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"हरामजादे, नमक हराम, उल्लू के पटूठे !" सफेद नकाबपोश के मुह से गालियों का सैलाब उमड़ पड़ा---अबे, अगर पिल्ला मर भी गया था तो ये बात तुझे उसके बाप के सामने कहने की क्या जरूरत थी--ये साला, मेरा नाम लेने वाला था -- मजबूर होकर मुझे इसका खेल खत्म करना पडा…वरना तो की काम का अादमी था ये-इसके जरिए मैं ऐसे-ऐसे खेल दिखाता कि … 'उफ्फ' "जी तो चाहता है कि तुझे भी गोली से उड़ा दूं भूतनी के !"'
"म-मगर मैं बता कहां रहा था बॉस.....।" काला नकाबपोश बोला------"वो....वो तो अाप ही ने मजबूर करके मुझ से पूछा. . .
"जुबान को लगाम दे चोट्टी के वरना सचमुच तेरा भेजा उड़ा दूगा ।"
इस बार काला नकाबपोश कुछ न बोला ।
कॉटेज में सन्नाटा छाया रहा ।
सफेद नकाबपोश मानो अपने गुस्से को नियंत्रित करने का प्रयत्न कर रहा था-उसकी अवस्था से स्पष्ट था कि जो कुछ हुआ है उसका उसे वेहद अफसोस है कुछ देर थोडा नियंत्रित होकर बोला----" मेरे मु'ह को क्या तक रहे हो कुत्ते, इस लाश को उठाकर वहाँ डाल दो जहां इसके लड़के कैद को रखा था ।"
एक साथ चार नकाबपोश औधें पड़े गिरधारीलाल पर झपटे ।
" आपके लिए फोन है शेखर शाब हैं' निक्यू ने सपाट स्वर में कहा ।
"किसका ? "
"बैरिस्टर साहब का ।" कहने के बाद बह चला गया ।
"शेखर मल्होत्रा यह सोचकर चकरा उठा कि बैरिस्टर विश्वनाथ ने उसे फोन क्यों किया है ?"
विस्तर से उठा ।
ड्राइंग-हाँल में मौजूद फोन के नजदीक पहुचा ।होल्ड-स्टैन्ड से रिसीवर उतारकर बोला---"हैलो ।"
"किरन तो वहां नहीं है ?" बैरिस्टर साहब की आवाज उभरी ।
"जी, नहीं तो---किरन तो आज अाई ही नहीं जबकि मुझे पूरी उम्मीद थी कि वह अायेगी ।"
"फिर कहां गई ?" बैरिस्टर साहब का स्वर चिंता में डूबा हुआ था---“तुम्हरे नामुराद केस की रि'-इन्वेस्टीगेशन के चक्कर में सुबह नो बजे की निकली हुई है और अव रात के नौ बज रहे थे-लंच टाइम के आसपास वह चाकू------विक्रता के मकान पर देखी गई थी ।"
" क- कौन चाकू विक्रेता ।"
"वही, जिससे तुमने संगीता को मारने के लिए चाकू खरीदा था ।"
यह सोचकर शेखर के होंठों पर फीकी मुस्कान रेग गई कि उसके प्रति बैरिस्टर साहब के रवैये में अभी तक कोई परिवर्तन नहीं अाया था, हां…थोड़े चौंके हुए स्वर में उसने सवाल जरूर किया-----“किरन वहाँ क्यों गई थी ?"
"तुम्हें नहीं मालूम ?" व्यंग्यात्मक स्वर ।
"जी-जी-मुझे क्या मालूम हैं'"
"पिछली रात चाकू-बिक्रेता का किसी ने कल्ल कर दिया है ।"
चौंके हुए स्वर में शेखर मल्होत्रा कुछ कहने ही जा रहा था कि दूसरी तरफ से इतनी वेहरेमी के साथ रिसीवर पटका गया कि शेखर के कान में धमाका होता महसूस हुआ और फिर ...... किर्र ..रं .... किर्र .... र्र ... की आवाज गूंजती चली गइं-रिसीवर वापस क्रेडिल पर रख कर अभी ठीक से मुड भी नहीं पाया था कि वेल पुन: बजने लगी ।
रिसीवर उठाकर बोला---" शेखर मल्होत्रा हियर ।"
जवाब तुरन्त न मिला , कम-से-कम पन्द्रह सेकेंड बाद धीमे से कहा गया----"किरन बोल रही हूं शेखर ।"
"क-किरन ?" वह उत्तेजित हो उठा-----"त-तुम आखिर हो कहा, तुम्हारे पापा तुम्हारे लिए बहुत परेशान हैं ।"
“वह सब छोडो शेखर !" किरन ने बात काट दी----“इस वक्त केवल वह सुनो जो 'मैँ' कहना चाहती हूं।"
" हा", बोलो क्या वात है ?"
"मैं संगीता के हत्यारे को पहचान चुकी हूं ।"
" क -- क्या ?"' शेखर उछल पड़ा ।
"मगर थोडी गड़बड़ हो गई है ।"
" कैसी गड़बड़ ?"
"वह भी जान चुका है कि मैं उसका रहस्य जान गई हूं और वह पागल की तरह मुझें सूंघता फिर रहा है---सबसे ज्यादा मुसीबत की बात है कि उसकी पहुच से ज्यादा दूर नहीं हूं !"
"क-कहां हो तुम ?"' शेखर पुरी तरह व्यग्र नजर आने लगा-----" प्लीज , बताओ किरन, तुम क्या हो, मैं इसी वक्त...........
"नहीं, फोन पर बताना मुनासिब नहीं होगा ।"
"फ-फिर. ?"
"शहर के बाहर ठीक उस स्यान पर नटराज का मन्दिर है जहां से पहाडि़या शुरू होती हैं ।"
"मैँने देखी हैं ।"
"सारे फोटो लेकर तुम वहीं पहुंच जाओ ।"'
"फ़-फोटो ?"
" "हां वे फोटो जिन्हें कल रात मेरी कोठी से अपनी कोठी के लिए रवाना होते-वक्त तुमने जूतों के अन्दर रखे थे--समझ रहे हो, न, मैं संगीता की मां और शहजाद राय के "फोटुओं की बात कर रही हूं ।"
"म-मगर वे फोटो-----।"'
उसे ज्यादा बोलने का अवसर दिये बगैर किरन बोली---"फोटुओं के साथ शहजाद बाय की सारी चिट्ठियां भी ले आना----वहीं तुम्हें दो आदमी मिलेंगे-घबराना बिलकुल मत, अपने ही आदमी हैं वे ---- उनके साथ चले आना, वे तुम्हें मेरे पास ले आयेंगे, ज्यादा सवाल मत करो…टाइम कम है ।"
" ठ ठीक है ।" शेखर ने कहा ।
"और सुनो ।" किरन ने रहस्यमय स्वर में कहा… "अभी मेरे इस फोन का जिक्र किसी से मत करना क्योंकि" मुमकिन है कि जिसे तुम मेरा और अपना शुभचिन्तक समझकर फोन करो वही संगीता का हत्यारा हो ।"'
" न-- नाम तो बता दो उसका ।"
"मिलने पर !" इन शब्दों के साथ दूसरी तरफ से रिसीवर रख दिया गया ।
शेखर मल्होत्रा के होंठों पर पहेलीनुमा मुस्कुराहट उभरी थी ।
" गुड , वैरी गुड गर्ल ।“ कहने के साथ सफेद नकाबपोश ने किरन की कनपटी से सटा रिवॉल्वर जेब के हवाले किया और बोला----" वाकई तुम वड़ी प्यारी लडकी हो, हमें तुमसे यही उम्मीद थी ।"
किरन चुपचाप उसकी तरफ देखती रही ।
' नकाबपोश ने उसके हाथ से वह कागज छीन लिया जिस पर लगभग वही वाक्य लिखे थे जो किरन ने फोन पर बोले थे…उन वाक्यों पर सरसरी नजर डालने के बाद नकाबपोश ने कहा----"बिल्कुल ठीक, ये ही सब वाक्य बोले हैं तुमने----इस पर्चे में केवल वे वाक्य नहीं हैं जो तुमने शेखर मल्होत्रा के सवालों के जबाव में कहे-हम खुश हैं कि तुमने उसके सवालों के जवाब भी ठीक दिये अौर बात करने का तुम्हारा लहजा भी हमें पसन्द अाया-----'' मल्होत्रा सात जन्म लेने के बावजूद नहीं समझ सकता कि फोन पर तुम नहीं तुम्हारी कनपटी पर रखा रिवॉल्वर बोल रहा था !"
"म-मगर मैं अभी तक नहीं समझ पाई कि तुम आखिर चाहते क्या हो ?"
"लो-अभी -- तक इतना नहीं समझ पाई तुम----भाई कमाल है?" अजीब से चटखारे के साथ कहता चला गया व्रह-“वेसे तो यही बुद्धिमान समझती हो खुद क्रो-जज साहब, बैरिस्टर साहब, अक्षय श्रीशस्तव और शहजाद राय जैसे धुरंधरों को धूल चटाने की इच्छा से संगीता मर्डर कैस की रि’-इन्वेस्टीगेशन करने निकल पड्री ।
किरन पर कुछ कहते न वन पडा ।
उसकी कुर्सी के ठीक सामने पडी मेज पर दो फोन रखै थे ।
एक का रिसीवर अभी तक सफेद नकाबपोश के हाथ में था ---यह रिसीवर वह था जिस पर उसने किरन और' शेखर के बीच हुई भी अक्षरश: सुनी थी…इस रिसीवर को फोन के केहिल पर रखता हुआ बोला वह-"खैर तुम नहीं समझी तो हम बता देते है---. बात ये है कि केवल कल का दिन बीच में है, परसों संगीता मर्डर केस का फैसला होगा और शहजाद राय के फोटो तथा चिट्टियां उस फैसले 'की ऐसी…तैसी फेर सकते हैं --- बिना वजह के खून-खराबे में मैं विश्वास नहीं रखता इसलिए तुम दोनों में से किसी को मारूंगा नहीं----इतना करना है कि फोटो और चिट्ठियां तुम्हारे सामने जला दूगा तथा परसों सुबह तुम्हारा टीका - वीका करके विदा कर दूगा ।"
किरन अव भी चुप रही ।
सफेद नकाबपोश ने आठ में से दो को कहा…"नटराज के मन्दिर म दोनों जाओगे ।"
"ओ.के. बॉस ।" दोनों एक सुर में बोले ।
नटराज का मन्दिर एक उजाड़ स्थान पर था ।
चारों तरफ और दूर-दूर तक साये अधंकार को शेखर मेल्होत्रा आंखे फाड़कर घूर रहा था है ।।
दिल वहुत जोर'-जोर से धड़क रहा था उसका ।
" अचानक एक शक्तिशाली टॉर्च के 'प्रकाश झागों' ने अधंकार के मुंह पर जोरदार चांटा जड़ा ।
शेखर सतर्क हो गया ।
प्रकाश दायरा मन्दिर प्रांगण और दीवारों पर यात्रा करने के बाद उसके जिस्म पर अाकर ठहर गया-दायरा इतने व्यास का था कि शेखर का सम्पूर्ण जिस्म प्रकाश झागों से नहा उठा-मिचमिचाती आंखों से उसने टॉर्च की तरफ देखने की केशिश की मगर रंग-बिरंगे सितारों और प्रकाश दायरे के उदृगमस्थल के अलावा कुछ नजर न आ सका ।
फिर !
दायरे का उदृगमस्थल उसकी और बढने लगा ।
आंखों के आगे अपना हाथ अड़ाकर शेखर चुपचाप खडा रहा ।
सामने उसकी तरफ आता दायरे का उदूगम अभी दस-पांच कदम दूर ही था कि पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा…चिहुंककर शेखर पलता, लम्बी--लम्बी और मोटी मूंछों वाला एक कुम्भकरण सरीखा व्यक्ति उसके निकट खड़ा था…रंग काला भुजंग, चेहरा इतना चौडा जैसे रामलीला ग्राउण्ड में खडे कुम्भकरण के पुतले का हो ।
“फोटो और चिट्ठियां लाये हो ?“ उसके मुह से गड़गड़ाहटदार आवाज निकली ।
सहमते हुए शेखर ने कहा---"हां ।"
“कहां हैं ?"
"म-मेरी जेब में ।" उसने थूक सटका ।
, "मुझे दो ।"
"नहीं ।" शेखर ने कहा-“फोटो तुम्हें नहीं, केवल किरन को दूंगा ।"
"दिखा तो सकते हो ? कहाँ हैं वह है?"
"जरूर ।" कहने के साथ उसने जेब से एक लिफाफा निकालकर कुम्भकरण सरीखे व्यक्ति को दिखाया और उसने लिफाफा के लिए हाथ बढाया ही था कि शेखर ने फुर्ति के साथ वापस जेब में रखते हुए कहा----“कह चुका हू कि लिफाफा केवल किरन के हाथ में दूंगा ।"
कुम्भकरण सरीखे व्यक्ति ने कुछ ऐसे अन्दाजा में उसकी तरफ देखा जैसे जल्लाद अपने शिकार को देखता है--मुस्कुराने के प्रयास में उसके लम्बे-लम्बे और चौडे दांत जो चमके तो शेखर सिहरकर रह गया, वड़े ही कातिलाना अन्दाज में कहा उसने---"'' ऐसा चाहते हो तो ऐसा ही सही, चलो ।"
कहने के बाद वह मुड़ा और एक तरफ़ को चल दिया ।
शेखर उसके पीछे था ।
प्रकाश दायरा साथ-साथ चल रहा था ।
मुश्किल से पन्द्रह मिनट बाद वह 'बड' के घने वृक्ष के नीचे छुपी खडी विना नम्बर प्लेट बाली काली एम्बेसेडर के नजदीक पहुच गये-उस पर नजर पड़ते ही शेखर चीख पड़ा-“न-नही, तुम किरन के भेजे हुए अभी नहीं हो ..... ।"
चेहरे पर "भड़ाक" से घूंसा पड़ा ।