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Adultery ' गाँव का टेलर '

होली का रंग

फाल्गुन का महीना था। राजस्थान की गर्म हवाओं में अब टेसू के फूलों की महक और होली की मस्ती घुल चुकी थी। अज़ानगढ़ की विला में होली का त्यौहार हमेशा से ही शान-ओ-शौकत के लिए जाना जाता था, लेकिन इस बार... इस बार विला की दीवारों के भीतर एक अलग ही आग सुलग रही थी।

सुबह के 10 बज रहे थे। विला के बड़े आंगन में ढोल-नगाड़े बज रहे थे। गांव के लोग, आसामी और नौकर-चाकर ठाकुरों को बधाई देने आ रहे थे। हवा में लाल, हरा और गुलाबी गुलाल उड़ रहा था, जिससे पूरा माहौल धुंधला और नशीला हो गया था।

कामिनी अपने कमरे में तैयार हो रही थी। आज होली थी, इसलिए रिवाज के मुताबिक उसे सफेद कपड़े पहनने थे। उसने अपनी अलमारी से सबसे बारीक, मलमल की सफेद साड़ी निकाली। यह साड़ी इतनी झीनी थी कि हवा के झोंके से भी उड़ जाती थी। उसने नीचे जो ब्लाउज पहना, वह भी सफेद था, बिना अस्तर का। उसे पता था कि जब यह भीगेगा, तो यह उसके शरीर पर होने या न होने के बराबर होगा।

उसने अपने पूरे बदन पर—गर्दन, बांहों, कमर और जांघों पर—खूब सारा नारियल का तेल लगाया। कहने को तो यह रंग छुड़ाने के लिए था, लेकिन हकीकत में यह उसे और भी चिकना और फिसलन भरा बनाने के लिए था।

प्रताप सुबह से ही अपने दोस्तों के साथ भांग की ठंडाई पीने में व्यस्त था। वह आंगन के एक कोने में एक चारपाई पर पड़ा था, नशे में धुत, अपनी ही दुनिया में मस्त। उसे खबर भी नहीं थी कि उसकी पत्नी के साथ आज क्या होने वाला है।

कामिनी ने आईने में खुद को देखा। उसकी आंखों में डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी उत्सुकता थी। आज उसे राज और रमन... दोनों का सामना करना था। एक साथ।

वह नीचे उतरी। आंगन में रंगों का कोहराम मचा था।

राज सिंह विला के चबूतरे पर एक बड़े सिंहासन जैसी कुर्सी पर बैठे थे। उन्होंने सफेद कुर्ता-पायजामा पहना था, जो अब रंगों से सराबोर हो चुका था। उनकी आंखें लाल थीं—शायद भांग की वजह से, या शायद कामिनी के इंतज़ार में। वे एक शेर की तरह भीड़ को देख रहे थे।

उनके ठीक पीछे, एक वफादार और खूंखार साये की तरह रमन खड़ा था। रमन ने आज कोई वर्दी नहीं पहनी थी। वह सिर्फ एक सफेद धोती और एक तंग बनियान में था। उसका गठीला, काला और पसीने से भीगा शरीर तेल में चमक रहा था। उसकी मज़बूत बांहों पर हरा और लाल रंग लगा था। वह किसी रक्षक से ज्यादा किसी शिकारी जैसा लग रहा था।

जैसे ही कामिनी आंगन में आई, सबकी नज़रें उस पर टिक गईं। सफेद साड़ी में, खुले बालों के साथ वह किसी अप्सरा जैसी लग रही थी।

राज की नज़रें उस पर जम गईं। उन्होंने अपनी मूंछों पर हाथ फेरा। रमन ने अपनी जीभ से होठों को गीला किया।

राज उठे। वे भीड़ को चीरते हुए धीरे-धीरे कामिनी की तरफ बढ़े। उनके हाथ में लाल गुलाल की थाली थी। पूरा आंगन शांत हो गया। बड़े ठाकुर अपनी बहू को रंगने जा रहे थे।

"होली मुबारक हो, बहू," राज ने सबकी मौजूदगी में अपनी भारी आवाज़ में कहा।

"मुबारक हो बाबूजी," कामिनी ने झुककर उनके पैर छुए।

राज ने एक चुटकी गहरा लाल गुलाल लिया। उन्होंने उसे कामिनी के गालों पर नहीं लगाया। उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया और अपनी गुलाल से सनी उंगलियां कामिनी की गोरी गर्दन पर, ठीक वहां फेरीं जहाँ उन्होंने उसे काटा था। उनका अंगूठा उसकी कॉलर बोन पर रगड़ खाया।

"आज का दिन खास है कामिनी," राज ने बहुत धीरे से कहा, ताकि सिर्फ वही सुन सके। "आज सारे भेद मिट जाएंगे। आज विला के दरवाजे बंद होंगे और मर्यादा के कपड़े उतरेंगे।"

कामिनी कांप गई। राज का स्पर्श उसके पूरे बदन में बिजली दौड़ा गया।

तभी रमन आगे आया। उसके हाथ में एक बड़ी स्टील की बाल्टी थी—जिसमें केसरिया रंग का पानी भरा था।

"मालिक," रमन ने राज से अनुमति मांगी, लेकिन उसकी आंखों में कामिनी के लिए भूख थी। "छोटी मालकिन को रंगना है। शगुन का पानी।"

राज ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। "नेकी और पूछ-पूछ? नहला दे इसे।"

रमन ने एक शैतानी मुस्कान के साथ बाल्टी उठाई और बिना किसी चेतावनी के पूरा पानी कामिनी के ऊपर उंडेल दिया।

"छपाक!"

पानी की एक तेज़ धार कामिनी के सिर से लेकर पांव तक गिर गई। ठंडा पानी और रंग उसके बदन पर चिपक गया।

और जैसा कि तय था, वह सफेद मलमल की साड़ी उसके शरीर से दूसरी त्वचा की तरह चिपक गई।

नज़ारा देखने लायक था। साड़ी इतनी पारदर्शी हो गई कि कामिनी के भारी स्तनों का उभार, उसके गहरे भूरे रंग के बड़े निप्पल, उसकी नाभि का गड्ढा और उसकी जांघों का आकार... सब कुछ दुनिया के सामने नंगा हो गया। उसके गीले बाल उसकी पीठ पर चिपक गए। पानी की बूंदें उसके स्तनों से टपक रही थीं।

भीड़ में सन्नाटा छा गया। लोग अपनी बहू-बेटियों की इज़्ज़त बचाने के लिए नज़रें झुका लेते हैं, लेकिन यहाँ हर मर्द की नज़र कामिनी के भीगे बदन पर थी।

कोने में पड़ा प्रताप नशे में ताली बजा रहा था। "वाह! मेरी बीवी तो फिल्म की हीरोइन लग रही है! क्या फिगर है!"

लेकिन राज और रमन की आंखों में वासना का नंगा नाच था। राज ने कामिनी के भीगे हुए स्तनों को घूरा। उन्होंने मुनीम जी को इशारा किया।

"उत्सव खत्म," राज ने कड़क आवाज़ में आदेश दिया। "बाहर वालों को विदा करो। विला के दरवाजे बंद करो। अब हम आराम करेंगे।"

दोपहर के 2 बज चुके थे। बाहरी मेहमान जा चुके थे। प्रताप को नौकरों ने टांगकर उसके कमरे में फेंक दिया था, जहाँ वह बेहोश हो गया। विला के मुख्य द्वार बंद हो चुके थे। नौकर अपने क्वार्टर में चले गए थे।

विला के अंदर एक भारी सन्नाटा था।

राज ने कामिनी को संदेश भिजवाया नहीं, बल्कि खुद उसका हाथ पकड़कर उसे सीढ़ियों की तरफ ले गए। रमन उनके पीछे-पीछे चल रहा था, जैसे कोई वफादार कुत्ता अपने हिस्से के मांस का इंतज़ार कर रहा हो।

कामिनी, जो अभी भी भीगी हुई साड़ी में थी और ठंड से कांप रही थी, राज के कमरे में लाई गई।

कमरे में एसी चल रहा था, जिससे ठंड और बढ़ गई। कामिनी के निप्पल ठंड से पत्थर जैसे सख्त हो गए थे और ब्लाउज के गीले कपड़े को चीर रहे थे।

कमरे के बीच में एक मेज पर चांदी के बड़े-बड़े गिलास रखे थे। यह खास 'शाही ठंडाई' थी, जिसमें बादाम, केसर, गुलाब की पत्तियां और बहुत सारी, बहुत सारी भांग मिली हुई थी।

"दरवाजा बंद करो रमन," राज ने कहा। उन्होंने अपना भीगा हुआ, रंगीन कुर्ता उतार फेंका था। वे सिर्फ गीली धोती में थे, जिसके नीचे उनका पौरुष साफ दिख रहा था।

रमन ने दरवाजा बंद किया और भारी लोहे की सिटकनी लगा दी। उसने भी अपनी बनियान उतार दी। उसका काला, गठीला बदन अब आज़ाद था।

"पी लो," राज ने ठंडाई का एक बड़ा गिलास कामिनी के होंठों से लगा दिया। "यह तुम्हें गर्म कर देगा। और तुम्हारे दिमाग के ताले खोल देगा।"

कामिनी ने एक घूंट पिया। स्वाद मीठा, गाढ़ा और नशीला था। राज ने उसे पूरा गिलास एक सांस में पिलवा दिया।

"गुड गर्ल," राज ने उसके भीगे बालों को पीछे किया।
 
15 मिनट के अंदर, भांग ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। कामिनी का सिर घूमने लगा। उसे लगा जैसे ज़मीन हिल रही है। उसका डर गायब हो गया और एक अजीब सी, भारी बेफिक्री छा गई। उसे राज और रमन... दोनों बहुत आकर्षक, बहुत शक्तिशाली लगने लगे। उसे लगा जैसे वह दुनिया की रानी है और ये दो मर्द उसकी सेवा के लिए हैं।

"गीले कपड़े अच्छे नहीं लगते," रमन ने पीछे से कहा। उसकी आवाज़ गूंज रही थी।

रमन ने कामिनी के कंधे पर हाथ रखा और उसकी साड़ी का पल्लू खींच दिया। गीला कपड़ा फर्श पर 'छप' से गिर गया।

कामिनी का भीगा हुआ, पारदर्शी ब्लाउज और उसमें कैद उसके स्तन राज के सामने थे। ब्रा की काली पट्टियां सफेद ब्लाउज के नीचे साफ दिख रही थीं।

"इसे आजाद करो," राज ने आदेश दिया। वे अपनी कुर्सी पर बैठ गए, नज़ारा देखने के लिए।

रमन ने कामिनी की पीठ पर ब्लाउज की डोरी खोल दी। उसके मोटे उंगलियों ने कामिनी की गीली पीठ को छुआ। ब्लाउज ढीला हो गया। रमन ने उसे कंधों से नीचे उतार दिया।

कामिनी ने अपने हाथों से अपनी छाती नहीं ढकी। भांग के नशे ने उसे बेशर्म बना दिया था। वह खड़ी रही, अपने स्तनों को राज की नज़रों के सामने पेश करते हुए। वे ठंड से अकड़े हुए थे और ऊपर की तरफ तने हुए थे।

"आह..." राज ने एक गहरी सांस ली। "होली के असली रंग तो अब दिख रहे हैं। दूधिया सफेद और गुलाबी।"

राज पास आए। उन्होंने अपने अंगूठे से कामिनी के एक निप्पल पर लगा लाल रंग पोंछा। रगड़ से कामिनी के मुंह से एक आह निकल गई।

"रमन," राज ने कहा। "नीचे का इंतजाम देख। इसे पूरा नंगा कर।"

रमन कामिनी के सामने घुटनों के बल बैठ गया। कामिनी ने नीचे देखा। रमन का सिर उसकी पेट के पास था। रमन ने कामिनी की भीगी साड़ी की प्लीट्स पकड़ीं और उन्हें एक-एक करके खोलना शुरू किया। साड़ी का घेरा खुलता गया।

साड़ी उतर गई। पेटीकोट की डोरी रमन ने अपने दांतों से खोल दी। गीला पेटीकोट नीचे गिर गया।

कामिनी पूरी तरह नंगी थी। उसके गोरे शरीर पर जगह-जगह गुलाल के धब्बे थे—लाल, हरा, गुलाबी। वह किसी कैनवास जैसी लग रही थी जिस पर कामुकता की पेंटिंग बनी हो। उसकी योनि पर भी रंग का पानी टपका था।

"खूबसूरत," रमन ने उसकी जांघों को सूंघते हुए कहा। "मालिक, यह तो देवी है। इसके पैरों में गिर जाने का मन कर रहा है।"

"तो गिर जा," राज ने कहा। "और हम इसके पुजारी हैं। आज इसकी पूजा होगी। इसे बिस्तर पर ले चलो।"

रमन ने कामिनी को अपनी गोद में उठाया और उसे विशाल बिस्तर पर लिटा दिया। मखमली चादर कामिनी की नंगी पीठ को गुदगुदा रही थी। वह नशे में थी, हंसी जा रही थी। उसे लग रहा था कि वह बादलों में तैर रही है।

"मुझे प्यार करो..." कामिनी बड़बड़ाई, अपनी टांगें फैलाते हुए। "दोनों... मुझे दोनों चाहिए... मुझे खालीपन अच्छा नहीं लग रहा..."

"मिलेगा," राज ने अपनी धोती खोल दी। उनका विशाल लिंग बाहर आया, भांग और हवस के नशे में वह और भी बड़ा लग रहा था।

"सब मिलेगा। इतना मिलेगा कि तू संभाल नहीं पाएगी।"

राज बिस्तर पर चढ़े और कामिनी के सिरहाने बैठ गए। रमन बिस्तर के निचले हिस्से में था, कामिनी के पैरों के पास। रमन ने भी अपने कपड़े उतार दिए थे।

"रमन, शुरुआत तू कर," राज ने कहा। "इसकी प्यास बुझा। इसे चाट।"

रमन ने कामिनी की टांगें अपने कंधों पर रख लीं। उसकी योनि का नज़ारा देखकर वह पागल हो गया। वह गुलाबी, गीली और खुली हुई थी। रमन ने अपना चेहरा वहां गड़ा दिया।

"स्लप... स्लप..."

रमन ने एक जानवर की तरह उसे चाटना शुरू किया। उसकी जीभ कामिनी के अंदर-बाहर हो रही थी।

"आह! रमन! गुदगुदी हो रही है! उफ्फ!" कामिनी ने बिस्तर की चादर पकड़ ली। उसकी कमर हवा में उठने लगी।

राज ने ऊपर से कामिनी का चेहरा पकड़ा। "मेरी तरफ देख। नीचे क्या देख रही है?"

राज ने अपना लिंग कामिनी के चेहरे के सामने झुलाया। "इसे देख। यह भी प्यासा है।"

"मुंह खोल," राज ने कहा।

कामिनी ने सम्मोहित होकर अपना मुंह खोला। राज ने अपना लिंग उसके मुंह में डाल दिया।

अब कामिनी 'लॉक' हो चुकी थी। एक मानव सैंडविच। नीचे रमन उसकी योनि को अपनी जीभ और उंगलियों से बजा रहा था, और ऊपर राज उसके मुंह को चोद रहे थे।

यह एक 'लव ट्रायंगल' था। कामिनी बीच में थी, और दो मर्द उसे दोनों सिरों से खा रहे थे।

कामिनी का दिमाग सुन्न हो गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि मज़ा कहाँ ज्यादा आ रहा है। रमन की खुरदरी जीभ उसके 'दाने' पर जादू कर रही थी, उसे किनारों तक ले जा रही थी, और राज का मोटा, नसों वाला लिंग उसके गले को भर रहा था, उसे सांस लेने की जगह नहीं दे रहा था।

"हम्म... मम्म... गप... गप..." कामिनी की आवाज़ें राज के मांस में दब गईं। उसकी आंखों से पानी बह रहा था, लेकिन यह खुशी का पानी था।

रमन ने अपनी दो उंगलियां कामिनी के अंदर डाल दीं। वह उन्हें तेज़ रफ़्तार से अंदर-बाहर कर रहा था, जबकि उसकी जीभ बाहर काम कर रही थी।
 
"गीली हो गई मालिक," रमन ने अपना मुंह हटाकर चिल्लाया, उसका चेहरा कामिनी के रस से भीगा था। "पूरा रस निकल रहा है। बाढ़ आ गई है।"

"तो इंतज़ार मत कर," राज ने अपना लिंग कामिनी के मुंह से बाहर निकाला। एक 'पॉप' की आवाज़ आई। "चढ़ जा उस पर। अपना लंड डाल दे। इसे भर दे।"

रमन ऊपर चढ़ा। वह कामिनी की टांगों के बीच आया। उसका काला लिंग तैयार था। उसने कामिनी की कमर पकड़ी।

उसने एक ही धक्के में खुद को कामिनी के अंदर उतार दिया।

"आह्ह्ह!" कामिनी चिल्लाई। "रमन! बहुत मोटा है! धीरे!"

रमन ने उसे पेलना शुरू किया। वह जंगली था। वह कामिनी के स्तनों को बुरी तरह मसल रहा था, उन्हें खींच रहा था और उसे जोर-जोर से ठोक रहा था। बिस्तर की कमानी चरमरा रही थी।

राज देख रहे थे। उनकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी। अपनी औरत को किसी और के नीचे, अपने नौकर के नीचे तड़पते देखना उन्हें सबसे ज्यादा उत्तेजित करता था। यह उनकी शक्ति का प्रदर्शन था।

"राज..." कामिनी ने हाथ बढ़ाकर राज को बुलाया, जबकि रमन उसे नीचे से झकझोर रहा था। "आप भी... मुझे आप चाहिए... मुझे मत छोड़िए..."

राज ने रमन को इशारा किया। "रुक जा। बाहर मत निकलना। बस रुक जा। अंदर ही रह।"

रमन रुक गया, लेकिन वह अभी भी कामिनी के अंदर था, धड़क रहा था।

राज बिस्तर पर आए। वे कामिनी के चेहरे के ऊपर आ गए, उसके सीने पर घुटने टेककर

"तुझे दोनों चाहिए ना?" राज ने पूछा। "ले। दोनों ले।"

राज ने अपना लिंग दोबारा कामिनी के मुंह में डाल दिया।

अब असली खेल शुरू हुआ। रमन नीचे से धक्के मार रहा था, और राज ऊपर से। कामिनी का शरीर एक साथ दो दिशाओं में हिल रहा था। वह बीच में पिस रही थी।

"गप... गप... गप..." मुंह की आवाज़।

"पच... पच... पच..." नीचे की आवाज़।

कामिनी की आंखों से आंसू बह रहे थे, भांग और हवस के मिश्रण के आंसू। वह दो ताकतवर मर्दों के बीच थी। उसकी छाती पर रमन के हाथ थे जो उसके स्तनों को निचोड़ रहे थे, और उसके बालों में राज की उंगलियां थीं जो उसके सिर को आगे-पीछे कर रही थीं।

काफी देर तक यह चलने के बाद, राज ने अपना लिंग कामिनी के मुंह से निकाला। वे हांफ रहे थे।

"रमन," राज ने कहा। "उसे पलट दे। घोड़ी बना। मुझे इसका पिछवाड़ा देखना है।"

रमन ने कामिनी को पलटा दिया। कामिनी अब घुटनों और कोहनियों के बल थी। उसका नंगा, गोरा और भरा हुआ नितंब हवा में उठा हुआ था, हिल रहा था।

रमन उसके पीछे गया और फिर से अपनी जगह बना ली। वह पीछे से उसे पेलने लगा। "थप-थप" की आवाज़ आने लगी जब रमन का पेट कामिनी के नितंबों से टकरा रहा था।

राज बिस्तर से नीचे उतरे और कामिनी के चेहरे के सामने खड़े हो गए।

"इसे चूस," राज ने अपना लिंग कामिनी के लटकते हुए चेहरे के पास कर दिया।

अब कामिनी एक चौपाया जानवर की तरह थी। पीछे से रमन उसे रगड़ रहा था, उसका उपयोग कर रहा था, और आगे से वह राज की सेवा कर रही थी, उनका लिंग चूस रही थी।

"आह! मालिक! यह तो टूट जाएगी!" रमन ने उत्तेजना में कामिनी के नितंब पर एक जोरदार थप्पड़ मारा। लाल निशान पड़ गया।

"कितना माल है इसमें!"

"नहीं टूटेगी," राज ने कामिनी के बालों को खींचा। "विला की औरतें मज़बूत होती हैं। क्यों कामिनी? मज़ा आ रहा है?"

"हम्म... हूँ..." कामिनी का मुंह भरा हुआ था। वह सिर्फ कराह सकती थी।

अचानक, राज के दिमाग में एक और खयाल आया। एक शैतानी खयाल।

"रमन, निकाल," राज ने कहा।

रमन बाहर निकला। कामिनी हांफते हुए बिस्तर पर गिर गई।

"कामिनी, पीठ के बल लेट जा," राज ने आदेश दिया।

कामिनी लेट गई। वह पूरी तरह बिखर चुकी थी। उसका पूरा शरीर पसीने, लार और रंगों से सना था।

राज और रमन दोनों उसके पैरों के पास खड़े हो गए। दो विशाल मर्द। दो खड़े हुए हथियार।

"हम दोनों एक साथ जाएंगे," राज ने कहा। "मैं और रमन।"

कामिनी की आंखें फैल गईं। वह होश में आ गई। "नहीं... बाबूजी... फट जाएगा... जगह नहीं है... प्लीज..."

"कोशिश करेंगे," राज ने कहा। "रमन, तू पीछे के रास्ते पर तेल लगा। बहुत सारा तेल।"

रमन ने तेल लिया और कामिनी के नितंब के छेद पर मला। कामिनी कांप रही थी।

"मैं आगे से जाऊंगा," राज ने कहा। "तू पीछे से कोशिश कर। धीरे-धीरे।"

राज ने कामिनी की एक टांग अपने कंधे पर रखी और अपनी जगह बना ली। रमन ने दूसरी तरफ से कामिनी को पकड़ा और अपने लिंग को पीछे वाले रास्ते पर सेट किया।

राज अंदर गए। कामिनी ने राहत की सांस ली। "आह..."

फिर रमन ने धक्का दिया।

"आह्ह्ह्ह्ह! नहीं! नहीं!" कामिनी चीख पड़ी। दर्द असहनीय था। "रमन... मर गई... निकालो

..."
 
रमन का लिंग बहुत मोटा था। वह अंदर नहीं जा पा रहा था। कामिनी रोने लगी।

"रुक जा," राज ने कहा। उन्हें अपनी बहू की तकलीफ देखी नहीं गई (या शायद उन्हें लगा कि वह सचमुच फट जाएगी)। "जबरदस्ती नहीं। आज नहीं। इसे बाद के लिए रखते हैं।"

उन्होंने प्लान बदला।

"रमन, तू लेट जा," राज ने कहा। "बिस्तर पर।"

रमन बिस्तर पर लेट गया।

"कामिनी, इसके ऊपर बैठ जा," राज ने कहा।

कामिनी रमन के लिंग पर बैठ गई। रमन का लिंग उसके अंदर था।

"अब पीछे झुक," राज ने कहा। "मेरी तरफ।"

कामिनी पीछे झुकी। रमन ने उसे संभाल लिया, उसकी कमर पकड़ ली। अब कामिनी का चेहरा और छाती ऊपर की तरफ थी, राज की तरफ।

राज ने बिस्तर पर चढ़कर कामिनी के चेहरे के पास पोज़िशन ली।

"अब हम इसे 'नहलाएंगे'," राज ने कहा। "रमन, तैयार है? मैं छूटने वाला हूँ।"

"जी मालिक... मैं भी फटने वाला हूँ," रमन ने नीचे से कामिनी के नितंबों को भींचते हुए कहा। "यह बहुत टाइट है।"

राज ने अपने लिंग को कामिनी के चेहरे, आंखों और होंठों पर रगड़ना शुरू किया, जबकि रमन नीचे से तेज़, छोटे धक्के मार रहा था।

"कामिनी... खोल अपनी ज़ुबान!" राज चिल्लाए। "प्रसाद ले!"

कामिनी ने अपनी जीभ बाहर निकाली। वह इंतज़ार कर रही थी।

"मैं आ रहा हूँ!" रमन नीचे से चिल्लाया। उसने अपनी कमर को हवा में उठा दिया, कामिनी को भी साथ उठाते हुए।

रमन ने अपना सारा, ढेर सारा वीर्य कामिनी की योनि के अंदर, बहुत गहराई में, बच्चेदानी के मुंह पर छोड़ दिया। कामिनी को लगा जैसे उसके अंदर गर्म पानी का गुब्बारा फूट गया हो। वह भर गई।

उसी वक्त, ठीक उसी पल, राज ने कामिनी के चेहरे पर अपना वीर्य छोड़ना शुरू किया। उनकी गर्म, गाढ़ी धार कामिनी की आंखों, गालों, नाक और होंठों पर गिरी। कामिनी ने अपनी जीभ से उसे चाटने की कोशिश की, उसे पीने की कोशिश की।

वह पूरी तरह सन गई थी। नीचे से भरी हुई, ऊपर से ढकी हुई। वीर्य, पसीना और रंग... सब एक हो गया था।

तीनों एक साथ ढेर हो गए। रमन नीचे, कामिनी उसके ऊपर, और राज बगल में।

कमरे में सिर्फ भारी सांसों, एसी की हमिंग और धड़कनों की आवाज़ थी।

काफी देर तक वे वैसे ही पड़े रहे। भांग का नशा अब उतर रहा था, लेकिन हकीकत का नशा और गहरा हो गया था। कामिनी के ऊपर और अंदर, दोनों जगह उसके 'मालिकों' का निशान था।

राज उठे। उन्होंने एक गीला तौलिया लिया और कामिनी का चेहरा पोंछा। बहुत प्यार से।

"खुश है?" राज ने पूछा।

कामिनी ने अपनी आंखें खोलीं। वह थकी हुई थी, उसका शरीर टूट रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। एक औरत की शांति।

"जी..." उसने फुसफुसाया।

"आज होली पूरी हुई," राज ने कहा। "रमन, जा। अपने कपड़े पहन। और सुन... यह बात इसी कमरे में रहनी चाहिए। बाहर तू सिर्फ नौकर है।"

"मालिक, मेरी जुबान कटी समझो," रमन ने उठते हुए कहा। उसने अपना लंगोट उठाया। उसने जाते-जाते कामिनी को एक आखिरी, कामुक नज़र से देखा, जो अभी भी नंगी पड़ी थी। उसकी आंखों में एक चमक थी—उसने अपनी मालकिन को गर्व कर दिया था। वह बाथरूम में चला गया।

राज ने कामिनी को अपनी बांहों में ले लिया।

"आज जो हुआ," राज ने उसके पेट पर, उसकी नाभि पर अपना बड़ा हाथ फेरते हुए कहा, "उसका नतीजा बहुत जल्द मिलेगा। मुझे यकीन है। रमन और मैंने मिलकर तुझे जो दिया है, वो खाली नहीं जाएगा।"

"नतीजा?" कामिनी ने पूछा, उनकी छाती पर सिर रखकर।

"हाँ," राज ने मुस्कुराते हुए कहा। "वारिस। इस विला का चिराग। जो प्रताप नहीं दे सका, वो आज हमने तुझे दे दिया है। अब तेरे अंदर हमारा अंश है। एक असली ठाकुर का खून।"

कामिनी ने अपने पेट पर राज का हाथ दबाया। उसे वहां एक नई गर्मी महसूस हुई। उसे लगा कि वह अब खाली नहीं है। वह पूरी हो गई है।

"अब सो जा," राज ने उसे माथे पर चूमा। "कल से तू सिर्फ मेरी नहीं, हम सबकी रानी है। इस विला की असली रानी।"

उस रात, जब पूरी दुनिया रंगों से खेलकर थक चुकी थी, विला के उस बंद कमरे में तीन जिस्मों ने मिलकर एक नए रिश्ते, एक नए राज़ और शायद... एक नए जीवन की शुरुआत कर दी थी।

दिनी अब जानती थी कि उसकी ज़िंदगी अब कभी भी साधारण नहीं होगी। वह एक पत्नी से ज्यादा, एक प्रेमिका से ज्यादा, एक 'साझा देवी' बन चुकी थी। और उसे यह रूप... सबसे ज्यादा पसंद था।

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होली की उस रंगीन और वहशी रात को बीते दो महीने हो चुके थे। अज़ानगढ़ की गर्मी अब अपने चरम पर थी। लू के थपेड़े विला की दीवारों से टकरा रहे थे, लेकिन विला के अंदर का माहौल कुछ और ही कहानी कह रहा था।

कामिनी की दिनचर्या अब बदल चुकी थी। वह अब सिर्फ घर के काम करने वाली बहू नहीं थी। वह अब 'खास' थी। राज ने उसे भारी काम करने से मना कर दिया था। रमन हमेशा उसके आसपास साये की तरह मंडराता रहता था, उसकी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ख्याल रखता था। और रातें... रातें तो अब एक नियमित उत्सव बन गई थीं। कभी राज के कमरे में, कभी छत पर रमन के साथ, तो कभी तीनों एक साथ।

लेकिन पिछले कुछ दिनों से कामिनी को अजीब महसूस हो रहा था। सुबह उठते ही उसे चक्कर आते थे। खाने की खुशबू से उसका जी मचलाता था। उसके स्तन पहले से ज्यादा भारी और संवेदनशील हो गए थे।

सुबह के 9 बज रहे थे। कामिनी रसोई में सबके लिए चाय बना रही थी। अचानक उसे तेल की गंध से उबकाई आई। वह मुंह पर पल्लू रखकर वॉशबेसिन की तरफ भागी और उल्टियां करने लगी।

विला में हड़कंप मच गया। सास दौड़ी आईं।

"क्या हुआ बहू? तबीयत खराब है?"

राज, जो आंगन में बैठे हुक्का पी रहे थे, तुरंत खड़े हो गए। उनकी आंखों में चिंता नहीं, बल्कि एक उम्मीद की चमक थी। रमन, जो गाड़ी साफ कर रहा था, उसने भी कपड़ा छोड़ दिया और रसोई के दरवाजे पर आ खड़ा हुआ।

"वैद्य जी को बुलाओ!" राज ने अपनी भारी आवाज़ में आदेश दिया। "अभी। रमन, गाड़ी निकाल।"

रमन बिजली की फुर्ती से गया और गांव के पुराने वैद्य जी को ले आया।

वैद्य जी ने कामिनी की नब्ज टटोली। उन्होंने कुछ सवाल पूछे। और फिर मुस्कुराते हुए बाहर आए जहाँ सब इंतज़ार कर रहे थे।

"बधाई हो बड़े ठाकुर," वैद्य जी ने हाथ जोड़कर कहा। "विला में किलकारियां गूंजने वाली हैं। बहू रानी माँ बनने वाली हैं।"

यह सुनते ही सास खुशी से रो पड़ीं। ससुर जी ने अपनी मूंछें ऐंठीं। और प्रताप... प्रताप तो जैसे पागल हो गया।

"मैं बाप बनने वाला हूँ?" प्रताप चिल्लाया। "मैं बाप बनने वाला हूँ! देखा? सब कहते थे कि मैं कुछ नहीं कर सकता, लेकिन मैंने कर दिखाया!"

प्रताप खुशी से नाच रहा था। उसे अपनी नामर्दी याद नहीं थी, या शायद वह नशे में इतना रहता था कि उसे लगता था कि किसी रात उसने चमत्कार कर दिया होगा।

लेकिन असली जश्न तो दो और चेहरों पर था।

राज ने अपनी मूंछों पर ताव दिया। उनका सीना गर्व से फूल गया। उन्होंने रमन की तरफ देखा। रमन दरवाजे के पास खड़ा था, सिर झुकाए, लेकिन उसके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी।

दोनों जानते थे कि यह 'चमत्कार' प्रताप का नहीं है। यह उस होली की रात का नतीजा है। यह उन दोनों के पसीने और मेहनत का फल है।

"मिठाई बांटो!" राज ने आदेश दिया। "पूरे गांव में। आज विला का वारिस आने की खबर मिली है।"

दिन भर बधाई देने वालों का तांता लगा रहा। कामिनी को उसके कमरे में आराम करने के लिए कहा गया। प्रताप दिन भर अपनी 'मर्दानगी' के किस्से दोस्तों को सुनाता रहा और शाम होते-होते फिर से शराब के नशे में धुत होकर लुढ़क गया।

रात के 11 बजे। विला शांत हो गई।

कामिनी अपने बिस्तर पर लेटी थी। वह अपने पेट पर हाथ फेर रही थी। उसे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि उसके अंदर एक जान पल रही है। किसका बच्चा है यह? राज का? या रमन का? उसे पता नहीं था, और सच तो यह था कि उसे फर्क भी नहीं पड़ता था। यह बच्चा उन 'मर्दों' का था जिन्होंने उसे औरत बनाया था।

तभी, उसके कमरे का दरवाजा धीरे से खुला।

कामिनी चौंक गई। प्रताप तो सो रहा था।

दरवाजे पर राज खड़े थे। और उनके पीछे रमन।

"बाबूजी..." कामिनी उठने लगी।

"लेटी रहो," राज ने अंदर आते हुए कहा। उन्होंने दरवाजा बंद किया और कुंडी लगा दी।

वे दोनों बिस्तर के पास आए। उनकी आंखों में आज हवस नहीं, बल्कि एक अजीब सी श्रद्धा और अधिकार था।

"विला सो गई?" कामिनी ने पूछा।

"विला सो गई, लेकिन विला के मालिक जाग रहे हैं," राज ने बिस्तर के किनारे बैठते हुए कहा।

रमन दूसरी तरफ, फर्श पर घुटनों के बल बैठ गया। उसका चेहरा कामिनी के बराबर था।

"आज हमें अपनी फसल देखनी है," राज ने कहा। "आज हम उस ज़मीन की पूजा करेंगे जहाँ हमारा बीज पनप रहा है।"
 
राज ने कामिनी की साड़ी को धीरे से हटाया। उन्होंने उसका ब्लाउज ऊपर किया और पेटीकोट की डोरी ढीली कर दी। कामिनी ने कोई विरोध नहीं किया।

उसका पेट नंगा हो गया। गोरा, सपाट और मुलायम पेट।

राज ने अपना बड़ा, खुरदरा हाथ उसके पेट पर रखा। उनकी हथेली की गर्मी कामिनी के अंदर तक उतर गई।

"यहाँ..." राज ने फुसफुसाया। "यहाँ मेरा खून पल रहा है।"

"और मेरा पसीना मालिक," रमन ने भी अपना काला, मज़बूत हाथ कामिनी के पेट पर रख दिया।

अब कामिनी के पेट पर दो हाथ थे। एक मालिक का, एक नौकर का।

"महसूस हो रहा है कामिनी?" राज ने उसकी आंखों में देखा।

"जी..." कामिनी की आंखों में आंसू आ गए। खुशी के आंसू। "मुझे लगा था मैं बांझ रह जाऊंगी। प्रताप..."

"प्रताप का नाम मत ले," राज ने सख्त आवाज़ में कहा। "यह बच्चा उसका नहीं है। यह 'सिंघानिया' खून है, लेकिन इसमें रमन की ताकत भी मिली हुई है। यह शेर पैदा होगा।"

रमन ने झुककर कामिनी के पेट को चूम लिया। उसने अपनी जीभ से उसकी नाभि को चाटा।

"मेरी रानी..." रमन ने कहा। "आपने मुझे दुनिया की सबसे बड़ी खुशी दी है।"

"आज कोई ज़बरदस्ती नहीं होगी," राज ने कहा। "आज सिर्फ प्यार होगा। बहुत धीमा और गहरा प्यार।"

उन्होंने कामिनी के कपड़े पूरी तरह उतार दिए। गर्भवती होने की वजह से कामिनी का शरीर और भी ज्यादा भरा हुआ और कामुक लग रहा था। उसके स्तन सूजकर बड़े हो गए थे और निप्पल गहरे काले हो गए थे।

"देख रमन," राज ने कामिनी के स्तनों की तरफ इशारा किया। "दूध उतरने लगा है। तैयारी हो रही है।"

राज झुके और उन्होंने कामिनी के एक स्तन को अपने मुंह में ले लिया। लेकिन इस बार उन्होंने उसे काटा नहीं। उन्होंने उसे बहुत प्यार से, बहुत कोमलता से चूसा।

"आह..." कामिनी ने उनकी गर्दन को पकड़ लिया। यह स्पर्श बहुत सुकून देने वाला था।

रमन ने कामिनी के पैरों को अपनी गोद में ले लिया। उसने उसके तलवों की मालिश करना शुरू किया।

"पांव सूज रहे होंगे," रमन ने कहा। "मैं दबा देता हूँ।"

एक तरफ राज उसके स्तनों को प्यार कर रहे थे, और दूसरी तरफ रमन उसके पैरों की सेवा कर रहा था। कामिनी को लगा जैसे वह स्वर्ग में है। वह दो प्रेमियों की चहेती थी।

थोड़ी देर बाद, राज ऊपर उठे। उन्होंने अपनी धोती खोली।

"मुझे अंदर आना है," राज ने कहा। "महसूस करना है कि अंदर क्या बदलाव आया है।"

कामिनी ने अपनी टांगें फैला दीं। "आ जाइए... मालिक।"

राज ने बहुत सावधानी से प्रवेश किया। वे जानते थे कि अब उन्हें संभलकर रहना है।

"उफ्फ... कितनी गर्म है," राज ने आंखें बंद कर लीं। "गर्भावस्था ने तुझे और भी रसीला बना दिया है।"

वे धीरे-धीरे हिलने लगे। धीमे स्ट्रोक्स।

रमन अब बिस्तर पर चढ़ आया था। वह कामिनी के पीछे लेट गया लेकिन साइड से। वह कामिनी की गर्दन और पीठ को चूम रहा था।

"मैं भी हूँ मालकिन," रमन ने उसके कान में कहा। "हम दोनों साथ हैं।"

कामिनी बीच में थी। राज उसके अंदर थे, और रमन उसे बाहर से जकड़े हुए था। वह सुरक्षित थी। वह भरी हुई थी।

"यह बच्चा..." राज ने धक्के मारते हुए कहा, "यह बच्चा जानेगा कि उसके असली पिता कौन हैं। हम उसे बताएंगे। जब वह बड़ा होगा, तो वह प्रताप जैसा कमजोर नहीं, बल्कि हम जैसा बनेगा।"

"हाँ..." कामिनी ने कराहते हुए कहा। "वह शेर बनेगा।"

उस रात कोई जंगलीपन नहीं था, कोई चीख-पुकार नहीं थी। उस रात सिर्फ एक गहरा, रूहानी और शारीरिक मिलन था। तीन जिस्म एक आत्मा बन गए थे।

घंटे भर बाद। राज और रमन कपड़े पहन चुके थे। कामिनी अभी भी बिस्तर पर लेटी थी, चादर में लिपटी हुई।

राज ने एक सोने का कंगन निकाला और कामिनी की कलाई में पहना दिया।

"यह इनाम है," राज ने कहा। "वंश बढ़ाने के लिए।"

रमन ने अपनी जेब से एक चांदी की पायल निकाली। "और यह मेरी तरफ से मालकिन। मेरी छोटी सी कमाई।"

कामिनी ने दोनों तोहफे स्वीकार किए। उसकी कलाई में सोने का कंगन और पैर में चांदी की पायल... यह उसके दो प्रेमियों की निशानी थी।

"अब सो जा," राज ने कहा। "अपना खयाल रखना। और याद रखना... तुझे अब दो-दो जानों की हिफाजत करनी है। एक अपनी, और एक वारिस की।"

"और प्रताप?" कामिनी ने पूछा। "अगर उसे शक हुआ?"

रमन हंसा। "वो गधा है मालकिन। वो तो इसी खुशफहमी में मरेगा कि उसने तीर मारा है। और अगर उसने चूं-चपड़ की... तो विला में बहुत सारे गहरे कुएं हैं।"

राज ने रमन को घूरकर देखा, लेकिन फिर मुस्कुरा दिए। "रमन सही कह रहा है। तू चिंता मत कर। हम हैं।"

वे दोनों दरवाजे की तरफ बढ़े।

जाते-जाते राज रुके।

"कामिनी," उन्होंने कहा।

"जी?"

"जब बच्चा हो जाएगा... और जब तू ठीक हो जाएगी..." राज की आंखों में वही पुरानी हवस लौट आई। "तो हम फिर से कोठरी में जाएंगे। याद रखना।"

कामिनी शर्मा गई और मुस्कुरा दी। "याद रखूँगी।"

दरवाजा बंद हो गया।

कामिनी ने अपने पेट पर हाथ रखा। बाहर की दुनिया के लिए वह प्रताप सिंह की पत्नी और एक संस्कारी बहू थी। लेकिन इस बंद कमरे में, और अपने दिल में... वह "बड़े ठाकुर की नई बहू" नहीं, बल्कि "विला की रानी और उसके दो शेरों की प्रेमिका" थी।

उसने करवट ली और सुकून की नींद सो गई। विला का मायाजाल अब पूरा हो चुका था।

(कहानी समाप्त)
 
गाँव का टेलर

स्थान: राजगढ़, मुख्य बाज़ार

समय: जून की दोपहर, 1:18 बजे

जून का महीना अपनी पूरी जवानी पर था। राजगढ़ कस्बा, जो आमतौर पर अपनी चहल-पहल के लिए जाना जाता था, इस वक्त किसी भट्टी की तरह धधक रहा था। आसमान से आग नहीं, बल्कि पिघला हुआ सोना बरस रहा था। लू के थपेड़े सड़कों पर ऐसे दौड़ रहे थे जैसे अदृश्य कोड़े बरस रहे हों।

धूल भरी आंधियों ने बाज़ार की रौनक को उड़ाकर दुकानों के शटरों के पीछे कैद कर दिया था। सड़कें वीरान थीं; यहाँ तक कि आवारा कुत्ते भी नालियों के ठंडे हिस्सों में पनाह लिए हुए थे। सन्नाटा इतना गहरा था कि बिजली के तारों पर बैठे चील की आवाज़ भी गूंज रही थी।

लेकिन मुख्य बाज़ार के पश्चिमी कोने पर स्थित "अप्सरा लेडीज बुटीक" की दुनिया, बाहर की इस झुलसा देने वाली हकीकत से कोसों दूर थी। यह दुकान राजगढ़ के पुराने, सीलन भरे और अंधेरे दर्जीखानों से बिल्कुल अलग थी।

इसका सामने का हिस्सा पूरा कांच का था—मोटा, पारदर्शी टफन ग्लास, जिस पर सुनहरे अक्षरों में दुकान का नाम लिखा था। अंदर दूधिया सफेद एलईडी लाइट्स जल रही थीं और सबसे महत्वपूर्ण बात—डेढ़ टन का एक भारी-भरकम स्प्लिट एसी 18 डिग्री पर चल रहा था।

दुकान के अंदर, राज अपने काउंटर पर बैठा था। 38 साल का राज, जिसके व्यक्तित्व में शहर की एक अलग ही चमक थी। वह राजगढ़ के मर्दों जैसा नहीं था जो पान चबाते थे और बेतरतीब कपड़े पहनते थे। राज ने एक आसमानी नीले रंग की शर्ट पहन रखी थी, जिसकी आस्तीनें कोहनी तक बहुत सलीके से मुड़ी हुई थीं। उसकी कलाई पर एक चांदी की घड़ी थी और उसकी उंगलियां—जो उसका सबसे बड़ा औजार थीं—बेहद साफ, लंबी और तराशी हुई थीं।

राज को यहाँ आए छह महीने हो चुके थे। वह अपनी पत्नी और दो बच्चों को शहर में ही छोड़ आया था। बच्चों की पढ़ाई और शहर के खर्चों को पूरा करने के लिए उसने अपने अकेलेपन का सौदा किया था। राजगढ़ एक बड़ा कस्बा था, जहाँ पैसा तो बहुत था, लेकिन 'फिनिशिंग' नहीं थी।

यहाँ की औरतें महंगे कपड़े तो खरीद लेती थीं, लेकिन उन्हें सिलने वाला कोई ऐसा कारीगर नहीं था जो उनके शरीर के भूगोल को समझ सके। राज ने इसी कमी को पहचाना था। उसने शहर के बड़े बुटीकों में काम किया था। उसे पता था कि कपड़े का काम तन को ढकना नहीं, बल्कि उसे उभारना होता है।

वह जानता था कि एक औरत के शरीर में कहाँ कसाव चाहिए और कहाँ ढील, ताकि देखने वाले की सांसें अटक जाएँ।

लेकिन आज की दोपहर बहुत भारी थी। ग्राहकों का आना-जाना बंद था। राज काउंटर पर बैठा एक फैशन मैगजीन के पन्ने पलट रहा था। मैगजीन में छपी मॉडलों की तस्वीरें उसे अपने शहर के दिनों की याद दिला रही थीं, लेकिन साथ ही उसके अंदर एक अजीब सा खालीपन भी भर रही थीं। पिछले पाँच दिनों से उसने किसी स्त्री को छुआ नहीं था।

उसका पौरुष, जो शांत दिखता था, अंदर ही अंदर किसी ज्वालामुखी की तरह उबल रहा था।

दीवार घड़ी की टिक-टिक उस सन्नाटे को और गहरा बना रही थी। राज ने मैगजीन बंद की और अपनी आंखें मूंद लीं, एसी की ठंडक को महसूस करते हुए। तभी…

दुकान के कांच के दरवाज़े पर एक परछाई उभरी। किसी ने बाहर से दरवाज़ा धक्का दिया।

घंटी बजी—टिंग-टोंग!

राज ने आंखें खोलीं। दरवाज़ा खुला और बाहर की गर्म, धूल भरी, झुलसाने वाली हवा का एक तेज़ झोंका अंदर आया। लेकिन उस गर्म हवा के साथ एक ऐसी खुशबू भी अंदर दाखिल हुई जिसने एसी की कृत्रिम महक को एक ही पल में बेअसर कर दिया।

वह खुशबू किसी परफ्यूम की नहीं थी। वह खुशबू थी—गीली मिट्टी, मोगरे के तेल, टेलकम पाउडर और एक पके हुए, स्वस्थ स्त्री शरीर के ताज़ा पसीने की मिली-जुली, मादक गंध। यह गंध इतनी तीव्र और मौलिक थी कि राज के नथुने फड़क उठे।

सामने डॉली खड़ी थी।

डॉली... राजगढ़ के सबसे रईस और बाहुबली जमींदार, ठाकुर हनुमंत सिंह की पत्नी। उम्र 32 साल, लेकिन उसका यौवन ऐसा था जैसे कोई फल पककर रसीला हो गया हो और बस टूटने का इंतज़ार कर रहा हो। वह 'भरी-पूरी' थी।

आजकल की जीरो-फिगर वाली लड़कियों जैसी नहीं, बल्कि अजंता- एलोरा की मूर्तियों जैसी। भरी हुई बाहें, चौड़ा सीना, गहरी कमर और विशाल नितंब।

डॉली ने आज एक गहरे तोतिया रंग की सूती साड़ी पहन रखी थी। बाहर की भीषण गर्मी और उमस ने उस साड़ी को उसके बदन से बुरी तरह चिपका दिया था। पसीने की वजह से सूती कपड़ा गीला होकर पारदर्शी सा हो गया था और उसके शरीर के हर उभार, हर ढलान और हर मोड़ को बड़ी ही बेशर्मी और खूबसूरती से बयां कर रहा था।

उसका ब्लाउज... वह एक अलग ही कहानी कह रहा था। वह पुराने जमाने का, बंद गले का और कोहनी तक की आस्तीन वाला ब्लाउज था। शायद किसी स्थानीय दर्जी ने सिला था।

लेकिन वह ब्लाउज डॉली के भारी स्तनों के दबाव से इतना कसा हुआ था कि उसके हुक खिंचे हुए थे। कपड़े के अंदर का तनाव साफ दिखाई दे रहा था। ऐसा लग रहा था कि उसका शरीर उस कपड़े की कैद से आज़ाद होने के लिए छटपटा रहा है।

राज अपनी कुशन वाली कुर्सी से धीरे से खड़ा हुआ। उसकी नज़रें, अनचाहे ही, डॉली के सीने पर जा टिकीं, जो तेज़ सांसों के कारण ऊपर-नीचे हो रहा था।

धूप से तमतमाया हुआ उसका गोरा चेहरा लाल हो रहा था। माथे की बड़ी लाल बिंदी पसीने से थोड़ी गीली हो गई थी, और पसीने की एक पतली, चमकदार धार उसकी कनपटी से होते हुए, गर्दन के रास्ते, उसके ब्लाउज की गहरी घाटी में समा रही थी। राज ने उस बूंद के सफर को अपनी आँखों से पिया।

डॉली ने अंदर कदम रखा और दरवाज़ा अपने पीछे बंद कर दिया। बाहर का शोर एकदम से कट गया। अब दुकान में सिर्फ एसी की हमिंग और डॉली की भारी सांसों की आवाज़ थी।

"नमस्ते भाभी जी," राज ने अपनी आवाज़ को संयमित करते हुए, थोड़ा झुककर अभिवादन किया। उसकी आवाज़ में शहर की तहजीब थी।

डॉली ने एसी की ठंडक महसूस करते हुए एक लंबी, गहरी राहत की सांस ली।

"उफ्फ... राम! जान ही ले लेगी यह गर्मी," डॉली ने अपनी साड़ी के पल्लू से अपना चेहरा पोंछा। जब उसने हाथ उठाया, तो उसका ब्लाउज थोड़ा ऊपर खिंच गया और उसकी कमर का एक छोटा सा, गोरा और पसीने से भीगा हिस्सा राज की आँखों के सामने आ गया। वहां साड़ी के कसकर बांधने के गहरे निशान थे।

डॉली काउंटर के पास आई। राज को उसके शरीर से उठती हुई वह तेज़, कस्तूरी गंध अब और भी करीब से महसूस हुई। यह एक ऐसी गंध थी जो मर्दों के दिमाग को सुन्न कर देती है।

"नमस्ते शर्मा जी," डॉली ने राज को देखा। उसकी बड़ी-बड़ी, काली, कजरारी आँखों में एक अजीब सी शिकायत और एक अनकहा दर्द था। "सुना है शहर से आए हो? पूरे राजगढ़ में चर्चा है तुम्हारी। कहते हैं तुम औरतों को अप्सरा बना देते हो? या सिर्फ बातें ही बड़ी हैं?"

राज के होठों पर एक हल्की, रहस्यमयी मुस्कान आ गई। वह समझ गया कि यह महिला साधारण ग्राहक नहीं है। यह एक ऐसी महिला है जिसे अपने सौंदर्य का भान है, लेकिन जिसे शायद घर में वो तारीफ नहीं मिलती जिसकी वह हकदार है।

"मैं तो बस कारीगर हूँ मालकिन," राज ने बहुत ही मृदु स्वर में कहा, उसकी नज़रें डॉली की आँखों में गड़ी थीं।

"अप्सरा तो आप पहले से हैं। भगवान ने आपको बहुत फुर्सत में बनाया है। बस... लिबास थोड़ा सादगी भरा है। हीरे को भी सही अंगूठी की ज़रूरत होती है, वरना उसकी चमक छिप जाती है।"

डॉली एक पल के लिए ठिठक गई। गाँव के किसी मर्द की हिम्मत नहीं थी कि उससे ऐसे बात करे, और वो भी इतनी सीधे तौर पर। लेकिन राज की बातों में बदतमीजी नहीं, एक तरह की पूजा थी। डॉली के होठों पर एक तंज भरी हंसी आई।

"सादगी? इसे मजबूरी कहते हैं शर्मा जी," उसने अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक किया, जिससे उसके सीने का उभार और स्पष्ट हो गया। "गाँव के दर्जी को क्या पता फैशन क्या होता है? वो तो बस तन ढंकना जानते हैं, तन को निखारना नहीं। मेरे पति को लगता है कि औरत जितनी ढकी रहे, उतनी अच्छी। लेकिन..." वह रुकी, और अपनी आँखों को थोड़ा सिकोड़ते हुए राज को देखा, "लेकिन मुझे लगता है कि खूबसूरती को कैद नहीं करना चाहिए।"

उसने अपना महंगा, भूरे रंग का लेदर का पर्स काउंटर पर रखा। 'खट' की आवाज़ गूंजी। उसने पर्स की चेन खोली और उसमें से एक मखमली, सुर्ख लाल रंग का कपड़ा निकाला। कपड़ा देखते ही लग रहा था कि वह बहुत कीमती रेशम है। उसकी चमक दुकान की लाइट में दमक उठी।

"मुझे एक ब्लाउज चाहिए," डॉली ने वह लाल कपड़ा काउंटर पर राज की तरफ सरकाया। उसकी उंगलियां कपड़े को सहला रही थीं। "लेकिन वैसा नहीं जैसा मैं रोज़ पहनती हूँ। वो बोरे जैसा नहीं। मुझे कुछ अलग चाहिए। कुछ... कुछ शहर जैसा। कुछ ऐसा जिसे पहनकर मैं आईने के सामने खड़ी होऊं, तो मुझे खुद से प्यार हो जाए।"

राज ने कपड़े को हाथ में लिया। कपड़ा पानी की तरह मुलायम और ठंडा था। उसने अपनी उंगलियों से कपड़े की बनावट को महसूस किया, बिल्कुल वैसे ही जैसे वह किसी औरत की त्वचा को छू रहा हो।

"रेशम है..." राज बड़बड़ाया। "बहुत नाज़ुक। यह शरीर पर दूसरी चमड़ी की तरह चिपक जाएगा।" उसने नज़रें उठाकर डॉली को देखा। "बन जाएगा। लेकिन डिज़ाइन? कैसा डिज़ाइन पसंद करेंगी? बोट नेक? कॉलर वाला? या..."

डॉली ने इधर-उधर देखा, जैसे तसल्ली कर रही हो कि दुकान में कोई और तो नहीं है। फिर उसने काउंटर पर थोड़ा आगे झुकते हुए, अपनी आवाज़ को लगभग फुसफुसाहट में बदलते हुए कहा, "मुझे वो... वो 'बैकलेस' चाहिए। डोरी वाला। जैसा फिल्मों में हीरोइनें पहनती हैं।"

राज के दिल की धड़कन एक क्षण के लिए रुक गई। एक गाँव की जमींदारनी, जो हमेशा हवेली की चारदीवारी में घूंघट या पल्लू में रहती है, वह बैकलेस ब्लाउज मांग रही थी? वह भी इतना खुलकर? यह सिर्फ एक कपड़े का ऑर्डर नहीं था, यह एक विद्रोह था। एक निमंत्रण था।

"बैकलेस?" राज ने जानबूझकर शब्द को दोहराया, उसकी आवाज़ थोड़ी भारी हो गई। "गहरा गला? पीठ पूरी खुली? सिर्फ डोरियां?"

"हाँ," डॉली ने अपनी बात पर जोर दिया, उसकी आँखों में एक अजीब सी जिद थी। "पूरी खुली। नीचे तक। सिर्फ दो डोरियां होनी चाहिए। और फिटिंग..." वह रुकी, अपनी साड़ी के पल्लू को अपनी मुट्ठी में कसते हुए, "फिटिंग ऐसी होनी चाहिए शर्मा जी, कि लगे कपड़ा मेरे बदन पर चिपका हुआ है। अगर मैं सांस लूँ... तो कपड़े को पता चले। मुझे ढीले कपड़े पसंद नहीं। मुझे कसाव पसंद है।"
 
'कसाव' शब्द ने हवा में एक बिजली सी दौड़ा दी। राज समझ गया। यह महिला सिर्फ कपड़ा नहीं सिलवाना चाहती, यह अपने दबे हुए अरमानों को आकार देना चाहती है। यह उस कसाव को महसूस करना चाहती है जो शायद इसकी नीरस ज़िंदगी से गायब हो चुका है। यह स्पर्श की भूखी है।

"ऐसी फिटिंग के लिए नाप बहुत सटीक लेना होगा मालकिन," राज ने अपने पेशेवर अंदाज़ को ओढ़ने की कोशिश की, लेकिन उसके गले में एक सूखापन आ गया था। "अंदाज़े से काम नहीं चलेगा। पुराने ब्लाउज से नाप लेकर वो बात नहीं आएगी। शरीर का नाप लेना होगा। ताज़ा नाप। एक सूत का भी फर्क रहा, तो वो 'कसाव' नहीं आएगा जो आप चाहती हैं।"

डॉली ने उसे सीधे देखा। उसकी आँखों में कोई झिझक नहीं थी। "तो नाप ले लो," उसने चुनौती भरे स्वर में कहा। "मैं इसीलिए आई हूँ। मुझे पता है शहर के दर्जी छूकर नाप लेते हैं, तभी उनके कपड़े बोलते हैं।"

राज काउंटर से बाहर निकला। उसके पैरों में एक अजीब सी भारीपन था। उसने अपनी गर्दन में लटका पीला इंची-टेप सही किया। वह टेप, जो अब तक बेजान पड़ा था, अब डॉली के गर्म शरीर को नापने वाला था।

"आइए, ट्रायल रूम की तरफ," राज ने दुकान के पिछले हिस्से की ओर इशारा किया।

दुकान का पिछला हिस्सा मुख्य शोरूम से थोड़ा अलग था। वहां कपड़ों के बड़े-बड़े थान रखे थे, जिनके बीच एक संकरा रास्ता था जो पीछे की तरफ जाता था। वहां एक दीवार पर आदमकद आईना लगा था और तीन तरफ से भारी मखमली पर्दों से घिरा हुआ एक छोटा सा ट्रायल एरिया था।

वह जगह थोड़ी अंधेरी, एकांत और बेहद निजी थी। वहां की हवा में नए कपड़ों की महक और एक अजीब सा रहस्य था। एसी की ठंडक वहां थोड़ी कम पहुँचती थी, जिससे वहां का तापमान थोड़ा गर्म था।

डॉली उस तरफ बढ़ी। उसकी पायल की 'छन-छन' सन्नाटे में गूंज रही थी। वह आईने के सामने जाकर खड़ी हो गई। उसने खुद को उस बड़े आईने में देखा। तोतिया रंग की साड़ी में उसका भरा हुआ बदन किसी रसीले, पके हुए आम जैसा लग रहा था। पसीना अभी भी उसकी गर्दन और पीठ पर था, जिससे उसका ब्लाउज जगह-जगह से काला पड़ गया था।

राज उसके पीछे आकर खड़ा हो गया। आईने में दोनों की परछाइयां दिख रही थीं। राज डॉली से करीब चार इंच लंबा था। उसका सांवला, मर्दाना चेहरा और डॉली का गोरा, भरा हुआ रूप—दोनों एक साथ बहुत जच रहे थे।

माहौल में एक गाढ़ा तनाव था। एसी की ठंडक और दो जिस्मों की दबी हुई गर्मी आपस में टकरा रही थी। राज ने इंची-टेप को अपने हाथों में कसा। उसे पता था कि अगले कुछ मिनटों में जो होने वाला है, वह सिर्फ नाप लेना नहीं होगा। वह सीमाओं को लांघना होगा।

"पल्लू..." राज ने बोलना शुरू किया, लेकिन उसकी आवाज़ फटी हुई निकली। उसने गला साफ किया और फिर से कोशिश की, थोड़ा अधिकार के साथ। "नाप लेने के लिए आपको पल्लू हटाना पड़ेगा। साड़ी का पल्लू नाप में बाधा बनेगा।"

डॉली ने राज की आँखों में आईने के जरिए देखा। एक पल की खामोशी। फिर, उसने एक पल भी नहीं गंवाया। उसने अपने दाहिने कंधे से साड़ी का पल्लू गिरा दिया।

रेशमी पल्लू सरसराता हुआ नीचे गिरा और उसकी कमर पर लटक गया।

नज़ारा राज की आँखों के सामने नंगा हो गया।

उसका पुराना ब्लाउज पसीने से भीगकर पारदर्शी हो रहा था। ब्लाउज के कसाव की वजह से उसके स्तनों का ऊपरी हिस्सा बाहर उभर रहा था, जैसे दो कबूतर उड़ने के लिए तैयार हों। उसकी बांहें गोल, सुडौल और मलाईदार थीं।

और उसकी कमर... जहाँ साड़ी का फेंटा लगा था, वहां का मांस गोरा और मक्खन जैसा मुलायम दिख रहा था। पसीने की बूंदें वहां चमक रही थीं।

राज ने एक गहरी सांस ली। उसने एक कदम और आगे बढ़ाया। अब वह डॉली के बिल्कुल पीछे सटकर खड़ा था। इतना करीब कि वह डॉली के बालों से आती चमेली के तेल की खुशबू और उसके शरीर की वो खट्टी-मीठी पसीने की गंध सूंघ सकता था। डॉली की पीठ की गर्मी राज के सीने को महसूस हो रही थी।

"तैयार हैं आप?" राज ने बहुत धीमे स्वर में पूछा, जैसे कोई राज़ साझा कर रहा हो।

डॉली ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी पलकें झुका लीं और अपनी छाती को थोड़ा और तान दिया। यह एक मूक सहमति थी। एक समर्पण था।

राज डॉली के ठीक पीछे खड़ा था। आदमकद आईने में दोनों की परछाइयां एक-दूसरे में समाई हुई लग रही थीं।

डॉली का पल्लू उसकी कमर पर लापरवाही से लटक रहा था, और उसका कसा हुआ बदन पसीने की हल्की चमक के साथ राज की आँखों के सामने बेपर्दा था।

राज ने अपने हाथों में इंची-टेप के दोनों सिरों को कसा। उसके हाथों में हल्का कंपन था, जिसे वह छुपाने की कोशिश कर रहा था।

"हाथ... थोड़ा ऊपर कीजिए," राज ने डॉली के कान के पीछे, बहुत धीमी आवाज़ में कहा। उसकी आवाज़ ट्रायल रूम के सन्नाटे में गूंज गई।

डॉली ने यंत्रवत अपने दोनों हाथ कंधों तक उठा लिए। इस हरकत से उसका सीना और तन गया। राज ने टेप का एक सिरा उसके बाएँ कंधे की हड्डी पर रखा और दूसरा सिरा दाएँ कंधे तक ले गया। नाप लेते वक़्त, राज की कलाई अनजाने में—या शायद जानबूझकर—डॉली की नंगी गर्दन के पिछले हिस्से से रगड़ खा गई।

"सी...!" डॉली के होंठों से एक तीखी सिसकी निकली। उसकी गर्दन के रोंगटे खड़े हो गए। एसी की ठंडक के बावजूद, राज की कलाई की रगड़ उसे जलते हुए कोयले जैसी लगी।

"माफ़ करना," राज ने आईने में उसकी आँखों में झांकते हुए कहा, लेकिन उसने अपना हाथ नहीं हटाया। "गर्दन का नाप भी ज़रूरी है... ताकि गला पीछे से गिरे नहीं।"

उसने अपनी तर्जनी और मध्यमा उंगली डॉली की रीढ़ की हड्डी के उस ऊपरी हिस्से पर फेर दी जहाँ ब्लाउज का हुक बंद था।

"गला कितना गहरा रखना है?" राज ने अपनी उंगली को उसकी पीठ पर नीचे सरकाते हुए पूछा। "यहाँ तक?"

उसकी उंगली डॉली की पीठ के बीचो-बीच रुकी।
 
डॉली की साँसें तेज़ हो रही थीं। उसका पेट अंदर-बाहर हो रहा था। "और नीचे..." उसने मुश्किल से थूक निगलते हुए कहा। "इतना गहरा कि... कि पीठ पर कुछ न बचे।"

राज ने अपनी उंगली और नीचे सरकाई। अब वह ब्लाउज की सीमा पार कर चुकी थी और उस नंगी त्वचा पर थी जो साड़ी के अंदर छिप जाती है।

"ठीक है," राज ने फुसफुसाया। "जैसा आप चाहें।"

अब सबसे मुश्किल और सबसे नशीला पल था। राज को 'बस्ट' यानी छाती का नाप लेना था। इसके लिए उसे अपनी दोनों बाहें डॉली की बगलों के नीचे से आगे लानी थीं, जैसे वह उसे पीछे से गले लगाने वाला हो।

राज ने एक गहरी सांस भरी और अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए। जैसे ही उसके हाथ डॉली के शरीर के इर्द-गिर्द आए, उसका अपना चौड़ा सीना डॉली की पीठ से सट गया। संपर्क होते ही दोनों के शरीरों में एक बिजली दौड़ गई।

डॉली ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसे अपनी पीठ पर राज के सख्त सीने का दबाव और अपने कानों के पास उसकी भारी साँसें महसूस हो रही थीं। राज के हाथ अब हवा में लटके थे, उसके भारी स्तनों के ठीक सामने। टेप उसके स्तनों के सबसे उभरे हुए हिस्से पर था।

"लंबी साँस लीजिए," राज ने आदेश दिया। उसकी आवाज़ अब भारी और फटी हुई थी। "साँस रोककर रखिए।"

डॉली ने एक बहुत गहरी साँस खींची। उसका सीना फूलकर और ऊपर उठ गया, मानो राज के हाथों को चुनौती दे रहा हो। राज ने टेप को कसा। टेप पीला था और डॉली का ब्लाउज पसीने से भीगा हुआ हरा।

राज ने टेप को इतना कसा कि डॉली के स्तन उस कसाव में दब गए। राज के हाथों के पोर डॉली के स्तनों के नरम, मांसल किनारों को छू रहे थे।

"बत्तीस... नहीं... चौंतीस," राज बड़बड़ाया, जैसे वह कोई मंत्र पढ़ रहा हो। उसने टेप को ढीला नहीं किया। "फिटिंग बहुत टाइट चाहिए ना?"

"हम्म्म..." डॉली ने अपनी आँखें नहीं खोलीं। वह उस कसाव का आनंद ले रही थी। "बहुत टाइट... इतनी कि साँस लूँ तो टांके खुलने का डर रहे।"

राज ने अपनी बाहें नहीं हटाईं। वह कुछ पलों तक उसी 'आलिंगन' की मुद्रा में खड़ा रहा। डॉली की महक—पसीने, टेलकम पाउडर और उसके यौवन की गंध—राज के दिमाग को सुन्न कर रही थी।

"शहर में," राज ने डॉली के कान के पास अपने होंठ ले जाकर कहा, "हम इसे 'स्किन फिट' कहते हैं। दूसरी चमड़ी।"

उसने धीरे से अपनी बाहें हटाईं, लेकिन हटते वक़्त उसकी हथेलियाँ डॉली की बाजुओं से रगड़ती हुई निकलीं। डॉली का शरीर ढीला पड़ गया, जैसे किसी ने उसे सम्मोहित कर लिया हो।

"अब कमर," राज ने कहा।

और वह डॉली के पीछे घुटनों के बल बैठ गया।

यह स्थिति किसी भी मर्द और औरत के लिए खतरनाक थी। राज ज़मीन पर था और उसका चेहरा सीधे डॉली के कूल्हों और कमर के बराबर था। डॉली का पेट, उसकी नाभि, और साड़ी का वो हिस्सा जहाँ फेंटा लगा था, सब राज की नज़रों की गिरफ़्त में था।

राज ने अपनी उंगलियों में टेप लिया और उसे डॉली की कमर के चारों ओर लपेटा। उसने टेप को कसने के लिए अपने हाथ डॉली के पेट पर रखे।

"साड़ी..." राज ने नीचे से ऊपर, डॉली के चेहरे की तरफ देखते हुए कहा।

डॉली अब उसे आईने में नहीं, बल्कि नीचे झुककर सीधे देख रही थी।

"साड़ी नाप में अड़चन डाल रही है, मालकिन। ब्लाउज की लंबाई कहाँ तक रखनी है, यह तय करने के लिए आपको साड़ी थोड़ी नीचे करनी होगी।"

डॉली का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। एक पराया मर्द, उसके पैरों में बैठा, उसे साड़ी नीचे करने को कह रहा था। यह शर्मनाक था, लेकिन उत्तेजना उससे कहीं ज़्यादा थी।

डॉली ने कांपते हाथों से अपनी साड़ी के फेंटे को पकड़ा। उसने अपनी साँस रोकी और साड़ी को एक इंच... दो इंच... तीन इंच नीचे सरका दिया।

नज़ारा राज की आँखों के सामने खुल गया।

साड़ी अब डॉली के कूल्हों की हड्डी पर अटकी थी। उसकी गहरी, गोल नाभि पूरी तरह अनावृत हो गई थी। नाभि के आस-पास का हिस्सा पसीने से गीला था और बेहद गोरा था, क्योंकि वह हिस्सा कभी धूप के संपर्क में नहीं आया था। कमर पर साड़ी के कसने के लाल निशान पड़े हुए थे, जो डॉली के गोरे बदन पर कामुक लग रहे थे।
 
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