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लाल हवेली

धीरे- धीरे वक्त गुजरने लगा।

"काफी रात हो चुकी है...जाकर सो जाओ।" राज ने मौन भंग करते हुए कहा।

"यही बात मैं भी कह रही हूं...कि काफी रात हो चुकी है, भैया अभी तक नहीं आए।"

"आ जाएंगे डॉली, तुम्हारे भैया को कोई जरूरी काम था मैं पहले ही कह चुका हूं। उन्हें आने में टाइम लग सकता है। इसीलिए उन्होंने मुझे यहां भेजा है ताकि तुम किसी बात की चिन्ता न करो...।"

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"मुझे तुम्हारी बात का विश्वास नहीं।"

"तुम्हारा मतलब मैं झूठ बोल रहा हूं।"

"हो सकता है।"

"मेस विश्वास नहीं।"

"तुम्हारा एहसान है मुझ पर लेकिन जहां तक विश्वास की बात है, तुम अभी मेरे लिए अजनबी हो...और अजनबियों पर एकाएक ही विश्वास करना नहीं चाहिए। तुम खुद ही कहो...क्या इतनी जल्दी विश्वास कर लेना उचित होगा।"

"नहीं...।"

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"फिर बताओ...मेरा शक करना बाजिब है या नहीं...।"

"तुम अपनी जगह सही हो...मैं अपनी जगह और सतीश मेहरा अपनी जगह। गलत कोई भी नहीं है।"

"अगर मैं अपनी जगह सही हूं तो फिर मुझे सच्चाई बताओ।"

"सच्चाई यह है कि देर हो चुकी है...जाकर सो जाओ और मुझे भी सोने दो।" –

डॉली ने गौर से उसकी आखों में देखा फिर कुर्सी छोड़कर उठ खड़ी हुई।

"ठीक है...मैं जा रही हूं।" कहने के साथ ही वह मुड़कर बाहर निकल गई।

राज ने सिगरेट सुलगाई और फिर वह बैड पर अधलेटी स्थिति में पीठ की और तकिया लगाकर लेट गया। सिगरेट फूंकता हुआ वह इंस्पेक्टर सतीश मेहरा और मंत्री धरम सावंत के बारे में सोचने लगा।

उसकी समझ में आ चुका था कि इंस्पेक्टर सतीश मेहर ने गलत जगह पंगा ले लिया है।

मंत्री!

एक महत्वपूर्ण पद।

जहां तक कोई सहज ही नहीं पहुंच सकता और अगर पहुंच जाए तो तमाम शक्तियों का मालिक बन जाए।

शासन प्रशासन सब-कुछ उसके हाथ में।
 
वह इंस्पेक्टर सतीश मेहरा की नौकरी के बारे में सोच रहा था। क्या होगा उसकी नौकरी का? सोचते-सोचते उसकी आंख लग गई। आंख खुली किसी आहट को सुनकर। उसने देखा।

डॉली थी। सहमी और डरी हुई सी।

"क्या हुआ...क्या बात है?" राज ने अचम्भे से उसकी ओर देखते हुए पूछा।

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"ब...बाहर...कोई है।" डॉली कम्पित स्वर में बोली। भय से उसके नेत्र फटे हुए थे।

"इतनी रात गए ?"

"हां।"

"कौन हो सकता है?"

"क्या मालूम।"

राज ने तकिये के नीचे से माउजर निकाला और फिर वह तेजी से दरवाजे की तरफ बढ़ चला।

"न...न...नहीं।" उसका रास्ता रोकती डॉली एकाएक ही बीच में आती हुई बोली-" दरवाजा मत खोलना...न मालूम गिनती में वो लोग कितने हों। भैया भी नहीं हैं वरना मैं तुम्हें न रोकती।"

"डरो नहीं डॉली...मैं सावधानी के साथ बाहर निकलूंगा।"

"नहीं...।" डॉली उसे दोनों हाथों से पकड़कर लगभग उससे चिपट गई। उसके अंगों के उभार राज को स्पर्शित कर आन्दोलित करने लगे।

अचानक ही वह इस तरह इतना करीब आ जाएगी ये उसने सोचा भी नहीं था।

"डरो नहीं...कतई नहीं डरो । मैं हूं न...मेरे होते हुए तुम्हारा बाल भी बांका नहीं होगा।" राज ने उसे ढाढ़स बंधाते हुए अपने आपसे अलग किया।

वह डरती थरथराती राज के पीछे-पीछे दरवाजे तक पहुंची।

राज ने सावधानी के साथ दरवाजा खोला। उसके एक हाथ में माउजर था और दूसरे हाथ से दरवाजा खोलकर उसने कदम बाहर निकाला।

बिल्डिंग के कम्पाउंड में प्रकाश फैला था। वहां कोई भी नजर नहीं आया। वह सावधानी के साथ इधर-उधर देखता हुआ आगे बढ़ गया। कम्पाउंड पार करके उसने सड़क पर नजर घुमाई। रात अधिक हो जाने के कारण सड़क भी पूरी तरह वीरान पड़ी थी।

सिर्फ एक आवारा कुत्ता सड़क के बीचोंबीच सामान्य गति से दौड़ा चला जा रहा था। सड़क के डिवाइडर के दोनों ओर मरकरी लैम्पस की लम्बी कतार दूर तक चली गई थी। दूधिया रोशनी पूरी सड़क पर फैली हुई थी।
 
वह थोड़ी दूर तक निकला चला गया किन्तु उसे जब कोई भी दिखाई नहीं पड़ा तो वह वापस लौट गया। डॉली दरवाजे पर सहमी सी खड़ी थी।

"कोई नहीं है..." राज ने फ्लैट में कदम रखते हुए कहा-"मैं लम्बा चक्कर लगा आया।"

"लेकिन दस्तक तो हुई थी...दो बार...।" वह बौखलाए हुए स्वर में बोली।

"हो सकता है किसी ने शरारत की हो।"

"नहीं...वो शरारत नहीं हो सकती।"

"घबरा नहीं...अब मैं पहरा दूंगा। अगर फिर दस्तक हुई तो मैं देख लूंगा।"

___"मेस अगवा करने वाले यहां भी तो आ सकते हैं।"

"कहा न..डरने नहीं। अब मैं जागता रहूंगा और तुम अपने कमरे में सो जाओ।"

"न...नहीं।"

"क्या नहीं?"

"मुझे अकेले कमरे में डर लगता है। मैं...मैं तुम्हारे वाले कमर में ही रहूंगी।"

"तुम बेकार ही डर रही हो। आओ...पहले मैं तुम्हें सुला देता हू।"

राज डॉली को उसके कमरे में ले गया और उसे बिस्तर में लिटाकर थोड़ी देर वहीं कमरे में चहलकदमी करता रहा। उसके कान प्रत्येक आहट पर लगे थे और नजरें डॉली की आंखोंपर जो कि धीरे-धीरे बंद होती जो रही थीं। फिर एक पल वो भी आया कि डॉली की पलकें झुकी तो उठी नहीं।

राज ने उसे निकट से देखा।

लेकिन कोई अन्तर नहीं हुआ। उसकी निद्रा सघन होती चली गई।

राज दबे पांव कमरे से बाहर निकल आया

बाहर आकर एक बार फिर उसने सड़क की दोनों जानिब नजरें दौड़ाकर देखा। कहीं कोई न था। बिल्डिंग के पहले माले को पार कर दूसरे माले तक जा पहुंचा। कहीं भी किसी प्रकार की हलचल नहीं थी।

अन्तत: उसने यही निश्चय किया कि वो दस्तक डॉली मेहरा का महज दिमागी खलल थी। शायद अपने में वह डर गई थी।

एक और सिगरेट सुलगाने के बाद राज वापस अपने कमरे में आ गया।

वह बाकी रात चलकर गुजार देने का फैसला करके बैड पर जा बैठा।

सिगरेट फूंकते हुए उसने टाइम पास करना शुरू कर दिया।

थोड़ी ही देर में सिगरेट खत्म हो गई।

उसने पहले दूसरी सिगरेट सुलगाने की इच्छा करने के उपरान्त उस इच्छा को समाप्त करके सिल्वर बॉटल निकाल ली।

तीन-चार चूंट भरने के बाद वह बैड पर फैल गया। दो क्षण को उसकी आख लग गई।

अचानक!

सन्नाटे में कोई चीज गिरने की आवाज गूंज उठी। उसके साथ ही डॉली की चीख !
 
उसकी आंखजब तक खुली...जब तक वह कुछ समझा, तब तक घबराई हुई डॉली मेहरा गिरत-पड़ती आ पहुंची उसके पास तक और इससे पहले कि वह उठता, डॉली उससे घबराकरभागे पंछी की भांति आ लिपटी। उसके चेहरे पर आतंक की काली परछाईं सहज ही देखी जा सकती थी।

उसकी कंपकंपाहट को राज ने स्पष्ट अनुभव किया।

"क्या हुआ?"

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"व...व...वहां कोई...था...कोई था।" डॉली लड़खड़ाते हुए स्वर में बोली।

राज माउजर संभालकर तेजी से बाहर निकला। वह पूरे फ्लैट में घूम गया।

डॉली के कमरे के बाहर उसे काली बिल्ली बैठी दिखाई पड़ी जो कि उसे आते ही वहां से भाग गईं। वह कमरे के भीतर दाखिल हुआ।

कमरे में एक कबूतर पड़ा दिखाई दिया जिसे कि आधा खायाजा चुका था।

कबूतर के पंख कमरे में कम कमरे के बाहर ज्यादा बिखरे पड़े थे।

राज पलक झपकते समझ गया।

एक डिब्बा और टेबल लैम्प भी कबूतर के निकट ही लुढ़केहुए थे। टेबल लैम्प में लगा बल्ब

फूट गया था। कांच कमरे के फर्श पर बिखरी पड़ा था।

पूरी कहानी को समझ लेने के उपरांत भी उसने चारों तरफ खोज-खबर ली और अन्त में मुस्कराता हुआ वापस लौट आया।

जबकि डॉली उसके बैड में चादर ओढ़े इस प्रकार दुबकी पड़ी थी मानो चादर न होकर वह लोहे का जिरह बख्तर हो जिसके पहन लेने से वह खतरनाक हथियारों के वार से बच जाएगी।

"कोई नहीं है डॉली...तुम बेकार ही डर गई। एक बिल्ली तुम्हारे कमरे में दाखिल हो गई थी। तुम्हें उसी ने डरा दिया था। बिल्ली के अलावा वहां बिल्ली का शिकार हुआ कबूतर है...बस...और कुछ भी नहीं।" उसने डॉली को समझाने की कोशिश करते हुए कहा।

"नही...नहीं...नहीं...।" डॉली कम्पित स्वर में बोली।

___"मैं सच कह रहा हूं। मेरे साथ चलो...दिखाता हूं।"

"नहीं...अब मैं कहीं नहीं जाऊंगी। कहीं नहीं जाऊंगी। यहीं रहूंगी तुम्हारे पास।"

___ "यहां...?" राज ने परेशानी जाहिर करते हुए आश्चर्य मिश्रित स्वर में कहा।

"हां...अब मैं किसी भी कमरे में तन्हा नहीं रहूंगी। मैं डर जाती हूं। मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगता है और कभी-कभी तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे अभी हार्ट-अटैक होगा और बिना तड़पे ही मैं मर जाऊंगी।"

"डॉली...तुम समझती क्यों नहीं...।"

"मैं जिन्दा रहना चाहती हूं। वक्त से पहले मरना नहीं चाहती। कमरे का दरवाजा अंदर से । अच्छी तरह बंद कर लो और बिस्तर में आ जाओ। मैं पूरी रात सो नहीं सकी मुझे विश्वास तुम्हारे पास आ जाने से मैं सो जाऊंगी।"

कर्त्तव्यविमूढ़ सा राज अपने स्थान पर ठगा-सा खड़ा रह गया।

डॉली पहले उसकी ओर देखती रही फिर उसने स्वयं उठकर कमरे का दरवाजा अंदर से बंद किया और राज का हाथ पकड़कर बिस्तर में खींच लायी।

"सो जाओ...मुझे बहुत जोरों से नींद आ रही है।" उसने राज की दोनों बांहों को अपने बदन के इर्द-गिर्द से निकालते हुए लगभग अपने ऊपर खींच ही लिया।

राज अचम्भित सा उसके मांसल जिस्म के गुदगुदे स्पर्श से रोमाचित हो उठा। वह कुछ भी समझ नहीं पा रहा था। हक्का-बक्का असमंजस में फंसा अपने को डॉली मेहरा के जिस्म से दूर करने का प्रयास कर रहा था लेकिन डॉली ने उसके दोनों हाथों को कसकर पकड़ने के बाद अपनी कमर से ऊपर पहुंचाया हुआ था।

वह आंखें बंद किए लेटी रही।
 
दोस्तो क्या होगा जब दो जवान जिश्म एक साथ होंगे ये जानने के लिए इंतजार करें अगले अपडेट का
 
राज समझ रहा था कि उसकी महज आंखेंबंद थीं, वह सो कतई नहीं रही थी। इतनी बात उसके दिमाग में आसानी से पहुंच रही थी कि डॉली जिस मजबूती से उसके हाथों को पकड़े हुए हौं-उसे मद्देनजर रखकर ये किसी भी तरह माना नहीं जा सकता था कि वह सो रही है।

दूरी बिल्कुल खत्म हो चुकी थी।

मगर राज के मन में एक दुविधा तो थी ही। वह दुविधा डॉली के खौफ की थी।

डॉली डर की वजह से उसे अपने करीब खींचे हुए थी।

उसके हाथ गलत हरकत करने के बारे में सोचकर ही जहां के तहां रुक गए।

धीरे-धीरे वक्त गुजरने लगा।

उसने एक बार फिर अपने हाथों को मुक्त करने का प्रयास किया मगर नाकामयाब रहा।

डॉली ने उसके दोनों हाथ पूरी तरह अपने कब्जे में करते हुए अपने वक्षों के साथ भींच लिए।

एक गुदगुदे रोमांच ने उसे आसक्त कर दिया। बरबस ही उसके हाथ डॉली के वक्षों पर कस गए।

डॉली ने किसी प्रकार का प्रतिरोध नहीं किया। वह यूं ही आंखेंबंद किए पड़ी रही।

राज की उत्तेजना बढ़ती जा रही थी।

धीरे-से डॉली की गर्दन तक अपने अधर पहुंचाए फिर उसके अधर फिसलकर डॉली के बाएं कपोल पर पहुंच गए।

उस उत्तेजक स्पर्श ने अन्तत: डॉली के सबरको खत्म कर दिया। वह फुर्ती के साथ पलटकर झटके के साथ राज से लिपट गई।

कामुक सीत्कार उसके मुख से फूट निकला। उसका छिपा हुआ प्रेम अब जाहिर हो गया।

"ओह हनी...तुम बहुत अच्छे हो। बहुत अच्छे। पहली नजर में ही मुझे तुमसे प्यार हो गया था। वह राज के आलिंगन में समाती हई बोली "मेरी किस्मत से तुम यहां तक आ गए। और मैं तुम्हारी बांहों में आने का लोभ संवरण नहीं कर की।

राज ने उसके तपते हुए अधरों पर प्रगाढ़ चुम्बन अंकित कर दिया।

वासना की दबी हुई चिंगारियों को प्रेम के हल्के झोंके मिलने लगे। उसके साथ ही चिनगारियां धीरे-धीरे शोलों में परिवर्तित होने लगीं।

राज इस मामले में कुछ ज्यादा ही सक्रिय था। डॉली ने धानी रंग की नाइटी पहनी हुई थी।

राज का हाथ उसकी नाइटी के रिबन पर पहुंचा।

रिबन खींचते ही नाइटीबंधन रहित हो गई।

स्लीबलैस नाइटी यूं भी लगभग पारदर्शी सी थी। राज को नाइटी के अन्दर का सांचे में ढला उसका जिस्म यूं भी नजर आ रहा था फिर भी उसने अपने और डॉली के बीच की प्रत्येक दीवार को गिरा देता ही उचित समझा।

वस्त्र नाम के लिए भी नहीं बचे।

गर्म बदन एक-दूसरे के आलिंगन में समा गए तो सिसकारी फूट निकली।

डॉली उस घडी राज से भी ज्यादा उत्तेजित हो चुकी थी। उसने राज का चेहरा चुम्बनों से भर दिया।

अगले ही क्षण राज करवट बदलकर ऊपर आ गया।
 
उसने राज की कठोरता को अनुभव किया और कामुक सीत्कार के साथ आनन्द सागर मे डूबती उतराती हुई वह बरबस ही आंखें बंद करके निढाल सी होती चेली गई। वह सम्पूर्ण रूप से अपने-आपको राज के हवाले कर चुकी थी। उसकी ओर से नाममात्र का भी प्रतिरोध नहीं था। सहयोग था...केवल सहयोग।

राज का प्यार पाकर वह पूरी दुनिया को भुला बैठी थी। आत्मविभोर हो उसने राज के गले में अपनी सुडौल बांहों का हार डाल दिया।

फिर राज के चेहरे को उसने अपने उन्नत वक्षों से भींच लिया।

वह बदनतोड़ ढंग से सहवास में सहयोग करने लगी।

गर्म सांसों में तूफान जैसी तेजी आ गई। धड़कनें तेज से तेजतर होती चली गईं।

"ओह हनी..."

डॉली कामुक स्वर मेंफुसफुसाती हुई बोली "कितना प्यार छिपाए हुए थे अपने अन्दर। मैं तो जैसे जन्म-जन्म की प्यासी थी...आह...इतना गहरा होगा तुम्हारा प्यार, मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। तुम्हारी दीवानी बनी थी तो कोई गलती नहीं की थी मैंने।"

"मुझे तो तुमसे डर लग रहा था कि कहीं तुम मुझे उस भला न कहने लगो।"

"क्यों?"

"क्योंकि शुरूआत मैंने की थी। अगर तुम्हारे दिल में मेरे लिए प्यार न होता तो...?"

"अगर प्यार न होता तो मैं तुम्हें अपने इतने करीब कभी न आने देती। मैंने पूरी तरह इशारा कर तो दिया थ...तुम फिर भी झिझक रहे थे।"

"पहली-पहली बार किसी लड़की को छूना गलत होता है। ऐसे मामले बहुत पेचीदा होते हैं क्योंकि इनका नतीजा मालूम नहीं होता। सब कुछ सस्पैंस में दबा हुआ होता है।"

डॉली मुस्करायी।

उसकी कोमल उंगलियां उस समय राज के सिर के बालों में कंघी कर रही थी। राज पर वह अपना प्यार लुटा रही थी। शीघ्र ही दोनों गहरी निद्रा में डूब गए।

…………………………………
 
सूरज चढ़ आने पर राज की आंख खुली। वह उठा। देखा, डॉली उसके बसबर में बैड पर निर्वस्त्र औंधी पड़ी घोड़े बेचकर सो रही थी। उसकी दूध धोयी सांचे में ढली काया पूरी तरह नंगी थी। सिर के बाल काली घटा की मानिन्द तकिए पर फैले हुए थे। वह गहरी नींद में थी।

राज आंखेंफाड़े उसकी चांदी-सी चमकती शीशेजैसी पीठ को निहारने लगा। पीठ से फिसलकर उसकी निगाह डॉली की पतली कमर के खम पर पहुंची और उसके बाद गोल पुष्ट नितम्बों की गोलाइयों पर। वह अपने आपको न रोक सका।

बरबस की उसका दायां हाथ डॉली की चिकनी पीठ पर से फिसलता हुआ कमर और नितम्बों तक जा पहुंचा...तत्पश्चात् झुककर उसने पीठ पर चुम्बन अंकित करते हुए नीचे उतरना आरंभ कर दिया। प्रत्येक चुम्बन के साथ वह नीचे उबका चला जा रहा था।

डॉली के शरीर की कंपकंपाहट बता रही थी कि वह नींद से जाग चुकी है मगर वासना के उत्तेजनापूर्ण खेल को खेलने की खातिर सामन वाले खिलाड़ी को पुन: उत्साहित कर खेल का पूस आनन्द उठाना चाहती थी।

राज ने उसे धीरे-से पलटकर अपनी बांहों में भर लिया।

एक बार फिर वासना पूर्ण गर्म सांसों का शोर उभरने लगा।

डॉली उससे टूट-टूटकर प्यार कर रही थी। अधरों से अधर जुड़े थे और वे एक-दूसरे को अपने आलिंगन में जकड़े हुए थे।

"भैया, अभी तक नहीं आए...।" डॉली राज को कॉफी का प्याला देती हुई चिन्तित स्वर में बोली "पूरी रात गुजरने के साथ-साथ अब तो दिन के दस बज चुके हैं तपन...प्लीज कुछ करो। भैया का पता लगाओ।"

"पता लगाने की कोई जरूरत नहीं है। तुम्हारा भाई सुरक्षित है।" राज ने कॉफी का छोटा-सा चूंट भरते हुए कहा।

"इसका मतलब तुम जानते हो सतीश भैया के बारे में?"

"हां..जानता हूं।"

"फिर तुमने बताया क्यों नहीं?"

"इसलिए कि...।"

"बताओ तपन...बता मैं इस सस्पैंस के बोझ को बर्दाश्त नहीं कर सकूँगी।"

"वह...वह अस्पताल में है।"

"अस्पताल में...?" आश्चर्य से डॉली के नेत्र फैल गए-"अस्पताल में क्यों...क्याहुआ उन्हें ? जल्दी बताओ तपन उन्हें क्या हुआ?" उसने उत्तेजनापूर्ण स्वर में पूछा।

राज ने उसे भी सतीश मेहरा की भातिं अपना दूसरा नाम ही बताया था।

वह भी तपन सिन्हा के नाम से वाकिफ थी। इसलिए वह उसे तपन के नाम से ही पुकार रही थी।"

"तुम्हारे भैया का छोटा-सा एक्सीडेंट हो गया था। तुम परेशान न हो जाओ, इसलिए तुम्हारे भैया ने मुझे तुम्हें एक्सीडेंट के बारे में बताने से मना किया था।"

"मुझे भैया के पास ले चलो...फौरन...अभी इसी वक्त मुझे भैया के पास ले चलो।"

"डॉली...सुनो तो...।"

"नहीं...मुझे कुछ नहीं सुनना। जल्दी उठो...जल्दी मैं चेंज करके आती हूं तब तक तुम तैयार हो जाना।"

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वह चली गई।

राज दो पल के लिए स्थिर बैठा रहा।

उसके बाद उसने भी कपड़े पहनने शुरू कर दिए। वह समझ रहा था कि अब डॉली को किसी भी प्रकार रोका नहीं जा सकता। उसके तैयार होने से पूर्व ही डॉली जल्दी-जल्दी अपने कपड़े संभालती हुई आ गई।

"अरे...तुम अभी तक...."

"तैयार हूं बाब...एकदम तैयार हूं।"

फिर राज जल्दी-जल्दी बाल संवारकर उसके साथ चलने को तैयार हो गया।

फ्लैट से बाहर आकर वे एक टैक्सी में सवार हुए और फिर जा पहुंचे उसी अस्पताल में जिसमें इंस्पेक्टर सतीश मेहरा एडमिट था।
 
डॉली राज के साथ लम्बे-लम्बे डग भरती तेजी से आगे की ओर बढ़ी चली जा रही थी। उसकी उत्तेजना में निरंतर वृद्धि होती जा रही थी। वृद्धि का कारण थी दुर्घटना की खबर और चोट खाए भाई को देखने की तड़प।

राज जब उसे साथ लेकर सतीश वाले वार्ड में पहुंचा तो चकित रह गया।

सतीश का बैडखाली था।

एक आर्डरली बैड की चादर आदि बदलने का काम कर रहा था।

"इस बैड का पेशेंट किधर गया?" राज ने आर्डरली से सम्बोधित होते हुए पूछा।

"वो इंस्पेक्टर...?" आर्डरली चादर झटकता हुआ बोली-"सुबह को ही रिलीव हो गया।"

"चला गया?"

"अभी का...कबी का...।"

"देर हो गई?"

"हां..।"

"किधर?"

"क्या बाप...पेशेंट लोग अब अपुन कू पता ठिकाना बता के तो जाते नेई।"

डॉली ने सवालिया नजरों से राज की ओर देखा। उसके चेहरे से परेशानी झलक रही थी।

जवाब देने के उपरांत आर्डरली ने वहां से खिसकने में देर न लगाई। वह जानता था कि पेशेन्ट

के लिए परेशान उसके सगेवाले बाद में उसे ही घेरेंगे। उससे ही जानकारी हासिल करने के लिए सवाल पर सवाल करेंगे। राज ने एक बार आसपास नजर दौड़ाई और फिर वह अस्पताल से बाहर निकल आया।

"कहां गए होंगे भैया...?" डॉली उसके साथ-साथ चलती हुई उत्तेजित स्वर में बोली-"वह तो कह रहा था कि भैया सुबह ही रिलीव होकर यहां से चले गए।"

___ "फिक्र मत करो...सतीश कोई बच्चा नहीं है। जरूर किसी काम से गया होगा। तुम उसके दोस्तों के बारे में अगर कुछ जानती हो तो बताओ?" राज सिगरेट सुलगाता हुआ बोला।

"तीन चार दोस्तों के बारे में जानती हूं।"

"तो फिर सबसे पहले उस दोस्त के पास ले जो यहां से नजदीक हो।"

"ठीक है...चलो।"

राज ने टैक्सी कार रुकवाई।

एक दोस्त मानखुर्द में ही रहता था, दूसरा चूना भट्टी के इलाके में और दो अन्य चर्चगेट और कोलाबा में रहते थे। टैक्सी कार के अतिरिक्त उन्होंने लोकल ट्रेन से भी यात्रा की।

लेकिन! नतीजा वही रहा...ढाक के तीन पात।

___ चारों ने एक ही जवाब दिया कि सतीश मेहरा उनके पास नहीं आया।

अन्त में दोनों इस आशय से मानखुर्द वापस लौटे कि शायद सतीश फ्लैट पर पहुंच गया हो। मगर सतीश मेहरा वहां भी वापस नहीं लौटा था।

डॉली के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें गहरी होती चली जा रही थीं।

"तपन...।" राज की ओर देखती हुई वह कम्पित स्वर में बोली-"भैया यहां भी नहीं हैं।"

उसके नेत्र एकाएक ही डबडबा गए, चेहरा रो पड़ने के लिए बिगड़ने लगा।

राज ने उसे अपनी बांहों में संभाल लिया।

"नहीं डॉली...नहीं...।" वह प्यार से डॉली के सिर पर हाथ फेरता। हुआ बोला-" सब ठीक हो ...सब ठीक हो जाएगा।"

"मुझे तो कुछ भी ठीक होता दिखई नहीं दे रहा...।" डॉली रुंधे कंठ से बोली-"उसकी आंखें छलक पड़ना ही चाह रही थीं।

__ "मेरे ऊपर विश्वास रखो डॉली। मैं तुम्हारे भाई को पाताल से भी खोज निकालूंगा।"

"समझ में नहीं आता कि भैया चले कहां गए

"जहां भी होगा, सतीश मैं उसका पता-ठिकाना मालूम करके ही रहूंगा।"
 
"कैसे...कैसे मालूम करोगे और कहां से मालूम करोगे...मुझे तो कोई भी सह नजर नहीं आ रही।"

"हिम्मत मत हारी...अगर हिम्मत हार जाओगी तो कुछ भी रह नहीं जाएगा। अब मैं तुमसे जैसा कह रहा हूं तुम वैसा ही करती जाओ। ओ. के.।"

डॉली ने दुखी भाव से स्वीकृति में गर्दन हिला दी।"

"यहां से तुम सीधी अपने भैया के पुलिस स्टेशन जाओगी और वहां से जितनी भी जानकारी मिल सके उसे लेकर आगेगी।"

"ठीक है।"

"मैं तुम्हे बाद में मिलूंगा।"

"कहां मिलोगे...?"

"इसी ठिकाने पर।"

"पुलिस स्टेशन मैं अकेली जाऊंगी।"

"पुलिस स्टेशन अकेले जाने में क्या परेशानी है और फिर दिन है। दिन के समय तो तुम सुरक्षित हो ही। रात में अकेली मत निकलना।"

"ठीक है।"

"मैं तुम्हारे भैया की तलाश में जाऊंगा। मुझे लौटने में थोड़ी देर हो सकती है। तुम मेरा यहीं इंतजार करना। वैसे मैं यहां रिंग करके हालात की सूचना तुम्हें देता रसूंगा।"

"ओ. के. ! मैं जाती हूं।"

"जाओ...।"

डॉली वहां से चली गई।

उसके चले जाने के बाद राज ने अपने माउजर में नई मैगजीन लगाई और फिर सिगरेट सुलगाकर वह भी वहां से निकल पड़ा।

टैक्सी पकड़कर वह एक बार फिर अस्पताल जा पहुंचा।

उसने काला चश्मा लगाकर अंदर कदम रखा। वह सहज भाव से अस्पताल के विभिन्न भागों में घूमता रहा। वहां तहकीकात करने से पहले उसने अंदर का जायजा ले लेना उचित समझा। वह जल्दबाजी में कोई भी काम करना नहीं चाहता था।

तीस मिनट की मुसलसल निगाहबीनी के पश्चत् उसने अस्पताल के अन्दर एक ऐसी नर्स को तलाश कर लिया जो हर तरह से पैसा बनाने में लगी रहती थी। किसी भी प्रकार का गलत काम करने से उसे कोई हिचकिचाहट नहीं होती थी।

नर्स तीस के ऊपर थी और चेहरे से ही फरचट नजर आती थी।

नाम था सुन्दरी। सुन्दरी के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए राज ने आर्डरली को चाय के साथ तगड़ा नाश्ता भी कराया था। उसने अपना परिचय एक पेशेंट के सहयोगी के रूप में दिय था। उसने आर्डरली को बताया था कि वह एक पेशेंट को अस्पताल में एडमिट करना चाहता है और उसे उस पेशेंट के लिए अतिरिक्त सुविधा की जरूरत है।

तब आर्डरली ने बताया कि वह सुन्दरी से मिले...सुन्दरी इस अस्पताल का प्रत्येक कार्य करने में सक्षम है।

___ राज ने सुन्दरी की तलाश की। सुन्दरी के दर्शन होते ही वह समझ गया कि वह उसके मतलब की औरत है।

"मैडम...।" राज सुन्दरी को कारीडोर के मोड़ पर सुनिश्चित तरीके से रोकते हुए बोला "आपसे एक निवेदन है...।"

सुन्दरी चौंकती हुई जब तक उसके सामने रुकी तब तक राज उसके हाथ में सौ-सौ के तीन-चार नोट दबा चुका था। नोटों की गर्मी महसूस होते ही सुन्दरी तुरन्त मुस्करा उठी। व्यावसायिक मुस्कान अपने चेहरे पर लाती हई वह बोली-"हुक्म करें...मैं अपने बस भर आपके प्रत्येक हुक्म को पूरा करने की कोशिश करूंगी।"

"मेरा काम थोड़ा गोपनीय है...कान्फीडेंशियल...।"

"सुन्दरी की यही तो विशेषता है कि कभी इधर की बात उधर नहीं हो सकती। बाएं हाथ ने क्या काम किया, इस बात की खबर कभी दाहिने हाथ को नहीं होपाती।"

"क्या बात करने के लिए कोई सही जगह है...जहां एकांत हो।"

"हां-हां, क्यों नहीं...।"

"तो वहीं चलो और अगर जगह सही न हो तो हम बाहर चलते हैं।"
 
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