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Adultery Chudasi (चुदासी )

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दूसरे दिन जैसे ही रामू काम करने आया तो मैं बेडरूम में चली गई और वो कब काम खतम करके अंदर आए उसकी राह देखने लगी।

तभी मेरे मोबाइल की रिंग बजी। मैंने उसकी स्क्रीन पे नजर डाली। मीना दीदी का काल था। मैं सोच में पड़ गई की दीदी ने क्यों मुझे काल किया होगा? फिर से तो कोई झगड़ा नहीं करेगी ना? और मैंने काल काट दिया।

चंद सेकंड में फिर से दीदी का काल आ गया। दीदी के साथ झगड़े के बाद मम्मी का भी फोन नहीं आया था। मैं जीजू के साथ मम्मी के कहने पर तो सोई थी, उसका शायद उन्हें अफसोस होगा। शायद मम्मी ने मेरी और दीदी की सुलह के लिए भी दीदी के पास फोन किया हो?

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डरते हुये मैंने मोबाइल उठाया तो सामने दीदी थी- “निशा...”

मैं- “हाँ बोलो...” मैं ज्यादा बोल ना पाई।

दीदी- “निशा, अपने जीजू को काल कर...” दीदी के स्वर में घबराहट थी।

मैं- “क्यों? कभी आप मुझसे जीजू से बात करने को ना बोलें, और कभी बोलने को कहें, ये क्या है?” मैंने रूखेपन से कहा।

दीदी- “प्लीज़्ज़... निशा अभी ज्यादा बात करने का समय नहीं है, तेरे जीजू आत्महत्या करने गये हैं..” बोलते हुये दीदी रोने लगी।

मैं- “क्या?” मैं चौंक पड़ी।

दीदी- “हाँ निशा...” दीदी ने कहा।

मैं- “पर क्यों दीदी?” मैंने आज की बातों में पहली बार दीदी को दीदी कहकर पुकारा।

दीदी- “तेरे जीजू को शेयर मार्केट में बहुत ज्यादा घाटा हो गया है। सब बेच के भी नुकसान की भरपाई होना नामुमकिन है। और पैसे लेने वालों ने भी उन्हें जान से मारने की धमकी दी हुई है। वो घर पे आज चिट्ठी लिखकर चले गये हैं की मैं मरने जा रहा हूँ..” दीदी ने उनकी बात फटाफट कह दी।

मैं- “पर उसमें मैं क्या कर सकती हूँ?” मैंने कहा।

दीदी- “मैं कब से उनका मोबाइल लगा रही हूँ, रिंग बज रही है, पर वो उठा नहीं रहे। शायद तुम्हारा काल उठा लें...” दीदी ने कहा।

मैं- “आप रखो दीदी, मैं जीजू को काल लगाती हूँ..” कहकर मैंने दीदी की काल काट दी।

दीदी का काल काटते ही रामू रूम के अंदर आया, बेड पर बैठ गया, और मेरे पैरों को सहलाने लगा। मेरा बदन भी वासना की आग में सुलग रहा था। मैं भी तो कब से उसका इंतेजार कर रही थी, पर दीदी से बात करने बाद मुझे पहले जीजू से बात करनी थी।

मैंने रामू को कहा- “अभी तुम जाओ रामू, मैं कुछ प्राब्लम में हूँ...” मैं सोचती थी की शायद रामू मेरी बात जल्दी मानेगा नहीं, उसे मुझे समझाना पड़ेगा।

रामू मेरी सोच से विपरीत खड़ा हुवा और बाहर निकलने लगा। बाहर निकलते हुये ठहरा और मुझसे पूछा- “मेरे । लायक कोई काम हो तो बताना मेमसाब...”
 
मैं- “नहीं, तुम जाओ अभी प्लीज़्ज़...” मैं कुछ चिढ़ते हुये बोल उठी। मैं रामू के पीछे गई और उसके बाहर निकलते ही घर का मेनडोर बंद करके सोफे पर बैठ गई।

मैंने जीजू का मोबाइल लगाया, रिंग की जगह उनके मोबाइल में हेलो ट्यून बजने लगी- “जिंदगी एक सफर है। सुहाना, यहां कल क्या हो किसने जाना, मौत आनी है आएगी एक दिन, जान जानी है जाएगी एक दिन, ऐसी बातों से क्या घबराना जिंदगी एक सफर है सुहाना, यहां कल क्या हो किसने जाना...”

पूरी हेलो ट्यून खतम हो गई, पर जीजू ने फोन नहीं उठाया।

मैंने रिडायल किया और बोलने लगी- “प्लीज़... जीजू फोन उठाओ प्लीज़... जीजू प्लीज़... फोन उठाओ जीजू... फोन उठाओ, जीजू फोन उठाओ, जीजू आपको अपनी साली की कसम फोन उठाओ...”

और जैसे जीजू ने मेरी बात सुन ली हो, वैसे उन्होंने फोन उठाया और उनकी आवाज सुनाई दी- “हेलो..”

मैं- “हाय जीजू कैसे हो?” मैंने मन ही मन सोच लिया की पहले ऐसे ही बात करूंगी फिर धीरे से बात निकालूंगी।

जीजू- “अच्छा हूँ और दसवीं मंजिल पर बैठा हूँ, कूदने के लिए हिम्मत जुटा रहा हूँ..” जीजू ने सीधा ऐसी बात कही की मेरी बोलती बंद हो गई।

मैंने धीरे-धीरे एक-एक शब्द को अलग-अलग करके बोला- “क्यों जीजू, क्या हुवा?”

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जीजू- “तेरी दीदी ने नहीं बताया क्या? तुझे फोन करने को कहा और क्यों मर रहा हूँ वो नहीं कहा क्या?” जीजू ने फिर से मेरी बोलती बंद कर दी।

मैं- “जीजू ऐसी बातों के लिए कोई मरता है? आप दीदी का और पवन का तो खयाल कीजिए...” मैंने कहा।

जीजू- “मैं नहीं रहूँगा तो लेनदार पैसे लेने नहीं आएंगे, और जो है उससे पवन और तेरी दीदी का गुजारा आराम से हो जाएगा...” जीजू ने कहा। पर उसकी आवाज में जो दर्द था उससे मेरी आँखें नम हो गईं।

मैं- “कैसी बातें कर रहे हैं आप? दीदी को सिर्फ हर महीने घर चलाने के लिए पैसे चाहिए, उतनी ही जरूरत है। क्या आपकी? हो सकता है पवन को भी आपके बगैर सब कुछ मिल जाय, पर इतनी ही अहमियत है क्या आपकी? दीदी को पति का प्यार और पवन को पापा का प्यार कौन देगा बताओ जीजू?” बोलते हुये मैं भावुक होकर रोने लगी।

जीजू- “काश.. निशा, तुम जो कह रही हो ऐसा होता, पर सच ये है की तुम्हारी दीदी को मेरी जरूरत हर महीने ही पड़ती है। मेरी आदत है बरसों से मैं घर खर्च के लिए हर महीने एक साथ तेरी दीदी को पैसे देता हूँ और पिछले दो साल से तेरी दीदी में भी एक आदत आ गई है कि वो भी महीने में एक ही बार मेरा लण्ड लेती है, वो भी मासिक के दो दिन बाद, पूरी सुरक्षा के दिनों में। और रही बात पवन की तो वो अभी छोटा है, थोड़े दिन में भूल जाएगा...” जीजू बोलते हुये हॉफने लगे।

मैं- “जीजू अभी आप जो कह रहे हैं, उसके लिए आप ये सब कर रहे हैं की पैसे के लिए?” मैंने जीजू को पूछा।

जीजू- “पैसे के लिए ही मैं मर रहा हूँ निशा, मुझे कभी-कभी लगता है कि मैं जिंदगी की हर लड़ाई में फेल हूँ, ना पैसे, ना नाम, ना इज्ज़त, ना शोहरत, ना प्यार, मैं कुछ भी पा नहीं सका, बीवी भी सेक्स की जगह पूरा दिन । शक करे? ऐसी होती है लाइफ क्या? और इंसान को कोई चाहने वाला हो तो वो पूरी दुनियां से लड़ सकता है." जीजू ने निराशा से कहा।

मैं- “जीजू शोहरत और दौलत हर इंसान की तकदीर में नहीं होती, और जिस्मानी ताल्लुकात से ही प्यार का पता चलता है, ऐसा किसने कहा आपको? और आपने ये कैसे सोच लिया की आपको कोई प्यार नहीं करता...” मैंने भावुकता से कहा।

जीजू- “जिस्मानी ताल्लुकात से ही प्यार है ऐसा नहीं होता, पर प्यार जताने के लिए तो जिस्मानी ताल्लुकात जरूरी हैं, और मुझे हर रोज सेक्स चाहिए, वो तुम्हारी दीदी जानती है। फिर भी वो समझती क्यों नहीं? निशा, क्यों तेरी दीदी इस बारे में समझना नहीं चाहती और उसके सिवा मुझे प्यार करने वाला कौन है और मैं उससे नहीं तो किससे सेक्स की अपेक्षा रखू?” जीजू ने कहा।
 
जीजू- “जिस्मानी ताल्लुकात से ही प्यार है ऐसा नहीं होता, पर प्यार जताने के लिए तो जिस्मानी ताल्लुकात जरूरी हैं, और मुझे हर रोज सेक्स चाहिए, वो तुम्हारी दीदी जानती है। फिर भी वो समझती क्यों नहीं? निशा, क्यों तेरी दीदी इस बारे में समझना नहीं चाहती और उसके सिवा मुझे प्यार करने वाला कौन है और मैं उससे नहीं तो किससे सेक्स की अपेक्षा रखू?” जीजू ने कहा।

मैं- “मैं जीजू मैं, मैं हूँ ना आपसे प्यार करने वाली, और सामने वाला हमें न समझे तो हमारा प्यार थोड़ा कम हो जाता है। जीजू, दीदी आपको समझ नहीं पा रही, मैं समझाऊँगी उनको। आप अभी के अभी घर जाओ मैं आपकी जो फरियाद दीदी के लिए है वो मैं उसे समझाऊँगी...” मैंने जीजू को कहा।

जीजू- “झूठ बोल रही हो तुम... तुम अपने जीजू से प्यार करती होती तो मुझे पहले इतना तड़पाती क्यों? तुमने जो किया था वो तो अपनी दीदी के लिए किया था..” जीजू ने कहा। उनकी बात कुछ हद तक सही भी थी।

मैं- “नहीं जीजू, ऐसी बात नहीं है। मैं सच में आपसे प्यार करती हूँ, दिन रात बस आप ही के बारे में सोचती हूँ..” मैंने जीजू को आधा सच और आधा झूठ कहा।

जीजू- “सच में, मेरी कसम खाकर मुझसे कहो और हाँ जीजू मत कहना...” जीजू की बातों में अब निराशा कम हो गई थी।

मैं- “हाँ सच में, आपकी कसम, अनिल आई लोव यू..” मैंने शर्माते हुये कहा।

जीजू- “बैंक्स निशा, कोई प्यार करने वाला और हिम्मत देने वाला हो तो इंसान पूरी दुनियां से लड़ सकता है, वो जंगल में भी मंगल कर सकता है...” जीजू ने कहा।

मैं- “अब आप घर जा रहे हैं ना?” मैंने पूछा।

जीजू- “हाँ जान...” जीजू ने कहा।

मैं- “तो फिर जल्दी जाइए और आज के बाद कभी ये मत सोचना की दीदी आपसे प्यार नहीं करती। मैं उन्हें समझाऊँगी, और अनिल बाकी की बातों के लिए मैं हूँ ना...” मैंने शरारत से कहा।

जीजू- “हाँ, तुम हो ना... पर एक बात कह देता हूँ कि तुम्हारी दीदी गुस्सा करे या लड़ाई पर उसको सुधारने की जवाबदारी तुम्हारी...” जीजू भी अब टेन्शन फ्री हो गये थे।

मैं- “ओके जीजू। अब जल्दी करो और मुझसे बात करना छोड़ो, बाइ..”

मैंने जीजू की बाइ सुने बिना ही काल काट दी और दीदी को फोन करके उन्हें खुश खबरी दी। जीजू का काल काटकर मैंने जब दीदी को काल किया और बताया की जीजू घर आ रहे हैं, तब दीदी ने उस दिन मेरे साथ जो सलूक किया था उसकी माफी माँगी और अपनी गलती को स्वीकार किया। मैंने भी दीदी को ज्यादा शर्मिंदा करना उचित नहीं समझा और उन्हें माफी दे दी।
 
शाम को मैं मार्केट से सब्जी लेकर आ रही थी, तब मैंने कान्ता को गेट से निकलते देखा, वो रो रही थी। मैंने उसे क्या हवा वो पूछने का मन बनाया, तब तक वो निकल गई। लिफ्ट के पास रामू बैठा बीड़ी पी रहा था, मुझे देखकर वो खड़ा हो गया और हँसने लगा। मैं भी मुश्कुरा पड़ी।

रामू ने लिफ्ट की जाली खोली, मैं अंदर दाखिल हुई तो वो भी अंदर आ गया और जाली बंद करके थर्ड फ्लोर का बटन दबाकर पूछा- “अभी समय है मेमसाब?”

मैं कुछ बोली नहीं पर उसकी बात सुनकर मेरी चूत गीली हो गई तो फिर से मुश्कुराई।

मेरी मुश्कुराहट को देखकर रामू समझ गया की मेरी इच्छा है और वो खुश होकर कुछ अलग किश्म का गीत गुनगुनाने लगा- “हो तुझे प्यार तो आ जाना पान की दुकान पे.."

तभी नीचे से आवाज आई- “रामू, रामू कहां गये?” हमारे बिल्डिंग के प्रमुख महेश परमार की आवाज थी। महेश परमार की उमर 30 साल की ही थी, पर छोटी उमर में भी वो बहुत आगे बढ़ चुके थे, बिल्डिंग में सबसे ज्यादा आमिर वोही हैं।

रामू धीरे से बोला- “मैं दो मिनट में आता हूँ मेमसाब...”

तीसरा फ्लोर आते ही मैं लिफ्ट से निकली, रामू वापस नीचे गया, मैं दरवाजे का ताला खोल रही थी पर मेरा ध्यान नीचे था।

महेश- “मेरे साथ चलो, कल उत्तरायण है तो पतंग और डोरी लेने जाना है..” महेश की आवाज आई।

रामू- “कुछ काम था निशा मेमसाब को...” रामू ने कहा।

महेश- “चल ना वहां बहुत भीड़ होगी, गाड़ी बहुत दूर पार्क करनी पड़ती है, तू जाकर ले आना, मैं गाड़ी में बैठा रहूँगा...” महेश ने ऊंची आवाज में कहा।

बाद में रामू की कोई आवाज नहीं आई तो मैं समझ गई की वो महेश के साथ चला गया है।

रात को नीरव भी देर से साथ में पतंग और डोरी लेकर आया। मुझे और नीरव को पतंग उड़ाने का कुछ ज्यादा ही शौक है। हर साल हम सुबह उठते ही चाय नाश्ता करके सबसे पहले छत पर चढ़ जाते हैं, और दोपहर को फटाफट खाना खाकर फिर से ऊपर चले जाते हैं, और शाम को सबसे लास्ट में नीचे उतरते हैं। मैं और नीरव एक मिनट भी बरबाद नहीं करते उस दिन, और पूरा दिन पतंग उड़ाते रहते हैं।

नीरव ने आकर खाना खाया और फिर वो पतंग पे कन्नी बांधने बैठ गया। मैं काम निपटाकर उसे मदद करने लगी। रात के बारह बजे सारी पतंगों को कन्नी बांधकर हम बेड पर लेट गये।

लेटते ही मैं नीरव को बाहों में लेकर किस करने लगी तो उसने अपने हाथ से मेरे मुँह को दूर करके मेरी बाहों से निकलकर दूसरी तरफ मुँह करके बोला- “सो जाओ निशु, बहुत देर हो गई है और कल जल्दी भी उठना है..." और दो ही मिनट में नीरव सो गया।पर मुझे बहुत देर बाद नींद आई।
 
नीरव ने आकर खाना खाया और फिर वो पतंग पे कन्नी बांधने बैठ गया। मैं काम निपटाकर उसे मदद करने लगी। रात के बारह बजे सारी पतंगों को कन्नी बांधकर हम बेड पर लेट गये।

लेटते ही मैं नीरव को बाहों में लेकर किस करने लगी तो उसने अपने हाथ से मेरे मुँह को दूर करके मेरी बाहों से निकलकर दूसरी तरफ मुँह करके बोला- “सो जाओ निशु, बहुत देर हो गई है और कल जल्दी भी उठना है..." और दो ही मिनट में नीरव सो गया।पर मुझे बहुत देर बाद नींद आई।

सुबह होते ही बेल बजी- “डिंग-डोंग, डिंग-डोंग...”

आजकल मैंने रात को नाइटी पहनना छोड़ दिया है, मैं गाउन पहनकर ही सो जाती हूँ। मैं बाहर निकली और बर्तन लेकर दूध लेने के लिए दरवाजा खोला। उस दिन जो मुझसे गलती हुई थी और उसके बाद चाचा ने जो शरारत की थी, और मैं गुस्सा होकर बर्तन छोड़कर रूम में चली गई थी। उस दिन के बाद से चाचा मेरी तरफआँख उठाकर भी नहीं देखते थे, वो चुपचाप दूध देकर निकल जाते थे। क्योंकि 25 साल से चाचा मेरे ससुराल में दूध दे रहे हैं, वो जानते हैं की उस दिन मैंने जानबूझ के नहीं किया था। वो कुछ गलत करने जाएंगे और मैं कहीं बता दूंगी तो उनको खराब लगेगा।

चाचा से दूध लेकर मैंने दरवाजा बंद किया और मैं सोच में पड़ गई की कल जीजू घर पहुँचे उसके बाद दीदी का फोन नहीं आया, क्या हुवा होगा? मैंने दीदी को मोबाइल लगाया।

पहली ही रिंग में दीदी ने उठाया- “हाँ, निशा पतंग उड़ाने नहीं गई अभी..” उनकी आवाज में आज अलग ही मिठास थी।

मैं- “9:00 तो बजने दो, क्या जल्दी है?” मैंने कहा।

दीदी- “याद है निशा, शादी से पहले उत्तरायण के अगले दिन तुम सोती ही नहीं थी, और मैं हमेशा तुम्हारी फिरकी पकड़ती थी...” दीदी ने कहा।

मैं- “हाँ, दीदी... कल जीजू के आने के बाद पूरा दिन घर पे ही रहे थे क्या?” मैंने मुद्दे पर आते हुये पूछा।

दीदी- “हाँ निशा, कही नहीं गये, और पापा और मेरी सास-ससुर भी यहीं थे, और पापा कह रहे थे की अब्दुल चाचा को बात करेंगे तो लेनदार कुछ नहीं कर सकेंगे...” और सारे दिन में जो-जो हुवा था दीदी ने सब बताया।

मैं- “और रात को कुछ किया था? जीजू घर वापस आए उस खुशी में?” मुझे जो जानना था वो भी मैंने पूछ ही लिया।

दीदी- “रात को तो मेरा सर फटा जा रहा था, सारा दिन कितना रोई थी मैं, 9:00 बजे तो सो गई मैं.." दीदी ने कहा।

मैं- “ओके दीदी मैं रखती हूँ, बाइ...” मैंने कहा।

दीदी- “बाइ..” कहकर दीदी ने काल काट दी।

मैं सोफे पर लेटकर मेरे और दीदी के बारे में सोचने लगी। कितना फर्क है मुझमें और दीदी में? उतना ही फर्क है। जीजू और नीरव में। जितना मुझे सेक्स में इंटरेस्ट है उतना ही जीजू को है, और दीदी और नीरव भी एक जैसे । हैं। क्या जोड़ियां बन गई हैं हमारी उलट-सुलट, देखने से दोनों (मैं और जीजू) सुखी, पर अंदर की पीड़ा अंदर जाने ऐसी हालत थी हमारी। मैं दीदी की जगह जीजू के साथ होती, और दीदी नीरव के साथ होती तो हम चारों ज्यादा सुखी होते।

थोड़ी देर बाद मैंने नहाकर नीरव को जगाया। वो नहा रहा था तब तक मैंने चाय-नाश्ता तैयार किया और फिर खाने बैठे।

नाश्ता करते हुये नीरव ने अंकल, आंटी को याद किया- “हर साल अंकल और आंटी होते हैं, आज नहीं होंगे..."

मैं- “हाँ, केयूर आया की नहीं?” मैंने पूछा।

नीरव- “आ गया, आंटी अभी भी ठीक नहीं हैं, मुंबई ले जाने की बात कर रहे हैं...” नीरव ने खड़े होते हुये कहा।

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उत्तरायण की पतंगबाजी मैं बर्तन, डिश, कप को अंदर रखकर आई। तब तक नीरव पतंग और डोरी लेकर बाहर निकल गया। मैं भी उसके पीछे-पीछे बाहर निकली और हम घर को बंद करके छत पर चले गये।

10:00 बजे थे, आसमान नीले रंग की जगह आज अलग-अलग रंगों से रंगा हुवा था। मेरे पसंदीदा दो ही त्योहार हैं- उत्तरायण और धुलेटी। क्योंकि ये दोनों त्योहार रंगों से भरे हैं। एक में हम आसमान रंगों से भरते हैं, दूसरे में हम खुद रंगों से भर जाते हैं। हर छत पर टेपरेकाईर बज रहे थे। हर बिल्डिंग की छत खचाखच भरी हुई थी।

कुछ बच्चे पतंग पकड़ने के लिए इधर-उधर दौड़ रहे थे, तो कई बच्चे अपने मम्मी-पापा से जिद करके पतंग उड़ा देने को कह रहे थे।

कुछ बूढे एक तरफ चेयर पे बैठे हुये थे, तो कुछ अपने पोते, पोतियों को संभाल रहे थे। लड़के पतंग उड़ा रहे थे

और उनकी बीवियां, बहन या गर्लफ्रेंड फिरकी पकड़कर पीछे खड़ी थीं। कुछ लड़के बारी-बारी एक दूसरे की फिरकी पकड़कर काम चला रहे थे। चारों तरफ से थोड़ी-थोड़ी देर में- “कयपो छे..” की आवाजें आ रही थीं।

मैंने फिरकी पकड़ी हुई थी और नीरव पतंग उड़ा रहा था। उसने अब तक दो पतंग काट दिए थे। हमारी बिल्डिंग में मैं और नीरव सबसे अच्छा पतंग उड़ाते हैं, इसलिए जिसे पतंग उड़ाना नहीं आता था वो सब हमारे आस-पास खड़े थे, और नीरव के पतंग काटते ही वो सब हमारे साथ चिल्लाते थे- “कयपो छे...”

तभी नीरव की पतंग के साथ रेड कलर की पतंग का पेंच लड़ गया। नीरव ढील देने लगा तो वो खींचने लगा तो मैंने नीरव से कहा की- “तुम भी खीचो नहीं तो हमारा कट जाएगा...”

नीरव ने और ढील छोड़ते हुये कहा- “किसने कहा की वो करे ऐसा हमें करना चाहिए, और डोरी को खींचने में कितनी मेहनत पड़ती है मालूम है तुझे...”

मैं मन ही मन बड़बड़ाई- “कब सीखोगे मेहनत करना, हर काम ईजी ही करते रहते हो...”

तभी बाजू की छत से जोरों की आवाज आई- “कयपो छे...”

मैंने देखा तो हमारी पतंग काट चुकी थी और पतंग काटने वाला बाजू की छत से ही था।

नीरव- “यार इतने में तो कोई मेरी पतंग काट नहीं सकता, ये कौन है?” नीरव ने बाजू में खड़े भाई से पूछा।

तभी बाजू की छत से आवाज आई- “नीरव, मैंने कहा था ना अगले साल तेरी पतंग उड़ने नहीं दूंगा, देख ये मेरा भांजा आया है तेरी पतंग काटने और मेरी प्रोमिस है की तुममें से कोई उसकी एक पतंग काटकर दिखाओ तो वो चला जाएगा...”

मैंने उस तरफ देखा तो हमारे बाजू की बिल्डिंग में रहने वाले मनसुख भाई थे, जो कुछ 50 साल के होंगे। पिछले उत्तरायण में उनकी सारी पतंगें नीरव ने काट दिए थे और तब सबने उनकी बहुत मजाक उड़ाई थी।

नीरव- “ऐसा है मनसुख भाई तो मैं भी आपकी चैलेंज लेता हूँ। अगर आप जीत गये तो मैं कभी पतंग नहीं उड़ाऊँगा..." नीरव ने भी जोरों से कहा।

मैंने मनसुख भाई के बाजू में देखा तो एक क्यूट सा लड़का खड़ा था जो शायद उनका भांजा था।

मनसुख- “तो समझ लो ये उत्तरायण तुम्हारी लास्ट है, आज के बाद तुम पतंग उड़ा नहीं सकोगे...” मनसुख भाई ने कहा।

नीरव- “देखते हैं..” कहते हुये नीरव ने दूसरी पतंग उठाई।
 
मनसुख भाई के बिल्डिंग की छत हमसे एक फ्लोर ऊपर थी। उस वजह से वो लोग उनकी छत पर से हमारी । छत की तरफ के आगे के भाग में आते थे, तभी एक दूसरे से बात होती थी। सिर्फ उनकी छत की पानी की टंकी हमें दिख रही थी जिस पर कुछ 15-17 साल के लड़के थे। अच्छी हवा होने की वजह से नीरव की पतंग तुरंत चढ़ गई, इतनी देर में तो छत पर जो लोग थे उन सबको नीरव और मनसुख भाई की शर्त के बारे में पता चल चुका था।

मनसुख भाई ने तो हमारी बिल्डिंग के सभी लोगों को चैलेंज दिया था इसलिए सभी को बात में इंटरेस्ट पड़ा। सब लोग हमारी पतंग की तरफ देखने लगे थे। हमारी पतंग कुछ ज्यादा ऊपर गई भी नहीं थी और रेड पतंग हमारी तरफ आई और उससे पेंच लड़ गया, नीरव कुछ सोचे समझे उसके पहले हमारी पतंग कट भी गई।

पतंग कटते ही मनसुख भाई हमारी छत की तरफ आए- “क्यों नीरव, कहा था ना अभी भी चाहो तो शर्त छोड़ सकते हो?”

नीरव- “अंकल एक-दो पतंग कटने से इतने खुश मत हो जाओ, अभी पूरा दिन बाकी है...” नीरव ने भी सामने जवाब दिया।

तभी उनकी छत पर से नारा सुनाई दिया- "नीरव भाई, नीरव भाई आए हैं; कच्ची डोरी लेकर पतंग उड़ा रहे हैं...”

हमारी छत पर जितने भी लोग थे, सबकी नजर उनकी छत पर चली गई। नारा लगाने वाले दिखाई नहीं दे रहे थे, पर जो बच्चे पानी की टंकी पर थे वो हमारी तरफ देखकर हमें अंगूठा दिखाकर डान्स करने लगे।

हमारी बिल्डिंग के एक अंकल हमें कहने लगे- "नीरव, अब तो हमारी इज्ज़त का सवाल है, काटो उसकी पतंग...”

नीरव- “अंकल, इस बार तो मैं उसे नहीं छोडूंगा..” कहते हुये नीरव सारी पतंगें चेक करने लगा। 10-15 मिनट की मेहनत के बाद उसने एक पतंग निकाला और उसे चढ़ाया।

इस बार हमारी पतंग पूरी तरह से ऊपर चढ़ गई तब तक वो रेड पतंग से हमारी पेंच नहीं लड़ी। नीरव ने दूसरी (और किसी का) पतंग काटा पर सबको वो रेड पतंग नीरव कब काटे उसमें ज्यादा इंटरेस्ट था। थोड़ी देर बाद नीरव ने उसकी पतंग को रेड कलर की पतंग पर रख दिया और पेंच लड़ा दिया और ढील छोड़ने लगा। उस तरफ से वो पतंग को खींच रहा था। 10 मिनट तक नीरव ढील छोड़ता ही रहा पर दोनों में से किसी की पतंग कटी नहीं। हमारी पतंग इतनी दूर चली गई थी की वो दिखाई भी नहीं दे रही थी।

तभी अचानक ही उस लड़के ने अपनी पतंग नीचे से निकालकर ऊपर रख दिया। हम लोगों को उसका ये खेल देखकर आश्चर्य हुवा, क्योंकि इतने साल में हमने आज तक किसी को ऐसा करते नहीं देखा था। शायद किसी को आता भी नहीं होगा ऐसा करना। अब स्थिति ऐसी थी की चाहे कुछ भी हो नीरव को अब पतंग खींचना ही था। क्योंकि हमारी पतंग नीचे थी। ज्यादा दूर जाने से पतंग भारी हो गई होगी क्योंकि नीरव खींचते हुये बीच-बीच में हाथों को झझोड़ रहा था। 5-7 मिनट खींचने के बाद नीरव थक गया और धीरे-धीरे खींचने लगा और थोड़ी ही देर में फिर से हमारी पतंग कट गई। पतंग कटते ही नीरव छत पर नीचे बैठ गया, मैं उसकी डोरी लेकर खींचने लगी।
 
“नीरव भाई नीरव भाई आए हैं.” “कच्ची डोरी लेकर पतंग उड़ा रहे हैं...”

फिर से उस छत पर से नारा गूंजने लगा और टंकी पर बच्चे डान्स करने लगे। डोरी खींचकर मैं नीरव के पास गई।

नीरव- “साले ने थका दिया...” नीरव ने गुस्से से कहा।

मैं- “अब तुम छोड़ो मैं चढ़ाती हूँ..” कहते हुये मैंने एक पतंग उठाई। मैंने पतंग को डोरी से बाँधा और जिस तरफ मनसुख भाई की छत थी उस तरफ जाकर मैंने आवाज लगाई- “अंकल... अंकल... मनसुख अंकल..”

मनसुख भाई हमारी छत की तरफ आए और पूछा- क्या है?

मैं- “मुझे लगता है कि आपका भांजा कुछ चीटिंग कर रहा है..” मैंने कहा।

मनसुख- “हम लोग चीटिंग नहीं करते...” अंकल ने थोड़ा तैश में आकर कहा।

मैं- “तो फिर वो वहां खड़े होकर क्यों पतंग उड़ा रहा है, जहां हमें कुछ दिखता नहीं?” मैंने उन्हें ज्यादा उकसाने के लिए कहा।

मनसुख- “तो फिर कहां खड़ा रहे बोलो तुम?” अंकल और तैश में आ गये थे।

मैं- “उसको कहो कि वो इस तरफ हमारे सामने पतंग चढ़ाए..” मैंने कहा।

मनसुख- “अच्छा, मैं उससे कहता हूँ..” अंकल ने इतना कहा और वो उसे बुलाने चले गये।

मैं खुश हो गई, क्योंकि मैं अपने इरादों में सफल हो गई थी। वो लड़का मुझे देखते हुये पतंग चढ़ाए ऐसा मैं चाहती थी। तुरंत वो लड़का हमारी तरफ आया, बहुत क्यूट सा था, 17-18 साल का होगा।

मैंने उसे पूछा- क्या नाम है तुम्हारा?

विशाल...” उसने कहा।

मैं- “और घर पे सब क्या कहते हैं?”

विशाल- “पप्पू...” उसने कहा।

मैं- “तो देखो पप्पू, मैं पतंग उड़ा रही हूँ...” कहते हुये मैंने अपनी पतंग का चढ़ाना चालू किया, 2-3 धक्के लगाने के बाद मेरी पतंग ऊपर चढ़ गई।

मैंने एक लड़के बुलाया और उससे पूछा- “तेरे घर पे ‘पप्पू कांट डान्स' वाले गाने की सी.डी. है?”

उसने 'हाँ' बोला।

तब मैंने उससे कहा- “जा लेकर आ और सेटिंग करके रखना, पप्पू की पतंग कटते ही वो बजाना...”

वो लड़का हँसता हुवा चला गया।
 
मेरी और पप्पू की पतंग में जंग छिड़ गई थी, वो कई बार पतंग को ऊपर तो कई बार नीचे करता था, जो उसकी मास्टरी थी। 15-20 मिनट तक हमारी जंग चलती रही, न मेरी पतंग कट रही थी न उसकी। पप्पू बीचबीच में मेरी तरफ देख रहा था और ज्यादातर हमारी आँख मिल जाती, तब वो शर्मकार ऊपर देखने लगता था। सबकी नजर आसमान की तरफ थी। कुछ लोग तो आँखें बंद करके भगवान को याद करने लगे थे।

मैंने उनकी छत पर देखा, तो पप्पू के सिवा वहां टंकी पर बैठे हुये लड़के दिख रहे थे। मैंने चिल्लाकर पप्पू को बुलाया- “पप्पू..”

और पप्पू ने मेरी तरफ देखा तो मैंने मुश्कुराते हुये आँख मारी और फिर उसे फ्लाइंग किस दे दी। वो मानो सब कुछ भूल गया और मेरी तरफ देखता ही रहा और उसका ध्यान भंग तब हुवा जब हमारी छत पर से नारा बजा कयपो छे...”

उसकी पतंग कट चुकी थी, हमारी छत पर से गाना चालू हो गया- “पप्पू कांट डान्स साला...”

उसका मामा आकर उसे धमकाने लगा। वो मेरी तरफ हाथ करके बोलना चाहता था पर अटक गया। और इसतरफ नीरव ने आकर मुझे उठा लिया और सब तालियां बजाकर चिल्लाने लगे- “कयपो छे...”

थोड़ी देर बाद मैंने उस लड़के को पानी की टंकी पर बैठे हुये देखा, वो मेरी तरफ ही देख रहा था, उसका मुँह लटका हुवा था।‘

मुझे ऐसे क्यूट से लड़के को मुँह लटकाकर बैठे देखकर दया आ गई तो मैंने उसके सामने देखकर कान पकड़ाऔर धीरे से बोली- “सारी...”

उसने अपना मुँह फेर लिया। मुझे उसकी हालत देखकर बुरा तो बहुत लगा, पर मैं क्या कर सकती थी। मुझे हर हाल में जीतना ही था, उसके मामा ने मेरे नीरव के साथ शर्त जो लगाई थी।

1:00 बजे आसपास नीरव ने कहा- “अब पहले पेट पूजा कर लेते हैं..." नीरव जानता था की वो उत्तरायण के दिन मुझे खाने के बारे में न कहे तो मैं मेरी तरफ से तो कभी याद नहीं करती थी।

मैं- “चलो...” कहते हुये मैंने डोरी लपेटना चालू किया और नीरव ने पतंग को नीचे उतारा।

खाना खाकर नीरव सोफे पर लेट गया और पेपर पढ़ने लगा, और मैं सिंगल सोफे पर बैठ गई। मैंने टीवी ओन किया। खाने में मैंने भेल बनाई थी, मीठी और तीखी चटनी अगले दिन बनाकर रखी थी।

तभी रामू काम पर आया। रामू के आते ही मैंने अपनी नजरें नीची कर लीं, क्योंकि रामू के मेरे संबध चालू हुये उसके बाद मैं पहली बार नीरव के साथ उसे हमारे घर में देख रही थी। रामू ने बर्तन तो तुरंत धो लिए क्योंकि हर रोज से आज कम थे। उसके बाद रामू झाडू लगाने लगा। मैंने टीवी देखते हुये चोरी छुपे उसपर नजर डाली।

वो मुझे घूरते हुये झाडू लगा रहा था और हमारी नजर मिलते ही वो मुझे इशारे करने लगता था।

वैसे तो नीरव लेटा हुवा था, इसलिए उसे कुछ दिखने वाला नहीं था। फिर भी मुझे डर लगने लगा की कहीं नीरव हमें देख न ले। मैंने उसकी तरफ देखकर आँखें निकली और इशारे से कहा- “ये क्या कर रहे हो?” और फिर मैंने उसके सामने देखना ही बंद कर दिया।

झाड़ लगाकर रामू बेडरूम के अंदर पोंछा लगाने गया और वो बहुत देर तक बाहर नहीं निकला तो मैंने रूम की तरफ देखा तो रामू रूम के दरवाजा के पास ही खड़ा था और जैसे ही मैंने उसके ऊपर नजर डाली तो वो हाथ से इशारे करके अंदर बुलाने लगा। मैंने उसपर से नजर हटा दी। पर थोड़ी देर तक वो वहां से नहीं आया।

तब मैंने नीरव से कहा- “अंदर पैसे बाहर पड़े हैं और रामू काम कर रहा है, मैं लेकर कपबोर्ड में रख देती हूँ..” कहते हुये मैंने टीवी का वाल्यूम बढ़ा दिया।
 
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