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लाल हवेली

रंजीत सावन्त का नम्बर मिलाने पर इस बार राज को रंजीत ही लाइन पर मिल गया।

"कौन है तु...?" दूसरी ओर से कठोर स्वर उभरा।

"रंजीत सावन्त से बात करनी है।" राज मजबूत स्वर में बोला।

"तो कर न।"

"यानी तू ही रंजीत है।"

"आने बाप की आवाज को पहचानता नहीं क्या?"

"सुन...सुन रहा है न...?"

"अब बोल भी चुक...शुक्र कर, ट लीफोन की लाइन पर है वरना एक ही वार में टेंटुआ दबा डालता।"

__ "रंजीत सावन्त...इंस्पेक्टर सतीश मेहरा के लिए मैंने तुझे फोन किया था। उसे कुछ होना नहीं चाहिए...आई बात समझ में?"

"ऐ...तू है कौन?"

"फिलहाल तो तू अपना बाप समझ। और सुन...एक बात तेरी खातिर में और ला देना चाहता हूं। वो ये कि तू सतीश को दुनिया के किसी भी छोर पर ले जाकर क्यों न छिपा देना...मैं उसे खोज निकालूंगा।"

"अपना नाम पता कुछ बोल...?" दूसरी ओर से बहुत संयम के साथ पूछा गया।

"घबरा मत...बहुत जल्दी तुझे मेरा नाम और पता सब कुछ मालूम हो जाएगा। मेरी धमकी कभी झूठी नहीं होती।"

"तो तुझे यकीन है कि तू सतीश मेहरा को छुड़ा ले जाएगा ?"

"अपने जेरेसाया तमाम स्टाफ को सावधान कर दे क्योंकि तेरे पास पछताने के लिए वक्त नहीं रह जाएगा। मेरी आदत में शुमार है...मैं दुश्मन को सावधान किए बिना उस पर बार नहीं करता। यहां मैंने बार नहीं करना दुश्मन के शिकंजे से अपने आदमी को निकालना है।"

"अपना कोई जिक्र करेगा तू?"

"करूंगी...थोड़ा सब्र कर।" कहने के साथ ही राज ने मोबाइल का बटन ऑफ कर दिया।

एस्टीम ड्राइव करते जय ने तिरछी दष्टि से राज की ओर देखा। वह कार को बहुत धीमी रफ्तार से ड्राइव कर रहा था।

"अब इसे उस तरफ साइड में ले ले।" राज ने उसे दो विशाल बिल्डिंग्स के बीच के खाली पैसेज में कार खड़ी करने का आदेश दिया।

उसने आदेश के अनुपालन में एस्टीम उसी पैसेज के बीच रोक दी।

राज दूरबीन से ब्रिज के उस पार ढलान पर बनी रंजीत सावन्त की कोठी की ओर देखने लगा जिसके विशाल फाटक उस घड़ी बंद थे। कोठी के सामने वाले भाग में चूंकि घने वृक्ष लगे हुए थे, इस वजह से अन्दर का दृश्य देख पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा था। फिर भी राज इस कोशिश में लगा हुआ था कि किसी प्रकार अंदर देखा जा सके।

अचानक! कोठी का फाटक खुला और सफेद रंग की अर्मदा अपने चौड़े पहियों पर दौडती हुई बाहर । निकली। सड़क पर आते ही वह दायीं ओर को मुड़ गई। उसके अंदर कितने ही आदमी बैठे हुए थे और गनों की बैरलें भी चमकती दिखाई दे रही थी।

"पीछा कर।" राज ने अगला आदेश दिया।

जय ने तुरन्त एस्टीम आगे बढ़ा दी।

"वो सामने...सफेद अर्मदा...।"

"बरोबर।" कहते हुए जय ने एक्सीलेटर पैडल पर पांव का दबाव बढ़ा दिया। एस्टीम हवा से बातें करने लगी।

"बाप, अपुन का समझ में नेई आरेला है के तुम इधर क्या भकस करेला है।"

"उस कार में रंजीत सावन्त के आदमी मौजूद हैं और वे आदमी मेरे विचार से सीधे उस जगह जा रहे हैं जहां रंजीत सावन्त ने सतीश को छिपा रखा है।"

"ऐसा क्या?"

"बिल्कुल ऐसा ही।"

"तब तो अपुन का काम आसान हो जाएंगा...नेई?"

"एकदम आसान तो नहीं...लेकिन हां, थोड़ा आसान जरूर हो जाएगा।"

___ "पन बाप, तुमेरे कू कैसे मालूम कि ये लोग उधर र जाता जिधर सतीश को रखेला है...?"

राज मुस्कराया। बोला-"ये सब आयडिए का हिसाब है। मेरे आयडिए से उधर ही जाना चाहिए क्योंकि मैंने रंजीत सावन्त को बातों से इस कदर टाइट कर दिया है कि रंजीत सावन्त सतीश की सुरक्षा व्यवस्था में वृद्धि जरूर-जरूर करेगा।".

"इसका मतलब ये लोग वही व्यवस्था बनाने का वास्ते जाएला है?"

"हां।"

जय ने अतिरिक्त जोश के साथ पीछा आरंभ कर दिया। अर्मदा तेजी से दौड़ती रही। अन्त में सागर तट के क्षेत्र में बनी एक पुरानी बिल्डिंग के अंदर वह दाखिल हो गई। बिल्डिंग के बहुत पहले राज ने अपनी कार रुकवा दी।

___ कार रोकने के बाद जय ने सवालिया दृष्टि से उसकी ओर देखा।
 
उसने उत्तर देने के स्थान पर सिगरेट सुलगा ली। वह दूर से उस बिल्डिंग की ओर निहारता रहा। बिल्डिंग के अंदर किसी भी प्रकार की हलचल नजर नहीं आ रही थी। सिगरेट का आखिरी कश लगाने के बाद राज ने उसे खिड़की से बाहर उछाल दिया।

"मैं अंदर जा रहा हूं...तूने इधर ठहरकर सिर्फ तमाशा देखना होगा। अगर पन्द्रह मिनट तक मैं वापस न लौटू तो अपने आदमी बुलाकर धावा बोल देना।" एस्टीम का दरवाजा खोलता हुआ वह बोला।

"अपुन कू साथ ले चलने का...?" जय ने डरते-डरते पूछा।

"नहीं...तू यहीं ठहर। अगर हम दोनों अंदर जाकर फंस गए तो फिर बचाने वाला कोई नहीं रह जाएगा।"

"पण...।"

"अपनी बकवास बंद कर...।" कहने के साथ ही राज कार से बाहर निकलकर बिल्डिंग की ओर चल दिया।

___ बिल्डिंग की ओर वह एक लम्बा चक्कर लगाकर जा रहा था। उसने तय कर लिया था कि वह पिछले भाग से बिल्डिंग में कदम रखेगा। नतीजतन उसने लम्बा चक्कर लगाकर पीछे पहुंचना ही उचित समझा। बिल्डिंग के पिछले भाग में नारियल के ऊंचे-ऊंच दरख्त थे। उसके आगे दर तक फैली रेत और फिर समुद्र की। चंचल लहरें।

सावधानी के साथ वह तीन माले की बिल्डिंग के पीछे जा पहुंचा। बाउंडी वॉल पार करने में उसे किसी प्रकार की परेशानी नहीं हुई। दूसरी तरफ कबाड़ का ढेर लगा था। उसेकी ओट लेता हुआ वह सावधानी के साथ आगे बढ़ने लगा। अब उसने अपना माउजर निकालकर दाहिने हाथ में संभाल लिया था। वह पूरी तरह सचेत था। पिछली साइड में उसे सीढ़ियां दिखाई पड़ी जो कि ऊपर को जाती थीं लेकिन सीढ़ियों का मुख लकड़ी के दरवाजे से बंद था और दरवाजे पर ताला पड़ा हुआ था। उसने ताले को हिला-डुलाकर देखा।

...

ताला मजबूत किस्म का था। उसे आसानी से खोला नहीं जा सकता था। यू भी उस घड़ी उसके पास ताला खोलने की किसी भी प्रकार की सुविधा नहीं थी। ताले से हार मानकर वह आगे बढ़ा।

दीवार के साथ सटकर चलते हुए उसने अंदर की आहट लेने का प्रयत्न आरम्भ कर दिया। अचानक ही उसका हाथ एक खुली हुई खिड़की पर जा पहुंचा। हाथ के दबाव से खिड़की स्वयमेव ही खुलती चली गई। यदि उसने खिड़की के पल्ले को अपने हाथ से स्वयं ही रोका न होता तो पूरी खिड़की खुल गई होती। उसके दिल की धड़कनें अकस्मात् ही बढ़ती चली गई। घबरा गया वहा उसने अपने आपको सावधानी के साथ पीछे को खींच लिया। कितने ही क्षणों के लिए वह अपने आपको संयत करता रहा। जब उसके दिल की धड़कनें काबू में हो गई तो वह पुन: खिड़की की ओर बढ़ा। उसने संभालकर खिड़की से अंदर झांका।

___ अंदर कमरे में सन्नाटा था। कमरे का अधिकतर भाग अंधेरे में डूबा हुआ था।

उसने पीछे मुड़कर देखा। आसपास की स्थिति को देखते हुए वह सावधानी के साथ खिड़की के रास्ते भीतर दाखिल हो गया। किसी भी प्रकार की आहट उसने न होने दी। यहां तक कि वह अपनी सांसों को संयत करने की भी कोशिश में लगा रहा। । उसे अपनी सांसों की आहट का भी खौफ था कि कहीं कोई सुन न ले। अंदर पहुंचने के बाद वह माउजर सामने की ओर ताने चारों और घूम गया। कमरा पूरी तरह खाली था।

साइड में कमरे का दरवाजा था। बंद दरवाजे को बाहर की और ठेलने पर दरवाजा हल्की-सी चरमराहट के साथ खुलता चला गया। बाहर कॉरीडोर में भी अंधेरा था। कॉरीडोर में उसने दूर तक देखा। दाएं-बाएं दोनों ओर। कॉरीडोर के दोनों छोर खाली पड़े थे। कहीं कोई नहीं था।

वह बिल्ली की चाल से चलता हुआ आगे की ओर बढ़ने लगा। थोड़ी दूर चलने के बाद कॉरीडोर बायीं ओर को मुड़ गया। सामने बड़ा-सा दरवाजा था। वह दरवाजा एक बड़े हॉल में खुलता था। हॉल पूरी तरह खाली था। उसने सधे हुए कदमों से अपने आपको आगे बढ़ाया। तब वह हॉल के बीचों बीच था।

तभी अचानक। हॉल में रोशनियों के झमाके होते चले गऐ। एक के बाद एक प्रकाशपुंज जलते चले गए। उस अनायास होने वाले रोशनी के अटैक ने उसकी आखें चकाचौंध कर दी।

ठीक सामने चौड़ी-सी सीढ़ियां ऊपर को चढ़ती चली गई थीं। इसके ठीक ऊपर उसे एक आदमी नजर आ गया था। उसके हाथ में गन थी। गन के दहाने ने जैसे ही आग उगली वैसे ही वह नीचे गिरा। गोली की हवा उसे अपने ऊपर से स्पष्ट अनुभव की।

नीचे गिरते ही उसने पलटते हुए अपना माउजर सीधा किया और फिर वह ट्रेगर दबाता चला गया। गोली सीधी उस गनमैन के सीने में लगी थी। गोली खाते ही वह सीढियों पर लुढ़कता हुआ नीचे की ओर आने लगा। दाएं-बाएं से गोलीबारी आरंभ हो गई। उसने दौड़ते हुए मोटे से खंभे की ओट में छलांग लगा दी। उसे दायीं ओर से फायरिंग को आघात लगा। उसके बाद वह अंधाधुंध फायरिंग करता हुआ पीछे हटने लगा। वह समझ नहीं पा रहा था कि दुश्मन किस-किस स्थान पर छिपा हुआ है। उसने जेब से एक छोटे आकार का बम निकालकर उसकी पिन खींची और उसे सीढ़ियों की ओर उछाल दिया।

__भयानक विस्फोट के साथ ही समूचा हॉल धुएं और आग के शोलों से घिर गया।
 
उस अवसर का लाभ उठाकर वह दूसरे दरवाजे की ओर निकल पड़ा। निकलते समय भी उसका माउजर आग उगलता जा रहा था। उसे ये समझते देर न लगी कि उस बिल्डिंग के अंदर उसकी मौत का सामान एकत्रित किया गया था। बाहर की ओर दौड़ लगाते हुए उसने बीच रास्ते अपना दूसरा माउजर भी निकाल लिया। गलियारे में मुड़ते ही वह सीधा हुआ और उसने पूरी मैगजीन एक ही बार में खाली कर डाली।

गलियारे के सिरे पर दो आदमी थे, दोनों उस तूफानी गोलीबारी के धारे में तिनके की तरह बह गए। अवसर मिलते ही राज ने बारी-बारी दोनों गनों की पुरानी मैगजीने निकालकर नई मैगजीनें लगा दीं। अगल ही पल दोनों गने लोड हो चुकी थीं। जब तक वह दरवाजे पर पहुंचा तब तक जय ऑटोगन समेत अंदर प्रवेश कर चुका था।

"बाहर चल जय...बाहर!" राज ने उसे रोकना चाहा लेकिन वह रुका नहीं।

उसकी गन का दहाना अपने सामने की ओर गोलियां बरसाता आगे बढ़ता जा रहा था। राज उसके पीछे लपका। उसने सोचा भी नहीं था कि जय उसके आदेश का उल्लंघन करेगा।

जय निरन्तर आग बढ़ता चला जा रहा था। उसकी शक्तिशाली गन का आतंक फैलता जा रहा था।

"रुक जा जय...रुक जा।" राज ने उसे रोकने की कोशिश की।

लेकिन! उत्तेजित जय जिसे कुछ और ही आदेश दिया गया था, उस घड़ी गोलियों के धमाकों से बेचैन होकर अपने आपको रोक न सका। वह अपने बाँस को बचाने की गरज से हथियार लेकर मैदान में उतर पड़ा। उसकी गन आग बरसा रही थी। गिनती के दो आदमी सामने आए, उसने एक को भी बख्शा नहीं। वह सब कुछ नेस्तनाबूद कर देने का तमन्नाई नजर आ रहा था।

राज मुश्किल से ही उसे हॉल की ओर जाने से रोक सका। जहां उसके द्वारा किए गए विस्फोट से आग के शोले हाहाकार मचाए थे।

"क्या कर रहा है...मैं तुझे बाहर रुकने को बोलकर आया था न?" राज ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा।

___ "पण बाप, अपुन से बर्दाश्त नेई हुआ। गोली चलने से दिल का अन्दर में धमाका होने लगा...अपुन कू घबराहट चालू हो गया बस...फिर नेई रुक सका।" जय भावुक होता हुआ बोला।

"क्या सोचा तूने...यहीं न कि गोली चली तो सीधी मुझे लगी...है न?"

"अबी दिल का अन्दर में घबराहट होएली है तो अपुन क्या करे...क्या करे अपुन।"



"तू किसी हित लम्बा फंसवा देगा। अब तुझे बाहर रुकने को बोला नहीं करूंगा।"

"सतीश मेहरा को तलाश करने का क्या?"

"लगता तो नहीं कि वो इधर होगा।"

"तलाश करने में क्या वांदा है?"

"कोई नहीं।"

"तो फिर चल न...इधर काय कू टेम खोटी करेला है बाप...।"

"चल।"

दोनों आगे-पीछे सावधानी के साथ चल पड़े।

बिल्डिंग के विभिन्न भागों में चार आदमी खून से लथपथ स्थिति में मिले। चारों या तो मर चुके थे या फिर मरने के करीब थे। सतीश मेहरा वहां कहीं भी नहीं था। अंत में राज ने एक अत्यंत घायल आदमी को किसी प्रकार मौत की नींद सोने से जगाया।

"सतीश मेहरा कहां है...बता सकते हो?" उसने उस आदमी को झिंझोड़कर पूछा।

___ "न...न...नहीं।" वह आदमी मुश्किल तमाम बोलकर खामोश हो गया। उसके नेत्र बंद हो गए।"

"अर्मदा में अभी तुम आए थे?"

"न...नहीं।"

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"फिर?"

"सावन्त बॉस ने दो आदमी भेजे थे, कहा था कि कोई उनके पीछे बिल्डिंग में आने वाला है। उसे अगर पकड़ा जा सके तो पकड़ लो वरना सूट कर दो।"

"आई सी...इसका मतलब उसे मालूम था कि ऐसा कुछ हो सकता है।"
 
उस आदमी की आंखें एक बार फिर बंद हो गईं। राज ने उसे झिंझोड़कर जगाने का प्रयत्न किया लेकिन इस बार उसके ऊपर कोई असर नहीं हुआ। वह या तो मर चुका था या फिर गहरी बेहोशी में डूब चुका था।

तभी पुलिस सायरन उस क्षेत्र में गूंज उठा।

भाग जय...पुलिस!" कहता हुआ राज बाहर की ओर दौड़ पड़ा।

जय उसके पीछे था।

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दूसरे दिन राज अचम्भित रह गया।

कामरेड करीम भाई के अखबार में सतीश मेहरा कांड हैडलाइन में था और शब्दश: सच छपा था। उसने जुल्म की कहानी बयान करत हुए धरम सावन्त का नाम मोटे अक्षरों में छापा था। पुलिस प्रशासन की चाटुकारिता को भी बयान किया था। ये भी लिखा था कि करप्शन का दैत्य एक ईमानदार पुलिस इस्पेक्टर को निगल गया। उस समाचार को राज ने कई बार पढ़ा। उसे उम्मीद नहीं थी कि करीम भाई इतना हिम्मतवर रिपोर्टर होगा।

डॉली उसके साथ सटकर बैठी हुई कामरेड करीम की शाया रिपोर्ट को बड़े गौर से पढ़ रही थी। उस समय वह राज के साथ राज के चैम्बर वाले फ्लैट में थी। हालांकि जय दोनों को घाटकोपर ले जाना चाहता था लेकिन राज के सामने उसकी एक न चली।

___"ये करीम भाई तो काम का आदमी निकला...।" राज समाचार पत्र डॉली के सुपुर्द करता हुआ बोला-"बड़े जिगरे वाला है। जिस सच्चाई को छापने से बड़े-बड़े अखबार पीछे हट गए ...कामरेड के छोटे से अखबार ने वो दुस्साहस कर डाला। कमाल का आदमी था भई...मैं अभी उसे उसके काम के लिये शुक्रिया अदा करता हूं।"

उसने मोबाइल निकालकर कामरेड करीम के नम्बर मिलाए। दूसरी तरफ घंटी जाती रही लेकिन किसी ने फोन रिसीव नहीं किया।

"लगता है कामरेड अपने आफिस में है नहीं...।"

__"शायद...।" डॉली अखबार देखती हुई बोली।

राज ने रंजीत सावन्त का नम्बर मिलाया।

"कौन?" दूसरी तरफ से गुर्राहट भरा स्वर उभरा। उस स्वर को वह पहले भी सुन चुका था।

"रंजीत सावन्त को बुला फोन पर...।" उसने मुंह बिगाड़ते हुए कर्कश स्वर में जान-बूझकर इसलिए कहा ताकि दूसरी तरफ वाला उखड़ जाए। और वही हुआ भी।

"सावन्त साहब बोल ढोलकी के...सावन्त साहब...साले, तू एक बार मुझे मिल जा कहीं...सिर्फ एक बार फिर मैं तुझे तेरी बदतमीजी की सजा देता हूं। तेरी रूह कांप उठेगी...। यूं...थर- थर...।"

"मुझे उसकी आवाज सुनाई दे रही है।" राज हंसा।

"सारी हंसी आख में डाल दूगा...तू सिर्फ एक...सिर्फ एक बार मेरे सामने आ जा।"

"रंजीत को फोन पर बुला...जरूरी काम है

"अभी तू ठहर...फिर बताता हूं।"

उसके बाद सन्नाटा छा गया।

थोड़ी देर बाद रंजीत की आवाज उभरी "हैलो कौन है...?"

"वही...जिसकी वजह से रातों की नींद उड़ गई रंजीत सावन्त...जिसे मारने की तेरी कोशिश नाकामयाब रही और बदले में जिसने तेरे कई आदमी मौत के घाट उतार दिए।"

"तो तू है...।"

"बराबर पहचाना...आज का अखबार देख...?"

"तू किस अखबार की बात कर रहा है?"

"दैनिक प्रभात...।"

दूसरी ओर से रंजीत सावन्त का कहकहा उभरा।

"दैनिक प्रभात ने धरम सावन्त द्वारा सतीश मेहरा पर लगाए गए झूठे आरोप की पोल खोल दी है। तेर पापों का घड़ा भर चुका है। अब तो तू महज उसके फूटने का इंतजार कर।"

"दैनिक प्रभात की एक भी कापी बाजर से लाकर बता तो सही...।"

"क्या मतलब?"
 
"अरे, गरीब प्रकाशक का गरीब अखबार है। पांच सौ प्रतियां भी मुश्किल से ही छाप पाता है।। उसकी सभी प्रतियां मेरे पास सुरक्षित मौजूद हैं...बेफिक्र रह। उस अखबार को जनता के बीच जाने का अवसर नहीं मिल सकेगा। दैनिक प्रभात की आवाज तो निकल ही नहीं सकेगी। रहा सवाल उस कामरेड करीम भाई का तो...अभी तू मुझसे वाकिफ नहीं है...जिसने मेरे खिलाफ झंडा ऊंचा किया है, उसके गले तक पहुंचने में मेरे आदमियों को देर नहीं लगती।"

राज एकाएक ही चौंक उठा।

उसने बीच में ही फोन बंद कर दिया और वह तेजी से बाहर की ओर लपका।

"कहां जा रहे हो...?" डॉली ने उत्तेजनापूर्ण स्वर में पूछा।

"जरूरी काम से जा रहा हूं...अभी आ जाऊंगा।" राज उस कमरे से निकलकर बैडरूम की ओर मुड़ता हुआ बोला।।

डॉली लगभग दौड़ती हुई उस कमरे में पहुंची।

राज फुर्ती के साथ तैयार हो रहा था।

बगली होलस्टर पहनकर पहले उसने होलस्टर में अपना पहला माउजर लोड करके फिट किया। दोनों पैरों में वह नीकेब चढ़ाए हुए था। दायीं ओर वाले नीकेब में उसने दूसरा माउजर फंसाया। लम्बे शिकारी चालू को बायीं और वाले नीकेब में फंसाने के बाद उसने कोट पहन लिया। उसके विशेष कोट की अंदरली जेबों में ढेर सास सामान पहले से ही सैट था।

डॉली की आखें भय से फैलती चली गई। "क्या हुआ...मुझे बताओ कहां जा रहे हो?" उसने घबराएं हुए स्वर में पूछा।"

"कामरेड करीम पर मुसीबत है...उसे फौरन मद की जरूरत है।"

"मैं साथ चलूं?"

"तुम क्या करोगी?"

"साथ चलना चाहती हूं।"

"ओ. के. चलो।"

राज उस घड़ी किसी बहस में पड़कर वक्त जाया करना नहीं चाहता था। डॉली उसके साथ चल पड़ी।

गहरे नीले रंग की एस्टीम तूफानी रफ्तार से निकल भागी। करीम भाई ने उसे जो कार्ड दिया था उसमें टेलीफोन नम्बर के अतिरिक्त ऐड्रेस भी दर्ज

था। ऐहेस को तरफ बढ़ती एस्टीम की रफ्तार निरंतर बढ़ती जा रही थी। अंत में...।

___एस्टीम एक घनी बस्ती की चौड़ी-सी गली में दाखिल हो गई। उस गली में दाखिल होने से पूर्व राज ने कार रोककर एक आदमी से उस ऐड्रेस के बारे में पूछ लिया था। ऐड्रेस के अनुसार उसने महज दो मोड़ और काटने थे, उसके बाद कामरेड करीम भाई का अफिस कम रेजीडेन्स आ जाना था। एस्टीम ने पहला मोड़ काटा। फिर वह दूसरे मोड़ की तरफ बढ़ ही रही थी चीख-पुकार का शोर उभरने लगा।

सड़क चौड़ी थी अलबत्ता उस घड़ी संकरी प्रतीत हो रही थी। क्योंकि इतने सारे आदमी थे और इतनी सारी तलवारें थीं। समूची सड़क भरी-भरी प्रतीत हो रही थी। सबसे आगे था खून में लथपथ दौड़ता हुआ-अपनी मौत से भागता हुआ करीम भाई। उसके सफेद कुर्ते-पायजामे पर खून का लाल रंग अलग से चमकता नजर आ रहा था। वह बेतहाशा भाग रहा था।

बदहवासी के आलम में उसे कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। पीछे से किसी ने तलवार फेंककर मारी। तलवार पहले सड़क से टकराई फिर उछलकर उसकी टांगों से जा टकराई। नतीजतन वह दौड़ता हुआ लड़खड़ाया, उसने अपने संतुलन को बनाने की कोशिश की। लेकिन वह लड़खड़ाता चला गया। उसकी हालत उस पतग की तरह हो गई जो हवा में पूरी तरह तन जाने के बाद एक झटके के साथ धागे से टूटकर हवा में लहरा गई हो। लहराती हुई पतंग ने जमीन पर गिरना था और पीछे झपटते तलवारों के झुंड ने उसे काटकर टुकड़ों में विभक्त कर देना था।

लेकिन! ऐन वक्त पर राज किसी छलावे की तरह कार से प्रकट हुआ। उसने बाएं हाथ में घायल करीम भाई को संभाली और दाहिने हाथ से माउजर निकालकर जो गोलियां बरसाई तो दौड़ते कदमों को मानो अचानक ही ब्रेक लग गया। दो तलवार वाले जो सबसे आगे थे, उनमें से एक के सीने में गोली लगी दूसरे का भेजा हवा में बिखर गया। जैसे ही दो लाशें गिरी वैसे ही बाकी के आदमी निकल भागे।
 
राज ने पहले उनके पीछे बढ़नः ।। चाहा लेकिन अगले ही पल उसे करीम भाई की हालत का ध्यान हो आया।

"करीम भाई...करीम भाई तुम ठीक तो हो न ?" उसने करीम को झिंझोड़ते हुए पूछा।

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"हं...हा...म...मैं ठीक हूं...ठीक है।" कामरेड करीम कम्पित स्वर में बोला।

राज ने उसके शरीर से बहता खून देखा, उसके घाव देखे और फिर वह तेजी से उसे कार में डालकर वहां से ले चला।

करीब के नर्सिंग होम में कामरेड को पहुंचाने के बाद वह वहां डॉली को छोड़कर निकल जाना चाहता था लेकिन इसी बीच मरीज को देखने आए डाक्टर ने मरहम-पट्टी करने से इंकार कर दिया।

डॉली दौड़कर बाहर आयी।

"तपन...तपन...डाक्टर साहब कह रहे है ये ता पुलिस केस है-वो इलाज नहीं कर सकते।" उसने उत्तेजनापूर्ण स्वर में कहा।

राज तुरन्त उल्टे पांव वापस लौटा। डाक्टर अपने केबिन में था। वह तुरन्त केबिन में पहुंचा।

"सॉरी मिस्टर...दिस इज पुलिस केस, आई कान्ट ड इट।" उसे देखते ही डाक्टर बोला।"

"आपकी बात सही है...ये पुलिस केस...कुछ गुण्डों ने कामरेड को तलवारों से मार डालने की कोशिश की। वो तो मैं इन्हें यहां तक ले आया वरना तो इन्होंने घटनास्थल पर ही दम तोड़ देना था। पेशेंट आपके सामने है। मैं आपकी फीस भरने को तैयार हूं। आप पेशेंट का इलाज शुरू करने से पहले पुलिस को इंफार्म कर दें। पेशेंट ने जो भी बयान देना होगा दे देगा।"

___ डाक्टर ने घूरकर उसे देखा फिर क्रोधित भाव के साथ रिसीवर उठाकर पुलिस स्टेशन के नंम्बर डायल किए। फिर उसने राज से पूछा "पेशेंट का नाम पता...?"

"डेली न्यूज पेपर प्रभात के एडीट... र कामरेड करीम भाई...।"

"वो कामरेड भाई हैं?"

"जी हां डाक्टर साहब।"

इसी बीच दूसरी तरफ से सम्पर्क स्थापित हो गया और डाक्टर ने कामरेड करीम के घायल होने की सूचना पुलिस को दे दी। फिर वह वहां एक पल के लिए भी नहीं रुका। सीधा वहां पहुंचा जहां करीम को रखा गया था। आनन-फानन उसने करीम की महरम-पट्टी शुरू कर दी। कई जगह टांके भी लगाने पड़े। वह प्रत्येक घाव की लम्बाई-चौड़ाई को नापकर नोट करता जा रहा था। उसे मालूम था कि पुलिस को घावों की तफसील रिपोर्ट चाहिए होती थी। काम पूरा करने में उसे एक घंटा दस मिनट का समय लगा। इस बीच उसने कामरेड करीम को खून की बोतल लगा दी थी।

अंत में वह वापस अपने केबिन में लौटा। कॉरीडोर में मौजूद राज को उसने अंदर जाने का संकेत किया।

राज ने उसके केबिन में दाखिल होने से पूर्व डॉली को संकेत से आदेश दिया। नतीजतन डॉली फुर्ती से कामरेड करीम के कमरे की ओर बढ़ गई।

"पुलिस अभी तक यहां पहुंची नहीं है जबकि फोन रिसीव करने वाले ने कहा था कि पुलिस फौरन यहां पहुंच रही है।" अपनी कुर्सी पर फैलते हुए डाक्टर ने चिन्तित स्वर में कहा।

राज उसकी बात सुनकर गहरे सोच में डूब गया।

"पुलिस आयी क्यों नहीं अब तक?"

"आपने अपनी ड्यूटी पूरी कर दी न...आपका फर्ज पुलिस को इंफार्म करना था सो कर दिया, बात खत्म। पुलिस नहीं आती है तो न सही। जब भी पुलिस आकर पूछताछ करे तो कामरेड करीम भाई और दैनिक प्रभात तो आपको याद ही है न...फौरन पुलिस को बता देना कि घायल शख्स जो आपके ट्रीटमेंट का तलबगार था...दैनिक प्रभात का एडीटर था।"

"क्या मैं एक बार फिर फोन कर दूं...?"

'मुझे कोई एतराज नहीं। एनी वे डाक्टर...क्या मैं अपने पेशेंट को ले जा सकता हूं?"

"अभी नहीं..अभी तो उसे खून दिया जा रहा है। खून की बोतल खत्म होने से पहले तुम यू भी उसे ले जा नहीं सकते। दूसरे उसे थोड़ी देर यहां ठहरना होगा। अभी उसे एक बोतल और लगानी होगी...उसके जरिए ताकत के कुछेक इंजेक्शन भी दे दूंगा।"

__यानि अभी यहां थोड़ा वक्त और गुजारना होगा?"

"बिल्कुल।"

"अच्छा तो आप तब तक अपना बिल ही मुझे बनाकर दे दें तार्कि मैं उसका भुगतान कर दू?"

__ "ऐसी भी क्या जल्दी है...अभी ट्रीटमेंट पूरा तो हो जाने दो।" कहने के साथ ही डाक्टर ने रिसीवर उठा लिया और फिर वह नम्बर डायल करने में व्यस्त हो गया।

"पुलिस को फोन कर रहे है?"

"हां।"

"ठीक हैं...मैं बाहर हूं। आपको मेरी कोई भी जरूरत पड़े तो आप मुझे बुलवा लें।"

"ओ. के.।"

राज बाहर निकल आया।
 
राज बाहर निकल आया।

उसने पहले नर्सिंग होम का अंदर से एक राउंड लगाया। उसके बाद वह ऊपरी माले की ओर बढ़ गया। नर्सिंग होम तीन माले की काफी बड़ी बिल्डिंग में बनाया गया था लेकिन उसमें मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं थी। दूसरा माला तकरीबन खाली था। दो ही पेशेंट थे दूसरे माले पर और तीसरे माले पर एक भी पेशेंट नहीं था। घूमने के बाद वह नीचे करीम के कमरे में पहुंचा। करीम अभी भी मूर्च्छित था। डॉली उसके पास ही बैठी थी।

"सब ठीक है न?" राज ने उससे पूछा।

"हां...ठीक है।" डॉली उसे -देखकर खड़ी होती हुई बोली।

"होश नहीं आया?"

"बीच में एक बार थोड़ा-थोड़ा आया था। फिर अपने आप ही आखें बंद होती चली गईं।"

"डॉली, तुम कामरेड के पास से हटना नहीं। मुझे कुछ गड़बड़ लग रही है।"

"कैसी गड़बड़ ?"

"आखिर पुलिस अभी तक यहां आयी क्यों नहीं...।"

बड़बड़ता हुआ राज बाहर निकल आया। राज तीसरे माले को भी पार करके खुली छत पर जा पहुंचा। छत पर बड़ा-सा वाटर टैंक था। वाटर टैंक की साइड में छिपकर उसने दूरबीन आखों पर लगाई और आसपास के क्षेत्र का निरीक्षण करने लगा। नार्सिग होम के सामने सड़क थी, सड़क पर हल्का-फुल्का ट्रैफिक था। सड़क के उस पार चार इमारतें लाइन से बन रही थीं। उन चार में से सिर्फ किनारे वाली एक इमारत में काम चल रहा था। शेष तीन का काम बंद था। आगे ड्रेन का छोटा-सा पुल था। बायीं ओर सब्जीमण्डी थी। राज ने सिगरेट सुलगा ली।

वह नर्सिंग होम में आने-जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को गौर से देख रहा था। दो सिगरेटें फूंक चुकने क बाद तब उसने टैंक के साइड की छोटी-सी दीवार पर फैल जाने की कोशिश में अपनी टांगें फैलाई ही थीं कि अचानक नर्सिंग होम के फाटक पर काले शीशे वाली एक वैन रुकी।

एक आदमी फुर्ती से वैन के निकट पहुंचा। उसने ड्राइवर से कुछ कहा। फिर उस ओर संकेत किया जिधर करीम का कमरा था।

राज खामोशी से देखता रहा। उसने देखा वैन के निकट पहुंचने वाला आदमी तेजी से चलता हुआ करीम के कमरे की दीवार तक पहुंचा और उसने पीली दीवार पर लाल रंग की चाक से निशान लगा दिया। काली वैन धीमी गति से आगे बढ़ गई। राज उसकी प्रत्येक गतिविधि को नोट कर रहा था। काली वैन तीसरे नम्बर की निर्माणाधीन इमारत में दाखिल हो गई।

राज ने ऊपर नीचे होकर उसे देखने का भरसक प्रत्यन किया लेकिन वैन इमारत के पिछले भाग में पूरी तरह लुप्त हो चुकी थी। वह फ़ैसला नहीं कर पा रहा था, क्या करे...क्या न करे।

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.अचानक ही उसे एक स्याहपोश नजर आया वह धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ रहा था और उसके हाथ में मेंडोलिन केस था। राज उसे पूरी तरह देखे नहीं पा रहा था। सीढ़ियों के बीच में बल्लियां आ जातीं या फिर मोड़ आ जाने पर वह लुप्त हो जाता। स्याहपोश अभी-भी पूरी तरह नजर नहीं आ रहा था लेकिन उसे मेंडोलिन केस को राज ने खुलते देख लिया। केस के अंदर से टेलिस्कोपिक गन के पार्ट्स निकलने लगे। काले दस्ताने युक्त हाथ टेलिस्कोपिक गन के पाटर्स को जोडने का काम करने लगे।

अगले ही पल राज सारी कहानी समझ चुका था। वह फुर्ती से सीढ़ियां उतरकर नीचे । पहुचा। पहले उसने डॉली को सावधान कर देना चाहा किन्तु अगल ही पल वह आगे बढ़ चुका था। उसने सड़क पार की और वह दूसरे नम्बर की इमारत में दाखिल होकर अंदर ही अंदर दौड़ता हुआ तीसरे नम्बर की इमारत में दाखिल हो गया।

उक्त इमारत में दाखिल होते ही उसने बिल्ली जैसी चाल से चलना आरंभ कर दिया। एक-एक बार में दो-दो सीढियां पार करता हुआ वह आनन-फानन स्याहपोश के सिर पर आ पहुंचा। उस घड़ी स्याहपोश गन को कंधे से सटाए टेलिस्कोप से निशाना लगाने का प्रयास कर रहा था। राज को लगा कि कहीं वह ट्रेगर दबाने ही न जा रहा हो-इसलिए उसने फुर्ती से माउजर निकालकर उसकी खोपड़ी से सटा दी।

"खबरदार! कोई हरकत मत करना!" वह गुर्राकर बोला।

"पीछे हट...निशाना बहक जाएगा!" स्याहपोश ने निरन्तर निशाना लगाने का प्रयास करते हुए कहा।

"मैं भेजा उड़ा दूंगा।"
 
"तेरा भेजा पहले ही उड़ जाएगा श्याने...जब मैं शिकार पर निकलता हूं तब इस बात का इंतजाम करके चलता हूं कि कहीं कोई मेरे काम में बाधा न डाल दे। अपने पीछे देख। तेरे भेजे से ज्यादा दूर नहीं है वो बन्दूक...देख-देख।" स्याहपोश निरंतर सामने की ओर देखता हुआ इस प्रकार बोला मानो उसे अपने पीछे भी सब-कुछ दिखाई दे रहा हो।

राज को उसकी बात पर विश्वास नहीं हो रहा था लेकिन जब उसने तिरछी दृष्टि से गर्दन को थोडा-सा घुमाकर देखा तो उसे अपने पीछे किसी की मौजूदगी की झलक मिल गई। यकीनन कोई उसके पीछे मौजूद था। उसका माउजर स्वत: ही नीचे की ओर झुक गया। वह समर्पण की मुद्रा में आ चुका था। समर्पण की मुद्रा में आने के बाद उसने मुड़कर पीछे देखना चाहा तो तुरन्त ठंडी बैरल उसकी गर्दन से आ चिपकी।

"पिस्तौल फेंक दो!" कठोर स्वर में आदेश दिया गया।

वह ठिठक गया।

"पिस्तौल फेंको वरना...!" स्वर में धमकी भरी हुई थी।

उसने उंगलियों में फंसा माउजर उंगलियों की गिरफ्त से आजाद कर दिया।

तीखी आहट के साथ भारी माउजर फर्श से टकराकर एक बार थोड़ा-सा उछला फिर स्थिर हो गया। उसके बाद वह पीछे मुड़ा। तब उसने देखा। लम्बोतरे चेहरे वाला खरनाक-सा आदमी ढीले-ढाले कुर्ते-पायजामे में खतरनाक गन लिए खड़ा था।

इस बीच...!

स्याहपोश भी अपनी गन समेत उसकी ओर घूम गया। वह दो खतरनाक हत्यारों के घेरे में पहुंच चुका था, जो न सिर्फ पेशेवर थे बल्कि निर्मम भी थे। उसने बारी-बारी से दोनों की ओर देखा।

दोनों हत्यारों ने क्रूरतापूर्ण ढंग से अट्टहास लगाया।

"हम जिसकी सुपारी लेते हैं उसे इस फानी दुनिया से कूच करना ही पड़ता है।" स्याहपोश गुर्राता हुआ क्रूरतापूर्ण स्वर में बोला।

"अब तू देखेगा...तेरी आखों के सामने हम उसे शूट कर देंगे जिसे बचाने के लिए तू आधी-तूफान की तरह दौड़ता-भागता यहां तक पहुंचा है।" लम्बे चेहरे वाले ने शैतानी हंसी के साथ कहा।

तुम लोग किसे मारना चाहते हो?" राज ने सामान्य होते हुए पूछा।

"जिसे तू बचाना चाहता है।"

"मैं किसे बचाना चाहता हूं...?"

"ऐ श्याने, जास्ती बकवास करेंगा तो पहले तुझे ही निशाना बना डालूंगा...क्या!"

"अच्छा इतना तो बता दो-उसकी सुरपारी तुम्हें दी किसने?"

"ये हमारे बिजनेस का सीक्रेट है। हम सीक्रेट आउट नहीं करते। अब मुश्किल ये है कि हमें एक की जगह दो गोलियां बरबाद करनी पड़ेगी।"

राज ने अपने दाहिने हाथ को हल्का-सा दबाव दिया और कोट की आस्तीन के अंदर ही अंदर एक छोटी-सी गोली रेंगती हुई आगे बढ़ने लगी। गोली को व्यवस्थिति करने की गरज से उसने अपना जबड़ा खुजाने के लिए हाथ ऊपर उठाया तो आगे बढ़ती गोली बीच में ही रुक गई। सब-कुछ बेहद सामान्य था। उन दोनों को कुछ पता नहीं था कि उनके विरुद्ध कार्यवाही अमल में लायी जा चुकी है।

"एक ही जगह दो हत्याएं करनी पड़ेगी।" लम्बे चेहरे वाला बोला-"एक उरसकी जो नर्सिंग होम में है और दूसरी इसकी।" उसने राज की ओर संकेत किया।"

"मुझसे वाकिफ हो?" राज ने उसकी आखों में अपलक झांकते हुए पूछा। "वक्ती जुनून के तहत बना हुआ हीरो।" "मुम्बई की पूरी पुलिस मेरी तलाश में है...।"

स्याहपोश चौंका।

"तू निशाना लगा...टेम खोटी मत कर। तब तक मैं इस हीरो से निपटता हूं।" लम्बे चेहरे वाला कर्कश स्वर में बोला।

स्याहपोश टेलिस्कोपिक गन संभालकर नर्सिग होम की तरफ घूम गया लेकिन उसका समूचा ध्यान राज की तरफ ही लगा हुआ था।

"हां...तो तू क्या कह रहा था...अक्सी मुम्बई की पुलिस तेरी तलाश कर रही है?" लम्बोतरे चेहरे वाला गुर्राहट भरे स्वर में बोला।
 
"दिल्ली और गुजरात की पुलिस भी।" राज ने उसकी आखों में झांकते हुए कहा।

"इतना बड़ा सिंघड़ है तू।"

"दो लाख का इनाम है मेरे सिर पर।"

"इससे भी ज्यादा लम्बी हांकने का अवसर दूंगा तुझे...बोल-बोल?"

"नाम नहीं पूछोगे?"

"बता दे...अपने-आपको लायन बता दे।"

"राज शर्मा...उर्फ लायन।"

"वाह रे झुठे...जैसा मैं बोलता जा रहा हूं तू भी बेशर्म बनकर उसे ही रिपीट किए जा रहा है।"

"तुझे रंजीत सावन्त ने यहां भेजा है कामरेड करीम का मर्डर करने के लिए...।" रौद्र हो उठा।

लम्बे चेहरे कला पहले सावधान हुआ लेकिन राज को सहज भाव से स्थिर देख वह पुन: पहले जैसी स्थिति में आ गया।

"अच्छा तो सचमुच का हीरो बनना चाहता है।"

"पेशेवर हत्यारे का काम बेहद बुरा होता है। और एक बात तुझे बता दूं, गोली चलाने वाला गोली से ही मरता है मगर पेशेवर हत्यारा कुत्ते की मौत भी मरता है।"

"तू तो अपने आपको सचमुच लायन साबित करने पर तुला हुआ है।"

"और सुन...तेरा अंजाम भी बहुत बुरा होने वाला है।"

"अभी तो मुझे तू मरता दिखाई दे रहा है बड़बोले।"

__ “निशाने पर है शिकार...! इसी बीच स्याहपोश ऊंचे स्वर में बोला। टेलिस्कोपिक गन उसके कंधे से सटी हुई थी और आख टेलिस्कोप के लैंस पर। उसका शरीर तना हुआ था। उसमें रत्ती बराबर भी शिथिलता नहीं थी।

"ट्रेगर दबा दे!" लम्बोतरे चेहरे वाला चिल्लकर बोला।

उसी समय राज ने अपना दाहिना हाथ सीधा कर दिया। आस्सीन से गोली फिसलकर फर्श पर गिरी। गिरते ही हल्का-सा विस्फोट हुआ।

और!

पलक झपकते जैसे वहां एक समूचा बादल फैल गया हो। लम्बे चेहरे वाले ने फायर किया। लक्ष्यविहीन फायर।

उसकी आखें तीखी पीड़ा से बंद हो गई थीं । वही हालत स्याहपोश की थी। स्याहपोश ने भी ट्रेगर दबाने की की कोशिश की मगर ट्रेगर दबाने के पहले ही वह हवा में उछल चुका था।

किसी ने उसे दूसरे माले से नीचे फेंक दिया था। वह सिर के बल नीचे गिरा। गर्दन टूटी और खेल खत्म हो गया।

बचा लम्बे चेहरे वाला। आखें बंद किए ही गिरता-पड़ता वह सीढ़ियों तक जा पहुंचा। सीढ़ियों पर फिसल जाने के कारण वह संतुलन बनाए न रख सका।

__ सीढ़ियों पर फिसलते हुए नीचे आधे मोड़ पर पहुंचने में चोटें तो उसे कई आयीं लेकिन उस धुएं की पीड़ा कम से कम वह नहीं थी। उसने कराहते हुए अपनी आखों को दोनों हाथों से मसल डाला। धुएं की पीड़ा आखों में खुजली मचाए चली जा रही थी। अन्त में! किसी प्रकार उसने अपनी आंखों को खोला।

आखों को खोला तब राज उसके सामने था। उसने दहशत भरी निगाहों से राज की और देखा-"ट...लायन...?"

 
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