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मस्त पड़ोसन (पड़ोसन को दुल्हन बनाया )
यह कहानी तब शुरू हुई जब मैंने दिल्ली की एक डीडीए कॉलोनी में किराए पर ग्राउंड फ्लोर पर फ्लैट लिया। उसी समय मेरा तबादला लखनऊ से दिल्ली हुआ था। मैं एक आंतरराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी करता था। जब मैंने पहली बार उस फ्लैट को देखा और मालिक मकान से किराया बगैरह तय किया तब मेरी मुलाक़ात हमारे होनेवाले पडोसी सेठी साहब और उनकी पत्नी डॉली से हुई।
उस समय उन दोनों से मिलकर मुझे बड़ा ही अपनापन महसूस हुआ। सेठी साहब का नाम था सुमेर सेठी। वह पंजाबी थे पर उनका जनम और परवरिश ओडिशा में ही हुई थी। सेठी साहब की करीब एक साल पहले दिल्ली में नौकरी लग गयी थी। वह एक अर्ध सरकारी यात्रा कंपनी में मैनेजर थे। कंपनी में उनका बड़ा ओहदा और रुसूख़ था। उनके घर बाहर पार्किंग में हमेशा एक दो लक्ज़री कारें खड़ी होती थीं।
सेठी साहब का फ्लैट हमारे बिलकुल सामने वाले ब्लॉक में था। हमारे दोनों के फ्लैट ग्राउंड फ्लोर पर ही थे। दोनों फ्लैट के बीच का फासला कुछ पच्चीस तीस कदम होगा।
सेठी साहब और उनकी पत्नी डॉली के व्यवहार में एक अद्भुत सा अपनापन था जो मैंने बहुत ही कम लोगों में देखा था। एक ही पंक्ति में कहूं तो वह दोनों पति पत्नी जरुरत से ज्यादा भले इंसान थे। फ्लैट का कब्जा लेते समय सेठी साहब ने मुझे कहा की अगर मैं उनको घर की चाभी दे दूंगा तो वह हमारे आ जाने से पहले घर में साफसूफ बगैरह करवाकर रखेंगे। मैंने फ़ौरन उनको घर की चाभी देदी और उनका फ़ोन नंबर ले लिया। वापस लखनऊ जा कर मैंने उन्हें हमारे दिल्ली पहुँचने का दिन और अंदाजे से समय भी बता दिया।
हम (मैं, मेरी पत्नी ज्योति और मेरा छोटा बेटा) लखनऊ से सुबह निकल कर करीब शाम को चार बजे दिल्ली हमारे फ्लैट पर पहुंचे। फ्लैट पर पहुंच कर जब हमने चाभी लेकर घर खोला तो घर एकदम साफ़ सुथरा पाया। हमारा घर गृहस्थी का सामान उसी दिन सुबह ही ट्रक में दिल्ली पहुँच चुका था। सेठी साहब ने पहले से ही दो मजदूरों का प्रावधान कर वह सामान को ट्रक में से निकलवाकर घर में रख रखा था।
हम से बात करके ट्रक का बचा हुआ किराया भी उन्होंने अपनी जेब से चुकता कर दिया था। यह एक अनहोनी घटना थी। कोई पडोसी आजकल के जमाने इतना कुछ करता है क्या? हमें वहाँ पहुँच कर बस अपना सामन खोल कर घर को सजाना ही था। हमारी पड़ोसन श्रीमती डॉली सेठी वहाँ पहुंची और मेरी पत्नी ज्योति से मिली और उन्होंने अपना परिचय दिया। साथ में ही उन्होंने हमारे लिए नाश्ता, रात के डिनर का और एक कामवाली का भी प्रबंध कर दिया था।
ज्योति तो उनके इस उपकार से बड़ी ही कृतज्ञ महसूस करने लगी। शाम को करीब साढ़े सात बजे जब हम दो कमरों को पूरी तरह सजा कर घर में कुछ देर विश्राम कर रहे थे तब सेठी साहब हमारे घर हमें भोजन के लिए बुलाने आ पहुंचे।
सेठी साहब अच्छे खासे हैंडसम और ऊँचे तगड़े नौजवान थे। वह हर हफ्ते शनिवार और इतवार को जरूर जिम में आधे घंटे से एक घंटे तक कसरत करते थे जिसके कारण उनके कंधे, छाती, बाजू, पेट, जाँघें, आदि सख्त और मांसल थे। सेठी साहब ने अपनी डिग्री के अलावा फ़िजिओथेरपी में भी डिप्लोमा कर रखा था। वह कुछ समय के लिए फिजियोथेरपी की प्रैक्टिस भी करते थे। उन्हें दुर्गा माँ में अटूट श्रद्धा थी और वह हर साल एक बार वैष्णोदेवी की यात्रा जरूर करते थे।
उस समय दिल्ली में एक यात्रा कंपनी में सेठी साहब काफी जिम्मेवार ओहदे पर थे और स्वभावतः गंभीर लगते थे। पर जैसे उनसे परिचय और करीबियां बढ़ीं तब मुझे लगने लगा की उनमें भी बचपन की चंचलता और जवानी का जोश काफी मात्रा में था जो सेठी साहब आसानी से नहीं उजागर होने देते थे। यह मेरी नज़रों से नहीं छिप पाया की मेरी कमनीय पत्नी ज्योति को पहली बार देखते ही उनकी नजरें मेरी पत्नी के बदन का मुआइना करते हुए ज्योति की छाती पर एक पल के लिए जैसे थम सी गयीं। पर फ़ौरन औचित्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपनी नजरें नीची कर लीं और हम औपचारिक बातों में जुट गए। मेरी चालाक बाज शिकारी जैसी पैनी नजर ने वह एक पल के सेठी साहब के मन के भाव भाँप ने में देर नहीं की।
पहले दिन से ही मैंने सेठी साहब की आँखों में जो भाव देखे तो मैं समझ गया की ज्योति उनको भा गयी थी। जैसे जैसे बाद में परिचय बढ़ता गया और एक दूसरे से नजदीकियां बढ़ने लगीं और औपचारिकतायें कम होती गयी वैसे वैसे मेरा यह विचार दृढ होता गया। मौक़ा मिलते ही सेठी साहब जिस तरह चोरी छिपी कुछ पल के लिए ज्योति के पुरे बदन पर नजरें घुमा कर देख लेते थे, लगता था शायद वह ज्योति को अपनी आँखों से ही कपडे उतार कर नंगी देख रहे हों।
ज्योति भी शायद सेठी साहब की आँखों के भाव समझ गयी होंगी। पर सेठी साहब ने कभी भी ज्योति को अपनी नजर या व्यवहार से शिकायत का कोई अवसर नहीं दिया। और फिर वैसे भी उससे पहले करीब करीब हर मर्द से सेठी साहब से कहीं ज्यादा बीभत्स नज़रों की ज्योति को आदत हो चुकी थी। सेठी साहब के मीठे और प्यार भरे वर्तन के कारण ज्योति भी शायद उनकी सराहना भरी नजर से नाराज होने के बजाय उन्हें पसंद करने लगी थी।
उस रात को जब हम सेठी साहब के वहाँ से डिनर कर वापस आये तब मैंने चुटकी लेते हुए ज्योति से कहा, “सेठी साहब वैसे तो बहुत ही भले इंसान हैं पर मुझे लगता है अपने जमाने में वह काफी रोमांटिक रहे होंगे। ख़ास कर तुम पर ख़ास मेहरबान लगते हैं। जब भी मौक़ा मिलता है तुम्हें ध्यान से देखना नहीं चूकते।”
मेरा कटाक्ष समझने में मेरी पत्नी को ज़रा भी देर ना लगी। ज्योति ने तपाक से पलटवार करते हुए कहा, “क्यों नहीं? अरे सेठी साहब जरूर मुझे देखते हैं, पर तुम क्या करते हो? मैं देख रही थी की तुम तो बेशर्मों की तरह डॉली जी को घूरने से बाज ही नहीं आते। जहां तक सेठी साहब का सवाल है, बेचारे नजरें चुरा कर ही देखते ही हैं, तुम्हारी तरह बेशर्म बनकर आँखें फाड़ फाड़ कर वह मेरी नंगी कमर के नीचे तो नहीं घूरते। और फिर मैं तो इतना जानती हूँ की आज एक ही दिन में हमारा घर उन्हीं के कारण सेट हो गया। शादी के बाद अभी तक हमारी इतनी ट्रांसफर हुई, पर क्या ऐसा कभी हुआ है की हमारा घर पहले ही दिन सेट हो गया और हमें कोई परेशानी भी नहीं हुई?”
ज्योति ने तो मेरी बोलती ही बंद कर दी। एक ही झटके में उसने मुझे दो नसीहत दी। पहली यह की मैं सेठी साहब के बारे में उलटी सीधी टिपण्णी ना करूँ और दूसरे यह की उसने मेरा डॉली को ताड़ना पकड़ लिया था। यह सच था की डॉली जी ने पहली नजर में ही मुझे घायल कर दिया था।
ना चाहते हुए भी मैं उनकी साड़ी ब्लाउज के बीच के नंगे हिस्से को घूर कर देखे बिना रह नहीं सकता था। बार बार मेरी नजर वहाँ जाती और मन में यह इच्छा होती की काश उनकी साड़ी जो नाभि के काफी नीचे तक पहनी हुई थी, थोड़ी नीचे की और खिसके। यह बात बीबियों से कहाँ छिपती हैं? जब कोई खूबसूरत औरत आसपास हो तो वह तो अपने पति की नजर पर कड़ी निगरानी रखती हैं।
वह बात वैसे तो वही ख़तम हो गयी, पर वास्तव में हमारी पहली रोमांटिक अंदाज वाली बात वहाँ से
शुरू हुईं।
यह कहानी तब शुरू हुई जब मैंने दिल्ली की एक डीडीए कॉलोनी में किराए पर ग्राउंड फ्लोर पर फ्लैट लिया। उसी समय मेरा तबादला लखनऊ से दिल्ली हुआ था। मैं एक आंतरराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी करता था। जब मैंने पहली बार उस फ्लैट को देखा और मालिक मकान से किराया बगैरह तय किया तब मेरी मुलाक़ात हमारे होनेवाले पडोसी सेठी साहब और उनकी पत्नी डॉली से हुई।
उस समय उन दोनों से मिलकर मुझे बड़ा ही अपनापन महसूस हुआ। सेठी साहब का नाम था सुमेर सेठी। वह पंजाबी थे पर उनका जनम और परवरिश ओडिशा में ही हुई थी। सेठी साहब की करीब एक साल पहले दिल्ली में नौकरी लग गयी थी। वह एक अर्ध सरकारी यात्रा कंपनी में मैनेजर थे। कंपनी में उनका बड़ा ओहदा और रुसूख़ था। उनके घर बाहर पार्किंग में हमेशा एक दो लक्ज़री कारें खड़ी होती थीं।
सेठी साहब का फ्लैट हमारे बिलकुल सामने वाले ब्लॉक में था। हमारे दोनों के फ्लैट ग्राउंड फ्लोर पर ही थे। दोनों फ्लैट के बीच का फासला कुछ पच्चीस तीस कदम होगा।
सेठी साहब और उनकी पत्नी डॉली के व्यवहार में एक अद्भुत सा अपनापन था जो मैंने बहुत ही कम लोगों में देखा था। एक ही पंक्ति में कहूं तो वह दोनों पति पत्नी जरुरत से ज्यादा भले इंसान थे। फ्लैट का कब्जा लेते समय सेठी साहब ने मुझे कहा की अगर मैं उनको घर की चाभी दे दूंगा तो वह हमारे आ जाने से पहले घर में साफसूफ बगैरह करवाकर रखेंगे। मैंने फ़ौरन उनको घर की चाभी देदी और उनका फ़ोन नंबर ले लिया। वापस लखनऊ जा कर मैंने उन्हें हमारे दिल्ली पहुँचने का दिन और अंदाजे से समय भी बता दिया।
हम (मैं, मेरी पत्नी ज्योति और मेरा छोटा बेटा) लखनऊ से सुबह निकल कर करीब शाम को चार बजे दिल्ली हमारे फ्लैट पर पहुंचे। फ्लैट पर पहुंच कर जब हमने चाभी लेकर घर खोला तो घर एकदम साफ़ सुथरा पाया। हमारा घर गृहस्थी का सामान उसी दिन सुबह ही ट्रक में दिल्ली पहुँच चुका था। सेठी साहब ने पहले से ही दो मजदूरों का प्रावधान कर वह सामान को ट्रक में से निकलवाकर घर में रख रखा था।
हम से बात करके ट्रक का बचा हुआ किराया भी उन्होंने अपनी जेब से चुकता कर दिया था। यह एक अनहोनी घटना थी। कोई पडोसी आजकल के जमाने इतना कुछ करता है क्या? हमें वहाँ पहुँच कर बस अपना सामन खोल कर घर को सजाना ही था। हमारी पड़ोसन श्रीमती डॉली सेठी वहाँ पहुंची और मेरी पत्नी ज्योति से मिली और उन्होंने अपना परिचय दिया। साथ में ही उन्होंने हमारे लिए नाश्ता, रात के डिनर का और एक कामवाली का भी प्रबंध कर दिया था।
ज्योति तो उनके इस उपकार से बड़ी ही कृतज्ञ महसूस करने लगी। शाम को करीब साढ़े सात बजे जब हम दो कमरों को पूरी तरह सजा कर घर में कुछ देर विश्राम कर रहे थे तब सेठी साहब हमारे घर हमें भोजन के लिए बुलाने आ पहुंचे।
सेठी साहब अच्छे खासे हैंडसम और ऊँचे तगड़े नौजवान थे। वह हर हफ्ते शनिवार और इतवार को जरूर जिम में आधे घंटे से एक घंटे तक कसरत करते थे जिसके कारण उनके कंधे, छाती, बाजू, पेट, जाँघें, आदि सख्त और मांसल थे। सेठी साहब ने अपनी डिग्री के अलावा फ़िजिओथेरपी में भी डिप्लोमा कर रखा था। वह कुछ समय के लिए फिजियोथेरपी की प्रैक्टिस भी करते थे। उन्हें दुर्गा माँ में अटूट श्रद्धा थी और वह हर साल एक बार वैष्णोदेवी की यात्रा जरूर करते थे।
उस समय दिल्ली में एक यात्रा कंपनी में सेठी साहब काफी जिम्मेवार ओहदे पर थे और स्वभावतः गंभीर लगते थे। पर जैसे उनसे परिचय और करीबियां बढ़ीं तब मुझे लगने लगा की उनमें भी बचपन की चंचलता और जवानी का जोश काफी मात्रा में था जो सेठी साहब आसानी से नहीं उजागर होने देते थे। यह मेरी नज़रों से नहीं छिप पाया की मेरी कमनीय पत्नी ज्योति को पहली बार देखते ही उनकी नजरें मेरी पत्नी के बदन का मुआइना करते हुए ज्योति की छाती पर एक पल के लिए जैसे थम सी गयीं। पर फ़ौरन औचित्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपनी नजरें नीची कर लीं और हम औपचारिक बातों में जुट गए। मेरी चालाक बाज शिकारी जैसी पैनी नजर ने वह एक पल के सेठी साहब के मन के भाव भाँप ने में देर नहीं की।
पहले दिन से ही मैंने सेठी साहब की आँखों में जो भाव देखे तो मैं समझ गया की ज्योति उनको भा गयी थी। जैसे जैसे बाद में परिचय बढ़ता गया और एक दूसरे से नजदीकियां बढ़ने लगीं और औपचारिकतायें कम होती गयी वैसे वैसे मेरा यह विचार दृढ होता गया। मौक़ा मिलते ही सेठी साहब जिस तरह चोरी छिपी कुछ पल के लिए ज्योति के पुरे बदन पर नजरें घुमा कर देख लेते थे, लगता था शायद वह ज्योति को अपनी आँखों से ही कपडे उतार कर नंगी देख रहे हों।
ज्योति भी शायद सेठी साहब की आँखों के भाव समझ गयी होंगी। पर सेठी साहब ने कभी भी ज्योति को अपनी नजर या व्यवहार से शिकायत का कोई अवसर नहीं दिया। और फिर वैसे भी उससे पहले करीब करीब हर मर्द से सेठी साहब से कहीं ज्यादा बीभत्स नज़रों की ज्योति को आदत हो चुकी थी। सेठी साहब के मीठे और प्यार भरे वर्तन के कारण ज्योति भी शायद उनकी सराहना भरी नजर से नाराज होने के बजाय उन्हें पसंद करने लगी थी।
उस रात को जब हम सेठी साहब के वहाँ से डिनर कर वापस आये तब मैंने चुटकी लेते हुए ज्योति से कहा, “सेठी साहब वैसे तो बहुत ही भले इंसान हैं पर मुझे लगता है अपने जमाने में वह काफी रोमांटिक रहे होंगे। ख़ास कर तुम पर ख़ास मेहरबान लगते हैं। जब भी मौक़ा मिलता है तुम्हें ध्यान से देखना नहीं चूकते।”
मेरा कटाक्ष समझने में मेरी पत्नी को ज़रा भी देर ना लगी। ज्योति ने तपाक से पलटवार करते हुए कहा, “क्यों नहीं? अरे सेठी साहब जरूर मुझे देखते हैं, पर तुम क्या करते हो? मैं देख रही थी की तुम तो बेशर्मों की तरह डॉली जी को घूरने से बाज ही नहीं आते। जहां तक सेठी साहब का सवाल है, बेचारे नजरें चुरा कर ही देखते ही हैं, तुम्हारी तरह बेशर्म बनकर आँखें फाड़ फाड़ कर वह मेरी नंगी कमर के नीचे तो नहीं घूरते। और फिर मैं तो इतना जानती हूँ की आज एक ही दिन में हमारा घर उन्हीं के कारण सेट हो गया। शादी के बाद अभी तक हमारी इतनी ट्रांसफर हुई, पर क्या ऐसा कभी हुआ है की हमारा घर पहले ही दिन सेट हो गया और हमें कोई परेशानी भी नहीं हुई?”
ज्योति ने तो मेरी बोलती ही बंद कर दी। एक ही झटके में उसने मुझे दो नसीहत दी। पहली यह की मैं सेठी साहब के बारे में उलटी सीधी टिपण्णी ना करूँ और दूसरे यह की उसने मेरा डॉली को ताड़ना पकड़ लिया था। यह सच था की डॉली जी ने पहली नजर में ही मुझे घायल कर दिया था।
ना चाहते हुए भी मैं उनकी साड़ी ब्लाउज के बीच के नंगे हिस्से को घूर कर देखे बिना रह नहीं सकता था। बार बार मेरी नजर वहाँ जाती और मन में यह इच्छा होती की काश उनकी साड़ी जो नाभि के काफी नीचे तक पहनी हुई थी, थोड़ी नीचे की और खिसके। यह बात बीबियों से कहाँ छिपती हैं? जब कोई खूबसूरत औरत आसपास हो तो वह तो अपने पति की नजर पर कड़ी निगरानी रखती हैं।
वह बात वैसे तो वही ख़तम हो गयी, पर वास्तव में हमारी पहली रोमांटिक अंदाज वाली बात वहाँ से
शुरू हुईं।