राज पुलिस के रिकार्ड रूम में इंस्पेक्टर सोहनलाल और सब-इन्स्पेक्टर ठाकुर के साथ बैठा था । वहां उसको फरार मुजरिममों की पुलिस के रिकार्ड में मौजूद सैंकड़ों तस्वीरें दिखाई जा रही थीं । अपने चश्मे के बिना उन तस्वीरों का मुआयना करने में उसे इतनी दिक्कत महसूस हो रही थी कि उसकी आंखों से पानी निकलने लगा था ।
जो तस्वीरें उसे दिखाई जा रही थीं उनमें अभी तक उसे उन दोनों बदमाशों के दर्शन नहीं हुए थे, जिन्होंने कचहरी के कंपाउंड में उस पर आक्रमण किया था ।‘
उसे कामिनी के कथित चाहने वाले कुणाल सिंह और उसके साथी सुन्दरलाल की तस्वीरें विशेष रूप से दिखाई गई । सोहनलाल के कथनानुसार वहीं दो आदमी थे जो दिल्ली की ज्वेल रॉबरी के लिए और जौहरी के कत्ल के जिम्मेदार थे । लेकिन राज के लिए वे दोनों सूरतें एकदम अपरिचित थीं । जिन दो बदमाशों ने कल रात उस पर आक्रमण किया था, वे कम से कम कुणाल सिंह और सुन्दरलाल नहीं थे ।
“आप कोई तस्वीर पहचान नहीं सके ।” - सोहनलाल निराश स्वर में बोला - “लेकिन फिर भी मेरी राय में आपकी बीवी के यूं रहस्यपूर्ण ढंग से गायब हो जाने के पीछे उसकी उस पिछली जिन्दगी का जरूर रिश्ता है, जिससे शायद बड़े प्रत्याशित ढंग से उसे एकाएक फिर दो-चार हो जाना पड़ा है ।”
राज महसूस कर रहा था कि उसे इस बात का तीव्र विरोध करना चाहिए था । उसे कहना चाहिए था कि किसी गैंगस्टर की रखैल उसकी बीवी नहीं हो सकती थी, लेकिन पता नहीं क्यों उसका मुंह नहीं खुल रहा था ।
“हमारी समस्या यह है कि अभी तक हमारी समझ में यह नहीं आया है” - सोहनलाल बोला - “कि जिस केस की हम तफ्तीश कर रहे हैं, यह क्या है ? क्या यह किसी गुमशुदा की तलाश का केस है, क्या यह कत्ल का केस है ? या क्या यह ज्वेल रॉबरी के पुराने केस का ही कोई नया एंगल है ? दिल्ली पुलिस का हमें केवल इतना निर्देश है कि अगर अलका कपूर हमें अपने इलाके में दिखाई दे तो हम उसे हिरासत में लें और दिल्ली पुलिस को खबर कर दें ।”
सोहनलाल एक क्षण ठिठका और फिर बोला - “और फिर पता नहीं यह टिपटाप क्या बला है जहां आपकी बीवी को उन बदमाशों ने आने के लिए कहा था ? उन्होंने आपकी बीवी को दस हजार रुपए का कथित हिस्सा क्यों भिजवाया है ? यादव वाला काम क्या बला है ? कुछ भी तो पल्ले नहीं पड़ रहा हमारे ।”
“साहब !” - ठाकुर बोला - “दिल्ली की ज्वेल रॉबरी में दस लाख रुपए के हीरे लूटे गए थे । उस डकैती के फौरन बाद कुणाल सिंह, सुन्दरलाल और अलका कपूर तीनों दिल्ली से गायब हो गए थे । हीरे अभी तक भी प्रकट नहीं हुए हैं । क्या यह नहीं हो सकता कि कश्मीर में आकर एक संभ्रांत गृहिणी का बहुरूप धारण कर लेने के बाद अलका की नीयत खराब हो गई हो और वह अपने ही साथियों का माल डकार जाना चाहती हो लेकिन वे लोग अपना माल हासिल करने के लिए उसके पति के माध्यम से उस पर दबाव डालने की कोशिश कर रहे हों ?”
“लेकिन जिन लोगों ने प्रोफेसर साहब पर हमला किया था ।” - सोहनलाल बोला - “वे तो किसी यादव वाले काम का जिक्र कर रहे थे । दिल्ली को ज्वेल रॉबरी का तो उन्होंने नाम भी नहीं लिया था । और फिर दस लाख के माल में दस हजार का हिस्सा तो कुछ भी न हुआ ।”
“शायद वह मुकम्मल हिस्सा न हो । शायद वह हिस्से की एक किश्त हो ।”
“लेकिन माल हाथ में आने से पहले वे लोग अपने पल्ले से अलका को दस हजार रुपया क्यों भिजवायेंगे ? और फिर प्रोफेसर साहब ने अपने आक्रमणकारियों के रूप में कुणाल सिंह और सुन्दरलाल की शिनाख्त नहीं की है ।”
“फिर भी इनके आक्रमणकारी कुणाल सिंह और सुन्दरलाल हो सकते हैं । इन्होंने खुद कहा था कि अपने आक्रमणकारियों की सूरत ये खूब अच्छी तरह नहीं देख पाए थे और तस्वीरों से शिनाख्त करने में यह अपने चश्मे की गैरमौजूदगी की वजह से भी नाकामयाब रहे हो सकता हैं ।”
सोहनलाल सोचने लगा ।‘’
“साहब !” - ठाकुर फिर बोला - “प्रोफेसर साहब के कथनानुसार कल इन्होंने अपने बीवी को नशे में पाया था और उसका व्यवहार भी नार्मल नहीं था । साहब, हो सकता है कि वे बदमाश पहले ही इनकी बीवी से सम्पर्क स्थापित कर चुके हों, लेकिन उसे धमकाकर माल अपने हवाले कर लेने में कामयाब न हो सके हों । आखिर थी तो वो भी दादा लोगों की संगिनी । शायद इसी वजह से उन बदमाशों ने उसके पति के माध्यम से उस पर दबाव डालने की कोशिश की हो ।”
“ऐसी जरायमपेशा औरत को इस बात की परवाह हो सकती है कि उसके पति क्या बीतती है ?”
“उसका कल रात का व्यवहार जाहिर करता है कि उसे परवाह थी । इसीलिए वह कल रात अपने पति के सो जाने के बाद चुपचाप उसे छोड़कर चली गई, ताकि कम से कम उसकी वजह से उसके पति का कोई अहित न हो ।”
“लेकिन” - राज आवेशपूर्ण स्वर में बोला - “जो कुछ आप कह रहे हैं, अगर वह सच है तो वह अपना कोई सामान साथ लेकर क्यों नहीं गई ? वह तरीके के कपड़े पहनकर क्यों नहीं गई ? सिर्फ एक नाइट गाउन पहनकर नंगे पांव कोई बर्फबारी के मौसम में बाहर कदम रखने की हिम्मत भी कैसे कर सकता है ? यह कोई मानने की बात है कि दस हजार रुपयों वाला लिफाफा तो वह अपने साथ ले गई लेकिन कोई तरीके का कपड़ा पहनकर घर से न निकली ।”
“यह जरूरी नहीं कि आपको उसकी एक-एक पोशाक की वाकफियत हो । हो सकता है उसके पास कुछ ऐसी पोशाकें हों जो आपकी जानकारी में न हों ।” - सोहनलाल बोला ।
“हो सकता है लेकिन यह नहीं हो सकता कि उसके पास कोई तीसरा कोट रहा हो और उसकी मुझे खबर न हो ।”
“लेकिेन...”
“साहबान !” - राज तीव्र विरोधपूर्ण स्वर में बोला - “आप खामखाह मेरी बीवी के चरित्र पर कीचड़ उछालने की कोशिश कर रहे हैं । मेरी बीवी वह नहीं जो आप उसे समझ रहे हैं । कोई अलका कपूर नाम की गैंगस्टर की रखैल मेरी बीवी नहीं हो सकती ।”
“क्यों नहीं हो सकती ? आपने खुद कबूल किया है कि आप अपनी बीवी के बारे में कुछ नहीं जानते । फिर वह यह क्यों नहीं हो सकती जो हम उसे समझ रहे हैं ?”
राज को जवाब नहीं सूझा ।
“आप यह मानते हैं” - सोहनलाल बोला - “कि हमारे फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट ने आपके फ्लैट से जो उंगलियों के निशाने उठाए हैं, उनमें आपकी बीवी की उंगलियों के निशान भी होंगे ।”
“हां ।” - राज बोला ।
“हमारे पास अलका कपूर की उंगलियों के निशानों का रिकार्ड है । अगर आपके फ्लैट से उठाए गए उंगलियों के निशानों का कोई सैट सेानिया कपूर की उंगलियों के निशानों से मिलता हुआ पाया गया तो आप मानेंगे कि अलका कपूर ही कामिनी सिप्पी बनकर आपकी बीवी बनी हुई है ?”
राज के मुंह से बोल न फूटा । उसने धीरे से सहमति में गर्दन हिलायी ।‘’
“अभी सारा मेला सामने आया आता है ।” - सोहनलाल बोला - “अभी ।”
तभी एक हवलदार एक फाइल लेकर वहां पहुंचा । फाइल उसने सोहनलाल के सामने रख दी और वहां से चला गया ।
सोहनलाल कुछ क्षण फाइल देखता रहा और फिर बोला - “यह फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट की रिपोर्ट है । प्रोफेसर साहब आपके फ्लैट से अलका कपूर की उंगलियों के निशान मिलें हैं । अब क्या कहते हैं आप ?”
राज खामोश रहा । वह उसके लिए बड़ी कठिन घड़ी थी । अब उसके विरोध में कोई बल नहीं रहा था ।
“ठाकुर !” - सोहनलाल ने आदेश दिया - “जरा प्रोफेसर साहब को अलका कपूर का फाइल कार्ड दिखाओ ।”
ठाकुर ने उसके सामने जो कार्ड रखा, उसके ऊपर के भाग में जिस सुन्दर युवती के चेहरे और प्रोफाइल की दो तस्वीरें लगी हुई थीं, वह निश्चय ही कामिनी थी । तस्वीरों के नीचे लिखा था - अलका कपूर उर्फ कामिनी सिपाईमलानी । आयु बीस वर्ष । कद पांच फुट तीन इंच । बाल भूरे । आंखें सुर्मई । रंग गोरा । दो बार गिरफ्तार हो चुकी है । एक बार चोरी के इल्जाम में और दूसरी बार जाली चैक पास कराने की कोशिश के इल्तजाम में । लेकिन दोनों बार पर्याप्त प्रमाण न मिलने के कारण बरी हो गई ।
राज ने कार्ड परे सरका दिया ।‘’
“अब भी कोई शक है आपको अपनी बीवी के बारे में ?” - सोहनलाल व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोला ।
राज ने उत्तर नहीं दिया । उसने अपने दोनों हाथों से अपना माथा थाम लिया ।
“प्रोफेसर साहब !” - एकाएक सोहनलाल बड़े हमदर्दी भरे स्वर में बोला - “मैं आपके दिल की हालत को समझता हूं । मुझे आपसे पूरी हमदर्दी है लेकिन हकीकत को न आप झुठला सकते हैं, न मैं और न कोई और । देखिए, दिन ढल गया है । सारा दिन आपकी बड़ी परेड हुई है । इसलिए फिलहाल तो आप घर जाकर आराम कीजिए ।”
राज ने बिना हथेलियों पर से सिर उठाए सहमति में सिर हिलाया ।‘’
“और कल भी आप हमें उपलब्ध रहिएगा ।”’
“यानि कि कल भी मैं कालेज न जाऊं ?”’
“अगर हो सके तो ।”
“ठीक है ।”’
वह उठ खड़ा हुआ । उसने दोनों पुलिस अधिकारियों का अभिवादन किया, एक सूनी निगाह अभी भी अपेक्षित से मेज पर पड़े अपनी बीवी के फाइल कार्ड पर डाली और भारी कदमों से चलता हुआ वहां से बाहर निकल आया ।
बाहर अन्धेरा हो चुका होने की वजह से बर्फ की सफेद चादर अब सुर्मई हो गई थी सांय-सांय करती हुई ठण्डी हवा चल रही थी । उसने अपने ओवरकोट का कालर ऊंचा कर लिया और जेबों में हाथ धंसाए आगे बढा ।
जितना थका हुआ और हताश वह अपने आपको आज महसूस कर रहा था, उतना उसने आज तक कभी महसूस न किया था ।
क्या वाकई इतना धोखा हो गया था उसके साथ ?
उसकी इतनी निष्ठावान बीवी एक गैंगस्टर की रखैल रह चुकी थी ?
और पिछली रात के धुआंधार अभिसार के पीछे क्या उसका यही उद्देश्य था कि वह थककर, निढाल होकर, घनघोर नींद में सो जाए और वह चुपचाप वहां से खिसक सके ।
क्या वह उसका पति, नहीं था ? क्या वह सिर्फ एक पर्दा था जो उसने अपनी गुनाहभरी जिन्दगी पर इतनी चतुराई से डाला था ?
एकाएक वह वापिस घूमा और लम्बे डग भरता हुआ फिर इमारत में दाखिल हो गया ।
इन्स्पेक्टर सोहनलाल और सब-इन्स्पेक्टर ठाकुर को उसने वहीं बैठा पाया, जहां वह उन्हें छोड़कर गया था ।
इन्स्पेक्टर सोहनलाल ने तनिक हैरानी से उसकी तरफ देखा और फिर शुष्क स्वर में पूछा - “अब क्या है ?”
“मैं एक बात पूछना चाहता था ।” - राज बड़े दयनीय स्वर में बोला ।‘
“कौन-सी बात ?”’’
“अलका कपूर के फाइल कार्ड में उसके केवल दो ही अपराध लिखे हुए हैं लेकिन आपके लिहाज से तो वह बड़ी खराब लड़की थी । मैं यह पूछना चाहता था कि क्या वह... वह कभी...”
“मैं समझ गया आप क्या पूछना चाहते हैं ।” - सोहनलाल के स्वर में तुरन्त हमदर्दी का भाव पैदा हुआ - “अगर इससे आपको कोई सन्तुष्टि हासिल होती है तो हकीकत यह है हमारे पास ऐसा कोई रिकार्ड नहीं है कि उसका रिश्ता कभी वेश्यावृत्तिक या कालगर्ल के धन्धे से रहा हो । जहां तक उसके किसी मर्द से रिश्ते का सवाल है, वह हम उसका सिर्फ कुणाल सिंह से ही जोड़ सके हैं ।”
“आप अलका कपूर का कोई पता-ठिकाना नहीं जानते ?”
“प्रोफेसर साहब, अगर जानते होते तो अब तक हम वहां पहुंच न गए होते ।”’’
“या उसके परिवार के बारे के कुछ जानते हों आप ?”
“न । उसके बारे में हम केवल इतना जानते हैं कि मूल रूप से यह कश्मीर हिल्स में ही कहीं की रहने वाली है । हमारी जानकरी में वह कभी वापिस लौटकर नहीं आई ।”
“लेकिन अगर अलका कपूर ही कामिनी है तो....”’
“मेरी मतलब है आज से पहले हमें अलका कपूर उर्फ कामिनी सिप्पी की यहां वापिसी की खबर नहीं थी । अब तो हम उसकी होशियारी की दाद देते हैं कि कैसे उसने वापिस यहां आकर चुपचाप आपसे शादी कर ली और एक इज्जतदार हाउसवाइफ बन गई । यह तो चिराग तले अन्धेरा वाली मिसाल हो गई ।”
“शुक्रिया ।” - राज जल्दी से उठ खड़ा हुआ - “शुक्रिया ।”
वह फिर बाहर निकला ।
वहां तक वह पुलिस की जीप में आया था इसलिए वापिसी के लिए वह पैदल चलने लगा ।
रास्ते में वह सिर्फ कामिनी के बारे में सोचता रहा ।
कैसा नामुराद दिन था वह । यह सोचकर ही उसका दिल डूबा जा रहा था कि आज जब वह घर पहुंचेगा तो उसकी सूनी दीवारें उसका स्वागत करेंगी । कोई उसे दरवाजा नहीं खोलेगा । कोई उसके देर से घर लौटने की शिकायत करने के लिए वहां मौजूद नहीं होगा ।
वह माल पर पहुंचा ।
इमारत के मुख्य द्वार की पहली सीढी तक बर्फ पहुंची हुई थी । मंगतराम से यह अपेक्षित होता था कि बेलचा लेकर कम से कम सीढियों के आगे से वह बर्फ हटाता रहे, क्योंकि वहां से बर्फ न हटाने से तो धीरे-धीरे दरवाजा ही बन्द हो जाने की नौबत आ सकती थी ।
आज पता नहीं कहां चला गया था कम्बख्त ! उस जैसा ईमानदार नौकर साधारणतया यूं बिना बताए गायब नहीं होता था लेकिन फिर उसे ख्याल आया कि वह बताता किसे ? वह सुबह से भाग-दौड़ में लगा हुआ था और कामिनी खुद ही गायब थी ।
वह इमारत में दाखिल हुआ ।
तभी उसका पहली मंजिल का किराएदार गोंसाल्वेज तहखाने की सीढियों चढकर ऊपर पहुंचा और उसके सामने आ खड़ा हुआ ।
“भई, राज साहब ! यह क्या बात हुई ?” - वह भुनभुनाता हुआ बोला - “इतना आप किराया लेते हैं लेकिन किराएदारों की सुख-सुविधा की आप जरा भी परवाह नहीं करना चाहते ।”
“क्या हो गया है ?” - राज हड़बड़ा कर बोला ।
“फ्लैट रेफ्रीजरेटर बना पड़ा है, साहब !” - वह बड़ा नाटकीय ढंग से बोला ।
“भट्टी में आग धीमी पड़ गई होगी ।” - राज खेदपूर्ण स्वर में बोला ।
“भट्ठी बुझी पड़ी है, जनाब ! मैं अभी देखकर आया हूं । मैं अभी आफिस से लौटा हूं । मेरी मिसेज ने बताया है कि आज तो सारा दिन ही फ्लैट का ठण्ड से बुरा हाल रहा था ।”
“आपने मंगतराम को कह दिया होता ।”
“लेकिन वह कहीं मिले तो सही । उसके न मिलने की वजह से ही मैं खुद तहखाने में गया था । वह नीचे नहीं है और भट्टी बिल्कुल बुझी पड़ी है ।”
“आई एम सॉरी, मिस्टर गोंसाल्वेज ! मै अभी मंगतराम को तलाश करके भट्ठी चालू कराता हूं ।”
“और तब तक हम ठण्ड में ठिठुरते रहें ?” - वह नाक चढाकर बोला ।
“मैं खुद भट्ठी चालू करता हूं, मिस्टर गोंसाल्वेज !”
“आप कुछ भी कीजिए, मुझे इससे कोई मतलब नहीं, लेकिन जो करना है, जल्दी कीजिए । और दोबारा ऐसी गड़बड़ नहीं होनी चाहिए ।”
“जान !” - एकाएक पहली मंजिल की सीढियों से मिसेज गोंसाल्वेज की झिड़कीभरी आवाज आई - “यू कम बैक हेयर दिस वैरी मिनट ।”
“कमिंग डियर ।” - गोंसाल्वेज बोला - “लेकिन पहले मैं...”
“पहले कुछ नहीं । मिस्टर राज के साथ इतना बड़ा मुश्किल हो गया है और तुम उनसे बुझी हुई भट्ठी के लिए लड़ रहे हो । इसमे इनकी क्या गलती है । ये ब्लडी नौकर लोग ही कामचोर है ।”
“लेकिन...”
“जान ! वेयर आर यूअहर मैनर्स ?”
“सॉरी, डियर !”
“मिसेज राज गायब हो गया है, मालूम ? आज सारा दिन इधर पुलिस का चक्कर लगाता रहा । वो लोग हमसे भी पूछा कि क्या हमने मार्निंग में मिसेज राज को देखा ।”
“आपने कामिनी को देखा था, मिसेज गोंसाल्वेज ?” - राज ने व्यग्र स्वर में पूछा ।
“देखा तो नहीं था ।” - वह बोली - “लेकिन हमको मालूम था कि जरूर कुछ गड़बड़ होने का है । जब हव मवाली-सा लगने वाला छोकरा पहली बार इधर आया था, हम तभी सोचा कि कुछ गड़बड़ । मिसेज राज, सच ए नाइस यंग लेडी और वो मवाली...”
“कौन मवाली ?”
“वो छोकरा ! जो आपके पीछे से मिसेज राज से मिलने इधर आता था और हमेशा चोर की माफिक पिछवाड़े की सीढियों से इमारत में दाखिल होता था । उसका हिप्पी की माफिक लम्बे-लम्बे बाल होता था । चमड़े का कोट पहनता था और इतनी टाइट जीन पहनता था कि....”
मिसेज गोंसाल्वेज ने बुरी-सी शक्ल बनाई ।
“आप यह कहना चाहती हैं कि कोई आदमी कामिनी से मिलने आया करता था ।”
“यस । सैवरल टाइम्स । ऐवरी वीक । कई बार वीक में दो बार भी ।”
“आपने यह बात पुलिस को भी बताई है मिसेज गोंसाल्वेज ?” - राज ने डरते-डरते पूछा ।‘
“काहे को ! हमसे कोई पूछा ही नहीं । हमसे तो पुलिस यही पूछा कि क्या हमने पिछली रात को तुम्हें अपना वाइफ से झगड़ा करते सुना । या आप दोनों का कन्टीन्यूटी कैसा था ?”
“ओह !”
“कम बैक, जान ! मिस्टर राज ! आई एम सारी आन बिहाफ ऑफ माई हसबैंड ।”
“ओह, नाट एट आल । रादर आई एम सरी फार युअर इनकनवीनियन्स, मिसेज गोंसाल्वज ।”
गोंसाल्वेज जल्दी-जल्दी सीढियां चढ गया ।