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सन्नी
हम दोनों ने नहा कर कपड़े पहन लिए तो लक्ष्मी आंटी भी नहाने चली गई। विक्की ने लक्ष्मी आंटी से कहा कि हम दोनों कुछ देर नीचे हो आते हैं। हम दोनों कॉलेज के पास बने बुक स्टोर पहुंचे और वहां से हमारी सारी किताबें खरीद ली।
विक्की ने पवन पापा को फोन करके कॉलेज के बारे में बताया और खरीददारी कैसे करते हैं उसके बारे में पूछा। अकेले रहने का हमें कोई तजुर्बा नहीं था। पवन पापा ने लक्ष्मी आंटी की मदद लेने की सलाह दी तो मैं ने कहा तीन लोग शहर में पैदल ज्यादा नहीं घूम सकते। बस तो काफी थीं पर कुछ समझ नहीं आ रहा था। पापा ने हंसते हुए कहा कि बड़ा होने का मतलब है हालात के साथ बदलना। वैसे मम्मियों ने कुछ करने का प्लान बनाया है पर इसके बारे में वह कुछ बता नहीं सकते।
किताबें ले कर हम घर पहुंचे तो वहां लक्ष्मी आंटी ने साफ सफाई कर ली थी और हमारा बेड ठीक कर रही थी। लक्ष्मी आंटी ने हमें देख कर कहा,
"बाबू इतनी जल्दी किताबें खरीद ली? अगर पता होता तो मैं घर के सामान की पर्ची देती। दुबारा जाना नहीं पड़ता "
विक्की ने कहा, "लक्ष्मी आंटी, हमने किताबों की दुकान कल कॉलेज से आते हुए देख ली थी पर बाकी खरीददारी के लिए मदद की जरूरत पड़ेगी। हम बाकी खरीददारी के लिए मॉल जा रहे हैं। आओगी हमारे साथ?"
लक्ष्मी आंटी की आंखे चमक उठी। उसने कहा,
"मॉल में मैं कभी गई नहीं। सुना है वहां सब महंगा होता है और कई चीजें एक साथ मिलती हैं। क्या मुझे आने देंगे? मैं कोई मेमसहाब नहीं।"
मैंने हंसकर कहा कि हम दोनों के होते हुए उसे कोई नहीं रोक सकता। लक्ष्मी आंटी ने दौड़ते हुए अपने बाल बनाए और अपने अच्छे कपडे पहन कर बाहर आ गई। हम ने बाहर से रिक्शा कर ली और मॉल पहुंचे। मॉल कि चमक देख लक्ष्मी आंटी का चेहरा खिल उठा। मॉल के अंदर जाने पर वहां के स्टॉल और दुकानों में मेकअप से बनठन कर खूबसूरत लड़कियां समान बेचती लक्ष्मी आंटी को दिखी।
लक्ष्मी आंटी की खूबसूरती किसी पाउडर या लिपस्टिक की मोहताज नहीं थी पर उसके कपड़े काफी पुराने और सस्ते थे। बस्ती में लोगों की नजरों से छुपने के लिए बने कपड़े यहां उसे बुरा महसूस करा रहे थे। हम सब एक बड़े स्टोर में गए जहां काफी समान किफायती दाम पर रखा था। लक्ष्मी आंटी बाकी सब को देखते हुए हमारे पीछे पीछे चल रही थी। मैं जानबूझकर लक्ष्मी आंटी को स्टोर के हर कोने में घूमाने लगा। लक्ष्मी आंटी ने अब यहां से भागने का मन बना लिया था और उसन जल्दी से हमारा पर्ची में रखा सामान भर लिया। अपने कपड़ों से संकोच में लक्ष्मी आंटी को विक्की का खयाल नहीं रहा और उसने मेरे साथ सामान भर लिया। जब हम पैसे देने की कतार में खड़े हो गए तो लक्ष्मी आंटी सामान के ढेर को देख कर चौंक गई।
लक्ष्मी आंटी ने कहा, "हे भगवान, मैंने इतना सामान भर लिया? बाबू इस में से कम कर देंगे तो चलेगा।"
मैंने लक्ष्मी आंटी को कतार से बाहर निकाल कर कहा कि विक्की बिल चुका देगा तब तक हम कुछ और करते हैं। विक्की ने आंख मारी और हां कहा।
लक्ष्मी आंटी ने बाहर आ कर भी सामान कम करने की बात की तो मैंने कहा कि अब हम अपना घर बना रहे हैं तो पहली खरीददारी बड़ी होनी है। अगली बार कम सामान लगेगा। लक्ष्मी आंटी ने माना कि यह बात सही थी और उसने अपनी नजर घुमाई। वहां तकरीबन खाली पड़े दुकान को लक्ष्मी आंटी किसी खजाने की तरह देख रही थी। मैं लक्ष्मी आंटी को अंदर ले गया तो उसने शर्माकर बाहर भागने की कोशिश की।
पूरे दुकान में किताबों के ढेर लगे थे। कहीं बच्चों की किताबें थीं, तो कहीं आत्मकथा और कहीं और स्कूल की किताबें। कॉपियां और पेन के अलग अलग ढेर और गुच्छे थे। लक्ष्मी आंटी ने किसी जेवर की तरह उन पर अपनी उंगली घुमाई। मैंने पीछे से लक्ष्मी आंटी के कान में कहा,
"लक्ष्मी आंटी, अब तुम्हारी की तनख़ा बढ़ गई है और तुम जो चाहो खरीद सकती हो। मैं जानता हूं कि तुम अपनी पढ़ाई अपने दम पर करना चाहती हो। तुम जो खरीद लोगी उसके पैसे तुम्हारी तनख़ा से काट लेंगे।
लक्ष्मी आंटी ने खुश होकर दौड़ना शुरू किया। उसने अलग अलग तरह की कॉपियां और पेन लिए। लक्ष्मी आंटी ने कुछ 10 वी कक्षा की किताबें खरीद ली और साथ में इंग्लिश सीखने की किताब भी ली। मैंने लक्ष्मी आंटी के हाथ में भारी वजन को देखा पर लक्ष्मी आंटी को उस का कोई ग़म नहीं था।
विक्की दुकान के बाहर से ही लक्ष्मी आंटी को देख रहा था और हमारे बाहर आते ही लक्ष्मी आंटी को चिढ़ाने लगा।
लक्ष्मी आंटी अपने कपड़ों के बारे में पूरा भूल गई। उस वक़्त अगर कोई हमें देखता तो उसे बस कॉलेज के 3 दोस्त दिखते। हम दोनों लक्ष्मी आंटी को होटल में ले गए और लक्ष्मी आंटी को मुंबई कि पाव भाजी खिलाई। लक्ष्मी आंटी तो सातवे आसमान में उड़ रही थी कि उसका दिन ऐसे बिता। पेट भरने के बाद जब हम ने बिल चुकाया तो कीमत देख लक्ष्मी आंटी चौंक गई।
लक्ष्मी आंटी बोल पड़ी, "बाबू, इतने में तो मैं आप दोनों को 3दिन ये सब्जी बना कर खिलाऊं!!"
विक्की ने लक्ष्मी आंटी को हंसकर कंधे से धक्का देते हुए कहा, "लेकिन थकने के बाद अच्छा खाना तुरन्त मिलने की भी कीमत होती है ना?"
लक्ष्मी आंटी ने सोच कर हां कहा और हम सब ने रिक्शा कर घर लौट आए। लक्ष्मी आंटी ने हमारी भरी हुई थैलियां घर में जा कर खोली। पहले उसने बड़े प्यार से अपनी किताबें हमारे पढ़ाई के समान के साथ में रख दी। बाकी सामान ले कर लक्ष्मी आंटी किचन में गई। हम दोनों हॉल में बैठ कर घड़ी देखने लगे।
लक्ष्मी आंटी ने किचन में से कहा, "बाबू, अब जब सारा सामान आ गया है तो मै आप दोनों को परेशान नहीं करूंगी। ताजी सब्जियां मै यहीं से खरीद लूंगी पर कोई सब्ज़ी पसंद ना हो तो मुझे अभी… आ!!!"
लक्ष्मी आंटी ने थैला बाहर लाते हुए कहा, "बाबू उन्होंने आप के थैले में किसी और का सामान भर दिया है। हमें इसे लौटकर पैसे वापस लेने होंगे!"
"तो तुम्हें ये कपड़े पसंद नहीं आए? कुछ ज्यादा ही बड़े हैं पर सोचा शहरी लड़कियों के छोटे कपडे तुम्हे पसंद नहीं आयेंगे।"
लक्ष्मी आंटी वहीं जमीन पर थैला ले कर बैठ गई। उसने एक एक कपड़ा बाहर निकलते हुए उसे छुआ।
लाल और सफेद टॉप के साथ पहनने के लिए हरी लेगिंग्स थी। अनेक रंगों के डिजाइन से बनी नीली सलवार कमीज़ कि जोड़ी थी। इन कपड़ों के नीचे एक गुलाबी शर्ट और सफेद लेडीज पतलून थी। पतलून के साथ satin में बना पट्टा निकल आया। यह गुलाबी satin में बना camisole और boy-shorts थे।
लक्ष्मी आंटी ने हमारी ओर देखा तो मैंने कहा, "घर में पहनने के लिए दूसरी जोड़ी भी होनी चाहिए। नीचे देखो, कुछ और भी होगा।"
लक्ष्मी आंटी के हाथ एक पैकेट लगा जिस में कॉम्पैक्ट पाउडर, कुछ लिपस्टिक और सिंदूर कि एक डिब्बी थी। लक्ष्मी आंटी ने हम दोनों को गले लगाया और कहा कि वह हमारा शुक्रिया कैसे अदा करे।
"लक्ष्मी आंटी क्यों न तुम ये कपड़े पहन कर देखो? इन कपड़ों के नाप बड़ी मुश्किल से लिए थे।"
लक्ष्मी आंटी थैला बेडरूम में ले गई और एक एक ड्रेस कि नुमाईश हमारे लिए करने लगी। गुलाबी शर्ट और सफेद लेडीज पैंट पहन कर लक्ष्मी आंटी किसी बड़ी कंपनी की अफसर लग रही थी पर उसे इन कपड़ों की आदत नहीं थी और उसने सुडौल पैरों को हाथों से छिपा रही थी।
शिकायत के स्वर में लक्ष्मी आंटी बोली, "बाबू ये किस काम आयेगा?"
विक्की ने गूढ़ अर्थ से कहा, "हर चीज का वक़्त होता है।"
लक्ष्मी आंटी समझ गई कि उसे जवाब आसानी से नहीं मिलेगा और आखरी जोड़ी पहनने के लिए अंदर चली गई।
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सन्नी
हम दोनों ने नहा कर कपड़े पहन लिए तो लक्ष्मी आंटी भी नहाने चली गई। विक्की ने लक्ष्मी आंटी से कहा कि हम दोनों कुछ देर नीचे हो आते हैं। हम दोनों कॉलेज के पास बने बुक स्टोर पहुंचे और वहां से हमारी सारी किताबें खरीद ली।
विक्की ने पवन पापा को फोन करके कॉलेज के बारे में बताया और खरीददारी कैसे करते हैं उसके बारे में पूछा। अकेले रहने का हमें कोई तजुर्बा नहीं था। पवन पापा ने लक्ष्मी आंटी की मदद लेने की सलाह दी तो मैं ने कहा तीन लोग शहर में पैदल ज्यादा नहीं घूम सकते। बस तो काफी थीं पर कुछ समझ नहीं आ रहा था। पापा ने हंसते हुए कहा कि बड़ा होने का मतलब है हालात के साथ बदलना। वैसे मम्मियों ने कुछ करने का प्लान बनाया है पर इसके बारे में वह कुछ बता नहीं सकते।
किताबें ले कर हम घर पहुंचे तो वहां लक्ष्मी आंटी ने साफ सफाई कर ली थी और हमारा बेड ठीक कर रही थी। लक्ष्मी आंटी ने हमें देख कर कहा,
"बाबू इतनी जल्दी किताबें खरीद ली? अगर पता होता तो मैं घर के सामान की पर्ची देती। दुबारा जाना नहीं पड़ता "
विक्की ने कहा, "लक्ष्मी आंटी, हमने किताबों की दुकान कल कॉलेज से आते हुए देख ली थी पर बाकी खरीददारी के लिए मदद की जरूरत पड़ेगी। हम बाकी खरीददारी के लिए मॉल जा रहे हैं। आओगी हमारे साथ?"
लक्ष्मी आंटी की आंखे चमक उठी। उसने कहा,
"मॉल में मैं कभी गई नहीं। सुना है वहां सब महंगा होता है और कई चीजें एक साथ मिलती हैं। क्या मुझे आने देंगे? मैं कोई मेमसहाब नहीं।"
मैंने हंसकर कहा कि हम दोनों के होते हुए उसे कोई नहीं रोक सकता। लक्ष्मी आंटी ने दौड़ते हुए अपने बाल बनाए और अपने अच्छे कपडे पहन कर बाहर आ गई। हम ने बाहर से रिक्शा कर ली और मॉल पहुंचे। मॉल कि चमक देख लक्ष्मी आंटी का चेहरा खिल उठा। मॉल के अंदर जाने पर वहां के स्टॉल और दुकानों में मेकअप से बनठन कर खूबसूरत लड़कियां समान बेचती लक्ष्मी आंटी को दिखी।
लक्ष्मी आंटी की खूबसूरती किसी पाउडर या लिपस्टिक की मोहताज नहीं थी पर उसके कपड़े काफी पुराने और सस्ते थे। बस्ती में लोगों की नजरों से छुपने के लिए बने कपड़े यहां उसे बुरा महसूस करा रहे थे। हम सब एक बड़े स्टोर में गए जहां काफी समान किफायती दाम पर रखा था। लक्ष्मी आंटी बाकी सब को देखते हुए हमारे पीछे पीछे चल रही थी। मैं जानबूझकर लक्ष्मी आंटी को स्टोर के हर कोने में घूमाने लगा। लक्ष्मी आंटी ने अब यहां से भागने का मन बना लिया था और उसन जल्दी से हमारा पर्ची में रखा सामान भर लिया। अपने कपड़ों से संकोच में लक्ष्मी आंटी को विक्की का खयाल नहीं रहा और उसने मेरे साथ सामान भर लिया। जब हम पैसे देने की कतार में खड़े हो गए तो लक्ष्मी आंटी सामान के ढेर को देख कर चौंक गई।
लक्ष्मी आंटी ने कहा, "हे भगवान, मैंने इतना सामान भर लिया? बाबू इस में से कम कर देंगे तो चलेगा।"
मैंने लक्ष्मी आंटी को कतार से बाहर निकाल कर कहा कि विक्की बिल चुका देगा तब तक हम कुछ और करते हैं। विक्की ने आंख मारी और हां कहा।
लक्ष्मी आंटी ने बाहर आ कर भी सामान कम करने की बात की तो मैंने कहा कि अब हम अपना घर बना रहे हैं तो पहली खरीददारी बड़ी होनी है। अगली बार कम सामान लगेगा। लक्ष्मी आंटी ने माना कि यह बात सही थी और उसने अपनी नजर घुमाई। वहां तकरीबन खाली पड़े दुकान को लक्ष्मी आंटी किसी खजाने की तरह देख रही थी। मैं लक्ष्मी आंटी को अंदर ले गया तो उसने शर्माकर बाहर भागने की कोशिश की।
पूरे दुकान में किताबों के ढेर लगे थे। कहीं बच्चों की किताबें थीं, तो कहीं आत्मकथा और कहीं और स्कूल की किताबें। कॉपियां और पेन के अलग अलग ढेर और गुच्छे थे। लक्ष्मी आंटी ने किसी जेवर की तरह उन पर अपनी उंगली घुमाई। मैंने पीछे से लक्ष्मी आंटी के कान में कहा,
"लक्ष्मी आंटी, अब तुम्हारी की तनख़ा बढ़ गई है और तुम जो चाहो खरीद सकती हो। मैं जानता हूं कि तुम अपनी पढ़ाई अपने दम पर करना चाहती हो। तुम जो खरीद लोगी उसके पैसे तुम्हारी तनख़ा से काट लेंगे।
लक्ष्मी आंटी ने खुश होकर दौड़ना शुरू किया। उसने अलग अलग तरह की कॉपियां और पेन लिए। लक्ष्मी आंटी ने कुछ 10 वी कक्षा की किताबें खरीद ली और साथ में इंग्लिश सीखने की किताब भी ली। मैंने लक्ष्मी आंटी के हाथ में भारी वजन को देखा पर लक्ष्मी आंटी को उस का कोई ग़म नहीं था।
विक्की दुकान के बाहर से ही लक्ष्मी आंटी को देख रहा था और हमारे बाहर आते ही लक्ष्मी आंटी को चिढ़ाने लगा।
लक्ष्मी आंटी अपने कपड़ों के बारे में पूरा भूल गई। उस वक़्त अगर कोई हमें देखता तो उसे बस कॉलेज के 3 दोस्त दिखते। हम दोनों लक्ष्मी आंटी को होटल में ले गए और लक्ष्मी आंटी को मुंबई कि पाव भाजी खिलाई। लक्ष्मी आंटी तो सातवे आसमान में उड़ रही थी कि उसका दिन ऐसे बिता। पेट भरने के बाद जब हम ने बिल चुकाया तो कीमत देख लक्ष्मी आंटी चौंक गई।
लक्ष्मी आंटी बोल पड़ी, "बाबू, इतने में तो मैं आप दोनों को 3दिन ये सब्जी बना कर खिलाऊं!!"
विक्की ने लक्ष्मी आंटी को हंसकर कंधे से धक्का देते हुए कहा, "लेकिन थकने के बाद अच्छा खाना तुरन्त मिलने की भी कीमत होती है ना?"
लक्ष्मी आंटी ने सोच कर हां कहा और हम सब ने रिक्शा कर घर लौट आए। लक्ष्मी आंटी ने हमारी भरी हुई थैलियां घर में जा कर खोली। पहले उसने बड़े प्यार से अपनी किताबें हमारे पढ़ाई के समान के साथ में रख दी। बाकी सामान ले कर लक्ष्मी आंटी किचन में गई। हम दोनों हॉल में बैठ कर घड़ी देखने लगे।
लक्ष्मी आंटी ने किचन में से कहा, "बाबू, अब जब सारा सामान आ गया है तो मै आप दोनों को परेशान नहीं करूंगी। ताजी सब्जियां मै यहीं से खरीद लूंगी पर कोई सब्ज़ी पसंद ना हो तो मुझे अभी… आ!!!"
लक्ष्मी आंटी ने थैला बाहर लाते हुए कहा, "बाबू उन्होंने आप के थैले में किसी और का सामान भर दिया है। हमें इसे लौटकर पैसे वापस लेने होंगे!"
"तो तुम्हें ये कपड़े पसंद नहीं आए? कुछ ज्यादा ही बड़े हैं पर सोचा शहरी लड़कियों के छोटे कपडे तुम्हे पसंद नहीं आयेंगे।"
लक्ष्मी आंटी वहीं जमीन पर थैला ले कर बैठ गई। उसने एक एक कपड़ा बाहर निकलते हुए उसे छुआ।
लाल और सफेद टॉप के साथ पहनने के लिए हरी लेगिंग्स थी। अनेक रंगों के डिजाइन से बनी नीली सलवार कमीज़ कि जोड़ी थी। इन कपड़ों के नीचे एक गुलाबी शर्ट और सफेद लेडीज पतलून थी। पतलून के साथ satin में बना पट्टा निकल आया। यह गुलाबी satin में बना camisole और boy-shorts थे।
लक्ष्मी आंटी ने हमारी ओर देखा तो मैंने कहा, "घर में पहनने के लिए दूसरी जोड़ी भी होनी चाहिए। नीचे देखो, कुछ और भी होगा।"
लक्ष्मी आंटी के हाथ एक पैकेट लगा जिस में कॉम्पैक्ट पाउडर, कुछ लिपस्टिक और सिंदूर कि एक डिब्बी थी। लक्ष्मी आंटी ने हम दोनों को गले लगाया और कहा कि वह हमारा शुक्रिया कैसे अदा करे।
"लक्ष्मी आंटी क्यों न तुम ये कपड़े पहन कर देखो? इन कपड़ों के नाप बड़ी मुश्किल से लिए थे।"
लक्ष्मी आंटी थैला बेडरूम में ले गई और एक एक ड्रेस कि नुमाईश हमारे लिए करने लगी। गुलाबी शर्ट और सफेद लेडीज पैंट पहन कर लक्ष्मी आंटी किसी बड़ी कंपनी की अफसर लग रही थी पर उसे इन कपड़ों की आदत नहीं थी और उसने सुडौल पैरों को हाथों से छिपा रही थी।
शिकायत के स्वर में लक्ष्मी आंटी बोली, "बाबू ये किस काम आयेगा?"
विक्की ने गूढ़ अर्थ से कहा, "हर चीज का वक़्त होता है।"
लक्ष्मी आंटी समझ गई कि उसे जवाब आसानी से नहीं मिलेगा और आखरी जोड़ी पहनने के लिए अंदर चली गई।
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