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Adultery मस्त पड़ोसन (पड़ोसन को दुल्हन बनाया )

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मस्त पड़ोसन (पड़ोसन को दुल्हन बनाया )

यह कहानी तब शुरू हुई जब मैंने दिल्ली की एक डीडीए कॉलोनी में किराए पर ग्राउंड फ्लोर पर फ्लैट लिया। उसी समय मेरा तबादला लखनऊ से दिल्ली हुआ था। मैं एक आंतरराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी करता था। जब मैंने पहली बार उस फ्लैट को देखा और मालिक मकान से किराया बगैरह तय किया तब मेरी मुलाक़ात हमारे होनेवाले पडोसी सेठी साहब और उनकी पत्नी डॉली से हुई।

उस समय उन दोनों से मिलकर मुझे बड़ा ही अपनापन महसूस हुआ। सेठी साहब का नाम था सुमेर सेठी। वह पंजाबी थे पर उनका जनम और परवरिश ओडिशा में ही हुई थी। सेठी साहब की करीब एक साल पहले दिल्ली में नौकरी लग गयी थी। वह एक अर्ध सरकारी यात्रा कंपनी में मैनेजर थे। कंपनी में उनका बड़ा ओहदा और रुसूख़ था। उनके घर बाहर पार्किंग में हमेशा एक दो लक्ज़री कारें खड़ी होती थीं।

सेठी साहब का फ्लैट हमारे बिलकुल सामने वाले ब्लॉक में था। हमारे दोनों के फ्लैट ग्राउंड फ्लोर पर ही थे। दोनों फ्लैट के बीच का फासला कुछ पच्चीस तीस कदम होगा।

सेठी साहब और उनकी पत्नी डॉली के व्यवहार में एक अद्भुत सा अपनापन था जो मैंने बहुत ही कम लोगों में देखा था। एक ही पंक्ति में कहूं तो वह दोनों पति पत्नी जरुरत से ज्यादा भले इंसान थे। फ्लैट का कब्जा लेते समय सेठी साहब ने मुझे कहा की अगर मैं उनको घर की चाभी दे दूंगा तो वह हमारे आ जाने से पहले घर में साफसूफ बगैरह करवाकर रखेंगे। मैंने फ़ौरन उनको घर की चाभी देदी और उनका फ़ोन नंबर ले लिया। वापस लखनऊ जा कर मैंने उन्हें हमारे दिल्ली पहुँचने का दिन और अंदाजे से समय भी बता दिया।

हम (मैं, मेरी पत्नी ज्योति और मेरा छोटा बेटा) लखनऊ से सुबह निकल कर करीब शाम को चार बजे दिल्ली हमारे फ्लैट पर पहुंचे। फ्लैट पर पहुंच कर जब हमने चाभी लेकर घर खोला तो घर एकदम साफ़ सुथरा पाया। हमारा घर गृहस्थी का सामान उसी दिन सुबह ही ट्रक में दिल्ली पहुँच चुका था। सेठी साहब ने पहले से ही दो मजदूरों का प्रावधान कर वह सामान को ट्रक में से निकलवाकर घर में रख रखा था।

हम से बात करके ट्रक का बचा हुआ किराया भी उन्होंने अपनी जेब से चुकता कर दिया था। यह एक अनहोनी घटना थी। कोई पडोसी आजकल के जमाने इतना कुछ करता है क्या? हमें वहाँ पहुँच कर बस अपना सामन खोल कर घर को सजाना ही था। हमारी पड़ोसन श्रीमती डॉली सेठी वहाँ पहुंची और मेरी पत्नी ज्योति से मिली और उन्होंने अपना परिचय दिया। साथ में ही उन्होंने हमारे लिए नाश्ता, रात के डिनर का और एक कामवाली का भी प्रबंध कर दिया था।

ज्योति तो उनके इस उपकार से बड़ी ही कृतज्ञ महसूस करने लगी। शाम को करीब साढ़े सात बजे जब हम दो कमरों को पूरी तरह सजा कर घर में कुछ देर विश्राम कर रहे थे तब सेठी साहब हमारे घर हमें भोजन के लिए बुलाने आ पहुंचे।

सेठी साहब अच्छे खासे हैंडसम और ऊँचे तगड़े नौजवान थे। वह हर हफ्ते शनिवार और इतवार को जरूर जिम में आधे घंटे से एक घंटे तक कसरत करते थे जिसके कारण उनके कंधे, छाती, बाजू, पेट, जाँघें, आदि सख्त और मांसल थे। सेठी साहब ने अपनी डिग्री के अलावा फ़िजिओथेरपी में भी डिप्लोमा कर रखा था। वह कुछ समय के लिए फिजियोथेरपी की प्रैक्टिस भी करते थे। उन्हें दुर्गा माँ में अटूट श्रद्धा थी और वह हर साल एक बार वैष्णोदेवी की यात्रा जरूर करते थे।

उस समय दिल्ली में एक यात्रा कंपनी में सेठी साहब काफी जिम्मेवार ओहदे पर थे और स्वभावतः गंभीर लगते थे। पर जैसे उनसे परिचय और करीबियां बढ़ीं तब मुझे लगने लगा की उनमें भी बचपन की चंचलता और जवानी का जोश काफी मात्रा में था जो सेठी साहब आसानी से नहीं उजागर होने देते थे। यह मेरी नज़रों से नहीं छिप पाया की मेरी कमनीय पत्नी ज्योति को पहली बार देखते ही उनकी नजरें मेरी पत्नी के बदन का मुआइना करते हुए ज्योति की छाती पर एक पल के लिए जैसे थम सी गयीं। पर फ़ौरन औचित्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपनी नजरें नीची कर लीं और हम औपचारिक बातों में जुट गए। मेरी चालाक बाज शिकारी जैसी पैनी नजर ने वह एक पल के सेठी साहब के मन के भाव भाँप ने में देर नहीं की।

पहले दिन से ही मैंने सेठी साहब की आँखों में जो भाव देखे तो मैं समझ गया की ज्योति उनको भा गयी थी। जैसे जैसे बाद में परिचय बढ़ता गया और एक दूसरे से नजदीकियां बढ़ने लगीं और औपचारिकतायें कम होती गयी वैसे वैसे मेरा यह विचार दृढ होता गया। मौक़ा मिलते ही सेठी साहब जिस तरह चोरी छिपी कुछ पल के लिए ज्योति के पुरे बदन पर नजरें घुमा कर देख लेते थे, लगता था शायद वह ज्योति को अपनी आँखों से ही कपडे उतार कर नंगी देख रहे हों।

ज्योति भी शायद सेठी साहब की आँखों के भाव समझ गयी होंगी। पर सेठी साहब ने कभी भी ज्योति को अपनी नजर या व्यवहार से शिकायत का कोई अवसर नहीं दिया। और फिर वैसे भी उससे पहले करीब करीब हर मर्द से सेठी साहब से कहीं ज्यादा बीभत्स नज़रों की ज्योति को आदत हो चुकी थी। सेठी साहब के मीठे और प्यार भरे वर्तन के कारण ज्योति भी शायद उनकी सराहना भरी नजर से नाराज होने के बजाय उन्हें पसंद करने लगी थी।

उस रात को जब हम सेठी साहब के वहाँ से डिनर कर वापस आये तब मैंने चुटकी लेते हुए ज्योति से कहा, “सेठी साहब वैसे तो बहुत ही भले इंसान हैं पर मुझे लगता है अपने जमाने में वह काफी रोमांटिक रहे होंगे। ख़ास कर तुम पर ख़ास मेहरबान लगते हैं। जब भी मौक़ा मिलता है तुम्हें ध्यान से देखना नहीं चूकते।”

मेरा कटाक्ष समझने में मेरी पत्नी को ज़रा भी देर ना लगी। ज्योति ने तपाक से पलटवार करते हुए कहा, “क्यों नहीं? अरे सेठी साहब जरूर मुझे देखते हैं, पर तुम क्या करते हो? मैं देख रही थी की तुम तो बेशर्मों की तरह डॉली जी को घूरने से बाज ही नहीं आते। जहां तक सेठी साहब का सवाल है, बेचारे नजरें चुरा कर ही देखते ही हैं, तुम्हारी तरह बेशर्म बनकर आँखें फाड़ फाड़ कर वह मेरी नंगी कमर के नीचे तो नहीं घूरते। और फिर मैं तो इतना जानती हूँ की आज एक ही दिन में हमारा घर उन्हीं के कारण सेट हो गया। शादी के बाद अभी तक हमारी इतनी ट्रांसफर हुई, पर क्या ऐसा कभी हुआ है की हमारा घर पहले ही दिन सेट हो गया और हमें कोई परेशानी भी नहीं हुई?”

ज्योति ने तो मेरी बोलती ही बंद कर दी। एक ही झटके में उसने मुझे दो नसीहत दी। पहली यह की मैं सेठी साहब के बारे में उलटी सीधी टिपण्णी ना करूँ और दूसरे यह की उसने मेरा डॉली को ताड़ना पकड़ लिया था। यह सच था की डॉली जी ने पहली नजर में ही मुझे घायल कर दिया था।

ना चाहते हुए भी मैं उनकी साड़ी ब्लाउज के बीच के नंगे हिस्से को घूर कर देखे बिना रह नहीं सकता था। बार बार मेरी नजर वहाँ जाती और मन में यह इच्छा होती की काश उनकी साड़ी जो नाभि के काफी नीचे तक पहनी हुई थी, थोड़ी नीचे की और खिसके। यह बात बीबियों से कहाँ छिपती हैं? जब कोई खूबसूरत औरत आसपास हो तो वह तो अपने पति की नजर पर कड़ी निगरानी रखती हैं।

वह बात वैसे तो वही ख़तम हो गयी, पर वास्तव में हमारी पहली रोमांटिक अंदाज वाली बात वहाँ से

शुरू हुईं।
 
मेरी बीबी ज्योति करीब ३२ साल की थी। उसकी जवानी पूरी खिली हुई थी। उसके काले घुंघराले लम्बे बालों की लट उसके कानों पर लटकती हुई उसकी खूबसूरती में चारचाँद लगा देती थी। ज्योति के खूबसूरत स्तनमंडल उसके ब्लाउज में समा नहीं पा रहे थे। स्तनोँ का काफी उभरा हुआ हिस्सा गर्दन के नीचे से दिखता था जिसे ज्योति सलवार या पल्लू से ढकने की नाकाम कोशिश करती रहती थी।

ज्योति की कमर बड़ी ही लुभावनी लगती थी। ख़ास कर उसकी नाभि के आसपास का उतार चढ़ाव। साडी नाभि से काफी नीची पहनने के कारण ज्योति की नाभि के नीचे का उभार और फिर एकदम ढलाव जो दिखता था वह गजब का होता था। ज्योति बिलकुल सही कद की थी। ना उसका जीरो फिगर था ना ही वह तंदुरस्त लगती थी। ज्योति के कूल्हे काफी आकर्षक थे। गोल माँसल थे पर ज्यादा भी उभरे हुए नहीं की भद्दे लगे।

सेठी साहब की पत्नी डॉली ज्योति से थोड़ी कम लम्बाई की थी पर नाक नक़्शे में वह ज्योति से बिलकुल कम नहीं थी। थोड़ी कम ऊंचाई के कारण वह उम्र में भी एकदम छोटी लगती थी। डॉली का चेहरा भी जिसे बेबी डॉल कहते हैं, ऐसा था। बदन पतला पर स्तन भरे हुए, कमर पतली पर कूल्हे आकर्षक, धनुष्य से लाल होंठ, लम्बी, गर्दन और पतली मांसल जांघें, किसी भी मर्द की की नजर में देखते ही समा जाती थीं। डॉली जी की बोली मीठी थी। कभी हमने उनको किसी की निंदा करते हुए या इधर उधर की बात करते हुए नहीं सुना। पर हाँ, वह कोई लागलपेट के बिना एकदम सीधा बोलती थी।

अगर उनको कुछ कहना है तो वह साफ़ साफ़ बहुत ही सीधी पर शिष्ट भाषा में बोल देती थी। पहली बार ही जब मैंने डॉली को देखा तो मुझे अनायास ही सेठी साहब से मन ही मन इर्षा होने लगी। ऐसी नक्शेकारी की मूरत जिसके साथ रोज सोती हो वह मर्द तक़दीर वाला ही कहलायेगा।

वैसे ही दिन बीतते गए और सेठी साहब और डॉली के साथ हमारे रिश्ते दिन ब दिन करीबी होते चले गए। मेरी नौकरी में मुझे काफी टूर करना पड़ता था। मैं महीने में कई दिन घर से दूर रहता था। ज्योति को जब भी कोई समस्या होती या काम होता और सेठी साहब को पता लगता तो बगैर समय गँवाए सेठी साहब फ़ौरन उसे हल कर देते।

मध्यम वर्ग और सिमित आय वाली गृहिणीं को रोज कई समस्याओं से झूझना पड़ता है। पानी, दूध, गैस, बिजली, कामवाली, सफाई, बच्चे, स्कूल, और पता नहीं क्या क्या नयी नयी समस्याएं रोज होती हैं। अगर कोई इन्हें भाग कर सुलझाले तो जिंदगी काफी आसान हो जाती है। ज्योति सेठी साहब के ऐसे व्यवहार से उनकी कायल हो गयी। जब कोई कामाकर्षक मर्द आपके लिए इतना सब कुछ ख़ुशी ख़ुशी करे तो कोई भी औरत उस मर्द की लोलुप नजरों को बुरा नहीं मानती।

डॉली और सेठी साहब का स्वभाव ही कुछ ऐसा था की हम चाहते हुए भी उनसे अछूते नहीं रह सकते थे। उनकी रसोई में अगर कुछ भी नयी वानगी बनी तो डॉली जी जरूर एक छोटे से पतीले में वह हमें भिजवातीं। वैसे ही ज्योति भी करती। सेठी साहब और डॉली हमारे पडोसी नहीं एक तरह से फॅमिली जैसे ही बन गए। कई बार उनका लंच या डिनर हमारे यहां होता तो कभी हम उनके यहाँ लंच या डिनर कर लेते। जब मैं घर पर होता था तो मैं और सेठी साहब अक्सर ड्रिंक हफ्ते में एक बार जरूर साथ में बैठ कर करते। या तो हमारे घर या फिर उनके घर।

मैं हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का बड़ा ही शौक़ीन हूँ। मेरे घर में दीवारों पर कई जानेमाने शास्त्रीय संगीत के उस्तादों की तस्वीर देख कर एक दिन डॉली जी काफी उत्तेजित हो कर मुझसे शास्त्रीय संगीत के बारे में पूछने लगीं। डॉली जीका पूरा खानदान शास्त्रीय संगीत में रचापचा था। डॉली के पिता शास्त्रीय संगीत के जाने माने गायक थे। उनके खानदान में कई बड़े कलाकार हुए थे।

उस दिन हम करीब एक घंटे तक ज्योति और सेठी साहब से अलग बैठ कर शास्त्रीय संगीत के बारे में चर्चा करते रहे। डॉली जी शास्त्रीय संगीत में मेरी रूचि देख कर और मेरी बातें सुन कर इतनी खुश हो गयीं की उन्होंने मुझसे वादा किया की अगर मौक़ा मिला तो वह मुझे एक दिन उनके मायके जरूर ले जायेगी और उनके पापा, चाचा बगैरह से मिलवायेगीं। ज्योति ने बिज़नेस मैनेजमेंट किया था, सो उस समय दरम्यान ज्योति भी सेठी साहब के साथ बैठ कर बिज़नेस और फाइनांस के बारे में बात करती रही।
 
कई बार मैं कुछ ना कुछ बहाना कर सेठी साहब के घर चला जाता और अगर सेठी साहब ना होते तो डॉली के साथ गपशप मारने की कोशिश करता रहता। डॉली मेरी नियत से वाकिफ थीं या नहीं, मुझे नहीं पता; पर जब भी मैं जाता था तब डॉली जी भी कामकाज छोड़कर मुझसे बात करने बैठ जाती और हमारी बातें चलती रहतीं। डॉली जी मेरी लोलुप नज़रों का जवाब हँस कर देतीं। मुझे पूरा सपोर्ट देतीं।

जब भी मैं डॉली जी को ताड़ते हुए पकड़ा जाता तो डॉली जी ही उसे कुछ शरारत भरी मुस्कान दे कर नजर अंदाज कर देतीं। इससे मेरे मन में कई बार विचार आया की क्यों नहीं इस बात को आगे बढ़ाया जाए। मैं और आगे बढ़ने से झिझकता था क्यूंकि मुझे पक्का भरोसा नहीं था की अगर मैंने कुछ आगे कदम बढ़ाया तो कहीं डॉली जी या सेठी साहब बुरा ना मानें और हमारे संबंधों में कोई दरार ना पैदा हो।

एक बार मैं वैसे ही एक छुट्टी के दिन सुबह कुछ जल्दी उठ गया। मौसम सुहाना था सो मैं बाहर ताज़ी हवा खाने निकला। सुबह होने में थोड़ा वक्त था। मैंने देखा की सेठी साहब के ड्रॉइंग रूम की बत्तियां जल रहीं थीं। उसके अगले दिन ही डॉली जी उनके ताऊ के घर गयीं थीं। डॉली जी के ताऊजी और बुआ दिल्ली में ही रहते थे। महीने दो महीने में एकाध बार डॉली जी उनसे मिलने चली जातीं थीं।

उस दिन सेठी साहब घर में अकेले ही थे। मैं उनके घर के नजदीक पहुंचा तो सूना की अंदर से कुछ आवाजें आ रही थीं। मैंने उत्सुकता से सेठी साहब के घर की घंटी बजाई। पर शायद बेल काम नहीं कर रही थी। मैंने दरवाजे को धक्का मारा तो पाया की दरवाजा खुला था। शायद दूध वाले से दूध लेने के बाद सेठी साहब दरवाजा बंद करना भूल गए होंगे।

मैं अंदर जैसे ही दाखिल हुआ और जो दृश्य मैंने देखा तो मेरी आँखें फटी की फटी ही रह गयीं। सेठी साहब सिर्फ निक्कर पहने हुए टीवी देख रहे थे। टीवी पर कोई पोर्न वीडियो चल रहा था। सेठी साहब अपना लण्ड निक्कर में से निकाल कर हिला रहे थे। सेठी साहब का लण्ड देख कर मैं भौंचक्का सा रह गया। छे सात इन्च से तो ज्याद ही लंबा होगा और काफी मोटा सख्त खड़ा चिकनाहट से लिपटा हुआ उनका लण्ड देख कर मुझे विश्वास नहीं हुआ की किसी इंसान का इतना बड़ा लण्ड भी हो सकता है। सेठी साहब का बदन पसीने से तरबतर था। लगता था जैसे अभी वह सुबह का व्यायाम कर फारिग हुए हों।

मेरे आने की आहट होते ही सेठी साहब ने मुड़कर मुझे देखा तो एकदम झेंप गए। मैं सेठी साहब को इस हाल में देख कर खुद बड़ा ही शर्मिन्दा हो गया।

मैंने पीछे घूम कर कहा, “सेठी साहब आई ऍम सॉरी, बेल शायद बजी नहीं और दरवाजा खुला था तो मैं अंदर चला आया। मुझे नोक करके आना चाहिए था। मैं बाद में आता हूँ।” यह कह कर मैं जब बाहर निकलने लगा तो सेठी साहब ने खड़े हो कर मेरा हाथ थाम लिया और मुझे घर के अंदर खिंचते हुए बोले, “चलो अब तुम आ ही गए हो और तुमने सब देख ही लिया है तो अब आओ और बैठो। अब मुझसे क्या शर्माना?”

उस समय बड़ी ही अजीब सी स्थिति थी। सेठी साहब ने टीवी बंद कर दिया। मैं बिना कुछ बोले चुपचाप बैठ सेठी साहब को देखता रहा।

कुछ देर चुप्पी के बाद सेठी साहब धीरे से बोले, “देखो अब तुमने तो मुझे देख लिया है तो तुमसे कुछ भी क्या छिपाना? बात यह है की तुम्हारी भाभी डॉली और मेरी आजकल ठीकठाक पटती नहीं है।” यह कह कर सेठी साहब ने अपनी दास्तान सुनाई।

सेठी साहब ने जो कहा वह सुनकर मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। सेठी साहब ने कहा की वह पहले से ही सेक्स में काफी आक्रमक रहे हैं। उनकी शादी हुई तो डॉली जी के साथ वह दिन रात लगे रहते थे। सेठी साहब के अनुसार, वह डॉली जी को २४ घंटे में कम से कम चार बार रगड़ते थे। दिन में दो बार और रात में दो या तीन बार।
 
शुरू में तो डॉली जी ने उनका काफी साथ दिया और खूब चुदवाया, पर वह थक जाती थी। उनके लिए सेठी साहब की ताकत और जोश के साथ कदम से कदम मिलाना कठिन था। धीरे धीरे वह तंग होने लगी। डॉली जी चुदाई एन्जॉय तो करती थी पर इतनी रफ़ नहीं। वह चाहती थी की चुदाई प्यार से धीरे से होनी चाहिए। पर सेठी साहब को रफ़ चुदाई के बगैर चैन नहीं पड़ता था।

सेठी साहब जब चिपक पड़ते थे तो चाटना, काटना, गाँड़ पर चपेट मारते रहना इत्यादि किये बगैर उन्हें संतुष्टी नहीं होती थी। डॉली जी बेचारी जब फारिग होती थी तब गाल, स्तन, पेट, हाथ, जांघें आदि लाल लाल हो जाते थे और उन पर सेठी साहब के दांतों के निशान होते थे। कई बार तो बेचारी डॉली जी चलने की हालात में भी नहीं होती थीं।

सेठी साहब ने कहा, “अब यह हाल है की डॉली मुझे रातको पलंग में अवॉयड करने की कोशिश करती है। आजकल हमारे बीच कुछ ऐसा पेंच फँसा हुआ है की पता नहीं कैसे निकलेगा।” यह कह कर कुछ देर सेठी साहब चुप हो गए। फिर मेरी और देख कर बोले, “हो सकता है तुम मेरी कुछ मदद कर सको।” सेठी साहब ने बिना बताये की क्या पेच फंसा है बात को वहीँ ख़त्म कर दिया।

मैंने पूछा, “सेठी साहब, ऐसा क्या पेंच फँसा हुआ है और मैं आपकी कैसे मदद कर सकता हूँ? बताइये ना, प्लीज?”

सेठी साहब ने कहा, “तुम्हारा कहा डॉली मानती है। मैंने देखा है की तुम्हारी संगीत, कला बगैराह बातों से उसका मूड काफी अच्छा हो जाता है। कई बार वह मुझे तुम्हारी मिसाल देती है। तुम्हारे प्रति वह काफी सम्मान की नज़रों से देखती है। तुम जब कुछ कहते हो तो वह तुम्हारी बात ध्यान से सुनती है। पर हमारे साथ कुछ उलटा ही है। मैं कुछ कहता हूँ तो डॉली उसका उलटा ही अर्थ निकलती है और हमारे बीच में वाद विवाद शुरू हो जाता है। मैं भी डॉली की बेतुकी बात से गुस्सा हो जाता हूँ और कुछ ना कुछ उटपटांग बोल देता हूँ और फिर बात का बतंगड़ बनने में देर नहीं लगती। कई दिनों तक आपस में हम बोलते नहीं।”

मेरी समझ में यह नहीं आया की सेठी साहब मुझसे क्या चाहते थे। मैंने पूछा, “सेठी साहब बताइये ना मैं क्या कर सकता हूँ?”

सेठी साहब ने कहा, “कुछ ख़ास नहीं, बस तुम रोज थोड़ी देर डॉली से बातचीत कर कोशिश करो की उसका मूड ठीक रहे। उसे ड्राइविंग सीखना है। मैंने पहले भी उसे सिखाने की कोशीश की थी। पर वह ऐसी बेवकूफी भरी गलतियां करती है की मैं गुस्सा हो जाता हूँ और उसे डाँट देता हूँ। इसके कारण हमारे बीच लड़ाई हो जाती है..

आप मेरी कार ले जाओ और थोड़ा समय निकाल कर डॉली को ड्राइविंग सिखाओ। इसके बारे में अगर आपको लगता है की ज्योति कुछ कहेगी तो मैं ज्योति जी से बात करूंगा की मैंने आप को कहा है। आजकल मेरे दफ्तर में कुछ टेंशन चल रहा है। थोड़ा तनाव में रहने के कारण ज़रा ज़रा सी बात में मैं डॉली से उलझ पड़ता हूँ और बात बिगड़ जाती है।”

सेठी साहब की बात मुझे बड़ी मीठी लगी। मैं तो डॉली जी के करीब जाने की लिए बहाने ढूंढता था। फ़ौरन सेठी साहब का हाथ थाम कर कहा, “सेठी साहब ऐसा हर कपल के बीच होता है। हमारा भी यही हाल है। ज्योति और मैं भी अक्सर भीड़ जाते हैं। आप को रिक्वेस्ट करने की कोई जरुरत नहीं। आखिर दोस्त होते किस लिए हैं? मैं जरूर डॉली जी के साथ कुछ समय बिताऊंगा और उन्हें ड्राइविंग भी सिखाऊंगा। पर बदले में आप ज्योति को सम्हालियेगा। ज्योति भी आपकी बड़ी इज्जत करती है। वह भी मुझे आपकी मिसाल देती है।”

इस तरह पता नहीं अनायास ही मुझे और सेठी साहब हम दोनों को एक दूसरे की बीबी के करीब जाने की बिना मांगे ही इजाजत मिल गयी।

उन दिनों मेरा टूर पर जाना अक्सर हुआ करता था। मैं मार्केटिंग डिवीज़न में था और काफी बड़ा एरिया मेरे अंडर में था तो महीने में कम से कम पंद्रह दिन तो मैं बाहर ही रहता था। मेरी गैर हाजिरी में सेठी साहब दिन में एक बार जरूर घर आकर ज्योति को पूछते की कोई दिक्कत तो नहीं। वैसे अक्सर डॉली जी और ज्योति दोनों एक दूसरे के घर करीब रोज आते जाते ही रहते थे।

जैसे जैसे आपसी परिचय बढ़ता गया, वैसे वैसे सेठी साहब ज्योति को कभी कबार ज्योति के करीब जाकर ज्योति के कानोंमें या कई बार तो हमारे सामने ही, “हाय, ब्यूटीफुल! हेलो जानेमन”, बगैरह बोल देते थे। मेरी पत्नी शुरु शुरू में ऐसी खुली तारीफ़ तारीफ़ सुनकर कुछ अजीब महसूस करती थी।
 
एक बार ऐसे ही इतवार दोपहर को लंच के समय जब हम इकठ्ठा हुए तब अचानक ही सेठी साहब ने ज्योति की नंगी कमर में हाथ डाल कर अपने करीब खिंच लिया और उसे एकदम करीब खिंच कर हम सब के सामने ही ज्योति के गालों को चुम कर बोले, “हाय माय ब्यूटीफुल गर्ल फ्रेंड! आई लव यू।”

सेठी साहब का इस तरह अचानक ही ऐसा व्यवहार देख मेरी बीबी के चेहरे पर तोते उड़ने लगे। शादी के बाद किसी गैर मर्द ने पहली बार सबके सामने उसे इस तरह उसे गर्ल फ्रेंड कह कर बुलाया था और खुला खुला प्यार का इजहार किया था।

ज्योति के चेहरे का बिगड़ा हुआ हाल देख कर डॉली आगे आयी और ज्योति से बोली, “सेठी साहब हैं ही ऐसे। कोई खूबसूरत औरत देखि की शरू हो गए लाइन मारने।”

फिर वह अपने पति की और घूम कर बोली, “अरे बेचारी को थोड़ा वक्त तो दीजिये आपको पहचानने का! इस तरह उस पर टूट पड़ोगे तो ज्योति आपके बारे में क्या सोचेगी?”

फिर मेरी और घूम कर डॉली बोली, “वैसे राजजी, आप अपनी खूबसूरत बीबी को मेरे पति से जरूर बचा कर रखिये। सेठी साहब बड़े माहिर हैं, खूबसूरत औरतों का दिल जितने में। पता नहीं कब आपकी बीबी को उड़ा कर ले जाए! फिर यह मत कहना की भाभी आपने सावधान नहीं किया।”

मैंने भी हँसते हुए कहा, “भाभीजी मुझे ज्योति की कोई चिंता नहीं। अगर सेठी साहब ने इधर उधर कुछ किया तो आप तो हैं ही मेरा इन्शुरन्स। मैं फिर आपको उड़ा कर ले जाऊँगा।”

डॉली ने वही शरारती अंदाज में कहा, “राजजी ऐसी कोई ग़लतफहमी में मत रहियो। मैं कोई आसानी से फंसने वाली चिड़िया नहीं हूँ।”

तब मैंने कहा, “मुझे आजतक कहाँ जिंदगी में कुछ आसानी से मिला है?

मैंने बौखलाई हुई ज्योति का हाथ थाम कर कहा, “अरे जानेमन क्या हुआ? ऐसे घबरा नहीं जाते। यह तो एक मिलने का अंदाज है। वैसे आज कल इन चीजों का कोई बुरा नहीं मानता। तुम भी उनको उसी लहजे में जवाब दो ना? बोलो थैंक यू। शुक्रिया!”

ज्योति ने मेरी और मुस्कुरा कर देखा और सेठी साहब की और घूम कर कुछ शर्माते हुए बोली, “शुक्रिया सेठी साहब। डॉली जी कह रही हैं, आप मुझे उड़ा कर ले जाओगे? मेरे पति ने मुझे आज तक कोई हवाई जहाज में बिठाया नहीं। आप मुझे उड़ा कर ले जाओगे तो इसी बहाने मुझे उड़ने का मौक़ा तो मिलेगा।”

सेठी साहब थोड़ा सा सहम गए और कुछ क्षोभित से बोले, “ज्योति मुझे माफ़ करना। क्या करूँ? रूमानी दिल है। खूबसूरत लड़की को देख कर आपे से बाहर हो जाता हूँ।”

सेठी साहब की सख्सियत से मेरी पत्नी ज्योति तब तक काफी वाकिफ हो चुकी थी। उनका जो स्वाभाविक ही अपनेपन का अहसास दिलाने का स्वभाव ज्योति बहुत पसंद करती थी। इसी कारण सेठी साहब और शर्मिंदा ना हो इस उद्देश्य से ज्योति ने कहा, “चलिए सेठी साहब इस बहाने आप जैसे हैंडसम मर्द ने मेरे जैसी एक बच्चे की माँ को गर्ल फ्रेंड बनाया और मुझे खूबसूरत तो समझा। चाहे वह मुझे दिलासा देने के लिए की गयी मिथ्या प्रशंषा ही क्यों ना हो।”

मेरी पत्नी ने कहने के लिए तो यह कह दिया पर उसे इस घटना की चिंता होने लगी, क्यूंकि कोई भी पत्नी अपने सामने ही अपने पति से किसी परायी स्त्री की ऐसी भुरीभूरी प्रशंशा आसानी से बर्दाश्त नहीं कर पायेगी। डॉली जी क्या सोचती होंगी? यह चिंता ज्योति को खाये जा रही थी। उस के मन में सेठी साहब और डॉली जी के बीच में जो मनमुटाव जैसा दिख रहा था उसकी गहराई में जाने की स्त्री सहज जिज्ञासा भी थी जिसे वह रोक नहीं पा रही थी।
 
उस दिन सुबह मेरा सेठी साहब से जो सामना हुआ था उसके बारे में मैंने ज्योति को नहीं बताया था। और दूसरे उसे चिंता थी की जिस तरह सेठी साहब उसे डॉली के सामने ही ताड़ रहे थे, लाइन मार रहे थे और कुछ ज्यादा ही रोमांटिक रुख अपनाये हुए थे उससे कैसे निपटे। कहीं इसके कारण ज्योति और डॉली जी के बीच कोई मनमुटाव पैदा ना हो।

उस चिंता से निजात पाने के लिए ज्योति ने तय किया की वह डॉली जी से सीधी बात करेगी और अपनी समस्या बताएगी। दूसरे दिन दोपहर सारा काम निपटा कर ज्योति सेठी साहब के घर पहुंची।

शुरुआत की औपचारिक बातों के बात ज्योति ने डॉली जी को अपनी उलझन बतायी। ज्योति ने कहा की वह सेठी साहब की बड़ी इज्जत करती है, पर जब सेठी साहब उसके साथ कुछ ज्यादा ही छूट ले लेते हैं तो ज्योति को समझ नहीं आता वह क्या करे? उनकी रंगीली हरकतों और छेड़खानी से ज्योति कैसे निपटे? कहीं ऐसा ना हो की डॉली जी इन से आहत हों। कहीं ज्योति तो उनके मनमुटाव का कारण नहीं थी?

ज्योति की बात सुनकर डॉली जी हँस पड़ीं। उन्होंने ज्योति को बड़े प्यार से अपने पास बैठाया। डॉली और ज्योति के बीच काफी लम्बी और सौहार्दपूर्ण बात हुई।

डॉली जी ने ज्योति से कहा, “देखो ज्योति , यह तुम्हें सोचना है की तुम सेठी साहब का छेड़ना पसंद करती हो या नहीं। अगर तुम्हें यह पसंद नहीं की सेठी साहब तुमसे कोई छूट लें, तो तुम सेठी साहब को साफ़ साफ़ बतादो की तुम्हें उनका छेड़छाड़ करना पसंद नहीं। मैं तुम्हें गारण्टी देती हूँ की वह आगे से तुमसे कोई छेड़छाड़ नहीं करेंगे। अगर तुम्हें सेठी साहब की छेड़छाड़ से ज्यादा कोई परेशानी नहीं तो फिर तुम मेरे पास क्यों आयी हो? मुझे सेठी साहब तुम्हारे साथ क्या छूट लेते हैं नहीं लेते हैं उससे कोई मतलब नहीं।”

ज्योति का दुसरा सवाल जो डॉली जी और सेठी साहब के बीच में कुछ मनमुटाव के बारे में था उसका जवाब देते हुए डॉली जी ने फिर अपने दाम्पत्य जीवन की बात करते हुए ज्योति को बताया की शादी के बाद डॉली जी का दाम्पत्य जीवन एक पत्नी की चाह होती है ऐसा ही सुखपूर्ण था। सेठी साहब डॉली से चिपके ही रहते थे। छुट्टी के दिन सेठी साहब डॉली से कम से कम दिन में तीन बार और रात में दो बार सेक्स करते थे।

शादी के कुछ दिनों में तो डॉली जी सेठी साहब की दिनरात चुदाई से जैसे ऊब सी गयी थीं। सेठी साहब का स्टैमिना इतना तगड़ा था की बिना झड़े डॉली जी को वह परेशान कर देते थे। हालांकि सेठी साहब डॉली को अपनी तगड़ी चुदाई से थका देते थे पर इसके बावजूद, डॉली जी के लिए वह उनके जीवन का स्वर्णिम समय था। डॉली जी से “चुदाई” शब्द सुनकर ज्योति चौंक पड़ी।

ज्योति के चेहरे का भाव देख कर डॉली जी ने ज्योति को अपने पास खींचा और धीमे से बोली, “देखो यार, अब जब हमारी बात शारीरिक संबंधों, मतलब सेक्स के बारे में ही हो रही है तो बेहतर है हम यह औपचारिकता का मुखौटा फेंक कर साफ़ साफ़ बिना लागलपेट के खुल्लमखुल्ला बात करें। अब हम इतने करीब आ चुके हैं और हमें एक दूसरे पर इतना विश्वास हो गया है की समय आ गया है की हम एक दूसरे से अपना असली चेहरा ना छिपाएं।”
 
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बात जारी रखते हुए डॉली जी ने ज्योति को कहा की एक साल तक तो वह फॅमिली प्लानिंग करते रहे। एक साल बाद उन्होंने बच्चे का प्लान बनाया। करीब तीन साल तक बिना गर्भ निरोधक के वह मैथुन करते रहे। पर गर्भ तो दूर डॉली जी का पीरियड में भी कोई देरी नहीं हुई।

कई डॉक्टर को दिखाने के बाद जब सब डॉक्टरों ने एक ही सुर में कहा की डॉली जी और सेठी साहब दोनों में से किसी में कोई कमी नहीं है। पर बच्चा क्यों नहीं हो रहा इसका जवाब कोई नहीं दे पा रहा था।

कई डॉक्टर, वैद, हकिम और साधू संतों को दिखाने के बाद एक स्पेशलिस्ट गाइनोकोलॉजिस्ट डॉक्टर जिसने इस मामले में काफी रिसर्च की थी, सेठी साहब को कहा की कई लाखों में कोई एक केस ऐसा होता है जब पुरुष के शुक्राणु किसी एक स्त्री के बीज से मेल नहीं खाते और स्त्री का बीज उस पुरुष के शुक्राणु से फलीभूत नहीं होता। हो सकता है किसी और स्त्री से संगम करने से वह फलीभूत हो। या फिर किसी और पुरुष के शुक्राणु से डॉली जी का बीज फलीभूत हो।

लाखों में से एकाद केस ऐसा होता है की कोई ख़ास मर्द के वीर्य का बीज (क्रॉसमोज़ोम) किसी ख़ास औरत के बीज को फलीभूत नहीं कर पाता है। ऐसा क्यों होता है यह शारीरिक विज्ञान समझ नहीं पाया है। पर ऐसा कभी कभी होता है। वह डॉक्टर के अनुसार सेठी साहब और डॉली के केस में भी ऐसा ही हुआ था।

अगर सेठी साहब किसी और औरत से सम्भोग करे तो उस औरत को या डॉली जी किसी और मर्द से सम्भोग करे तो डॉली जी को माँ बनने में कोई दिक्क्त नहीं होगी ऐसा उस स्पेशलिस्ट डॉक्टर का ओपिनियन था। इसका मतलब तो यह हुआ की सेठी साहब के वीर्य से डॉली जी गर्भ धारण नहीं कर सकती। जब से सेठी साहब और डॉली जी को यह पता चला तब से जैसे उनके जीवन में एक अँधेरा सा छा गया। या यूँ कहो की उनके दाम्पत्य जीवन में एक उदासीनता आ गयी।

वैसे ही शादी के कुछ सालों बाद पति पत्नी के बीच सेक्स की नवीनता कम हो जाती है। परन्तु डॉक्टर की बात सुन कर जैसे दोनों में एक दूसरे से सेक्स करने की इच्छा ख़तम सी हो गयी। सेठी साहब और डॉली जी दोनों ही बच्चे पाने के लिए बड़े बेकरार थे पर भाग्य को कुछ और ही मंजूर था।

डॉली जी ने कहा की वह दोनों किसी भी बच्चे को गोद लेने के पक्ष में नहीं थे। डॉली जी का कहना था की जबतक या तो डॉली जी का या सेठी अपना खुद का बच्चा ना हो तो वह प्यार आ ही नहीं सकता। जब से उनको समस्या इस बात का पता चला तब से डॉली जी बड़ी गहराई से सोच में डूब गयी की इस को कैसे सुलझाया जाए।

सेठी साहब की दूसरी शादी का सवाल ही पैदा नहीं होता। एक रास्ता यह था की सेठी साहब किसी और औरत से बच्चा पैदा करे और वह बच्चा वह दोनों गोद ले ले। पर वह औरत कौन होगी और क्या वह ऐसी सौदेबाजी के लिए राजी होगी? यह बड़ा मुश्किल सवाल था। दुसरा रास्ता यह था की डॉली जी किसी और मर्द से सम्भोग करे और फिर जो बच्चा हो वह उसे रख ले।

किसी और मर्द से सम्भोग करना यह एक बड़ी दुविधा थी जिसके लिए डॉली जी राजी नहीं थी। हाँ, अप्राकृतिक गर्भधारण से किसी और मर्द का वीर्य डॉली जी के गर्भ में स्थापित कर वह डॉली जी गर्भ धारण कर सकती थी। यह एक विषय था जिस पर सेठी साहब और डॉली जी विचार कर रहे थे। पर सेठी साहब किसी भी अनजाने मर्द के वीर्य से बच्चा हो यह नहीं चाहते थे। मामला काफी जटिल बनता जा रहा था। अब किया जाए तो क्या किया जाए?

जहां तक की सेठी साहब का ज्योति को छेड़ने और लाइन मारने का सवाल था तो डॉली जी ने ज्योति को शादी और विवाहेतर सेक्स के बारे में कुछ बातें खुलकर बतायीं।

डॉली जी ने कहा, “देखो ज्योति , यह जिंदगी छोटी सी है। उसमें भी अपनापन महसूस हो, ऐसे कपल कहाँ मिलते हैं? बड़ी मुश्किल से आप दोनों हमें मिले हैं जिनसे हम खुले दिल से मिल सकते हैं, सारी बातें शेयर कर सकते हैं। जब हमारी शादी हुई थी तब सेठी साहब को मैंने अपनी शादी से पहले हुए अफेयर्स के बारे में बताना चाहा। तब सेठी साहब ने मुझे एक बात कही..

उन्होंने कहा की मर्द और औरत किसी नाजुक घडी में जोश में आकर एक दूसरे से अगर सेक्स कर बैठे तो उसे बुरा नहीं मानना चाहिए। जरुरी सवाल यह है की क्या आप एक मर्द से जिन्दगी भर सुखदुख में साथ रहने का वादा करने के लिए तैयार हो? सेठी साहब ने शादी के समय मुझसे शादी करने के लिए एक शर्त रखी थी। उन्होंने मुझसे वचन लिया था की हम जिंदगी भर एक दूसरे पर पूरा विश्वास रखेंगे और एक दूसरे को कभी नहीं छोड़ेंगे..

अगर कभी ऐसा हुआ की मेरा किसी गैर मर्द से या उनका किसी गैर औरत से कोई शारीरिक सम्बन्ध हो भी गया तो हम एक दूसरे को ताना टोका नहीं करेंगे, ना ही रोकेंगे और ना ही कोई सवाल करेंगे। सेठी साहब ने मुझे वचन दिया की वह कभी भी किसी गैर औरत को घर में नहीं घुसाएँगे और अपनी पत्नी का ओहदा किसी गैर औरत को नहीं देंगे। उसी तरह से उन्होंने मुझसे भी वचन लिया की मैं भी किसी गैर मर्द से किसी भी हद तक जाऊं, पर मैं सेठी साहब को छोड़ उसके साथ नहीं जाउंगी और सेठी साहब को नहीं छोडूंगी।”

डॉली जी की बात सुनकर ज्योति के होश उड़ गए। सेठी साहब और डॉली में इतना तालमेल? ज्योति ने कभी सोचा भी नहीं था की पति और पत्नी के बीच इतनी स्पष्ट अंडरस्टैंडिंग हो सकती है। डॉली जी ज्योति को जैसे शादीशुदा जीवन का फलसफा समझा रही थी। ज्योति ने डॉली जी की बात ध्यान से सुन रही थी।

डॉली जी ने बात जारी रखते हुए कहा, “मुझे नहीं पता की तुम चुदाई को कितना एन्जॉय करती हो। मैं तो बहुत एन्जॉय करती हूँ। जब मैं और सेठी साहब चुदाई करते हैं तो खुल कर सब कुछ करते हैं। कोई पाबंदी नहीं होती। क्या तुम लोग भी खुल कर चुदाई एन्जॉय करते हो?”

डॉली जी का सवाल सुनकर ज्योति कुछ घबड़ा सी गयी। उसने सोचा नहीं था की डॉली जी ऐसा कोई सवाल करेंगी। ज्योति ने कुछ हिचकिचाते हुए कहा, “जी, वैसे हम लोग वैसे ही सेक्स करते हैं जैसे होता है।”

डॉली जी ने कहा, “अरे चुदाई के नाम से क्यों घबड़ा जाती हो? अंग्रेजी शब्द सेक्स बोल सकती हो तो देसी शब्द चुदाई क्यों नहीं बोल सकती? बात तो एक ही है। चुदाई हर मर्द और औरत के जीवन का एक अहम् हिस्सा होता है। चुदाई करना कोई पाप नहीं, बशर्ते की वह जबरदस्ती ना किया जाए। तुम्हारी बड़ी बहन होने के नाते मैं कह रही हूँ की अगर तुम चुदाई के समय खुल कर पूरा एन्जॉय नहीं करती तो समझो की जिंदगी का एक अद्भुत सुख गँवा रही हो। सेठी साहब तो इस बात में कुछ ज्यादा ही माहिर हैं..

उन्होंने ने ही मुझे यह सब सिखाया है। मेरे सेठी साहब इतने हैंडसम और रोमांटिक हैं। मैं जानती हूँ की तुम सेठी साहब को बहुत पसंद करती हो। सेठी साहब तो तुमको पसंद करते ही हैं। और यार हर मर्द को दूसरे की बीबी अच्छी लगती है। तुम तो वैसे ही इतनी खूबसूरत, समझदार और अगर तुम बुरा ना मानो तो कहूं की सेक्सी हो। तुम मानो या ना मानो, पर हम सब को शादी के एक दो साल के बाद एक दूसरे से चुदाई में वह मजा नहीं आता जो शादी के बाद शुरूशुरू में आता है। और जिंदगी का यही वक्त है लाइफ एन्जॉय करनेका..

तो मुझे तुम एक दूसरे से करीब आओ उसमें कोई बुराई नजर नहीं आती। मुझसे छिपाने या डरने की कोई जरुरत नहीं है। मुझे कुछ कहने की भी जरुरत नहीं है। सेठी साहब मेरे पति हैं और हमेशा रहेंगे। जब तुमसे सेठी साहब कुछ ज्यादा छेड़खानी करते हैं तो घरमें रातको मेरे साथ भी वह ज्यादा रोमांटिक हो जाते हैं। यह मेरे लिए बहुत अच्छी बात है।”
 
डॉली जी की बात सुनकर ज्योति की आँखें चौड़ी फ़ैल गयीं। उसकी आँखों में अचम्भे का भाव देख कर डॉली जी बोलीं, “देखो ज्योति । मैंने तुम्हें कहा है ना, की अब जब हम सेक्स के बारे बात कर ही रहे हैं तो बेहतर है हम कोई लागलपेट के बिना एकदूसरे से खुल्लमखुल्ला अपनी सारी सीक्रेट शेयर करें। मेरे साफ़ और खुल्लमखुल्ला चुदाई, लण्ड बगैरह शब्दों का प्रयोग करना और हमारी निजी बातें बताना इस लिए है की मैं और सेठी साहब तुम्हें और राजजी को पराया या दुसरा नहीं मानते। तुम दोनों को हम अपना मानने लगे हैं..

हमारी जिंदगी का यह राज़, आज तक मैंने किसी से शेयर नहीं किया। तुम इसका बुरा मत मानना। मैं और सेठी साहब एकदूसरे से खुल्लमखुल्ला बातें ही करते हैं। अब तो आप लोगों से भी यह पर्दा नहीं रहा। अगर तुम भी मुझसे बिना घुमाये फिराए सारी बातें खुल्लमखुल्ला करोगी तो मुझे अच्छा लगेगा।”

ज्योति ने कुछ झिझकते हुए कहा, “डॉली जी मैंने कभी इस तरह से किसी से बात नहीं की। पर यह सच है की हम भी आप दोनों को अपना मानते हैं। जहां तक मैं जानती हूँ, मेरे पतिमेरे मुकाबले काफी खुल्लमखुल्ला बातें करते हैं। हम पति पत्नी भी आपस में खुल्लमखुल्ला ही बात करते हैं। मेरे लिए यह अनुभव कुछ नया है इस लिए मुझे मेरी उलझन के लिए क्षमा करना।”

डॉली जी ने ज्योति को कहा की वह ज़माना चला गया जब पति और पत्नी सिर्फ एक दूसरे से ही सम्भोग करके खुश रहते हैं। अब जो कपल कुछ एक्सट्रा एन्जॉय करना चाहते हैं, उन पति पत्नी में एक ऐसी अंडरस्टैंडिंग हो रही है की पति और पत्नी एक दूसरे ही सहमति से दूसरे मर्द या औरत के साथ शारीरिक सम्भोग का आनंद लेने के लिए तैयार रहते हैं।

अक्सर ऐसे कपल दूसरे ऐसे कपल को ढूंढते रहते हैं जो एक ही मानसिकता वाले, मीठे स्वभाव के और विश्वास पात्र हों। ऐसे माहौल में एक पति का किसी और की पत्नी से मिलने पर काफी निजी तरीके सम्बोधन करना जैसे की “डिअर, डार्लिंग” बगैरह तो आम बात है। जब एक दूसरे के पति पत्नी से सम्भोग करने की बात हो तब पति के सामने ही उसकी पत्नी की कमर में हाथ डालकर उसे करीब खिंच कर लिपट कर आलिंगन करना कोई अजूबा नहीं गिना जाता।

आज कल मोबाइल और इंटरनेट के कारण पति का पत्नी के अलावा दूसरी औरतों से और पत्नी का पति के अलावा दूसरे मर्दों से करीबी संपर्क काफी बढ़ गया है। इसके कारण परस्पर जातीय आकर्षण हो ही जाता है।

इस हालात में यह आवश्यक हो गया है की शादी के बंधन को बनाये रखने के लिए शादी के नियमों में कुछ आमूल परिवर्तन किये जाएँ। शादी का बंधन किसी साधारण औरत मर्द की चुदाई से कहीं बढ़कर है। औरत मर्द का प्यार साधारण तया शारीरिक भूख के अलावा भावुकता से भी जुड़ा हुआ होता है। पर शादी के बंधन में कई और मसले जुड़ जाते हैं जो शादी के बंधन को बनाये रखने में कारगर साबित होते हैं। बच्चे, समाज, परिवार, लोकलाज, आर्थिक सम्बन्ध इत्यादि इनमें प्रमुख हैं।

इसीलिए डॉली जी ने कहा की उन्होंने और सेठी साहब ने मिलकर यह तय किया था की दोनों ही एक दूसरे के विजातीय संबंधों के बारे में एक दूसरे से कोई छानबीन नहीं करेंगे और ना ही कोई ज्यादा दिलचश्पी रखेंगे। यदि दोनों में से किसी को भी किसी और से जातीय सम्भोग करने की कामना हो तो वो करे। परन्तु उस व्यक्ति से ऐसे अधिक भावुक सम्बन्ध ना बनाये जिससे की वैवाहिक जीवन में कोई बाधा पैदा हो।

डॉली ने ज्योति से कहा की सेठी साहब ने जब से ज्योति से छेड़खानी करनी शुरू की है तब से सेठी साहब और डॉली के संबंधों में भी कुछ सुधार होता नजर आ रहा है। जरुरी ना होने पर भी सेठी साहब डॉली जी से कुछ छिपाते नहीं बल्की सारी बातें बता देते हैं।

डॉली जी की बात सुनकर ज्योति को एक तगड़ा झटका लगा। डॉली जी और सेठी साहब के सम्बन्ध इतने खुले और घनिष्ठ होंगे उसकी ज्योति ने कल्पना तक नहीं की थी।

डॉली जी से बात कर ज्योति को काफी अच्छा लगा। वह काफी तनावमुक्त महसूस कर रही थी। ज्योति ने मुझे इस चर्चा के बारे में जब बताया तो मैं भी अचंभित सा सोचता ही रह गया। डॉली जी ने ज्योति को जो शादीशुदा कपल का फलसफा सिखाया था वह सब ज्योति ने मुझे अक्षरसः कहा। डॉली जी के स्पष्ट विचारों के बारे में सुनकर तो मैंने भी दांतों तले उंगलीयाँ दबालीं।

हकीकत में तो डॉली जी को सेठी साहब और ज्योति का एक दूसरे के करीब आना अच्छा लगा। उनके मन में आस जगी की अगर ज्योति और सेठी साहब के सम्बन्ध और गहरे हुए तो हो सकता है की ज्योति को मनाया जा सके और शायद कुछ बात बन जाए। ज्योति और सेठी साहब का एक दूसरे के प्रति जो आकर्षण पैदा हो रहा था वह मुझसे भी अछूता नहीं था।

पर जलन होने के बजाय मुझे भी सेठी साहब और ज्योति का इस तरह करीब आना अच्छा लगने लगा। एक कारण यह भी था की शादी की पांच सालों के बाद की पति और पत्नी के नीच में विजातीय आकर्षण की नीरसता से शायद ज्योति ऊब चुकी थी। चुदाई के समय वह पहले जैसी सक्रियता नहीं ला पा रही थी जो शादी के बाद होती थी।

मुझे लगा की शायद ज्योति के लिए भी सेठी साहब का उसकी जिंदगी में आना और इस तरह ज्योति के लिए उसकी सुंदरता, सेक्सीपन और कमनीयता की सराहना पाना एक अच्छा सौपान था जिसे ज्योति कहीं न कहीं एन्जॉय कर रही थी। मेरे मन में एक आस जगी की शायद हमारी यह घनिष्ठता आगे चल कर कुछ रंग ला सकती थी। काश ऐसा हो की सेठी साहब मौक़ा पाकर ज्योति की चुदाई करे और ज्योति भी उनसे सहर्ष चुदवाये।

अगर ऐसा हो तो ज्योति की चुदाई सेठी साहब साहब कैसे करते हैं, ज्योति के मन के भाव सेठी साहब से चुदवाते समय कैसे होंगे, ज्योति चुदाई को कैसे एन्जॉय करेगी यह सब सोच कर मेरा लण्ड भी मेरे पायजामे ने खड़ा हो गया। मैं ज्योति और सेठी साहब की चुदाई के बारे में सोचने लगा। अब विधाता को क्या मंजूर था वह तो विधाता ही जाने।
 
उधर ज्योति और सेठी साहब की कहानी पनप रही थी तो मुझे डॉली के बदन को हासिल करने की लालसा सता रही थी। डॉली का चेहरा बेबी फेस कहते हैं, वैसा था। डॉली की छाती उनकी कमर के नाप को चुनौती देने वाली थी। उनकी गाँड़ भी बड़ी सुआकार थी। मेरी रातों की नींद डॉली की गाँड़ के बारे में सोच कर गायब हो जाती थी।

डॉली जी के बदन की खुशबु पाने के लिए मैं हरदम बेचैन रहता था। हर बार जब भी डॉली मेरी नज़रों से नजरें मिलाकर देखती थी तो पता नहीं मुझे ऐसा लगता था जैसे उनकी आँखें मुझे चुनौती दे रही हो की “आओ और मुझे अपनी बाँहों में ले लो।” हो सकता है की वह मेरे मन की लालसा ही थी या फिर हकीकत में वह ऐसा कुछ चाह रही थी।
 
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