" मेंरे ख्याल से बस.........लगभग सभी प्रमुख किरदारों पर हम गौर कर चुके हैं ।"
बैरिस्टर साहब के होंठों पर व्यंग्यात्मक मुस्कान उभरी बोले-तुम सबसे मुख्य किरदार को भूल गई ।”
" किसे ?"
"शेखर मल्होत्रा को ।"
"और आप शेखर मल्होत्रा को भूल नहीं सकते ।" किरन के होंठों पर उनसे ज्यादा व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट उभरी----इतने झमेले के बावजूद नहीं भूले ।"
"इसलिए नहीं भूले क्योंकि अभी भी उसके हत्यारा होने की सम्भावनायें ज्यादा हैं !"
"बह कैसे ?"
"हम तुम्हें एक कहानी सुनाते है ।" लम्बी सांस लेने ने बाद बैरिस्टर साहब ने कहना शुरू किया…“यू मानकर चलो कि हत्यारा शेखर मल्होत्रा ही है…संगीता की जुबानी उसे यह घटना मालूम थी कि एक बार जब वह चोर साबित हो चुकी थी तो तुम्हारे पास आई-पैरों में पडकर रोई-गिड़गिड़ीाई, कहा कि वह चोर नहीं है और तब तुम भावुक होकर उसे बेगुनाह साबित करने निकल पड़ी-केहने का मतलब ये कि शेखर मल्होत्रा को तुम्हारा 'कैरेक्टर' मालूम था-वह जानता था कि तुम भावुक हो और अगर कोई तुमसे प्रभावशाली ढंग से कहे कि वह बेगुनाह है तो तुम उसे बेगुनाह मान लेती हो----ते वह ठीक संगीता की-सी तर्ज पर तुम्हें फंसाने आँफिस में अाया ।"
"'आप तो बडी ऊंची उडान भर रहे है पापा हैं'
"टोको मत, सुनती रहो किरन-तुम उसके जाल में फंस गई यानि रि'-इन्वेस्टीशन करने निकल पडी । दिमाग में बस बैठाने के लिए कि तुम्हारे रि-इन्वेस्टीगेशन पर निकल पड़ने से ‘असली हत्यारे' के पेट में दर्द शुरू हो गया है, उसने किराये के आदमियों द्वारा अम्बेडकर मार्ग पर हमला करवाया-तुम्हारे शेखर की कोठी पर पहुंचने और अतर एन्ड फेमिली के सामने यह कहने से उनमें खलबली मचनी ही थी कि तुम शेखर को बेगुनाह साबित करने के अभियान पर निकली हो-इसलिए नहीं कि संगीता की हत्या से उसका कोई सम्बन्थ है बल्कि इसलिए कि अगर शेखर बेगुनाह साबित हो गया तो जो दौलत भगवान ने उन्हें छप्पर फाड़कर दी है वह हाथ से निकल जाएगी-इत्तेफाक से उनकी बाते बुन्दू ने सुन ली और तुम्हें आकर बता दीं…तुम उनसे बात करने कोठी के ड्राइंग हॉल में गई…वहां शेखर ने अपने किसी राजदार अथवा मददगार द्वारा पहले ही गुलाब चन्द की ताश बाला ड्रामा "स्टेज" कर रखा था जो_ बुन्दू की गर्दन दबाने की नाकाम कोशिश के साथ तुम तक लाया गया…पुलिस की मदद से तुम स्टडी का दरवाजा तोडकर तहखाने तक पहुंची जहाँ तुम्हें दिखाने के लिए शेखर ने पहले ही रधिया का काल करके लाश डाल रखीं थी और ऐसे सबूत छोडे हुए थे कि जिन्हें तुम आसानी से पकड तो-शेखर ने तुम्हें संगीता के काल्पनिक हत्यारे का वही 'कद' बताया जो कि उसने रधिया के हत्यारे का तहखाने में 'प्लांट' किया गया था----यहाँ तुम्हें पूरा यकीन हो गया कि हत्यारा शेखर मल्होत्रा नहीं है-यही वह चाहता था-इतना समझदार वह है कि यह समझ सके कि तुम कब क्या सोचोगी और क्या "स्टेप लोगी' यानि वह जानता वा कि रधिया की मौत के बाद तुम उसके कमरे की तलाशी ले सकती हो ------सो, वहाँ मिस्टर राय के फोटो और चिट्ठियों का लिफाफा प्लांट कर दिया यानि जिन फोटो और चिट्ठियों के बूते पर वह मिस्टर राय को ब्लैकमेल किया करता था उनका इस्तेमाल अब उसने तुम्हारा ध्यान मिस्टर राय पर केन्दित करने में किया-जिस सवाल की तुमने इतनी हाय-तीजा मचा रखी है उसका जवाब बडा सीधा-सा है, यह कि रधिया को थाने का नम्बर इसलिए मालूम था क्योंकि गहने चोरी होने के बाद संगीता अक्सर अक्षय से फोन पर बात करती धी और उसके लिए नम्बर मिलाती थी रधिया-यहीं हम यह भी कहेगे कि गहनों का चोर भी कोई नहीं बल्कि खुद शेखर मल्होत्रा ही था, इसलिए अक्षय आज तक चोर पकड़ नहीं पाया…सुब्रत जैन से जुडी कहानी भी उसने तुम्हें बुरी तरह उलझाने के लिए सुनाई-वह यह भी जानता था कि लन्दन में संगीता को चोरी के इल्ताम में पकड़वाने वाला रमन आहूजा ही है और अच्छी तरह जानता था कि उसे पहचानते ही तुम्हारे दिमाग पर क्या प्रतिक्रिया होगी-उस प्रतिक्रिया को होने देने के लिए वह तुम्हें वहां ले गया…अम्बेडकर मार्ग पर रमन आहूजा का तुम्हें मिलना इसलिए इत्तेफाक नहीं था क्योंकि शेखर मल्होत्रा जानता था कि उसकी फैवट्री का लंच टाइम क्या है और रमन आहूजा वहां से लगभग कितने बजे गुजरेगा अपने किराये के गुन्डों से शेखर ने हमला ठीक उसी समय कराया जबकि वहाँ से रमन आहूजा को गुजरना था…सोचा तो शेखर ने यही होगा कि तुम रमन को वहीं पहचान जाओगी मगर इत्तेफाक से वैसा न होकर रमन आहूजा के फ्लैट पर हुअी----मिस्टर राय की कोठी से बस द्वारा यहाँ अाते वक्त तुमने शेखर के सामने ही लिफाफा पिंडली पर लगाया होगा----सो, उसे मालूम था कि पर्स में कुछ नहीं है मगर अपने आदमी भेजकर उसने तुम पर यह जता दिया कि अपराधी फोटो और चिट्ठियां हासिल करने के लिए मरा जा रहा हे-अपनी इस हरकत से उसने अपने दो उल्लू सीथे किये-पहला यह कि तुम यह सोचने लगी कि अगर हत्यारा शेखर होता तो उन फोटो और चिट्ठियों को तुम्हारे चंगुल से निकालने की कोशिश क्यो करता जिनसे तुम अब तक के मुकदमें की कार्यवाही निरस्त करा दोगी-----दूसरा ये कि तुम्हारे दिमाग में यह सब ठूंसनै के बावजूद मुकदमें को निरस्त कराने का मसला तुम्हारे पास पहुचा ही दिया-तात्पर्य ये कि तुम्हारे दिमाग को विभिन्न किरदारों में उलझाकर वह खुद को तुम्हारे जरिए : एक ऐसे केस से निकल लेना चाहता है जिसमें गर्दन तक फंस चुका था ।"
“ गुड पापा, वेरी गुड !" किरन इस वार व्यंग्य से केवल मुस्कुराई ही नहीं बल्कि ताली बजा 'उठी-"अपनी बेटी को तो आपने दिमाग से बिल्कुल ही पैदल साबित कर दिया-आपको तो हर तरफ शेखर मल्होत्रा ही शेखर मल्होत्रा नजर आ रहा है, मैं जो कर रही हु, वह शेखर मल्होत्रा ही करा रहा है-मैं सोच रही हूं वह भी शेखर मल्होत्रा सुचवा रहा है-आपकी इस कहानी का तो सीधा- साधा मतलब यह निकला कि किरन अग्निहोत्री न अपने दिमाग से कुछ कर रही है, न सोच रही है---' किसी को अपने विचारों पर दृढ रहना सीखना हो तो वह आपसे मिले ---अापने एक बार जिसे मुजरिम मान लिया, सो मान लिया, आप उसके फेवर में कोई दलील सुनने तक की गुंजाइश अपने दिमाग में नहीं रखते मगर ।"
"मगर ? "
"संगीता मर्डर केस की रि'-इन्वेस्टीगेशन के पीछे मेरा मकसद केवल शेखर मल्होत्रा को बेगुनाह साबित करना नहीं बल्कि चक्रव्यूह के पीछे छुपे असली हत्यारे को बेनकाब करके सामने लाना है ......
और जो बात मैं नहीं समझा पा रही हू वह बात आपको उस दिन समझा दूंगी जिस दिन असली मुजरिम को कानून के हवाले करूंगी ।"
बैरिस्टर साहब कुछ कहना ही चाहते थे कि फोन की घन्टी घनघना उठी ।
विश्वनाथ ने रिसीवर उठाया और कहा---“बैरिस्टर विश्वनाथ हियर ।"
"इंस्पेक्टर अक्षय बोल रहा हू ।" दूसरी तरफ़ से कहा गया …"क्या किरन जी घर पर हैं ?"
"हां, बोलो क्या बात है ?"
और फिर !
जो दूसरी तरफ़ से कहा गया उसे सुनकर बैरिस्टर साहब उछल पड़े बोले----" क्या.....कब हुआ ये, कहां और केसे हुआ, क्या हमलावर पकडे़ गये ?"
"दूसरी तरफ़ से उसके सभी सवालों का जवाब मिला ।
किरन ने तब पूछा जबकि रिसीवर क्रेहिल पर रख चुके…"क्या हुआ पापा ?"
"इंस्पेक्टर अक्षय का फोन था…शेखर मल्होत्रा पर उसकी कोठी के ठीक बाहर उस वक्त हमला हुआ जब वह बस स्टॉप से कोठी की तरफ जा रहा था, अक्षय के हमलावर विना नम्बर प्लेट वाली वाली एम्बेसेडर में सवार थे और मल्होत्रा का बयान ये है कि वे उनसे किन्हें फोटो और चिट्ठियों का पता पूछ रहे थे ।"
चिंतित किरन ने सवाल किया…“इस वक्त शेखर कहा' है ?"
"अस्पताल में ।"
किरन के होंठों पर जहर बुझी व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट नाच 'उठी-"आप थोडा गलत बोल गए पापा ।”
"क-क्या ?"
" आपको ये कहना चाहिए था कि शेखर मलहोत्रा ने खुद को इसलिये जख्मी करा लिया ताकि किरन अग्निहोत्री यह सोचे कि वे गुन्डे भला उसके कैसे हो सकते हैं !"
बैरिस्टर साहब सकपकाकर रह गये !
किरन तेज कदमों के साथ हॉल से बाहर निकल गई !
"अरे !" बैरिस्टर साहब चोंकै-“रात के इस वक्त तुम कहाँ चल दीं ?"
"अस्पताल ।" किरन ने संक्षिप्त जवाब दिया ।
"दिमाग खराब हो गया है क्या ?" बैरिस्टर साहब बिगड गए-“ये कोई टाइम है कहीं जाने का और उस पर भी तब जबकि आज ही अाज में तुम पर दो हमले हो चुके हैं ! "
एकाएक किरन उनके नजदीक आईं, बोली--"आपको यकीन है न कि वे हमले मल्डोत्रा ने कराए थे ?"
" फिर ? ”
"तब तो आपको मेरे बाहर जाने से डरना ही नहीं चाहिए !"
" क्यों ?"
" कयोंकि शेखर मल्होत्रा हमले चाहे जितने करवाए मरवा नहीं सकता मुझे , अगर मैं मर गई तो क्रोर्ट में अव तक हुई संगीता मर्डर केस की कार्यवाही को निरस्त कौन करायेगा , बेगुनाह कौन साबित करेगा उसे ?”
बैरिस्टर साहब सकपका गये !
" मगर मैं इतना इतेफाक नहीं रखती पापा,
मैं ये समझती हूं कि हमलावर जो भी है वह ज्यादा परेशान होकर मुझे खत्म भी कर सकता है इसलिए आपकी सेफ से ये रिवॉल्वर निकाल कर अपने साथ ले जा रही हूं ।" कहने के साथ उसने जपने दाये हाथ में मौजूद रिवॉल्वर उनहें दिखाया ।
किरन के भभकते चेहरे पर नजर पड़ते ही जाने क्यो ब्रैरिरटर साहब के सम्पूर्ण जिस्म में सनसनी-सी दौड़ गई, गुस्से को काबू करके बोले---समझने की कोशिश करों वेटी तुम एक ऐसे चवकर में उलझ गयी हो जिसमें उलझने की तुम्हारी उम्र नहीं है, भूल जाओं इस चक्कर को, अपने दिमाग को इस सनक से आजाद कर तो ।"
इस बार किरन के होंठों पर ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण चेहरे पर व्यंग्यात्मक भाव फैल गए-आंखें जुगनुओं की मानिन्द चमक रही थी, बैरिस्टर साहब के बेहद नजदीक पहुंचकर बोली वह…“मैं एक किरदार के बारे में नए सिरे से अपनी राय व्यक्त करना चाहती हूं पापा !"
"किसके वारे में हैं"'
"किरदार नम्बर एक के बारे में, अपके बारे में ।"
"प-पागल हो गयी हो क्या है"'
"आप भी शुरू से वही चाहते हैं जो मुजरिम चाहता है…यह कि मैं इस मामले में दिलचस्पी न लूं , यह कि रि'-इन्वेस्टीगेशन छोड़ दूं और यह कि मैं अपने कदम वापिस खींच लूं ।"
"हम नहीं, एक बाप का दिल ऐसा चाहता है किरन ।"
"बाप का दिल एक आड़ भी हो सकती है ।" किरन कहती चली गई…"मुझे इंक्वायरी करनी होगी कि कहीं मुजरिम बाप के दिल की आड़ तो नहीं ले रहा है---कम-से-कम अापसे मैंने ऐसी अपेक्षा नहीं की थी कि अाप मुझें सच्चाई की खोज करने से रोकेंगे-----आपसे तो सहयोग मिलने की उम्मीद थी मुझे और यह कहते हुए अफसोस हो रहा कि----
इस मामले में आपकी हर गतिविधि मेरी उम्मीदों के एकदम विपरीत है ।" कहते ही वह एक झटके के साथ पलटी और ऊची ऐडी वाली सैंडिल से "खट -- खट" करती दरवाजे की तरफ बढ़ गई ।
अभी वह आधा ही रास्ता तय कर पाइं थी कि बैरिस्टर विश्वनाथ ने कहा ----“ठहरो किरन !"
किरन ठिठकी ।
पलटी और बोली----"प्लीज पापा, अब मुझे रोकने की कोशिश न कीजिएगा क्योंकि चक्रव्यूह के मध्य में पहुंचकर अगर कोई शख्स हथियार डाल दे उसकी मौत निश्चित !! "
"हथियार हम डाल रहे हैं बेवकूफ लड़की ।"
“क्या मतलब ?"'
"हमसे क्या सहयोग चाहती थी तुम ?" बैरिस्टर साहब का रुख और लहजा बदला हुआ था ।
किरन ने उन्हें ध्यान से देखा, कुछ देर अपने पापा के बदले रूख का सबब जानने की असफल चेष्टा करती रही और बोली---"अापसे वैचारिक सहयोग चाहती थी, कि अाप मुझें रोकें नहीं, बल्कि सच्चाई की खोज में अागे बढ़ने के लिए प्रेरित करें, मेरी पीठ ठोकें और जहाँ कहीं भटक रही होऊं वहाँ मुझे रास्ता दिखाएं, मार्ग दर्शन करें मेरा ।"
" ठीक है, अब से हम वही करेगे जो तुम चाहोगी !"
"यानि ?"
"हम तुम्हारे साथ अस्पताल चल रहे है ।" कहने के साथ व आगेे बढे ।"
किरन अपने पापा के इस निर्णय पर दंग रह गई और अभी वह इस बदले हुए निर्णय का कारण जानने की चेष्टा कर ही रही थी कि बैरिस्टर विश्वनाथ नजदीक पहुंचे, उसके सिर पर सनेह -भरा हाथ रखकर बोले----" चलो !'
वे चल दिए । तीनों नौकर और सुलोचना देबी असमंजस में पड़े उन्हें
जाता देखने के अलावा कुछ न कर सके और उस ववत बैरिस्टर साहब गेरेज़ से गाड़ी निकाल रहे थे जब टैक्सी नम्बर यू बी एक्स 4889 कोठी के ठीक सामने रुकी ।
किरन ने उसके ड्राइवर से बात की ।
पिछली सीट के नीचे से अपनी चीज निकाली और बैरिस्टर साहब से ड्राइवर को पांच सौ रुपये दिलवाकर उसे विदा किया-कुछ देर बाद उनकी फियेट सूनी पडी सड़को को रौंदती अस्पताल की तरफ भागी जा रही थी…कार ड्राइव करते बैरिस्टर साहब ने बगल में बैठी किरन से सवाल किया---“टैक्सी की पिछली सीट के पृष्ट भाग में तुमने क्या छुपा रखा था ?"
"संगीता की मां और राय अंकल के फोटुओं के निगेटिब्स । किरन ने बताया । '
“ओह !"
"शायद ये फोटो कल मुझे साफ-साफ़ बता देगे कि हत्यारा कौन है ?"
"कैसे ?"
"संगीता का कत्ल वैसे ही चाकू से हुआ है जैसा शेखर ने खरीदा था, अत: इस बात की बहुत ज्यादा सम्भावना है कि पहली अप्रैल वाले दिन शेखर के बाद इनहीं किरदारों में से किसी ने शेखर जैसा चाकू खरीदा हो---अगर ऐसा हुआ होगा तो चाकू विक्रेता बता सकता है कि चाकू किसने खरीदा था ।"
“वेरी गुड !" बैरिस्टर साहब कह उठे---"" तेज चल रहा है तुम्हारा दिमाग ।"
किरन ने पुन: व्यंग्य क्रिया---"क्या हमारा समझौता नहीं हो गया है ?"
बैरिस्टर साहब चुप रह गये । गाडी में खामोशी छा गई थी । लम्बी छाती जा रहीं खामोशी को पुन: बैरिस्टर साहब ने ही तोडा, बोले…“अन्यथा न ले तो एक बात कहें ?"
"बोलिए ?''
"रिवॉल्वर हमेँ दे दो !"
" क्यों ?"
"चलाना तो , रिवॉल्वर अपने हाथ में तुमने लिया ही पहली बार है ऐसे शख्स के हाथ में रिवॉल्वर हो जो उसे चलाना न जानता हो तो रिवॉल्वर किसी और को नहीं बल्कि उसी को चोट पहुंचा सकता है जिसके हाथ में हो---किसी भी किस्म के खतरे का मुकाबला करने के लिए हम तुम्हारे साथ हैं, रिवॉल्वर की बाकायदा ट्रेनिंग ली है हमने, अतः अगर हमारी जेब में रहे तो किसी भी किस्म के हमले के वक्त कारगर सिद्ध हो सकता है ।"