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हिन्दी नॉवल-काली दुनिया का भगबान - complete

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कई पल यूंही गुजर गये ।

" याद आया रीमा जी ।" एकएक क्लाइव की आंखें चमक उठी…"इस बारे में हमें एक आदमी बता सकता है ।"

"वो कौन है? मेरा लहजा उत्सुकता से भर उठा ।

" हिलकाक !"

' "ये हिलकाक कौन है?"

"वो सेना का एक कैप्टन है ।" 'ये' बात तुम दावे से कह रहे हो कि उसे मालूम होगा ?"

"वित्कूल दावे से कह रहा हूं।”

" 'फिर तो हमारी प्रॉब्लम सॉल्व हो गई, लेकिन ये हिलकाक साहब पाये कहां जाते हैं?"

"सुनने में आया है कि हिलकाक की हर शाम रोबिन स्टार नाईट क्लब में गुजरती है ।" वह एक जाहिल मिजाज फौजी है । औरत हिलकाक की सबसे बडी कमजोरी है, अगर किसी औरत पर उसका दिल आजाये तो वह उसे हासिल करके रहता हैं।"

मैं मन-हीं-मन मुस्कुराई ।

मेरा काम वन गया था । मैं आसानी से हिलकाक को अपने कब्जे में कर सकती थी । मेरे पास खूबसूरती का वो हथियार था, जिससे आज तक कोई नहीं वच सका, फिर वो पट्ठा.क्या बचता ?

"अब मुझे हिलकाक का मुंह खुलवाना होगा क्लाइव ।" एकाएक मेरा लहजा कठोर हो उठा ।

"मगर उस हरामजादे का मुंह खुलबाना आसान नहीं होगा मैडम । मैंने ये भी सुना है कि वह बड़ा ही खतरनाक और चालाक किस्म का इन्सान है ।"

"भले ही वह कितना भी चालाक और खतरनाक किस्म का इन्सान क्यों न हो । उसका मुंह खुलवाने की जिम्मेदारी मेरी रही । अब तक मैं ऐसे न जाने कितने लोगों के मुँह खुलवा चुकी हूं। मुझे ये बताओ कि तुमने कभी हिलकाक को देखा है?"

"नहीं ।" उसने जवाब दिया…"मैँने सिर्फ उसका नाम सुना है, लेकिन आप मुझसे ये क्यों पूछ रही हैं?"

"इसलिये पूछ रही हूं कि मैं उसे पहचानूगी कैसे? उसका हुलिया तो मुझे मालूम होना ही चाहिये ।"

"इस समस्या का समाधान तो आप ही को निकालना होगा ।"

"खेर । मैं ही क्रोई-न कोई समाधान निकालूंगी ।"

"अब आपका क्या प्रोग्राम है?" .

"मैं आज शाम ही क्लब में पहुंचकर हिलकाक से मिलकर डगलस के बारे में जानकारी हासिल करूंगी ।"

"आज आपको आराम करना चाहिये । मेरे ख्याल से आप कल शाम क्लब जाये तो बेहतर होगा ।"

"ऐसे कामों में देरी नहीं करनी चाहिये । इस वक्त डगलस की जिन्दगी का सवाल है, अगर मैंने देर की तो उसकी जिन्दगी खतरे में पड़ सकती है ।"

"ठीक है, लेकिन मैं आपको अकेली नहीं जाने दूंगा । मैं आपके साथ चलूँगा ।"

"अगर तुम मेरे साथ चलोगे तो सारा खेल बिगड जायेगा । तुम्हारा मेरे साथ चलना जरूरी नहीं है । वैसे तुम्हारी नॉलिज के लिये एक बात बता दूं कि मैं अपने मिशन में किसी दूसरे की दखलअंदाजी पसन्द नहीं करती । मैं अपने मिशन पर अकेली ही काम करती हूँ । मैंने बड़े-बड़े माफिया डॉन, अण्डरवर्ल्ड किंग, जुर्म की दुनिया के महन्त, खतरनाक कहे जाने वाले दादों को शिकस्त ही है । वो आर्मी आफिसर तो किस खेत की मूली है?"

"लेकिन आपको हद से ज्यादा सावधान रहना होगा । क्योंकि आप सेना के चंगुल से निकलकर भागी हैं । मुझे उम्मीद है कि सैनिक अभी भी अपको शिकारी कुतों की तरह तलाश करते घूम रहे होगे, अगर आप कहें तो मैं आपको शहर के हालातों की जानकारी हासिल

करके दे सकता हू।"

मुझे क्लाइव ठीक कहता लगा ।

कम-से-कम मुझे इस बारे में जानकारी तो होनी ही चाहिये कि सेना मेरे खिलाफ़ क्या कर रही हे?

" ठीक है । तुम शहर के हालातों के बारे में मालूम करवाओ ।"

"मेलेट !" क्लाइव करीब खड़े अपने दोनों आदमियों में से एक को सम्बोधित करके बोला ।

"यस सर ।" मैलेट सतर्क नजर आया ।

"शहर के हालात की मुकम्मल जानकारी लेकर आओं ।" क्लाइव ने आदेश दिया-" और मुझे शाम से पहले रिपोर्ट चाहिये ।"

" यस सर ।" कहने के साथ ही मैलेट दरवाजे की तरफ घूम गया ।

"एक बात बताओ क्लाइव ।" मैंने कहा ।

"कहिये ।"

"तुम्हारी इस जगह पर मैं सुरक्षित तो हूं।"

"आप यहां एकदम सुरक्षित रीमा जी । इसे जगह के बारे में चन्द लोगै के अलावा और किसी को मालूम नहीं है और जिनको मालूम है । वे सभी मेरे विश्वासपात्र-भी हैं । दुश्मनों को तो सपने में भी गुमान नहीं होगा कि ये जगह सर एडलॉफ के समर्थकों की है । मेरी निगाह में तो इससे सुरक्षित जगह दूसरी हो ही नहीं सकती ।"

"एक बात और ।"

"कहिये ?"

"बाई-द-वे अगर कोई खतरा आ जाये तो उससे निबटने के तुमने यहां कुछ इन्तजाम किये हुए हैं?"

"मैंने आने वाले किसी भी खतरे से निबटने के लिये मुकम्मल इंतजाम किए हुए है ।" वह बोला ---"आपको फिक्र करने की जरूरत नही !"

"फिक्र करनी पड़ती है मिस्टर क्लाइव । तुम लोगों ने मडलैण्ड की गद्दी पर आसीन उस कठपुतले राष्ट्रपति का तख्ता पलटने का बीडा उठाया है । एक तरह से बगावत का बिगुल बजा दिया है और ये जंग तुम्हारे चन्द आदमियों और रिवाल्चरों के बल पर तो नहीं जीती जा सकतीं ।"

"मैं आपकी बात कबूल करता हू रीमा जी । लेकिन मैं आपको बता चुका हू कि मैंने इस जंग को लड़ने का पूरा इन्तजाम किया हुआ ।"

"लेकिन मुझे तो यहां कोई इन्तजाम नजर नहीं आ रहां है ।"

"_मैं आपको दिखाता हू।" वह कुर्सी छोड़ता हुआ बोला ।

कहने के साथ ही उसने अपनी जेब से रिमोट निकालकर एक बटन दबा दिया ।

अगले क्षण ।

सामने वाली दीवार सरसराती हुई एक तरफ़ हट गई । वहां काफी बहा रिक्त स्थान नजर आने लगा था ।

"आप मेरे साथ आइये।" वह उस रित्त स्थान की तरफ बड़ता हुआ बोला--"आपको यहाँ के इन्तजाम दिखाता हू।"

मैं कुर्सी छोड़कर क्लाइव के पीछे चल पडी ।

हम स्थान के करीब पहुंचे । वहा हल्का उजाला फैला हुआ था और उस उजाले में सीढियां नजर आ रही थी, जो नीचे तक चली गई थीं ।

हम सीढियां उतरकर नीचे पहुंचे ।

नीचे कदम रखते ही मैं ठिठक-सी गई ।

वो एक लम्बा चौड़ा तहखाना था । उसमें आधे दर्जन के आसपास टूयूबलाईटें जगमगा रही थीं । उसकी दायी तरफ वाली दीवार में हवा जाने के लिये लोहे की जाली वाले रोशनदान लगे हुए थे । तहखाने की दायी दीवार के नीचे फर्श पर आधुनिक हथियारों का ढेर लगा हुआ था । एक जगह गत्ते को काटने का ढेर लगा हुआ था । उसे देखकर मैंने अनुमान लगा लिया कि उनमें हैण्ड ग्रेनेड इत्यादि हो सकते हैं । एक कोने में बच्चों के खिलौनों की तरह रिवाल्बरों का ढेर पड़ा था । इस वक्त तहखाने में तकरीबन तीन सौ के आसपास आदमी मौजूद थे, जो अजीब निगाहों से मुझे देख रहे थे ।

वे आदमी सर एडलॉफ के समर्थकों के अलावा और कोई नहीं हो सकते थे ।

" बाकई तुमने जंग लडने का मुकम्मल बन्दोबस्त किया हुआ है क्लाइव ।" मैंने कहा ।

"शहर में इसके अलावा हमारे ऐसै कई गुप्त टिकाने और भी हैं ।" बोला क्लाइव-""जहा इससे भी ज्यादा असलाह मौजूद है । हम लोगों ने जंग लड़ने की पूरी तैयारी की हुई है? बस हमें मुनासिब वक्त का इन्तजार है ।"

" वो मुनसिब वक्त जल्दी ही आयेगा ।"

"ये सभी लोग मेरे साथी हैं ।" क्लाइव ने वहा मौजूद उन आदमियों की तरफ संकेत क्रिया-"ये सभी जांबाज और हथियार चलाने मे निपुण हैं । ये सर एडलॉफ के लिये अपनी जान भी दे सकते है !"

"इस जंग में ऐसे ही आदर्मियों की जरूरत है ।"

"अब चलें?"

"चलो ।"

क्लाइव पलटकर सीढियों की तरफ बढ गया ।

हम सीढियां चढ़कर वापस उसी कमरे में पहुचे । …

क्लाइव ने उसी रिमोट कन्ट्रोलर का एक अन्य बटन दबाया ।

दूसरे क्षण दीवार सरसराती हुई अपनी जगह आ लगी । अब रिक्त स्थान बन्द हो चुका था । तभी मैलेट ने भीतर कदम रखा ।

"शहर के क्या हालात हैं मैलेट?" क्लाइव ने गोली की तरह सवाल दागा ।

"शहर के हालात तो खराब हैं ।" उसने बताया' । "इस वक्त पूरे शहर में सेना की जीपें दोड़ रही हैं । सैनिक सड़कों पर गश्त लगा रहे हैं । सैनिकों को इन्हीं मैडम की तलाश है । हर वाहन की तलाशी ली जा रही है । हर खूबसूरत युवती को रोककर उससे उसके बारे में जानकारी हासिल की जा रही है और सबसे बुरी खबर तो ये है कि सर एडलॉंफ के एक-एक समर्थक को चुन-चुन कर जेल में बंद . किया जा रहा है । "

"आपने सुना रीमा जी ।" क्लाइव सर्द सांस लेकर मुझसे मुखातिब हुआ !

" मैंने सुन लिया ।"

"इन हालातों में आपका खुले में घूमना खतरनाक हो सकता ।"

" मुझे डगलंस के बारे में जानकारी हासिल करने के लिये बाहर तो निकलना ही पडेगा ।"

"लेकिन बाहर कदम कदम पर खतरा आपका स्वागत करेगा ।"

"मैं खतरों से डरने वालीं नहीं हूं। मैं बचपन से लेकर आज तक खतरों से ही खेलती आई हूं । मेरा और खतरों का तो चोली-दामन का साथ है क्लाइव । मैं आज शाम हर-हालत में क्लब पहुंचकर हिलकाक से जानकारी हासिल करूगी ।"

"क्या आपको मुझसे किसी मदद की दरकार है?"

"हां ।"

"हुक्म कीजिये ।"

"मुझे मेकअप का सामान चाहिये ।"

"क्या-क्या सामान चाहिये आपको?"

मैंने क्लाइव को सामान बता दिया ।

"सामान कब चाहिये?"

"एक घन्टे तक मिल जाना चाहिये !"

"मिल जायेगा ।"क्लाइव ने अपनी जेब से कुछ नोट निकाले और मैलेट की तरफ बढाता हुजा बोला---" मैडम ने जो सामान वताया है, उसे लेकर आओ मैलेट ।"

मैलेट ने हाथ बढाकर नोट थाम लिये और पलटकर दरवाजे की तरफ लपका ।

"और कोई हुक्म?"

"मुझें मडलेण्ड की कुछ करेंसी भी चाहिये ।"

"आप जितनी करेंसी चाहेंगी, मिल जायेंगी ।"

"मुझे एक ऐसा पता बताओ, अगर कहीं सैनिक मुझसे मेरे निवास स्थान का पता पूछने लगे तो मैं उन्हें वही बता दू ।"

क्लाइव ने मुझे एक पता भी बता दिया ।

"और कुछ?"

"वस और कुछ नहीं । क्लब से वापस लौटने के बाद मैं अपने अगले कदम के बारे में बता सकूगी ।"

"ओ के० । वेस्ट आँफ लक ।"

=====

=====

 
टैक्सी सेवन स्टार नाईट क्लव की तरफ भागी जा रही थी । मै पैसेंजर सीट-पर बैठी हुई थी ।

मेरे चाहने वाले जानते हैं कि आदतन मैं वेजरी नहीं पहनती, लेकिन आज़ मैंने ब्रेजरी पहनी थी । स्वीटेपल नामक ब्रेजरी के स्ट्रेप साधारण ब्रा की तरह पीछे नहीं बांधे जाते, बल्कि गर्दन पर स्टिकिंग किये जाते थे और पीठ पूर्णतया निर्वस्त्र रह जाती थी । ब्रेजरी के कप इस तरह से बनाये गये थे कि यदि दूर से देखा जाये तो पता नहीं चलता था कि उरोजों पर कोई अनावरण भी है । ये लगता था कि वे निर्वस्त्र हैं ।

मैंने ऊपर लांग टूयूनिक पहनी हुई थी ।

टूयूनिक ने मेरे जिस्म में एक अपील ला दी थी ।

सेक्स अपील ।

मेरी गोरी-गोरी भरी बांहें उस काले टूयूनिक की कन्धो की पट्टी कै कारण और निखर आई थीं और उसके भराव में एक ऐसा आकर्षण था कि खुले गले की टूयूनिक से मेरे उन्नत, सुडौल तथा आकर्षक एवं वृत्ताकार उरोजों के उभार स्पष्ट नुमायां हो रहे थे और आधी मांसल जंघा तक ढकने वाली टूवूनिक का छोर मेरी कोमल त्वचा वाली जंघाओं की सुन्दरता में चार चांद लगा रहा था ।

मैंने अपने बॉबकट स्याह बालों को पीछे की तरफ करके स्याह स्कार्फ से बांधा हुआ था । मेरे पैरों में ऊंची एडी वाले सैण्डिल थे । मेरे कंधे पर वैनेटी बैग लटका हुआ था ।

इस पल मैं सिर से पांव तक कयामत नजर जा रही थी । चलती-फिरती कयामत ।

मेहरबान दोस्तों को बताने की जरूरत नहीं कि इस वक्त मैं मेकअप में थी, चेहरे से लापरवाह नजर जा रही थी, क्रिन्तु मन ही मन बेहद सतर्क थी ।

सड़क पर सेना की जीपे इधर-उधर दौढ़ रही थी । सैनिक कंधों पर रायफल लटकाये सड़क पर गश्त लगा रहे थे ।

सहसा ।

मैं चौकी ।

सामने सडक पर आधा दर्जन के आसपास आर्मी वाले खड़े नजर जा रहे थे । उनमें से एक सेना का आफिसर था और बाकी सैनिक थे । सड़क के एक किनारे पर एक दर्जन के आसपास वाहन लाइन लगाए खड़े थे और दो सैनिक उन वाहनों को चैक करते दिखाई दे रहे थे ।

टैक्सी वाहनों के करीब पहुंचती जा रही थी । कुछ पलों बाद जब टैक्सी उन वाहनों के करीब पहुची तो एक सैनिक हाथ उठाकर टैक्सी को पंक्ति के पीछे रुकने का संकेत किया ।

टेक्सी चालक ने टैक्सी वाहनों की पंक्ति के पीछे रोक दी । जिस बाहन की तलाशी हो चुकी होती थी, बह आगे बढ जाता था । कुछ पलों बाद मेरी टैक्सी का नम्बर आया । दोनों सैनिक टैक्सी की पिछली खिडकी के करीब पहुंचे । उनमें एक ने अपनी दोनों हथेलियाँ खिड़की पर टिकाईं, फिर उसने झुककर अपनी ब्लेड की धार जैसी पैनी निगाहें मेरे चेहरे पर टिका दी

"क्या नाम है तुम्हारा?" सैनिक ने पुछा ।

"डिलेला ।" मेरे गुलाब की पंखडियों जैसे होठ खुले ।

"कहां रहती हो?"

"हिलमैन स्कबायर !"

"पता बोलो ।"

मैंने उसे वहीं पता बता दिया, जो क्लाइव ने मुझे बताया था ।

सैनिक संतुष्ट नजर आने लगा ।

"क्या बात है ?" मैंने पूछा-"तुम इतनी पूछताछ किसलिये कर रहे हो?"

" "हम लोगों को एक लड़की की तलाश है । वह दुश्मन की जासूस है ।" सैनिक ने बताया-"कल रात यह एक बैरक में बंद थी, एक सैनिक को बेहोश करके उसकी वर्दी पहनकर भाग निकली, लेकिन जायेगी कहां? जल्दी ही हम लोग उसे तलाश का लेंगे ।"

सब कुछ साफ़ था । सैनिक मेरी ही तलाश में थे ।

इस समय मैं एक नये मेकअप में थी । मुझे उस मेकअप में पहचान लेना कठिन ही नहीं असम्भव भी था । उस सैनिक की निगाहें मेरे चेहरे से फिसलती हुई टूयूनिक के गले से झांकती मेरी गुलाबी छातियों पर स्थिर होकर रह गई । वह भाड़-सा मुह फाडे छातियों को देखता रह गया । उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि आज़ से पहले उसने ऐसी छातियां नहीं देखी थीं ।

"तुम्हें और कुछ पुछना है ।" एकाएक मैं बोल उठी ।

सैनिक का सम्मोहन टूटा । उसने हडबड़ाकर अपनी निगाहें मेरी छातियों से हटा लीं । मेरी हंसी छूटते छूटते बची ।

" चलो ड्राइवर ।" इससे पहले कि सैनिक कुछ कह पाता, मैं बौल उठी ।

चालक ने तुरन्त टैक्सी आगे बढा दी ।

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सैनिक पीछे खड्री कार की तरफ बढ गया ।

तभी ।

मेरे होंठ र्भिचते चले गये ।

सड़क के किनारे दो आर्मी के आफिसर खडे थे । उनमें से एक वह कमाण्डर भी था, जिसने मुझे आर्मी एरिया में बिजली के शॉक लगाये थे और फिर मुझे बैरक में बन्द करवा दिया था ।

जाहिर है कि मेरी तलाश जोर-शोर से शुरू हो रही थी । कमाण्डर ने मेरी तरफ देखा, मगर उस बेचारे के फरिश्तों तक को भी पता नहीं चल पाया था कि मैं टैक्सी में बैठी उसकी आंखों के सामने से निकल गई थी ।

अब मैं पहले से कहीं ज्यादा सावधान हो गई थी ।

=====

=====

मैं क्लब का सनग्लास वाला दरवाजा धकेलकर अन्दर दाखिल हुई तो उस समय वहां आरकेस्ट्रा पर मधुर धुन गुंज रही थी ।

डासिग फ्लोर पर अनगिनत जोड़े एक दूसरे से चिपके हुए डांस करने में व्यस्त थे । बीच-बीच में किसी की मादक हंसी हाल में गूंज उठती थी ।

हर कोई अपनी मस्ती में खोया हुआ था । कौन आया और कौन गया? इस तरफ किसी की भी तवज्जो नहीं थी । रंगीनियों अपने पूरे यौवन पर थीं । मैंने चारों तरफ निगाहे घुमाई और फिर लोगों पर बिजलियाँ गिराती हुई मस्त चाल से एक खाली मेज की तरफ बढ गई । मुझे देखकर कई मनचले युवकों के होठों से आह निकल गई थी । किन्तु मैंने किसी की तरफ भी देखना गंवारा नहीं क्रिया था । मैं सहीं-सलामत क्लब पहुच गई थी । रास्ते में मुझे किसी भी किस्म की दिक्कत पेश नहीं आई थी । मैं लापरवाही भरे अंदाज में चलती हुई उस खाली मेज पर जाकर बैठ गई ।

तभी: एक वेट्रेस वहाँ आ धमकी । वह गजब की खूबसूरत थी । वह सिर्फ पैन्टी और ब्रेजरी पहने थी । दोनों का रंग स्याह था ।

"यस मेडम ।" वेट्रेस बोली ।

" शैम्पेन !"

वेट्रेस आँर्डर लेकर चली गई ।

मैं अपने अगले कदम के बारे में सोचने लगी । अब मुझें हिलकाक के बारे मे पता करना था ।

वेट्रेस शैम्पन ले जाई ।

"सुनो !" वेट्रेस मुढ़कर जाने लगी तो मैं बोल उठी ।

"यस मैडम ।" वह मेरी तरफ घूमी ।

"क्या नाम है तुम्हारा ?"

" लिली !"

"तुम तो बहुत खूबसूरत हो लिली ।"

"आपसे ज्यादा खूबसूरत नहीं हू मैडम ।" वह मुस्कुराई ।

"ये लो ।" मैंने वैनेटी बैग-में से एक बड़ा नोट निकालकर लिली की तरफ बढाते हुए कहा ।

लिली की आँखे चमक उठी । उसने मेरे हाथ से नोट झपटकर अपनी ब्रेजरी में ठूंसते हुए अदब से कहा…"इस नोट के बदले में मुझे क्या करना होगा?"

"ये जरूरी तो नहीं कि नोट के बदले कोई काम ही करवाया जाये ।"

" कोई-न-कोई काम तो होगा मैडम, वरना भला कौन किसी को मुफ्त में इतने पैसे देगा?"

मुझे दो वेट्रेस खेली-खाई लगी थी ।

" कहिये, मुझे क्या करना है?" वह पुन: बोल उठी ।

" तुम हिलकाक को जानती हो?" इस बार मेरा स्वर धीमा था ।

"हिलकाक को इस क्लब में हर कोई जानता है ।" उसने बताया-"वह आर्मी का कैप्टन है? हर शाम इस क्लब में आता ।"

"अभी तक बो नहीं आया?"

"नहीं, लेकिन बात क्या है मैडम?"

" मुझे हिलकाक से मिलना है ।"

" तो मिल लेना मैडम । उससे मिलने के लिये आपको किसी से इजाजत लेने की जरूरत नहीं है ।"

"लेकिन मैं उसे नहीं जानती ।" मैंने वैनेटी बैग से एक और नोट निकालकर लिली की तरफ बढा दिया ।

"इस नोट की एवज में मुझे क्या करना होगा?"

"तुम मुझे इशारे से उसे दिखाओगी और उसे पता नहीं चलना चाहिये कि मैं तुमसे उसके बारे में पूछ रही थी ।"

"लिली इस क्लब में इसी तरह के काम करती है और किसी को कानों-कान खबर नहीं होने देती ।" वह नोट लेकर अपनी ब्रेज़री मे रखती बोली " आप फिक्र न करें । जैसै ही हिलकाक आयेगा, वैसे ही हैं; इशारा करके आपको बता दूगी ।"

"तुम वहुत समझदार हो लिली ।"

"और हुक्म ?" वह मुस्कुराई ।

"फिलहाल इतना ही काफी है ।"

"मैं आपको एक बात बता देना चाहती हूं मैडम ।" वह मेज पर झुककर बोली -"हिलकाक खूबसूरत औरतों का दीवाना है । आप तो आसमान से उतरी अप्सरा लगती हैं । उससे बचकर रहना ।"

मैं मुस्कुराकर रह गई ।

क्लाइव ने मुझे हिलकरक के बारे में जो कुछ बताया था, बो सहीं साबित हो रहा था ।

"हिलकाक कब आयेगा?"

"लो, वो आ गया । अब आप जाने और आपका काम ।" वह दरवाजे की तरफ देखती हुई बोली----"जो शख्स हाल में दाखिल हुआ है, वही हिलकाक है । अब मैं चलती हू ।"

कहने के साथ ही वेट्रेस चली गई ।

तब तक मेरी निगाहें दरवाजे को तरफ घूम चुकी थीं ।

हिलकाक एक छ फुट लम्बा गोरा-चिट्ठा आर्मी आफिसर था । उसकी उम्र तीस-पैंतीस साल के आसपास रही होगी । आँखों में ब्लैड की धार जैसा पैनापन था । वह क्रीम कलर का शानदार सूट पहने था । देखने मात्र से ही वह चीते जैसा फुर्तीला और सतर्क रहने वाला इन्सान लगता था ।।

हिलकाक ने चारों तरफ निगाहें घुमाई, फिर वह मेरी मेज की तरफ बढता चला गया ।

मैं मन-ही-मन मुस्कुराई ।

कदाचित् उस पर मेरे रूप का जादू चल गया था । कसूर उसका नही था । मैं खूबसूरती की बो चुम्बक हूं अगर एक बार मुझे कोई देख भर ले तो बरबस ही मेरी तरफ खिंचा चला आता है।

मैंने तुरन्त अपनी निगाहें उसकी तरफ़ से हटा लीं और गिलरसं उठाकर डासिंग फ्लोर पर नृत्य करते जोडों की तरफ देखने लगी ।

"एक्सक्यूज मी ।" कानों से टकराया।

मैं समझ गई कि वो हिलकाक ही था ।

"यस ।" मैंने गर्दन घुमाकर देखा ।

"' क्या मैं यहां बैठ सकता हूं?"

" श्योर ।" मैं अदा से मुस्कुराई।

मानो उस पर कडकंड़ाकर बिजली गिरी ।

वह मेरे सामने कुर्सी पर बैठ गया ।

"लगता है कि तुम अकेली हो ।" वह पट्ठा-फौरन शुरु हो गया--" मैं भी अकेला हूं।"

"फिर ?" मेरी सवालिया निगाहें उसके चेहरे पर जम गई ।

मैं उसके शब्दों का अभिप्राय अच्छी तरह समझ गई थी । फिर भी मैंने जानबूझ कर उससे पूछ ही लिया था ।

" क्या तुम मेरी दोस्त बनना पसन्द करोगी?" वह अपना हाथ मेरी तरफ वढाते हुआ बोला ।

"क्यों नहीं?" मैंने तपाक से कहा-"मैं अकेली हूं। तुम्हारे साथ मेरा वक्त गुजर जायेगा ।"

हिलकाक की आँखों में किसी चालाक शिकारी जैसी चमक कौंध कर गायब हो गई । मैंने उसके बढ़े हुए हाथ पर अपना हाथ रख दिया ।

"तो दोस्ती पक्की ।" यह मुस्कराया ।

"पक्की ।" में भी मुस्कुराई।

तभी! हिलकाक ने झुककर मेरा हाथ चूम लिया था ।

"अब दोस्ती की शुरुआत हुई है ।" मेरी मुस्कान गहरी हो उठी ।

"मैं तुम्हारा नाम जान सकता हूं।" उसने पूछा ।

"डिलेला ।" मैंने उसे यहीं नाम बताया, जो उस सैनिक को बताया था ।

"स्वीट नेम ।"

"ओर मैं तुंम्हें किस नाम से पुकारू?" .

"हिलकाक ।" उसने बताया, फिर एक पल ठहाकर बोला-"मैं हर शाम इसी क्लब में गुजारता हूं लेकिन तुम्हें पहली वार देख रहा हूं।"

"आज मैं पहली बार इस क्लब में आई हूं।" अब आपसे मुनाकात हो गई है तो आना-जाना लगा ही रहेगा ।"

… "मैं भी यहीँ चाहता हूं।"

"क्यों ?"

"तुम जैसी दोस्त से मुलाकात होती रहेगी । क्लब में वक्त अच्छा कटेगा ।" वह बोला-"मैंने जिन्दगी में न जाने कितनी युवतियां देखी हैं, लेकिन तुम जैसी खूबसूरत युवती आज तक नहीं देखी !"

"शुक्रिया !*

फिर मैँने देखा ।

 


हिलकाक की निगाहें मेरे खूबसूरत चेहरे से फिसलती हुई कहीं और ही भटक गई थीं । दरअसल आगे की तरफं झुकने की वजह से मेरे ताबीज काफी फैल गये थे और मेरी दूधिया चट्टानों की गहराई तक बिल्कुल साफ नजर आ रही थी । इस वक्त उसकी निगाहें वहीं जमी हुई थी। मानो मंत्रन्मुग्ध सा होकर रह गया था वह ।

"तुम कहां खो गये हिलकाक ?" मैंने धीरे से मुस्कुराकर पूछा ।

वह हढ़बड़ाकर रह गया ।

उसने तुरन्त अपनी निगाहें वहां से हटा ली थीं ।

फिर उसने पूछा-"तुम क्या लेना पसन्द करोगी?"

"कुछ नहीं ।" मैंने जवाब दिया- "क्योकि मैं आलरेडी शेम्पन ले ही रही हूं।"

"शैम्मेन भी कोई पीने कीं चीज है ।" वह गिलास मेरे हाथ से लेकर एक तरफ रखता हुआ बोला-"मैं स्काॅच मंगाता हूं।"

मैंने उसकी बात का जरा भी विरोध नहीं क्रिया ।

कहकर उसने वेट्रेस को संकेत किया । वेट्रेस लपकती हुई करीब पहुची ।

वह लिली ही थी ।

लिली मुझे देखकर मुस्कराई ।

मैंने उसकी तरफ होले से आंख दवा ही ।

"यस सर ।" यह हिलकाक से मुखातिब हुई ।

हिलकाक ने उसे दो डबल स्काॅच का आंर्डर थमा दिया ।

वह चली गई ।

कुछ देर बाद वह आँर्डर सर्व कर गई ।

हमने जाम उठाकर आपस में टकराये और फिर गिलास होठों से लगा लिये । मैंने एक लम्बा घूंट भरा । किन्तु हिलकाक तो यहा पियक्यड निकला । उसने एक ही सांस में गिलास खाली करके मेज पर रख दिया ।

"डिलेला ।" यह मेरी नग्न बांह सहलाता हुआ बोला-"तुम स्कॉच से भी ज्यादा नशीली हो ।“

"तुम मेरी कितनी बार तारीफ करोगे?"

"बार-बार करूँगा ।" वह बोला-"जब तक तुम मेरे सामने रहोगी, करता ही रहूंगा । तुम सिर से पांव तक कयामत हो । पता नहीं, ऊपर वाले ने तुम्हें फुर्सत में बनाया होगा?"

मैं खिलखिलाकर हंस पडी ।

हिलकाक पर मेरे रूप का जादू पूरी तरह हावी हो चुका था ।

"अपना पैग खाली करो ।" उसने कहा-"एक ही पैग से चिपकी बैठी रहोगी ।"

मैंने गिलास होठों से लगाकर खाली का दिया । फिर पीने का सिलसिला उस वक्त रूका, जब तीन तीन पैग हमारे हलक से नीचे उतर चुक थे ।

सहसा!

हिलकाक ने मेरे टूयूनिक के खुले गले में हाथ डालकर मेरे वक्षों को पेस क्रिया तो मेरे होठों से धीमी-सी सिसकारी निकल गई ।

मैंने उसकी आँखों में झांका ।

उनमें वासना के सुर्ख डोरे तेर रहे थे । सांसें भारी थीं । वह मुझमें समाने के लिये बेताब था । उसी क्षण सहसा हॉल की सारी तेज रोशनियों बुझ गई थीं और एक तरफ वने डायस पर पडा रेशम का परदा धीरे-धीरे सरकने लगा था ।

फिर ।

डायस पर रंगीन प्रकाश का वृत चमक उठा । और डायस पर एक लचीले जिम वाली नर्तकी नजर आई । लम्बे कद, गोरे रंग और तीखे नाक-नक्श बाती नर्तकी के मखमली जिस्म पर बेजरी और ब्रीफ थी । अर्धचन्द्राकार कप वाली नीली ब्रेजरी और पतली-सी ब्रीफ में उसका यौवन शोले की तरह धधक रहा था । उस ब्रेजरी में उसके यक्ष-स्थल का उभारयुत्त वृत्ताकार सौन्दर्य और भी खिल उठा था । उसके उदर के नीचे कमर के इर्द-गिर्द कसी नीले रंग की ही ब्रीफ ने उसकी सुडौल जंघाओं का आकर्षण और भी बढा दिया था । अब आरफेस्ट्रा के बीच में ड्रग्स के स्वर उभरने लगे थे । जिप्सी की लय पर उसके कदम थिरक उठे ।

देखते-हीं-देखते नर्तकी के कदमों की गति तेज होती चली गई । जिस्म उत्तेजक ढंग से झटके खाने लगा ।

बीचम्बीच में उसके होठों से उत्तेजक सिसकारियां भी फूट निकलती थीं । उसका नृत्य बड़ा ही उत्तेजक रुख अख्तियार करता जा रहा था ।

नृत्य अपनी चरम-सीमा की तरफ अग्रसर था ।

वातावरण में उत्तेजना बढती जा रही थी ।

एकाएक नर्त्तकी नीचे उतर जाई । उसके साथ रंग बदलता रोशनी का दायरा भी घूम गया ।

जिसकी रोशनी में मैंने अधंचन्द्राकार कपों को बक्ष-स्थल से फिसलकर समतल उदर तक जाते देखा ।

जब उसके वक्ष आवरणहीन थे ।

उस हॉल में मौजूद हर शख्स अपनी पलकें झपकाना तक भूल गया था ।

उसके बक्ष में गजब का आकर्षण था । उदर तथा जंघाजों की सुडोंलता ने उसे अपीलिग बना दिया था ।

हाल में घूमते हुए वह मेरे सामने आई, तब उस पर फोकस की गहरी सुर्ख रोशनी डाली जा रहीँ थी । जिसमें मैंने उसके चेहरे पर मस्ती नशा देखा । उसकी घनेरी पलकें झुकी हुई थीं और गुलाब की पंखुडियों जैसे अधरों पर दिलकश मुस्कान फैली हुई थी ।

मैंने अपने कधें पर हिलकाक की उगलियों का दबाव महसूस किय.. .साथ ही मेरे घुटने पर उसने घुटने का स्पर्श क्रिया ।

किन्तु मैंने उसकी हरक्त का जरा भी नोटिस नहीं लिया ।

मेरी नजरें नर्तकी पर थीं ।

मैं उसकी खूबसूरती की कायल होकर रह गई थी ।

नर्तकी आगे बढ़ गई ।

नं जाने कब हिलकाक ने मेरी टूयूनिक उपर तक सरका दी और मेरे बाये कधें पर से उसकी सट्रेप भी बांह पर फिसल आई ।

मैं चौकी!

मैंने हिलकाक की तरफ देखा, उसकी आंखें नशे और वासना की अधिकता से यूं सूर्ख नजर आ रहीं थी, मानो जिसूम का सारा खून उनमें आकर सिमट गया हो ।

उधर नर्तकी डायस पर पहुच चुकी थी और उसका उत्तेजक नृत्य अपनी चरम-सीमा पर था ।

इधर हिलकाक ने अपना चेहरा आगे बढ़ाकर मेरे होठों पर चुम्बन जड़ दिया । चुम्बन विस्फोटक था ।

मेरा रोम-योम उन्माद से भरें उठा था । अब मैं यहां के माहौल में रंग चुकी थी और अपना मकसद भूल गई थी । मेरी पलकें बोझिल हो उठी थीं । सहसा उसने मेरी कान की ली को अपने दांतों के बीच दबा लिया । उसी क्षण मैं चिहुंक उठी । न जाने कब हिलकाक का हाथ मेरी जांघों पर घुसपैठ कर गया था ।

"ऐ ।" मैं अपना चेहरा पीछे खिचती हुई बनावटी गुस्से में बोल उठी…"ये क्या कर रहे हो?" पलक झपकते ही उसने अपना हाथ पीछे खींच लिया ।

"शरारती ।" मैं उसके गाल पर हल्की-सी चपत लगाती हुई बोली । "

"डिलेला ।"

"हू ।"

वह मेज पर अपनी दोनों कुहनियां टिकाकर मेरी तरफ झुकता हुआ फुसफुसाया--"आओ चलें ।"

"अब कहाँ चलोगे?"

"करीब ही मेरा आवास है । वहाँ चलते हैं ।"

"क्यों ?"

"यहां वहुत ज्यादा शोर-शराबा है । यहीं इत्मीनान से बैठकर बाते करेगे । इस बहाने तुम मेरा गरीबखाना भी देख लोगी ताकि भविष्य में जब तुम्हारा मन आया करे, वहीं चली आया करना । "

मैं समझ गई थी कि यह मुझे अपने आवास पर क्यों ले जाना चाहता है । मैं भी यही चाहती थी कि एकान्त में उससे अपने मतलब की बात उगलवा सकू । किन्तु मैंने एकदम से हा नहीं की थी । उसे मुझ पर शक हो सकता था ।

हिलकाक मुझे अपने जाल में फसा रहा था, ताकि अपनी हवस पूरी देर सके, लेकिन वो क्या जानता था कि मेंने उसे अपने रूप-जाल में फसाया था । काश उसे मालूम होता कि वह अपने साथ एक नागिन को ले जा रहा है, जो उसे हर-हालत में उसे डसने बाली थी ।

" चलो जानेमन !" मुझे खामोश देखकर वह पुन: बोल उठा ।

"रहने दो ।"

"क्यों?"

" तुम्हें जो बाते करनी हैं । यहीं क्यों नहीं कर लेते?"

"चलो न ।" वह मेरी कलाई थामकर अनुरोध भरे स्वर में बोला--"देखो न, यहां कितना शोर हे?"

"कहीं मुझें ज्यादा देर तो नहीं कर दोगे?"

" नहीं ।" उसने उत्तर दिया' "जब कहोगी मैं तुम्हें अपनी कार में तुम्हारे घर पर छोड़ जाऊंगा ।"

"ठीक है ।" मैं कुर्सी छोड़ती हुई बोली---"चलो ।"

वह भी खुशी से झूमता हुआ उठ खड़ा हुआ । जाहिर है, उसे तो ऐसा लग रहा होगा मानो बैठे बिठाए उसकी लॉटरी खुल गई हो ।

हिलकाक मुझे लेकर क्लब के पार्किग में पहुचा । यहां उसकी कार खडी थी, वह मुझे कार में बिठाकर अपने आवास की तरफ रवाना हौं गया

=====

=====

 
सफर लम्बा नहीं था ।

तकरीबन बीस मिनट बाद मैं हिलकाक के आवास पर थी ।

रास्ते में मुझे किसी तरह की दिक्कत पेश नहीं आई थी । सडकों पर सैनिकों की गश्त जारी थी । किसी भी सैनिक ने कार नहीं रोकी थी । जाहिर है कि वो लोग हिलकाक की कार को पहचानते होगे । आखिर वो आर्मी का एक आफिसर था ।

"ये मेरा आवास है ।" यह बोला ।

"सुन्दर है ।" मैंने चारों तरफ निगाहें घुमाकर कहा ।

आवास छोटा था, मगर वहां सारे आधुनिक विलासिता के साधन उपलब्ध थे । कीमती सोफा, फ्रिज, रंगीन टेलीविजन, स्टीरियो टेप इत्यादि सभी सामान था ।

वो ड्राइंग रूम था ।

उसके चारों कोनों में आदमकद आइने लगे हुए थे । फर्श पर सुर्ख रंग का कालीन बिछा हुआ था । दीवारों पर खूबसूरत पेंटिंग्स लगी थी ।

मैं धम्म से सोफे पर बैठ गई । वेनेटी बैग सामने मेज पर रखा और एक पैर दूसरे पैर पर रख लिया ।

मैंने देखा ।

हिलकाक ने फ्रिज से व्हिस्की की बोतल निकाली और उसे अनसील्ड करता हुआ बोला--" पानी या सोडा ।"

"मेरा पीने का मूड नहीं है ।"

"तुम पहली बार मेरे घर आई हो । भला ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं तुम्हे ऐसे ही यहां से चली जाने दूंगा? मुझे खातिरदारी का मौका तो मिलना ही चाहिये ।" यह शिकायत पूर्ण लहजे में बोला ।

"फिर तो पीनी ही पडेगी । मैं अपने इस नये दोस्त को नाराज नहीं करूंगी ।"

हिलकाक ने दो पैग तैयार किये और मुझे एक गिलास थमाकर स्टीरियो का स्विच आँन कर दिया, फिर मेरी बगल में सोफे पर जा बैठा । तदुपरान्त उसने अपनी बांह मेरे सुडौल कंधे पर रख दी ।

हाल रुम मैं सगीत की मधुर पन गूंज उठी । संगीत के प्रभाव में मैंने उसके कधें से अपना सिर टिका दिया, फिर मेने जाम खाली करके मेज पर रख दिया । वह भी अपना जाम खत्म कर चुका था ।

अब उसका हाथ मेरी जंघा पर फिसल रहा था । एक तो नशा । उस पर मन लुभाने वाला संगीत और फिर प्यार के रोमांस भरे पल । सबने सोने पर सुहागे जैसा काम क्रिया था । संगीत ने तो माहोल में नशा-सा गोल दिया था ।

"आओ जानेमन ।" हिलकाक बोल उठा---" तुम्हे अपना बेडरूम दिखाता हू।"

"चलो ।" मैं उठती हुई बोली ।

वह भी उठ खड़ा हुआ ।

मैं उसके साथ चल पडी ।

मुझे हिलकाक के आवास पर किसी अन्य इन्सान के दर्शन नहीं हुए थे । इस बारे में मैंने उससे पूछने की जरूरत नहीं समझी थी । यहां किसी का न होना मेरे हक में अच्छा ही था, मैं आसानी से अपने शिकार पर काबू कर सकती थी ।

वह मुझे लेकर बेडरूम में पहुचा ।

वेडरूम सजा-संगी था ।

"बैठो ।" वह बेड की तरफ संकेत करता हुआ बोला ।

मैं वेड पर बैठ गई । मैं जानती थी कि वह मुझे बेडरूम में क्यों लाया था?

"बेडरूम कैसा लगा ।"

"खूबसूरत है, मगर क्या तुम सिर्फ इसलिये मुझे ड्राइंग रूम से यहाँ लाये हो?"

उसके होठों पर अर्थपूर्ण मुस्कान नाच उठी ।

"आराम से बैठ जाओं ।" वह बोला--! तुम्हें देखकर तो ऐसा लग रहा है जैसे अभी उठकर भागने का इरादा रखती हो ।"

मैं खिलखिलाकर हंस पडी । मेंने सैण्डिले उतारी और पांव ऊपर करके वेड पर पालथी मारकर बैठ गई । वह तो जेसे इसी इन्तजार में था । उसने अपने बूट उतारे और बेड पर चढकर मेरी बगल में आ बैठा ।

अब संगीत की आबाज आनी बन्द हो गई थी । जाहिर है कि कैसेट खत्म हो गई थी ।

हिलकाक मेरा टूयूनिक उतारने का प्रयास किया ।

"अरे. .अरे!" मैंने हड़वड़ाने का अभिनय किया---' ये क्या करते हो ?"

"दोस्ती की शुरुआत तो प्यार सै ही होती है न जानेमन !"

वह ट्यूनिक उतारता हुआ मुस्कराया ।

" शरारती कही के।"

कुछ पलों बाद मेरे जिस्म पर सूत का एक तार भी नहीं बचा था है मेरे सारे कपड़े लावारिसों की तरह वेड पर एक तरफ पडे थे ।

मेरे मेहरबान दोस्त जानते हैं कि मेरे मखमली जिस्म में एक आकर्षित कर देने बालीगंज सुडौलता है । बक्ष-स्थल में अपार सौन्दर्य है । मेरे अंग-अंग से यौवन फूटता है । मेरे जिस्म से उठ रहीं जूही के फूलों जैसी खुशबू हिचकाक को मदहोश कस्ने लगी । उसकी निगाहे मेरे जिस्म पर एक जगह टिक ही नहीं पा रही थीं ।

अब मुझे उसे शीशे में उतारना था ।

""त. . .तुम तो वाकई में कयामत हो ।" बह मेरे वक्षों को सहलाता हुआ कांपते स्वर में बोला ।

मैंने अपने अधर उसके होठों की तरफ बढा दिये । उसके होठों ने मेरे अधरों का एक कोर से दूसरे कोर तक स्पर्श क्रिया ।

मेरे जिस्म में सनसनाहट दौड़ गई ।

हिलकाक ने अपना चेहरा पीछे खींच लिया, फिर वह मेरे गुलाबी वक्षों को देखने लगा । एक पल बाद उसकी नजरें उससे नीचे, वहुत नीचे फिसलती चली गई थीं ।

यह पट्ठा तो जैसे पलकें झपकाना तक भूल गया था ।

जव मेरा कयामत बरपा देने वाला जिस्म अपनी जन्मजात अवस्था में किसी बलिष्ठ मर्दं के सामने हो तो वह अपने जिस्म पर कपडों का वजन कैसे सहन कर सकता है?

यही उसके साथ भी हुआ ।

वह जल्दी-जल्दी अपने जिस्म के कपडों का बोझ हल्का करने लगा । शीघ्र ही वह मेरी तरह एकदम बेलिवास था ।

मैंने दोनों हाथ उठाकर मादक अंगडाई ली ।

उसपर तो मानो कड़कड़ाकर विजली गिरी थी ।

और फिर !

वह पागल-सा हो गया था ।

हिलकाक अपना चेहरा झुकाकर मेरे गुलाबी जिस्म को चूमता चला गया ।

उभार और घाटियां कुछ भी तो उसके होठों से अछूती नहीं वची थीं ।

आनन्द की अधिकता से मेरी पलकें मुंदने लगी थीं । कुछ पलों तक यहीं स्थिति रही फिर उसके होठ सरके और पेट पर पहुंच गये । अगले क्षण उसने अपने दोनों हाथ मेरी खमदार कमर पर रखकर पीछे की तरफ झुकने पर मजबूर का दिया था, फिर उसके होठ फिसलते ढलान पर आकर ठहर गये थे ।

 
मेरा समूचा वजूद गुदगुदाहट ते भर उठा था । मेरी सहन-शक्ति जवाब देती जा रहीं थी ।

"'अ. . . अब और मत तढ़पाओ जानेमन ।" हिलकाक के सब्र का प्याला छलक गया ।

मैं भी कुछ पाने के लिये बेताब हो उठी । एक क्षण गंवाये बगैर मैं पीठ के वल वेड पर लेट गई ।

मेरी तरफ से उसे हरी झण्डी मिल चुकी थी ।

हिलकाक मेरे मखमली जिस्म पर झुकता चला गया । अगले क्षण मेरे होठों से पीड़ा भरी कराह निकल गई ।

वो पीड़ा क्षणिक ही थी ।

मैंने उसे अपनी तरफ से सुविधा और सहयोग प्रदान क्रिया ।

फिर ।

खेल चल निकला ।

वो खेल, जिसे सिर्फ दो खिलाडी ही खेलते हैं और उनका मकसद एक ऐसी मंजिल तक पहुंचना होता है, जहाँ स्वर्ग का सा आनन्द प्राप्त होता है ।

खेल चलता रहा ।

हमारे जिस्म पसीने से भीग चुके थे । वह मेरे कानों के समीप फुसफुसाते हुए न जाने क्या-क्या कहे जा रहा था । किन्तु मुझे तो कुछ भी सुनने का होश नहीं था ।

हमारी गति तूफानी थी ।

बेडरूम का तापमान इतना बढ गया था कि वहां की एक-एक वस्तु पिघलती हुई-सी महसूस हो रहीँ थी ।

अचानक ।

खेल खत्म ।

अगले कई पलों तक मुझे अपने आप पर कावू नहीं रहा था । मैं स्वयं को स्वर्ग की सैर करती-सी महसूस करने लगी थी ।

उधर उसने भी मुझें जोरों से अपनी बाहों में भर लिया था और कांपकर शांत हो गया था ।

मैंने अपनी लम्बी टांग उसकी कमर के इर्द-गिर्द लपेट दी थीं ।

".अ . . अब तो दोस्ती पक्सी हो गई ।" मैंने उखड्री उखडी सांसों के बीच पूछा ।

". . . हां ।"

"अब मुझे एक बात बताओ दोस्त ।"

"पूछो ।" वह अपनी उखडी हुई सासो पर काबू करता बोला ।

"डगलस को किस जेल में रखा गया है ।" मैंने धमाका क्रिया ।

उसके जिस्म को जोरों का झटका लगा । मानो उसके सिर पर कोई शक्तिशाली ब्रम फोड दिया गया हो । वह अपने चेहरे पर समूचे संसार का आश्चर्य समेटे मुझे देखता रह गया ।

"क. . .कौन हो तुम?" एकाएक उसके होठों से निकला । मेरे सवाल ने हिलकाक की सारी मस्ती हवा कर दी थी ।।

"तुम्हारी एक दोस्त है" मैंने गहरी मुस्कान के साथ कहा ।

"बको मत ।" वह गुर्राया--'भुझे ये बताओ कि तुम हो कौन ?"

जवाब में मेरे चेहरे पऱ जहरीले भाव कुण्डली मारते चले गये ।

"जवाब दो ।" उसका लहजा पूर्ववत् था ।

"भारत में एक महत्वपूर्ण जासूसी संस्था हुआ करती है आई०एस०सी०, मैं उसकी नम्बर वन एजेन्ट हू।"

हिलकाक का चेहरा फक्क पढ़ गया ।

"क कहीं तुम रीमा भारती तो नहीं हो "उसके होठों से आश्चर्य भरा स्वर निकला ।

"यानि तुम मुझे जानते हो । मेरा नाम सुन चुके हो तुम?"

"हा, लेकिन तुमने मुझसे अपने बारे में झूठ क्यों बोला?"

"अगर मैं झूठ न बोलती तो तुम्हारे बेडरूम तक कैसे पहुंचती?" मैंने कहा-"यहां तक पहुंचने के लिये ही तो मुझे इतना नाटक करना पडा था, लेकिन तुम बेवकूफ़ किस्म के इन्सान निकले । मुझे हासिल करने के चक्कर में तुमने ये भी नहीं सोचा कि एक लड़की इतनी आसानी से तुम्हें अपना जिस्म सौंपने के लिये कैसे तैयार हो गई?"

उसके चेहरे के भाव तेजी से बदले । कदाचित् अब उसे अपनी भूल का अहसास हुआ था, लेकिन अब क्या फायदा था? तीर तो कमान से निकल चुका था ।

"तो तुम्हीं आर्मी की बैरक से फरार हुई थी !! हिलकाक ने सवाल किया ।

"तुमने ठीक कहा ।"

" ल. . . लेकिन तुम मुझसे डगलस के बारे में क्यों पूछ रही हो । उससे तुम्हारा क्या रिश्ता है?"

" डगन्नस मेरा हमपेशा है । वह आई०एस०स्री० का एजेन्ट है । उससे मेरा यहीँ रिश्ता हे ।" मैने कहा--- " और मैं उसी की तलाश में यहां हू। मुझे उसे उस अज्ञात जेल से छूडाना है, जहाँ उसे नजरवद करके रखा गया है ।"

मैंने एक और धमाका क्रिया ।

यदि हिलकाक की कमर से मेरी टांगें न जकड्री होती तो निश्चित रूप से वह उछल पड़ा होता । उसकी आँखे हैरत से कगारों तक फटती चली गई ।

"मुझें बताओ कि डगलस किस जेल में बन्द है?" मेने पुन: अपना सवाल क्रिया ।

"तुम क्या समझती हो कि मैं तुम्हें डगलस का पता वता दूगा?"

"अगर तुमने मुझसे दोस्ती की है तो बताना ही पडेगा दोस्त ।" एकाएक मेरा लहजा कठोर हो उठा ।

"तुम्हारी जबरदस्ती है क्या ?"

"जबरस्ती ही समझो ।"

वह खामोश रहा ।

मैंने उसके चेहरे का अध्ययन किया । मुझे लगा कि वह आसानी से मुंह खोलने वाला नहीं था ।

मैंने उसकी कमर पर अपनी टागों का शिकंजा कसना शुरू कर दिया ।

उसने मेरी टांगों की गिरफ्त से निकलने का प्रयास किया । किन्तु वह कामयाब नहीं हो सका । वो क्या जानता था कि मेरी टागे नही , लोहे के शिकंजे हैं । जिनकी गिरफ्त से निकलना इतना आसान नही ।

मैंने शिकंजा और कस दिया ।

उसका चेहरा पीडा से सुर्ख पड़ता चला गया । नि:सन्देह इस वक्त उसे अपनी हड्डियां टूटती हुई महसूस हो रही होगी ।

"छ. . .छोडो मुझे ।" जब उसका प्रयास विफल हो गया तो वह बिलबिला उठा ।

 
"जब तक तुम मेरे सवाल का जवाब नहीं दे दोगे, तव तक खातिरजमा रखो कि मेरे चगुल से नहीं निकल सकते हो ।" मैंने इत्मीनान से कहा---"मेरा नाम रीमा भारती है, जिसके पंजे में फंसा शिकार छटपटा तो सकता है, मगर अपना दम घुटने से पहले निकल नहीं सकता । अगर तुम जिन्दा रहना चाहते हो तो एक अच्छे दोस्त की तरह मेरे सवाल का जवाब दे दो, वरना तुम मेरी टांगों के शिकजे में कसते चले जाओगे और फिर इस दुनिया से रुख्सत होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी कैप्टन ।"

"त. . तुम जानती हो कि मैं कैप्टन हू ।" उसके होठो से हैरत भरा स्वर निकला ।

"अगर मैं तुम्हारे बारे में न जानती होती तो क्या मैं तुम्हारे सामने छत की तरफ मुँह करके पीठ के बल लेटकर झक मार रही थी? कम से कम मैं मजे लेने के लिये तो तुम्हारे साथ नहीं आई ।"

"तुम्हें मेरे बारे में किसने बताया?"

"ये जरूरी नहीं कि तुम्हारे हर सवाल का जवाब दिया जाये । बैसे भी तुम इस हालत में नहीं हो कि मुझसे कोई सबाल पुछ सको, अगर तुमने जल्दी नहीं बका तो मुझे तुम्हारी जान लेने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा ।"

"मेरी चिंता छोडो । तुम अपनी जिन्दगी के वारे में सोचो ।" उसने गिरगिट की तरह रंग बदला---"तुम यहाँ से जिन्दा बचकर वापस नहीं जाओगी ।"

"कौन मारेगा मुझें?"

"मैं मारूंगा ।"

"तुम मारोगे मुझे, जबकि खुद तुम्हारी जान तो मेरी मुट्ठी में है ।" मैं फुफकार उठी---" अब शुरु हो जाओ, वरना इस बात का लिहाज नहीं करूंगी कि अभी अभी तुमने मुझे स्वर्ग की सेर कराई है ।"

जवाब में उसने दोनों हाथों से मेरी सुराहीँदार गर्दन दबोच ली ।

मैं हढ़बड़ाकर रह गई ।

मुझे उम्मीद नहीं थी कि इस स्थिति में भी वह ऐसी हरकत कर सकेगा, मगर उसने कर दी थी । आखिर वो भी एक ट्रेन्ड फौजी था । मिलेट्री का कैप्टन था ।

हिलकाक की उगलियों मेरी गर्दन में धसने जाने लगी थीं । मेरा दम घुटने लगा । चेहरा सुर्ख पड़ता चला गया, आँखे कटोरिंयों से उबलने को तैयार हो गई । मैने अपनी फ़टी-फटी आंखों से देखा, उसका चेहरा अंगारा वना हुआ था । आँखों से मानो आग बरस रहीँ थी । जबडे कसे हुए थे । वह साक्षात् खून का प्यासा दरिन्दा नजर आ रहा था ।

मैं उनकी पीठ पर टांगों का शिकंजा कसती चली गई । ऐसा करने में मैंने अपनी पूरी ताकत खर्च कर दी थी । हमारे बीच खूनी सघर्ष चल रहा था । हर गुजरने वाला क्षण भयानक रुप अख्यियार करता जा रहा था । हम एक-दूसरे की जान लेने पर तुले हुए थे ।

शायद मैंने हिलकाक को कुछ कम करके आंक लिया था । मगर वो वडा ही जीवट वाला इन्सान निकला था वह एक मर्द था । जाहिर है जिस्मानी ताकत के मामले मैं मुझसे कुछ ज्यादा ही रहा होगा ।

उसके हाथों का दबाव मेरी गर्दन पर बढता जा रहा था । इस प्रयास में उसका चेहरा मेरे चेहरे के काफी करीब आ गया था ।

सहसा।।

मैं हरकत कर गई ।

मैंने अपनी नाखून-युक्त उगलियां सलाख की तरह उसकी आँखों में धुसेड़ दीं ।

वह पीड़ा से बिलबिला उठा ।

उसके हाथ मेरी गर्दन से हट गये ।

. . उसी क्षण ।

मैने अपना हाथ घुमा दिया ।

भडाक ।

मेरा जबरदस्त घूसा उसकी कनपटी पर पडा। वह हलाल होते बकरे की तरह चीख उठा ।

मैंने अपनी टांगों का शिकंजा और कस दिया । इसके बाद उसने अपने आपको सम्भाला और मेरे चेहरे पर ताबड़-तोड़ घेसे बरसाने लगा । परिणामस्वरूप उसकी पीठ पर मेरी टांगों का शिकंजा ढीला पड़ गया था और वह विजली को भी मात देने वाली गति से मेरी टागों के बीच से निकलकर स्प्रिग लगे खिलौने की तरह उछलकर खड़ा हो गया ।

हम कट्टर प्रतिद्धन्द्धियों की तरह एक-दूसरे के सामने थे । वह बाज की तरह मेरे ऊपर झपटा ।

परन्तु मैं तैयार थी । इससे पहले कि वह मुझे छू भी पाता, मैं हरकत कर गई थी । मेरा घुटना पूरे वेग के साथ उसकी जांघों के जोड पर पडा

और वह बुरी तरह से बिलविलाता हुआ दोनों हाथों से अपनी जांघों का जोड़ दबाये पीछे हटता चला गया था ।

"हरामजादी ! कूतिया ।" वह कठिनाई से किसी तरह कहने में कामयाब हुआ-" तूने क्या क्रिया?"

"वहीँ, जो तुम्हारे साथ क्रिया जाना चाहिये ।"

"याद रख, तूने एक आर्मी आफिसर पर हाथ उठाया है ।" वह दांत पीसता हुआ बोला---" ये तेरा इण्डिया नहीं है । यहां अपनी हरकत का भयानक परिणाम भुगतना होगा । "

उधर हिलकाक ने अपना वाक्य पूरा किया

इधर मै स्प्रिग लगे खिलौने की तरह उछली और मैंने दोनों पलाइग क्रिक उसके सीने पर जड दी ।

वह फुटबाल की तरह उछलकर पीछे दीवार से टकराया, फिर फर्श पर गिरा । उसके होठों से घुटी घुटी सी चीख निकल गई । गिरी मैं भी थी, लेक्रिन वेड पर और गिरते ही मैं उछलकर

खडी हो गई और फिर हाथ के हाथ हिलकाक पर जम्प लगा गई थी ।

हिलकाक बड़ा फुर्तीला निकला । पलक झपकते ही वह एक तरफ करवट बदल गया । फलस्वरूप मैं मुंह के वल फर्श पर गिरी । मैंने दोनों हथेलियाँ फर्श से टिका ली थी, अगर मैं ऐसा न करती तो मेरा चेहरा तीव्रता के साथ फर्श से टकराना था ।

गिरते ही मैं उठ खडी हुई । साथ ही मैंने अपनी लात उसके गुप्लांग पर जड़ दी । वह बिलबिला उठा । उसके चेहरे पर पीड़ा की असंख्य रेखायें खिंचती चली गई थीं ।

' 'दोस्ती करना आसान है हिलकाक ।" मैं मुस्कराई-"लेकिन दोस्ती निभाना मुश्किल है ।"

पलक झपकते ही वह उठा और तीर की तरह मुझसे टकराया । हम दोनों फर्श पर गिरे और गुत्थमगुत्था हो गये । कभी वह नीचे तो मैं ऊपर । कभी वह ऊपर तो मैं नीचे । जिसका भी दाव लगता वहीँ दूसरे के चेहरे पर घूसें बरसाने लगता था ।

मगर मुझे ये कबूल करने में जरा भी हिचकिचाहट नहीं कि इस वक्त हिलकाक मुझ पर लगातार हावी होता जा रहा था ।

मुझे उम्मीद थी कि मैं उसे आसानी से कावू में कर लूंगी, लेकिन उसने मुझे अहसास करां दिया था । शक्ति और फुर्ती के मामलेमें वह मुझसे उन्नीस-बीस ही है । "

मैंने अपना मौका ताड़ा और उसकी कनपटी की एक विशेष नस दूसरी नस पर चढा दी । अगले क्षण वह फर्श पर पड़ा मछली की तरह छटपटा रहा था । उसके होठों से मर्मातक चीखे उबल रही थीं । वास्तव में ये मेरा अपने जापानी ट्रेनर द्वारा सीखा एक चिर-परिचित विशिष्ट दाव था । किसी को टॉर्चर करने का अनोखा तरीका । जिसे मैंने जब भी किसी पर आजमाया था, ये दाव खाली नहीं गया था ।

""य. . .ये तुमने क्या किया?" वह बिलबिलाता हुआ चीखा-"मुझें बचाओ, वरना मैं दर्द से मर जाऊंगा ।"

मैं उठकर खडी हो चुकी थी और दिलचस्प निगाहों से उसे तड़पता हुआ देख रही थी ।

"अ. . .भगबान के लिये मुझ पर रहम खाओ।" वह पुन: बिलबिलाता हुआ चीखा-"मेरी जान निकली जा रही है । मुझे इस नारकीय वेदना से छूटकारा दिलाओ ।"

"तुम्हें इस वेदना से एक ही शर्त पर छुटकारा मिल सकता हिलकाक ।" मैंने कहा-"अगर तुम मुझे डगलस का पता बता दो।"

"मा . .मै डगलस का पता नहीं जानता ।"

"बक्रो मत ।" मैं गुर्रा उठी---"मूर्ख समझते हो मुझे जो तुम्हारे इतना कह देने से मैं तुम्हारी बात पर विश्वास कर लूंगी । अगर तुम जिन्दा रहना चाहते हो तो तुम्हें सच उगलना ही होगा ।"

"मेरी बात का यकीन करो । मैंने तुम्हें सच ही बताया है ।"

"फिर तो तुम इसी तरह दर्द से तढ़प-तड़पकर मर जाओगे ।" मैं बोली---" और तुम्हें कोई नहीं बचा पायेगा? अपनी मौत तय समझो कैप्टन !"

"मै अपने गाॅड की कसम खाकर कहता हूं मिस रीमा ।" उसने आर्तनाद-सा क्रिया--"मुझे वाकई नहीं मालूम कि डगलस को कौन सी जैल मे रखा गया है?"

मैंने गौर से उसका चेहरा देखा । वह मुझे सच बोलता लगा था । वैसे भी मैंने उसके साथ जो हरकत की थी, उसकी वजह से तो बड़े से बड़े जिगर वाला इन्सग्न भी अपना मुंह खोलने पर मजबूर हो जाता है, क्योंकि ये पीडा इन्सान के लिये असहनीय होती है ।

"तो तुम नहीं जानते हिलकाक ।" मैंने उसके चेहरे पर निगाहे टिकाते हुए पूछा ।

"न. . . नहीं ।"

"फिर मुझे डगलस के बारे में कौन बता सकता है?" मैंने सवाल किया ।

"त. . .तुम्हें उसका पता विल्सन से मालूम हो सकता है ।"

"कौन विल्सन !"

"वो आर्मी का मेजर है ।"

"वो मुझे कहाँ मिलेगा?"

हिलकाक ने बडी शराफत से एक पता बता दिया ।

"किसी और का नाम बताओ, जो मुझे इस बारे में जानकारी दे सकता हो ।"

" मैं नहीं जानता ।"

"आर्मी को मेरी असलियत के बारे में मालूम है !"

" नही ।" उसने शराफत के साथ उत्तर दिया ---" वो अवश्य समझ चुकी है कि कोई जासूस हो ।"

तदपुरान्त मैंने हिलकाक से अपने मतलब की जो भी बात पूछी, वह मुझें बताता चला गया ।

अब सवाल इस बात का था कि मैं हिलकाक का क्या करू?

 


मुझे उसकी जुबान हमेशा के लिये बन्द कर देने के अलावा और कोई रास्ता नजर नहीं आया था । क्योंकि वह मेरी असलियत जान चुका था और मेरे लिये खतरनाक साबित हो सकता था । न जाने मुझे अपने मिशन में कितना वक्त लगना था । अब तो कदम कदम पर मेरा पाला सैनियों और सेना के ऑफिसरों से ही पड़ना था ।

"अ. . . अब तो मुझें इस वेदना से छुटकारा दिला दो ।" वह विलाप करता हुआ वोला-"मैं तुम्हारे सभी सवालों का जवाब दे चुका हूं।"

"उठो ।" मैं बोली ।

वह पीड़ा से निजात पाने के लिये उछलकर खड़ा हो गया ।

हिलकाक मेरे लिये बेकार था ।

बिजली की गति से मेरा हाथ हरकत में आया और मैंने अपनी खडी हथेली का वार उसकी गले पर कर दिया ।

अचूक वार ।

कडाक्

हिलकाक की गर्दन को हड्डी टूट गई ।

मेरा एक ही वार उसकी जान लेने के लिये पर्याप्त रहा था । वह होठों से ही-धुटी घुटी चीख उगलता हुआ मुंह के बल कालीन पर गिरा और स्थिर हो गया ।

मैंने झुककर उसे हिला-डुलाकर देखा ।

वह मौत की लम्बी नींद सो चुका था ।

मैंने जल्दी जल्दी कपड़े पहने और हिलकाक की लाश को उसी अवस्था में छोडकर दरवाजे की तरफ बढ़ गई ।

अब मेरा शिकार विल्सन था ।

किन्तु अभी मैं बेडरूम का दरवाजा भी पार नहीं कर पाई थी कि एकाएक बाहर से भारी बूटों का स्वर मेरे कानों से टकराया।

मैं चौकी ।

खतरा ।

ये शब्द किसी धन की तरह मेरे जेहन से टकराया था ।

मेरे पैरों में ब्रेक लग गये ।

बूटो की आवाज करीब आती जा रही थी ।

बेडरूम मैं कोई खिडकी इत्यादि भी नहीं थी, जिससे बाहर निकला जा सकता ।

पलक झपकते ही मैं खुले दरवाजे के एक पल्ले के पीछे दीदार से पीठ सटाकर खडी हो गई और दम साधे आने वालों का'इन्तजार करने लगी ।

आगन्तुक तीन सैनिक थे । तीनों के कन्धों पर रायफलें लटकी हुई थीं । अभी-अभी तीनों किसी एक्सप्रेस ट्रेन की तरह धढ़घड़ाते हुए भीतर दाखिल हुए थे । "

तीनों की पीठ मेरी तरफ थीं ।

"हे भगवान !! मैं मन ही मन कह उठी…"ये सैनिक भी कैसे लोग हैं? जो हर जगह मेरे इर्द-गिर्द किसी भूत की तरह प्रकट हो जाते हैं ।"

'"अ. . . अरे !" जो सबसे आगे था । उसके होठों से हैरत भरा स्वर निकला.."कैप्टन साहब तो नंगे फर्श पर पड़े हुए हैं । इन्हें क्या हुआ ?"

उन दोनों की निगाहें भी हिलकाक पर पड़ चुकी थी ।

"एक लडकी कैप्टन साहब के साथ उनकी कार मे आई थी ।" एक पल बाद दूसरा सैनिक बोल उठा ----" कैप्टन को देखो । मुझे तो कोई गडबड लगती है ।"

पहले वाले ने झपटकर हिलकाक का मुआयना किया ।

इधर मैं दम साधे दवे कदमों पल्ले के पीछे से निकलकर दरबाजे की तरफ बढी ।

"क. . .कैंप्टन साहब. . . ।"

"क्या हुआ कैप्टन साहब को?"

"ही इज नो मोर ।"

" व. . . व्हाॅट ।।"

"मैं सच कह रहा हूं।"

मैं कनखियों से उन्हें देखती हुई आगे बढ रही थी।

"का ..कैप्टन साहब को किसने मारा ।"

तभी पहले वाला दरवाजे की तरफ घूम गया ।

"हाल्ट ।" उसके होठों से गुर्राहट निकली ।

मैं फ्रिज होकर रह गई ।

"अगर एक कदम भी आगे बढाया तो भूनंकर

रख दी जाओगी ।"

पलक झपकते ही शेष दोनों सैनिक भी एडियों पर मेरी तरफ़ घूम गये थे । उनकी आखे हैरत से यूं फट पडी थी, मानो अभी उबलकर ' बाहर आ गिरेगी । तीनों सैनिकों के चेहरे देखते ही मैं भी झटका खाये बगैर नहीं रह सकी थी । उनमें से एक आर्थर था ।

"य .ये तो वही लडकी है ।" दूसरा सैनिक बोला "जो कैप्टन साहब के साथ कार में आई थी ।"

" हां ।" पहले ने कहा---"ये यहां से निकलकर भागने की फिराक में थी । अगर मेरी निगाहें इस पर न पड़ती तो ये भाग चुकी होती । मुझे तो लगता है कि इसी ने हिलकाक साहब की हत्या की है ।"

मेरा दिल जोरों से धडक उठा ।

"'काई गलत हरकत करने की कोशिश मत करना, बर्ना बेमौत मारी जाओगी । दूसरा चेतावनी भरे स्वर में बोला…"बाहर भी हमारे साथी मौजूद हैं ।"

मैं खामोश रही ।

वे सैनिक जरूरत से ज्यादा सतर्क नजर आ रहे थे । मुझे तो उम्मीद ही नहीं थी कि वे वहाँ विन बुलाये मेहमान की तरह आ टपकेंगे । बहरहाल में फस चुकी थी ।

"कौन हो तुम ?" सहसा दूसरा गुर्रा उठा ।

प्रत्युत्तर में ऐसा चेहरा बना लिया जैसे जवाब देते हुए मेरा हार्टफेल हुआ जा रहा हो ।

"तुम वही लड़की हो न?" आर्थर फर्श रौंदता हुआ-सा मेरे करीब पहुचा ।

"क.. .कौन-सी लडकी?" मैंने भोलेपन से पूछा ।

"वहीँ, जो पिछली रात आर्मी बैरक से भागी थी ।" हालांकि चेहरा और हुलिया पूरी तरह बदला हुआ था परन्तु फिर भी पता नहीं उस पट्ठे को मेरे ऊपर कैसे शक होगया था?

" तुम्हें जरूर कोई गलतफहमी हो गई है ।" मैंने उत्तर दिया---" आज तक आर्मी एरिया देखा तक नहीं है । तुम वहां की बैरक से भागने की बात कर रहे हो?"

आर्थर ने गोर से मेरा चेहरा देखा, किन्तु उसे मेरे चेहरे पर ऐसा कुछ नजर नहीं आया होगा, जिससे वह मुझ पर रत्ती भर भी शक कर सके ।

"फिर कौन हो तुम ?" आर्थर ने पूछा ।

इस बीच दोनों सैनिकों की रायफलें न सिर्फ कन्धों से उतरकर उनके हाथों में आ गई थीं, बल्कि मेरे उपर तन भी चुकी थी ।

"मेरा नाम डिलेला है ।" मैंने जवाब दिया ।

"कौन डिलेला?"

"बको मत ।"

"मैं बक नहीं रही, हकीकत बयान कर रही हू।"

" अगर तुम कैप्टन साहब की प्रेमिका हो तो तुमने इनकी हत्या क्यों की है?"

"ह. . .हत्या!" मैंने हड़बड़ाने का जबरदस्त अभिनय क्रिया-" भला मैं अपने आशिक की हत्या क्यों करूंगी? दरअसल हुआ ये कि प्यार करने के बाद अचानक तुम्हारे कैप्टन साहब का सिर चकराया और धड़ाम से फर्श पर गिर पडे । मैं घबरा उठी थी । मैं समझ नहीं पाई कि एकाएक हिलकाक को क्या हो गया है । जरा सोचो, अगर में इनकी हत्या करती तो लाश पर हत्या करने का कोई चिन्ह तो दिलाई देता?"

"फिर तुम छिपकर भाग क्यों रही थी?" दूसरे सैनिक ने सवाल दागा ।

"पागल हौ तुम ! मैं भला क्यों भागूंगी?" मैंने कहा--"हिलकाक को गिरते देखकर कुछ देर के लिये मेरा दिमाग अवश्य कुन्द होकर रह गया था । मैं तो डॉक्टर को बुलाने का इरादा लेकर दरवाजे की तरफ झपटी थी । अचानक मुझे बूटों की आबाज सुनाई दीं थी । मैं समझी पता नहीं कौन हे? इस समय देश के हालात वैसे ही खराब हैं । अत्त: मैं घबराकर दरवाजे के पल्ले के पीछे छिप गई थी ।"

" तुम कहानी अच्छी गढ लेती हो ।" आर्थर बोला । .

" सच्चाई बयान कर रही हूं और तुम इसे कहानी बता रहे हो । भला मुझे कहानी गढने की क्या जरूरत है?"

"ताकि हम तुम्हारे उपर शक न कर सकें । ऐसी कहानी गढने में माहिर हो । ऐसी ही कहानी तुमने कमाण्डर को गढ़का सुनाई थी । मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि तुम वहीँ लड़की हो ।"

मेरे जेहन को हजार वाट का जबरदस्त झटका लगा ।

"इसे हैड़बवार्टर ले चलो ।" आर्थर अपने साथियों को सम्बोधित करके आदेश पूर्व लहजे में बोला---" इससे सच उगलवाया जायेगा ।"

मैं एक बार फिर फंस चुकी थी ।

 


"चलो ।" दोनो सैनिकों रायफल की नाल के बल पर मुझे दरवाजे की तरफ धकेला ।

"मेरे पास उनका आदेश मानने के अलावा दूसरा कोई चारा न था ।

वे मुझें हिलकाक के आवास से बाहर ले आये ।

वहां पहले ही एक जीप खडी थी । उसकी ड्राइविंग सीट पर एक सैनिक मोजूद था ।

"जीप में बैठो ।" आर्थर ने हुक्म दनदनाया ।

मै जीप के पिछले हिस्से में सवार हो गई।

मेरे पीछे-पीछे तीनों सैनिक भी जीप में बैठ गये थे ।

" चलो मैलेट ।" आर्थर ने ड्राइविग सीट पर मौजूद सैनिक को आदेश दिया ।

जीप चल पडी ।

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अचानक जीप के ब्रेक चीख उठे । ब्रेक इतनी ताकत से लगाये गये थे कि मैं उछलकर सामने वाली सीट पर बैठे आर्थर से टकराते-टकराते बची थी ।

जीप सडक पर जाम होकर रह गई थी ।

सैनिक हड़वड़ाकर रह गये ।

" क्या बात है मैलेट?" आर्थर ने ड्राइविंग सीट की तरफ गर्दन मोड़कर पूछा…"जीप क्यों रोक दी?"

"सडक के बीचों-बीच एक आदमी औंधे मुंह पड़ा हुआ है ।" उसने उत्तर दिया-"एक्सीडेन्ट हुआ लगता है ।"

"ओह ।"

"अब क्या क्रिया जाये?"

"हम लोग देखते हैं ।" आर्थर ने कहा और उन् सैनिकों में से एक को सम्बोधित करके बोला----"आओ मेरे साथ ।"

कहने के साथ ही आर्थर और सैनिक जीप से नीचे कूद गये और मेरी नजरों के सामने से गायब हो गये ।

अब जीप के पिछले हिस्से में एक सैनिक रह गया था ।

जिस जगह जीप खडी थी । वह शहर का बाहरी इलाका था । चारों तरफ सन्नाटा फैला हुआ था। हवा की सांय-सांय वातावरण में अजीब-सा डरावनापन उत्पन्न कर रहीँ थी ।

एकाएक मेरा मस्तिष्क तेजी से कार्य करने लगा था ।

इस वक्त मेरे पास शानदार मौका था । मैं थोड्री सी कोशिश करके उन सैनिकों के चंगुल से निकल भाग सकती थी ।

बहरहाल रिस्क तो था ही ।

और मैं रिस्क लेने का फैसलों कर चुकी थी । वस हिम्मत और हौंसले की जरूरत थी । मेरे मेहरबान दोस्त जानते ही हैं कि आपके सपनों की रानी में हिम्मत और हौंसले की कोई कमी नहीं है ।

मैंने अपनी बगल में बैठे सैनिक की तरफ कनखियों से देखा, वह मुझे जरूरत से ज्यादा सतर्क लगा ।

सड़क के दायी तरफ घने पेडों का झुरमुट था । अगर मैं सही-सलामत वहीं तक पहुंच जाती तो बाजी मेरे हाथ में होनी थी । मुझे आर्थर और उसके साथी के वापिस लोटने से पहले ही इस जीप से किनारा कर लेना था ।

किन्तु इससे पहले कि मैं कोई हरकत कर पाती ।

सहसा!

'धड़ामू . .!'

जीप के करीब एक जबरदस्त विस्फोट हुआ ।

पलक झपकते ही जीप के चारों तरफ़ धुएं का पहाड-सा खडा होता चला गया । उस धुएं में कुछ भी देख पाना कठिन था । यहां तक कि मैं अपनी बगल में बैठे सैनिक का चेहरा भी नहीं देख पा रही थी ।

इससे सुनहरी मौका भला और क्या हो सकता था ।

एक क्षण भी व्यर्थ किये बगैर में जीप से नीचे कूदी ओर पेडों की झुरमुट को तरफ सरपट दौड़ पडी ।

"अरे! वो लडकी जीप से कूद कर भाग रही है आर्थर ।" वातावरण में किसी के चीखने का स्वर गूँज उठा । जाहिर है कि चीखने वाला वही सैनिक था, जो मेरी बगल में बैठा हुआ था ।

"वो बचकर नहीं जानी चाहिये ।" स्वर आर्थर का था--"उसका पीछा करों ।"

'तढ़. . .तढ़...रेट. . ,रेट.. . ।'

वातावरण में गोलियों की तड़तड़ाहट गूंजी ।

"घड़ान् . . !"

अभी गोलियों को तड़तड़ाहट का स्वर खत्म भी नहीं हुआ था कि एक और विस्फोट हुआ था ।

मैं हैरत में थी । मैं गोलियां चलने और विस्फोटों का रहस्य नहीं समझ पा रहीँ थी । मैं तो वस अन्धा धुन्ध भागे जा रहीं थी ।

इस बार तीसरा विस्फोट हुआ । वो विस्फोट इतना जबरदस्त था कि मैं अपना बैलेंस नहीं बनाये रख सकी थी और मुंह के बल नीचे गिरी थी । मेरा सिर भड़ाक् से तेज अन्दाज के साथ किसी पत्थर टकराया था ।

मैंने गर्दन मोढ़कर सड़क की तरफ देखा तो आग के शोलों के बीच जीप के परखच्चे उडते नजर आये । अगले क्षण मेरी आंखों के समक्ष अंधेरे की सपाट चादर खिंचती चली गई । उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं रह गया था । मैं बेहोश हो चुकी थी ।।

=====

=====

मेरी बेहोशी टूटी ।

मैंने पटू से आँखे खोल दी । इस वक्त मैं एक शानदार सजै-संवरे कमरे में एक आराम देह दीवान पर लेटी हुई थी । कमरा प्रकाश से जगमगा रहा थे । उसका इकलौता दरवाजा बन्द था । वहां मुझे किसी इन्सान के दर्शन नहीं हुए थे ।

मैं आजाद थी ।

मुझें वे क्षण याद आते चले गये के जब मैं बेहोश हुई थी । अभी भी मैं उन विस्फोटों का रहस्य नहीं समझ पाई थी । मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मैं उन सैनिकों की गिरफ्त से आजाद हो चुकी हूँ । उस वक्त हुए धमाके से फैला धुआं मेरे लिये वरदान साबित हुआ था, जिसकी वजह से मैं जीप से कूदकर निकल भागने में कामयाब हो सकी थी । लेकिन इस वक्त मेरे जेहन में एक ही सवाल चकराये जा रहा था कि मैं कहां हूं और मुझे यहां कौन लाया है ? सहसा कमरे का दरवाजा खुला ।

दूसरे क्षण ।

जिस शख्स ने भीतर कदम रखा । उसे देखकर मेरी खोपडी अंतरिक्ष में उड़ने लगी ।

आरान्तुक क्लाइव था । सर एडलॉफ के समर्थकों का मुखिया ।

"त. तुम ।" मेरे होठों से हैरत भरा स्वर निकल गया । प्रत्युत्तर मैं क्लाइव मुस्कुराकर रह गया ।

"मुझें यहाँ कौन लाया है?" मैंने उत्सुकता भरे स्वर में सवाल किया ।

"मैं आपको यहां लाया हूं।" वह दीवान के करीब पहुंचकर बोला ।

"तुम ?"

"हा ।" उसने उत्तर दिया---" उस वक्त सडक पर जो कुछ भी हुआ वो मेरा ही किया-धरा है । आपको सैनिकों के चंगुल से आजाद कराने का यही एक रास्ता था ।"

"लेकिन तुम्हें कैसे पता चला कि मैं सैनिकों के चंगुल में फंस चुकी हूं।" मैंने उठकर बैठते हुए पूछा ।

"यहां से निकलने के बाद आप हर पल मेरी निगरानी में रही हैं । मुझे शक था कि आप पर खतरा आ सकता है । इसलिये मैं अपने आदमियों के साथ साये की तरह आपके पीछे लगा रहा । अगर वो सैनिक आपको अपने साथ ले जाने में सफल हो जाते तो मेरे सामने बडी कठिनाई आ जाती ।"

"उन सैनिकों का क्या हुआ?"

"सैनिकों का वहीँ हुआ, जो होना चाहिये था । हमने उन्हैं जीप सहित उडा दिया, लेकिन आप सैनिकों के चंगुल में कैसे फंस गई?"

"उन सैनिकों ने मुझे हिलकाक के साथ उसकी कार में आते हुए देख लिया था । न जाने कैसे उन्हें मेरे ऊपर शक हो गया । मैं हिलकाक के बेडरूम से निकल ही रहीं थी कि उन्होंने मुझे अपने कब्जे में कर लिया । उनमें एक आर्थर नाम का सैनिक भी था, जो मुझे आर्मी एरिया में मिला था । वो पट्ठा पता नहीं कैसे कूद कर इस नतीजे पर पहुच गया कि मैं वही लड़की हूं जो सैनिक बैरक से निकल भागी थी ।"

" ओह ।"

"मेरी असेलियत जानने के लिये वे मुझे सैना के हेडक्वार्टर ले जा रहे थे । अगर तुम वक्त पर पहुंचकर मेरी मदद न करते तो शायद इस समय मैं वहीं होती ।"

"कैप्टन हिलकाक ने डगलस के बारे में क्या बताया?"

 


"तुम्हारी इन्कार्मेंशन गलत निकली क्लाइव । हिलकाक को मालूम नहीं है कि डगलस को किस गुप्त जेल में नजरबंद करके रख गया है ।"

"व. . .व्हाट?"

"ये सच है ।"

"ऐसा आपको कैप्टन हिलकाक ने बताया ।"

"और कौन बतायेगा?"

"वो हरामजादा झूठ भी तो बोलता हो-सकत्ता है ।"

"मैं एक जासूस हू क्लाइव । मैं सामने वाले का चेहरा देखकर बता सकती हूं कि वो सच बोल रहा है अथवा झूठ और मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि हिलकाक ने झूठ नहीं बोला था ।"

क्लाइव का चेहरा बुझ गया-" यानि आपका इतना खतरा उठाकर हिलकाक के पास जाना बेकार साबित हुआ । वो अहम् खबर आपको नहीं मिल पाई, जो हमें कामयाबी के, शिखर तक पहुचा सकती थी ।"

"मैं ये भी नहीं कह सकती कि मेरा हिलकाक के पास जान बेकार साबित हुआ है ।"

"म. मतलब ।" वह चौंका ।

"मतलब ये कि हिलकाक ने मुझे एक महत्वपूर्ण जानकारी दी है कि डगलस के बारे में विल्सन बता सकता है ।"

क्लाइव का चेहरा जिस तेजी से बुझा था । उसी तेजी से चमक उठा । उसका स्वर उत्सुकता से भर उठा… "कोन विल्सन ।"

"विल्सन सेना में मेजर है ।"

"विल्सन का पता-ठिकाना?"

मैंने क्लाइव को विल्सन का वो पता-टिकाना बता दिया, जो मुझे हिलकाक ने बताया था । अन्त में बोली-' "वो जगह कहां पड़ेगी, जहा विल्सन मिलेगा ।"

क्लाइव ने मुझे वो जगह समझा दी, फिर बोला-----" मगर उस इलाके में अधिकांश सैनिक अधिकारी रहते हैं ।"

" हूं ।"

"लेकिन आपने हिलकाक का क्या किया?"

"मैंने उसका वहीं किया, जो एक दुश्मन का करना चाहिये था । मैंने उसकी हत्या कर दी, अगर मैं उसे जिन्दा छोड़ देती तो वो हमारे लिये खतरनाक साबित हो सकता था ।" मैंने बताया ।

"ये तो आपने अच्छा किया, लेकिन उसकी हत्या आपके लिये सिरदर्द वन जायेगी । हिलकाक की हत्या की खबर फैलते ही सेना पागल हो उठेगी । वे लोग आपको पकड़ने के लिये ऐडी-चोटी का जोर लगा देंगे ।"

"सैना तो पहले ही मेरी तलाश जोर शोर से कर रही है । इस बात से मुझें कोई फ़र्क नहीं पड़ता ।"

"भले ही फर्क न पडता हैं, लेकिन सेना के आला दिमाग लोग तो सतर्क हो जायेंगे । वो फौरन अन्दाजा लगा लेंगे कि हिलकाक की हत्या किसी खास मकसद से की गई है. . . और विल्सन तो और भी ज्यादा सतर्क हो जायेगा । अगर उन लोगों के दिमाग में ये बात आ गई कि आपका मकसद डगलस को छुडाना है तो वो उसके चारों तरफ सुरक्षा की ऐसी मजबूत दीवार खडी कर देगे कि उसे तोड़कर . आपका डगलस तक पहुंचना लगभग असम्भव हो जायेगा ।"

"डोंट वरी ।" मैंने लापरवाही से कन्धे झटके--,"नम्बर एक तो ये बात उनके दिमाग में आयेगी ही नहीं, उन्हें कोई ख्वाब नहीं चमकने वाला और अगर आ भी गई तो सुरक्षा की ऐसी दीवारों को ध्वस्त करना भी मुझे बाखूंबी आता है !"

क्लाइव ने चुप्पी साध ली ।

उसने अपनी जेव से सिगरेट का पैकेट निकाला और अपने लिये सिगरेट लगा ली । उसे देखकर मुझे याद आया कि मुझे भी सिगरेट होठों लगाये घण्टों गुजर चुके थे ।

"एक सिगरेट मुझे भी दो !" कहा मैंने ।

क्लाइव ने पैकेट से एक सिगरेट निकालकर मुझे थमा दी ।

मैंने सिगरेट होठों के बीच दबा ली । क्लाइव ने उसे सुलगा भी दिया ।

" अब ये बताओ कि आपका अगला कदम क्या होगा?" क्लाइव ने गहरा कश लेकर ढेर सारा धुंआ उगल दिया ।

"हिलकाक ने विल्सन के बारे में मुझे बताया है कि वह बहुत सतर्क रहने वाला शख्स है ।" मैं बोली-"मगर फिर भी मुझे यकीन है कि मैं उसका मुंह खुलवाने में कामयाब हो जाऊंगी । बस मेरे उस तक पहुंचने की देर . !"

"कब निकलने का प्रोग्राम है?"

"कल दिन में किसी भी वक्त?“

क्लाइव ने मेरी तरफ इस अन्दाज से देखा, जैसे उसे मेरे दिमाग के हिल जाने का अंदेशा हो?

"मुझे इस तरह क्यों देख रहे हो क्लाइव ?"

"आप सब कुछ जानते हुए भी जानबूझ कर खतरे को न्यौता दे रही हो । सेना आपकी शहर के चप्पे-चप्पे पर तलाश कर रही है । वो आपकी जान के पीछे पडी हुई है । फिर भी आप दिन में जाने की बात कर रही हैं । मैं आपकी बात से सहमत नहीं हू, दिन में यहा से बाहर निकलना आत्महत्या करने जैसा काम होगा रीमा जी । मेरे ख्याल से आपका रात के वक्त निकलना ही उचित होगा ।"

"क्या सारा दिन मैं यहां हाथ-पर-हाथ रखे बैठी रहूं ?"

"इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं है । विल्सन कोई मामूली आदमी नहीं है । सेना का मेजर है । उसकी सुरक्षा के लिये वहां सैनिक भी होगे । क्या वो आपको देखते ही गोलियों से नहीं भून डालेंगे?"

"अगर ऐसी वात है तो ठीक है, लेकिन रात के वक्त आप अपने बचाव में वहुत कुछ कर सकती हैं, जो दिन के उजाले में नहीं कर सकतीं । रात के वक्त आपके बचकर भाग निकलने के भी ज्यादा चांसेज हैं । मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ कि आप दिन के वक्त यहां से बाहर भी निकले । आपका रात के वक्त जाना ही बेहतर होगा ।"

क्लाइव की बात में वजन था ।

मैं समझ चुकी थी कि क्लइइव मुझें दिन के वक्त बाहर नहीं निकलने देगा । अत: मैंने इससे ज्यादा बहस करना उचित नहीं समझा था ।

"औ०के ।" मैं कश लेकर बोली ।

"अगर आप चाहें तो मैं आपके साथ चल सकता हू क्योंकि एक से दो भले होते हैं ।"

"तुम्हारा मेरे साथ चलना ठीक नहीं होगा, अगर कोई खतरा आ गया तो अपने साथ साथ मुझें तुम्हारी हिफाजत भी करनी पडेगी ।

इस स्थिति में हम दोनों मुसीबत में फंस जायेगे ।"

"आपकी मर्जी ।" वह बोला" "मेरे लिये कोई आदेश हो तो बताइये।"

" अगर कोई आदेश होगा तो अवश्य वताऊंगी ।" मैंने सिगरेट का आखिरी कश लेकर उसे फर्श पर उछालते हुए कहा…" 'फिलहाल तो मैं सोना चाहती हू।"

"ओ०के० ।"

कहने के साथ ही क्लाइव चला गया । मैंने नीचे उतरकर दरवाजा बन्द किया, फिर लाईट आँफ करके दीवान पर लेटकर आंखें बन्द कर लीं । न जाने कब नींद ने मुझे अपने आगोश में ले लिया था । मुझे पता ही नहीं चला था ।

=====

=====

मैंने बाउण्ड्री वाल पर बैठकर सतर्कता भरी निगाहें भीतर डाली ।

उधर घुप्प अंधेरा था । पूरा लॉन सूना पडा था । फूलों वाले पौधों के अलावा वहाँ मुझे कुछ नजर नहीं आया था । आसपास कोई खतरा मौजूद नहीं था ।

बाउण्ड्री वॉल ज्यादा ऊंची नहीं थी । अत: संतुष्ट होकर मैंने हाथों से बाल थामकर अपने पैर नीचे लटका दिये । अगले क्षण मेरे पैर कच्ची जमीन को छू रहे थे । मैं बाउण्ड्री वॉल छोड़कर घूमी ।

सन्नाटा पूर्ववत् था । पता नहीं क्यों दो सन्नाटा मुझे वहुत रहस्यमय-सा प्रतीत हो

रहा था । मगर किसी बात की परवाह न करते हुए मैं दबे पांव सामने बरामदे की तरफ बढती चली गई ।

मैंने रिवाल्वर निकालकर हाथ में ले लिया था । ये रिवाल्वर मैंने क्लाइव से लिया था ।

मेहरबान दोस्तों को बता दूं कि इस वक्त मैं विल्सन के बंगले पर थी । यहां पहुंचते ही सबसे प।ले मैंने बंगले के मुख्य प्रवेश द्वार आयरन गेट का रुख क्रिया था । इस समय वह बन्द था और यहां मुझे कोई नजर नहीं आया था, लेकिन मैंने आयरन गेट से भीतर प्रवेश करना उचित नहीं समझा था ।

अतः मैंने बाउण्ड्री वॉल का रुख किया था ।

मुझे हल्का सा आश्चर्य अवश्य था । इस वक्त मैं सेना के एक मेजर के आवास पर थी और यहां अभी तक एक चूहे से भी मेरा सामना नहीं हुआ था । यहां किसी भी तरह की सुरक्षा-व्यवस्था तक नजर नहीं आ रही थी, जबकि होना तो ये चाहिये था कि अब तक मेरे स्वागत में दर्जन भर सेनिक मेरे सामने होते । या सहसा मेरे जेहन में एक विचार तेजी से चकराता चला गया कि कहीं कैप्टन हिलकाक ने मुझे विल्सन के बंगले की जगह किसी दूसरी जगह तो नहीं भेज दिया है ।

फिर कुछ सोचकर मैंने इस विचार को अपने दिमाग से झटक था ।

मैं बरामदे में पहुची। यहां भी अंधेरा सन्नाटे के साथ मिलकर पांव पसारे था । अब तक मेरी आँखे यहां फैले अंधेरे की अभ्यस्त हो चुकी थीं ।

सामने प्रवेश द्वार था ।

मैं उस तरफ बढी ।

किन्तु उसी क्षण सहसा मैं तीव्र प्रकाश से नहा उठी । एकाएक बरामदे की सारी बत्तियां जल उठी थीं । मेरे पांव जहाँ के तहाँ चिपककर रह गये ।

साथ ही मैंने चौंककर तीव्रता से चारों तरफ नजरें घुमाई और पाया कि मैं चारों तरफ से धिर चुकी थी । इस समय लगभग आधा दर्जन रायफलों की नाले मेरे ऊपर तनी हुई थीं और वे रायफलें जो लोग सम्भाले थे, वे सभी सैनिक थे । एक सेनिक पर नजर पडते ही मुझे जोरों का झटका लगा ।

यह आर्थर था ।

जाहिर है कि यह उस जीप हादसे से बच निकलने में कामयाब होगया था।

मेरी सारी सतर्कता धरी रह गई थी ।

फिर अभी मैं ठीक से सम्भल भी नहीं पाई थी कि अचानक एक भयानक कहकहा पिघले हुए सीसे की तरह मेरे कानों में उतरता चला गया ।

 
मैं फिरकनी की तरह आवाज की दिशा में घूमी । साथ ही मैंने सामने जो कुछ भी देखा, वो मेरे लिये जाल पड़ने के लिये काफी था । सामने बरनाड खड़ा था ।

सेना का वहीं कमाण्डर, जिससे मेरी मुलाकात आर्मी एरिया में हुई थी और उसने मेरे उपर यातनाओं का पहाड़ तोड़ा था । वो कहकहा उसी के हलक से निकला था ।

सब कुछ मेरी आशा के विपरीत हुआ था ।

इस वक्त यहां विल्सन को होना चाहिये था । किन्तु वहाँ तो किसी भूत की तरह बरनाड मौजूद था, जो मेरे लिये कम आश्चर्यजनक बात नहीं थी ।

बहरहाल, मात हो गई थी ।

"वैल्कम बेबी !" कहकहा समाप्त करके बरनाड बोला--"तुम अपने अपको बहुत ज्यादा चालाक समझती हो । आखिर तुम हमारे जाल में फंस ही गई । पहली बार तो तुम बचकर भाग निकली थी , लेकिन इस बार बचकर नहीं भाग पाओगी ।"

मैं खामोश रही । . .

दरअसल, खतरे का आभास तो मुझे उसी वक्त हो गया था, जब मैंने वहां अंधेरा देखा था और मुझें किसी इन्सान के दर्शन नहीं हुए थे । परन्तु वो खतरा बरनाड के रूप में मेरे सामने आयेगा, इसकी कल्पना मैंने न की थी ।"

"तुम्हारा खेल खत्म चुका ।" बरनाड मेरे करीब पहुचकर ठिठकता हुआ भयानक अंदाज में गुर्राया--" रिवाॅल्बर मेरे हबाले कर दो !"

मैंने शराफत के साथ रिवाल्वर उसकी तरफ बढा दिया !

"इस वक्त तुम्हारी जिन्दगी मेरी मुट्ठी मे है ।" वह मेरे से रिवाल्वर झपटता हुआ पूर्ववत् लहजे में बोला--"तुम आर्मी एरिया से तो हमारे हाथों से बचकर भाग निकली थी, लेकिन यहां से नही भाग सकोगी । अब तुम्हारी कब्र इसी बंगले में बनेगी ।"

इस वक्त मैं उसी मेकअप में थी, जिसमें कैप्टन हिलकाक से मिली थी । मैं जानबूझ कर चौंकने का जानदार अभिनय करती हुई बोली-" कौन. . .कौन बैरक से भाग निकली थी?"

"तुम और कौन?"

"मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि तुम ये क्या कह रहे हो? मैंने तो आज तक आर्मी एरिया में कदम तक नहीं रखा और तुम कह रहे हो कि मैं बैरक से भाग निकली थी"

"तो तुम वो लडकी नहीं हो?"

" विल्कुल नहीं । तुम्हें जरूर कोई गलतफ़हमी हो गई है ।"

"फिर कौन हो तुम?"

"मेरा नाम डिलेला है और मैं हिलकाक की प्रेमिका हूं।"

पलक झपकते ही बरनाड का हाथ घूम गया ।

"तड़ाक्. . . !"

उसकी चौडी हथेली झन्नाटेदार थप्पड़ की शक्ल में मेरे गाल से टकराई । थप्पड़ इतना ताकतवर था कि मेरे होठों से घुटी-घुटीं चीख निकल गई । समूचा चेहरा झनझना उठा और मैं गिरते-गिकते बची ।

"तुम क्या समझती हो कि तुम्हारा ये झूठ मेरे सामने चल जायेगा । जो पता तुमने आर्थर को बताया था, उस पते पर तो क्या उस पूरी इमारत में भी डिलेला नाम की कोई लडकी नहीं रहती ।"

मैं झटका खाकर रह गई ।

मेरा झूठ पकडा गया था ।

वे लोग तो बड़े ही पहुचे हुए निकले थे । मुझें तो सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि वे वहां तक भी पहुच सकते हैं ।

"इन्सान कितना भी चालाक क्यों न हो? वह ऐसे मामले में कहीं-न-कहीं गलती अवश्य कर जाता है और एक गलती तुम भी कर बैठी ।" इस बार आर्थर बोला… "तुमने अपना नाम और मेकअप तो बदल लिया, लेकिन अपनी आबाज नहीं बदली थी । तुम्हारी आवाज से ही मैंने तुम्हें कैप्टन के आवास पर पहचान लिया था ।"

मुझसे वाकई चूक हो गई थी ।

और आर्थर ने मेरा सारा खेल बिगाढ़कर रख दिया था ।

अब मुझे अपनी भूल पर पछतावा हो रहा था ।

बहरहाल मेरी पोल खुल चुकी थी ।

"तुम हैरान हो रही होगी कि हमें तुम्हारे यहीं पहुंचने के बारे, कैसे मालूम हो गया ? मैं तुम्हें बताता हूं। इस बंगले में जब भी कोई कदम रखता है, तो वो हमारे इलेक्ट्रनिक इन्फार्मर से बच नहीं पाता । जब तुम बाउण्डी वॉल पर चढी थी, तभी भीतर अलार्म बज उठा था । बरनाड ने बताया----"उसके बाद मैंने तुम्हें मॉनीटर टी०वी० पर देखा था । उसी वक्त मैने तुम्हें पहचान लिया था ।"

मैं खामोश रही ।

उधर, एक पल ठहरकर बरनाड ने सवाल किया--' "ये बताओ कि वो लोग कौन थे, जिन्होंने न सिर्फ सैनिकों को मार डाला, वल्कि

सेना की जीप को भी बम से उडा दिया ।"

"मुझे क्या मालूम कि वो लोग कौन थे ?"

"तुम उसे नहीं जानती?" उसने मुझे कहरभरी निगाहों से घूरा ।

"नहीं ।"

उसने पुन: मेरे चेहरे पर थप्पड रसीद कर दिया ।

मैं बिलबिला उठी ।

उस पर गुस्सा तो आया, लेकिन मैं बड़ी मुश्किल से गुस्से को जब्त करने मे कामयाब हो सकी थी ।

"बको ।" वरनाड हिंसक भेड्रिये की तरह गुरोंया-"तुम्हारी असलियत क्या है और तुम्हें आर्मी के इस गुप्त ठिकाने के बारे में किसने बताया, जिसकी हमारे इन्टेली जेंस के चन्द लोगों के अलावा किसी को भनक तक नहीं है ।"

मन ही मन मैं बुरी तरह चौकी ।

हिलकाक ने तो मुझे ये विल्सन का बंगला बताया था, जबकि वरनाड उस जगह को आर्मी का गुप्त ठिकाना बता रहा था । इसका मतलब हिलकाक वडी ही कुत्ती चीज निकला था । उस हरामजादे ने र्फसाने के लिये चाल चली थी ।

मैँ एक बार फिर फंस चुकी थी और इस बार बहुत बुरी फ़सी . . ।

बहरहाल, मैं जिस मसकद को लेकर यहीं आई थी, मेरा वो मकसद तो कमाण्डर बरनाड से भी पूरा हो सकता था, लेकिन फिलहाल तो मुझे ये देखना था कि कमाण्डर का अगला कदम क्या होता है ?

"तुम खामोश क्यों हो?" बरनाड के होठों से पुन: गुर्राहट खारिज हुईं-"ज़वाब क्यों नहीं देतीं?"

मैं वैसी ही बनी रही ।

"जवाब दे हरामजादी ।" आर्थर मेरी पसलियों पर रायफल का बट जड़ता हुआ गला फाड़कर चीखा ।

मैं पीड़ा बिलबिला उठी ।

" जल्दी से अपना मुह खोल !" वह पुन: चीख उठा----"वरना मैं मार-मार का तेरी हड्डी-पसली एक कर दूंगा ।"

""त. . .तुम लोग बेवजह मेरे पीछे पड़े हुए हो । मैं तुम्हें अपने बारे में बता तो चुकी हूं कि मेरा नाम डिलेला है और मैं हिलकाक की प्रेमिका हूं अगर तुम मेरी बात पर यकीन नहीं कर रहे हो तो मैं क्या कर सकती हूं?"

आर्थर ने कुछ काने के लिये अपना मुंह खोला, लेकिन बरनाड ने उसे खामोश रहने का संकेत क्रिया ।

आर्थर ने अपने होठ भिच लिये ।

बरनाड मुझे अगारे बरसाती आंखों से घूरता हुआ बोला-"माना कि तुम हिलकाक की प्रेमिका हो, लेकिन तुम यहाँ क्या लेने आई हो?"

"यहां का पता मुझे हिलकाक ने दिया था । उसने मुझे बताया था कि यहां पर मुझे मेजर विल्सन मिलेगा । मुझे विल्सन को भी खुश करना होगा । अपने प्रेमी की बात माननी पडी । मैं विल्सन को खुश करने यहां आई हूं लेकिन वो तो मुझे दिखाई नहीं दे रहा है, कहां है विल्सन?"

"अब तुम एक नई कहानी गढ़कर सुना दी हरामजादी ।" उसने गुस्से से दांत पीसे ।

"ये कहानी नहीं, हकीकत है ।"

पलक झपकते ही बरनाड का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुच गया । अगले क्षण उसका हधौड़े जैसा घूसा मेरी कनपटी से टकराया ।

मेरे हलक से चीख उबल पडी ।

आँखों के समक्ष गुंजायमान तारे नाच उठे ।

. "ये इतनी आसानी से मुंह खोलने वाली नहीं है आर्थर । वहां कैम्प के टॉर्चर रूम में भी इसने सच नहीं उगला था । अब हमेँ शायद इसे जो यातनायेँ देनी पडेगी, जिनके चलते मौत भी गा-गा कर सच बोलने पर मजबूर हो जाये ।"

"कोई गलत हरकत मत करना लडकी ।" बरनाड फुफ्कारा-" बरना तुम अपनी मौत की खुद जिम्मेदार होंगी ।"

मैं पूर्ववत् बनी रहीं ।

"अब क्या करना है सर?" आर्थर ने पूछा ।

"इस कुतिया को मौत के कमरे में ले चलो ।" उसने हुक्म दनदनाया ।

" चल ।" आर्थर मेरे नितम्बो पर रायफल का बट जड़ता हुआ बोला ।

अगले क्षण । मेरे जिस्म से कई रायफ़लो की नाले आ चिपकी ।

फिर सैनिक मुझे धकेलते हुए आगे बढ़ गये । वे मुझे जिन रास्तों से ले जा रहे थे । वो रास्ते मैं बराबर अपने दिमाग में बिठाती जा रही थी ।

कई राहदारियों से गुजरकर मुझे एक कमरे में ले जाया गया । मैंने बारीकी के साथ उसका निरीक्षण क्रिया । यह एक लम्बा-चौडा पुराने टाइप का कमरा था । सामने एक और दरवाजा नजर जा रहा था, जो इस वक्त बन्द था । कमरे की एक दीवार के साथ बर्फ की सिल्लिया पड़ी हुई थी । "

"सुनो " बरनाड मेरे चेहरे पर अपनी निगाहें फिक्स करता हुआ बोला- " अगर मैं चाहू तो मेरे एक इशारे पर सैनिकं तुम्हें गोलियों से छलनी कर सकते हैं । मगर मैं बेकार में खून-खराबा नहीं करना चाहता । तुम्हारी जान बच सकती है । बशर्ते तुम सब कुछ सच -सच बता दो । तुम्हें आखिरी मौका देना चाहता हू । उसके बाद तुम्हारे बचाव के सारे रास्ते बन्द हो जायेंगे ।"

मैंने होठ खोलने की कोशिश नहीं की ।

"में तुम्हें सोचने के लिये एक मिनट का वक्त देता हूँ अगर एक मिनट पूरा होने के बाद भी तुमने अपना मुंह नहीं खोला तो दूसरा मिनट मेरा होगा और वो दूसरा मिनट तुम्हारी मौत का पैगाम लेकर आयेगा ।"

कहने के साथ ही उसने अपनी कलाई घडी पर एक निगाह डाली, फिर उसकी निगाहें मेरे चेहरे पर आ चिपकी ।

वडी गहरी खामोशी ने अपने पांव पसार दिये थे ।

मैं जानती थी कि एक मिनट गुजरने के बाद मुझे भयानक यातनाओं के दौर से गुजरना पड़ेगा । अत मैं खुद को यातनाएं सहने के लिये मानसिक रूप से तैयार करने लगी ।

" एक मिनट पूरा हो गया ।" सहसा बरनाड ने ऐलान किया--"अब बोलो । क्या फैसला किया तुमने?"

मैंने कोई जवाब नहीं दिया ।

"देखो, अगर तुम एक बिलबिलाती मौत मरना नहीँ चाहती हो तो अपना मुंह खोल दो ।" वह कहरभरे स्वर में बोला--"वरना मुझे तुम्हारे उपर यातनाओं के पहाड़ तोड़ने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा ।"

मैं मूक बनी सब सुन रहीं थी ।

मेरी खामोशी ने उसके गुस्से पर आग में घी जैसा काम किया था ।

"इस हरामजादी के कपड़े उतारो ।" बरनाड सैनिकों को सम्बोधित करके बोला ।

पलक झपकते ही तीन सैनिकों ने मुझे दबोच लिया । एक ने अपने फौलादी हाथों से मेरी कमर दबोच लि । दूसरे ने मेरी कलाइयों और तीसरा मेरे कपड़े उतारने लगा ।

मैं अपनी समूची ताकत के साथ उनसे जूझ पडी , लेकिन उनकी गिरफ्त से आजाद नहीं हो पा रही थी ।

कुछ पलों बाद मैं एकदम निर्वस्त्र थी ।
 
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