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धीरे- धीरे वक्त गुजरने लगा।
"काफी रात हो चुकी है...जाकर सो जाओ।" राज ने मौन भंग करते हुए कहा।
"यही बात मैं भी कह रही हूं...कि काफी रात हो चुकी है, भैया अभी तक नहीं आए।"
"आ जाएंगे डॉली, तुम्हारे भैया को कोई जरूरी काम था मैं पहले ही कह चुका हूं। उन्हें आने में टाइम लग सकता है। इसीलिए उन्होंने मुझे यहां भेजा है ताकि तुम किसी बात की चिन्ता न करो...।"
.
.
"मुझे तुम्हारी बात का विश्वास नहीं।"
"तुम्हारा मतलब मैं झूठ बोल रहा हूं।"
"हो सकता है।"
"मेस विश्वास नहीं।"
"तुम्हारा एहसान है मुझ पर लेकिन जहां तक विश्वास की बात है, तुम अभी मेरे लिए अजनबी हो...और अजनबियों पर एकाएक ही विश्वास करना नहीं चाहिए। तुम खुद ही कहो...क्या इतनी जल्दी विश्वास कर लेना उचित होगा।"
"नहीं...।"
.
"फिर बताओ...मेरा शक करना बाजिब है या नहीं...।"
"तुम अपनी जगह सही हो...मैं अपनी जगह और सतीश मेहरा अपनी जगह। गलत कोई भी नहीं है।"
"अगर मैं अपनी जगह सही हूं तो फिर मुझे सच्चाई बताओ।"
"सच्चाई यह है कि देर हो चुकी है...जाकर सो जाओ और मुझे भी सोने दो।" –
डॉली ने गौर से उसकी आखों में देखा फिर कुर्सी छोड़कर उठ खड़ी हुई।
"ठीक है...मैं जा रही हूं।" कहने के साथ ही वह मुड़कर बाहर निकल गई।
राज ने सिगरेट सुलगाई और फिर वह बैड पर अधलेटी स्थिति में पीठ की और तकिया लगाकर लेट गया। सिगरेट फूंकता हुआ वह इंस्पेक्टर सतीश मेहरा और मंत्री धरम सावंत के बारे में सोचने लगा।
उसकी समझ में आ चुका था कि इंस्पेक्टर सतीश मेहर ने गलत जगह पंगा ले लिया है।
मंत्री!
एक महत्वपूर्ण पद।
जहां तक कोई सहज ही नहीं पहुंच सकता और अगर पहुंच जाए तो तमाम शक्तियों का मालिक बन जाए।
शासन प्रशासन सब-कुछ उसके हाथ में।
"काफी रात हो चुकी है...जाकर सो जाओ।" राज ने मौन भंग करते हुए कहा।
"यही बात मैं भी कह रही हूं...कि काफी रात हो चुकी है, भैया अभी तक नहीं आए।"
"आ जाएंगे डॉली, तुम्हारे भैया को कोई जरूरी काम था मैं पहले ही कह चुका हूं। उन्हें आने में टाइम लग सकता है। इसीलिए उन्होंने मुझे यहां भेजा है ताकि तुम किसी बात की चिन्ता न करो...।"
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"मुझे तुम्हारी बात का विश्वास नहीं।"
"तुम्हारा मतलब मैं झूठ बोल रहा हूं।"
"हो सकता है।"
"मेस विश्वास नहीं।"
"तुम्हारा एहसान है मुझ पर लेकिन जहां तक विश्वास की बात है, तुम अभी मेरे लिए अजनबी हो...और अजनबियों पर एकाएक ही विश्वास करना नहीं चाहिए। तुम खुद ही कहो...क्या इतनी जल्दी विश्वास कर लेना उचित होगा।"
"नहीं...।"
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"फिर बताओ...मेरा शक करना बाजिब है या नहीं...।"
"तुम अपनी जगह सही हो...मैं अपनी जगह और सतीश मेहरा अपनी जगह। गलत कोई भी नहीं है।"
"अगर मैं अपनी जगह सही हूं तो फिर मुझे सच्चाई बताओ।"
"सच्चाई यह है कि देर हो चुकी है...जाकर सो जाओ और मुझे भी सोने दो।" –
डॉली ने गौर से उसकी आखों में देखा फिर कुर्सी छोड़कर उठ खड़ी हुई।
"ठीक है...मैं जा रही हूं।" कहने के साथ ही वह मुड़कर बाहर निकल गई।
राज ने सिगरेट सुलगाई और फिर वह बैड पर अधलेटी स्थिति में पीठ की और तकिया लगाकर लेट गया। सिगरेट फूंकता हुआ वह इंस्पेक्टर सतीश मेहरा और मंत्री धरम सावंत के बारे में सोचने लगा।
उसकी समझ में आ चुका था कि इंस्पेक्टर सतीश मेहर ने गलत जगह पंगा ले लिया है।
मंत्री!
एक महत्वपूर्ण पद।
जहां तक कोई सहज ही नहीं पहुंच सकता और अगर पहुंच जाए तो तमाम शक्तियों का मालिक बन जाए।
शासन प्रशासन सब-कुछ उसके हाथ में।