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सैनिक आँखे फाड़े मेरे निर्वस्त्र जिस्म को देख रहे थे । उनकी निगाहें मेरे जिस्म पर एक जगह टिक ही नहीं पा रही थीं । उनकी आखों में अजीब-सी चमक थी । उनके चेहरों के भाव साफ इस बात की चुगली खाते प्रतीत हो रहे थे, अगर इस वक्त उनका कमाण्डर-वहां मौजूद न होता तो अब तक उनमें मुझे हासिल करने की होढ़ लग चुकी होती ।
" "क्या देख रहे हो तुम लोग ।" एकाएक वरनाड गुर्राया" "इसके हाथ-पैर बांध दो ।"
सैनिक हढ़बड़ाकर रह गये ।
उनमें से एक ने अपनी जेब से रेशमी डोरी निकाली और मेरे हाथ पीठ पीछे करके मजबूती से जकड दिये, फिर मुझे बेरहमी से फर्श पर धकेलकर मेरे पांव भी बांध दिये ।
"तुम लोग मेरे साथ ठीक नहीं कर रहे हो ।" मैंने कसमसा कहा-"तुम सबको अपनी गलती का खामियाजा भुगतना पड़ेगा ।"
"खामोश ।" बरनाड हिंसक स्वर में गुर्रा उठा--"मुंह से फालतू आवाज निकाली तो गोली मार दूंगा ।"
"तुम मुझे गोली ही मार दो तो बेहतर होगा । अगर मैं बच गई तो तुम्हारे लिये सिरदर्द वन जाऊंगी ।"
"इस हरामजादीं को उठाकर बर्फ की सिल्लियों पर पटक दो ।" वह मेरी बात अनसुनी करता हुआ बोला--" गर ये सिल्लियों से नीचे आने का प्रयास करे तो इसे इतना मारो कि इसकी आत्मा भी चीखने पर मजबूर हो जाये ।"
आर्थर ने मुझे उठाकर बर्फ की सिल्लियों पर पटक दिया ।
"भड़ाक् . . !"
मेरा जिस्म अबाज करता हुआ बर्फ की सिल्लियों से टकराया था ।
मेरे हलक से मर्मातक चीख उबल पडी थी ।
कुछ क्षणों तक मैं उसी स्थिति में पडी रही, मगर कब तक पड़ी रहती? बर्फ की ठण्डक. असहनीय हो गई थी और मुझे अपना जिस्म ठण्डे बर्फ से सुन्न पड़ता महसूस होने लगा था ।
मैं दांत-पर-दांत जमाये अभी तक बर्दाश्त कर रही थी । मुझे लगा, अगर मैंने अपने बचाव में जल्दी ही कुछ नहीं किया तो मैं वहीं जमकर लाश में तब्दील हो जाऊंगी ।
वे दिलचस्प निगाहों से मुझे देख रहे थे ।
मेरी स्थिति बडी संकटपूर्ण थी ।
" और जब वो जिस्म को जमा देने वाली ठण्डक मेरी बर्दाश्त से बाहर हो गई तो मेरे हौंसले जवाब देने लगे । मेरे होठों से पीड़ा भरी कराहें फूट निकली और देखते-ही-देखते वे चीखों में तब्दील हो गई । मगर मेरी उन चीखों का कमाण्डर पर जरा भी प्रभाव नहीं पड़ा । वह तो मानो बहरा हो गया था ।
"ये तो सिर्फ ट्रेलर है ।" मेरी हालत देखकर बरनाड ने जोरदार ठहाका लगाया-----"कुछ देर बाद मैं तुम्हें फिल्म दिखाऊँगा । अभी भी वक्त है । सब कुछ सच-सच बता दो, वरना बेमौत मारी जाओगी ।"
"म. . .मेरी मोत इतनी आसान नहीं है कमाण्डर, जितनी तुम समझ रहे हो ।"
"यानि अभी भी तुम्हें अपने जिन्दा वच जाने की उम्मीद है ।" उसके होठों से व्यंग भरा स्वर निकला ।
"उम्मीद पर तो दुनिया कायम है ।"
बरनाड के हलक विजेताओं जैसा कहकहा उबल पडा । वो कहकहा इतना जबरदस्त था कि मुझे अपने कानों के परदे झनझनाते हुए से महसूस हुए थे ।
मैंने सिल्लियों से लुढ़ककर नीचे गिरने का प्रयास किया । जैसे ही मैं सिल्ली के क्रिनारे पर पहुंची, वैसे ही रायफल के वट का जबरदस्त वार मेरी पीठ पर पडा ।
मेरे जिस्म में पीड़ा की तीव्र लहर दौड गई ।
सेनिक पूरी तरह से सावधान थे ।
वे सैनिक क्या जानते थे कि मेरे जिस्म पर पढ़ रहा रायफल का प्रत्येक बट उन्हें मौत के करीब पहुंचाता जा रहा है । बस मुझे कुछ करने का जरा-सा मोका मिलना चाहिये था, फिर उनकी खैर नहीं थी , लेकिन दिक्कत तो यही थी कि वे मुझे मौका ही नहीं दे रहे । मैं खून जमा देने वाली उस ठण्ड से बचने के लिये इधर-उधर लुढ़क रही थी ।
बरनाड मेरी बेबसी पर कहकहे लगा रहा था । "ये तो बहुत सख्त जान लगती है सर ।" आर्थर बोला--"इतनी यातनाएं सहने के बाद तो पत्थर भी अपना मुह खोलने पर मजबूर हो जाते हैं, लेकिन ये तो अपना मुंह खोलने के
लिये तैयार ही नहीं है ।"
"ये तो क्या इसके फरिश्ते भी मुह खोलेंगे आर्थर । जब तक ये अपना मुंह नहीं खोल देती, तबतक मुझसे इसका पीछा छूटने बाला नहीं है ।" वरनाड खौफनाक लहजे में कह उठा-" इसे उठाकर दूसरे कमरे में ले चलो ।"
आर्थर ने आगे बढकर मुझे बोरे की तरह अपने कंधे पर लाद लिया और दूसरे बन्द दरवाजे की तरफ बढ गया ।
बाकी पीछे चल पड़े ।
उनमें बरनाड भी था ।
मुझे उस ठण्डक से तो निजात मिल गई थी, लेकिन अब देखना … यह था कि वे लोग मेरा मुह खुलवाने के लिये और क्या करने वाले थे ?
आर्थर बन्द दरवाजे के करीब पहुकर ठिठका । अगले क्षण उसने बूट की जबरदस्त ठोकर बन्द दरबाजे पर रसीद कर दीं । दरवाजे के दोनों पल्ले भड़ाक् की आवाज के साथ खुल गये । ~ तदुपरान्त आर्थर ने मुझे कधे से उतारकर भीतर उछाल दिया । मेरा जिस्म हवा में चकराता हुआ धड़ाम् से कमरे के बीचों बीच फर्श पर गिरा । मेरे होठों से हदय-विदारक चीख उबल पडी ।
निसन्देह मैं बेहोश होते-होते बची थी ।
उधर मेरे पीछे पीछे वे लोग भी धढ़धड़ाते हुए भीतर दाखित हो गये थे ।
मेरी निगाहें बरनाड पर थीं ।
उसने आगे बढकर सामने मेज पर रखी कांच की एक बोतल उठा ली, फिर वह फुर्ती से मेरी तरफ पलट गया ।
मैंने देखा, उस बोतल में सुर्ख रंग का कुछ था ।
फिर वरनाड दो ही लम्बे डगो मेँ मेरे करीब पहुचा और बोतल मेरी आंखों के सामने लहराता हुआ बोला-----"इस को देखो, इसमें एक विशेष किस्म की नरभक्षी चिंटिया भरी हुई हैं । लाखों चीटियों । जो चन्द घन्टो में तुम जैसे बेबस किसी भी जीते-जागते इन्सान के समूचे जिस्म का मांस चट करके उसे कंकाल में तब्दील कर सकती हैं और ये खून की गन्ध से इन्सान की तरफ खिंचती है ।"
इस वार मैंने गौर से देखा ।
उस बोतल में वाकई रंगीन ढेर सारी चीटियों भरी हुई थीं, वे आकार में आम चीटियों से कई गुना बडी थी । वे बार वार अपना मुंह शीशी के भीतरी हिस्से पर, मार रही थीं और शीशी से बाहर निकलने के लिये बेताब थीं ।
ऐसी चीटियां मैं पहली बार देख रही थी । मैं मन हीँ मन सिहर-सी उठी ।
अपने किसी दुश्मन को बिलबिलाती मौत देने का वाकई उनके पास बहुत भयानक तरीका था ।
"तुम इस कमरे के फर्श पर पडी चीखोगी चिलाओगीं । अपनी जिन्दगी की भीख मागोगी, लेकिन ये सब सुनने बाला यहाँ कोई नहीं होगा ।" बरनाड के होठों पर जहरीली मुस्कान नाच
उठी…फिर चन्द घण्टों बाद तुम गुमनामी की मौत मर जाओगी ! और कोई जान भी नहीं पायेगा कि तुम अचानक दुनिया के तख्ते से कहां गायब हो गई? "
" तुमने तो मेरे लिये ऐसी मौत सोची है कि मुझ बदनसीब को कफ़न भी नसीब नहीं होगा ।" मैंने मासूमियत से कहा ।
"तुम्हें कफन की क्या जरूरत पडेगी । तुम तो मात्र हड्डियों का ढाचा रह जाओगी ।"
मैंने होठ मीच लिये ।
"चलो " वरनाड सैनिकों को सम्बोधित करता हुआ बोला-"कुछ देर बाद इस लड़की के कंकाल को उठाकर इमारत की छत पर फेक देना ।"
वे मुझे उस कमरे में बन्द करके चले गये । बरनाड बो बोतल भी अपने साथ ले गया था ।
मैं वहां अकेली रह गई ।
मेरी निगाहें दरवाजे पर स्थिर थी ।
वक्त सुस्त रफ्तार से गुजरता जा रहा था ।
अचानक ।
मैं चौंकी ।
दरवाजे के पल्लो के नीचे रिक्त स्थान से एकाएक चीटियों का रेला सरसराता हुआ भीतर दाखिल होने लगा था । उनका रुख मेरी तरफ ही था ।
वे चीटियां पानी के रेले की तरह भीतर घुसी चली आ रही थी ।
अब मुझें अपने बचाव में कुछ करना था । ।
सबसे पहले मुझे बंधनों से मुक्ति पानी थी । पलक झपकते ही मैं उठकर पंजों बल बैठ गई । मैं थोडी सी कोशिश के बाद अपने हाथ नितम्बो के नीचे से निकालकर चेहरे के सामने ले गई । पहले मैंने दांतों से अपने हाथों के बंधन खोले और फिर वडी फूर्ती से पैरों के बन्धन भी खोल डाले ।
अब मैं आजाद थी ।
चीटियों का रेला तीव्रता से मेरे करीब पहुंचता जा रहा था ।
वे तो जैसे मेरा मांस नोचने के लिये बैचेन थीं ।
सैनिकों ने मेरे कपड़े तो उतार दिये थे, लेकिन उन्होंने मेरे सैण्डिल नहीं उतारे थे । अब वो सैण्डिल ही मेरे लिये वरदान साबित होने वाले थे । मैंने बायें पैर के सैण्डिल की एडी को ढक्कन की तरह खोला और भीतर से खोखली एडी से दो कैप्यूल बरामद किये । मैंने एक कैप्सूल चीटियों के रेले की तरफ उछाल दिया ।
कैप्सूल रेले के ठीक सामने गिरकर फटा ।
दूसरे क्षण पीले रंग का जहरीला धुआं कमरे में फैल गया ।
मैंने तुरन्त अपनी सांस रोक ली । कुछ पलों बाद जब धुआं हटा तो चीटियों मर चुकी थीं और धुएं के प्रभाव के कारण बाहर से आने वाली चीटियों का रेला भी रूक चुका था । अब एक भी चींटी भीतर आती दिखाई नहीं दे रहीँ । मैंने बरनाड के खतरनाक इरादों पर पानी फेर दिया था ।
अब मुझे बरनाड के भीतर दाखिल होने का इन्तजार था ।
=========
=========
तकरीबन तीन घंटे बाद दरवाजे के बाहर खटर-पटर की आवाज उत्पन्न हुई । 'म
मैं समझ गई कि बाहर से दरवाजा खोला जा रहा है ।
मैं उसी स्थिति में लेट गई, जिसमें वे लोग मुझे छोड़कर वहां से गये थे ।
निगाहें दरवाजे पर जमा दी थीं । दरवाजा खुला । अगले क्षण बरनाड ने भीतर कदम रखा । उसके पीछे वे चारों सेनिक भी थे ।
भीतर का नजारा देखकर वे जड होकर रह गये ।
"अ. . . अरे ।" एकाएक बरनाड के होठों से हैरत भरा स्वर निकला ------"सारी चीटियां मरी पडी है और यह सहीं-सलामत है । ये वच कैसे गई?"
मैं मन ही मन मुस्कुराई ।
उसी क्षण!
उसका रिवाल्वर वाला हाथ मेरे चेहरे के करीब आया । मुझें लगा कि मेरा खेल खत्म होने वाला है । मगर मैंने मौका ताड़कर अपने दांत उसकी कलाई में गड़ा दिये । वह बिलबिला उठा । बरनाड की उंगलियों की पकड़ रिवाल्वर पर ढीली पड़ गई थी ।
दूसरे क्षण रिवाल्वर मेरे हाथ में थी । मैंने उसकी गर्दन से अपनी एक बांह लपेट दी और दूसरे ही क्षण रिवाल्वर की नाल उसकी कनपटी से चिपक चुकी थी ।
"तुम वहुत ज्यादा उछलकूद कर चुकें कमाण्डर !" मैंने कहा--- " लेकिन तुम्हारी उछलकूद का क्या नतीजा निकला , तुम्हारी हर कोशिश नाकामयाब साबित हुई है ।"
वह अपने होठों पर जुबान फिराकर रह गया ।
" तुम मुझे मार नहीं सके बरनाड ।" मैं पुन बोली--"तुम मुझे मारने की अपनी इच्छा मन में लिये ऊपर पहुंच जाओगे ।"
कहने के साथ ही मैंने रिवाल्वर की नाल उसकी कनपटी से सटा दी ।
""त. ..तुम चाहती क्या हो?" उसने पूछा । ' .बरनाड की कांपती अन्दाज जता रही थी कि उसके हौंसले पस्त हो चुके हैं । किन्तु उसके चेहरे के भाव इस बात की चुगली खाते प्रतीत हो रहे थे कि वह भीतर-ही-भीतर बुरी तरह उबाल खाया हुआ है, अगर उसका वश चलता तो वह मुझें फोरन गोली मार देता ।
"मैँ तुमसे एक छोटी सी जानकारी चाहती हू ।" मैंने उत्तर दिया ।
"क्या जानकारी चाहती हो?"
"डगलस को किस जेल में रखा गया है?" मैंने पूछा ।
वो बुरी तरह चौका । इस बुरी तरह, मानो मैंने उसके सिर पर शक्तिशाली बम फोड दिया हो ।
"क.. .कौन हो तुम?" -वह मेरे जबाब को हजम करता हुआ बोला ।
उसका प्रश्न गोल करके मैंने रिवाल्वर की नाल उसके माथे के ठीक बीचों-बीच सटा दी,
,,,,,,,,,,,,,,, निकली--" ‘खैर' मत बताओ । इस बारे में तो मैं सेना के क्रिसी और आफिसर से भी मालूम कर लूंगी लेकिन ऊब तुम्हारी बीबी विधवा जरूर हो जायेगी और तुम्हारे बच्चे विना बाप के कहलाने लगेंगे । अव मैं ट्रेगर दबाने जा रहीँ हूं।"
बरऩाड के चेहरे का रंग साफ साफ उड़ गया । माथे पर पसीने की धाराएं फूट निकलीं । आँखे आतंक से फटती चली गईं ।
मैंने रिवाल्वर का कुत्ता खींचा । सन्नाटे में क्लिक की आवाज जोरों से गूंजी ।
" "क्या देख रहे हो तुम लोग ।" एकाएक वरनाड गुर्राया" "इसके हाथ-पैर बांध दो ।"
सैनिक हढ़बड़ाकर रह गये ।
उनमें से एक ने अपनी जेब से रेशमी डोरी निकाली और मेरे हाथ पीठ पीछे करके मजबूती से जकड दिये, फिर मुझे बेरहमी से फर्श पर धकेलकर मेरे पांव भी बांध दिये ।
"तुम लोग मेरे साथ ठीक नहीं कर रहे हो ।" मैंने कसमसा कहा-"तुम सबको अपनी गलती का खामियाजा भुगतना पड़ेगा ।"
"खामोश ।" बरनाड हिंसक स्वर में गुर्रा उठा--"मुंह से फालतू आवाज निकाली तो गोली मार दूंगा ।"
"तुम मुझे गोली ही मार दो तो बेहतर होगा । अगर मैं बच गई तो तुम्हारे लिये सिरदर्द वन जाऊंगी ।"
"इस हरामजादीं को उठाकर बर्फ की सिल्लियों पर पटक दो ।" वह मेरी बात अनसुनी करता हुआ बोला--" गर ये सिल्लियों से नीचे आने का प्रयास करे तो इसे इतना मारो कि इसकी आत्मा भी चीखने पर मजबूर हो जाये ।"
आर्थर ने मुझे उठाकर बर्फ की सिल्लियों पर पटक दिया ।
"भड़ाक् . . !"
मेरा जिस्म अबाज करता हुआ बर्फ की सिल्लियों से टकराया था ।
मेरे हलक से मर्मातक चीख उबल पडी थी ।
कुछ क्षणों तक मैं उसी स्थिति में पडी रही, मगर कब तक पड़ी रहती? बर्फ की ठण्डक. असहनीय हो गई थी और मुझे अपना जिस्म ठण्डे बर्फ से सुन्न पड़ता महसूस होने लगा था ।
मैं दांत-पर-दांत जमाये अभी तक बर्दाश्त कर रही थी । मुझे लगा, अगर मैंने अपने बचाव में जल्दी ही कुछ नहीं किया तो मैं वहीं जमकर लाश में तब्दील हो जाऊंगी ।
वे दिलचस्प निगाहों से मुझे देख रहे थे ।
मेरी स्थिति बडी संकटपूर्ण थी ।
" और जब वो जिस्म को जमा देने वाली ठण्डक मेरी बर्दाश्त से बाहर हो गई तो मेरे हौंसले जवाब देने लगे । मेरे होठों से पीड़ा भरी कराहें फूट निकली और देखते-ही-देखते वे चीखों में तब्दील हो गई । मगर मेरी उन चीखों का कमाण्डर पर जरा भी प्रभाव नहीं पड़ा । वह तो मानो बहरा हो गया था ।
"ये तो सिर्फ ट्रेलर है ।" मेरी हालत देखकर बरनाड ने जोरदार ठहाका लगाया-----"कुछ देर बाद मैं तुम्हें फिल्म दिखाऊँगा । अभी भी वक्त है । सब कुछ सच-सच बता दो, वरना बेमौत मारी जाओगी ।"
"म. . .मेरी मोत इतनी आसान नहीं है कमाण्डर, जितनी तुम समझ रहे हो ।"
"यानि अभी भी तुम्हें अपने जिन्दा वच जाने की उम्मीद है ।" उसके होठों से व्यंग भरा स्वर निकला ।
"उम्मीद पर तो दुनिया कायम है ।"
बरनाड के हलक विजेताओं जैसा कहकहा उबल पडा । वो कहकहा इतना जबरदस्त था कि मुझे अपने कानों के परदे झनझनाते हुए से महसूस हुए थे ।
मैंने सिल्लियों से लुढ़ककर नीचे गिरने का प्रयास किया । जैसे ही मैं सिल्ली के क्रिनारे पर पहुंची, वैसे ही रायफल के वट का जबरदस्त वार मेरी पीठ पर पडा ।
मेरे जिस्म में पीड़ा की तीव्र लहर दौड गई ।
सेनिक पूरी तरह से सावधान थे ।
वे सैनिक क्या जानते थे कि मेरे जिस्म पर पढ़ रहा रायफल का प्रत्येक बट उन्हें मौत के करीब पहुंचाता जा रहा है । बस मुझे कुछ करने का जरा-सा मोका मिलना चाहिये था, फिर उनकी खैर नहीं थी , लेकिन दिक्कत तो यही थी कि वे मुझे मौका ही नहीं दे रहे । मैं खून जमा देने वाली उस ठण्ड से बचने के लिये इधर-उधर लुढ़क रही थी ।
बरनाड मेरी बेबसी पर कहकहे लगा रहा था । "ये तो बहुत सख्त जान लगती है सर ।" आर्थर बोला--"इतनी यातनाएं सहने के बाद तो पत्थर भी अपना मुह खोलने पर मजबूर हो जाते हैं, लेकिन ये तो अपना मुंह खोलने के
लिये तैयार ही नहीं है ।"
"ये तो क्या इसके फरिश्ते भी मुह खोलेंगे आर्थर । जब तक ये अपना मुंह नहीं खोल देती, तबतक मुझसे इसका पीछा छूटने बाला नहीं है ।" वरनाड खौफनाक लहजे में कह उठा-" इसे उठाकर दूसरे कमरे में ले चलो ।"
आर्थर ने आगे बढकर मुझे बोरे की तरह अपने कंधे पर लाद लिया और दूसरे बन्द दरवाजे की तरफ बढ गया ।
बाकी पीछे चल पड़े ।
उनमें बरनाड भी था ।
मुझे उस ठण्डक से तो निजात मिल गई थी, लेकिन अब देखना … यह था कि वे लोग मेरा मुह खुलवाने के लिये और क्या करने वाले थे ?
आर्थर बन्द दरवाजे के करीब पहुकर ठिठका । अगले क्षण उसने बूट की जबरदस्त ठोकर बन्द दरबाजे पर रसीद कर दीं । दरवाजे के दोनों पल्ले भड़ाक् की आवाज के साथ खुल गये । ~ तदुपरान्त आर्थर ने मुझे कधे से उतारकर भीतर उछाल दिया । मेरा जिस्म हवा में चकराता हुआ धड़ाम् से कमरे के बीचों बीच फर्श पर गिरा । मेरे होठों से हदय-विदारक चीख उबल पडी ।
निसन्देह मैं बेहोश होते-होते बची थी ।
उधर मेरे पीछे पीछे वे लोग भी धढ़धड़ाते हुए भीतर दाखित हो गये थे ।
मेरी निगाहें बरनाड पर थीं ।
उसने आगे बढकर सामने मेज पर रखी कांच की एक बोतल उठा ली, फिर वह फुर्ती से मेरी तरफ पलट गया ।
मैंने देखा, उस बोतल में सुर्ख रंग का कुछ था ।
फिर वरनाड दो ही लम्बे डगो मेँ मेरे करीब पहुचा और बोतल मेरी आंखों के सामने लहराता हुआ बोला-----"इस को देखो, इसमें एक विशेष किस्म की नरभक्षी चिंटिया भरी हुई हैं । लाखों चीटियों । जो चन्द घन्टो में तुम जैसे बेबस किसी भी जीते-जागते इन्सान के समूचे जिस्म का मांस चट करके उसे कंकाल में तब्दील कर सकती हैं और ये खून की गन्ध से इन्सान की तरफ खिंचती है ।"
इस वार मैंने गौर से देखा ।
उस बोतल में वाकई रंगीन ढेर सारी चीटियों भरी हुई थीं, वे आकार में आम चीटियों से कई गुना बडी थी । वे बार वार अपना मुंह शीशी के भीतरी हिस्से पर, मार रही थीं और शीशी से बाहर निकलने के लिये बेताब थीं ।
ऐसी चीटियां मैं पहली बार देख रही थी । मैं मन हीँ मन सिहर-सी उठी ।
अपने किसी दुश्मन को बिलबिलाती मौत देने का वाकई उनके पास बहुत भयानक तरीका था ।
"तुम इस कमरे के फर्श पर पडी चीखोगी चिलाओगीं । अपनी जिन्दगी की भीख मागोगी, लेकिन ये सब सुनने बाला यहाँ कोई नहीं होगा ।" बरनाड के होठों पर जहरीली मुस्कान नाच
उठी…फिर चन्द घण्टों बाद तुम गुमनामी की मौत मर जाओगी ! और कोई जान भी नहीं पायेगा कि तुम अचानक दुनिया के तख्ते से कहां गायब हो गई? "
" तुमने तो मेरे लिये ऐसी मौत सोची है कि मुझ बदनसीब को कफ़न भी नसीब नहीं होगा ।" मैंने मासूमियत से कहा ।
"तुम्हें कफन की क्या जरूरत पडेगी । तुम तो मात्र हड्डियों का ढाचा रह जाओगी ।"
मैंने होठ मीच लिये ।
"चलो " वरनाड सैनिकों को सम्बोधित करता हुआ बोला-"कुछ देर बाद इस लड़की के कंकाल को उठाकर इमारत की छत पर फेक देना ।"
वे मुझे उस कमरे में बन्द करके चले गये । बरनाड बो बोतल भी अपने साथ ले गया था ।
मैं वहां अकेली रह गई ।
मेरी निगाहें दरवाजे पर स्थिर थी ।
वक्त सुस्त रफ्तार से गुजरता जा रहा था ।
अचानक ।
मैं चौंकी ।
दरवाजे के पल्लो के नीचे रिक्त स्थान से एकाएक चीटियों का रेला सरसराता हुआ भीतर दाखिल होने लगा था । उनका रुख मेरी तरफ ही था ।
वे चीटियां पानी के रेले की तरह भीतर घुसी चली आ रही थी ।
अब मुझें अपने बचाव में कुछ करना था । ।
सबसे पहले मुझे बंधनों से मुक्ति पानी थी । पलक झपकते ही मैं उठकर पंजों बल बैठ गई । मैं थोडी सी कोशिश के बाद अपने हाथ नितम्बो के नीचे से निकालकर चेहरे के सामने ले गई । पहले मैंने दांतों से अपने हाथों के बंधन खोले और फिर वडी फूर्ती से पैरों के बन्धन भी खोल डाले ।
अब मैं आजाद थी ।
चीटियों का रेला तीव्रता से मेरे करीब पहुंचता जा रहा था ।
वे तो जैसे मेरा मांस नोचने के लिये बैचेन थीं ।
सैनिकों ने मेरे कपड़े तो उतार दिये थे, लेकिन उन्होंने मेरे सैण्डिल नहीं उतारे थे । अब वो सैण्डिल ही मेरे लिये वरदान साबित होने वाले थे । मैंने बायें पैर के सैण्डिल की एडी को ढक्कन की तरह खोला और भीतर से खोखली एडी से दो कैप्यूल बरामद किये । मैंने एक कैप्सूल चीटियों के रेले की तरफ उछाल दिया ।
कैप्सूल रेले के ठीक सामने गिरकर फटा ।
दूसरे क्षण पीले रंग का जहरीला धुआं कमरे में फैल गया ।
मैंने तुरन्त अपनी सांस रोक ली । कुछ पलों बाद जब धुआं हटा तो चीटियों मर चुकी थीं और धुएं के प्रभाव के कारण बाहर से आने वाली चीटियों का रेला भी रूक चुका था । अब एक भी चींटी भीतर आती दिखाई नहीं दे रहीँ । मैंने बरनाड के खतरनाक इरादों पर पानी फेर दिया था ।
अब मुझे बरनाड के भीतर दाखिल होने का इन्तजार था ।
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तकरीबन तीन घंटे बाद दरवाजे के बाहर खटर-पटर की आवाज उत्पन्न हुई । 'म
मैं समझ गई कि बाहर से दरवाजा खोला जा रहा है ।
मैं उसी स्थिति में लेट गई, जिसमें वे लोग मुझे छोड़कर वहां से गये थे ।
निगाहें दरवाजे पर जमा दी थीं । दरवाजा खुला । अगले क्षण बरनाड ने भीतर कदम रखा । उसके पीछे वे चारों सेनिक भी थे ।
भीतर का नजारा देखकर वे जड होकर रह गये ।
"अ. . . अरे ।" एकाएक बरनाड के होठों से हैरत भरा स्वर निकला ------"सारी चीटियां मरी पडी है और यह सहीं-सलामत है । ये वच कैसे गई?"
मैं मन ही मन मुस्कुराई ।
उसी क्षण!
उसका रिवाल्वर वाला हाथ मेरे चेहरे के करीब आया । मुझें लगा कि मेरा खेल खत्म होने वाला है । मगर मैंने मौका ताड़कर अपने दांत उसकी कलाई में गड़ा दिये । वह बिलबिला उठा । बरनाड की उंगलियों की पकड़ रिवाल्वर पर ढीली पड़ गई थी ।
दूसरे क्षण रिवाल्वर मेरे हाथ में थी । मैंने उसकी गर्दन से अपनी एक बांह लपेट दी और दूसरे ही क्षण रिवाल्वर की नाल उसकी कनपटी से चिपक चुकी थी ।
"तुम वहुत ज्यादा उछलकूद कर चुकें कमाण्डर !" मैंने कहा--- " लेकिन तुम्हारी उछलकूद का क्या नतीजा निकला , तुम्हारी हर कोशिश नाकामयाब साबित हुई है ।"
वह अपने होठों पर जुबान फिराकर रह गया ।
" तुम मुझे मार नहीं सके बरनाड ।" मैं पुन बोली--"तुम मुझे मारने की अपनी इच्छा मन में लिये ऊपर पहुंच जाओगे ।"
कहने के साथ ही मैंने रिवाल्वर की नाल उसकी कनपटी से सटा दी ।
""त. ..तुम चाहती क्या हो?" उसने पूछा । ' .बरनाड की कांपती अन्दाज जता रही थी कि उसके हौंसले पस्त हो चुके हैं । किन्तु उसके चेहरे के भाव इस बात की चुगली खाते प्रतीत हो रहे थे कि वह भीतर-ही-भीतर बुरी तरह उबाल खाया हुआ है, अगर उसका वश चलता तो वह मुझें फोरन गोली मार देता ।
"मैँ तुमसे एक छोटी सी जानकारी चाहती हू ।" मैंने उत्तर दिया ।
"क्या जानकारी चाहती हो?"
"डगलस को किस जेल में रखा गया है?" मैंने पूछा ।
वो बुरी तरह चौका । इस बुरी तरह, मानो मैंने उसके सिर पर शक्तिशाली बम फोड दिया हो ।
"क.. .कौन हो तुम?" -वह मेरे जबाब को हजम करता हुआ बोला ।
उसका प्रश्न गोल करके मैंने रिवाल्वर की नाल उसके माथे के ठीक बीचों-बीच सटा दी,
,,,,,,,,,,,,,,, निकली--" ‘खैर' मत बताओ । इस बारे में तो मैं सेना के क्रिसी और आफिसर से भी मालूम कर लूंगी लेकिन ऊब तुम्हारी बीबी विधवा जरूर हो जायेगी और तुम्हारे बच्चे विना बाप के कहलाने लगेंगे । अव मैं ट्रेगर दबाने जा रहीँ हूं।"
बरऩाड के चेहरे का रंग साफ साफ उड़ गया । माथे पर पसीने की धाराएं फूट निकलीं । आँखे आतंक से फटती चली गईं ।
मैंने रिवाल्वर का कुत्ता खींचा । सन्नाटे में क्लिक की आवाज जोरों से गूंजी ।