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हिन्दी नॉवल -ट्रिक ( By Ved Parkash Sharma) complete

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दूसरी तंरफ से आवाज आ रही थी… "हेलो० हैलो क्या हुया .....ये गोली की आवाज केसी थी. ......हैलो?”

"बहुत देर से यह सेनिक अपनी जान बनाने की कोशिश कर रहा था ।"' वह किसी शेर की भांति वायरलेस पर चीखा- "तुमने इसकी सारी मेहनत पर पानी फिरवा दिया । तुमसे बात करते वक्त्त तुम्हें खतरे की सूचना देने के लालच को नहीं दबा सका और मिस्टर डेंजर कहकर इसने तुम्हें खतरे की सूचना दे दी । अपनी इस गलती की वजह से मारा गया । अब जब हुम इतना सब जान ही गए हो तो कान खोलकर सुनो ---- इस वक्त जीप तुम्हारे दुश्मन के कब्जे में है । इस जीप में तुम्हारे सारे आदमी मारे जा चुके हैं ।"

"कौन हो तुम."'

" ओह !! अभी भी नाम बताना पडेगा ।"

' हैरी ' ऐसे लहजे कहा जैसे बोलने बाला ' कन्फर्म ' करना चाहता हो !

"यस" उसने पुरी मस्ती में कहा --- " पुरा नाम हैरी आर्मस्टर्ांग !"

" मैं पाकिस्तानी सीकर्ेट सर्विस का चीफ बोल रहा हूं !!!

"ओह !" वह कुछ और मस्ती में आ गया ---- " मेरी फरारी का समाचार तुम तक पहुंच चुका है !

'हैरी' तुम पाकिस्तान से निकल नहीं पाओगे ! खुद को जिंदा रखना चाहते हो तो .......!

"मैं इस वक्त पाकिस्तान में नहीं ---- 'आजाद कश्मीर ' में हूं मिस्टर चीफ ! उस आजाद कश्मीर में जिसे तुम नाम के लिये आजाद कहते हो । कश्मीरियों को बेवकूफ़ बनाने के लिए आजाद कहते हो है असल में तुमने धरती के इस स्वर्ग को गुलाम बना रखा है । अपनी आंखो से देख रहा हूं मैं । चप्पे--चप्पे पर तुम्हारे सेनिक फेले हुए हैं, मगर ये सैनिक अब मुझे तुम्हारे पाकिस्तान की सी मा में रोक नहीं पाएंगे । बहुत जल्दी से बॉंर्डर क्रॉस करके हिन्दुस्तान पहुच जाऊंगा।

उस देश में जिस देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ़ तुमने भयानक साजिश रची है ।" '

"हमारी कुछ समझ में नहीं आ रहा । तुम कहना क्या चाहते हो ?”

"बही कहना चाहता हू मिस्टर चीफ जो छावनी नम्बर बासठ की कैद में रहकर जाना है और यह भी " जानता हू कि अब. तुम मुझे झूठा साबित करने की कोशिश करोगे । दुनिया को यह बताने की कोशिश करोगे कि 'हैरी' विकास का दोस्त है, इसलिए पाकिस्तान पर झूठा आरोप लगा रहा मगर शायद तुम भूल रहे हो-हैरी या विकास को किसी का समर्थन जुटाने की जरूरत नहीं पड़ती । हमे अपनी लडाई अकेले लड़नी जाती है । भले ही सारी दुनिया 'हेरी' को झूठा समझती और कहती रहे मगर ये वादा है मेरा तुमसे-तुम्हारी साजिश के परखच्चे उड़ाकर ही दम लूंगा ।" अंतिम शब्द कहते-कहते 'हेरी' का चेहरा भभकने लगा था । थोडा संभलकर बोला ------" जानता हु, तुम ये वार्ता इसलिए लंबी करना चाहते हो ताकि मुझे बातों में उलझाकर मेरी दिशा और दूरी जान सको । मगर नहीं चीफ महोदय, अपनी इस कोशिश में मैं भी कामयाब नहीं हो सकोगे तुम ।" कहने के साथ एक झटके से.उसने वायरलैस आँफ कर दिया ।

सूर्य देव ने अभी दर्शन नहीं दिये थे मगर पूर्वी गगन की मांग में मानो सिंदूर भरना शुरू हो गया था !

रात को दो वजे सोने के बावजूद वह सुवह पौने पांच बजे उठ जाता ! कारण केवल यह नाजारा ही था ! उठने में अगर कुछ लेट हो जाता तो दो ऊंचे - ऊंचे पहाड़ों के बीच से सूर्य झांकने लगता !!!

..... यह नजारा उसे बिल्कुल पंसद नहीं था !

अमरीक सिंह !

मेजर अमरीक सिंह ।

पिछले एक महीने से वह चोकी नंबर सेवन का इंचार्ज था ।

पंद्रह जवानों की टुकडी के साथ वहीं तैनात था वह ।

पहाड़ की चोटी पर !

वहां, जहां पहुंचने का कोई जमीनी रास्ता नहीं था । कम से कम हिन्दुस्तान की तरफ से वहां केवल हवाई मार्ग से ही पहुंचा जा सकता था । उसकी दुक्ड़ी के लिए ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर भी हवाई मार्ग से ही आता था । इसके लिए हैलीकॉप्टर को हर रोज वहाँ के तीन चक्कर लगाने पडते थे ।

ठीक सामने ।

इसी पहाड़ जितना उच्चा एक दूसरा पहाड़ था । उसकी चोटी पर स्थित थी….......पाकिस्तानी चोंकी ।"

दोनों के बीच एक किलोमीटर से ज्यादा का फासला नहीं था। " कंटीली तार आदि की कोई बाढ भी नहीं थी वहाँ । दरअसल वैसी कोई बाढ लग भी नहीं सकती थी । दोनों चोटियों के बीच एक दर्रा था । अर्थात यदि इधर से आधा किलोमीटर नीचे उतरा जाए और उधर से आधा किलोमीटर नीचे उतरा जाए तो पाकिस्तानी और हिन्दुस्तानी सेनिक गले मिल सकते थे ।

मगर ।

राजनीतिज्ञ गले कहाँ मिलने देते थे उन्हें । जहाँ वे गले मिल सकते थे अर्थात वह दर्रा तो मानो बॉर्डर बन चुका था । हिंदुस्तानी उसे पार करके सामने वाले पहाड़ की चढाई शुरु नहीं कर सकते थे !

उसी तरह पाकिसतानी इस पहाड़ की चढ़ाई शुरू नहीं कर सकते थे !

दोंनो के हुक्मरानों का हुक्म था ---- ऐसा करने वाले को फौरन गोली मार दी जाए !!!!!

गोलियां तो दोंनों चोकियों के बीच वैसे भी चलती रहा करती थी !

दोंनो तरफ के सैनिकों का मकसद एक ही था -- दुश्मन को यह बताना -- दर्रा पार करने की कोशिश मत करना , हम सजग हैं !

दोंनों ने कई बार एक दुसरे से चौंकी कब्जाने की कोशिश भी की थी !!

अनेक सैनिक मारे भी गये थे ! परंन्तु स्थाई रूप से कभी कोई दुसरे की चौकीं पर काबिज नहीं हो सका !!!!!!!!!!!

 
अमरीक सिंह सुबह के नजारों में खोया हुआ था !

कि

तभी .....

"धड़ाम ! धुम्म !

पलक झपकते ही अमरीक सिंह वहां लेट गया जहां खड़ा था !!!!!

वही काम उन पांच सैनिकों ने भी कीया था जो पहाड़ के पांच स्पाँट पर 'शिफ्ट डयूटी' के तहत पहरे पर थे !!!!

उन्हें लगा --- आज दुश्मन ने आतिशबाजी के लिये भोर का समय चुना है !

मगर नहीं !!!

ऐसा नहीं था !

दुश्मन के तम्बू पर नजर पड़ते ही उन्हें चौंक जाना पड़ा !!!

धूं धूं करके जल रहा था पीकिस्तानी चौंकू का तम्बूं !

भारतीय चौंकी के तम्बूं में सोये सैनिक भी धमाके की आवाज के साथ जग गये !!!

हड़बड़ाकर उठे !!!

सबसे पहसे हाथ अपनी गनों पर गये !!

फिर रेंगते हुये बाहर निकले !!

पाकिस्तानी तम्बूं जलता देखा तो एक ने हैंरत के साथ पूर्व--.-- " कर दिया सालों का काम तमाम ! "

"नहीं यार, हमने कुछ नहीं किया ।" एक ने ज़वाब दिया ।

"तो क्या आपस में ही सिर फोड़ बैठे एक-दूसरे का !"

" ऐसा ही लगता है ।"

" शामोश ।" अमरीक सिंह ने कहा… " यह उनकी कोई चाल भी हो सकती है ।"

कई ने पूछना चाहा…""कैसी चाल?"

मगर आर्मी रूल्ज उन्हें अमरीक सिंह से ऐसा बोई भी सवाल पूछने की परमिशन नहीं देते थे ।

सो, सब खामोश रहे ।

आंखें तम्बूं से निकल रहीं आग की लपटों पर पर चिपकी हुई थी !

एक और धमाका हुआ ।

बारूद के कणों के साथ पत्थर भी हवा में सन्नाये।

अमरीक सिंह बड़बड़ाया-…"'कमाल है । चोकी को हैडग्रेनेड से नष्ट किया जा रहा है ।"

"सर ।" एक सेनिक ने कहा---- "आरोप शायद हम पर लगने वाला है ।"

अमरीक सिंह खामोश रहा-तो समी खामोश रहे । असल में वह मामले को समझने की कोशिश कर रहा था ।

अभी कुछ भी नहीं समझ पाया था कि उस चोटी से फायरिंग की आवाजें आने लगी । ऐसा लग रहा था जेसे वहां युद्ध चल रहा ।

धुंआ छंटा तो देखा ---- एक पाकिस्तानी तेजी से सामने वाले पहाड़ की ढलान से उतर कर दर्रे कू तरफ दौड़ रहा था !

" क्या हुक्म है सर !" एक सैनिक ने पूछा -" कमा दे साले को !"

" नहीं अभी ऐसा कुछ नहीं करना ! उसके हाथ में सफेद झंड़ा है !"

" आपने खुद कहा धा सर ! दुश्मन कोई चाल चल रहा हो सकता !"

इससे पहले अमरीक सिंह कुछ बोलता , सामने वाली पहाड़ी पर दो पाकिस्तानी सैनिक नजर आए ! अपनी गनों से उन्होंने सफेद झंड़े वाले पर गोलियां बरसा दी !!!

शायद कोई गोली उसे लग भी गई !!

तभी तो एक चीख के साथ ढलान पऱ गिरा और फिर दरें की तरफ़ तुढ़कता चला गया ।

दो में से एक सैनिक उसका पीछा करने के चवकर में ढलान पर दौड़ा ।

"थाय ।" अमरीक सिह की गन से शोला लपका।

निशाना सफेद झंडे वाले का पीछा करने वाला सेनिक 'था।

वह मुह के बल ढलान पर गिरा और एक पत्थर से उलझकर रूक गया ।

एक सेनिक ने पूछा- "इसका मतलब शुरू को जाएं सर?"

“हमें सफेद झंडे वाले को बचाना है ।" अमरीक सिंह ने स्पष्ट आदेश दिया-----" हर उस शख्स को मार गिराओ जो उसे मारने की कोशिश करे ।"

"लेकिन सर ।" एक ने उसकी वर्दी को देखते हुए कहा…----" लग तो वह भी पाकिस्तानी सेनिक रहा है ।"

"वह जो भी है पाक आर्मी का दुश्मन है" । अमरीक सिहं बोला---- "मुझें बता है-उनकी चौंकी को उसी ने ध्वस्त किया है । हमसे संरक्षण चाहता है ।"

क्रोई कुछ नहीं बोता ।

बोलने का मौका भी नहीं था।

सामने वाली चोटी पर अब तीन सेनिक नजर आ रहे ये ।

तीनों ने अपनी गनों का मुह दरें में पहुंच चुके शख्स की तरफ घुमा कर खोल दिया !

हुक्म तो मिल ही चुका था , सो भीरतीय गोलियां सामने वाले पहाड़ पर झपटी !!!!

एक की लाश ढलान पर लुढ़की ! बाकी दो ने जमीन से चिपक कर पोजीशन ले ली !!!!!

अब वे दर्रे में मौजूद शख्स को भूल कर इंडयिन आर्मी पर गोली चलाने लगे !!!!!

जवाब इधर से भी बराबर दिया जा रहा था !!!!

करीब बीस मिनट की गोलाबारी के पाकिस्तानी पहाड़ पर नजर आरहे

दोनों सैनिक भी ढ़ेर होगये ।

सन्नाटा छा गया ।

अब उधर से कोई गोली नहीं चल रही थी !!!

सफेद झंडे वाले का झंडा दर्रे में ही कहीं गिर गया था । अब उसके पास उसकी गन भी नहीं थी । पहाड़ पर चढने की असफल कोशिश कर रहा था वह । असफल इसलिए क्योकि जख्मी होने के कारण चढ़ने में मुश्किल हो रही थी । अमरीक सिंह ने एक नजर उस पर डाली दूसरी पाकिस्तानी पहाड़ की चोटी पर ।

वहां सन्नाटा छाया हुआ था । जैसे कोई जीवित न बचा हो ।

अमरीक सिंह ने पुन: दर्रे की तरफ़ देखते हुए कहा......…"'मैं उसे लेकर आता हूं ।"

"सर ।" एक सेनिक ने कहा-…"'मुमकिन है आपका पहला ही ख्याल ठीक हो । कोई चाल हो यह उन की । ऐसा भी तो हो सकता है कि आप ढलान पर उतरना शुरू करें और वे सामने से....... ।"

"बको मत राणा 1" अमेरीक सिंह ने उसकी बात पूरी होने के पहले ही गुर्राकर कहा-----". कोशिश उन्होंने की भी तो तुम सब किसलिए हो ।"

सबको सांप सूंघ गया ।

 


. अमरीक सिंह ने पुन: कहा…"तुम मुझे कवर करोगे ! सबका एक ही काम होगा-----" ढेर कर देना जो मुझ पर या उस पर निशाना . साधने की कोशिश केरे जिसे मैं लेने जा रहा हूं !!!!

सब चुप रहे ।

गन संभाले अमरीक सिंह ने ढलान की तरफ रेंगना शुरू कर दिया । नीचे से जख्मी शख्स भी ऊपर चढने की कोशिश कर रहा था। कुछ देर तब सब कुछ सामान्य रहा । कहीं कोई गडबड नहीं !!!!!

मगर अचानक पाकिस्तानी पहाड की चोटी पर एक साथ चार सेनिक नजर आए । उनकी गने अमरीक सिंह की तरफ घूमी ही थी कि इधर से गोलियों की बाढ उधर लपकी । उददेश्य था… उन्हें अमरीक सिंह पर गोली चलाने का मोका न देना।

अब । दोनों तरफ़ से गोली की वर्षा हो रही थी ।

ढलान के मध्य में दोनों मिले ।

अमरीक सिंह ने देखा-उसे दो गोलियां लगी थी । एक दाएं पैर की पिंडली मे, दूसरी बाएं कंधे में । जिस्म पर भले ही पाक आर्मी की वर्दी हो मगर असल में वह अमेरिकी था । जख्मी होने के बावजूद वड़ी बहादुरी के साथ पहाड़ पर चढ रहा था वह । उस ववत एक पत्थर से उसका हाथ फिसला था और वह पुन: ढलान पर लुढ़कने वाला था कि अमरीक सिंह ने अपना पैर एक पत्थर की जड में फंसाकर उसे गोद में संभाला ।

अपनी मिचती आंखों को बंद होने से रोकने की कोशिश करते हुये उसने कह्य-“थैंक्यू ........ थैंक्यू दोस्त ।"

" कौन हो तुम !" अमरीक सिंह का पहला सबाल यही था ।

उसने डूबती आवाज में कहा…""हिन्दुस्तान का दोस्त ।"

"वह तो मैं समझ गया । मगर कुछ नाम भी तो होगा ।"

"ह..... हैरी । हैरी आर्मरट्रांग । अमेरिकी हूं मगर ।"

"तुम्हारी बांहों में लग रहा है…अपने भाई की बाहों में हूं ।"

"सो तो हो ही । उधर कैसे फंस गए?"

"कहानी लंबी है । उसे छोडो । वैसे भी पिछली बातों को दोहराने से कोई लाभ नहीं । मेरी मदद करना चाहते हो तो वह करो जो मैं चाहता हू्ं ।"

"क्या चाहते हो ?"

" मुझे बिजय-बिकास के पास पहुचा दो ।"

" कौन विजय-विकास?"

"भले ही तुम न जानते हो मगर राजनगर में उन्हें सब जानते है ।" हैरी बडी मुश्किल से कह पा रहा था…"याद रखना, केवल उन्हीं के पास पहुंचाना मुझे और किसी के पास नहीं ।" कहने के साथ उसकी गर्दन एक तरफ को लुढक गई !

अमरीक सिंह ने उसे झिंझोड़ा ---" हैरी ....मिस्टर हैरी !

वह बेहोश' हो चुका था ।

"हैरी .... हैरी. . .मेरे यार ।" भावुक स्वर में कहने के साथ विकास उसकी तरफ़ लपका ।

"व. . .बिक्की ।"' कहते हुए हैरू कोशिश हैरी ने भी बिस्तर से उठने की की थी ।

" कोशिश क्यों?"

उठ ही जो गया था वह !

जख्मी होने के बावजूद वह विस्तर से खड़ा हो गया था । मगर, पल भर के लिए भी खड़ा न रह सका । एक गोली तो उसकी पिंडली में ही लगी थी । तड़खड़ाकर गिरने ही वाला था कि.. . ।

"अबे सभंलकर ।" विजय चीखा !

विकास ने लपकर अपनी बांहों में संभाल लिया था । बोता…"क्या' कर रहा है गधे ?"

पीड़ा को पीते हुए हैरी ने कहा…......“यार इतने दिन बाद सामने आए और मैं उठकर स्वागत न करूं । ऐसा भला कैसे हो सकता है?"

"ज्यादा बहादुर बनने की कोशिश मत कर । लेट जा ।" विकास उसे वापस बिस्तर पर लिटाता हुआ बोला…" आर्मी बाले बता चुके हैँ…ब्रॉर्डर क्रॉस करते वक्त तू दुश्मन की दो गोलियां चबा गया !!!"

इस बार हैरी कुछ बोला नहीं, केवल मुस्कराकर रह गया ।

"बहुत ही बहादुर लड़का है ।" कर्नल की वर्दी पहने एक रीबीले _ व्यक्ति ने कहा ---- गोलियां निकलवाते ववत्त तक "एनीस्थिसिंया" लेने से इंकार कर दिया । बस एक ही धुन सवार थी इसके दिमाग पर । यह कि---मेरे यहाँ होने की सूचना विजय-विकास में से किसी को दे दो ।"

"और वहीं तुमने किया । विजय बोला ।

"करना पड़ा ।" कहने के साथ कर्नल हंसा ----"न करता तो यह इसी हालत में आर्मी हाँस्पिटल से भागकर सीधा आपके घर पहुच जाता ।"

विकास ने पूछा --- "क्या जाप हमे जानते थे !"

"राजनगर में ऐसा कौन है जिसने आप दोंनो का नाम न सुना हो?"

"सो तो है ।" विजय ने अपना सीना चौडा लिया-----“ओसामा विन लादेन से कम कुख्यात नहीं हैं हम ।"

"वेसे अमरीक सिंह ने इसके साथ भेजे अपने संदेश में कहा था-----"बेहोश होते वक्त इसने एक ही प्रार्थना की थी ----कि मुझे राजनगर में विजय-विकास के पास पहुंचा दिया जाए' मगर मैंने आप लोगों को इनफॉर्म करने से पहले इसके जिस्म से गोलियां निकालना मुनासिब समझा ।"

"लेकिन हैरी ।" विकास ने पूछा----“तू पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में पहुंच कैसे क्या?"

"खुद नहीं पहुचा । पहुंचाया गया था ।"

"किसने पहुंचाया ?"

हैरी ने जवाब देने के स्थान पर कर्नल की तरफ देखा । कहा ---- "कर्नल साहब, क्या आप कुछ देर के लिए हमें अकेला छोड सकते हैं?”

" ओह !" कर्नल हंसा…'शायद तुम अपने दोस्त से कोई प्राइवेट बात करना चाहते हो ।"

"आप समझदार है ।"

"ओके ।" कहने के साथ यह मुस्कराया । मुड़ा और अपने भारी बूटों से ठक-ठक की आवाज करता हुआ कमरे से बाहर निकल गया ।

"अब बताओ प्यारे ।" विजय ने कहा --- “ किस्सा क्या है?"

" विक्की ।" हैरी ने विकास से कहा -----कमरे का दरवाजा ही नहीं, सारी खिड़कियां भी बंद कर दो।"

"ऐसा क्या बताने वाले हो तुम?"

"बताता हूं । पहले वह करों जो कहा है ।"

विकास ने बैसा ही किया । उधर उसने अंतिम खिडकी बंद की इधर विजय ने कहा ---- “अब ज्यादा सस्पेंस बनाकर हमारी खोपडी फोड़ने की कोशिश मत करों प्यारे, जल्दी से बताओ----तुम अमेरिका से कूदकर आजाद कश्मीर में कैसे पहुच जाए?"

“मुझे वहां पहुचाने बालों के नाम नुसरत-तुगलक हैं ।"

"वे नमूने?” दोनों के मुह से एक साथ निक्ला, फिर विकास ने पूछा -----" वे तुम्हें कहाँ टकरा गए? "

"अमेरिका ही में ।"

"वहां क्या कर रहे थे वे?"

"वे वहां मुझे कंसाने के उदूदेश्य से ही आए थे ।"

"कारण ?"

"उस वक्त नहीं जानता था मगर अब जानता हूं !

"बता दो ।"

पहले यह बताता हू कि उन्होंने मुझे फंसाया किस तरह ।" कहने के बाद हेरी ने एक लंबी सांस ती । कुछ इस तरह जैसे अगली एक ही सांस में सबकुछ बताने का निश्चय किया हो और फिर, सचमुच एक ही सांस में वह खुद के नुसरत-तुगलक के चंगुल में फंसने का किस्सा बयान करता चला गया । अपने बेहोश होने तक की बात पूरी करने के बाद दूसरी सांस में बोला----" उस वक्त मैं नहीं समझ पाया था कि उन्होंने वह सब क्यों किया । होश में आने पर खुद को एक सीलन भरी छोटी-सी कोठरी में कैद पाया । मैं पाकिस्तानी सैनिको की देखरेख में था । उसी कैद में रहते, उन्हीं की बातों से धीरे-घीरे पता लगा----मैं आजाद कश्मीर में था और नुसरत-तुगलक ने मुझे वहां इसलिए पहुंचाया था क्योंकि उनके ख्याल से मैं उनकी साजिश के बोरे में जान के गया था ।"

 


"उनके ख्याल से, का क्या मतलब हुआ?"

"असल से मैं वह जानता ही नहीं था जिसके वारे में उन्हें भर्म हो गया था कि मैं जान गया हूं !"

"बडी पेचदार बाते कर रहे हो हैरी प्यारे , खोपड्री में कुछ घुसकर ही नहीं दे रहा ।"

"मेरे नुसरत तुगलक के चंगुल में फंसने से करीब दस मिनट पहले मेरे चीफ ने मुझे एक काम सौंपा था कहा था ----"एक सुचना के मुताबिक आज रात आठ बजे 'केलीबर' बार में एक तालिबान एक आई-एस-आई के जासूस से मिलने वाला है । तुम्हें उन दोनों को गिरफ्तार करके सीकरेट सर्विस के आँफिस में लाना ।" उसे छोटा-सा काम समझकर मैं केलीबर बार पहुचा । उस वक्त वे आपस में बाते कर रहे थे । मेरे कानों में तालिबान का केवल एक ही वाक्य पड़ा । वह आई-एस-आई के जासूस से कह रहा था --- 'अफगानिस्तान से "मारकेश' चल चुका है उस शख्स का नाम मारकेश' पड़ा ही इसलिए ही इसलिये क्योंकि जिसे वह मारने निकलता है वह बच नहीं सकता । जवाब में कुछ कहने के लिए आई-एस-आई के जासूस ने मुह खोला ही था कि रिवॉल्वर ताने उनके सिरों पर जा धमका । जाहिर है---- वे दोनों भौंचक्के रह गए । आई-एस-आई के जासूस का मुंह तो खुला का खुला ही रह गया था । मेरा उददेश्य उनकी बाते सुनना नहीं बल्कि केवल गिरफ्तार करके सीक्रेट सर्विस के आँफिस में ले जाना था !

सो , सीधे-सीधे रिवॉल्वर उनकी तरफ तानकर हाथ ऊपर उठाने का हुक्म दिया । हाथ ऊपर उठाते--उठाते उन पटूठो ने अचानक ऐसी हरकत कर डाली जिसकी मैँ स्वप्न में कल्पना नहीं कर सकता था ।"

"क्या किया उन्होंने?"

दोंनों ने अपनी-अपनी जेबों से रिवॉल्वर निकालकर एक दूसरे को गोली मार दी ।"

"अरे ये क्या बात हुई?”

"वही तो ।" हैरी बोला ----"मेरा तो दिमाग ही चकराकर रह गया था उस वक्त । जैसे ही हाथ उठाने के बीच उन्होंने हरकत की यानी अपने हाथ जेबों की तरफ बढाए, मुझे लगा मुझ पर हमला करने वाले हैं । मैंने फुर्ती से खुद को बचाने के लिए एक पिलर के पीछे जम्प लगाई मगर नहीं, उन्होंने मुझ पर हमला करने की कोई कोशिश नहीं की थी बल्कि एक दूसरे को मार डाला था । जव तक मैं पिलर के पीछे से वापस जम्प लगाकर उनके नजदीक पहुचा तब तक दोनो लाश में तब्दील हो चुके थे । यह रिपोर्ट जब सीर्केट सर्विस के आँफिस में पहुंचकर चीफ को दी तो कुछ देर तक तो वे भी सन्न से रह गए । जैसे कुछ समझ न पाए हो कुछ देर सोचते रहने के बाद बोले---"लगता है उनके पास कोई बहुत ही अहम इनफॉरमेशन थी । उन्हें डर हुआ होगा, इसलिए एक दूसरे को खत्म कर दिया । इसका मतलब वे आत्मधाती के दस्ते के लोग थे । वे ऐसा वे ही करते हैं ।"

जवाब में मैंने भी बस इतना ही कहा---" ऐसा ही लगता है सर ।"

चीफ ने कहा----‘काश हम जान सकते कि उनके पास क्या इनफोरमेशन थी । क्या तुमने उनके बीच होने वाली बाते सुनी थीं?' मैं बोला-----" ऐसी कोई कोशिश मैंने इसलिए नहीं की क्योकिं आपने ऐसा कुछ करने के लिए कहा ही नहीं था । मैंने तो पहुंचते ही उन्हें गिरफ्तार करने की केशिश शुरू कर दी थी । उनके बीच का केवल एक ही वाक्य सुन सका ।’

चीफ ने पूछा-"वह वाक्य क्या था ?"

मैंने बता दिया ।

सुनकर वे बोले-----'ओह !' इसका मतलब जल्दी ही विश्व की वड़ी हस्ती का कत्ल होने वाला है ।

मैंने चौंक कर पूछा'--"क्या मतलब सर?

उन्होंने बताया-'मारकेश ओसामा विन लादेन के मारक दस्ते के सबसे ज्यादा खतरनाक और कामयाब शख्स को कहते है । उसका असली नाम 'अताउल्ला' है मगर इस असली नाम को लगभग सभी भूल चुके हैं । उसके इस नए नाम के पीछे कारण है----वह जब भी, जिसे भी मारने निकला उसे मार ही डाला !

उसका शिकार कभी भी कोई छोटी-मोटी हस्ती नहीं होती । लादेन उसे अपनी मांद से निकालता ही तब है जब उसे दुनिया की किसी बडी हस्ती को खत्म करना होता है । तालिबान ने आईं-एस-आई के जासूस से जो कुछ कहा उससे जाहिर हे----मारकेश अपने किसी ताजा टारगेट की तरफ बढ़ चुका है । अफसोस-तुम यह नहीं जान सके कि अफगानिस्तान से निकले मारकेश की मंजिल क्या है । अब उन दोनों के द्वारा एक-दूसरे को मार डालने का कारण साफ-साफ नजर या रहा है । जाहिर है उन्हें मारकेश के टारगेट के बोरे में मालूम था वे किसी भी सूरत में अपनी इस जानकारी को उगलना नहीं चाहते थे । उन्हें डर हुआ होगा---- अगर वे तुम्हारे चंगुल में फंस गए तो मुमकिन है तुम उनका मुंह खुलवा तो । सो, एक-दूसरे को खत्म कर दिया ।' बात मेरी भी समझ में आ चुकी थी मगर आगे बढने का न मेरे पास कोई रास्ता था, न ही शायद चीफ के पास । अंतत: उन्होंने केवल इतना ही कहा- कि ---" खैर , हम मारकेश की मंजिल और टारगेट का पता लगाने की कोशिश करेगे । " उसके बाद मैं सीक्रेट सर्विस के आँफिस से वापस आ गया । बता ही चुका हूँ--यह घटना नुसरत-तुगलक के जाल में फांसने की घटना से दस दिन पुरानी है । कम से कम उस दिन यह घटना मेरी स्मृति पटल पर दूर-दूर तक नहीं थी जिस दिन मैं क्रिस्टी के साथ है "रेड लेबल' में बैठा था ।"

"पर उस घटना का तुम्हारी किडनैप होने से क्या संबंध है?"

" वही बता रहा हू।” हैरी ने कहा----" कैद में रहते हुए अपने पहरेदार पाक सैनिकों की आपसी बातचीत से पता लगा--- -तुगलक को यह वहम हो गया था कि मैंने तालिबान और आई.एस.आई. के जाजूस के बीच होने वाली बाते सुन ली थी और मैं मारकेश का टारगेट जान गया था, इसलिए मुझे जाल में उलझाकर किडनैप किया गया । जबकि मारकेश के टारगेट का पता तो मुझे उन्हीं पहेरेदारों की बेवकूफी भरी बातों से बाद में पता लगा ।"

"कौन है उसका टारगेट ?" व्यग्रता पूर्वक दोनो ने एक साथ पूछा ।

"तुम्हारे प्रधानमंतरी"

"क. . क्या?" विजय-विकस उछल पड़े ।

" वे शायद निकट भविष्य में पाकिस्तान यात्रा पर जाने वाले है ।"

"हां ।" विजय ने कहा…"है तो सही ऐसा ।"

"मारकेश लाहोर में उन पर हमला करेगा ।"

“ओह" विजय जैसे शख्स की चुहलबाजियां जाने कहाँ गायब हो गई । चिंता की लकीरें उभर आई थी उसकी-पेशानी पर । विकास ने अपने गुरू को ऐसी अवस्था में बहुत कम मोको पर देखा था । फिर भी विजय खुदको काफी जल्दी नियंत्रित करके कहा ----…"तुप तो वाकई अपने कलेजे में अणुबम से भी कहीं ज्यादा विस्फोटक जानकारी दबाए घूम ऱहे हो हैरी प्यारे ।"

"जिस क्षण मुझे मारकेश के टारगेट का पता लगा उसी क्षण से उस कैद से निकलने के लिए छटपटा रहा था । मौका मिलते ही भाग निकला । जान ही चुका था----मैँ आजाद कश्मीर में हूं । लक्ष्य था तुम्हारे पास पहुंचना । नहीं मालूम था कामयाब हो सकूंगा या नहीं । भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि मैं यहाँ पहुच गया ।"

"लाहोर में मारकेश कब, कहां और कैसे हमला करने वाला है ।"

" नहीं मालूम ।"

"मतलब ?"

"में केवल यह बता सकता हू जो पाकिस्तानी सैनिकों की बातचीत से पता लगा । यह भी नहीं कह सकता जो बाते वे करते थे उनमें कितनी सच्चाई है । आम चर्चा बस उनके बीच यही थी------ " हिन्दुस्तानी प्राइम मिनिस्टर लाहौर से वापस नहीं जा सकेगा! वह मारकेश के निशाने पर है । मारकैश कहां है, वह कब, कैसे और कहां क्या करेगा इस बात का शायद उन्हें भी कुछ पता नहीं था ।"

"ऐसा तुम कैसे कह सकते हो?"

"क्योंकि वे आपस में ही कयास लगाते रहते थे कि माऱकेश ये करेगा, वो करेगा ।”

“ओह" विजय थोड़ा गम्भीर जरूर नजर जा रहा था मगर पेशानी से चिंता की लकीरें गायब हो थी । कुछ देर जाने क्या सोचते रहने के बाद बोला----"और हैरी प्यारे, समय रहते हमें इतनी जबरदस्त इनफॉरमेशन देने के लिए तुम्हारा बहुत-वहुत शुक्रिया । वाकई तुमने अपनी जान पर खेलकर हिन्दुस्तान पर बहुत बड़ा उपकार किया है । अब तुम आराम करो, अब हम फुटाश की गोली लेते है !"

"मेरे ख्याल से अब आप पाकिस्तान जाएंगे ।"

"अमी तो खुद हमे ही नहीं मालूम प्यारे कि बक्त हमसे क्या कराने बाला है ।"

"इतना बुद्धू नही हूं अंकल ।"' हेरी मुस्कराया-----" समझ सकता हूं इतना सब कुछ जानने के बाद ऐसा हो ही नहीं सकता कि आपका टारगेट वह न वन जाए जिसका टारगेट आपके देश के प्राइम मिनिस्टर हैं और उसके लिए आपकी पाकिस्तान बल्कि लाहौर जाना होगा। कहना केवल यह चाहता है इस मिशन में मुझे भी आप अपने साथ ही पाएंगे ।"

"तुम अभी जख्मी हो प्यारे, आराम करो । हम और दिलजला काफी होंगे ।"

"विकास जानता है, हैरी को ये जख्म रोक नहीं सकते ।"

"फिर भी ।” विकास ने कहा'-“गुरु ठीक कह रहे है हैरी, मारकेश जैसे चिल्लर से निपटने के लिए हम दोनों काफी. .. ।"

" नहीं वि्क्की नहीं ।" अचानक हैरी का चेहरा लगा --" ये जख्म मुझे बेड से बांधकर नहीं रख सकते । मैं यह भी जानता हूं ---- " तुम दोनों तो क्या, मारकेश के लिए हम तीनों में से कोई एक ही काफी मगर. .. ।"

"मगर ?"

"ऐक गोली मे भी अपने हाथों से उस हरामजादे के जिस्म में उतारना चाहुंगा ।"

" पर प्यारे, इस मामले में तुम इतने सेंटीमेंटल क्यों हो रहे हो?"

'क्योकि मैंने वर्ल्ड हैड सेटर और पेंटागन में होने वाली तबाही को अपनी आँखों से देखा है ।"

"ओह "

 


विजय की 'ओह' पर जरा भी ध्यान दिए बगेर जुनूनी अवस्था में हैरी कहता चला गया…“मेरे मुल्क की शान समझे जाने वाली इमारत पलक झपकते ही जमीन के अंदर की गई । हजारों बेकसूर और मासूम लोग मारे गए । मैं कैसे भूल सकता हू अंकल । कोई भी अमेरिकी उस होलनाक मंजर को कैसे भूल सकता है । वह सब भी उसी के चेलों ने किया था जिसका चेला मारकेश है । उसके सीने में आग भरकर मुझे सुकून मिलेगा । जिसने आज अपना टारगेट भारत के प्रधानमंत्री को बनाया है कल उसके निशाने पर अमेरिका का राष्ट्रपति भी हो सकता है, इसलिए........।

" "'रिलेक्स प्यारे, रिलेक्स !" कहने के साथ विजय ने उसके कंघे पर हाथ रखा ।

"शर्म आनी चाहिए नुसरत मियां ।" तुगलक कह रहा था----- "शर्म आनी चाहिए तुम्हें ।"

"म........मुझे?" नुसरत चिहुंका------"मुझे क्यों?"

"क्योकि तुम भी उसी देश के वासी हो जिसके ये है? ये । कहने के साथ तुगलक ने मेज के पीछे पड़ी चेयर पर बैठे शख्स की तरफ़ इशारा किया---- "इन्हें हमने एक छोटा-सा बल्कि बहुत ही नन्हा-सा काम सौंपा था मगर ये उसे भी ठीक से अंजाम नहीं दे सके । सारा गुड़ गोबर कर दिया ।"

"गुड गोबर इन्होंने- किया है । शर्म इन्हें आनी चाहिए । मुझे क्यों लपेट रहे हो ?"

"बताया तो है---- " तुम्हें इसलिए लपेट रहा है क्योंकि तुम भी उसी देश क वासी हो जिसके ये…"

" उस हिसाब से तो शर्म तुम्हें भी आनी चाहिए ।" नुसरत ने तुगलक की बात काटकर कहा --- "क्योंकी तुम्हारी मां ने भी तुम्हें उसी देश की धरती पर पटका था जिस पर हम दोनों पटके गए थे ।"

"आ रही है । मुझे भी शर्म आ रही है ।"

“तो अभी लाता दूं ।" कहने के साथ नुसरत एक झटके के साथ कुर्सी से उठा ।

तुगलक ने पूछा…“क्या लेने चली ?''

"चुल्लू भर पानी ।"

"इरादा ठीक है तुम्हारा । हमे भी उसी में डूबकर मर जाना चाहिए मगर ये ।" एक बार फिर तुगलक ने चेयर पर बैठे शख्स की तरफ़ इशारा किया----- " ये ऐसा नहीं करेगे !! दुनिया के सबसे महान मुल्क की सबसे महान जासूसी संस्था आई-एस-आई के चीफ जो ठहरे !"

" प्लीज ..........प्लीज मिस्टर नुसरत- तुगलक ।" चेयर पर बैठे शख्स ने अपने चेहरे पर वेदना लिए कहा ----- पहले ही बहुत शर्मिन्दा हूँ और ज्यादा शर्मिन्दा न करें ।"

" अगर तुम और ज्यादा शर्मिन्दा हो गए तो अपना बिगाड क्या बिगाड़ लोगे ?"

" म....म......मैं अपने पद से इस्तीफा देने के लिए तैयार हूं ।" खुद को जलील महसूस कर रहे शख्स ने ज़ज्जाती लहजे में कहा ।

" और तुम्हारे इस्तीफा देने से इस महान मुल्क का जो नुकसान हुआ है यह पूरा हो जाएगा ?"

नुसरत बोला-""वापस कैद में लोट आएगा छटंकी नम्बर दो !"

"लौट भी आया तो अब क्या आचार डालेंगे हम उसका या मुरब्बा बनाकर चाटेंगे?" तुगलक ने कहा---"जो नुकसान वह हमारा कर सकता था, वह कर चुका होगा । विजय-विकास के सामने पूरा कर चुका होगा इस जानकारी को कि लाहोर में मारकेश उनके प्रधानमंत्री का तीया-पांचा करने वाला है ओर उनके सामने यह जानकारी 'पूरने' का मतलब है-हमरे और मारकेश के लिए अव यह काम जन्नत तक सीढी लगाकर चढ़ने जितना मुश्किल हो जाएगा । ऐसे में अगर उन्होंने अपने प्रधानमंत्री की पाकिस्तान यात्रा रद्द कर दी तो हमारी भद्द पिट - जाएगी है !

"मेरे ख्याल से हमारी इतनी ही भद्द नहीं पिटेगी तुगलक भाई ।" नुसरत ने कहा ।

तुगलकं ने पूछा…"और कितनी पिटेगी नुसरत बहन?"

"इससे कहीं ज्यादा । मुझे पूरा यकीन है-बो जोकर भले ही अपने प्रधानमंत्री का पाकिस्तान दौरा रद्द करने की कोशिश को मगर छटंकी नम्बर वन मामले करे यहीं खत्म नहीं होने देगा । दो जरा टेढ़ा है । उसकी कोशिश होगी---- " अपने प्रधानमंत्री को पाकिस्तान की सैर कराकर वापस सुरक्षित हिन्दुस्तान ले जाना । ऐसा हो गया तो वह सारी जिंदगी हमेँ ठेंगा दिखा-दिखाकर चिढ़ाया करेगाा ।"

"और ये सव होगा इनकी वजह से ।" एक बार फिर उसने चेयर पर बैठे आई-एस-आई के चीफ की तरफ इशारा किया ।

"वाकई ।" तुगलक ने कहा…“अगर ये उसे संभालकर रखते तो आज़ हमें यह दिन न देखना पड़ता ।"

' "मैंने तो पहले ही कहा था कि उसे इनके यानी अई.एस.आई के हवाले मत करों ।" नुसरत बोला----" अपने चार्ज में रखो । सीर्केट सर्विस की कैद में । तुम ही नहीं माने । कहा----आई-एस-आई आखिर हमारे मुल्क की महान संस्था है । फिर, आर्मी मदद भी हासिल है इन्हें । छटंकी तो क्या, छटंकी का बाप भी इनकी कैद से फरार नहीं हो सकेगा ।"

"तुमने सुना मियां ।" तुगलक सीधा आई-एस-आई के चीफ से मुखातिब हुआ…“उसे तुम्हारे चार्ज में रखने का फैसला मेरा था !

"तुमने सुना मियां ।" तुगलक सीधा आई-एस-आई के चीफ से मुखातिब हुआ-----“उसे तुम्हारे चार्ज में रखने का फैसला मेरा था ! सिर्फ मेरा !!! मेरे पार्टनर तक की सलाह अलग थी , इसलिए अब तुमसे कम से कम इतना पूछने का राइट तो मिल ही गया कि तुमने नाक क्यों कटबाई ? "

चुप रहा आई.एस॰आई॰ का चीफ ।

कहता भी तो क्या कहता?

 


यह जानता था…नुसरत तुगलक को सीधे सेना के जनरल और पाकिस्तानी राष्ट्रपति के द्वारा उसके पास भेजा गया है । सबसे पहले तो खुद जनरल ने ही उसे खरी-खोटी सुनाई थी । कहा था कि अगर यह एक कैदी को भी कैदी बनाकर नहीं रख सकता तो उसे आई-एस-आई के चीफ जैसे पद पर बने रहने का कोई हक नहीं है । उसने उसी समय अपने पद से इस्तीफा देने की पेशकश की थी , मगर जनरल ने कहा----" नहीं, तुम्हें सजा हम नहीं, नुसरत-तुगलक मुकर्रर करेंगे । उन्हें भेज़ रहे हैं ।"

और अब ।

नुसरत-तुगलक उसके सामने थे ।

उसे सजा देने जाए थे वे ।

जो हुआ, उस पर मन-ही-मन वह स्वयं 'गिल्टी' था ।

हर सजा भोगने के लिए भी तैयार था मगर, नुसरत-तुगलक न सजा सुना रहे थे न दे रहे थे । वे तो जलील कर रहे उसे । जो शख्स खुद ही अपनी. नाकामी के कारण खीझा हुआ था उसे और ज्यादा जमीन में गाड़े दे रहे थे !!

" जबाब दो मियां ।" उसे चुप देखकर तुगलक ने कहा ----" तुमने हमारी नाक क्यों कटाई ?"

"जो हो चुका है उसे अब मैं बापस तो ला नहीं सकता !" आई.एस.आई का चीफ़ इससे ज्यादा और कह भी क्या सकता था ---- "आप जो भी सजा दे, मैं भुगतने के लिए तेयार हूं ।"

"नाक कटी है मेरी! अब तुम्हीं तय करो----" क्या सजा दी जाए?"

"आप लोग जो भी सजा देंगे, मुझे कबूल होगी ।"

"तुगलक भाई ।" नुसरत ने कहा----“मैं बता सकता हूं इन्हें क्या 'सजा दी जानी चाहिए ।""

"बता ।"

"नाक के बदले नाक ।"

" तुगलक की दो आंखें आई.एस.आई के चीफ की नाक पर केद्रित हो गई!!!

और ......... उनका इरादा भांपते ही चीफ के सम्पूर्ण जिस्म में झुरझुरी -सी दौड़ती चली गई !

"सोचो मिंया , नाक काटकर शक्ल कैसी हो जायेगी इनकी ! अपने नाते -रिश्तेदारों को थोबड़ा तक नहीं पाएंगे ! सारे पाकिस्तान में चर्चा हो जाएगी --- I.S.I के चीफ की नाक छटंकी नः दो ले गया !!!! जीते जी मर जाएंगे बेचारे ! ठीक ही कहा इन्होंने ---- इससे तो बेहतर ये है ये रहें ही नहीं ! खलास कर दिये जायें ! ना रहेंगे ना लोंगों के ताने सुनेंगे !"

"अगर इन्हें नहीं ही रहना है तो केबल एक तरीका है !"

" वह क्या ?"

"इन्हें चुल्लू भर पानी में डूबकर मरना होगा ।"

"ऐसी शर्त क्यों?"

" क्योकि पकिस्तान इनकी इससे ज्यादा "एक्सपेंसिव' मौत 'अफोर्ड’ नहीं कर सकता ।"

"ठीक है ये तो खुद ही कह रहे थे कि शर्मिन्दा है । शर्मदार आदमी को डूबकर मरने के लिए चुल्लू भर पली काफी होता है । अभी लाया ।" कहने के वाद वह दौड़ता हुआ बाथरूम में चला गया ।

. कुछ देर बाद वह चुल्लू में पानी भर लाया ।

लपककर सीधा चीफ़ के नजदीक पहुचा । बोला'--"लीजिए हुजूर । डूबकर मर जाइए इसमें न हींग लगेगी न फिटकरी । रंग भी चोखा आएगा !"

"नहीं मर सके तो मुझे अपने द्वारा मुकर्रर की गई सजा देनी पडेगी ।" कहने के साथ तुगलक भी अपने स्थान से खड़ा हो गया. । मेज की परिक्रमा सी करने के बाद वंह भी चीफ के नजदीक पहुचा । अब चीफ के एक तरफ नुसरत था, दूसरी तरफ तुगलक ।

 
तुगलक ने अपनी जेब में हाथ डाला । एक चाकू निकाला ।

''किर्र . .रं. . .र्र॰. . !"' की आवाज के साथ गरारीदार चाकू खुला तो धूप में रखे आइने की मानिन्द दमक रहे उसके फल को देखकर चीफ के तिरपन कांप गए । चाकू के फल को उसके चेहरे के चारों तरफ़ घुमाते हुए ने तुगलक ने कहा ---- " किसी के साथ जोर-जबरदस्ती करने की कला हमने कभी नहीं सीखी चीफ मियां। आपकी इच्छा का विकल्प आपके सामने है। नुसरत वहन के चुल्लू में अभी तक पानी मोजूद है है या तो इसमें डूबकर कर मर जाइए वरना चाकू से नाक कटवाइए ! ”

"मेरे ख्याल से इसमें डूबकर मरना ही आपके लिये बेहत्तर होगा ।"

नुसरत ने अपना चुल्लू ठीक उसकी अच्छी के सामने कर दिया । थोड़ा मुड़कर तुगलक से बोला-…""चल वे दुर हट ।"

"जब तक चुत्लू में पानी है, तब तक इनके पास पूरा मोका हैं । उधर पानी खत्म हुआ इधर मेरा चाकू चलेगा । चाकू भी साला विदेशी है । सीधा रामपुर से मंगाकर अंटी में लगाया था । विदेशी चाकू से नाक कटेगी बंदापरवर की । पानी को संभाल वो बूंद-बूंद करके टपक रहा ।"

“जल्दी कीजिए हुजूर ।" नुसरत ने कहा ----"चुल्लू का पानी खत्म होने वाला है । खत्म हो गया तो आप देख ही रहे हैं, बडा जालिम है तुगलक । सचमुच आपकी नाक कत्तर डालेगा ।"

"नहीं ।" चीफ़ ने यह समझ में आते ही मर्मान्तक चीख के साथ दोनों हाथों से अपनी नाक ढांप ली कि दोनों सजा के तौर पर उसकी नाक काटने ही यहां आए हैं ।

“फाउल । ये तो फाउल है नुसरत बहन ।" तुगलक ने कहा…"मेरी नाक कटवाने के बाद अपनी नाक को बचाने की ऐसी कोशिश करने का इन्हें कोई राइट नहीं है । फेंक दे चुल्लू में भरा पानी और जक्ड़ ले इनके हाथ । अब ये अपनी मर्जी से मरने का हक खों चुके है ।"

" ठीक कहा --- तुगलक भैया । अब मैं तुम्हारे साथ हूं।" कहने के साथ नुसरत ने अपने दोनों हाथों से चीफ के हाथ पकड़कर उसके चेहरे से खींचे । चीफ चीख रहा था । मचल रहा था । मगर व्यर्थ । वहाँ कौन था जो उसकी मदद करता । नाक कटी तो एक ह्रदय विदारक चीख पनाह मांगती सी दूर-दूर तक गूंजती चली गई ।

"नहीं सर ।" ब्लेक ब्वाय ने प्रधानमंत्री कार्यालय से बात करने के बाद रिसीवर वापंस करेडिल पर रखते हुए विजय से क्हा------“प्रघानमंत्री का- पाकिस्तान दौरा रदृद नहीं हो सकता । "

“तुमने उन्हें बता दिया है न कि वहां......!"

"सब कुछ बता दिया है सर । आपके सामने ही तो बात की है । प्रधानमंत्री के निजी सचिव का कहना है…हमारी तरफं से यह दौरा रदद होने पर अंतर्राष्टीय जागत में हमारी बहुत किरकिरी हो जाएगी ।"

“किरकिरी तो पाकिस्तान की होनी चाहिए । वह हमारे प्रधानमंत्री को वहाँ बुला रहा है और उसके जासूस मारकेश के जरिए उनकी हत्पा का षडूयंत्र रच रहे हैं ।"

"इस बात को साबित करने का हमारे पास कोई सुबूत नहीं है । हैरी के बयान को सुबूत नहीं माना जा सकता ।"

"बात तो ठीक ।"

यहाँ । हमारी जानकारी पर प्रधानमंत्री के निजी सचिव चिंतित जरूर हो उठे । कहने लगे…अगर ऐसी रिपोर्ट है तो फौरन विजय-विकस को पाकिस्तान रवाना कर दिया जाए । अभी प्रधानमंत्री के पाकिस्तान दोरे में टाइम है । उनकी कोशिश होनी चाहिए-प्रधानमंत्री के वहाँ पहुचने से पहले ही मारकैश को काबू में कर लेना ।"

"यानी गाज उल्टी हम ही पर आ गिरी?"

"मैँने तो पहले ही कहा था गुरू ऐसी कोशिश हमें करनी ही नहीं चाहिए ।" काफी देर से खामोश बैठा विकास अंतत: बोल ही पड़ा-----“होना तो यह चाहिए कि प्रधानमंत्री वहां जाएं । शान से निर्धारित किए गए हर प्रोग्राम में हिस्सा ले और दनदनाते हुए सुरक्षित भारत लौट आएं । यह होगा पाकिस्तान को हमारी तरफ से दिया गया मुंह तोड़ जवाब । और. . .यह जवाब देने में हम सक्षम हैं । इस बार मुझे नुसरत-तुगलक को भी देखना है और मारकेश नामक उस शेतान को भी जिसके बारे में कहा जाता है कि जिसे वह मारने निकलता है वह जीवित नहीं रह सकता । खुद पर और अपने चेले पर भरोसा रखो गुरु । चलो पाकिस्तान । देखें तो सही, शिखर बार्ता के नाम पर यह नापाक मुल्क अब क्या साजिश रच रहा है ।"

"चलना तो पडेगा हो दिलजले । जाना तो पडेगा ही अब वहाँ ।" विजय ने कहा-----"हमाऱी कोशिश तो प्रधानमंत्री के सिर पर मंडरा रहे खतरे को टालने की थी । क्योंकि भले ही हम चाहे जितने तीस मारखां सही मगर नाकाम भी हम ही लोग होते है । इस बात की हमेँ कोई परवाह नहीं कि हमारी नाकामी के कारण हमारी अपनी जान वली जाए मगर प्रधानमंत्री की जान इस देश के गौरव की जान को कोई खतरा हो तो प्रयोग नहीं किए जा सकते ।"

"मगर अब तो ।" ब्लेक व्वॉय ने कहा-----" हालात जो हैं उनके मुताबिक ही काम करना होगा ।"

 


“और हम तैयार हैँ ।” बिजय ने निर्णायक स्वर में कहा------"वेसे भी, मोहम्मद इकराम के लिए तो हमें पाकिस्तान जाना ही था । अव हम कह सकते हैं-मोहम्मद इकराम की सीधी वात को उल्टे ढंग से प्रचारित करके भारत में दंगे कराना और प्रधानमंत्री के लिए मारकेश को पाकिस्तान बुलाना पाकिस्तान की एक ही साजिश के दो हिस्से है । हमे इस साजिश का भंडाफोड़ करना होगा । हमारा ख्याल है कि वे मोहम्मद इकराम को कोई ऐसा बयान जारी करने के लिए मजबूर करेंगे जिससे हिन्दुस्तान में लगी साम्प्रदायिक आग में घी पड जाए । हमारी सबसे पहली कोशिश उनके किसी ऐसे इरादे को नाकाम करने की होनी चाहिए ।"

"मेरे ख्याल से अब आप सही लाइन पर सोच रहे हैं ।" विकास ने कहा ।

"उसका क्या नाम बताया था जने जिससे हरशरण शास्त्री मोबाइल के जरिए बात किया करता था?"

"असलम ।" ब्लेक व्बॉय ने बताया ।

"हां । असलम ।" विजय ने नाम दोहराया----" पाकिसेतान में हमें अपना काम उसी की खोज से शुरू करना होगा ।"

"उसे खोजने की जरूरत नहीं पड़ेगी सर ।”

"क्यों?"

"उसका पता पाकिस्तान में स्थित रॉ की नजमा नामक जासूस को पता है । शास्त्री के मोबाइल पर अंकित फोन नम्बर उसी को भेजा गया था । उस नम्बर के वेस पर नजमा ने असलम का नाम ही नहीं एड्रेस भी पता लगा लिया है । आप चाहेंगे तो वह आपको सीधे असलम के फ्लैट तक पर पहुचा देगी ।"

विजय ने अजीब सवाल किया-दिखने में केसी है नजमा डार्लिंग ?"

वह बेहद आकर्षक धी ।

गोल चेहरे और बडी-बडी नीली आंखों बाली ।

कद पांच फुट सात इंच ।

रंग वेसा जैसा कश्मीरियों का होता है । कमर से नीचे तक स्पर्श करते उसके लंबे बाल इस वक्त खुले हुए थे ।

जिस्म पर मोजूद काले टाप और टांगों से चिपकी काली जींस में वह जरूरत से ज्यादा ही स्मार्ट लग रही थी । विजय-विकास को उसके दर्शन फलैेट का दरवाजा खुलते ही हो गए थे । दरवाजे के बीचोबीच खडी नजमा ने अपनी चमकदार आंखे दोनों आगंतुकों पर जमाते हुए कहा"-“कहिए?"

"में काबुल से आया हूं।" विजय ने कहा ।

नजमा ने तुरंत विकास की तरफ देखते हुए कहा-----" और आप कंधार से?"

" हम दोनों एयरपोर्ट पर मिलें ! विकास ने अपने हिस्से का सेटेंस बोला ।

"दोनों की बातें हुई । पता लगा दोनों को एक है जगह जाना है तो साथ चले जाए ।" विजय ने कोड का अंतिम वाक्य पूरा किया ।

कोड पूरा होते ही नजमा मुस्काई। उसके गुलाबी होंठों पर 'स्वागत' वाली मुस्कान बहुत भली लगी थी । दरवाजे के बीच से हटती हुई बोली-- "आइए! मैं पाकिस्तान में आपका इस्तकबाल करती हू।”

विजय-विकास ने एक साथ दरवाजा पार करके फ्लैट में कदम रखा ।

 


इस वक्त दोनो अफगानी नजर आ रहे थे । जिस्पो पर पठानी सूट । चेहरों पर ऐसी दाढी मूंछे जिन पर भूल से भी केचीं नहीं मारी गई थी । पेरों में जूतियां ।

ड्राइंग रुम में पहुंचकर नजमा ने पूछा- ---" आप में से विजय कौन है और विकास कौन?”

"लम्बाई से पता नहीं लग रहा?” विजय ने पूछा ।

"आप लोगों का क्या भरोसा । सुना है, चेहरे ही नहीं ----"जिस्म की बनावट और लम्बाई तक चेंज कर लेते है । अब देखिए न, आपको देखकर कोई कह नहीं सकता कि आप इंडियन्स हैं ।"

"मैं बिकास हूं ! ” लम्बे लड़के ने कहा !

नजमा उसी की आखों में आखें डालकर बोली…“मैं आप लोगों को अपनी असली सूरतों में देखना चाहती हूं।"

“वजह?"

" देखना चाहती दु वास्तव में वे कैसे लागते है जिन्हें जासूस जागत का सिरमौर कहा जाता है ।"

"मतलब?"

"साफ है --- बहुत नाम सुना है आप लोगों का । मैं तो आपको रिसीव करने एयरपोर्ट जाना चाहती थी , मगर मेरे चीफ का हुक्म हुआ---- " मुझे ऐसा नहीं करना है । यह निर्देश आप ही के थे । आपने कहलवाया था ---- इसमें खतरा हो सकता है ।"

"हमारी असली सूरत देखकर बच्चे अवसर डर जाते हैं । विजय ने कहा …- "खासतौर पर इस दिलजले का चेहरा देखकर !

इसलिए बेहतर है----तुम इस चक्कर में मत पड़ो । फौरन असलम मियां के पास ले चलो हमें । उनसे दो-दो हाथ हो जाएं तो बात बात आगे बड़े !!!

नजमा मुस्कराईं । बोली----"जैसा सुना था, बैसा ही पाया । आकर खडे़ नहीं हुए है कि लगे काम की बाते करने । मैंने आपके लिए ब्रेकफास्ट का इंतजाम कर रखा है । फ्रेश होकर डायनिंग रूप में आ जाइए ।" कहने के बाद वह रुकी नहीं बल्कि किचन की तरफ बढती चली गई ।

विजय-विकास एक…दूसरे की तरफ देखते रह गए ।

असलम उस वक्त अपने फ्लैट में, बल्कि बेड पर एक लड़की के साथ था जब कालबेल जोर से चोखी ।

लड़की के शरीर से खेलते उसके हाथ रुक गए ।

दिमाग पर झुंझलाहट सवार हुई । मुंह से निक्ला ---- "कौन आ मरा इस वक्त ?"

"' लडकी जो खुद उत्तेजित अवस्था में थी, ढीली पड़ गई । कालबेल एक बार फिर चीखी ।

" उफ्फ !" असलम भन्ना कर लड़की से अलग हुआ । बड़बडा़या ---" अभी देखता हूं साले को ।"

लडकी भी वेड से उठी । फर्श पर छितराए पड़े अपने कपड़े उठाने के लिए झुकी ही थी कि असलम ने कलाई पकड़कर वापस वेड की तराफ खींचते हुए क्या---" यूहीं पड़ी रह । कपडे पहन लेगी तो फिर उन्हें उतारता फिरूंगा । दरवाजे पर जो भी है उसे टरका आता हू।"

दोनों में से किसी के जिस्म पर कोई कपडा नहीं था । लडकी का जिस्म कुछ देर डनलप के गदृदे पर झूलता रहा फिर स्थिर हो क्या।

इस बीच कांलेबल एक बार और बज पडी थी !

 


असलम दरवाजे की तरफ लपका ।

लड़की मुंह दबाकर हंस पडी ।

दरवाजे के नजदीक पहुंच चुका असलम ठिठका । घूमा । और गुर्राया--“दांत क्यों फाड़ रही है?"

"तुम दरवाजा खोलने जा रहे हो ।" वह बराबर हंस रही थी ।

"और क्या करूं?" वह झुंझलाया ।

" यूं ......यूं ही ।" कहकर वह और जोर से हंस पडी । चेहरा अपने हाथों में छुपा लिया ।

तभी असलम की नजर अपने सामने रखे ड्रेसिंग टेबल के ज्याने पर पडी । खुद को जन्मजात खड़ा पाकर पहली बार ख्याल जाया उसके तन पर कोई कपड़ा नहीं है । . कुछ और बौखला गया । फर्श पर पड़े तहमद पर झपटा। कुछ देर बार वह ज़ल्दी-जल्दी अपने पेट पर तहमद की गा'ठ बांधता हुआ दरवाजे की तरफ़ लपक रहा था । लडकी अभी भी हाथों से चेहरा कांपे खिल-खिलाकर हंस रही थी ।

बेडरुम और ड्राइंग रूम के बीच का दरवाजा असलम ने भिड़ाकर कर बंद कर दिया ।

फ्लेैट के मुख्य द्वार की तरफ़ लपका । तब तक कालबेल एक बार और चीख चुकी थी !!! इसलिए भन्नाया हुआ था ।

एक झटके से दरवाजा खोला । कुछ कहने ही वाला था कि .......

मुहं खुला का खुला रह गया ।

लफ्ज तो लफ्ज . .हवा तक बाहर न निकल सकी उसके ।

यूं खड़ा रह गया जैसे ताजमहल को अपनी चौखट पर खड़ा देख रहा हो ।

मारे हैरत के उसका बुरा हाल था ।

एक आवाज गूजी----“क्या हुआ असलम मियां? बुत कैसे बन गए?"

“अ. . आप लोग. . .आप लोग यहाँ मेरे फ्लेट पर?" लफ्ज असलम के मुंह से यूं अटक अटक कर निकल रहे थे जैसे बगैर जुबान के बोल रहा हो ।

तुगलक बोला ----" ना आते तो अपनी खटिया खड़ी पाते ।"'

"अ. . आप लोग मुझे वहीं वुलवा लेते ।"

"नहीं वुलवा सकते थे ।"

"क . . .क्यों? "'

"क्योंकि तुम्हारा बुलावा ऊपर से आ चुका है ।"

" ज.....जी ।" असलम के हलक से चीख-सी निकली--- " क्या मतलब?"

"सारा इंटरव्यू दरवाजे पर खड़े-रव्रड़े ले डालोगे या. . . ।"

"अ- . आइए! आइए! " असलम नुसरत की बात पूरी होने से पहले इस तरह पीछे हटता हुआ बोला जैसे दरबारी अपने बादशाह को रास्ता देने के लिये हटते हैं !!!!!!!

और वे…जिन्हें दुनिया नुसरत-तुगलक के नाम से जानती है सचमुच शहंशाहों की तरह चलते फ्लैट में दाखिल हुए।

अपने परम्परागत लिबास में थे अर्थात पेरों में चमकदार कढ़ाई वाली जूतियां ! चूडीदार सफेद पाजामे । बंद गले के काले कोट । सिरों पर कल्फ से अकड़ी वे टोपियां जिन्हें आमतौर पर शायर पहन हैं ।

हमेशा की तरह आखों में काजल लगाए हुए थे ।

मुहं में दवे थे तम्बाकू के पान ।

जुगली-सी करते वे ड्राइंग रूम में दाखिल हुए। असलम उन्हें वहाँ देखकर अभी भी बुरी तरह हैरान था ।

उनके लिए काम ज़रूर कर रहा था यह मगर स्वप्न तक में नहीं सोच सकता था कि पाकिस्तान के सबसे बड़े जासूस समझे जाने वाले नुसरत-तुगलक उसकी, उस अदने से जासूस की चौखट पर जा धमकेंगे । उसका दिमाग ही नहीं, सारा वजूद यह जानने के लिए मरा जा रहा था कि वे यहाँ जाए तो आए क्यों हैं? शायद इसलिए वह एक बार फिर अपने मुंह से निकलने वाले शब्दों को न रोक सका…"'म. मेरी समझ में नहीं आया, मुझ अदने से जासूस से मिलने आपको खुद क्यों आना पड़ा?"

"क्योंकि एक मिस्टेक कर चुके हो?" नुसरत ने कहा ।

" मिस्टेक ......... कैसी मिस्टेक?"

तुगलक बोला --- '" भयानक मिस्टेक"

"पता तो लगे ।" असलम के होश फाख्ता थे ।

 
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