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Adultery एक रात ऐसी भी

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कामिनी- आहह...आप कितना अच्छा करते हो...

मैं- क्या करता हूँ जान...

कामिनी- जो आप कर रहे हो...

मैं- मैं क्या कर रहा हूँ जान...

कामिनी- आप चुदाई कर रहे हो...

मैं- किसकी चुदाई..

कामिनी(शरमा कर)- आअहह...अपनी बीवी की...

और कामिनी ने मूह घुमा कर मुझे किस कर दिया...

कामिनी अब बहुत खुल चुकी थी...वो चुदाई को एंजोई कर रही थी..और ये देख कर मैं बहुत खुश था...

मैं- कामिनी...फाड़ दूं तुम्हारी...

कामिनी- अब मुझसे क्यो पूछते है..मैं आपकी बीवी हूँ...जो मान हो करो ना..

मैं- नही...तुम बोलो...बिना मर्ज़ी के नही..

कामिनी- करो ना...ज़ोर से धक्के मारो जी..

मैने कामिनी को चूमा और तेज़ी से धक्के मारना शुरू कर दिया...

कामिनी- आहह..आअहह...आहह...ज़ोर से...

मैं- हाँ जान..ये लो...एसस्शह...ईएहह...

कामिनी- आहह..बहुत मज़ा आ रहा ....आअहह...आअहह...

मैं- एस्स ...एसस्स...ईीस्स...ईीस्स...

कामिनी- मेरा पानी...फिर से...ओह्ह्ह....ज़ोर से..ज़ोर से....

मैं- यस जान..ये लो...यीह..यीह...यीह...

और कुछ धक्को बाद कामिनी तीसरी बार झड गई...और मैं भी झड़ने के करीब आ गया तो मैने अपनी स्पीड बढ़ा दी...

मैं- यीह..यीहह...ईएह...ईएह..

कामिनी- उउउंम...उउंम..आअहह..आअहह...

मैं- मैं आया जान...कहाँ निकालु..

कामिनी- आअहह..अपनी बीवी के अंदर डाल दो जी...उउंम्म

यीहह...आआहह…त्ततहुूप्प्प…कचहुप्प्प…..ईएहहाअ…आहह…त्ततहुूप्प्प…त्ततहुूप्प्प….फ़फफूूककचह…फ़फफूूककच….ऊओ…ईीस्स…यईीसस…आअहह….ऊओ……फफफफकक्चाआप्प्प….

और ऐसी ही आवाज़ो के साथ मैने अपना पानी कामिनी की चूत मे भर दिया और फिर मैं कामिनी से लिपट कर लेट गया...
 
‘अब्बा’ का रिकार्ड बजता रहा ।

रिकार्ड पूरा बज चुकने के बाद अपने आप खामोश हो गया ।

वे दोनों सोफे पर लेटे रहे । सोफे पर इतनी जगह नहीं थी कि वे दोनों सहूलियत से उस पर लेट पाते, लेकिन अपनी असुविधाजनक स्थिति से उन दोनों में से किसी को भी कोई शिकायत नहीं थी । कामिनी का सिर राज के कन्धे पर टिका हुआ था और उसकी आंखें बन्द थी ।

राज बहुत सन्तुष्ट था । सहवास का आज जैसा मुकम्मल आनन्द उसे पहले कभी हासिल नहीं हुआ था । कामिनी के आज के व्यवहार में एक पत्नी जैसी निष्ठा के साथ-साथ एक नगर वधू जैसी चंचल मादकता भी थी । आज उसने सिर्फ एक पत्नी वाला फर्ज ही नहीं निभाया था, आज उसने एक फर्माबरदार बीवी की तरह अपने आपको सिर्फ अपने पति के हवाले ही नहीं कर दिया था, आज उसने जो कुछ किया था, उसे राज कोई नाम नहीं दे पा रहा था, लेकिन वह उसके लिए एक ऐसा अहसास था, जिससे वह पहले कभी दो-चार नहीं हुआ था, जिसके अस्तित्व तक को वह नहीं पहचानता था ।
 
“आज क्या बात है ?” - वह पूछे बिना न रह सका ।

“कौन-सी बात?” - कामिनी धीरे से बोली ।

“तुम्हें मालूम है... आज ऐसा करिश्मा क्योंकर हुआ ?”

“क्योंकि मैं तुम्हें बेपनाह मुहब्बत करती हूं ।”

“वह तो तुम पहले भी करती थी ।”

“मेरी मुहब्बत चढते चांद जैसी है । हर अगले दिन पिछले से ज्यादा होती है ।”

“आज जरूर मुहब्बत की पूर्णमासी है ।”’’

“हां ।”

“लेकिन चांद तो पूर्णमासी के दिन घटने लगता है ।”

“मेरी मुहब्बत का चांद कभी नहीं घटता । मेरी मुहब्बत दिन दूनी रात चौगुनी बढती है, बढती रहेगी ।”

“जहेनसीब !”

“चलो अब सो जाएं । कल तुमने कॉलेज जाने से पहले पुलिस-स्टेशन भी तो जाना है ।”

राज के जहन में फिर उन दोनों बदमाशों का अक्स उभरा ।

“क्यों उन बदमाशों की याद दिला दी तुमने ?” - राज शिकायतभरे स्वर में बोला - “रंग में भंग डाल दिया ।”

“खुद की मार उन दोनों पर ।” - कामिनी नफरत भरे स्वर में बोली ।

“आमीन ।” - राज बोला । फिर एकाएक उसकी एक अंगुली कामिनी के कपोल को छुई । उसकी अंगुली को कुछ गीला-गीला-सा लगा ।

नीम अंधेरे में उसने गौर से अपनी बीवी की सूरत देखी और फिर हैरानी से बोला - “कामिनी, तुम रो रही हो ।”

कामिनी ने उसके वक्ष के साथ अपना चेहरा रगड़ा और धीरे-से बोली - “आज मैं बहुत खुश हूं मैं खुश होती हूं तो मेरे आंसू निकल आते हैं ।”

“कमाल है ।”

“ऐसा औरतों के साथ अक्सर होता है । औरतों की कई आदतें बड़ी अजीब, बड़ी अनोखी होती हैं । लगता है औरतों को तुम खास नहीं समझते हो ।”

“हां - लेकिन अपनी औरत को” - राज ने उसके माथे पर एक चुम्बन अंकित किया - “समझने की कोशिश जरूर करना चाहता हूं ।”

“फेल हो जाओगे प्रोफेसर साहब ।”

राज हंसा ।

“चलो अब सोने चलें ।” - कामिनी उसके पहलू से अलग होती हुई बोली ।

राज भी उठा ।

कामिनी फर्श पर पड़ा अपना गाउन उठाने के लिए नीचे झुकी ।

राज ने पहले ही उसे अपने अंक में भर लिया । फिर किसी अज्ञात भावना से प्रेरित होकर उसने कामिनी को अपनी गोद में उठा लिया और उसे यूं ही उठाये-उठाये बैडरूम की तरफ बढा ।

“अरे...अरे...” - कामिनी छटपटाई - “यह क्या कर रहे हो ? मुझे उतारो ।”

राज ने वैसा कोई उपक्रम नहीं किया । वह बैडरूम में पहुंचा । फिर उसने कामिनी को यूं हौले से पलंग पर रखा जैसे वह जरा-सी ठेस लगने से टूट आने वाली कोई नाजुक-सी चीज हो ।

वह वापिस ड्राइंगरूम से लौटा । उसने रेडियोग्राम बंद किया, दस हजार के नोटों का लिफाफा उठाकर अलमारी में रखा, फ्लैट का दरवाजा चैक किया कि वह मजबूती से बन्द था और फिर वहां की बत्ती बुझाकर वापिस बैडरूम में पहुंचा ।

उसके पलंग के समीप पहुंचते ही कामिनी ने बैड-स्विच ऑफ कर दिया ।

राज उसके पहलू में लेट गया ।

कामिनी उसके साथ लेट गई और धीरे-से बोली - “सुनो ।”

“हूं ।” - राज बोला ।

“तुम मुझसे खफा तो नहीं हो ?”

“किस बात पर ?”

“किसी भी बात पर ।”

“नहीं तो । मैं भला क्यों खफा होने लगा तुमसे ?”

“आज अभी ड्राइंग रूम में बहुत ज्यादा बेशर्मी पर जो उतर आई थी ।”

“पगली उसमें खफा होने की क्या बात हुई भला ? मुझे तो वह सब-कुछ बहुत अच्छा लगा था ।”

“सच कह रहे हो ?”

“हां ।”

कामिनी कसकर उसके साथ लिपट गई ।

राज ने अच्छी तरह से रजाई को अपने और कामिनी के शरीर पर व्यवस्थित किया ।

“आज ठन्ड बहुत है ।” - राज बोला ।

“आज मुझे एक क्षण के लिए भी अपने से अलग मत करना ।” - कामिनी यूं बोली जैसे सपने में बुदबुदा रही हो ।

राज खामोश रहा । आज उसे कामिनी की हर बात अजीब सी लग रही थी, लेकिन साथ ही अच्छी भी लग रही थी । कामिनी को बहुत ज्यादा तो वह जानता नहीं था, लेकिन आज की कामिनी को तो लगता था कि वह कतई नहीं जानता था ।

“गुड नाइट ।” - राज बोला ।

कामिनी ने जवाब नहीं दिया । वह सो चुकी थी ।‘

राज कुछ क्षण आंखें खोले लेटा रहा । बाहर से सांय-सांय करके चलती तेज हवा की आवाज आ रही थी । हवा इतनी तेज थी कि खिड़कियों के पल्ले मजबूती से बन्द होने के बावजूद फड़फड़ा रहे थे । ऊपर के फ्लैट में डाक्टर मिश्रा का रेडियो बज रहा था । राज ने मन ही मन फैसला किया कि कल वह फिर डाक्टर मिश्रा को टोकेगा कि वह कम से कम रात को रेडियो धीमा बजाया करे ।

लेकिन तभी रेडियो बन्द हो गया ।

राज ने आंखें मूंद लीं ।‘



फिर पता नहीं कब उसे नींद आ गई ।

लेकिन नींद में भी उसे यही सपना आता रहा कि रेडियो बज रहा था और वह डाक्टर मिश्रा से झगड़ रहा था । रेडियो बजना बन्द हुआ तो उसे लगा कि कहीं कोई कार स्टार्ट हो रही थी और उसका हार्न बज रहा था । फिर किसी औरत की चीख की आवाज । क्या वह कामिनी की आवाज थी ? नहीं, कामिनी की आवाज कैसे हो सकती थी वह ? लेकिन उसे वह आवाज कामिनी की आवाज जैसी क्यों लगी थी ? नींद में उसने उठने की कोशिश की, लेकिन शरीर ने साथ नहीं दिया । नींद उस पर बुरी तरह हावी थी ।

और शायद सपने नींद पर बुरी तरह हावी थे ।

वह रात हर लिहाज से उसकी जिन्दगी की एक अनोखी रात साबित हुई ।
 
घड़ी के अलार्म की बजती घण्टी की आवाज से राज की नींद खुली । उसने अन्धेरे में हाथ फैलाया और टटोलकर फौरन अलार्म बन्द करने की कोशिश की ताकि कामिनी की नींद न खराब हो जाये । कामिनी रात को देर से सोई थी इसलिए वह नहीं चाहता था कि वह जल्दी उठे । वैसे भी आज उसका घर पर नाश्ता करने का कोई इरादा नहीं था । वह सिर्फ एक कप चाय पीकर और तैयार होकर वहां से रवाना हो जाना चाहता था । पुलिस स्टेशन पर पता नहीं उसे कितनी देर लगने वाली थी, और कॉलेज वह लेट नहीं होना चाहता था, इसलिए आज वह जल्दी से जल्दी घर से रवाना हो जाना चाहता था ।

वह पलंग की अपनी तरफ से नीचे उतरा । अन्धेरे में ही अपना गाउन तलाश किया और उसे पहनकर किचन में आ गया उसने हीटर जलाकर उस पर पानी की केतली रखी और बाथरूम में चला गया ।

जब वह वापिस किचन में लौटा तो चाय का पानी उबल रहा था । पहले उसने सोचा कि वह कामिनी के लिए भी चाय बना ले, लेकिन फिर उसने उसे सोने देना ही उचित समझा ।

चाय पीते समय उसके जहन में अपने आप ही पिछली रात ड्राइंगरूम में सोफे पर कामिनी के साथ बीती घड़ियों का अक्स उभरने लगा । पिछली रात की याद भर से उसके होंठों पर मुस्कराहट आ गई । एक निहायत खूबसूरत और बेतहाशा प्यार करने वाली औरत का पति होना कितने परम आनन्द की बात थी । उसने दिल से महसूस किया कि वह खुशकिस्मत था कि उसकी कामिनी जैसी शानदार औरत से शादी हुई थी ।

किचन की खिड़की बर्फ के गालों से सफेद हुई थी । उसने खिड़की को थोड़ा-सा खोलकर बाहर झांका तो उसे सब-कुछ सफेद ही सफेद दिखाई दिया । पिछले रोज अखबार में छपी मौसम की भविष्यवाणी सच साबित हुई थी । पिछली रात शिमले में बेतहाशा बर्फ पड़ी थी ।

उसने चाय का खाली कप सिंक में पहले से पड़े में पहले से पड़े जूठे बतनों में डाल दिया और फिर बाथरूम में घुस गया ।

घर से रवानगी के लिए तैयार हो जाने तक राज ने हर काम बड़ी खामोशी से इस बात का ख्याल रखते हुए किया कि कामिनी की नींद न खुल जाए ।

कामिनी को यह बताने की नीयत से कि वह जा रहा था, वह बैडरूम में में पहुंचा । उसे कामिनी की रजाई में कतई कोई हरकत नहीं दिखाई दी । शायद वह अभी भी बहुत गहरी नींद में थी । वह उसके समीप पहुंचा । उसके होंठों पर अपने आप ही एक मीठी मुस्कराहट प्रकट हो गई ।

“कामिनी !” - उसने आवाज लगाई और साथ ही रजाई का एक छोर पकड़कर उसे ऊपर उठाया ।

मुस्कराहट उसके चेहरे से यूं गायब हुई जैसे स्विच ऑफ कर देने से बिजली बन्द हो जाती है ।

कामिनी पलंग पर नहीं थी ।

रजाई के नीचे जो उसे कामिनी के शरीर का आकार लग रहा था वह एक तकिया निकला ।

“कामिनी !” - उसने जोर से आवाज लगाई ।

उसकी आवाज खाली बैडरूम में गूंजकर रह गई ।

कामिनी बैडरूम में नहीं थी ।

एकाएक उसे सारा फ्लैट बेहद तनहा और वीरान लगने लगा ।

वह सारे फ्लैट में फिर गया ।

कामिनी कहीं नहीं थी ।

राज ने मूर्खो की तरह पलंग के नीचे, सोफे और रेडियोग्राम के पीछे और वार्डरोब के भीतर तक कामिनी को तलाश किया ।

कामिनी कहीं नहीं थी ।

***
 
राज पुलिस स्टेशन पहुंचा ।

उसे यह सोचकर ही शर्म आ रही थी कि अभी पुलिस को उसे यह बताना पड़ेगा कि उसकी - एक इज्जतदार प्रोफेसर की - बीवी आधी रात को घर से गायब हो गई थी ।

राज परेशान भी था और अपनी बीवी से खफा भी था । न जाने क्यों उसका दिल गवाही दे रहा या कि पिछली रात को कामिनी ने उसे भरपूर बेवकूफ बनाया था । उसने जरूर उससे झूठ बोला था । वह उन दोनों बदमाशों के बारे में जरूर कुछ जानती थी । पिछली रात वह उसके साथ जरूरत से ज्यादा मुहब्बत से इसलिए पेश आई थी, क्योंकि असली बात की तरफ से वह उसका ध्यान बटाना चाहती थी । उसकी इस धारणा को बल देने वाली सबसे बड़ी बात यह भी कि इस हजार के नोटों से भरा लिफाफा जो बदमाशों ने उसे कामिनी के लिए दिया था, कामिनी अपने साथ ले गई थी ।

थाने में जो पुलिस अधिकारी उसे मिला, उसका नाम इंस्पेक्टर सोहनलाल था । वह लगभग पचास साल का बहुत रौबीला आदमी था और बहुत घिसा हुआ पुलिसिया मालूम होता था ।

राज ने उसे अपना परिचय दिया ।

“मैं आपको जानता हूं ।” - परियच सुनकर इन्स्पेक्टर सोहनलाल बोला ।

राज ने हैरानी से उसकी तरफ देखा ।

“मेरा लड़का आप ही के कालेज में पढता है” - सोहनलाल ने बताया - “एक बार मैं आपसे कालेज में मिला था ।”

“ओह !”

राज को सोहनलाल की कतई याद नहीं थी । कालेज में विद्यार्थियों के अभिभावक प्रोफेसरों से मिलने आते ही रहते थे । वह आखिर किस-किसकी याद रख सकता था ।

“फरमाइये, मैं आपकी क्या खिदमत कर सकता हूं ?” - सोहनलाल बोला ।

राज ने बेचैनी से पहलू बदला । उसने अपने होंठों पर जुबान फेरी ।

“आप कोई रिपोर्ट लिखवाना चाहते हैं ?” - सोहनलाल उसे प्रोत्साहन देता हुआ बोला ।

“हां” - राज कठिन स्वर में बोला - “हां ।”

“क्या हो गया है ?”

“मेरी बीवी... मेरी बीवी...”

“हां, हां ।”

“वो घर से गायब हो गई है ।”

“क्या मतलब ?”

“आज सुबह जब मैं सोकर उठा तो मैंने देखा कि वो घर पर नहीं थी ।”

“रात को थी ?”

“हां ।”’’

“यानी कि उसे गायब हुए अभी थोड़ा ही अरसा हुआ है ।”

“हां । रात ग्यारह बजे के करीब हम लोग सोये थे । सुबह जब मैं सोकर उठा था तो वह फ्लैट में नहीं थी ।”

“आपकी शादी को कितना अरसा हुआ है ?”

“तीन महीने ।”

“पिछली रात आप दोनों में कोई झगड़ा-वगड़ा तो नहीं हुआ ?”

“नहीं । कतई नहीं ।”

“शायद वह अपने मायके चली गई हो । आपने वहां से मालूम किेया ? मायका कहां है आपकी बीवी का ? क्या शिमले में ही ?”

“मुझे नहीं मालूम ।” - राज कठिन स्वर में बोला ।

“क्या मतलब ?” - सोहनलाल हैरानी से बोला ।

“मेरा मतलब है मुझे नहीं मालूम मेरी बीवी के रिश्तेदार कहां रहते हैं । सच बात यह है कि मुझे यह भी नहीं मालूम कि मेरी बीवी के कोई रिश्तेदार हैं भी या नहीं ।”

“कमाल है । आपकी शादी कहां हुई थी ?”

“कोर्ट में ।”

“लव मैरिज ?”

“हां ।”

“बहुत बुरी तरह फिदा रहे होंगे आप उस पर जो आपने उसके खानदान के बारे में मामूली-सी भी जानकारी हासिल करने की कोशिश किये बिना यूं आनन-फानन उसने शादी कर ली ।”

राज खामोश रहा ।

“प्रोफेसर साहब ! मुमकिन है आपकी बीवी कहीं घूमने गई हो ।”

“ऐसे गन्दे, बर्फीले मौसम में ? बिना मुझे बताये ? बिना मुनासिब गर्म कपड़े पहने ?”

“यह कपड़ों वाली क्या बात हुई ?”

“फ्लैट से उसका केवल एक झीना-सा नाइट गाउन गायब है जो कि वह कल रात को पहने हुए थी । मेरी बीवी के पास दो कोट हैं । एक चमड़े का और एक फर का । दोनों फ्लैट में उसकी अलमारी में टंगे हुए हैं । ऐसे बर्फीले मौसम में सिर्फ एक नाइट गाउन पहनकर तो वह फ्लैट की चौखट से बाहर कदम रखने की हिम्मत नहीं कर सकती ।”

“ओह !” - सोहनलाल एक क्षण खामोश रहा और फिर बोला - “देखिए प्रोफेसर साहब ! आपका यूं दौड़े-दौड़े पुलिस स्टेशन चला आना यह साबित करता है कि आपको अपनी पत्नी के किसी प्रकार के अनिष्ट की आशंका है ! एक पढे-लिखे, सुबुद्ध व्यक्ति के मन में ऐसी आशंका खामखाह नहीं पैदा हो जाती । आप सुबह सोकर उठे, आपने अपनी पत्नी को अपने फ्लैट से गायब पाया तो आप उसके बारे में अड़ोस-पड़ोस से पूछने के स्थान पर या उसके खुद-ब-खुद लौट आने का इन्तजार करने के स्थान पर यहां पुलिस-स्टेशन दौड़े चले आये । आपका यह एक्शन साफ जाहिर करता है कि कोई ऐसी वजह है जो आपको यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि शायद आपकी बीवी किसी मुसीबत में पड़ गई हो । ऐसी कौन-सी वजह है, राज साहब ?”

राज ने एक गहरी सांस ली और फिर उसने धीरे-धीरे पिछली रात कचहरी के अहाते में घटी सारी घटना इन्स्पेक्टर को कह सुनाई ।

“ओहो !” - सारी बात सुन चुकने के बाद सोहनलाल बोला - “आप तो अनोखी बातें सुना रहे हैं ।”

राज खामोश रहा ।

“उन दोनों बदमाशों ने आपके साथ ऐसी बदसलूकी की और फिर आपकी बीवी के लिए आपके हाथ दस हजार रुपये भिजवाए ।”

“हां ।”

“आप कोई मजाक तो नहीं कर रहे ?”

“मैं ऐसा कोई मजाक भला क्यों करूंगा आपसे ?” - राज उखड़कर बोला ।

“कोई वजह नहीं” - सोहनलाल ने स्वीकार किया - “बात बड़ी अनोखी है । बड़ी अजीब है । लेकिन अगर आप कहते हैं कि ऐसा हुआ है, तो हुआ है ।”

राज खामोश रहा ।

“आप उन दोनों बदमाशों को दोबारा देखें तो उन्हें पहचान लेंगे ?”

“शायद पहचान लूं ।”

“पहचान लेने का दावा नहीं कर सकते आप ?”

“नहीं । दरअसल कचहरी के कम्पाउड में अन्धेरा था । एक बार एक गाड़ी की हैडलाइट उन पर पड़ी थी तो एक क्षण के लिए मुझे उन दोनों की सूरतें दिखाई दी थी, लेकिन उस एक क्षण में मैं उनकी सूरतें इतनी अच्छी तरह से नहीं देख पाया था कि दोबारा देखकर उन्हें पहचान लेने का दावा कर सकूं ।”

“आप इस घटना के फौरन बाद, कल रात को ही, यहां क्यों नहीं आए ?”

“इन्स्पेक्टर साहब, वे लोग मेरी बीवी को जानते होने का दावा कर रहे थे, उन्होंने मेरे हाथ मेरी बीवी के लिए दस हजार रुपये की रकम भिजवाई थी, इसलिए इस बारे में सबसे पहले मैं अपनी बीवी से बात करना चाहता था ।”

“हूं । आपकी बीवी ने इस बारे में क्या कहा ?”

“यही कि वे बदमाश किसी और आदमी के चक्कर में गलती से मुझ पर हाथ डाल बैठे थे और यह कि वह ऐसे किन्हीं आदमियों को नहीं जानती थी ।”

“आपको अपनी बीवी की बात पर विश्वास हो गया ?”

“क्यों न होता ? अविश्वास की कोई वजह ही नहीं थी ।”

सोहनलाल ने सहमति में सिर हिलाया और बोला - “एक बात सच-सच बताइए प्रोफेसर साहब ! ऐसा तो नहीं कि आपने अपनी बीवी पर उन दोनों बदमाशों से उसकी कोई पुरानी जानकारी होने का इल्जाम लगाया हो और फिर इसी बात पर आप दोनों में तकरार हो गई हो ?”

“नहीं” - राज कठिन स्वर में बोला - “ऐसी कोई बात हम दोनों में नहीं हुई थी । मैं पहले ही अर्ज कर चुका हूं कि कल रात हम दोनों में किसी भी तरह का झगड़ा-फसाद नहीं हुआ था । पिछली रात तो मेरे घर का माहौल असाधारण रूप से मीठा और प्यार भरा था । लेकिन...”

राज हिचकिचाया ।

“हां-हां । कहिए ।”
 
“लेकिन अब मैं महसूस कर रहा हूं कि हो सकता है कि उन बदमाशों से सम्बन्धित बातों की तरफ से मेरा ध्यान बंटाने की खातिर ही मेरी बीवी कल रात मुझसे जरूरत से ज्यादा मुहब्बत से पेश आ रही हो ।”

“सरासर हो सकता है । औरतें ऐसी बातों में बड़ी उस्ताद होती हैं ।”

राज कुछ न बोला ।

“वह वीरू, जोकि उन दो बदमाशों में से एक बदमाश का नाम था, यह नाम पहले कभी सुना आपने ?”

“नहीं ।”

“यादव ?”

“वह भी नहीं ।”

“हूं । प्रोफेसर साहब ! मुझे भी दाल में कुछ काला दिखाई दे रहा है । आपके साथ मार-पिटाई करके आपकी बीवी पर दबाव डालने की उन बदमाशों की कोशिश के पीछे उनकी कोई भारी शरारत हो सकती है । आप अपनी बीवी के बारे में कुछ बताइए ।”

“क्या बताऊं ?”’

“नाम, उम्र, शक्ल-सूरत वगैरह...”

“नाम कामिनी राज । उम्र तेईस साल । शक्ल-सूरत बहुत खूबसूरत । रंग गोरा । कद लम्बा । बाल लम्बे, भूरे । आंखें सुर्मई ।”

“शादी से पहले आपकी बीवी किस नाम से जानी जाती थी ?”

“कामिनी सिप्पी के नाम से ।”

“सिप्पी कौन-सी जात हुई ? आपकी बीवी सिन्धी तो नहीं ?”

“सिंधी ही है ।”

“फिर यह जात सिपाईमलानी होगी । सिप्पी सिमाईमलानी का ही छोटा रूप है । जैसे बंगालियों में मुखोपाध्याय का मुखर्जी होता है या गंगोपाध्याय का गांगुली होता है ।”

“ऐसा ही होगा, लेकिन मुझे यह बात नहीं मालूम थी ।”

“कमाल है । आप अपनी बीवी का नाम भी ठीक से नहीं जानते ।”

“नाम जानता हूं । नाम की बारीकियां नहीं जानता ।”

“आपकी बीवी ने आपको कभी नहीं बताया, कभी जिक्र तक नहीं किया कि वह मूल रूप से कहां से रहने वाली थी या उसके रिश्ते-नाते वाले कहां रहते हैं ?”

“नहीं ।”

“अपने परिवार के बारे में उसने कभी कोई बात नहीं की ?”

“नहीं ।”

“जब आप उससे शुरू में मिले थे, तब कहां रहती थी वो ?”

“होटल मैसोनिक में ।”

“और शादी के बाद वह होटल छोड़कर आपके साथ रहने के लिए आपके पास आ गई ?”

“और कहां जाती ? शादी के बाद भी क्या होटल में ही रहती ?”

“बड़ी अजीब बात है, प्रोफेसर साहब । आप बुद्धिजीवी आदमी हैं । संभ्रांत समाज के अंग हैं, लेकिन फिर भी आपने ऐसी नादानी दिखाई । आदमी कोई छोटी-मोटी चीज भी खरीदता है तो दुकानदार से उसके बारे में सौ सवाल करता है । वह चीज कहां बनी है । कम्पनी का नाम कैसा है । उसके ठीक चलते रहने की कोई गारंटी है या नहीं वगैरह । लेकिन शादी जैसा जिम्मेदारी का काम आपने बिना सवाल पूछे कर लिया । आपने आनन-फानन एक आनन-फानन एक ऐसी लड़की से शादी कर ली जिसके नाम के अलावा आप उसके बारे में कतई कुछ नहीं जानते । मुलाकात कैसे हुई थी आपकी अपनी बीवी से ?”

“किसी के यहां हुई पार्टी में मैं पहली बार कामिनी से मिला था ।”

“आपने मेजबान से ही उसके बारे में पूछा होता ।”

“मेजबान को भी” - राज संकोचपूर्ण स्वर में बोला - “मैं कोई खास अच्छी तरह से नहीं जानता था ।”

“कमाल है । कमाल है ।”

राज खामोश रहा ।

“देखिए” - कुछ क्षण खामोश रहने के बाद सोहनलाल बोला - “आमतौर पर तो हम इस प्रकार का केस तब तक रजिस्टर भी नहीं करते जब तक गुमशुदा को गुम हुए कम से कम दो-तीन दिन न हो गए हों, लेकिन आपका केस बहुत अनोखा है इसलिए इसको हम अभी रजिस्टर किए लेते हैं । वैसे भी हमें ऊपर से हिदायत है कि जब किसी रहस्यपूर्ण घटना का शिकार कोई नर्ई ब्याही दुल्हन हो तो हम केस की ज्यादा बारीकी से तफ्तीश करें ।”

“क्यों ?”

“क्योंकि इधर पिछले कुछ दिनों से ऐसी घटनाएं बहुत होने लगी हैं जिनमें कोई नई दुल्हन जलकर मर जाती है तो उसके ससुराल वाले उसे दुर्घटना का नाम दे देते हैं । या कोई दुल्हन बड़े रहस्यपूर्ण ढंग से गायब हो जाती है तो उसके ससुराल वाले कह देते हैं कि लड़की चरित्रहीन थी और वह जरूर अपने किसी पुराने यार के साथ भाग गई थी । ऐसे कुछ केसों की तफ्तीश करने पर हमें मालूम हुआ था कि ये बहुत बेदर्दी से किए गए कत्लों के केस थे जिनमें ऐसे ससुराल वालों ने बेचारी दुल्हन को जान-बूझकर जलाकर मार डाला था, या उसे मारकर लाश गायब कर दी थी । जिनकी दान-दहेज के मामले में उम्मीद पूरी नहीं हुई थी या जिन्हें दुल्हन से और कोई सरासर नाजायज शिकायत थी ।”

“इन्स्पेक्टर साहब !” - राज आवेशपूर्ण स्वर में बोला - “आप कहीं मुझ पर यह इल्जाम तो नहीं लगा रहे कि मेरी बीवी के गायब हो जाने के पीछे मेरा हाथ है ?”

“मैंने आप पर कोई इल्जाम नहीं लगाया । मैंने तो सिर्फ आपके सवाल का जवाब दिया है ।”

“लेकिन बड़ा शरारती जवाब दिया है आपने । मैं आपको फिर याद दिलाना चाहता हूं कि मैंने अपनी बीवी से कोर्ट में जाकर लव मैरिज की थी । इसलिए दान-दहेज का कोई मतलब ही नहीं था । और मैं अपनी बीवी से बेहद मुहब्बत करता हूं । मुझे उससे जायज या नाजायज कैसी भी कोई शिकायत नहीं है ।”

“जरूर नहीं होगी । मुझे असल में केस में उन दो बदमाशों का दखल चिंता में डाल रह है जिनसे आपकी मार-पीट हुई थी ।”

राज खामोश रहा ।

“फिलहाल आप अपने घर आइए । मैं अभी एक घंटे में तफ्तीश के लिए वहां आता हूं ।”

“लेकिन मैंने तो कालिज जाना है ।”

“कमाल है । आपकी बीवी इतने रहस्यपूर्ण ढंग से आपके घर से गायब हो गर्ई है और आपको कालेज जाने की पड़ी हुई है ।”

राज शर्मिदा हो गया ।

सोहनलाल के एक मातहत ने रिपोर्ट दर्ज करके उस पर राज के हस्ताक्षर कराए और फिर राज को वहां से विदा कर दिया ।

राज वापिस माल पर पहुंचा ।

इमारत के मुख्य द्वार पर उसका सामना उसकी पहली मंजिल की किराएदार मिसेज गोंसाल्वेज से हो गया ।

“गुड मार्निंग ।” - वह मीठे स्वर में बोली ।

“वेरी गुडमार्निग मिसेज गोंसाल्वेज ।” - राज प्रत्यक्षतः प्रसन्न स्वर में बोला । फिर कुछ सोचकर वह सीढियों की ओर बढता हुआ ठिठका गया और बोला - “आपने कामिनी को तो नहीं देखा, मिसेज गोंसाल्वेज ?”

“आज ?”

“हां ।”

“नहीं तो । आज तो नहीं देखा । मिसेज राज तो मुझे कल शाम के बाद से नहीं दिखाई दीं । क्या बात है, मिस्टर राज ? कोई गड़बड़ ?”

“हां । है तो सही कुछ ।” - वह चिन्तित भाव से बोला । और फिर सीढियां चढ गया ।

वह अपने फ्लैट में पहुंचा ।

कामिनी के बिना अपना फ्लैट उसे इतना खाली-खाली और वीरान लगा कि उसका दिल घबराने लगा ।

सबसे पहले उसने कालेज फोन करके प्रिंसिपल को खबर की कि उस रोज वह कालेज नहीं आ सकता था ।

फिर उसने उस चश्मे की दुकान पर फोन किया जहां से वह अपना चश्मा बनवाता था । उसका नम्बर दुकानदार को मालूम था । उसने उसे एक नया चश्मा जल्दी से जल्दी बना देने का आदेश दिया ।

फिर वह ड्राइंग-रूम में उस सोफे पर आ बैठा जहां कल उसे अपने विवाहित जीवन का अभूतपूर्व आनन्द प्राप्त हुआ था । वह कामिनी के बारे में सोचने लगा । क्यों झूठ बोला उसने उन दोनों बदमाशों के बारे में, कि वह उन्हें नहीं जानती थी । कोई तो वजह रही हो होगी । कल से पहले तो उसने कभी उससे झूठ नहीं बोला था । और फिर कामिनी का कल रात का व्यवहार बाकी दिनों से भिन्न क्यों था ?

राज एकाएक अपने स्थान से उठा और बैडरूम में पहुंचा ।

उसने कामिनी के कपड़ों वाली अलमारी खोली और बड़ी बारीक से उसमें मौजूद एक-एक कपड़े का मुआयना किया ।

उसकी कोई भी पोशाक वहां से गायब न थी ।

इतनी ठण्ड में सिर्फ एक झीना-सा नाइट गाउन पहने वह कैसे फ्लैट से बाहर कदम रख पाई ?

लेकिन हकीकतन किया तो उसने यही था ।

क्या माजरा था ?

वह वापस ड्राइंगरूम में आ गया ।

वह महसूस कर रहा था कि कम से कम एक बात इन्स्पेक्टर सोहनलाल ने सच कही थी । दुनिया में उसके अलावा शायद ही कोई ऐसा पति हो जो अपनी पत्नी के बारे में, सिवाय इसके कि वह खूबसूरत थी और नौजवान थी, और कुछ न जानता हो ।

नौ बजे के करीब अपने तिवारी नामक मातहत सब-इन्स्पेक्टर के साथ इन्स्पेक्टर सोहनलाल राज के फ्लैट पर पहुंचा ।

राज से औपचारिक अनुमति प्राप्त करने के बात दोनों ने बड़ी बारीकी से फ्लैट के एक-एक कोने-खुदरे का मुआयना करना आरम्भ कर दिया ।

किचिन के सिंक में पड़े जूठे बर्तनों के बारे में सोहनलाल ने खास तौर से सवाल किया - “बर्तन साफ करने क्या कोई नौकरानी आती है ?”

“नहीं” - राज ने बताया - “हम... मेरा मतलब है, कामिनी खुद करती है ।”

“क्या अक्सर यही होता है कि रात के बर्तन सुबह साफ किए जाते हैं ?”

“नहीं । कल रात पहली बार थी जब ऐसा हुआ था ।”’’

“क्या यह असाधारण बात नहीं ?”

“असाधारण तो है ।”

“इस असाधारण बात की कोई वजह भी होगी ?”

“हां ।”

“सोचिए कोई वजह ?”

राज खामोश रहा ।

“कल रात अपनी बीवी के व्यवहार में आपने किसी तरह की तब्दीली देखी थी ?”

राज हिचकिचाया ।

“देखिए, ऐसे हिचकिचाने से काम नहीं चलेगा । आप हमसे कोई बात छुपायें तो नुकसान आपका ही होगा । यह बात ध्यान में रखियेगा कि आपकी बताई छोटी से छोटी बात आपको बीवी की तलाश की दशा में हमारी बहुत मदद कर सकती है । अगर आप कुछ छुपाएंगे तो मजबूर होकर हमें यह समझाना पड़ेगा कि आप सिर्फ ड्रामा कर रहे हैं कि आप अपनी बीवी के गायब हो जाने की वजह से चिन्तित हैं । असल में आपको उसकी कोई परवाह नहीं है ।”

“ऐसी बात नहीं है ।” - राज हड़बड़ाकर बोला ।

“जरूर नहीं होगी । इसीलिए तो मैं आपको राय दे रहा हूं कि कोई बात छुपाइए नहीं ।”
 
राज फिर भी कुछ क्षण हिचकिचाता रहा लेकिन अन्त में वह कठिन स्वर में बोला - “कल जब मैं वापिस लौटा था तो मुझे अपनी बीवी की सांसों में से ब्रान्डी की गन्ध मिली थी और वह मुझे तनिक नशे में भी लगी थी ।”

“आपकी बीवी ड्रिंक करती है ?”

“ड्रिंक नहीं करती । लेकिन आप जानते ही हैं कि आज कल जैसे बर्फीले मौसम में शिमले में ब्रान्डी पी लेना ड्रिंक करने में शुमार नहीं किया जाता ।”

“लेकिन आप कहते हैं कि वह आपको तनिक नशे में भी लगी थी ?”

“हां । यह एक असाधारण बात थी । कामिनी ने मेरी जानकारी में पहली बार इतनी ब्रांडी पी थी कि उसे थोड़ा नशा हो गया था ।”

“मूड कैसा था उसका ? सहज स्वाभाविक या आन्दोलित ? इमोशनल ?”

“इमोशनल !”

“यह सोफा” - सोहनलाल ने सोफे की तरह संकेत किया - “ऐसी उजड़ी-सी हालत में क्यों है ? बड़ी बुरी तरह से रौंदा गया मालम हो रहा है यह ।”

राज का चेहरा लाल हो गया । वह मुंह से कुछ नहीं बोला ।

“ओह ! समझा !” - सोहनलाल के होंठो की कोरों पर एक क्षीण-सी मुस्कराहट उभरी - “यह कोई बड़ी बात नहीं । जिनकी नई-नई शादी हुई हो, उनके साथ ऐसी बात आम हो जाती है । जब्त करना मुश्किल हो जाता है कभी-कभी ।”

राज खामोश रहा ।

“लेकिन आप लोग तो फ्लैट में अकेले रहते हैं । फिर बैडरूम में जाने की जगह यहां सोफे पर...”

“इन्स्पेक्टर ।” - राज कठोर स्वर में बोला - “क्या इन बातों का भी तफ्तीश से रिश्ता है ?”

“हर बात का भी तफ्तीश से रिश्ता है ।” - सोहनलाल लापारवाही से बोला - “क्या ऐसा पहले भी हुआ है कि आप लोगों से बैडरूम में जाने जितना भी सब्र न हुआ हो ?”

“नहीं ।”

“अब बराय मेहरबानी आप अपनी बीवी की कोई तस्वीर दिखाइए ।”

राज ने उसे कामिनी का एक कैबिनेट साइज का स्टूडियो फोटोग्राफ पेश किया । इन्स्पेक्टर की तस्वीर पर निगाह पड़ते ही राज को ऐसा लगा जैसे वह तनिक चौंका हो । उसने तस्वीर राज के हाथ से ली और गौर से उसका मुआयना करने लगा ।

“यह आपकी बीवी की तस्वीर है ?” - वह बोला ।

“जी हां ।” - राज हैरानी से बोला - “और किसकी होगी ? तभी तो मैं आपको दिखा रहा हूं ।”

“प्रोफेसर साहब ! मेरे ख्याल से आपकी बीवी की तस्वीर मैंने पहले भी देखी है ।”

“हो सकता है । शिमले में यह कोई नई बात नहीं । सीजन में तो सारा कश्मीर रिज पर या स्कैण्डल प्वायन्ट पर मौजूद होता है । कभी देखा होगा आपने कामिनी को ।”

“आपने मेरी बात ठीक से नहीं समझी, प्रोफेसर साहब । मैंने अर्ज किया कि मैंने आपकी बीवी की तस्वीर पहले कभी देखी है । मैंने यह नहीं कहा कि मैंने आपकी बीवी पहले कभी देखी है ।”

“तस्वीर कहां देख ली आपने ?”

“आप बुरा तो नहीं मानेंगे ?”

“किस बात का ?”

“उस बात का जो मैं कहने जा रहा हूं ।”

“मैं बात सुने बिना कैसे कह सकता हूं कि मैं उसका बुरा मानूंगा या नहीं ।”

“कोई दस महीने पहले दिल्ली पुलिस ने हमें कुछ फरार अपराधियों की तस्वीरें भेजी थीं । राज साहब, उन्हीं में मैंने आपकी बीवी की तस्वीर देखी थी । सूरत सरासर यही थी लेकिन तस्वीर पर नाम अलका कपूर लिखा हुआ था ।”

“आपको गलतफहमी हुई है ।” - राज एक-एक शब्द पर जोर देता हुआ बोला - “इस बारे में आपको जरूर कोई गलतफहमी हुई है ।”

“हो सकता है ।” - सोहनलाल ने स्वीकारा किया - “लेकिन अगर मुझे गलतफहमी नहीं हुई है तो इस लड़की की दिल्ली पुलिस को डकैती और कत्ल के एक केस के सिलसिले में तलाश है । ठाकुर ।” - सोहनलाल अपने मातहत सब-इन्स्पेक्टर की तरफ घूमा - “तुम्हें कुछ याद आया ?”

“जी हां ।” - ठाकुर तत्पर स्वर में बोला - “यह वही केस है जिसमें कनाट प्लेस के एक जौहरी की दुकान लूटी गई थी और जिसमें जौहरी का कत्ल हो गया था । अलका कपूर की तस्वीर के साथ जो विवरण आया था, उसके अनुसार वह मशहूर गैंगस्टर कुणाल सिंह की रखैल थी ।”

“कमाल है ।” - सोहनलाल प्रशंसात्मक स्वर में बोला - “यह लड़की तो बड़ी होशियार निकली । दिल्ली से चुपचाप खिसक आई और यहां आकर एक इज्जतदार कालेज प्रोफेसर से शादी करके एक संभ्रान्त गृहणी बन गई । पुलिस की निगाहों से बचे रहने का इससे ज्यादा लाजवाब तरीका और क्या हो सकता था ?”
 
राज पुलिस के रिकार्ड रूम में इंस्पेक्टर सोहनलाल और सब-इन्स्पेक्टर ठाकुर के साथ बैठा था । वहां उसको फरार मुजरिममों की पुलिस के रिकार्ड में मौजूद सैंकड़ों तस्वीरें दिखाई जा रही थीं । अपने चश्मे के बिना उन तस्वीरों का मुआयना करने में उसे इतनी दिक्कत महसूस हो रही थी कि उसकी आंखों से पानी निकलने लगा था ।

जो तस्वीरें उसे दिखाई जा रही थीं उनमें अभी तक उसे उन दोनों बदमाशों के दर्शन नहीं हुए थे, जिन्होंने कचहरी के कंपाउंड में उस पर आक्रमण किया था ।‘

उसे कामिनी के कथित चाहने वाले कुणाल सिंह और उसके साथी सुन्दरलाल की तस्वीरें विशेष रूप से दिखाई गई । सोहनलाल के कथनानुसार वहीं दो आदमी थे जो दिल्ली की ज्वेल रॉबरी के लिए और जौहरी के कत्ल के जिम्मेदार थे । लेकिन राज के लिए वे दोनों सूरतें एकदम अपरिचित थीं । जिन दो बदमाशों ने कल रात उस पर आक्रमण किया था, वे कम से कम कुणाल सिंह और सुन्दरलाल नहीं थे ।

“आप कोई तस्वीर पहचान नहीं सके ।” - सोहनलाल निराश स्वर में बोला - “लेकिन फिर भी मेरी राय में आपकी बीवी के यूं रहस्यपूर्ण ढंग से गायब हो जाने के पीछे उसकी उस पिछली जिन्दगी का जरूर रिश्ता है, जिससे शायद बड़े प्रत्याशित ढंग से उसे एकाएक फिर दो-चार हो जाना पड़ा है ।”

राज महसूस कर रहा था कि उसे इस बात का तीव्र विरोध करना चाहिए था । उसे कहना चाहिए था कि किसी गैंगस्टर की रखैल उसकी बीवी नहीं हो सकती थी, लेकिन पता नहीं क्यों उसका मुंह नहीं खुल रहा था ।

“हमारी समस्या यह है कि अभी तक हमारी समझ में यह नहीं आया है” - सोहनलाल बोला - “कि जिस केस की हम तफ्तीश कर रहे हैं, यह क्या है ? क्या यह किसी गुमशुदा की तलाश का केस है, क्या यह कत्ल का केस है ? या क्या यह ज्वेल रॉबरी के पुराने केस का ही कोई नया एंगल है ? दिल्ली पुलिस का हमें केवल इतना निर्देश है कि अगर अलका कपूर हमें अपने इलाके में दिखाई दे तो हम उसे हिरासत में लें और दिल्ली पुलिस को खबर कर दें ।”

सोहनलाल एक क्षण ठिठका और फिर बोला - “और फिर पता नहीं यह टिपटाप क्या बला है जहां आपकी बीवी को उन बदमाशों ने आने के लिए कहा था ? उन्होंने आपकी बीवी को दस हजार रुपए का कथित हिस्सा क्यों भिजवाया है ? यादव वाला काम क्या बला है ? कुछ भी तो पल्ले नहीं पड़ रहा हमारे ।”

“साहब !” - ठाकुर बोला - “दिल्ली की ज्वेल रॉबरी में दस लाख रुपए के हीरे लूटे गए थे । उस डकैती के फौरन बाद कुणाल सिंह, सुन्दरलाल और अलका कपूर तीनों दिल्ली से गायब हो गए थे । हीरे अभी तक भी प्रकट नहीं हुए हैं । क्या यह नहीं हो सकता कि कश्मीर में आकर एक संभ्रांत गृहिणी का बहुरूप धारण कर लेने के बाद अलका की नीयत खराब हो गई हो और वह अपने ही साथियों का माल डकार जाना चाहती हो लेकिन वे लोग अपना माल हासिल करने के लिए उसके पति के माध्यम से उस पर दबाव डालने की कोशिश कर रहे हों ?”

“लेकिन जिन लोगों ने प्रोफेसर साहब पर हमला किया था ।” - सोहनलाल बोला - “वे तो किसी यादव वाले काम का जिक्र कर रहे थे । दिल्ली को ज्वेल रॉबरी का तो उन्होंने नाम भी नहीं लिया था । और फिर दस लाख के माल में दस हजार का हिस्सा तो कुछ भी न हुआ ।”

“शायद वह मुकम्मल हिस्सा न हो । शायद वह हिस्से की एक किश्त हो ।”

“लेकिन माल हाथ में आने से पहले वे लोग अपने पल्ले से अलका को दस हजार रुपया क्यों भिजवायेंगे ? और फिर प्रोफेसर साहब ने अपने आक्रमणकारियों के रूप में कुणाल सिंह और सुन्दरलाल की शिनाख्त नहीं की है ।”

“फिर भी इनके आक्रमणकारी कुणाल सिंह और सुन्दरलाल हो सकते हैं । इन्होंने खुद कहा था कि अपने आक्रमणकारियों की सूरत ये खूब अच्छी तरह नहीं देख पाए थे और तस्वीरों से शिनाख्त करने में यह अपने चश्मे की गैरमौजूदगी की वजह से भी नाकामयाब रहे हो सकता हैं ।”

सोहनलाल सोचने लगा ।‘’

“साहब !” - ठाकुर फिर बोला - “प्रोफेसर साहब के कथनानुसार कल इन्होंने अपने बीवी को नशे में पाया था और उसका व्यवहार भी नार्मल नहीं था । साहब, हो सकता है कि वे बदमाश पहले ही इनकी बीवी से सम्पर्क स्थापित कर चुके हों, लेकिन उसे धमकाकर माल अपने हवाले कर लेने में कामयाब न हो सके हों । आखिर थी तो वो भी दादा लोगों की संगिनी । शायद इसी वजह से उन बदमाशों ने उसके पति के माध्यम से उस पर दबाव डालने की कोशिश की हो ।”

“ऐसी जरायमपेशा औरत को इस बात की परवाह हो सकती है कि उसके पति क्या बीतती है ?”

“उसका कल रात का व्यवहार जाहिर करता है कि उसे परवाह थी । इसीलिए वह कल रात अपने पति के सो जाने के बाद चुपचाप उसे छोड़कर चली गई, ताकि कम से कम उसकी वजह से उसके पति का कोई अहित न हो ।”

“लेकिन” - राज आवेशपूर्ण स्वर में बोला - “जो कुछ आप कह रहे हैं, अगर वह सच है तो वह अपना कोई सामान साथ लेकर क्यों नहीं गई ? वह तरीके के कपड़े पहनकर क्यों नहीं गई ? सिर्फ एक नाइट गाउन पहनकर नंगे पांव कोई बर्फबारी के मौसम में बाहर कदम रखने की हिम्मत भी कैसे कर सकता है ? यह कोई मानने की बात है कि दस हजार रुपयों वाला लिफाफा तो वह अपने साथ ले गई लेकिन कोई तरीके का कपड़ा पहनकर घर से न निकली ।”

“यह जरूरी नहीं कि आपको उसकी एक-एक पोशाक की वाकफियत हो । हो सकता है उसके पास कुछ ऐसी पोशाकें हों जो आपकी जानकारी में न हों ।” - सोहनलाल बोला ।

“हो सकता है लेकिन यह नहीं हो सकता कि उसके पास कोई तीसरा कोट रहा हो और उसकी मुझे खबर न हो ।”

“लेकिेन...”

“साहबान !” - राज तीव्र विरोधपूर्ण स्वर में बोला - “आप खामखाह मेरी बीवी के चरित्र पर कीचड़ उछालने की कोशिश कर रहे हैं । मेरी बीवी वह नहीं जो आप उसे समझ रहे हैं । कोई अलका कपूर नाम की गैंगस्टर की रखैल मेरी बीवी नहीं हो सकती ।”

“क्यों नहीं हो सकती ? आपने खुद कबूल किया है कि आप अपनी बीवी के बारे में कुछ नहीं जानते । फिर वह यह क्यों नहीं हो सकती जो हम उसे समझ रहे हैं ?”

राज को जवाब नहीं सूझा ।

“आप यह मानते हैं” - सोहनलाल बोला - “कि हमारे फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट ने आपके फ्लैट से जो उंगलियों के निशाने उठाए हैं, उनमें आपकी बीवी की उंगलियों के निशान भी होंगे ।”

“हां ।” - राज बोला ।

“हमारे पास अलका कपूर की उंगलियों के निशानों का रिकार्ड है । अगर आपके फ्लैट से उठाए गए उंगलियों के निशानों का कोई सैट सेानिया कपूर की उंगलियों के निशानों से मिलता हुआ पाया गया तो आप मानेंगे कि अलका कपूर ही कामिनी सिप्पी बनकर आपकी बीवी बनी हुई है ?”

राज के मुंह से बोल न फूटा । उसने धीरे से सहमति में गर्दन हिलायी ।‘’

“अभी सारा मेला सामने आया आता है ।” - सोहनलाल बोला - “अभी ।”

तभी एक हवलदार एक फाइल लेकर वहां पहुंचा । फाइल उसने सोहनलाल के सामने रख दी और वहां से चला गया ।

सोहनलाल कुछ क्षण फाइल देखता रहा और फिर बोला - “यह फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट की रिपोर्ट है । प्रोफेसर साहब आपके फ्लैट से अलका कपूर की उंगलियों के निशान मिलें हैं । अब क्या कहते हैं आप ?”

राज खामोश रहा । वह उसके लिए बड़ी कठिन घड़ी थी । अब उसके विरोध में कोई बल नहीं रहा था ।

“ठाकुर !” - सोहनलाल ने आदेश दिया - “जरा प्रोफेसर साहब को अलका कपूर का फाइल कार्ड दिखाओ ।”

ठाकुर ने उसके सामने जो कार्ड रखा, उसके ऊपर के भाग में जिस सुन्दर युवती के चेहरे और प्रोफाइल की दो तस्वीरें लगी हुई थीं, वह निश्चय ही कामिनी थी । तस्वीरों के नीचे लिखा था - अलका कपूर उर्फ कामिनी सिपाईमलानी । आयु बीस वर्ष । कद पांच फुट तीन इंच । बाल भूरे । आंखें सुर्मई । रंग गोरा । दो बार गिरफ्तार हो चुकी है । एक बार चोरी के इल्जाम में और दूसरी बार जाली चैक पास कराने की कोशिश के इल्तजाम में । लेकिन दोनों बार पर्याप्त प्रमाण न मिलने के कारण बरी हो गई ।

राज ने कार्ड परे सरका दिया ।‘’

“अब भी कोई शक है आपको अपनी बीवी के बारे में ?” - सोहनलाल व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोला ।

राज ने उत्तर नहीं दिया । उसने अपने दोनों हाथों से अपना माथा थाम लिया ।

“प्रोफेसर साहब !” - एकाएक सोहनलाल बड़े हमदर्दी भरे स्वर में बोला - “मैं आपके दिल की हालत को समझता हूं । मुझे आपसे पूरी हमदर्दी है लेकिन हकीकत को न आप झुठला सकते हैं, न मैं और न कोई और । देखिए, दिन ढल गया है । सारा दिन आपकी बड़ी परेड हुई है । इसलिए फिलहाल तो आप घर जाकर आराम कीजिए ।”

राज ने बिना हथेलियों पर से सिर उठाए सहमति में सिर हिलाया ।‘’

“और कल भी आप हमें उपलब्ध रहिएगा ।”’

“यानि कि कल भी मैं कालेज न जाऊं ?”’

“अगर हो सके तो ।”

“ठीक है ।”’

वह उठ खड़ा हुआ । उसने दोनों पुलिस अधिकारियों का अभिवादन किया, एक सूनी निगाह अभी भी अपेक्षित से मेज पर पड़े अपनी बीवी के फाइल कार्ड पर डाली और भारी कदमों से चलता हुआ वहां से बाहर निकल आया ।

बाहर अन्धेरा हो चुका होने की वजह से बर्फ की सफेद चादर अब सुर्मई हो गई थी सांय-सांय करती हुई ठण्डी हवा चल रही थी । उसने अपने ओवरकोट का कालर ऊंचा कर लिया और जेबों में हाथ धंसाए आगे बढा ।

जितना थका हुआ और हताश वह अपने आपको आज महसूस कर रहा था, उतना उसने आज तक कभी महसूस न किया था ।

क्या वाकई इतना धोखा हो गया था उसके साथ ?

उसकी इतनी निष्ठावान बीवी एक गैंगस्टर की रखैल रह चुकी थी ?

और पिछली रात के धुआंधार अभिसार के पीछे क्या उसका यही उद्देश्य था कि वह थककर, निढाल होकर, घनघोर नींद में सो जाए और वह चुपचाप वहां से खिसक सके ।

क्या वह उसका पति, नहीं था ? क्या वह सिर्फ एक पर्दा था जो उसने अपनी गुनाहभरी जिन्दगी पर इतनी चतुराई से डाला था ?

एकाएक वह वापिस घूमा और लम्बे डग भरता हुआ फिर इमारत में दाखिल हो गया ।

इन्स्पेक्टर सोहनलाल और सब-इन्स्पेक्टर ठाकुर को उसने वहीं बैठा पाया, जहां वह उन्हें छोड़कर गया था ।

इन्स्पेक्टर सोहनलाल ने तनिक हैरानी से उसकी तरफ देखा और फिर शुष्क स्वर में पूछा - “अब क्या है ?”

“मैं एक बात पूछना चाहता था ।” - राज बड़े दयनीय स्वर में बोला ।‘

“कौन-सी बात ?”’’

“अलका कपूर के फाइल कार्ड में उसके केवल दो ही अपराध लिखे हुए हैं लेकिन आपके लिहाज से तो वह बड़ी खराब लड़की थी । मैं यह पूछना चाहता था कि क्या वह... वह कभी...”

“मैं समझ गया आप क्या पूछना चाहते हैं ।” - सोहनलाल के स्वर में तुरन्त हमदर्दी का भाव पैदा हुआ - “अगर इससे आपको कोई सन्तुष्टि हासिल होती है तो हकीकत यह है हमारे पास ऐसा कोई रिकार्ड नहीं है कि उसका रिश्ता कभी वेश्यावृत्तिक या कालगर्ल के धन्धे से रहा हो । जहां तक उसके किसी मर्द से रिश्ते का सवाल है, वह हम उसका सिर्फ कुणाल सिंह से ही जोड़ सके हैं ।”

“आप अलका कपूर का कोई पता-ठिकाना नहीं जानते ?”

“प्रोफेसर साहब, अगर जानते होते तो अब तक हम वहां पहुंच न गए होते ।”’’

“या उसके परिवार के बारे के कुछ जानते हों आप ?”

“न । उसके बारे में हम केवल इतना जानते हैं कि मूल रूप से यह कश्मीर हिल्स में ही कहीं की रहने वाली है । हमारी जानकरी में वह कभी वापिस लौटकर नहीं आई ।”

“लेकिन अगर अलका कपूर ही कामिनी है तो....”’

“मेरी मतलब है आज से पहले हमें अलका कपूर उर्फ कामिनी सिप्पी की यहां वापिसी की खबर नहीं थी । अब तो हम उसकी होशियारी की दाद देते हैं कि कैसे उसने वापिस यहां आकर चुपचाप आपसे शादी कर ली और एक इज्जतदार हाउसवाइफ बन गई । यह तो चिराग तले अन्धेरा वाली मिसाल हो गई ।”

“शुक्रिया ।” - राज जल्दी से उठ खड़ा हुआ - “शुक्रिया ।”

वह फिर बाहर निकला ।

वहां तक वह पुलिस की जीप में आया था इसलिए वापिसी के लिए वह पैदल चलने लगा ।

रास्ते में वह सिर्फ कामिनी के बारे में सोचता रहा ।

कैसा नामुराद दिन था वह । यह सोचकर ही उसका दिल डूबा जा रहा था कि आज जब वह घर पहुंचेगा तो उसकी सूनी दीवारें उसका स्वागत करेंगी । कोई उसे दरवाजा नहीं खोलेगा । कोई उसके देर से घर लौटने की शिकायत करने के लिए वहां मौजूद नहीं होगा ।

वह माल पर पहुंचा ।

इमारत के मुख्य द्वार की पहली सीढी तक बर्फ पहुंची हुई थी । मंगतराम से यह अपेक्षित होता था कि बेलचा लेकर कम से कम सीढियों के आगे से वह बर्फ हटाता रहे, क्योंकि वहां से बर्फ न हटाने से तो धीरे-धीरे दरवाजा ही बन्द हो जाने की नौबत आ सकती थी ।

आज पता नहीं कहां चला गया था कम्बख्त ! उस जैसा ईमानदार नौकर साधारणतया यूं बिना बताए गायब नहीं होता था लेकिन फिर उसे ख्याल आया कि वह बताता किसे ? वह सुबह से भाग-दौड़ में लगा हुआ था और कामिनी खुद ही गायब थी ।

वह इमारत में दाखिल हुआ ।

तभी उसका पहली मंजिल का किराएदार गोंसाल्वेज तहखाने की सीढियों चढकर ऊपर पहुंचा और उसके सामने आ खड़ा हुआ ।

“भई, राज साहब ! यह क्या बात हुई ?” - वह भुनभुनाता हुआ बोला - “इतना आप किराया लेते हैं लेकिन किराएदारों की सुख-सुविधा की आप जरा भी परवाह नहीं करना चाहते ।”

“क्या हो गया है ?” - राज हड़बड़ा कर बोला ।

“फ्लैट रेफ्रीजरेटर बना पड़ा है, साहब !” - वह बड़ा नाटकीय ढंग से बोला ।

“भट्टी में आग धीमी पड़ गई होगी ।” - राज खेदपूर्ण स्वर में बोला ।

“भट्ठी बुझी पड़ी है, जनाब ! मैं अभी देखकर आया हूं । मैं अभी आफिस से लौटा हूं । मेरी मिसेज ने बताया है कि आज तो सारा दिन ही फ्लैट का ठण्ड से बुरा हाल रहा था ।”

“आपने मंगतराम को कह दिया होता ।”

“लेकिन वह कहीं मिले तो सही । उसके न‍ मिलने की वजह से ही मैं खुद तहखाने में गया था । वह नीचे नहीं है और भट्टी बिल्कुल बुझी पड़ी है ।”

“आई एम सॉरी, मिस्टर गोंसाल्वेज ! मै अभी मंगतराम को तलाश करके भट्ठी चालू कराता हूं ।”

“और तब तक हम ठण्ड में ठिठुरते रहें ?” - वह नाक चढाकर बोला ।

“मैं खुद भट्ठी चालू करता हूं, मिस्टर गोंसाल्वेज !”

“आप कुछ भी कीजिए, मुझे इससे कोई मतलब नहीं, लेकिन जो करना है, जल्दी कीजिए । और दोबारा ऐसी गड़बड़ नहीं होनी चाहिए ।”

“जान !” - एकाएक पहली मंजिल की सीढियों से मिसेज गोंसाल्वेज की झिड़कीभरी आवाज आई - “यू कम बैक हेयर दिस वैरी मिनट ।”

“कमिंग डियर ।” - गोंसाल्वेज बोला - “लेकिन पहले मैं...”

“पहले कुछ नहीं । मिस्टर राज के साथ इतना बड़ा मुश्किल हो गया है और तुम उनसे बुझी हुई भट्ठी के लिए लड़ रहे हो । इसमे इनकी क्या गलती है । ये ब्लडी नौकर लोग ही कामचोर है ।”

“लेकिन...”

“जान ! वेयर आर यूअहर मैनर्स ?”

“सॉरी, डियर !”

“मिसेज राज गायब हो गया है, मालूम ? आज सारा दिन इधर पुलिस का चक्कर लगाता रहा । वो लोग हमसे भी पूछा कि क्या हमने मार्निंग में मिसेज राज को देखा ।”

“आपने कामिनी को देखा था, मिसेज गोंसाल्वेज ?” - राज ने व्यग्र स्वर में पूछा ।

“देखा तो नहीं था ।” - वह बोली - “लेकिन हमको मालूम था कि जरूर कुछ गड़बड़ होने का है । जब हव मवाली-सा लगने वाला छोकरा पहली बार इधर आया था, हम तभी सोचा कि कुछ गड़बड़ । मिसेज राज, सच ए नाइस यंग लेडी और वो मवाली...”

“कौन मवाली ?”

“वो छोकरा ! जो आपके पीछे से मिसेज राज से मिलने इधर आता था और हमेशा चोर की माफिक पिछवाड़े की सीढियों से इमारत में दाखिल होता था । उसका हिप्पी की माफिक लम्बे-लम्बे बाल होता था । चमड़े का कोट पहनता था और इतनी टाइट जीन पहनता था कि....”

मिसेज गोंसाल्वेज ने बुरी-सी शक्ल बनाई ।

“आप यह कहना चाहती हैं कि कोई आदमी कामिनी से मिलने आया करता था ।”

“यस । सैवरल टाइम्स । ऐवरी वीक । कई बार वीक में दो बार भी ।”

“आपने यह बात पुलिस को भी बताई है मिसेज गोंसाल्वेज ?” - राज ने डरते-डरते पूछा ।‘

“काहे को ! हमसे कोई पूछा ही नहीं । हमसे तो पुलिस यही पूछा कि क्या हमने पिछली रात को तुम्हें अपना वाइफ से झगड़ा करते सुना । या आप दोनों का कन्टीन्यूटी कैसा था ?”

“ओह !”

“कम बैक, जान ! मिस्टर राज ! आई एम सारी आन बिहाफ ऑफ माई हसबैंड ।”

“ओह, नाट एट आल । रादर आई एम सरी फार युअर इनकनवीनियन्स, मिसेज गोंसाल्वज ।”

गोंसाल्वेज जल्दी-जल्दी सीढियां चढ गया ।
 
राज तहखाने में पहुंचा ।

यह देखकर उसे बड़ी हैरानी भी हुई और गुस्सा भी आया कि तहखाने की विशाल भट्टी की राख तक ठन्डी हो चुकी थी ।

मन ही मन मंगतराम को बेतहाशा कोसते हुए उसने बेलचा उठाया और पहले भट्टी में से राख निकाल - निकालकर एक विशाल ड्रम में डाली फिर ताजा आगे जलाने के कठिन काम में जुट गया ।

उस काम में अपनी नातजुर्बेकारी की वजह से भट्टी में धधकती हुई आग जला पाने में उसे पूरा घंटा लग गया । फिर जब पानी उबलने लगा और भाप बनने लगी तो उसने राहत की सांस ली ।

उस दौरान मंगतराम को फौरन नौकरी से निकाल देने का फैसल वह मन ही मन कई बार दोहरा चुका था ।

फिर वह तहखाने से बाहर निकाला और अपने फ्लैट में पहुंचा ।

गोंसाल्वेज ने झूठ नहीं कहा था । फ्लैट वाकई बर्फ में लगा हुआ था । लेकिन अब भट्ठी जल चुकी थी और फ्लैट बहुत जल्द गर्म हो जाने वाला था ।

उसने अलमारी में से ब्रांडी की बोतल निकाली और किचन में पहुंचा ।

किचन के सिंक में पिछली रात के जूठे बर्तन अभी भी पड़ थे ।

अभी उसे वे बर्तन भी धोने पड़ने थे - उसने एक वितृष्रणपूर्ण निगाह बर्तनों पर डालते हुए सोचा ।

उसने रैक पर से एक गिलास उठाकर उसमें ब्रांडी डाली, सिंक का नलका खोलकर उसने उसमें पानी मिलाया और फिर उसने एक ही सांस में गिलास खाली कर दिया ।

उसने तुरन्त ब्रांडी का दूसरा पैग तैयार किया ।

उस वक्त उसके जहन में कामिनी के गायब हो जाने वाली बात से भी ज्यादा गम्भीरता से यह बात घूम रही थी कि वह लम्बे बालों वाला आदमी कौन था जो उसकी गैरहाजिरी में चोरों की तरह कामिनी से मिलने आता था ।

तभी उसे याद आया कि आज की गहमा-गहमी में अपना नया चश्मा लाना तो वह भूल ही गया था । और भट्टी की राख से उसके हाथ अभी भी भरे हुए थे और राख उसके कपड़ों पर भी कई जगह दिखाई दे रही थी ।

उसी अपने आप पर गुस्सा आने लगा । फ्लैट पर आकर उसने हाथ भी नहीं धोये थे, लेकिन उसे ड्रिंक करने की पड़ गई थी ।

उसने गिलास खाली करके एक ओर रख दिया । उसने अपना ओवरकोट उतारकर किचन के दरवाजे पर टांग दिया और सिंक में भरे जूठे बर्तनों के ऊपर ही हाथ धोने लगा ।

तभी उसे अपने पीछे से एक आहट सुनाई दी ।

उसने गर्दन घुमाकर पीछे देखा ।

किचन की चौखट पर एक नौजवान लड़की खड़ी थी । उसके हाथ में एक रिवाल्वर थी जिसकी नाल का रुख राज की तरफ था ।

राज धीमे से घूमा । उसने गौर से लड़की की तरफ देख । वह एक बहुत कम उम्र लड़की थी जो एक घिसी हुई जीन हाई नैक का पुलोवर और चमड़े का भारी, लम्बा कोट पहने थी, लेकिन फिर भी सर्दी से ठिठुरती मालूम हो रही थी । उसके होंठ नीले पड़े हुए थे और उसका रिवाल्वर वाला हाथ कांप रहा था ।

“कौन हो तुम ?” - राज बोला ।

“तुम्हारी मौत ।” - लड़की बड़ी दिलेरी से बोली ।

“क्या ? मैंने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा ?”

“तुम्हारी वजह से कुणाल जेल जा रहा है ।”

“ओह !” - राज के नेत्र सिकुड़ गए - “तुम्हारा क्या लगता है वो ?”

“वो मेरा ब्वाय फ्रेंड है और... और...”

“और क्या ?”

“और मेरे होने वाले बच्चे का बाप ।”

“क्या कह रही हो ?” - राज अविश्वासपूर्ण स्वर में बोला - “तुम तो अभी खुद बच्ची हो ।”

“मैं अट्ठारह साल की हूं ।” - वह बोली । उसके स्वर में गर्व का ऐसा पुट था, जैसे अट्ठारह साल का होना बहुत बड़ी उपलब्धि हो ।

“और तुम गर्भवती हो ?”

“हां ।” - और एकाएक वह रोने लगी ।

“रोती क्यों हो ? तुम तो बहादुर लड़की हो । हाथ में रिवाल्वर लेकर यहां मेरी मौत बनकर आई हो ।”

“प्रोफेसर साहब ! अगर कुणाल जेल चला गया तो मेरा क्या होगा ?”

“इस सवाल का जवाब तुम मुझसे चाहती हो ।”

“आप उसे छुड़वाइये ।”

“झूठ बोलकर ?”

“हां ।”

“और अगर मैं तुम्हारी बात नहीं मानूंगा तो तुम मेरा खून कर दोगी ?”

“हां । हां ।”

“मेरा खून कर देने से कुणाल छूट जाएगा ?”

“मेरी समझ में नहीं आ रहा कि मैं क्या करूं ?” - और वह फिर रोने लगी । उसका सामने तना रिवाल्वर वाला हाथ अपने आप नीचे झुक गया ।

राज आगे बढा । उसे अपनी ओर बढता पाकर भी लड़की ने रिवाल्वर दोबारा उसकी ओर नहीं तानी । वह किचन की चौखट के साथ लगी रोती रही । उसकी दोनों कपोलों पर आंसुओं की लम्बी लकीरें खिंचने लगी ।

राज ने रिवाल्वर उसके हाथ से ले ली । लड़की ने कोई एतराज नहीं किया । राज ने रिवाल्वर का चेम्बर खोलकर भीतर झांका ।

भीतर एक भी गोली नहीं थी ।

“यह तो खाली है ।” - वह बोला ।

लड़की कुछ न बोली ।

“तुम खाली रिवाल्वर से मेरा खून करना चाहती थीं ।”

“मुझे नहीं मालूम रिवाल्वर खाली थी । मुझे तो इसे खोलना भी नहीं आता ।”

“लेकिन चलाना आता है ?”

“हां ।”

“कहां से सीखा !”

“फिल्मों में देखा है ।”

उस उत्कंठापूर्ण वातावरण में भी राज की हंसी निकल गई ।

“मैं मुसीबत में हूं न” - वह बोली - “इसलिए आप मुझ पर हंस सकते हैं ।”

“मैं तुम पर नहीं हंस रहा । मैं तुम्हारी नासमझी पर, तुम्हारी नादानी पर हंस रहा हूं । यह रिवाल्वर मिली कहां से तुम्हें ?”

“यह मेरे पापा की है ।”

“तुम्हारे पापा रिवाल्वर रखते हैं ?”

“हां” - उसके स्वर में फिर गर्व का पुट आ गया - “और बन्दूक भी ।”

“कौन है तुम्हारा पापा ?”

“रायबहादुर द्वारकानाथ !”

“तुम रायबहादुर द्वारकानाथ की लड़की हो ?”

“हां ।”’’

“वही रायबहादुर द्वारकानाथ जिनकी समरहिल पर कोठी है ?”

“हां ।”

राज हैरानी से उसका मुंह देखने लगा । वह बहुत बड़े आदमी की बेटी थी ।

“नाम क्या है तुम्हारा ?” - उसने पूछा ।

“रागिनी !”

“रागिनी ! अपने आंसू पोंछ लो ।”

रागिनी ने आंसू पोंछ लिए ।

“तुम वाकई मेरा खून कर देना चाहती थीं ?”

“मैं आपको डराना चाहती थी । मैं चाहती थी कि रिवाल्वर से डरकर आप कुणाल के हक में अपना बयान बदल दें ।”

“ऐसा कहीं होता है ।”

वह खामोश रही ।

“तुम खुद बड़ी विकट स्थिति में हो, रागिनी ! कुणाल को सजा न भी हो तो भी तुम्हारा क्या होगा ?”

“तो हम शादी कर लेंगे ।”
 
“कुणाल तो एक मामूली घर का लड़का है । तुम इतने बड़े बाप की बेटी हो । तुम्हारे पापा इस शादी की इजाजत दे देंगे ?”

“नहीं ।”

“तो ?”

“हम अपने आप शादी कर लेंगे ।”

“तुम्हारे पापा तुम्हें ऐसा नहीं करने देंगे ।”

“हम उनकी पकड़ाई में आयेंगे ही नहीं ।”

“ओह ! यानी कि तुम दोनों का भाग जाने का इरादा है ?”

इस बार वह मुंह से कुछ न बोली । लेकिन उसने धीरे-से सहमति में सर हिलाया ।

“भाग जाने लायक कुछ पैसा-पत्ता पल्ले में है ?”

उसने इन्कार में सिर हिलाया ।

“ओह माई गॉड ।” - एकाएक राज के नेत्र फैल गए - “कहीं इसीलिए तो उसने दिन-दहाड़े दुकानदार का गल्ला लूटने की कोशिश नहीं की थी ?”

“हां ।” - वह कठिन सवर में बोली ।

उस क्षण पहली बार राज को कुणाल से हमदर्दी हुई । बेचारा नादानी में अपनी गर्ल फ्रेंड को गर्भवती बना बैठा था और गर्भपात का आसान तरीका छोड़कर लड़की के साथ भाग जाने का विकट तरीका अपनाने के लिए लूटमार के अपराध पर उतर आया था ।

“यह बात कुणाल ने मजिस्ट्रेट को क्यों नहीं बताई ? पुलिस को क्यों नहीं बताई ?” - राज बोला - “यह बात मालूम होने पर वे लोग हो सकता था कि कुणाल के साथ हमदर्दी से पेश आते । हो सकता था दुकानार ही अपनी शिकायत वापस ले लेता ।”

“कुणाल मेरी वजह से चुप रहा” - रागिनी सिसककर बोली - “उसने अगर यह बात कह दी होती तो मेरे पापा तो मुझे जान से ही मार डालते ।”

“जब तुम्हें अपने पापा से इतना डर लगता है तो तुमसे ऐसा कदम उठाया ही क्यों ?”

“मैं कुणाल से प्यार करती हूं ।”

“यह मेरे सवाल का जवाब नहीं ।”

“मेरे पास यही जवाब है आपके सवाल का । मैं कोई चरित्रहीन लड़की नहीं । जिसके साथ प्यार होता है, उसके साथ सब कुछ होता है ।”

राज खामोश रहा । वह भी एक किताबी फिकरा था जिसका वह लड़की शायद तरीके से मतलब भी नहीं समझती थी ।

फिर उसने जेब से रूमाल निकाल खुद रागिनी के आंसू पोंछे । उसने उसकी बांह थामी और उसे ड्राइंगरूम में ले आया । उसने उसे सोफे पर बिठाया और स्वयं वापस किचन में आ गया । उसने दो कप कॉफी तैयार की और ड्राइंगरूम में पहुंचा । वह रागिनी की बगल में बैठ गया । उसने एक कप रागिनी को थमा दिया ।

तब तक फ्लैट गर्म होने लगा था और रागिनी को भी, लगता था कि ठन्ड से राहत महसूस हो रही थी ।

“तुम कुणाल को कैसे जानती हो?” - राज ने पूछा ।

“मैं भी आपके ही कालेज में पढती हूं । कुणाल सेकेण्ड ईयर में है । मैं फर्स्ट ईयर में हूं ।”

“कुणाल अभी नाबालिग है । अभी पैसा कमाने की सामर्थ्य भी उसमें नहीं । वह पकड़ा न भी जाता तो लूट से जो पैसा उसे हासिल हुआा था, वह कब तक चलता ? वह पैस खतम हो जाने के बाद वह फिर कोई ऐसी ही हरकत करता । इसी चक्कर में मुमकिन है वह किसी को जान से मार डालता या खुद जान से हाथ धो बैठता । दोनों ही तरीकों से तुम दस कमसिनी में विधवा हो गई होती । फिर तुम्हारा क्या होता और तुम्हारे होने वाले बच्चे का क्या होता ?”

वह सिर झुकाए खामोश बैठी रही ।

“रागिनी , जो कुछ तुमने किया, उसके लिए मैं तुम्हें दोष नहीं देता लेकिन हर काम का एक मुनासिब वक्त होता है, एक मुनासिब दस्तूर होता है । तुमने दोनों ही बातों का कोई ख्याल नहीं किया मालूम होता है । मैं प्यार के या प्यार करने वाले के खिलाफ नहीं । खुद मैंने लव मैरिज की है । लेकिन औलाद की ऐसी बचकानी और गैरजिम्मेदाराना हरकतों के मैं सरासर खिलाफ हूं जिनका खमियाजा मां-बाप को भुगतना पड़े । ...देखो, देखो रोना नहीं । रोने से तुम्हारी समस्या का कोई हल नहीं निकलने वाला ।”

“मैं क्या करूं ?” - वह बोली । उसके स्वर में ऐसी फरियाद थी कि खुद राज का दिल भर आया ।

“सबसे पहले तो यह कबूल करो कि तुमने लगती की है ।”

उसने सहमति में सिर हिलाया ।

“फिर सीधे घर जाओ और अपनी मां को सब-कुछ साफ-साफ बात दो ।”

“मैं ऐसा नहीं कर सकती । पापा मुझे शूट कर देंगे ।”

“इस बात में कोई शक नहीं कि रायबहादुर साहब तुमसे बहुत खफा होंगे, लेकिन औलाद पर इतना जुल्म वे हरगिज नहीं ढायेंगे ।”

“मुझे डर लगता है ।”

“जब गुनाह से डर नहीं लगा तो सजा से डर क्यों लगता है ?”

वह खामोश रही ।

“और फिर घर नहीं जाओगी तो कहां जाओगी ?”

“मैं... मैं जान दे दूंगी ।”

“यूं जान देना बुजदिलों का काम है । तुम बहादुर लड़की हो । तुम्हें ऐसा सोचना भी नहीं चाहिए ।”

“लेकिन...”

“चलो, मैं तुम्हें तुम्हारे घर लेकर चलता हूं और रायबहादुर साहब को सब-कुछ समझाता हूं । मैं तुमसे वादा करता हूं कि तुम्हारी खता माफ कराये बिना मैं वहां से नहीं टलूंगा ।”

“आप मेरे लिए ऐसा करेंगे ?”

“क्यों नहीं करूंगा ? मैं एक अध्यापक हूं । अपने विद्यार्थियों का मार्ग-निर्देशन करना मेरा धर्म है ।”

“मैने आपको बहुत गलत समझा, प्रोफसर साहब । मैं आपकी दिल से अहसानमन्द हूं कि आप तब मेरी मदद करने जा रहे हैं जब आप खुद मुश्किल में हैं ।”

“मैं ?”

“जी हां । मुझे मालूम है कि आपकी मिसेज गायब हैं ।”

“तुम्हें कैसे मालूम है ?”

“अखबार में छपा है ।”

“अखबार में छपा है ?” - राज और भी हैरान हुआ - “कौन से अखबार में छपा है ?”

रागिनी ने अपनी जेब से एक तह किया अखबार निकाला । उसने उसे खोलकर राज को थमा दिया ।

राज ने देख कि वह एक शिमले से ही छपने वाला, नाम मात्र का अखबार था जो शाम को ही प्रकाशित होता था । अखबार के एक कोने में उसे यह सुर्खी दिखाई दी - कालेज प्रोफेसर की पत्नी रहस्यपूर्ण ढंग से गायब ।

नीचे बारीक टाइप में छपी खबर को वह चश्मे की गैरमौजूदगी की वजह से बड़ी कठिनाई से पढ पाया । खबर में इस प्रकार का शरारत भरा संकेत भी दिया गया था कि उसकी बीवी उससे असंतुष्ट होकर उसे छोड़कर चली गई थी ।

राज ने गुस्से में अखबार को फिर तह किया और उसे रागिनी को वापस लौटा दिया ।

“प्रोफेसर साहब !” - रागिनी बोली - “कोई औरत कैसे आप जैसे आदमी से यूं पल्ला झाड़ सकती है ।”

“उसने मुझसे पल्ला नहीं झाड़ा है ।” - राज शुष्क स्वर में बोला - “उसके गायब हो जाने के पीछे जरूर कोई और वजह है ।”

“आई एम सॉरी !” - वह खेदपूर्ण स्वर में बोली ।

राज ने कॉफी खत्म की और उठकर अपना ओवरकोट फिर पहन लिया । उसके संकेत पर रागिनी तुरन्त उसके साथ हो ली ।

कार पर सवार होकर वे समर हिल की ओर रवाना हो गए ।
 
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