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लाल हवेली



जबकि वह डॉली की चोटों को आंखेंफाड़े देख रहा था।

"ये...ये सब कैसे हुआ सदा...किसने किया...?" उसने भावुक स्वर में पूछा। निश्चित ही वह डॉली से परिचित था।

डॉली ने रोते-बिलखते उसी गुण्डे की ओर हाथ उठाकर इशारा कर दिया।

बस, वो इशारा ही काफी था।

पुलिस इंस्पेक्टर एक सिपाही का डंडा लेकर गुण्डे के ऊपर टूट पड़ा।

वह पहले ही टूटा-फूटा था, उस दोहरी मार ने उसके सारे कस-बल निकाल डाले।

"इंस्पेक्टर..!" एक बार बीच में गुण्डे ने उसके ऊपर डंडे को पकड़ते हुए कठोर स्वर में कहा-"ये तू अपनी सेहत के लिए ठीक नेई करेला है। तेरे कू भोत भारी पड़ेगा इस मामले में हाथ डालना।"

"मुझे धमका रहा है...कुत्ते! मुझे!" इंस्पेक्टरचिल्लाकर बोला।

"जग्गू जगलर धमकाता नेई...क्या बाप।" गुण्डे ने अकड़ते हुए कहा-"कर को बताएला है...बीच में कोई लफड़ा...कोई भंकस नेई मंगता! अ ब्बी का अबी इस छोकरी के साथ अपुन कू इधर से फुटा दे वरना तेरा पुलिस स्टेशन भैंस का तबेला बन जाएंगा...समझा क्या!"

"जग्गू जगलर. इस लड़की को जानता है?"

"छोकरी को जानने का काम अपुन का नेई...अपुन तो बॉस लोग का आर्डर मानता...बस उसके बाद झकास! काम फिनिशि। अबी तू भी अपुन कू जाने दे वरना तू भी फिनिश। खलास।" जग्गू जगलर मुंह टेढ़ा करता हुआ विषाक्त स्वर में बोला।

"फिनिश तो तुझे मैं कर डालूंगा

हरामजादे...देख इधर...पहचान ले इसे...ये-ये मेरी बहन है डॉली...! डॉली मेहरा। इंस्पेक्टर सतीश मेहरा की बहन! और अब तू देखेगा कि धमकी देकर तूने किस तरह अपनी मौत को बुलावा दिया है।"

इस बार दोनोंहाथों से डंडा थामकर उसने जग्गू जगलर को पीटना शुरू किया तो बिछा डाला उसे।

अभी वह डंडा फेंककर गुस्से में उफनता हुआ अपनी सीट पर बैठा ही था कि टेलीफोन की घंटी बज उठी।

"चैम्बूर पुलिस स्टशेन...।" इंस्पेक्टर सतीश मेहरा रिसीवर कान से लगाना हुआ उखड़े हुए स्वर में बोला। ‘

"रंजीत सावन्त...मंत्री धरम सावन्त का भाई...समझा तू इंस्पेक्टर..!" दूसरी ओर से बेहद कर्कश आवाज उभरी। उसे इयरपीस कान से परे खिसका लेना पड़ा।

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सतीश खामोश रहा। रंजीत सावन्त की आवाज सुनते ही उसका खून खौल उठा।

 
जग्गू जगलर को छोड़ दे सतीश मेहरा..और सुन! उसे हाथ मत लगा देना। वो मेरा आदमी है। अगर उसे हल्की -सी खरोंच भी आ गई तो...!"

"जग्गू को छोड़ा नहीं जा कसता।" सतीश विद्रोही स्वर में गुर्राकर बोला।

"मेरे किसी काम के लिए ये तेरा दूसरा इंकार है...इंस्पेक्टर। लगता है तुझे अपनी नौकरी प्यारी नहीं।"

"कानून की मुहाफिज पुलिस का पहला फर्ज है कानून की रक्षा करना। अगर माशरे का पुलिस के ऊपर से एतबार उठ गया तो फिर खूनी क्रान्ति यकीनी है। इसलिए जब तक अपनी कुर्सी पर कायम और दायम हूं तब तक किसी भी किस्म की धमकी से डरे बिना मैं कानून के हित में काम करता रहूंगा...इसके लिए नौकरी तो क्या अगर जान भी चली जाए तो उससे भी पीछे नहीं हटूंगा।"

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"बहुत जोश है तुझमें...हूं न...बहुत जोश है.. और जोश इसलिए है क्योंकि मामला तेरी बहन का है। अपनी बहन की खातिर तू यकीनन अपनी जिन्दगी को दांव पर लगा सकता है। और शायद तुझे अपनी जिन्दगी दांव पर लगानी ही पड़ जाए। सबरकर सतीश मेहरा...मैं आ रहा हूं...मैं आ रहा हूं वह।"

इंस्पेक्टर सतीश मेहरा के चेहरे का चेहरे का रंग बदल गया। दहशत की काली परछाई उसकी आंखेंमें साफ उतरी नजर आ रही थी।

राज उसके चेहरे के उतार-चढ़ाव देख रहा था। बहुत धीरे-से उसने रिसीवर क्रैडिल पर रखा फिर वह जग्गू जगलर की ओर मुड़ता हुआ ऊंचे स्वर में बोला-"सखाराम...इसे हवालात में डाल दो।"

तुरन्त दो सिपाही आगे आए। उन्होंने जग्गू जगलर को हवालात में डालकर ताला डाल दिया।

सतीश किसी गहरे सोच में डूबा हुआ था।

राज ने आगे बढ़कर उसके करीब पहुंचते हुए पूछा-"कोई परेशानी हो तो मुझे बता सकते हो...निस्संकोच।"

तब सतीश मेहरा ने पहली बार उसकी ओर गौर से देखा।

"तुम कौन हो?"

"भैया...इन्होंने ही मुझे लाल बत्ती वाले मोड़ पर उस शैतान से बचाया था।" डॉली बीच में दखल देती हुई बोली

"ओह...आई सी। मैंने आपकी तरफ ध्यान ही नहीं दिया। सॉरी क्षमा चाहता हूं। आपने मेरी बहन को बचाया इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। बदले में मैं आपकी कोई मदद कर सकू तो अपने आपको धन्य समझंगा।"

"नहीं-नहीं, बदले जैसी कोई बात नहीं है। किसी लड़की को मुश्किल से बचाना तो मेरा फर्ज बनता है। डॉली की मदद करने वाला उस घड़ी कोई नहीं था और मुझे मदद करनी थी इसलिए मेरा बीच में आना जरूरी हो गया था, लेकिन अभी मुझे कुछ ऐसी स्थिति बनती नजर आ रही है कि तुम इस जग्गूजगलर के आ जाने से किसी भारी उलझन में पड़गए हो।"

सतीश मेहरा ने इस बार उसे कुछ अधिक ही गौर से देखा। राज उसकी समझ से परे की चीज बनता जा रहा था...एक पहेली की तरह। उसे लगा कि वह अजनबी उसकी परेशानी को उसके चेहरे से पढ़ चुका था।

"हिचकिचाने की जरूरत नहीं है। तुम मुझे अपने सगेवाला मान सकते हो। मैं किसी भी प्रकार की मदद करने में सक्षम हूं। मुझ पर किसी भी प्रकार से भरोसा कर सकते हो।"

"इतनी मदद की-उसका बहुत-बहुत शुक्रिया। फिलहाल मुझे किसी प्रकार की मदद नहीं चाहिए।"

"तो फिर ठीक है...मै चलता हूं।"

सतीश ने गर्मजोशी के साथ उससे हाथ मिलाया। फिर राज वहां से बाहर निकल गया।

सतीश ने डॉली की चोटों की ओर ध्यान देते हुए एक सिपाही को डॉली के साथ निकट के क्लीनिक में भेज दिया। डॉली उस समय वहां से जाना नहीं चाहती थी किन्तु अन्तत: उसे जाना ही पड़ा।

सतीश की मन स्थिति ठीक नहीं थी। अंदर ही अंदर वह विचलित था। जैसे-जैसे वक्त गुजरता जा रहा था। वैसे-वैसे उसके अंदर की घबराहट बढ़ती जा रही थी।"

"इंस्पेक्टट...।" हवालात के अंदर से जग्गू जगलर कर्कश स्वर में गुर्राकर बोला-"अपुन से पंगा लेकर तूने अच्छा नेई किया। तेरे कू भुगतना पड़ेगा। अबी तू जग्गू जगलर को जानताइच नेई...क्या। अपुन भोत डेंजर अरदमी है...भोत डेंजर

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इंस्पेक्टर सतीश ने कहर भरी नजरों से उसे घूरा। बोला कुछ नहीं।

"देखता क्या है...अपुन तेरे कू छोड़ेगा नेई...कतई नेई छोड़ेगा।।"

अभी सतीश उससे कुछ कहना ही चाहता था कि अचानक ही कारों के इंजनों के शोर से पुलिस स्टेशन गूंजउठा। धड़धड़ाते हुए कितने ही बंदूकधारी नेता अंदर दाखिल होते चले गए। और...।
 
इससे पहले कि सतीश कुछ संभल पाता...कुछ कर पाता कितने ही आदमी उसके ऊपर टूट पड़े। बिना किसी पूछताछ के एक ईमानदार पुलिस ऑफीसर अपने ही पुलिस स्टेशन के अंदर पिट रहा था।

वहां मौजूद सिपाहियों को भी बुरी तरह मारा जा रहा था।

किसी ने हवालात की चाबी हासिल करके जग्गू जगलर को आजाद कर दिया।

उनका बॉस लम्बे-चौड़े जिस्म का मालिक, तीस के पेटे में पहुंचा हुआ व्यक्ति था। उसने सफेद कुर्ते के नीचे जींस पहन रखी थी।

___ "तूने मेरी बात नहीं मानी इंस्पेक्टर...।" जींस वाला लम्बाआदमी सतीश के सिर के बालों को क्रूरतापूर्वक अपने दाएं हाथ के पंजे में जकड़ता हुआ बोला-"मेरे आदमी को छूने की गलती की...देख क्या हश्र हुआ तेरा...देख-देख...तेरे ही पुलिस स्टेशन के अंदर तेरी कैसी दुर्गत हुई है...और अभी इससे भी अधिक दुर्गत होनी शेष है। जग्गू जगलर....इधर आ। इधर आ कुत्ते ले बदला अपने अपमान का। आ!"

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जग्गू जगलर तेजी से आगे आया।

उसने सतीश को लात-घूसों से मारना आरंभ कर दिया।

"कुत्ते...जूते का प्रयोग कर इज्जत उतारने की खातिर जूता चलाया जाता है। इसका वो हाल करके छोड़ ताकि फिर कभी कोई पुलिसिया हमारा विरोध करने का दुस्साहस न संजो सके।"

पुलिस स्टेशन के अंदर जन प्रतिनिधि द्वारा अनाचार पूर्ण अत्याचार आरंभ हो गया।

सतीश को हर तरह से पीटा जा रहा था।

पिटते-पिटते वह लहूलुहान हो गया। बहुत बुरी हालत हो गई उसकी।

"सुन...।"

जींस वाले व्यक्ति ने भद्दी-सी गाली देते हुए विषाक्त स्वर में कहा

__ "मुझे कहते हैं रंजीत सावंत...मंत्री जी का भाई होता हूं...क्या होता हूं..भाई! समझा। और देख...इधर...।" उसने जग्गू की ओर संकेत किया "ये होता है जग्गू जगलर...जिसने अभी-अभी जूते से पीटकर तेरी भद्रा उतारी है। हम दोनों मिलकर तेरी बहन को उठा भी लेंगे और पूरा काम भी डालेंगे... तू कुछ नहीं कर सकेगा। बाकी रही तेरी नौकरी...तो नौकरी करना तो तू अपने आप ही भूल जाएगा।"

सतीश के गले में खून भरने लगा था इसलिए उसने उसे थूक दिया। बुरी हालत हो रही थी उसक।

"और आखिरी वार्निंग भी सुन ले। अगर ज्यादा हाथ पांव चलाने की कोशिश की तो कसम जग्गू जगलर की तू जान से जाएगा। जान से जाएगा तू...समझा!"

इंस्पेक्टर सतीश उस घड़ी सुनने की ही स्थिति में था। कुछ कहने की स्थिति उसकी थी ही नहीं।

वह तो मन ही मन डॉली के लिए चिन्तित था कि कहीं उस समय डॉली वापस न लौट आए। क्योंकि डॉली की वापसी होने पर वह डॉली को किसी भी कीमत पर उन जालिमों के हाथों छुड़ा नहीं सकता था। अन्याय का तूफान आकर गुजर गया।

डॉली के मामले में किस्मत ने उसका साथ दिया। सिपाही डॉली को नर्सिंग होम से उसके घर तक छोड़ने चला गया था। वह उसे पुलिस स्टेशन में वापस लेकर नहीं लौटा। जब वह लौटा तो पुलिस स्टेशन का हाल देखकर उसे विश्वास नहीं हुआ।

इंस्पेक्टर सतीश की हालत बहुत खराब थी। उसके मुंह से खून बराबर निकल रहा था। वह उस सिपाही के साथ तुरन्त ही बाहर चल पड़ा। अभी वह कुछ ही दूर गया था कि रास्ते में उसे राज मिल गया।

"अरे...ये तुम्हें क्या हुआ इंस्पेक्टर...?" राज जल्दी से सहारा देता हुआ बोला।

"पहले मुझे अस्पताल ले चलो फिर सब बता दूंगा।"

वो ढेर सारी गाड़ियां क्या पुलिस स्टेशन ही गई थीं?" उसने शंकितस्वर में पूछा।

"हां।"

"ओह...तभी मुझे शक हो रहा था।"

"शैतान से पाला पड़ा है...आह।"

"और तुम्हारी बहन...डॉली?"

"फिलहाल सुरक्षित है।"

"घबराओ नहीं इंस्पेक्टर...सब ठीक हो जाएगा।" कहते हुए राज ने सिपाही के साथ मिलकर सतीश को सहारा दिया और फिर वहां से सीधा अस्पताल पहुंचा। उसकी वर्दी का लिहाज करते हुए उसे तुरन्त ही एडमिट कर लिया गया।
 
प्राथमिक चिकित्सा के बाद डाक्टर उसे आराम करने के लिए कहकर चला गया।

राज उसके साथ ही था।

हालांकि उसे भय था कि पुलिस इंस्पेक्टर उसे पहचान सकता था। खासकर दिल्ली और मुम्बई पुलिस के लिए वह यानि राज शर्मा उर्फ लायन मोस्ट वांटेड था।

ये फ्लैश के खिलाड़ी की तरह ब्लफ चाल थी कि बेझिझक पुलिस के सामने था। यूं फोटो और हकीकत में फर्क होता है। पुलिस के पास उसकी जोफोटोथी वो भी कुछ आड़ी-तिरछी थी, इस बात को भी वह जानता था।

कोई आकर फोटो सामने रखे और इशारा भी करे कि यही लायन है तब ही उसकी शिनाख्त हो सकती थी।

जो भी था वह रिस्क उठा रहा था। उसके सिद्धान्त में ये सम्मिलित था कि वह जुल्म के खिलाफ कभी खामोश न रहे। हमेशा जालिम का विरोध करे और मजलूम की मदद करे।

। हालांकि पुलिस से उसकी पुरानी दुश्मनी थी किन्तु यहां पुलिस अधिकारी दुश्मनी योग्य नहीं था बल्कि उसे स्वयं मदद की जरूरत थी। न जाने क्यों उसने मन ही मन सतीश मेहरा की मदद करने का निश्चय कर लिया था। वह उसे सीधा आदमी लगा था

__ "अब कैसा महसूस हो रहा है।" राज ने उससे पूछा।

___ "पहले से ठीक हूं...।" सतीश कमजोर से स्वर में बोला।

"यहां से चलना चाहोगे?"

"अभी सिर्फ फोन करना चाहता हूं।"

"किसे...?"

"अपने ए. सी. पी. को।"

"चलो।"

राज उसे सहारा देकर ले चला। अस्पताल के रिसेप्शन काउंटर पर फोन पर मौजूद था।

इंस्पेक्टरसतीश मेहरा नम्बर ने डायल किए। थोड़ी देर बाद सम्पर्क स्थापित हुआ।

ए. सी. पी. से वार्ता आरंभ होते ही सतीश ने पूरी रिपोर्ट बयान कर दी।

"कह चुके...?" उसकी पूरी बात सुन लेने के बाद ए. सी. पी. ने दूसरी ओर से कठोर स्वर में कहा-"अब मेरी बात सुनो...तुम्हारे खिलाफ अनुशासनहीनता की कार्यवाही अमल में लायी जा रही है। तुम पर चार्ज ये है कि तुमने मंत्री महोदय के खिलाफ बदसलूकी का परिचय दिया है। उनसे बद्तमीजी की है। इस कारण तुम्हारे खिलाफ विभागीय कार्यवाही की जा रही है। तुम्हारी रिपोर्ट आई. जी. तक पहुंच चुकी है।".

"ये आप क्या कह रहे है...मैंने ऐसा कुछ नहीं किया बल्कि मंत्री महोदय तो पुलिस स्टेशन में आए तक नहीं मेरा उनसे आमना-सामना तक नहीं हुआ।" सतीश गिड़गिड़ाकर बोला।

राज को दूसरी ओर की आवाज तो सुनाई दे नहीं रही थी किन्तु वह सतीश मेहरा का चेहरा देखकर अनुमान लगाने की कोशिश कर रहा था...कुछ गलत हो रहा है, इस बात का वह सहज ही अनुमान लगा चुका था।
 
राज को दूसरी ओर की आवाज तो सुनाई दे नहीं रही थी किन्तु वह सतीश मेहरा का चेहरा देखकर अनुमान लगाने की कोशिश कर रहा था...कुछ गलत हो रहा है, इस बात का वह सहज ही अनुमान लगा चुका था।

सतीश मेहरा देर तक गिड़गिड़ाता रहा,अंतमें दूसरी तरफ से सम्पर्क काट दिया गया।

वह रिसीवर थामे खड़ा रहा।

"क्या हुआ...?" राज ने उसका बाजू थामकर उसे हिलाते हुए पूछा।

"कुछ समझ में नहीं आ रहा है।"

"तुम बताओ तो सही?"

"ए. सी. पी. का कहना है कि मेरे विरुद्ध विभागीय कार्यवाही अमल में लायी जा रही है...।"

"क्यों ?"

"क्योंकि मैंने मंत्री धरम सावंत के साथ बदतमीजी की और उनकें आने के बाद पुलिस स्टेशन में उनका अपमान किया।"

"मंत्री धरम सावंत...."

"हां।"

"लेकिन वह तो वहां नहीं था।"

"यही तो मैं ए. सी. पी. से बार-बार कह रहा था लेकिन वह मेरी बात मान ही नहीं रहा है। उसका कहना है कि गलती मेरी है...सिर्फ मेरी।"

"ये तो सरासर इल्जाम है...झूठा इल्जाम..।" राज चौंकता हुआ बोला।

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"मैं समझ रहा हूं...।"

"क्या समझ रहे हो?"

"यही कि उच्चाधिकारी मंत्री धरम सावंत के दबाव में आकर एक छोटे कर्मचारी के विरुद्ध साजिश रच रहे हैं।"

"साजिश...।" राज विचारपूर्ण स्वर में बड़बड़ाया-"

"यानी बड़े अधिकारियों पर प्रशासन का दबाव...!"

"यही समझ लो।"

"अब तुम क्या करोगे?"

"अपने फेवर में साक्ष्य एकत्रित करूंगा।"

"कहां से?"

"पुलिस स्टेशन से।"

"अपने कर्मचारियों की बात कर रहे हो?"

"हां।"

"कोई जरूरी नहीं कि तुम्हारे कर्मचारी तुम्हारी मदद करें।"

"इसमें मदद वाली कोई बात नहीं है। मैं तो सच्चाई का तलबगार हूं। मैं अपने कर्मचारियों से किसी प्रकार का झूठ बोलने को नहीं कहूंगा, यही कहना चाहूंगा कि जो कुछ उन्होंने देखा हो वही बयान कर दें।"
 
राज मुस्कराया।

उसने इंकार में गर्दन हिलाते हुए कहा-"मुझे नहीं लगता कि कोई तुम्हारी मदद करेगा।"

__"क्यों...क्या मैं उनसे झूठ बोलने के लिए कहूंगा ?"

"कुछ भी कहो। जहां तक मैं समझता हूं, तुम्हारी तरफ से कोई नहीं बोलेगा।"

"नहीं, दो एक सिपाही तो मेरी तरफ से जरूर बोलेंगे।"

"देख लेना...रात पड़ी है। अपने केस की तैयारी कर लेना।"

"ओ. के.!'

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"तो मैं चलूं..।"

"हां...जाओ।"

"कोई जरूरत हो तो बताओ?"

"नहीं...फिलहाल कोई जरूरत नहीं।"

"घबराना नहीं...।"

"सिपाही हूं...सिपाही कभी घबराता नहीं। हर मुश्किल का सामना करने की हिम्मत है मुझमें।"

"हिम्मतवर आदमी की मैं इज्जत करता हूं लेकिन फिर भी अगर कभी जरूरत पड़े तो मैं हर तरह से हाजिर हूं।"

"तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद!"

"इस तरह की औपचारिक बातों से दूरी बढ़ती है।"

"मतलब धन्यवाद से।"

"हां।" राज मुस्कराया।

"अगर कोई सहायता करे तो धन्यवाद देना उचित कार्यवाही है। इसमें कुछ बुरा नहीं है।"

"लेकिन मैं तो उसे सहायता नहीं मानता।"

"तुम खुले दिमाग क, बड़े दिलवाले...सुलझे हुए आदमी हो। अरे हां दोस्त...इतनी मदद के बावजूद अभी तक मैं तुम्हारे नाम से वाकिफ नहीं हो सका हूं।"

"लोग मुझे तपन कहते हैं...तपन सिन्हा।"

"खुशी हुई तुमसे मिलकर।"

"अगर हम औपचारिकताएं भुलाकर अच्छे दोस्तों की तरह एक-दूसरे से मिलें तो कैसा रहे?"

"अच्छा रहें।"

"तो फिर दोस्त बेफिक्र होकर यहां आराम करो। मैंतुमसे सुबह आकर मिलता हूं। घबराना कतई नहीं...मैं हर पल तुम्हारे साथ हूं।"

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"घर जा रहे होगे?"

"यही समझ लो।"

"समझ लो से मतलब?"

"मैं किराए के फ्लैट को भी अपना घर ही मानता हूं...कल ही किराए पर लिया है। सिंधी कालोनी में।"

"कहीं बाहर से आए हो?"

"हां...जालंधर से।" राज ने बड़ी सफाई से झूठ बोला।

"फैमिली साथ लाए होगे?"

"मैं खुद ही फेमिली है।" वह सतीश की आखों में देखता हुआ मुस्कराया।

"यानी तन्हा हो।"

"एकदम।"

"एक बात कहूं मिस्टर तपन...।" __

"कहो...एक नहीं, दो कहो लेकिन तपन के साथ मिस्टर की दुम को हटाकर। सिर्फ तपन कहकर।"

"ओ. के.-ओ के. ! आगे से मैं तुम्हें तपन ही बोलूंगा।"

"अब कहो?"

__ "तुम चैम्बूर रहते हो और मैं मानखुर्द। थोड़ा-सा फासला है दोनों के बीच। मैं चाहता हूं तुम चैम्बूर की जगह मानखुर्द चले जाओ। डॉली घबरा रही होगी। डर रही होगी। दूसरे...जो शैतान उसका अगवा करने की कोशिश कर चुके हैं...वे अपनी उस कोशिश को रिपीट भी कर सकते हैं।"



"हां...ये तो है।"

"अगर तुम वहां रहोगे तो मुझे तसल्ली बनी रहेगी। विश्वास बना रहेगा कि मेरी बहन सुरक्षित

"जा तो सकता हूं लेकिन...।"

"कोई परेशानी हो तो बेझिझक कह सकते हो।"
 
"नहीं...परेशानी तो कोई नहीं है।"

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"तो फिर प्लीज मेरी रिक्यैस्ट मान लो। रहने को इस अस्पताल में पड़ा रहूंगा मगर मेरा दिमाग डॉली की तरफ ही लगा रहेगा। यही सोचता रहूंगा कि न जाने किस हाल में हो वह...जैसे कि इस वक्त दिमाग उसी के लिए परेशान है।"

"मैं चला जाता हूं। सिर्फ इतना बता दो कि मानखुर्द में कहां पहुंचूंगा?"

"उसकी चिन्ता मत करे...मैं तुम्हें वहां पहुंचवाए देता हूं।"

"मुझे पता बता दो...बस।"

"नहीं...वो जो सिपाही मेरे साथ आया है, वही तुम्हें से जाएगा।"

"बेकार ही दौड़ हो जाएगी उसकी।"

"बहुत दूर नहीं है।"

"फिर भी...।"

"फिर भी कुछ नहीं...तुम जाओ उसके साथ ।" कहकर सतीश ने उसे सिपाही के साथ विदा कर दिया।

सिपाही उसे मानखुर्द में एक आठ माले की बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर स्थित इंस्पेक्टरसतीश के फ्लैट में छोड़कर लौट गया।

डॉली ने उसके लिए बैडरूम में व्यवस्था बना दी।

"भैया कब लौटेंगे...?" डॉली ने राज की ओर कॉफी का प्याला बढ़ाते हुए कहा।

__ "अभी सतीश को वहां थोड़ा काम है। उसने कहा था कि काम पूरा होते ही वह वापस लौट ।

आएगा।"

राज कॉफी का प्याला संभालकर नजरें चुराता हुआ बोला। उसकी कोशिश यही थी कि कहीं उसका झूठ पकड़ा न जाए। कहीं उसके चेहरे पर इस किस्म के भाव न आ जाएं कि डॉली उसके झूठ को समझ जाए।

___"लेकिन इतने समय तक तो भैया वहां कभी नहीं रहे। कहीं कोई बात तो नहीं हो गई।"

"कोई बात नहीं हुई, तुम तो बेकार ही परेशान हो रही हो।"

"नहीं, जरूर कोई बात है...मुझसे कुछ छिपा रहे हो।"

"कुछ नहीं छिपा रहा हूं...।"

"सच कह रहे हो।"

"एकदम सच।"

डॉली मेहरा ने अविश्वास पूर्ण दृष्टि से उसकी ओर देखा। उसकी आंखेंकह रही थीं कि उसे राज के कथन पर विश्वास नहीं आ रहा था। वह चुपचाप कुर्सी पर बैठ गई। उसका चेहरा चिंता में डूबा नजर आ रहा था।
 
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