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‘‘पुलिस जब तुम्हारे पीछे पड़ेगी तो मेरा अलावा भी कोई ना कोई गवाह खोज निकालेगी, जिसने ऐन कत्ल के वक्त तुम्हें हवेली के भीतर या उसके आस-पास देखा होगा। प्रकाश के कमरे से तुम्हारे फिंगर प्रिंट भी अवश्य ही बरामद होंगे। देखो गुलेगुलजार हर सबूत तुम्हारे खिलाफ है, तुम बच नहीं सकती। हरगिज-हरगिज भी नहीं बच सकती।“
‘‘ओह गॉड ये आदमी तो मुझे कातिल साबित करने की कसम खाये बैठा है।‘‘
‘‘मैं नहीं, तुम्हारे कुकर्म तुम्हें कातिल साबित करेंगे। फिर अपने घर से हजारों मील दूर इस शहर में अपनी मौजूदगी का क्या जवाब है तुम्हारे पास! नहीं मैडम तुम नहीं बच सकतीं।‘‘
‘‘मगर मैंने प्रकाश का कत्ल नहीं किया है।‘‘
‘‘ये बात तुम पुलिस को समझाना।‘‘
”सुनो! तुम इस किस्से को यहीं खत्म क्यों नहीं कर देते?“
‘‘कर देता हूं मगर पहले तुम मुझे सारी बात बताओ, बिना कुछ छिपाये, बदले में मैं तुमसे वादा करता हूं कि कम से कम मेरी वजह से पुलिस तुम तक नहीं पहुंचेगी। खुद तलाश कर ले तो जुदा बात है।‘‘
‘‘तुम इन बेवजह के पचड़ों में क्यों पड़ते हो, भूल क्यों नहीं जाते ये सब?‘‘
कहती हुई वो मेरे पहलू में मुझसे सटकर बैठ गई उसका एक उरोज मेरी कोहनियों पर दस्तक देने लगा। अचानक जैसे उसे याद हो आया था कि वो एक लड़की थी - एक ऐसी लड़की जिसपर जवानी झूम कर आई थी। जिसका अंग-अंग सांचे में ढला हुआ था। लिहाजा उसने अपना आखिरी हथियार आजमाना शुरू कर दिया था।
”नहीं भूल सकता - अब ये किस्सा खत्म नहीं हो सकता।“
”हो सकता है“ - वो अपना एक हाथ मेरी जांघ पर रखती हुई बोली - ”तुम्हारे किए हो सकता है।“
मैं खामोश रहा।
वह धीरे से उठकर खड़ी हो गई। उसने अपना गाउन उतार कर एक तरफ फैंक दिया। मैंने हड़बड़ा कर राकेश की तरफ देखा। वो खामोशी से बैठा हुआ सिगरेट फूंक रहा था।
”देखो“ - रोजी बोली - मैं प्रकाश के कमरे में गई थी, इसकी खबर सिर्फ तुम्हें है, इस बाबत अगर तुम खामोशी अख्तियार कर लो तो पुलिस को हरगिज-हरगिज भी ये पता नहीं चलेगा की मैं मौका-ए-वारदात पर गई थी।‘‘
”मैं ऐसा क्यों करूँगा?“
”मेरी खातिर, अपनी रोजी की खातिर, देखना कितनी ऐश कराती है ममा तुम्हे।“
मैं हकबकाया! कैसी हर्राफा थी वो, अभी यार की चिता भी नहीं जली थी और वो मुझे अपनी जवानी के हिंडोले पर झूला झुलाने की तैयारी कर रही थी।
‘‘तुमने कभी जन्नत की सैर की है?‘‘ वो बोली।
‘‘नहीं।‘‘
‘‘मैं कराऊंगी, बस इस कहानी को यहीं खत्म कर दो।‘‘
कहकर उसने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर बड़े ही मादक अंदाज में अंगड़ाई ली।
मुझे अपना गला सूखता सा प्रतीत हुआ।
”मैं कैसी लग रही हूँ?“
‘‘एक नम्बर की छिनाल।“
तत्काल उसके चेहरे पर हाहाकारी भाव आये। मुझे लगा वो मुझपर झपटने वाली है। मगर ऐसा नहीं हुआ। वहीं खड़ी वो अपनी मुट्ठियां खोलती बंद करती रही। इस दौरान उसके चेहरे पर एक के बाद दूसरे भाव आये और चले गये।
मैंने एक सिगरेट सुलगा लिया।
‘‘आराम से बैठ जाओ बहन-जी, और यकीन जानों बिना जुबान खोले तुम्हारी खलासी नहीं होने वाली।‘‘
जवाब मैं वह कुछ कहते-कहते चुप हो गयी। उसने एक नजर राकेश पर डाली मगर उधर से कोई प्रोत्साहन मिलता ना पाकर धम्म से सोफे पर बैठ गयी।
‘‘क्या जानने चाहते हो?“
”सबसे पहले तो तुम हवेली में घटित एक महीने पुरानी घटना का खुलासा करो। तुमने जूही के डैडी पर चाकू से हमला करने का अभिनय क्यों किया, जूही द्वारा गोली चलाये जाने के बावजूद तुम जिन्दा कैसे बच गई और फिर प्रकाश ने तुम्हे कब्र में दफनाने का अभिनय क्यों किया?“
”देखो मैंने जो भी किया - प्रकाश के कहने पर किया, अपने प्यार के हाथों मजबूर होकर किया। इसलिए किया क्योंकि मैं प्रकाश की सलामती के प्रति फिक्रमंद थी।“
”यानी की जूही के हाथों कत्ल होने का अभिनय करने के लिए तुम्हें प्रकाश ने कहा था।“
”हाँ।“
”क्यों?“
‘‘मैं सिर्फ इतना जानती हूं कि कोई लाल हवेली खरीदना चाहता था, और प्रकाश उसकी मदद कर रहा था।‘‘
‘‘खरीददार कौन था?‘‘
”मैं नही जानती प्रकाश ने मुझे इस बारे में कभी कुछ नहीं बताया।“
”लेकिन तुम्हारे कत्ल की नौटंकी से हवेली कैसे बिक सकती थी?“
”क्योंकि वो जो कोई भी था, जूही के डैडी को ब्लैकमेल करके उनसे लाल हवेली का सौदा करना चाहता था। जिस वक्त जूही ने मुझ पर फायर किया उस वक्त की कुछ तस्वीरें ले ली गई थीं। उन्हीं तस्वीरों को हथियार बनाकर मानसिंह को ब्लैकमेल करने का प्लान था। मगर इससे पहले कि वो ऐसा कुछ कर पाता मानसिंह की मौत हो गई और कहानी खत्म।“
”बाद में उसने वैसी ही कोई कोशिश जूही पर क्यों नहीं की?“
”की गई थी, ये काम दिलावर सिंह को सौंपा गया। मगर जूही किसी भी कीमत पर हवेली का सौदा करने को राजी नहीं हुई, जेल भिजवाने की धमकी का भी उसपर कोई असर नहीं हुआ। दिलावर सिंह के जरिए उसपर कई बार दबाव बनाने की कोशिश की गयी मगर कोई फायदा नहीं हुआ।“
”क्या मानसिंह की मौत में दिलावर का हाथ हो सकता है?“
‘‘ईडिएट वो महज एक दुर्घटना थी, दूसरी बात अगर ऐसा नहीं भी था तो दिलावर को उसकी मौत से कुछ भी हॉसिल नहीं था, उल्टा अगर वे कुछ दिन और जिन्दा रह जाते तो दिलावर उन्हे हवेली बेचने का मजबूर कर सकता था, और हवेली के असली खरीदार से उसे मोटी रकम हासिल हो सकती थी।“
”वो खलीफा जो कोई भी है, वो हवेली क्यों खरीदना चाहता है?“
”मुझे नहीं मालूम।“
”प्रकाश के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है?“
”क्या मतलब?“
”उसका कत्ल क्यों हुआ?“
”अब मैं क्या कह सकती हूँ?“
”कोई अंदाज तो लगा ही सकती हो।“
फौरन उसने इंकार में सिर हिलाया।
”क्या उसका कत्ल दिलावर सिंह ने किया या करवाया हो सकता है?“
”मैं इस बारे में कुछ भी नहीं कह सकती।“
”फिर किस बारे में कहोगी?“
वो खामोश रही।
”तुम लाल हवेली क्यों गई थी?“
”प्रकाश के बुलावे पर।“
”अक्सर जाती हो।“
”नहीं, मानसिंह की मौत के बाद ये मेरा दूसरा फेरा था।“
‘‘पहले फेरे में भूत बनकर जूही को डराने गयी थीं।‘‘
‘‘हां।‘‘
”आज क्यों गई थी?“
”कहा न प्रकाश के बुलाने पर।“ वो झल्ला उठी।
”मैंने सुना था, मेरी उसमें कोई दिलचस्पी नहीं, मैं ये जानना चाहता हूँ कि प्रकाश ने तुम्हें क्यों बुलाया था?“
”मुझे नहीं मालूम।“
”या फिर बताना नहीं चाहती।“
”देखो मुझे सचमुच नहीं मालूम की प्रकाश ने मुझे क्यों बुलाया था। मुझसे मुलाकात हो पाने से पहले ही वो कत्ल कर दिया गया। लिहाजा कारण जो भी था वो प्रकाश के साथ ही खत्म हो गया।“
”ऐसा तुम कहीं इसलिए तो नहीं कह रहीं क्योंकि तुम्हारी किसी भी बात को झूठा साबित करने के लिए प्रकाश अब जीवित नहीं है।“
”मैं सिर्फ और सिर्फ हकीकत बयान कर रही हूँ।“
”चलो मान लिया कि तुम सच कह रही हो, तुमसे मुलाकात होने से पहले ही प्रकाश का कत्ल हो चुका था, मगर जब तुम्हें मालूम था कि प्रकाश मर चुका है, तो फिर तुम दोबारा उसके कमरे में क्या करने गई थी?“
”वो .... वो.... मैं अपना पर्स भूल आई थी, जो कि मेरा रिश्ता प्रकाश के कत्ल से जोड़ सकता था, उस पर्स के सहारे पुलिस बड़ी आसानी से मुझ तक पहुंच जाती। वो पर्स लेने के लिए मैं दोबारा प्रकाश के कमरे में गई।“
”तुम झूठ बोल रही हो।“
”क.....क.....क्या?“ वह हकलाती हुई बोली - ”क्या कहना चाहते हो तुम?“
”यही कि प्रकाश के कमरे में दोबारा तुम इसलिए नहीं गई क्योंकि वहाँ तुम्हारा पर्स रह गया था बल्कि इसलिए गई क्योंकि तुम्हें वो चिट्ठी चाहिए थी जो अभी भी तुम्हारे गिरेबां में तुम्हारी अंगिया के भीतर मौजूद है।“
मेरी बात सुनकर वो हकबका सी गई। जबकि राकेश अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ, वो सधे कदमों से चलता हुआ रोजी के करीब पहुंचा।
”चटाख।“ - अपने दाहिने हाथ का एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसने रोजी के गाल पर रसीद कर दिया।
”हरामजादी“ - वो नफरत भरे स्वर में बोला - ‘‘तू मुझे डबल क्रास करना चाहती थी।“
रोजी के मुंह से बोल तक न फूटा।
”अगर तेरी इस हरकत की खबर दिलावर साहब को लग गई तो वह तुझे जिंदा दफन करवा देंगे।“
”तुम गलत समझ रहे हो, मेरा वैसा कोई इरादा नहीं था। अगर होता तो मैं यहां वापस लौटकर क्यों आती?“
”तो फिर यहां आते के साथ ही तूने ये क्यों कहा कि वह प्रोनोट तुझे नहीं मिला। वो प्रकाश के पास था ही नहीं, और अगर था तो कातिल उसे अपने साथ ले गया।“
”वो तो मैंने यूंही मजाक में कह दिया था, मेरा इरादा बाद में उसकी बाबत सबकुछ तुम्हें सच-सच बता देने का था।“
”ठीक है तू सही है, मैं ही बेवजह तुझ पर शक कर बैठा। अब ला वो प्रोनोट मुझे दे दे।“
कहते हुए राकेश ने अपना एक हाथ उसके आगे फैला दिया।
”नहीं“ -रोजी दो कदम पीछे हट गई - ”वो चिट्ठी मैं तुम्हें नहीं दूंगी।“
”क्यों?“
”मुझे तुम पर ऐतबार नहीं है।“
”अब हो जायेगा“ - कहते हुए राकेश ने रिवाल्वर निकालकर उस पर तान दिया - ‘‘अब क्या कहती है?“
”वो प्रोनोट मैं तुम्हें किसी भी कीमत पर नहीं दूँगी।“
”चाहे जान चली जाए।“
रोजी खामोश रही, उसने एक बार अपने सूख आये होठां पर जुबान फिराकर उन्हें तर किया फिर मदद मांगती निगाहों से मेरी तरफ देखा।
उसकी निगाहों का अनुसरण करता हुआ राकेश मेरी तरफ घूम गया।
”ओह तो जनाब जिन्दा हैं, अभी तक।“
”क्या मतलब?“ - मैं हड़बड़ाया।
”मतलब ये ......धांय।“ उसने गोली चला दी।
ठीक उसी वक्त रोजी ने उसे धक्का दे दिया। निशाना चूक गया। गोली मेरे सिर के काफी ऊपर से गुजर गई।
वह सम्भला, सम्भलकर उसने पुनः मुझे निशाना बनाना चाहा। मैंने तत्काल अपनी रिवाल्वर निकालकर राकेश की दिशा में फायर झोंक दिया। गोली उसकी खोपड़ी में जा घुसी। खोपड़ी के परखच्चे उड़ गये। रोजी दरवाजे की तरफ भागी, हड़बड़ाकर मैं उसके पीछे दौड़ा। तब तक वो दरवाजा पार कर चुकी थी। कमरे से निकलकर मैंने अपने आजू-बाजू निगाह दौड़ाई, वो मुझे सीढ़ियां उतरती दिखाई दी। मैं पूरी ताकत से उसकी दिशा में दौड़ पड़ा।
ग्रॉउंड फ्लोर पर पहुंच पाने से पहले ही मैंने उसे दबोच लिया।
”छोड़ो-छोड़ो“ - वो मेरी पकड़ में छटपटाती हुई बोली - ”मैं किसी को नहीं बताऊँगी की राकेश का कत्ल तुमने किया है। बदले में तुम्हें मेरी जानबख्शी करनी होगी।“
”नॉनसेंस मैंने आत्मरक्षा के लिए उस पर गोली चलाई थी, अगर मैं ऐसा नहीं करता तो वह मुझे जान से मार देता, वो सिर्फ सैल्फ डिफेंस था ना कि कत्ल।“
‘‘फिर तो मैं तुम्हारे लिए बहुत काम की साबित हो सकती हूँ, मैं तुम्हारे पकड़े जाने पर एक चश्मदीद गवाह की हैसियत से तुम्हारे हक में गवाही दे सकती हूँ, यू नो।“
”यस स्वीट हार्ट।“
”मेरे कत्ल से तुम्हे क्या हॉसिल होगा।“
”कुछ भी नहीं।“
”फिर तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो?“
”क्या बकती हो मैं ऐसा क्यों चाहूँगा?“
”तो फिर मुझे पकड़ने के लिए क्यों दौड़े थे?“
”तुम वहां से भागी ही क्यों?“
”मैंने सोचा“ - वो बड़े ही मासूम अंदाज में बोली - ”कि राकेश का कत्ल करने के बाद तुम मेरा भी कत्ल कर दोगे, क्योंकि मैंने तुम्हें उसका कत्ल करते देख लिया था। बस यही सोचकर मैं वहाँ से भाग खड़ी हुई।“
”वो फ्लैट किसका था?“
”मालूम नहीं, वैसे राकेश कहता है कि वो उसके किसी फ्रैंड का है जो कि इन दिनों कहीं बाहर गया हुआ है। जाने से पहले वो देखभाल के लिए फ्लैट की चाभी राकेश को सौंप गया था।“
”यानी की तुम यहां नहीं रहती हो।“
”नहीं।“
”तो फिर कहाँ रहती हो?“
”आर्य नगर में।“
”अब वहीं जाओगी।“
‘‘हाँ।‘‘
”अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हारे साथ वहां तक चल सकता हूं।“
”थैंक्यू“ - वो बोली - ”तुम अच्छे आदमी लगते हो। इसलिए मैं जो कुछ भी जानती हूं तुम्हें बता देना चाहती हूं।‘‘
बाहर आकर हम दोनों एक साइकिल रिक्शा पर सवार हो गये।
पूरे रास्ते वो मुझसे सटी सिमटी-सी बैठी रही। और यदा-कदा रिक्शे वाले को तेज चलने के लिए हाँक लगा देती थी।
तकरीबन बीस मिनट पश्चात। हम आर्य नगर पहुंचे। रिक्शे वाले को उसने तीस रूपये देकर सड़क से ही वापस लौटा दिया।
तत्पश्चात वो मुझे एक दो मंजिला मकान के सामने ले गई।
”तुम यहां रहती हो।“
”हाँ।“ - वो दरवाजा खोलती हुई बोली - ”ये हमारा लव-नेस्ट था। मैंने और प्रकाश ने बहुत सारी रातें यहां इकट्ठे बिताई हैं, आओ।“
दरवाजा बंद करके वो मेरी तरफ घूमी।
”तुम बैठो“ - वो बोली - ”मैं कॉफी बना कर लाती हूँ।“
मैंने सहमती में सिर हिला दिया। वो सामने की तरफ एक दरवाजे के पीछे जाकर मेरी नजरों से ओझल हो गई।
मैं फौरन दरवाजे के पास पहुंचा। मैंने सावधानी पूर्वक दरवाजा खोलकर भीतर झांका, वह एक लम्बा-चौड़ा कमरा था जो कि इस वक्त खाली पड़ा था, दाई तरफ एक और दरवाजा नजर आया, मैंने उसे खोलकर देखा, मगर आश्चर्य रोजी वहां भी नहीं थी।
अभी मैं वापस जाने की लगा था कि मुझे रोजी की आवाज सुनाई दी।
”हल्लो, मैं यहां हूँ।“
मैं आवाज की दिशा में पलट गया।
सामने रोजी खड़ी थी, अब तो मेरी हालत रंगे हाथों पकड़े जाने जैसी होकर रह गई।
”किसे तलाश रहे हो?“
”तु...तुम्हें..... और भला कौन है यहाँ?“
”कोई खास वजह थी।“
‘‘माचिस‘‘
”माचिस।“ - वो तनिक चौंकी।
”सिगरेट सुलगाना है मेरा लाइटर काम नहीं कर रहा।“
‘‘अभी लाई।‘‘
उसने एक माचिस लाकर मेरी हथेली पर रख दिया।
एक सिगरेट सुलगाने के पश्चात् मैंने माचिस उसे वापस लौटा दिया, वो माचिस लेकर अंदर चली गई, मैं वापस बैठक में आ गया।
थोड़ी देर बाद वो कॉफी की ट्रे हाथ में पकड़े हुए ड्राइंग रूम में दाखिल हुई। कपों को सेंट्रल टेबल पर रखने के पश्चात् वो एक स्टूल पर बैठ गई।
‘‘क्या है उस चिट्ठी में जिसके लिए राकेश इतनी बुरी तरह पेश आया था तुम्हारे साथ?“
‘‘लो तुम खुद देख लो।‘‘
कहकर उसने अपनी अंगिया से वो चिट्ठी निकालकर मेरे हवाले कर दी। मगर वो कोई चिट्ठी नहीं थी, एक स्टॉम्प पेपर था। जिसके एक कोने में जूही के सिग्नेचर मौजूद थे, कागज पर दो लोगों के हस्ताक्षर और थे जिनमें से एक किसी वकील के थे और दूसरा खुद प्रकाश का था। दोनों व्यक्तियों ने अपने सिग्नेचर के आगे अपना पूरा नाम और पता लिखा था। मैंने चिट्ठी पढ़ना शुरू किया। इबारत कुछ यूं थी।
‘‘ओह गॉड ये आदमी तो मुझे कातिल साबित करने की कसम खाये बैठा है।‘‘
‘‘मैं नहीं, तुम्हारे कुकर्म तुम्हें कातिल साबित करेंगे। फिर अपने घर से हजारों मील दूर इस शहर में अपनी मौजूदगी का क्या जवाब है तुम्हारे पास! नहीं मैडम तुम नहीं बच सकतीं।‘‘
‘‘मगर मैंने प्रकाश का कत्ल नहीं किया है।‘‘
‘‘ये बात तुम पुलिस को समझाना।‘‘
”सुनो! तुम इस किस्से को यहीं खत्म क्यों नहीं कर देते?“
‘‘कर देता हूं मगर पहले तुम मुझे सारी बात बताओ, बिना कुछ छिपाये, बदले में मैं तुमसे वादा करता हूं कि कम से कम मेरी वजह से पुलिस तुम तक नहीं पहुंचेगी। खुद तलाश कर ले तो जुदा बात है।‘‘
‘‘तुम इन बेवजह के पचड़ों में क्यों पड़ते हो, भूल क्यों नहीं जाते ये सब?‘‘
कहती हुई वो मेरे पहलू में मुझसे सटकर बैठ गई उसका एक उरोज मेरी कोहनियों पर दस्तक देने लगा। अचानक जैसे उसे याद हो आया था कि वो एक लड़की थी - एक ऐसी लड़की जिसपर जवानी झूम कर आई थी। जिसका अंग-अंग सांचे में ढला हुआ था। लिहाजा उसने अपना आखिरी हथियार आजमाना शुरू कर दिया था।
”नहीं भूल सकता - अब ये किस्सा खत्म नहीं हो सकता।“
”हो सकता है“ - वो अपना एक हाथ मेरी जांघ पर रखती हुई बोली - ”तुम्हारे किए हो सकता है।“
मैं खामोश रहा।
वह धीरे से उठकर खड़ी हो गई। उसने अपना गाउन उतार कर एक तरफ फैंक दिया। मैंने हड़बड़ा कर राकेश की तरफ देखा। वो खामोशी से बैठा हुआ सिगरेट फूंक रहा था।
”देखो“ - रोजी बोली - मैं प्रकाश के कमरे में गई थी, इसकी खबर सिर्फ तुम्हें है, इस बाबत अगर तुम खामोशी अख्तियार कर लो तो पुलिस को हरगिज-हरगिज भी ये पता नहीं चलेगा की मैं मौका-ए-वारदात पर गई थी।‘‘
”मैं ऐसा क्यों करूँगा?“
”मेरी खातिर, अपनी रोजी की खातिर, देखना कितनी ऐश कराती है ममा तुम्हे।“
मैं हकबकाया! कैसी हर्राफा थी वो, अभी यार की चिता भी नहीं जली थी और वो मुझे अपनी जवानी के हिंडोले पर झूला झुलाने की तैयारी कर रही थी।
‘‘तुमने कभी जन्नत की सैर की है?‘‘ वो बोली।
‘‘नहीं।‘‘
‘‘मैं कराऊंगी, बस इस कहानी को यहीं खत्म कर दो।‘‘
कहकर उसने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर बड़े ही मादक अंदाज में अंगड़ाई ली।
मुझे अपना गला सूखता सा प्रतीत हुआ।
”मैं कैसी लग रही हूँ?“
‘‘एक नम्बर की छिनाल।“
तत्काल उसके चेहरे पर हाहाकारी भाव आये। मुझे लगा वो मुझपर झपटने वाली है। मगर ऐसा नहीं हुआ। वहीं खड़ी वो अपनी मुट्ठियां खोलती बंद करती रही। इस दौरान उसके चेहरे पर एक के बाद दूसरे भाव आये और चले गये।
मैंने एक सिगरेट सुलगा लिया।
‘‘आराम से बैठ जाओ बहन-जी, और यकीन जानों बिना जुबान खोले तुम्हारी खलासी नहीं होने वाली।‘‘
जवाब मैं वह कुछ कहते-कहते चुप हो गयी। उसने एक नजर राकेश पर डाली मगर उधर से कोई प्रोत्साहन मिलता ना पाकर धम्म से सोफे पर बैठ गयी।
‘‘क्या जानने चाहते हो?“
”सबसे पहले तो तुम हवेली में घटित एक महीने पुरानी घटना का खुलासा करो। तुमने जूही के डैडी पर चाकू से हमला करने का अभिनय क्यों किया, जूही द्वारा गोली चलाये जाने के बावजूद तुम जिन्दा कैसे बच गई और फिर प्रकाश ने तुम्हे कब्र में दफनाने का अभिनय क्यों किया?“
”देखो मैंने जो भी किया - प्रकाश के कहने पर किया, अपने प्यार के हाथों मजबूर होकर किया। इसलिए किया क्योंकि मैं प्रकाश की सलामती के प्रति फिक्रमंद थी।“
”यानी की जूही के हाथों कत्ल होने का अभिनय करने के लिए तुम्हें प्रकाश ने कहा था।“
”हाँ।“
”क्यों?“
‘‘मैं सिर्फ इतना जानती हूं कि कोई लाल हवेली खरीदना चाहता था, और प्रकाश उसकी मदद कर रहा था।‘‘
‘‘खरीददार कौन था?‘‘
”मैं नही जानती प्रकाश ने मुझे इस बारे में कभी कुछ नहीं बताया।“
”लेकिन तुम्हारे कत्ल की नौटंकी से हवेली कैसे बिक सकती थी?“
”क्योंकि वो जो कोई भी था, जूही के डैडी को ब्लैकमेल करके उनसे लाल हवेली का सौदा करना चाहता था। जिस वक्त जूही ने मुझ पर फायर किया उस वक्त की कुछ तस्वीरें ले ली गई थीं। उन्हीं तस्वीरों को हथियार बनाकर मानसिंह को ब्लैकमेल करने का प्लान था। मगर इससे पहले कि वो ऐसा कुछ कर पाता मानसिंह की मौत हो गई और कहानी खत्म।“
”बाद में उसने वैसी ही कोई कोशिश जूही पर क्यों नहीं की?“
”की गई थी, ये काम दिलावर सिंह को सौंपा गया। मगर जूही किसी भी कीमत पर हवेली का सौदा करने को राजी नहीं हुई, जेल भिजवाने की धमकी का भी उसपर कोई असर नहीं हुआ। दिलावर सिंह के जरिए उसपर कई बार दबाव बनाने की कोशिश की गयी मगर कोई फायदा नहीं हुआ।“
”क्या मानसिंह की मौत में दिलावर का हाथ हो सकता है?“
‘‘ईडिएट वो महज एक दुर्घटना थी, दूसरी बात अगर ऐसा नहीं भी था तो दिलावर को उसकी मौत से कुछ भी हॉसिल नहीं था, उल्टा अगर वे कुछ दिन और जिन्दा रह जाते तो दिलावर उन्हे हवेली बेचने का मजबूर कर सकता था, और हवेली के असली खरीदार से उसे मोटी रकम हासिल हो सकती थी।“
”वो खलीफा जो कोई भी है, वो हवेली क्यों खरीदना चाहता है?“
”मुझे नहीं मालूम।“
”प्रकाश के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है?“
”क्या मतलब?“
”उसका कत्ल क्यों हुआ?“
”अब मैं क्या कह सकती हूँ?“
”कोई अंदाज तो लगा ही सकती हो।“
फौरन उसने इंकार में सिर हिलाया।
”क्या उसका कत्ल दिलावर सिंह ने किया या करवाया हो सकता है?“
”मैं इस बारे में कुछ भी नहीं कह सकती।“
”फिर किस बारे में कहोगी?“
वो खामोश रही।
”तुम लाल हवेली क्यों गई थी?“
”प्रकाश के बुलावे पर।“
”अक्सर जाती हो।“
”नहीं, मानसिंह की मौत के बाद ये मेरा दूसरा फेरा था।“
‘‘पहले फेरे में भूत बनकर जूही को डराने गयी थीं।‘‘
‘‘हां।‘‘
”आज क्यों गई थी?“
”कहा न प्रकाश के बुलाने पर।“ वो झल्ला उठी।
”मैंने सुना था, मेरी उसमें कोई दिलचस्पी नहीं, मैं ये जानना चाहता हूँ कि प्रकाश ने तुम्हें क्यों बुलाया था?“
”मुझे नहीं मालूम।“
”या फिर बताना नहीं चाहती।“
”देखो मुझे सचमुच नहीं मालूम की प्रकाश ने मुझे क्यों बुलाया था। मुझसे मुलाकात हो पाने से पहले ही वो कत्ल कर दिया गया। लिहाजा कारण जो भी था वो प्रकाश के साथ ही खत्म हो गया।“
”ऐसा तुम कहीं इसलिए तो नहीं कह रहीं क्योंकि तुम्हारी किसी भी बात को झूठा साबित करने के लिए प्रकाश अब जीवित नहीं है।“
”मैं सिर्फ और सिर्फ हकीकत बयान कर रही हूँ।“
”चलो मान लिया कि तुम सच कह रही हो, तुमसे मुलाकात होने से पहले ही प्रकाश का कत्ल हो चुका था, मगर जब तुम्हें मालूम था कि प्रकाश मर चुका है, तो फिर तुम दोबारा उसके कमरे में क्या करने गई थी?“
”वो .... वो.... मैं अपना पर्स भूल आई थी, जो कि मेरा रिश्ता प्रकाश के कत्ल से जोड़ सकता था, उस पर्स के सहारे पुलिस बड़ी आसानी से मुझ तक पहुंच जाती। वो पर्स लेने के लिए मैं दोबारा प्रकाश के कमरे में गई।“
”तुम झूठ बोल रही हो।“
”क.....क.....क्या?“ वह हकलाती हुई बोली - ”क्या कहना चाहते हो तुम?“
”यही कि प्रकाश के कमरे में दोबारा तुम इसलिए नहीं गई क्योंकि वहाँ तुम्हारा पर्स रह गया था बल्कि इसलिए गई क्योंकि तुम्हें वो चिट्ठी चाहिए थी जो अभी भी तुम्हारे गिरेबां में तुम्हारी अंगिया के भीतर मौजूद है।“
मेरी बात सुनकर वो हकबका सी गई। जबकि राकेश अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ, वो सधे कदमों से चलता हुआ रोजी के करीब पहुंचा।
”चटाख।“ - अपने दाहिने हाथ का एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसने रोजी के गाल पर रसीद कर दिया।
”हरामजादी“ - वो नफरत भरे स्वर में बोला - ‘‘तू मुझे डबल क्रास करना चाहती थी।“
रोजी के मुंह से बोल तक न फूटा।
”अगर तेरी इस हरकत की खबर दिलावर साहब को लग गई तो वह तुझे जिंदा दफन करवा देंगे।“
”तुम गलत समझ रहे हो, मेरा वैसा कोई इरादा नहीं था। अगर होता तो मैं यहां वापस लौटकर क्यों आती?“
”तो फिर यहां आते के साथ ही तूने ये क्यों कहा कि वह प्रोनोट तुझे नहीं मिला। वो प्रकाश के पास था ही नहीं, और अगर था तो कातिल उसे अपने साथ ले गया।“
”वो तो मैंने यूंही मजाक में कह दिया था, मेरा इरादा बाद में उसकी बाबत सबकुछ तुम्हें सच-सच बता देने का था।“
”ठीक है तू सही है, मैं ही बेवजह तुझ पर शक कर बैठा। अब ला वो प्रोनोट मुझे दे दे।“
कहते हुए राकेश ने अपना एक हाथ उसके आगे फैला दिया।
”नहीं“ -रोजी दो कदम पीछे हट गई - ”वो चिट्ठी मैं तुम्हें नहीं दूंगी।“
”क्यों?“
”मुझे तुम पर ऐतबार नहीं है।“
”अब हो जायेगा“ - कहते हुए राकेश ने रिवाल्वर निकालकर उस पर तान दिया - ‘‘अब क्या कहती है?“
”वो प्रोनोट मैं तुम्हें किसी भी कीमत पर नहीं दूँगी।“
”चाहे जान चली जाए।“
रोजी खामोश रही, उसने एक बार अपने सूख आये होठां पर जुबान फिराकर उन्हें तर किया फिर मदद मांगती निगाहों से मेरी तरफ देखा।
उसकी निगाहों का अनुसरण करता हुआ राकेश मेरी तरफ घूम गया।
”ओह तो जनाब जिन्दा हैं, अभी तक।“
”क्या मतलब?“ - मैं हड़बड़ाया।
”मतलब ये ......धांय।“ उसने गोली चला दी।
ठीक उसी वक्त रोजी ने उसे धक्का दे दिया। निशाना चूक गया। गोली मेरे सिर के काफी ऊपर से गुजर गई।
वह सम्भला, सम्भलकर उसने पुनः मुझे निशाना बनाना चाहा। मैंने तत्काल अपनी रिवाल्वर निकालकर राकेश की दिशा में फायर झोंक दिया। गोली उसकी खोपड़ी में जा घुसी। खोपड़ी के परखच्चे उड़ गये। रोजी दरवाजे की तरफ भागी, हड़बड़ाकर मैं उसके पीछे दौड़ा। तब तक वो दरवाजा पार कर चुकी थी। कमरे से निकलकर मैंने अपने आजू-बाजू निगाह दौड़ाई, वो मुझे सीढ़ियां उतरती दिखाई दी। मैं पूरी ताकत से उसकी दिशा में दौड़ पड़ा।
ग्रॉउंड फ्लोर पर पहुंच पाने से पहले ही मैंने उसे दबोच लिया।
”छोड़ो-छोड़ो“ - वो मेरी पकड़ में छटपटाती हुई बोली - ”मैं किसी को नहीं बताऊँगी की राकेश का कत्ल तुमने किया है। बदले में तुम्हें मेरी जानबख्शी करनी होगी।“
”नॉनसेंस मैंने आत्मरक्षा के लिए उस पर गोली चलाई थी, अगर मैं ऐसा नहीं करता तो वह मुझे जान से मार देता, वो सिर्फ सैल्फ डिफेंस था ना कि कत्ल।“
‘‘फिर तो मैं तुम्हारे लिए बहुत काम की साबित हो सकती हूँ, मैं तुम्हारे पकड़े जाने पर एक चश्मदीद गवाह की हैसियत से तुम्हारे हक में गवाही दे सकती हूँ, यू नो।“
”यस स्वीट हार्ट।“
”मेरे कत्ल से तुम्हे क्या हॉसिल होगा।“
”कुछ भी नहीं।“
”फिर तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो?“
”क्या बकती हो मैं ऐसा क्यों चाहूँगा?“
”तो फिर मुझे पकड़ने के लिए क्यों दौड़े थे?“
”तुम वहां से भागी ही क्यों?“
”मैंने सोचा“ - वो बड़े ही मासूम अंदाज में बोली - ”कि राकेश का कत्ल करने के बाद तुम मेरा भी कत्ल कर दोगे, क्योंकि मैंने तुम्हें उसका कत्ल करते देख लिया था। बस यही सोचकर मैं वहाँ से भाग खड़ी हुई।“
”वो फ्लैट किसका था?“
”मालूम नहीं, वैसे राकेश कहता है कि वो उसके किसी फ्रैंड का है जो कि इन दिनों कहीं बाहर गया हुआ है। जाने से पहले वो देखभाल के लिए फ्लैट की चाभी राकेश को सौंप गया था।“
”यानी की तुम यहां नहीं रहती हो।“
”नहीं।“
”तो फिर कहाँ रहती हो?“
”आर्य नगर में।“
”अब वहीं जाओगी।“
‘‘हाँ।‘‘
”अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हारे साथ वहां तक चल सकता हूं।“
”थैंक्यू“ - वो बोली - ”तुम अच्छे आदमी लगते हो। इसलिए मैं जो कुछ भी जानती हूं तुम्हें बता देना चाहती हूं।‘‘
बाहर आकर हम दोनों एक साइकिल रिक्शा पर सवार हो गये।
पूरे रास्ते वो मुझसे सटी सिमटी-सी बैठी रही। और यदा-कदा रिक्शे वाले को तेज चलने के लिए हाँक लगा देती थी।
तकरीबन बीस मिनट पश्चात। हम आर्य नगर पहुंचे। रिक्शे वाले को उसने तीस रूपये देकर सड़क से ही वापस लौटा दिया।
तत्पश्चात वो मुझे एक दो मंजिला मकान के सामने ले गई।
”तुम यहां रहती हो।“
”हाँ।“ - वो दरवाजा खोलती हुई बोली - ”ये हमारा लव-नेस्ट था। मैंने और प्रकाश ने बहुत सारी रातें यहां इकट्ठे बिताई हैं, आओ।“
दरवाजा बंद करके वो मेरी तरफ घूमी।
”तुम बैठो“ - वो बोली - ”मैं कॉफी बना कर लाती हूँ।“
मैंने सहमती में सिर हिला दिया। वो सामने की तरफ एक दरवाजे के पीछे जाकर मेरी नजरों से ओझल हो गई।
मैं फौरन दरवाजे के पास पहुंचा। मैंने सावधानी पूर्वक दरवाजा खोलकर भीतर झांका, वह एक लम्बा-चौड़ा कमरा था जो कि इस वक्त खाली पड़ा था, दाई तरफ एक और दरवाजा नजर आया, मैंने उसे खोलकर देखा, मगर आश्चर्य रोजी वहां भी नहीं थी।
अभी मैं वापस जाने की लगा था कि मुझे रोजी की आवाज सुनाई दी।
”हल्लो, मैं यहां हूँ।“
मैं आवाज की दिशा में पलट गया।
सामने रोजी खड़ी थी, अब तो मेरी हालत रंगे हाथों पकड़े जाने जैसी होकर रह गई।
”किसे तलाश रहे हो?“
”तु...तुम्हें..... और भला कौन है यहाँ?“
”कोई खास वजह थी।“
‘‘माचिस‘‘
”माचिस।“ - वो तनिक चौंकी।
”सिगरेट सुलगाना है मेरा लाइटर काम नहीं कर रहा।“
‘‘अभी लाई।‘‘
उसने एक माचिस लाकर मेरी हथेली पर रख दिया।
एक सिगरेट सुलगाने के पश्चात् मैंने माचिस उसे वापस लौटा दिया, वो माचिस लेकर अंदर चली गई, मैं वापस बैठक में आ गया।
थोड़ी देर बाद वो कॉफी की ट्रे हाथ में पकड़े हुए ड्राइंग रूम में दाखिल हुई। कपों को सेंट्रल टेबल पर रखने के पश्चात् वो एक स्टूल पर बैठ गई।
‘‘क्या है उस चिट्ठी में जिसके लिए राकेश इतनी बुरी तरह पेश आया था तुम्हारे साथ?“
‘‘लो तुम खुद देख लो।‘‘
कहकर उसने अपनी अंगिया से वो चिट्ठी निकालकर मेरे हवाले कर दी। मगर वो कोई चिट्ठी नहीं थी, एक स्टॉम्प पेपर था। जिसके एक कोने में जूही के सिग्नेचर मौजूद थे, कागज पर दो लोगों के हस्ताक्षर और थे जिनमें से एक किसी वकील के थे और दूसरा खुद प्रकाश का था। दोनों व्यक्तियों ने अपने सिग्नेचर के आगे अपना पूरा नाम और पता लिखा था। मैंने चिट्ठी पढ़ना शुरू किया। इबारत कुछ यूं थी।