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चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल compleet

"अाप विश्वास कीजिए, सच्चाई यही है ।”

"मेरे विश्वास करने से कुछ नहीं होगा ।" शहजाद राय भड़क उठे-"बिश्वास पुलिस को आना चाहिए, अदालत को आना चाहिए और दावा है कि उन्हें इस बेवकूफी भरी कहानी पर विश्वास नहीं जाएगा-लोग इस बात पर हंसेंगे कि आधी रात के वक्त जिस्म पर चौंगा, चेहरे पर नकाब और हाथ में चाकू लिए बेडरूम में तुम अपनी पत्नी को "अप्रैल-फूल' बनाने के मकसद से गये थे----पूरी तरह अविश्वसनीय, असम्भव और बचकाना बयान होगा यह ।"

"तो फिर मैं क्या कंहू, आप ही सलाह दीजिये ।" मैं अधीर होकर कह उठा…"मैं आपको वकील नियुक्त करता हूं । वहीं कंरूगा जो आप कहेंगें ---- 'इस झमेले से निकालने की जिम्मेदारी अाप ले लिजिए !"

शहजाद राय खामोश हो गये ।

मुद्रा बता रही थी कि कुछ सोच रहे हैं ।

लुटा पिटा मैं उम्मीदजनक अवस्था में उनकी तरफ़ देख रहा था ।

वे बड़बड़ाये----“तुम्हें बुन्दू , निक्कू और रधिया ने रंगे हाथों पकड़ा है, तुम केवल एक अवस्था में बच सकते होतब, जबकि अदालत में इन तीनों को अविश्वसनीय साबित कर दिया जाए, और ये तीनों अविश्वसनीय तब साबित हो सकते है जब प्रमाणित किया जाये कि तुम्हें संगीता की हत्या के जुर्म में फंसाने के पीछे इनका स्वार्थ है !"

. मैं चुपचाप उनकी बड़बड़ाहट को सुन रहा था ।

एकाएक उन्होंने मुझसे पूछा --- " नोकर का तुम्हें फंसाने के पीछे क्या स्वार्थ हो सकता है ?"

"उन्होंने मुझे फंसाया ही कब है ?" मैंने मुर्खों की मानिंद कहा !!!

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"फ'साया नहीं है बेवकूफ है" शहजाद राय झुंझला उठे-“बल्कि अदालत में साबित कर रहे हैं कि उन्होंने तुम्हें फंसाया है, सोचना ये है कि वे तुम्हें क्यों फंसायेगे ?"

काठ के उल्लू की तरह मैं उन्हें देखता रहा ।

एकाएक उन्होंने पूछा'----"वह डायमंड नेकलेस कहाँ है जो तुमने अपनी मैरिज एनीवर्सरी पर संगीता को दिया था?"

. "मेरे लॉकर में ।"

"वहां क्या कर रहा है ?"

"अगले ही दिन यानि तीस तारीख को संगीता ने यह कहकर नेक्लेस मुझे दे दिया था कि इतना महंगा नेकलेस 'डेली यूज' के लिए नहीं होता-इसे विशेष अवसरों पर पहना करूंगी, वेसे भी इतना महंगा नेकलेस कोठी में रखना समझदारी नहीं थी ।"

"और तुम---नेकलेस को लॉकर में रख अाये ?"

"हां !"

वे बोले-" यह झूठ है ।"

" ज ..... जी ?" मैं चकराया ।

"यह बात तुम्हें किसी के सामने अपने मुंह से नहीं निकालनी कि नेकेलेस लॉकर में है-इस सच्चाई को भूल जाओ और इस झूठ को याद रखो कि तुमने इन तीन नीकरों में से किसी को संगीता के गले से नेकलेस खींचते देखा है ।"

" ज---जी......मैं कछ समझा नहीं ।"

" सब समझ जाओगे ।" शहजाद राय का दिमाग मानो कम्यूटर की-सी तेजी से काम कर रहा था--- यह बताओ कि क्या तुम्हें इन तीनों नौकरों में से किसी का कोई ऐसा भेद मालूम है जिसके खुलने से वह डरता हो ?"

"म-मैं समझा नहीं कि आप क्या पूछ रहे हैं ।"

"लगभग प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कोइं-न-कोई क्षण ऐसा आता है जव उससे कोई ऐसा काम हो जाता है जिसके बारे में वह अपने अलावा किसी को पता नहीं लगने देना चाहता-य-यानि वह उसके जीवन का ऐसा भेद बन जाता है कि जिसके बारे में अगर लोगों को पता लग जाये तो उसके जीवन में तूफान आ सकता है ।"

"एक दिन संगीता कह रही थी कि रधिया गर्भवती है!!"'

शहजाद राय ने उत्सुक स्वर में पूछा…" क्या वह शादीशुदा नहीं है?”

" है मगर…

"मगर?"

"उसका पति गांव में रहता है और वह छः महीने से गांव नहीं गई है ।"

चमचमा रही आँखों के साथ शहजाद राय ने तुरन्त पूछा…“फिर गर्भवती कैसे हो गई वह है ?"

"संगीता ने वताया था कि वुन्दू के साथ उसके सम्बन्ध हैं !”

"वैरी गुड, बुँन्दू शादीशुदा है या कुंवारा ?"

"शादीशुदा है , उसकी पत्नी भी गांव में रहती है !"

" वन गई कहानी!" शहजाद राय चुटकी बजाकर कह उठे और फिर उन्होंने मुझे वह कहानी सुनाई जो मैंने हवालात में इंस्पेक्टर अक्षय को और फिर अदालत में सुनाई थी---शहजाद राय के निर्देश पर मैं इसी कहानी पर डटा रहा, मगर झूठ की यह हांडी चढी नहीं, आपके पापा ने मेरे और शहजाद राय के झूठ की धज्जियां उड़ाकर रख दी--अक्षय ने केस को इतना पुख्ता बनाकर क्रोर्ट में पेश किया कि शहजाद राय की एक नहीं चली ।"

किरन गहरे सोच में डूब गई थी ।

फोटोग्राफ़र और फिंगर प्रिन्टृस विभाग बालों का काम निपटते ही अक्षय और किरन पुनः लाश के इर्दगिर्द का निरीक्षण करते हुए इन्वेस्टीगेशन में जुट गए और कुछ देर बाद किरन ने घोषणा की--" अब मैं एक बहुत ही जबरदस्त और धमाकेदार बात पूरे दावे के साथ कह सकती हूं ।"

".क्या ?" अक्षय ने पूछा ।

जाने कैसी मुस्कुराहट के साथ किरन पलटकर शेखर से बोली--" उस अादमी की लम्बाई क्या थी जिसे तुमने संगीता पर हमला करते देखा था ?"

अक्षय चौका…“इसने संगीता पर किसी को हमला करते देखा था ?"

"प-प्लीज इंस्पेक्टर, मैंने शेखर से सवाल किया है----तुमने जवाब नहीं दिया शेखर, क्या लम्बाई रही होगी उसकी?"

"इ-इस तरह तो उसकी लम्बाई बताना मेरे लिए मुश्किल होगा ।"

"यह तो बता सकते हो कि तुमसे लम्बा था अथवा गुटृटा?"

शेखर ने तुरन्त जवाब दिया--" मुझसे तो लम्बा था ।"

“इधर आओ ।" किरन ने अंगुली के इशारे से उसे नजदीक बुलाया और फिर तहखाने की एक दीवार के नजदीक ले गई ---वहाँ उसने शेखर को दीवार के सहारे लाठी की तरह खड़ा कर दिया और अपने लम्बे बालो से एक शेयर पिन निकालकर उसके सिर के ऊपर दीवार में एक निशान लगाने के बाद बोली----“हट जाओं ।"

असमंजस में फंसा शेखर हट गया ।

अकेला वह क्या ?

सभी असमंजस में फंसे हुए थे ।

औरों की तो बात ही दूर, स्वयं अक्षय नहीं समझ पा रहा था कि वह कर क्या कर रही है----सबकी नजरें किरन पर इस तरह केद्रित थी जैसे वह कोई जादूगर हो और हैरत में डाल देने वाला कोई जादु दिखाने जा रही हो--- कुछ देर तक ध्यान से दीवार को घूरती रही और फिर अचानक अक्षय की तरउ पलटकर बोली--"' मैं रधिया की हत्या का कारण बता सकती हूं !"

"दीवार पर कारण लिखा है क्या ?"

"ऐसा ही समझो ।" किरन के पतले होंठों पर बेहद प्यारी मुस्कान उभरी ।

“तो बताइये, वहाँ आपने क्या पढा ?"

"दीवार पर 'कोडवर्ड' में लिखा है कि रधिया संगीता के हत्यारे से मिली हुई थी ।"

"संगीता का हत्यारा ?" अक्षय उछल संगीता का हत्यारा तो शेखर मल्होत्रा है ।"

"नहीं ।" पूरी सख्ती और मुकम्मल दृढता के साथ कहा किरन ने---“संगीता का हत्यारा वह है जिसने रधिया की हत्या की है ।"'

"प-पता नहीं आप कौन-सी बात किस आधार पर कह रही हैं ?"

"मेरे 'एक्टिव' होते ही हत्यारा इसलिए बौखला गया क्योकि वह समझ चुका था कि मैं एक सवाल .................सिर्फ एक सवाल करके रधिया को 'तोड' सकती हू और अगर वह टूट गई तो उसके चेहरे से नकाब खुद नुंच जाएगा---ऐसा वक्त आने से पहले ही उसने रधिया हत्या कर दी ।"

“मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि आप क्या कह रही हैं ?"

एकाएक किरन ने वुन्दू से सवाल किया----तुम बोलो बुन्दू तुम्हें उस रात थाने का फोन नम्बर मालूम था जिस रात संगीता का कत्ल हुआ ?”

"नहीं, मुझे तो अाज भी मालूम नहीं है ।"

"और तुम्हें निक्कू ?"

निवकू ने कहा…"थाने के नम्बर की मुझे भला जरूरत ही क्या पड़ती जो मालूम होगा ?"

"तो रधिया को कैसे मालूम था ?"

दोनों सकपका गये, एक साथ बोले…“ह-हमेँ क्या पता? "'

“क्या उसने नम्बर डायरेक्टरी या कहीं अन्य से देखा था ?"

"नहीं ।" निक्कू बोला---"नम्बर उसने तुरन्त, इस तरह मिला दिया था जैसे उसे याद हो ।"

“आप बताइये इंस्पेक्टर साहब, अच्छी तरह दिमाग लड़ाने के बाद बताइए कि रधिया को थाने का नम्बर इस कदर रटा हुआ कैसे था कि फर्राटे के साथ अापसे सम्बन्थ स्थापित कर लिया !"

"कमाल की बात है ।" अक्षय बड़बड़ाया ।

' "इससे ज्यादा कमाल की बात ये है कि यह सवाल इन्वेस्टीगेशन के दरम्यान न आपने रधिया से पूछा और न ही कोर्ट में जिरह के वक्त शहजाद राय ने जबकि यह सवाल................यह एक मात्र सवाल रधिया को बोखलाकर रख देता-उसे बताना पड़ता कि एक अनपढ नौकरानी को अगर थाने का नम्बर मालूम था तो क्यों-यह नम्बर उसे किसने और किस मकसद से रटाया था-क्या इसलिए कि शेखर के पकडे जाते ही वह पुलिस को सूचित कर दे ?"

" म---मगर आप यह कैसे कह सकती हैं कि संगीता का हत्यारा ही रधिया का हत्यारा है ?"

"शेखर के बयान के मुताबिक हत्यारे का कद इससे ज्यादा था और मजे की बात तो ये है इंस्पेक्टर साहब कि रधिया का कत्ल उसी ने किया है जिसका कद शेखर के कद से ज्यादा है ।”

 


"शेखर के बयान की भला क्या विश्वसनीयता.........

“मेँ जानती हूं इंस्पेक्टर !" किरन कहती चली गई… जानती हूं कि आप यह कहेंगे कि शेखर के मुंह से निकला एक भी लपज विश्वसनीय नहीं माना जा सकता---- आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि मात्र शेखर के बयान के आधार पर न मैं किसी निष्कर्ष पर पहुंची हूं और न ही सब कुछ कह रही हूं ---यह सव मैं तब कह रही दूं जब शेखर के बयान की पुष्टि कर चुकी हूं !!

“कैसी पुष्टि ?"

"शेखर को यह तो मालूम नहीं था कि रधिया का हत्यारा कद में इससे ज्यादा था या कम हैं"'

“यह बात भला इसे कैसे मालूम हो सकती है ?"

"अब मान लो, मैंने शेखर से संगीता के हत्यारे का कद पूछा तो इसने तिकड़म से, जो मुह में आया बता दिया…यह वात मैं सोचकर कह रही हूं कि शेखर सरासर झूठ बोल रहा है----इसने किसी को संगीता की हत्या करते नहीं देखा, मगर क्या इतना बड़ा इत्तेफाक हो सकता है कि जो कद उसने बताया है, रधिया का कातिल उसी कद का निकल जाए ?"

"आप कैसे कह सकती हैं कि रधिया का कातिल उसी कद का है ।"

कछ देर पहले जिस दीवारके सहारे मैंने शेखर को खड़ा किया था उस दीवार पर फर्श के करीब पांच फूट दो इंच ऊपर हाकी-सी चिकनाई लगी हुई है----------

जव आप उस चिकनाई को सूंघने के बाद रधिया की लाश का सिर सुंघेगे तो पायेंगे कि दीवार पर चिकनाई का निशान रधिया के सिर से वना है और इसका कद अगर 'एक्यूरेट' नहीं तो करीब-करीब पांच फूट दो, एक या तीन इंच होगा ।

उसके करीब आठ इंच ऊपर यानि पांच फुट दस इंच के आसपास चिकनाई का एक और निशान है, उसमें कोई गंध नहीं है…यह निशान हत्यारे के सिर के अलावा किसी का नहीं हो सकता क्योंकि दोनों निशान मिलकर यह कहानी कह रहे हैं कि रधिया और हत्यारे के बीच संधर्ष हुआ, एक बार रधिया ने हत्यारे को दीवार से सटा दिया और एक बार हत्यारे ने रधिया को--यानि दूसरा निशान यह बता रहा है । हत्यारे का कद पांच फूट नौ दस' या ग्यारह इंच के आसपास होना चाहिए-दीवार पर मैंने शेखर के कद की ऊंचाई पर शेयर पिन से निशान लगा रखा है । दीवार के नजदीक जाकर अाप खुद गोर फरमा सकते हैं कि निशान गन्धहीन चिकनाई से करीब दो इंच नीचे है या नहीं ?"'

अक्षय की अक्ल मानो चमगादड़ बनकर तहखाने का चंवकर लगा रही थी ।

शेखर मल्होत्रा की समझ में यह बात आने लगी थी कि किरन उसके हक में अगर सबूत नहीं तो कुछ हद तक तर्क जुटाने में अवश्य कामयाब हो चुकी थी-----शायद इसीलिए उसकी आंखें हीरों की मानिन्द चमकने लगी थी । खुशी की ज्यादती के कारण जिस्म में पैदा होती कंपकंपाहट को वह चाहकर भी नियन्वित नहीं कर पा रहा था ।

पोस्टमार्टम वाले लाश ले गए ।

यह रहस्य अपनी जगह कायम था कि गुलाब चन्द की लाश या रधिया का हत्यारा स्टडी का दरवाजा अन्दर से बन्द करके कहीं और कैसे गायब हो गया-काफी कोशिश के बावजूद तहखाने का कोई अन्य रास्ता न अक्षय को मिल सका और न ही किरन को !

अक्षय ने शेखर, निक्कू बुन्दू और अतर एण्ड फैमिली के एक-एक मेम्बर से घोट--घोट कर पूछा कि किसी ने आज से पहले गुलाब चन्द की लाश कोठी में नहीं देखी थी ?

जिस वक्त वह सबके बयान ले रहा था उस वक्त किरन उस कमरे की तलाशी लेने पहुंची जहां रधिया रहती थी और इस तलाशी में उसे एक ऐसी चीज बरामद हुई जिसे देखते----किरन की आंखें बिस्फारित अंदाज में फटी की फटी रह गई, मगर शिघ्र ही उसने खुद को सम्हाल लिया और यहाँ से मिली चीज का जिक्र किसी से नहीं किया । "

सबका जवाब इंकार में था ।

अतर जैन से बात करके किरन ने उस कहानी की पुष्टि कर ली जो शेखर ने सुनाई थी---अतर का कहना भी यही था कि सुब्रत जैन की शक्ल उसने उस दिन के बाद से नहीं देखी जिस दिन वह घर छोडकर गया था ।

अन्त में किरन ने कहा-मुझे अाप सबका एक-एक फोटो चाहिए ।"

"फ-फोटो है"' अतर जैन चौंक पड़ा----“हमारे फोटुओं का क्या करेंगी अाप ?"

"एलबम में सजाऊंगी ।" किरन ने मजेदार स्वर में कहर-"मुझें एक शौक है, बड़ा विचित्र शोक ।"

"कैसा शौक ?”

"मैँ जिससे मिलती हूं अपनी एलबम में लगाने के लिए उसका फोटो जरूर ले लेती हुं- मिलने वाला चाहे मोची हो या रिक्शा-पुलर--आज़ तक जितने लोगों से मिली हूं --मेरे पास सबके फोटो हैं ।"

"नहीं.........असम्भव ।" अतर जैन कह उठा----'' हो ही नहीं सकता, मान लीजिए कि आप घूमने के लिए किसी हिल स्टेशन पर जाती हैं---वंहा होटल में ठहरती हैं---मेनेजर से मिलती हैं---वेटर्स के सम्पर्क में अाती है तो क्या आपके पास उन सबके फोटो.....

“मेरे पास उस खच्चर का फोटो भी है जिस पर बैठकर नैनीताल से "टिफिन टॉप' और चाइनापीक गई थी ।" किरन ने कहा----क्या अप लोगों को फोटो देने में एतराज है !""

"ए---एतराज ?" अतर जैन सकपकाया, कमल की तरफ देखता हुआ बोला----"एतराज भला क्यों होगा ?"

एकाएक किरन ने कमल की आंखों में आंखें डालकर पूछा…"आपको एतराज है ?”

"न-नहीं तो ।"

"तो लाइए, अपना एक…एक फोटो दे दीजिए मुझे और इंस्पेक्टर साहब, अाप भी ।

"म-मैं भी है"' अक्षय उछल पड़ा ।

"क्यों, क्या अपासे नहीं मिली हू मैं ?"'

"मिली तो है, खैर, कल सुबह आपके घर पहुच जाएगा ।"

"थेंक्यू! अरे आप लोग भी अभी तक यहीं खड़े हैं, अपना-अपना फोटो लेने गए नहीं ?"

कमल ने कहा---“हमारे फोटो भी कल सुबह आपके पास पहुंच जायेंगे ।" .

"" ओ.के ।" किरन के कहा-“लेकिन अगर सुबह होते ही आपमें से किसी का फोटो नहीं पहुचा तो मैं यह समझुंगी कि उसके दिल में चोर है और इतना तो अाप जानते ही होंगे कि चोर किसके दिल में होता है ?"

सभी सहम गए ।

एक अजीब-भी चेतावनी दे डाली थी किरन ने ।

अभी उनमें से किसी के मुंह से बोल न फूटा था कि किरन ने शेखर से कहा-----"मुझे एक तुम्हारा फोटो चाहिए और एक संगीता का ।"

"स-संगीता का क्यों, उससे अाप मिली हैं ?"

"बाह ! जिसके मर्डर की तहकीकात कर रही हूं क्या उसका फोटो मेरे पास नहीं होना चाहिए ?"

"ठीक है, मैं अपने कमरे से फोटो लाकर दे देता हू।"

"मैं साथ चल रही हू ।"

एकाएक अक्षय ने क्हा----"अच्छा तो किरन जी, मैं चलू !"

"ओं के सी यू इंस्पेक्टर !" किरन ने उसकी तरफ़ विदाई का हाथ हिलाया, उधर अक्षय लोहे वाले रेट के बाहर खडी अपनी जीप की तरफ़ बढा ।

इधर किरन के नजर वुन्दू और निक्कू पर पड्री, बोली-“अा्प दोनो के फोटो भी कल सुबह तक मेरे पास पहुच जाने चाहिएं ।"

"म-मगर मेमशाब, हम फोटो पहुचायेगा कहाँ ?"

"ओहू सॉरी ।" कहने के साथ उसने पर्स में से एक विजिटिंग कार्ड निकलकर उन्हें पकडा दिया और शेखर के साथ उसके कमरे की तरफ बढ़ गई-मगर उसने महसूस किया आसपास कोई नहीं है तो बोली---------अब मैं शर्त लगाकर कह सकती है शेखर कि तुम्हें बेगुनाह सबित कर दूंगीं !!

"म-मैँ. . ..मैं समझ नहीं पा रहा है किरन जी कि किन शब्दों में मैं आपका शुक्रिया अदा करू ?" खुशी की पराकाष्ठा के कारण शेखर का लहजा कांप रहा था…

“अब तो मुझे यकीन होने लगा है कि आप यह चमत्कार कर दिखायेंगी ।"

"मेरे एक सवाल का जवाब और दो ।"

पूछिए क्या---" यह बात किस-किसको पता थी कि तुम संगीता का अप्रैलफूल बनाने जा रहे हो ?"

"किसी को नहीं ।" उसके कमरे में पहुंचकर सोफे पर बैठती हुई किरन ने कहा…“ऐसा नहीं हो सकता ।"

"कैसा ?"

"यह कि अप्रैल-फूल वाली बात किसी को पता नहीं थी ! असली हत्यारे ने योजना और जिस चालाकी के साथ तुम्हें हत्यारे के 'रूप में" प्लांट किया है, उतनी खूबसूरती के साथ तुम्हारी मुकम्मल योजना जाने विना कोई नहीं कर सकती----“याद कर ले, मुमकिन है, कि यार'-दोस्ताने में तुमने अपनी योजना किसी को बता दी हो ?"

"खूब सोच चुका हु, किरन जी, इस बोरे में मैंने किसी से जिक्र नहीं किया है ।"

एक पल सोचने के बाद किरन ने अगला सवाल किया…"अपने मैनेजर के बारे में क्या ख्याल है तुम्हारा ?"

"म-मैनेजर?” तुमने उससे एक ही रात के ट्रेन और प्लेन के टिकट मंगाये … सम्भव है कि वह इस अजीब बात की तह में गया हो और फिर किसी ढंग से तुम्हारी योजना की भनक लगी हो उसे ?"

"जो योजना सिर्फ और सिर्फ मेरे दिमाग में थी--जिसका एक भी लफ्ज़ मैंने फूटे मुह से किसी से नहीं कहा, उसकी भनक भला किसी को लग ही कैसे सकती है ?"

"भनक तो लगी है----भनक लगे विना कोई शख्स वह सब कर ही नहीं सकता जो हत्यारे ने किया है-पता यह लगाना है कि तुम्हारे प्लान की भनक उसे कहां से लगी ?" शेखर चुपचाप 'चांद' को देखता रहा ।

अच्छा, ये बताओ कि---" अपनी मैरिज एनीवर्सरी तुमने कहां मनाई थी ?"

"होटल ताज पैलेस में ।"

"फर्स्ट अप्रैल पर तुम्हारे और संगीता के बीच बहस वहीं हुई थी ?"

"वंहा, डिनर के दरम्यान ।"

"और उस वक्त तुमने यह सावधानी नहीं बरती होगी कि कोई तुम्हारी बहस न सुन पाये ?"

"सावधानी बरतने का सवाल ही नहीं था, हम कोई अपराध थोड़ी कर रहे थे ?"

किरन की आंखे जुगनुओं की मानिन्द चमक उठी… “उस वक्त तुमने ये ध्यान भी नहीं दिया होगा कि दायेँ-बायेँ और आगे-पीछे वाली सीटों पर कौन बैठा है ?"

"सवाल ही नहीं ।"

"यानि उस वक्त तुम्हारे बीच हुई बहस किसी ने सुनी हो सकती है ।"

"सुनी तो हो सकती है मगर सुनने से किसी को लाभ क्या हुआ होगा -सच्चाइं ये है कि उस क्षण स्वयं मुझे . मालूम नहीं था कि संगीता को अप्रैल-फूल किस तरह बनाऊंगा, योजना तो मेरे दिमाग में बाद में वनी---., जबकि मेरे और संगीता के बीच चैलेंजों का आदान-प्रदान हो चुका था ।"

“माना कि उस वात किसी ऐसे शख्स ने तुम्हारी बहस सुनी जो ऐसे मौके की फिराक में था कि संगीता का मर्डर करके तुम्हें फंसा सके-बस बहस के बद उसने तीस-इकतीस और पहली तारीख को साये की तरह तुम्हारा पीछा किया…तुम्हें काला कपडा खरीदते, उसे टेलर को देते और चाकू खरीदते देखा--फिर किसी ढंग से यह भी पता लगा लिया कि तुमने एक ही साथ के ट्रेन और पलेन के टिकट मंगाये है----- उसने तुम्हारी योजना का अनुमान लगा लिया होगा ।"

"भला इस तरह "अनुमान कैसे लग सकता है ?"

"जो लोग जिस फिराक में होते हैं वे अपने मतलब के अनुमान बखूबी लगा लेते हैं शेखर, लिफाफा देखकर " मजमून भांप जाने वाले लोगों के बारे में तुमने ज़रूर सुना होगा और फिर कौन जानता है कि वह शख्स कौन था---खेर, मैं तुम्हारी फेवट्री के मैनेजर से मिलना चाहती हूं ! इस वक्त कहां होगा वह ?"

 


शाम के सात बजा रही रिस्टवॉच पर नजर डालते हुए शेखर ने कहा-इस वक्त तो अपने फ्लैट पर होगा ।"

“क्या तुम मुझे वहाँ ले जा सकते हो ?"

" ओंफकोर्स ?"

"तो चलो ।"

"फोटो नहीं लेंगी ?"

"ओह हां ।"

शेखर ने मेज की दराज से एलबम निकाली और " उसके पृष्ट से किसी फोटो को छुडाने का प्रयत्न करता बोला-बैसे संगीता का फोटो तो अपके घर मौजूद इस केस की फाइल में भी होगा ?'"

"उसमें विभिन्न कोणों से लिए गये संगीता की लाश के फोटो हैं…चूंकि हत्यारे ने चाकू का अन्तिम वार उसके चेहरे पर किया था इसलिए चेहरा इतना विकृत हो गया था कि ठीक से पहचान में नहीं अा रही ।"

“ये लीजिए ।" उसने संगीता का फोटो किरन की तरफ़ बड़ाया ।

किरन ने फोटो लिया ।

और !

फोटो पर नजर पड़ते ही कुछ ऐसा लगा कि किरन के सम्पूर्ण शरीर में बिजली-सी कौंध… -हक्की-बक्की अवस्था में वह कभी फोटो की तरफ़ देख रही थी--- तो कभी एलबम से अन्य फोटो निकालने मेॉ व्यस्त शेखर को फोटो पर नजर पड़ते ही कुछ ऐसा लगा कि किरन के सम्पूर्ण शरीर में बिजली-सी कौंध… -हक्की-बक्की अवस्था में वह कभी फोटो की तरफ़ देख रही थी, कभी एलबम से अन्य फोटो निकालने में व्यस्त शेखर को ।

शेखर की गर्दन एलबम पर झुकी थी ।

इसीलिए वह किरन के जिस्म में बिजली का अहसास नहीं कर पाया…फोटो पर नजर पडते ही किरन की आखों से जैसे सैकडों फुट लम्बी एक फिल्म-गुजर गुजर गई थी !

और फिर लकवा मार गया उसे ।

जब तक शेखर मल्होत्रा ने एलबम से अपना पासपोर्ट साइज का फोटो निकालकर किरन की तरफ़ बढाया तब तक प्रत्यक्ष में भले ही यह खुद को नियंत्रित कर चुकी हो, परन्तु अन्दर से नियंत्रित नहीं थी ।

दिलो--दिमाग में बवंडर-सा उठा हुआ था ।

ऐसा बवंडर जो उद्वेलित किये हुए था ।

आंखों में उस वक्त भी फिल्म-सी चल रही थी जब शेखर ने पूछा-“चलें किरन जी ?"

"क्या तुम यही कपडे़ पहनकर अपने मेनेजर के यहां चलोगे?” किरन ने खुद को सम्भाला ।

एक नजर उसने तन पर मौजूद कुतें-पायजामेँ पर डाली, बोला-“आप मुझें वे-गुनाह साबित करने जा रही हैं, इस खुशी ने मुझसे मेरा से अहसास तक छीन लिया कि मैंने क्या पहन रखा है ।"

"मेरा ख्याल है कि कपडे चेंज कर लो ।"

“ओ. के. ।" कहने के साथ एलबम को वापस दराज में रखने हेतु उसने दराज खोली ही थी कि किरन ने कहा---"एलबम मुझे दे दो, तब तक मैं इसे देखती रहूगी ।"

शेखर ने एलबम उसे पकड़ा दी ।

उधर वह सेफ से एक जोडी कपडे़ निकलकर बाथरूम में बंद हुआ

इधर किरन ने एलबम खोल ली-सबसे पहले पृष्ठ पर दुल्हन बनी संगीता का फोटो था ।

किरन इस फोटो को देखती रही ।

देखती रही ।

दिलो--दिमाग में पुन: एक जलजला-सा उठने लगा ।

वह पृष्ठ किरन ने तब जाकर पलटा जव यह अहसास हुआ कि शेखर बाथरूम से लौटने बाला होगा ।

गुलाब श्चन्द जैन और उनकी पत्नी का फोटो उसके सामने था ।

किरन की गोरी, पतली, नर्म और नाजुक ऊंगलियां तेजी से चली-फोटो एलबम के पृष्ठ से उखड़कर उसके पर्स में पंहुच गया और फिर उसने फोटुओं पर सरसरी नजर डालते हुए पृष्ठ पलटने का जो सिलसिला शुरू किया तो वह जब तक चलता रहा जब तक कि एक झटके से बाथरूम का दरवाजा न खुल गया ।

किरन की नजरें स्वत: उस तरफ़ उठ गयी ।

और ।

नजरें एक वार उठी तो जैसे चिपक कर रह गयी ।

इस क्षण से पूर्व किरन ने महसूस नहीं किया था कि शेखर मल्होत्रा कितना खूबसूरत होगा ।

" नहाया-धोया वह काली पैंट और सफेद कमीज में ठीक "चंकी पांडे' सा लग रहा था ।

वेसा ही गठा हुआ कसरती जिस्म, वेसा ही कद, वेसे ही नाक-नक्शा-फर्क था तो सिर्फ आंखों के रंग मे…चंकी पांडे की आंखें गहरी काली हैं जबकि शेखर की नीली थीं ।

गहरी नीली ।

किरन को वे आंखें चंकी पांडे की आंखों से बेहतर लगी ।

 


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जो कर रही हैं, अगर आप उसे महान् कार्य नहीं मानती तो इतना तो मानना ही पडे़गा कि मुझ पर अहसान कर रही हैं आप ।"

"भूल है तुम्हारी ।" किरन ने पुरजोर स्वर में विशेष किया---"संगीता मर्डर केस को तुम एक पेपर समझ सकते हो और मुझे वकालत की एक स्टूडेन्ट-अगर मैं इस पेपर को 'साल्ब" कर लेती हूं तो शहजाद राय, अक्षय श्रीवास्तव, जज साहब और मेरे पापा जैसे धुरंधरों को मेरी क्षमताओं और काबलियत का लोहा मानना पडेगा और साथ ही कुबूल करनी पडेगी यह सच्चाई कि "सच्चाई तर्कों से बडी है'…-सो जो कुछ कर रही हूं घुरंधुरों से अपना लोहा मनवाने के लिए कर रही हूं फिर यह सब तुम पर अहसान कैसे हुआ हैं?"

एकाएक शेखर ने कहा…“इतना लम्बा लेक्चर अापने मुझे इसलिए दिया है ताकि मैं आपकी 'आप' या "किरन जी' न कहूं ! "'

"हां !” किरन सभ्य अन्दाज में हँसी ।

"कोशिश करूंगा ।"

"अब तुम वह सवाल पूछ सकते हो जो पूछना चाहते थे ? "

"जवाब मुझे मिल चुका है ।"

किरन ने चक्ति स्वर में पूछा…“किसने दिया जवाब ?"

"अ_आप. . . सॉरी... तुमने !"

"म-मैं तुम्हारे किसी सवाल का जवाब दे चुकी हूं ?"

"दरअसल मैं यह जानना चाहता था कि आप… 'सॉरी तुम मेरी मदद क्यों कर रही हो…इस सवाल का जवाब तुम्हारे "लैक्चर' से मिल चुका है ।"

किरन खिलखिलाकर हैंस पडी ।

क्यारियों यें खिले फूल मानों उचक-उचक कर खिलखिलाने वाले को देखने लगे

फूलों के अलावा कुछ आंखें भी देख रही थी उन्हें । पूरी चौदह आखें थीं वे ।

दस आंखों में ईष्यों के भाव थे-अगर या कहा जाये तो गलत न होगा कि उन आंखों में हैरत, गुस्से और कुछ-कुछ प्रतिशोध के भाव थे-किरन और शेखर को साथ-साथ खिलखिलाते देखकर जिनकी आंखों में ये भाव थे, वे आंखें अतर एन्ड फेमिली के पांच सदस्यों की थीं ।

वुन्दू और निवकू की आंखों में कोई ऐसा भाव न था जिसे शब्द दिये जा सकें ।

अतर एन्ड फैमिली के पांचों सदस्य ' पहली मंजिल पर स्थित एक बन्द खिड़की के पीछे खड़े पारदर्शी शीशे के माध्यम से उन्हें लोहे वाले गेट की तरफ़ बढते देख रहे थे !

कुछ ऐसे जैसे न चाहते हों कि कोई उन्हें वहीं खड़ा देखे ।

लोहे वाले गेट के नजदीक पहुंचकर शेखर ने पूछा--"आप किस सवारी से अाई थी ?"

"टैक्सी से ?"

"मुझे 'ये लोग गाड़ी को हाथ नहीं लगाने देते ।"

"' कोई बात नहीं, हम टैक्सी से चलेंगे ।"

गेट के बाहर निकलते ही शेखर ने एक टैक्सी रोकी और दोनों उसमें सवार हो गये--शेखर ने ड्राइवर को मैनेजर के फ्लैट का पता बताया-उधर ड्राइवर ने टेक्सी अागे बढाई, इधर किरन ने वहुत देर से दिमाग में घुमड़ रहा सवाल किया---“संगीता से तुम्हारी पहली मुलाकात कहाँ हुई थी शेखर ?"

 


"आगरा यूनिवर्सिंटीं मे--- तब जबकि संगीता ने वहां एम. ए. प्रीवियस में एडमीशन लिया था-मे वहीं पहले ही से पढ़ता था , बी. ए. फाइनल करके एम.ए. में आया था मैं

इसमें जरा भी अतिश्योक्ति नहीं है किरन जी.. . . ओह ..... सॉरी ..... कि संगीता ने पहले ही दिन सारे कॉलिज में तहलका-सा मचा दिया था-जिसकी जुबान पर देखो संगीता की चर्चा -- लड़के जहां ठंडी आहे भर…भरकर उसकी चर्चा कर रहे थे वहीं लड़कियां मारे डाह के मरी जा रही थी ----दोस्तों में जव चर्चा चली तो मैं भी "उस लडकी' को देखने के लिए उत्सुक हो उठा जिसने सारे कॉलिज में खलबली मचा रखी थी…यह सच है कि मैं सिर्फ उसे देखने कैटींन में गया और यह भी सच है कि संगीता की स्वप्निल आंखों ने मुझ पर जादू-सा कर दिया, आज़ मुझे यह कुबूल करने में हिचक नहीं है कि मैं उसी दिन संगीता से अपना दिल हार चुका था परन्तु वह एक तरफा प्यार था… अपनी भावनाएं उसके सन्मुख रखने का न मुझमें हौंसला था, न ही परिस्थितियां उस सबकी इजाजत देती थी ।”

''परिस्थितियां ?"

"अपनी बूढी मां का इकलौता बेटा था--पिता की मृत्यु पर मेरी आयु केवल दस वर्ष की बी-तव से मेरी अनपढ मां ने मेहनत-मज़दूरी करके न केवल पाला-पोसा था बल्कि जिदूद करके पढा भी रहीं थीं---उन दिनों वह कहा करती थी कि बस'...."दो साल और हैँ…तू एम. ए. कर लेगा, कहीं अच्छी भी नौकरी मिल जायेगी और फिर मैं 'राज' करूंगी ऐसी मां के बेटे को कुदरत किसी से मुहव्वत करने की’ इजाजत नहीं देती औरे फिर-संगीता अपने परिधान तथा चेहरे से ही करोड़पति नजर आती थी --कहने का मतलब यह कि मैंने उससे कभी बात नहीं की-हां, मित्र-मण्डली में उसकी चर्चा चलती रहती थी--धीरे-धीरे दिन गुजरने लगे-उन लडकों में संगीता को फंसाने की होड़-सी लगी रहती जो काँलेज में एडमीशन पढने के लिए नहीं बल्कि मुहब्बत, दादागिरी और गुन्डागर्दी करने के लिए लेते हैं ---

मगर बाप की दौलत की नुमाइश करना जिनका शौक होता है, मगर.......पूरा साल गुजर गया-सगींता को फंसाना दूर, कोई कलाई तक न पकड सका उसकी---धीरे-धीरे सारे कॉलिज में चर्चा फेल गई कि संगीता इतनी 'बोल्ड' लड़की है कि कोई उसे छू तक नहीं सकता-जाने क्यों यह अहसास मुझे सुकून पहुंचाता था किरन जी......सॉरी....... 'कि संगीता, किसी की नहीं हुई है----: आज सोचता हूं तो लगता है कि शायद मुझे यह 'सुकून' मेरे अन्दर पल रही मुहब्त के कारण मिलता था---उधर संगीता को लेकर लडकों में शर्तें लगने लगी!

लड़के शर्ते हारने लगे और फिर कॉलिज के सबसे बड़े गुन्डे ने-अपने चमचों से वह शर्त लगा ली.....वह शर्त जो मेरे और संगीता के समीप जाने का 'बायस' भरे- पूरे ग्राउन्ड में उसने संगीता का चुम्बन लेने का ऐलान किया और सिर्फ ऐलान ही नहीं किया बल्कि ऐसा करके दिखाया भी उसने ।

हां-उसने किया, भरे-पूरे ग्राउन्ड में किया-हजारों छात्रों और सैकडों प्रोफेसर्स की मौजूदगी में किया---संगीता के पुरजोर विरोध के बाद किया-उस दिना-उस दिन मैं भूल गया कि मैं एक गरीब मां की एक इकलौती लाठी हूं यह भी भूल गया कि, अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरी मां अपनी छाती पीट-पीटकर खुद को मार डालेगी-जाने यह कैसा जुनून था कि अपनी हैसियत भूलकर में बाज की तरह नगर विधायक के बेटे पर टूट पडा और फिर उसे इतना मारा कि लहुलुहान हो गया वह-सारे कॉलिज में सनसनी फैल गई---दब्बू सा नजर आने वाला 'मैं' चर्चा का केन्द्र बन गया---उस दिन भी मैंने संगीता से या संगीता ने मुझसे बात नहीं की थी और यह सच है किरन कि जोश और जुनून के काफूर हो जाने पर मैं पश्चाताप की अाग में जलने लगा----

यह सोचकर खुद को गालियां बकने लगा कि मैं क्यों इतनी बड़ी हस्ती के बेटे से भिड़ा--क्या हो गया था मुझे-जब सभी चुपचाप देख रहे थे तो मैंने ही बेवकूफी क्यों की, मगर मेरे भीतर के इस पश्चाताप से विधायक के बेटे और उसके चमचों को भला क्या लेना-देना था---अगले ही दिन हाकियों से इतना पीटा कि मेरी कई हड्डियां टूट गई-- बिस्तर पर पड़ गया---मां दहाड़े मार-मारकर रोया करती थी !

कॉलिज छूट गया मगर संगीता रोज मेरी किराये की खोली में अाने लगी----इस तरह हमारे बीच मुहब्बत के अंकूर फूटे और मेरे 'प्लस्तर' उतरने तक वे परवान चढ़ गये---मां संगीता क अपनी बहू के रूप में स्वीकार कर चुकी थी---बह कहा करती थी कि संगीता के पिता के सामने जाकर अपनी झोली फैला देगी और संगीता को मांग लेगी पर वह दिन अाने से पहले ही 'एन्जाम' आ गए…विधायक ने ऐसा षडृयन्त्र रचा कि 'अटैन्डेस' कम होने के बहाने मुझे परीक्षा में नहीं बैठने दिया गया और यह मामूली भी खबर मेरी मां के दिलो-दिमाग पर ऐसी बिजली बनकर गिरी कि उसे अर्थी पर लादकर श्मशान ले जाने के अलाबा मेरे पास कोई चारा नहीं रहा।

परीक्षायें खत्म हो गयी… संगीता अपने शहर यानि यहां आ गई-कुछ दिन बाद उसका पत्र मिला, उसने मुझे यहीं बुलाया था--" मैं अाया-उसने मुझे बाबूजी से मिलाया परन्तु बाबूजी यह सुनते ही अाग बबूला हो गए कि हम शादी करना चाहते हैं-संगीता अड़ गई, विद्रोही हो उठी वह-मैंनै उस दरम्यान उसे यह समझाने की केशिश की कि किस्मत नहीं चाहती कि हम मिलें । अतः हमें किस्मत से नहीँ लडना चाहिए मगर वह नहीं मानी और.......

जब एक दिन उसने आत्महत्या करने की कोशिश की तो बाबूजी मजबूर हो गए…

उन्होंने हमारी शादी कर दी मगर इस शर्त के साथ कि मैं घर जमाई बनकर रहूंगा !!!!!!

हालाकि आगरा में भी मेरा ऐसा कुछ नहीं बचा था जिसे " अपना कह सकता अथवा जिससे 'मोह' होता परन्तु घरजंबाई बनना इसलिए कुबूल नहीं था ।

क्योंकि बाबूजी को तो पहले से ही शक था कि मैं उनकी बेटी से नहीं बल्कि दौलत से मुहब्बत करता हूं मगर जिस तरह संगीता ने बाबूजी को शादी के लिए मजबूर किया था लगभग उसी तरह मुझे घरजंवाई बनने पर मजबूर कर दिया ।"

किरन ने एक अजीब सा सवाल पूछा-----""क्या तुम पर संगीता की चढी-चढी आंखों का भेद कभी नही खुला ।"

" क क्या मतलब ?" शेखर बुरी तरह चौंका ।

"जबाब दो शेखर ।" उसे तीक्षण दृष्टि से घूरती किरन ने अपना सवाल दोहराया-" सच-सच बताओ के तुम पर कभी संगीता की चढी-चढी आंखों का भेद खुला अथवा नहीं?"

"क-क्या तुम ? "' शेखर बुरी तरह बोखला 'उठा-----“क्या तुम उन आंखों का भेद जानती हो ?"

"सवाल मैंने तुमसे किया है शेखर ।"

"हां, मुझ पर वह भेद खुल गया था ।" शेखर को मानो बताना पड़ा !

"कब ?"'

"शादी के बाद ।"

"क्या उसने तुम्हें यह भी वताया था कि आगरा से पहले वह लन्दन कैम्ब्रिज में पढ़ती थी ?"

"बताया था ।"

. "तब यह भी बताया होगा कि वहां अपनी पढाई अधूरी छोडकर वह भारत क्यों लौट अाई ?"'

"उसका मन नहीं लगा था, एटमोस्फेयर रास नहीं आया था उसे ।"

किरन यूं मुस्करा उठी जैसे लोग इस झूठ को सुनकर मुस्करा उठे कि शाहजहां का बनवाया हुआ ताजमहल 'सोनम' की बांहों में बांहें डाले "ओबराय कॉन्टिनैटल " के डिस्को फ्लोर पर फुदक रहा था । बोली---क्या लन्दन के बारे में उसने ' तुम्हें कुछ और नहीं बताया ? "

"ऐसा कुछ खास तो नहीं मगर-----

“मगर ?"

"तुम्हारी रहस्यमय मुस्कान से लग रहा है जैसे ऐसा कुछ जानती हो जिसे मैं नहीं जानता, ऐसा आखिर क्या है?"

किरन के जवाब देने से पहले टैक्सी एक झटके के साथ सकी रूकी----------दोनों ने चौंककर बाहर की तरफ़ देखा तो पाया कि वे अपनी मंजिल पर पहुंच चुके थे ।

किरन पर नजर पड़ते ही मेनेजर उछल पड़़ा-" अ-अरे अरे । आप?"

"त-तुम ?" चौंक किरन भी गई ।

भाड़-सा मुंह फाड़े अभी वे एक-दूसरे की तरफ देख ही रहे ये कि शेखर ने कहा----“लगता है तुम एक-दूसरे को पहले से जानते हो ?"

'तुमने ठीक कहा शेखर!" किरन बोली !!!

 


"ह-हम अाज ही तो मिले थे सर ।" हकलाते हुए मैनेजर ने शेखर से कहा----'मैँ लंच में यहाँ आ रहा था, किन्हीं बदमाशों ने इनकी गाड़ी पर गोलियां बरसाई------"तब मैंने लिफ्ट दो थी ।"

'ग--गोलियां ?"' अब उछलने की बारी शेखर की थी…'इनकी गाडी पर बदमाशों ने गोलियाँ ......’क-क्या बक रहे हो इन पर तो गाडी भी नहीं है ।"

"म… सच कह रहा हूं सर, इनसे पूछ लीजिए ।"

शेखर ने तेजी से पलट कर किरन की तरफ देखा और सवाल करने के लिये मुंह इसलिये खुला का खुला रह गया क्योंकि सवाल किये बिना ही उसे जबाब मिल चुका था ---- किरन मुस्करा ही इस अन्दाज में रही थी जैसे वह कह रही हो कि मैनेजर जो कह रहा है, ठीक कह रहा है !

तब शेखर ने पुछा --- " तुमने तो कहा था कि तुम्हारे पास गाड़ी नही है ?"

" मैनें सिरफ यह कहा था कि तुम्हारी कोठी पर टैक्सी में पहुची थी और यह सच था --- रास्ते में बदमाशों ने गोंलियां चलाकर गाड़ी की ऐसी हालत कर दी थी कि वह एक इंच नहीं चल सकती थी --- तब पहले इन महाशय से लिफ्ट ली और फिर टैक्सी के जरिये कोठी पर पहुचीं !"

" यानी हमला तब हुआ जब तुम मेरे पास आ रही थी !"

" हां !"

" मुझे क्युं नहीं बताया ?"

" डर था कि सुनते ही एक के बाद दूसरे सवाल का जबाब की झड़ी लगा दोगे , बही अब कर रहे हो !"

" क्या तुम जबाब देना नहीं चाहती ?"

" दूंगी !" किरन हौले से मुस्कराई ---" तब दूंगी जब फुर्सत होगी इस वक्त हम तुम्हारे मैनेजर साहब से मिलने अाऐ हैं और एक ये महाशय हैं कि दरबाजे में अड़े -खड़े हैं ! क्या हमारे अन्दर जाने में आपको अॉब्जेक्शन है ?

"स स सॉरी --- आइये !" झेपता हुआ वह पीछे हटा !!!!

शेखर चुुप सा हो गया था !

ड्राइंगरूम में पड़े सोफे पर बैठती हुई किरन ने कहा --- " हालांकि आज ही की डेट में हम दूसरी बार मिल रहे हैं किन्तु अभी तक आपने अपना नाम नहीं बताया !!"

"मुझे रमन आहूजा कहते हैं ।"

"र-रमन-आहूजा कहते हैं ?" किरन के मस्तिष्क में मानो 'अनार' फूटा--रोशनी के फूल बिखरे और सम्पूर्ण जहन में जगमगाता प्रकाश फैल गया कि इस शख्स को उसने कहाँ देखा है? "

रमन आहूजा ने पूछा----"और आपका नाम हैं"'

"किरन अग्निहोत्री ।"

"बडा सुन्दर नाम है ।"

एकाएक किरन थोडे आगे सरकी और सामने वाले सोफे पर बेठे रमन आहूजा की आंखो में अंखों डालकर रहस्यमय स्वर में बोली-क्या तुमने मुझे पहचाना मिस्टर रमन?"

"अजीब सवाल है ! दरवाजे पर हम दोनों कुबूल कर चुके हैं ..........

"नहीँ ।" उसकी बात काटकर किरन कहती चली गई, मैं आज हुई मुलाकात की बात नहीं कर रही, मैं बात कर रही हू अाज से पांच साल पहले की…तव की, जव तुम लंदन में थे ।"

" ल ल -- लंदन में ?" जाने क्यों रमन आहूजा का चेहरा पीला पड़ गया ।

आंखों में आंखें डाले किरन ने कहा---" तुम लंदन में पढे़ हो न?"

"हां-हां ।" रमन को कहना पड़ा ।

"और संगीता भी वहीं पढती थी-वह संगीता जो सारे कॉलिज में बदनाम थी---इसलिए बदनाम थी क्योंकि वह चीबीस घण्टे स्मैक, अफीम, हेरोइन या एल. एस. डी. के नशे में चूर रहती थी ।"

रमन आहूजा हवका-बक्का। रह गया ।

काटो तो खून नहीं ।

किरन के शब्द कानों में पड़ते-पड़ते शेखर भी चौंक पड़ा था –

बह ध्यान से किरन और रमन आहूजा के चेहरों को देखने लगा । एकाएक किरन ने शेखर से कहा-"कुछ ऐसी बातें हैं शेखर जिनका जिक्र मैं तुम्हारे सामने नहीं करना चाहती थी परन्तु हातात ऐसे बन गए है कि करना पड़ेगा !"

"म-मैं समझा नहीं किरन ।"

"सुनते रहो ।" कहने के बाद किरन रमन आहूजा की तरफ मुखातिब हुई और उसे सख्त नजरों से घूरती हुई बोली---“संगीता इतनी खूबसूरत थी कि उसने सारे कॉलिज में तहलका मजा दिया, लोग उसकी स्वीनिल आंखों के दीवाने हो गए-यह भेद काकी दिन बाद खुला कि वे 'स्वप्निल' आंखें इसलिए स्वप्निल थीं क्योंकि संगीता हर वक्त नशे में रहती थी, इतना ही नहीं बाँझ 'फ्री-सेक्स वाले मूड की लड़की थी वह ।"

"क-किरन")..... ये क्या कह रही हो तुम ?" शेखर मल्होत्रा दहाड उठा ।

"प्लीज शेखर, रोको मत कहने दो, जानती हूं कि तुम्हें दुख हो रहा है-दुख से ज्यादा आश्चर्य हो रहा होगा , मगर जो सच है, खुद पर संयम रखकर सुनते रहो ।"

शेखर मूर्खों की मानिन्द उसे निहारता रह गया !!

पलटकर किरन ने पुन: रमन आहूजा से कहा-------"संगीता को किसी लडके साथ रात गुजारने और उससे शारीरिक सम्बन्थ स्थापित करने में कोई आपत्ति नहीं होती थी-क्रोई भी विदेशी लड़का एक चुटकी स्मैक, हैरोइन या अफीम के बदले उसे हासिल कर सकता अ, घीरे---धीरे यह बात सारे कोलिज में फैल गई-क्रॉलिज के प्रवन्धक बौखला उठे लडकों पर छाया संगीता का जादु कम होने लगा… उन दिनों संगीता 'कालिज की वेश्या' के नाम से पूरी तरह बदनाम हो चुकी थी जव एक ऐसी घटना घटी जिसने सारे कॉलिज को हिलाकर रख दिया !!!!!

"जो तुम कह रही हो किरन, क-क्या बह सच है ?" रोने को तैयार शेखर ने पूछा ।

किरन ने रमन आहूजा के पीले जर्द चेहरे की तरफ इशारा करके कहा----"क्या मिस्टर रमन के चेहरे पर उड़ती हवाइयां तुम्हें साफ-साफ नहीं बता रहीं कि मेरे मुंह से निकला एक-एक वाक्य "ब्रह्म-वाक्य' है ?"

शेखर ने रमन की तरफ देखा ।

उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे रंगे हाथों पकड़े जाने वाले चोर के चेहरे पर होते हैं, बोला---"तुम्हें तो मैंने अपनी फैवट्री का मेनेजर बनाया भी संगीता के ही कहने पर था मगर-----

" मगर ?" किरन ने पूछा ।

"संगीता ने कहा था कि यह मेरे दूर के रिश्ते का "कजिन' है ।"

“खैर।" किरन बोली --- अभी यह कहानी पूरी नहीं हुई है----तो मैं कह रही थी कि एक दिन अचानक एक टिचर की 'डायमंड रिग' गायब हो गई---- सबका शक संगीता पर गया--लोग यह समझते थे कि उसने स्मैक आदि खरीदने के लिए डायमंड रिंग चुरा ली है, अत: उसे पकडकर पुलिस के हवाले कर दिया गया---पुलिस ने न सिर्फ यह साबित कर दिया कि चोर संगीता है बल्कि एक डायमंड-विक्रेता से रिंग बरामद भी हो गयी ! डायमंड बिक्रेता ने कुबूल किया कि रिग उसे संगीता ने बेची थी ।"

"अ-आपको ।” रमन वड़ी मुश्किल से कह सका“अा्पको यह सब कैसे मालूम है ?"

"क्या तुमने अभी भी नहीं पहचाना?" “में वही हूं जो तुम्हारी और संगीता की क्लास में नहीं पढती थी, तुमसे सीनियर क्लास में थी और सारे कॉलिज की सबसे ज्यादा 'बिलिएन्ट' छात्रा मानी जाती थी !"

"ओ---त--तुम… 'तुम वह किरन हो ?"

"तब तक रिग बरामद हो चुकी थी और डायमंड-विक्रेता का बयान भी हो चुका था , जब मेरी तारीफ सुनकर संगीता मेरे पास अाई, मेरे कदमों में गिड़ेगिड़ा--गिड़गिड़कर कहने लगी कि मैं चरित्रहीन हूं किसी भी विदेशी लड़के के साथ सोने में मुझे हिचक नहीं होती--न्नशेबाज हूँ मगर चोर नहीं हूं ----रिंग मैंने नहीं चुराई थी-- जाने किसके इशारे पर मुझे चोरी के झूठे जुर्म में फंसाया गया है…उस दिन, बल्कि कहना चाहिए कि उस क्षण से पहले मैं भी यह समझती थी कि चोर संगीता ही है, परन्तु अपनी बात संगीता ने कुछ ऐसे ढंग और इतने आत्मविश्वास के साथ कही कि मुझे उसकी 'सच्ची' होने का यकीन हो गया…तब मैंने सारे मामले की इन्वेस्टीगेशन दुबारा से की और सारे कॉलिज के सामने साबित कर दिया कि रिग संगीता ने नहीं चुराई थी---चोर कोई और था तथा संगीता के खिलाफ़ बयान देने वाला डायमंड विक्रेता असली चोर से मिला हुआ था ।

शेखर ने धड़कते दिल से पूछा…“असली चोर कोन था ?"

"य--ये महाशय ।"

"इसने रिग क्यों चुराई थी ?" शेखर ने पूछा।

“अन्य विदेशी लड़कों की तरह यह भी संगीता को हासिल करना चाहता था ।" किरन कहती चली गई---"मगर एक तो संगीता सिर्फ विदेशी लडकों में दिलचस्पी लेती थी----दुसरे, इसके पास एक चुटकी स्मैक तक नहीं थी जो कि संगीता की रात की कीमत हुआ करती थी---कहने का मतलब ये कि यह 'फ्री' में संगीता को हासिल करना चाहता था जिसका उसने विरोध किया---' जोर जबरदस्ती पर उतर अाया और परिणाम यह हुआ कि संगीता ने इसकी अच्छी---खासी धुनाई कर दी

 


'कॉलिज की वेश्या' के नाम से बदनाम लड़की ने इसे हाथ न रखने दिया बल्कि पीटी भी…इस अपमान की अाग में सुलगकर इसने रिग चुराकर डायमंड विक्रेता को केवल इस कीमत के बदले दे दी कि अपने बयान में संगीता का नाम लेगा और संगीता स्वप्न में भी नहीं सोच सकती थी कि कोई इतनी छोटी--सी घटना का बदला उससे इतने खतरनाक अन्दाज में ले सकता है ।"

"इसके बाद क्या हुआ ?"

"चोरी के हज्जाम से तो मैंने संगीता को वरी करा दिया परन्तु इसके बाद स्वयं मैंने ही उससे ज्यादा सम्पर्क न रखा क्योंकि मैं एक बदनाम लड़की को अपने दोस्तों की लिस्ट में शामिल नहीं कर सकती थी---वाद में संगीता की बदनामी इतनी बड़ी कि प्रबन्धक कमेटी ने उसे कॉलिज से निकाल दिया । मैं संगीता के बारे में केवल इतना जानती थी कि वह इंडियन है-ऐसी तो कल्पना भी न कर पाई थी कि वह मेरे ही शहर की बल्कि मेरे पापा के दोस्त की बेटी है और यह बात तो मेरे ख्वाबों से भी बाहर थी कि एक दिन उसी संगीता के मर्डर केस की रि-इन्वेस्टीगेशन करूंगी ।"'

" ममम-मगर ।" शेखर ने कहा---“आगरा में तो संगीता का वह रूप हरगिज नहीं था जो तुम लंदन में बता रही हो… यह सच है कि संगीता नशा करती थी किन्तु कॉलिज का एक भी लड़का ऐसा नहीं था जिसने उसे हासिल करने के चेष्टा न की हो और न ऐसा एक भी लड़का था जो उसे हासिल करने में कामयाब हुआ हो----फिर रमन को यानि उस शख्स को अपना 'कजिन' बनाकर संगीता ने मुलाजिम क्यों रखवाया जिसने उसे एक दिन चोरी के इल्जाम में फंसवाया था ?"

"इसका जवाब मिस्टर रमन देगे ।"

"म-मैं ?" रमन हकला गया ।

" हां तुम !" किरन उस पर धुड़क-सी पडी-----"ऐसी संगीता के सामने क्या मज़बूरी थी कि उसने तुम्हें यानि उस शख्स को अपनी फेक्ट्री में मेनेजर रखवा दिया जिसने उसे चोरी के इल्जाम में फंसवाया था ?"

" इ - इससे ज्यादा मैंने उससे कुछ नहीं कहा था कि उसके भेद मिस्टर शेखर पर खोल दूगा ।"

"क्या मतलब ? "

"मैं बेरोजगार था-नौकरी के लिए भटक रहा -था कि एक दिन सड़क पर संगीता टकरा गई--उसे देखकर मैं चौंका, जबकि मुझे देखते ही उसका चेहरा पीला पड़ गया ! एक हफ्ते की मेहनत के बाद मैंने पता लगा लिया कि लंदन के कॉलिज से 'फ्लर्ट गर्ल के आरोप में जिस संगीता को निकाल दिया गया था वह यहाँ सती-सावित्री वनी घूमती हेै---मैँने उसकी आगरा के कॉलिज की लाईफ भी मालूम कर ली थी और यह पता लगने पर हैरान रह गया कि लंदन में "कॉलिज की वेश्या' के नाम से कुख्यात लड़की यहाँ विल्कुल बदली हुई थी ।"

“तुमने कारण जानने की कोशिश की होगी ?"

"यह पता लगने पर मैं उससे अकेले में मिला कि मिस्टर मल्होत्रा अपनी बीबी को "गंगाजल" समझते हैं-उसे धमकी दी या दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि ब्लैकमेल किया-यह सुनकर उसके छवके छूट गये कि मैं उसके लंदन वाले करेक्टर की पोल मिस्टर मल्होत्रा पर खोल सकता हुं--वह गिडगिडाने लगी-तव मैंने पूछा कि उसमें इतना चेंज कैसे आ गया है…उसने वताया कि एक गुप्त बीमारी लग गई थी, डाक्टर ने साफ-साउ कहा कि अगर वह खुद को नहीं बदलेगी तो बीमारी बढती जायेगी और एक दिन उसकी जान ले लेगी, जबकि पुरूषों से दूर रहने पर धीरे-ेधीरे स्वत: ठीक हो जायेगी ---

यही कारण था कि मिस्टर मल्होत्रा से शादी करने से पहले वह भारत में किसी पुरुष के संसर्ग में नहीं आई-मेरी धमकी के जवाब में जब उसने यह पूछा कि मैं क्या चाहता हुं , तब मैंने अपनी ज़रूरत पेश की जो मेरी फौरी समस्या थी ।"

"यानि नौकरी ?"

"हाँ ।" रमन ने बताया---" हालांकि शुरू में उसने बहुत हील हुज्जत की, पर मेरी धमकी में दम था और हमारे बीच फैसला दुआ वह मुझे अपना कजिन बनाकर फेक्ट्री में मैंनेजैर की नौकरी दिलवा देगी और उस दिन के बाद मैं भूल जाऊंगा कि किसी संगीता नाम की लड़की को जानता हूं ---उसने अपना वादा निभाया और मैंने भी, यह सच है किरन जी कि उस दिन के बाद न मैं कभी संगीता से मिला, न ही कोई डिमांड रखी ।"

"जिस दिन शेखर ने प्लेन और ट्रेन के टिकट मंगवाये थे उस दिन तुमने क्या सोचा था ?"

"मैं चौंका था-इतना ज्यादा कि इनसे कह बेठा कि 'एक ही रात ट्रेन और प्लेन के टिकट' सर ?---ये हँसकर टाल गए और फिर मुझे भी यह वात दिमाग से निकालनी पडी ।"

"इतनी चुभने वाली बात तुम दिमाग से कैसे निकाल सकै?"

"निकालनी पड़ती है किरन जी-नोकर को अपने एम्पलायर, की जाने कितनी चुभने वाली बाते दिमाग से निकालनी पड़ती हैं !"

किरन के होंठों पर नाचने वाली मुस्कुराहट गहरी हो गई, बोली--"' मुझे तुम्हारा एक फोटो चाहिए ।"

"फ-फोटो " रमन आहूजा का दिल धक धक करके बजने लगा ।

"कहां से बोल रही हो तुम ?” दूसरी तरफ़ से बैरिस्टर विश्वनाथ की उद्विग्न आवाज सुनाई दी…“हम तुम्हारे लिए परेशान हैं-सुबह की निकली अब तक घर में घुसी हो, लंच पर भी नहीं आयी ---तुमने अपने दिमाग पर क्या सनक सवार कर ली किरन---सब कुछ छोड़ो और जहां कही हो वहां से सीधी घर आओ ।"

" आपकी घडी में क्या बजा है ? "' पब्लिक टेलीफोन बूथ में खड़ी किरन ने पूछा ?"

"साढे आठ ।"

"मैं ठीक दस बजे तक घर पहुंच रही हूं ।" किरन ने कहा ----" और अब वह सुनिये जो सुनाने के लिए आपको फोन किया है---मैं यह बताना चाहती हूं पापा कि अगर दस बजे तक घर न पहुंचूं तो मेरी खोज शुरू कर दीजिएगा, उस अवस्था में या तो मैं आपको किसी अस्पताल के एमरजेन्सी वार्ड में जख्मी पडी मिलूगी या 'किडनैप' कर ली जाऊंगी और यह भी हो सकता है कि आपको कहीं से मेरी लाश भी मिले ।"

"कि किरन किरन !" बैरिस्टर विश्वनाथ पागलों की मानिन्द चीख पड़े --- ये --ये तुम यया बक रहीं हो बेटी , ऐसा क्या हो गया कि ..........!"

"हुआ नहीं पापा, होने जा रहा है ।"

"क् -क्या ? "

अगर मेरे साथ केई दुर्घटना घटे तो आप समझ जाना पापा किं उसके जिम्मेदार राय अंकल हैं ।"

" श ..... शहजाद राय ?" बैरिस्टर विश्वनाथ उछल पड़े ।

"हां !"

" क -- क्यो .......'मिस्टर राय ऐसा क्यों करेगे है ? "

"जवाब देगी वह चीज जो मैंने टैक्सी नम्बर यू बी एक्स 4889 की पिछली सीट के नीचे छुपा दी है ।"

"क-क्या छुपा दिया है तुमने वहां ?” बैरिस्टर विश्वनाथ ने लगभग चीखते हुए पूछा परन्तु किरन ने जवाब मुंह से देने के स्थान पर रिसीवर आहिस्ता से क्रेडिल पर लटका दिया ।

बूथ से बाहर निकली वह और वहीं खडी उस टैक्सी की पिछली सीट पर सवार हो गई जिसमें शेखर मल्होत्रा पहले से ही सवार था !!

"चलो ।" किरन के अादेश के साथ टैक्सी अागे बढ गई ।

शेखर ने पुछा----"'टैक्सी रूका--कर तुमने किसे फोन किया था ?"

"क्यों ? "

"यह जानने के लिए कि इस वक्त वे घर पर हैं या नहीं ?”

"क्यों जानना चाहती थीं तुम ?" तो जवाब में किरन के होंठों पर वह मुस्कान उभरी जिसका अर्थ आसानी से किसी की समझ में नहीं अाया करता----टैक्सी फर्राटे भरती हुई अपने गंतव्य की तरफ दौड रही थी------वह टैक्सी जिसका रजिरट्रेशन नम्बर यू वी एक्स 4889 था ।

किरन अपने ऊपर हुए हमले का विवरण बता चुकीं थीं और उस वक्त शेखर बार बार कह रहा था कि या तो वह इस केस की रि'-इन्वेस्टीगेशन की 'ताक' पर छोड़ दे अथवा अपनी सुरक्षा का कोई इंतजाम करे क्योंकि इस मामले से कदम पीछे ना हटाने का साफ मतलब है कि पुन: हमला होगा ।

किरन होले-से मुस्कुराई थी कि टैक्सी गंतव्य पर पंहुच गई !

 


उतरते हुए शेखर ने कहा-“तुमने बताया नहीं कि यहां शहजाद राय के बंगले पर क्यों आयी हो ?"

"तुम्हें एक चमत्कार दिखाने ।"

"च-चमत्कार ।" टैक्सी का पेमेन्ट करता हुआ शेखर चौंका । "

"हां, वह चमत्कार ही होगा-तुम्हारे लिए और "राय अंकल' के लिए भी ।” किरन कहती चली गई--“मेरे पास एक ऐसी धमाकेदार चीज है जिसे राय अंकल ने अपने पिछले जीवन में देखा तो जरूर होगा परन्तु मेरे पास देखकर उनके छवके छूट जायेगे ?"

"छ--छक्के छूट जायेंगे ?"

" निश्चित रूप से ।”

"ऐसी क्या चीज है तुम्हारे पास ?"

"जो भी चीज है उसे तुम्हारे सामने राय अंकल को दिखाऊंगी -- तभी तुम भी देखना----चीज को भी और राय अंकल क चेहरेे को भी--- मेरा दावा है कि वेसा चेहरा तुमने अपने पिछले जीवन में कभी न देखा होगा ।"

“तुम तो मारे सस्पेंस के मेरे होश फाख्ता किए दे रही हो ।"'

"आओ ।" कहने के बाद किरन तेजी से बंगले के मुख्य द्वार पर पहुच गई ।

दरवाजा खोलकर किरन ने 'एयरकंडीशन्ड' आँफिस में कदम रखा ही था कि शहजाद राय की अन्दाज गूँजी--"आओ बेटी----आओ , तुम इस वक्त यहाँ …!"

शब्द मुंह में ही रह गये ।

उसके पीछे दाखिल होते शेखर मल्होत्रा को देखकर उन्होंने स्वयं अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया था ।

किरन ने पूछा---"क्या हुआ, कुछ कह रहे थे आप हैं''

"त-तुम......इसके साथ ?" शहजाद राय बोले--"य-यानि तुम मानी नहीं ?"

"मानने से मतलब ?"

"संगीता मडर्र केस की रि---इन्वेस्टीगेशन की 'सनक' तुम्हारे दिमाग में अभी तक सवार है ?"

किरन स्कुराई, बोली-“आपके ख्याल भी पापा से मिलते हैं --- मैं कुछ जरूरी बातें करने आईं थी ।"

"बैठो ।" शहजाद राय ने खाली कुर्सी की तरफ़ इशारा किया ।

किरन उस तरफ बढ़ गई ।

मेज के उस पार सिंहासननुमा कुर्सी पर शहर का सबसे धुरंधर माना जाने वाला प्रसिद्ध 'क्रिमिनल-लायर विराजमान था-----वह, जो अंग्रेज की तरह सुर्ख और सफेद था…वह . जिसके चेहरे से रौब, तेज और रईसी टपकती थी और, वह, जिसकी अपनी 'शान' इतनी जबरदस्त थी, लोग इस आफिस में दाखिल होते ही' उसके प्रभाव में गिरफ्त हो जाते



मेज के इस तरफ़ चार कुर्सियां थी ।

"बैठो शेखर ।" किरन ने कहा ।

और !

स्वयं बैठी जब शेखर बैठ चुका, बैठते ही बोली---""शेरव्रर ने हवालात में आपको "फ़र्स्ट अप्रैल' वाली कहानी सुनाई यी मगर आपने उस कहानी को वहीं के वहीं दबा दिया और अपने दिमाग से एक नई कहानी को ज़न्म दिया-उस कहानी को जिसे आपके निर्देश पर इसने अपने बयान का जामा पहनाया औदृ फिर आपने उस कहानी की कोर्ट में 'सच्ची' साबित करने की असफल चेष्टा की ।"

किरन के शब्द सुनते ही शहजाद राय की भृकुटी तन गई, मस्तक पर बल पढ़ गये और 'घूरने' वाले "अन्दाज़' में वे शेखर मल्होत्रा की तरफ देखने लगे-मुद्रा साफ-साफ़ कह 'रही थी कि वे शेखर मल्होत्रा से खफा है और नागवारी वाले अन्दाज में अभी शेखर पर ही घुड़कने' ही वाले थे कि किरन ने कहा- -- प्लीज अंकल मेरे सवाल का जवाब केवल मेरी तरफ देखते हुए दीजिए----मैं जानना चाहती हूं कि क्या यह सच है ?"

"सच है ।" उसकी तरफ़ देखते हुए शहजाद राय ने संक्षिप्त उत्तर दिया ।

“आपने उसी कहानी के आधार पर केस क्यों नहीं के लडा जो सच थी ?"

“जितने दिन हमने इस केस को अदालत में घसीटा है उतने दिन सिर्फ और सिर्फ अपनी कहानी के बूते पर घसीटा है-अगर इसकी कहानी के आधार पर चले होते तो दो-तीन तारीखों के बाद ही इसे सजा हो जाती ।"

"मैं ऐसा नहीं समझती ।”

“इसलिए नहीं समझती क्योंकि अभी तुम "कच्ची हो-तार्जूबे का जबरदस्त अभाव है तुममें-य-इस बारे में अपने पापा से बात करना, दोनों कहानियां उन्हें सुनाना और तब पूछना कि हमने ठीक किया या नहीं ?"

“तो आपने इसकी स्टोरी पर इसलिए केस नहीं लडा " क्योंकि वह अापको जमी नहीं थी ?"

"क्या यह बात हमेँ स्टाम्प पेपर पर लिखकर देनी पडेगी? "

शहजाद राय की आंखों-में आंखें डालकर पूछा किरन ने…"कोई और वजह तो नहीं थी अंकल ?"

"अ् अ -और वजह. ?"' शहजाद राय उछल पड़े-“और क्या हो सकती है ?''

"मुमकिन है कि आपका उदूदेश्य शेखर मल्होत्रा को बचाना नहीं बल्कि फंसाना हो ?"

""-फ फसाना ?" शहजाद राय चिहुंक उठे---" क्या बक रही हो तुंम-क्या हम यहां अपने क्लाइन्दृस को फंसाने के लिए बैठे हैं?"

किरन अपने मुह से निकलने वाले एक-एक लफ्ज को चाबाती हुई बोली--" माफ कीजिएगा अंकल, शेखर मल्होत्रा सिर्फ और सिर्फ आपका 'क्लाइन्ट' ही नहीं बल्कि अबकी बेटी का हत्यारा भी था ।"

"ह-हमारी बेटी का ?" शहजाद राय के हलक से ऐसी है आवाज़ निकली जैसे कोई उनकी गर्दन दबा रहा हो ।

बूरी तरह चौंकते हुए शेखर ने पलटकर किरन की तरफ देखा ।

परन्तु !

किरन का ध्यान उनकी तरफ़ कत्तई नहीं था ।

उसका चांद-सा खूबसूरत मुखड़ा इस वक्त दोपहर के सूर्य की मानिन्द चमक रहा था, सुलगती आंखें शहजाद राय पर केन्द्रित किये किरन अपने मुह से शब्द नहीं बल्कि अाग बरसाती चली गई--"' हा", आपकी बेटी अंकल-क्या एाप मेरी आखों में आंखें डालकर कह सकते हैं कि संगीता जापकी वेटी नहीं थी ?"

"क-वया वक रही हो तुम ?"' शहजाद राय दहाड उठे---, शर्मनाक 'गप्प' तुम्हें किसने सुनाई ?"

“इसने ।" कहने के साथ किरन ने अपने पर्स से एक पुराना फोटो निकालकर मेज पर फेक दिया ।

और !!

वह फोटो ......... वह फोटो ही वह चमत्कार था जिसका जिक्र किरन ने शेखर मल्होत्रा से किया था ।

 


फोटो पर नजर पड़ते ही जहाँ शेखर मल्होत्रा के हलक से आश्चर्य मिश्रित सिंसकारी निकल पडी, वहीं शहजाद राय का चेहरा ऐसा हो गया जैसे भरे बाजार में नंगे कर दिए गये हों ।

सारा तेज, सारी सौम्यता और सारी रईसी टूट-टूटकर बिखर गयी ।

चेहरा विकृत नजर आने लगा था । पीता जई ।

मुर्दे के चेहरे से भी ज्यादा निस्तेज ।

निश्चित रूप से शेखर मल्होत्रा ने अपने पिछले जीवन में ऐसा चेहरा नहीं देखा था ।

आंखों में खौफ़नाक भाव लिए शहजाद राय मेज के बीचों बीच पड़े उस फोटो को देख रहे थे, जिसमें युवावस्था में वे स्वयं गुलाब चंद की पत्नी के साथ आपत्तिजनक मुद्रा में नजर. खा रहे थे ।

उन्होंने झपटकर फोटो उठा लिया और शेखर मल्होत्रा अभी कुछ समझ भी नहीं पाया था कि किसी जुनूनी की मानिन्द फोटो के टुकड़े--टुकड़े कर दिए उन्होंने-----शेखर ने चौंककर किरन की तरफ देखा और उसकी तरफ़ देखते ही मानो दंग रह गया ।

किरन मुस्कुरा रही थी ।

बेहद जहरीली, व्यंग्यात्मक और प्यारी-प्यारी मुस्कान थी उसके होंठों पर !

शहजाद राय यूं हांफ रहे थे मानो सैकडों मील दौड़ने के बाद अभी-अभी यहां पहुचे हों

आंखों में अजीब-भी दहशत लिए उन्होंने किरन की तरफ देखा ही था कि चमचमाती मुस्कुराहट के साथ किरन ने कहा----" मुझे मालूम था अंकल कि अाप उस फोटो का यही हस्र करेंगे, इसलिए मालूम था क्योंकि मैं भी एक वकील हू और अाप भी--- वकील अच्छी तरह जानता है कि सबूत को अगर कोर्ट में पहुंचने से पहले खत्म कर दिया जाए तो कुछ साबित नहीं किया जा सकता ।"

शहजाद राय की जुबान को मानो लकवा मार गया था !

'शब्दकोष' उसके लिए फैवट्री में अभी-अभी तैयार हुआ कोरा कागज़ बन चुका था ।

और किरन ।

किरन के लिए 'शब्दकोष' की मोटाई मानो चौगुनी हो गई थी, विजेता वाली मुस्कान होंठों पर लिए यह कहती चली गई ----'' आपको यह जानकर निराशा होगी अंक्ल कि मेरे पास ऐसे ही सात फोटों और हैँ----मैंने माना उनमे आपकी और संगीता की मां की मुद्राएं अलग हों मगर कहानी सारे फोटो वही कहते हैं जो वह फोटो कह रहा था जिसके आपने दुक्रड़े कर दिए ।"

शहजाद राय की सिटृटी-पिटृटी गुम !

काटो तो खून नहीं ।

किरन ने अपने पर्स से पुराना लिफाफा निकालकर उसे दिखाते हुए कहा--" फोटो इस लिफाफे में हैं और लिफाफे वे चिट्ठियां भी हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि अाप भी कभी मूल रूप से हस्तिनापुर के रहने वाले हैं और गुलाव चन्द में संतान पैदा करने की क्षमता नहीं थी तथा संगीता अपके और उसकी पत्नी के सम्बन्धों की उत्पत्ति थी !!

"य-यह लिफाफा दे दो ।"

किरन ने जहरीले स्वर में कहा----"ताकि एाप सारे फोटो और अपने कर-कमलों से लिखी चिट्ठियां फाड़कर फेक दे?”

“उन सम्बन्धों का-इन चिट्ठियों या फोटुओं का अथवा संगीता के मेरी वेटी होने का उसके मर्डर केस से कोई सम्बन्ध नहीं है…यह एक अलग कहानी है और हम नहीं चाहते कि यह कहानी किसी को पता लगे ।"

"क्यों, क्या इस प्रेम-प्रकरण का संगीता मर्डर -- केस में इतना दखल भी नहीं है कि आपने अपने क्लाइन्ट शेखर मल्होत्रा को कोर्ट से बचाने की नहीं बल्कि कानून के चगुल में फंसने की कोशिश की?"

शहजाद राय के मुंह पर पुन: अलीगढी ताला लटक गया । "

किरन कहती चली गई…“ऐसी कोशिश आपने इसलिए नहीं की क्योंकि आपकी अपनी सोचों के मुताबिक संगीता का हत्यारा शेखर मल्होत्रा ही था और कौन बाप नहीं चाहेगा कि अपनी आंखों से वेटी के हत्यारे को फांसी पर झूलता देखे-अपने इसी--- मंसूवे को परवान चढाने के लिए आपने शेखर मल्होत्रा के अपने विश्वास में लेकर इसकी वह स्टोरी निरस्त कर दी जो इसे बचा सकती थी और ऐसी कहानी के साथ केस लड़ा जिसके बारे में आपको मालूम था कि क्रोर्ट में पिटनी ही पिटनी है, वाह !!! शेखर मल्होत्रा के चारों तरफ़ क्या जबरदस्त चक्रव्यूह रचा गया…वही फंसा रहा था जिसे इसने खुद को बचाने की जिम्मेदारी सौंपी थी… इससे ज्यादा चक्करदार चक्रव्यूह और क्या हो सकता है कि कोर्ट में खड़े दोनों वकीलों का मकसद एक ही था, शेखर मल्होत्रा को फंसाना, बचाव के लिए कोई भी तो न था…फिर..... "फिर शेखर मल्होत्रा बेगुनाह साबित होता भी तो कैसे ? "

"खुद को अपने चारों तरफ़ फैले चक्रव्यूह से बचाता भी तो कैसे अंकल ?"

"संगीता का हत्यारा यही है किरन ।"

अभी मैंने आपको सिर्फ एक स्टोरी सुनाई है अंकल, दूसरी नहीं सुनेगे ?"

"दूसरी स्टोरी है"'

"अगर मैं इस स्टोरी पर गौर करूं तो कैसा रहे कि गुलाब चन्द की कार सैकडों फिट गहरी खाई में इसलिए आ गिरी क्योंकि उसे पता लग गया था कि संगीता आपकी बेटी है और फिर जब एक दिन यही रहस्य संगीता को पता लग गया तथा वह यह कहने लगी कि अपको उसे सारी दुनिया के सामने अपनी बेटी कबूल करना पडेगा तो अपनी इज्जत की खातिर आपने अपनी अवेध संतान को खत्म करके" चक्रव्यूह में शेखर मल्होत्रा को फंसा दिया !"

" "क-क्या बेसिर-पैर की स्टोरियां सोच रही हो तुम ?"

" 'कौन-सी स्टोरी के सिर-पैर से और कौन-सी के नहीं हैं, इस बात का फैसला कोर्ट में होगा अंकल ।" गुर्राहटदार स्वर में कहने के साथ किरन एक झटके से खडी हो गई बोली…"चलो शेखर ।"

"ठ-ठहरो ।" शहजाद राय इस तरह चीख पड़े जैसे उनके जिस्म से रूह निकलकर चलने की तैयारी कर बैठी हो !

"कहिये ?"

"लिफाफा हमें दे दो ।"

"लिफाफा नहीं मिलेगा अंकल और कान खोलकर सुन लीजिए कि मैं यहीं से सीधी अपने घर जा रही हूं----अगर दोपहर की तरह मुझ पर हमला हआ, किसी ने मुझे या शेखर को रोकने अथवा मारने की केशिश की तो पापा को यह वात पता लग जाएगी कि हमारे साथ जो कुछ हुआ है बह आपने कराया है !"

शेहजाद राय यूं खड़े रह गये जैसे उनका सब कुछ लुट गया हो !!!!

 


सड़क के पार खडी टैक्सी की तरफ बढते हुए शेखर ने कहा---आओ किरन ।"

“नहीं शेखर, हम टैक्सी से नहीं, बस से चलेंगे ।"

"वजह ?-"'

"वस में भीड़ होगी और क्राइम करने वाले भीड़ से कतराते हैं ।"'

“मैं सहमत हूँ और तुम्हारे दिमाग की दाद भी देता हैं ।" मुस्कुराता हुआ शेखर तुरन्त कह उठा ।

मुस्कान का जवाब मुस्कान से देती किरन ने कहा… "तो आओ, बस-सटॉप की तरफ चलें ।"

कुछ देर वाद वे भीड़ से ठसाठस, भरी बस में यात्रा कर रहे थे । दो स्टॉप बाद दो व्यक्तियों के लिए बनाई गई एक सीट मिल गई थी उसे तब शेखर ने कहा----"मैं यह नहीं समझ ' पाया किरन कि तुम हत्यारा किसे मानकर चल रही हो… रमन को या शहजाद राय को ?"

किरन के होंठों पर मोहक मुस्कान उभर आई, बीली !!!

इन्वेस्टीगेटर किसी के सामनें बाते कुछ और कर रहा होता है और दिमाग में कुछ और सोच रहा होता है-बैसे मेरे ख्याल से कल मुझे यह बात पता लग जानी चाहिए कि हत्यारा कौन है ???"

"क-कल .......कल तुम्हें यह बात पता लग जाएगी है"' शेखर उछल पड़ा है !!

किरन की मुस्कुराहट रहस्यमय हो उठी, बोली--. "सम्भावना तो है ।"

" क-- केसे ।" प्रसन्नता की ज्यादती के कारण शेखर का लहजा कांप रहा था।

"मैँने सबके फोटो मांगे हैं, वे बता देगे कि हत्यारा कौन है ?"

. "फ-फोटो तुम्हें संगीता का हत्यारा बता देगे । मैं कुछ समझा नहीं ।"

रहस्य से लबालब भरी मुस्कान के साथ किरन ने .कहा---"'हर चीज बोलती है शेखर, सुनने वाले के पास दिमाग होना चाहिए और मजे की बात ये कि कुदरत ने मुझे दिमाग देते वक्त किसी किस्म की कंजूसी नहीं वरती ।"

 
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