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धर्मयुद्ध (विजय विकास अंलफासे सीरीज)

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धर्मयुद्ध (विजय विकास अंलफासे सीरीज)

राष्ट्रपति भवन के अन्दर कोहराम-सा मचा हुआ था-वाहर निरंतर गनों की गर्जना एव टैंकों की हुंकार गूज रही थी-इसानी चीखौ-पुकार का बाजार गर्म था ।

ऐसा महसूस हो रहा था जेसे राष्ट्रपति भवन के आसपास का क्षेत्र

एकाएक ही किसी युद्धस्थल में बदल गया हो-बाहर आग बरस रही थी…इसानी चीखें गूज रही थीं ।

प्रलय-सी आ गई थी । हर तरफ़ चीखो-पुकार हाहाकार कोहराम ओँर मारकाट ।

एक ही मुल्क की सेना दो हिस्सों में बटकर युद्ध करने लगी थी ।

एक हिस्से का प्रयास राष्ट्रपति भवन पर कब्जा कर लेना था आर दूसरे

का उसकी हिफाजत करना ।

धरती काप रही थी-आसमान थर्रा रहा था…रह-रहकर राष्ट्रपति भवन की मजबूत दीवारें झनझना उठती-एकाएक ही सेना का दूसरा हिस्सा मानो विनाश पर तुल गया था ।

अन्दर भगदड मची हुई थी ।

बौखलाए-से राष्ट्रपति भवन के सभी कर्मचारी इधर उधर दौड रहे थे…सभी घबराए हुए-बदहबास-आतकिंत और उलझे हुए थे… ~

अधिकांश चेहरे प्रश्चवश्र्वक चिह्न बन गए थे ।

उन्ही मे से एक चेहरा राष्ट्रपति का भी था ।

राष्ट्रपति सादात का ।

वे पागलों की तरह राष्ट्रपति भवन के बडे-बडे कमरों हॉलों और गैलरिंयों में भागे फिर रहे थे-उन्होंने कईं कर्मचारियों से पूछा कि यह सब क्या हो रहा है?

परंतु कोई कुछ न बता सका ।

कदाचित किसी को पता ही न था ।

बौखलाए -से राष्ट्रपति एक शक्तिशाली ट्रांसमीटर कै नजदीक पहुंचे

उस पर सम्बंध स्थापित करने के बाद काफी देर तक हैलो-हैलो करते रहे, परन्तु परिणाम.. l

ढाक के तीन पात ।

अन्त मे झुझंलकर उन्होने हेडफोन ट्रासपीटर पर दे मारा

हेडफोन के टुकड़े -टुकड़े हो गए-वातावरण में बारूद की गध फैलने लगी थी-सिर्फ एक क्षण के लिए उनकी दृष्टि खुली हुई खिडकी पर स्थिर हुई, अगले ही पल वे उस तरफ लपके ।

बाहर युद्ध चल रहा था ।

वे खिडकी के समीप पहुचे-अभी बाहर झाकने ही जा रहे थे कि......

"न. . .नहीं सर ॥ ” किसी ने तेजी से चीखकर उनकी बाह पकडी . ओर अनायास ही एक चीख के साथ राष्ट्रपति सादात सगमरमरी फ़र्श पर जा गिरे ।

. . एक झटके से उन्होंने, खिडकी, बन्द होने की आवाज सुनी ।

वे उठे… घूमे खिडकी बन्द करने वाला भी मुड़ा I

“त. . .तुम…मेजर हाशमी? ” सादात के कठ' से चीख-सी उबल पडी l

'"ज.......जी हां…माफ कीजिए सर !"

उसने तेज किन्तु सम्मानित स्वर में कहा । उसके जिस्म पर मौजूद मेजर की वर्दी खून से पुती पडी थी.……चेहरा लहुलुहान…बाल बिखरे हुए-मेजर हाशमी नामक उस युवक के चेहरे पर हवाइयां उड रही थीं-उसके कंधे में गोली लगी थी-खून यू बह रहा था, जैसे भारी वर्षा में कोई परनाला । राष्ट्रपति सादात चकित स्वर में चीख…से पडे-“य. ..यह सव क्या है मेजर?”

"वही जिसकी चेतावनी, मैं आपको समय-समय पर देता रहा था l"

"व . . विद्रोह? "

"हां I"

" नही ! " पूरी शक्ति से चीखकर राष्ट्रपति सादात पीछे हट गए ।

"यह सच है सर…हालात बेकाबू हो चुके हैं…विदेशी सेना पूरी तरह जनरल इबलीस कै साथ है-हमारी सैना कै भी दो हिस्से हो गए है । सेना का एक बडा हिस्सा इबलीस कै साथ चला गया है…आपके हक की सेना कमजोर पड रही है I”

“न. . .नहीं!" सादात की चीख निकल गई ।

"मैंने आपकी कितना समझाया था सर ? एक न सुनी आपने । जिस दिन आपने विदेशी सेना क्रो इस मुल्क मे बुलाया था, मैंने उसी दिन... ....॥"
 
"'म. . .मगर विदेशी सेना को तो हमने विद्रोहियों को कुचलने के लिए बुलाया था l”

"मैंने उसी दिन कहा था कि एक दिन विदेशी हमारे मुल्क पर कब्जा कर लेगे ।-"

“मेजर ।“

“मैंने आपसे कहा था कि भले ही आपके निमत्रण पर सही, लेकिन यदि एक बार विदेशी सेना के पैर हमारे मुल्क की जमीन पर पड़ गए तो फिर वे यहा' से निकाले न निकलेंगे-आपने. कहा था फि वे हमारे मित्र देश की सेनाएं हैं-ऐसा नहीं होंगा-मगर. .कोई भी बडा मुल्क किसी भी छोटे मुल्क का दोस्त नहीं हो सकता-हा अपना उल्लू सीधा करने के लिए दोस्ती का मुखौटा ज़रूर चढा. सकता है । वही हुआ----- आपके आदेश पर विदेशी सेना ने विद्रोहियों को कुचल तो दिया, लेकिन उसके बाद आपके बार-बार के अनुरोध के वाबजूद भी _इस मुल्क से विदेशी सेना अपने मुल्क न लौटी-यहीँ डेरा डालकर पड़ गई-सारे मुल्क मैं फैल गई…आपने उनके राष्ट्रपति से भी बाते की, मगर व्यर्थ…उन्होंने आपसे कीमत मागी-इस मुल्क से अपनी सेनाएं हटाने की शर्तें रखीं…इस मुल्क की घरती पर अपना सेनिक अड्डा स्थापित करने जैसी भयानक शर्ते ।" .

"ल. . लेकिन-हमने उनकी कोई शर्त नहीं मानी ।"

"जनरल इबलीस ने मान ली हैं I”

"हाशमी ! "

"हकीकत यहीँ है सर-यदि आप मेरी बात मान लेते तो आज यह दिन देखना न पडता-मैंने आपसे सैकडों मर्तवा कहा कि जनरल इबलीस गद्दार है-उसकी एक आख सिर्फ और सिर्फ इस मुल्क के राष्ट्रपति की गद्दी को देख रही है-उस हरामी ने सेना का' एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने हक में कर लिया है। आपने ही ने तो जनरल बनाया था उसे-वह सैनिक विद्रोह के बूते पर राष्ट्रपति की कुर्सी हथियाने के ख्वाब देख रहा था…विदेशियों को एक ऐसे गद्दार की तलाश थी-वे मिल गए-उनकै बीच सौदा हो गया…बिदेशी सेना ने उसे राष्ट्रपति बचाने का वचन दिया और इबलीस ने उनकी सभी शर्तें मजूर करने का ।

“या खुदा I" सादात के कंठ से एक आह-सी फूट पडी ।

"गदर हो गया है सर…यकीनन वे हमसे बहुत ज्यादा ताकतवर हैं…आप यह न समझें कि विद्रोह. राष्ट्रपति भवन के आसपास या राजधानी में ही है । मुझे मिली खबरो के मुताबिक सारे 'मजलिस्तान' की यही हालत है । यह एक साथ सारे 'मजलिस्तान' मे योजनाबद्ध तरीके से किया गया है सर-आज रात बारह बजे. का समय मुकर्रर किया गया था-ठीक बारह बजे 'मजलिस्तान' कै हर शहर-हर छावनी-कस्बे और गावों में इबलीस के तरफदारों ने विद्रोह कर दिया…इस वक्त मुल्क के चप्पे-चप्पे पर जग जारी है ।”

" ओह ! ! खुदा !! -अब क्या होगा?”

“वे आपके खून के प्यासे है सर…इसीलिए मैंने आपको खिडकी. से खींचा था I”

~ "हमें अपनी परवाह नहीं-हम भले ही रुख्सत हो जाएं, मगर मुल्क गुलाम न हो I"

"मुल्क को गुलाम होने से अब कोई नहीं रोक सकता सर l"

"म...मेजर ।"

“हकीकत यही है सर-वे बहुत ताकतवर हैं-तादाद में बहुत ज्यादा हैं-कुछ भी करने का वक्त हाथ से निकल चुका हे-वे कुछ ही देर बाद राष्ट्रपति भवन में घुस आएगे-यहां कब्जा कर लेंगे और फिर वे आपको कत्ल कर देगे सर I"

एकाएक सादात का स्वर गम्भीर हो उठा-“हमें अपनी परवाह नहीं है मेजर ।"

"सर I"

“हमारे साथ आओं ।" कहने के साथ ही राष्ट्रपति सादात तेजी से बाहर निकल गए । हाशमी नामक लहूलहान और जख्मी युबा मेजर उनके पीछे लपका । राष्ट्रपति भवन के चारों तरफ से अब भी निरंतर फायरिंग क्री आवाजे आ रही थीं ।



"न . . .नहीँ सर, ये नहीं हो सकता ।" हाशमी चीख पडा…"आपको भी हमारे साथ चलना होगा…हम आपको इस तरह मौत के मुंह में अकेला छोडकर नहीं जा सकते I"

"जिद मत करो मेजर ।"

"आप समझते क्यों नहीं सर-वे आपके खून के प्यासे हैं ।"

“हम जानते हैं I” राष्ट्रपति सादात का कठोर स्वर…"मगर हम अभी तक इस मुल्क के अवाम द्वारा चुने गए राष्ट्रपति हैं हाशमी और तुम मेजर हो-एक सैनिक होने के …एक देशभक्त मेजर होने के नाते तुम्हें हमारा हुक्म मानना ही होगा।"

"स…सर I"

“म. . .मगर पापा ।" वहीँ खडी एक जवान और बला की सुन्दर लडकी कह उठी…“हम आपको यहा छोडकर हरगिज नहीँ जाएगे । क्यों मम्मी ?"

“मुमताज ठीक कह रही है I"

"ओह-तुम समझती क्यों नहीं बेगम मुर्तजा! "

मुमताज कह उठी…“हमें कुछ नहीं सुनना है ।"

"हम सिर्फ तुम्हारे पापा या मुर्तजा के शौहर ही नही हैं वेटी-इस मुल्क के राष्ट्रपति भी हैं…बागियो के डर से हम राष्ट्रपति भवन को खाली छोडकर. भाग नहीं सकते ।”

"तब हम भी कही नहीं जाएगी-यही मरेगी-आपके साथ ।" मुर्तजा ने कहा ।

. "कैसी बेवकूफी जैसी बातें कर रही हो मुर्तजा-मुमताज अभी बच्ची है, लेकिन तुम तो समझदार हो-जिद मत करो-कहा मानो । समय कम है…तुम लोग मेजर के साथ निकल जाओ…हमे इस मुल्क के राष्ट्रपति की गरिमा बनाए रखनी है I"

"प. . .पापा!"

"तुम्हें कुरान की कसम है बेटी…तुम्हें भी मुर्तजा-जाओ यहां से ।" सुनकर मुर्तजा ठगी-सी खडी रह गई, जबकि मुमताज के कंठ से एक चीख निकल गई…दोडकर सादात से लिपट गई वह…सादात्त ने उसे अपने अक में भीच लिया।

मुमताज फूट-फूटकर रो पडी. I

सादात ने अपने जबड़े कसकर भीच लिए-अन्दर से फूट _पडने वात्ती रुलाई क्रो बडी सख्ती से रोका था उन्होने-इसी प्रयास मे उनका चेहरा बिगडता चला गया-होंठ कापे-मुमताज कहती चली गई-"ये आपने क्या किया पापा-ये_ कैसी कसम. . .?" …

" रोते नहीं वेटी…रोते नहीं हैं ॥” न चाहते हुए भी उनकी आवाज़ भर्रा गई ।

वहीं खडी, सपाट चेहरे वाली मुर्तजा कह उठी-“आप बड़े खुदगर्ज है !"

'"म...मुर्तजा!"

"आप राष्ट्रपति सही…मगर मुल्क पर कुर्बान होने का हक अकेले आपही को तो नहीं हे?"

“मुर्तजा ।"

" आ मुमताज I” कहने के साथ ही उसने मुमताज की बाह' पकडकर उसे अपनी तरफ खींच लिया-मुमताज फूट-फूटकर रोती रही, जबकि राष्ट्रपति सादात को बड्री ही कठोर दृष्टि से घूरती हुई मुर्तजा ने कहा… "मुझे नहीं मालूम. था कि आप इतने खुदगर्ज हैं-इत्तने ज्यादा कि कुरान की कसम में बांधकर आप हमसे मुल्क पर कुर्बान होने का हमारा हक छीन लेगे ।"

"ऐसा मत कहो मुर्तजा-हम तो. . .हम तो.. . ।" सादात तडप उठा।

उनकी बात पर कोई भी ,ध्यान दिए बिना मुर्तजा ने हाशमी से कहा-"आओ भाईजान I"

हाशमी हक्का-बक्का रह गया ।
 
मुमताज की बाहे… पकड़े मुर्तजा उसे. लगभग घस्रीटती हुई दरवाजे की तरफ़ बढ… गई । मुमताज बुरी तरह रो रही थी-हाशमी ने सादात की तरफ़. देखा-उसके चेहरे पर मोजूद भावों को देखकर हाशमी की आखें' भरती चली गईं…अगले ही पल. . . ।

'"मेजर । " सादात का कठोर स्वर I

""ज . . .जी ।” वह रो पड़ा ।

"उनके साथ जाओं I"

""ल...लेकिन सर… I"

"हम कुछ सुनना नहीं चाहते मेजर-तुम जाओ…उनकी हिफाजत. की जिम्मेदारी तुम्हारी हे-उनसे कहना कि कुरान की कसम हमने उनसे उनका हक छीनने के लिए नहीं, बल्कि हक का सही तरीके से इस्तेमाल करने के लिए दी है…उन्हें 'जग' में शरीक होना हे-आजादी की जग' में…जब तक इसं मुल्क से इबलीस और उसकी. विदेशी ताकत को खदेड न ले, तब तक किसी धातु के बने बर्तन में खाना नहीं खाना उन्हें ।”

"स . . .सर । " मेजर हाशमी का सारा शरीर काप गया ।

"जाओ मेजर…यह' हमारा हुक्म हे…-उनकी और इस मुल्क की हिफाजत के लिए जाओ ।"

बुरी तरह बिलख-बिलखकर रोता हुआ हाशमी भागने की-सी अवस्था में कमरे से बाहर निकल गया-मुर्तजा और मुमताज काफी पहले ही दरवाजा पार का चुकी थी ।

कमरे मे राष्ट्रपति सादात अकेले खडे. रह गए…जडवत-पत्थर की किसी प्रतिमा कै समान-फिर वह प्रतिमा हिली…हाथ दुआ के अन्दाज मे जुडकर उठे-होंठ कुछ बुदवुदाने लगे ।

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मेजर हाशमी ने गलत नहीं कहा था।

सचमुच-रात के ठीक बारह बजे ।

तब जबकि सब सो रहे थे…अचानक ही मजलिस्तान की धरती पर एक ज्वालामुखी-सा फूट पड़ा-अगर कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि जो हुआ था, उसे हाशमी ने बहुत कम शब्दों में कहा था ।

उसे यू कहना चाहिए था कि मुल्क में नरसंहार हो रहा हे l

मौत तण्डव कर रहीँ हे।

सब कुछ एक योजना के अनुसार हुआ था-मुल्क के हर शहर, कस्बे और गाव के चप्पे-चप्पे पर विद्रोह की आग भड्क उठी थी । एक ही समय पर ।

बिलकुल फिक्स टाइम-बारह बजे ।

इसी से जाहिर था कि जो कछ हुआ उसकी पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार कर ली गई थी…सिर्फ उन्हीं को मालूम था, जिन्होंने किया । उन्हे तो भनक तक नहीँ थी, जिन पर हुआ ।

गहरी नींद में सोए सारे मुंत्क के बेगुनाह हडबडाकर उठे ।

हक्के-बक्के-चकित…आतकित !

चारों तरफ पौत का आर्तनाद गूंज रहा था ।

इसी मुल्क की एक बस्ती ।

"आग की लपटों में घिरी…गरीबों की झोंपडिया धू धू करके जल रही थीं…'चारों तरफ भगदड़, हाहाकार चीखौ-पुक्रार इंसानी चीखें गूज रही थीं ।

विदेशियों के साथ इस मुल्क के चन्द फौजी भी पैशाचिक अट्टहास लगा रहे थे ।

अस्त-व्यस्त-सी कोई मां अपने दुधमुहे' बच्चे क्रो छाती से चिपकाकर भाग रही थ्री कि तभी कहकहा लगाते किसी फौजी ने उसकी टागों पे टांग अड़ा दी । एक चीख के साथ मां लुडकती¸ चली गई ।

अपने लाल को नहीं छोडा. उसने, किन्तु जब सभली तब तक एक सगीन उसके जिगर के टुकडे के नन्हे जिस्म में आ धसी-मां बाहें फैलाकर चीखती ही रह गई, जबकि दुधमुहा' बच्चा सगीन' पर झूलता हुआ हवा मे लहरा उठा।

मां का करुण क्रुदन पैशाचिक अट्टहासौ में दबकर रह गया ।

सगीन को एक झटका लगा…हवा में नाचता हुआ बच्चा आग में घिरी एक झोंपडी में जा गिरा-बिना कुछ सोचे-समझे चीखती हुई मां अपने बच्चे को बचाने की लालसा में आग मे घुस गई ।

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""न. . .नहीँ-नही…मेरी बहन को छोड. दो कमीनो कुत्तो-खुदा के वास्ते-अमीना को छोड… दो-मैं एक-एक का खून पी जाऊगा ।" पागलों के समान हलक फाढ़-फाडका सुल्तान चिल्ला रहा था…मगर. कर कुछ नहीं सकता था, क्योंकि वह स्वयं चार दरिन्दौ की पकड़ में गिरफ्त मे था ।

उधर-अमीना चीख रही थी ।

चार फौजी वहशी गिद्धों के समान रह-रहकर अमीना पर झपट रहे थे-चीखती-चिल्लाती हुई बुरी तरह बिलखती अमीना रह-रहकर अपने भाईजान को पुकार रही थी…कपडे तार-तार हो गए थे । झपटते हुए गिद्धों ने पूरा जिस्म नग्न कर दिया था।

अट्टहास गूज़ रहे थे-पैशाचिक कहकहे ।

सुल्तान मचल रहा था…किंतु पकड… सख्त थी ।

नग्न अमीना पर चारों एक साथ झपटे-अमीना चीखी-क्रिस्री तरह उनके बीच से भागी-एक ने झपटकर उसकी टाग. पकडी… अमीना मुह के बल जमीन पर गिरी ।

एक साथ चारों ने उसे दबोच लिया ।

फिर मी-अमीना ने सघर्ष क्रिया…इतना ज्यादा सघर्ष कि वे राक्षस अपनी इच्छापूर्ति न कर सकै-तव एक फौजी ने कटार खींच ली-अमीना पर झपटा और फिर. . . ।

उफ्फ्-अमीना का एक स्तन कटकर जमीन पर जा गिरा ।

अमीना के कंठ से तो चीखें, निकलीं ही-इघर एक चीख कै बाद सुल्तान भी बेहोश हो गया-फौजियों के बंधन में झूल-सा गया वह । फौजियो ने छोडा. तो किसी बेजान वस्तु की तरह जमीन पर जा गिरा ।

वे फौजी भी जमीन पर पडी दर्द से छटपटा रही जख्मी अमीना पर झपटे....॥

♣★♣★♣

"य . . .यह क्या हो रहा है अम्मी? " सहमी हुई दस वर्षीय बालिका ने. अपनी मां से पूछा तो मां ने उसे अपने वक्षों में कुछ और कसकर कहा…“क . . कुछ नहीं वेटी-कुछ नहीं ।"

आठ वर्षीय लडके. ने पूछा-"बाहर पटाखे टूट रहे हैं न अब्बा?"

""हां बेटे…हां ।" रहीम ने उसे लिपटा लिया I

"म . ..मगर अब्बा-आज तो शब्बेरात नहीं है न? "

"म . . .मेरे बेटे I”

तभी…कमरे के बन्द दस्वाजे पर किसी ने बहुत जोर से प्रहार किया-पति-पत्नी और उनके बच्चे सूखे पोत की तरह "काप" गए l बाहर से जोरदार आवाज़ आई-"दरवेजा खोलो ।"

"न. . .नसीमा "

"ज. .जी I"

"अब क्या होगा? ”

'भडाक' से दरवाजा टूटा…बहूत-से सैनिक अन्दर-रहीम ने झपटकर दराती' उठाई…एक सेनिक ने झपटकर दस वर्षीय बालिका को छीन लिया-नसीम चीखी…बच्ची रो पडी I चीख-पुकार मच गई वहां । एक फौजी ने रहीम से कहा-“ला-इस पिल्ले. को हमे दे ।” एक हाथ से गोद में बच्चे को सभाले-दूसरे में दराती लिए रहीम पीछे हटा, बोला…“न . . .नही…मैँ अपने बच्चे को नहीं दूंगा…खुदा के वास्ते हम पर रहम करो I”
 
“खुदा-हा-हा-हा-खुदा-देखत्ते हैं तेरा खुदा. तुझे कैसे बचाता. हैं?” कहने के साथ ही "धाय" से एक गोली उसके बच्चे की नन्हीं छाती में जा घसी…-खून-का फव्वारा उछला-रहीम का सारा चेहरा अपने बेटे के खून से रग गया । नसीम चीखी, किंतु कई फौजियो की गिरफ्त में थी वह । रहीम ने घबराकर अपने बेटे की लाश सैनिक. के मुह पर दे मारी, परन्तु सैनिक. ने गन सीधी कर दी…नन्ही लाश सगीन' पर लटक गई । जब सगीन को किसी झडे' की तरह हवा में फहराते हुए मैनिर्को. ने अट्टहास लगाया तो रहीम दराती सभालकर उस पर झपटा ।

एक ही वार मे सिर धड़ से जुदा ।।

_ पलभर के लिए तो उसके साथी हक्का-बक्का रह गए, मगर फिर एक साथ सभी रहीम पर झपटे-रहीम ने दराती चलाई बार किये , किन्तु व्यर्थ ।।

वह जख्मी हो गया-सैनिकों ने उसे जकड़ लिया ।

तब रोती हुई दस वर्षीय बच्ची को जमीन पर खडा किया गया । एक सैनिक के भारी बूट की ठोकर फडाक से बच्ची के चेहरे पर पडी…आर्त्तनाद-सा करती बच्ची हवा में उछलकर -सामने वाली. दीवार से जा टकराई-जमीन पर गिरते ही उसके जिस्म पर एक अन्य सैनिक कै भारी वूट की ठोकर पड्री।

जैसे फुटबॉल थी वह बच्ची ।

अट्टहासों के साथ वे दरिन्दे खेल रहे थे-बन्धनों मे जक्रड़े रहीम और नसीम पागलों की तरह चीख-चिल्ला रहे थे-दरिन्दे तब तक खेलते रहे, जब तक कि बच्ची मुर्झा न गई…कई बार तो उन्होंने नन्हे शव को भी एक दुसरे की ठोकरो पर उछाला ।।

“हरामजादे!" एक सेनिक गुर्राया-“तूने हमारे एक साथी को मार डाला?"

रहीम चीख पडा…"मैं तुम्हारा खून पी जाऊगा' कमीनो ! "

“नगी कर दो इसकी बीबी को I" उसने धूरकर अपने साथियों से कहा-"हम इसे बताएगे' कि खून कैसे किया जाता है ।"

“न" . . .नहीँ! " रहीम हलक फाड़ उठा ।

परन्तु कोई असर नही l .

उसे सब कुछ देखना पड़ा-अपनी' बीबी को लुटते भी ।

♣★♣★♣

"यस-हम कर्नल तोम्बो बोल रहे हें-तुम कौन हो? "

शक्तिशाली ट्रांसमीटर पर दूसरी तरफ़ से आवाज उभरी…“मैं कैप्टन हॉरमन हूं सर…राष्ट्रपति भवन के बाहर से I”

"ओह-वहा क्या स्थिति है ?"

"यहां हालात हमारे बिल्कुल विपरीत हैं सर-सादात समर्थित सेना हम पर भारी पड रही हे…हममे से एक भी अभी तक राष्ट्रपति भवन में दाखिल नहीँ हो सका है,जबकि मेरे ख्याल से मेजर हाशमी खुद अन्दर चला गया है ।"

"ओह-कोशिश करो कैप्टन-उन्हे भून डालो ।"

. “स . सारी सर-अव शायद ऐसा मुमकिन नहीं है ।"

" क्यो?” कर्नल तोम्बो चीख पड़ा ।

"इस मोर्चे पर हमारे ज्यादातर सेनिक मारे जा चुके है~-जो शेष है वे सादात समर्थित नेताओं का मुकाबला करने में समर्थ नहीं । वे हम पर हावी हैं-यही सूचना देने के लिए आपसे सबंध स्थापित किया था…यदि शीघ्र ही हमेँ मदद नहीं पहुचाई' गई तो राष्ट्रपति भवन पर कब्जा करना तो दूर, हममे से एक भी जीवित्त नहीं बचेगा I"

"ओह ।" मुह से यह शब्द निकलने के साथ ही कर्नल तोम्बो के चेहरे पर चिन्ता की ढेर सारी लकीरें' उभर आईं…किसी सोच में डूब गया वह-फिर अचानक ही बोला…"तुम फिक्र मत करो कैप्टन…हम आ रहे हे-बख्तरबन्द गाडी के सामने उनमें से एक नहीं ठहर सकेगा । तब तक तुम उन्हें उलझाए रखो-सिर्फ पन्द्रह मिनट I"

“ओ .कै . सर ।" दूसरी तरफ़ से कहा गया, परंतु कर्नल तोम्बो ने उस वाक्य पर कोई ध्यान दिए बिना ही सम्बन्ध विच्छेद कर दिया था । उसके समीप खड़े एक विदेशी ने पूछा-“क्या हुआ कर्नल? "

"राष्ट्र्पति भवन के बाहर हमारी सेनाएं कमजोर पढ़ रही हैं ।"

उनके बीच खड़ा जनरल इबलीस चिन्तित एव अघीर स्वर में कह उठा…"अब क्या होगा?” '

"होना ही क्या हे…बिना बख्तरबन्द गाडी. के काम नहीं चलेगा I" कर्नल तोम्बो ने कहा-“हमें भी वैन के जरखिए ही राष्ट्रपति भवन पहुचना' होगा ।"

♣★♣★♣

‘ धडाम् ...॥ '

एक विशाल किले के अन्दर और बाहर भी दुर-दूर तक इस कर्णभेदी विस्फोट की आवाज सुनी गई-यह विस्फोट किसी दस्ती बम या किसी तोप के गरजने का नहीं था, बल्कि लोहे की उस बहुत बडी चादर के गिरने का था, जो इस विस्फोट से पहले विशाल किले का एकमात्र बन्द दरवाजा बनी हुई थी ।

वह एक किला था-विशाल किला I

लाल पत्थरों से निर्मित-पाच मजिला' एव सपाट दीवारों बाला अजय' किला ।

किले की दीवारों की जड में बाहर की तरफ एक बिशाल खाई बनी हुई थी…इस खाई का कोई स्थायी पुल नहीँ था-एकमात्र दरवाजा हमेशा वन्द रहने वाला…उस दरवाजे पर अधिकांशत: एक लोहे की चादर फिक्स रहती थी-यही लोहे की चादर वक्त आने पर अपने फिक्स स्थान से खाई कै उपर गिरती…किले का दरवाजा खुलने के साथ ही खाई के पार किले के अन्दर पहुचने के लिए लोहे की वह चादर अस्थायी पुल का काम करती ।

ऐसा ही हुआ था ।

यानी धडाम की आवाज़ के साथ किले का बन्द दरवाजा बनी लोहे की चादा खाई पर पुल बन गई…फिर किले के अन्दर से एक बख्तरबन्द गाडी तेजी कै साथ बाहर निकलती नजर आईं-वह बख्तरवन्द गाडी… चमकदार स्टील की बनी हई थी…किसी जोगा जितनी बडी…चारों तरफ से बन्द ।

वेन के अगले भाग से चार-दाएं-बाएं से तीन-तीन-पीछे से एक और छत से बाहर निकली एक, मशीनगन की नाल बाहर झाक रही थी…यानी कुल मिलाकर बारह नाले वेन से बाहर निकली हुई थी ।

वे सभी गने आग उगल रही थीं ।

वैन ने पुल पार किया-फर्राटे भरती हुई राष्ट्रपति भवन की तरफ़ लपकी-उसकी बाडी से बाहर निकली बारह गने हर दिशा मेँ आग बरसाती चली जा रही थी-यहां-वहां छुपे सादात समर्थित सैनिकों … ने उस पर गोलियाँ बरसाईं-दस्ती बम बरसाए किन्तु व्यर्थ-हर तरफ मौत बरसाती. हुई वेन निर्विघ्न राष्ट्रपति भवन की तरफ़ बढ़ती चली गईI

♣♣♣♣♣
 
"मेरे बेटे को छोड दो जालिमो-तुम्हें खुदा की कसम-कुरान की कसम ।” साठ वर्षीय बूढा करीम चाचा गिडगिडा.. उठा…"म..मेरी जान ले लो…म. . मगर-मेरे बेटे को छोढ़ दो ।”

"हा-हा…हा-हा ।” वे चार थे, चारों एक साथ ठहाका लगा उठे ।

दो ने एक युवक को जकढ़ रखा था-एक ने करीम चाचा को । एक युबक के सामने. पहुचा-वह कोई अफसर था, तभी तो उसके हाथ गन के स्थान पर रिबॉंल्बर था…रिवाल्बर युवक की छाती पर . रखा उसने, बोला…“जवान बेटे कै सामने बूढे बाप को मारने में मजा नहीं आता…हां, बूढे बाप के सामने जवान बेटा मरे ,तो मजा जरूर आता है ।"

वह ट्रेगर दबाने ही वाला था जोश में उफनते हुए युवक ने उछलकर उसके रिवाॅल्बर वाले हाथ में ठोकर मारी…रिवॉल्बर हाथ से निकलकर हवा में लहराया और दूर जा गिरा I

“हरामजादे!" अफसर जैसे पागल हो गया-“ह्यथ-पैर चलाता है !"

उसने झपटकर एक सेनिक से गन छीनी-नाल का अग्रिम सिरा

युवक की छाती पर रखत्ते ही ट्रेगर दबा दिया । खून का फव्वारा और युवक की चीख हवा में उछली…उधर, साठ वर्षिय करीम चाचा के जिस्म में जाने कहा से इतनी ताकत आ गई कि एक ही झटके मे -उंन्होंने _ न केवल सेनिक की गिरफ्त से खुद को छुडा. लिया, बल्कि पलक झपकते ही ज़मीन पर पडा. रिवाल्वर उठाकर फायर भी झोंक दिया । अफ़सर की खोपडी के परखच्चे उड़ गए ।

दोनों सेनिक हक्का-बक्का ।

अचानक ही रिवाॅल्बर हाथ में लिए करीम चाचा वहां से भाग खड़े हुए । I

“पकडो उसे I” एक चीखा-"भाग न पाए ।" सेनिक करीम चाचा के पीछे लपके, किन्तु करीम चाचा एक तरफ़ अघेरे में गुम हो चुके थे।

♣♣♣♣♣

पीछे से एक ब्यगयात्मक आवाज उभरी…"क्या कर रहे हो सादात?"

दुआ की मुद्रा तोडकर. राष्ट्रपति. घूमे…सामने. इवलीस खडा था, उनकी सेना का जनरल…वह काणा था । उसकी एक आख फूटी हुई थी…किसी जग' में कोई सुगलता हुआ बुलेट उस आख मेँ धस गया था-आख पर वह आई कैप लगाता था । सुर्ख रग की आई कैप ।

इस वक्त आई कैप अजीब-से ढग से फाडफड़ा रही थी-एकमात्र आख में सारे मजलिस्तान के बेगुनाहो का खून नाच रहा था…इबलीस ऊँची कद-काठी का बेहद तन्दरूस्त और विशाल जिस्म का मालिक था-बहुत. ही चौडा चेहरा था उसका…क्रूर-शक्ल से ही बेरहम नज़र आने वाले इबलीस के चेहरे पर घनी, लम्बी और कटारीदार मूछें थीं । बाल पीछे की तरफ़ काढा करता था वह…जेसे भेडिया. हो…थूथनी किसी सूअर से मिलती थ्री । क्रूरता और बेरहमी का प्रतिबिम्ब था इबलीस ।

इस वक्त वह अपनी वर्दी में था…जनरल की पूरी वर्दी में-कसी हुई वर्दी में उसके जिस्म का एक एक हिस्सा साफ चमक रहा था । भद्दे, काले औऱ मोटे होंठों परं व्यंग मेँ डूबी बिजयी मुस्कान ।

सादात ने उससे नजरे हटाकर उसके दाएं-बांएं देखा । दो विदेशी खड़े थे-एक सिविल कपडों. में, दुसरा कर्नल की वर्दी में--ढेर सारे सेनिकों की गने उनकी तरफ तनी हई थीं-

एकाएक इबलीस ने पूछा-“तुमने जवाब नहीं दिया सादात…यूं हाथ ऊपर उठा क्या कर रहे थे?"

राष्ट्रपति सादात ने बिना डरे कहा-"परवरदिगार से दुआ कर रहा था ।"'

"क्या मांगा?" इबलीस हसा तो उसके कुत्ते जेसे लम्बे दात्त चमक उठे ।

"तेरी मौत ।"

… इबलीस ने ठहाका लगाया यूं लगा जैसै भेडिया. इंसानी आवाज में हस रहा हो, बोला-"बड़ा बेरहम है तुम्हारा खुदा अभी तक उसने तुम्हारी सुनी नहीं I”

"वहां देर है काफिर…अन्धेर नहीं ।"

"वहां कुछ भी नहीं है सादात-सिर्फ अन्धेर है ।"

"वह तुझे तेरे कर्मों की सजा जजरूर देगा झ्वलिस-ज़ब सिर पर शैतान सवार होता तो खुदा दीखता नहीं है…मुल्क का वफादार समझकर तुझे हमने जनरल बनाया था…म. .मगर. तू-तू तो गिरगिट से भी गया-बीता निकला शैतान-इन विदेशियों के साथ मिलकर अपने ही मुल्क के वाशिन्दो का खून बहाया है तूने…ये खून रंग लाएगा इबलीस ।" . .

" तुम बेवकूफ हो सादात I”

"सच है…यदि हम बेवकूफ न होते तो कभी तुझ जेसे नमकहराम क्रो जनरल न बनाते-कभी दोस्त समझकर. इन विदेशियों से मदद न मागते।"

"अगर तुमने… हमारी शर्ते मान ली होतीं तो तुम्हें कभी यह दिन न देखना पड़ता I" एक विदेशी ने कहा।

" थू…थू है तुम्हारी शर्तों पर I”

"श. . शूट. . ! ” एक विदेशी चीखा-”आई से शूट हिम I”

"धाय ।" इबलीस के चौड़े हाथ में दबा रिवाॅल्बर गरजा l

सादात के कंठ से चीख और पेट से खून का फव्वारा फूट पड़ा । त्योराकर वे जमीन पर गिरे । वही पड़े-पड़े बोले- " आवाम ही खुदा होता है शैतान-तूने अवाम पर जुल्म ,ढाए हैँ…वही खुदा तुझसे गिन गिन-गिनकर इन जुल्मों का बदला लेगा…इन विदेशियों का कोई दोष नही.…दोष तेरा है, क्योंकि तू अपना था-इसी मुल्क का था I”

"बोल I" इबलीस ने पूछा…“तेरी बीबी और वेटी कहा' हैं?"

“मैं नहीं जानता I" राष्ट्रपति सादात का दुढ़ स्वर ।

इबलीस का रिवॉल्वर गरज उठा-'धांय-धाय-धांय . . ।।

♣♣♣♣♣
 
वही हुआ जो ऐसी घटनाओं के बाद अक्सर होता रहता हे । यानी अगले दिन के विश्वभर के समाचार पत्रो की मुख्य सुर्खी यही थी कि मजलिस्तान में सैनिक विद्रोह ।

जनरल इबलीस के नेतृत्व मे सेना और मजलिस्तान के अवाम ने अत्याचारी. सादात की सरकार के -विरूद्ध विद्रोह कर दिया-सादात् बागियों की गोली से मारे गए ।

जनरल इबलीस ने सत्ता संभाल ली है ।

परन्तु-हर समाचार सेंसर… था…दुनियाभर के अखबारों में सिर्फ वही छपा था जो इबलीस और उसके विदेशी आका चाहते थे । यदि किसी जीवट जिगर के देशी या विदेशी पत्रकार ने सच्ची रिपोर्ट अपने अखबार को देनी चाही तो उसे हलाक कर दिया गया।

मज़लिस्तान का सम्बन्ध शेष दुनिया से बिल्कुल कट गया था-न कोई मजलिस्तान से बाहर. निकल सकता था और न ही कोई मजलिस्तान के अन्दर दाखिल हो सकता था…सिर्फ मजलिस्तान रेडियो सुना जा सकता था और वही इबलीस के कब्जे मे था ।

सिर्फ वही खबरें मजलिस्तान से बाहर निकल रही थीं जौ इबलिस चाहत था…जो खबर दुनिया तक पहुचने दी गई थी उनके मुताबिक सादात सरकार को एक अलोकप्रिय-जुल्मी और ऐसी सरकार बताया गया था जिसे मजलिस्तान का अवाम पसन्द नहीं करती था-सादात की हत्या के तुस्ना बाद रेडियो पर प्रसारित होने वाले अपने भाषण में इबलीस ने कहा था कि-ताना-शाह सादात की अलोकप्रिय सरकार' के विरूद्ध बगावत मजलिस्तान के अवाम और सेना ने स्वेच्छा से की है । इस वक्त सारे मजलिस्तान मे शाति हे-अवाम खुश है ।

तात्पर्य यह कि सारो दुनिया क्रो मजलिस्तान की ठीक उल्टी तस्वीर दिखार्द गई ।

वास्तविक समाचार जानने का किसी के पास कोई जरिया नहीं' था l

मजलिस्तान में पूरी तरह प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी गई थी । जुल्म हो रहे थे किन्तु मजलिस्तान से बाहर सिर्फ शान्ति की खबरे जा रही थीं…इबलीस की छवि किसी मसीहा के रूप में उभारी जा रही थी और सादात को शेतान कहा जा रहा था ।

दुनियाभर के लोगों पर हफ्ता-क्स दि T तक मजलिस्तग्न से सम्बन्धित समाचार पढने और सुनने का भूत हावी रहा…फिर घीरे-धीरे उन खबरो मे लोगों की दिलचस्पी होती चली गई ।

दिन गुजरते गए …महीनो गुजर गए I

इबलीस को राष्ट्रपति घोषित किया गया…समाचार पत्रो मे अब यह समाचार नहीं छपते कि मजलिस्तान मे विद्रोह हुआ था बल्कि राष्ट्रपति इबलीस के बारे मे ही छपता था-यह कि राष्ट्रपति इबलीस अपने मुल्क की भलाई के लिए क्या कर रहे हैं । जिस देश की सेनाओं की मदद से इबलीस राष्ट्रपति बना था, उस देश का नाम था…"सेमिनार राष्ट्र…ओर मजे की बात यह थी कि सेमिनार. भारत का मित्र राष्ट्र था ।

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भारतीय सीक्रेट सर्विस के साउण्ड प्रूफ़ आफिस मेँ बैठे बिजय ने ब्लेक व्वाय द्धारा कही गईं एकं…एक बात ध्यान से सुनी और जब ब्लैक व्वाय चुप हो गया तो विजय अपने ही अन्दाज में बोला…"तो अब तुम यह चाहते हो प्यारे काले लडके क्रि हम मजलिस्तान जाए?"

"जी हा ।" चीफ की कुर्सी पर बैठे ब्लेक व्वाय ने सम्मानित स्वर में कहा l

"और वहां से डाक्टर भसीन को निकालकर लाए ?"

" यस सर-आपको सिर्फ इतना ही करना हे इस काम में इबलीस सरकार और हमारे मित्र देश की सेनाए आपको पूरी मदद करेंगी l उसके बाद आपको और डाक्टर भसीन को मजलिस्तान की सीमा से बाहर निकालना इबलीस सरकार की जिम्मेदारी होगी ।"

एकाएक कुर्सी. पर पसरते हुए विजय ने कहा… "यह काम हम नही का सकते प्यारे ।"

"क क्यों सर?” ब्लैक व्वाय चोंक पडा ।

" अमा तुम भी रहोगे दीवट-के दीवट ही मियां काले लडकें-ये भी साला काम है-अमा हमसे काम ही लेना था तो कोई बडा काम लेत्ते-एक वेज्ञानिक क्रो मजलिस्तान. के बागियों कै पंजे' से निकालना है-अब इस उम्र में हम यह काम करेगे?"

"आप मामले की गम्भीस्ता को समझ नही रहे हे सर ।"

"हम सब समझ रहे हे प्यारे ।

"काम उतना साधारण या आसान नहीँ है जितना आप समझ रहे है! बागियों की ताकत बहुत ज्यादा है-अंदर ही-अन्दर इबलिस सरकार को हिला रखा है उन्होंने ।

" हमने सब सुन लिया है ।"

"फिर भी आप ...!"

" इस काम के लिए अपना दिलजला काफी रहेगा प्यारे काले लडके ?"

" विकास !"

" हा !"

" इसमे तो कोई शक नही सर कि विकास इस काम को बखूबी कर सकता हे…पहले हमारे दिमाग में भी विकास ही को मजलिस्तान भेजने का विचार आया था किन्तु...!"

“किन्तु ? "

"फिर कुछ सोचकर वह विचार रद्द कर दिया I”

"क्या सोचकर? ”

"विकास पर आपको तो फख होना ही चाहिए, क्योकि वह आपका शिष्य है और अगर यह कहा जाए तो गलत न होगा कि उसने आपसे भी आगे बढकर. भारत का नाम रोशन किया है-भारत के बच्चे-बच्चे . को बिकास पर नाज हे…आपने और अलफासे ने उसमें सैकडो विशेषताए भर दी हैं…मगर कई बार विशेष परिस्थितियों में वे विशेषताए उसके अवगुण भी लगने लगते हैं ।

“जेसे !"

"उसका काम करने का तरीका आपसे बिल्कुल अलग हे…आपकी कोशिश किसी भी अभियान क्रो शान्ति से-गुप-चुप और दिमाग से हल करने की रहती है जबकि विकास का सिद्घान्त खुला खेल फरक्काबादी खेलने का रहा हे-वह नया लडका है-खून जल्दी उबाल खाता हे-ऐसा नहीं कि उसमें दिमाग नही है लेकिन वह जल्दी ही जोश में आ जाता है और ऐसे हर मोके पऱ बह अपने दिमाग पर से नियत्रण खो बैठता हे…पागल हो जात्ता हे-तब वह दिमाग से नहीं बल्कि अपनी असीमित ताकत से काम लेता है-जो काम दिमाग से चुटकी बजाते ही हो सकता है उसे करने के लिए वह लाशों के ढेर लगाता चला जाता है-उसक्रा सबसे पहला सिद्घान्त अपने कार्यक्षेत्र में जाकर अपने नाम का आतक फैलाना और हम नहीँ चाहते कि मजलिस्तान में किसी किस्म का कोई आत्तक फेले ।"

"ऐसा क्यो चाहते हो तुम?"

"यदि विकास वहां अपने ढंग से काम करेगा तो विश्व मे यह बात. जरूर फैलेगी कि मजलिस्तान में इबलिस सरकार के विरुद्ध बागी सक्रिय हैं, जबकि सारी दुनिया में प्रचार यह किया जा रहा है कि....... मजलिस्तान का अवाम इबलीस सरकार से खुश हे ।"

"वह तो ठीक है प्यारे, मगर. . . ।"

" मगर?” .

“हम फिर भी यही कहेगे कि मजलिस्तान दिलजले को ही भेजा जाए-जच तक हमारी मदद के बिना अपना दिलजला इस किस्म कै दो-चार' केसों को हल नहीं करेगा, तब तक दुनिया यह जानेगी ही कैसे कि हमारा शिष्य क्या चीज. बन गया है…यूं तो हर जासूस का काम करने का तरीका अलग ही होना चाहिए, फिर भी हम उसे समझा देगे कि मज़लिस्तान में जरूरत से ज्यादा उखाड-पछाड न करे -- ऐसा करने से हमारे मित्र राष्ट्र की बदनामी हो सकती हे ।”

"जैसी आपकी इच्छा I”

"उससे सम्बन्थ स्थापित करो I"

ब्लेक व्वाय ने पूछा…"इस वक्त विकास कहा होगा सर?"

"आजकल वह खाली है-- अपने गाडीव प्यारे के साथ कहीं उघम मचा रहा होगा !"

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जो नियमित पाठक हैं वे तो जानते हैं, किन्तु नए पाठक इस उलझन के शिकार जरूर होंगे …कि सीकेट सर्विस का चीफ़ होने के वावजूद ब्लेक व्वाय आखिर विजय को 'सर‘ क्यों कहता है?

दरअसल बहुत पहले विजयं ही भारतीय सीक्रेट सर्विस का चीफ़ था, कितु फील्ड में काम करने के शौकीन विजय को डैस्क वर्क रास न आया, कुर्सी से बंधे रहने की अपेक्षा वह खत्तरों से जूझने में ज्यादा दिलचस्पी रखता था, अत: चीफ़ के पद से त्याग-पत्र देकर उसने गृहमत्री की सलाह पर ब्लेक व्वाय क्रो चीफ बनवा दिया…यही कारण हे` कि ब्लेक व्वाय आज भी विजय को अपना' चीफ मानकर उसे 'सर' कहता है, जबकि विजय सिर्फ सीक्रेट सर्विस का साधारण सदस्य है ।

वेसा ही सदस्य है-विकास ।।

एजेण्ट स्क्वायर डबल एक्स फाइव के नाम से मशहूर ।।।

रिश्ते में विकास विजय का भाजा है, यानी विजय की चचेरी और ब्लेक व्वाय की सगी बहन रैना का बेटा-रेना का पति यानी रघुनाथ सूणाटेंडेंट पुलिस है बिजय इंस्पेक्टर जनरल आँफ़ पुलिस अर्थात ठाकुर निर्भय सिह का पुत्र हैं ।

ठाकुर साहब ने विजय को नालायक और आवारा समझकर घर' से निकाल दिया है… सीक्रेट सर्विस के सदस्यों के अलावा विजय की हकीकत कोई नही जानता ।

विजय को अपने पेशे के अलावा यदि किसी से प्यार है तो उसका नाम है-विकास ।।

विकासा सात फीट लम्बा…ह्रष्ट-पुष्ट और गोरा लडका-कामदेव, कै समान सृन्दर-ऐसा कि जिसे देखते ही लडकिया मर मिटे…किंतु वह विजय अलफासे जेसा गुरुओं का शिष्या है-लडक्रियों. में कोई दिलचस्पी. नहीं रखता-उसे यदि किसी से प्यार है तो…सिर्फ देश से! अपनी खूबसूरती से कई गुना ज्यादा खतरनाक ।

अलफासे एक अन्तर्राष्ट्रिय अपराधी का नाम है…ऐसे अपराधी का जिसका दावा है कि दुनिया की किसी जेल में उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध. कैद नहीँ रखा जा सकता-अलफासे का यह दावा आज तक अपनी जगह अटल है…सारी दुनिया की पुलिस को अपनी उगलियों पर नचाता हुआ अलफासे हमेशा दुनिया के भ्रमण पर रहता है ।

यही अन्तर्राष्ट्रिय शातिर विकास का दूसरा गुरु है ।

विजय और अलफासे की भिन्न योग्यताओं का नाम हे…विकास! विकास के साथ एक बन्दर रहता है…सारी…उसे बन्दर कहना मोत क्रो दावत देने के बराबर है-जिसे विजय 'गाण्डीव' कहता है उसका नाम घनुषटकार है ----बबुत पहले डॉक्टर लाजारूस नाम का एक ऐसा वैज्ञानिक हुआ था शल्य विज्ञान की दुनिया क्रो मस्तिष्क प्रत्यारोपण का कमाल दिखाकर चमत्कृत कर दिया…इसी डाक्टर लाज़ारूस ने 'मौण्टों' नामक एक जेबक्रत्तरे क्रो पकडा. और उसका मस्तिष्क एक बन्दर के जिस्म में प्रत्यारोपित कर दिया ।

वही बन्दर बाद में विजय के हाथ लगा-बिजय से उसे विकास ने ले लिया…विक्रास ने उसे बहुत से आदभुत कामों में एक्सपर्ट कर दिया-यही वजह है कि वह विकास क्रो गुरु और विजय को स्वामी मानता हे…इसानी मस्तिष्क होने के कारण वह इसानों' की तरह ही' _ सोच-समझ सकता है । सिगार और शराब पीता है.-'माउथ आर्गन बजाता है-सही निशाने पर गोली चलाता है-बॉंयलन के फ्तले तार से दुश्मन का सिर काटने में एक्सपर्ट है…बोल नहीं सकता, लेकिन लिख लेता है, यानी घनुष्ट्रकार सैकडों खूबियों` का दिलचस्प पिटारा है ।

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सबसे पहला घपला तो तभी होगया जब विकास ने होटल गुलमर्ग में कदम रखा…-धनुषटकार उसके कंधे पर बैठा, सिर पर 'गाल रखे सो रहा था…बिकास काउण्टर के समीप से गुजर ही रहा था कि काउण्टर गर्ल ने कहा…"'प. . प्लीज-एस्सक्यूज मी सर । "

उसकी तरफ घूमकर विकास बोला-“कहिए' ।"

"होटल में वन्दर लाने की इजाजत. . . ।" काउण्टर गर्ल का वाक्य पूरा न हो सका…क्योंक्रि उससे पहले . ही. . . l

"चटाक ।"

सारे हाल मे एक जोरदार चाटे की आवाज गूंज गई ।

सभी ने उस तरफ देखा जबकि काउण्टर गर्ल का गाल झनझना रहा था-उसके गोरे और भरे हुए गाल पर__लाल रंग में घनुष्टंकार की चार उगलिया उभर आई थीं ।

आखें भर आईं-चकित दृष्टि से उसने घनुष्टकार की तरफ देखा ।

विकास के कंधे पर बैठा घनुष्टक्रार अभी भी-उसे घुडकिया दे रहा था…चाटा' मारने के… बाद बडी. फुर्ती से वापस विकास के कांधे पर आ बेठा था बह ।।

काउण्टर गर्ल चीख पडी…“ये क्या बदतमीजी है?"

"इन हजरात का.नाम मोण्टों है मेडम ।" विकास मुस्कराया ।

“व्हाट डू यू मीन? "

"कोई यदि इन्हे बन्दर कहा तो जनाब तैश में आ जाते हैं-किसीं के भी द्वारा खुद को अपने नाम से पुकारा जाना ही पसन्द करते हैं l क्यों मोण्टों?" .

घनुष्टकार ने स्वीकृति में गर्दन हिलाई ।

घपला बढने. लगा था, किन्तु अभी ज्यादा नहीं बढ़ पाया था कि अपने केबिन से निक्लकर वहा भागता हुआ मेनेजर पहुच' गया…आते ही वह बोला-" अरे-रे-ये क्या गडबड… हो गई । शायद मोण्टों जी को बन्दर कह दिया होगा सुनीता-ये बन्दर नहीं इनका नाम पोण्टी है और ये हैं मिस्टर विकास-मोन्टो के गुरु ।”

सुनीता चकित रह गई । कुछ बोल नहीं सकी वह, जबकि. हालात को सभालने की कोशिश मे हडबडाया…सा मैनेजर कह रहा था-“म . .माफ करना मिस्टर मोण्टों । सुनीता नई है-यह आपको जानती नही थी I" मोण्टो अब भी सुनीता को घुडक रहा था ।

मैनेजर ने कहा-“सुनीता-मोण्टों जी से माफी माग. लो ।"

सुनीता घूम… गईं-एक बन्दर से माफी मागने की बात उसकी समझ बिल्कुल नहीं आई…वैसे भी, बिना किसी प्रकार की कोई गलती किए चाटा' भी उसी ने खाया था…बह बेचारी क्या जानती थी कि बन्दर को बन्दर कहकर उसने शायद अपने जीवन की सबसे बडी, भूल की थी । .अत' में हाथ जोडकर. उसे मोण्टों से माफी मागनी ही पडी ।

. उसके ऐसा करत्ते ही मोण्टों उछला-सुनीता के कठ से चीख निकली, परन्तु कोई परवाह किए बिना अपनी दोनों बाहे उसके गले में डालकर झूला और दनादन…दनादन उसके चेहरे के ढेर सारे… चुम्बन ले डाले । ~

तुरन्त ही वापस विकास के कंधे पर।।

विकास ने बताया-"यह मोण्टों का किसी को माफ करने का तरीका है।"

सुनीता . . बुरी तरह झेंप गई…चेहरा सुर्ख पड़ गया-गर्दन झुका ली उसने, जबकि विकास हाल में से गुजरता हुआ एक खाली सीट की . तरफ़ वड गया ।

होंलं मेँ बेठे लोग दिलचस्प निगाहों से मोण्टों को देख रहे थे-उस बंदर क्रो. जो छोटा-सा शानदार सूट और जूते पहने था…उगलियों में कई अगूठिया'-गले पें टाई ।
 
विकास के सीट तक पहुचते-पहुचते उसने कोट की जेब से निकालकर एक सिगार सुलगा लिया था…विकास के बैठत्ते ही वह उछलकर मेज के पार वाली कुर्सी पर बैठ गया । सभी की नजरो से लापरवाह वह सिगार के हल्के-हल्के कश लगा रहा था ।।

कुछ देर बाद-हॉल आकेंस्ट्रा की मधुर धुन गुंज उठी…बहुत से जोडे फ्लोर पर थिरकने लगे-अचानक ही मोण्टों ने सिगार ऐश ट्रे मे मसला-जेब से पव्वा निकाला-दो-तीन घूंट हलक से नीचे उतारे । पव्वा बंद करके जेब में डाला और फिर फ्लोर पर पहुच गया ।

आर्केस्ट्रा बंद हो गया, पऱन्तु किसी की भी परवाह किए बिना मोन्टो ने जेब से माउथ ओंर्गन निकाला. और बजाना शुरू कर दिया, साथ ही फ्लोर पर थिरकने भी लगा ।

मोण्टों बड़ा ही सुन्दर माउथ आँर्गन बजा रहा था और उतना ही सुन्दर ऩाच भी रहा था…लोग हसने लगे और फिर हसते हंसते' लोगों . .के पेट में बल पड गए ।

जो जोडे पहले डरकर भाग गए थे उन्होंने उसके चारों ओर एक वृत्त-सा बना लिया ।

लोग हस रहे थे-कछ मनचले ताली बजा बजाकर मोन्टो को उत्साहि कर रहे थे । .

माऊथ आर्गन बजाता हुआ मोण्टो सारे फ्लोर पर थिरकता फिर रहा था…बीच-बीच में वह इस तरह ठुमकै लगाता कि लोग ठहाके लगा उठते…अपनी सीट पर बैठा विकास भी उस दृश्य क्रो देखकर धीमे-धीमे मुस्करा रहा था-अचानक ही वह चौका ।

गले पड़े लोंकैट से पिक-पिक की हल्की ध्वनि निकल रही थी-साथ ही लॉकेट से एक सुई की नोक उसके सीने. पर रह-रहकर चुभ रही थी ।

विकास समझ गया कि सीक्रेट सर्विस का चीफ उससे बात करना चाहता है।

वह खडा हुआ…तेज और लम्बे-लम्बे कदमों के साथ बाथरूम. मे पहुचा-दरवाजा अन्दर से बन्द करके ट्रांसमीटर ओंन किया ।

दूसरी तरफ से ब्लेक व्बाय ब्रार-बार कह रहा था…"हैलो-हैलो सक्वायर एक्स-एक्स फाइव हैलो ।"

"एक्स-एक्स फाझ्व हियर सर l" विकास ने कहा ।

सीधा आदेश दिया गया…“तुम्हारे लिए एक केस है विकास । इसी समय गुप्त भवन पहुचो ।"

"ओ के सर ॥" कहने के साथ ही उसने ट्रांसमीटर. आँफ किया और दरवाजा खोलकर बाहर निकला-सारा हाॅल खाली पडा था । एक नज़र उसने फ्लोर की तरफ डाली-खिलखिलाती भीड के बीच धनुष्टकार अभी तक नाच रहा था ।

गुलाबी होंठों पर हल्की' सी मुस्कान लिए लम्बा लडका लम्बे-लम्बे कदमों के साथ दरवाजा पार कर गया…काली बैलबॉंटम और सफेद कमीज मे इस बक्त वह गजब ढा रहा था ।

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इन्टरकांम किसी शक्तिशाली मक्खी कै समान भिनभिना उठा । ब्लैक व्बाय ने हाथ वढाकंर. रिसीवर उठाया-कान से लगाते ही रिसेप्शनिस्ट का स्वर सुनाई दिया…"एजेण्ट स्कवायर एक्स-एक्स फाझ्व कमिग सर I"

"भेज दो I" छोटा-सा वाक्य बोलकर ब्लैक ब्वाय ने रिसीवर रखा ही था कि सामने बेठे विजय ने कहा-'"लगत्ता है अपना दिलजला पहुच गया है प्यारे !"
 
"जी हां I"

दरवाजा एक झटके से खुता-सिर्फ एक क्षण के लिए लम्बा लडका दरवाजे पर नज़र आया-फिर लम्बे-लम्बे दो या तीन कदमों मे ही विजय के समीप-पूरी श्रद्घा के साथ विजय के चरणों में झुका वह-,चरण स्पर्श किया ।

"बाल बच्चे राजी-खुशी रहे मेरे लाल॥"' कहने के साथ ही मुस्कराते हुए बिजय ने उसका कान पकड लिया-- डबल एक्स फाइव सीधा खडा हुआ तो उसका कान पकडे विजय का हाथ ऊपर उठता चला गया । कुर्सी से उठता हुआ विजय कह उठा… !अमा-अमा प्यारे…क्या पूरा कुतुबमीनार ही बनने का इरादा है?”

" आपकी दुआ है अंकल । " सचमुच-विकास विजय से छह इच के करीब निकल गया था । विकास की जिन्दगी मे रफ्तार थी…वेसी ही रफ्तार जैसी तेज चल रही आंधी में होती है-वह हर काम जल्दी में करता था…'इससे पहले कि गुरु और शिष्य के बीच कोई और बात हो जाए…ब्लेक बॉय ने . ओंफिशियल स्वर में कहा-“मिस्टर एक्स-एक्स फाईव । "

"यस सर I" बिकास का सारा जिस्म तन गया ।

"सिट डाउन I” विकास बैठ गया ।

ब्लेक व्वाय ने बात शुरू की तुम्हें कल ही मज़लिस्तान जाना होगा ।"

" काम?”

" तुम जानते हो कि कुछ ही महीने पहले वहा… सैनिक विद्रोह के बाद इबलीस सरकार की स्थापना हुई है…इबलिस सरकार हमारी सहयोगी है क्योकि उस सरकार की स्थापना हमारे मित्र राष्ट्र सेमिनार की सेनाओं की मदद से हो सकी है-इस प्रकार से मजलिस्तान. में हमें सेमिनार सरकार ही समझनी चाहिए क्योंकि सेमिनार हमारा सबसे अच्छा दोस्त हे…हमारे और सेमिनार के बीच पच्चीस साल फी सन्धि हे ।"

"जी-मैं जानता हूं ।"

"मजलिस्तान में इबलिस सरकार के खिलाफ कुछ सिरफिरे बगावत करने की नाकाम कोशिश कर रहे हैँ-उन्होंने अपना एक सगठित्त दल तैयार कर लिया है I”

"ल. . लेकिन . . .।"

"हां-हां--कहो I”

"अखबार आदि में तो हमेशा यही खबर छपती है क्रि मजलिस्तान में इवलीस सरकार का कोई विरोध नहीं हे-और आप कह रहे हैं कि . . . I”

"इस किस्म की खबरें कोई भी देश अखबारों में नही छपने देता…वेसे भो इबलीस सरकार के खिलाफ वहा मुट्ठीभर बागियों का होना कोई बिशेष घटना नहीँ है…हर देश की हर सरकार के विरुद्ध ऐसे लोग हर मुल्क में मिल जाएगे-लोकप्रिय से लोकप्रिय, सरकार के विरुद्ध भी लोग मोर्चा लगा ही लेते हें और फिर मजलिस्तान तो` वेसे भी आजकल अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का केन्द्र बना हुआ है ।"

" वह कैसे सर?"

" इबलीस सरकार की स्थापना वहा सेमिनार सनाओं की मदद से हुईं है,सेमिनार हमारा मित्र है और पश्चिमी देश यह समझ रहे हैं कि मजलिस्तान पर हमारा ही कब्जा हो गया है ।"

"ऐसा क्यों है? "

" ऐसा है नही, बल्कि पश्चिमी देशों का सोचने का अपना तरीका हे…मजलिस्तान की सीमा हमारे एक ऐसे ण्डोस्री देश से मिलती है, , जिसे एक पश्चिंमी देश इस भ्रमजाल में फंसाए है कि हम उसके शत्रु है…इस देश को उसने यह पट्टी पढा दी है कि हमारी तरफ से खतरा है-उस पश्चिमी महाशक्ति द्वारा समझाई गई यह बात हमारे पडोसी देश के भेजे में घुस गई है कि उस पर एक तरफ़ से हम हमला कर सकते हैं दुसरी तरफ़ से मज़लिस्तान में मोजूद हमारे मित्र. सेमिनार की सेनाए-इस क्षेत्र में अपनी ताकत बढाने के लिए वह पश्चिमी महाशक्ति हमारे पडोसी देशों को खतरनाक हथियारों. से लेस कर रही है-ऐसा अनुमान हे कि मजलिस्तान में जो दल इबलीस सरकार का विरोध कर रहा है उसके पीछे पश्चिमी ताकत है ।"

‘ “ओह ।" बिकास ने कहा ।

"उन बागियों से इबलिस सरकार निपट भी रही है और सक्षम भी I"

" फिर मुझे वहा क्यों जाना हैं?"

" बागियो ने मजलिस्तान में रह रहे एक भारतीय वैज्ञानिक को अपने कब्जे में कर लिया है । इबलीस सरकार की बहुत कोशिश के बाद भी डॉक्टर भसीन......!"

“डॉक्टर भसीन?”

“उस बैज्ञानिक का नाम है I” .

"औह-हां I”

"इबलीस सरकार डॉक्टर भसीन को बागियों के पजे से निकालने में नाकाम रही हे…स्वयं इबलीस सरकार ने ही हमे भसीन के फस जाने की सूचना भेजी है और एक ऐसे भारतीय जासूस की माग की है जो डॉक्टर भसीन को उनकी गिरफ्त से निकाल सके…इबलीस सरकार और सेमिनार की सेनाएं वहां तुम्हारी भरपूर मदद करेगी I”

"यानी कि डॉक्टर भसीन को भारत लाना है?"

"हां, डाक्टर भसीन कोई साधारण वैज्ञानिक नहीं है । आजकल वह किसी ऐसे ईंधन की खोज कर रहा है, जिससे तारापुर परमाणु सस्थान को चलाए रखा जा सकै-तुम जानते ही होगे कि अभी तक तारापुर परमाणु सस्थान पश्चिमी मदद से ही चल रहा था, लेकिन पिछले एक-डेढ़ साल से वह देश ईधन देने में नखरे दिखा रहा है ।"

"मै जानता हूं।".

. "तब तो तुम डाक्टर भसीन के महत्व को खूब अच्छी तरह समझ सकते हो ।"

"जी हा…मैं तो तैयार हू…आप पासपोर्ट आदिं का प्रबध कीजिए I”

"समझो कि हो चुका है I"

"ठीक हे…मैं कल निकल जाऊगा…और कछ सर?"

“ओर कुछ हमें कहना हे प्यारे I" बहुत देर से चुपचाप बैठे विज़य ने एकाएक कहा ।

उनकी तरफ मुखातिब होकर बिकास बोला-"कहिंए अंकल। "
 
"मजलिस्तान मेँ तुम पायजम्मे मे रहोगे ।"

"जैसी आपकी आज्ञा ।" लडके के गुलाबी होंठों पर शरारती मुस्कान

उभर आई…“मैं एक वार भी वहां पैंट नहीँ पहनूगां-हमेशा पायजामे मे रहूंगा।"

ब्लेक व्वाय मुस्करा उठा I

~ विजय ने कहा…"तुमु वहां अनावश्यक खून-खराबा नहीं करोगे ।"

"पायजामे का इससे क्या मतलब अकल?" विकास ने भोलेपन से

पूछा ।।

"मतलब बड़ा गहरा हे मेरी जान I"

"खैर-लेकिन आपसे यह किसने कह दिया गुरु कि मैं अनावश्यक खुन-खराबा करता हूं ?”

" पहले बात की पूछ पकडो-तुम्हारा सिद्घान्त अपने अभियान पर जाते ही सबसे पहले उस स्थान पर अपना आतक फैलाना है जहा तुम काम करते हो l"

"वह तो काम करने का अपना अपना तरीका है गुरु ।"

"लेकिन तुम्हारा यह तरीका कम-से-कम इस अभियान में नहीं चलेगा ।"

"वह क्यों?”

"क्योकि शेष दुनिया में इस बात का बिल्कुल भी प्रचार नहीं किया जा रहा है कि मजलिस्तान में इबलीस सरकार का किसी भी स्तर पर जरा भी विरोध है…यदि तुमने वहा उखाड-पछाड की तो मजलिस्तान में उस बागी दल की मौजूदगी का सारी दुनिया को अहसास हो जाएगा . और ऐसा हमारे दोस्त नहीं चाहते !"

"समझ गया !"

"क्या समझे?”

"जो आपने समझाया हे ।

" . . तब तो प्यारे यह भी समझ गये होगे कि तुम्हें मजलिस्तान खामोशी से जाना है…खामोशी से वहा अपना काम करना है और खामोशी से ही लोट आना है--- जैसे गये ही न हो ।"

अत्यन्त शराफत के साथ कहा विकास ने…“जैसी गुरुदेव की आज्ञा ।"

" अच्छे बच्चे आज्ञाकारी. ही होते हैं-अब इसी बात पर तुम एक झकझकी.. सुनो I”

यू कहा शरारती ने…" उससे पहले आपको मेरी एक दिलजली सुननी होगी !"

विजय ने बहुत जोर से अपने माथे पर हाथ मारा और कुर्सी पर पसर गया I

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जिस वक्त इण्डियन एजेण्ट एस्क्वायर डबल एक्स ने विमान पर लगी सीढी तय करके मजलिस्तान की जमीन पर कदम रखा उस वक्त शाम के पाच बज रहे थे- हालाँकि मजलिस्तान की राजधानी के एयरपोर्ट पर पाच यात्री उत्तरे थे परंतु अपने कामदेव जैसे रूप और विशेष. लम्बाईं के कारण वह दूर से ही अलग चमक रहा था । दाए हाथ मे मात्र एक सूटकेस लटकाए वह लम्बे-लंबे कदमों कै साथ कस्टम विभाग की तरफ बढ़ा ।

उधर वह कस्टम पर अपने कागजात दिखा रहा था-इधर पब्लिक बालकनी मे खड़ा एक युवक उसे दंखते ही बडी, तेजी से हटा-सींढिया तय करके नीचे पहुचा और फिर दो मिनट बाद ही बह एक पब्लिक. टेलिफोन बूथ मेँ खड़ा फुसफुसाते स्वर मेँ कह रहा था…“वह आ गया है ।"

"गुड ॥" किसी महिला की आवाज-"राष्ट्रपति भवन से उसे होने लेने क्रोईं आया है?"

“सिर्फ एक ड्राइवर-विदेशी कार लेकर I”

"गाडी का हुलिया और नम्बर?"

"चमचमाती हुई वेहद लम्बी काली कार…नम्बर आर. जेड. चार सौ बाईस I"

"तुम उसके गाडी मे बैठने तक नज़र रखो…यदि उसके प्रोग्राम में कोई रददोबदल हो तो फौरन खबर करना-यदि सब कुछ वेसा ही होता रहे जैसा नजर आ रहा हैं तो फोन की कोई जरूरत नहीं है ।"

"ज . . .जी ।" उसने धीमे से कहा । दूसरी तरफ़. से संबध विच्छेद हो गया ।

जिस वक्त वह बूथ से बाहर निक्ल रहा था, ठीक उसी समय विकास कस्टम से निपटकर आगे बढा । वह मुश्किल से दो या चार कदम ही चल पाया था कि ड्राइवर की वर्दी पहने एक व्यक्ति उसके समीप पहुचकर बोला…“हैलो सर I"

“हैलो सर नही-नमस्ते I"

"सांरी.…मगर आज आप बहुत सुबह-सुबह आ गए?"

"रात एक बजे चल दिया था न?" बिकास ने उस व्यक्ति को वहुत ध्यानपूर्वक देखते हुए कोड का जवाब दिया ।

"आइए ।" कहने साथ ही वह मुडा… और उसकी अगवानी-सी करता हुआ एयरपोर्ट की इमारत से बाहर की तरफ बढ़ गया । बिकास ने भी उसके पीछे अपने कदम बढाए-जाने क्यों, पैनी दृष्टि से उसने, अपने चारों तरफ का निरीक्षण किया-दाईं तरफ़ बडी तेजी से उसने एक युवक को सरककर थम्ब के पीछे छुपते देख लिय.।

वह ठिठका सिर्फ एक पल के लिए…अगले ही पल -उसने लापरवाही का प्रदर्शन करते हुए कदम आगे बढा दिए ।

ऊपर से भले ही वह लापरवाह-नजर आ रहा था, किन्तु अन्दर-ही-अन्दर पूरी तरह, सतर्क हो चुका था--वह समझ चुका था किकि उस पर नज़र रखी जा रही है-ड्राइवर के पीछे बढते_ हुए उसने एक वार पुन: कनखियों` से थम्ब की तरफ देखा-थम्ब के पीछे से झाककर एक चेहरे पर फिक्स दो आखें उसी को देख रही थीं-एक बार को तो लडके. की इच्छा हुई कि वह रूके-घूमे-झपटे और उस युवक की गर्दन थाम ले…मगर विजय की चेतावनी को याद करके अपना यह नेक बिचार फिलहाल स्थगित ही कर दिया ।।

हां-किसी भी किस्म के हमले का सामना करने…के लिए वह चोकस जरूर हों गया था।

एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही वह चौक पड़ा-चौंकने का कारण 'चप्पे-चप्पे पर तैनात सेमिनार के सेनिक ये-कई सेनिक जीपें खडी. थीं…सशात्र सेनिक अपने-अपने स्थान पर चहलकदमी' कर रहे थे और सडक पर आ-जा रहे यात्रियों के चेहरों पर उसने अजीब-स्री सफेदी देखी थी ।

विकास के दिमाग मे कई सवाल उठे।

चप्पे-चप्पे पर इतनी अधिक सख्या में सशस्त्र सेनिक क्यों हैं?

. नागरिको के चेहरों पर अजीब-सी दहशत क्यों है?

वातावरण में एक खिचाव था. . अजीब-सा सन्नाटा-उसे विचित्र-सा लगा-यह सन्नाटा क्यों है?

क्या सचमुच मजलिस्तान की भीतरी स्थिति वैसी ही हे जैसी विश्वभर के अखबार या रेडियो बता रहे हैं-यदि वह सच हे तो सारे वातावरण पर छाए इस सन्नाटे का क्या अर्थ है?

यही सब सोचता हुआ विकास उस काली और लम्बी कार की पिछली सीट पर बैठ गया, जिसका दरवाजा ड्राइवर उसके स्वागत हेतु खोले खडा था…ड्राझ्वर ने दरवाजा बन्द क्रिया । जिस वक्त घूमकर वह ड्राइविंग सोट की तरफ आ रहा था, उसी समय में बिकास ने बडी तेजी से एक छोटा…सा रिवॉल्बर जुराब से निकालकर कोट की भीतरी जेब में डाल लिया ।

अपनी सीट पा बैठकर ड्राइवर ने गाडी. स्टार्ट की ।

गाडी तैरने कै-से अंदाज मे आगे बढ़ गई…विकास ने पीछे देखा, वही युवक सडक पर खड़ा कार की तरफ देख रहा था-धीमे से मुस्कराकर विकास सीट पर पसर गया । परन्तु वह निरतर देख रहा था कि गाडी खिन रास्तों से गुजर रही है l

हर चौराहे पर उसने सशस्त्र सेनिक देखे थे ।

पिक-गिक-करती कई जीपे उसने सडक. पर इधर-उधर दौडती भी देखी थी ----

हालांकि जनजीवन कै दैनिक कार्य सामान्य-से होते नजर आ रहे ,थे परन्तु विकास को वातावरण कुछ बैसा ही लगा जैसा कि दंगाग्रस्त' क्षेत्र में कफर्यु खुलने कै बाद होता है l
 
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