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लाल हवेली (एक खतरनाक साजिश)

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‘‘पुलिस जब तुम्हारे पीछे पड़ेगी तो मेरा अलावा भी कोई ना कोई गवाह खोज निकालेगी, जिसने ऐन कत्ल के वक्त तुम्हें हवेली के भीतर या उसके आस-पास देखा होगा। प्रकाश के कमरे से तुम्हारे फिंगर प्रिंट भी अवश्य ही बरामद होंगे। देखो गुलेगुलजार हर सबूत तुम्हारे खिलाफ है, तुम बच नहीं सकती। हरगिज-हरगिज भी नहीं बच सकती।“

‘‘ओह गॉड ये आदमी तो मुझे कातिल साबित करने की कसम खाये बैठा है।‘‘

‘‘मैं नहीं, तुम्हारे कुकर्म तुम्हें कातिल साबित करेंगे। फिर अपने घर से हजारों मील दूर इस शहर में अपनी मौजूदगी का क्या जवाब है तुम्हारे पास! नहीं मैडम तुम नहीं बच सकतीं।‘‘

‘‘मगर मैंने प्रकाश का कत्ल नहीं किया है।‘‘

‘‘ये बात तुम पुलिस को समझाना।‘‘

”सुनो! तुम इस किस्से को यहीं खत्म क्यों नहीं कर देते?“

‘‘कर देता हूं मगर पहले तुम मुझे सारी बात बताओ, बिना कुछ छिपाये, बदले में मैं तुमसे वादा करता हूं कि कम से कम मेरी वजह से पुलिस तुम तक नहीं पहुंचेगी। खुद तलाश कर ले तो जुदा बात है।‘‘

‘‘तुम इन बेवजह के पचड़ों में क्यों पड़ते हो, भूल क्यों नहीं जाते ये सब?‘‘

कहती हुई वो मेरे पहलू में मुझसे सटकर बैठ गई उसका एक उरोज मेरी कोहनियों पर दस्तक देने लगा। अचानक जैसे उसे याद हो आया था कि वो एक लड़की थी - एक ऐसी लड़की जिसपर जवानी झूम कर आई थी। जिसका अंग-अंग सांचे में ढला हुआ था। लिहाजा उसने अपना आखिरी हथियार आजमाना शुरू कर दिया था।

”नहीं भूल सकता - अब ये किस्सा खत्म नहीं हो सकता।“

”हो सकता है“ - वो अपना एक हाथ मेरी जांघ पर रखती हुई बोली - ”तुम्हारे किए हो सकता है।“

मैं खामोश रहा।

वह धीरे से उठकर खड़ी हो गई। उसने अपना गाउन उतार कर एक तरफ फैंक दिया। मैंने हड़बड़ा कर राकेश की तरफ देखा। वो खामोशी से बैठा हुआ सिगरेट फूंक रहा था।

”देखो“ - रोजी बोली - मैं प्रकाश के कमरे में गई थी, इसकी खबर सिर्फ तुम्हें है, इस बाबत अगर तुम खामोशी अख्तियार कर लो तो पुलिस को हरगिज-हरगिज भी ये पता नहीं चलेगा की मैं मौका-ए-वारदात पर गई थी।‘‘

”मैं ऐसा क्यों करूँगा?“

”मेरी खातिर, अपनी रोजी की खातिर, देखना कितनी ऐश कराती है ममा तुम्हे।“

मैं हकबकाया! कैसी हर्राफा थी वो, अभी यार की चिता भी नहीं जली थी और वो मुझे अपनी जवानी के हिंडोले पर झूला झुलाने की तैयारी कर रही थी।

‘‘तुमने कभी जन्नत की सैर की है?‘‘ वो बोली।

‘‘नहीं।‘‘

‘‘मैं कराऊंगी, बस इस कहानी को यहीं खत्म कर दो।‘‘

कहकर उसने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर बड़े ही मादक अंदाज में अंगड़ाई ली।

मुझे अपना गला सूखता सा प्रतीत हुआ।

”मैं कैसी लग रही हूँ?“

‘‘एक नम्बर की छिनाल।“

तत्काल उसके चेहरे पर हाहाकारी भाव आये। मुझे लगा वो मुझपर झपटने वाली है। मगर ऐसा नहीं हुआ। वहीं खड़ी वो अपनी मुट्ठियां खोलती बंद करती रही। इस दौरान उसके चेहरे पर एक के बाद दूसरे भाव आये और चले गये।

मैंने एक सिगरेट सुलगा लिया।

‘‘आराम से बैठ जाओ बहन-जी, और यकीन जानों बिना जुबान खोले तुम्हारी खलासी नहीं होने वाली।‘‘

जवाब मैं वह कुछ कहते-कहते चुप हो गयी। उसने एक नजर राकेश पर डाली मगर उधर से कोई प्रोत्साहन मिलता ना पाकर धम्म से सोफे पर बैठ गयी।

‘‘क्या जानने चाहते हो?“

”सबसे पहले तो तुम हवेली में घटित एक महीने पुरानी घटना का खुलासा करो। तुमने जूही के डैडी पर चाकू से हमला करने का अभिनय क्यों किया, जूही द्वारा गोली चलाये जाने के बावजूद तुम जिन्दा कैसे बच गई और फिर प्रकाश ने तुम्हे कब्र में दफनाने का अभिनय क्यों किया?“

”देखो मैंने जो भी किया - प्रकाश के कहने पर किया, अपने प्यार के हाथों मजबूर होकर किया। इसलिए किया क्योंकि मैं प्रकाश की सलामती के प्रति फिक्रमंद थी।“

”यानी की जूही के हाथों कत्ल होने का अभिनय करने के लिए तुम्हें प्रकाश ने कहा था।“

”हाँ।“

”क्यों?“

‘‘मैं सिर्फ इतना जानती हूं कि कोई लाल हवेली खरीदना चाहता था, और प्रकाश उसकी मदद कर रहा था।‘‘

‘‘खरीददार कौन था?‘‘

”मैं नही जानती प्रकाश ने मुझे इस बारे में कभी कुछ नहीं बताया।“

”लेकिन तुम्हारे कत्ल की नौटंकी से हवेली कैसे बिक सकती थी?“

”क्योंकि वो जो कोई भी था, जूही के डैडी को ब्लैकमेल करके उनसे लाल हवेली का सौदा करना चाहता था। जिस वक्त जूही ने मुझ पर फायर किया उस वक्त की कुछ तस्वीरें ले ली गई थीं। उन्हीं तस्वीरों को हथियार बनाकर मानसिंह को ब्लैकमेल करने का प्लान था। मगर इससे पहले कि वो ऐसा कुछ कर पाता मानसिंह की मौत हो गई और कहानी खत्म।“

”बाद में उसने वैसी ही कोई कोशिश जूही पर क्यों नहीं की?“

”की गई थी, ये काम दिलावर सिंह को सौंपा गया। मगर जूही किसी भी कीमत पर हवेली का सौदा करने को राजी नहीं हुई, जेल भिजवाने की धमकी का भी उसपर कोई असर नहीं हुआ। दिलावर सिंह के जरिए उसपर कई बार दबाव बनाने की कोशिश की गयी मगर कोई फायदा नहीं हुआ।“

”क्या मानसिंह की मौत में दिलावर का हाथ हो सकता है?“

‘‘ईडिएट वो महज एक दुर्घटना थी, दूसरी बात अगर ऐसा नहीं भी था तो दिलावर को उसकी मौत से कुछ भी हॉसिल नहीं था, उल्टा अगर वे कुछ दिन और जिन्दा रह जाते तो दिलावर उन्हे हवेली बेचने का मजबूर कर सकता था, और हवेली के असली खरीदार से उसे मोटी रकम हासिल हो सकती थी।“

”वो खलीफा जो कोई भी है, वो हवेली क्यों खरीदना चाहता है?“

”मुझे नहीं मालूम।“

”प्रकाश के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है?“

”क्या मतलब?“

”उसका कत्ल क्यों हुआ?“

”अब मैं क्या कह सकती हूँ?“

”कोई अंदाज तो लगा ही सकती हो।“

फौरन उसने इंकार में सिर हिलाया।

”क्या उसका कत्ल दिलावर सिंह ने किया या करवाया हो सकता है?“

”मैं इस बारे में कुछ भी नहीं कह सकती।“

”फिर किस बारे में कहोगी?“

वो खामोश रही।

”तुम लाल हवेली क्यों गई थी?“

”प्रकाश के बुलावे पर।“

”अक्सर जाती हो।“

”नहीं, मानसिंह की मौत के बाद ये मेरा दूसरा फेरा था।“

‘‘पहले फेरे में भूत बनकर जूही को डराने गयी थीं।‘‘

‘‘हां।‘‘

”आज क्यों गई थी?“

”कहा न प्रकाश के बुलाने पर।“ वो झल्ला उठी।

”मैंने सुना था, मेरी उसमें कोई दिलचस्पी नहीं, मैं ये जानना चाहता हूँ कि प्रकाश ने तुम्हें क्यों बुलाया था?“

”मुझे नहीं मालूम।“

”या फिर बताना नहीं चाहती।“

”देखो मुझे सचमुच नहीं मालूम की प्रकाश ने मुझे क्यों बुलाया था। मुझसे मुलाकात हो पाने से पहले ही वो कत्ल कर दिया गया। लिहाजा कारण जो भी था वो प्रकाश के साथ ही खत्म हो गया।“

”ऐसा तुम कहीं इसलिए तो नहीं कह रहीं क्योंकि तुम्हारी किसी भी बात को झूठा साबित करने के लिए प्रकाश अब जीवित नहीं है।“

”मैं सिर्फ और सिर्फ हकीकत बयान कर रही हूँ।“

”चलो मान लिया कि तुम सच कह रही हो, तुमसे मुलाकात होने से पहले ही प्रकाश का कत्ल हो चुका था, मगर जब तुम्हें मालूम था कि प्रकाश मर चुका है, तो फिर तुम दोबारा उसके कमरे में क्या करने गई थी?“

”वो .... वो.... मैं अपना पर्स भूल आई थी, जो कि मेरा रिश्ता प्रकाश के कत्ल से जोड़ सकता था, उस पर्स के सहारे पुलिस बड़ी आसानी से मुझ तक पहुंच जाती। वो पर्स लेने के लिए मैं दोबारा प्रकाश के कमरे में गई।“

”तुम झूठ बोल रही हो।“

”क.....क.....क्या?“ वह हकलाती हुई बोली - ”क्या कहना चाहते हो तुम?“

”यही कि प्रकाश के कमरे में दोबारा तुम इसलिए नहीं गई क्योंकि वहाँ तुम्हारा पर्स रह गया था बल्कि इसलिए गई क्योंकि तुम्हें वो चिट्ठी चाहिए थी जो अभी भी तुम्हारे गिरेबां में तुम्हारी अंगिया के भीतर मौजूद है।“

मेरी बात सुनकर वो हकबका सी गई। जबकि राकेश अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ, वो सधे कदमों से चलता हुआ रोजी के करीब पहुंचा।

”चटाख।“ - अपने दाहिने हाथ का एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसने रोजी के गाल पर रसीद कर दिया।

”हरामजादी“ - वो नफरत भरे स्वर में बोला - ‘‘तू मुझे डबल क्रास करना चाहती थी।“

रोजी के मुंह से बोल तक न फूटा।

”अगर तेरी इस हरकत की खबर दिलावर साहब को लग गई तो वह तुझे जिंदा दफन करवा देंगे।“

”तुम गलत समझ रहे हो, मेरा वैसा कोई इरादा नहीं था। अगर होता तो मैं यहां वापस लौटकर क्यों आती?“

”तो फिर यहां आते के साथ ही तूने ये क्यों कहा कि वह प्रोनोट तुझे नहीं मिला। वो प्रकाश के पास था ही नहीं, और अगर था तो कातिल उसे अपने साथ ले गया।“

”वो तो मैंने यूंही मजाक में कह दिया था, मेरा इरादा बाद में उसकी बाबत सबकुछ तुम्हें सच-सच बता देने का था।“

”ठीक है तू सही है, मैं ही बेवजह तुझ पर शक कर बैठा। अब ला वो प्रोनोट मुझे दे दे।“

कहते हुए राकेश ने अपना एक हाथ उसके आगे फैला दिया।

”नहीं“ -रोजी दो कदम पीछे हट गई - ”वो चिट्ठी मैं तुम्हें नहीं दूंगी।“

”क्यों?“

”मुझे तुम पर ऐतबार नहीं है।“

”अब हो जायेगा“ - कहते हुए राकेश ने रिवाल्वर निकालकर उस पर तान दिया - ‘‘अब क्या कहती है?“

”वो प्रोनोट मैं तुम्हें किसी भी कीमत पर नहीं दूँगी।“

”चाहे जान चली जाए।“

रोजी खामोश रही, उसने एक बार अपने सूख आये होठां पर जुबान फिराकर उन्हें तर किया फिर मदद मांगती निगाहों से मेरी तरफ देखा।

उसकी निगाहों का अनुसरण करता हुआ राकेश मेरी तरफ घूम गया।

”ओह तो जनाब जिन्दा हैं, अभी तक।“

”क्या मतलब?“ - मैं हड़बड़ाया।

”मतलब ये ......धांय।“ उसने गोली चला दी।

ठीक उसी वक्त रोजी ने उसे धक्का दे दिया। निशाना चूक गया। गोली मेरे सिर के काफी ऊपर से गुजर गई।

वह सम्भला, सम्भलकर उसने पुनः मुझे निशाना बनाना चाहा। मैंने तत्काल अपनी रिवाल्वर निकालकर राकेश की दिशा में फायर झोंक दिया। गोली उसकी खोपड़ी में जा घुसी। खोपड़ी के परखच्चे उड़ गये। रोजी दरवाजे की तरफ भागी, हड़बड़ाकर मैं उसके पीछे दौड़ा। तब तक वो दरवाजा पार कर चुकी थी। कमरे से निकलकर मैंने अपने आजू-बाजू निगाह दौड़ाई, वो मुझे सीढ़ियां उतरती दिखाई दी। मैं पूरी ताकत से उसकी दिशा में दौड़ पड़ा।

ग्रॉउंड फ्लोर पर पहुंच पाने से पहले ही मैंने उसे दबोच लिया।

”छोड़ो-छोड़ो“ - वो मेरी पकड़ में छटपटाती हुई बोली - ”मैं किसी को नहीं बताऊँगी की राकेश का कत्ल तुमने किया है। बदले में तुम्हें मेरी जानबख्शी करनी होगी।“

”नॉनसेंस मैंने आत्मरक्षा के लिए उस पर गोली चलाई थी, अगर मैं ऐसा नहीं करता तो वह मुझे जान से मार देता, वो सिर्फ सैल्फ डिफेंस था ना कि कत्ल।“

‘‘फिर तो मैं तुम्हारे लिए बहुत काम की साबित हो सकती हूँ, मैं तुम्हारे पकड़े जाने पर एक चश्मदीद गवाह की हैसियत से तुम्हारे हक में गवाही दे सकती हूँ, यू नो।“

”यस स्वीट हार्ट।“

”मेरे कत्ल से तुम्हे क्या हॉसिल होगा।“

”कुछ भी नहीं।“

”फिर तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो?“

”क्या बकती हो मैं ऐसा क्यों चाहूँगा?“

”तो फिर मुझे पकड़ने के लिए क्यों दौड़े थे?“

”तुम वहां से भागी ही क्यों?“

”मैंने सोचा“ - वो बड़े ही मासूम अंदाज में बोली - ”कि राकेश का कत्ल करने के बाद तुम मेरा भी कत्ल कर दोगे, क्योंकि मैंने तुम्हें उसका कत्ल करते देख लिया था। बस यही सोचकर मैं वहाँ से भाग खड़ी हुई।“

”वो फ्लैट किसका था?“

”मालूम नहीं, वैसे राकेश कहता है कि वो उसके किसी फ्रैंड का है जो कि इन दिनों कहीं बाहर गया हुआ है। जाने से पहले वो देखभाल के लिए फ्लैट की चाभी राकेश को सौंप गया था।“

”यानी की तुम यहां नहीं रहती हो।“

”नहीं।“

”तो फिर कहाँ रहती हो?“

”आर्य नगर में।“

”अब वहीं जाओगी।“

‘‘हाँ।‘‘

”अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हारे साथ वहां तक चल सकता हूं।“

”थैंक्यू“ - वो बोली - ”तुम अच्छे आदमी लगते हो। इसलिए मैं जो कुछ भी जानती हूं तुम्हें बता देना चाहती हूं।‘‘

बाहर आकर हम दोनों एक साइकिल रिक्शा पर सवार हो गये।

पूरे रास्ते वो मुझसे सटी सिमटी-सी बैठी रही। और यदा-कदा रिक्शे वाले को तेज चलने के लिए हाँक लगा देती थी।

तकरीबन बीस मिनट पश्चात। हम आर्य नगर पहुंचे। रिक्शे वाले को उसने तीस रूपये देकर सड़क से ही वापस लौटा दिया।

तत्पश्चात वो मुझे एक दो मंजिला मकान के सामने ले गई।

”तुम यहां रहती हो।“

”हाँ।“ - वो दरवाजा खोलती हुई बोली - ”ये हमारा लव-नेस्ट था। मैंने और प्रकाश ने बहुत सारी रातें यहां इकट्ठे बिताई हैं, आओ।“

दरवाजा बंद करके वो मेरी तरफ घूमी।

”तुम बैठो“ - वो बोली - ”मैं कॉफी बना कर लाती हूँ।“

मैंने सहमती में सिर हिला दिया। वो सामने की तरफ एक दरवाजे के पीछे जाकर मेरी नजरों से ओझल हो गई।

मैं फौरन दरवाजे के पास पहुंचा। मैंने सावधानी पूर्वक दरवाजा खोलकर भीतर झांका, वह एक लम्बा-चौड़ा कमरा था जो कि इस वक्त खाली पड़ा था, दाई तरफ एक और दरवाजा नजर आया, मैंने उसे खोलकर देखा, मगर आश्चर्य रोजी वहां भी नहीं थी।

अभी मैं वापस जाने की लगा था कि मुझे रोजी की आवाज सुनाई दी।

”हल्लो, मैं यहां हूँ।“

मैं आवाज की दिशा में पलट गया।

सामने रोजी खड़ी थी, अब तो मेरी हालत रंगे हाथों पकड़े जाने जैसी होकर रह गई।

”किसे तलाश रहे हो?“

”तु...तुम्हें..... और भला कौन है यहाँ?“

”कोई खास वजह थी।“

‘‘माचिस‘‘

”माचिस।“ - वो तनिक चौंकी।

”सिगरेट सुलगाना है मेरा लाइटर काम नहीं कर रहा।“

‘‘अभी लाई।‘‘

उसने एक माचिस लाकर मेरी हथेली पर रख दिया।

एक सिगरेट सुलगाने के पश्चात् मैंने माचिस उसे वापस लौटा दिया, वो माचिस लेकर अंदर चली गई, मैं वापस बैठक में आ गया।

थोड़ी देर बाद वो कॉफी की ट्रे हाथ में पकड़े हुए ड्राइंग रूम में दाखिल हुई। कपों को सेंट्रल टेबल पर रखने के पश्चात् वो एक स्टूल पर बैठ गई।

‘‘क्या है उस चिट्ठी में जिसके लिए राकेश इतनी बुरी तरह पेश आया था तुम्हारे साथ?“

‘‘लो तुम खुद देख लो।‘‘

कहकर उसने अपनी अंगिया से वो चिट्ठी निकालकर मेरे हवाले कर दी। मगर वो कोई चिट्ठी नहीं थी, एक स्टॉम्प पेपर था। जिसके एक कोने में जूही के सिग्नेचर मौजूद थे, कागज पर दो लोगों के हस्ताक्षर और थे जिनमें से एक किसी वकील के थे और दूसरा खुद प्रकाश का था। दोनों व्यक्तियों ने अपने सिग्नेचर के आगे अपना पूरा नाम और पता लिखा था। मैंने चिट्ठी पढ़ना शुरू किया। इबारत कुछ यूं थी।
 
”मैं कु. जूही सिंह पुत्री स्व. श्री मानसिंह अपनी मर्जी से अपने पूरे होशोहवास में अपनी निजी मिल्कियत लाल हवेली को पचास लाख रुपयों में श्री दिलावर सिंह पुत्र स्व. श्री बछेड़ू सिंह को बेच दिया है। अब इस हवेली पर मेरा कोई अधिकार शेष नहीं बचा है।

मैं यह घोषणा करती हूं कि उक्त हवेली सिर्फ और सिर्फ मेरी मिल्कियत है, जिसे बेचने का पूरा अधिकार मेरे पास है। मैं अपनी सुविधा अनुसार अगले छह महीनों में कभी भी यह हवेली खाली कर दूंगी।

अगर छह महीने में मैं हवेली खाली नहीं करती हूं तो खरीददार श्री दिलावर सिंह को मेरे खिलाफ किसी भी तरह की कानूनी कार्रवाई का पूरा अधिकार होगा।

कुमारी जूही सिंह।“

नीचे उसके सिग्नेचर थे।

पढ़कर मैं सन्नाटे में आ गया, मेरी खोपड़ी भिन्ना सी गई।

”क्या सचमुच ऐसा कोई सौदा हुआ था?“ मैं रोजी को अपलक घूरता हुआ बोला।

”नहीं“ - वो इंकार में सिर हिलाती हुई बोली - ”सवाल ही नहीं उठता।“

”जूही के हस्ताक्षर जाली हैं।“

”नहीं।“

”वो तैयार कैसे हुई ऐसी किसी तहरीर पर हस्ताक्षर करने के लिए?“

”जब जूही ने सिग्नेचर किए थे तब ये स्टॉम्प पेपर कोरा था, सौदे की बाबत टाइपिंग बाद में की गई, तब की गई, जबकि जूही इस पर सिग्नेचर कर चुकी थी।“

‘‘पर ऐसे किसी ब्लाइंड सिग्नेचर की नौबत ही क्यों कर आई?“

”प्रकाश ने करवाया था।“

”मैं समझा नहीं, अच्छा होगा अगर तुम कहानी को टी.वी. सीरियल की तरह किस्तों में बयान करने की बजाय एक ही बार में, किसी फिल्म की तरह बयान कर डालो।“

”ओके“ - वो पहली बार मुस्कराई - ”मैं तुम्हे पूरी फिल्म दिखाती हूँ। एक ही बार में दिखाती हूँ। सुनो छह या सात रोज पहले एक सुबह प्रकाश इस कोरे स्टॉम्प पेपर को हाथ में लिए जूही के पास गया और उससे इसपर साइन करने को कहा।“

”तब क्या जूही ने उससे ये सवाल नहीं किया होगा कि वो ब्लैंक स्टॉम्प पेपर पर उसके दस्तखत क्यों करवाना चाहता है?“

”किया था मगर तब प्रकाश यह कहकर बात टाल गया कि ”घबराओ मत मैं तुम्हारी प्रापर्टी नहीं हड़पूंगा।“ जवाब में जूही भी हंस पड़ी और फिर उसी हंसी मजाक के माहौल में उसने दस्तखत कर दिये थे।‘‘

”मगर प्रकाश ने ऐसा क्यों किया?‘‘

”उसकी मजबूरी थी। दिलावर से लाल हवेली बिकवा देने की बात कहके दस लाख का कमीशन एडवांस लिया था, और कुछ ही दिनों में सारा पैसा जुए में हार गया था। उधर उसकी लाख कोशिशों के बाद भी जूही हवेली बेचने को तैयार नहीं हुई। तब दिलावर उससे अपने पैसों का तकादा करने लगा। मगर प्रकाश के पास होते तब तो देता। तब उसने प्रकाश को यह स्टॉम्प पेपर लाकर दिया और कहा कि अगर वो इसपर जूही के हस्ताक्षर कराकर दे दे तो वह अपने पैसों का तकादा छोड़ देगा।“

‘‘मुझे नहीं लगता ऐसी कोई तहरीर कोर्ट में मान्य हो सकती है, वह भी तब जब तहरीर लिखने वाला उसे चैलेंज करने के लिए उपलब्ध हो। ऐसे में तो सालों साल मुकदमेंबाजी होती रहती और तब तक हवेली पर जूही का कब्जा बरकरार रहता।‘‘

‘‘हो सकता है दिलावर का इरादा उसकी हत्या करा देने का रहा हो। उसकी मौत के बाद जब वह हवेली पर कब्जा जमा लेता तो किसमें दम था कि वह दिलावर को बेदखल कर पाता।‘‘

‘‘दम तो है तुम्हारी बात में, लेकिन एक बात अभी भी समझ में नहीं आई कि दस लाख रूपये इतनी बड़ी रकम तो नहीं थी जो प्रकाश उसका इंतजाम नहीं कर पाता। वह अपने पिता से ले सकता था, जूही से उधार मांग सकता था।‘‘

‘‘उसके पिता ने बहुत पहले उसे घर से निकाल दिया था। तब भी वजह यही थी जुए की लत! मुम्बई में वह लाखों रूपये जुए में उड़ा चुका था और लाखों का कर्जदार हो चुका था। एक तो बिजनेस मैन का बेटा था ऊपर से उसके पिता की अच्छी साख थी इसलिये बड़ी आसानी से उसे उधार मिल जाता था, जो बात उन लोगों को नहीं मालूम थी वो ये थी कि श्यामसिंह का बिजनेस चरमराया हुआ था। उनकी माली हालत लगातार खराब होती जा रही थी।

मुसीबत तब हुई जब गैम्बलिंग का रैकेट चलाने वालों के रिकवरी एजेंट्स ने प्रकाश पर दबाव बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे उनका दबाव बढ़ता चला गया और एक वक्त वो भी आया जब उन लोगों ने प्रकाश को इतनी बुरी तरह मारा कि वह आठ दिन तक कोमा में रहा था। सारी बात जब उसके पिता को पता चली तो उन्होंने जैसे-तैसे रूपयों का-जो कि इंट्रेस्ट लगाकर एक करोड़ चालीस लाख हो चुका था-का इंतजाम कर प्रकाश का उन लोगों से पीछा छुड़वाया था। इस कोशिश में उन्हें अपना घर तक बेचना पड़ा था। सच पूछो तो उसने अपने पिता को सड़क पर पहुंचा दिया था। इसके बाद बड़ी मुश्किल से उन्होंने अपने डूबते बिजनेस को बचाया था।‘‘

‘‘और ऐसे लड़के से तुम प्यार करती थी?‘‘

‘‘गलत मैं एक ऐसे लड़के से प्यार करती थी जो हर वक्त नोट चमकाया करता था। और फिर मैं कौन सी दूध की धुली थी। जब उससे मेरी मुलाकात हुई तो मैं मुम्बई के एक बियर बार में डांस किया करती थी, और तब तक जाने कितने मर्दों का बिस्तर गरम कर चुकी थी। मुझमें उसे जाने क्या नजर आया कि देखते ही मुझपर फुल फिदा हो गया।‘‘

‘‘रोज बार खुलते ही आ बैठता और बंद होने से पहले हिलता तक ना था। मुझपर लाइन मारना उसका फुल टाइम जॉब बन गया। नहीं जानता था कि वह बेवजह मेहनत कर रहा था, वरना अपनी अंटी थोड़ी ढीली करता और मुझे पा लेता, मगर वो मुझे उस तरह पाने का तमन्नाई नहीं था। वो तो मुझपर हमेशा के लिए अपना क्लेम ठोक देना चाहता था।‘‘

‘‘किस्मत का खेल देखो कि उन्हीं दिनों महाराष्ट्र में बीयर बारों पर पाबंदी लगा दी गई। हजारों बार बालाओं की तरह मैं भी खड़े पैर बेरोजगार हो गयी। तब प्रकाश ने मेरे रहने खाने और ऐश का सारा इंतजाम करके दिया। मैंने भी उस दिन के बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसे ही अपना भगवान मान लिया, वो जो कहता गया मैं करती गई। मगर जब उसने अपनी बहन को धोखा देने की कोशिश की तो मुझे बर्दाश्त नहीं हुआ और मैंने उसकी जी भरकर लानत-मलानत की। नतीजा ये हुआ कि वह दिलावर के यहां से यह पेपर - जाने कैसे - मगर चुरा लाया।“

”सच पूछो तो उसकी मौत की वजह मैं ही थी। मैंने ही उसे दिलावर से मुखालफत के लिए उकसाया और यही बात उसकी मौत का कारण बन गयी। काश मैंने उसे ऐसा करने को नहीं कहा होता तो शायद वो जिन्दा बच जाता।“

कहती हुई वो सिसक उठी।

मैंने उसे चुप कराने की कोशिश नहीं की बल्कि खामोश रहकर उसके चुप होने का इंतजार करने लगा।

कुछ एक मिनट यूं ही गुजरे। वह शांत हुई। मैंने अपना रुमाल उसे दे दिया। वो आंसुओं से भीगा अपना चेहरा साफ करने के पश्चात रुमाल मुझे वापस लौटाती हुई बोली - ”थैंक्यू।“

जवाब में मैंने अपने सिर को हल्की सी जुम्बिस दी फिर उसकी आंखों में देखता हुआ बोला- ”तुम्हें क्या लगता है प्रकाश का कत्ल दिलावर सिंह ने किया है।“

‘‘और कौन करेगा?“

”क्या पता उसका कत्ल किसी और ने किया हो?“

”इम्पॉसिबल“ - वो निर्णायक स्वर में बोली - ”प्रकाश का कत्ल दिलावर सिंह का ही किया धरा है।“

”अगर ऐसा है तो फिर कत्ल करने वाले ने इस कागज को वहीं क्यों छोड़ दिया, क्यों नहीं वो इस प्रोनोट को अपने साथ ले गया?“

‘‘क्योंकि तभी मैं वहां पहुंच गई थी। मुझे यकीन है कि जब मैं वहां पहुंची थी तो कातिल अभी भीतर ही था। मैंने भीतर से उभरती आहट स्पष्ट सुनी थी। फिर जब मैं कमरे में दाखिल हुई तो मैंने पाया कि बॉलकनी का दरवाजा धीरे-धीरे बंद हो रहा था, यानि उसी पल कोई उसे खोलकर बाहर निकला था।‘‘

‘‘तुमने जानने की कोशिश नहीं की - वह कौन था।‘‘

‘‘नहीं क्योंकि तभी मेरी निगाह प्रकाश की लाश पर पड़ गई। मैंने बड़ी मुश्किल से खुद को चीखने से रोका। खुद पर काबू पाया और चुपचाप जैसे वहां पहुंची थी वैसे ही बाहर निकल गयी। फिर बाहर आकर मैंने राकेश को फोन किया और उसे प्रकाश के कत्ल की बाबत बता दिया।‘‘

‘‘फिर क्या हुआ?‘‘

‘‘दो मिनट बाद मेरे मोबाइल पर राकेश का फोन आया उसने मुझे इस स्टॉम्प पेपर के बारे में बताते हुए कहा कि मैं दोबारा प्रकाश के कमरे में जाऊं और इसे तलाशने की कोशिश करूं। सुनकर मैं हैरान रह गई, मुझे नहीं मालूम था कि प्रकाश इसे दिलावर से हांसिल करने में कामयाब हो गया था।‘‘

‘‘मगर राकेश का तुमपर क्या होल्ड था, तुम क्यों मजबूर थी उसकी बात मानने को?‘‘

‘‘इसकी दो वजह थी। पहला ये कि उसने मुझसे कोई रिक्वेस्ट नहीं की थी बल्कि बाकायदा धमकी दी थी कि अगर मैंने उसकी बात नहीं मानी तो मेरा अंजाम बुरा होगा। दूसरी कदरन ज्यादा अहम वजह ये थी कि अगर ये प्रेनोट प्रकाश ने हासिल कर लिया था तो मुझे हरगिज भी ये गवारा नहीं था कि ये दोबारा दिलावर सिंह के हाथ लगे।‘‘

‘‘मगर सवाल ये उठता है कि इतने अहम काम के लिए उन लोगों ने तुम्हें ही क्यों चुना?‘‘

‘‘शायद इसलिए क्योंकि उस वक्त मैं हवेली के एकदम करीब थी। उन्हें वहां पहुंचने में टाइम लग सकता था। उस दौरान किसी को प्रकाश के कत्ल की खबर लग सकती थी। ऐसे में अगर पुलिस उनसे पहले वहां पहुंच जाती तो उनका किया धरा बेकार हो जाता। दूसरी वजह ये रही हो सकती है कि वे लोग अपना नाम प्रकाश के कत्ल से जुड़ने देना नहीं चाहते होंगे। मैं अगर किसी तरह फंस भी जाती तो उन्हें कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला था।‘‘

‘‘तुम ठीक कह रही हो, दूसरी बात ही ज्यादा अहम लगती है।‘‘

‘‘तुम सचमुच प्रकाश के बुलावे पर ही वहां गई थीं।‘‘

‘‘हां उसी ने मुझे फोन करके वहां बुलाया था।‘‘

”किसलिए?“

”वह जूही को दिलावर सिंह द्वारा फैलाये जा रहे षड़यंत्र के बारे में बताना चाहता था। उसने आज जूही को सबकुछ बताने का फैसला किया था। यह भी कि मैं उसकी चलाई गई गोली से मरी नहीं थी बल्कि जिन्दा थी। मगर अफसोस कि ऐसा कुछ कर पाने से पहले ही उसकी हत्या कर दी गई।“

तभी जोर जोर से दरवाजा भड़भड़ाया जाने लगा।

”कौन?“ रोजी शंकित स्वर में बोली।

”पुलिस।“ - बड़ा ही अप्रत्याशित जवाब मिला।

हम दोनों उल्लूओं की तरह एक दूसरे की शक्ल देखने लगे।

”दरवाजा खोलो“ - रौबदार आवाज गूँजी - ” वरना हम इसे तोड़ देंगे।“

”तुम पिछले कमरे में चले जाओ“ -रोजी हड़बड़ाकर बोली - ”मैं दरवाजा खोलती हूँ। पता नहीं पुलिस यहाँ क्यों आई है? मुझे तुम्हारे साथ देखकर नाहक ही शक करेंगे।“

सहमति में सिर हिलाता मैं उठ खड़ा हुआ।

पिछले कमरे में पहुँचकर मैंने दरवाजे को थोड़ा सा खुला छोड़ दिया, और यूं बनी झिर्री से बाहर देखने लगा।

दरवाजे के करीब पहुँचकर रोजी ने जैसे ही दरवाजा खोला उसे एक तरफ धकेलते हुए दो पहलवानों जैसे डील-डौल वाले व्यक्ति भीतर घुस आये जो कि कहीं से भी मुझे पुलिसिये नहीं लगे उल्टा उनके हाव-भाव गुण्डे-बदमाशों जैसे थे।

उनके अगले एक्शन ने यह साबित भी कर दिया कि वो पुलिसवाले नहीं थे।

उनमें से एक ने पीछे घूमकर दरवाजे की सिटकनी चढ़ा दी। जबकि दूसरे ने रोजी के बाल पकड़े और उसे सोफे पर धकेल दिया।

”और कौन है तेरे साथ यहाँ?“

”कोई नहीं“ - मुझे रोजी की धीमी और भय से कांपती हुई आवाज सुनाई दी - ”मैं यहाँ अकेली ही रहती हूँ।“

”हमें पहचानती है।“

”नहीं।“

”मेरा नाम जमील है“ - उनमें से एक बोला - ”और यह सलाउद्दीन है! मैं बारूद हूँ और यह तोप है क्या समझी?“

”समझ गई प्रकाश ने बताया था तुम दोनों के बारे में। तुम दोनों दिलावर सिंह के शूटर हो।‘‘

‘‘बस!‘‘

‘‘नहीं उसने एक बात और बताई थी।“

‘‘क्या?‘‘

‘‘यही कि तुम दोनों को अपने बाप का नाम नहीं मालूम।‘‘

‘‘ठहर जा स्साली, हराम का जना बताती है हमको।‘‘ कहते हुए उसने एक जोर का थप्पड़ जड़ दिया रोजी के चेहरे पर। उसकी आंखें छलछला आईं मगर मुंह से उफ! तक ना निकलने दिया उसने।

‘‘मेरे पास तेरे लिए एक सवाल है‘‘ वो कहर भरे स्वर में बोला, ‘‘जो कि मैं दोबारा नहीं पूछूंगा - बता वो स्टॉम्प पेपर कहां है? जो तू प्रकाश के कमरे से उठाकर लाई थी।‘‘

‘‘मुझे वहां ऐसा कोई कागज नहीं मिला था।‘‘

”यानी कि तड़प रही है अपनी दुर्दशा करवाने को।“ इसबार दूसरा पहलवान बोला।

”मैं मरने से नहीं डरती, अगर मेरी मौत तुम्हारे हाथों ही लिखी है तो उसे कोई नहीं रोक सकता। वैसे भी प्रकाश की मौत के बाद मेरे भीतर से जीने की चाह खत्म हो चुकी है।“

”गलत, बिल्कुल गलत तेरी मौत मेरे हाथ नहीं बल्कि जमील के हाथ लिखी है, क्यों जमील?“

”तुझे कैसे मालूम?“ जमील बोला।

”मालूम तभी तो बोला, मैंने इसके गॉड का लाइफ एण्ड डाई रजिस्टर देखा था। उसमें लिखा था कि की रोजी को गोली जमील मारेगा ना कि सलाउद्दीन।“

कहकर वो जोर-जोर से हंस पड़ा।

”देख छोकरी बहुत सारे तरीके आते हैं हमें जुबान खुलवाने के, ऐसे तरीके जिनके बारे में तूने कभी कल्पना तक नहीं की होगी, इसलिए आखिरी मौका देता हूं जमील जो चाहता है उसे बता दे। बदले में हम तुझे जिन्दा और सही सलामत सीतापुर से निकल जाने देंगे?“ सलाउद्दीन कर्कश स्वर में बोला।

जवाब में रोजी ने कसकर अपने होंठ भीच लिए।
 
”जमील“ - सलाऊद्दीन चीखा - ”गोली मारकर घुटना तोड़ दे स्साली का।“ उसका इतना कहना था कि जमील ने रिवाल्वर की नाल रोजी के घुटने से सटा दिया, ट्रीगर पर धीरे-धीरे उसकी अंगुलियां कसने लगीं। रोजी ने अपनी आंखें बंद कर लीं। वक्त बहुत ही कम था, वह किसी भी क्षण रोजी को अपाहिज कर सकता था। जबकि रोजी तो मानो मौत को गले लगाने के लिए तैयार बैठी थी। उसका चेहरा चट्टान की तरह सख्त नजर आ रहा था। हालांकि यह इमोशंस दिखाने का वक्त नहीं था मगर यूं अपनी आंखों के सामने किसी खूबसूरत लड़की की दुर्दशा होते देखना बंदे को हरगिज भी बर्दाश्त नहीं था।

”अबे सोचता क्या है?“ - सलाउद्दीन बोला - ”गोली चला।“

तत्तकाल जमील की अंगुलियों में हरकत हुई, उस वक्त मेरे सामने रोजी की पीठ थी, उसके घुटने पर रिवाल्वर टिकाये जमील के सिर का बस ऊपरी हिस्सा मुझे नजर आ रहा था। मैंने बिना एक क्षण गंवाये जमील की नीचे झुकी खोपड़ी का निशाना लेकर गोली चला दी। अगर मेरा निशाना जरा सा भी चूक जाता तो वो गोली जमील की बजाय रोजी को ढेर कर जाती। शुक्र था खुदा का कि ऐसा नहीं हुआ।

जमील तत्काल फर्श पर ढेर हो गया। जमील का हश्र देखकर सलाउद्दीन के हौसले पस्त हो गये। उसने फौरन दरवाजा खोलकर बाहर छलांग लगा दी।

ठीक तभी रोजी अपनी जगह से उठी। उसने फर्श से जमील का रिवाल्वर उठाकर हाथ में लिया और खुले दरवाजे से बाहर निकल गई। मैं हड़बड़ाया, यह एक निहायती अहमकाना हरकत थी। सलाउद्दीन बाहर कहीं छुपा हो सकता है। या भागते हुए वह, पलटकर रोजी पर फायर झोंक सकता था। जबकि पता नहीं रोजी ने कभी रिवाल्वर चलाया भी था या नहीं!“

”रोजी“ - मैंने आवाज दी - ”कहाँ जा रही हो?“ उसने जवाब नहीं दिया।

”रोजी रूक जाओ।“

मैं लगभग चीख सा पड़ा। ठीक तभी ”धांय“ गोली चलने की आवाज! फिर रोजी की चीख तत्पश्चात दूसरा फायर! पुनः एक दर्दनाक चीख! और फिर सबकुछ एकदम शांत। मैं सावधानी बर्तता हुआ बाहर पहुँचा सामने ही दरवाजे से थोड़ा अलग हटकर रोजी की लाश पड़ी थी और उससे चंद कदमों की दूरी पर सलाऊद्दीन मरा पड़ा था।

मैं घुटनों के बल रोजी के करीब बैठ गया, अभी उसके शरीर में हरकत थी, वो जिन्दा थी।

”रोजी“ - मैंने उसे पुकारा - ”तुम मेरी आवाज सुन रही हो।“

जवाब में उसकी बंद पलकों में हल्का सा कम्पन हुआ और फिर उसने धीरे-धीरे आंखें खोल दी।

”रोजी तुम मेरी आवाज सुन रही हो।“

उसने पलकें झपकाकर हामी भरी।

‘‘तुमने ऐसा क्यों किया, क्यों जानबूझकर मौत को गले लगाया?‘‘

जवाब में उसके होंठ फड़फड़ाये। मुझे लगा वो कुछ कहना चाहती है मगर कह नहीं पा रही।

उसने दोबारा कोशिश की।

”मैं.......अब जीकर.....भी.....क्या.....करती?“ वह बहुत ही कठिनाई से बोल रही थी - ”किसके लिए जीती मेरा प्रकाश तो ..... पहले ........... ही ... मुझसे दूर जा चुका है..... अब मैं ..... जिन्दा रहकर .....भी क्या करती.....मैं जा रही.....हूँ अपने प्रकाश के .....और हां एक बात का.....।

उसने जोर से हिचकी ली उसका वाक्य अधूरा रह गया और गर्दन एक ओर को लुढ़क गई।

रोजी की मौत ने न जाने क्यों मुझे हिलाकर रख दिया। हालांकि उससे मेरी वाकफियत चंद घंटों की ही थी। मगर फिर भी मैं उस जैसी खूबसूरत-हुस्नोशान युवती की मौत पर दहल सा गया। भला ये भी कोई उम्र थी मौत को गले लगाने की। मैं पुनः उसके बेडरूम में जा घुसा, मोटे तौर पर वहां की तलाशी ली मगर कुछ हांसिल नहीं हुआ। कुछ हासिल होने की मुझे उम्मीद भी नहीं थी क्योंकि मुझे यकीन था कि रोजी ने जो कुछ भी बताया था वह सच था।

‘‘हिलना नहीं, वरना शूट कर दूंगा।‘‘ दरवाजे से बाहर निकलते मेरे कदम जहां के तहां ठिठक गये। एक रिवाल्वर की नाल मेरी पसलियों को टकोह रही थी। मेरे सामने सीओ महानायक सिंह राजपूत बावर्दी खड़ा था।

‘‘भीतर चलो।‘‘ उसने हुक्म दिया, ‘‘और खबरदार जो कोई बेजा हरकत की।‘‘

‘‘जनाब आपको गलतफहमी हुई....।‘‘

‘‘जुबान बंद रखो और अपने दोनों हाथ ऊपर उठा लो।‘‘

ठीक तभी किसी कैमरे की फ्लैश लाइट चमकी। हम दोनों की निगाह एक पल को उधर चली गयी।

‘‘ऐ कौन हो तुम?‘‘ वो फोटो खींचने वाले पर चीखा।

‘‘प्रेस रिपोर्टर हूं साहब! आपने तो कमाल कर दिया, कातिल को रंगे हाथों गिरफ्तार कर दिखाया।‘‘

सुनकर वो शायद खुश हो गया। दोबारा मुझे भीतर जाने को कहने की बजाय मुझे वहीं कवर किये हुए उसने महकमें को फोन लगाया। फिर उसने मुझे जबरन अपनी जीप में सवार कराया और इंतजार करने लगा।

दस मिनट बाद इंस्पेक्टर जसवंत सिंह अपने दल-बल के साथ वहां हाजिर हुआ। मुझे कुछ कहने का मौका दिए बगैर मेरे हाथों में हथकड़ियां डाल दी गयीं। मेरी रिवाल्वर पुलिस ने अपने अधिकार में कर ली। फिर मुझे कोतवाली ले जाया गया जहां मुझे हवालात में ठूंस दिया गया।

हालात अच्छे नहीं थे। पता नहीं मुझपर कौन-कौन सी धाराएं लगाई जाने वाली थीं। मैं कोतवाल जसवंत सिंह से कुछ उम्मीद कर सकता था मगर अपने अधिकारी के खिलाफ जाकर भला वो मेरी मदद क्यों करता।

मेरी वो रात हवालात में गुजरी। रात को मुझे कदरन अच्छा खाना दिया गया, जिसकी मुझे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। मेरा मोबाइल भी कम्बख्तों ने ले लिया था वरना कम से कम डॉली को अपनी गिरफ्तारी की खबर कर सकता था। मैंने कई बार अलग-अलग पुलिसयों के माध्यम से जसवंत सिंह को मैसेज भिजवाया कि मैं उससे बात करना चाहता था। मगर हर बार मुझे यही जवाब मिला कि साहब अभी बिजी थे।

इस दौरान मेरा सिगरेट भी खत्म हो चुका था। शुक्र था मेरा बटुआ कब्जाने का ख्याल उन लोगों को नहीं आया था। मैंने एक सिपाही को कीमत से सौ रूपये ज्यादा दिए तो उसने मुझे सिगरेट का पैकेट और माचिस लाकर दे दिया। मगर किसी भी कीमत पर कम्बख्त ना तो फोन करने के लिए अपना मोबाइल देने को तैयार हुआ ना ही मेरा मैसेज कहीं पहुंचाने को तैयार हुआ।

‘‘चलो साहब ने बुलाया है।‘‘ हवालात का दरवाजा खोलते हुए एक पुलिसिया बोला। मैंने घड़ी देखी, दोपहर के दो बजे थे। आगे अभी पता नहीं क्या होने वाला था। मुझे लेकर वह कोतवाली इंचार्ज के कमरे में पहुंचा। जहां इस्पेक्टर जसवंत सिंह, डॉली और जूही के अलावा, दो अन्य लोग भी मौजूद थे।

‘‘फिलहाल तुम्हे रिहा किया जा रहा है‘‘ - जसवंत सिंह बोला - ‘‘मगर पुलिस को इंफार्म किए बिना तुम शहर से बाहर नहीं जा सकते और फरदर इंवेस्टिगेशन के लिए हर वक्त अवेलेबल रहना है।‘‘

मैंने सिर हिलाकर हामी भरी।

तत्पश्चात हम सभी बाहर निकले। मालूम हुआ जो दो अजनबी लोग हमारे साथ थे, उनमें से एक सत्तारूढ़ पार्टी का एमएलए था और दूसरा वार्ड कमीश्नर था। मैंने दोनों महानुभावों का तहेदिल से शुक्रिया अदा किया।

‘‘ठीक है बेटा हम चलते हैं‘‘ - एमएलए जूही से मुखतिब था, ‘‘कभी भी कैसी भी जरूरत हो निःसंकोच फोन करना। तुम्हारे पिता के लिए हम सभी के दिलों में बहुत इज्जत है। ऊपर से वे हमारे भाई जैसे दोस्त थे, तुम्हारे किसी काम आये तो सोचेंगे दोस्ती का फर्ज अदा किया। मुझे प्रकाश के बारे में भी पता चला, सुनकर बहुत दुख हुआ। इत्मिनान रखो कातिल को उसके किये की सजा जरूर मिलेगी। भगवान दोनों की आत्मा को शांति दें।‘‘ कहकर वो और वार्ड कमीश्नर एक ही कार में सवार हो गये।

फिर मैं डॉली के साथ इम्पाला में आगे बैठ गया और जूही पीछे सवार हो गई।

‘‘खबर कैसे लगी‘‘

‘‘किस बात की? प्रकाश के कत्ल की या तुम्हारी गिरफ्तारी की।‘‘

‘‘दोनों की बता।‘‘

‘‘वो क्या है कि कल जब दिन भर की माथा-पच्ची के बाद शाम को मैं हवेली पहुंची तो वहां पुलिस अपना डेरा डाले हुए थी। पता चला प्रकाश का कत्ल हो गया था। सुनकर जब मैंने तुम दोनों को तलाशने की कोशिश की तो कुछ पता नहीं चला। तब मैंने तुम्हारा मोबाइल ट्राई किया, एक-दो बार उस बेल गई फिर स्विच ऑफ बताने लगा। जूही को फोन किया तो पता चला यह हॉस्पीटल में थी। मैं चुपचाप हवेली से खिसक कर हॉस्पिटल पहुंची। मैंने इससे तुम्हारे बारे में पूछा तो ये सिर्फ इतना ही बता सकी कि तुम इंवेस्टीगेशन पर थे।‘‘

‘‘मैंने इसे बताया कि प्रकाश के साथ क्या हो गया था तो ये हवेली जाने की जिद करने लगी। तब इसे डिस्चार्ज कराकर हम हवेली पहुंचे। तुम्हारे बारे में सोच सोच कर मेरा दम निकले जा रहा था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि तुम्हें कहां तलाश करूं। उधर ये रो रोकर जान देने पर उतारू थी। मैंने जैसे तैसे इसे सम्भाला और सुबह होने का इंतजार करने लगी।‘‘

‘‘आज सुबह मुझे कोतवाल को फोन करने का ख्याल आया। मेरे पास उसका नम्बर नहीं था। तब मैंने गूगल पर कोतवाली का नम्बर सर्च करके उससे बात की तो पता चला तुम हवालात में अपनी खातिरदारी करवा रहे थे। ये बात जब मैंने जूही को बतायी तो इसी ने तुम्हे वहां से छुड़ाने का इंतजाम किया, वरना मैं तो किसी को जानती नहीं थी।‘‘

‘‘ओह बहरहाल तुम दोनों का शुक्रिया।‘‘

‘‘हमने तुम्हारा शुक्रिया कबूल किया।‘‘

कहकर वो खामोश हो गयी।

मैंने एक सिगरेट सुलगा लिया और धीरे-धीरे कश लेने लगा, ‘‘कल जो तूने इस केस पर भाग दौड़ की उसका क्या रहा?‘‘

‘‘कुछ खास नहीं।‘‘

‘‘तू भूल रही है कि बॉस मैं हूं, तेरा काम सिर्फ रिपोर्टिंग करना है, नतीजे निकालना नहीं।‘‘

‘‘यस बॉस।‘‘

‘‘हां ये टोन कुछ ठीक है। अब बता कल क्या क्या किया?‘‘

उसने बताया, सबकुछ बताया, वो भी बताया कम्बख्त ने जिसे बताने की कोई जरूरत नहीं थी। जैसे कि - उसने अपने नाखून काटे, नेलपॉलिश लगाई, और एक खास बात और कि उसने दो बार लिपस्टिक लगाई थी।

बस कंघी करने के बारे में बताने ही लगी थी कि हम हवेली के गेट पर जा पहुंचे और उसे खामोश हो जाना पड़ा।

हवेली पहुंचकर मैंने नित्यकर्मों से फारिग होने के बाद हैवी डोज नाश्ता लिया फिर कार लेकर बाहर निकल गया। कुछ बातें मेरे दिमाग में घुमड़ रही थीं जिनका फौरी जवाब तलाशने का एक रास्ता मुझे दिखाई दे रहा था। इस वक्त मैं वहीं जा रहा था।

एक घंटे बाद मैं वहां ‘नई सुबह‘ अखबार के लोकल दफ्तर पहुंचा। उस वक्त वहां कुल मिलाकर पांच लोगों का स्टॉफ था। मैंने उन्हें अपना परिचय दिया, और आने का मंतब्य बताया तो पता चला वे सभी मेरे नाम से वाकिफ थे। उनमें से एक मेरा विजटिंग कार्ड लेकर सामने के केबिन में घुस गया, फिर तुरंत बाद बाहर निकलकर मुझे भीतर भेज दिया।

भीतर पहुंचते ही मैं थमककर खड़ा हो गया। यह वही युवक था जिसने कल रोजी का पीछा करते वक्त मुझे अपनी बाइक पर लिफ्ट दी थी और बाद में फेवीक्विक के जोड़ की तरह मुझसे चिपक कर रह गया था। जाहिर था उसे ‘मियां बीवी और वो‘ के बखेड़े वाली कोई स्टोरी मिलने की उम्मीद थी।

मुझे देखकर वो हकबकाया, ‘‘तुम!‘‘

‘‘जी साक्षात!‘‘

‘‘तो तुम प्राइवेट डिटेक्टिव हो।‘‘ वो मेरे विजटिंग कार्ड पर निगाह जमाये बोला, ‘‘राज शर्मा नाम है तुम्हारा।‘‘

‘‘जी जनाब।‘‘

‘‘प्लीज हैव ए सीट।‘‘

मैं उसके सामने विजिटर चेयर पर बैठ गया।

दस सेकेंड के भीतर पानी का गिलास और अगले मिनट चाय हाजिर हो गयी। जिस युवक के सामने इस वक्त मैं कुर्सी पर बैठा था पता चला वह वहां का ब्यूरो चीफ था, उसका नाम सुशांत तिवारी था। वो बेहद खुशमिजाज इंसान साबित हुआ।

‘‘कल तो यार तुमने अपनी बीवी के यार को जान से ही मार दिया। मुझे मालूम होता तो मैं हरगिज भी वहां से नहीं हिलता।‘‘ कहकर वो हंस पड़ा।

‘‘वैसे जनाब भागे क्यों थे आप वहां से?‘‘

‘‘फोन पर खबर मिली थी कि लाल हवेली में कोई कत्ल हो गया था। वो खास न्यूज थी इसलिए मुझे तुम्हारा पीछा छोड़ना पड़ा। फिर मुझे क्या पता था तुम वहां कोई कत्ल करने वाले हो वरना मैं हिलता ही नहीं वहां से।‘‘

‘‘आपके सामने वो वाकया होता तो क्या आप रोकने की कोशिश करते मुझे?‘‘

‘‘नहीं भई, मैं न्यूज हाउंड हूं। मेरा पेशा खबरें परोसना है, खबरें बनने से रोकना नहीं। तुम अपना काम कर चुके होते तो मैं जनता को बताता कि कितनी निर्ममता से तुमने अपनी बीवी के आशिक को उस वक्त गोली मार दी जब वह तनहा कमरे में तुम्हारी बीवी के साथ उसकी मर्जी से गुलछर्रे उड़ा रहा था।‘‘

इस बार हम दोनों एक साथ हंसे।

‘‘लगता है पुलिस को खबर नहीं लगी अभी तक तुम्हारी।‘‘

‘‘आप बतायेंगे।‘‘

‘‘क्यों भई मैं क्या पुलिस की नौकरी करता हूं?‘‘

‘‘नहीं‘‘

‘‘सो देयर।‘‘

‘‘वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि मैंने उसे सेल्फ डीफेंस में गोली मारी थी।‘‘

‘‘ओह फारगेट इट यार!‘‘ वो लापरवाही से बोला, ‘‘स्साला एक नम्बर का मवाली था। दिलावर के लिए काम करता था। अच्छा हुआ धरती का बोझ कुछ हलका हुआ।‘‘

मैंने हैरान निगाहों से उसकी तरफ देखा।

‘‘हां तो राज साहब बताइए क्या सेवा कर सकता हूं आपकी?‘‘ इस बार वो पूरी गम्भीरता से बोला।

‘‘जनाब ठीक-ठीक कुछ कह पाना तो मुहाल है मेरे लिए कि मैं क्या जानना चाहता हूं। फिर भी कोशिश करता हूं अपनी बात आपके सामने रखने की।‘‘

‘‘जरूर मैं सुन रहा हूं।‘‘

‘‘देखिए मुझे पता चला है कि मानसिंह की मौत से एक रोज पहले उनकी किले जैसी हवेली की बाउंडरी वॉल से कोई वाहन टकराया था जिससे उस तरफ की दीवार ढह गयी थी।‘‘

‘‘आपकी जानकारी दुरूस्त है जनाब, वो दस पहियों वाला ट्रक था जिसे शायद ट्रेलर कहते हैं। बाउंड्री टोड़ता हुआ वो आधा से ज्यादा हवेली के भीतर जा घुसा था।‘‘

‘‘क्या ड्राइवर नशे में था?‘‘

‘‘नहीं, वहां सभी को लगभग यकीन था कि वो जरूर किसी नशे में था मगर जांच में पता चला कि ऐसी कोई बात नहीं थी।‘‘

‘‘नया ड्राइवर था?‘‘

‘‘नहीं, दस सालों से लांग रूट की गाड़ी चला रहा था कभी कोई एक्सीडेंट उसके खाते में दर्ज नहीं था।‘‘

‘‘ये बात आपको कुछ अजीब नहीं लगती, कि एक मंझे हुए ड्राइवर से ऐसी गलती हुई वो भी एकदम खुली जगह में, और फिर लाख रूपये का सवाल ये कि वह हवेली की तरफ गया ही क्यों था, उधर से तो कोई आम रास्ता नहीं निकलता।‘‘
 
‘‘यू हैव ए प्वाइंट राज, हमने भी उससे यही सवाल किया था। जवाब में जानते हो उसने क्या कहा। वो बोला कि उसकी बीवी बच्चा जनने वाली थी इसलिए वो मानसिंह से आशीर्वाद लेने हवेली ही जा रहा था कि अचानक उसकी आंख में कुछ पड़ गया। वह आंखें मिचमिचा ही रहा था कि जाने कैसे स्टैरिंग बाईं ओर को मुड़ गई और ट्रक हवेली की दीवार तोड़ता भीतर घुस गया। उसकी बीवी के बच्चा होने वाला था यह बात सच थी। हमने जच्चा-बच्चा केंद्र में पूछताछ करवाई थी।‘‘

‘‘ठीक है अब जरा अगले रोज हुए उसके कत्ल पर रोशनी डालिए प्लीज, ऐसा क्योंकर हुआ कि एक मामूली ट्रक ड्राइवर अचानक ही दो बार सुर्खियों में आ गया।‘‘

‘‘देखो उसके कत्ल की बाबत हमारा बल्कि पुलिस का यह वर्शन है कि वह महज राहजनी की वारदात थी, उसे लूटने की कोशिश की गई, वह नहीं माना तो उसे गोली मार दी गयी।‘‘

‘‘गोली उसके जिस्म पर कहां लगी थी?‘‘

‘‘माथे पर ऐन दोनों भौंहों के बीच जहां सुहागनें बिन्दी लगाती हैं। उसे प्वाइंट ब्लैंक रेंज से शूट किया गया था। उसकी बॉडी आधा ट्रक से बाहर और आधा भीतर लटकी पाई गयी थी।‘‘

‘‘ओह उसके संदर्भ में कोई और खास बात जो आप बताना चाहें।‘‘

‘‘हां है, एक बहुत ही अहम बात है, जो सभी को खटकी थी मगर जवाब किसी के पास नहीं था। उसकी मौत से एक दिन पहले उसके सेविंग एकाउंट में एकमुश्त एक लाख रूपये जमा हुए थे। वो रूपये उसके पास कहां से आये किसी को खबर नहीं, उसके बीवी बच्चों को भी नहीं। ये बात किसी को पता नहीं चलती अगरचे की बैंक मैनेजर ने अखबार में उसके कत्ल की खबर पढ़कर पुलिस को इसकी जानकारी ना दी होती।‘‘

‘‘एक लाख रूपये इतनी बड़ी रकम तो ...।‘‘

‘‘उसके लिए थी, उसके परिवार में बारह लोग थे। सब उसी पर डिपेंड थे। बैंक में उसने आजीवन कभी एकमुश्त पांच हजार रूपये से ज्यादा नहीं जमा कराया था। लिहाजा एक लाख की रकम उसके लिए बहुत बड़ी बात थी।‘‘

‘‘मेरा ख्याल है एक लाख पर आपका जोर किसी और वजह से भी है।‘‘

‘‘हां, मेरा अपना अंदाजा ये कहता है कि उसने ये एक लाख किसी को धोखा देकर कमाये थे जिसने बाद में उसका कत्ल कर दिया। या फिर किसी को मालूम था कि उसके पास एक लाख की नकदी थी और गाड़ी पर जाते वक्त वह उसे साथ लेकर जाने वाला था, और उसी ने मौका देखकर उसका काम तमाम कर दिया।‘‘

‘‘जनाब एक और वजह भी हो सकती है, इजाजत हो तो बयान करूं?‘‘

‘‘हां प्लीज गो अहैड।‘‘

‘‘वो एक लाख उजरत थी हवेली की दीवार में टक्कर मारने की।‘‘

‘‘हे भगवान! कितनी फसादी बात कह रहे हो यार।‘‘

‘‘क्या ऐसा नहीं हो सकता?‘‘

‘‘देखो दोस्त होने को तो इस दुनियां में कुछ भी हो सकता है और यह बात हम अखबार वालों से बेहतर कौन समझ सकता है। मगर मोटिव क्या था, दीवार में टक्कर मारने का कोई उसे एक लाख क्यों....ओह गॉड, ओह माई गुड गॉड‘‘-वह बेध्यानी में कुर्सी से उछलकर उठ खड़ा हुआ, ‘‘मोटिव था, बहुत बड़ा मोटिव था। हवेली में मुख्य द्वार से गुजरे बिना छत पर पहुंचने का रास्ता बनाना। मैंने टूटी दीवार देखी थी, वहां पत्थरों का यूं ढेर लग गया था कि उनपर चढ़कर बड़े आराम से पहली मंजिल की बॉलकनी में फिर वहां से सीढ़ियों के रास्ते छत पर पहुंचा जा सकता था। मगर इसका मतलब तो ये हुआ कि मानसिंह जी की हत्या हुई थी।‘‘

‘‘यस सर! असल वजह ये थी दीवार तोड़ने की, अगर आप मेरी इस थ्यौरी पर यकीन करें तो ड्रायवर का कत्ल क्यों हुआ आप समझ सकते हैं।‘‘

‘‘एक्जेटली! उसका मुंह बंद करने के लिए!‘‘ - कहकर वह तनिक रूका फिर बोला - ‘‘भाई कमाल के आदमी हो तुम! एक झटके में तुमने मुझे यकीन दिला दिया कि मानसिंह किसी हादसे का शिकार नहीं हुए थे बल्कि उनका सुनियोजित ढंग से कत्ल किया गया था।‘‘

‘‘जनाब अगर सम्भव हो तो अपने अखबार के माध्यम से आप इस बात को बस इतनी हवा दें कि बात कातिल के कानों तक पहुंचे बिना ना रहे।‘‘

‘‘भई अखबार में छापना मतलब ढिंढोरा पीटने जैसा होगा। मुझपर इसकी जवाबदारी आयद होगी, पूरा शहर हिल जायेगा। खासतौर से पुलिस डिपार्टमेंट तो पगलाये सांड की तरह मेरी ओर झपटेगा। खैर वो मेरा डिपार्टमेंट है मैं संभाल लूंगा किसी तरह। मगर तुम इससे क्या हांसिल होने की उम्मीद कर रहे हो।‘‘

‘‘देखो कातिल पहले से ही बौखलाया हुआ है। पहले मानसिंह, फिर नरेश नाम का दिलावर सिंह का प्यादा, फिर प्रकाश, फिर राकेश, फिर दिलावर सिंह के शूटर जमील और सलाउद्दीन, उसके बाद रोजी! पूरी सात जानें जा चुकी हैं इस सिलसिले में। अब अगर अखबार में यह खबर छप गई तो उसे लगने लगेगा कि धीरे-धीरे उसका भेद खुल रहा है, उसकी सारी योजना चौपट हो रही है। ऐसे में वह कोई ना कोई ऐसा कदम जरूर उठाएगा जो उसे जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा देगा।‘‘

‘‘जरा ठहरो तुमने अभी एक नाम लिया रोजी! उस लड़की के कत्ल से लाल हवेली का क्या रिश्ता?‘‘

मैं बेवजह मुस्कराया।

‘‘देखो यार अगर कुछ जानते हो तो बता दो प्लीज। क्योंकि पुलिस इस एंगल से नहीं सोच रही और हमारे पास भी कोई लीड नहीं है, जो प्रकाश और रोजी के कत्ल को आपस में लिंकअप कर सकें। अगर ऐसा कुछ है तो देखना कल के एडीशन से आग लगा दूंगा मैं।‘‘

‘‘वह प्रकाश की गर्लफ्रेंड थी। मुम्बई की रहने वाली थी और एक महीने पहले ही वो प्रकाश के बुलावे पर यहां पहुंची थी। दिलावर के शूटर उसे जान से मार देने पर उतारू थे। मगर अचानक हालात कुछ यूं बदले कि उसने जमील की रिवाल्वर से सलाउद्दीन को शूट कर दिया और सलाउद्दीन के रिवाल्वर से निकली गोली रोजी का काम तमाम कर गई। दोनों ने लगभग एक वक्त पर गोली चलाई थी।‘‘

‘‘तुम तो यार बहुत कुछ जानते हो - अच्छा जमील को किसने मारा, इसका जवाब अगर दे दो तो गुरू मान लूंगा तुम्हें और ये आप-आप कहना बंद करो यार!‘‘

‘‘ठीक है बताता हूं, पहले वादा करो कि ये बात अखबार में नहीं छपेगी।‘‘

‘‘डरते हो?‘‘

‘‘आप! सॉरी-तुम भूल रहे हो मैं जिस धंधे में हूं उसमें डरकर काम नहीं किया जा सकता।‘‘

‘‘ओके किया वादा, अब बताओ, जमील को किसने मारा?‘‘

‘‘मैंने।‘‘

‘‘फट्टा है।‘‘

‘‘मैं सच कह रहा हूं, पुलिस में तुम्हारे कांटेक्ट होंगे पता कर लो?‘‘

‘‘जरूरत नहीं, समझो मुझे तुम्हारी बात पर यकीन है। और दिल से कहता हूं मैंने तुम्हारे जैसा गुरू आदमी नहीं देखा, आज से तुम मेरे सिर माथे पर, हुक्म करो और क्या सेवा कर सकता हूं?‘‘

‘‘हैं तो सही कुछ काम अगर तुम्हें करना गंवारा हो तो‘‘

‘‘अरे अभी कहा न तुम मेरे गुरू हुए, हुक्म करो।‘‘

‘‘देखो इतना तय है कि मानसिंह की हत्या हुई है, और इसलिए हुई है क्योंकि कोई है जो लाल हवेली खरीदने के लिए मरा जा रहा है। जब मानसिंह के सामने उसकी पेश ना चली तो, उनका कत्ल कर दिया या करवा दिया। फिर उसने जूही को धमकाकर हवेली खरीदनी चाही मगर कामयाब फिर भी ना हुआ। फिर हवेली में भूतों का उपद्रव शुरू हो गया, ताकि वह घबराकर हवेली बेचकर भाग जाय। उसे मेंटल केस बनाने की भी भरपूर कोशिश की गई। मगर हत्यारा अपने मकसद में फिर भी कामयाब नहीं हुआ। तब उसने प्रकाश को अपने चंगुल में फांसा मगर मुराद पूरी होती ना पाकर उसका भी कत्ल कर दिया।‘‘

‘‘कौन है वो?‘‘

‘‘मालूम नहीं सिर्फ एक आदमी है जो उसे जानता है मगर उसकी जुबान खुलवाना और भाई को दुबई से इंडिया लेकर आना एक ही बात है।‘‘

‘‘और वो है दिलावर सिंह, है न?‘‘

‘‘हां, हर जगह उसकी टांग फंसी हुई है। हवेली में वाकया हुए सभी ड्रामों की स्क्रिप्ट उसी ने लिखी है। हर जगह उसके आदमियों की दखलअंदाजी है। हर जगह वह पान में लौंग की तरह फिट है। और इन सबके पीछे एक ही वजह है कि वे लोग जूही को इतना खौफजदा कर देना चाहते हैं कि वह या तो हवेली छोड़कर भाग जाय या उसे बेचने को मजबूर हो जाय।‘‘

‘‘ये ‘ड्रामे‘ वाली बात का जरा खुलासा करो, कंकालों वाली बात तो मुझे पता है, क्योंकि पुलिस में उसकी कंप्लेन की गई थी। ये अलग बात थी कि जांच में ना कुछ हांसिल होना था ना ही हुआ।‘‘

जवाब में मैंने उसे सारा किस्सा सुना डाला।

सुनकर वह मंत्रमुग्ध रह गया कुछ देर तक उसके हलक से आवाज तक न निकली।

‘‘कमाल है यार! इतना बड़ा षड़यंत्र चल रहा था हवेली में और हम उस लड़की को पागल करार देकर अपने फर्ज की इंतिहा समझ रहे थे।‘‘

‘‘तुम्हारी सोचों से भी परे, अभी तो कितनी ऐसी बातें हैं जिनका खुलासा होना बाकी है।‘‘

‘‘ये तो विकट स्थिति है, दिलावर सिंह से पार पाना लगभग असंभव है। बहुत ऊपर तक पहुंच है उसकी। मुख्यमंत्री तक सीधी पहुंच बताते हैं उसकी,‘‘ - तिवारी बोला - ‘‘खैर अब ये बताओ कि तुम मुझसे क्या चाहते हो?‘‘

‘‘देखो सारे फसाद की जड़ वो हवेली है। कोई उसे खरीदने को मरा जा रहा है, तो कोई उसे बेचने को तैयार नहीं है। क्यों चाहिए किसी को वो हवेली, कहीं ऐसा तो नहीं कि मानसिंह के पुरखों ने किसी से ये हवेली छीनी हो और अब हवेली के ओरिजनल मालिकान का कोई होता-सोता निकल आया हो जो इसे दोबारा हांसिल करना अपने लिए आन-बान और शान की बात समझता हो।‘‘

‘‘यार हमारे शहर में जमीन से जुड़े विवाद तो आये दिन होते ही रहते हैं। खून खराबा भी आम बात है, परिवार के परिवार कत्ल कर दिये जाते हैं। जमीन की लड़ाई में मैंने गांव के गांव तबाह होते देखे हैं इसलिए मुझे तम्हारी बात से इत्तेफाक है। ठीक है मैं इस एंगल से टटोलता हूं लाल हवेली का इतिहास।‘‘

‘‘साथ ही पिछले पांच-छह महीनों में अपने शहर में घटित तमाम छोटी बड़ी बातों को दिमाग में ताजा करने की कोशिश करो, क्या पता कुछ ऐसा घटित हुआ हो जिसका कोई मतलब ना निकलता हो। जिसके होने की कोई वजह ना दिखाई देती हो। जो इस सिलसिले की जड़ तक पहुंचने में मदद कर सके।‘‘

‘ओके मैं ये भी करता हूं।‘‘

‘‘कभी सिगमा ब्रदर्स एण्ड कम्पनी का नाम सुना है।‘‘

‘‘शायद नहीं, क्या बला है ये।‘‘

जवाब में मैंने उसे जमीनों के खरीद-फरोख्त वाली कहानी सुना दी। जिसकी जानकारी मुझे डॉली से हांसिल हुई थी।

‘‘इस कम्पनी के असली मालिकान के बारे में अगर कोई जानकारी हासिल कर सको तो मजा आ जाय।‘‘

‘‘सारे काम होंगे गुरू और इत्मिनान रखो युद्ध स्तर पर होंगे।‘‘

‘‘शुक्रिया अब मैं चलता हूं।‘‘

‘‘ठीक है ये मेरा कार्ड रख लो कभी भी जरूरत पड़े बेहिचक कॉल करना, रात और दिन का ख्याल मत करना गुरू।‘‘

मैंने सहमति में सिर हिलाया और बाहर निकल गया।

अगली सुबह तकरीबन दस बजे मैं शेष नारायण शुक्ला के निवास पर पहुंचा। प्रकाश के बताये अनुसार यह मानसिंह के बेहद करीबी लोगों में से एक था और यही वो व्यक्ति था जिसने मानसिंह की पार्टी में गैराहाजिरी सबसे पहले नोट की थी और उन्हें खोजना शुरू कर दिया था। वैसे तो मेरा मानना है कि किसी के बारे में सबसे करामद जानकारी उसका कोई दुश्मन ही दे सकता है, मगर यहां अभी तक कोई दुश्मन सामने नहीं आया था, लिहाजा मैंने मतकूल के दोस्त को टटोलने का फैसला किया था।

कॉल बेल पुश करने के पश्चात मैं दरवाजा खुलने का इंतजार करने लगा।

प्रकाश की लाश अभी भी पुलिस के अधिकार में ही थी। अलबत्ता इंस्पेक्टर जसवंत सिंह ने आश्वासन दिया था कि आज पोस्टमार्टम के बाद लाश फौरन हवेली पहुंचा दी जायेगी। प्रकाश के मां-बाप को उसके कत्ल की मनहूस खबर सुनाने का काम इस नाचीज को ही करना पड़ा था।

दरवाजा खुला, और एक नौकर टाइप आदमी प्रकट हुआ।

”किससे मिलना है?“

मैंने बताया तो वो मुझे भीतर लिवा ले गया।

”आपका नाम।“ वो बैठक में पहुंचकर बोला।

”राज शर्मा।“

”आप बैठिए मैं साहब को खबर करता हूँ।“

मैंने सहमती में सिर हिला दिया।

तकरीबन बीस मिनट पश्चात! जबकि मैं इंतजार करता-करता ऊब चुका था, और अब किसी भी वक्त उठकर बिना इजाजत अंदर दाखिल होने का मन बनाने लगा था। ठीक तभी एक उम्रदराज व्यक्ति जो कि खद्दर का कुर्ता पैजामा पहने हुए था। बड़े ही शान से चलता हुआ मेरे करीब पहुंचा।

”नमस्ते।“ - मैं दोनों हाथ जोड़ता हुआ बोला।

जवाब में उसने अपने सिर को हल्की सी जुम्बिस दी और मेरे सामने बैठता हुआ गम्भीर स्वर में बोला - ”बैठो।“

तब जाकर मुझे इस बात का अहसास हुआ कि अंजाने में मैं सोफे से उठ खड़ा हुआ था।

”शुक्रिया।“ - कहकर मैं पुनः बैठ गया।

”क्या चाहते हो?“ - उसने प्रश्न किया।

”मानसिंह जी के संदर्भ में चंद सवालात करना चाहता हूं, सुना है आप उनके खास और करीबी दोस्तों में से एक थे......।

”किससे सुना?“ - मेरा वाक्य काटकर वो यूं बोला मानो उसे मानसिंह का करीबी बताकर मैंने कोई बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो, उसकी बात सुनकर पहले तो मैं हड़बड़ा सा गया तुरंत बाद सम्भला। और सम्भलते ही जवाब दिया - ”जूही से“

”जूही“ - उसने दोहराया- ”मानू की बेटी! अच्छी लड़की है, बस पिता की मौत के सदमें से वह अभी तक उबर नहीं पाई है। तो ये गड़े मुर्दे उखाड़ने का काम तुम मानू की बेटी के कहने पर कर रहे हो।“

”मानू?“ - मैं तनिक उलझे स्वर में बोला।

”मानसिंह। हम उसे मानू ही कहते थे।“

”जानकर खुशी हुई।“

”मगर क्यों?“

”जी“ - मैं पुनः उलझन में पड़ गया।

”मेरा मतलब है तुम ये सब क्यों कह रहे हो?“

”मैंने पहले भी अर्ज किया था जनाब कि ऐसा मैं जूही की वजह से कर रहा हूँ। उसे शक है कि उसके पिता अपनी आई मौत नहीं मरे बल्कि उन्हें मार दिया गया।“

”बकवास, सब बकवास है“ - वह बड़े ही अजीबोगरीब अंदाज में बोला - ”मैंने खुद मानू की लाश देखी थी। वह साफ-साफ एक्सीडेंट केस नजर आ रहा था। कोई भी लाश को एक नजर देखते ही कह सकता था कि उसकी मौत सिर के बल जमीन पर गिरने से हुई थी।“

”मगर जनाब वो दुर्घटना किसी ने जानबूझकर भी तो क्रियेट किया हो सकता है।“

”तुम्हारा मतलब है किसी ने मानू की हत्या की नीयत से उसे छत से नीचे धकेल दिया था।“

”क्या ऐसा नहीं हो सकता?“

वो सोचने लगा फिर कुछ क्षणोपरांत बोला - ”तुम्हारे और जूही के बीच कोई इश्क मुहब्बत वाला चक्कर तो नहीं चल रहा।“

”जी“ - मैं हड़बड़ाया - ‘‘क्या कह रहे हैं बंदापरवर?“

”कुछ खास नहीं बस तुम्हारी उम्र और हरकतों की वजह से पूछ बैठा। अक्सर लोग-बाग मोहब्बत में ऐसी हरकतें करने से बाज नहीं आते। जिसकी वजह से बाद में आजीवन उन्हें पछताना पड़ता है। मैंने भी किया था, मगर जासूसी नहीं बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा, जानते हो क्या? कत्ल, कत्ल किया था मैंने, अपनी प्रेमिका के एक इशारे पर अपने ही क्लास में पढ़ने वाले लड़के को इतना मारा, इतना मारा कि उसकी जान ही चली गई। मगर हॉसिल क्या हुआ तनहाई और सिर्फ तनहाई। खैर बात तुम्हारी हो रही थी। देखो अगर ऐसी कोई बात है तो ये खामखाह की जासूसी छोड़ दो, मेरी पुलिस विभाग में काफी पहुंच है। मैं केस को फिर से इंवेस्टिगेट करवा सकता हूँ।“

”माफ कीजिएगा जनाब आपकी सोच कोरी कल्पना है क्योंकि हमारे बीच ऐसा कुछ नहीं है।“

”तो फिर तुम ये बेवजह पूछताछ क्यों कर रहो हो?“

”क्योंकि ये मेरा पेशा है।“

”तुम पुलिस में हो।“

”जी नहीं, प्राइवेट डिटेक्टिव हूं।“

”भई पहले कभी किसी प्राइवेट जासूस का नाम तो नहीं सुना अपने शहर में।“

”मैं दिल्ली से आया हूँ।“

”तभी तो .....तभी तो......।“

कहकर वो खामोश हो गया। मैं उसकी बात का कोई मतलब तलाशने की कोशिश में लग गया।

”ठीक है“ - कुछ देर पश्चात वो अहसान जताता हुआ बोला - ”बोलो क्या जानना चाहते हो।“

‘‘मानसिंह जी के बारे में ही बताइए, उनका कोई झगड़ा कोई पुरानी रंजिश या फिर कोई ऐसा व्यक्ति जो कि उन्हें सख्त नापसंद करता हो या कोई ऐसा जो उन्हें नापसंद रहा हो।“

”नहीं था“ - वो बोला - ”ऐसा कोई व्यक्ति हो ही नहीं सकता। तुम दुश्मनी की बात करते हो मैं तो कहता हूँ कि उसकी कभी किसी से कोई छोटी-मोटी तकरार भी नहीं हुई थी। वो तो हमें भी अक्सर समझाते हुए कहता था - ‘कितनी छोटी उम्र दी है ईश्वर ने मानव को, आज हो तो कल नहीं हो, बना सको तो दोस्त बनाओ, दुश्मनी के लिए वक्त ही कहां है?‘ अब उम्मीद है तुम्हे अपनी बात का जवाब मिल गया होगा।“

”जी हाँ, शुक्रिया।“

”आगे बढ़ो।“

”अब जनाब से गुजारिश है कि आप कुछ देर के लिए दुर्घटना वाली बात को भूलकर ये सोचिए कि अगर मानसिंह का कत्ल हुआ था, तो कातिल कौन हो सकता है, ऐसा कौन है जिसे कि उनकी मौत से कोई फायदा पहुंचता हो?“

”सिर्फ वो जिसने कि तुम्हें इस केस की इंक्वायरी के लिए दिल्ली से यहाँ सीतापुर बुला लिया।“

”आपका मतलब है जूही।‘‘

”ठीक समझे।“

”क्या वो अपने पिता का कत्ल कर सकती है?“

”बिल्कुल नहीं“ - वो बोला - ”मेरे कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि अगर मानू की मौत से किसी को तगड़ा लाभ हुआ है तो वो जूही है। क्योंकि मानू की मौत के बाद उसकी तमाम चल-अचल सम्पति पर अब सिर्फ और सिर्फ उसकी इकलौती बेटी जूही का अधिकार है।“

”और अब अगर जूही न रहे।“

”क्या कहना चाहते हो भई?“

”समझने की कोशिश कीजिए जनाब, जिस तरह मानसिंह की मौत से उनकी सारी सम्पत्ति जूही की हो गई। उसी तरह खुदा न करे अगर जूही को कुछ हो गया तब उस स्थिति में जायदाद का मालिक कौन होगा?“

”जाहिर है श्याम सिंह।“

”ये श्याम सिंह कैसे आदमी हुए?‘‘

”ठीक ही हैं अलबत्ता मानू की तरह मिलनसार तो हरगिज भी नहीं है। बहुत कम बोलता है, कुछ ज्यादा ही रिर्जव टाइप आदमी है। उसके लड़के के कत्ल का पता चला मुझे, सुनकर बहुत अफसोस हुआ। किसने किया होगा उसका कत्ल, भला उस बच्चे से किसी की क्या अदावत हो सकती है।‘‘

”यही तो वो लाख रूपये का सवाल है जनाब जिसपर आपही कोई रोशनी डाल सकते हैं,‘‘ कहकर मैं तनिक रूका फिर बोला, ‘‘जनाब आपको किसी ऐसे व्यक्ति की खबर है जो कि मानसिंह से लाल हवेली खरीद लेना चाहता था और ना सिर्फ खरीदने का इच्छुक था बल्कि किसी भी कीमत पर, आई रिपीट किसी भी मुनासिब-गैरमुनासिब कीमत पर खरीदना ही चाहता था।“
 
”हां मैं उसे जानता हूँ, खुद मानू ने ही मुझे उसके बारे में बताया था। अब कहीं तुम ये तो नहीं कहना चाहते कि मानू द्वारा हवेली बेचे जाने से इंकार करने पर उसी ने मानू का कत्ल कर दिया।“

”हो सकता है, ऐसा ही हुआ हो।“

”हो सकता है“ - वो विरोध जताता हुआ बोला - ”ऐसा नहीं भी हुआ हो।“

”जरूर हो सकता है जनाब, वो निर्दोष हो सकता है? ऐसे में उसका नाम बताने में आपको क्या हर्ज है?“

”अगर वो गुनहगार भी है तो मुझे उसका नाम बताने में कोई हर्ज नहीं।“ - वो दृढ़ स्वर में बोला।

”शुक्रिया बंदापरवर“ - मैं बोला - ”मगर अभी तक मुझे उसका नाम सुनने को नहीं मिला।“

”बच्चन सिंह उर्फ बच्चू, मकानों के खरीद-फरोख्त का धंधा करता है।“

”उसका कोई अता-पता।“

”आलम नगर पहुंचकर किसी से भी पूछ लेना।“

”शुक्रिया“ - मैं उठकर खड़ा हो गया।

”एक बात और।“ - वो खुद भी उठता हुआ बोला।

”जी कहिए।“

”किसी अजनबी के लिये यह शहर बेहद खतरनाक है और फिर खास तुम्हारे जैसे व्यक्ति के लिए जिसका कि मकसद ही खुराफातों से भरा पड़ा है। उसके साथ जो न हो जाय वही कम है।“

क्या शहर था, हर दूसरा आदमी मुझे डराने या सावधान रहने की नसीहत दे डालता था।

”आप मुझे डरा रहे हैं या फिर अपने शहर की बुराइयाँ गिना रहे हैं।“

”गलत समझे, मैं सिर्फ तुम्हे आगाह कर रहा हूँ। खबरदार कर रहा हूँ, आने वाली मुसीबतों से, और ये कहना चाहता हूँ कि वक्त-बेवक्त, जायज या नाजायज किसी भी प्रकार की मदद दरकार हो तो मुझे इत्तिला करना।“

कहते हुए उसने अपना एक विजटिंग कार्ड निकालकर मुझे पकड़ा दिया।

कार्ड जेब के हवाले करके मैंने एक बार पुनः उसे धन्यवाद दिया और बाहर निकल आया। हैरानी की बात थी कि इस केस में मैं जिससे भी मिलता था वही मेरी निगाहों में खटकने लगता था। अब यह आदमी भी मुझे बार-बार खटक रहा था। मैं उसकी बातों से तनिक भी आश्वस्त नहीं था, मुझे लग रहा था कि वो खुद को जैसा शो करना चाहता है असलियत उसके विपरीत है और वो गिरगिट की भांति रंग बदलने में माहिर जान पड़ता था। मगर लीड को फॉलो करना मेरी जरूरत थी, मजबूरी थी।

ग्यारह बजे मैं आलम नगर पहुंचा।

बच्चन सिंह का नाम पूछने पर लोगों ने अनभिज्ञता जाहिर की मगर जब मैंने ”बच्चू“ कहा तो फौरन एक मैले-कुचैले कपड़ों में लिपटा हुआ छोटा सा लड़का सामने आया। तत्पश्चात वो मुझे एक दो मंजिला इमारत के सामने छोड़ गया। घंटी की तलाश में मैंने चौखट के अगल-बगल निगाह दौड़ाया मगर वहाँ मुझे किसी कॉल बेल स्विच के दर्शन नहीं हुए। अतः मैंने दरवाजे पर दस्तक दे दिया और इंतजार करने लगा। करोड़ों का सौदा करने को मरा जा रहा प्रापर्टी डीलर इस मुर्गी के दरबे में रहता हो भला ये कोई मानने वाली बात थी। पता नहीं किसके पास भेज दिया था बुढऊ ने मुझे।

दो मिनट बीत गये मगर दरवाजा नहीं खुला।

मैंने दोबारा दस्तक दिया।

जवाब नदारद। और इससे पहले कि मैं तीसरी बार दस्तक देता!

”कौन है?“ एक सुरीला किंतु तीखा नारी स्वर मुझे सुनाई पड़ा, आवाज ऊपर से आई थी। मैंने गर्दन उठाकर देखा, पहली मंजिल की बॉलकनी पर एक कम उम्र सांवली, किन्तु आकर्षक नयन-नक्श वाली युवती खड़ी थी।

”किससे मिलना है बाबूजी?

मुझे अपनी ओर देखता पाकर वो तनिक मुस्कराती हुई बोली।

”बच्चू से।“ मैंने उत्तर दिया।

”वो घर पर नहीं है, शाम को आयेगा।“

”तुम कौन हो?“

”मैं कौन हूँ“ - वो अचकचा सी गई फिर सम्भलती हुई बोली - ”मेरा नाम शम्मो है, तुम्हे बच्चू से क्या काम था?“

”कुछ खास नहीं मैं शाम को दोबारा आ जाऊँगा।“

”ऊपर आ जाओ।“

”क्या?“

”मैंने कहा ऊपर आ जाओ, बहरे हो क्या?“

मैं उसकी बात का जवाब दिये बगैर सीढ़ियां चढ़ने लगा।

मेरे ऊपर पहुंचने से पहले वो दरवाजा खोल चुकी थी, मैं अंदर दाखिल हुआ तब उसने मेरे पीठ पीछे दरवाजा बंद कर दिया।

”आओ।“ कहकर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया, मैं उसके साथ चलने लगा। उसका यह व्यवहार हैरान कर देने वाला था। मुझे लेकर वो जिस कमरे में पहुंची थी वो निश्चय ही बैडरूम के रूप में प्रयुक्त होने वाला एक बड़ा कमरा था, उसने मुझे पलंग पर बैठने का इशारा किया और खुद मेरे सामने एक स्टूल पर बैठ गई।

”अब बोलो क्या काम है बच्चू से?“

”ये मैं उसी को बताऊँगा।“

”तुम्हारी मर्जी है मैं तो सिर्फ इसलिए पूछ रही थी कि अगर तुम ”उस लिए‘‘ आये हो तो तुम्हारा मतलब मुझसे भी हल हो सकता है।“

”उस लिये“ - मैं अचकचाता हुआ बोला- ”मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझा।“

”अच्छा। इतने नासमझ तो नहीं दिखते।“

”देखो। मैं सचमुच नहीं समझा कि तुम कहना क्या चाहती हो?

”इधर पहली बार आये हो लगता है जो इतना भी नहीं जानते कि यहां लोग दो जिस्मों के बीच की दूरियां मिटाने आते हैं।“

”क्या?“ मैं भौंचक्का सा उसकी शक्ल देखने लगा, वो जो चेहरे पर एक आकर्षक मुस्कान लिए अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से लगातार मुझे घूरे जा रही थी। सहसा मुझे यकीन नहीं आया कि अभी-अभी वो इस घर को कोठा बताकर हटी थी। अब मुझे उसके ”उस लिए‘‘ का अर्थ भी समझ में आ चुका था। खैर मैं अपने मनोभावों पर काबू पाता हुआ बोला - ”देखो मैं बच्चू से कुछ बेहद जरूरी बात करना चाहता था, इसलिए यहाँ आ पहुंचा। ना कि तुम्हारे ”उस‘‘ के लिए।“

कहकर मैं उठ खड़ा हुआ।

मेरी हड़बड़ाहट पर वो खिलखिलाती हुई हंस पड़ी।

”क्या हुआ?“

”इतना घबड़ा क्यों रहे हो बाबू, बैठ जाओ। मैं तुम्हारे साथ कोई जबरदस्ती थोड़े ही कर रही हूँ।“

”मैं शाम को आऊंगा।“

वह उठ खड़ी हुई, उसने मेरे कंधों पर हाथ रखा और पलंग पर धकेल दिया, उस दौरान उसका दायाँ उरोज मेरे कंधे से टकरा गया मेरे पूरे शरीर में झनझनाहट सी दौड़ गई जबकि वो जालिम मुस्कराती हुई बोली- ‘‘एक और है मेरे पास, पूरे दो हैं देखोगे।‘‘

‘‘नहीं रहने दो, तुम कहती हो तो दो ही होंगे, बिना देखे ही यकीन कर लेता हूं।‘‘

‘‘अच्छा तनिक ठहरो, चले मत जाना मैं अभी आई।‘‘

कहकर वो कमरे से बाहर निकल गई, मैं दबे पांव दरवाजे तक पहुंचा और हल्की सी झिर्री बनाकर भीतर देखने लगा। मेरे देखते ही देखते वो एक दूसरा दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश कर गई। मैं दबे पांव उसके पीछे लपका और दरवाजे के समीप पहुंचकर अपना समूचा ध्यान अंदर से उभरने वाली किसी आहट को सुनने के लिए केंद्रित कर दिया।

अभी चंद मिनट ही गुजरे थे कि मुझे अंदर से आती शम्मो की आवाज सुनाई पड़ी।

”हल्लो“ - वो निश्चय ही किसी से फोन पर बात कर रही थी - ”मैं शम्मो बोल रही हूँ।“

जवाब में दूसरी तरफ से क्या कहा गया ये जानने का मेरे पास कोई साधन नहीं था।

”आज बच्चू को तलाश करता एक बाबू यहां आ पहुंचा है कहता है उसे बच्चू से कुछ काम है।“

पुनः चुप्पी छा गई।

‘‘हां-हां मुझे तो वही लगता है और भला इतनी शिद्दत से उसे कौन तलाश करेगा।“

एक बार फिर से शम्मो की आवाज आनी बंद हो गई। मैं दम साधे प्रतीक्षा करने लगा।

”ठीक है, मैं उसे कुछ खिला-पिला देती हूँ। आधे-एक घंटे के लिए तो समझो वो गया काम से“....नहीं, नहीं उसे कोई शक नहीं होगा।....... तुम घबड़ाओ मत अगर उसे होश आ भी गया तो मैं उसे उलझा लूंगी......मैं अब फोन रखती हूँ कहीं वो चला ना जाय।“

मैं दरवाजे से हट गया और वापस पहले वाले कमरे में आ बैठा।

जनाब औरतें दो-मुंहा सांप की तरह होती हैं। इसलिए जब भी कोई औरत आप पर बेवजह मेहरबान होती दिखाई दे, तो संभल जाएं क्योंकि उस वक्त वह अपने दूसरे मुंह से आपको डसने की तैयारी कर रही होती है।

थोड़ी देर बाद विस्की की बोतल और गिलास हाथ में लिए शम्मो ने कमरे में प्रवेश किया। मैंने महसूस किया कि इस दौरान उसने अपने चेहरे पर हल्का मेकअप भी पोत लिया था। खूबसूरत तो वो यकीनन थी ऊपर से कजरारी बड़ी-बड़ी आंखों का तो कहना ही क्या था? उसके तीखे नयन-नक्श किसी को भी अपनी तरफ आकर्षित कर लेने की क्षमता रखते थे। मगर इन सब के अलावा उसमें कुछ खामियाँ भी थी, वो हरजाई थी, बेवफा थी, दगाबाज थी।

गिलास में विस्की उड़ेलते वक्त, वो जानबूझकर इतना नीचे झुकी कि मुझे उसकी खुले गले की बॉलकनी में झांकने का मौका मिल जाय। सचमुच लाजवाब चीज थी स्साली। मेरी निगाहों का अनुसरण कर उसने जो शरमाने की एक्टिंग की वो भी लाजवाब थी, गिलास में विस्की उड़लने के पश्चात् उसने जाम मुझे पकड़ा दिया और उठकर मेरी गोद में बैठ गई। मैं निहाल हुआ, उसने मेरे हाथों से जाम लेकर गिलास को चूमा और मुस्कुराते हुए मेरे होठां से लगा दिया। शबाब के हाथों में गिलास देखकर, कौन बेवकूफ होगा जो पीने से इंकार कर दे। एक बारगी तो मेरा भी दिल हुआ कि, अगर वो जहर भी है तो पी जाऊँ।

”क्या सोचने लगे? वो खनकती हुई बोली अब मुझे उसकी आवाज भी पहले से ज्यादा लुभावनी प्रतीत हुई और होती भी क्यों नहीं आखिरकार वो मेरी गोद में बैठी हुई थी।

”मुझे अकेले पीने की आदत नहीं।“

”तुम अकेले कहां हो बाबू?“ वो इठलाकर बोली - ”मैं जो हूँ तुम्हारे साथ।“

”हाँ मगर मैं चाहता हूँ तुम भी साथ बैठकर पियो।“

”बस इतनी सी बात है, मैं अभी आई।“ - कहकर वो कमरे से बाहर निकल गई। मैं समझ गया वो दूसरा गिलास लेने गई है, वक्त बहुत कम था वो किसी भी क्षण वापस लौट सकती थी। पलंग से उठकर खिड़की से बाहर झांका, यह मकान का पिछवाड़ा था, गली सूनी पड़ी थी। मैंने पूरा जाम गली में उड़ेल दिया और वापस पलंग पर पहुंचकर बोतल खोलकर अपना गिलास एक चौथाई भर लिया। अब सारा दारोमदार इस बात पर था कि जो भी मिलावट थी वो महज गिलास तक सीमित रही हो, जिसका फैसला अगले चंद मिनटों में हो जाने वाला था।

दो मिनट बाद वो कमरे में वापस लौटी, उसके हाथ में खाली कांच का गिलास देखकर मुझे तसल्ली हुई, मुस्कराती हुई वो मेरे बगल में आ बैठी।

जाम तैयार कर चुकने के बाद उसने चियर्स बोला तत्पश्चात हम दोनों चुस्कियां लेने लगे, अभिनय में उसका पार्ट अब खत्म हो चुका था। जिसे उसने बखूबी अदा किया था।

अब मेरी बारी थी।

मेरा गिलास खाली हो चुका था। मेरी आंखें नींद से बोझिल होने लगी। मुझे पूरा का पूरा कमरा घूमता प्रतीत हुआ। धीरे-धीरे मैं बेहोशी के गर्त में डूबता चला गया और एक वक्त वो भी आया जब मैं बेहोशी के आलम में पलंग पर ढेर हो गया।

मेरे गिरने के साथ ही वो पलंग से उठ खड़ी हुई, उसके होठों पर एक तिक्त मुस्कान रेंग रही थी। अपनी जीत पर वो फूले नहीं समा रही थी।

बहरहाल कुछ देर तक यूंही अनिश्चित सी खड़ी रहने के पश्चात वो कमरे से बाहर निकल गई। मैं इंतजार करने लगा, उसके अगले कदम का, बल्की उत्सुक था ये जानने को कि अब वो क्या करने वाली थी?

मुझे ज्यादा देर इंतजार नहीं करना पड़ा लगभग पांच मिनट बाद ही वो कमरे में वापस लौटी। मगर वो खाली हाथ नहीं थी। बल्कि लाइलोन की एक पतली िंकंतु, दूर से ही मजबूत दिखने वाली डोरी वो अपने साथ लेकर आई थी। कमरे में घुसने के साथ ही वो मेरे पैरों के पास आकर खड़ी हो गई। फिर ज्योंही उसने डोरी का फंदा मेरे पैरों में डालना चाहा मैं उठकर बैठ गया।

‘‘हल्लो स्वीट हार्ट।‘‘

फिर एक साथ दो काम हुए, वह बौखलाकर दो कदम पीछे हट गई और दूसरा उसका हाथ तेजी से अपने गिरेबां की तरफ बढ़ा। वहाँ मौजूद चीज क्या थी यह कहना मुहाल था। मगर वह जो भी था निश्चय ही मेरे लिए खतरनाक था। इससे पहले की वो अपने मकसद में कामयाब हो पाती, मैंने अपनी रिवाल्वर उसपर तान दी।

”डोंट मूव।“ - मैं तिक्त स्वर में बोला और पलंग से उठ खड़ा हुआ। उसका हाथ जहां का तहां फ्रीज हो गया। मैं उसकी तरफ बढ़ा मेरा इरादा उसके गिरेबां से वो चीज निकाल लेने का था, जिसका इस्तेमाल वो अपने बचाव के लिए करना चाहती थी।

मैं उसके करीब पहुंचा।

”नमस्ते फूलन देवी जी“ - मैं बोला- ”उम्मीद है अब आपके होश दुरूस्त हो चुके होंगें।“

जवाब में उसका अंग-प्रत्यंग सुलग उठा। उसकी बड़ी-बड़ी खूबसूरत आंखें इस वक्त आग उगलती सी प्रतीत हो रही थीं। मानो वो अपनी आंखों की ज्वाला में मुझे भस्म कर देना चाहती हो। खैर मैं उसके समीप पहुंचा। मगर उसके गिरेबां में हाथ डालने का हौसला न कर सका। जिन्दगी के यही वो नाजुक क्षण होते हैं। जहाँ पहुंचकर इंसान - अगर आप हैं तो - बेबस हो जाता है। उसके पूर्व संस्कार आड़े आ जाते हैं।

”माल निकालो“ - मैं रिवाल्वर से उसे टकोहता हुआ बोला।

”माल निकालो?“ वो सकपकाई।

”मैं उस माल की बात कर रहा हूँ जो तुमने अपने गिरेबां में छुपाया हुआ है।

”अच्छा वो“

”हां वो“

”खुद क्यों नहीं निकाल लेते बाबू।“ - वो इठलाती हुई मुस्कराई - ”क्या शर्म आ रही है?“

तभी अचानक ही बिग बी कि फिल्म ”हम“ का एक सीन मेरे दिमाग में उभरा बस फिर क्या था, मैंने आनन-फानन में अपने सामने खड़ी शम्मों को उल्टा कर दिया। उसके गिरेबां में मौजूद वस्तु फर्श पर गिर पड़ी मगर वो कोई सिक्का नहीं था बल्कि हाथी दांत के मूठ वाली एक छोटी पिस्टल थी। दोबारा शम्मो को सीधा खड़ा करने के पश्चात मैं उसकी पिस्तौल की तरफ झुका। इससे पहले की मैं फर्श पर पड़ी पिस्तौल को उठा पाता, शम्मो की टांग चली मैं पीठ के बल नीचे गिर पड़ा इस दौरान मेरी खुद की रिवाल्वर भी मेरा साथ छोड़ गई, जबकि शम्मो की पिस्तौल उसके हाथ में पहुंच चुकी थी।

”अब बोलो बाबू“ - वो हर्षित स्वर में बोली - ”चला दूं गोली।“

”मुझे मारकर तुम बच नहीं सकती।“

”बचने कि बात छोड़ो बाबूजी वो सब दिलावर साहब हैंडल कर लेगा।“

”लेकिन मुझे मारकर तुम्हे क्या हासिल होगा?“

मैं तनिक दीन स्वर में बोला जिसका प्रत्याशित परिणाम सामने आया, वो तनिक नम्र हुई।

”कुछ भी नहीं“ - वो बोली - ”मगर तुम भी तो यही करने वाले थे, फिर मैं तुम्हें क्यों छोड़ दूं?“

”तौबा, तुम्हारे ऊपर गोली चलाने का तो मुझे ख्याल भी नहीं आया था। अगर मेरी ऐसी कोई मर्जी होती तो तुम्हारे ‘वर्ल्ड बैंक‘ से तुम्हारी पिस्तौल निकलवाने की कोशिश क्यों करता सीधा गोली नहीं मार देता।“

”रिवाल्वर क्यों दिखाई?“

”बस यूं ही, तुम कोई बेजा हरकत न करो इसलिए, महज तुम्हें डराने के लिये।“

”डरी तो नहीं मैं“ - वो धूर्त भाव से मुस्कराई।

मैं खामोश रहा। साथ के साथ मेरी निगाह फर्श पर अपनी रिवाल्वर की तलाश में भटकने लगी।

”वो उधर है“ -मेरा मंतव्य समझकर वो बोली - ”पलंग के पायताने, चाहो तो उठा लो।“

मैंने हैरान निगाहों से उसकी ओर देखा। मेरे देखते ही देखते उसकी पिस्तौल पुनः उसके गिरेबान में जाकर खो गई अब वो निहत्थी थी। मैंने आगे बढ़कर पलंग के पायताने से अपना रिवाल्वर उठा लिया, मगर दोबारा उस पर रिवाल्वर तानने का मन नहीं हुआ। शायद पहली शिकस्त का असर था, ऊपर से उसके द्वारा पिस्तौल वापस ब्लाउज के अंदर रख लेने का बड़ा ही मनोवैज्ञानिक असर हुआ था, सो मैंने भी अपनी रिवाल्वर जेब में ठूंस ली, और उसके सामने पलंग पर बैठ गया।

”आदमी तुम पसंद आये।“

”जहेनसीब, कोई खास बात दिखाई दे गई।“

”दोबारा रिवाल्वर दिखाने जैसी छिछोरी हरकत तुमने नहीं की।“

”तुमने भी तो मेरी जान बख्श दी।“

”मेरी बात कुछ और थी, मेरे पास और भी तरीके थे तुमसे निपटने के।“

”तौबा, यानी दोबारा रिवाल्वर दिखाता फिर भी तुम जीतती।“

”उम्मीद तो थी अलबत्ता गारंटी नहीं कर सकती।“

”प्रकाश का कत्ल किसने किया?“

‘‘क्या?‘‘ - मेरे इस अचानक सवाल पर वो हड़बड़ाई - ”क्या कहा तुमने?“

”प्रकाश का कत्ल किसने किया?“

”मुझे क्या मालूम?“

”मालूम होता तो बता देती।“

”शायद हां, शायद नहीं भी।“

”वैसे जानती तो होगी, प्रकाश को।“

उसने सहमति में गर्दन हिलाई।

”वो यहाँ आता था।“

”कभी-कभार महीने में एक बार।“

”अकेले“

”अमूमन तो अकेले ही आता था, कभी राकेश के साथ भी।“

”किसलिए?“

”कोठे पर आदमी किसलिये आता है? बताऊँ।“

”नहीं जाने दो“ - मैं बोला - ”यहाँ उसकी खिदमत में कौन होता था?‘‘

”वैसे तो कोई भी, मगर प्र्रकाश और राकेश अक्सर सौम्या या फिर संगीता का साथ पसंद करते थे।“

”अभी कहां हैं वो दोनों?

‘‘किसी रिश्तेदार की शादी में गई हैं।“

”रिश्तेदार“ - मैं तनिक चौंका।

”हाँ भाई। क्या हम लोगों का कोई रिश्तेदार नहीं हो सकता?“

”मैंने ऐसा कब कहा, वैसे तुम इस धंधे में कैसे आ गई?“

”क्या कहना चाहते हो?“

”मेरा मतलब है, शक्लो-सूरत से तो किसी भले घर की पढ़ी-लिखी, जहीन लड़की दिखाई देती हो।“

”दिखाई देती थी बाबू, अब नहीं दिखती।“

”क्या?“

”वही भले घर कि पढ़ी-लिखी और जहीन।“

”यानी की तुम्हारी बाबत मेरा अंदाजा दुरुस्त है।“

”हाँ तुम ऐसा समझ सकते हो।“

”इस दलदल से निकलने का कभी मन नहीं हुआ।“

”पहले होता था, मैं एक बार यहां से भागकर घर पहुंच भी गई थी। मगर माँ-बाप ने घर में रखने से इंकार कर दिया, तब मैं उलटे पांव लौट कर यहां आ गई, और फिर यहीं कि होकर रह गई।“

‘‘वैसे धंधे में लाया कौन था तुम्हे?‘‘
 
‘‘मेरा आशिक, ऐसा आशिक जो मुझे ख्वाबों के हिंडोले पर झुलाता था। कहता था चांद तारे तोड़कर ला सकता है मेरे लिए। उसकी बातों में आकर मैं उसके साथ घर से भाग गई। फिर उसने मुझे एक आदमी के हवाले कर दिया जिसने बाद में मुझे दिलावर साहब के किसी आदमी को बेच दिया। तब मेरी उम्र 14 साल थी। इश्क की आग ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा था। मगर जब तक यह बात समझ में आई बहुत देर हो चुकी थी।‘‘

”ओह! - कहकर मैं खामोश हो गया।

कमरे में निःस्तब्धता छा गई। कुछ पल यूं ही गुजरे।

”क्या सोचने लगे बाबू?‘‘ कहकर उसने खामोशी भंग की।

”यही कि तुम्हारे आका लोग अभी तक पहुंचे क्यों नहीं?“

”आका लोग“ - वो अचकचाई।

”हाँ, मेरे आने के फौरन बाद जिन्हें तुमने फोन पर इत्तला की थी।“

”हे भगवान, तुमने मुझे फोन करते देखा था।“

”सुना भी था।“

”ओह, ओह, अब मैं समझी, समझ गई, मैं सब समझ गई।“

”क्या समझ गई?“

”छोड़ो ये बताओ अब तुम्हारा इरादा क्या है?“

”क्या मतलब?“

”अगर तुम जाना चाहो तो मैं तुम्हें नहीं रोकूंगी।“

”इतनी हमदर्दी कहीं मुझसे मुहब्बत तो नहीं कर बैठी।“

जवाब में वो खुलकर मुस्कराई, बोली - ”लद गये वो जमाने यारों! जब हमारे सीने में भी एक दिल धड़कता था।“

”अरे वाह! तुम तो शायरी भी करती हो।“

वो खामोश रही, अचानक ही वो उदास नजर आने लगी।

मैंने अपना डनहिल का पैकेट निकालकर उसे सिगरेट पेश किया जिसे उसने मशीनी अंदाज में कबूल किया। एक सिगरेट मैंने अपने होठों से लगाया फिर लाइटर निकालकर पहले उसका फिर अपना सिगरेट सुलगाया।

”तुमने दिलावर सिंह को फोन किया था।“

”हाँ“

”आगंतुक वही होगा।“

”ठीक-ठीक नहीं कह सकती वैसे ज्यादातर उम्मीद उसके किसी गुर्गे के आने की है। तुम जल्दी करो जाओ यहाँ से।“

”आगंतुक को जवाब क्या दोगी।“

”कह दूंगी, शिकार होशियार निकला जाल तोड़कर फरार हो गया?“

‘‘और ऐसा तुम मेरे लिए करोगी एक अजनबी के लिए। जिसे घंटा भर पहले तुम जानती तक नहीं थी।“

”जान-पहचान के लिए कोई वक्त निर्धारित नहीं होता बाबू।“

”बच्चू से तुम्हारी कैसी बनती है?“

”अच्छी बहुत अच्छी, बहुत ही नेकदिल आदमी है वो।“

”वो लाल हवेली खरीदना चाहता था, तुम्हें खबर होगी।“

”हाँ मगर उस बात को खत्म हुए एक अरसा हो गया, अब उसका जिक्र क्यों कर रहे हो?‘‘

”बच्चू उस हवेली के तीन चार करोड़ तक देने को तैयार था। क्या इतना पैसा था बच्चू के पास।“

”बच्चू वो हवेली दिलावर साहब के कहने पर खरीद रहा था, इसलिए पैसे कि चिन्ता उसे करनी ही नहीं थी।“

”दिलावर के पास इतना रुपया होगा।“

”शायद नहीं“ - वो सोचती हुई बोली- ”मुझे लगता है असली खरीदार कोई और था, पूंजी उसी ने लगानी थी, वैसे भी दिलावर साहब क्या करता उस हवेली को लेकर।“

”वही सही मगर वो तीसरा आदमी हवेली की इतनी बड़ी कीमत क्यों देने को तैयार थी?“

”सुनने में आया है“ - वो दबे स्वर में बोली - ”हवेली वाली जमीन पर भारत सरकार कोई शूगर मिल लगाना चाहती है लिहाजा हवेली के मालिकानों को मुंहमांगा मुआवजा मिलने की उम्मीद है, जो कि हवेली की मूल कीमत से पांच-छह गुना या इससे ज्यादा भी हो सकती है।“

डॉली ने भी ऐसा ही कुछ कहा था, मगर न जानें क्यों ये बातें मेरे गले से नीचे नहीं उतर रही थीं। ये तो सरासर अंधा सौदा था, कोई भी समझदार आदमी ऐसे सौदे में रुपया फंसाने कि हिम्मत नहीं कर सकता। मेरा दिल बार-बार गवाही दे रहा था कि असल बात कुछ और थी। कोई बहुत ही गहरा षड़यंत्र रचा जा रहा था। जिसके हवन कुण्ड में मानसिंह और प्रकाश की आहूति पड़ चुकी थी। रोजी भी उसी सिलसिले कि एक कड़ी थी और अब जूही को होम करने कि तैयारी हो रही थी। मैं और डॉली भी इससे अलग नहीं थे। अगर जूही कि जान खतरे में थी तो हम भी उस अनदेखे खतरे से महफूज नहीं थे।

‘‘तुम्हें पता है हवेली के आस-पास के काफी सारे खेत भी खरीदे जा चुके हैं।‘‘

‘‘हां पता है, वो सब दिलावर साहब के जरिए ही तो खरीदे गये थे।‘‘

‘‘किसके लिए?‘‘

‘‘मुझे नहीं मालूम।‘‘

”क्या मान सिंह का कातिल बच्चू हो सकता है?“

”हरगिज नहीं, जिस दिन उनका कत्ल हुआ वो हर वक्त मेरे साथ था।“

”यानी तुम्हे मालूम है कि मानसिंह का कत्ल ही हुआ है ना कि वे किसी दुर्घटना के शिकार हुए थे।“

”हाँ बच्चू ने बताया था“ - वो बोली - ”अब ये मत पूछना बच्चू को कैसे मालूम था, क्योंकि वो सिर्फ उसका अंदाजा था जो कि उसके कहे अनुसार सौ फीसदी दुरूस्त था।“

”ओह!“

”अब जल्दी करो, तुम जाओ यहाँ से वो लोग आते ही होंगे।“

”तुम्हे क्या लगता है वो लोग मेरा कत्ल करेंगे?“

”कुछ कह नहीं सकती फिर भी उम्मीद तो यही है।“

”देखेंगे“ - मैं लापरवाही से बोला।

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

”कौन है?“ वह सशंक भाव से बोली।

”हम हैं“ -अधिकार पूर्ण स्वर - ”दरवाजा खोलो।“ उसने हड़बड़ाकर मेरी तरफ देखा।

”तुम किचन में छुप जाओ“ - वो फुसफुसाई - “मैं उन्हें यहीं से वापस भेज दूंगी।“

मैं हिला तक नहीं,

”जल्दी करो जाओ।

मैं बजाय किचन कि तरफ जाने के, दरवाजे की तरफ बढ़ा। किसी लड़की को मुसीबत में डालकर अपने लिए पनाह तलाशने में मेरा ईगो हर्ट होता था। मैंने सिटकनी हटाकर दरवाजा खोल दिया। सबसे पहले मेरी निगाह जिस शख्स पर पड़ी, वो दिलावर सिंह था।

मुझे इस तरह दरवाजे के बीचों-बीच देखकर वो हड़बड़ाया मगर यह स्थिति ज्यादा देर तक बरकरार न रह सकी, अगले ही पल मुझे धकेलता हुआ वो कमरे में दाखिल हुआ। उसके पीछे-पीछे दो व्यक्ति और अंदर आ गये, दरवाजा पुनः बंद हो गया, दिलावर के पीछे दाखिल होने वाले एक शख्स को मैं पहचान गया, वो पुलिस वाला था जिसे मैं पहले भी कोतवाली में देख चुका था। दूसरे शख्स को मैं नहीं पहचान सका जो कि ग्रे कलर का सूट और उससे मैच करती टाई लगाये था और शक्लो-सूरत से कुलीन दिखाई दे रहा था।

दिलावर के साथ इन दोनों कि उपस्थिति का मतलब मैं नहीं समझ सका।

दिलावर सिंह ने उड़ती सी निगाह शम्मो पर डाली और एक कुर्सी खींचकर बैठने के पश्चात सिगरेट सुलगाने में मशगूल हो गया।

”एक मुझे भी।“

उसने बगैर कुछ कहे सिगरेट का पैकेट और लाइटर मुझे पकड़ा दिया। मैंने एक सिगरेट सुलगाकर पैकेट और लाइटर उसे वापस लौटा दिया।

”तुम्हें“ - वो मुझे घूरता हुआ बोला - ”मेरे आमद की जानकारी थी।“

”नहीं“ - मैं बोला।

”यानी इसने“ - वो शम्मो को घूरता हुआ बोला - ”आखिरकार तुम्हें बेवकूफ बना ही दिया।“

”अब तो यही लगता है।“

जवाब में वो हो-हो करके हंस पड़ा, मैं दीवार से टेक लेकर खड़ा हो गया, और चुपचाप सिगरेट के कस लगाने लगा।

”तुम जानते हो हम यहाँ क्यों आये हैं?“

”नहीं, मगर अंदाजा लगा सकता हूँ“ - मैं शांत भाव से बोला - ”तुम नाक रगड़कर यह कहने आये हो कि मैं दिल्ली वापस लौट जाऊँ, क्योंकि तुम्हें डर है कि अगर मैं यहां बना रहा तो एक ना एक दिन लाल हवेली के रहस्य से परदा उठ ही जायेगा, और फिर तुम बुरी मौत मरोगे।“

जवाब में उसने हैरानी से मेरी तरफ देखा और एक बार पुनः वो हो-हो, करके हंस पड़ा मगर फिर तत्काल हंसी को ब्रेक लगाता हुआ बोला - ”तेरी दूसरी बात सही है। मगर पहली बिल्कुल गलत, क्योंकि मैं तुझसे रिक्वेस्ट करके दिल्ली भेजने की बजाय तेरा कत्ल कर के ऊपर भेजने आया हूँ। आज तू बच नहीं सकता भले ही आईजी-डीआईजी या मुख्यमंत्री को भी यहां तेरे आमद की खबर क्यों ना हो।“

”तुम एक पुलिसिये कि मौजूदगी में मेरा कत्ल करने कि हिम्मत नहीं कर सकते।“

”पुलिसिया“ - वो सकपकाया - ”कौन है यहाँ?“

मैंने इशारा किया तत्काल उस पुलिसिये का चेहरा निचुड़ सा गया।

”ये मेरे से बाहर नहीं जा सकता।“ दिलावर बोला।

”कब तक?“

”क्या मतलब भई?“

”एक कत्ल का चश्मदीद गवाह होगा ये, कभी भी तुम्हें फंसवा सकता है, ब्लेकमेल कर सकता है।“

”इसकी मजाल नहीं हो सकती।“

”दिलावर साहब“ - पुलिसिया बीच में बोल पड़ा - ”क्या इसके कत्ल के अलावा कोई रास्ता नहीं।“

”अब नहीं है।“

”मैं कुछ कहूँ।“ -तीसरा सूटधारी व्यक्ति बोला।

”जरूर कहो भई।“ दिलावर बोला।

”ये लड़की कौन है?“ - सूटवाले का इशारा शम्मो की तरफ था।

”क्या मतलब?“

”समझने की कोशिश कीजिए“ - सूट वाला बोला - ”क्या ये कोई खास है, क्या इसका दुनिया में बने रहना जरूरी है?“

मैंने शम्मो की तरफ देखा, वो हकबकाई सी उसकी ओर देख रही थी।

”नहीं मगर साफ-साफ कहिए क्या कहना चाहते हैं?“ - दिलावर बोला।

”सिर्फ इतना कि लड़की को इसकी रिवाल्वर से गोली मार दीजिए और इसे“ - उसने मेरी तरफ इशारा किया - ”उसके कत्ल के इल्जाम में अंदर करवा दीजिए।“
 
तौबा, उनके खतरनाक इरादों को भांपते ही मैं भीतर तक कांप उठा। शम्मों चुपचाप वही फर्श पर बैठ गई। सचमुच कितने खतरनाक लोग थे ये, जो किसी के कत्ल जैसा जघन्य अपराध सिर्फ इसलिए कर सकते थे क्योंकि उसमें किसी दूसरे को फँसाना था।

”हाँ ये ठीक रहेगा।“ - पुलिसिया हर्षित स्वर में बोला।

”हर कत्ल का कोई मोटिव होता है“ - दिलावर बोला - ”बेवजह कोई किसी का कत्ल नहीं करता, इसके पास शम्मो कि हत्या का क्या उद्देश्य है?“

”उद्देश्य है दिलावर साहब“ - सूटधारी बोला -‘‘ये शम्मो से पूछताछ करने यहां पहुंचा था, शम्मों ने जब इसे कुछ बताने से इंकार किया तो इसने उसपर रिवाल्वर तान दी, जवाब में शम्मों अपनी जान बचाने के लिए दरवाजे की ओर भागी तो इसने गोली चला दी। ऐन वक्त पर मैं यहाँ पहुंच गया मैंने इसे गोली चलाते देख लिया और कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर के पुलिस को खबर कर दी।“

”आप अचानक यहाँ कैसे टपक गये?“

”मैं मौज मेले के लिए यहाँ पहुंचा था, आखिर है तो ये एक कोठा ही।“

”बढ़िया, बहुत बढ़िया।“

मैं समझ गया, अब ड्रामें का अंतिम दृश्य शुरू होने वाला था, मैंने अपना हाथ रिवाल्वर कि तरफ बढ़ाया, मगर...।

”खबरदार“ - दिलावर कर्कश स्वर में बोला - ”मुझे लापरवाह मत समझना मैं जब से इस कमरे के अंदर आया हूँ मेरी निगाह तुम पर ही टिकी है, अगर कोई बेजा हरकत की तो वक्त से पहले जहन्नुम का नजारा करा दूंगा।“

मुझे उसके पास किसी हथियार के दर्शन नहीं हुए मगर उसकी धमकी कोरी नहीं थी। उसके कोट का दाहिना हिस्सा थोड़ा खिंचा हुआ था और उसका हाथ कोट की जेब में था, मुझे लगा वो पहले से ही निशाना साधे बैठा था, अलबत्ता रिवाल्वर अभी भी कोट की जेब में ही थी।

”भगवत“ - दिलावर बोला - ”तू इसकी तलाशी ले।“

जवाब में वहाँ खड़ा पुलिसिया आगे बढ़ा, उसने तलाशी ली और मेरी रिवाल्वर निकालकर दिलावर को पकड़ा दिया।

”शम्मो का कत्ल और तुम उसके कातिल“ -दिलावर बोला - ”अब बोल जासूस के बच्चे कहानी कैसी लगी?“

”कहानी अच्छी है, मगर एक बहुत बड़ा झोल है, कोई ये मानकर राजी नहीं होगा कि मैंने महज अपने सवाल का जवाब ना मिलने पर इसे गोली मार दी?“

‘‘भई ये भगवत का डिपार्टमेंट है, वो कहानी में कुछ जोड़-तोड़ कर लेगा। कर लेगा न भाई?‘‘

‘‘जी कर लूंगा।‘‘ भगवत जोश में बोला।

दिलावर ने मेरी रिवाल्वर दाहिने हाथ में स्थानांतरित की। रिवाल्वर वाला हाथ शम्मो कि तरफ घूमा, वो मेरी तरफ से निश्चिंत था। मैं नीचे झुका, मैंने अपने टखनों के पास से दूसरी रिवाल्वर निकालकर गोली चला दी। निशाना दिलावर का रिवाल्वर वाला हाथ था। गोली उसके हाथ में ही लगी, मगर तब तक वो गोली चला चुका था। अलबत्ता ऐन वक्त पर मेरी गोली लगने से उसका निशाना डगमगा गया। सिर को निशाना लेकर चलाई गई उसकी गोली शम्मो के कंधे जा घुसी, और रिवाल्वर दूर जा गिरा, दिलावर और शम्मों कि चीखें एक साथ गूँजी।

तभी एक हैरतअंगेज वाकया हो गया। घायल शम्मों ने चीखने के साथ ही अपनी पिस्तौल निकालकर पहले दिलावर फिर वहाँ खड़े पुलिसिये को गोली मार दी। इसी दौरान सूटधारी व्यक्ति वहाँ से गायब हो गया। मैंने दिलावर को देखा, गोली उसके सिर में लगी थी। नब्ज टटोला, मगर नब्ज गायब थी।

शहर पर राज करने वाला जाबर, मजलूम की गोली से अपने बनाने वाले के पास पहुंच चुका था। वही हाल पुलिसिये का भी हुआ था। दोनों अपने अंजाम को पहुंच चुके थे। मैंने शम्मों पर दृष्टिपात किया वो बायें हाथ से अपने दायें कंधे को पकड़े दर्द को पीने कि कोशिश कर रही थी। मैं उसके समीप पहुंचा।

”तुम ठीक हो।“ - एक बेवकुफाना सवाल मेरे मुँह से निकल ही गया। उसने सिर हिलाकर हामी भरी।

मैं उसे सहारा देकर नीचे खड़ी अपनी कार तक ले गया, उसे कार में बैठाकर उलटे पांव वापस लौटा। मैंने दिलावर कि तलाशी ली। काबिलेजिक्र दो चीजें बरामद हुई पहला एक कागज पर जल्दीबाजी में घसीटा गया कोई फोन नम्बर था और दूसरी चीज आड़ी-तिरछी लकीरों से भरा किसी डायरी का एक पन्ना था।

कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी। असल खलीफा अभी भी सात पर्दों के पीछे छिपा हुआ था। अलबत्ता दिलावर नाम का एक अहम किरदार कम जरूर हो गया था।

दोनों कागज मैंने अपनी जेब में रख लिए, तभी मुझे रिवाल्वर का ख्याल आया जो एक ओर उपेक्षित सी पड़ी थी। रिवाल्वर उठाकर मैंने बेल्ट में ठूंस लिया और एक-एक करके उन सभी तथ्यों को मिटाना शुरू किया जो मेरी वहाँ आमद कि चुगली कर सकते थे, फिर वहीं से फोन करके मैंने पुलिस को वारदात की सूचना दी, और कार में जा बैठा।

शम्मो को अस्पताल पहुंचाने के पश्चात मैं लाल हवेली पहुंचा। वहां काफी भीड़ थी, प्रकाश की डैड बॉडी आ चुकी थी। लोग-बाग उसे घेरे खड़े थे। भीड़ को चीरता हुआ मैं हवेली के भीतर दाखिल हुआ। ड्राईंग रूम में ही डॉली मुझे मिल गई, मैं उसे अपने पीछे आने का इशारा करके पहली मंजिल की सीढ़ियाँ चढ़ गया। मेरे पीछे-पीछे डॉली वहाँ पहुँची।

”क्या चल रहा है, यहाँ?“ - मैं बोला।

”जैसे तुम्हें कुछ मालूम ही नहीं।“

”मेरा मतलब कुछ खास कि तरफ था, कुछ नये कि तरफ था।“

‘‘प्रकाश के मां-बाप आ चुके हैं, आने के साथ ही श्याम सिंह ने अपने को प्रकाश के कमरे में बंद कर लिया। जबकि उनकी मिसेज जूही के कमरे में है, वे जब से आई हैं उनके आंसू सूखने का नाम नहीं लेते, दोनों चाची-भतीजी बस रोये जा रही हैं।“

”और कुछ।“

”हाँ एक खास बात पता लगी है।“

”वो क्या?“

”आओ“ - कहकर वो आगे-आगे चल पड़ी। जूही के कमरे को पार करके अगले दरवाजे पर वो ठिठक गई।

”ये कमरा स्टोर के रूप में प्रयुक्त होता है“ - वो जंग लगे कुंडे को खोलती हुई बोली - ”इसके अंदर कूड़ा-कबाड़ा भरा है, इसलिए कोई इसमें झांकने कि कोशिश भी नहीं करता।“

वो दरवाजा खोल चुकी थी, हम दोनों भीतर दाखिल हुए, पूरा कमरा धूल से अटा पड़ा था, फर्श पर कदमों के निशान बने हुए थे। कुछ मर्दाना जूतों के तो कुछ जनाना सैंडिलों के। सैंडिल के निशानों पर गौर करने पर मैंने पाया कि वो डॉली के ही थे, अलबत्ता जूतों के निशानात से मैं कोई निष्कर्ष नहीं निकाल सका।

फिर उसने वहां रखा एक बक्शा खोला। उसके भीतर एक प्रोजेक्टर रखा था। यह उसका पोर्टेबल संस्करण था, जिससे सिनेमा हॉल में सिनेमा दिखाया जाता है। इसमें डाइरेक्ट पेनड्राइव लगाकर या कम्प्यूटर से जोड़कर मूवी चलाई जा सकती थी।

”क्या है ये?‘‘ मेरे मुंह से निकला।

”खुद देखकर अंदाजा लगाओ“ - वो तनिक इठलाई - ”वैसे तो बड़ा शरलॉक होम्ज बने फिरते हो।“

‘‘ये तो प्रोजेक्टर है।‘‘

मैंने उसपर जाहिर नहीं होने दिया कि ऐसी किसी चीज की उपस्थिति का अंदाजा मुझे उसी रोज हो गया था जब जूही के कमरे हमपर चलाई गोली बरामद नहीं हुई थी। और दीवार में ऊपर बने मोखले ने मेरा ध्यान आकर्षित किया था, तभी मैं समझ गया था कि हमारे सामने महज एक रिकार्डिंग प्ले हो रही थी। डॉली अपनी उस खोज पर बेहद खुश थी और मैं उसकी यह खुशी छीनना नहीं चाहता था।

”एक्जेक्टली यह प्रोजेक्टर ही है“ - वो बोली - ”मगर सवाल ये उठता है कि यह हवेली के इस कमरे में उपेक्षित सी क्यों पड़ी है?“

”क्यों पड़ी है?“ - मैंने दोहराया - ”खैर ठीक है अब इसे उठाकर तेरे कमरे में रख देते हैं।“

”क्यों?“

”रात को दोनों जने ब्लू फिल्में देखा करेंगे“

”नॉनसेंस“ - उसने बुरा सा मुंह बनाया - ‘‘हाँ, मैं पूछ रही थी कि ये मशीन यहाँ क्यों पड़ी है?“

”इसके कई कारण हो सकते हैं, ये मशीन खराब हो सकती है, या फिर किसी को इसके इस्तेमाल कि फुरसत नहीं होगी।“

”नहीं एक ठोस कारण है इस मशीन को यहाँ रखने के पीछे, बल्की असली वजह ही वही है।“

”यानी कि वजह मालूम है।“

”जवाब में वो मुस्करा उठी।

”वजह बता।“

”ये रही वजह“ - कहकर उसने मशीन का फोकस सामने वाली दीवार पर करके बिजली का स्विच ऑन कर दिया - ”दीवार पर तत्काल एक आकृति तैयार हुई, वो एक साया सा दिखाई दे रहा था, उसके सिर पर टोकरी जैसा हैट रखा हुआ था, ये वही साया था जिसने जूही के कमरे में मुझ पर दो गोलियां चलाई थी और मैं बाल-बाल बचा था। ये महज उस फिल्म की देन थी, तभी साये का हाथ हवा में ऊपर उठा उसकी रिवाल्वर से गोली चली मगर किसी को लगी नहीं, लगती भी कैसे वो तो महज एक फिल्म थी। बैकग्राउंड में जो दीवार थी वह जूही के कमरे की थी लिहाजा यह मूवी वहीं सूट की गयी थी।

”क्या समझे बॉस?“

”समझ गया अब तू मेरी अम्मा कहलाने के लायक हो चुकी है, वैसे तुझे सूझी कैसे ये बात?“

”बस यूं ही सुबह इस कमरे में घुस आई, यहां का ताम-झाम देखकर मेरा माथा ठनका तो पड़ गई असलियत जानने के पीछे हाथ धोकर।“

”तूने तो आज कमाल कर दिया।“

”वो तो मैं रोज की करती हूँ“ - डॉली कह रही थी - ”वैसे सबसे बड़ा कमाल तो उस शातिर दिमाग का है जिसने कि इतने बड़े षडयंत्र को अंजाम दिया, मगर उनको इसका फायदा क्या पहुंचता?“

”उनका उद्देश्य जूही को पागल करार देना हो सकता है, जो कि अब मैं देख रहा हूँ, वो लगभग हो ही चुकी थी कि तभी तू यहां आ पहुंची और फिर तेरे पीछे-पीछे मैं। नतीजतन षड़यन्त्रकारियों के काम में बाधा पड़ गई और उनका सुनियोजित, मजबूत जाल काफी हद तक छिन्न-भिन्न हो गया। जूही को पागल घोषित करने की उनकी तमाम कोशिशें असफल हो गइंर्।

जरा सोच इस फिल्म के माध्यम से उसपर गोली चलाई गयी, बाद में ना तो हमलावर मिला ना ही गोली बरामद हुई। ऐसा बार-बार होता तो ना सिर्फ लोग उसे पागल समझ लेते बल्कि उसे भी यकीन आ जाता कि वो पागल है। बाकी कसर वो गोलियां पूरी कर रही थीं जो मैंने पता किया है कि अगर किसी अच्छे-भले इंसान को एक खास क्रम में दी जायं तो वह पागल तक हो सकता है।

और डॉक्टर भी कैसा जिसका कोई वजूद नहीं है। उस रोज जब बाजार में जूही चीख चीखकर कह रही थी कि यहीं उस डॉक्टर का क्लीनिक था तो मुझे भी लगने लगा था कि उसका दिमाग हिल चुका है। मगर अब मैं दावे के साथ कह सकता हूं अगर कड़ाई से पूछताछ की जाय तो वो दुकानदार ये बकने को मजबूर हो जायेगा, कि एक दिन के लिए उसकी दुकान को ना सिर्फ क्लीनिक का रूप दिया गया था बल्कि वहां कोई फर्जी या कातिल का जोड़ीदार डॉ. भी उलब्ध था, सिर्फ जूही को वो गलत दवाइयां प्रिस्क्राइब करने के लिए। मगर वो गायब है। दुकान और घर दोनों को ताला लगाकर गायब है। कोई बड़ी बात नहीं कि उसकी भी लाश बरामद हो जाय।

और देख दिन भी कौन सा चुना गया था जूही को डॉक्टर के पास ले जाने के लिये, जब पूरी मार्केट बंद होती है। ताकि कोई गवाह ना निकल आए, मेरा दावा है जब जूही वहां पहुंची होगी तो दिलावर के गुर्गे भी वहां आस-पास निगरानी पर रहे होंगे ताकि कोई भटकता हुआ गलती से भी उधर ना पहुंच जाय। सब प्लान का हिस्सा था, एक ऐसा प्लान जिसको बनाने वाले की परछाईं से भी मैं अभी तक अंजान हूं।“

”दिलावर के बारे में क्या कहते हो?“

‘‘वो इस खेल का महज एक मोहरा था।‘‘

‘‘था!‘‘

‘‘हां, आज अपने ही एक प्यादे के हाथों जहन्नुम रशीद हो गया।‘‘

”ओह! ये तो गुड न्यूज है, अब क्या इरादा है।‘‘

‘‘फिलहाल तो बाहर चलते हैं।

हम दोनों कमरे से बाहर आ गये, डॉली ने पुनः कुंडी लगाकर दरवाजा बंद कर दिया।

”ये कमरा क्या हर वक्त यूं ही खुला रहता है?“

”सवाल ही नहीं उठता, जब से मैं यहाँ आई हूँ इस कमरे में हर वक्त ताला झूलता दिखाई पड़ता था। मगर कल से यह खुला पड़ा है, दरवाजे पर हर वक्त झूलने वाला ताला कमरे के अंदर रखा हुआ है। इसे खुला देखकर ही मैं उत्सुकता वश अंदर चली गई थी।“

”जूही को इसकी खबर है।“

”किसकी?“

”मेरा इशारा अंदर के ताम-झाम कि तरफ है।“

”अभी नहीं है।“

”उसे इस बाबत बताना होगा।“

”तुम्हें तकलीफ उठाने की जरूरत नहीं“ - वो चिढ़े स्वर में बोली - ”मैं उसे खबर कर दूंगी।“ उसकी आवाज की तल्खी पर बरबस ही मेरी हंसी छूट गई, वो भी हँसी।

अभी हम दो-चार कदम ही आगे बढ़े थे कि तभी जूही के कमरे से आती आवाज सुनकर हमें ठिठक जाना पड़ा।

”वो सब तो ठीक है बेटी“ - एक अपरिचित नारी स्वर - ”लेकिन यूं अजनबियों को बुलाकर घर में बिठा लेने को कौन अच्छा कहेगा। सुना है दूसरा कोई मर्द है उसके साथ, छिः-छिः कैसी लड़की है, पराये मर्द के साथ घूमती फिर रही है। अब मैं आ चुकी हूँ, तू उन दोनों से कह दे उनका काम खत्म हो चुका है, वो दोनों अपने घर चले जायें।“
 
मैंने डॉली की ओर देखा, तो उसने बताया कि ये जूही की आंटी की आवाज है। मैंने उसका हाथ पकड़ा और जूही के कमरे में प्रवेश कर गया। सामने पलंग पर चाची लेटी हुई थीं और जूही उनके पांव दबा रही थी। चाची सचमुच कॉफी बोल्ड औरत थीं। जवान बेटे की मौत से उन्हें कोई सदमा पहुंचा हो ऐसा कम से कम वो चेहरे से प्रगट नहीं होने दे रही थीं।

हमें यूं ही अचानक कमरे में दाखिल होते देख वो उठकर बैठ गई। जूही भी अब तक सीधी बैठ चुकी थी। मैंने और डॉली ने लगभग एक साथ हाथ जोड़े।

”नमस्ते“ - मैं बोला।

”नमस्ते“ - वो बोली - ”बैठो।“

मैं सामने रखी एक कुर्सी पर बैठ गया। डॉली मेरे पीछे कुर्सी कि पुश्त पकड़कर खड़ी हो गई।

”लगता है आपने मुझे पहचाना नहीं।“

”ठीक कहते हो बेटा, क्या नाम है तुम्हारा?“

”राज, दिल्ली से आया हूँ।“

”तो तुम आये हो दिल्ली से“ - वो तिक्त भाव से बोली - अच्छा हुआ तुम यहीं आ गये। मैं खुद भी तुमसे मिलना चाहती थी।“

”कहिए।“

”देखो बेटा......।“

”चाची“ - जूही झुंझलाकर बोली - ”ये भी कोई वक्त है ऐसी बातें करने का।“

”तू चुपकर, ये ऊँच-नीच की बातें, तेरी समझ में नहीं आयेंगी।“

”मैं खूब समझती हूँ। कोई बच्ची नहीं हूँ, अपना भला-बुरा समझ सकती हूँ। आपको कोई हक नहीं पहुंचता कि ......।“

उसने तत्काल अपने होंठ काटे।

”हाँ-हाँ कह ले, चुप क्यों हो गई?“ - चाची बिफर पड़ी- ”क्या जमाना आ गया, जरा सी बच्ची अब हक की बात करने लगी। मुझे सिखाती है, कि अब मैं बच्ची नहीं हूँ, बेशरम कहीं की......।“

”ओफहो! चाची अब बस भी करो।“

”क्या बस करूं.....? वो पुनः झुंझलाई।

”सुनिए“ - मैं अपने शब्दों में मिसरी घोलता हुआ बोला - ”आप शायद मुझसे कुछ कह रही थीं।“

”अरे हाँ बेटा मैं कह रही थी कि, तुम लोगों को यहाँ आये कई दिन हो गये हैं, तुम्हारा भी घर-बार होगा, मां-बाप होंगे। सब तुम्हारी राह देखते होंगे। वैसे अब मैं यहां आ गई हूँ देखती हूँ- कौन तंग करता है मेरी फूल सी बच्ची को“ - कहकर चाची ने जूही के सिर पर हाथ फिराया - ”हां तो बेटा मैं कह रही थी कि अब तुम दोनों भी अपने घर वापस लौट जाओ, एक जवान लड़की के साथ ज्यादा दिन तक परदेश में रहना अच्छी बात नहीं होती।“- अबकी दफा उनका इशारा डॉली कि तरफ था।

मैंने जूही की ओर देखा तो पाया कि वह लज्जित अवस्था में सिर झुकाये बैठी थी। फिर डॉली को देखा और बोल पड़ा - ”ये नहीं हो सकता।“

‘‘क्या नहीं हो सकता?‘‘

”यही कि हम अपने घर लौट जायें।“

”अरे तो क्या जीवन भर यहीं बने रहोगे।“

‘‘जी ठीक समझीं आप।‘‘

”बड़े बेशरम हो भईया तुम तो।“

”खानदानी हूँ कोई नई बात करें।“

मेरी बात सुनकर चाची तिलमिलाती हुई कमरे से बाहर निकल गई, पीछे दो हसीनों की सम्मलित हंसी गूंजी।

”मैं चाची की तरफ से तुम दोनों से माफी मांगती हूँ।“ जूही बोली।

”डॉली से मांगो - शायद मिल जाय मैं तो हरगिज नहीं दे सकता।“

”क्या?“ - वो चौंकी।

”माफी, आजकल मेरे पास उसकी किल्लत चल रही है।“

वो हैरानी से मेरा मुंह देखने लगी।

‘‘मैं जरा तुम्हारे अंकल से मिलकर आता हूँ।“

उसने सहमति में सिर हिलाया, मैं कमरे से बाहर निकल गया।

मैं नीचे पहुंचा, पूछने पर मालूम हुआ श्याम सिंह मास्टर बेडरूम में हैं। वो कमरा मानसिंह जी के जीवन काल में उनका बेडरूम हुआ करता था। उनकी मौत के बाद आज शायद पहली बार खोला गया था। दरवाजे पर पहुंचकर मैंने दस्तक दिया।

”कॅमिंग“ - अंदर से कहा गया। मैं दरवाजा धकेलता हुआ अंदर दाखिल हुआ। सामने चेयर पर एक अधेड़ उम्र का बेहद रौब-दाब वाला व्यक्ति बैठा हुआ था। चेहरे पर निराशा थी, आंखें गमगीन।

”नमस्ते“ - मैं हाथ जोड़कर बोला।

जवाब में उन्होंने अपने सिर को हल्की जुम्बिस दी और मुझे बैठने का इशारा किया। मैं सामने रखी दूसरी कुर्सी को तनिक नजदीक खींचकर बैठ गया।

”तुम शायद राज हो।“

”जी हां“ - मैं बोला - ”ठीक पहचाना आपने।

”बोलो“

”जनाब प्रकाश के साथ जो .....।“

”उसे छोड़ो“ - वो मेरी बात को काटते हुए बोले - ”मतलब कि बात करो।“

”जी हाँ, जरूर“ - मुझे असुविधा सी महसूस हुई - मैं आपका ज्यादा वक्त नहीं लूंगा...।

”आई नो-आई नो, आगे बोलो।“

”मानसिंह जी के पीछे यहाँ हवेली में जो कुछ भी घटित हो रहा था, आपको उसकी खबर थी?“

”कुछ-कुछ, मुझे प्रकाश ने फोन किया था, उसी से मालूम हुआ कि भइया कि मौत का सदमा जूही बर्दाश्त नहीं कर सकी थी। उसका सीधा असर उसके दिमाग पर हुआ था, वह कुछ अपसेट रहने लगी, और उलटी-सीधी हरकतें करने लगी थी।“

”बस“।

”भई उसकी बातों से तो मैंने यही अंदाजा लगाया था, अगर और कोई बात थी तो मुझे उसकी खबर नहीं।“

”फिर तो जनाब आपका जानना, न जानने के बराबर ही था।“ - मैं बोला - ”अब तो मुझे ये कहने में तनिक भी संकोच नहीं की हवेली में पनपने वाले षड़यंत्रों की बाबत आप कुछ भी नहीं जानते। यहां तक कि मानसिंह जी कि मौत भी अब साधारण हादसा नहीं दिखाई देती। बल्कि लगता है कि किसी ने सुनियोजित ढंग से उनकी हत्या इस तरह से की ताकि लोगों को वह दुर्घटना दिखाई दे।“

”जानते हो तुम क्या कह रहे हो“ - वो तनिक आंदोलित हो उठे और मेज पर रखा पेपरवेट लट्टू की तरह घुमाने लगे।

”मुझे मालूम है जनाब मैं क्या कह रहा हूँ।“

”साबित कर सकते हो।“

”अभी नहीं मगर इत्मीनान रखिये जनाब साबित कर के दिखाऊँगा।“

”साफ-साफ बताओ किसी पर शक है तुम्हें?“

”अभी नहीं मगर बहुत जल्द मैं उसे दुनियां के सामने ले आऊंगा।“ - मैं बोला - ”आप दिलावर सिंह को तो जानते होंगे।“

आशा के विपरीत जवाब मिला - ”हाँ“

”कैसे।“

”भई वो सीतापुर के गुंडे बदमाशों का सरगना है। अपराधियों से लेकर पुलिस तक उसकी जी हजूरी करना अपना सौभाग्य समझते हैं। कुछ लोग उसकी तुलना दुबई वाले भाई से करते हैं।“

”बस यही वजह है उसको जानने कि या और भी वजह है।“

”और क्या वजह हो सकती है?“

”आप करते क्या हैं?“ - मैं उसके सवाल को नजरअंदाज करके बोला।

”क्या पूछना चाहते हो?“

”मेरा मतलब है आपका लाइन ऑफ बिजनेस क्या है?“

”मुम्बई में इम्पोर्ट एक्सपोर्ट का बिजनेस है मेरा।“

”आमदनी कैसी है?“

”अच्छी-बहुत अच्छी, तुम्हारी उम्मीदों से भी कहीं ज्यादा।“

‘‘माफ कीजिए जनाब मुझे पता चला है, कि आपके बिजनेस की हालत डंवाडोल है। ऊपर से बेटे द्वारा लिये गये कर्जे को भरने में आपकी तमाम जमा-पूंजी चुक गई थी। गुस्से में आकर आपने अपने बेटे को घर से निकाल दिया था, तभी से वो यहां आकर रह रहा था।‘‘

‘‘ओह तो अब तुम मेरी जासूसी कर रहे हो।‘‘ उसने फिर पेपरवेट घुमाना शुरू कर दिया।

‘‘मेरा सवाल अभी भी अपनी जगह कायम है जनाब।‘‘

‘‘वो सब पुरानी बातें हैं। बिजनेस में ऊंच-नीच होती रहती है! अब सबकुछ ठीक हो जाएगा।‘‘

‘‘मानसिंह जी के कत्ल पर आप कोई रोशनी डाल सकते हैं?“

‘‘इडिएट, भाई साहब का कत्ल नहीं हुआ था। वो एक हादसा था, अब उसकी नई तजुर्बानी करके हम सब के गम को दोबाला मत करो।‘‘

”नहीं करता जनाब, बहरहाल वक्त देने का शुक्रिया।“ - मैं उठ खड़ा हुआ।

मेरे पास ढेरों सवाल थे जो मैं उससे करना चाहता था। मगर माहौल उपयुक्त नहीं था। फिर कभी सही! सोचता हुआ मैं दरवाजे की ओर बढ़ा।

कमरे से बाहर निकलते ही मेरा सामना सीओ महानायक सिंह से हुआ। वो इस वक्त वर्दी में नहीं था।

”नमस्ते हुजूर। - मैं बोला - ”आप शायद मकतूल के पिता को तलाश रहे हैं।

”ठीक समझे, मगर सिर्फ उनको ही नहीं तुम्हें भी तलाश रहा था मैं।“

”वो कमरे में हैं, और बंदा सामने हाजिर है हुक्म दीजिए।“

”मैं पहले जरा सिंह साहब से मिल लूं फिर तुमसे निपटता हूँ। तुम यहीं रहना खिसक मत जाना कहीं, ओ.के.?“

”ओ.के. बॉस।“

मेरा जवाब सुनने से पहले ही वह कमरे में दाखिल हो चुका था। उसके पीठ पीछे मैंने भीतर से उभरती कोई अपने मतलब की बात सुनने की कोशिश की मगर नाकामयाब रहा। लिहाजा वहीं चहलकदमी करते हुए मैं उस पुलिसिए के बाहर आने का इंतजार करने लगा। वक्त गुजरता गया। मैंने एक सिगरेट सुलगा लिया।

ठीक दसवें मिनट में कमरे का दरवाजा खुला और महानायक सिंह ने बाहर कदम रखा।

”कुछ नया पता लगा हजूर।“

”किस बारे में पूछ रहे हो?“

”मेरा मतलब है प्रकाश के कत्ल से सम्बंधित कोई नई बात पता लगी हो।“

”अभी तक तो नहीं लगी मगर जल्दी ही कातिल हमारी पकड़ में होगा‘‘ - महानायक सिंह बोला - ”मगर एक नई बात मुझे जरूर पता चली है और उम्मीद करता हूँ तुम भी जानते होगे।“

‘‘कौन सी बात हुजूर।‘‘

”यही कि दिलावर सिंह का कत्ल हो गया।“

”क्या कहते हो माई-बाप, ये कब हुआ?“

”बनो मत साफ-साफ बताओ वहां क्या हुआ था?“

”मुझे क्या मालूम?“

”आज तुम बच्चन सिंह से मिलने गये थे।“

मुझे लगा उसे पहले से ही पता था, लिहाजा छुपाने की कोशिश बेमानी थी, ”गया था।“

”तब समय क्या हुआ था?“

”यही कोई ग्यारह बजे होंगे“

”गये क्यों थे?“ - वो बोला - ”और कोई नया झूठ बोलने की कोशिश मत करना, क्योंकि शम्मो इस वक्त पुलिस हिरासत में है और सब कुछ बक चुकी है।“

”मगर उसे तो गोली लगी थी, वो अस्पताल में थी।“

”अब पुलिस स्टेशन में है, गोली उसकी खाल को चीरती हुई बाहर निकल गई थी। इसलिए उसे अस्पताल से डिस्चार्ज कराने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी।“

‘‘उसने कहा कि मैंने दिलावर सिंह का कत्ल किया है?‘‘

‘‘नहीं मगर वो तुम्हारी खातिर झूठ बोलती हो सकती है।‘‘

‘‘वो क्या मेरी सगी वाली है।‘‘

‘‘बकवास मत करो, मुझे लगता है सब किया धरा तुम्हारा ही है। वरना तुम वहां से भाग खड़े होने की बजाय पुलिस को इंफार्म करते और पुलिस के आने तक वहीं रूके रहते।‘‘

‘‘मैं जरूर ऐसा करता अगर शम्मों को अस्पताल ले जाना जरूरी ना होता।‘‘

‘‘तुम उसे अस्पताल पहुंचाने के बाद पुलिस को वारादात की जानकारी दे सकते थे। मगर तुमने ऐसा नहीं किया। क्योंकि सब किया धरा तुम्हारा था और तुम गिरफ्तारी से बचना चाहते थे।‘‘

‘‘तो फिर मैं यहां क्यों मौजूद हूं, दिल्ली क्यों नहीं भाग गया।‘‘

‘‘वो सब मैं नहीं जानता, मगर तुमने जिस दिन से यहां कदम रखा है इस शहर का सकून छिन गया है। तुमने यहां आने के बाद क्या-क्या गुल खिलाए हैं मैं सब जानता हूं।‘‘

”ओह! जब आप सबकुछ जानते ही हो तो मुझसे क्यों पूछ रहे हो?“

”शम्मो कि कही गई बातों कि तसदीक के लिए। वो कोई खास बात बताना भूल गई हो सकती है जिसे कि तुम बाखूबी बयान कर सकते हो।“

”ऐसी कोई बात नहीं हुई जो कि भूली जा सकी।“

”फिर भी पूरी कहानी मैं एक बार तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूँ। वो भी कोतवाली पहुंचकर। तुम अभी और इसी वक्त से खुद को गिरफ्तार समझो।‘‘

”अगर मैं ना चलना चाहूं तो .....।“

”तो ये कि मैं तुम्हे दिलावर के कत्ल जुर्म में गिरफ्तार करके बाकायदा हथकड़ियां लगाकर यहां से ले जाऊंगा। फैसला तुम पर है अपना जुलूस निकलवाना चाहते हो या चुपचाप चल रहे हो मेरे साथ।“

”दिलावर ही क्यों तुम्हारे महकमें का भी तो एक व्यक्ति मारा गया है, उसे क्यों भूलते हो?“

”शटअप!“

”क्यों ये बात स्वीकार करते तुम्हारी जान निकलती है कि तुम्हारे महकमें का एक पुलिसिया“ - मैं तनिक उच्च स्वर में बोला - ”सादी वर्दी में दिलावर नाम के गुण्डे के साथ वेश्या के कोठे पर मेरा कत्ल करने के लिए गया था।“

”मैं कहता हूँ जुबान बंद करो, वरना तुम्हारे हक में अच्छा नहीं होगा।“

”आखिरकार पुलिसवाले हो जनाब“ - मैं बोला, पूर्वतः जोर से बोला, तुरंत वहाँ भीड़ एकत्रित होनी शुरू हो गई - ‘‘ताकत बताकर किसी की भी जुबान बंद करवा सकते हो।“

”यू आर अंडर आरेस्ट“ - वो निश्चित स्वर में बोला।

”किस जुर्म में?“

”कत्ल में शरीक होने के जुर्म में।“

अब तक वहां लोगों का हजूम इकट्ठा हो चुका था।
 
”तुम मेरी गिरफ्तारी का वारंट ईशू कराओ मैं एक मुअज्जित और नेक शहरी हूँ, बिना वारेंट तुम मुझे गिरफ्तार नहीं कर सकते।‘‘

‘‘जासूस हो इतना तो जानते ही होगे कि कत्ल के केस में पुलिस किसी को भी बिना कोई चार्ज लगाये पूछताछ के लिए हिरासत में ले सकती है। समझो मैं वही कर रहा हूं।‘‘

मैंने हकबका कर उसकी ओर देखा। हालात अच्छे नजर नहीं आ रहे थे।

”ठीक है मैंने मानी तुम्हारी बात! मगर पहले तुम सिंह साहब से लिखवाकर लो कि मैं पिछले एक हफ्ते से बातौर मेहमान यहाँ रह रहा था और इनकी भतीजी जूही के कहने पर उसके पिता की मौत के केस की तफ्तीश कर रहा था।“

”इसकी कोई जरूरत नहीं।“ - वो बोला।

‘‘ठीक है फिर मुझे जबरदस्ती ले जाओ यहां से, और कोई रास्ता नहीं तुम्हारे पास।‘‘

‘‘मेरे धैर्य की परीक्षा मत ले छोकरे वरना सचमुच यहां से घसीटता हुआ लेकर जाऊंगा तुझे।‘‘

‘‘ठीक है घसीटो।‘‘

वो कसमसा कर रह गया। वहां शहर के मुअज्जित लोगों का अम्बार लगा हुआ था। लोग एक लाश को सपुर्दे खाक करने जा रहे थे। ऐसे में मेरे साथ ज्यादती करने पर उसे भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता था।

आखिरकार उसने पैंतरा बदला।

”ओके“ - तब तक शोर सुनकर बाहर आ चुके श्यामसिंह से वह मुखातिब हुआ - ”सिंह साहब है तो ये गैरजरूरी ही - अगर आपको ऐसा लिखकर देने में कोई एतराज ना हो तो प्लीज ...।“

‘‘भई ऐतराज तो नहीं है मगर....।“

”चाचा जी, जो सच है उसको लिखकर देने में आपको क्या एतराज है?“ यह स्वर जूही का था।

श्याम सिंह को लिखना पड़ा।

”जनाब इस पर आप अपना मुम्बई का पता और फोन नम्बर भी लिख दीजिए, और मोबाइल नम्बर भी।“

”क्यों?“

”क्या हर्ज है जनाब?“

उन्होंने लिखा और वो वरका फाड़कर महानायक को पकड़ा दिया। जो कि उसने गुस्से में मुझे सौंप दिया।

”अब चलें“ - महानायक सिंह मुझे अग्नेय नेत्रों से घूरता हुआ बोला।

”जी हाँ जरूर।“ - कहकर मैं उसके साथ हो लिया।

‘‘जरा ठहरिये इंस्पेक्टर साहब! - आवाज डॉली की थी - ”मैं राज से कुछ बात चाहती हूँ बस एक मिनट दीजिए प्लीज।“

महानायक सिंह सिर्फ एक पल को हिचकिचाया फिर थोड़ा आगे बढ़ गया, डॉली मेरे करीब पहुंची।

”अब ये कौन सा रायता फैला रहे हो तुम“ - वो फुसफुसाई- ”कोई चाल चल रहे हो या गिरफ्तारी की वजह से दिमाग हिल गया है तुम्हारा, जो खामखाह एक पुलिस ऑफीसर से दुश्मनी मोल ले ली तुमने।“

”कोई चाल नहीं है जानेबहार, जो चीजें मैंने इतना बवेला कर के हांसिल की, वो तो वैसे ही श्यामसिंह या जूही के जरिये हासिल हो जानी थी। बवेला तो मैंने सिर्फ इसलिए किया है ताकि ये पुलिसिया थाने में मेरे साथ ढंग से पेश आये। अब इतने सारे बड़े और पहुंच वाले लोगों के सामने वो मुझे लेकर जा रहा है, तो उसकी मजाल नहीं होगी मेरे साथ कोई ज्यादती करने की।‘‘

”मैं तुम्हें छुड़ाने के लिए कुछ करूं।‘‘

”वैसे तो मौजूदा ड्रामें की वजह से पूरी उम्मीद है कि वो मुझे जल्दी ही छोड़ देगा। पर है तो पुलिसवाला, क्या भरोसा उसका। अगर उसने शम्मों को किसी तरह बयान बदलने के लिए राजी कर लिया तो समझ ले तुझसे अगली मुलाकात जेल में होगी। ऐसे में कुछ ना कुछ तो तुझे करना ही पड़ेगा, मगर करेगी कैसे?“

”क्यों, मिस्टर श्याम सिंह...।“

”मुझे उम्मीद नहीं है, वो पहले ही मेरे खिलाफ है। तू ऐसा कर ‘‘नई सुबह‘‘ के ब्यूरो चीफ सुशांत तिवारी को मेरी गिरफ्तारी कि खबर कर दे, उम्मीद है वो कुछ काम आयेगा।“ -कहकर मैंने सुशांत तिवारी से हांसिल विजटिंग कार्ड उसे पकड़ा दिया और खुद महानायक सिंह की जीप में जा बैठा।

हम कोतवाली पहुंचे।

इंस्पेक्टर जसवंत सिंह वहां मौजूद नहीं था। महानायक सिंह उसकी कुर्सी पर जा बैठा, और मुझे अपने सामने बैठने का इशारा कर हवलदार को चाय लाने का हुक्म दिया।

‘‘चाय के साथ कुछ और लोगे?“

”जनाब ये खातिरदारी कहीं बलि के बकरे वाली खातिरदारी तो नहीं है?“

”खामोश बैठो।“

मैं फिर कुछ नहीं बोला। सिगरेट का पैकेट निकालकर उसका इंकार सुनने के बाद खुद एक सिगरेट सुलगाने में व्यस्त हो गया।

हवलदार चाय रखकर चला गया।

”अब बोलो असल में क्या हुआ था?“

”कहाँ?“

”शम्मो के कोठे पर।“

जवाब में मैंने पूरे वाकये को सैल्फ डिफेंस बनाकर पेश कर दिया।

”ये बात तुम हवेली में नहीं बता सकते थे, क्या जरूरत थी इतनी हीलो-हुज्जत करने की?“

उसने पैंतरा बदला। मैं हैरान रह गया। ये वही पुलिसिया था जो बीस मिनट पहले मुझे घसीटता हुआ थाने ले जाने की धमकी दे रहा था।

‘‘जनाब आप शायद भूल रहे हैं कि आप वहां मुझसे पूछताछ करने में इंट्रेस्टेड नहीं थे, वहां तो आप ऐसे पेश आ रहे थे जैसे कोई इश्तिहारी मुजरिम आप के हाथ लग गया हो।‘‘

‘‘और कोई बात जो तुम बताने चाहो।‘‘ वो मेरी बात को नजरअंदाज करके बोला।

‘‘ऐसा कुछ नहीं है, अलबत्ता एक इल्तिजा है - जरा शम्मों से मुलाकात करा दीजिए।“

वो हिचकिचाया।

”जनाब मामूली सी बात है प्लीज।“

”वो कातिल है, मैं तुम्हे उससे मिलने की इजाजत नहीं दे सकता।“

”हे भगवान“ - मैं आह भरता हुआ बोला - ”आपको कितनी बार समझाऊँ कि उसने सेल्फ डिफेंस में गोली चलाई थी, अगर वो ऐसा न करती तो दिलावर उसे और मुझे दोनों को मार डालता।“

”दिलावर के हाथ पर गोली किसने चलाई थी?“

”वो मैंने चलाई थी।“

”क्यों?“

”क्योंकि वो मेरी ही रिवाल्वर से शम्मो को सूट करना चाहता था। मेरा इरादा उसके हाथ से रिवाल्वर गिरा देने का था।“

”तुम्हारे पास कितनी रिवाल्वर हैं?“

”दो।“

”दिखाओ।“

मैंने दोनों रिवाल्वर उसके हवाले कर दी।

”ये तुम्हे बाद में मिलेंगी बशर्ते कि तुम दिलावर और भगवत के कत्ल, या कत्ल में सहयोग के इल्जाम से बरी हो पाए।“

‘‘हाकिम हो साहब यहां तो वही होगा जो आप चाहोगे।‘‘

‘‘अच्छा याद आ गया तुम्हें कि मैं हाकिम हूं! अभी थोड़ी देर पहले तो तुम कोई और राग अलाप रहे थे।‘‘

‘‘मेरी मति मारी गयी थी जनाब! म्ांगल को अक्सर मेरे साथ ऐसा हो जाता है।‘‘

‘‘आज तो बुधवार है।‘‘

‘‘ओह लगता है ये प्राब्लम अब एस्टेंड भी होने लगी है।‘‘

”तुमने जब दिलावर के रिवाल्वर वाले हाथ पर गोली मारी तब रिवाल्वर का क्या हुआ था?“

”जाहिर है वो छिटक कर दूर जा गिरी, मगर तब तक उसमें से गोली चल चुकी थी, और वही गोली शम्मों को जा लगी।“

”यानि शम्मो ने निहत्थे दिलावर को गोली मारी थी, फिर ये ”शेल्फ डिफेंस‘‘ कैसे हुआ ये तो सरासर कत्ल का केस हुआ।“

”गलत बिल्कुल गलत, क्योंकि मेरी गोली और शम्मो की गोली लगभग एक साथ चली थी।“- मैंने झूठ बोला- ”वो खुद को बचाना चाहती थी और मैं उसे बचाना चाहता था।“

फिर उसने यादव को गोली क्यों मारी?“

”यादव!“

”वो पुलिसकर्मी जो कि शम्मो के हाथों मारा गया उसका पूरा नाम भगवत यादव था।“

”दिलावर को गोली लगने के बाद उसने अपनी रिवाल्वर निकाल ली थी। शम्मों अगर उसे शूट नहीं करती तो बेहिचक वो हम दोनों को गोली मार देता।“

‘‘कमाल है, हैरानी होती है सुनकर कि इतना बड़ा डॉन एक औरत के हाथों मारा गया।‘‘

‘‘पिस्तौल की ‘गोली‘ को पता नहीं था जनाब कि वो कितने बड़े आदमी से टकराने जा रही है। वरना वह रास्ते में ही ठंडी पड़ जाती। या अपना रास्ता बदल लेती।‘‘

‘‘मजाक बंद करो! जानते हो मुझे तुमपर गुस्सा तो बहुत आ रहा है। मगर ये सोचकर कि तुम्हारी वजह से इस शहर को दिलावर जैसे शैतान से मुक्ति मिल गयी, मैं अपना गुस्सा भीतर ही भीतर पीने की कोशिश कर रहा हूं। यही वजह है कि मैं तुमसे इतनी सभ्यता से पेश आ रहा हूं।‘‘

‘‘शुक्रिया जनाब।‘‘

”वो तीसरा शख्स कैसे बच गया। जिसका जिक्र तुमने अपनी कहानी में किया था।“

”वो ऐन वक्त पर भागने में कामयाब हो गया था।“

”वैसे वो था कौन?“

”क्या पता मैंने पहले उसे नहीं देखा।“

”दोबारा देखो तो पहचान लोगे।“

”श्योर।“

उसने घंटी बजाई। हवलदार भीतर दाखिल हुआ।

”साहब को“ - उसने मेरी तरफ इशारा किया - ”ले जाकर शम्मो के साथ बंद कर दो।“

उसने सहमति में सिर हिलाया बोला - ”चलिए“।

मैं उसके साथ हो लिया।

”तुम“ - मुझे हवालात में आया देखकर शम्मों चौंक पड़ी, फिर मुस्कराती हुई बोली ”आओ बाबू जी बैठो, तुम्हारा स्वागत है।“

मेरे अंदर दाखिल होने के बाद हवलदार ने सींखचों वाला दरवाजा पुनः बंद कर दिया। मैं आगे बढ़कर सम्मो के निकट बैठ गया।

”एक बात समझ में नहीं आई बाबू, तुम्हारा क्या कसूर था, तुम कैसे अंदर आ गये? मैंने तो दरोगा को बताया भी था कि तुमने कुछ नहीं किया था।“

”मैं यहां तुमसे बातें करने के लिए आया हूं। सबसे पहले तो ये बताओ तुम्हारा जख्म कैसा है?

”ठीक है, मैं तो खामखाह डर गई थी। डॉक्टर कहता है गोली खाल को चीरती हुई निकल लग गई थी। मैं तुम्हारी अहसानंद हूँ तुमने मुझे मरने से बचा लिया।“

‘‘मैंने तुम्हे नहीं बल्कि खुद को बचाया था। अगर तुम मेरी रिवाल्वर कि गोली खाकर मर जाती तो वह पुलिसिया मुझे तुम्हारे कत्ल के इल्जाम में फंसाने से बाज नहीं आता।“

”चलो अहसान बराबर हुआ।“

”हाँ एहसान बराबर हुआ।“ - मैं बोला।

”अच्छा बाबू ये बताओ मुझे कितनी सजा होगी?“

”तुम्हे क्या लगता है?“

”उमरकैद।“

”अगर तुम मेरा कहना मानो तो कोई सजा नहीं होगी।“

”क्या कहते हो बाबू?“-उसने अपनी बड़ी-बड़ी आंखें मुझपर टिका दीं।

”मैं सच कह रहा हूँ, अच्छा ये बताओ तुमने पुलिस को क्या बताया?“

”वही जो हुआ था।“

”फिर भी सुनूं तो क्या बताया।“

उसने वही सब दोहरा दिया जो कि उसके कोठे पर घटित हुआ था। गोली कि बाबत उसने यही बताया कि दिलावर कि रिवाल्वर गिर चुकने के बाद उसने दिलावर और भगवत को गोली मार दी। बस यही एक बड़ा माइनस प्वाइंट था जो कि खतरनाक था और मेरी अंतरआत्मा को मंजूर नहीं था। हालांकि अपने इस बयान से भी वह कत्ल की मुजरिम साबित नहीं होती मगर जेल तो उसे जाना ही पड़ता। लिहाजा मैंने उसे सेल्फ डिफेंस वाली वाली कहानी घोलकर पिला दी।

मैंने उसे वही सब रटा दिया जो कि सीओ महानायक सिंह को पहले ही बता चुका था।

”मगर मेरे पहले बयान का क्या होगा?“

”तुमने लिखित दिया है।“

”नहीं अभी तो सिर्फ जबानी बताया था।“

”फिर कोई बात नहीं तुम साफ मुकर जाना और अपने दूसरे बयान पर जमी रहना। हिलना नहीं, चाहे जो हो जाय, किसी के रौब में मत पड़ना। सिर्फ एक बात ध्यान में रखो तुमने आत्मरक्षा के लिए गोली चलाई थी और वो कोई जुर्म नहीं। ये लोग तुम्हे तोड़ने के लिए ये भी कहेंगे कि मैंने बयान दिया है कि तुमने जानबूझकर दिलावर को मारा था। ये भी कहेंगे कि अगर तुम अपना जुर्म स्वीकार कर लोगी तो तुम्हारी सजा माफ करा देंगे। कहने का मतलब ये है कि वे हर तरह का पैंतरा आजमायेंगे। तुम्हारे साथ मार-पीट भी कर सकते हैं। मगर ये सब वक्ती होगा, और जेल जाने के मुकाबले कुछ भी नहीं होगा। ऊपर से मेरी पूरी कोशिश होगी कि तुम्हारे साथ कोई ज्यादती ना हो, कोर्ट के चक्कर ना लगाने पड़ें। जरूरत पड़ी तो तुम्हारे लिये बढ़ियां वकील का इंतजाम भी मैं करूंगा, बस तुम अपने बयान से मत हिलना, समझ गई?“

”समझ गई।“ - कहकर वो मुस्कराई, ‘‘मैंने तुम्हे सही पहचाना था। बहुत अच्छे आदमी हो तुम।‘‘

‘‘मैं बहुत बुरा आदमी हूं इसलिए अपने ऊपर वाले से अपने पाप बख्शवाने के लिए जब भी मौका मिलता है अच्छे काम करने की कोशिश करता हूं।‘‘

जवाब में वह ठठाकर हंस पड़ी।

और मैं इंतजार करने लगा, हवलदार के वापस लौटने का। हवालात का दरवाजा खुलने का। एक घंटे, दो घंटे फिर तीन घंटे गुजर गए मगर दरवाजा नहीं खुला, इस दौरान बैठे-बैठे मुझे झपकी आ गई और मैं वहीं सो गया।
 
दोबारा जब मेरी आंख खुली तो मैंने हवलदार को सामने खड़ा पाया, शायद उसी की आवाज सुनकर मेरी नींद उचट गई थी।

”चलिए आपको साहब बुला रहे हैं।“

मेरी आंख खुलने के साथ ही वह बोला। मैंने शम्मो पर निगाह डाली। वो बेसुध सोई पड़ी थी।

मैं उठ खड़ा हुआ, घड़ी देखी तो पांच बच चुके थे, तकरीबन चार घण्टे मैंने हवालात में गुजारे थे, खड़े होने के पश्चात मैंने दोनों हाथ हवा में उठाकर अंगड़ाई लिया तत्पश्चात हवलदार के साथ चल पड़ा।

इस बार जसवंत सिंह अपने कमरे में मौजूद था, महानायक सिंह शायद जा चुका था। वहां और भी कई लोग मौजूद थे। मसलन सुशांत तिवारी, जूही, डॉली तथा दो अन्य व्यक्ति जो मेरे लिए अपरिचित थे।

”आओ गुरूदेव“ - तिवारी बोला - ”मुझे खेद है कि तुम्हें चार-पांच घण्टे हवालात में गुजारने पड़े, दरअसल जब मुझे डॉली जी ने कॉल किया तो मैं हरदोई में था, और इंस्पेक्टर साहब भी वहीं थे। सीओ साहब को मैंने कई बार कॉल किया मगर बात नहीं हो पाई, बस इसी वजह से देर हो गई।‘‘

”नेवर माइंड, आमद का शुक्रिया।“ मैं कुर्सी नसीन हुआ।

जसवंत ने बताया कि मेरे खिलाफ कोई चार्ज नहीं था और शम्मो के बारे में अभी फैसला होना बाकी था।

कुछ देर पश्चात हम सभी एक साथ वहां से रूखस्त हुए, बाहर आकर मैंने सुशांत और उसके साथ वहां पहुंचे दो बड़े अखबार के प्रतिनिधियों को धन्यवाद देकर विदा किया। फिर मैंने डॉली और जूही को भी हवेली वापस भेज दिया। और खुद टहलता हुआ इंस्पेक्टर जसवंत सिंह के कमरे में पहुंचा।

”तुम“ - वो मुझे दोबारा आया देखकर चौंका - गये नहीं अभी?“

”जी हाँ थोड़ी गुफ्तगूं करनी थी आपसे।“

”अभी भी कुछ बाकी रह गया है।“

”जी हाँ, तभी तो लौटकर आया हूँ।“

”बैठो।“ - वो शुष्क भाव से बोला।

शुक्रिया बोलता हुआ मैं एक बार फिर से उसके सामने बैठ गया।

”बको! जल्दी बोलो क्या बकना चाहते हो, जानते हो तुमने यहां आकर इस शहर की शांति भंग करके रख दी, जहां जाते हो वहीं लाशों का ढेर लगा देते हो, दिल तो करता है तुम्हें अपने हाथों जहन्नुम रशीद कर दूं मगर क्या करूं मजबूर हूं?“

”जरा पता कराओ कि प्रकाश का जन्म कहाँ हुआ था, अगर किसी अस्पताल में हुआ होगा तो वहां के रजिस्टर में जन्म की तारीख, माता-पिता का नाम सभी कुछ अंकित होता है, उसे चेक करवाओ।“ मैं उसकी बात को अनसुना करता हुआ बोला।

”क्यों भई पुलिस अब तुम्हारे इशारे पर चलेगी क्या?“ वो हकबकाया सा बोला।

”और अगर हो सके तो सिंह परिवार कि हिस्ट्री टटोलने की कोशिश करो, मुझे लगता है इस हवेली में जरूर कोई राज छुपा हुआ है।“

”और कुछ हो तो वो भी बता दो।“ - वह झल्ला उठा।

‘‘ये मानसिंह के भाई श्यामसिंह का मुम्बई का पता और फोन नम्बर है, मालूम करो कि उसका बिजनेस कैसा चल रहा है, और वो मुम्बई से सीतापुर के लिए कब रवाना हुआ था। साथ ही यह मालूम करने की कोशिश करो कि पिछले एक-दो महीनों में वो किन लोगों से मिलता जुलता रहा था, इससे पहले उसने सीतापुर का फेरा कब लगाया था।‘‘

‘‘और कुछ?‘‘ इस बार वा बड़े धैर्य के साथ बोला।

”हाँ एक काम और“ - कहकर मैंने उसे दिलावर कि जेब से हॉसिल फोन नम्बर पकड़ा दिया - ”पता करो इस नम्बर का फोन कहां लगा हुआ है?“

”जरूर मैं तुम्हारा जरखरीद गुलाम जो ठहरा“ - वो तिलमिला उठा - ”मैं तुम्हारी नौकरी जो बजाता हूँ।“

”समझने कि कोशिश करो इंस्पेक्टर साहब, अब हवेली से सम्बन्धित हर ड्रामे से परदा उठने वाला है, थोड़ा हाथ पांव चलाओगे तो अगले चौबीस घंटों में नतीजा तुम्हारे सामने होगा।“

”कोई जादू का डंडा हाथ लग गया है।“

”वही समझ लो।“

कहकर मैं उठ खड़ा हुआ।

‘‘तुम्हे लगता है ये सब किया-धरा श्याम सिंह का है?‘‘

‘‘अभी कुछ बातों की पुष्टि होनी बाकी है, फिर देखेंगे।‘‘

वहाँ से मैं सीधा लाल हवेली पहुंचा, मालूम हुआ सभी लोग शव के अंतिम संस्कार के लिये गये हुए हैं और अभी तक वापस नहीं लौटे थे।

मैं मानसिंह के कमरे में पहुंचा, और मोटे तौर पर वहां कि तलाशी लेने लगा, एक-एक करके मैंने राइटिंग टेबल कि दराजें टटोल डाली। फिर बुक सेल्फ में रखी किताबों को देखने के पश्चात कमरे के एक कोने में रखी अलमारी के पास पहुंचा यह आल्मारी भी किताबों से भरी पड़ी थी, कुछ किताबों को निकालकर देखने के पश्चात मैंने उन्हें यथास्थान वापस रख दिया। इतनी मेहनत का कोई भी सिला हासिल नहीं हुआ था।

अभी मैं फारिग हुआ ही था कि जेब में पड़ा मेरा मोबाइल बाइब्रेट होने लगा।

सुशांत तिवारी की कॉल थी।

‘‘कैसे हो गुरू?‘‘

‘‘बढ़ियां।‘‘

‘‘मेरे ऑफिस आ सकते हो।‘‘

‘‘थोड़ा टाइम लगेगा।‘‘

‘‘तब तक मैं नहीं रूक सकता, एक प्रेस कांफ्रेंस अटैंड करनी है।‘‘

‘‘कोई खास बात।‘‘

‘‘हां फोन पर ही बताता हूं, दरअसल तुम्हारे कहने पर मैं पिछले कुछ महीनों में शहर में घटित हुई तमाम घटनाओं को रिवाइज कर रहा था। इस सिलसिले में मैंने मोर्ग में जाकर पुराने अखबार टटोलने शुरू किये तो एक ऐसी घटना सामने आई जिसकी कोई वजह आज तक पता नहीं चली थी।‘‘

‘‘ओह! क्या हुआ था?‘‘

‘‘घटना करीब पांच महीने पुरानी है, लखनऊ से पुरातत्व विभाग एएसआई की एक टीम सीतापुर आई थी, वे लोग यहां की पुरानी इमारतों और मंदिरों का सर्वेक्षण कर रहे थे। पांचवे दिन ही उनमें से दो जिनके नाम प्रशांत और ब्रजभूषण थे, की सरेराह गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। तब ये मामला कई दिनों तक सुर्खियों में छाया रहा था। तब से आजतक उनके कातिल का पता चलना तो दूर पुलिस उनकी कत्ल की वजह का भी कोई अंदाजा नहीं लगा पाई।‘‘

सुनकर मेरे दिमाग में जैसे बिजली सी कौंधी।

‘‘शुक्रिया, और कुछ?‘‘

‘‘हां एक बात और लाल हवेली सदियों से मानसिंह के पुरखों की ही मिल्कियत रही है, और इसका निर्माण लगभग चार सौ साल पहले उसके पुरखों द्वारा ही कराया गया था।‘‘

‘‘थैंक्यू दोस्त।‘‘

‘‘एक बात और है सुनकर उछल पड़ोगे।‘‘

‘‘मैं उछलना चाहता हूं प्लीज गो अहैड।‘‘

‘‘सिगमा ब्रदर्स, एक पार्टनरशिप फर्म है। जिसका रजिस्ट्रेशन इसी साल फरवरी में कराया गया था। दोनों पुरातत्व विभाग के कर्मचारियों के कत्ल के लगभग बीस दिन बाद। और इसके दोनो पार्टनर्स में से एक, मकतूल का भाई श्यामसिंह है।‘‘

‘‘अरे नहीं‘‘ मैं भौचक्का रह गया, ‘‘और दूसरा कौन है?‘‘

‘‘कोई रतन सिंह शेखावत है, नाम से कुछ याद आया गुरू?‘‘

‘‘नहीं, बहरहाल तुमने कमाल कर दिया दोस्त, शुक्रिया। और हां अपने अखबार के लिए एक एक्सलुसिव न्यूज कवर करने को तैयार रहो, देखना कितनी जय-जयकार होती है, तुम्हारे अखबार की।‘‘

‘‘मगर कब?‘‘

‘‘बस एक या दो दिन सब्र करो।‘‘

‘‘ठीक है, बाय।‘‘

उसने कॉल डिस्कनैक्ट कर दिया। मैंने मोबाइल वापस जेब में रखा तो मेरे हाथ एक छोटी सी पर्ची लगी, यह वही पर्ची थी जो जूही को गोली लगने वाले दिन मुझे सीढ़ियों पर पड़ी मिली थी, जिसपर किसी का फोन नम्बर लिखा था, अत्यधिक भाग-दौड़ के कारण मैं उस पर्ची को भूल ही गया था।

मैंने मोबाइल निकालकर उस नम्बर पर रिंग किया।

‘‘हैलो।‘‘ दूसरी तरफ से रौबदार आवाज सुनाई दी। मैंने जवाब नहीं दिया।

‘‘हैलो! अरे कौन है भाई, बोलते क्यों नहीं।‘‘ दूसरी ओर से आती आवाज जूही के अंकल श्याम सिंह की हो भी सकती थी और नहीं भी! दावे के साथ कुछ कह पाना मुहाल था।

मैंने चुपचाप कॉल डिस्कनैक्ट कर दी।

मैं पुनः कमरे के भीतर गया और रूमाल में लपेटकर वो पेपरवेट उठा लिया जिसे मुझसे बात करते वक्त श्याम सिंह बार-बार घुमा रहा था। इसके बाद मैंने अपने कमरे में पहुंचकर वो ताला बरामद किया जो जूही पर हमले वाले दिन सीढ़ियों के मुहाने के पास पड़ा मिला था।

मैं एक बार फिर कोतवाली पहुंचा। मुझे देखकर जसवंत सिंह हकबका सा गया।

‘‘अभी कुछ बाकी रह गया?‘‘

‘‘बस एक आखिरी काम प्लीज!‘‘

‘‘वो भी बोलो।‘‘

मैंने उसे वो ताला परोस दिया - ‘‘इसपर से फिंगरप्रिंट्स उठाने हैं और उनका मिलान श्याम सिंह के फिंगर प्रिंट से करना है।‘‘ कहते हुए मैंने पेपर वेट उसके सामने रख दिया, ‘‘इसपर श्यामसिंह की उंगलियों के ताजा निशान हैं।‘‘

उसने सहमति में सिर हिलाया और एक हवलदार को बुलाकर दोनों चीजें उसके हवाले कर दीं।

‘‘तुम तो लगता है हाथ धोकर मतकूल के भाई के पीछे पड़े हुए हो।‘‘

‘‘मैं सिर्फ कातिल के पीछे हूं जनाब चाहे वो कोई भी हो।‘‘

‘‘मेरी शुभकामनायें तुम्हारे साथ हैं, अगर रिपोर्ट देखकर जाना चाहते हो तो चाय मंगाऊं?‘‘

‘‘अगर आप उतनी देर मुझे झेल सकते हैं तो आई डोंट माइंड।‘‘

उसने चाय का आर्डर दे दिया।

‘‘आराम से बैठो भई, आजकल थोड़ी फुर्सत में हूं, सीओ साहब बहुत हेल्प कर रहे हैं, हर काम मुझी पर नहीं लाद देते, खुद भी बहुत सारा फील्ड वर्क कर लेते हैं।‘‘

चाय पी चुकने के बाद हम लगभग बीस मिनट तक केस से संबंधित बातें करते रहे। फिर हवलदार रिपोर्ट दे गया। ताले से बरामद प्रिंट श्यामसिंह के फिंगर प्रिंट से बिल्कुल नहीं मिलते थे। मगर रिपोर्ट देखकर मुझे ज्यादा निराशा नहीं हुई, मैंने तो बस एक तुक्का लगाया था जो निशाने पर नहीं लगा।

‘‘अब क्या कहते हो, किसी और से......‘‘कहता हुआ वो अचानक खामोश हो गया, वह गौर से ताले से बरामद उंगलियों के निशान देखने लगा। फिर उसने मेज की दराज से एक डायरी निकाली जिसमें एक कागज पर किसी के फिंगर प्रिंट्स थे, उसने ताले के प्रिंट को उससे मिलाकर देखा, उसके चेहरे पर हैरानी के भाव आए।

‘‘क्या हो गया जनाब?‘‘ मैं उत्सुक स्वर में बोला।

‘‘हू-ब-हू मिलते हैं।‘‘

‘‘क्या?‘‘ मैं भौचक्का रह गया, अगले ही पल मैंने झपटकर उसके हाथों से दोनों प्रिंट लेकर खुद मुआयना किया। दोनों एक ही व्यक्ति के फिंगर प्रिंट्स थे।

‘‘ये किसके प्रिंट्स हैं?‘‘

‘‘मेरे।‘‘ बड़ा ही अप्रत्याशित जवाब मिला। मैं हकबका कर उसका मुंह देखने लगा।

‘‘मगर जनाब आपके फिंगर प्रिंट का यहां क्या काम?‘‘

‘‘कुछ दिनों पहले कत्ल के एक केस में मैंने एक कमरे की कुछ चीजों को हैंडल किया था। बाद में जब वहां से प्रिंट उठाये गये तो मेरे प्रिंट उनमें से अलग करने को लिये गये थे। बाद में यह मुझे सौंप दिया गया तो मैंने काफी गौर से अपनी उंगलियों के निशानों को देखा था। ऊपर से मेरे अंगूठे पर एक कट का गहरा निशान है, वही निशान मैंने ताले से बरामद प्रिंट में देखा तो अपने निशान देखने का ख्याल आया, नतीजा तुम्हारे सामने है।‘‘

‘‘मगर सवाल ये है जनाब की आपके फिंगर प्रिंट इस ताले पर कैसे पहुंचे।‘‘

‘‘कहना मुहाल है, वैसे मानसिंह की मौत के बाद तफतीश के दौरान मैंने उस ताले को छुआ हो सकता है, मुमकिन है ये तभी के प्रिंट हों।‘‘

वो बोले जा रहा था जबकि मेरे कानों में सांय-सांय हो रही थी। उसकी बातें मुझे कहीं दूर से आती प्रतीत हो रही थीं। कितनी सारी बातें थीं जिनमें वो पुलिसिया एकदम फिट बैठता था।

वो बर्थडे पार्टी में बतौर मेहमान मौजूद था। मानसिंह की मौत की इंवेस्टीगेशन भी उसी ने की थी। ऐसे में स्याह को सफेद कर दिखाना, कत्ल को दुर्घटना साबित कर दिखाना उसके लिए क्या मुश्किल था। और फिर वो एक पुलिसिया था, दिलावर सिंह जैसे गुण्डे पर अपना रौब गालिब कर लेना उसके लिए आसान था। किसी आम आदमी के काबू में दिलावर जैसा गुण्डा भला कैसे आ सकता था।

किसी ट्रक ड्राइवर को धौंस देकर हवेली की दीवार तोड़ने के लिए तैयार करना उसके लिए बहुत ही आसान था। फिर एक लाख रूपये भी तो दिये थे उसने। सीतापुर में घुसते ही उसका मुझसे टकराना, बाद में मीठी-मीठी बातें करना, भला कोतवाली के इंचार्ज को क्या पड़ी थी कि वह हर पग पर मेरी सहायता करता। मगर उसने की, क्योंकि वह जानना चाहता था कि मैं क्या सोचता हूं, क्या करता हूं, कहां जाता हूं। मगर ऐसा था तो उसने ये क्यों साबित किया कि ताले से बरामद फिंगर प्रिंट उसके थे।

इस एक सवाल ने मेरी तमाम कल्पनाओं को एक ही झटके में जमीन पर पटक दिया।

क्या पता वो किसी खास बात की तरफ से मेरी तवज्जो हटाना चाहता हो। क्या पता वो यही चाहता हो कि अगर मुझे उसपर कोई शक हो तो उसके इस एक्शन से मैं उसे इनोसेंट मान लूं। आखिर पुलिसिया था पैंतरेबाजी तो उसका रोज का काम था।

‘‘तुम्हें क्या हुआ भई?‘‘

‘‘कुछ नहीं, बस सोच रहा हूं कि यह प्रिंट अगर श्याम सिंह के प्रिंट से मैच कर गये होते तो मजा आ गया होता। अब मैं आप पर तो शक नहीं कर सकता जनाब,‘‘-कहकर मैं ठठाकर हंस पड़ा,-‘‘बहरहाल वक्त देने का शुक्रिया चलता हूं।‘‘
 
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