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हिन्दी नॉवल -ट्रिक ( By Ved Parkash Sharma) complete

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विजय- विकास के साथ उसने अलफांसे का नाम भी सुन रखा था ।

ऐसा दुनिया में भला कौन हो सकता था जिसने विजय-विकास का नाम सुना हो मगर अलफांसे का नाम न सुना हो ।

वह तो बस यह देख रही थी यह कि यह है वह अंतरांषट्रीय मुजरिम दुनिया के हर देश की पुलिस को जिसकी तलाश है----अलफांसे को सामने पाकर नजमा अपने सम्पूर्ण जिस्म में अजीब-सा रोमांच महसूस कर रही थी । उसी वक्त कानो में विजय की आवाज पडी । वह अलफांसे से पूछ रहा था-----" तुम यहां बेमौसम के आम की तरह कहाँ से टपक पड़े लूमड़ मियां?"

"मैँ कब कहाँ टपक पडूं खुद नहीँ जानता ।"

“बात तो ठीक है प्यारे.......!

मगर विजय का वाक्य अधूरा रह गया । विकास ने आगे बढकर पूरी श्रद्घा के साथ अलफांसे के चरण स्पर्श किए थे ।

अलफांसे ने उसका कान पकड़कर ऊपर उठाते हुए कहा----"जीते रहो !"

" जीत तो गए ही है लूमड़ । तुम बताओ-यहाँ गीत गाते कहां घूम रहे हो?"

" मदद करने आया था तुम्हारी मगर, सही समय पर खिड़की के नीचे न बैठ गया होता तो ये मोहतरमा मेरा ही बैंड बजा चुकी थी ।" कहने के साथ उसकी आखे नजमा पर जम गई ।

"व.... वे क्षण ऐसे थे जिनसे 'तुरंत' दोस्त और दुश्मन की पहचान नहीं की जा सकती यी ।" थोडी हड़बड़ाहट के बाद नजमा कहती चली गई…"उस वक्त मुझे लगा--खिड़की पर शायद असलम का ही कोई साथी है ।"

"बावजूद इसके कि मेरी गोली इसे लगी थी । कहने के साथ वह असलम की लाश की तरफ बढता हुआ बोला…“यह शख्स तुम लोगों के पास मानव बम बनकर आया था ।

उटूदेश्य था-एक ही धमाके में अपने साथ तुम तीनों को भी खत्म कर देना । खासतौर पर तुम दोनो को !" लाश के नजदीक बैठकर उसने विजय-विकास की तरफ़ इशारा किया और फिर लाश के जिस्म पर मौजूद पठानी सूट की शर्ट ऊपर उठाता बोला…“ये देखो।"

तीनो ने असलम के पेट पर मोजूद वेल्ट और बेल्ट के अंदर घुमड़ रहे आर.डी.एक्स को देखा । कुछ देर शांत रहने के बाद विलय ने कहा…"वह हम पहले ही जान चूके हैं प्यारे ।"'

"वह तो 'ऐन वक्त' पर तुम्हारे द्वारा इस पर फायर करने से ही जाहिर है।” लाश के नजदीक से उठकर उनकी तरफ आते हुये अलफांसे ने कहा----“मगर सवाल ये हे--तुमने इसका इरादा कब कैसे भांपा?"

" पहले इसका नजमा के सामने अड़ना । फिर हमारे आने पर दिलजले के बोरे में पुछना और दिलजले के सामने आते ही हमने जो चमक इसकी आंखों देखी वह, वह चमक थी जो इंसान को आंखों में अपने जीवन का सबसे अहम मकसद पाते वक्त उभरती है । केवल एक पल पूर्व, तब...... जब दिलजला कमरे में नही था…इसकी आंखों में निराशा और मायुसी के साए मंडरा रहे थे । एक ही पल बाद दिलजले को देखते ही वे ' जगमगा उठी । उसकी तरफ वढ़ते वक्त इसका हाथ अपने पेट की तरफ बढा था । हमारी छठी इंर्दिय ने कहा…"खतरा ।' और. . उसके बाद तो वह करना ही था जो किया ।"'

"ठीक कह रहे हो जासूस प्यारे । यह तुम्हारे विकास को भी खत्म करने के लालचवश नाकाम हो गया । इस लालच में न पड़ता तो इस वक्त यहां तुम्हारे जिस्म के पुर्जे अलग-अलग बिखरे पड़े होते ।"'

"ऐसा नहीं हो सकता था ।"

" क्यो?"

" तुम जो खिडकी के उस तरफ़ घात लगाए बैठे थे । क्या तुम ऐसा हो जाने देते !"

बड़ी ही आकर्षक मुस्कान उभरी अलफांसे के होंठो पर । बोला'-""कह तो तुम ठीक रहे हो ।"

"अब ! " विजय ने इस तरह कहा जैसे एक चेप्टर पूरा होने पर दुसैरा चैप्टर शुरू किया हो…"सवाल ये उठता है…खिड़की के पीछे घात लगाए तुम बैठे क्यों थे । तुम्हें कैसे पता कि हम यहाँ हैं और ये महाशय हमारा बेड़ा-गर्क ठंडी सड़क करने यहां पहुच रहे हैं?"

"कई लाख रुपए का सवाल है ये ।"’

“हमारे सवाल की कीमत की बघिया मत बैठाओ लूमड़ ! जमाना लाखों का नहीं करोडों का है ।"'

" संभलकर बोलो झकझकिये ।" अलफांसे के होंठो पर बडी ही रहस्यमय मुस्कान उभरी----" तुम्हारे सवाल का जवाब देने की कीमत मांगने बाला हूं ! खुद ही करोंड़ो का कहोगे तो कीमत करोंड़ो में देनी पड़ेगी !"

"मतलब क्या हुआ इस लॉफ्फाजी का?"

“तुम्हें मालूम है, मैं फ्री फंड में कोई काम नहीं किया करता ।"

"मालूम है ।”

"इस वक्त तुम्हें मोहम्मद इकराम की तलाश है ।"

"कैसे जानते हो?"

"उसे छोड़ो । दिमाग केवल इस सच्चाई पर अटकाए रखो कि उस तक पहुंचने का तुम्हारे पास एक और केवल एक ही जरिया था । वह जो इस वक्त लाश में तब्दील हुआ इस कमरे में पड़ा है । इसकी मौत के साथ रास्ता ब्लॉक हो चुका है तुम्हारा । अर्थात मोहम्मद इकराम तक पहुंचने का तुम्हारे पास कोई जरिया नहीं क्या है ।"

"जिंदगी में पहली बार दुरुस्त फरमा रहे हो तूमड़ मियां ।"

"में बता सकता है इस वक्त वह कहाँ है?"

"बता दो । तुम्हारे बच्चे जिएं, बड़े होकर तुम्हारा खून. . . ।"

"वही कह रहा हूं ।” विजय की बात काटकर अलफांसे कहता चला गया----"उसका पता बताने की कीमत देनी होगी । केवल तुम्हारी दुआओं के बदले या की फ्री फडं में मैं उसका पता बताने वाला नहीं हूं !

" यानी यहां तुम हमसे सौदा करने के लिए पधारे हो ।"

"ठीक समझे ।" कहने के साथ उसने आराम से सोफे पर बैठकर पैर सेंटर टेबल पर फैला दिए थे----“अब यह तुम्हें तय करना है कि तुम्हारा सवाल लाखों का था या करोडों का ।"

"अजी हमारे सवाल का क्या है, दो कौडी का भी नहीं था साला ।"

“मुझें मालूम है, पैतरा बदलने में तुम माहिर हो ।" अलफांसे ने पूरे इत्मीनान के साथ कहा-“कानों में घासलेट डालकर सुनो----" मेरे द्वारा मोहम्मद इकराम का पता बताने की कीमत एक लाख अमेरिकी डालर होगी । अर्थात सैंतालीस लाख रुपए। बोलो । मंजूर हो तो उगलूं पता?"

"य. . तो आप क्या बात कर रहे है क्राइमर अंकल?" बहुत देर से खामोश विकास अंतत: बोल ही पड़ा-“आप हमसे सोदेबाजी करेगे? हमसे ।"

"बात जब बडों में चल रही हो तो बच्चों को बीच में नहीं बोलना चाहिए ।"

" क. . किसी बात कर रहे हैं आप । कम से कम हमसे आपने कभी कोई सौदेबाजी नहीं की ।"

"जीवन चक्र का ऐसा कोई नियम नहीं है विकास कि जो पहले नहीं हुआ वह आज नहीं हो सकता । मेरा तो काम ही इन्फॉरमेशंस बेचना है । किसी और को बेचूं या झकझरिय को ।"

"म.. मगर मदद आपने हमारी पहले भी कई बार की है । इस तरह कीमत कभी नहीं मांगी ।"

 


"गलतफहमी है तुम्हारी । कीमत मैं हमेशा वसूल करता हूं ! ये धंधा है मेरा । कहावत सुनी होगी----" घोड़ा अगर घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या? ये अलग बात है---कीमत धन के रूप में शायद पहली बार मांग रहा हू। झकझकिया तुमसे बेहतर जानता है…मैंने कभी इसकी कोई मदद कीमत वसूल किए बगैर नहीं की, उस कीमत की शेप अलग मौकों पर अलग रहीं है । कभी मैंने अपनी जान की कीमत पर इसकी जान बचाई, कभी अपने किसी और फायदे के लिए इसकी मदद की मगर इस वक्त मैं कही फंसा हुआ नहीं हूं , इसलिए कीमत धन के रूप में ही चुकानी होगी । एक बार फिर दोहराता हूं----फ्री फंड में मैं किसी की मदद नहीं किया करता ।"

"तो ठीक है । हमें हरगिज--हरगिज मंजूर नहीं है ये सौदा ।" एकाएक लड़का भडक उठा…"अपनी इन्फॉरमेंशन आप अपने पास रखें । हम अपने ढंग से खुद मोहम्मद इकराम का पता लगा लेगे ।"

" ये बात झकझकिए से कहलवा दो ।" अल्फांसे मुस्कराया---" यहाँ से उठकर चला जाऊंगा ।"

“अंकल ।" विकास विजय की तरफ घूमा-…"'कह क्यों नहीं रहे आप हमें इनसे कोई इन्फॉरमेंशन नहीं चाहीये ।”

" बड़े जब आपस में बातें कर रहे हों तो छोटों को बीच में नहीं बोलना चाहिए ।" कहने के बाद उसने विकास को कुछ भी कहने का मौका दिए बगैर अलफांसे की तरफ घूमकर कहा---" उड़ तो वाकई तुम काफी ऊंचे रहे हो लूमड़ मियां । जिस किस्म के सौदे आज़ तक दुसरे लोगों से करते रहे थे सौदा आज हमसे कर रहे हो । विजय दी ग्रेट से । शर्म आनी चाहिए तुम्हें । डूबकर मर जाना चाहिए चुल्लू-भर पानी में ।"

" ऐसा तो अई.एस.आई का चीफ तक नहीं कर सका । मैं भला कैसे कर सकूंगा?"

"नुसरत-तुगलक ने काफी कोशिश की कि वह चुल्लू-भर पानी में डूब मरे मगर बह ऐसा नहीं कर सका ! मजबूर होकर उन्हें ISI के चीफ की नाक काटनी पड़ी !"

" क. . किसी बात कर रहे हैं आप । कम से कम हमसे आपने कभी कोई सौदेबाजी नहीं की ।"

"जीवन चक्र का ऐसा कोई नियम नहीं है विकास कि जो पहले नहीं हुआ वह आज नहीं हो सकता । मेरा तो काम ही इन्फॉरमेशंस बेचना है । किसी और को बेचूं या झकझरिय को ।"

"म.. मगर मदद आपने हमारी पहले भी कई बार की है । इस तरह कीमत कभी नहीं मांगी ।"

"गलतफहमी है तुम्हारी । कीमत मैं हमेशा वसूल करता हूं ! ये धंधा है मेरा । कहावत सुनी होगी----" घोड़ा अगर घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या? ये अलग बात है---कीमत धन के रूप में शायद पहली बार मांग रहा हू। झकझकिया तुमसे बेहतर जानता है…मैंने कभी इसकी कोई मदद कीमत वसूल किए बगैर नहीं की, उस कीमत की शेप अलग मौकों पर अलग रहीं है । कभी मैंने अपनी जान की कीमत पर इसकी जान बचाई, कभी अपने किसी और फायदे के लिए इसकी मदद की मगर इस वक्त मैं कही फंसा हुआ नहीं हूं , इसलिए कीमत धन के रूप में ही चुकानी होगी । एक बार फिर दोहराता हूं----फ्री फंड में मैं किसी की मदद नहीं किया करता ।"

"तो ठीक है । हमें हरगिज--हरगिज मंजूर नहीं है ये सौदा ।" एकाएक लड़का भडक उठा…"अपनी इन्फॉरमेंशन आप अपने पास रखें । हम अपने ढंग से खुद मोहम्मद इकराम का पता लगा लेगे ।"

" ये बात झकझकिए से कहलवा दो ।" अल्फांसे मुस्कराया---" यहाँ से उठकर चला जाऊंगा ।"

“अंकल ।" विकास विजय की तरफ घूमा-…"'कह क्यों नहीं रहे आप हमें इनसे कोई इन्फॉरमेंशन नहीं चाहीये ।”

" बड़े जब आपस में बातें कर रहे हों तो छोटों को बीच में नहीं बोलना चाहिए ।" कहने के बाद उसने विकास को कुछ भी कहने का मौका दिए बगैर अलफांसे की तरफ घूमकर कहा---" उड़ तो वाकई तुम काफी ऊंचे रहे हो लूमड़ मियां । जिस किस्म के सौदे आज़ तक दुसरे लोगों से करते रहे थे सौदा आज हमसे कर रहे हो । विजय दी ग्रेट से । शर्म आनी चाहिए तुम्हें । डूबकर मर जाना चाहिए चुल्लू-भर पानी में ।"

" ऐसा तो अई.एस.आई का चीफ तक नहीं कर सका । मैं भला कैसे कर सकूंगा?"

"नुसरत-तुगलक ने काफी कोशिश की कि वह चुल्लू-भर पानी में डूब मरे मगर बह ऐसा नहीं कर सका ! मजबूर होकर उन्हें ISI के चीफ की नाक काटनी पड़ी !"

"ये क्या बके जा रहे हो लूमड़ मियां । पाकिस्तान के अजीमुश्शान जासूसों ने, पाकिस्तान ही की जासूसी संस्था के चीफ की नाक काट डाली । दिमाग तो उल्टा -- पुल्टा नहीं गया है तुम्हारा? ऐसा भला क्यों और कैसे हो सकता है?"

" ऐसा हो चुका है झकझकिऐ ।" अलकांसे ने कहा----" और ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि आई.एसआई. का चीफ़ हैरी को कैद में नहीं बनाए रख सका । वह भाग निकला । उसी की वजह से तुम्हे यह जानकारी मिली कि मारकेश लाहौर में तुम्हारे प्रधानमंत्री पर हमला करने वाला है । चीफ को उन्होंने उसके उसी गुनाह की सजा. . . ।"

 


विजय ने उसकी बात काटकर कहा…“लगता है लूमड़ तुम इस बारे में जरूरत से ज्यादा जानकारियां रखते हौं ।"

"अब तुम्हें इल्म हो गया होगा----" मैं ऐसे ही सैंतालीस लाख रुपए नहीं मांग रहा ।" अलफांसे की मुस्कान गहरी होती चली गई…"मेहनत की है शुरू से उन नमूनों को वाच कर रहा हू जिनकी साजिश के तहत हिन्दुस्तान में साम्प्रदायिक दंगे हुए । मोहम्मद इकराम का अपहरण हुआ" और वक्त रहते तुमने मुझे कीमत नहीं दो तो तुम्हारे प्रधानमंत्री का मर्डर भी हो सकता । अपनी मेहनत की कीमत मांग रहा हूं झकझकिए । मंजूर हो तो दो । न मंजूर हो तो मैं चला ।" कहने के साथ वह सोफे से उठकर खड़ा हो गया ।

"अमां-अमां-बैठो लूमड़ भाई । कहां चल दिए उठकर? घर में चार बर्तन होते हैं तो खटर…पटर करते ही रहते हैं । छोटी- मोटी कहन-सुनन का मतलब ये नहीं होता कि बोरिया-बिस्तर ही गोल कर लिया जाए ।" कहता हुआ विजय लपककर उसके नजदीक पहुच गया था !!"

उसके इस पैंतरे वाले अंदाज पर अलफांसे मुस्करा उठा, वह बोला…"नुसरत-तुगलक द्वारा आई-एस-आई के चीफ की नाक काटने से संबंधित बात का जिकर् मैंने किया ही इसलिए था ताकि तुम्हें एहसास हो जाए कि इस केस में मैं तुम्हारे लिए कितना मददगार साबित हो सकता हूं और तुम्हारी अदाएं बता रही हैं…जो एहसास मैं तुम्हें कराना चाहता था वह हो चुका है ।

अब एक बात और सुन लो-नुसरत-तुगलक के षडूयंत्र का ऐसा कोई हिस्सा नहीं है जिसकी जानकारी मुझे न हो । समझ सकते हो -- अगर मुझे उनके हर कदम की जानकारी न होती तो उनके उस प्यादे का पीछा करता यहाँ तक नही पहुच सकता था जिसे उन्होंने तुम्हें ब्लास्ट करने के लिए भेजा था ।"

"सवाल ही ये है लुबड़ मियां । उनके षडूयंत्र की, उनके हर कदम की जानकारी तुम्हें है तो है केसे?"

"आम खाना छोडकर जो पेड़ गिनते है वे पेड़ ही गिनते रह जाते हैं । आम कोई और "चट" कर जाता है ।"

"हमे आम खाते-खाते पेड़ गिनने की बीमारी है ।"

"तो गिनो पेड़ यानी सुनो ।" कहने के बाद एक क्षण के लिए अलफांसे चुप हुआ, किर चहलकदमी--सी करता हुआ बोला----"इतना तो तुम जानते ही हो-मेरे चेले दुनिया भर में फैले हुए है । उनपे से एक बह बूढा भी है जिसके जरिए नुसरत-तुगलक ने हैरी को "मेगा स्ट्रीट’ के वंगला नम्बर आर चौंसठ में बुलावाया था । उन दिनों मैं न्यूयार्क ही में था । उसने मुझें जानकारी दी । पता लते ही मेरे कान खडे हो गए । समझने में देर नहीं लगी कि नुसरत- तुगलक द्वारा हैरी का अपहरण बेसबब नहीं हो सकता । इसका मतलब किसी बड़े चक्कर में लगे हुए हैं । अपना तो काम ही ऐसे चक्करों को सूघंकर उनके पीछे लगना है ताकि वक्त आने पर मेहनत से जुटाई हुई अपनी जानकारियों की कीमत वसूल कर संकू। वही इस वक्त कर रहा हूं । अब शायद तुम्हें बताने की जरूरत बाकी नहीं बची है कि मैं तभी नुसरत-तुगलक के पीछे लगा हुआ हूं और इसी कारण मुझे उनके सभी मंसूबों की जानकारी है ।"

"मोहम्मद इकराम को लेकर उनका क्या मंसूबा हे?"

“वो टीबी. पर उसका ऐसा इंटरव्यू प्रसारित करेगे जिससे तुम्हारे देश में भड़के साम्प्रदायिक दंगे और ज्यादा भडक उठें ।"

" क्या वे ऐसा इंटरव्यू तैयार कर चुके हैं?"

"नहीं किया तो कर लेंगे ।"

"यह सव वे कब और कहाँ करने वाले है?"

"बताने की कीमत सैंतालीस लाख रुपए ।" अलफांसे का लहजा एकदम सपाट था 1

इतना सपाट कि विजय उसे घूरता रह गया । कुछ बोल नहीं सका !

जबकि अलकांसे अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ कहता चला गया ---- "अगर तुमने यह सोचा था कि ठीक उस तरह मेरे मुंह से सैंतालीस लाख की इनफॉरमेशन फ्री में उगलवा लोगे जिस तरह कोर्ट में वकील गवाह पर अपने सवालों की बौछार करके अपने काम की बात उगलवा लेते हैं तो मैं कहूंगा'---"तुम्हारा दिमाग घूम गया है । अलफांसे से ऐसी उम्मीद करना तुम्हारी बेवकूफी के अलावा कुछ नहीं हो सकती । मैंने तुम्हें केवल यह जानकारी दी है कि मेरे पास क्या-वया जानकारियां हैं । उनसे तुम्हें कोई फायदा होने बाला नहीं है, इसलिए फ्री में दे दी । जिससे फायदा होने वाला है, वह जानकारी बगैर कीमत लिए नहीं दूगा ।”

"समझ रहे हैं प्यारे । अच्छी तरह समझ रहे हैं । जितनी भी बातें तुमने कहीं उनका एक ही उददेश्य है । यह साबित करना कि तुम्हारे पास वे सभी जानकारियां हैं जिनकी इस वक्त हमे जरूरत है और ऐसा तुमने इसलिए किया है ताकि हम तुमसे सौदा करने पर मजबूर हो जाएं ।"

अलफांसे ने अपने एक-एक शब्द पर जोर देते हुए कहा --- " और मजबूर तुम्हें होना पड़ेगा ।"

"अजी ठेंगा ।" विजय ने किसी झगडालू स्त्री की तरह सचमुच ठेंगा दिखाया----" ठेंगा मजबूर होगा हमारा ।"

"मतलब !"

"नहीं बताना चाहते तो मत बताओं । हम खुद मालूम कर लेंगे ।"

"ओके । मैं चलता हूँ ।" कहने के साथ अत्तफांते उस खिडकी की तरफ बढ़ गया जिसके जरिए आया था ।

विकास ने पलटकर विजय की तरफ देखा । भाव ऐसा या जेसे जानना चाहता हो-क्या वह सचमुच अलफांसे को जाने दे रहा है? उधर नजमा की समझ में आकर नहीं दे रहा था कि विजय और अलफांसे के बीच यह अजीब-सा सम्बंध आखिर है क्या?

वह विजय का दोस्त है या दुश्मन ?

खिड़की के नज़दीक पहुच चुका अलफांसे ठिठका। घूमा और बोला---" मुझे पक्का यकीन है-जो जानकारियां मेरे पास अपनी तिगड्रमों से तुम दोनों भी जल्दी ही उन्हें जुटा लोगे मगर यकीन मानना विजय तव तक भारत के किसी टी. वी पर मोहम्मद इकराम का भड़काऊ इंटरव्यू प्रसारित हो चुका होगा ।"'

"अब तक तुमने सुनाया लूंमढ़ मियाँ, हमने सुना । अब हम सुना रहे है, कानों में घासलेट डालकर सुनो ।" विजय इस ववत अपने जलाल पर नजर आ रहा था…"जो इन्मफॉरमेशन तुम्हारे पास है । जिनके बारे में तुम्हारा कहना है कि उन्हें तुमने बड़ी मुशिक्ल ' से जुटाया है वे दुनिया में हमारे और सिर्फ हमारे ही काम की हैं, किसी और के लिए उनका कोई महत्व नहीं है । मतलब ये हुआ कि अगर उन्हें हमने नहीं खरीदा तो" तुम्हारी सारी तथाकथित मेहनत पर पानी फिर जाएगा । एक दमड़ी हाथ नहीं लगेगी तुम्हारे । उन इन्फॉरमेशन का दुनिया में दूसरा कोई खरीदार नहीं है । चटनी बनाकर सारी जिंदगी चाटते रहना उसे ।" .

"कहना क्या चाहते हो?"

"खरीदार जब एक और केवल एक ही तो विक्रेता को मुंहमांगी कीमत कभी नहीं मिल सकती । खरीदार उसे जितने में चाहेगा खरीदेगा । क्योंकि जानता है, वह नहीं खरीदेगा तो विक्रेता को कुछ नहीं मिलने वाला ।"

"यानी कीमत कम करना चाहते हो?"

"ओंर तुम्हें करनी पडेगी ।"

" मैं कब अपनी मुंहमागी कीमत पर अड़ा हुआ हूं।”

"तो ठीक है, एक लाख डॉलर नहीं केवल एक लाख रुपए मिलेगे ।"

"गुरु ।" विकास ने कहा…"य. . .ये आप क्या कर रहे हैं । ये तो क्राइमर अंकल के सामने घुटने टेकने जैसी बात हो गई ।"

"तुमसे पहले भी कहा जा चुका है दिलजले, बडों के बीच में नहीं बोलते ।” कहने के बाद उसने विकास को कुछ भी कहने का मौका दिए बगैर अलकांसे से कहा…"बोलो लुमढ़ मियां । एक लाख रुपए मंजूर हैं या नहीं ।"

"एक ही झटके में काफी तगड़ी बर्गिर्निंग कर रहे हो झकझकिए !"

"मंजूर तो बोलो, न मंजूर हो तो फूटो ।"

"मुझें तो सौदा करना है तुमसे ।" अलफांसे के होंठों पर बड़ी ही जालिम मुस्कान थी…“साबित करना है कि अलपांसे तुमसे भी रकम ऐठ सकता है, इसलिए मंजुर है ।"

"रकम अभी नहीं ।" विजय ने दुसरी शर्त रखी !

अलफांसे ने पूछा…क्यों?"

"क्यों का क्या मतलब । कंगले है । एक लाख रुपए जैब में रखकर नहीं घूमते !"

"फिर कब मिलेगी?"

"राजनगर पहुंचने पर ।"

"क्या जरूरी कि तुम अपना वादा निमाओगे ही?"

"ऐसा कहकर तुम एक ठाकुर की जुबान की भदृद पीट रहे हो । ठाकुर एक बार जो कह देता हे, कह देता है । सिर कटा सकता है वादे से नहीं मुकर सक्ता । वो कहावत तो तुमने सुनी होगी कि प्राण जाए पर वचन. . . ।"

"में जानता हूं तुम कैसे ठाकुर हो ।" अलफांसे उसकी बात काटकर कहता चला गया…"यह भी जानता हूं----वदा करते वक्त ही तुम्हारा पक्का निश्चय है कि तुम इस वादे को कभी पूरा करने वाले नहीं हो । इसके बावजूद मैं यह सौदा कबूल कर रहा हूँ तो इस के दो कारण हैं ।

 


पहला-सचमुच इस वक्त जो इन्फॉरमेशंस मेरे पास है उनका एक ताख में भी मुझे कोई दूसरा खरीदार नहीं मिलेगा । दूसरा-मुझे विश्वास है, तुम इस सौदे से मुकरने की चाहे जितनी कोशिश करो मगर मैं वह रकम तुम्हरि हलक से निकाल लूंगा जो तय हुई है । एक हो घुटे हुये सूदखोर की तरह मुझे अपनी रकम निकालनी अच्छी तरह आती है ।"

"तो बताओ-मोहम्मद इकराम इस वक्त कहां हैं?"

“आबू सलेम का नाम सुना है?"

“वो इंडियन माफिया यो भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को अपनी उंगलियों पर नचा रहा है?"

"शायद यह भी तुम्हें मालूम होगा कि आजकल पाकिस्तानी सरकार ने उसे पनाह दे रखी है मगर यह मालूम नहीं होगा कि इसके बदले में वह नुसरत तुगलक के लिए काम कर रहा है ।"

"जो नहीं मालूम था, वह अब मालूम हो गया है ।"

"मोहम्मद इकराम इस वक्त उसी के कव्जे में है । असलम ने उसे हरशरण से लेकर आबू सलेम के हेडक्वाटर पर पहुचाया था । वह सव मैंने अपनी आंखो से देखा है ।"

'आबू सलेम का हैड क्वार्टर है कहाँ?"

"मैं अपने साथ तुम्हें वहां ले जा सकता हूं !"

" य. . .ये कैसा इंजेक्शन लगा रहे हो मुझे मोहम्मद इकराम बुरी तरह छटपटा रहा था । डॉक्टर ने कहा----"घबराओ मता केवल पेन किलर है ।"

बेड पर पडे इकराम ने एक बार फिर पुष्टि विरोध करने की कोशिश की मगर कामयाब न हो सका । उसे एक नहीं, चार तरफ़ से चार आदमियो ने जकड़ रखा था । एक ने पैर, एक ने बाई बाँह व एक ने दाई और एक ने सिर । पांचवां डाक्टर था जो उसे इंजेक्शन लगाने की कोशिश कर रहा था । उन आदमियों से जकड़ा इकराम 'मचलने' से ज्यादा कुछ न कर सका जो शक्ल से ही गुंडे नजर आ रहे थे ।

उसकी 'मचलन' देखकर वे खिल्ली उड़ने वाले अंदाज में हैंस रहे थे ।

अंतत डॉक्टर ने उसकी बांह में इंजेक्शन लगा दिया । जहाँ इंजेक्शन लगाया था, स्प्रिट युक्त रुई से उस स्थान को रगड़ता हुआ बोला----" बेवजह वजह परेशान हो रहे हो ! तुम्हें मारना ही होता तो यहां क्यों लाए जाते? तुम्हारी जान की हिफाजत तो हमे इस तरह करनी है जैसे मां अपने बच्चे की करती है ।"

"क.. कौन हो तुम लोग?"

"बताने की इजाजत नहीं है ।" कहने के साथ डॉक्टर अपना काम पूरा करके पीछे हट गया ।

एक साथ चारों गुंडों ने भी छोड दिया उसे ।

उसने एक झटके से उठने की कोशिश की मगर सफ़ल न हो सका !

उल्टी चीख निकल गई ।

कारण था…दोनों टांगो में एक साथ दौड़ती चली दर्द की लहर ।

उसकी हालत देखकर गुंडे जैसे चारों शख्स एक बार फिर खिलखिला उठे ।

तभी ।

गैलरी से कदमों की आवाज आई ।

"भ. भाई जी ।" एक के मुंह से निकल--"' भाई जी आ गए ।'"

डाँक्टर सहित सभी एकदम खामोश हो गए । जैसे सांप सूंघ गया हो ।

सावधान की मुद्रा से आ गए थे वे सब । नजरे कमरे के एक मात्र दरवाजे की तरफ उठ चुकी थी । खुद इकराम भी उधर ही देख रहा था !

वहाँ, जहाँ जाकर जूतों की ठक-ठक रूक गई थी ।

सबकी नजरें वहीं स्थिर हो गई ।

बहुत ही अनाकर्षक था वहाँ खड़े श'ख्स का व्यक्तित्व !

इतना ज्यादा कि मोहम्मद इकराम की नजर भी जब एक बार उस पर पडी तो वहीं चिपकी रह गई !

 


करीब छ: फुट लंबा था वह ।

गोल चेहरे वाला ।

तदुरुस्त ।

गोरा-चिटूटा ।

जिस्म पर शानदार नीला सूट था । गते में सोने की चेन । आंखों पर 'रेबेन' का सबसे महंगा चश्मा । केवल कनपटियों के बाल सफेद थे । बाकी काले ! कई उंगलियों में हीरे, पन्ने , मूंगे और माणिक की अंगूठियाँ पहने हुए था । एक पल. . केवल एक पल के लिए दरवाजे पर ठिठका था वह । अगले पल बेड की तरफ बढते हुए वहां मौजूद लोगो से कहा…"तुम जाओ ।"

मोहम्मद इकराम ने महसूस किया…-उसकी आवाज में भी एक खास खनक थी ।

वे पांचों इस तरह कमरे से गायब हुए जेसे कभी थे ही नहीं ।

बेड के नजदीक पहुचते हुए उसने आखों से चश्मा उतार लिया ।

मोहम्मद इकराम उसकी नीली आंखों में मोजूद गजब की चमक को देखता ही रह गया जबकि उसने पूछा…“कैसे हो मिस्टर इकराम?"

"ठ...ठीक हू।" ये शब्द स्वत: मोहम्मद इकराम के मुंह से फूट फड़े !

'चिंता मत करो । कल तक पूरी तरह ठीक हो जाओगे ।" कहने के साथ उसने बड़े ही अपनत्व वाले भाव से इकराम के बालों को सहलाया ।

" ककक.......कोन हो तुम?"

" हां मेरे आदमियों ने बताया ।" चश्मा बेड पर डालने के बाद उसने जेब से डनहिल का पैकेट और सोने का लाइटर निकालने के बाद कहा…"जब से तुम होश में आए हो, एक ही बात जानना चाहते हो। यह कि हम कौन हैं?"

कहने के बाद उसने सिगरेट जलाई । पैकेट व लाइटर जेब में डालने के बाद बेड की परिक्रमा-सी करता हुआ बोला----- " मैं तुम्हें यही बताने आया हूं !

मोहम्मद इकराम चुप रहा । बोलने की जरुरत भी महसूस नहीं की उसने ।

मंत्रमुग्ध सा वस 'उसे’ देखे जा रहा था । किर एकाएक उसने अपना हाथ बैड पर लेटे इकराम के हाथ की तरफ बढाते हुए कहा…" मुझें आबू सलेम कहते है ।"

हाथ तो खैर इसलिए मिल गए क्योकिं स्वाभाविक अंदाज में इकराम का हाथ भी उसके हाथ की तरफ बढ चुका था मगर हकीकत ये है-उसका नाम सुनते ही इकराम के जेहन को जबरदस्त धक्का लगा था । चेहरा पलक झपकते ही इस तरह पीला पड़ गया जैसे हल्दी पौत दी गई हो । उसके ढीले पड़ गए हाथ को एक बार फिर अपनत्व के भाव से झटकते हुए आबू सलेम ने कहा ---" लगता है तुम मेरे नाम से वाकिफ हो ।"

"अ. ..आपके नाम से भला कौन वाकिफ नहीं है मगर.. ।"

"मगर?” उसका हाथ छोड़कर आबू सलेम ने सिगरेट में कश लगाया !

हलक सूख रहा था मोहम्मद इकराम का । बोलने की कोशिश में आवाज अटक-अटक कर निकल रही थी । जैसे अचानक गले में कांटे उग आए हों । काफी प्रयत्न के बाद कह सका-----मैं.... ..मैं सोच भी नहीं सकता था कि आप इतने खूबसूरत होंगे ।”

वह मुस्कराया । गुलाबी होंठो पर मुस्कान बहुत अच्छी लग रही थी । बोला-----" मेरी समझ में आज तक यह नहीं आया कि मेरा नाम सुनकर अच्छे - खासे खूबसूरत लोग बदसूरत क्यों नजर जाने लगते है।"

"अ. . आपके बारे में अपावाहें ही इतनी हैं के .. ।" एक बार फिर मोहम्मद इकराम के कंठ में कांटे से चुभ गए ।

'कि ?" आबू सलेम ने पूछा ।

" छ... . .छोड़िए . .मैं ये जानना चाहता हूं मुझें यहाँ क्यों बुलाया गया है?"

"वडी जल्दी जानना चाहते हो तुम ये?"

" ज.... . .जी ।"

"बता देते हैं ।" काहने के बाद वह कमरे के दरवाजे की तरफ घूमा ! थोड़ी ऊंची आबाज में बोला-----, है?"

"में हूं भाई जी !" जादू के से जोर से दरवाजे पर आदमी प्रकट हुआ !

" भई इकराम साहब जानना चाहते हैं इन्हें यहाँ वयों लाया गया है ! " बहुत ही सामान्य अंदाज़ में बात कर रहा था वह…“एक व्हील चेयर ले आओ ।"

" "अभी आती है भाई जी ! " कहकर वह अभी गायब हो गया !

मौका देखकर मोहम्मद इकराम ने सवाल किया…"मुझे गोलियां मारी थी । फिर यहाँ अपके पास कैसे पहुच गया और ये जाह कौन-सी है?”

“इस वक्त तुम पाकिस्तान में हो ।"

"प . . .पाकिस्तान !"

आबू सलेम के कुछ कहने से पहले दो आदमी व्हील चेयर के साथ कमरे में प्रविष्ट हुए ।

आबू सलेम ने अपना ध्यान उस पर से हटाकर उनसे कहा---“इकराम साहब को बिस्तर से उठाकर इस पर बैठा दो । ध्यान रहे-टांगों पर जरा भी जोर न पड़े इनकी ।”

"म . . .मुझे कहां ले जाया जा रहा हे?

"यह बताने कि आपको यहां क्यों लाया गया है?”

मोहम्मद इकराम के कुछ कहने से पहले दोनो आदमियों ने मिलकर . उसे बेड से उठा लिया ।

आबू सलेम ने कहा--" संभालकर ।”

उन्होंने उसे इस कदर आहिस्ता से व्हील चेयर पर रखा जैसे कांच की बनी कोई बेशकीमती वस्तु हो । इसमें कोई शक नहीं कि मुकम्मल प्रक्रिया के दोरान उसने अपने जख्मों में जरा भी पीड़ा का एहसास नहीं किया था ।

"ले चलो ।" आबू सलेम ने कहा ।

उसके बाद । वे दोनों आदमी व्हील चेयर को ढकेलते हुए कमरे से बाहर आ गए ।

आबू सलेम साथ था ।

 


उस वक्त वे गेलरियों से गुजर रहे थे जब आबू सलेम का मोबाइल बजने लगा । व्हील चेयर के साथ चलते-चलते आबू सलेम ने अपनी जेब से मोवाइल निकाला जो किसी भी सूरत में "मेच बाँक्स' से बड़ा नहीं था । एक नजर मोबाइल की स्कीन पर डाली । आवाज के साथ वही एक नाम बार-बार स्पार्क कर रहा था…-संगीता चावला !!

उस नाम को पढकर आबू सलेम के गुलाबी होंठो पर बडी ही प्यारी मुस्कान उभरी थी !

उसका धंधा चौपट हो जाएगा । मैं उसे फायदा उठाने दे रहा हुं , वह मुझे । यह अलग बात है कि हम दोनों ही अपने सम्बधों को दोस्ती या प्यार के आवरण में ढांपे रखते हैं ।"

क्या कहता मोहम्मद इकराम?

चुप ही रहा ।

अबू सलेम नंगी सच्चाई को कबूल कर रहा था ।

फिर, अनेक गैलरियों से गुजरने के बाद जब व्हील चेयर एक कमरे में दाखिल हुई तो मारे हैरत के मोहम्मद इकराम उछल पड़ा । एक पल को तो ऐसा लगा जैसे जादू के जोर से उसे उसके ड्राइंग रूम में पहुचा दिया गया हो ।

दीवारों पर वैसा ही पेंट । वेसा ही फर्नीचर । उसके ड्राइंग रूम में रखे फोटो तक मोजूद थे वहाँ ।

"य. . .ये सब क्या है?” इकराम ने बौखलाए से अंदाज में चारों तरफ देखते हुए पूछा ।

आबू सलेम ने मुस्कराते हुए पूछा- "तुम्हारा ड्राइंग रूम लग रहा न?"

"ह....हॉं ! मगर....."

"फिल्म लाइन से जुड़े हो । मंत्री हो इंडरुट्री के । किसी और आदमी के साथ यह सब हुआ होता और वहं आश्चर्य व्यक्त करता तो बात समझ में जाती । मगर तुम.. तुम्हें इतना आश्चर्य क्यों हो रहा है । जब लोग स्टूडियोज मेॉ स्विजरतैड की वादियाँ बना देते हैं तो क्या हम तुम्हारा बेडरूम नहीं बना सकते?

कितना टाइम लगता है ये सब बनाने में?" "

" लोकिन मेरे ड्राइंग रूम का सेट यहां क्यों बनाया गया है?"

" बाताते हैं बताते हैं ।" कहने के बाद चमचों से कहा…"खड़े क्यों हो भाई? अपना काम करो?”

हड़बड़ाकर वे इस तरह काम में जुट गए जैसे यदि एक पल की भी देरी की तो कत्ल कर दिए जाएंगे ।

करना ही क्या था उन्हें? बस, मोहम्मद इकराम को व्हील चेयर से उठाकर सोफे पर बैठाना था । सो, पलक झपकते ही कर दिया ।

दो उनका काम खत्म होते ही आबू सलेम ने कहा-"टीम को मेज दो !

वे बगैर कुछ कहे व्हील चेयर को साथ लिए कमरे से बाहर चले गए ।

मोहम्मद इकराम समझ नहीं पा रहा था यह सब हो क्या रहा है । वह पूछना चाहता था मगर हिम्मत नहीं पड़ रही थी । हालाकि आबू सलेम ने अभी तक उससे कोई सख्त बात नहीं की थी । उस वक्त तक मोहम्मद इकराम अपने सवाल पूछे, न पूछे की 'उहापोह' में ही था कि एक साथ अनेक लोग कमरे में प्रविष्ट हुए !

उनके साथ एक कैमरा भी था। कैमरा स्टैंड भी ! ट्रॉली भी। रिफ्लेक्टर भी !

सूचना एवं प्रसारण मंत्री था मोहम्मद इकराम । देखते ही समझ गया…वह किसी टी.वी. चेनल की शूटिंग टीम थी ।

वे सब बगैर कुछ कहे अपने-जपने काम में जुट गए ।

जैसे जो कुछ होना था, पूर्व निर्धारित था !

उस वक्त कैमरामैन मोहम्मद इकराम के ठीक सामने स्टैंड पर कैमरा फिट कर रहा था ! साइडों में लाइटें और रिफ्लेक्टर लगाए जा रहे थे जब मोहम्मद इकराम चीख…सा पड़ा -------" बाताया क्यों नहीं जा रहा मुझे । ये सब हो क्या रहा है?"

- आबू सलेम ने संक्षिप्त सा जवाब दिया---- " शूटिंग की तैयारी ।"

' वो तो ये लाइट, ये कैमरा, ये रिफ्लेक्टर आदि देखरकर मैं भी समझ गया । मैं ये भी समझ गया मेरी मौजूदगी मेरे ड्राइंग रूम में दिखाने की कोशिश की जाएगी मगर मैं ये जानना चाहता हूं ----- ये सब हो क्यों रहा है? कौन से चैनल से है आप लोग ? मेरे इंटरव्यू का आप क्या उपयोग करेंगे !

क्योंकि आबू सलेम ने कोई जवाब नहीं दिया-इसलिए किसी ने जवाब नहीं दिया । सभी बस अपने काम में जुट गए।

आबू सलेम आगे बढा । एक लड़के के कं पर हाथ रखा । उसे साथ लिए मोहम्मद इकराम के नजदीक पहुंचा । बोला----" इनका नाम खालिद मिस्त्री है । इस टीम का ये डायरेक्टर भी है, राइटर भी।" थोड़ा-सा विराम देने के बाद उसने खालिद मिस्त्री से कंहा---" इनके डायलॉग दो ।"

खालिद मिस्त्री ने जेब से एक कागज निकलकर इकराम को पकडा दिया !

थोडा भन्नाए, थोड़ा दहशत में डूबे मोहम्मद इकराम ने कागज़ लिया । उसकी तहें खोली और पढा ।

लिखा था…" जी हां । मैं आज भी जम्मू में कहे गए अपने शब्दों पर कायम हूं ! बेवजह हंगामा मचा रखा हेिन्दू कटटरपंथियों ने आखिर क्या गलत कह दिया मैंने । मैं फिर कहता हूं , जोर जोर देकर कहता हूं जम्मू धाटी में मुसलमानों को बसा देना चाहिए और कश्मीर में हिन्दुओं को ! मुसलमानों पर हिंसा करके ये मेरी ही बात सच साबित कर-रहे है । जम्मू में वे लोग इतना बवाल इस वजह से ही कर रहे हैं क्योंकि वहां मुस्लिम आबादी कम है ।"

पढ़ते पढ़ते मोहम्मद इकराम का चेहरा सुर्ख हो उठा । कनपटियां गर्म हो गई । चेहरा ऊपर उठाते ही मुंह से गुर्राहट की निकली----" ये सब नहीं कहूंगा ।"

" क्यों?"

"इ. . .इन. ..इन शब्दों से तो हिन्दुस्तान में आग लग जाएगी ।'"

‘ वो तो लगी पडी है ।”

“त. . .तो. . जो ये शब्द उस आग में घी का काम करेगे । आग और भडक जाएगी ।"

"मुमकिम है वही हो जो तुम सोच और कह रहे हो ।" आबू सलेम लहजा अभी भी पूरी तरह शांत और संयत था…"मगर एक मुस्लिम नेता होने के नाते न तुम्हें इतना भड़कना बाकी न ही सोचना चाहिए । सोचने का काम डायलाग राइटर का है या डायरेक्टर का । खालिद मिस्त्री है न । यह ये सोचेगा कि कौन से डायलॉग का ओडियंस पर क्या रियेक्शन होगा । तुम क्यों अपना भेजा खराब करते हो ।"

"नही । मैं कैमरे के सामने ये सब किसी कीमत पर नहीं कहुंगा ।" कहने के साथ उसने गुस्से में कागज एक तरफ फेंक दिया था ।

आबू सलेम ने अब भी शांत स्वर में कहा ---" मुझे दुख है । तुम भेजे का इस्तेमाल नहीं कर रहे हो ।"

"क...क्या मतलब?"

 


मतलब समझाने से पहले उसने जेब से डनहिल का पैकेट और लाइटर निकालकर एक सिगरेट सुलगाई । हल्का सा कश लगाने के बाद बोला -----" पहले यह सोचो तुम्हें अभी तक क्यो जिंदा रखा गया है ?"

मोहम्मद इकराम का दिल धाड़-धाड़ करता रहा।

“मार क्यों नहीं दिए गए और मारने के लिए खास एफटर्स करने की जरूरत भी नहीं थी । तुम्हारी दोनों टांगों में दो गोलिया लग चुकी थी । समय रहते उन्हें न निकाला जाता तभी मर जाते उनके जहर ही से । मगर ऐसा नहीं होने दिया गया । बाकायदा आपरेशन करके गोलियां निकाली गई । क्यों? सोचो मिस्टर इकराम । अगर तुमसे कैमरे के सामने यह न कहलवाया जाना होता तो तुम पर क्यों इतना खर्चा किया जाता?"

इकराम पर कुछ कहते न वन पड़ा ।

"अब एक बात और सोचो ।” आबू सलेम का अंदाज ऐसा था जैसे बच्चे को समझा रहा हो----" अगर तुम खालिद मिस्त्री के लिखे डायलाग नहीं बोलोगे तो किस काम के रह जाओगे । क्यों लादे फिरेंगे तुम्हें । मार क्यों नहीं दिए जाऊंगे ।"’

मोहम्मद इकराम के चेहरे का रंग फक्क से उड़ गया । मुह से जो आवाज निकली वह खौफ से लबरेज थी…“अ. ..आप मुझे मार डालने की धमकी दे रहे है ।"

“गलत बात । ये वैसी ही गलत बात है जैसी कटृटरपंथी हिन्दुओं ने तुम्हारे साथ की । कहने का मतलब तुम्हारा कुछ अोर था, यार लोग कुछ और ले उडे । उसी तरह समझाने वाले के किसी काम के नहीं रहते तो वह हमारा बोझा ढोता और समझ तुम यह रहे हो…मैं तुम्हे धमका रहा हू ।

"काम का तो मैं तुम्हारे यह बयान देने के बाद नहीं रहूंगा ।"

“बिल्कुल करेक्ट । पहली बार भेजे का इस्तेमाल किया तुमने ! मुझे खुशी हुई । ज्यादातर लोग सामने वाले से अपना काम करवाने के बाद उसे रव्रत्म कर देते हैं । बात वही आम और गुठली बाली है । मगर मैं तुमसे वादा करता हूँ । तुम्हारे साथ ऐसा नहीं होगा । गुठली बनने के बाद फेंक नहीं दिया जाएगा तुम्हें ।"

"क्या गारंटी है?”

एक पल के लिए सुर्ख हुआ अबू सलेम का चेहरा ।

मगर । केवल एक ही पल के लिए । अगले पल उस पर सामान्य भाव उभर आए । सिगरेट में एक कश लगाया । गुलाबी होंठों पर मुस्कान बिखेरी । उसके कंधे पर हाथ रखता हुआ बोला----“मेरे ख्याल से इतनी गारंटी काफी होनी चाहिए कि यह बात आबू सलेम कह रहा है !"

मोहम्मद इकराम पर बोलने के लिए जैसे कुछ रह नहीं गया ।

केवल एक पल के लिए आबू सलेम के चेहरे पर दौड़ी सुर्खी ने उसे बता दिया था----"मुंह से निकला एक भी गलत लफ्ज उसकी जान ले सकता है । जान उसे बैसे ही साफ-साफ खतरे में नजर आ रही थी !

उसे चुप देखकर आबू सलेम ने खालिद मिस्त्री से कहा----" 'डायलॉग वाला पेपर उठाकर दे दो ।"

खालिद मिस्त्री ने यह काम इस तरह किया जैसे, रोबोट ने किया ।

कागज़ लेते वक्त मोहम्मद इकराम के दिमाग में अंधड़ चल रहे थे । समझ नहीं पा रहा था क्या करे। एक तरफ जान थी दूसरी तरफ़ जानता था-पूरा भारत सुलग उठेगा ।

"डायलॉग्स याद कर तो ।" आबू सलेम ने कहा…“ज्यादा रिटैक हुए तो तुम्हें दिक्कत हो जाएगी ।"

सहमे हुए मोहम्मद इकराम की नजरे कागज पर दौडने लगी ।

उसकी नज़रे भले ही कागज पर दौड रही पी मगर दिमाग कागज पर लिखे अक्षरों पर नहीं था ।

एक ही बात सोच रहा था वह अबू सलेम की बात मान लूं या नहीं ।

आबू सलेम उसकी वर्तमान मानसिक अवस्था को अच्छी तरह समझ रहा था, इसलिए अराम से उसके सामने वाले सोफे पर बैठता हुआ बोला…"मिस्टर इकराम, कुछ देर पहले संगीता के संबंध में बात करते वक्त मैंने तुम्हें समझाया था ----- लोग एक दूसरे का फायदा उठा रहे हैं । ये दुनिया यूं ही चल रही है ! हालांकि तुम जानते हो कि तुम्हारे साथ इस स्टेटमेंंट से हमें क्या फायदा होगा मगर तुम्हें इसके बोरे में नहीं सोचना चाहिए । तुम्हें यह सोचना चाहिए---- ' तुम्हें क्या फायदा होगा?' नहीं सोच पा रहे तो मैं बता देता हू-तुन्हें यह फायदा होगा कि तुम जिंदा रहोगे । जान है तो जहान है । जब तुम रहोगे ही नहीं तो तुम पर क्या फ़र्क पडेगा इस बात से कि भारत में क्या हो रहा है !

मौहम्मद इकराम का जेहन अब सांय-सांय का रहा था ।

"दूसरी, अंतिम और सबसे वड़ी बात ।" आबू सलेम ने अपने एक-एक शब्द पर जोर दिया ----- "'हमारा काम तुम्हरे "न रहने' पर भी नहीं रुकेगा । तुम जानते हो । बॉलीबुड में ऐसे ऐसे मेकअपमेन भी है जो अपनी मेहनत से इकराम भी बना देगे । वाकी काम कैमरामेन कर देगा । ऐसे एंगल से शूटिंग की जाएगी कि देखने वाले बिल्कुल नहीं ताड़ पाएंगे कि बोलने वाला इकराम नहीं है । इसी दुनिया में जुड़े होने के नाते तुम्हें मालूम है कि टेक्नीशियंस ऐसा कर देंगे । बोलो-----'' ऐसा कर देते या नहीं?"

“क. . कर देगे ।" ये शब्द मोहम्मद इकराम के मुह से बडी मुश्किल से निकले ।

"फिर क्यों मुफ्त में जान गंवाने पर आमादा हो?”

मोहम्मद इकराम पर कुछ कहते न वन पड़ा ।

किसी और बात ने मोहम्मद इकराम पर असर किया हो या न किया हो मगर अंतिम बात ने जरूर किया था ।

यह बात झटके से उसकी समझ में आ गई थी कि अपनी कुरबानी देकर भी वह इन लोगों को अपने मंसूबे पूरे करने से नहीं रोक सकेगा ।

"फैसला करने के लिए केवल दस मिनट देता दूं तुम्हें ।" कहने के साथ आबू सलेम ने एक सिगरेट सुलगाई-----"मैं कई बार देख चुका हू। मेरी एक सिगरेट दस मिनट में खत्म होती । तुम इसके अतिंम सिरे को मेरे जूते से कुचलने को मोका न ही दो तो बेहतर हेगा ।”

इसके बाद कमरे में खामोशी छा गई ।

आबू सलेम आराम से सिगरेट पीता रहा। उसकी सिगरेट पर नजर गडाए मोहम्मद इकराम के चेहरे पर पसीने की बूंदे उभरने लगी । खालिद मिस्त्री सहित कमरे में मौजूद अन्य लोगों को जैसे इस सबसे कोई मतलब ही नहीं था । "

वे सब अपने काम में जुटे रहे थे ।

सिगरेट तब तक आधी ही हुई थी जब इकराम ने टूटे स्वर में कहा----" मैं तेयार हूं ।"

"गुड ।” आबू सलेम ने कहा…“अपने फैसले के लिए मे तुम्हें बधाई देता दूं

“म...मुझे यह सब याद करना पडेगा ।" मोहम्मद इकराम ने कागज की तरफ इशारा किया ।

"आराम से करों । कोई जल्दी नहीं है । मैं यहीं बैठा हूं !

वे शब्द याद करने में इकराम ने आधा धंटां लिया । उसके बाद शूटिंग शुरू हुई मगर दो घंटे की कोशिश के बावजूद ओके शाट नहीं लिया जा सका । बार-वार रिटेक होते रहे । कभी मोहम्मद इकाराम डायलॉग ठीक सें नहीँ बोल पाता था कभी खालिद मिस्त्री उसके फेस एक्सप्रेशन से संतुष्ट नहीँ था तो कभी कैमरामेन को भरपूर लाइट नहीं मिल पाती थी । वह बीसवां रिटेक था जो लगभग ठीक ही चल रहा था किं अचानक आबू सलेम का मोबाइल एक बार फिर बज उठा ।

अबू सलेम ने आन करने के साथ कहा----" यस ।"

"जैक बोल रहा हूं भाई जी ।" दूसरी तरफ से आवाज आई ।

"काम हो गया?" आबू सलेम ने पूछा ।

" हां भाई जी । उसके साथ एक ऐसा काम भी कर दिया है जिसके बारे में सुनकर शायद आपको अच्छा लगेगा ।"

" ऐसा क्या काम कर दिया?"

"विजय विकास इस वक्त मेरे कब्जे में हैं ।"

"क.. .क्या?” सचमुच उछल पड़ा आबू सलेम ---" क्या तुम उन्हीं विजय-विकास की बात कर रहे हो, जो... ।"

" हां भाई जी । उन्हीं की बात कर रहा हू मैं । इस वक्त वे पूरी तरह मेरे कब्जे में हैं !"

आबू सलेम ने बुरी तरह उद्विग्न स्वर में पूछा…"हो कहां तुम? "

दूसरी तरफ से आवाज आई---"मैं वहीं आ रहा हू।" कह कर आबू सलेम भागता- सा कमरे से बाहर निकल गया ।

अगले पल जो हस्ती नमूदार हुई । जिसने बेडरूम की चौखट पार ड्राइंग रूम में कदम रखा उसे देखकर विकास और अलफॉसे के हलक से चीखें निकल गई । आश्चर्य से सराबोर थीं वे चीखें ।

कारण ।

वे अपने सामने संगीता को देख रहे थे ।

नजमा कहीं थी ही नहीं ।

 


विकास जैसे शख्स की आखें मारे हैरत के फ़टी की फटी रह गई थी !

"म.....मार्वलस ।" ये शब्द अलफांसे के मुह से निकल सके जब वह खुद आश्चर्य के सागर से बाहर निकल आया- “मार्वलस विजय । मुझे लग ही नहीं रहा यह वह लड़की है जो कुछ देर पहले हमारे साथ थी ।"

“सर !” नजमा ने कहा-"मुझे भी देखने दीजिए खुद को !

“क्यों ...क्या तुम खुद को इन दोनों के थोंबड़े के आइने में नहीं देख रही?”

"सर प्लीज !" उसने सिर झटका।

"ये झटके अब भी बंद नहीं हुए तुम्हारे ।"

" सोरी सर ।"

"अपनी आवाज भी भूल जाओ ।'"

"समझिए भूल गई ।" ये शब्द उसने संगीता की अवाज में कहे थे ।

विकास ने पूछा-"क्या तुमने अभी तक खुद को आइने में नहीं देखा?"

"सर ने देखने ही नहीं दिया ।

अलकांसे झपटकर बाथरूम में पहुचा । वाश-बेसिन के ऊपर टंगा बडा-सा आइना उतारा और उसे साथ लेकर बापस ड्राइंग रूम में आ गया ।

वहां आकर भी उससे सांस नहीं ली । सांस तभी ली जब आइना लेकर नजमा के ठीक सामने जा खड़ा हुआ !

खुद को देखकर नजमा के हलक से चीख निकल गई ।

उसके दोनों हाथ अपने चेहरे पर जा लगे थे ।

अपने कहां?

संगीता के चेहरे पर !

उसे लग ही नहीं रहा था वह उसका अपना वहीं असली चेहरा है !

"बहुत हो लिया लूमड़ प्यारे! आइना हटा तो वरना वह हो जाएगा भी आज से पहले कभी नहीं हुआ।"

"क्या नहीं हुआ?"

"अपनी नजर खुद को नहीं लगी कभी।"

उसकी बात का मलतब समझ में आया तो तीनों के मुंह से ठहाके फूट पड़े ।

नजमा अब हस भी रही थी तो संगीता के अंदाज में !

अलझासे ने कह ही दिया-'"विजय ऐसा जादू तो पी सी सरकार भी नहीं कर सकता ।"

“लेकिन गुरु ।" विकास ने पूछा'----"'नजमा अभी तक नाइट गाउन में क्यों है? जैक आता ही होगा ।"

"इसी लिए ।"

"क्या मतलब?"

"यह तैयार होने के बहाने जैक को कुल देर यहाँ बैठाएगीं ।"

"क्यों?"

"ताकि उस बीच हम अपना काम कर सकें !"

"कैसा काम"

विजय के जवाब देने से पहले कालबेल बजी !

चारों सतर्क हो गए । अलफासे फुसफुसाया-'" शायद वह आ गया है !

"तुम उसे संभांल लोगी न?" विजय ने धीमी आवाज में नजमा से पूछा !

उसने कहा-----'' फिक्र ना करें ।"

"आओ प्यारे ।" कहने के साथ विजय ने बेडरूम की तरफ जम्प लगाई ! विकास और अलफांसे उसके पीछे थे । जब तक कालबेल दूसरी बार बजी तब तक खिड़की के जरिए वे तीनों फ्लैट से बाहर निकल चुके थे !

नजमा दरबाजा खोलने के लिये आगे बड़ी !

संगीता के फ्लैट के ठीक सामने एक सफारी खडी थी !

चमचमाती हुई टाटा सफारी ।

दो वर्दीधारी गनमैन उसके नजदीक खडे नजर नजर आ रहे थे । एक ड्राइविंग डोर पर था । दूसरा सफारी के उस तरफ ।

"जिसका डर था बेदर्दी वही वात हो गई ।" एक पिलर की बैक से निकलकर विकास सीधा सफारी की तरफ बढ गया जबकि विजय बौखला कर उसके पीछे लपकता हुआ बोला……"अबे. . .अबे. . .क्या कर रहा है दिलजले। यूं सरेआम मारपीट करना हमारे फेवर में नहीं होगा ।"

विकास रुका नहीं, उसने लगातार आगे बढ़ते हुए कहा…“जानता हूँ गुरु । आप फिक्र न करें ।"

अब!

लेकिन विजय के पास अगला वाक्य तक कहने का मौका नहीं था !

सफारी के काफी नजदीक पहुच चुका था विकास ।

विजय इस तरह एक तरफ़ को टहल लिया जैसे विकास से उसका कोई मतलब ही न हो ।

अलफासे पिलर के पीछे ही खड़ा रह गया है उसके होंठों पर मुस्कान थी ।

विकास ने उनमें से एक गनमैन के नजदीक पहुंचकर पूछा…"मिस्टर जैक के साथ आप ही आए हैं?”

"हां ।” उसका लहजा भी अक्खड़ था, अंदाज़ भी ---" क्यों?"

" वे आपको वहीं बुला रहे हैं ।"

" कहां? "

"संगीता के फ्लैट पर ।"

"हमेँ वहां ?" उसे हैरानी थी --- "क्यों?"

"नहीं मालूम ।" विकास ने भी अब अपनी आवाज में वेसा ही अवखड़पन पैदा कर लिया था--""चलना है तो मेरे साथ -चलो । नहीं चलना तो खड़े रहो । मैं उनसे कह दुंगा तुमने आने से इंकार कर दिया ।” कहने के बाद वह मुडा और वापस इमारत की तरफ़ चल दिया ।

"ठहर !" गनमैन ने कहा । विकास ठिठक गया ।

गनमैन ने दूसरे गनमैन से कहा-"लगता है टाइम लगने वाला है, इसलिए बॉस हमें भी वहीं बुला रहे हैं ।"

"चाहे जितना टाइम लगे । पहले ऐसा कभी नहीं हुआ?"

"अब हो रहा है तो क्या करें? मुमकिन है उन्हें हमसे कोई काम हो ।"

दूसरे गनमैन ने कई पल कुछ सोचने में गवाए ।

थोडी देर बाद बोला----"गाडी को लाक करके चलते हैं ।

’ “यही ठीक रहेगा ।" दूसरे ने कहा ।

विकास अकड़ा…-'"चलना है तो जल्दी करौ ।"

"चल रहे है यार । अकड़ क्यों रहा है ।” गाडी लॉक करने के बाद चाबी अपनी जेब में डालते हुए गनमैन ने कहा । फिर दोने विकास के ’ साथ फ्लैट की इमारत की तरफ बढ़ गए ।

सफारी से काफी दूर, विजय अभी चहलकदमी- सी कर रहा था ।

गनपैनों से नजर बचाकर हैं विकास ने विजय की तरफ देखा । नजर मिलते ही अपने होंठों पर शरारती मुस्कान लिए उसने विजय को आंख मारी । ‘

विजय बीखलाकर रह गया है !

 


उन्हें लिए विकास उसी पिलर की तरफ बढ रहा था जिसकी बैक में अलफासे था । एक क्षण केवल एक क्षण के लिए पिलर के नजदीक ठिठका । बोला-"दायां शिकार आपका है अंकल, बायां मेरा । इनके नुह से आवाज न निकल पाए"'

अचानक क्या बड़बड़ाने लगा तू?” एक गनमैन ने चौंककर पूछा ।

परंतु ।

न तो जवाब ही मिला उसे, न अगला लफ्ज मूंह से निकालने का मौका ।

पिलर के पीछे से झपटकर, अलफासे ने उसका मुंह दबोच लिया था । ठीक वैसी ही हालत उसके साथी की भी हुई ।

वह विकास के चंगुल में फंसा गूं -गूं कर रहा था ।

विजय ने दूर से उस दृश्य को देखा तो लपकता हुआ उस तरफ़ - बढा । जब तक वह पिलर के नजदीक पहुचा तब तक दोनों अपने-अपने शिकारी को बेहोश कर चुके थे ।

आँख मारते हुए विकास ने पूछा…- "अब इनका करें क्या?"

“उठाकर सफारी की तरफ ले चलो । उसकी डिक्की में डाल दो ! चाबी इसकी जेब में है ।"

" मेरे ख्याल से गुरू , उसके पहले हमें इनकी वर्दी पहन लेनी चाहिए !"

" एक दम दुरूस्त तुम्हारा ख्याल !" कहने के साथ विजय ने उनमें से एक के कपड़े उतारने शुरू कर दिये थे !

दूसरे के कपड़े विकास उतारने लगा !

अलफांसे बोला---" मेरा क्या होगा ?"

" तुम एसे ही ठीक हो !" विजय ने कहा ----" वैसे तीसरा होता तो भी तुम्हारे साइज का होना मुश्किल था !"

जैक और संगीता के बाहर जाने तक दोनों गनमेन्स के जिस्म सफारी की डिवकी में ठूंसे जा चुके थे ।

अलफांसे अगली और पिछली सीट के बीच लेट गया था । वहुत अराम से था वह । उसके लेटने लायक काफी जगह थी ।

गने सम्भाले विजय-विकास सफारी के बाहर ठीक उसी तरह खड़े थे जैसे उन्होंने पिलर के पीछे से गनपैन्स को खड़े देखा था । बस इतना-सा परिवर्तन किया उन्होंने कि अपनी कैप्स के छज्जै ललाट पर झुका लिए थे ।

आंखें तक ढक ली थी।

वे नजदीक आए । विजय ने फौरन बाई तरफ बाला अगला गेट खौल दिया । नजमा संगीता वाली अदा में थ्रोड़ा उचककर सीट पर जा बैठी । उस वक्त जैक गाडी के आगे से घूमकर ड्राइविंग गेट की तरफ जा रहा था जब वह विजय की तरफ देखकर होलेे से मुस्कराई ।

विजय ने उसकी मुस्कान का जवाब देने की कोई कोशिश नहीं की ।

ड्राइविंग गेट उधर खडे विकास ने खोल दिया था ।

"तुम लोग पीछे बैठो ।" कहने के साथ उनकी तरफ़ कोई ध्यान न देते हुए जैक ने इग्नीशियन में मौजूद चाबी घुमा दी ।

विजय-विकास अपनी-अपनी साइड का… पिछला गेट खोलकर सफारी में सवार हो गए ।

सफर शुरू हो गया । गाडी के अंदर खामोशी छाई हुई थी ।

विजय-विकास यह देखकर संतुष्ट थे कि सफारी का रूख उसी तरफ था जिधर वह इमारत थी जिसके अंदर जाने के लिए इतने पापड बेले थे ।

उस वक्त गाडी एक सुनसान सडक से गुजर रही थी जब ड्राइविंग करते जैक ने कहा…"अनवर ।"

" हूं !" चौंक कर विजय-विकास एक साथ बोल पड़े थे ।

अगला वाक्य कहने से पहले जैक एक पल के लिए हिचका । मगर सिर्फ एक पल के लिए । अगले पल उसने कहा---" मैं तुन्हें अगले पेट्रोल पम्प पर उतार दूंगा । वहाँ से डीजल लेकर राउंड हाउस पहुचना है ।"

दोनों चुप रहे । क्षणिक खामोशी के बाद जैक ने पूछा ---"एनी प्राब्लम?"

"नो सर ।" विकास ने अपनी आवाज एक गनमैन की आवाज से मिलाने की केशिश की ।

और बस ।

उसके बाद जैक ने कुछ नहीं कहा ।

खामोशी के साथ गाडी ड्राइव करता रहा।

विजय-विकास के दिमाग वड़ी तेजी से काम कर रहे थे । उन्हें लग रहा था----जैक के अनवर कहते ही एक साथ दोनों के बोल पड़ने से गड़बड़ हो चुकीहै । बस यही निश्चय नहीं कर पा रहे ये----उस गड़बड़ को जैक ने पकड़ लिया है या नहीं? यदि पकड़ चुका था तो काफी खूबसूरत एक्टिग कर रहा था वह ।

जरा भी तो विचलित नजर नहीं आ रहा था । कुछ देर बाद !

दुर. . एक पेट्रोल पम्प का साइन बोर्ड नजर जाने लगा ।

विजय के दिमाग ने और तेजी से काम करना शुरू कर दिया ।

जैक ने गडबड को ताड़ा हो या न ताडा हो मगर यह तो पवका था कि वह उन्हें वहां उतारने वाला था । वहां कुछ ओंर लोग भी होंगे । कम से कम पेट्रोल पम्प का स्टाफ तो होगा ही । वहां किसी भी किस्म का 'एक्शन' करना मुनासिब नहीं होगा । उससे तो बेहतर है जो करना है, यहीँ गाड़ी ही में कर लिया जाए ।

विजय इस नतीजे पर पहुचा ही था कि कानो में विकास की अ्वाज पड़ी…“पेट्रोल पम्प पर गाडी रोकने की कोशिश मत करना मिस्टर जैक । सीधे चलते रहो ।"

“मैं जान चुका हूं ,तुम अनवर और सलीम नहीं हो ।" जैक के हलक से गुर्राहट सी निकली ।

"हम भी जान चुके हैं कि तुम जान चुके हो । इसलिए गन वक्त से पहले तुम्हारी पसलियों से सटानी पडी !

महसूस' कर रहे होंगे इसकी चुभन ओंर अब ये भी जान लो----जरा--सी भी गलत हरकत तुम्हें भी बहीं पहुचा देगी जहां अनवर और सलीम पहुच चुके हैं ।"

"अ. . .अरे. . .क. . ,क्या हो रहा है ये?" नजमा ने जबरदस्त एक्टिग की---" क. . .कौन हो तुम लोग?"

"ज्यादा मत 'फुदक्रो मेडम ।” कहने के साथ विजय ने अपनी गन की नाल उसकी पसलियों से सटा दी --" ये वो फिल्मी गन नहीं है जो केवल आबाज करती है । अगर इसने अवाज कर दी तो तुम्हारी आवाज हमेशा के लिए की बंद हो जाएगी ।"

"..अ अरे. . .म. . .मगर.. ।" बुरी तरह बोखलाकर उसने जैक की तरफ देखा ।

जैक का चेहरा पत्थर की तरह सख्त और सपाट नजर आ रहा था । उसने कहा---"' फिक्र न करें मेडम, ये हमारा कुछ नहीं निगाह सकेंगे ।"

‘ठीक कहा तुमने ।” विकास के मुँह से निक्लने को गुर्राहट अत्यंत सनसनीखेज थी…--"हमारा कहना मानते रहे तो तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा । "

पेट्रोल पम्प पीछे छूट गया था । जबड़े भीचे जेक ने पूछा- "क्या अनवर और सलीम को तुमने मार दिया?"

"अपनी तो आदत ही ऐसी है ।” विजय ने कहा ।

"हो कौन तुम?"

विजय शायद कुछ कहता पर उससे पहले विकास बोल पड़ा-“बिजय- विकास ।”

“ओह ! " मुह से यह शब्द निकलने के साथ जैक का वह चेहरा पीला पड़ गया जो एक पल पूर्व सख्त नजर आ रहा था ! सारी सख्ती जाने कहाँ गायब हो गई थी । हवाइयां उडती नजर आ रही थी उस , पर ! यहीं तो चाहता था विकास, इसलिए तो अपने नाम उसने साफ…साफ बताए थे । वह जानता था…नाम की अपनी दहशत होती है । इस हथियार को वह अक्सर इस्तेमाल कर लेता था जबकि विजय अपने नाम को हथियार के रूप में कभी इस्तेमाल नही करता था । मगर अब.. जब इस्तेमाल हो ही चुका था और उसका असर वह जैक के चेहरे पर साफ़-साफ़ देख रहा था तो बोला----" तुम जानते होगे, इंसानों को हम इस तरह मारते हैं जेसे फुटपाथ पर सोया फकीर मच्छरों को मारता है ।"

"च. ..चाहते क्या हो?” पहली बार उसकी आवाज में हकलाहट उभरी !

"बडा अच्छा सवाल किया ।" विजय अपनी टोन मैं आ गया--"उतना ही अच्छा जवाब भी हाजिर है । आबू सलेम भाई से "मुलाकात' की तमन्ना है ।”

"क्यों?”

" तुम तो यार संतरियों वाले सवाल पूछने लगे ।"

“मेरा ख्याल है तुम्हारा मकसद मोहम्मद इकराम तक पहुचना है ।"

- "समझदार हो ।” विजय ने कहा…“उसी तक पहुंचना है। क्या तुम बता सकते हो ---"राउंड हाउस' में वह कहां मिलेगा?"

 


"वह वहां नहीं है ।"

"अब तुम झूठ बोल रहे हो प्यारे ।"

"यह सच है !"

विकास ने कहा----“हमने असलम को उसे यहाँ पहुंचाते देखा है ।"

"जरूर देखा होगा मगर बाद में उसे ट्रांसफर कर दिया गया !"

“कहां !"

"नुसरत-तुगलक के पास ।"

"अगर तुम उनका पता बता दो तो हम जिदगी भर तुम्हारे चरण धो-धो कर पानी पीएंगे ।”

“उनका हेडक्वार्टर किसी को नहीं मालूम । न मुझें, न भाई जी को ।"

"'चलते पुर्जे हो प्यारे । आबू सलेम तक की गारंटी ले बेठे । खेर, जो होगा देखा जाएगा । अब हम 'राउंड हाउस' पहुंचने वाले है । वहां के सुरक्षाकर्मी तुम्हारी इस टाटा सफारी को देखते ही गेट खोल देगे । अपने होने वाले बच्चों की 'भलाई चाहते हो तो कोई इशारा मत करना उन्हें !"

"इशारा किया तो बच्चे मैं होने ही कहाँ दूंगा गुरु ।" कहने के साथ विकास ने जैक को गन की नाल का एहसास करा दिया था ।

"ये भी ठीक है ।” विजय बोला…“बल्कि ठीक से भी कुछ ज्यादा ही है ।"

जैक चुप रहा ।

अलकांसे ने जानबूझकर खुद को खामोश और छुपाए रखा था ।

उसने सोचा था --- दुश्मन पर सारे कार्ड एकदम नहीं खुलने चाहिए । अगर जैक विजय विकास को चकमा देने की कोशिश करेगा तो वह उस पर अप्रत्याशित हमलावर बनकर टूट पड़ेगा ।

अभी दुर होने के बावजूद "राउंड हाउस' साफ नजर का रहा था ।

ठीक सामने था वह ।

सरल रेखा की मानिन्द एकदम सीधी चली गई सड़क के अंतिम छोर पर ।"

यदि यूं कहा जाए तो ज्यादा मुनासिब होगा-सड़क खत्म ही वहाँ होती नजर जा रही थी जहाँ "राउंड हाउस' का लोहे वाला विशाल गेट था । यह सडक केवल उसी इमारत तक जाने के लिए बनाई गई लगती थी । क्योंकि दाएं-बाएं, आगे-पीछे, कहीं कोई दूसरी इमारत नहीं थी ।

अलफांसे के साथ आकर उस इमारत को विजय विकास पहले भी देख चुके थे । यह बात उसी समय उनके दिमाग में आई थी कि इमारत का नाम "राउंड हाउस' शायद इसलिए रखा गया है क्योंकि वह गोल थी ।

देखने से ऐसा लगता था जैसे चारदीवारी से घिरे हजारों-हजार गज के भूखंड के बीचों बीच कंकरीट का एक बहुत वड़ा गिलास बनाकर खड़ा कर दिया गया हो । वह गिलास इतना ऊंचा था कि मीलों दुर से नजर आने लगता था । उसकी दीवारों में अनेक खिड़की और दरवाजे थे ।

खिड़की दरवाजे पर तैनात थे-हथियार बंद गार्ड ।

उनके जिस्मों पर वैसी ही वर्दी थी जैसी इस वक्त विजय-विकास ने पहन रखी थी ।

वैसी ही वर्दी वाले लोहे के गेट पर भी तैनात थे ।

एक जिप्सी भी खडी थी वहां ।

गेट पर तैनात गाडर्स ने दूर से आती सफारी को देखते ही गेट खोलना शुरू कर दिया था जो इतना भारी था कि हाथों से नहीं, एक लीवर को दबाने से खुलता था ।

गेट खुल चुका था । इसके वावजूद जैक ने गाडी रोक दी ।

"आगे चलो प्यारे, वर्ना ऊपर की तरफ पार्सल कर देंगे ।" विजय के मुंह से निकली गुर्राहट सख्त से सख्त व्यक्ति की रीढ की हडडी में मौत की सिहरन दीड़ाने वाली थी ।

“दरवाजा भले ही खोल दिया हो उन्होंने मगर मुझे भी यहां एक रजिस्टर पर साइन करके आगे बढ़ना होता है ।"

जैक ने बड़बड़ते से स्वर में कहा था…"साइन किए बगेर मेरे आगे बढ़ जाने से उन्हें शक हो जाएगा ।”

एक गार्ड रजिस्टर लिए सफारी की तरफ बढ़ता नजर आया।

"मैं सीट के पीछे से तुम्हें देख रहा हूं ।" इस बार विकास गुर्राया-"अगर तुमने साइन के बहाने रजिस्टर पर कुछ ओंर लिखने की कोशिश की तो वह तुम्हारे द्वारा इस जीवन में किया गया अंतिम काम होगा ।"

जैक कुछ बोला नहीं ।

रजिस्टर लिए गार्ड ड्राइविंग छोर पर पहुच चुका था ।

जैक ने 'पावर विंडो' का स्विच दबाकर कांच उतारा ।

गार्ड ने वहुत ही अन्दर के बाद रजिस्टर खिडकी के अंदर सरका दिया । पेन एक डोरी की मदद से रजिस्टर के साथ बंधा हुआ था ।

गार्ड ने गाडी के अंदर झांकते की कोशिश नहीं की । जैक ने साइन किए और वह रजिस्टर लेकर वापस चल दिया । इंजन बंद नहीं किया था जैक ने । गाडी गेयर में डालकर आगे बढा दी ।

अब वे चारों दीवारों के अंदर दूर-दूर तक फैेले गार्डन के बीच बनी सड़क पर थे । उस सडक पर जो धनुष की तरह घूमती हुई इमारत के पोर्च की तरफ चली गई थी । पोचं भी गोल और दर्शनीय था मगर विजय-विकास उसे नहीं देख रहे थे ।

वे देख रहे थे वहां की सुरक्ष-व्यवस्था को ।

धनुषाकार सड़क के दोनों तरफ ही नहीं, गार्डन में भी जगह जगह गाडूर्स तैनात थे । सैकडों की संख्या में थे वे । सभी के हाथो में स्वचालित गनें थी । अंदर की व्यवस्था देखने के बाद विकास को लगा-यहाँ आने के लिए तरकीब वही ठीक थी जो विजय ने अपनाई । बगैर किसी प्लानिंग के धूम धडाका करके अपनी जान तो गंवाई जा सकती थी मगर इमारत में दाखिल नहीं हुआ जा सकता था ।

जैक ने गाडी पोर्च के नीचे रोक दी ।

वहाँ तैनात अनेक गाडर्सं ने गाडी को चारों तरफ से घेर लिया ।

"बस एक ही बात दिमाग में रखना प्यारे, भले ही हम तुमसे जितनी दूर हों, लेकिन किसी भी किस्म की गडबड होने पर हमारी गनों से निकली गोलियों की पहली खेप तुम्हारे जिस्म में आग भर देगी ।"

जेैक ने बगैर कुछ कहे अपनी साइड का दरवाजा खोला ।

"तुम भी उतरो ।." विजय ने गुर्राकर नजमा से कहा ।

अपनी साइड का दरवाजा खोलकर विकास भी जैक के लगभग साथ ही बाहर निकल आया था ।

नजमा केवल जैक को दिखाने के लिए अपने चेहरे पर घबराहट का प्रदर्शन कर रही थी जबकि वास्तव में उसके होंठों पर संगीता बाली मुस्कान नाच रही थी । बाहर निकलने के लिए उसने भी दरवाजा खोला । अपनी साइड का दरवाजा खोलते विजय ने अलफग्रेसे के कंधे पर हाथ रखकर कहा…"बगेर वर्दी बाहर नहीं निकल जा सकता । तुम्हें यहीं का मोर्चा संभालना है ।"

अलफासे चुप रहा ।

उसके बोलने का इंतजार किया भी नहीं था विजय ने । नजमा के साथ ही साथ सफारी से बाहर आ गया था ।

अब वे जैक के पीछे उन सीढियों की तरफ की बड़े जो इमारत के मुख्य दरवाजे तक चली गई थी !

बहुत ही भव्य सीढियां थी वे । करीब पंद्रह ।

कुछ वैसी जैसे स्टेडियम में दर्शकों के बैठने के लिए होती हैं ।

जहां सफारी खडी थी, मुख्य द्वार उससे करीब बारह फुट ऊपर था !

सीढियों के दोनों तरफ़ गाडर्स तैनात थे: नजमा और जेैक अगल… बगल रहकर सीढिया चढ़ रहे थे ।

विजय-विकास पीछे थे । अन्य गार्ड्स उन्हें जैक के पर्सनल गाडर्स ही समझ रहे थे जबकि जैक जानता था-वाकई उसकी कोई भी हरकत उसे हमेशा के लिए सुला देगी !

कुछ देर बाद वे मुख्य द्वार पार कर गए ।

 
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