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जबकि वह डॉली की चोटों को आंखेंफाड़े देख रहा था।
"ये...ये सब कैसे हुआ सदा...किसने किया...?" उसने भावुक स्वर में पूछा। निश्चित ही वह डॉली से परिचित था।
डॉली ने रोते-बिलखते उसी गुण्डे की ओर हाथ उठाकर इशारा कर दिया।
बस, वो इशारा ही काफी था।
पुलिस इंस्पेक्टर एक सिपाही का डंडा लेकर गुण्डे के ऊपर टूट पड़ा।
वह पहले ही टूटा-फूटा था, उस दोहरी मार ने उसके सारे कस-बल निकाल डाले।
"इंस्पेक्टर..!" एक बार बीच में गुण्डे ने उसके ऊपर डंडे को पकड़ते हुए कठोर स्वर में कहा-"ये तू अपनी सेहत के लिए ठीक नेई करेला है। तेरे कू भोत भारी पड़ेगा इस मामले में हाथ डालना।"
"मुझे धमका रहा है...कुत्ते! मुझे!" इंस्पेक्टरचिल्लाकर बोला।
"जग्गू जगलर धमकाता नेई...क्या बाप।" गुण्डे ने अकड़ते हुए कहा-"कर को बताएला है...बीच में कोई लफड़ा...कोई भंकस नेई मंगता! अ ब्बी का अबी इस छोकरी के साथ अपुन कू इधर से फुटा दे वरना तेरा पुलिस स्टेशन भैंस का तबेला बन जाएंगा...समझा क्या!"
"जग्गू जगलर. इस लड़की को जानता है?"
"छोकरी को जानने का काम अपुन का नेई...अपुन तो बॉस लोग का आर्डर मानता...बस उसके बाद झकास! काम फिनिशि। अबी तू भी अपुन कू जाने दे वरना तू भी फिनिश। खलास।" जग्गू जगलर मुंह टेढ़ा करता हुआ विषाक्त स्वर में बोला।
"फिनिश तो तुझे मैं कर डालूंगा
हरामजादे...देख इधर...पहचान ले इसे...ये-ये मेरी बहन है डॉली...! डॉली मेहरा। इंस्पेक्टर सतीश मेहरा की बहन! और अब तू देखेगा कि धमकी देकर तूने किस तरह अपनी मौत को बुलावा दिया है।"
इस बार दोनोंहाथों से डंडा थामकर उसने जग्गू जगलर को पीटना शुरू किया तो बिछा डाला उसे।
अभी वह डंडा फेंककर गुस्से में उफनता हुआ अपनी सीट पर बैठा ही था कि टेलीफोन की घंटी बज उठी।
"चैम्बूर पुलिस स्टशेन...।" इंस्पेक्टर सतीश मेहरा रिसीवर कान से लगाना हुआ उखड़े हुए स्वर में बोला। ‘
"रंजीत सावन्त...मंत्री धरम सावन्त का भाई...समझा तू इंस्पेक्टर..!" दूसरी ओर से बेहद कर्कश आवाज उभरी। उसे इयरपीस कान से परे खिसका लेना पड़ा।
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सतीश खामोश रहा। रंजीत सावन्त की आवाज सुनते ही उसका खून खौल उठा।