जय ने बताया था कि उनकी पत्नी गुज़र चुकी थीं और इकलौती बेटी अपनी शादी के बाद विदेश जा बसी थी। इसलिए वो इतने बड़े बँगले में अकेले ही रहते थे। राज उनकी तरफ़ बढ़ चला। राज के कदमों की आहट सुनकर ब्रिगेडियर ने शतरंज से नज़रें उठाकर उसे देखा और बड़े प्यार से मुस्कुराये।
"प्लीज़ड टू मीट यू, यंगमैन," ब्रिगेडियर ने बड़ी गर्मजोशी से राज के साथ हाथ मिलाया।
"द प्लेशर इज़ ऑल माइन, सर," राज मुस्कुराया।
"बैठो," सोफ़े की तरफ़ इशारा करते हुए ब्रिगेडियर ने कहा, "सफ़र कैसा रहा तुम्हारा?"
"जी, अच्छा ही था," राज सोफ़े पर बैठ गया।
"नारायण, 2 कप कॉफ़ी भिजवा दो, प्लीज़," ब्रिगेडियर ने मेज़ पर रखे फ़ोन पर आर्डर दिया। "थैंक यू।"
"यहाँ आकर तुम्हें डर तो नहीं लग रहा?" ब्रिगेडियर मुँह दबाये हँसे।
"नहीं तो सर," राज ने हाथ खड़े कर दिए, "यहाँ ड़र लगने जैसा क्या है?"
"मानो तो है, नहीं मानो तो नहीं है," ब्रिगेडियर ने सिगार का डब्बा खोला और राज की ओर बढ़ाया।
राज ने हाथ के इशारे से मना कर दिया। तभी नौकर एक ट्रे में कॉफ़ी के दो कप लिए आ गया। उसने ट्रे राज की तरफ़ बढ़ायी।
"थैंक यू," राज ने कॉफ़ी का कप लेते हुए कहा।
ब्रिगेडियर को कॉफ़ी देने के बाद नौकर वहाँ से चला गया।
"और आप क्या मानते हैं, ब्रिगेडियर साहब?" कॉफ़ी का एक घूँट पीकर राज ने पूछा।
"मेरे लिए ये सब महज़ कहानियाँ हैं," कॉफ़ी का स्वाद चखते ही ब्रिगेडियर साहब की आँखों में चमक आ गयी। "सुनना चाहोगे भानुगढ़ के भूतिया किले की कहानी?"
"जी, ज़रूर," राज ने कॉफ़ी के कप को मेज़ पर रख दिया।
"हज़ारों साल पहले, यहाँ सारणीया राजवंश की हुकूमत हुआ करती थी। उस राजवंश की दसवीं पीढ़ी के महाराज भानुप्रतापदेव सारणीया से ये कहानी शुरू होती है। महाराज भानुप्रतापदेव बड़े ही दयालु और कर्तव्यनिष्ठ राजा थे। मगर, राजा का कोई बेटा नहीं था जो उनके बाद, उनका राजकाज संभाल सके और शत्रुओं से अपने राज्य और प्रजा की रक्षा कर सके। राजा को हर वक़्त एक डर सताया करता था। राजा की बढ़ती उम्र के साथ उनका ये ड़र और चिंता और ज़्यादा बढ़ते गए।"
"राजा के उस ड़र का नाम था, महाराज सुरेंदर प्रताप। वो भानुगढ़ के पड़ोसी देश, समरगढ़ का राजा था और बड़ा ही क्रूर था। उसने अपनी प्रजा पर तरह तरह के ज़ुल्म ढाए थे। हर वक़्त बस, प्रजा को सता कर अपनी तिजोरियाँ भरने की फ़िराक़ में रहता था वो। भानुगढ़ पर उसकी बुरी नज़र थी।
राजा भानुप्रतापदेव उस दुष्ट राजा सुरेंदर से किसी तरह का मन मुटाव नहीं चाहते थे। इसलिए, उन्होंने एक दिन सुरेंदर प्रताप को अपने महल आने का न्योता दे दिया ताकि दोनों आपसी बातचीत के ज़रिए कोई ऐसा रास्ता निकलें कि जिससे दोनों राज्य के बीच कभी जंग ने हो और अच्छे तालुकात बने रहें। इसी बीच राजा भानुप्रतापदेव की तबियत काफ़ी बिगड़ गयी। उनका आखिरी वक़्त करीब आ गया था।"
"राजा भानुप्रतापदेव का न्योता स्वीकार कर विराटपुर से कुछ लोग भानुगढ़ आ गए। भानुगढ़ की प्रजा के बीच किसी ने अफ़वाह उड़ा दी कि राजा भानुप्रतापदेव, अपना राज्य महाराज सुरेंदर प्रताप को सौंप रहे हैं ताकि महाराज सुरेंदर उनकी और राजपरिवार की जान बक्श दें। प्रजा का गुस्सा भड़क गया और वो राजा के खिलाफ़ विरोध पर उतर आए। करीब आधी रात के वक़्त, भानुगढ़ की पूरी प्रजा ने मिलकर राजमहल पर हमला कर दिया और वहाँ आग लगा दी।"
"राजा के सैनिक भी विद्रोहियों को कुचलने में नाकामयाब रहे और सब कुछ जलकर ख़ाक हो गया। महल के अंदर फँसे कई सारे बेकसूर लोग आग में झुलसकर मर गए। कहते हैं, भानुगढ़ के किले के अंदर आज भी उन बेकसूर लोगों की आत्मा भटकती है। वो आत्माएँ, भानुगढ़ के लोगों से अपनी मौत का बदला लेने को बेचैन हैं।"
"रात के अंधेरे में ये आत्माएँ बहुत ज़्यादा ताकतवर हो जाती हैं। उस वक़्त जो किले के अंदर जाता है, वो कभी ज़िंदा वापस नहीं आता। और अगर किले से बच निकल भी जाये तो अपना दिमागी संतुलन खो बैठता है। तो ये थी भानुगढ़ के भूतिया किले की दास्तान। कैसी लगी ये कहानी तुमको?"
"इंटरेस्टिंग! वेरी इंटरेस्टिंग," राज ने ताली बजायी और कहा, "और मैं अपने शो के ज़रिए के साबित कर दूँगा कि ये सिर्फ़ एक कहानी है और वहाँ कोई भूत नहीं है।"
"ऑल द बेस्ट!" ब्रिगेडियर ने राज से हाथ मिलाया और कहा, "चलो, अब तुम फ्रेश हो जाओ। और ठीक 8 बजे डायनिंग रूम में पहुँच जाओ। आज तुम्हारे लिए बहुत स्पेशल खाना बना है। और सुनो देर मत करना, मैं वक़्त का बड़ा पाबंद हूँ।"
"जी, बन्दा ठीक 8 बजे हाज़िर हो जाएगा," राज अपने सीने पर हाथ रखते हुए सोफ़े से उठा।
"ऊपर की मंज़िल पर दायीं तरफ़ पहला कमरा, गेस्टरूम है," ब्रिगेडियर की नज़रें शतरंज की ओर लौट गयीं। "वहाँ तुम्हारी ज़रूरत की सारी चीज़ों का इंतज़ाम करवा दिया गया है। और भी किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो किचन में फ़ोन कर के शंकर को कह देना। इंटरकॉम के पास ही सारे नंबर लिखे हुए हैं।"
"शुक्रिया, सर"
राज लाइब्रेरी से बाहर चला आया और तेज़ी से ऊपर की तरफ़ जाती सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
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डिनर के बाद, राज गेस्टरूम के किंग साइज़ बेड पर आराम से लेट गया। राज को अपने अंदर एक नया जोश महसूस हो रहा था। ब्रिगेडियर आदमी बड़ा खुशमिज़ाज़ और मिलनसार था। कुछ ही घंटों में ही राज की उससे अच्छी दोस्ती हो गयी है। और खाना भी बड़ा लज़ीज़ था। राज का पेट और मन दोनों ही खुशी से भर गए थे।
रात के खाने का लुत्फ़ उठाने के बाद, दोनों ने लाइब्रेरी में बैठकर व्हिस्की पी और ब्रिगेडियर ने अपने फ़ौजी जीवन के कुछ किस्से सुनाए। साथ ही, ब्रिगेडियर ने उसे बहुत सारी ऐसी पेरानॉर्मल घटनाओं के बारे में भी बताया जो भानुगढ़ के लोगों के साथ हुई थीं। बँगले के सारे नौकर, राज को ऐसी नज़रों से देख रहे थे जैसे मानो कह रहे हों, 'क्यों भरी जवानी में शहीद होना चाहते हो? ' उनके डरे हुए चेहरों की याद आते ही राज खिलखिलाकर हँस पड़ा।
"ब्रिगेडियर ने जो कुछ किले के बारे में बताया, उससे मेरे शो के पहले एपिसोड के लिए काफ़ी मैटीरियल मिल गया है," राज बेड पर उठकर बैठ गया।
राज ने पलंग के पास रखी मेज़ पर पड़े बैग से लैपटॉप निकाला और उस पर अपने शो की डिटेल्स टाइप करने लगा।
"शो की शुरुआत मैं, दो पड़ोसी राजाओं की आपसी दुश्मनी की कहानी सुनाकर करूँगा। उसके बाद, राजमहल में विद्रोहियों की लगायी आग और उस आग में जलकर मारे गए लोगों की आत्माओं के बारे में बताकर ऑडिएंस को डराउंगा। हाँ, ये ठीक रहेगा।" राज ने चुटकी बजायी और लैपटॉप पर टाइप करने लगा।
"उसके बाद, वहाँ के चप्पे चप्पे की रिकॉर्डिंग दिखाऊँगा। अगर, कहीं कोई पेरानॉर्मल एक्टिविटी नहीं दिखायी देती, मतलब नो भूत!" राज ने अपने लैपटॉप पर किले की तस्वीर को ग़ौर से देखा।
"कल दिन में ही हर तरफ़ सीसीटीवी कैमरे लगावाने होंगे। बॉस को बोल दिया है, कल तड़के ही वो टेक्निशियंस को भेजकर काम शुरू करवा देंगें। अगर, कल दिन में ही काम पूरा हो जाये तो रात होते ही शूटिंग शुरू कर दूँ। पूरे किले में घूमकर मुझे अकेले ही सब शूट करना होगा।"
राज ने एक बार फ़िर लैपटॉप पर किले की फ़ोटो को देखा और फ़िर उसे बन्द कर वापस बैग में रख दिया। वो बिस्तर पर लेट गया और मन ही मन अगले दिन के शूट की प्लानिंग करने लगा। कहाँ कहाँ कैमरा लगाना है। कौन सा शॉट कैसे लेना है। यही सब सोचते सोचते उसे नींद आ गयी।
पलकें झपकते ही उसकी आँखों के सामने भानुगढ़ का किला आ गया। मगर इस बार, उसे खण्डर नहीं नज़र आये बल्कि राजमहल की संगमरमर से बनी दीवारों की सुंदर नक्काशी नज़र आयी। राजमहल के गलियारों में बिछी खूबसूरत कालीन नज़र आयी। ऊँची छत पर लटकते झूमर और खिडकियों के काँच पर बनी रंगीन तस्वीरें दिखीं। वो, राजमहल की शान-ओ-शौकत को बस देखता ही रह गया।
इतने में किसी के चीखने की आवाज़ सुनकर राज चौंक उठा। आवाज़ पीछे से आयी थी इसलिए वो फौरन पीछे मुड़ गया। उसने देखा एक खूबसूरत सी लड़की दौड़ती हुई उसके करीब आ रही थी। ये वही लड़की थी जिसे राज पिछले कई दिनों से अपने सपनों में देख रहा था।
उसके पीछे 2 जल्लाद, हाथों में तलवारें लिए उसे पकड़ने के लिए भाग रहे थे। और उनके पीछे वर्दी पहने सैनिकों का एक जत्था था। वो लड़की दौड़ती हुई आयी और राज के सीने से लग गयी। फ़िर उसने राज के सीने से अपना सर ऊपर उठाया और उसकी आँखों में देखा। लड़की की कजरारी आँखों में आँसू भरे थे।
"आपने तो हमारी रक्षा करने का वचन दिया था, न?" उस लड़की ने सिसकियाँ भरते हुए पूछा, "जब हमें आपकी ज़रूरत पड़ी तो आप हमें छोड़कर कहाँ चले गए, वीरभद्र?"
उसकी बात सुनकर राज हैरान रह गया। राज के मन में हज़ारों सवाल तूफान की तरह उठे। मगर इससे पहले की वो कुछ कह पाता उन दोनों जल्लादों ने आगे बढ़कर उस लड़की को खींचकर राज से अलग कर दिया। उस लड़की की आँखों से आँसू छलककर उसके गालों पर फिसल आये। उसने अपना हाथ राज की तरफ़ बढ़ाया।
राज का अपने ऊपर बिल्कुल काबू न रहा और उसका हाथ खुद ब खुद उस लड़की की तरफ़ बढ़ गया। राज पर एक अजीब सा जुनून सवार हो गया। उसने हर हाल में उस लड़की को बचाने के लिए कमर कस ली। वो अकेला, निहत्था उन दो ताकतवर जल्लादों और उनकी पूरी सेना से लड़ने को तैयार हो गया।
फ़िर चाहे वो अपनी तलवारों से उसके टुकड़े टुकड़े क्यों न कर दे। मगर, अपनी जान की बाज़ी लगाकर भी वो उसकी जान ज़रूर बचाएगा। राज नहीं जानता था उस लड़की से उसका क्या रिश्ता था मगर इतना ज़रूर जानता था कि वो उसके लिए अपनी जान से भी प्यारी थी। मगर इससे पहले कि राज उस लड़की तक पहुँच पाता उस जल्लाद ने लड़की की गर्दन की नस दबाकर उसे बेहोश कर दिया। और फ़िर उसके बेहोश जिस्म को कंधे पर लादकर अँधेरे में कहीं गायब हो गया।