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लाल हवेली

उसने जल्दी-जल्दी फूलों की बेलों की ओट में तीन बम लगाकर बैग का बोझ हल्का कर लिया। उसे इस बात का भी डर था कि कहीं कोई वक्त से पहले उसके बैग को न टटोल ले।

- जब वह अन्तिम बम लगाकर पलटा तब जग्गू जगलर को उसने मोड़ से उतर आते देखा।

उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। वह सोचने लगा कि कहीं जग्गू ने उसे बम लगाते देख तो नहीं लिया। कहीं उसकी चोरी पकड़ी तो नहीं गई।

वह अपने अंदर की बौखलाहट छिपाने की कोशिश म बाउंड्री वॉल की ओर मुड़कर इस प्रकार देखने लगा मानो वहां के हिस्से का निरीक्षण कर रहा हो।







"क्या बाप...इधर से अब्बी कोई आने वाला नेई...अपुन इधर का भी इंतजाम कर डालेगा...क्या! जग्गू जगलर जो भी काम चालू किया न तो उसे खल्लास कर को छोड़ा। सब बरोबर हो जाएंगा। वो भूतनी का आया न तो सीधा टपका डालेंगा अपुन उसक...टपका डालेंगा।"

"मैं ये सोच रहा हूं जग्गू कि ये दीवार छोटी है

___"ऐ बिडू तेरे को कितनी बार बोला दीवार छोटी हो या बड़ी...जग्गू जगलर का नाम पूरा बोलना मांगता क्या! जग्गू बोलने से अपुन का इमेज डाउन होता न...तो तेरे कू समझकर बोलने का बाप!

"अबे हां...जग्गू जगलर...जग्गू जगलर! बस! अभी जगलर की दुम लगा देने से बहुत बड़ा तीरंदाज बन गया तू।"

"ऐई...अपुन से पंगा हूं...अपुन से पंगा नेई । अपुन का भेजा घूम गया न तो उप्पर से छ: इंच छील डालेगा। भोंत डेंजर आदमी है अपुन।"

"फोन लगाऊं क्या छोटे साहब को?"

"ने....ऐसा फोकटी का काम कभी नेई करना। बोल इधर का मामला फिट है न...अरे हाथ मिला न बिडू...जग्गू जगलर दिलखुश आदमी है। मन में मैल नेई रखता ...क्या!"

"इधर दो आदमी फिट कर।"

"बरोबर बोलता...अगर बड़ा साहब के पास वो मिलने के वास्ते आया तो पिच्छू से ही आएंगा।"

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"दो साइड में...बाकी सामने।"

"बाकी का हिसाब भी देख ले...सब ठीक है न?"

"हवा के घोड़े पर सवार होकर नहीं देखने वाला। आराम-आराम से देखूगा। कोई जल्दी नहीं है। चार बजने में अभी बहुत देर है।"

"देख ले बाप...पहले तू ही देख ले। छोटा सावन्त देखेगा और उसका जरिए कमी निकली तो अपुन का नौकरी खलास होने का चक्कर हो जाएंगा।" जग्गू जगलर उल्टे कदमों से वापस लौट चला।

जोगलेकर कोठी के सामने वाले भाग में पहुंचा। उस घड़ी पोर्टिको में उसे एक बम लगाने का अवसर मिल गया।

जग्गू जगलर तब कोठी के अंदर था।

चार गनर ड्राइव वे से लेकर सामने के लॉन वाले भाग में पहले से सैट थे। और ! चार ही गनर फाटक पर थे।

फाटक के बाहर की स्थिति का निरीक्षण करते जोगलेकर ने चारों गनर्स को कोठी की बाउंड्री वॉल बाहर से देखने के लिए भेजकर एक बम वहां फाटक के पास ही फिट कर दिया।

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अब उसके बैग में तीन बम बाकी थे। एक उसने फव्वारे के पास छिपाया, दूसरा लॉन की फुलवारी में और अन्तिम बम वह कोठी के अंदर कॉरीडोर के बीच में लगाकर संतुष्ट हो गया।

___एक कठिन काम उसके द्वारा पूरा हो गया था। उसने राहत की सांस ली।

फिर वह लॉन की बैंच पर बैठकर सिगरेट सुलगाने लगा।

तभी! जग्गू जगलर वहां वापस आ गया। कोठी के अंदरले भाग की सैटिंग के बाद वह खुली हवा में वापस लौटा था।

"कर आया काम पूरा...?" जोगलेकर सिगरेट फूंकता हुआ बोला।

"एकदम फिट...।"

'कहीं कोई कमी?"

"जग्गू जगलकर हमेशा फिट काम करेला है...क्या! अपुन कोई एइसा वइसा चलता पुरजा फिसलता टफेरी नेई । अपुन फुल ट्रेनिंग शुदा मवाली नम्बर वन है। अक्खी मुम्बई जग्गू जंगलर को भाई बोलती समझा क्या...! ये तो ते है। अपुन का सगेवाला...तेरी जगह कोई दूसरा होता तो कब का लुढ़का डालता बाप...क्या! अपुन भोत डेंजर आदमी है...पैगा नेई लेना। अपुन जग्गू...जग्गू जगलकर। मुम्बई का मवाली लोग अपुन का नाम से इधर थर-थर कांपता है।"

"बड़ा सावन्त के आने पर किसी बिल की तलाश मत करने लग जाना।"

"नेईं करेगा...पन क्या ..!" बोलता बोलता जग्गू जगलर अचानक ही ठिठककर खामोश हो गया। उसकी नजर जोगलेकर के खाली बैग पर टिककर रह गई थी।
 
जोगलेकर ने भी अपनी गलती को महसूस किया। वह खाली बैग को अभी-भी सीने से लगाकर रखे हुए था जबकि काम होते ही उसने उसे कहीं फेंक देना चाहिए था।

"अब्बी का अबी तुमेरा बैग खाली...इसका अंदर कोई भूत-प्रेत होएला था क्या?" जग्गू जगलर उसकी ओर शंकित दृष्टि से देखता हुआ बोला-"जो पलक झपकते जिनी का माफिक उड़न छू हो गयः...ऐ! क्या! जग्गू बगलर की नजर चील की नजर से चास्तीं तेज है।"

"वो...उसके अंदर दावत का खाना था। दरअसल मै धन सेठ की दावत में जा नहीं सका तो उसने तमाम सारा खाना पैक करके भिजवा दिया। मैंने सोचा कि खाना खराब न हो जाए-इसलिए उसका घर पहुंचना भी जरूरी है। यहां का कुछ पता नहीं कितनी देर लग जाए।"

"कौन धन्नू सेठ...?"

"वही...साकी नाके वाला। कबाड़ का काम करता है न?"

"अपुन नेई जानता।" "

है उधर...साकी नाके में।"

"होएगा तो अपनु कू क्या करने का...अबी तू इधर का बोल। सब बरोबर है न...?"

"हां...सब ठीक है। छोटा सावन्त आ जाए तो उसे और दिखा लेना का...बसा।"

सिर हिलाता जग्गू जगलर वहां से आगे बढ़ गया। उसके जाते ही जोगलेकर ने सबसे पहला काम उस बैग को ठिकाने लगाने का किया। उसे लगा कि अगर अचानक ही सटीक चहाना उसके द्वारा फिट न हो गया होता तो सब गड़बड़ हो जाती।

जग्गू जगलर का उस वक्त संतुष्ट होना बेहद जरूरी था।

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अन्टाप हिल कोठी नम्बर वन-वन नाइन के फाटक पर राज की कार को सेकने की कोशिश की गई मगर राज उसे तेज रफ्तार से दौड़ाता हुआ सीधा कोठी के ड्राइन वे के मध्य में रुका।

आनन-फानन कई गनर दौड़कर उसकी कार के गिर्द जा पहुंचे।

"बाहर निकल...आज जग्गू जगलर तेरे से सास अगला पिछला हिसाब बरामर कर डालेगा...क्या! जग्गू जगलकर वो चीज है जो किसी की उधारी बाकी नेई रखता...अक्खी उधारी चुकता कर डालता...निकल बाहर कू।" वह विषाक्त स्वर में बोला।

"अपने बाप से पूछकर आया न...।" राज कार से बाहर निकला। उसने एक नजर चारों से तनी हुई गनों पर इस प्रकार डाली मानो गनों के स्थान पर फूल मालाओं को देख रहा हो। उसी अंदाज में उसने अपने लिए सिगरेट सुलगा ली। फिर वह कहने लगा "रंजीत सावन्त को अगर बाप मानता हो तो उसे और धरम सावन्त को बाप समझता हो तो उसे जाकर बोल कि उसका बाप आया है। पुरानी मार अगर भूला न हो तो काम फुर्ती से कर। कहीं ऐसा न हो कि टाइम पूरा हो जाए और मैं यहां से चलता बनूं

जोगलेकर पीछे था।

मगर अचाम्भित था क्योंकि वह इतना पीछे भी नहीं था कि उस तक राज की नजर पहुच न पाती। उसकी नजर एक पल के लिए भी जोगलेकर के ऊपर न ठहरी। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उसने जोगलेकर को कभी देखा ही न हो।

"अब तू जाएगा है तो जाएगा किधर...ये जग्गू जगलर का ठिकाना है। इधर आदमी आता अपनी मर्जी से पन जाता अपुन का मर्जी से...तू डंडा चला को भी कुछ नेई कर सका....अपुन तेरे कू इधरिच खोल डालेगा...अब्बी का अबी!"

__ "बाप लोग से पूछा क्या...बिना पूछे कोई काम बिगाड़ेगा तो तेरा क्या होगा मालूम तुझे...मुझे मालूम मैं तुझे तेरे बारे में बताता हूं। तू बिना पूछे कोई कदम उठाएगा तो रंजीत तेरा भेजा निकाल डालेगा। तेरी तिक्का बोटी कर डालेगा...साले सांड! तू अपने आपको समझता क्या है।"

राज जैसे ही उसकी ओर लपका, वह उल्टे कदमों से वापस भाग निकला।

तमाम गनर अचम्भित रह गए जब उन्होंने देखा कि एक निहत्थे आदमी से डरकर जग्गू जगलर जैसी शातिर भाग खड़ा हुआ।

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फिर भी उन लोगों ने एकजुट होकर जब गने तानी तब जाकर राज रुका।

___ "तुम्हारे बड़े बाप ने मुझे यहां बुलाया है। पूछताछ कर लो...कहीं ऐसा न हो, मुझे रोकने के चक्कर में तुम्हारी नौकरी जाती रहे।"

इसी बीच जग्गू जगलर की पोर्टिको के समीप पुन: वापसी हुई।

"आने दो उसे...बड़े साहब बुला रहे हैं।" वह वहीं से चिल्लाकर बोला।
 
गनर्स ने राज के लिए ड्राइव वे खाली कर दिया। सिगरेट के कश लगाता हुआ राज ड्राइव वे पर चलता हुआ कोठी के भीतर दाखिल हुआ। बड़े हॉल में उसका सामना छोटे-बड़े सावन्त से हुआ।

रंजीत सावन्त और धरम सावन्त।

"आओ मित्र...आओ।" धरम सावन्त ने उसका स्वागत करते हुए चाटुकारिता पूर्ण स्वर में कहा।

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उसके अंदर की धूर्तता को राज भली-भांति समझ रहा था। वह निर्भीक भाव से धरम सावन्त के सामने कुर्सी पर जा बैठा।

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"टोपी वाले, जहां तक मैं समझता हूं...तूने धरम सावन्त होना चाहिए क्योंकि भेड़ की खाल में भेड़िया तू ही नजर आ रहा है और ये सांप का छोटा सपेला...।" उसने शैतानी अंदाज में मुस्कराते हुए कहा-"यानी रंजीत सावन्त...है न?"

"हें-में-ह.!" धरम सावन्त ने अंदर के भाव अंदर ही दबाते हुए मक्कारी भरी हंसी का प्रदर्शन किया-" भेड़ की खाल और भेड़िए वाली बात समझ मैं आयी नहीं मित्र...।"

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"ये जो खद्दर की टोपी...खदर का कुर्ता-पायजामा है न, ये भेड़ की खाल...आगे तुझे क्या समझाऊं...इतना तो तू खुद समझदार है। अब जल्दी बोल, क्यों आमने-सामने बैठकर बात करने का तलबगार था

"तुम्हें देखने का तमन्नाई था।"

"देख लिया?"

"हां।"

"तो फिर काम की बात कर। मुझे दूसरी जगह जाना है।"

__ "काम की बात ये है कि तूने यहां आकर अपनी जिन्दगी की सबसे भारी भूल की है।" बीच में दखल देता रंजीत सावन्त दांत पीसता हुआ तीखे स्वर में बोला।

राज मुस्कराया।

"ऐ...खामोश!" धरम सावन्त ने रंजीत को डांटा

"उल्टी-सीधी बकवास करने की जरूरत नहीं है। खबरदार, जो दोबारा बीच में अपनी टांग फंसाने की कोशिश की।"

रंजीत खामोश हो गया।

"ये पागल है मित्र...।" धरम सावन्त वापस राज की ओर मुड़कर कदरन नम्र स्वर में बोला "इसकी बात का बुरा न मानना...थोड़ा पागल है। वो होता है न खिसका हुआ...?"

___"फिकर मत कर...खिसका हुआ हो या बिना खिसका हुआ। मैं सबको ठीक कर देता हूं।"

"जाने दो मित्र...अब पहले ये बताओ लोगे क्या...मार्टिनी...बैस्ट सेलर...ओल्डमोक या ब्लैक होर्स?"

"नहीं...मेरा पेट शराब से भरा हुआ है और नहीं पीनी...।"

"अच्छा इसके अलावा और कुछ?"

"कुछ नहीं...सिर्फ मतलब की बात कर। मेहमाननवाजी का चक्कर छोड़। मुझे मालूम है तेरे दिल में मैल है। तूने मुझे बुलाया ही इस गरज से है

कि मीठा बोलकर फांस लिया जाए, उसके बाद साले को काटकर गोश्त चील-कौंओं को खिला डालने का।"

"ऐसा नहीं है।"

"अच्छा...! तो बता फिर कैसा है?"

"देखो मित्र, बात बनाने से बनती है। बिगाड़ने से बिगड़ती है। इस बनने-बिगड़ने के काम में जो बनने वाला मामला है वह मुश्किल वाला है। यानी कोई भी चीज बनती मुश्किल से है और बिगड़ती बहुत आसानी से है। इसलिए मेरी राय में बना लो...वही अच्छा है। बिगाड़ने का क्या है...कभी-भी बिगाड़ सकते हो।"

"मैंने कब इंकार किया है।"

"अच्छा देखो...मैं एक जन प्रतिनिधि हूं। नाम धरम सावन्त। ठिकाना तुम जानते ही हो। यानी मेरे बारें में तुम्हें कुल जानकारी है।"

राज खामोश रहा।

"तुम्हारे बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं।"

"झूठ...गलत!"

"यानी?"

"तू नेता है न...इसलिए झूठ बोलने को कोई जुरः म नहीं समझता बल्कि झूठ बोलना अपना हक मानता है...मौलिक अधिकार।"

"लेकिन मैंने तो कोई झूठ नहीं बोल।"

"तूने कहा...तुझे मेरे बारे में कोई जानकारी नहीं...राइट?"

"रहटा।"

"तो तूने ये झूठ कहा। तुझे मेरे बारे में तमाम जानकारी थी। जैसे कि मैं चैम्बूर में सिंधी कालोनी में रह रहा हूं। मेरा फ्लैट कौन सा है...मैं किस नम्बर की कौन-सी कार इस्तेमाल कर रहा हूं। आर. डी. एक्स. जैसे घातक विध्वंसक से मेरा काम तमाम कराने के लिए मेरी एस्टीम में उसे फिट करके रखा। जैसे किसी जानवर के शिकार के लिए हांका लगाया हो, वैसा ही हांका लगाकर मुझे कार की तरफ निकालने की कोशिश की गई...है न? इतनी सारी जानकारियों के बावजूद तू कहता है कि तू कतई झूठ नहीं बोल रहा है। बोल...बता...क्या ये सब झूठ नहीं है?"
 
"रात गई...बात गई। जो पीछे गुजर गया उसे भूल जाओ मित्र...।"

"ऐ...ये तू मित्र-मित्र का राग अलापना बंद कर न। ऐसा लग रहा है जैसे सांप फुफकार मारने की जगह बांसुरी बजाने का काम करने लग गया हो।"

"जो कुछ हुआ गलतफहमी में हुआ। हम मिल-बैठकर बात को सुलझा लेंगे...तुम अपने बारे में बताओ कुछ?"

"मेर बारे में जानकर तू क्या करेगा...सीधा-सीधा सतीश मेहरा को मेरे हवाले कर दे ताकि मैं इधर से फौरन निकल लूं।"

"सतीश मेहरा से तुम्हारा संबंध क्या है?"

"कोई संबंध नहीं।"

"ऐसो नहीं हो सकता। कोई न कोई रिश्ता तो तुम्हारा उससे जरूर है वरना तुम इतनी मारामारी न करते।"

"ऐई मंत्री...चल बहुत हो गया। सतीश मेहरा को इधर बुला...मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है। निकलना है मुझे यहां से।"

धरम सावन्त जोर से ठहाका मारकर हंसा।

"निकलना है तुझे...है न?" एकाएक ही उसके तेवर बदल गए। वह खूखार हो उठा-"धरम सावन्त के शिकंजे में फंसने के बाद तू समझता है कि यहां से जिन्दा निकल जाएगा राज शर्मा उर्फ लायन...तेरी नाप-तोल करने के बाद ही अब मैं तुझे बता रहा हूं कि आज के बाद किसी स्टेट की पुलिस को लायन की तलाश में भटकना नहीं पड़ेगा क्योंकि पुलिस का फर्ज मैं अंजाम दे दूंगा...और सुन...भागने की कोशिश मत करना। जिस दिशा में कदम उठाएगा...उसी दिशा में गोलियों की बौछार निकलेगी। तू समझता है मैं तुझे पहचान नहीं पाऊंगा...अरे, शक तो मुझे पहले ही हो गया था...तुझे यहां बुलाने से पहले मैं तेरी हिस्ट्री, ज्योग्राफी सब देख और समझकर आया

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राज मुस्कराया।

"हंस ले...और जितना जी चाहे हंस ले क्योंकि ये तेरी आखिरी हंसी होगी।"

"मेरे बारे में सब-कुछ जान चुका है तू?"

"सब...।"

"तुझे मालूम है मुम्बई अन्डरवर्ल्ड के बड़े-बड़े खलीफा मेरी मौत के तमन्नाई हैं?"

"हां।"

"मगर आज तक मैं उनकी तमन्ना के खिलाफ जिन्दा हूं...क्यों?"

"इसलिए कि उनके पास दिमाग की कमी थी। वे सही प्लान बनाकर काम नहीं कर सके। वरना तो तेरा सफाया कब का हो चुका होता। अब तू सही जगह फंसा है।"

राज हंसा।

"आखिरी हंसी है तेरी...जितना चाहे दिल खोलकर हंस ले क्योंकि उसके बाद तो तूने मरना ही है। इस कोठी के चप्पे-चप्पे में मेरे आदमी मौजूद हैं।"

"तो तू ये समझता है मंत्री कि मैं तेरे फूल पूल प्लान का शिकार हुआ हूं..क्यों?"

"इसमें क्या शक है।"

"इसमें शक है..मैं तुझे बताता हूं..ये देख।" राज ने एक छोटा बॉक्स उसके सामने खोल दिया। बाक्स क खुले हुए पल्ले पर छोटी-सी स्क्रीन थी और बक्स में नन्हे कम्प्यूटर के बटन।

धरम सावन्त ने चौंककर उसकी ओर देखा। उसने दो तीन बटन दबाए।

स्कीन पर एक नक्शा उभर आया। कोने में बाकायदा ऐड्रेस लिखा था। मेप ऑफ वन-वन नाइन, अन्टॉप हिल, मुम्बई। उस ऐड्रेस को पढ़ते ही धरम सावन्त की आंखें आश्चर्य से फैल गईं।

"पहचाना...?" राज ने मुस्कराते हुए पूछा।

"हं...हां।"

"कहां का नक्शा है?"

"इसी कोठी का...लेकिन ऐ लायन! खबरदार! कोई हरकत मत करना!"

___ "तेरे आदमियों की भीड़ चारों तरफ मौजूद हैं...मैं ऐसी-वैसी कोई हिम्मत कर सकता हूं भला।"

"ये चक्कर क्या है?"

"तेरी कोठी का नक्शा तुझे बता रहा हूं...इसमें चक्कर कहां से आ गया। हां...ये जो आठ लाल निशान हैं...इन्हीं का चक्कर है।"
 
"लाल निशान?"

"हां।"

"अलग-अलग जगह पर आठों निशान...तुझे बराबर दिखाई तो दे रहा है न?"

"हां।"

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"सुन...ये बटन है न...इसे दबा।"

"उससे क्या होगा?"

"दबा तो सही। आसमान नहीं गिर जाएगा। चल-चल दबा...वैसे इसका डुप्लीकेट इधर इस रिमोट में भी है।"

"डुप्लीकेट...?"

"हां...अगर तू नहीं दबा पाएगा तो मैं दबा दूंगा।"

"मैं कुछ समझा नहीं?"

"समझ जाएगा...बचपन में वीडियो गेम नहीं खेला क्या?"

"खेला।"

"बस...उसी का बटन है...दबा!"

उस समय मानो धरम सावन्त की बुद्धि कुंठित हो गई थी। मानो राज की आखों में किसी प्रकार का सम्मोहन था। सम्मोहित हो गया था वह। उसने बटन दबा दिया। बटन के दबते ही यूं लगा मानो भूकम्प आ गया हो। कानों के पर्दे हिला देने वाला विध्वंसक विस्फोट। कोठी की दीवारें कांप उठीं।

"ये...ये...क्या हुआ?" धरम सावन्त ने कम्पित स्वर मैं उससे पूछा।

_ 'कुछ नहीं...इसमें देख न...नक्शे में। जो कोठी का लॉन वाला हिस्सा हैं...यहां विस्फोट से बड़ा-सा खड्डा जैसा हो गया है। और क्या-क्या नुकसान हुआ, ये तो बाहर जाकर देखने सही पता चल सकेगा।"

विचलित अवस्था में धरम सावन्त ने अपने भाई की तरफ देखा।

अगले ही पल चारों तरफ से गनर आ गए।

जग्गू जगलर ने राज की खोपड़ी से रिवाल्यर लगा दिया।

"हिलने का नेई....क्या ! जाग्गू जगलर का निशाना चूकता नई...जास्ती लफड़ा करेंगा तो तेरे भेजे में उप्पर साइड में खिड़की खोल डालेंगा।" यग्गू जगल्म गुर्राता हुआ बोला।

___ "सबसे ज्यादा शक्तिशाली बम इस हॉल वाले क्षेत्र में ही लगा हुआ है।" राज ने बिना किसी प्रकार की घबराहट के कहा-"तू चाहे जितनी गोलियां चला लेना लेकिन मेरी उंगली जिस बटन पर रखी है वह तो दब ही जाएगा और बटन दब जाने का मतलब होगा तुम सबकी कब्र इस हॉल में बन जाना। तुममें से एक भी यहां से बचकर निकल नहीं सकेगा।"

सन्नाटा छा गया।

प्रत्येक सहमी-सहमी नजरों से राज की ओर देखने लगा।

"मंत्री...!"

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धरम सावन्त ने उसकी ओर देखा।

"क्या इरादा है?"

"बटन मत दबाना।"

"नहीं...मरने का शौक मैं अपने साथ-साथ तुम सबका भी पूरा किए देता हूं।"

"नहीं-नहीं...।"

"तो फिर बोल इस क त्ते को पीछे हटने को।"

"पीछे हट जग्गू...।"

जग्गू जगलर तुरन्त पीछे हट गया।

रंजीत सावन्त का बस नहीं चल रहा था वरना वह राज को कच्चा चबा जाता।

"मंत्री, तू समझता था कि तूने मुझे अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों में बहला-फुसलाकर यहां बुला लिया है...है न?"

धरम सावन्त कुछ न बोला।

"ऐसा नहीं था...मैं तो जान-बूझकर यहां आया था। तुझे ये बताने कि मैं तेरे ठिकाने पर आकर भी बचकर निकल सकता हूं और तू मेरा बाल भी बांका नहीं कर सकता।"

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"लायन...मैं तुझसे एक बात बोलूं?" धरम सावन्त ने डरते-डरते पूछा।

"बोल...क्या बोलना चाहता है?"

"अभी तक मुझे नहीं मालूम था कि अनजाने में मैं किससे टकरा गया हूं। पहले मालूम होता तो ऐसी नौबत ही न आती। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि बहुत देर हो चुकी हो। तू इस मामले से हट जा। मेरी तुझसे कोई जाती दुश्मनी नहीं है। इस बीच तेरा जो भी नुकसान हुआ हो...मैं उसका हर्जा-खर्चा देने को तैयार हूं।" \
 
__ "इंस्पेक्टर सतीश मेहरा मेरा हर्जा-खर्चा है। उससे माफी मांगने के साथ-साथ उस पर जो भी चार्ज लगाए हैं, उन सभी चार्जी को खत्म कर दे। हमारे बीच कम्प्रोमाइज हो जाएगा।"

"सतीश मेहरा तो अब मेरी पहुंच से दूर हो चुका है और तुझे सतीश मेहरा से क्या लेना-देना है। उसे भूल जा। वो कोई तेरा सगे वाला है क्या?" .

"एक बात बोल दी न...सतीश मेहरा चाहिए। बस।"

"इससे कम पर कोई कम्प्रोमाइज?"

"सवाल ही नहीं उठता।"

"तेरे जैसा आदमी नहीं देखा...तू किसी गैर की खातिर जान पर खेल रहा है।"

"ये अहद कर चुका हूं कि अपने सामने जो भी जुल्म हो रहा होगा उसे होने नहीं दूंगा। किसी भी कीमत पर जालिम के आगे झुकूगा नहीं।"

"कभी नुकसान उठा जाएगा।"

"उसकी कोई चिन्ता नहीं।"

"फिर हमारे बीच कम्प्रोमाइज होने वाला नहीं।"

"कम्प्रोमाइज का मैं ख्वाहिशमंद भी नहीं। तू ये बोल मंत्री कि सतीश मेहरा को छोड़ता है या नहीं?"

“कहा न...सतीश मेहरा मेरे पास नहीं।"

"तो कहां है वो?"

"मुझे नहीं मालूम।"

हंसा राज ।

"मैं सच कह रहा हूं।"

"तू कितना सच्चा है, मैं वाकिफ हूं तुझसे ।"

"सुन लायन!"

"बोल मंत्री?"

"इस चक्कर को छोड़कर कहीं निकल जा । दो-चार लाख रुपया ले जा...ऐश कर।"

"यानि रिश्वत?"

"नहीं। सतीश मेहरा प्रकरण से अलग होने की कीमत ।"

"किसी भी कीमत पर तू मुझे राजी नहीं कर सकेगा । चलता हूं...चलने से पहले वार्निंग है तेरे और तेरे चमचों के लिए...अगर मेरी पीठ पर गोली लगी तो तुम सब यहीं दफन हो जाओगे।" इतना कहने के साथ ही राज ने रिमोट संभाला और वहां से बाहर की ओर चल पड़ा। उसकी पीठ पर कुछ गने उठीं तो मगर धरम सावन्त के इशारे पर उन्हें झुक जाना पड़ा।

रंजीत सावन्त साइड वाले दरवाजे से बाहर निकला। उसके पीछे लपका जग्गू जगलर।।

तब राज पोर्टिको पार कर ड्राइव वे की ओर बढ़ रहा था । वहां हो चुके विस्फोट से कम्पाउंड का पूरा नक्शा ही बदल गया था।

जिस कार में वह वहां तक पहुंचा था उसके ऊपर ढेर सारा मलवा गिर गया था। अभी उसने कार की ओर कदम बढ़ाया ही था कि पीछे से गोलियों की बाढ़ छूटी।

ऐन उसी वक्त साइड मे छलांग लगाते हुए उसने रिमोट का बटन दबा दिया।

कोठी में एक के बाद एक विस्फोटों का तांता-सा लग गया।

वह तेजी से अपनी कार में पहुंचा और उसकी कार तोप से छूटे गोले की भांति निकल भागी।

पीछे होते विस्फोटों से कोठी मलबे का ढेर बनती जा रही थी।

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आग के शोले...आसमान को छूता धुएं का बवण्डर और मलवा। बारूद की तीखी गंध।

राज दी लायन का एक और दिल दहला देने वाला कारनामा।

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एन. एम. जोशी मार्ग पर एक रेस्टोरेंट में राज जोगलेकर से मिला। हालांकि इस बार उसने जोगलेकर को चैक नहीं किया था लेकिन उसे विश्वास था कि जोगलेकर तब तक किसी प्रकार की दगा नहीं करेगा जब तक कि देबू उसके कब्जे में था।

नामी शातिर मवाली था जोगलेकर, मगर इस वक्त राज के सामने किसी केंचुए की भाति सीधा और चोट न पहुंचा सकने वाला निरीह प्राणी मात्र था।

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"बैठ...क्या लेगा?" राज ने सामने वाली चेयर की ओर संकेत करते हुए कहा। वह खिड़की के करीब बैठा था और उसकी आख खिड़की से बाहर की तरफ बार-बार घूम जाती थी।

___ "कुछ नहीं लायन साहब...थै क्सा।" जोगलेकर सांकेतिक चेयर पर बैठता हुआ बोला।

वहां आ पहुचे वेटर को राज ने दो कोल्ड ड्रिंक्स को आर्डर दे दिया।

"मैं जनता हूं छोटे बड़े सावन्त बच गए। बड़े सावन्त को हल्की-फुल्की चोट आयी है।"

"हां लायन साहब और बड़े सावन्त को बचाने का काम मैंने ही किया था क्योंकि मैंने कुछ तो करना ही था। मेरी रोजी-रोटी चलाने वाला वही है। मुझे सभी बमों की जगहें मालूम थीं इसलिए वक्त रहते मैंने उसे पिछले भाग से तब निकाला जब पीछे लगे दोनों बम फट गए।"

"मुझे तुम्हारी साफगोई पर खुशी है। तुमने जो कुछ किया...ठीक किया। अच्छा किया।"

इसी बीच वेटर ने कोल्ड ड्रिंक सर्व कर दिए।

"ले!" राज ने उसे ड्रिंक लेने का संकेत किया। उसने ड्रिंक को अपने नजदीक खींच लिया। वह तनिक विचलित-सा नजर आ रहा था।

"देबू ठीक तो है न...?" उसने डरते-डरते पूछा।"

"एकदम ठीक।"

"मुझे एक बार मेरे बेटे से मिलवा नहीं सकते मिस्टर लायन...?"

"मिलवा सकता हूं।"

"प्लीज...।"

"एक शर्त है।"

"कैसी शर्त?"

"मैं तुझे देबू से मिलवा देता हूं तू मुझे इंस्पेक्टर सतीश मेहत से मिलवा दे।"

जोगलेकर के चेहरे पर निराशा के बादल छा गए। उसने गर्दन झुका ली।

"क्यों...मेरी शर्त कबूल नहीं...?"

"कबूल कर लेता, अगर मेरे अधिकार की बात होती।"

"तेरे अधिकार की बात नहीं है ये?"

"नहीं।"

"क्यों...।"

"क्योंकि मुझे सतीश मेहरा के बारे में कोई जानकारी नहीं है। वह मेरे अधिकार से बाहर के क्षेत्र में आता है। मैं उसके बारे में कुछ नहीं कर सकता। अगर कर सकता होता तो कब का आपके सामने हथियार डाल चुका होता। अपने बेटे से मैं बेइंतहा प्यार करता हूं। उसके लिए कुछ भी कर सकता हूं...कुछ भी।"

"जोगलेकर...हकीकतन मैं तुझे दुःख देना नहीं चाहता। मेरा दिल कह रहा है कि तुझे अभी का अभी तेरे बेटे से या तो मिलवा दूं या फिर तुझे तेरा बेटा वापस कर दूं। मगर क्या करूं मैं भी मजबूर हूं। मुझे चाहिए सतीश मेहरा और तुझे चाहिए तेरा बेटा। न तेरी चाहत पूरी हो पा रही है और न मेरी।"

"लायन साहब! मेरी चाहत तो आप अगर चाहें तो पूरी हो सकती है। यह काम आपके हाथ में है लेकिन जो आपका काम है उसे मैं पूरा नहीं कर सकता। वो मेरे हाथ में नहीं।"

"खैर, छोड़ न उस बात को जो नहीं हो सकता उसका रोना क्या...आगे के बारे में बात करते हैं।"

"क्या..।"

"यह कि लाल हवेली में सतीश मेहरा के मिलने की क्या गारंटी है।"

__ "उस बारे में कुछ नहीं मालूम...सिर्फ इतना मालूम कर सका हूं कि लाल हवेली कोई ख्तरनाक जगह है और उसका संचालक अन्दरवर्ल्ड किंग गुरुनानी है।"

"लाल हवेली है कहा...?"

"मलाड क्रीक से दस किलोमीटर अंदर समुद्र में...।"

.

"आई सी।" राज ने विचारपूर्ण स्वर में कहा। वह जानता था कि लाल हवेली का वही पता पाल भी उसे बता चुका है और जोगलेकर ने जो भी बताया है वो सही है। उसे थोड़ा-थोड़ा जोगलेकर पर विश्वास हो चला था।

"लाल हवेली नाम ठीक उसी तरह से है जैसे कि चर्चगेट नाम है लेकिन वहां कोई चर्च नहीं हैं...नाम ब्रान्द्रा लेकिन कोई भी बन्दर नहीं...।"

"यानी वहां कोई लाल हवेली नहीं है।"

"नहीं बिल्डिंग तो है लेकिन लाल हवेली जैसी नही...आप चाहें तो उसे लाल हवेली कह लें या फिर कोई भी नाम दे डालें। उसकी स्थिति ठीक चर्च गेट जैसी ही है। सुना ये है कि वो हवेली-ववेली जैसी कोई जगह नहीं है वो तो किलेनुमा जगह है। बेहद मजबूत...।"

"और भी कुछ सुना है...।"

"हां।"

"बता डाल...घबराने की जरूरत नहीं है।"

"सुना है बिगबॉस गुरुनानी इन दिनों हथियारों की तस्करी में लंगा हुआ है और इस नई लाइन पर काम करते हुए उसने बहुत धंधा कर डाला है। मोटी रकम पीटी है।"

"हथियारों की तस्करी...।"

.

.

"हां।"

"हथियारों की तस्करी तो एक खतरनाक धंधा है..देशद्रोह का जुर्म बनता है इस काम में।"

"तो क्या ह आ...मोटी रकम हाथ आनी चाहिए जुर्म किसी भी दर्जे का हो। मुम्बई का अण्डवर्ल्ड डॉन है। वह तमाम पुलिस फोर्स को हफ्ता पहुंचाता है। बड़ी-बड़ी ताकतें हैं उसके पीछे। उसका हाथ रोकने की हिम्मत किसी में नहीं है।"

"धरम सावन्त से उसका क्या संबंध है।"
 
"उसे धरम सावन्त से पॉलिटीकल सेफ्टी प्राप्त है...शायद धरम सावन्त को वह पेटियों की शक्ल में कुछ न कुछ देता भी रहता है।"

"यानी लेन-देन का मामला फिट है।"

"बिलकुल।"

"अगर लाल हवेली में सतीश मेहरा की तलाश की जाए तो वह वहां मिल सकता है।"

"इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता।"

"यानी रिस्क हो सकता है।"

"हां।"

"और कोई बात...।"

"एक खास बात है।"

"बोल डाल।"

"धरम सावन्त ने तमाम पुलिस फोर्स को अलर्ट कर दिया हैं कि राज शर्मा उर्फ लायन मुम्बई में मौजूद है।"

"इसका मतलब पुलिस लायन की तलाश में लग चुकी है...।"

"हां।"

"जो काम मैंने अंजाम दिया था, उसके तहत यूं भी पुलिस तहकीकात करने के बाद यही नतीजा निकालती कि इस तरह का विस्फोटक काम लायन ही अंजाम दे सकता है। वांटेड वाले बोर्ड में सबसे बड़ी फोटो मेरी ही लगी है। मेरी तलाश तो पहले से ही थी हां मंत्री धरम सावन्त की रिपोर्ट के बाद वह तलाश युद्ध स्तर पर शुरू कर दी गई होगी।"

"इसीलिए आपसे कहना है कि आप अब सावधान रहें। कभी भी आपकी मुठभेड़ पुलिस से हो सकती है...।"

"उस मुठभेड़ के लिए मैं हमेशा तैयार रहता

"क्या मैं एक बार फिर आपसे विनती कर सकता हूं...।"

"देबू से मिलने के लिए।"

"हां...।" "मुझे तुम्हारी तड़प का अहसास है मगर मैं मजबूर हूं।"

जोगलेकर पुन: उदास हो गया।

उसे लायन से बहुत उम्मीद थी कि वह उसकी बात मान लेगा-पुलिस की रिपोर्ट सुनने के बाद लेकिन अन्तत: निराश ही हाथ लगी उसे।

"देबू सुरक्षित है।"

"मानता हूं।"

"खुश है।"

"ये भी मानता हूं।"

"फिर क्या करना है उसका?"

"सिर्फ एक बार देखना चाहता था मिस्टर लायन। आप चाहें तो दूर से ही सही, एक झलक उसकी दिखा दें।"

"मुमकिन होता तो जरूर दिखा देता।"

"नामुमकिन जैसी कोई बात नजर भी तो नहीं आती।"

"आती है।"

"आपको आती होगी।"

"ठीक कह रहा है। मुझे आती है...।" कहते हुए राज की नजर खिड़की के बाहर की ओर स्थिर होकर रह गई-"तू निकला तो होशियारी से था न।"

"हां।"

"किसी ने तेरा पीछा तो नहीं किया था।"

"नहीं...क्यों।" एकाएक ही जोगलेकर के माथे पर बल पड़ गए।

"मुझे लगता है किसी को मेरी तलाश है।"

"किसको।"

"दो आदमी हैं। एक लम्बा सा और दूसरा गठा हुआ।"

"क्या वे बाहर मौजूद हैं।" जोगलेकर ने राज की नजरों का पीछा करते हुए पूछा।

"हां।"

"मैं देख सकता हूं।"

राज ने उसे अपने बराबर वाली चेयर पर आने का संकेत किया।

जोगलेकर उस चेयर पर आकर बैठ गया। फिर उसने खिड़की के बाहर नजर दौड़ाई। जैसा कि राज ने बयान किया था, ठीक वैसे ही दो आदमी बाहर सड़क पर लाल रंग की हुंडई के करीब मौजूद थे और रेस्टोरेंट की ओर देख रहे थे।

"इन दोनों की यहां मौजूदगी समझ में आ नहीं रही।"

"इनसे वाकिफ हो...।"

.



"हा...ये दोनों किराए पर हर तरह का जुर्म करने को तैयार रहते हैं।"

"यानी तुम्हारी ही बिरादरी के हैं?"

"हां।"

"पुलिसिए तो नहीं?"

"नहीं।"

"पक्का ...?"

"एकदम पक्का ।"

"हाव भाव से तो मुझे पुलिसिए ही लग रहे है?"

"नहीं लायन साहब, विश्वास करें मेरा। वो दोनों पुलिसिए नहीं हैं। मैं उन्हें अच्छी तरह पहचानता हूं। लगता है उन्हें किसी की तलाश है।"

"हां...ऐसा ही है।"

"यहां उन्हें किसकी तलाश हो सकती है?"

"मैं समझ गया।"

"क्यो?"

"उन्हें यहां हम दोनों में से किसी एक की तलाश हो सकती है।"

"हम दोनों में से किसी एक की?"
 
"हां...या फिर दोनों की ही।"

"तो फिर?"

"तू साइड वाले दरवाजे पर पहुंच।"

"और आप...?"

"मेरी फिक्र मत कर...उधर पहुंच। वो दोनों फ्रंट डोर की तरफ बढ़ रहे हैं...नाउ मूव!

जोगलेकर तेजी से उठता हुआ बोला-"यहां से निकलकर मुझे फोन करना।"

"ओ. के.! अब जाकर भी बता न!"

वह लम्बे डग भरता हुआ साइड वाले दरवाजे की तरक बढ़ गया।

राज ने फुर्ती से चेहरे पर दाढ़ी लगाई। नाक के नथुनों में स्प्रिंग फंसाए, सिर पर बालों की व्हिग। वह देखते-देखते बदल गया।

इधर फ्रंट डोर खुला, उधर उसने जोगलेकर को बाहर हो जाने का संकेत कर दिया।

जोगलेकर सावधानी के साथ बाहर निकल गया। दोनों मवाली खोजी निगाहों से रेस्टोरेंट की। भीड़ में अपनी तलाश करने लगे। उन्हें आशा थी कि उनका शिकार वहां मौजूद होगा लेकिन धीरे-धीरे उनकी निराशा बढ़ती चली गई।

राज ने देखा उन दोनों की नजरें उसके ऊपर से भी घूमकर निकल गईं।

वे चुपचाप अलग होकर रेस्टोरेंट के अलग-अलग भागों में बढ़ गए।

राज ने अपनी जगह फिलहाल छोड़ने की गलती नहीं की। वह जानता था कि उसके उठते ही दोनों गौर से उसी का निरीक्षण करने लग जाएंगे इसलिए वह चुपचाप बैठा रहा। उसने वेटर के आने पर दोनों कोल्ड ड्रिंक फुर्ती से हटवाकर आइसक्रीम का आर्डर दे दिया।

कोल्ड ड्रिंक जल्दी हटवा देने की वजह ये थी कि कहीं वहां घूमते मवाली इस बात का गौर न कर लें कि उस टेबल पर आदमी एक था और ड्रिंक शक वह किसी भी तरह पैदा नहीं होने देना चाहता था।

शीघ्र ही दोनों मवाली बाहर निकल गए।

राज ने खिड़की से उन्हें हुंडई में बैठते देखा। हुंडई स्टार्ट होकर वहां से चली गई।

वह अपनी सीट छोड़कर उठा। काउंटर पर उसने पैसे दिए और फिर वह पूरी सावधानी के साथ रेस्टोरेंट से बाहर निकल आया।

उसने टैक्सी की तलाश में आसपास नजर दौड़ाई। टैक्सी न मिलने पर वह पैदल ही आगे बढ़ चला। अभी उसने मुश्किल से तीस मीटर का । फासला तय किया होगा कि अचानक ही साइड में हुंडई निकलकर फुटपाथ पर चढ़ आयी...ऐन उसके सामने।

.

.

ब्रेक चीखे।

चारों पहियों पर फिसलती छोटे आकार की कार ने उसे धक्का मार ही दिया! हालांकशि उसने बचने की बहुत कोशिश की थी, मगर वह कार की रफ्तार से अपने-आपको बचा न सका।

नतीजतन कार की टक्कर लगते ही वह उछलकर फुटपाथ की साइड वाली बंद दुकान के शटर से जा टकराया।

खड़-खड़ का तीखा शोर उभरा।

अभी वह संभल भी नहीं पाया था कि फिसलती हुई कार के दोनों अगले दरवाजे खुले और दोनों मवाली कार से बाहर निकले। एक के हाथ में लम्बा शिकारी छुरा था और दूसरे के हाथ में स्टील रॉड। दोनों गजब की तेजी से गिरकर उठते राज पर टूट पड़े।

स्टील रॉड पूरी शक्ति के साथ घूमी। राज ने सही वक्त पर झुकाई देकर अपने-आपको उस खतरनाक वार से बचा न लिया होतो उसकी बहुत बुरी हालत होती। क्योंकि स्टील रॉड के वार ने शटर में एक बड़ा छेद कर दिया था।

वार करने वाले ने चूंकि उस वार के पीछे अपनी समूची शक्ति झोंक दी थी इस कारण जब वार खाली गया और रॉड राज के सिर से टकराने के स्थान पर खाली हवा में निकलता हुआ शटर से जाकर टकराया तो वो झटका खा गया।

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इस बीच राज अपने-आपको संभाल चुका था। उसने झटके के साथ हाथ घुमाया तो चमकदार-चाकू काम करता चला गया।

खून के छींटे उड़ गए।

स्टील रॉड वाले का पेट एक छोर से दूसरे छोर तक कट चुका था। उसकी अंतड़िया बाहर आ चुकी थीं।

फुटपाथ पर खून की नदी सी बह निकली थी। राज अपना काम करके फुर्ती से सीधा हुआ। अगर उसने संभलने में एक पल की भी देरी की होती तो जिसके हाथ में शिकारी चाकू था, उस पर टूट चुका होता। लेकिन! राज को संभलता देख चालू वाला ठिठक गया। यूं भी अपने साथी की हालत देख उसकी टांगें कंपकंपाने लगी थीं। हालांकि मुकाबला बराबर का था। चाकू उसके हाथ में भी था और चाकू ही सामने वाले के हाथ में, मगर उसके दिल में दहशत बैठ गई थी। आते-जाते लोग ठिठककर दूर ही ठिठक गए। किसी ने बीच में आने की कोशिश नहीं की।

राज चालू संभालता अपने प्रतिद्वंद्वी की ओर बढ़ा। प्रतिद्वंद्वी सावधान मुद्रा में एकदम तनकर खड़ा हो गया। उसने दो बार चाक को दाएं से बाएं और बाएं से दाहिने हाथ में किया।

दोनों समीप आ गए।

चाकू तेजी से घूमे।

राज एकदम निकट था। अंतिम समय में वह अपना हाथ रोककर घुटनों के बल गिरा। घुटनों तक की उसकी लम्बाई अनायास ही घट जाने की वजह से वह अचानक ही ऊपर से छोटा हो गया।

मवाली का वार खाली गया।

नीचे झुके राज ने चाकू दस्ते तक उसके पेट में उतार दिया। फिर तेज झटके के साथ वह मवाली का पेट चीरता चला गया।

उसकी हालत भी पहले मवाली जैसी हो गई। वह भी अपने ही खून में तड़पकर गिरा।

राज ने काम खत्म होते ही संकरी गली में दौड़ लगा दी। वह मौकाए-वारदात से शीघ्र अति शीघ्र दूर निकल जाना चाहता था।

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समुद्र की लहरों में तेज हलचल थी। आसमान में बादल छाए हुए थे और किसी भी घड़ी मूसलाधार वर्षा आरंभ हो सकती थी।

स्टीमर में जय के अलावा खबरी लाल...यानी पाल भी मौजूद था। स्टीमर मंथर गति से आगे बढ़ रहा था।

राज डेक पर खड़ा दूरबीन से उस दिशा में देख रहा था जिस दिशा में पाल ने लाल हवेली टापू के मिलने की संभावना व्यक्त की थी। तेज हवाएं बह रही थीं। सिर के बाल बेतरतीबी से बिखरे हुए थे।

"काम पूरा है न?" उसने जय से धीमे स्वर में पूछा।

"एकदम पूरा...।" जय रेलिंग के सहारे दूर समुद्र में उठती लहरों की ओर देखता हुआ बोला।

"मास्टर का आदमी आप था न?"

"बरोबर।"

"और माल?"

"माल पहुंचा को गया...बाप ये मास्टर है क्या चीज?"

"किसी खतरनाक संस्था का चीफ है। मैंने धोखे से उसकी जान बचा दी थी। बस...तब से वो मुझे बहुत मानता है।। उसकी संस्था दुनिया के आधे भाग में कार्यरत है। उसके दिए हुए फोन नम्बर पर मुझे हमेशा सही जवाब मिला और हमेशा पक्का काम हुआ।"

"उसका नाम क्या है?"

"मास्टर।"

"ये कोई नाम नई है।"

"मुझे यही नाम मालूम है।"

"बाप लाल हवेली कोई डेंजर जगो है क्या?"

"डेंजर ही होगी। मैं उस जगह से नावाकिफ

"अपुन आदमी साथ लाएला होता तो ठीक होता न?"

"नहीं...अभी कोई आदमी नहीं। स्टीमर का स्टाफ ही काफी है।"

"फिर भी..."

"तू और आदमियों की फिक्र छोड़, ये बता स्टीमर का स्टाफ भरोसे का है न?"

"एकदम भरोसे का...जिसका स्टीमरे है, अपुन का दोस्त होता वो।"
 
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