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हिन्दी नॉवल-काली दुनिया का भगबान - complete

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सैनिक आँखे फाड़े मेरे निर्वस्त्र जिस्म को देख रहे थे । उनकी निगाहें मेरे जिस्म पर एक जगह टिक ही नहीं पा रही थीं । उनकी आखों में अजीब-सी चमक थी । उनके चेहरों के भाव साफ इस बात की चुगली खाते प्रतीत हो रहे थे, अगर इस वक्त उनका कमाण्डर-वहां मौजूद न होता तो अब तक उनमें मुझे हासिल करने की होढ़ लग चुकी होती ।

" "क्या देख रहे हो तुम लोग ।" एकाएक वरनाड गुर्राया" "इसके हाथ-पैर बांध दो ।"

सैनिक हढ़बड़ाकर रह गये ।

उनमें से एक ने अपनी जेब से रेशमी डोरी निकाली और मेरे हाथ पीठ पीछे करके मजबूती से जकड दिये, फिर मुझे बेरहमी से फर्श पर धकेलकर मेरे पांव भी बांध दिये ।

"तुम लोग मेरे साथ ठीक नहीं कर रहे हो ।" मैंने कसमसा कहा-"तुम सबको अपनी गलती का खामियाजा भुगतना पड़ेगा ।"

"खामोश ।" बरनाड हिंसक स्वर में गुर्रा उठा--"मुंह से फालतू आवाज निकाली तो गोली मार दूंगा ।"

"तुम मुझे गोली ही मार दो तो बेहतर होगा । अगर मैं बच गई तो तुम्हारे लिये सिरदर्द वन जाऊंगी ।"

"इस हरामजादीं को उठाकर बर्फ की सिल्लियों पर पटक दो ।" वह मेरी बात अनसुनी करता हुआ बोला--" गर ये सिल्लियों से नीचे आने का प्रयास करे तो इसे इतना मारो कि इसकी आत्मा भी चीखने पर मजबूर हो जाये ।"

आर्थर ने मुझे उठाकर बर्फ की सिल्लियों पर पटक दिया ।

"भड़ाक् . . !"

मेरा जिस्म अबाज करता हुआ बर्फ की सिल्लियों से टकराया था ।

मेरे हलक से मर्मातक चीख उबल पडी थी ।

कुछ क्षणों तक मैं उसी स्थिति में पडी रही, मगर कब तक पड़ी रहती? बर्फ की ठण्डक. असहनीय हो गई थी और मुझे अपना जिस्म ठण्डे बर्फ से सुन्न पड़ता महसूस होने लगा था ।

मैं दांत-पर-दांत जमाये अभी तक बर्दाश्त कर रही थी । मुझे लगा, अगर मैंने अपने बचाव में जल्दी ही कुछ नहीं किया तो मैं वहीं जमकर लाश में तब्दील हो जाऊंगी ।

वे दिलचस्प निगाहों से मुझे देख रहे थे ।

मेरी स्थिति बडी संकटपूर्ण थी ।

" और जब वो जिस्म को जमा देने वाली ठण्डक मेरी बर्दाश्त से बाहर हो गई तो मेरे हौंसले जवाब देने लगे । मेरे होठों से पीड़ा भरी कराहें फूट निकली और देखते-ही-देखते वे चीखों में तब्दील हो गई । मगर मेरी उन चीखों का कमाण्डर पर जरा भी प्रभाव नहीं पड़ा । वह तो मानो बहरा हो गया था ।

"ये तो सिर्फ ट्रेलर है ।" मेरी हालत देखकर बरनाड ने जोरदार ठहाका लगाया-----"कुछ देर बाद मैं तुम्हें फिल्म दिखाऊँगा । अभी भी वक्त है । सब कुछ सच-सच बता दो, वरना बेमौत मारी जाओगी ।"

"म. . .मेरी मोत इतनी आसान नहीं है कमाण्डर, जितनी तुम समझ रहे हो ।"

"यानि अभी भी तुम्हें अपने जिन्दा वच जाने की उम्मीद है ।" उसके होठों से व्यंग भरा स्वर निकला ।

"उम्मीद पर तो दुनिया कायम है ।"

बरनाड के हलक विजेताओं जैसा कहकहा उबल पडा । वो कहकहा इतना जबरदस्त था कि मुझे अपने कानों के परदे झनझनाते हुए से महसूस हुए थे ।

मैंने सिल्लियों से लुढ़ककर नीचे गिरने का प्रयास किया । जैसे ही मैं सिल्ली के क्रिनारे पर पहुंची, वैसे ही रायफल के वट का जबरदस्त वार मेरी पीठ पर पडा ।

मेरे जिस्म में पीड़ा की तीव्र लहर दौड गई ।

सेनिक पूरी तरह से सावधान थे ।

वे सैनिक क्या जानते थे कि मेरे जिस्म पर पढ़ रहा रायफल का प्रत्येक बट उन्हें मौत के करीब पहुंचाता जा रहा है । बस मुझे कुछ करने का जरा-सा मोका मिलना चाहिये था, फिर उनकी खैर नहीं थी , लेकिन दिक्कत तो यही थी कि वे मुझे मौका ही नहीं दे रहे । मैं खून जमा देने वाली उस ठण्ड से बचने के लिये इधर-उधर लुढ़क रही थी ।

बरनाड मेरी बेबसी पर कहकहे लगा रहा था । "ये तो बहुत सख्त जान लगती है सर ।" आर्थर बोला--"इतनी यातनाएं सहने के बाद तो पत्थर भी अपना मुह खोलने पर मजबूर हो जाते हैं, लेकिन ये तो अपना मुंह खोलने के

लिये तैयार ही नहीं है ।"

"ये तो क्या इसके फरिश्ते भी मुह खोलेंगे आर्थर । जब तक ये अपना मुंह नहीं खोल देती, तबतक मुझसे इसका पीछा छूटने बाला नहीं है ।" वरनाड खौफनाक लहजे में कह उठा-" इसे उठाकर दूसरे कमरे में ले चलो ।"

आर्थर ने आगे बढकर मुझे बोरे की तरह अपने कंधे पर लाद लिया और दूसरे बन्द दरवाजे की तरफ बढ गया ।

बाकी पीछे चल पड़े ।

उनमें बरनाड भी था ।

मुझे उस ठण्डक से तो निजात मिल गई थी, लेकिन अब देखना … यह था कि वे लोग मेरा मुह खुलवाने के लिये और क्या करने वाले थे ?

आर्थर बन्द दरवाजे के करीब पहुकर ठिठका । अगले क्षण उसने बूट की जबरदस्त ठोकर बन्द दरबाजे पर रसीद कर दीं । दरवाजे के दोनों पल्ले भड़ाक् की आवाज के साथ खुल गये । ~ तदुपरान्त आर्थर ने मुझे कधे से उतारकर भीतर उछाल दिया । मेरा जिस्म हवा में चकराता हुआ धड़ाम् से कमरे के बीचों बीच फर्श पर गिरा । मेरे होठों से हदय-विदारक चीख उबल पडी ।

निसन्देह मैं बेहोश होते-होते बची थी ।

उधर मेरे पीछे पीछे वे लोग भी धढ़धड़ाते हुए भीतर दाखित हो गये थे ।

मेरी निगाहें बरनाड पर थीं ।

उसने आगे बढकर सामने मेज पर रखी कांच की एक बोतल उठा ली, फिर वह फुर्ती से मेरी तरफ पलट गया ।

मैंने देखा, उस बोतल में सुर्ख रंग का कुछ था ।

फिर वरनाड दो ही लम्बे डगो मेँ मेरे करीब पहुचा और बोतल मेरी आंखों के सामने लहराता हुआ बोला-----"इस को देखो, इसमें एक विशेष किस्म की नरभक्षी चिंटिया भरी हुई हैं । लाखों चीटियों । जो चन्द घन्टो में तुम जैसे बेबस किसी भी जीते-जागते इन्सान के समूचे जिस्म का मांस चट करके उसे कंकाल में तब्दील कर सकती हैं और ये खून की गन्ध से इन्सान की तरफ खिंचती है ।"

इस वार मैंने गौर से देखा ।

उस बोतल में वाकई रंगीन ढेर सारी चीटियों भरी हुई थीं, वे आकार में आम चीटियों से कई गुना बडी थी । वे बार वार अपना मुंह शीशी के भीतरी हिस्से पर, मार रही थीं और शीशी से बाहर निकलने के लिये बेताब थीं ।

ऐसी चीटियां मैं पहली बार देख रही थी । मैं मन हीँ मन सिहर-सी उठी ।

अपने किसी दुश्मन को बिलबिलाती मौत देने का वाकई उनके पास बहुत भयानक तरीका था ।

"तुम इस कमरे के फर्श पर पडी चीखोगी चिलाओगीं । अपनी जिन्दगी की भीख मागोगी, लेकिन ये सब सुनने बाला यहाँ कोई नहीं होगा ।" बरनाड के होठों पर जहरीली मुस्कान नाच

उठी…फिर चन्द घण्टों बाद तुम गुमनामी की मौत मर जाओगी ! और कोई जान भी नहीं पायेगा कि तुम अचानक दुनिया के तख्ते से कहां गायब हो गई? "

" तुमने तो मेरे लिये ऐसी मौत सोची है कि मुझ बदनसीब को कफ़न भी नसीब नहीं होगा ।" मैंने मासूमियत से कहा ।

"तुम्हें कफन की क्या जरूरत पडेगी । तुम तो मात्र हड्डियों का ढाचा रह जाओगी ।"

मैंने होठ मीच लिये ।

"चलो " वरनाड सैनिकों को सम्बोधित करता हुआ बोला-"कुछ देर बाद इस लड़की के कंकाल को उठाकर इमारत की छत पर फेक देना ।"

वे मुझे उस कमरे में बन्द करके चले गये । बरनाड बो बोतल भी अपने साथ ले गया था ।

मैं वहां अकेली रह गई ।

मेरी निगाहें दरवाजे पर स्थिर थी ।

वक्त सुस्त रफ्तार से गुजरता जा रहा था ।

अचानक ।

मैं चौंकी ।

दरवाजे के पल्लो के नीचे रिक्त स्थान से एकाएक चीटियों का रेला सरसराता हुआ भीतर दाखिल होने लगा था । उनका रुख मेरी तरफ ही था ।

वे चीटियां पानी के रेले की तरह भीतर घुसी चली आ रही थी ।

अब मुझें अपने बचाव में कुछ करना था । ।

सबसे पहले मुझे बंधनों से मुक्ति पानी थी । पलक झपकते ही मैं उठकर पंजों बल बैठ गई । मैं थोडी सी कोशिश के बाद अपने हाथ नितम्बो के नीचे से निकालकर चेहरे के सामने ले गई । पहले मैंने दांतों से अपने हाथों के बंधन खोले और फिर वडी फूर्ती से पैरों के बन्धन भी खोल डाले ।

अब मैं आजाद थी ।

चीटियों का रेला तीव्रता से मेरे करीब पहुंचता जा रहा था ।

वे तो जैसे मेरा मांस नोचने के लिये बैचेन थीं ।

सैनिकों ने मेरे कपड़े तो उतार दिये थे, लेकिन उन्होंने मेरे सैण्डिल नहीं उतारे थे । अब वो सैण्डिल ही मेरे लिये वरदान साबित होने वाले थे । मैंने बायें पैर के सैण्डिल की एडी को ढक्कन की तरह खोला और भीतर से खोखली एडी से दो कैप्यूल बरामद किये । मैंने एक कैप्सूल चीटियों के रेले की तरफ उछाल दिया ।

कैप्सूल रेले के ठीक सामने गिरकर फटा ।

दूसरे क्षण पीले रंग का जहरीला धुआं कमरे में फैल गया ।

मैंने तुरन्त अपनी सांस रोक ली । कुछ पलों बाद जब धुआं हटा तो चीटियों मर चुकी थीं और धुएं के प्रभाव के कारण बाहर से आने वाली चीटियों का रेला भी रूक चुका था । अब एक भी चींटी भीतर आती दिखाई नहीं दे रहीँ । मैंने बरनाड के खतरनाक इरादों पर पानी फेर दिया था ।

अब मुझे बरनाड के भीतर दाखिल होने का इन्तजार था ।

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तकरीबन तीन घंटे बाद दरवाजे के बाहर खटर-पटर की आवाज उत्पन्न हुई । 'म

मैं समझ गई कि बाहर से दरवाजा खोला जा रहा है ।

मैं उसी स्थिति में लेट गई, जिसमें वे लोग मुझे छोड़कर वहां से गये थे ।

निगाहें दरवाजे पर जमा दी थीं । दरवाजा खुला । अगले क्षण बरनाड ने भीतर कदम रखा । उसके पीछे वे चारों सेनिक भी थे ।

भीतर का नजारा देखकर वे जड होकर रह गये ।

"अ. . . अरे ।" एकाएक बरनाड के होठों से हैरत भरा स्वर निकला ------"सारी चीटियां मरी पडी है और यह सहीं-सलामत है । ये वच कैसे गई?"

मैं मन ही मन मुस्कुराई ।

उसी क्षण!

उसका रिवाल्वर वाला हाथ मेरे चेहरे के करीब आया । मुझें लगा कि मेरा खेल खत्म होने वाला है । मगर मैंने मौका ताड़कर अपने दांत उसकी कलाई में गड़ा दिये । वह बिलबिला उठा । बरनाड की उंगलियों की पकड़ रिवाल्वर पर ढीली पड़ गई थी ।

दूसरे क्षण रिवाल्वर मेरे हाथ में थी । मैंने उसकी गर्दन से अपनी एक बांह लपेट दी और दूसरे ही क्षण रिवाल्वर की नाल उसकी कनपटी से चिपक चुकी थी ।

"तुम वहुत ज्यादा उछलकूद कर चुकें कमाण्डर !" मैंने कहा--- " लेकिन तुम्हारी उछलकूद का क्या नतीजा निकला , तुम्हारी हर कोशिश नाकामयाब साबित हुई है ।"

वह अपने होठों पर जुबान फिराकर रह गया ।

" तुम मुझे मार नहीं सके बरनाड ।" मैं पुन बोली--"तुम मुझे मारने की अपनी इच्छा मन में लिये ऊपर पहुंच जाओगे ।"

कहने के साथ ही मैंने रिवाल्वर की नाल उसकी कनपटी से सटा दी ।

""त. ..तुम चाहती क्या हो?" उसने पूछा । ' .बरनाड की कांपती अन्दाज जता रही थी कि उसके हौंसले पस्त हो चुके हैं । किन्तु उसके चेहरे के भाव इस बात की चुगली खाते प्रतीत हो रहे थे कि वह भीतर-ही-भीतर बुरी तरह उबाल खाया हुआ है, अगर उसका वश चलता तो वह मुझें फोरन गोली मार देता ।

"मैँ तुमसे एक छोटी सी जानकारी चाहती हू ।" मैंने उत्तर दिया ।

"क्या जानकारी चाहती हो?"

"डगलस को किस जेल में रखा गया है?" मैंने पूछा ।

वो बुरी तरह चौका । इस बुरी तरह, मानो मैंने उसके सिर पर शक्तिशाली बम फोड दिया हो ।

"क.. .कौन हो तुम?" -वह मेरे जबाब को हजम करता हुआ बोला ।

उसका प्रश्न गोल करके मैंने रिवाल्वर की नाल उसके माथे के ठीक बीचों-बीच सटा दी,

,,,,,,,,,,,,,,, निकली--" ‘खैर' मत बताओ । इस बारे में तो मैं सेना के क्रिसी और आफिसर से भी मालूम कर लूंगी लेकिन ऊब तुम्हारी बीबी विधवा जरूर हो जायेगी और तुम्हारे बच्चे विना बाप के कहलाने लगेंगे । अव मैं ट्रेगर दबाने जा रहीँ हूं।"

बरऩाड के चेहरे का रंग साफ साफ उड़ गया । माथे पर पसीने की धाराएं फूट निकलीं । आँखे आतंक से फटती चली गईं ।

मैंने रिवाल्वर का कुत्ता खींचा । सन्नाटे में क्लिक की आवाज जोरों से गूंजी ।

 


"ग.. .गोली मत चलाना।" वह थूक निगलकर बोला ।

"क्यों न चलाऊ?"

"म मैँ तुम्हें सारी जानकारी देने के लिये तैयार हूं...लेकिन.....!

"लेकिन वेकिन कुछ नहीं, मुझे समस्त जानकारी चाहिए ।"

और फिर ।

बरनाड सब कुछ बताता चला गया ।

"और कोई सवाल?"

"नहीं ।"

"मैंने तुम्हरी सारे सवालों के जवाब दे दिये है , अब तो रिवाल्वर हटा लो ।" बरनाड बोला ।

मैंने वरनाड से जो पूछना था । पूछ लिया ।

अब वह मेरे किसी मतलब का नहीं रह गया था । अत: मैंने गिरगिट की तरह रंग बदला----"अब ये रिवाल्वर तुम्हारी मौत के बाद ही हटेगा कमाण्डर ।"

"मैं जानता था कि तुम्हारा आखिरी ,ज़वाब यही होने वाला है।"

"तो फिर मरने के लिये तैयार हो न कमाण्डर !"

किन्तु तभी ।

वह पट्ठा गजब कर गया । शायद बो मौत का डर ही था, जिसने उसमें इतना साहस भर दिया था कि पलक झपकते ही उसका हाथ मेरे रिवाल्वर वाले हाथ पर पड़ गया और उसके बूट की जबरदस्त ठोकर मेरे घुटने पर । हमला एकदम अप्रत्याशित था ।

रिवाल्वर मेरे हाथ से निकल गया और मैं उछलकर पीठ के बल फर्श पर गिरी थी ।

वह पलटकर दरवाजे की तरफ भाग छूटा ।

परन्तु भला मैं इतनी आसानी सें अपने शिकार को कहा छोडने वाली हूं ।

कमाण्डर तो मेरे लिये मुसीबतों के पहाड खडे कर सकता था ।

पलक झपकते ही मैं स्प्रिंग लगे खिलौने की तरह उछलकर खडी हो गई और करीब पड़ा रिवाल्वर उठा लिया । इससे पहले कि वह आगे वाले कमरे का दरवाजा पार कर पाता, मैंने ट्रेगर दबा दिया ।

धाय ।

हवा में सनसनाती गोली वरनाड की खोपडी के पूष्ट्रमाग में धंसी । वह फिरकनी की तरह घूमकर धड़ाम से फर्श पर गिरा । जिस्म को तेज झटका लगा फिर शांत हो गया । . ,

लाश में गोल हो चुका था वह । मैं सैनिकों की लाशों को फलांगती हुई दूसरे कमरे में पहुंची । कमरे में पहुंचकर मैँने सबसे पहला काम कपड़े पहनने का किया । मैं बातों में इस कदर उलझी हुई थी कि मुझे अपनी नग्नता का ध्यान ही 'नहीं रहा था ।

शीघ्र ही मैं कमरे से निकलकर राहदारी में बढ़ रही थी ।

और गड़बड़ हो गई।

जैसे ही मैंने उस इमारत के आयरन गेट से बाहर कदम रखा, वैसे ही मेरी नजर बाहर उपस्थित तीन सैनिकों पर पडी । उनमें से एक सेनिक तो वहीं था, जो कैप्टन हिलकाक के आवास पर अपने साथियों के साथ आ धमका था ।

""अ.. ..अरे !" मेरे ऊपर नजर पड़ते ही वो चीख उठा-"ये तो वहीँ लडकी है, जिसने कैप्टन की हत्या की थी । यह कमाण्डर के चंगुल से कैसे बच निकली?"

मेरे पास सोचने-समझने का जरा भी वक्त नहीं था । अत: मैंने आव देखा न ताव और एक क्षण भी व्यर्थ किये बगैर झुककर नाक की सीध में भाग छूटी ।

"पकड्रो!" कोई चीखा----"वो भाग रही है ।"

"पकडने की जरूरत नहीं है ।" इस बार वातावरण में दूसरे सैनिकों की चीख गूंजी-----"इस हरामजादी को गोलियों से भून दो ।"

और फिर!

पीछे से मुझ पर गोलियों बरसने लगी । गोलियों की आवाज़ के साथ भारी बूटों की आवाज भी वातावरण में गूंजती चली गई । बूटों की टक… टक से स्पष्ट था कि वे सैनिक मेरे पीछे लग चुके थे ।

मैं अपने ऊपर बरसी गोलियों से फिलहाल तो बच गई थी ।

"रुक जाओ ।" तीसरा सेनिक चेतावनी भरे स्वर में चीखा-"वरना बेमौत मारी जाओगी ।"

मेरे रुकने का तो सवाल ही नहीं था, उल्टे मेरे भागने की रफ्तार तेज हो गई थी । इस वक्त मैं जान छोडकर भाग रही थी । मेरे पीछे से लगातार मुझ पर गोलियों बरस रही थीं, लेकिन शायद ये मेरा भाग्य ही था कि क्या मजाल जो एक भी गोली मुझे छु पाई हो? वे तो मेरा पीछा छोड़ने वाले नहीं लग रहे थे ।

मगर ।

… मैं उनके हाथ आने वाली कहीं थी ।

मुझे पीछा छुड़ाना जरूरी था । दौडते-दौडते मैं पीछे भी देख लेती थी । अब पीछे से गोलियों नहीं चल रही थी -क्योंकि मेरे और सैनिकों के बीच काफी फासला पैदा हो गया था । अब सैनिकों ने सोच लिया होगा कि मुझ पर गोलियां बरसाना बेकार है । मगर वे भूतो की तरह मेरे पीछे जरूर लगे हुए थे ।

इधर मेरे सामने एक प्रॉब्लम ये थी कि मुझे डगलस को जेल से छुडाना था ।

मैंने जेल के सुरक्षा प्रबंधों पर गंभीरता से गौर किया था ।

एक-एक चीज पर बारीकी के साथ विचार कर चुकी थी, और काफी सोच विचार करने के बाद मैं एक ही नतीजे पर पहुची कि जेल के सुरक्षा प्रबंधों को तोड़कर डगलस को निकालना मंगल ग्रह पर पहुंचने से कम नहीं है ।

इस बीच मेरे जेहन में एक विचार और भी आया था कि अगर . . मैं किसी तरह मार्शल को अपने कब्जे में कर लूं तो मैं सेना से मार्शल के बदले डगलस की डिमांड कर सकती थी । मैंने डगलस को जेल से मुहाने और मार्शंल को अपने कब्जे में करने, अर्थात् दोनों स्थितियों पर गंभीरता से विचार किया । मुझे मार्शल को अपने कब्जे में करना जेल के सुरक्षा प्रबंधों को बेधने की उपेक्षा ज्यादा आसान लगा था । लेकिन उसे कब्जे में करने के लिये पहले मुझे सोल्जर तक पहुचना था और उस तक पहुंचना मेरे लिये आसान काम नहीं था । सोज्जर तक पहुंचने के लिये मुझें उसे अपने विश्वास में लेना जरूरी था । अब मेरे सामने सवाल ये था कि सोल्जर को अपने विश्वास में जैसे लिया जा सकता है? उलझन-पर-उलझन ।

मेरा सोचना जारी था ।

क्या मजाल इस बीच मेरे भागने की रफ्तार में बाल बराबर भी कमी आई हो ।

भारी बूटों की आवाजे अब पीछे छूटती जा रही थी, लेकिन इससे खतरा कम नहीं हुआ था । मुझे ऐसी जगह की तलाश थी, जहाँ मैं फौरी तोर पर पनाह ले सकती । दूर सामने जुगनुओं की तरह प्रकाश चमकता नजर आ रहा था । जाहिर था कि वहां कोई बस्ती थी।

मैंने उस बस्ती में पनाह लेने का निर्णय कर लिया । क्योकि इस वक्त और हालात में वापस क्लाइव के ठिकाने पर पहुचना बेहद मुश्किल काम था ।

..तभी ।

क्लाइव ।

यह नाम किसी घन्न की तेरह मेरे जेहन से टकराया था । क्लाइव राष्ट्रपति सर एडाल्फ के समर्थकों का मुखिया! इस नाम के जेहन में आते ही मेरा चेहरा हजार वाट के बल्ब की तरह चमक उठा । मैंने अपनी उलझन का समाधान तलाश कर लिया था । मेरी दौढ़ बदस्तूर जारी थी । मुझे अपने पीछे लगी मौत से पीछा भी तो छूड़ाना था ।।

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====

मैं उस बस्ती के किनारे स्थित एक मकान कै दरवाजे के सामने पहुचकर ठिठकी । इस वक्त उस पुराने से मकान का दरवाजा बंद था ।

सुबह का उजाला धीरे धीरे फैलने लगा था । किन्तु अभी तक उस बस्ती में जाग नहीं हुई थी । चारों तरफ कब्रिस्तान जैसी खामोशी ने अपने पांव पसार रखे थे ।

मैंने की दरवाजे पर दस्तक दी।

"कौन है ?! मेरे कानों से नारी कंठ से निकला अलसाया-सा स्वर टकराया ।

"दरवाजा खोलिये।"

दूसरे क्षण । मुझे दरवाजे की तरफ़ आती कदमों की आवाज सुनाई दी ।

मैंने गर्दन मोड़कर सतर्क निगाहों से उस तरफ देखा, जिधर से मैं भागती हुई आई थी । मैं तसल्ली कर लेना चाहती थी कि कहीं सैनिक पीछे तो नहीं आ रहे है किन्तु उस तरफ से मुझे कोई आता दिखाई नहीं दिया था ।

मैंने राहर्त की सांस ली ।

तभी दरवाजा खुला । दरवाजे के बीचों बीच एक औरत नजर आई ।

यह बेहद खूबसूरत थी । उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे आसमान से कोई परी उत्तर आई हो । उसकी उम्र पैंतीस साल के आस पास रहीं होगी, लेकिन वह तीस साल से ज्यादा की नहीं लग रही थी।

"क्या बात है?" औरत के पंखुड्रियों जैसे होंठ हिले ।

मेरा सम्मोहन टूटा ।

"अ .अगर कुछ देर के लिये मुझे अपने घर में पनाह दें तो आपकी वहुत मेहरबानी होगी । मैंने अपनी सांसों को संयत करते हुए कहा ।

"चक्कर क्या है ।" बह गौर से मेरा चेहरा देखती हुई बोली ।

"वो मेरी जान लेना चाहते हैं ।"

औरत हौले से चौंकी । फिर. वह फुर्ती से एक तरफ हटती हुई बोली--"जल्दी से अन्दर आ जाओ ।"

मै तीर की तरह भीतर दाखिल हुईं ।

औरत ने दरवाजा बंद करके सिटकनी चढाई फिर मुझे साथ आने का इशारा करती हुई पलटकर आगे बढ गई ।

मैं उसके पीछे चल पडी ।

अभी तक मुझे वहीं उस औरत के अलावा और कोई नजर नहीं आया था ।

वह मुझें लेकर एक कमरे में पहुची।

मैंने चारों तरफ निगाहें घुमाई ।

वह साफ सुथरा, सजा-संवरा एक कमरा था । उसकी सामने बालीगंज दीवार के साथ लकडी का एक तखत पड़ा हुआ था । कमरे के बीचों बीच एक पुरानी गोलाकार मेज के इर्दगिर्द चार कुर्सियां . पडी हुई थीं । सामने आल्टर पर इंसा मसीह की सूली पर सजी तस्वीर लगी थी । उसके दाये वायें दो मोमबत्तियों जल रही थीं । संसार को प्रकाश देने वाले प्रभु यीशू कै सामने उन मोमबत्तियों का प्रकाश फीका नजर जा रहा था ।

"बैठो ।" औरत ने एक कुर्सी की तरफ संकेत करते हुए कहा ।

मैंने आगे बढकर कुर्सी संभाल ली ।

"चिंता करने की जरूरत नहीं है ।" बह एक अन्य कुर्ती पर बैठती हुई बोली-" तुम अपना ही घर समझो । यहां तुम्हें किसी भी किस्म की दिक्कत नहीं होगी । जब तक तुम चाहो यहां ठहर सकती हो !"

 


औरत का अपनापन देखकर मैंने राहत की सांस ली

"क्या नाम है तुम्हारा?" उसने पूछा 1

" रीमा !"

" तुम इस मुल्क की तो नहीं लगती !"

" मै इंडियन हू ।"

"मडलैण्ड कैसे आई हो?"

"एक जरूरी काम से आई हूं ।" मैंने गोल-मोल जवाब दिया ।

"सैनिक तुम्हारे पीछे क्यों पड़े हैं?"

" भगवान जाने । मेँ एक जरूरी काम से जा रहीँ थी । अचानक तीन सैनिकों ने मुझे घेर लिया है मुझें उनसे बचने के लिये भागना पडा ।

मैंने उस औरत के सामने खुलना उचित नहीं समझा था । क्योकि मुझे उसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी । अत इतनी ज़ल्दी मैं उस पर विश्वास कैसे कर सकती थी ?

"तुम्हारा क्या नाम है?" मैंने पूछा ।

" मारिया ।" औरत ने अपना नाम बताया--" मै यहाँ के अस्पताल में नर्स हू।"

"" तुम्हारे अलावा यहा और कोई दिखाई नहीं दे रहा?"

" अकेली रहती हू ।"

'" तुम्हारे बच्चे ।"

" शादी ही नहीं की, तो बच्चे कहां से आयेंगे?" मारिया ने मुस्कुराकर कहा ।

"पूछ सकती हू शादी क्यों नहीं हुई ?"

"बस यूंही ।" वो हंसी--"मैं एक आजाद पंछी जैसी जिन्दगी जीने में विश्वास रखती हूं। घर-गृहस्थी के बंधनों में बंधकर नहीं । लेकिन अब नहीं लगता कि यहां कोई आजादी से सांस ले पायेगा ।"

"क्यों?" मैंने सवाल किया ।

"जब इस मुल्क की सत्ता की बागडोर राष्ट्रपति सर एडलॉफ के हाथों में थी तो आराम से दो वक्त की रोटियों मिल रही थीं । जिंदगी मजे से गुजर रही थी । हर नागरिक खुश था । मुल्क में अमन-चैन था ।" मारिया एक सर्द सांस छोड़ती हुई बोली ----"लेकिन जव से सेना ने विदेशी ताकत की शह पर राष्ट्रपति का तख्ता पलटकर सत्ता अपने हाथ में ली है तब से हालत बद से बदतर हो गये हैं ! एक वक्त की रोटी भी मयस्सर नहीं हो रही है, उधर विदेशी ताकत ने अपने एक कठपुतले को यहां का नया राष्ट्रपति बना दिया है, जो इंसान की खाल में छिपा एक भेडिया है । जिसे सिर्फ सत्ता की भूख है !

हालांकि इस देश में जब-जब सेना ने सत्ता पर काबिज होने की कोशिश की है, तब-तब सेना का शासक कूते से भी बुरी मौत मारा गया, इतिहास इस बात का गवाह है, वो तानाशाह भी एक दिन जरूर कुत्ते की मौत मारा जायेगा ।"

कहते वक्त मारिया के चेहरे पर नफरत-ही-नफरत फैली नजर आ रही थी ।

"इस मुल्क की जनता के भीतर उस तानाशाह के खिलाफ बगावत की चिंगारी सुलग चुकी है । धीरे धीरे वो चिंगारी एक दिन बारूद का रूप धारण कर लेगी और जब वह बारूद फ़टेगा तो उस तानाशाह के तो चिथड़े उड जायेंगे और इस काम को अंजाम देंगे राष्ट्रपति के समर्थक जिन्होंने उस तानाशाह शासक के खिलाफ जंग का बिगुल बजा दिया है. इस मुल्क की औरते भी पीछे नहीं रहेगी । हम औरतों के भीतर भी अपनी मिट्टी के लिये वफादारी कूट कूटकर भरी है।"

मै मारिया की बातों से प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकी थी--"जिस मुल्क में तुम जैसी नारियों हों मारिया । वो देश गुलाम कैसे रह सकता है? मेरा विश्वास है, एक दिन तुम जैसी औरतें ही इस मुलक को गुलामी की जंजीरों से छुटकारा दिलाकर रहेंगी ।"

" काश ! ऐसा हो जाये तो फिर वहीँ खुशी भरे दिन लौटकर आ जायेंगे ।"

"वो दिन जरूर लोटकर जायेंगे. ।"

तभी!

दरबाजे पर दस्तक पडी । मैं चौंकी । मारिया भी हड़बड़ा-सी गई ।

"कौन हो सकता है?" मेरी संशक निगाहें मारिया के चेहरे पर स्थिर होकर रह गई ।

" क्या मालूम ।"

"जाकर देखो ।"

तभी दरवाजे पर पुन: दस्तक यहीं ।

"कौन है?" मारिया ने पूछा ।

"हम सेना कै लोग हैँ ।" बाहर से कठोर स्वर उभरा-----"दरवाजा खोलो ।"

मुझे जबरदस्त झटका लगा ।

" क्या बात है ?"

मारिया का लहजा तीखा सा उठा था । क्या मजाल जो उसके चेहरे पर घबराहट का एक भी भाव उभरा हो ।

"दरवाजा खोलो ।" बाहर से कहा गया ।

"क्यों?"

"सवाल मत करो ।" इस बार दूसरे सैनिक का कठोर स्वर मेरे कानों से टकराया----"तुम से जो कहा गया है वैसा ही करो, वर्ना दरवाजा तोड़ दिया जायेगा."

"ठहरो ।" जवाब में मारिया ने कहा…"मैं दरवाजा खोलती हूं।" साथ ही उसने कुर्सी छोड दी ।

" ऐसा लगता है कि वे लोग मेरे ही चक्कर में आये हैं ।" मैं फुसफुसाई ।

"घबराओ मत रीमां ।" वह दिलेरी का परिचय देती हुई बोली-"मेरे होते हुए ये सैनिक तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते । मैंने तुम्हें अपने यहां पनाह दी है । तुम्हारी रक्षा करना मेरा कर्त्तव्य बनता है? मैं अपनी जान पर खेल जाऊंगी, लेकिन तुम पर आँच नही जाने दूंगी ।"

मैं मारिया को देखती रह गई । मुझ पर कुछ कहते नहीं बना ।

सच तो ये था कि उसका अपनापन देखकर मैं उससे प्रभावित हुए बगैर न रह सकी थी ।

"तुम बराबर वाले कमरे में चलीं जाओ । जब तक मैं न कहू तब तक तुम कमरे से बाहर नहीं निकलना ।" वह बोली--"जल्दी से उठो और उस कमरे में जाकर छिप जाओ । मैं इन सैनिकों को संभालती हू।"

पलक झपकते ही मैंने कुर्सी छोड़ दी और दरवाजे की तरफ झपटी ।

मैं बराबर बाले कमरे में दाखिल हुई । कमरा खाली पड़ा हुआ था । सामान के नाम पर उंसमेँ कुछ भी नहीं था । मैंने दरवाजा बंद करके सिटकनी चढाई और दरवाजे से पीठ सटाकर खडी हो गई । मैं हर परिस्थिति से निबटने के लिये एकदम तैयार थी । मेरे कान राडार वने हुए थे ।

"बोलो ।" एक पल बाद मारिया का स्वर कानों से कि टकराया-"क्या बात है?"

"हमें एक लडकी की तलाश है ।" बाहर से कहा गया--"तुम्हारे मंकान में तो नहीं आइ ।"

साफ था कि वे आवाज किसी सैनिक की ही थी ।

"तुम किस लड़की की बात कर रहे हो?" मारिया का स्वर ।

प्रत्युत्तर मे दूसरे सेनिक ने मेरा हुलिया बता दिया ।

"मेरे मकान में वो लडकी क्यों आयेगी ।" मुझे मारिया का स्वर सुनाई दिया-, "मैं तो सोई पडी थी । दरवाजे पर दस्तक पडी तो मेरी नीद टूटी और मैंने दरवाजा खोल दिया ।"

-"वो आई तो इसी तरफ़ है ।"

"जब तुम लोग कह रहे हो तो ज़रूर लई होगी । लेकिन मेरे यहां नहीं आई, अगर तुम लोगों को मेरी बात पर विश्वास नहीं है तो मेरे मकान की तलाशी ले सकते हो, लेकिन वो लडकी है कौन? क्या जुर्म क्रिया है उसने?"

"वो एक खतरनाक किस्म की लडकी है । उसने सेना के दो ऑफिसरों की हत्या कर दी है ।" इस बार मुझे तीसरे सैनिक का स्वर सुनाई दिया---"बो किसी दुश्मन देश की जासूस है ।"

"फिर तो उसका पकड़ा जाना वहुत जरुरी है ।"

मैं उनके वार्तालाप का एकएक शब्द सुन रही थी ।

"इस मकान की तलाशी लो ।"

"तुम लोग शौक से मेरे मकान की तलाशी ले सकते हो । मैं तो पहले ही तलाशी लेने के लिये कह चुकी हू। भीतर आओ ।"

"अगर वो लड़की इस मकान में छिपी होती तो ये डंके की चोट पर तलाशी लेने के लिये न कहती, इसके मकान की तलाशी लेना वक्त बरबाद करना है ।"

"सुनो । हमने तुम्हें उस लड़की का हुलिया बता दिया है, अगर वो लड़की तुम्हे कहीं दिखाई दे अथवा तुम्हारे मकान पर पनाह मांगने आये तो हमें फौरन खबर करना ।"

"ठीक है ।" उसके बाद कोई आवाज सुनाई नहीं दी । "

जाहिर था कि सैनिक चले गये थे । इसका अंदाजा मैंने इस बात से लगाया था कि पल भर बाद ही दरवाजा बंद होने की आवाज सुनाई दी थी ।

मारिया ने बडी सफाई से सैनिकों को टाल दिया था । मै पुन: मुसीबत में फंसने से बाल-बाल बची थी । अब मारिया पर मेरा विश्वास जाग गया था । इधर मैंने कमरे से बाहर निकलने का प्रयास नहीं क्रिया था । मुझे मारिया के इशारे का इंतजार था ।

"बाहर जा जाओ रीमा." तभी मारिया का स्वर सुनाई दिया-" सैनिक चले गये हैं ।"

मैंने सिटकनी गिराकर दरवाजा खोला और कमरे से बाहर निकल आई ।

=====

=====

मारिया मुझे लेकर पहले वाले कमरे में पहुची । "बैठौ रीमा ।" वह बोली ।

मैंने पहले वाली कुर्सी संभाले ली ।

मारिया भी कुर्ती पर बैठ चुकी थी।

मैंने अपनी निगाहें मारिया के चेहरे पर टिका दीं जिस पर गंभीरता और सोच के मिले-जुले भाव कुण्डली मारे नजर आ रहे । हमारे मध्य खामोशी थी ।

जब दो खामोशी मुझे खलने लगी तो मैंने उसे शहीद किया-"क्या सोच रही हो मारिया?"

मारिया जैसे मीलों से वापस लोटकर आई हो । "मैं सोच रही थी कि क्या सैनिकों के अत्याचारों का कोई अंत भी है । उनके जुल्मों की कोई सीमा भी है ।" मारिया ने पहलू बदला----" निर्दोष लोगों को बेरहमी के साथ मौत के घाट उतारा जा रहा है । औरतों को गोलियों से उडाया जा रहा है और सर एडलॉंफ के समर्थकों को जेल की सलाखों के पीछे ठूंसा जा रहा है । उन पर मनमाने जुल्म हो रहे हैं । आज मुल्क की जनता त्राहि…त्राहि कर रहीँ

है।हर आदमी मौत के साये मे सासे ले रहा है ।

।वे इसान नहीं, खूनी भेड्रिये हैं, जो सत्ता की खातिर इंसानी खूनं से अपने हाथ रंग रहे हैं ।"

"हमारे भारत में कहते हैँ, जब-जब भी धरती पर जुल्म होता है ह निर्दोषों का खून बहाया जाता है, तब-तब ईश्वर इस धरती पर जन्म अवश्य लेता है । कभी ईसा । कभी मुहम्मद । तो कभी कृष्ण अथवा राम बनकर उस चीखती-कराहती मानवता के जख्मो पर मरहम रखता है । उन्हें अपना संरक्षण प्रदान करता है । घबराओ मत, . इन लोगों के जुल्मों का अन्त भी अब ज्यादा दूर नहीं है । कोई मसीहा आयेगा. . .जरूर जायेगा ।"

"एक बात बताओं रीमा ।"

"क्या ?"

"जो सैनिक यहीं आये ये, वे कह रहे थे कि तुम एक ख़तरनाकं जासूस हो ।"

मै मुस्कराई

" क्या सच हे रीमा?"

" एकदम सच है । मेरा नाम रीमा भारती है और मैं भारत की महत्वपूर्ण जासूसी संस्था साई०एस०सी० की जासूस हूं।"

"लेकिन तुमने मुझे ये बात पहले क्यों नहीं बताई?"

"क्योंकि एक जासूस इतनी आसानी से अपना भेद नहीं खोलता और एक अपरिचित के सामने तो बिल्कुल भी नहीं । एक जासूस अपनी परछाईं पर भी विश्वास नहीं करता ।" मैंने कहा---" हम जासूसों के सैकडों दुश्मन होते हैं । न जाने कब, कौन क्या चाल चल . . जाये?"

"अब तुमने मुझे क्यों बता दिया?"

"क्योकि अब मुझे तुम पर विश्वास हो गया है । जिस तरह से तुमने मुझे सैनिकों से बचाया है । इससे ये साबित हो जाता है कि तुम मेरी हमदर्द हो ! तुम्हारे सीने में भी इस सैनिक शासन के खिलाफ बगावत की आग सुलग रही है ।"

"मेरी समझ में एक बात नहीं अर रही है ऱीमा ।"

"वो क्या?"

" तुम एक हिन्दुस्तांनी जासूस हो । तुम्हें यहां की सेना के दो-आफिसरों की हत्या करने की क्या जरूरत आ पडी थी?"

"मैंने अपने मिशन के तहत ऐसा क्रिया है ।"

"म. . .मतलब?" वह चौकी ।

मैंने उसे मतलब समझाया।

सुनकर मारिया उछल पडी ।

"तो तुम उन दरिब्दों का संहार करने के लिये चण्डी बनकर हिन्दुस्तान से मडलैण्ड आई हो?"

" जैसा तुम समझो ।" मेरे होठों पर विशिष्टि मुस्कान थिरक उठी ।

"लेकिन क्या तुम अकेली ये पहाड़ जैसा काम कर पाओगी ?"

" जरूर कर पाऊँगी ।" मेरे लहजे में दृढ़ता थी… "जव इंसान .में कुछ कर गुजरने का जज्बा और हौंसला हो तो पहाड जैसा काम

भी राई के दाने के बराबर लगने लगता है । मैं हिन्दुस्तान से जिस मिशन को लेकर आई हूं उसमें कामयाब होकर ही वापस लौटूगी ।"

किन्तु मारिया चेहरे पर विश्वास का भाव न आया ।

" 'शायद' तुम्हें मेरी बात पर यकीन नहीं हो रहा है मारिया ।"

"यकीन करने बाली बात ही नहीं है ।" वह बोली--"तुम हजारों सैनिकों से अकेली कैसे लोहा ले सकोगी सर एडलॉफ के हजारों समर्थक तो अभी तक सैनिक्रो का बाल भी बाका नहीं कर पाये । उनमें से कुछ तो मारे गये, बचे हुओं को जेल में ठूंस दिया गया है !"

मेरे होठों पर फैली मुस्कानं गहरी हो उठी---" किसी विशाल पेड़ को गिराना हो तो उसकी शाखाएं काटने से काम नहीं चलता मारिया । शाखाएं तो दोबारा उग आती हैं । अगर पेड़ की जडे काट दी जाये तो यह भरभराकर गिर पड़ता है ।"

"मैं कुछ समझी नहीं रीमा । मुझे खुलकर बताओ कि तुम्हारे कहने का मतलब क्या है?"

"तुम मतलब समझ कर क्या करोगी? ये जरा लंबी… और पेचदार बातें हैं । तुम इतना समझ लो कि जल्दी ही इस मुल्क में सबकुछ ठीक हो जायेगा और जनता फिर खुली हवा में सांस ले

सकेगी ।"

"और ये करिश्मा तुम करोगी !"

"मैंने इसी उम्मीद पर इस मिशन में हाथ डाला है ।"

"भगवान करे कि इस काम में तुम्हें सफलता हासिल हो, अगर मेरी किसी तरह की मदद की ज़रूरत हो तो बेझिझक बता दो ।"

"मुझे तुम्हारी मदद की नहीं, दुआओं की ज़रूरत है ।"

"दुआएं तो तुम्हारे साथ हमेशा ऱहेगी रीमा ।"

" मुझे अपने यहां पनाह दी । मुझे सैनिकों से बचाया । इसके तुम्हारी शुक्रगुजार हु मारिया । अब मैं चलती हूं मुझे इजाजत दो ।"

"कहां जाओगी तुम?" वह सवालिया निगाहों से मेरी तरफ देखती हुई बोली ।

"अपने मिशन पर आगे काम करूंगी?"

"बस्ती में सैनिक घूम रहे हैं । वे तो पहले ही तुम्हारी जान के दुश्मन बने हुए हैं । तुम्हारा यहाँ से बाहर कदम रखना खतरनाक हो सकता है । जब तक बस्ती का मांहौल सामान्य नहीं हो जाता तब तक तुम यहां रुको तो बेहतर होगा ।"

 
"मैं चुहिया की तरह विल में छिपकर बैठने वाली नहीं हूँ अगर मैं यहां छिपी बैठी रही तो मेरा मिशन केसे पूरा होगा? जब मैं अपने मिशन पर निकलती हूं तो सिर पर कफ़न बांधकर निकलती हूं । मैंने खतरों से डरना नहीं सीखा । खतरों से खेलना मेरा, शौक है !"

" हिम्मत वाली हो?" " 'प्रत्यूत्तर में मैं मुस्कूरा कर रह गई।

मारीया ने मेरी हिम्मत देखी ही कहां थी, अगर वह मेरी हिम्मत देख लेती तो दांतों तले ऊंगली दबाकर रह जाती । मेरी हिम्मत के सामने तो बड़े बड़े सूरमा धाराशायी हो चुके हैं ।"

" अगर तुम जाना ही चाहती हो तो भी कुछ देर यहां आराम कर लो । मै बस्ती का मुआयना करके आती हूँ । वापस लौटकर तुम्हें बाहर के हालातों के बारे में बता दूंगीं । उसके बाद तुम खुद फैसला कर लेना कि तुम्हें क्या करना है तो कम-से-कम तुम्हें आगे के हालात तो मालूम होने चाहियें ।"

मारिया की बात में वजन था ।"

"ठीक है ।" मैं बोली---" बाहर के हालात-मालूम करके आओं । तब तक मैं आराम करती हूँ लेकिन जल्दी लोटकर आना । मुझे ज्यादा इंतजार न करना पड़े ।"

"तुम फिक्र मत करों । मैं यूं गई और यूं आई । मैं बाहर के दरबाजे पर ताला लगाकर जाऊंगी । ताकि तुम सुरक्षित रह सको ।"

"ठीक हे।तुम जाओ।"

मारिया उठकर चली गई । उसकी तरफ से किसी भी तरह का खतरा नहीं था । अतः मैं कुर्सी त्याग कर उठी और तख्त पर लेट गई ।

मैं थकी हुई थी । मुझे लेटने से काफी आराम मिला था ।

जाने कब मेरी आंखें झपक गई थीं । मुझे पता ही नहीं चला था ।

=====

=====

सुबह को मारिया से बाहर के हालात का पता चलने के पश्चात् ।

मैं आश्वस्त होकर बाहर निकली ।

बस्ती से निकलने के कुछ देर बाद मैं ठिठकी । मकानों का सिलसिला खत्म हो चुका था । इस वक्त में जिस मकान की छत पर खडी थी उससे दूर तक खुली जगह नजर आ रही थी ।

मैंने सतर्क निगाहों से आसपास का मुआयना क्रिया ।

सन्नाटा पूर्ववत् था ।

आसपास मुझे किसी इंसान के दर्शन नहीं हुए थे । मैंने राहत की सांस ली । हालात मेरे अनुकूल थे ।

मैंने दूसरी तरफ झाका ।

एक रेन वाटर पाइप छत से नीचे तक चला गया था । पलक झपकते ही मैं मुंडेर पर बैठ, गई, फिर मैंने दोनों हाथों से पाइप थामा और पाइप के सहारे बन्दरों की फुर्ती से नीचे उतरती चली गई ।

एक पल बाद मैंने पाइप छोड़ दिया' । धप्प ।

ये हल्की सी आवाज मेरे कदमों के कच्ची जमीन पर टकराने से हुई थी । क्षण भर के लिये सन्नाटा भंग हुआ था, फिर पूर्ववत् अपने पांव पसार दिये थे ।

तकरीबन दस मिनट बाद मैं सडक-पर पहुंचकर ठिठकी ।

बस्ती पीछे छूट चुकी थी ।

मेरी निगाहें सढ़क के किनारे लगे पत्थर पर स्थिर होकर रह गई, जिस पर स्याह रंग से लिखा था-विंगस्टन चार किलोमीटर ।

मेरे होठों से सर्द सांस निकल गई ।

मुझे तो उम्मीद ही नहीं थी कि कमाण्डर की हत्या करने के बाद मैं इतनी आगे निकल गई थी । रात का वक्त था । सेनिक प्रेत की तरह मेरे पीछे लगे हुए थे ।

मुझे तो उस वक्त सैनिकों से पीछा छुड़ाना था और मैं प्राण छोड़कर भाग रही थी । मुझे इस बात से काया लेना था कि मैं कितनी दूर तक भागी थी?

बहरहाल मुझे विंगस्टन पहुंचना ही था । पैदल चलना मेरे लिये खतरे का सौदा था ।

रास्ते में मेरा सामना सैनिकों से हो सकता था।

वो स्थिति मेरे लिये खतरनाक हो जाती । अत: मैंने लिफ्ट की तलाश में सड़क पर नजर डाली, किन्तु फिलहाल मुझे कोई वाहन आता नजर नहीं आया था ।

सड़क विधवा की मांग की तरह सूनी पडी थी ।

मैं किसी वाहन के आने का इंतजार करने लगी । .

सड़क पर पहुंचकर मेंने सबसे पहले अपने मेकअप से निजात पाई थी । अब मैं अपने असली रूप सें थी । जरुर मुझे कोई सैनिक देख लेता, वो सेनिक, जिससे मेरे सामना हो चुका था, तो उसके लिये मुझे पहचान लेना कठिन ही नहीं असम्भव होता ।

मुझे लिफ्ट के लिये ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा था । मुझे बस्ती की तरफ से एक कार आती दिखाई दी ।

मैं तुरंत सड़क के बीब पहुच गई और हाथ उठाकर कार को रुकने का संकेत करने लगी ।

कुछ पलों बाद कार मेरे करीब आकर रुकी । उसकी ड्राइविंग सीट पर एक नौजवान बैठा था । उसने खिड़की से सिर बाहर निकाल कर प्रश्न भरी निगांहों से मेरी तरफ देखा ।

"आप कहां तक जा रहे हैं?" मैंने पूछा ।

"मैं बुडैल जा रहा हूं ।" उसने उत्तर दिया-"बात क्या है?"

" मुझे विंगस्टन जाना है ।" मैं मुस्कुराई-"अगर आप मुझे लिपट दे दे तो वहीं मेहरबानी होगी ।"

" जरूर ।"-वह हाथ बढाकर दूसरी तरफ़ वाला गेट खोलता हुआ बोला---" विंगस्टन होकर ही निकलूंगा । बैठो ।"

ये मेरी दिलकश मुस्कान का ही जादू था कि नौजवान ने तुरंत लिफ्ट के लिये हा कह दी थी ।

मैं घूमकर करके दूसरी तरफ पहुंची और युवक के बगल वाली सीट पर बैठकर दरवाजा बंद कर लिया ।

युवक ने तुरंत कार आगे वढा दी । फिर मेरी तरफ देखते हुए पूछा…"आप इस मुल्क की तो नहीं लगतीं ।"

"आपने कैसे पहचाना ?"

"आपका चेहरा बता रहा है ।"

"'आपने ठीक पहचाना । मैं इण्डियन हू।"

"म. . .मगर इस उजाड जगह पर आप क्या का रही थीं?"

मैं ज़वाब के लिये तैयार थी बोली-""द्ररअसल मैं एडवेंचर की शौकीन हूं।"

" एडवेंचर की शौक्रीन! "

" हां! मैं नई-नई चीजों की जानकारी हासिल करने के लिये एक देशं से दूसरे देश की यात्रा करती रहती हूं। मैं एडवेंचर पर एक पुस्तक लिखना चाहती हूं।" मैंने सरासर झूठ बोला ।

" इसका मतलब है कि आप लेखिका भी है ।"

"ऐसा ही समझ लो ।"

"क्या नाम है आपका ?"

यह पट्ठा तो मेरे गले ही पढ़ गया था । मैं मन-ही-मन झुंझला उठी । फिर बोली- मेरा नाम प्रेरणा है । प्रेरणा शर्मा ।"

"आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई । मैं जिदगी में पहली बार किसी लेखिका को देख रहा हूं।"

मैं खामोश हो गई।

वह भी खामोशी से कार ड्राइव करने लगा ।

विंगस्टन करीब आता जा रहा था ।

" अपने दाईं तरफ देखो प्रेरणा।" वह बोला ।

मैंने दाई तरफ नजरें घुमाई, उस तरफ विशाल खण्डहर था, जो तकरीबन दो किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला हुआ था ।

"ये जो खण्डहर आप देख रही हैं । अपने मे एक इतिहास समेटे हुए है । इस इतिहास से वहुत कम लोग परिचित होंगे, अगर आप इन खण्डहरों के बारे में जानकारी हासिल करें तो आपको अपनी किताब के लिये काफी मसाला मिल जायेगा !"

" गुड फिर तो मैं इन खण्डहरों को अवश्य देखना चाहूगी ।"

मैंने युवक का मन रखने के लिये ऐसा कह दिया था । भला मेरी उस खण्डहर का इतिहास जानने में क्या दिलचस्पी हो सकती थी ?

"अगर आप कहें तो आपको उन खण्डहरों का इतिहास बता सकता हूं । मै आपके लिये गाइड बन सकता हूं।"

"आप बडे दिलचस्प हैं मिस्टर. . . ।"

"मेरे नाम किंग्ले है ।"

"मिस्टर , किंग्ले अगर आप मुझे खण्डहरों का इतिहास बता , देगे तो सारा सस्पेंस खत्म हो जायेगा ।" मैंने कहा----"मैं आज़ शाम खुद जाकर इन खण्डहरों को देखूंगी ।"

"आपकी जैसी मर्जी ।" फिर वह कुछ नहीं बोला । मैंने भी बोलना उचित नहीं समझा । मैं जानती थी, अगर मेंने कुछ कहा तो बातों का सिलसिला आगे बढेगा । वह मुझसे तरह-तरह सवाल करेगा । मेरी खूबसूरती के कसीदे गड़ेगो ।

मैंने कनखियों से उसकी तरफ देखा, उसकी निगाह रह-रह कर मेरे चेहरे पर फिसल जाती थी ।

"सामने देखो मिस्टर किंग्ले ।" मैं बोल उठी-"एँक्सीडेट हो किं जाऐगा ।"

किंग्ले यूं हड़बड़ाया जैसे किसी चोर को रंगे हाथों चोरी करते हुए पकड़ लिया जाता है । फिर उसने अपनी निगाहें सामने सड़क पर स्थिर कर दीं । एकाएक मेरा दम खुश्क हो गया । सामने बैरियर था ।

इस वत्त बैरियर पर एक आर्मी आफिसर के अलावा पाच छः सैनिक खड़े नजर आ रहे थे।

सभी सैनिक हथियारों से लेस थे ।

सैनिक शहर में दाखिल होने वाले हर वाहन की तलाशी ले रहे थे । मैंने तुरंत अंदाजा लगा लिया कि सेनिक मेरी ही फिराक में हैं । जाहिर था कि कमाण्डर बरनाड की हत्या की खबर सेना के आफिसरों को मिल चुकी थी ।

कार बैरियर के करीब पहुंचती जा रही थी ।

अब मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा था ।

किन्तु मैंने अपने, चेहरे पर घबराहट का कोई भाव उभरने नहीं दिया था । मैंने ये सोचकर सब कर लिया था कि जो होगा देखा जायेगा ।

"बैरियर गिरा हुआ है । यहां सेनिक मौजूद और वे शहर में दाखिल होने वाले हर बाहन की तलाशी ले रहे है ।" चकराया-सा बोला किंग्ले-----जरूर कोई गड़बड़ है ।"

"क्या गड़बड़ हो सकतीं हैं?"

"‘आजकल तो सेना का एक ही टार्गेट है, सर एडलॉफ के समर्थक ।" किंग्ले ने बताया---"जिन्हें दबोचने के लिये ये लोग कोई भी नैतिक अनैतिक तरीका अपनाने से गुरेज नहीं करते । शायद यहा भी ये लोग इसी फिराक मे मौजूद है ।

र्किग्ले ने कार बेरियर के करीब ले जाकर रोक दी । मगर उसका इंजन चालु रखा।

दो सैनिक-कार की तरफ बढे।

क्या मजाल जो मेरे चेहरे पर किसी तरह का भाव उभरा हो ।

. दोनों सेनिक कार के करीब पहुचे । उनमें से एक ड्राइविंग डोर की तरफ खड़ा था और दूसरा मेरी बगल वाली खिड़की के करीब । उसने अपनी निगाहें मेरे चेहरे पर गड़ा-सी दी थीं ।

"कौन हो तुम?" सैनिक ने सीधा मुझसे सवाल क्रिया ।

"ये एक लेखिका है । " जंबाब किंग्ले ने दिया…"एडवेंचर की है शौकीन है । देश-देश घूमकर उन जगहों पर शोध कर रही हैं जिनका .… इतिहास में कोई उल्लेख नहीं है ।"

" तुम इस लडकी के बारे में इतना कुछ कैसे जानते हो?" सैनिक ने अपनी निगाहें मेरे चेहरे पर से हटाकर र्किग्ले को घूरा ।

"ये मेरी जान-पहचान वाली है । लेकिन तुम इसकै बारे में क्यों पूछ रहे हो?"

" दरअसल सेना को एक ऐसी ही जवान ओर खूबसूरत युवती की तलाश है । वो एक खतरनाक जासूस है और दो सेनिक आफिसरों के अलावा कई सैनिकों की हत्या करके भागी है ।"

"वया मैं तुम्हें वो लड़की लगती हूं?" मैंने होंठ खोले ।

सैनिक मेरे सवाल का जबाब देने के बजाये र्किग्ले से मुखातिब हुआ-" तो ये लडकी तुम्हारी जान-पहचान वाली है मिस्टर-।"

"यस ।"

"तुम्हारा नाम?"

" 'र्किग्ले ।"

"अपना पता बताओं ।"

किंग्ले ने सेनिक को अपना पता बता दिया ।

"इस कार को जाने दो ।" सेनिक बैरियर के करीब खड़े अपने साथियों को सम्बोधित करके बोला ।

बैरियर पर मौजूद सैनिकों ने तुरंत बैरियर उठा दिया ।

किंग्ले ने कार आगे बढा दी ।

र्किग्ले मेरे लिये काफी मददगार साबित हुआ था । न जाने सैनिक मुझसे क्या-क्या सवाल करते? अगर र्किग्ले ने सैनिक को बता दिया होता कि मैंने बस्ती के पास से उसकी कार में लिफ्ट ली है तो उन्हें मुझ पर शक हो जाना लाजिमी था । हो सकता था कि मुझे कार से नीचे उतार लिया जाता ।

कार वेरियर पार करके सडक पर दौडती चली गई । मगर सैनिकों के फरिश्तों तक को भी पता नहीं चल पाया था कि मैं वही युवती हू जिस की उन्हें तलाश है । मैं उनकी नाक के नीचे से सुरक्षित निकल गई थी ।

मैंने कनखियों से किंग्ले का चेहरा देखा । उसके चेहरे पर सोच के गहरे भाव थे । कदाचित् वह मेरे बारे में ही सोच रहा था ।

"मिस प्रेरणा?" एकाएक किंग्ले बोल उठा ।

"यस ।"

"कहीँ ऐसा तो नहीं कि आप मुझसे कुछ छिपा रहीँ हों?"

में धक् से रह गई ।

मुझे उससे ऐसी बात की उम्मीद ही नहीं थी ।

फिर भी बोली--, "मैँ भला आपसे क्या छिपाऊंगी ?"

"कहीं आप ही तो वो लडकी नहीं हैं, जिसकी सैनिकों को तलाश है ।"

मेरा दिल जोरो से धड़क उठा । मगर मैं अपने आपको संभाले कह उठी-----"अगर मैं वही लडकी होती तो सैनिक मुझे पहचान नहीं लेते और इस वत्त मेरे साथ-साथ आप भी सैनिकों के चंगुल में होते !!"

"ये बात तो है ।"

"और सबसे बडी बात तो ये है कि मैं आपको इतनी दिलेर लगती हूँ कि सेना के दो आफिसरों और कई सैनिकों की हत्या कर सकूं । "
 
वह चुप रहा । लेकिन उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि मुझे लेकर उसके दिमाग में कहीं-न-कहीं कुछ जरुर चल रहा है । अब कार शहर में दाखिल हो चुकी थी ।

"बस यहीं रोक दो ।"

किग्ले ने कार सडक के किनारे रोक दी ।

मैं अपनी खिड़की खोलकर नीचे उतरी, फिर दरवाजा बँद करती हुई बोली--"आपका बहुत्-वहुत शुक्रिया मिस्टर र्किग्ले ।"

वह धीरे से सिर हिलाकर रह गया ।

मैंने उसके चेहरे के भावों से साफ-साफ महसूस किया था कि वह अभी तक भी अपने सोचों के दायरे से बाहर नहीं निकल पाया था । मैं शर्तं लगाकर कह सकती थी कि मैंने अपने बारे में किंग्ले को जो कुछ बताया था । वो अब उसके गले से नीचे नहीं उतर रहा था ।

और फिर . , …

उसके यहाँ से रुख्सत होने तक मैं वहीं खडी रही । तदुपरान्त मैंने किसी पी०सी०ओ० की तलाश में दायें-बायेँ नजरे घुमाई । सडक के दाई तरफ चंद मीटर के फासले पर मुझे एक पी०सी०ओ० नजर आया, जिसके कांचयुक्त स्पिग वाले दरवाजे पर सुर्ख रंग से मैंरीना टेलीकॉम सेन्टर लिखा था ।

मैंने पी०सी०ओ० की तंरफ कदम बढा दिये । सड़क पर कई सेनिक गश्त लगा रहे थे । मैं चेहरे पर से लापरवाह नजर आ रहीं थी, किन्तु मन -ही-मन च वेहद सतर्क थी ।

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कुछ पलो बाद मैं पी०सी०ओ० का दरवाजा धकेलकर भीतर दाखिल हुई । सामने सनमाइक युक्त मेज के पीछे ऐक बीस साल के' आसपास पहुंची बेहद हसीन युवती कुर्सी पर मोजूद थी । मेज के एक तरफ दो अधेड़ व्यक्ति थे । उनमें से एक कान से रिसीवर चिपकाये फोन पर बात कर रहा था । में मेज के करीब पहुची।"

"यस मैडम?" युवती मुस्कुराई।

"लोकल फोन ।" मैंने कहा ।

"वो सामने ।" उसने लकडी के केबिन की तरफ संकेत किया ।

मैं केबिन की तरफ बढ़ गई ।

अगले पल मैं केबिन में खडी मार्शल के दायें हाथ सोल्जर का नम्बर पुश कर रही थी । म

सम्पर्क स्थापित हुआ ।

"हेलो ।" दूसरी तरफ से मेरे कानों मे कठोर स्वर टकराया ।

" मिस्टर सोल्लर से बात करनी है ।"

" बोल रहा हूं।" लाइन पर स्वर उभरा-"लेकिन तुम कौन हो ?"

अब मेरे लिये अपना असली परिचय देना जरूरी हो गया था क्योकि तभी मैं कामयाबी की मंजिल तक पहुच सकती थी ।

"मेरा नाम रीमा है ।" मैं सावधान स्वर में बोली ।

"कौन रीमा?"

"रीमा भारती ।" मैंने उत्तर दिया--"भारत की जासूसी सस्था आई०एस०सी० की नम्बर वन एजेंट ।"

लाइन पर खामोशी छा गई ।

जाहिर है कि मेरा परिचय सुनकर सोल्लर को काठ मार गया होगा । उसकी खामोशी इस बात की चुगली खा रहीं थी ।

"क्या हुआ मिस्टर सोल्जर ?" मैंने पूछा ।

दूसरे क्षण सोलजर का चकराया-सा स्वर उभरा---" आप वहीँ रीमा भारती हो, जिसके कारनामें समूचे संसार में गूंजते हैं । जिसे चलती-फिरती मोत भी कहा जाता है ।"

"यानि तुम मुझे जानते हो सोल्जर ?"

"मैं तुम्हें जानता ही नहीं, बल्कि तुम्हारे कारनामो से भी परिचित हूं। ये बात अलग है कि मैंने आज तक तुम्हें देखा नहीं ।"

"बहुत जल्दी तुम मुझे देख भी सकोगे ।" "अच्छा ।"

"यस ।"

"गुड, लेकिन मुझे ये बताओ कि तुम्हें मेरा पर्सनल फोन नम्बर कैसे मिला?" उसका हैरानी भरा स्वर उभरा ।

"आखिर मैं एक जासूस हूं मिस्टर सोज्जर । ये तो मेरे लिये एक छोटी-सी बात है । मैँ तुम्हारी पूरी जन्मपत्री जानती हूं ।"

"खेर, ये बताओ कि तुमने किसलिये फोन क्रिया हूँ?"

"कोई किसी को बेवजह कोन क्यों करेगा । मेरे फोन की भी क्रोईं-न-क्रोई तो वजह जरूर होगी ।"

"मैं वजह जानना चाहता हू !"

"मैं तुम्हें एक धमाकेदार खबर देना चाहती हूं जिसे सुनकर तुम खुशी उछल पडोगे मिस्टर । सोल्जर ।" मैंने कहा ।

" वो ऐसी कौन सी धमाकेदार खबर है?"

"तुम लोग सर ,एडलॉफ़ के समर्थकों के मुखिया क्लाइव को गिरफ्तार करना चाहते हो, लेकिन अभी तक तुम लोग उसकी परछाई को भी नहीं छु पाये हो । क्योंकि तुम्हें नहीं मालूम कि क्लाइव कौंन-से बिल में छुपा हुआ है?"

मेरे इन शब्दों को सुनकर लाइन पर मौजूद सोज्जर निश्चित रूप से 'स्पिंग' बन गया होगा ।

मैं उसे झटके-पर-झटके दिये जा रही थी !

"त. . .तुम इस बारे में कैसे जानती हो?" दूसरी तरफ से सोल्जर का आश्चर्य भरा गहरा स्वर उभरा । इसके अलावा मैं और भी बहुत कुछ जानती हू।"

"और क्या जानती हो तुम?"

"में जानती हूं कि क्लाइव कहां छिपा हुआ है?"

" व.....व्हाट !"

"यस !"

"व. .वो कहा छिपा हुआ है? "

"अभी मेरी बात पूरी नहीँ हुई है सोज्जर डियर । गौर से सुनो, मैं न सिर्फ ये बता सकती हूँ कि; क्लाइव कहां छिपा हुआ है, मैं उसे गिरफ्तार भी करवा सकती हू।"

ये तो मैंने एक बम ही फोड दिया था ।

मेरी इस बात ने सोल्जर र्की खोपडी को फिरकनी की तरह घुमाकर रख दिया होगा ।

इस वक्त उसके चेहरे पर आश्चर्य ओर अविश्वास के ढेरों भाव होंगे, क्योकि मैं एक ऐसा काम करने के लिये कह रही थी, जो उन लोगों के लिये कठिन ही नहीं लगभग असंभव था ।

"य.. .ये तुम क्या का रही हो?"

"मैंने वही कहा है, जो तुमने सुना है ।"

"मुझे विश्वास नहीं हो रहा है ।"

" करना सीखो सोज्जर ।" मैंने ठोस लहजे में कहा-- "जो काम सेना और सेना के बड़े-से-बड़े आफिसर नहीं कर सके । उस काम को मैं कर सकती हूं ।"

"तुम क्लाइव को कब गिरफ्तार करवा सकती हो ?"

" जब तुम चाहों ।"

"ऐसे शुभ काम में देरी नहीं होनी चाहिये ।" उसका बेचैनी भरा स्वर उभरा-" तुम आज किसी वक्त उसे गिरफ्तार करवा दो, अगर तुम क्लाइव को इससे भी जल्दी गिरफ्तार करवा दोगी तो बेहतर होगा ।"

"जरूर करवा दूंगी, लेकिन में कोई भी काम मुफ्त में नहीं करती । मैं तुम लोगों की एक पहाड़ जैसी प्राॅब्लम चुटकियों में ख़त्म कर रही हू । मगर मुझे क्लाइव को गिरफ्तार के बदले क्या मिलेगा ?"

"ताज्जुब है ।"

"किस बात का ?”

"मैंने तो सुना था कि भारती ऐसे किसी काम को करने की एवज में कुछ भी नहीं लेती है !"

"बिल्कुल भी कुछ नहीं लेती थी, लेकिन अब ऐसा करना मेरी मजबूरी है ।"

"ऐसी तुम्हारी क्या मजबूरी है रीमा?"
 
"में खतरों भरे इस खेल से ऊब चुकी हूं सोल्लर, इसलिये काफी अर्से से आई०एस०सी० छोड़ देना थी । अपनी इस

खतरों भरी जिन्दगी से किनारा कर लेना चाहती थी मैं । लेकिन मैं जानती थी, अगर मैंने आई०एस०सी० छोड़ने की कोशिश की तो वे लोग नहीं छोड़ेगे । मैं आ०एस०सी० के इतने राज जानती हूँ की जुबान बंद करने के लिये किसी-न-किसी बहाने मौत के घाट उतार दिया जायेगा । इसलिये मैं मौके की तलाश में थी, और पहला मौका मिलते ही तुम्हारे मुल्क में भाग आई हूं। क्योंकि यहां` के हालात मेरे अनुकूल हैं । आई०एस०सी० चाहकर भी कभी मुझे यहां तलाश नहीं कर पायेगी । फिर यहाँ मैं बागियों से टकरा गई ।कुछ रोज मजबूरी में उनके साथ काम भी किया इसी बजह से मैं

जानती हूं कि क्लाइव कहां है? मगर ये मेरी मंजिल नहीं है सोल्जर । मुझे वहुत ऊचे जाना है । रीमा हमेशा शान से जी है और शान से जीना चाहती है ।"

"तुम्हारा मतलब है कि तुम्हें दौलत चाहिये ।“ सोज्जर का स्वर उभरा-पचास लाख डॉलर ।"

मैं खामोश रहीँ ।

"इस काम की एवज में हम तुम्हें एक करोड डॉलर तक दे., सकते हैं ।"

"मुझे दौलत नहीं चाहिये ।"

"अ. . . अगर तुम्हें दौलत नहीं तो और क्या चाहिये?" उसका स्वर हैरानी से भर उठा।

"इस वक्त न तो मैं आ०एस०सी० की एजेन्ट हूँ और न ही आई०एस०सी० से मेरा किसी तरह का कोई सम्बंध है । इस समय मेरी हैसियत एक मुजरिम जैसी है । दूसरी तरफ क्लाइव को गिरफ्तार करवाकर मैं बागियो से भी पंगा ले लूंगी । वे भी मेरी जान के दुश्मन हो जायेंगे । अत: तुम लोगों को मेरी जिदगी की गारंटी लेनी होगी और मुझे सेना में भी महत्वपूर्ण पद देना होगा । अगर तुम्हें मेरी शर्त मंजूर हो तो बोलो ।"

लाइन पर सन्नाटा छा गया ।

जाहिर था कि सोल्जर मेरी शर्त पर विचार का रहा था ।

अर्थात् मेरी 'स्टोरी' जम रहीं थी । मेरी स्कीम के सफ़ल होने के शत-प्रतिशत चांस नजर आने लगे थे । बो स्कीम, जो इनके साथियों की मुकम्मल बर्बादी का कारण बन जाने वाली थी ।

" किस उलझन में पड़ गये सोल्लर ? " जब खामोशी मुझे खलने लगी तो मैं बोल उठी ।

"तुम्हारी शर्त के बाद मेरा उलझन में पइ जाना स्वाभाविक है रीमा, जो शर्त तुमने रखी है । उसका निर्णय करने का मुझे कोई अधिकार नहीं है ! इस बात का निर्णय-करने का अधिकार सिर्फ हमारे चीफ मार्शल को है ।"

"लेकिन मैंने सुना है कि तुम मार्शल के दायें हाथ हो ।"

"तुमने ठीक सुना है, लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं है कि मैं जो भी फैसला करूंगा, तो मार्शल को कबूल होगा, हाँ, मैं तुम्हारी शर्त मार्शल तक पहुंचा दूंगा,लेकिन वो भी उस वक्त जब तुम क्लाइव को गिरफ्तार करवा दोगी ।"

"फिक्र मत करों सोलजर । क्लाइव को तो मैं गिरफ्तार करवा ही दूंगी ।"

"तो मैं भी तुम्हारी शर्त मार्शल साहब को बता दूंगा ।"

"अगर मार्शले ने मेरौ शर्त न मानी तो. . . ?"

"मुझें उम्मीद है कि तुम्हारी शर्त मान ली जायेगी । तुम्हें निराश नहीं होना पडेगा ।"

"एक बात और सुन लो सोज्जर ।"

"सुनाओ ।"

. "में सच्चे दिल से तुम्हारी मदद कर रही हूँ । मुझे विश्वासघात पसंद नहीं है, अगर मेरे साथ धोखा हुआ तो मैं बर्दाश्त नहीं करूगी ।"

" धोखे की बात अपने दिमाग से निकाल दो । तुम हमारे लिये एक ऐसा काम करने जा रही हो, जिसके लिये सेना एड्री चोटी का जोर लगा चुकी है, लेकिन उसे सफलता हासिल नहीं हुई । इसलिये हमारा धोखा करने का सवाल ही नहीं है ।"

"फिर ठीक है ।" मैंने कहा--"काम तकरीबन चार बजे तुम पांच सात सैनिकों के साथ शहर के बाहर 'वाले खण्डहरों में पहुच जाओ । क्लाइव उन्हीं खण्डहरों में पहुंचेगा ।"

"बेहतरं !"

"सैनिकों की फौज लाने की जरूरत नहीं है, अगर यहां पहुंचकर क्लाइव को तुम लोगों की भनक लग गई तो शिकार हाथ से निकल जायेगा-औरे तुम हाथ मलते रह जाओगे ।" . .

"मैं ऐसा ही करूंगा, लेकिन तुमसे कहां मुलाकात होगी?"

"मैँ तुम्हें खण्डहरों में ही मिलूंगी लेकिन मैंने तो तुम्हें आज तक देखा नहीं है । मैं तुम्हें पहचानूगी कैसे?"

"इस बारे में परेशान की ज़रूरत नहीं है, हालांकि मैंने तुम्हें आज तक देखा नहीं है, लेकिन फिर भी मैं तुम्हें पहचान लूंगा ।"

"ओ०र्के० ।"

"मैं तुम्हारा इंतजार करूँगा ।"

"मैं वक्त से पहले पहुच जाऊंगी ।"

"लेकिन मेरी समझ में एक बात नहीं आ रही है कि तुम क्लाइव को खण्डहरों में बुलावाओगी कैसे?"

" ये मेरी सिरदर्दी है कि मैं क्लाइव को वहाँ कैसे लाती हूं । तुम्हें क्लाइव चाहिये, तो तुम्हें मिल जायेगा । तुम आम खाओ । पेड़ गिनने की कोशिशे मत करै ।"कहकर मैने रिसीवर वापस रखा और केबिन के बाहर निकलकर मेज के करीब पहुंची । मैंने बिल अदा क्रिया और दरबाजे की तरफ पलट गई ।

अब मुझे क्लाइव से सम्पर्क स्थापित करना था । क्लाइव से सिर्फ ट्रांसमीटर पर सम्पर्क स्थापित क्रिया जा सकता था और इसके लिये मुझे एकांत की जरूरत थी ।

=====

=====
 
"भागो ।" मैंने पी०सी०ओ० से बाहर कदम रखा था कि सड़क पर मौजूद लोगों मे से कोई चिंलाया---" सैनिक आ रहे हैं ।"

मेरे पेरों मे व्रेक लग गये।

मैंने देखा ।

उस घड्री यहां से एक छोटा-सा जुलूस गुजर रहा था । करीब दो दर्जन लोग हाथों में तख्तियां उठाये शांतिपूर्ण ढंग से एक तरफ बढे जा रहे थे, किन्तु उन तख्तियों पर सैनिक शासन के-खिलाफ नारे लिखे हुए थे ।

सैनिकों का नाम सुनते ही अचानक उन लोगों के बीच यूं भगदड़ मच गई मानो मधुमक्खियों के छत्ते पर पत्थर मार दिया गया हो । लोग गिरते-पड़ते अपनी जान बचाने के लिये इधर उधर भागने लगे ।।

"अपनी जान बचाओ ।" इस बार दूसरा गला फाड़कर चीखा-""वरना सेनिक सबको गोलियों से भूनकर रख देगे ।

सड़क के दोनों ओर बनी दुकानों के शटर फ़टाफ़ट नीचे गिरने लगे । हर किसी के चेहरे पर खौफ के भाव थे । आंखों में मौत के साये थिरकने लगे थे ।

हालातों को देखते हुए मुझे भी करना था । मैंने तेजी से आसपास निगाहें दौड़ाई, मुझे कोई जगह नजर नहीं आई थी । एक क्षण गंवाये वगैर बला की फुर्ती से एडियों पर घूमी और पी०सी०ओ० का दरवाजा खोलकर वापस भीतर दाखिल हो गई ।

पी०सी०ओ० की मालकिन दौडती हुई दरवाजे के करीब पहुची ।

" आप एक तरफ हटिये मैडम ! दरवाजा लॉक करने दीजिये ।" लह घबराई-सी दरवाजा लॉक करती हुई बोली- सैनिकों का कोई भरोसा नहीं है 1 वे इन जुलूस वालों के चक्कर में पी०सी०ओ० में भी आ सकते हैं । उस स्थिति में हमें गोलियों से भी भून सकते हैं । अक्सर चने के साथ घुन भी पीस जाता है । वे इंसान नहीं, दरिन्दे हैं ।"

. . . इधर युवती ने अपना वाक्य पूरा क्रिया उधर सेना की कई जीपें पी०सी०ओ० के ऐन सामने पहुंचकर रुकीं । अगले क्षण जीपों से ढेर सारे सेनिक धड़ाधड़ नीचे कूद पड़े ।

सभी के पास गर्ने थीं ।

" फायर:" उनमें से एक सेनिक चीखा---" जो भी बागी नजर आये । उसे गोलियों से भून डालो ।"

"तड़. . .त्तड़. . .रेट. . .रेट. . . ।"

आदेश मिलते ही बाकी सैनिकों ने गंनों के मुंह खोल दिये ।

गोलियों की तढ़तड़ाहट के बीच निर्दोषों की चीखे गूंजने लगी थीं ।

भाग रहे लोग गोलियां खा-खाकर सड़क पर ढेर होने लगे ।

"ये तो सरासर अन्याय है ।" न चाहते हुए भी मेरे होठों से निकल गया ।

" अ . . . अन्याय तो है ही ।" मेरी बगल में बैठी युवती थर थर कांपती हुई कह उठी…"लेकिन इस देश में आज अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ कौन उठा सकता है? अगर किसी ने आवाज उठाने की कोशिश की तो उसका यहीँ अंजाम होगा, जो आप देख रही हैं ।" मैंने चुप्पी साध ली ।

सहसा :

धड़ाम ।

एक भयानक विस्फोट से वातावरण का कलेजा थर्रा उठा ।

बम सैनिकों के बीच सड़क पर फटा था ।

और बो बम सढ़क के दूसरी तरफ एक बहुमंजिता इमारत की छत पर से फैंका गया था।

मैंने छत की तरफ देखा था ।

किन्तु मुझे छत पर कोई नजर नहीं आया था ।

इधर विस्फोट इतना जबरदस्त था कि दर्जन भर सैनिकों के जिस्म के चीथड़े उड़ गये थे ।

बचे हुए सैनिक इधर-उधर भागे ।

मुझे अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि बम फेकने बाले सर एडलॉफ के समर्थकों के अलावा और कोई नहीं हो सकते थे ।

" बम फेंकने वाले सर एडलॉफ के समर्थक हैं । वे कुत्ते बचकर नहीं जाने चाहियें ।" वातावरण में एक सेनिक का चीखता स्वर गूंजा-" उन हरामजादों को तलाश करों । बम उस इमारत की छत से फेंका गया है । "

पलक झपकते ही आधा दर्जन सेनिक उस बहुमंजिला इमारत की तरफ़ झपटे ।

उसी क्षण ।

इमारत की छत पर से गोलियों की बाढ छुटी ।

त्तड़.. .तड़. ...रेट .…रेट .।।

इमारत कीं तरफ़ बढ़ रहे सैनिक होठों से मर्मातक चीख उगलंते हुए सढ़क पर देर हो गये ।

मैंने देखा, इमारत की छत पर दस-बारह व्यक्ति न्जर आ रहे थे । उनके हाथों में गनें दबी थीं ।

"हमला हो गया है ।" कोई चीखा-" पोजीशन लो ।"

सैनिक इधर-उधर फैल गये और छत की तरफ गोलियां बरसाने लगे । गोलियों का ज़वाब गोलियों से ही दिया जाने लगा ।

पलक झपकते ही बहां युद्ध जैसा दृश्य उत्पन्न हो गया था ।

सर एडलॉंफ के समर्थक सैनिकों पर भारी पड़ने लगे थे । उनके पांव उखड गये थे । वे अपनी जान बचाने के लिये इधर उधर भागने लगे ।

" तुम लोग बचकर नहीं जा सकते !" कोई सैनिक हलक फाड़कर चीखा -"वेहतर होगा कि अपने हथियार फेंककर अपने आपको हमारे हवाले कर दो ।"

"हम मर सकते हैं ।" छत पर मौजूद व्यक्तियों से एक अपनी गन ऊची करता हुआ चीखा-" हमें झुकना कबूल नहीं है ।"

"क्यों बेमौत मरना चाहते हो ? अगर तुम अपने आपको हमारे हवाले कर दोगे तो तुम लोगों की जान बख्शी जा सकती है ।"

"हमेँ अपनी जान की परवाह नहीं है । हम लोग तुम्हारे विदेशी आकाओं को इस मुल्क से खदेड़कर ही दम लेंगे, हमेँ उन लोगों की गुलामी स्वीकार नहीँ है ।"

"बड़े हिम्मत वाले लोग हैं ।" मैं बोल उठी ।

" इनकी हिम्मत ज्यादा देर तक नहीं रह सकती । कुछ देर बाद बेचारों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा । सैनिक मौत बनकर इन लोगों पर टूट पड़ेगे ।" वह युवती हमदर्दी भरे स्वर में बोली ।

मैं चुप हो गई ।

" आप तो इण्डियन-लगती हैं मैडम?" युवती ने विषय बदला ।

" हां !"

"किंग्स्टन में ही रहती हैं ।"

"इण्डिया में ही रहती हू ।" मैंने उत्तर दिया----"चार-पाच दिन पहले ही विंगस्टन आई हू।"

"क्यों ?"

"यहां मेरे एक जान-पहचान वाले रहते हैं । उनसे मिलने आई हूं।"

मैने उससे झूठ बोला ।।

" आपको ऐसे मोहाल में विंगस्टन नहीं आना चाहिये था । यहां आकर आपने अच्छा नहीं क्रिया । आपने अपनी आंखों से देख ही लिया होगा कि जनता पर किस तरह से अत्याचार हो रहे हैं? किसी को भी अपनी जिदगी का एक पल का भरोसा नहीं है ।" एक पल ठहरकर वह पुन बोल उठी----"मेरी राय मानिये कि आज ही आप इण्डिया वापस लौट जाइयेगा । यहां आपकी जिदंगी भी सलामत नहीं है ।"

उधर सैनिकों ने छत पर मौजूद सर एडलाफ के समर्थकों पर जबरदस्त हमला बोल दिया । सर एडलॉफ के समर्थक गोलियां खाखाकर पके आम की तरह टपा-टप सडक पर गिर रहे थे ।

वातावरण में उनकी होलनाक चीखे गूंज रहीँ र्थी ।

इमारत की छत पर चार-पाच समर्थक ही बचे थे । उनकें पांव उखड़ गये थे । वे अपनी जान बचाने के लिये पलटकर भाग खडे हुए ।

उन लोगों के हौसले पस्त होते देखकर सैनिक धड़धडाते हुए उस इमारत में दाखिल हो गये ।

"जो बागी बचे हैं । अब वे भी वेहरमी की मौत मारे जायेगे" ।" युवती ने सर्द सांस छोडी ।

इमारत के भीतर क्या हो रहा था? मेरे देखने का प्रश्न ही नहीं था । अब मुझे सैनिकों के वहां से चले जाने का इंतजार था । इस वक्त मेरा यहां से निकलना खतरनाक हो सकता था ।

मैं बुरी फसी थी ।

वक्त सुस्त रफ्तार से गुजरता जा रहा था ।

मेरी निगाहें इमारत के प्रवेशद्वार पर स्थिर थीं ।

कठिनाई से पाच-सात मिनट ही गुजरे थे कि सैनिक चार आदमियों को घसीटते सड़क पर ले आये ।

"अपने-अपने घरो की खिड़क्रियों से झांककर देखो ।'" एक सैनिक ने यहाँ फैले मरघट जैसे सन्नाटे को भंग किया--" ये हरामजादे हम लोगों से मुकाबला करने आये थे, अब इनका क्या अंजाम होगा?"

उन चारों आदमियों को सैनिकों ने सड़क पर पटक दिया । पलक झपकते ही वे उठ खड़े हुए । परन्तु क्या मजाल जो उनके चेहरों पर घबराहट का एक भी भाव नज़र जा रहा हो ।।

" बोलो किस तरह की मौत मरना चाहते हो तुम लोग ?" दूसरा 'सेनिक भयानक स्वर में बोला ।

"मौत तो मौत ही होती है चाहे वह क्रिसी भी रूप में क्यों न मिले ?"

उनमें से एक बेखौफ स्वर में बोला---"हम लोग शेर जैसी मौत मरना पसंद करेंगे ! लेकिन हम चारों को मारने से तुम लोगों की समस्या का समाधान नहीं हो जायेगा । तुम लोग समझते हो कि हमें मारकर सर एडलॉंफ के समर्थकों का सफाया कर दोगे । तुम लोग समर्थकों को मारते-मारते थक जाओगे, लेकिन वे खत्म नहीं होंगे ।"

" अच्छा ?!

"'हां !"

"एक बात और सुन लो ।'" दूसरा बोला !

"वो क्या?"

"हमें गोलियों से भून डालो । हमें अपनी मौत का डर नहीं है । मौत तो एक-न-एक दिन आनी ही है ।" एकाएक उसका स्वर गम्भीर हो उठा…" लेकिन हमारा ये बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा । ये बहुत जल्दी रंग लायेगा ।"

"इन कुत्तों की बातें सुनना बःद करो ।" वातावरण में आदेश भर्रा कर्कश स्वर गूंजा…" इन्हें गोलियों से भून डालो ।"

आदेश का तुरंत पालन हुआ ।

‘तड़.. .तढ़. ..रेट. ...रेट ।'

उन सैनिकों की गनों ने एक साथ गरजकर उन चारों के जिस्म में अनगिनत झरोखे वना दिये थे । वे कटे पेड़ की तरह सड़क पर गिरे । कुछ क्षण उनके जिस्म फड़फड़ाये, फिर शांत हो गये ।

पलक लपकते ही मेरा चेहरा पत्थर की त्तरह कठोर होता चला गया । जबड़े एक दूसरे पर जमकर सख्ती से कसते चले गये । मगर मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी ।

हालांकि भावुकता से मेरा कोई रिश्ता नहीं है । लेकिन जब मैं किसी निर्दोष पर जुल्म होते हुए देखती हूं तो अपने आपको रोक नहीं पाती । निर्दोष को अपनी आखो के सामने बेरहमी की मौत मरते देखकर मेरा खून खोल उठा था, लेकिन इस वक्त हालात मेरे विपरीत थे ।

युवती आँखें बंद किये खडी थी कदाचित उसमें इतना हौंसला नहीं था कि उन आदमियों को मौत के मुंह में जाते हुए देख सकती ।

"द. दरिंदों ने चारों समर्थकों को बेरहमी की मौत मार डाला ।" उसने धीरे-धीरे आँखे खोली, फिर कंपकंपाते स्वर में बोली"-'न जाने बेरहमी का ये सिलसिला कब खत्म होगा? कब तक औरतों की मांग उजडती रहेंगी? मासूम बच्चे अनाथ होते रहेंगे? कब तक मासूमों और निंदोंष लोगों की जाने ली जाती रहेंगी ।"

मैं गहरी सांस लेकर रह गई ।

देखते-ही-देखते सैनिक जीपों में सवार होकर लोट गये । वे अपने पीछे छोड़ गये थे एक ऐसा मंजर, जिसे देखकर ही दिल कांप उठता था ।

"लॉक खोलो ।" मैंने युवती से कहा-"सैनिक चले गये ।"

"फिर भी अभी खतरा टला नहीं है मैडम ।" युवती बोली--" लाशें उठाने के लिये क्रिसी भी क्षण सैनिक यहाँ पहुच सकते हैं, अगरं उन्हें सड़क पर कोई भी नजर आया तो वे उसे नहीं बखशेगे । जब तक सब कुछ पहले जैसा नहीं हो जाता तब तक आपका बाहर निकलना ठीक नहीं होगा ।"

मैं रिस्क लेने के मूड में नहीं थी ।

मुझे युवती की बात माननी पडी ।

" ल. . . लेकिन ये भी तो पता नहीं है कि सेनिक कब तक यहीं के पहुंचेंगे?" मैंने कहा ।

. "इस बारे भी में कुछ नहीं कह सकती ।"

मेरे सामने एक समस्या आ खडी हुई थी । मेरे पास वक्त का तोड़ा था । पहले मुझे क्लाइव से सम्पर्क स्थापित करना था । उसके बाद खण्डहरों में पहुंचना था ।

एकाएक क्षण मुझे सालों के बराबर लग रहा था । लेकिन मेरे सामने उस वक्त तक रुके रहने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं था जब तक सब कुछ पहले जैसा सामान्य नहीं हो जाता ।

फिर मुझे ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा था । कठिनाई से दस मिनट नहीं गुजरे थे कि सेना की कई गाडियां तेजी से पी०सी०ओ० के आकर रुकीं । दूसरे क्षण उनमें से सैनिक धड़ाधड़ नीचे कूदने लगे । देखते-ही-देखते वे मानव अंग और लाशो को उठाकर गाडियों में लादने लगे । उंनका अंदाज कुछ ऐसा था मानो बे सब इंसान नहीं बल्कि मेरे हुए जानवर हों ।

' कुछ देर बाद गाडियां चली गई ।

आधे घंटे बाद सब कुछ सामान्य हो गया था । कोई कह नहीं सकता था कि कुछ देर पहले यहाँ मौत का नंगा नाच हुआ था ।

"अब तो लॉक खोल दो ।" मैंने युवती से कहा ।

युवती ने तुंरत लॉक खोल दिया ।

एक क्षण गंवाये बगैर मैं दरवाजा धकेल कर तीर की तरह बाहर निकली और एक तरफ बढती, चली गई ।

मैं शहर के बाहर एकांत जगह पर एक मिट्टी के टीले के पीछे पहुचकर ठिठकी ।

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दूर-दूर तक खुली जगह थी । चारों तरफ सन्नाटे का साम्राज्य स्थपित था । मुझे यहां चिडिया का बच्चा तक नजर नहीं आया था । संतुष्ट होकर अपने दायें पैर के सेण्डिल की एडी को ढक्कन्न की तरह खोला, उस रिक्त स्थान में छोटा-सा शक्तिशाली ट्रांसमीटर मौजूद था ।

ये यही ट्रांसमीटर था, जो मुझे चलते वक्त क्लाइव ने दिया था । उसने मुझसे कहा था कि अगर किसी मुसीबत में फंस जाऊं तो उससे सम्पर्क स्थापित करूं ।

मैंने एडी से ट्रांसमीटर निकालकर उसे ऑन किया । दूसरे क्षण उसमें से पिक-पिक की हल्की-स्री आवाज निकलने लगी फिर मैं ट्रांसमीटर मुंह के समाने ले जाकर बोली-"हेलो . .टाइगर. . . ।"

कुछ पल बाद स्वर उभरा-"यस ! टाइगर स्पीर्किग ओवर ।"

दूसरी तरफ़ क्लाइव ही था ।

" मुझे पहचाना टाइगर ।"

" टाइगर जिस आवाज को एक बार सुन लेता है ! उसे जिदगी भर नहीं भूलता । तुम सही-सलामत तो हो. . . ओवर. . . ।"

"मैं सही सलामत हू. . .ओवर. . . ।"

"आपने मुझसे सम्पर्क स्थापित क्यों नहीं किया? आपको लेकर पैं बहुत ज्यादा चिंतित था. . .ओवर ।"

"तुम्हारा चिंतित होना स्वाभाविक था टाइगर मैंने तुमसे सम्पर्क स्थापित करने का विचार क्रिया था । लेकिन मुझे वक्त नहीं मिल पाया. . . ओवर ।"

"आप अपने मिशन में कहां तक पहुची हैं. . .।"

"तुम्हारे लिये एक खुशखबरी है टाइगर. . . ।"

"क्या खुशखबरी हे?" दूसरी तरफ से क्लाइव का उत्सुक्ता भरा स्वर उभरा… " मुझे जल्दी से तो खुशखबरी सुनाओ. . .ओवर ।"

"मैंने डगलस के बारे में मालूम कर लिया । उसे बुटैल जेल में नजरबंद करके रखा गया है. . ओवर ।"

"खबर पक्की है ।"

"एकदम पक्की है ।"

"तो डगलस को जेल से छुडाने की तैयारी की जाये ।"

"डगलस को उस जेल से छूड़ाना आसान काम नहीं होगा । जेल के सुरक्षा प्रबंध इतने कडे हैं डगलस के पास कोई परिन्दा भी पर नहीं मार सकता, उस तक पहुंचना मंगल ग्रह तक पहुंचने के बराबर है. . . ओवर ।"

"ओह ।" ट्रांसमीटर पर क्लाइव का गंभीरता भरा स्वर उभरा---"जेल के सुरक्षा प्रबंघ के बारे में मालूम है ....ओवर !"

"मालूम क्यों नहीं है? मालूम करने के बाद ही मैं ऐसा कह रही हू. . . । सुरक्षा प्रबंधों के बारे में सुनकर मेरी खोपडी फिरकनी की तरह नाचकर रह गई थी । ऐसे कड़े सुरक्षा प्रबंधों की जानकारी मिलने के बाद कोई डगलस क्रो जेल से बाहर निकालने की बात सोच भी नहीं सकता...ओवर ।"

"य. . . यानि सुरक्षा प्रबंधों को बेधा नहीँ जा सकता. . . ओवर ।"

"क्यों नहीं बेधा जा सकता । आज तक ऐसे कोई सुरक्षा प्रबंध नहीं बने, जिन्हें बेधा न जा सका हो। बस उन्हें वेधने के लिए तेज दिमाग की जरूरत है. . . ओवर ।"

"ओर वो दिमाग आपके पास है । अब आप ये बताइये कि के है आप मेरे पास कब पहुंच रही हैं? ताकि आगे के प्रोग्राम पर विचार-विमर्श क्रिया जा सकै. . .ओवर ।"

. "इस वक्त मेरा तुम्हारे पास आना सम्भव नहीं । शहर के हालात तुम्हारे सामने हैं । शहर भर में सैनिक तलाश कर रहे हैं । अगर मैंने शहर में कदम रखने का प्रयास किया तो मैं पकडी जाऊंगी. . .ओवर ।"

… "फिर क्या किया जाये ?"

' "तुम शाम के चार बजे तक शहर के बाहर वाले खण्डहरों में पहुच जाओ । मैं तुम्हें वहीं मिलूगी । यहां हम लोग आगे की प्लानिंग पर विचार-विमर्श करेंगे । मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं ऐसा कोई रास्ता निकालूंगी कि डगलस को आसानी से जेल से निकाला जा सके । वही तो हमें बतायेगा कि सर एडलॉंफ कहां छिपा हुआ हे. . . ओवर ।"

"ओ०कें० । मैं चार बजे तक खण्डहरों में पहुंचने की कोशिश करूंगा । आप मेरा इंतजार कीजियेगा । मुझे पहुंचने में थोडी देर भी हो सकती है-ओवर ।"

"मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी ।"

कहकर मैंने ट्रांसमीटर बंद करके यथास्थान रखकर सैण्डिल की एडी को बंद किया, फिर आसपास का मुआयना क्रिया । सब कुछ पहले जैसा ही था । मुझे आसपास किसी भी किस्म का ख़तरा दिखाई नहीं दिया था । मैं संतुष्ट होकर टीले के पीछे से निकलकर सड़क की तरफ बढ़ती चली, गई ।

अब मुझे शहर के बाहर बाले खण्डहरों में पहुचना था ।

मेरी स्कीम का तीसरा चऱण शुरू हो चुका था

=====

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आधे घंटे बाद मैं खण्डहरों में थी । यहां तक मैं पैदल ही पहुंचीं थी । रास्ते में मेरे सामने किसी भी किस्म की दिक्कत पेश नहीं आई थी ।

वह विशाल खण्डहर कई किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ था । उसके चारों तरफ थोडे-थोड़े फासले पर लंबे लंबे पेड़ किसी प्रहरी की तरह सिर उठाये खड़े थे ।

चहुं ओर खामोशी ने अपने पांव पसार रखे थे ।

मैंने रिस्टवॉच पर नजर डाली ।

अभी सिर्फ तीन बजकर बीस मिनट हुए थे ।

मैं एकदम चौकक्नी थी । मेरे कान' एरियल बने हुए थे ।

मैं वक्त से काफी पहले ही खण्डहरों में पहुच गई । जबकि मैंने सोल्जर को चार बजे पहुंचने के लिये कहा था । क्लाइव. को भी मैंने चार बजे ही बुलाया था । अब मुझे उन दोनों के पहुचने का इंतजार करना था । मुझे देखना ये था कि दोनों में से कौन पहले पहुंचता है ।

चालीस मिनट गुजारने मुझे चालीस साल गुजारने जैसे लगने लगे थे । मेरे पास वक्त गुजारने के लिये कोई जगह नहीं थी । कहीं और मैं किसी नये लफड़े में र्फस भी सकती थी । अत: मैं वक्त से पहले ही यहीं पहुचे गई थी ।

मैं खाली ही थी।

हथियार के नाम पर मेरे पास एक सुई तक नहीं थी ।

वक्त सुस्त रफ्तार से गुजरता जा रहा था ।

लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था वक्त गुजर नहीं रहा,बल्कि खिसक रहा था । जब किसी का इंतजार किया जाता है तो इंतजार की घंडिया-लंबी हो जाया करती हैं ।

इस वक्त यही मेरे साथ हो रहा था ।

इंतजार करने के साथ-साथ मैं चारों तरफ निगाहें घुमाकर देख लेती थी । किन्तु फिलहाल मुझे उन दोनों में से कोई भी आता दिखाई नहीं दिया था।

खामोशी पूर्ववत् थी ।

ऐसी खामोशी जिसमें मुझे अपने दिल की धड़कने साफ़ सुनाई दे रही थीं ।

सहसा! ।

मैं चोंकी ।

मुझे ऐसा लगा था जैसे कोई दबे पांव मेरे पीछे से चला आ रहा हो । मेरे मेहरबान दोस्त जानते हैं कि ऐसी परिस्थितियों में मेरे कान एरियल वन जाया करते हैं, जो मामूली से-मामूली-आहट भी सुन लेते है । इस वक्त भी ऐसा ही हुआ था । मैंने पदचाप स्पष्ट सुनी ।

पलक झपकते ही मैं फिरकनी की तरह एडियों पर घूम गई ।

मेरा सन्देह एकदम सहीं साबित हुआ था ।

सामने से एक शख्स ठीक किसी लौमड्री जैसी चाल से मेरी तरफ बढा आ रहा था । मेरी तीक्ष्ण निगाहें उसके जिस्म पर सरसराती चली गई ।

उस शख्स की उम्र पैंतालीस साल के आसपास रही होगी । उसका कद किसी भी तरह से छ: फुट से कम नहीं था । गोरा रंग । मजबूत जिस्म उसके चेहरे पर पत्थर जैसी कठोरता फैली थी और आंखों में जंगली बिल्ली जैसी चमक थी ।

वह हाफ बाजू की सफेद शर्ट और उसी के रंग की पेंट पहने था । उसकी फूली जेब इस बात की चुगली कर रहीँ थी कि उसमें रिवाल्वर मोजूद है, जो किसी भी क्षण उसके हाथ में आ सकती थी ।

"तुम ही रीमा भारती हो ?" उसने मेरे करीब पहुंचकर ठिठक्रत्ते हुए सवाल किया ।

"तुमने ठीक पहचाना।" मैंने उत्तर दिया-और अगर मैं गलती पर नहीं हूं तो तुम सोज्जर हो?"

"यस ।"

मैंने अपनी रिस्टबॉंच पर नजर डाली, फिर निगाहें उसके चेहरे पर टिकाती हुई बोली-" तुम वक्त से पहले आ गये । अभी चार बजने में बीस मिनट बाकी हैं ।"

"ऐसे कामों मे मै वत्त से पहले पहुंचना ही उचित समझता हूं । ताकि सामने बाले को ढंग से परख सकू ।" वह बोला--- "अगर वक्त पर पहुंचता तो तुमसे बात करने का मौका नहीं मिलता । वैसे मैं तुम्हारी नॉलिज के बता दूं कि मैं तुमसे पहले यहाँ पहुच गया था ।"

"अगर तुम मुझसे पहले यहाँ पहुंच गये थे तो मेरे सामने क्यों नहीं आये?" चौंककर पूछा ।

प्रत्युत्तर में सोल्जर धीरे से मुस्कुराकर रह गया । अब उसकी-मुस्कान से ये बात साबित हो गई थी कि सोल्जर -एक चौकस रहने वाला चालाक किस्म का इंसान था । वह मुझसे पहले वहां इसलिए पहुंचा था ताकि देख ले कि कहीं यहीं उसके लिये कोई खतरा तो नहीं । मैं उसे किसी जाल में तो नहीं फंसाने जा रही हूं !"

"तुम आदमी दिलचस्प हो सोल्जर ।…भेरे होठों पर दिलकश मुस्कान उभरी ।

सोल्जर तनिक हड़बड़ाया ।

दरअसल इस वक्त उसकी निगाहें मेरे खुले गले से झांकती मेरी दूधिया चट्टानों की गहराई में झांक रही थी ।

मेरा बो हथियार, जिससे आज तक कोई नहीं बच सका था । फिर भला सोल्जर कैसे बच सकता था? हालांकि उसने तुरंत वहां से अपनी निगाहें हटा ली थीं ।

मेरे होठों पेर फैली मुस्कान गहरी हो उठी थी ।

"अकेले आये हो?" मैँने सवाल किया ।

"लाव-लश्कर के साथ आया हूं !"

मैं अपनी निगाहें चारों तरफ घुमाने के बाद बोली-"लेकिन मुझे दिखाई तो कोई नहीं दे रहा है ।"

"वक्त अने पर तुम्हें सब कुछ दिखाई दे जायेगा । बस इतना जान लो कि मैं पूरी तैयारी के साथ यहां आया हूं।"

"आई सी ।"

"लेकिन अभी तक क्लाइव तो नहीं आया?"

" परेशान होने की जरूरत नहीं मिस्टर सोल्जर । मैंने क्लाइव को यहां पहुचने के लिये चार बजे का वक्त दिया है । वो समय का पांवध है। ववत् पर पहुच जायेगा । अभी चार बजने में दस मिनट बाकी है !"

सोज्जर ने अपनी कलाई पर बधी घडी पर नजर डाली । उसके बाद उसने कुछ नहीं कहा ।

जाहिर था कि उसकी घड़ी में भी चार बजने में दस मिनट बाकी थे ।

" मै तुम्हें एक बात बता देना चाहती हू सोज्जर ।"

" क्या ?"

"क्लाइव बहुत ही ज्यादा चालाक और सतर्क रहने वाला इंसान है । उसे संभालना तुम्हारी सिरदर्दी है, अगर उसे जरा भी भनक लग गई कि उसके लिये यहां कोई जाल बिछाया गया है तो वो छलावे की तरह गायब हो जायेगा । उसके बाद तुम क्लाइव को तलाश करते-करते मर जाओगे, लेकिन उसे तलाश नहीं कर पाओगे ।"

"तुम फिक्र मत करो । उसे भनक भी नहीं लगेगी, और हम लोग उसे आसानी से दबोच लेंगे ।"

"अब मुझे ये बताओ कि मेरी शर्त का क्या हुआ?"

"तुम तो ऐसे कह रही हो । जैसे तुम्हारी शर्त मान लेना मेरे हाथ की बात है । मैं मार्शल साहब का दायां हाथ अवश्य हूं । लेकिन इस तरह के फैसले वे स्वयं करते हैं । मैंने तुम्हारी शर्त साहब को बता दीं है । मुझे उम्मीद है कि तुम्हारी दोनों शर्त मान ली जायेंगी ।"

"सिर्फ तुम्हें उम्मीद है, दावे से नहीं कह सकते?" मैंने कहा----" तुम लोगों के लिये एक ऐसा काम कर रहीँ के जिसे तुम लोग अपनी लाख कोशिशों के बावजूद नहीं कर पाये । इस काम के बदले तो मार्शल साहब को फौरन मेरी शर्त मान लेनी चाहिये थी ।"

"डोंट बी सिली बेबी! तुम्हारी शर्त मान ली जायेंगी, लेकिन पहले मार्शल साहब को क्लाइव के गिरफ्तार होने की खबर तो मिल जाए ।"
 
. , इससे पहले कि मैं कुछ कह पाती, मुझे दूर एक शख्स आता दिखाई दिया । मैंने उसे तुरंत पहचान लिया । क्लाइव था ।

"क्लाइव आ रहा ।" मैं फुसफूसाई--"अब तुम जल्दी से कहीं छिप जाओ और उसके आने का इंतजार करो ।"

सोज्जर ने उस दिशा में देखा, जिस तरफ से क्लाइव आ रहा था । उसका चेहरा हजार बाॅट के बल्ब की, तरह चमक उठा ।

दूसरे क्षण वह कमान से निकले तीर की तरह माग छूटा । और देखत देखते खण्डहरों में कहीं गायब हो गया ।

अब मुझें गायब होना था । मैंने छिपने की तलाश में चारों तरफ नज़रें घूमाई । मेरी घूमती . नज़रें मलबे के ढेर पर स्थिर होकर रह गई ।

मेरे छिपने के लिये उससे बेहत्तर दूसरी कोई जगह नहीं हो सकती थी ।

एक पल खाद मैं मलबे के ढेर के पीछे बैठी क्लाइव के पहुंचने का इंतजार कर रहीँ थी ।

=====

=====

कठिनाई से पांच मिनट भी नहीं गुजर थे कि मेरे कानों से कदमों की आवाज़ टकराई, फिर एक पल गुजरा था कि वो आवाज मलवे के ढेर के करीब आकर गायब हो गोई ।

मैंने ढेर की एक साइड से तनिक चेहरा निकालकर झांका तो मुझे थोडे फांसले पर क्लाइव खड़ा नजर आया । उसकी बेचैन निगाहें . चारों तरफ घूम रही थीं । जाहिर था कि उसे मेरी तलाश थी ।

किन्तु उसे कहां दिखाई देने वाली थी ? मैं तो मलबे के ढेर के पीछे छिपी बैठी थी ।

"मेडम ।" जब मैं क्लाइव को नजर नहीं आई तो उसने मुझे पुकारा ।

जवाब में मैं खामोश रही ।

"रीमा मैडम ।" उसने पुन: हाँक लगाई ।

इस बार भी जवाब नदारद था ।

क्लाइव ने अपनी कलाई पर बंधी घडी पर नजर डाली । साथ ही उसके चेहरे पर उलझन के भाव उभरते चले गये ।

उसी क्षण ।

मैंने खण्डहरों के बीच से सोल्जर को निकलकर क्लाइव की तरफ बढते देखा, उसके हाँथ में लंबी नाल का रिवाल्चर था और रिवाल्वर का रुख क्लाइव की तरफ़-था ।

सोल्जर पर नजर पड़ते ही क्लाइव बुरी तरह उछल पड़ा ।

जाहिर है उसे तो सपने में भी उम्मीद नहीं रही होगी कि यहाँ उसे मेरी जगह सोल्जर के दर्शन होगे ।

फिर इससे पहले कि क्लाइव कोई हरकत कर पाता ।

" तुम चारों तरफ से धिर चुके हो क्लाइव ।" सोल्जर चेतावनी भरे स्वर मे बोला-"क्रोई गलत हरकत मत करना, वरना वो हरकत तुम्हारी जिदगी की आखरी हरकत होगी ।"

फिर भी गजब की फुर्ती का परिचय देते हुए क्लाइव ने अपनी जेब से रिवाल्वर निकाल ही लिया था ।

"गोली चलाने की गलती मत करना क्लाइव वरना बेमौत मारे जाओगे । इस वक्त तुम गोली चलाने की स्थिति में नहीं हो । बेहत्तर यही होगा कि रिवाल्वर फेंक दो ।" वह गुर्राया---"चारों तरफ निगाहें घुमाकर देखो । तुम्हें मालूम हो जायेगा कि इस समय तुम किस पोजीशन में हो?"

क्लाइव ने चारों तरफ़ निगाहें घुमाई । उसके चारों तरफ ढेरों सशस्त्र सेनिक क्रिसी भूत की तरह सेट हो चुके थे और वे मजबूत कदमों से क्लाइव की तरफ़ बढ़ रहे थे । उनका घेरा लगातार कसता जा रहा था । क्लाइव सन्नाटे में रह गया । तभी सोज्जर के रिवाल्वर ने गोली उगती और क्लाइव के हाथ का रिवाल्वर उससे बेवफाई करता हुआ छिटक कर दूर जा गिरा ।

परन्तु मौत को देखकर चींटी भी अपने बचाव में जान की बाजी लगा देती है, क्लाइव तो एक इंसान था । पलक झपकते ही उसने लंबी जम्प लगाई और मलवे के देर के करीब आकर गिरा, फिर रिअ'भ लगे खिलौने की तरह उछलकर खड़ा हुआ और मलवे के ढेर की तरफ भागा और जैसे ही वह मेरे करीब पहुंचा वेसे ही मैँ फुर्ती से उठकर खडी हुई और तीर की तरह आगे बढकर क्लाइव का रास्ता रोक लिया ।

, .क्लाइव के पैरों में ब्रेक लग गये ।

मुझे इस तरह वहाँ पाकर वह बुरी तरह से उछल पड़ा था ।

उसका उछल पड़ना स्वाभाविक भी था । क्लाइव को तो सपने में भी भी ऐसी हरकत की उम्मीद नहीं रही होगी ।

" य . .ये सब क्या है रीमा: ये लोग यहां. . .

।"

"इसका जवाब मैं तुम्हें देता हूँ क्लाइव !'" सोलजर बीच में ही बोल उठा--"' ये है कि रीमा भारती हम लोगों से मिल चुकी है । इसने कुछ शर्तों पर हमसे तुम्हारा सौदा किया है ।"

"य. . .ये झूठ है ।" क्लाइव को तो जैसे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था…"रींमा ऐसा नहीं कर सकती ।"

"ये सच है क्लटइव । उतना ही बड़ा सच, जितना पुरब से सूरज का उदय होना ।" मैंने उत्तर दिया ।

क्लाइव सन्नाटे में रह गया ।

अब तक सैनिक और सोल्जर उसे पूरी तरह घेर चुके थे ।

"गिरफ्तार कर लो इसे ।" मैंने कहा ।

पलक झपकते ही सैनिकों की गने क्लाइव के जिस्म से आ चिपकी ।

"ऊंट अपने आपको वहुत ऊचा समझता है, लेकिन उसे अपनी औकात का उस वक्त पता चलता है जब वह पहाड़ के नीचे पहुंचता है । अब ऊंट पहाड़ के नीचे आया है ।" सोल्जर, क्लाइव को अंगारे बरसाती निगाहों से देखता हुआ गुर्राया-"तुम लोग वहुत उछल-कूद कर चुके हो । सेना को जितना नुकसान पहुचा सकते थे । पहुचा चुके हो क्लाइव । अब और नुकसान नहीं पहुचा सकोगे । तुम सर एडलॉफ के समर्थकों के मुखिया हो । तुम्हारे गिरफ्तार हो जाने की खबर सुनकर सर एडलाॅफ के समर्थकों के हौंसले वेसे ही पस्त हो जायेंगे । उनकी बुलंद आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो जायेगी ।"

क्लाइव बेबसी भरे अंदाज में दांत पीसकर रह गया ।

"तुम्हें तलाश करने के लिये सेना ने दिन-रात एक कर दिया । हर वो जगह छान डाली, जहाँ तुम्हारे छिपे होने की ज़रा भी संभावना हो सकती थी, लेकिन तुम तो न जाने किस बिल में छिपे बैठे थे कि हम तलाश ही नहीं कर पाये ।" वह पुन: बोल उठा…"हमने तो गिरफ्तारी की उम्मीद ही छोड़ दी । लेकिन रीमा भारती ने हमारा काम आसान कर दिया । इसने तुम्हें गिरफ्तार करवाकर हमारी सारी मुश्किलों को आसान कर दिया है । अब तुम हमें बताओगे कि सर एडलॉंफ के समर्थक कहां-कहां छिपे हुए है। विंगस्टन में उनका टिकाना कहां-कहां है?"

"तो ये सब कुछ तुम्हारा किया-धरा है ।" क्लाइव मेरे चेहरे पर निगाहें फिक्स करता हुआ बोता ।

मैंने देखा ।

क्लाइव के चेहरे पर मेरे लिये नफरत-ही-नफरते फैली हुई थी । आखों से चिंगारियां-सी फूट रही थीं ।

"धोखेबाज । मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा तुम एक जहरीली नागिन निकलोगी । मैंने तो पर पहाड़ जितना विश्वास; किया और तुमने मेरी पीठ में छुरा घोप दिया ।" क्लाइव के होठो से नफ़रत का सेलाब फूट निकला----"तुम इन लोगों के हाथों बिक चूकी हो । दौलत के लालच ने अंधा कर दिया । तुमने जो खेल खेला है । उसके लिए गाॅड कभी माफ नहीं बनेगा । इस देश की जनता की बद्दुआएं लगेंगी । तुमने मेरे साथ नहीं, बल्कि इस मुल्क की जनता के साथ विश्वासघात क्रिया है । तुम औरत जाति के नाम पर एक कलंक हो । एक ऐसा कलंक, जिसे कभी र्मिटाया नहीं जा सकता ।"

"तुम्हे ऐसा करने का पूरा अधिकार है क्लाइव । अगर तुम्हारी जगह पर मैं होती तो मैं ऐसा ही कहती ।" मैं मन ही मन बढ़बड़ाइं-"लेकिनं मुझे माफ़ करना दोस्त । मैं ऐसा करने के लिये मजबूर थी, क्योंकि डगलस तक पहुंचने के लिये मेरे पास इसके अलावा दूसरा क्रोईं रास्ता नहीं था ।"

" मैने तो सुना था कि आई०एस०सी० की नम्बर वन एजेन्ट रीमा भारती ने हमेशा जुल्म के खिलाफ जंग लडी है । निर्दोषों की मदद की है और दोषियों और अत्याचारियों को मोत बांटी है । लेकिन वो सब झूठ निकला।" वह पुन बोल उठा----"कौन कहता है कि रीमा भारती दोस्तों की दोस्त और दुश्मनों के लिये साक्षात् मौत है । इतिहास के जो पन्ने तुम्हारी बहादुरी ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा से रंगे पड़े हैं । उन्हें फाड़कर जला देना चाहिए।"

मेरे भीतर अजीब-सा द्धन्द्र चल रहा था ।

सच तो ये था कि क्लाइव के शब्दों ने मुझे भीतर तंक़ हिलाकर रख दिया था ।

" इसे अपनी खुशुक्रिस्मती समझो कि अभी तक तुम मैरे सामने जिंदा खडी हो, अगर मैं आजाद होता तो यहीं तुम्हारी लाश पडी होती । मैं तुम्हें बताता कि मुझसे गद्दारी करने का क्या अंजाम होता है?" वह गुर्रा उठा ।

इस वत्त क्लाइव की हालत घायल शेर जैसी हो रही थी । गुस्से ओर अपमान से उसका चेहरा कनपटियों तक सुलग रहा था । आँखों से मानो आग बरस रही थी ।

" आक थू।" क्लाइव नुफरत से जमीन पर थूकता बोला ----"लानत हैं तुर्म परं रीर्मा जो तुम चंद नोटो की खातिर बिक गई हो । अगर तृम्हें दौलत ही चाहिये थी तो मुझसे कहती । में तुम्हें इतनी दौलत दे सकता था कि तुम्हे जिदगी भर कुछ करने की जरूरत ही नहीँ पडती । तुमने तो दौलत की खातिर अपने देश और डिपार्टमेंट के नाम पर भी कालिख पोत दीं है ।"

"अब ये राग अलापना बंद करो क्लाइव ।" मैंने कहा---"तुम जो कह रहे हो वो बीता हुआ कल था । मैं उस गुज़रे कल को भूल चुकी । वर्तमान की बात करों । इस वक्त वो रीमा तुम्हारें -समने नहीं है जिसकी ईमानदारी, फर्ज और कर्तव्यनिष्ठा की लोग कसमें खाया करते थे । अब मैं बदल चुकी हू। बीते हुए कल का कुछ भी याद करना नहीं चाहती ।"

क्लाइव के चेहरे पर फैले नफ़रत के भाव, गहरे हो उठे ।

"ले चलो इसे ।" सोल्जर सैनिकों को सम्बोधित करता हुआ-आदेशपूर्ण लहजे में बोला ।

" तुम कौन हो?" क्लाइव, सोल्जर की तरफ-घूमा ।

" मै वो शै हूं , जो शीशे से पत्थर को काटता हूँ ।"

"उस शीशे का कोई नाम भी तो होगा ।"

"मेरा नाम सोल्जर है ।"

"सेना में तुम्हारी क्या हैसियत है?"

"मैं सेना प्रमुख मार्शल का दायां हाथ हू। मार्शल का वफादार अदना-सा सेवक ।"

"अर्थात् अगर ये कहा जाये कि तुम मार्शल के पालतू कूते हो तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।"

सोलजर का गुस्सा आसमान छू गया । आँखों से मानो शोले फूट निकले ।

मैं हैरत भरी निगाहों से क्लाइव को देखती रह गई । मुझे आश्चर्य था कि इन हालातों में भी वह इतना कुछ करने का हौंसला कैसे जुटा पाया था?

"मेरा जी तो ये चाहता है कि रिवाल्वर की सारी गोलियों तुम्हारे भेजे मे उतार दूं लेकिन मेरी मजबूरी है कि मैं ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि मार्शल साहब का आदेश है कि तुम्हें जिंदा रखा जाये ।"

"मुझे जिंदा रखना ही पडेगा, अगर तुम लोगों ने मार डाला तो मेरी मौत तुम लोगों के लिये सिरदर्द बन जाएगी।"

"वो कैसे?"

"मेरी मौत की खबर सुनकर सर एडलॉफ के समर्थक पागल हो उठेंगे । वो किसी भी कीमत पर तुम लोगों को जिंदा नहीं छोडेगे क्लाइव ने उत्तर दिया---"तुम क्या समझते हो कि मुझे गिरफ्तार करने के `बाद सर एडाॅलफ के समर्थकों के सीनों में सुलग रही बगावत की आग ठण्डी हो जायेगी, नहीं वो आग और भी तेजी में भडक उठेएगी और उस आग में तुम सब जलकर राख हो जाओगे ।" पलक झपकते ही सोल्जर ने अपना हाथ घुमा दिया ।

चटाख् ।

उसकी चौडी हथेली झंन्नाटेदार थप्पड़ की शक्ल में पड़ी थी ।

क्या मजाल जो क्लग्रइव के होठों से उफ् तक निकली हो ।

उल्टे वह सोल्जर को खूनी निगाहों से घूरकर रह गया ।

"अब तुम्हारी अक्ल ठिकाने आईं है" सोल्जर ने दांत पीसे ।

_ क्लाइव व्यंग से मुस्कराया-"तुम क्या समझते हो कि थप्पड़ मारकर मेरी अक्ल ला दोगे? अगर तुम मेरे जिस्म के दुकड़े-टकड़े भी कर दो । तब भी हर टुकडे से विद्रोह और बगावत गूंज ही सुनाई देगी ।"

. "अच्छा ।" उसके होठों पर व्यंग नाच उठा ।

"मैं तुम्हें हकीकत बता रहा हू ।" वह वोला-"तुम लोगों के पापों का घड़ा भर चुका है । वो जल्दी ही फूटने वाला है ।"

"बहुत बडी-बडी बातें कर रहे हो क्लाइव । शायद तुम भूल रहे हो कि इस वक्त तुम सेना के कब्जे में हो और अब तुम्हारा बचकर निकलना कठिन ही नहीं असंभव है ।" मैं बीच में ही बोल उठी…" बेहतर यही होगा कि अब तुम अपनी मौत का इंतजार करो, जो तुम्हारी जिन्दगी के दरवाजे पर दस्तक दे रही है ।"
 
मेरे न रहने से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है रीमा । मेरे पीछे इस मुल्क की जनता है । सर एडलोंफ़ के समर्थक हैं । जब उनकी बगावत की आँधी चलेगी तो ये सब तानाशाह तिनके की तरह उड जायेंगे और उस आंधी से तुम भी नहीं बच पाओगी ।। किसी को ख़बर तक नहीं लगेगी कि रीमा भारती नाम को खतरनाक शै दुनिया के तख्ते से अचानक कहां गायब हो गई?"

"तुम अपने आपको बहुत बडा तीसमारखां समझते हो ।" मैं रिवाल्वर की नाल क्लाइव के माथे के ठीक बीचों-बीच सटार्ती हुंई गुर्रा उठी----"तुम बहुत देर से फू-फा कर रहे हो और मैं खामोश सुन रही हू। यहीं है कि तुम्हारी जुबान सदा-सदा के लिये बंद कर दी जाये ।"

"नहीं रीमा:" एकाएक सोल्जर बोल उठा----"गोली मत चलाना । क्लाइव को जिंदा रखना हमारी मज़बूरी हैं अगर इसकी हत्या कर दी तो हम लोग सर एडलॉफ़ के अन्य समर्थकों का पता-टिकाना नहीं जान पायेंगे । जबकि हमारे लिये उनके बारे में जानना बहुत जरूरी है ।"

मैंने रिवाल्वर की नाल, हटा ली ।

"यहीँ बेहतर होगा कि तुम मुझे गोली मार दो । बाद में तुम्हें पछतावा होगा कि तुमने मुझे गोली क्यों नहीं मारी?" क्लाइव ने कहा -" ओर उस वक्त बहुत देर हो चुकी होगी ।"

" अगर हम लोग यहीं खड़े रहे तो ये हरामजादा इसी तरह की बाता करता रहेगा ।" सोल्जर ने हुक्म दनदनाया-' "इसे ले चलो । इसकी मौत तो निश्चित है, लेकिन इसका फैसला मार्शल साहब करेंगे ।"

उसे पीछे से गनों की नालों से आगे धकेला गया ।

"आओ रीमा ।" सोल्जर बोला । मैं सोल्जर के साथ बढी । . , . कुछ देर बाद हम लोग खण्डहर से बाहर निकले । खण्डहर के पिछले हिस्से में सेना की चार जीपें खडी थीं ।

"जीप में बैठो क्लग्रइव ।" बोला सोल्जर । बिना किसी घबराहट के क्लाइव दूसरे नम्बर की जीप के पिछले हिस्से में सवार हो गया । उसके अलावा चार सेनिक भी जीप में बैठ गये . ।

बाकी सेनिक अन्य जीपों में सवार हो गये थे ।

मैं सोल्जर के साथ सबसे पीछे वाली जीप में बैठी थी । फिर चार जीपों का छोटा-सा काफिला आगे बढ गया।

देखते-हीं-देखते जीपों ने रफ्तार पकड ली ।

इस वक्त मेरे दिमाग में एक ही सवाल था कि सोल्जर मुझे कहां ले जा रहा है? मैंने अपनी बगल में बैठे सोल्जर को कनखियों से देखा, उसकी निगाहें मेरी शर्ट के खुले गले के भीतर झांक रही थी ।

====

====

तकरीबन एक घंटे बाद जीपों का वो काफिला एक विशाल इमारत के कम्पाउंड में पहुंचकर रूका ।

"आओ रीमा ।" सोल्जर जीप से नीचे उतरता हुआ बोला ।

मैं भी नीचे उतर गई । आगे वाली तीनों जीपों से सेनिक नीचे उतर चुके थे ।

उन्होंने क्लाइव को चारों तरफ़ से घेरा हुआ था ।

क्लाइव ने जलाकर राख कर देने बाली निगाहों से मुझे देखा, फिर. आगे बढ गया ।

उसके साथ क्या होने वाला था, ये तो ऊपर वाला ही जानता था ।

अब वहां मेरे और सोल्जर के अलावा दो सैनिक मौजूद थे ।

"मेरे साथ आओं ।"सोल्जर ने आगे बढते हुए कहा ।

मैं उसके साथ चल पडी ।

दोनों सैनिक मेरे पीछे थे ।

कई राहदारियों से गुजरकर सोल्जर एक कमरे के बंद दरवाजे के सामने पहुंचकर ठिठका ।

फिर मुझे वहीं रुकने के लिये कहकर वह कमरे का दरवाजा खोलकर भीतर दाखिल हो गया । साथ ही उसने भड़ाक से दरवाजा बंद कर लिया था ।

… मेरा माथा ठनका ( मेरे भीतर का जासूस सजग हो उठा । सोल्जर का इस तरह से कमरे में दाखिल होकर इस तरह से दरवाजा बंद कर लेना मुझे बड़ा -हीँ रहस्यमय लगा था ।

. "सोल्जर कालिंग सर. . . ओवर ।" दो पल बाद मेरे कानों से टकराया ।

पलक झपकते ही मेरे कान वायरलेस बन गये ।

अब सब कुछ मेरे सामने आइने की तरह साफ था सोल्जर ट्रांसमीटर पर मार्शल से बात कर रहा था ।

"मेसेज दो. . . ओवर. . . ।" सोल्जर के जवाब में कहा गया ।

वो तो मेरे कान थे जो ट्रांसमीटर पर चले रहे वार्तालाप को सुनने की क्षमता रखते थे, अगर कोई और होता तो उसे कुछ भी सुनाई नही देता । वेसे वो शक्तिशाली ट्रांसमीटर था, जिस पर सोल्जर बात कर रहा था ।

"हमने सर एडलॉफ के समर्थकों के मुखिया क्लाइव को गिरफ्तार कर लिया है और इस वक्त वह हमारे कब्जे में है और हमें ये कामयाबी रीमा भारती की वजह से मिली है सर । क्लाइव का क्या करना है. . . ओवर ।"

"क्लाइव को उसी जेल में बंद कर दो, जिसमें डगलस को रखा गया है । अब हमें उससे कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां हासिल करनी हैँ. . . ओवर ।"'

"ओ०कै० । उसे अभी कडी सुरक्षा व्यवस्था के बीच उसी जेल में भिजवा दिया जायेगा. . -ओवर ।"

"वो रीमा भारती कहां है. ओवर ।"

"इसी गुप्त इमारत में है, जहाँ से मैं आपसे ट्रांसमीटर पर बाते कर रहा हूं। अब आपको रीमा भारती की शर्त मान लेनी चाहिये सर. . . ओवर ।"

" तुम बेवकूफ हो सोल्जर । तुम्हारे दिमाग में अक्ल का खजाना नहीं है । तुमने कूद कर ये फैसला कर लिया हे ।. . .ओवर ।"

"फ़. . . फैसला तो आपको ही करना है सर । मैं तो सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि रीमा भारती ने अपना बादा पूरा कर दिया है. . . ओवर ।"

"तुमसे ज्यादा रीमा भारती को मैं जानता हूँ सोल्जर । मैंने आज तक उसे देखा तो नहीं है, लेकिन उसके बारे में बहुत कुछ सुना है । रीमा भारती एक ऐसी जीनियस शखिसयत है कि उसने दुनिया भर के अपराधियों को हिलाकर रख दिया है । उसमे न जाने कितने सूरमाओं की कब्र खोदी है । उसका दिमाग कम्यूटर से ज्यादा तेज चलता है । यह जितनी खूबसूरत है, उससे ज्यादा खतरनाक भी है । मौत का दूसरा नाम रीमा भारती है, अगर कोई नागिन से इस बात की उम्मीद रखे कि वो डसेगी नहीं तो ऐसा सोचना बेवकूफी है सोल्जर । नागिन का काम तो इसना है और रीमा भारती तो एक ऐसी नागिन है, उसका काटा इंसान पानी नहीं मांगता. . . ओवर ।"

मैं मन-हीं-मन मुस्कुराई ।

मार्शल तो मेरे बारे में बहुत कुछ जानकारी रखता था ।

"आप खुलकर बताइये सर । बात क्या है. . .ओवर ।"

"रीमा भारती ने जो कुछ बताया है । बो तुमसे झूठ भी तो बोल सकती है । ये भी तो हो सकता है कि इसमें उसकी कोई चाल हो । वो हमें किसी जाल में फंसाना चाहती हो । उसके शब्दों की सच्चाई जाने बगेर फैसला करना बेवकूफी होगी । पहले इण्डिया में मौजूद अपने सोर्सेज से इस बारे में जानकारी हासिल करो कि क्या वो सच बोल रहीँ है? क्या उसने वाकई आई०एस०सी० छोड़ दी हे? उसके बाद दूध का दूध और पानी-का पानी होजायेगा. . ओवर ।"

"ओ०के० सर, फिलहाल रीमा भारती का क्या करना है ।

"जब तक हमें उसके बारे में 'कन्मर्मेंशन‘ नहीं मिल जाती तब तक उसे नजरबंद रखो । ओवर. . . ।"

" बेहतर सर ।"

उसके बाद मुझे आवाज सुनाई नहीं दी ।

जाहिर था कि वार्तालाप खत्म हो गया था ।

मुझे मार्शर एक बेहद धूर्त और चालाक इंसान लगा थे ।

अगर वो डाल-डाल था तो मैं पात-पात थी । मैं जानती थी कि ऐसी नौबत भी आ सकती है । अत: मैं पहले ही खुराना से ट्रांसमीटर पर सम्पर्क स्थापित करके सब कुछ बता चुकी थी ।

सोल्जर को वहीँ सब सुनने को मिलना था, जो मैंने बताया था । तभी सोल्जर दरवाजा खोलकर बाहर निकला ।

"इसे ले जाकर कमरे में बंद कर दो ।" मुझसे चंद कदमों के फासले पर ख़ड़े दोनों सैनिकों को सम्बोधित करके बोला सोल्जर । इस बारे में तो मैं सुन चुकी हूं , लेकिन प्रकट में चौकी…"य. . .ये तुम क्या कर रहे रहेहो ?"

"आई-एम सॉरी रीमा । तुमने मुझे अपनी वर्तमान पोजीशन के बारे में जो कुछ भी बताया था । पहले मैं उस बारे-में कंफर्म करूंगा । तब तक के लिये तुम्हें नजरबंद रखना पड़ेगा ।"

"क्या तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं है?"

"ये मार्शल साहब का आदेश है । मेरे विश्वास करने या ऩ करने से कुछ नहीं होने बाला !" . . इस बीच मेरे जिस्म से गनों की नाले आ चिपकी थीं । सैनिक मुझे धकेलते हुए सामने वाले कमरे की तरफ़ बढ गये । दो पल बाद सेनिक मुझे उस कमरे में बंद करके बापस लौट गये थे !

मैंने उस कमरे का निरीक्षण किया वह एक छोटा कमरा था । एकदम खाली कमरे में सामने वाली दीवार में एक लोहे का दरवाजा था । जिसके मुंह पर लोहे का मजबूत ताला लटका हुआ था । दरवाजे के बगल में एक खिड़की बनी हुई थी । उसमें लोहे की मजबूत छड़े लगी हुई थीं । कोने में एक मेज रखी हुई-थी । यह कमरा पुराने जमाने का कैदखाने जैसा था । मैं फर्श पर बैठ गई और दीवार से पीठ सटाकर आंखें बंद कर लीं । अब मुझे आगे पेश आने वाले हालातों का इंतजार था ।

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