश्वनाथ ने कहा ----“ठहरो किरन !"

किरन ठिठकी ।

पलटी और बोली----"प्लीज पापा, अब मुझे रोकने की कोशिश न कीजिएगा क्योंकि चक्रव्यूह के मध्य में पहुंचकर अगर कोई शख्स हथियार डाल दे उसकी मौत निश्चित !! "

"हथियार हम डाल रहे हैं बेवकूफ लड़की ।"

“क्या मतलब ?"'

"हमसे क्या सहयोग चाहती थी तुम ?" बैरिस्टर साहब का रुख और लहजा बदला हुआ था ।

किरन ने उन्हें ध्यान से देखा, कुछ देर अपने पापा के बदले रूख का सबब जानने की असफल चेष्टा करती रही और बोली---"अापसे वैचारिक सहयोग चाहती थी, कि अाप मुझें रोकें नहीं, बल्कि सच्चाई की खोज में अागे बढ़ने के लिए प्रेरित करें, मेरी पीठ ठोकें और जहाँ कहीं भटक रही होऊं वहाँ मुझे रास्ता दिखाएं, मार्ग दर्शन करें मेरा ।"

" ठीक है, अब से हम वही करेगे जो तुम चाहोगी !"

"यानि ?"

"हम तुम्हारे साथ अस्पताल चल रहे है ।" कहने के साथ व आगेे बढे ।"

किरन अपने पापा के इस निर्णय पर दंग रह गई और अभी वह इस बदले हुए निर्णय का कारण जानने की चेष्टा कर ही रही थी कि बैरिस्टर विश्वनाथ नजदीक पहुंचे, उसके सिर पर सनेह -भरा हाथ रखकर बोले----" चलो !'

वे चल दिए । तीनों नौकर और सुलोचना देबी असमंजस में पड़े उन्हें

जाता देखने के अलावा कुछ न कर सके और उस ववत बैरिस्टर साहब गेरेज़ से गाड़ी निकाल रहे थे जब टैक्सी नम्बर यू बी एक्स 4889 कोठी के ठीक सामने रुकी ।

किरन ने उसके ड्राइवर से बात की ।

पिछली सीट के नीचे से अपनी चीज निकाली और बैरिस्टर साहब से ड्राइवर को पांच सौ रुपये दिलवाकर उसे विदा किया-कुछ देर बाद उनकी फियेट सूनी पडी सड़को को रौंदती अस्पताल की तरफ भागी जा रही थी…कार ड्राइव करते बैरिस्टर साहब ने बगल में बैठी किरन से सवाल किया---“टैक्सी की पिछली सीट के पृष्ट भाग में तुमने क्या छुपा रखा था ?"

"संगीता की मां और राय अंकल के फोटुओं के निगेटिब्स । किरन ने बताया । '

“ओह !"

"शायद ये फोटो कल मुझे साफ-साफ़ बता देगे कि हत्यारा कौन है ?"

"कैसे ?"

"संगीता का कत्ल वैसे ही चाकू से हुआ है जैसा शेखर ने खरीदा था, अत: इस बात की बहुत ज्यादा सम्भावना है कि पहली अप्रैल वाले दिन शेखर के बाद इनहीं किरदारों में से किसी ने शेखर जैसा चाकू खरीदा हो---अगर ऐसा हुआ होगा तो चाकू विक्रेता बता सकता है कि चाकू किसने खरीदा था ।"

“वेरी गुड !" बैरिस्टर साहब कह उठे---"" तेज चल रहा है तुम्हारा दिमाग ।"

किरन ने पुन: व्यंग्य क्रिया---"क्या हमारा समझौता नहीं हो गया है ?"

बैरिस्टर साहब चुप रह गये । गाडी में खामोशी छा गई थी । लम्बी छाती जा रहीं खामोशी को पुन: बैरिस्टर साहब ने ही तोडा, बोले…“अन्यथा न ले तो एक बात कहें ?"

"बोलिए ?''

"रिवॉल्वर हमेँ दे दो !"

" क्यों ?"

"चलाना तो , रिवॉल्वर अपने हाथ में तुमने लिया ही पहली बार है ऐसे शख्स के हाथ में रिवॉल्वर हो जो उसे चलाना न जानता हो तो रिवॉल्वर किसी और को नहीं बल्कि उसी को चोट पहुंचा सकता है जिसके हाथ में हो---किसी भी किस्म के खतरे का मुकाबला करने के लिए हम तुम्हारे साथ हैं, रिवॉल्वर की बाकायदा ट्रेनिंग ली है हमने, अतः अगर हमारी जेब में रहे तो किसी भी किस्म के हमले के वक्त कारगर सिद्ध हो सकता है ।"

 


किरन ने बिना किसी किस्म का विरोध किये रिवॉल्वर उनकी तरफ बढा दिया ।

अभी तक चाकूवाले की दुकान क्यों नहीं खुली हैं?" किरन ने चाकू विक्रेता के पड्रोसी से पूछा----" औंर तुम भी अपनी दुकान खोलते ही क्यों बन्द कर रहे हो ?"

"कपड़ा विक्रेता ने कहा---" अाप देख नहीं रहे हैं कि सारा बाजार बन्द होता जा रहा है ?"

“मगर क्यों ?"'

" अभी अभी खबर अाई है कि पिछली रात किसी ने चाकू विक्रेता की हत्या कर दी ।"

“वया ?" किरन उछल पड़ी----"' हत्या कर दी है ?"

" जी हां , बाजार इसीलिए बंद हो रहा है ---- सब लोग उसके घर जायेंगे !"

परन्तु !

कपड़ा बिक्रेता के मुंह से निकलने वाला एक भी लफ्ज किरन के कानों तक नहीं पहुंच रहा था----कानों ही में नहीं बल्कि सम्पूर्ण दिमाग में सांय-सांय की एक ऐसी आवाज गूंज रहीं थी जैसे रेगिस्तानी तूफान से पैदा होती है ।

क्या पिछली रात हुआ चाकू---विक्रेता का कत्त्ल महज एक इत्तेफाक है ? क्या चाकू-विक्रेता का कत्ल करने की जरुरत संगीता के हत्यारे के अलावा किसी को थी ?

क्या हत्यारा समझ गया था कि मैंने सबके फोटो क्यों मांगे हैं ?

मेरी एक-एक एक्टिविटी पर नजर है उसकी-हजार आंखों से देख रहा है मुझे ।

सभी के फोटो मिलने के साथ धर से निकलते वक्त आज किरन को जाने कैसे लगा था कि वह हत्यारे के चेहरे से वाकिफ हो जायेगी---खुद को विशेष रूप से संवारा और निखारा था, उसने-पीले घाघरे के ऊपरी भाग पर एक ऐसा लम्बा ब्लाउज पहना था जिसके ऊपरी भाग में चुनरी का डिजाइन बना हुआ था, पीले परिधान से मैच मिलाकर उसके सोने के दस्तबंद, सोने के बूंदे और सोने का लाकिट कंठ में डाला था, एक-एक नाखून पांलिस से निखारकर यर से निकली थी वह ।

मगर इस वक्त !

बाजार में खडी किरन ऐसा महसूस कर रही थी कि हत्यारा जो भी है उसके सम्पूर्ण शरीर पर आंखें ही आंखें हैं और हर आंख उसे और सिर्फ उसी को घूर रही है- इस क्षण जाने क्यों उसे ऐसा भी महसूस हुआ कि चारों तरफ़ तने रिवॉल्वर भाड से मुंह फाडे उसके जिस्म को घूर रहे है ।

किरन ने घबराकर इधर-उधर देखा ।

कहीं कोई आँख, कोई रिवॉल्वर नजर नहीं आया उसे ।

मस्तक पर पसीना उभर आया था ।

दिमाग में विचार कौंधा कि वह बेवजह नर्वस क्यों हो रही है ?

आगे बढ़ गई ।

एक टैक्सी ली और ड्राइवर को चाकू-विक्रेता के रेजिडैंस का वह एड्रेस बताया जो आँफिस से पडी इस केस की फाइल में दर्ज था-टेक्सी ने गंतव्य की और यात्रा शुरू कर दी---किरन ने अपने दिमाग और आखों को आराम के लिए पुश्त से टिकाकर नेत्र मूंद लिए ।

पिछले दिन की सम्पूर्ण घटनाये फिल्म की मानिन्द जहन के पर्दे से गुजरने लगी ।

रात के करीब डेढ बजे वह और बैरिस्टर साहब शेखर मल्होत्रा के पास से लोटे थे-उसे काफी चोटें अाई थी मगर ऐसी कोई न थी जिसकी वजह से अस्पताल में एडमिट होता, अत: डॉक्टर ने पटृिटयां आदि करने के बाद इस 'इंस्ट्रक्शन के साथ विदाई दे दी थी कि एक-दो दिन आराम करे ।

एकाएक किरन के दिमाग में विस्फोट की तरह येह विचार कौंधा कि यह बात केवल और केवल बैरिस्टर साहब को मालुम थी कि सभी किरदारों के फोटुओं के साथ वह चाकू विक्रेता से मिलेगी । किरन अचानक सीधी और सतर्क होकर सीट पर बैठ गई !

"अ..... आप ....... आप यहां कैसे पहुंच गई ? " इंसरेक्टर अक्षय ने चौंकते हुये पूछा !

किरन ने कहा"इसका मतलब "यह इलाका भी आप ही के थाने के क्षेत्र में अाता है ?"

" हां मगर… ! "

“मगर ?"

“मैं आपकी यहां मौजूदगी का सबब नहीं समझ पा रहा !! "

"यह हत्या भी संगीता हत्याकांड के सिलसिले में हो, रही हत्याओं का एक हिस्सा है ।"

"क्या यह बात जाप सिर्फ इसलिए कह रही हैं क्योंकि मरने वाला संगीता हत्याकाड के मुकदमे से कनेक्टिड था ?"

"नहीं ! " किरन ने दुढ़त्तापूर्वक कहा-----""चाकू--विक्रेता की हत्या का कारण भी लगभग बही है जो रधिया की हत्या का था यानि इस बेचारे को इसलिए मारना पड़ा क्योकि यह मुझे हत्यारे के बारे में बता सकता था, बल्कि अगर यह कहा जाए तो गलत न होगा कि अपने बयान से यह हत्यारे के चेहरे पर चढा नकाब नोंच सकता था ।"

"मैं समझा नहीं कि अाप कहना यया चाहती हैं ?"

"आपको याद होगा कि कल मैंने सभी लोगों के फोटो मांगे थे?”

“हां ।" अक्षय श्रीवास्तव ने कहा…“ अपनी फोटो आजं सुबह मैंने एक सिपाही के हाथ भेजा था, आपकी मिल गया होगा !"'

एकाएक किरन ने उसे गहरी नजरों से धूरते हुए प्रश्न किया----"'क्या आपको मालूम था कि मैंने फोटो क्यों मांगे थे ?"

" म म मुझे क्या मालूम !" अक्षय श्रीवास्तव सकपका उठा ! " म-मैंने तो इस बारे में सोचा तक नहीं ।"

"नहीं सोचा तो अब सोचिये ।" उसके चेहरे पर आंखें टिकाये किरन अपने एक-एक शब्द पर जोर देती कहती चली गई------“सबकें फोटो मैंने क्यों मांगे होंगे, मेरे लिए क्या 'यूज' रहा होगा उनका ?"

" इंस्पेक्टर अक्षय श्रीवास्तव ने ऐसी मुद्रा बनाई जैसे कुछ' सोचने का प्रयत्न कर रहा हो, कुछ देर बाद बोला---" कुछ समझ नहीं पा रहा हूं, जाने आपने फोटो क्यों मांगे थे ?"

किरन की आंखें "शून्य' में तब्दील होकर उसके चेहरे पर गड़ी और बोली----अाप वाकई नहीं समझ पा रहे हैं या समझने के बावजूद नासमझी का नाटक कर रहे हैं ?"'"

"क-क्या मतलव ?" अक्षय श्रीवास्तव हड़बड़ा गया--“मैं नासमझी का नाटक क्यों करूंगा !"

"अगर अाप वाकई नहीं समझे तो मैं ये कहूंगी कि अाप इंस्पेक्टर नहीं, घसियारे हैं ।"

अक्षय श्रीवास्तव और ज्यादा सकपका गया ।

किरन कहती चली गई…"सबफे फोटो मैंने इसलिए लिए थे ताकि चाकू विक्रेता से पूछ सकू कि शेखर मल्होत्रा के बाद उससे उसी दिन, वैसा ही दूसरी चाकू 'इनमें' से और किसने खरीदा था----यह मेरी तिकड़म थी यानि हत्यारे ने चाकू उससे खरीदा भी हो सकता था और नहीं भी---मगर मेरे पहुंचने से पहले ही इसे खत्म कर दिया गया…हत्यारे की इस हरकत से अगर ज्यादा नहीं तो तीन बातें _ सपष्ट हो जाती हैं !”

"क्या-क्या? "

"पहली यह है कि उसने चाकू इसी चाकू विक्रेता से खरीदा था-----दूसरी यह है कि मेरे फोटो मांगते ही हत्यारा समझ गया कि मैं--विक्रेता से मिलूगी और तीसरी तथा सबसे महत्वपूर्ण बात है कि हत्यारा उन्हें में से कोई है जिसके मेरे पास फोटो हैं ।”

"किस-किसके फोटो हैं आपके पास ।"

किरन ने अपने लम्बे ब्लाउज की सामने वली जेब से बैरिस्टर साहब, शहजाद राय, अक्षय श्रीवास्तव, गुलाब चन्द, संगीता, रमन, आहूजा, अतर, सुमित्रा, संगम, राकेश, कमल, बुन्दू और निक्कू के फोटो निकाले तथा उन्हें "प्लेइंग-कार्ड' की तरह फैलाकर उन्हें दिखाती हुई बोली---"चाकू-विक्रेता की मौत ने मुझे इस नतीजे पर पहुंचा दिया है कि मुझे केवल उन व्यक्तियों के बारे में सोचना जिनके ये फोटो हैं, इनसे बाहर मुल्क में जो करोड़ों लोग है उनके बारे में सोचकर मुझे अपना दिमाग खराब करने की कोई जरूरत नहीं है !"

"म-मगर इसमें तो खुद तुम्हारे पापा शहजाद राय, गुलाब चन्द और संगीता के फोटो भी हैं ।"

“तो क्या हुआ ?" किरन ने कहा----“इनमें से कोई भी हत्यारा क्यों नहीं हो सकता ?"

इस बार इंस्पेक्टर कुछ बोला नहीं----, किरन की तरफ ऐसी नजरों से देखता अवश्य रहा जैसे उसे पूरा-पूरा विश्वास हो गया हो कि किरन 'क्रेक' हो चुकी है-द-फोटुओं को समेटकर वापस जेब में रखती हुई किरन ने पूछा--“चाकू-बिक्रेता की हत्या किस हथियार से की गई है ?"

"रिवॉल्वर से ।"

"किस वक्त ?"

"रात के ठीक दो बजकर पचपन मिनट पर मक्तूल की पत्नी, चार बच्चों और पडोसियों ने गोली चलने की आवाज सुनी--- जिसने सुनी वह जाग गया…मक्तूल की पत्नी को लगा कि गोली उसके मकान की छत पर चली हे…सो, वह भागकर छत पर पहुंची और चारपाई पर पडी अपने पति की ताश को देखकर दहाड़े मार-मारकर रो पडी ।'"

"यानि चाकू--विक्रेता छत पर सोया हुआ था ।"

 


"हां !"

"बीबी-बच्चे ?"

"नीचे चौंक में । अक्षय ने बताया-- "मकतूल की बीवी का कहना है कि वह छत पर इसलिए नहीं सोती थी क्योंकि बच्चे वहीं सोते थे जहाँ वह सोती थी और छत पर बच्चों को सर्दी लगने का डर रहता था ।"

“किसी ने किसी को भागते देखा ?"

"नहीं ।"

"क्या मैं लाश को देख सकती हुं ?"

"देख तो सकती है मगर प्लीज, फिगर प्रिन्टृस विभाग वालों के अाने से पूर्व लाश या उसके अास-पास की किसी वस्तु के साथ छेड़खानी न करे---मैंने पोस्टमार्टम और फिगर प्रिन्टृस वालों को फोन कर दिया है ।"

"चलिए ।" किरन ने कहा ।

और नब्बे गज में बने दो कमरों के छोटे से एक मंजिल मकान की "दुबारी' से वे चौक में पहुचे---मकान के बाहर वाकी भीड़ जमा थी परन्तु दरवाजे पर तैनात पुलिस वाले किसी को अंदर नहीं ----जाने दे रहे थे ।

अंदर वाले कमरे रोवा-राट मचा हुआ था ।

चौक के एक कोने से शुरू होकर छत तक चले गए इतने कम चौड़े जीने पर अक्षय के पीछे चढ़ती किरन छत पर पहुंची जिसमें से एक समय में एक ही व्यक्ति गुजर सकता था ।"

छत पर तेज धूप खिली हुई थी ।

टूटे बानों वाली ढीली चारपाई पर चाकू-विक्रेता की लाश पडी थी ।

आँखे बंद किये ।

मानो सो रहा हो ।

गोली उसके मस्तक के दाई तरफ, कनपटी के नजदीक यानि करीब-करीब वहाँ मारी गई थी जहाँ के लोग अक्सर आत्महत्या के इरादे से मारते हैं----काफी बडा 'सुराख' नजर अा रहा था वहां और सुराख के चारों तरफ जम चुका था मक्तूल का गाढा लहू।

खून का रंग काला पड़ चुका था ।

बहती रक्त उसके गाल से होकर दाढी के बालों और चारपाई के 'बानों' को भिगोत्ता छत पर गिरा था-इस वक्त सारा का सारा खून सूख चुका था और उस पर मक्खियां भिन्न-भिना रही थीं । भिनभिनाती मक्खियां मक्तूल की कनपटी पर बने गोली के सुराख के अन्दर तक घुसी हुई थी !

लाश पर नजरें टिकाये किरन ने कहा---"हत्यारे को मालूम था कि गोली की आवाज लोगों को जगा देगी और उसे दूसरी गोली चलाने का अवसर नहीं मिलेगा इसलिए उसने पहले ही गोली ऐसे स्थान पर मारी कि मक्तूल के मर जाने में किसी किस्म का सन्देह न रहे ।"

"गोली मक्तूल की कनपटी से रिवॉल्वर की नाल को बिल्कुल सटाकर चलाई गई है क्योंकि गोली के सुराख के चारों तरफ़ बारूद के कण 'जमे हुए' साफ नजर आ रहे है ।"

"ये "फुट स्टेप्स' किसके हैं ?" किरन ने कीचड द्वारा विलकुल साफ वने जूर्तों के निशानों की तरफ संकेत करके पूछा ।

"सम्भावना तो यही है कि निशान हत्यारों के जूतों के होने चाहिए ।”

"कमाल है ?" किरन चारपाई से लेकर छत की छोटी-सी पिछली 'मुंडेर' तक स्पष्ट वने जूतों के निशानों को देखती हुई बोली…“हत्यारा अपने जूतों के इतने स्पष्ट निशान छोड़ गया ।"

"मज़बूरी थी उसकी ।" अक्षय ने कहा'……'"यहां यानि मकान की छत पर पहुचने का उसके पास सबसे आसान रास्ता मकान के पीछे मौजूद वह अत्यंत संकरी गली थी जिसमें आसपास के सभी मकानों का पानी और मैल गिरता था तथा गली में इतनी कीचड़ है कि उससे बचकर कोई यहां पहुंच ही नहीं सकता ।”

अक्षय की बात खत्म होते-होते किरन सूखी कीचड़ से बने फुट-स्टैंप्स से खुद को बचाती छत की पिछली मुंडेर के नजदीक पहुंची, नीचे झांका-मुश्किल से एक मीटर चौड़ी और छत से केवल पन्द्रह फूट गहरी कीचड भरी गली थी वह…एक तरफ़ से दूसरी तरफ एक सड़क पर खुलती-दोनों तरफ़ बने मकानों के बंद, गन्दे पानी के पाइपों के मुह गली में खुलते थे…चाकू विक्रेता के मकान के पाइप के साथ-साथ दीवार पर उन्हीं जूतों के निशान थे । "

अच्छी तरह निरीक्षण करने के बाद पलटती किरन ने कहा---"हत्यारा आया भी इधर ही से था और गोली मारने के बाद भाग भी इधर से ही गया ।"

"जी हां ।"

अपने हाथ की "बिंलांद' से फुट-स्टेप्स को नापने का प्रयत्न करती किरन ने अक्षय से सवाल किया---" क्या रधिया की गर्दन या तहखाने से मिले बल्ब पर से उठाये गये अंगुलियों के निशानों की रिपोर्ट आ गई है ?"

"हां , मगर रिपोर्ट निराशाजनक है ।"

"क्यों ?"

"हत्यारे ने गलब्स पहन रखे थे ।"

"ओह ।" किरन ने निराशाजनक अन्दाज में उसकी तरफ देखा ।

पंचनामा होने के बाद लाश के पोस्टमार्टम के लिए रवाना होने तक लंच टाइम हो गया और "इंस्पेक्टर अक्षय को विदा करके किरन लंच हेतु उसी इलाके के एक होटल में दाखिल हुई ।

डायनिंग हॉल में ज्यादा भीड़ थी ।

एक कोने की मेज पर जाकर तन्हा-सी बैठ गई वह' तथा लंच के दरम्यान प्रत्येक पल संगीता मर्डर केस के बारे में सोचती रही---एक-एक किरदार जहन के पर्दे से गुजरता रहा, परन्तु किसी ठोस नतीजे पर न पहुंच सकी!!

लंच के बाद 'कसाटा' का इन्तजार कर रही थी कि अचानक चौंक पड़ी !!

बल्कि अगर यह कहा जाये तो गलत न होगा कि इस तरह उछल पड़ी जैसे सैकडों बिच्छुओं ने यूनियन बनाकर डंक मारा हो और उसके उछल पड़ने का कारण था शेखर मल्होत्रा ।

हालांकि शेखर मल्होत्रा की हालत ऐसी कतई न थी कि वह चल-फिर न सकता हो, मगर डॉक्टर ने आराम की सलाह दी थी वह स्वयं भी सख्ती से, विस्तर से न उठने के लिए कह कर अाई थी । मगर वह उसकी आंखों के सामने मौजूद था ।

वहां मौजूद था जहाँ उसके होने की किरन कल्पना तक नहीं कर सकती थी ।

उसके जिस्म पर इस वक्त एक ढीली-ढालीं, आंखों को चुभने वाले चटक लाल रंग की शर्ट थी-अत्यन्त घिसी हुई जीन , गले में हरे रंग का ऐसा मफ्लर जिस पर काले रंग के सर्प बने हुए थे !!!

पैरों में जूतों पर जैसे महीनों से पालिश नहीं हुई थी !!!

हॉल के दरवाजे पर खडा वह चारों तरफ खोजी दृष्टि ‘ से देख रहा था, किरन पर नजर पड़ते ही उसकी तरफ बढ गया

नजदोक पहुंचते-पहुचते शेखर मल्होत्रा के होंठ मुस्कुराने के अन्दाज में फैल चुके थे ।

किरन न मुस्कुरा पाई ।

लगभग गुड़क पड़ी वह…"तुम इस वक्त यहां क्या कर रहे हो ?"

"आप ही को दूढ रहा था !"

"क्यों ?"

"लगता है कि अाम लोगों की तरह आप भी धोखा खा रही है ।"

" धोखा -कैसा ? "

" आप मुझे शेखर मल्होत्रा समझ रही हैं न ?"

"समझ रही हूं मतल्ब ?" किरन उछल पड़ी----"त-तुम शेखर मल्होत्रा हो नहीं कया ? "'

"मैं तो शेखर मल्होत्रा ही हूं मगर बह शेखर मल्होत्रा नहीं है जिसे अाप शेखर मल्होत्रा समझती हैं ।"

" क -- क्या बक रहे हो तुम ?" आश्चर्य की पराकाष्ठा के कारण किरन के हलक से किल्ली सी निकल गई !!

' "वह मेरा जुड्रवां भाई है, विनोद मल्होत्रा ।"

"व-विनोद मल्होत्रा" किरन की हैरानगी का कोई ठिकाना न रहा----" ज---जुड़वा भाई ?"

“जी हां ।"

"म-मगर ऐसा कैसे हो सकता है ?" किरन चीख-सी पड़ी----“असम्भव--नामुमकिन-हालांकि तो उसका कोई भाई ही नहीं है और अगर होता, तब भी दोनों की शक्ल इस हद तक नहीं मिल सकती---जुड़वा भाइयों में भी कोई-न-कोई फर्क जरूर होता है----कद काठी, चेहरा-मोहरा ........सव कुछ सेम-टु-सेम नहीं हो सकता ।'"

" यही तो आश्चर्य की बात है किरन जी, हम दोनों सेम हैं --- यहां तक की आवाज भी मिलती है !"

बुरी तरह हैरान किरन ने कहा--लेकिन उसने तो नहीं बताया कि उसका कोई जुड़वां भाई है ।"

"वह भला क्यों बताने लगा हैं" कथित शेखर मल्होत्रा रहस्यमय ढंग से मुस्कुराया ।

"क-क्यों ...... नहीं बतायेगा ?"

“मेरे अस्तित्व तक को नकारता है वह ।"

" मगर क्यों ?" सस्पेंस की ज्यादती के कारण किरन चीख पडी ।

"आपकी इस छोटी सी क्यों के पीछे एक लम्बी कहानी छुपी है किरन जी-इतनी लम्बी कि मेरे पास उसे सुनाने का वक्त नहीं है ।"

उसे घूरती हुई किरन गुर्राई----अगर तुम यह सोच रहे हो कि मैं इस बकवास पर यकीन कर रही हू तो तुम बड़े भुलावे में हो मिस्टर ! "

"क्या मतलब ? "

“जुड़वां की बात ही दुर तुम शेखर मल्होत्रा के भाई हो नहीं सकते ।"

"पहली बात तो ये कि आप विनोद मलहोत्रा को वार-बार शेखर मल्होत्रा कह ऱही है "और दूसरी ये _कि अगर मैं उसका भाई नहीं हु, तो क्या अाप बता सकती है कि मेरी शक्ल उससे इतनी ज्यादा क्यों. मिलती है कि अाप अभी तक मेरी शक्ल और उसके बीच फर्क नहीं दूंढ पाई है ?"

 


“तुम्हारे कहने का मतलब यह है कि असली शेखर मल्डोत्रा तुम हो और उसका नाम विनोद मल्होत्रा है जिसे सब लोग और मैं भी आज़ तक शेखर मल्होत्रा समझती रही हूं ?"

"जी हां असलियत यही है ! ”

“और तुम उसके जुड़वा भाई हो ?"

"निःसन्देह ।"

"बैठो ।" किरन उसे वहुत ध्यान से देख रही थी !"

वह मेज के पार, उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया !!!

तभी वेटर "कटासा ले जाया ।

किरन ने पूछा----" कसाटा लोगे ?"

“नो थेंक्स ।" उसने सभ्य स्वर में कहा !

किरन अपने अंतरिक्ष में मंडराते दिमाग को काबू में करने की भरपूर चेष्टा कर रही थी----निश्चय नहीं कर पा रही थी कि यह मुजरिम की कोई नई चाल है अथवा यह शख्स शेखर मल्होत्रा का भाई है, हकीकत पता लगाने के मकसद से उसने सवाल किया…“कहां रहते हो तुम?"

“इस शहर में नहीं रहता !" कथित शेखर मल्होत्रा ने जवाब दिया---- " बल्कि अगर कहा जाये तो गलत न होगा कि चाहकर भी उस शहर में नहीं रह सकता जिसमें विनोद रहता है !"

"क्यों ?"

"कभी विनोद ऐसा चाहता था और अाज मैं नहीं चाहता ।"

"पता नहीं तुम क्या कह रहे हो, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है ।"

“अगर मेरी और विनोद की कहानी की 'डैफ्थ' मेँ जायेगी तो निश्चित रूप से दिमाग चकराकर रह जाएगा, अत बेहतर यहीं होगा र्कि उसकी "डेपथ' में घुसने की चेष्टा न करें और वह सुने जो कहने अाया हूं ।"

“क्या कहना चाहते हो ?"'

"आप विनोद को बेगुनाह साबित करने के अपने मिशन से हाथ वापस खींच लें ।"

" क्यो ?"

"वाक्य सुनते ही किरन संभलकर बैठ गई , बोली---" क्यों ?"

"क्योंकि वह आपकी बेवकूफ बनाकर अपना उल्लू सीधा कर रहा है-क्योंकि वह एक नम्बर का धूर्त, हरामी, चालाक, खतरनाक, लालची और क्रिमिनल है… क्योंकि वह आपकी दया और सहानुभूति का पात्र नहीं है, इसलिए नहीं क्योंकि उसने सचमुच संगीता की हत्या की है-गुलाब चन्द का हत्यारा भी बही है ।"

"तुम अपने भाई के बारे में यह सब कह रहे हो ?"

“हुंह, किसका भाई. . .कैसा भाई ?" नफरत से मुह सिकोड़कर---"सच्चाईं को मुझे इसलिए कबूल करनी पड़ती है क्योंकि दुर्भाग्य से हमने एक ही कोख से जन्म लिया था-इसके अलावा हम दोनों के बीच भाई तो भाई, ऐसे सम्बन्ध भी नहीं हैं जैसे दो अजनबियों के बीच होते हैं--मैं उसके लिए कलंक हूं और वह मेरे लिए-कभी वह मेरी शक्ल नहीं देखना चाहता था, आज मैं उसकी शक्ल नहीं देखना चाहता, उसकी हरचंद कोशिश यह है कि मुझे दुनिया से गारद कर दे और मेरा प्रयास भी यह है कि वह इस दुनिया से उठ जाये ।"

"और इसलिए मुझसे यह कहने आये हो कि मैं उसकी मदद न करूं ?"' किरन ने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा !!!

उसने निःसंकोच स्वीकारा-था --" हां !"

चकित किरन ने कहा-“यानि मैं जानते-बूझते तुम्हरे कहने से उसकी मदद बंद कर दू कि तुम उसे इस दुनिया से उठा देखना चाहते हो ?'

कथित शेखर मल्होत्रा ने एक लम्बी और गहरी सांस ली बोला--इसका मतलब है कि अपनी लम्बी कहानी के कुछ महत्वपूर्ण अंश मुझे सुनाने ही पड़ेगे ।"

"अगर जरूरी समझते हो तो सुनाओ ।"

"सबसे पहली बात तो अाप अपने दिमाग में यह बैठा लें कि मेरी जान विनोद मल्होत्रा की मुटठी में बंद है ।"

"क्योंकि वह आपकी बेवकूफ बनाकर अपना उल्लू सीधा कर रहा है-क्योंकि वह एक नम्बर का धूर्त, हरामी, चालाक, खतरनाक, लालची और क्रिमिनल है… क्योंकि वह आपकी दया और सहानुभूति का पात्र नहीं है, इसलिए नहीं क्योंकि उसने सचमुच संगीता की हत्या की है-गुलाब चन्द का हत्यारा भी बही है ।"

"तुम अपने भाई के बारे में यह सब कह रहे हो ?"

“हुंह, किसका भाई. . .कैसा भाई ?" नफरत से मुह सिकोड़कर---"सच्चाईं को मुझे इसलिए कबूल करनी पड़ती है क्योंकि दुर्भाग्य से हमने एक ही कोख से जन्म लिया था-इसके अलावा हम दोनों के बीच भाई तो भाई, ऐसे सम्बन्ध भी नहीं हैं जैसे दो अजनबियों के बीच होते हैं--मैं उसके लिए कलंक हूं और वह मेरे लिए-कभी वह मेरी शक्ल नहीं देखना चाहता था, आज मैं उसकी शक्ल नहीं देखना चाहता, उसकी हरचंद कोशिश यह है कि मुझे दुनिया से गारद कर दे और मेरा प्रयास भी यह है कि वह इस दुनिया से उठ जाये ।"

"और इसलिए मुझसे यह कहने आये हो कि मैं उसकी मदद न करूं ?"' किरन ने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा !!!

उसने निःसंकोच स्वीकारा-था --" हां !"

चकित किरन ने कहा-“यानि मैं जानते-बूझते तुम्हरे कहने से उसकी मदद बंद कर दू कि तुम उसे इस दुनिया से उठा देखना चाहते हो ?'

कथित शेखर मल्होत्रा ने एक लम्बी और गहरी सांस ली बोला--इसका मतलब है कि अपनी लम्बी कहानी के कुछ महत्वपूर्ण अंश मुझे सुनाने ही पड़ेगे ।"

"अगर जरूरी समझते हो तो सुनाओ ।"

"सबसे पहली बात तो अाप अपने दिमाग में यह बैठा लें कि मेरी जान विनोद मल्होत्रा की मुटठी में बंद है ।"

" कैसे ?"

"वह मेरे जीवन का ऐसा रहस्य जानता है जिसे मरने के बाद भी 'आम' नहीं होने देना चाहूगा क्योंकि अगर वह रहस्य लोगों की पता लग गया तो लोग मेरी लाश तक पर थूकेंगे, दुनिया का कोई भी शख्स मुझे कंधा देने के लिए तेयार-नहीं होगा.......औरा शायद गिद्ध भी मेरा मांस खाने से इंकार कर दें ।"

" ऐसा क्या रहस्य है ?"

"आप समझ सकती हैं कि उस रहस्य के बारे में मैं कुछ नहीं बता सकूंगा ।"

"क्यों ?"

"अगर बता सकता---अगर मुझे गंवारा होता कि वह रहस्य किसी को पता लगे तो विनोद से इतना डरने की जरूरत हीं क्या थी-उसके जुल्म क्यों सहता मैं ?"

"कैसे जुल्मों की बात कर रहे हो तुम ?"'

"अपनी बूड़ी मां के हम दो बेटे थे-विनोद और मैं---विनोद शुरू से गुन्डागर्दी और आवारागर्दी किया करता था-चोरी, गिरहकटी और राहजनी उसके पेशे थे-शराब, जुआ और ऐय्याशी उसके शौक-मां उससे परेशान बी---मैं आगरा के कॉलिज में पढा करता था ।"

"त-तुम आगरा के कॉलिज में 'तुम' पढते थे ?”

"इसका मतलब विनोद ने आपसे यह कहा होगा कि पढ़ता 'वह' था?"

-"हां ।"

.""तब तो उसने यह भी वताया होगा कि उसके दिल में संगीता के लिए उसी दिन से 'मौन प्यार' पल रहा था जिस दिन संगीता ने कॉलिज में एडमिशन लिया !"

"हां, यह सब उसने बताया है ।" "इसका मतलब उसने कहानी तो सच्ची सुनाई है थोडी उलट पलट करके !!!

फीकी मुस्कान के साथ कथित शेखर मल्होत्रा ने कहा----"अब अाप इस कहानी को संक्षेप में यू समझ सकती हैं कि संगीता के साथ कॉलिज में 'मैं' पढता था--उत्तेजित होकर नगर विधायक के बेटे से मैं मिड़ा था-संगीता से मुहब्बत मुझे थी और जव ये सब बातें विनोद को पता लगी तो उसकी लार टपक पडी ।”

“लार टपकने से क्या मतलब ?"

"मेरी जुबानी उसे पहले ही से पता था कि संगीता कितनी खूबसूरत है और यह भी कि वह एक करोड़पति सेठ की इकलौती वेटी है-जब मैंने बताया कि अनाज मैं संगीता के लिए नगर विधायक के बेटे से भिड़ गया तो उसके दिमाग में तुरन्त यह स्कीम कौंध गई कि वह शेखर मल्होत्रा बनकर न के केवल खूबसूरत संगीता को हासिल कर सकता है बल्कि करोडों की सम्पत्ति का मालिक भी बन सकता है----उसने तुरन्त घोषणा कर दी कि कल से मेरी जगह कॉलिज वह जायेगा- मैं सकपका गया--मगर उसकी मुटूठी में मेरा रहस्य था उसने धमकी दी कि अगर मैंने वह नहीं किया जो वह चाहता है तो मेरे रहस्य को 'आम' कर देगा-मेरे छक्के छूट गए…तब उसने बताया कि चार दिन पहले उसने एक पेट्रोल पम्प लूटा है-हालांकि किसी को भनक तक नहीं है कि लुटेरा वह है मगर 'मुझे' खुद को विनोद मल्होत्रा के रूप में पुलिस के समक्ष प्रस्तुत कर देना है, पुलिस मुझे साल -दो साल के लिए जेल भेज़ देगी-विनोद का यह प्रस्ताव सुनकर मैं दहल उठा-उसके पेरों में पड़कर गिडगिडाने लगा-बार-बार रिक्वेस्ट की कि मुझे जेल मत भेजो----उसने मुझसे कहा…ऐसे बीज तू बो चुका है कि उसे फ़साने में मूझे दिक्कत पेश नहीं आयेगी ....

 
उसने मुझसे कहा…ऐसे बीज तू बो चुका है कि उसे फ़साने में मूझे दिक्कत पेश नहीं आयेगी ......लेकिन अगर तू इस शहर में रहा तो संगीता को भी हकीकत पता _लग सकती है और ऐसा न हो, इसके लिए जरूरी है कि तू इस शहर से हमेशा के लिए दफा हो जा ।"

"म म मगर ।" मैंने कहा--“मेरे गायब होने पर मां का कहेगी?"

"उसे यह पता नहीं लगेगा कि शेखर गायब हुआ है बल्कि यह पता लगेगा कि विनोद गायब है और तू जानता है कि उसे शेखर मल्होत्रा की परवाह है, विनोद की नहीं---विनोद के लिए तो वह चाहती ही यह है कि वह कहीं दफा के हो जाए !"

" ल ल लेकिन !" मैंने प्रतिरोध करना चाहा, कठोर स्वर में उसने मेरी बात काट दी…“मां की आंखों में मोतियाबिंद उतर आया है-जब तक हम अपने नाम न बतायें तब तक वह स्वयं नहीं जान पाती कि सामने शेखर खडा है या विनोद--फिक्र मत कर-मां को यकीन दिला दूगा कि शेखर ही हूं और जो गायब हुआ है वह विनोद था जिसके दिमाग पर हीरो बनने का भूत सवार था अत: मुम्बई भाग गया होगा !"

मेरे मुंह से बोल न फूटा !

उसकी मुटृठी में कैद रहस्य के कारण मैं उसकी हर बात मानने लिए मज़बूर था ।

"उसने धमकी दी कि मैं, उस शहर में कभी कदम न रखूं जिससे वह हो-------ऐसा वह इसलिए चाहता था कि संगीता पर यह 'राज' कभी न खुल सके कि जिसे शेखर समझ रही थी वह विनोद है, उसका हुक्म मानने के अलावा मेरे पास कोई चारा न था-सो मैं हमेशा के लिए अपनी मां को छोड़कर चला गया ।'"

“कहां चले गए ?"

"बहुत लम्बी कहानी है किरन जी, जाने कहां…कहां धक्कै खाएं हैं मैंने, पार उन धक्कें के बोरे में जानने से---आपको कोई ताम नहीं होगा…आपको लाभ होगा शेखर मल्होत्रा वने विनोद मल्होत्रा की कहानी जानने से-और वह कहानी ये है कि अगले दिन विनोद ' मैं ' अर्थात् शेखर बनकर कॉलिज गया -- वहां नगर विधायक के बेटे और उसके चमचों ने जमकर उसकी ठुकाई की---ठुकाई ही थी जिसकी वजह से संगीता मेरे भुलावे में उसकी गोद में जा गिरी-विनोद ने उस दिन जो खुद को 'शेखर' के रूप में स्थापित किया तो अाज तक किये हुए है और असली शेखर मल्होत्रा यानि मैं दर-दर की ठोकरें खा रहा हुं !"

किरन का दिमाग चकरधिन्ती की तरह घूमकर रह गया था ।

"उसके हुम के एक _हफ्ते बाद तक मैं आगरे में ही रहा था…यह अलग बात है कि खुद तो प्रकट नहीं किया, कर भी नहीं सकता था…बिनोद के जरिए अपना रहस्य खुल जाने का खौफ जो था । मगर मैंने अपने प्यार को, अपनी संगीता को, उसकी झोली में गिरते उसके षडूयंत्र में फंसते अपनी आँखों से देखा था और फिर............

उस मंजर को मैं एक हफ्ते से ज्यादा न देख ,सका तथा खून के आँसू, रोता चुपचाप आगरे से विदा हो गया---

शहर दर शहर भटकता रहा और उन दिनों सहारनपुर में था जब अखबार में संगीता के मर्डर और विनोद की गिरफ्तारी के बारे में पढा-मुझे वेहद खुशी हुई, यह सोचकर झूम उठा कि विनोद की शैतानियत का प्याला भर चुका है और अब उसे सजा हो जायेगी--सजा के साथ ही दफन हो जाएगा वह रहस्य जिसकी वजह से मुझे वनवास भोगना पड़ रहा है, सारा मामला क्या है और शेखर बने विनोद की संगीता की हत्या के जुर्म में क्या सजा होगी ?

जुर्म में क्या सजा होगी…यह सब जानने की उत्सुकता मुझे इस शहर में तो नहीं परन्तु इस शहर से केवल वीस किलोमीटर दूर एक छोटे कस्बे तक जरूर ले आई-गुप्त रूप से और किराये के अदमियों द्वारा मैंने उस पर चल रहे मुकदमें की पूर्ण जानकारी रखी !"

. "क्या किराये के आदमी तुम्हें और उसे देखकर चकराते नहीं हैं जिसको माना तुम्हारे मुताबिक विनोद मल्होत्रा है ? "

“किराये के आदमियों ने कभी मेरी शक्ल नहीं देखी, मैं उनके सामने चेहरे पर नकाब डालकर जाता है ।”

. ""' ओह !"

"कल सुबह तक मैं बेहद खुश था--------जिस तरह सबको यकीन था कि विनोद 'शेखर' को फांसी से कम सजा न ’होगी, उसी तरह मुझे भी यकीन था और मैं खुशी-खुशी . उस शुभ दिन की प्रतीक्षा कर रहा था जिस दिन विनोद के साथ मेरा रहस्य हमेशा के लिए दफन हो जाएगा परन्तु आज सुबह-उस वक्त इस शहर में स्थित मेरे आदमी ने फोन पर सुचना दी कि आप उसे बेगुनाह साबित करने निकल पडी और इतना सुनते ही हाथों के तोते उड़ गये-आपसे रिक्वेस्ट. करने दौडा चला आया कि प्लीज़, आप उसे बेगुनाह साबित करने के फेर में न पड़े ।"

"अगर बह बेगुनाह है तो मुझे उसे बेगुनाह साबितं वयो नहीं करना चाहिए ? "

“वह बेगुनाह नहीं है किरन जी, संगीता का हत्यारा वही है !"

"तुम कैसे कह सकते हो ?"

" म म मेरे पास सबूत है !"

"" कैसा सबूत ?"

"' एक वीडियो फिल्म'…ऐसी "वीडियो फिल्म' जिसे देखने के बाद आपको इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाएगा कि हत्यारा वही है-फिल्म में वह स्पष्ट रूप से हत्या करता हुआ नौकरों द्वारा पकड़ा जाता दिखता है !"

चकित किरन ने पूछा'-""अगर कोई ऐसी फिलम है तो तुमने उसे कोर्ट में पेश क्यों नहीं किया ?"

"जरूरत भी नहीं पडी और....... और… !"

"और ?"

"उसे कोर्ट में पेश करने वाले के सामने बहुत-भी अड़चनें आयेंगी ।"

“जैसे ?"

"यह पूछा जाएगा कि क्लिप कैसे तेयार-हुई और पेश करने वाले के पास कहाँ से अाई !"

"क्या तुम इन सवालों का जवाब नहीं दे सकते !"

"नहीं ।"

“क्यों ?"

"पहली बात ये है कि इन सवालों के मेरे पास जवाब ही नहीं जिनसे कोर्ट सन्तुष्ट हो सके-दूसरे ये कि कम-से-कम मैं तो तब तक खुलकर सामने आ ही नहीं सकता जब तक कि विनोद इस दुनिया में है ।"

"ऐसा क्यों ? "

"जब तक संगीता जीवित थी तब तक विनोद ने कभी नहीं चाहा कि मैं उसकी परछाई के अास-पास नजर आऊं-----" मेरी याद तक नहीं आई उसे और फिर तब ..........

जबकि संगीता की हत्या के में एक बार पकड़ा जाने के बाद जमानत पर छूटा---- उसने जोर-शोर से मेरी खोज शुरू कराई-उसकी 'मंशा' संगीता की हत्या के जुर्म में अपनी जगह मुझे फांसी पर चढवा देने की थी…मैं घबरा गया । घबराकर खुद को और ज्यादा छिपा लिया मैंने---आज तक छुपाये हुए हूं अगर आज भी वह मेरे सामने जा जाए और मेरे रहस्य को खोलने की धमकी देकर की कि ही उसके स्थान पर मुझे फांसी के फंदे पर झूलना है तो यह सच है किरन जी कि मेरे सामने उसका हुक्म मान लेने के अलावा कोई रास्ता न बचेगा इसलिए उसके जीते-जी मैं खुद क्रो प्रकट नहीं कर सकता !"

"मगर मेरे सामने तो तुमने खुद को प्रकट कर दिया है !"

“मजबूर होकर, इस उम्मीद के साथ कि हकीकत जान लेने के बाद अाप उसकी कोई मदद नहीं करेंगी और न ही मुझसे हुई मुलाकात का जिक्र करेंगी, मजबूरी यह थी कि मेरे आदमियों ने सुचना दी कि अगर मैंने आपको विश्वास न दिला दिया कि हत्यारा विनोद ही है तो अाप उसे बेगुनाह साबित कर देंगी-इस शहर में घुसने की हिम्मत इसलिए पड़ पाई क्योंकि मेरे अन्दमियों की सूचना के मुताबिक विनोद जख्मी हालत में अपनी कोठी पर पड़ा है ।"

"तुम्हें कैसे पता लगा कि मैं इस वक्त यहाँ हूं ?"

"' मेरे आदमियों ने वताया ।"

"इसका मतलब वे मुझ पर नजर रखे हुए थे ?"

"जी हां ।"

किरन को इल्म हुआ कि उसका यह अहसास कितना सही था कि कुछ रहस्यमय आंखें हर पल उसे घूर रही हैं--कछ देर तक कथित शेखर मल्होत्रा को घूरती रहने के बाद .....

वह बोली…“वीडियो फिल्म का क्या चक्कर है !'

"मैं नहीं जानता कि वह किसने, कब, कैसे और क्यों तैयार की बस, इतना जानता हूं कि केसिंट मैंने सैकडों वार देखी है और उसे देखने क बाद इस बारे में आपको कोई शक नहीं रह जायेगा कि हत्यारा विनोद ही हैे ।"

"तुम पर कहाँ से आई ?"

"जिन दिनों विनोद जमानत पर था उन दिनों मैं इस मकसद के साथ उस पर बराबर नजर रखे हुए था कि अगर वह अपने बचाव का कोई प्रपंच रचे तो मैं उसे नाकाम कर दूं---ऐसी ही एक रात में मैं उस कोठी के पिछवाडे़ टहल रहा था कि एक रहस्यमय नकाबपोश ने झाडियों में खीच लिया-अभी कुछ समझ भी नहीं पाया था कि सिर के पिछले हिस्से पर उसने रिवॉल्वर के दस्ते का वार किया-मैं वेहोश हो गया । होश आाया तो खुद को एक ऐसे कमरे में पाया जहां वी. सी. आर. की मदद से टी. बी पर एक फिल्म चल रही थी----------यह फिल्म संगीता के मर्डर की थी---फिल्म के खत्म होते ही टी. बी और वी. सी आर आँफ़ हो गए तथा कमरे की लाईट आन होते ही मैंने सामने रव्रड़े नकाबपोश को देखा-जो बातें उसने की उनका लब्बो-लुबाब यह निकला कि वह मुझे विनोद शेखर समझ रहा था तथा ब्लैकमेल करता हुआ फिल्म के पचास हजार रुपये मांग रहा था-- मेरे पास पचास हजार नहीं थे, किन्तु दिमाग में यह बात समा चुकी थी कि अगर इस फिल्म को कब्जा लूं तोविनोद चाहे जैसा प्रपंच रच ले मगर मैं उसे फांसी से कम सजा नहीं होने दूंगा और तब, मैंने ब्लेक-मेलर को इसी भुलावे में रखा कि मैं वही हूं जो वह सोच रहा है तथा मौका लगते ही उससे भिड़ गया…मेरी उसकी उठा-पटक के परिणामस्वरूप वह बेहोश हो गया और कैसिट कब्जाये मैं सिर पर पैर रखकर भागा ।"

 


"इस वक्त कैसिट कहां है ?" किरन ने सीधा सवाल किया ।

“मेरी जेब में मौजूद है ।"

"लाओ ।"

"स-सोरी किरन जी ।" वह मानो गिड़गिड़ाया---कैसिट मैं आपको दे नहीं सकता-----दिखा सकता हूं ।"

"यहां कैसे देखाओगे ?"

"आप यहां करीब डेढ धन्टे से बैठी हैं---लंच लिया है आपने जबकि फोन द्वारा मुझे आपके इस होटल में दाखिल होते ही सूचना मिल गई थी---मैंने तुरन्त अपने अादमी को एक कमरा लेने का आदेश भी दे दिया था----शायद आप जानती होगी कि इस होटल के प्रत्येक कमरे में कलर टी. वी. मोजूद है तथा पोर्टेबल बीसी. पी. कमरा लेने के बाद मेरे आदमी ने वहाँ पहुचा दिया है ।"

किरन ने गहरी नजरों से घूरते हुए कहर-"पूरो तैयारियां हैं?"

"मालूम था कि मेरी बातों पर आप तब तक यकीन नहीं करेंगी, जब तक कैसिट नहीं देख लेगी और 'मै' आपको कैसिट दे नहीं सकता तथा न ही आपको वहां ले जा सकता हू जहाँ रहता हुं, तब, मैंने सोचा कि सबसे 'इंजी' यही रहेगा कि एक दिन का किराया देकर इसी होटल का कोई कमरा इस्तेमाल कर लिया जाये ।"

"किस नम्बर का कमरा मिला है तुम्हें ?"

कथित शेखर मल्होत्रा ने जेब से चाबी निकाली और होटल के 'की-रिग पर लिखा नम्बर पढा-“चार सौ बासठ ।"

"यह कमरा मेरे यहां वेठे-वेठे किराये पर लिया गया है ?"

"जी हां ।"

किरन असमंजस में पड़ गई ।

निश्चय न कर पा रही थी कि कथित शेखर मल्होत्रा जो कह रहा है वह सच है अथवा मुजरिम ने यह खूबसुरत चाल उसे भ्रमित करने या भुलावे में डालने के लिए चली ?

क्या उसे इस व्यक्ति के साथ कमरा नम्बर चार भी बासठ में जाना चाहिये ?

कहीं यह षडूयंत्र तो नहीं है ?

अगर षडूयंत्र है तो सामने बैठा शख्स कहां से आ गया ------ इसकी शक्ल शेखर मल्होत्रा से हू ब हू क्यों और कैसे मिलती है ? एकाएक किरन के जहन में विचार उठा कि अगर इस तरह डरेगी तो क्या रि---इन्वेस्टीगेशन करेगी और क्या रहस्य तथा अपराधी का पर्दाफाश करेगी ?

हौसला रखकर उसे दिलेरी से काम लेना चाहिए !

एक झटके से कहा उसने --- " चलो !"

किरन ने महसूस किया कि उसके मुंह से हल्की-हल्की कराह निकल रही थीं ।

सिर के पिछले हिस्से में अभी तक तीव्र पीड़ा थी ।

समझ गई कि चेतना लौट रही है---कोशिश के बावजूद नेत्र न खोल सकी, दिमाग की नसों ने ठीक से काम करना शुरू किया ही था कि कानो में आवाज पडी… "और अब अाप मुझे मेरा बेटा लौटा दीजिए न.. . ।"

" खामोश !" किसी गुर्रांहटदार आवाज के मालिक ने जोर से चीखकर पहले बोलने वाले का वाक्य काटा और फिर गुर्राता हुआ बोला…“यहाँ तुम मेरा नाम नहीं लोगे सिर्फ 'हॉस' कहोगे मुझे ।"

"स-सॉरी ।” यह आवाज शेखर मल्होत्रा की थी, डरा हुआ और गिड़गिड़ाता-सा-“म-मैं यह कह रहा था कि मैंने आपका काम कर दिया, ठीक उसी तरह जैसे आपने मुझे बताया था…मैंने 'इसे' वही कहानी सुनाई जो आपने कहीं थी और उसके परिणामस्वरूप यह अपके कब्जे में है अव . मुझे मेरा बेटा लौटा दीजिये ताकि उसे लेकर वडोदा लोट जाऊ ।”

“अभी नहीं गिरधारी लाल !" गुर्राहटदार अावाब गूंजी…"अमी तो तुमसे वहुत काम लेने हैं-तुम्हारी शक्ल और आवाज बडीं जालिम है, हमारे वहुत काम की है ये तुम्हारी मदद से शेखर मल्होत्रा और उसके शुमचिन्तकौ को खेल दिखा सकते है कि वे बेचारे समझ तक नहीं पायेंगे कि कहां क्या और क्योंहो रह् है ?"

किरन ने जबड़े भींच लिए, मुंह से निकलने वाली कराह पर अंकुश पाया ।

" उधर, शेखर मल्होत्रा की आवाज कानों में पड़ी---- " म-मगर आपने तो कहा था कि अगर मैं यह काम कर दूंगा तो मेरा बेटा तोटा देगे और बडोदा जाने देंगे ।"

रोकते-रोकते किरन के मुंह से कराह निकल गयी ।

"चुप रहो ।" गुर्राहटदार आवाज गूंजी-“इसे होश आ रहा है शयद-ध्यान रहे अगर इसके सामने तुमने अपने बेटे या शहर बडोदा की वात की तो देखने के लिए तुम्हें अपने बेटे की लाश मिलेगी ।"

बस ।

सन्दाटा छा गया ।

नेत्र अभी तक मुदे हुए भी वह…महसूस कर रही ही कि किसी के साथ ररिसयों की मदद से बंधी हुई है--जहन में बेहोश होने से पूर्व के क्षण गुजरे---कमरा नम्बर चार सौ बासठ में कदम रखते ही कथित शेखर मल्होत्रा ने रिवॉल्वर निकल लिया था और अभी 'धोखा' शब्द दिमाग में कौधं ही था कि कथित शेखर मल्होत्रा ने सिर के पिछले हिस्से पर रिवॉल्वर के दस्ते का भरपूर वार किया ।

चीखने के लिए मुंह खुला ।

मजवूत हाथ कुकर के ढक्कन की मानिन्द होंठों परं चिपक गया ।

मुह से निकलने वाली चीख कुकर की सीटी में तब्दील हो गयी…आंखो के सामने आतिशबाजी वाले मानो सैकडों अनार एक साथ फूट पड़े और फिर जैसे काजल की कोठरी में कैद होती चली गई वह ।

"अब चेतना लौटी थी, अनुमान न लगा पाई कि कितना समय गुजर चुका है ?"

आंखें खुलते ही उसने खुद को एक ऐसे वहशी के चंगुल में पाया जिसके सम्पूर्ण जिस्म पर काला लबादा था चेहरे पर सफेद नकाब ।

किरन ने दाई तरफ, करीब दो मीटर दूर खड़े शख्स को देखा-य-यह वही शख्स था जिसने खुद को असली शेखर मल्होत्रा और शेखर को विनोद मल्होत्रा वताया था ।

निश्चित रूप से शेखर मल्होत्रा की इतैवट्रोस्टेट कॉपी था वह ।

नाम गिरधारी लाल, रोने वाला बडोदा का और उसका बेटा शायद नकाबपोश के चंगुल में है ।

ये तीनों बाते किरन समझ चुकी थी ।

हैरानी थी तो इस बात पर कि ऐसे दो व्यक्तियों की शक्ल ही नहीं बल्कि अबाज तक कैसे मिलती है जिनका आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है-अपने चारों तरफ की भांगोलिक स्थिति देखते ही किरन समझ गई कि इस वक्त ' वह किसी पहाडी इलाके में, पहाड़ पर वने 'कॉटेज' में है ।

चारों तरफ लकडी की दीवारें थी ।

बन्द दरवाजों और खिड़कियों में पारदर्शी शीशे लगे थे ।

शीशों के बाहर नजर आ रहे थे…सन्नाटे में डूबे ऊंचे-ऊंचे पर्वत ।

विभिन्न दीवारों के सहारे आठ नकाबपोश खडे थे---उनके चेहरों पर चढे नकाबों का रंग काला 'था ।

स्वयं वह एक कुर्सी के साथ मजबूती से बंधी हुई थी ।

सफेद नकाबपोश उसकी आंखों में झांकता हुआ मजेदार स्वर में बोला----“क्यो सच जानने की कोशिश कर रही न किइस वक्त तुम कहां हो ?"

उसकी आंखों में झांकती किरन ने पूछा---"कौन हो तुम ?"

"वाह !” उसने खिल्ली उड़ाने वाले अन्दाज में कहा--- "यानि कि मैं खुद बता दूँ ---अरे, अगर बताना ही होता तो बेवकूफ लड़की चेहरे पर भला नकाब क्यों पहनता और हां, तुम मुझे मेरी आखोम से पहचानने की कोशिश कर रही हो…लो, देखो.... जितने ध्यान से देखना चाहो और पहचान कर सकती हो तो पहचानो ।"

किरन सकपका गई ।

इस व्यक्ति के कॉन्फिडेन्स पर आश्चर्य हुआ उसे ।

जो कह रहा था उसका सीधा-सादा मतलब ये था कि वह जानता था कि किरन आखें देखकर उसे पहचान नहीं सकती, भूरे रंग की आंखों को घूरती हुई वह बीली---"अपनी आंखों पर शायद तुमने "कन्टैक्ट लेंस' लगा रखे है ?"

"समझदार हो ।" वह कह उठा-तुम वाकई समझदार हो छोकरी और बात सही भी है----' समझदार न होती तो तुम्हें पकड़कर यहाँ लाने की जरूरत क्यों पड़ती ?"

"म मुझे यहाँ क्यों लाया गया है ?"

“हाँ ये हुई बात--- ये हुआ वह सवाल जिसका जवाब देने में हमें खुद दिलचस्पी.......।"

वाक्य अधूरा रह गया ।

कॉटेज के बाहर कहीं ऐसी आवाज गूंजी जैसे कोई बच्चा चीखा हो ।

और चीख की आवाज क्रमश: दूर होती हुई वातावरण में लुप्त हो गई ।

सभी चौंके थे ।

गिरधारी लाल चीखा-"य-ये तो मेरे 'अंकुर' की ,आवाज थी ।"

"खामोश !" नकाबपोश दहाड़ा ।

गिरधारी लाल सहम गया ।

तभी सफेद नकाबपोश तेजी से पलटकर एक काले नकाबपोश से बोला---"'" तू किस तरह बांधकर आया था उसे, जल्दी देख क्या हूआ है ?"

हुक्म मिलते ही काले नकाबपोश ने कॉटेज से बाहर जम्प लगा दी ।

ममता का मारा गिरधारी भी उसके पीछे झपटा था कि--------

"पकडो इस हरामजादे को ।" सफेद नकाबपोश दहाड़ा ।

दो काले नकाबपोशों ने गोरित्लों की तरह झपटकर उसे दबोच लिया ।

सफेद नकाबपोश गुर्राया---उत्तेजित अन्दाज में गिरधारी लाल गिड़गिड़ा उठा---" म म म -मुझे देखने दो बॉस कि मेरे अंकुर को क्या हुआ-म म-मैं भागूगा नहीं---- वादा करता हूं कि वही करूंगा जो तुम ........ ।"

"बको मत ।" सफेद नकाबपोश ने पुन: दहाड़कर उसे चुप कर दिया और फिर गुर्राया जुबान वहुत चलती है तेरी, इस जुबान का इलाज लिए विना काम नहीं चलेगा ।"

इस वार गिरधारी कुछ बोला नहीं ।

दोनों नकाबपोशों की गिरफ्त में कैद कसमसाकर रह गया । कुर्सी के साथ बंधी किरन सारे ड्रामे को हैरत के साथ कि देख रही थी…इतना तो समझ चुकी थी कि चीख उसी बच्चे की थी जिसे अपने चंगुल में करके ये लोग गिरधारी लाल को इस्तेमाल कर रहे थे । कॉटेज के हॉलनुमा कमरे में सन्नाटा छा गया ।

धड़कते दिल से सभी उस नकाबपोश के लौटने का इंतजार कर रहे थे जो बच्चे की खैर-खबर और उसके, चीखने का सबब जानने बाहर गया था ।।

धीरे -- धीरे तनावपूर्ण क्षण गुजर गए---उस वक्त सफेद नकाबपोश किसी अन्य को बाहर जाने का हुक्म देने ही वाला था कि नकाबपोश बुरी तरह हड़बड़ाया हुआ कॉटेज में दाखिल होता दुआ चीखा-----" गजब हो गया बॉस -- व- वो लडका ........

" क क क्या हुआ अंकुर को ?" सफेद नकाबपोश से पहले गिरधारी लाल चीख पड़ा ।

काला नकाबपोश सकपकाकर चुप रह गया ।

"अबे बोलता क्यों नहीं मुर्गी के ?" सफेद नकाबपोश दहाड़ा---- " कहां गया लड़का ...... ? "

"व-वह नहीं है वॉस ।"

" तो कहां गया ?"

" म म मुझे तो लगता है कि ढलान पर से तुढ़ककर नदी में जा गिरा है ।"

गिरधारी लाल को मानो लकवा मार गया ।

" क-- क्या बक रहा है उल्लू के पटूठे ?" सफेद नकाबपोश दहाड़ा----""तुझे कैसे मालूम कि वह नदी में गिर गया ?"

"ढलान बर उसका एक जूता पड़ा है बांस ।"

सफेद नकाबपोश की मानो सिटूटी-पिटृटी गुम हो गई---उस एक पल के लिए कॉटेज से मौत का सन्नाटा व्याप्त हो गया था और फिर वह चीखा--“तूने उसे बांधा किस तरह था जो खुलकर ढलान पर पहुंच-----!"

"हरामजादे ....... कुत्ते !" सिंह की तरह दहाड़ ने क ेसाथ गिरधारी ने इतनी जोर से झटका दिया कि उसे अपनी गिरफ्त में लिए नकाबपोश दायें-बांये जा गिरे-गिरधारी लाल का चेहरा लौहार की भटृटी की मानिन्द दहक रहा था और अभी कोई कुछ समझ भी नहीं पाया था कि चीते की

तरह झपटा ।

पलक झपकते ही दोनों हाथों से सफेद नकाबपोश का गिरेबान पकड़ लिया उसने और बुरी तरह झंझोड़ता हुआ गरजा---“तूने मेरे बेटे को मार डाला…"म-मैं तुझे जिन्दा नहीं छोडूंगा कच्चा चबा जाऊंगा तुझे ! " बौखलाये हुए नकाबपोश पैंट की जेब से रिवॉल्वर निकाला । "

मगर ।

गिरधारी लाल को यह सब देखने का होश कहां था ---- उसे तो इस खबर ने मानो पूर्ण पागल कर दिया कि उसका बेटा नदी में गिर गया है, दोनों हाथों से सफेद नकाबपोश को झंझोड़ता हुआ वह चीखा----" म मैं तुझे जानता हुं----, सारी दुनिया को बता दूगा कि तू कौन है ?"'

सफेद नकाबपोश ने "फड़ाक' से अपने सिर की टक्कर उसके सिर पर मारी ।

गिरधारीलाल के हलक से चीख निकल गई ।

अभी संभल भी नहीं पाया था कि नकाबपोश ने हवा में उछलकर उसकी छाती पर "फ्लाइंग किक' रसीद की, इस बार की चीख के साथ गिरधारी लाल किरन की कुर्सी के पीछे जा गिरा, अब किरन उसे देख नहीं सकती धी क्योंकि गर्दन घुमाने की पोजीशन में नहीं थी वह परन्तु सफेद नकाबपोश अभी भी उसकी आंखों की रेंज में था ।

हाथ में दबे रिवॉल्वर को किरन की कुर्सी के पीछे ताने दहाड रहा था…“अगर तूने अपने नापाक मुंह से मेरा नाम निकालने की कोशिश की तो उसी वक्त ढेर कर दूगा ।"

कुर्सी के पीछे से वह चीखा----" म मुझे मरने की चिन्ता नहीं कमीने-त-- त - तू............!"

"खामोश ........ खामोश .......... खामोश ।" गगनभेदी गर्जना के साथ नकाबपोश ने तीन बार ट्रेगर दबाया ।

प्रत्येक 'खामोश' के साथ एक धमाका गूंजा ।

साथ ही गूंजी गिरधारीलाल की चीखें ।

तीनों गोलियां मानो उसके शरीर पर लगी थी--- सम्पूर्ण चेहरा लहूलुहान हो गया और हलाल होते बकरे की तरह डकराता हुआ लहराकर कॉटेज के फर्श पर गिरा ।

गिरने से पहले ही उसकी चीखों ने दम तोड़ दिया था ।

हालांकि किरन उसके चेहरे को लहू से रंगते, मछली की मानिन्द तड़पकर गिरते न देख पाई थी परन्तु अच्छी तरह है जानती थी कि चेयर के पीछे क्या हुआ है और वह अहसास के इतना खौफनाक था कि जिस्म का रोयां रोंया खड़ा हो गया ।

सफेद नकाबपोश के हाथ में दबे रिवॉल्वर से धुएं की लकीर अभी भी निकल रही थी !!!!!

रोंगटे सभी के खडे़ हो गये ।

 
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