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Adultery Nakhara chadhti jawani da (नखरा चढती जवानी दा )

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दूसरी तरफ रीत मलिक की बाहों में बाहें डालकर भरे से दिल से कहती है- “जाने का जरा सा भी दिल नहीं करता आपको छोड़कर, पर जान मुझे अब जाना ही होगा..”

मलिक- जान मेरा भी दिल नहीं लगेगा तेरे बिना।

रीत- लगना तो मेरा भी नहीं है, पर ये मेरी मजबूरी है।

मलिक रीत के होंठों में होंठ डालकर चूसता है, और दोनों आशिक एक दूसरे को अलविदा कहकर चले जाते हैं। पिंकी और रीत घर आकर देखती हैं, की हरपाल और सुखजीत कार में बैठकर रीत का ही इंतेजार कर रहे थे।

सुखजीत- तू कहां चली गई थी?

रीत- “ओहह... मम्मी मैं दर्शल.......” रीत से कोई बहाना नहीं लगता, इसलिए पिंकी झट से बीच में बोली।

पिंकी- “चाची मेरी एक सहेली अब रीत की भी अच्छी दोस्त बन चुकी है। बस जाते-जाते एक बार उससे मिलने के लिए गई थी।

सुखजीत- ठीक है, अब चलें?

सुखजीत कार से बाहर निकलकर नई-नई बह को प्यार देती है, और फिर वो चरणजीत को कसकर अपनी बाहों में लेकर उसके कान में धीरे से बोली- “बहनजी मेरे पीछे अब आपने पूरे मजे लेने है, बिटू और मीते के.."

सुखजीत की ये बात सुनकर चरणजीत शर्मा जाती है, और फिर सुखजीत बलविंदर को सत श्री अकाल कहती है। फिर वो पिंकी के गले से लगाकर उसके कान में बोली- “बेटी जीती रह..."

पिंकी धीरे से सुखजीत के कान में बोली- “चाची तू बहुत जाती है रात को पार्टी के पास कल तो मैंने उसे रात में तुझे देख लिया था..”

पिंकी की ये बात सुनते ही सुखजीत के पैरों के नीचे की जमीन निकल जाती है। वो अपने मन में सोचती है, की ये थी वो आखीरकार, जिसने मुझे उस रात देखा था। पर सुखजीत अपने दिल का डर जरा सा भी अपने चेहरे पर नहीं आने देती, और फिर हल्का सा हँसकर वो कार में बैठ जाती है।

फिर हरपाल कार स्टार्ट करता है, और घर से बाहर निकल लेता है। रास्ते में बिटू और मीता खड़े होते हैं, वो हरपाल को सत श्री अकाल कहते हैं, और साथ ही दोनों सुखजीत को सेक्सी सी स्माइल करते हैं। जिसे देखकर सुखजीत को मोटर वाली रात याद आ जाती है। फिर कुछ ही देर में वो अपने घर पटियाला आ जाते हैं।

सुखजीत को इतने दिन बाद घर आकर काफी अच्छा लग रहा था। पर उसके दिल में कहीं ना कहीं बिटू से दूर होने का दर्द भी था। रीत भी अब अपनी पुरानी दुनियां में वापिस आ चुकी थी। सुखजीत और रीत ने तो गाँव में पूरी ऐश करी ही थी।

पर यहाँ घर पर सोनू ने अपनी कामवाली शीला को खुद जमकर चोदा और अपने दोस्त रिंकू और दीप को भी शीला के खूब मजे दिलाए। क्योंकी उन दोनों ने शीला को रीत बना-बनाकर चोदा था। सोनू बाहर आता है, और सबसे मिलता है।

सुखजीत शीला को आवाज देती है, और कुछ नाने को बनाने को कहती है। रीत भी अपने रूम में जाती है और फ्रेश होकर कपड़े चेंज करके पाजामा और टाप डाल लेती है। फिर वो अपने यार मलिक से व्हाटसप पर चैटिंग करने लगती है।

सुखजीत बाथरूम में जाकर नहाने लगती है। शरीर के एक-एक अंग को साबुन लगाकर रगड़ रही होती है। सुखजीत अपनी पैंटी उतार देती है, और अपनी चूत को उंगलियां डाल डालकर साफ करती है। सुखजीत ने काफी दिनों से अपनी चूत के बाल साफ नहीं किए थे। इसलिए अब वो ब्लेड लेकर अपने बाल भी साफ करने लगती है।

जैसे ही उसकी चूत के बाल साफ होते हैं, तो वो देखती है की उसकी चूत अब आगे से पहले से काफी ज्यादा खुल चुकी है। ये देखते ही उसे बिटू की याद आती है, और वो शर्मा जाती है। थोड़ी देर बाद ही सुखजीत अपनी चूत को एकदम साफ करके एकदम चिकनी कर देती है। नहाने के बाद सुखजीत करती और सलवार डाल लेती है, और किचेन में जाती है। वहां शीला सबके लिए चाय बना रही थी।

शीला- मेमसाहब, कैसी रही फिर आपकी परोग्राम?

सुखजीत- बहुत अच्छा रहा।

शीला- मेमसाहब, अब मुझे अपने घर बिहार जाना है, एक महीने के लिए।

सुखजीत- क्यों अब क्या हुआ?

शीला- वो हमारे घर वाले की तबीयत ठीक नहीं है इसलिए।

सुखजीत- ठीक है, पर मैं यहाँ काम कैसे करूँगी?

शीला- मेमसाहब, काम के लिए मैं अपने भाई रघु को यहाँ आपके पास छोड़कर जाऊँगी।

सुखजीत- वो कर लेता है घर के काम?

शीला- हाँ मेमसाहब। वो सारे काम कर लेता है। वो आज शाम को आ जाएगा, और मैं कल सुबह की गाड़ी से घर चली जाऊँगी।

सुखजीत- ठीक है।

सुखजीत फिर बाहर जाकर सोफे पर बैठ जाती है, और हरपाल भी वहीं पर बैठा होता है।

इतने में सोनू आकर कहता है- “मैं आता हूँ अभी थोड़ी देर में.."

सुखजीत- इस लड़के ने घर में तो टिकना ही नहीं।

सोनू घर से चला जाता और इतने में प्यारेलाल घर में आ जाता है। हरपाल उसको देखकर खुश हो जाता और कहता है- "और कैसे हो प्यारेलाल?"

प्यारेलाल- मैं ठीक हूँ, बहुत दिनों बाद दर्शन हुए आपके।

प्यारेलाल सुखजीत को नीचे से ऊपर तक देखकर मुश्कुराता हुआ बोला- “सत श्री अकाल भाभीजी, आपके बिना तो पूरी कालोनी ही सूनी हो गई थी.."

सुखजीत शर्माकर बोली- “अच्छा भाईजी, मैं ऐसा क्या करती हूँ। जो मेरे जाने के बाद कालोनी सूनी हो गई?"

प्यारेलाल- भाभीजी आप ही तो हमारी कालोनी की रौनक हो।

सुखजीत ये सुनकर अपनी आँखें नीचे कर लेती है। हरपाल को ये बातें सुनकर ऐसा लग रहा था, की वो मजाक कर रहा है। पर अंदर की बात कुछ और ही थी।

प्यारेलाल सोफे पर आकर बैठ जाता है और बोला- "और फिर शादी कैसी रही?

हरपाल- हाँ सब ठीक हो गया, और आप बताओ यहाँ सब ठीक था?

प्यारेलाल- हाँ जी भाईजी यहाँ सब एकदम ठीक था, आप सुनाओ।

* * * * * * * * * *
 
कड़ी_50

प्यारेलाल एक अच्छे मोके की तलाश में होता है, की कब वो सुखजीत के कोमल और चिकने जिश्म पर हाथ फेरे, और अपने दिमाग पर चढ़ी इतने दिनों की हवस को वो शांत करे। वो बैठा टीवी देख रहा था, इतने में सुखजीत का फोन आता है। वो फोन उसकी सहेली जगरूप का होता है।

सुखजीत झट से उसका फोन उठाकर बोली- हेलो।

जगरूप- कैसी है सुख, आ गई गाँव की शादी से?

सुखजीत- “हाँ यार आ गई..” और बात करते-करते वहाँ से निकलकर बाहर आगन में खड़ी हो जाती है।

जगरूप- बात सुन यार, मैंने एक बहुत जरूरी बात करनी है।

सुखजीत- हाँ बोल।

जगरूप- मैं और मेरी 5-7 सहेलियां एक सोशल वर्क के लिए एक क्लब बना चाहती हैं। और हम सबने ये निश्चय किया है, की हम तुझे भी उस क्लब का मेंबर बनायेंगे और साथ ही उसका हेड भी।

सुखजीत- यार मेंबर तक तो ठीक है, पर हेड मैं क्यों बनूं?

जगरूप- “यार मुझे तेरे बारे में कालेज टाइम से ही पता है। एक तो तू किसी से भी बात करते हुए डरती नहीं है।

और तुझे बहुत ज्यादा अच्छे से पता है, की किस बंदे से कैसे काम निकलवाना है। इसलिए तुझे हेड बनाने की सोची है.."

सुखजीत ये सुनकर हँसते हुए बोली- “चल ठीक है, पर यार डोनेशन का बहुत बड़ा पंगा पड़ता है.."

जगरूप- “कोई बात नहीं डोनेशन का भी जुगाड़ हो जाएगा। कल सुबह एक मीटिंग करनी है सबने। बस तू वहां टाइम पर आ जइओ ओके...”

सुखजीत- ठीक है मैं आ जाती है, पर मैं एक बार अपने पति से बात कर लेती हूँ।

जगरूप- भाईजी ने क्या कहना है, मुझे पता है उनकी डोर तेरे हाथ में है। तूने उन्हें मना ही लेना है।

सुखजीत- हीहीहीही... पागल है, चल मैं आती हूँ अब सुबह।

सुखजीत ये कहकर फोन कट कर देती है। इतने में सुखजीत को अपने चूतरों पर किसी का हाथ महसूस होता है। जब सुखजीत पलटकर देखती है, तो प्यारेलाल उसके चूतरों पर हाथ लगाकर आगे जा रहा था।

प्यारेलाल- “भाभीजी बहुत दिन हो गये हैं, आप पार्क में नहीं आए। आज आ जाना."

सुखजीत ये सुनकर शर्मा जाती है और अंदर चली जाती है। अंदर जाकर वो हरपाल से क्लब वाली सारी बात करती है। और हरपाल सारी बात मान जाता है। इतने में बाहर बेल बजाती है।

सुखजीत- “हे शीला... दरवाजा खोल...”

शीला जाकर दरवाजा खोलती है, बाहर दरवाजे पर रीत की सहेली ज्योति खड़ी होती है। ज्योति ने एक टाइट जीन्स और टाप डाला हुआ था, जिसमें उसका पूरा फिगर बहुत ही मस्त लग रहा था।

ज्योति शीला से कहती है- "रीत घर पर है?"

शीला- हाँ जी।

ज्योति अंदर आती है और सुखजीत और हरपाल दोनों को सत श्री अकाल कहती है, और रीत के बारे में उनसे पूछती है।

सुखजीत- बेटा वो अपने रूम में है।

ज्योति रीत के रूम में चली जाती है, ज्योति के दिमाग में एक शरारत सूझती है, और वो बिना नाक ककये एकदम रीत के रूम में चली जाती है। जब वो अंदर जाती है, तो अंदर का नजारा देखकर हैरान हो जाती है।

रीत सिर्फ पैंटी में होती है, और अपनी पैंटी को साइड करके वो अपनी चूत को रगड़ रही थी। और एक हाथ से वो वीडियो बना रही थी। उसकी आँखें बंद होती हैं, और उसकी चूचियां टाप में से बाहर निकली होती हैं।

दरवाजे के खुलने की आवाज सुनकर रीत की आँखें एकदम खुल जाती है। और वो जल्दी से अपनी पैंटी और टाप ठीक करके बोली- “मलिक मैं बाद में बात करती हँ..."

ज्योति ये देखकर रीत की तरफ देखती है और बोली- “महारानी कम से कम दरवाजा तो बंद कर लिया कर, अगर अपने यार को अपना जुगाड़ दिखना होता है तो..."

रीत ये सुनकर शर्म से पानी-पानी हो जाती है, और उसके मुँह से एक शब्द तक नहीं निकलता।

ज्योति फिर से बोली- “किसके साथ लगी हुई थी, देख अब तेरी चोरी तो पकड़ी गई है। अब जल्दी से सब कुछ बता दे...”

रीत धीरे से बोली- “मलिक के साथ..."

ज्योति- कौन मलिक? मुझे कभी इसके बारे में नहीं बताया तूने और तू उसे अपना सारा जुगाड़ दिखा रही थी।

रीत- शटप ज्योति मलिक यार है मेरा।
 
ज्योति हैरान हो जाती है और कहती है- “वाओ... यार तूने कब अपना यार बना लिया?"

रीत थोड़ी सी मुश्कुराकर बोली- “क्यों तू यार बना सकती है, मैं नहीं बना सकती क्या?"

ज्योति- कब हुआ ये सब? और अब तो मुझे एक और बात का शक हो रहा है।

रीत- कौन सा शक?

ज्योति रीत की दोनों टाँगें खोलती है, और फिर उसकी पैंटी को साइड में करके उसकी चूत में दो उंगलियां डालकर बोली- “ये शक की तूने अपनी सील तुड़वा ली है.."

रीत की चूत में जैसे ही दो उंगलियां जाती हैं, तभी उसकी आँखें बंद हो जाती हैं, और वो समझ जाती है, की अब ज्योति सब कुछ जान गई है।

ज्योति- “हाए रीत तू तो अपना जुगाड़ करवा के आ ही गई है...”

रीत- “आss यार मलिक ने लगा दिया..."

ज्योति- “ हाए रब्बा... अब लड़की बड़ी हो गई है, और मजे लेने लगी है। चलो अच्छी बात है। अच्छा अब ये बता मजा आया या नहीं?" और ज्योति ने अपनी दो उंगलियां उसकी चूत में फिर से डाल दी।

रीत- “आह्ह... आss आता है मजा प्लीज़्ज़... ज्योति बाहर निकाल अपनी उंगलियां..."

ज्योति- “अच्छा मलिक डाले तो मजा आता है, और मैं डालूं तो बाहर निकाल? हाँ हाँ वैसे भी अब तुझे उंगलियों से कैसे मजा आएगा, अब तो तुझे लंबा मोटा लण्ड चाहिये। तभी तुझे और तेरी चूत को मजा आएगा...”

रीत अब तड़प जाती है, और ज्योति का हाथ पकड़कर उंगली बाहर निकाल देती है। रीत को पता था, की अगर उसने एक बार अपना कंट्रोल खो दिया, तो बहुत मुश्किल हो जाएगा। फिर रीत नार्मल हो जाती है और ज्योति को पूरी बात बता देती है।

दूसरी तरफ सुखजीत बैठी-बैठी बोर हो रही होती है। असल में प्यारेलाल का हाथ उसके चूतरों पर लगने के कारण सुखजीत को फिर से आग लगती है, और अब वो अपने जिश्म पर अच्छे से हाथ फेरवाना चाहती थी। फिर वो टाइम देखती है, की पार्क में जाने का टाइम हो गया है।

सुखजीत अपने रूम को लाक करती है और कुरती निकाल देती है और दोनों हाथ पीछे करके अपनी ब्रा का हुक खोल देती है। और फिर वो एक टी-शर्ट निकालकर डाल लेती है। नीचे वो अपनी पटियाला शाही सलवार ही । डालती है। सुखजीत टी-शर्ट और सलवार में बहुत ही कमाल की लग रही थी। सुखजीत जाते-जाते शीशे में एक बार खुद को देखकर अपनी चूचियां थोड़ी ऊपर उठती है, और शीला को कहकर वो पार्क में निकल जाती है। सुखजीत अपने चूतरों को मटकते हुए पार्क में 7:00 बजे पहुँच जाती है।

इस टाइम थोड़ा-थोड़ा अंधेरा होने लगता है। सुखजीत अंदर जाती है और दौड़ना स्टार्ट करती है। दौड़ते हुए सुखजीत की चूचियां ब्रा में ना होने के कारण कुछ ज्यादा ही उछल रही थीं। जट्टी की दौड़ देखकर अच्छे से अच्छे बंदे अपना लण्ड मसलने लगते हैं।

सुखजीत दौड़ते-करते पार्क के उस हिस्से में आ जाती है, जहाँ पर बहुत अंधेरा और बड़े-बड़े पेड़ होते हैं। जैसे ही वो वहां पर आती है, तभी कोई उसका हाथ पकड़कर अपनी ओर खींच लेता है, और पेड़ की दूसरी तरफ ले जाता है। सुखजीत देखती है, की वो प्यारेलाल होता है। सुखजीत उसे देखकर सेक्सी अदा से शर्मा जाती है।

प्यारेलाल- "आखीरकार, भाभी तू आ ही गई..."

सुखजीत- मेरे देवर ने इतने प्यार से बुलाया था, तो मुझे तो आना ही था ना।

प्यारेलाल इधर-उधर देखकर उसका टाप गले तक ऊपर उठा देता है। सुखजीत की चूचियां एकदम नंगी होती हैं,

जो प्यारेलाल के सामने आ जाती हैं।

सुखजीत- भाई आज ऊपर से कर लो।

प्यारेलाल- “भाभी जो मजा नीचे है, वो मजा ऊपर कहां?” कहते हुये प्यारेलाल सुखजीत की चूचियों को चूसने लगता है, और सुखजीत चूचियां चुसवाकर पागल होने लगती है।

फिर प्यारेलाल जल्दी से सुखजीत के होंठों को चूसकर उसकी सलवार का नाड़ा खोल देता है। जिससे उसकी सलवार एकदम उसके पैरों में गिर जाती है। फिर वो सुखजीत को घोड़ी बनाकर उसकी पैंटी भी नीचे कर देता है। जैसे ही प्यारेलाल अपना लण्ड निकालकर उसकी चूत में डालने लगता है। तभी वहां किसी के आने की आवाज आती है, और सखजीत अपने कपड़े ठीक करके वहां से निकल जाती है।

आज एक बार फिर से किसी बहनचोद ने प्यारेलाल के खड़े लण्ड पर जोर से लात मार दी थी।

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कहानी लाइक करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद
 
कड़ी_51

अगले दिन की सुबह हो जाती है। अब रोज की तरह रीत पहले अपनी स्कूल की यूनिफार्म डालती है। उसने सफेद कलर का सूट डाला होता है। जिसमें उसका जिश्म बहुत ही कमाल का लगता है। और उसकी बड़ी-बड़ी चूचियों को उसके लाल दुपट्टे ने छपा दिया होता है। अब ऐसे ही वो अक्टिवा बाहर निकालती है और खाना खाकर अपना बैग हाथ में ले लेती है, और अपना फोन भी लेकर जाना नहीं भूलती है। क्योंकी उसने अब मलिक से बात जो करनी होती है।

अब रीत अच्छे से तैयार होकर अक्टिवा पर बैठकर ज्योति के घर की और चल पड़ती है। उधर ज्योति भी स्कर्ट डालकर खड़ी होती है। उसकी स्कर्ट टाइट ओर शार्ट होती है। जिसकी वजह से उसकी पतली गोरी टाँगें साफ दिखाई देती हैं। ज्योति वहां खड़ी इंतेजार कर रही होती है और उधर रीत भी पहुँच जाती है। रीत अक्टिवा रोक कर उतर जाती है और चाबी ज्योति को दे देती है।

ज्योति- यार ये क्या बात बनी?

रीत- प्लीज़्ज़... आज तू अक्टिवा चला ले।

ज्योति- क्यों तू आज क्यों नहीं चलाएगी?

रीत- यार मैंने मलिक से फोन पर बात करनी है।

ज्योति- आए हाए अब तुझे पीछे बैठकर आशिकी मारनी है?

रीत- तू चुप कर और अक्टिवा चला।

ज्योति- हाँ हाँ मैं ही चुप करूं।

रीत- हाँ तू ही चुप कर।

रीत अब मलिक को फोन मिलाती है और बात करने लगती है और उधर ज्योति अपनी दोनों टांगों को खोलकर अच्छे से बैठकर अक्टिवा चला रही होती है और पीछे रीत बैठी फोन पर लगी होती है।

रीत- हेलो मलिक।

मलिक- हाँ जी जान।

रीत- क्या कर रहे हो?

मलिक- कुछ नहीं बस तुझसे बात कर रहा हूँ।

रीत- ओह्ह... अच्छा और बताओ फिर?

मलिक- पहले तू बता की अब ठीक है वो।

रीत ये सुनकर शर्मा जाती है और धीरे से बोलती है- “हाँ ठीक है, मैंने क्रीम लगा ली थी...”

मलिक- अच्छा फिर ठीक है।

रीत- अच्छा और बताओ।

मलिक- अब बता तू कब मिलना है?

रीत- जब आप कहोगे।

ज्योति- हाँ हाँ अब मिलना भी शुरू हो गया?

मलिक- ये कौन है?

रीत- मेरी दोस्त है, पागल है।

ज्योति- हाँ हाँ पागल हो गये।

रीत- तू चुप कर मुझे बात करने दे।

मलिक- ऐसा करो तुम लड़ाई करो मैं फोन कट कर देता हूँ।

रीत- नहीं नहीं बात करो।

मलिक- अच्छा, अब अगर आया बीच में तो मिलेगी और चूत देगी फिर से।

रीत ये बात सुनकर वो शर्मा जाती है और फिर कहती है- “हाँ बंक करूंगी स्कूल का..."

ज्योति- हाँ हाँ अब तो स्कूल भी बंक करे जाएंगे।

रीत- यार तू बात करने दे ना क्यों तू बीच में आ रही है?

ज्योति- हाँ हाँ मैं अब बीच में आ गई हूँ?

मलिक- अच्छा रीत तुम स्कूल पहुँचो। मैं बाद में बात करता हूँ। ओके आई लोव यू।

रीत- “ओके जी आई लोव यू टू..." और फोन काट देती है।

ज्योति- हाँ हाँ मैं अब हड्डी हूँ।

रीत- हाँ तू तो बहुत बड़ी हड्डी है।

ज्योति- अच्छा और बता फिर कब लेना है बंक। कब की डेट दी है उसने चुदने के लिए?

रीत- तू ये क्या कह रही है?

ज्योति- अब शर्माने की बात नहीं है ओके। अब बता दियो जब भी बंक लेना होगा ओके। ले लेंगे और फिर मजा ही अलग आता है बंक का तो।

रीत- हाँ हाँ मैं बता दूंगी।

अब वो स्कूल पहुँच जाते हैं और फिर दोनों अक्टिवा पार्किंग में लगाकर चले जाते हैं।

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दूसरी तरफ अब सुखजीत घर पर तैयार हो रही होती है। उसने एक मीटिंग में जाना होता है जिसके लिए वो काफी खुश भी होती है। क्योंकी वो उस मीटिंग मेंबर की हेड जो होती है। अब ऐसे ही वो तैयार हो रही होती है। पहले सुखजीत दूसरा सूट निकालती है पर उसे वो पसंद नहीं आता है तो वो अब ग्रीन कलर का सूट निकालती है। फिर नहाकर वो सूट डाल लेती है और फिर शीशे के आगे खड़ी होकर तैयार होने लगती है।।

उसने ग्रीन कलर का सूट डाला होता है, जिसमें वो पूरी कयामत लग रही होती है। उसकी ब्रा ने उसकी टाइट चूचियों को बाँध रखा होता है और फिर ऐसे ही उसका मस्त जिश्म और ऊपर से ऐसे मखमली बदन और उसपर लगी लिपस्टिक, पैरों में हील, सिर पर पोनी जिसमें वो मस्त लग रही होती है। अब वो जैसे ही निकालने वाली होती है तो, तभी वहां पर उसके फोन पर जगरूप का फोन आ जाता है।

सुखजीत- हेलो हाँ जी।

जगरूप- हाँ जी हो गये हो आप तैयार?

सुखजीत- हाँजी हाँजी हो गई बस अब निकलने लगी थी बस।

जगरूप- हाँ जी आप आ जाओ और मेरे घर पर ही आ जाना क्योंकी यहीं पर ही मीटिंग है।

सुखजीत- “ठीक है आ रही हूँ बस..” और वो फोन कट कर देती है और फिर उसके बाद शीला को आवाज देती है- "शीला..”

शीला सुखजीत की आवाज सुनकर भागकर आती है- “हाँ जी मेडम..."

सुखजीत- तुम तो जाने लगी थी तुम्हारा भाई नहीं आया क्या?

शीला- नहीं मेडम वो अब नहीं आएगा।

सुखजीत- ठीक है। तुम फिर पीछे से सर को खाना दे देना ओके? मैं आ रही हूँ थोड़ी देर में।

अब सुखजीत गागल्स लगाकर कार में बैठकर चल पड़ती है और फिर उसके बाद ऐसे ही आधे घंटे बाद वो पहुँच जाती है। बाहर काफी कारें खड़ी होती हैं, और फिर जब वो अंदर जाती है तो एक बेंच पर काफी लेडीस बैठी होती हैं, और सुखजीत को देखकर वो खड़ी हो जाती हैं। क्योंकी सुखजीत अब इसकी हेड होती है और फिर जगरूप सबसे मिलती है। सारी लेडीस सुखजीत के फिगर और उसके बात करने के स्टाइल को देखकर हैरान रह जाती हैं। क्योंकी सुखजीत के फिगर और चेहरे को देखकर हेड वाला रोब पड़ रहा था। फिर सुखजीत के बैठने के बाद सब बैठ जाती हैं।

जगरूप- "बहनों जैसा की आप सबको पता है, की आज की इस मीटिंग में हम अपना एक सोशल क्लब बना रहे हैं, जिससे अब गरीब लोगों और गरीब के बच्चों की स्टडी करवाने में हेल्प करेगें..."

सुखजीत- “इसलिए हमने अपनी इनकम में से कुछ हिस्सा इस क्लब को देना होगा। ताकी हम गरीब लोगों की हेल्प कर सकें...”

इतने में औरत बोली- “पर बहनजी, सबसे पहले हमें अपने क्लब की प्रमोशन करनी पड़ेगी, ताकी लोगों को पता चले की हमारा ऐसा कोई क्लब भी है..."

जगरूप- इसलिए हम अपनी कालोनी में इस बार दशहरे का एक फंक्सन करने वाले हैं।

फिर एक और औरत बोली- “पर मेडम सबके लिए इतने पैसे नहीं होंगे..."

सुखजीत अपना दिमाग चलाकर बोली- “देखो बहनजी, मेरे पास इसका भी हाल है। हम ऐसा करते हैं, की बैंक से फंक्सन करवाने के लिए लोन लेते हैं, और अपने मोहल्ले में बड़ा फंक्सन करवाते हैं। जिसमें हम अपने क्षेत्र के एम.एल.ए. संधू जी को इन्वाइट करेंगे। वो जाते-जाते हमें कुछ पैसे भी देंगे। और उस पैसे से हम अपना बैंक का लोन उतार देगें, और हमारी फ्री में प्रोमोशन भी हो जाएगी.."

सुखजीत की ये बात सुनकर सब औरतें तालियां मारने लगती है। सब उसके दिमाग की दाद देने लगती हैं।

जगरूप- आप ठीक कह रही हो, और एम.एल.ए. संधू जी मेरे पति के अच्छे दोस्त हैं। वो उनसे आने के लिए बात कर लेंगे।

सुखजीत- ठीक है बहनजी, और लोन का जुगाड़ मैं कर लेती हूँ। बैंक में री एक दोस्त लगी हुई है।

सब सुखजीत के इस फैसले से खुश और सहमत हो जाती हैं। सब कहती है, की हमसे जितना हो सकता है, हम सब कर लेंगी। और अब वो सब मिलकर क्लब का नाम 'अपना क्लब' रखती हैं। इसके बाद मीटिंग खतम हो जाती है, और सब अपने-अपने घर की ओर निकल जाती है। अब सिर्फ वहां जगरूप और सुखजीत ही रह जाती हैं।

सुखजीत- अब मैं भी चलती हूँ।

जगरूप- रुको बहनजी, मैं चाय मँगवाती हूँ, आप प्लीज़्ज़... पीकर जाना।

सुखजीत जगरूप को छेड़ते हुए बोली- “बहनजी अब आप इस क्लब की मेंबर हो गई हो। अब आराम से आप जवान लड़कों के नीचे लेट सकती हो...”

जगरूप- ओहहो... बहनजी वो सब तो चलता रहता है।

सुखजीत- हाँ आपने सुधारना थोड़ी है।

जगरूप को ये पता था, की सुखजीत इस काम में उसकी भी माँ है। फिर सुखजीत वहां चाय पीने के बाद बैंक की तरफ निकल जाती है।

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कड़ी_52

सुखजीत जगरूप के घर से निकलकर सीधी बैंक में जाती है। वहां पर उसकी एक सहेली प्रिया लगी हुई थी। प्रिया सुखजीत के साथ कालेज में पढ़ी होती है। प्रिया की उमर 44 साल होती है, और वो दिखने में आज भी काफी खूबसूरत होती है। प्रिया बैंक की यूनिफार्म डालकर बैठी हुई थी। सुखजीत उसके पास जाती है, और वो सुखजीत को देखकर खुश हो जाती है।

प्रिया- ओहह... वाउ वाट आ सीइज यार कैसी हो सुख?

सुखजीत- मैं बहुत अच्छी हूँ, क्या करूँ अब तू तो आती नहीं मिलने, मैंने सोचा मैं ही आ जाऊँ।

प्रिया- यार तुझे पता ही है, मेरी जाब का, टाइम निकलना कितना मुश्किल है।

सुखजीत- अच्छा जी चल फिर अपनी जाब का थोड़ा सा फायदा हमें भी दे दे।

प्रिया- हाँ क्यों नहीं यार। बस तू मुझे काम बता, एक मिनट में कर दूंगी।

सुखजीत- यार हमने एक 'अपना क्लब' नाम का एक क्लब बनाया है। इसी नाम का अकाउंट तेरे बैंक में खोलना है। और एक लोन भी चाहिये।

प्रिया- यार ये थोड़ा सा टेढ़ा काम है। क्योंकी एक नये अकाउंट पर लोन मिलना बहुत मुश्किल है। इसके लिए तो मुझे हमारे मैनेजर से बात करनी पड़ेगी।

सुखजीत- ठीक है, कहां है तेरा मैनेजर? मैं उससे भी बात कर लेती हैं।

प्रिया- कोई बात नहीं, चल मेरे साथ।

सुखजीत- ठीक है।

प्रिया अपने टेबल की दराज में से एक मिरर निकालती है। और अपनी लिपस्टिक को ठीक करके अपने गले का पल्ला थोड़ा सा नीचे कर लेती है। जिससे अब उसकी चूचियों के बीच की लाइन साफ-साफ दिख रही होती है। फिर प्रिया खड़ी होकर बोली।

प्रिया- चल चलते हैं सुख।

सुखजीत को ये सब सोचते हुए एक सेकेंड नहीं लगता की इसका मैनेजर एक नंबर का टरकी बंदा है, जो जवानी के मजे लेता है। फिर वो दोनों मैनेजर के आफिस पर पहुँच जाती है और प्रिया दरवाजा खोलकर बोली।

प्रिया- सर, मे आई कम इन?

अंदर से एक भारी आवाज आती है- “एस..."

दर्शल मैनेजर अपनी चेयर दूसरी तरफ घुमाकर बैठा होता है। सुखजीत और प्रिया दोनों आकर उसके सामने चेयर पर बैठ जाती हैं। पर उन दोनों को मैनेजर नजर नहीं आ रहा था।

प्रिया- सर, एक आपसे काम था।

मैनेजर अपनी चेयर घुमाता है, और सुखजीत उसको देखकर हैरान हो जाती है। क्योंकी मैनेजर और कोई नहीं गगन होता है। गगन वो ही है, जो शादी में सुखजीत और उसकी जवानी पर पूरा लटू बना घूम रहा था। सुखजीत को अपने पास और सामने देखकर गगन की आँखें चमक जाती हैं। गगन को देखकर सुखजीत अपनी आँखें नीचे कर लेती है, और सुखजीत को वो टाइम याद आ जाता है, जब उसने गरमी-गरमी में गगन से अपने चूतर मसलवा लिए थे।

प्रिया- सर, मेरी ये दोस्त है सुख, और सुखजीत ये हैं हमारे बैंक के मैनेजर गगन सर।

मोका देखकर गगन अपना हाथ आगे करके कहता है- “सत श्री अकाल जी..."

सुखजीत भी ये देखकर उससे अपना हाथ मिला लेती है। गगन सुखजीत का हाथ थोड़ा सा दबा देता है और उसकी आँखों में देखता है। सुखजीत झट से अपना हाथ उससे छुड़वा लेती है और अपनी आँखें नीचे कर लेती है।

प्रिया- सर, मेरी दोस्त को आपकी थोड़ी सी हेल्प चाहिये।

गगन- हाँ जी जरूर, बोलो हम तो यहां हेल्प करने के लिए ही बैठे हुए हैं।

सुखजीत ये सुनकर शर्मा जाती है, और सोचने लगती है की उसकी किश्मत ने उसके साथ ये कैसा खेल खेल दिया। जो लड़का उसके पीछे पागल हो रहा था, आज उससे उसे ही काम पड़ गया।

प्रिया गगन को सारी बात बता देती है, और फिर गगन सारी बात को अच्छे से समझकर बोला- "ठीक है प्रिया

जी आप एक रेजिस्ट्रेशन फार्म ले आओ प्लीज़्ज़..."

प्रिया उठकर फार्म लेने के लिए चली जाती है।

अब गगन और सुखजीत दोनों अकेले होते हैं उसके आफिस में। गगन सुखजीत का हाथ फिर से पकड़ लेता है,

और उससे बोलता है- “देखा फिर ऊपर वाला एक सच्चे प्यारे करने वाले की सुन ही लेता है..."
 
सुखजीत अंदर शर्मा रही होती है, पर वो उसके सामने शो नहीं करती। पर सुखजीत को ये भी पता था की अगर उसे लोन चाहिये तो उसे गगन से थोड़ी देर प्यारी बातें भी करनी होंगी। इसलिए अभी तक वो अपना हाथ गगन के हाथ में रखे हुए थी और फिर वो बोली।

सुखजीत- “हाँ जी आज पता चल गया की ऊपर वाला सबकी सुनता है?"

गगन- हाँ बस अब ऊपर वाला दिल भी सुन ले।

सुखजीत शर्माकर बोली- "आपके दिल में क्या है?"

गगन सुखजीत का हाथ अपने हाथ से मसलते हुए बोला- "दिल तो आपके साथ डान्स करने का कर रहा है, उस दिन की तरह..”

गगन की ये बात सुनकर सुखजीत पानी-पानी हो जाती है, और उसकी नजरें जमीन में गड़ जाती हैं। गगन के हाथ सुखजीत के हाथों को मसलते हुए उसे गरम कर रहे थे।

सुखजीत गगन को चालाकी से बोली- “पहले ये बैंक वाला काम तो करो, फिर डान्स के बारे में भी सोचते हैं..."

गगन ये सुनकर उसका हाथ पकड़कर अपने मुँह के आगे रखकर उसके हाथ चूम लेता है। गगन के इस किस ने सुखजीत को ऊपर से लेकर नीचे तक हिला कर रखा दिया था।

गगन- बैंक काम की आप जरा सी भी फिकर ना करो।

सुखजीत- ठीक है। फिर डान्स भी कर ही लेते हैं

सुखजीत की ये बात सुनकर गगन का लण्ड खड़ा हो जाता है, गगन का बस नहीं चलता वर्ना वो तो सुखजीत को यहीं पर नंगी करके अपने टेबल पर ही उसे चोदने की सोच रहा था।

इतने में प्रिया फार्म लेकर आ जाती है। सुखजीत गगन से अपना हाथ छुड़वाकर नार्मल होकर बैठ जाती है। सुखजीत वो फार्म फिल उप कर देती है।

गगन कहता है- “लो जी अब आपका काम दो-तीन दिनों में हो जाएगा..."

सुखजीत- थॅंक यू गगन जी।

गगन सेक्सी सी स्माइल करके दुबारा सुखजीत से हाथ मिलाता है, और फिर सुखजीत अपने चूतर हिलाते हुए बाहर चली जाती है। गगन सुखजीत के चूतरों को तब तक देखता है, जब तक वो बैंक से बाहर नहीं जाती। फिर सुखजीत अपनी कार में बैठकर घर आ जाती है।

दूसरी तरफ रीत के स्कूल की छुट्टी हो जाती है। और वो बाहर आते ही अपने बैग से फोन निकाल देती है, और देखती है की मलिक के 50 मिस्ड काल आ चुके थे। रीत तभी मलिक को फोन करती है, और आज ज्योति को अक्टिवा चलाने को कहती है।

रीत- सारी जान मैं स्टडी कर रही थी।

मलिक- कोई बात नहीं जान, वैसे मैंने तुझे एक खुशखबरी देनी है।

रीत- हाँ मलिक बताओ ना?

मलिक- मैं कल तुझे मिलने के लिए आ रहा हूँ।

रीत- हाई सच्ची?

मलिक- हाँ बाबू, बस तू कल स्कूल बंक कर लियो अपना।

रीत कुछ सोचकर बोली- “ठीक है मलिक मैं करती हूँ बंक..."

मलिक- आई लोव यू जान।

रीत- आई लोव यू टू।

मलिक- कल मैं वो अधूरा काम करूँगा, जो उस दिन रह गया था।

रीत समझ जाती है और बोली- “जो मर्जी कर लेना मलिक, मैं पूरी की पूरी आपकी हूँ..."

मलिक- हाए मैं मर मैं जाऊँ अपनी जान के इस प्यार को देखकर।

रीत- मलिक प्लीज़्ज़... मरने की बातें मत किया करो।

मलिक- हाए क्यों?

रीत- कुछ-कुछ होने लगता है, मेरे दिल को।

मलिक- दिल को तो कल होगा, जब मैं अंदर डालूँगा।

रीत शर्मा जाती है और बोली- “आप ना सच में बहुत बेशर्म हो..”

ऐसे बातें करते-करते ज्योति का घर आ जाता है। ज्योति भी रीत के साथ बंक मारने को तैयार हो जाती है। फिर रीत अपने घर को चली जाती है।

* * * * * * * * * *
 
कड़ी_53

दिन निकल जाता है, और शाम हो जाती है। अब सुखजीत का पार्क जाने का टाइम हो गया था। इसलिए वो अपनी घर में डालने वाली सलवार और कमीज डालकर पार्क के लिए निकल जाती है। सूट के नीचे सुखजीत ने ब्रा नहीं डाली थी। इसलिए उसकी चूचियां जोर-जोर से उछल रही थीं, और उसके चूतरों की तो बात ही अलग होती है।

सुखजीत के चूतर हमेशा ही बाहर निकले हुए होते हैं, चाहे वो सूट डाले या पाजामा। फिर सुखजीत घर से निकल जाती है। वो थोड़ी ही देर में पार्क पहुँच जाती है। पार्क में आने के बाद वो थोड़ी कसरत करती है। कसरत करते हुए उसे सारी दुनियां देख रही थी। लोग उसके मस्त सामान को देखकर अपना लण्ड मसल रहे थे। हर कोई सिर्फ एक बार सुखजीत की चूत में अपने लण्ड का पानी निकालना चाहता था। फिर सुखजीत कसरत करने के बाद दौड़ना शुरू कर देती है।

अब टाइम ऐसा हो गया था, की शाम का अंधेरा हो गया था। पर अभी तक पार्क की लाइट ओन नहीं होती है। इसलिए पार्क में अंधेरा हो जाता है। सुखजीत थोड़ी देर दौड़ते-करते पार्क के एक कोने में आ जाती है, जहाँ कल प्यारेलाल ने उसे पकड़ा था। सुखजीत वहीं खड़ी कल के कांड में बारे में सोच रही थी। तभी किसी ने पीछे से आकर उसकी कमर में हाथ डालकर उसे पीछे खींच लिया। सुखजीत एकदम से घबरा गई और उसने पीछे मुड़कर देखा, तो उसे पीछे से प्यारेलाल खड़ा उसे देखकर मुश्कुरा रहा था।

सुखजीत- “हाए भाईजी, मैं जब भी यहाँ आती हूँ, तभी आप मुझे पकड़ लेते हो..."

प्यारेलाल ने सुखजीत की चूचियों को मसलते हुए बोला- क्या करूँ भाभी तू काबू ही इसी जगह पर आती है।

सुखजीत प्यारेलाल के हाथ पर अपने हाथ रखकर बोली- “क्या करूँ भाईजी आपने मेरी चूचियां पकड़कर ही मुझे अपने काबू में किया हुआ था.."

सुखजीत की बात सुनकर प्यारेलाल गरम हो जाता है। तभी वो अपने होंठों को सुखजीत के होंठों पर टूटकर पड़ गया। वो जोर-जोर से उसके होंठों को चूसने लगता है, और साथ ही उसकी दोनों चूचियों को अपने मजबूत हाथों से कसकर पकड़कर मसलने लगता है।

सुखजीत ये सब देखकर समझ जाती है, की आज प्यारेलाल उसको अच्छे से चोदकर उसकी तसल्ली करवा ही देगा। आज गगन ने पहले से ही उसका हाथ पकड़कर और चूमकर उसे गरम कर दिया था। सुखजीत फिर अपने होंठों को उसके होंठों से निकालकर बोली।

सुखजीत- "भाईजी प्लीज़्ज़... जल्दी कर लो, कहीं कल की तरह कोई आ ना जाए। और पार्क की लाइटें भी अब ओन होने वाली हैं..”

प्यारेलाल तभी सुखजीत की दोनों चूचियां कसकर मसलते हुए बोला- “कोई बात नहीं भाभी, आज तो मैं ओन लाइट में भी जमकर चोदूंगा। कल भी तू मेरे लण्ड को नराज करके चली गई थी..”

सुखजीत प्यारेलाल की आग देखकर नखरे करते हुए बोली- “हाई आज तो मैं आपके लण्ड को मना कर ही मानूँगी..” कहकर सुखजीत प्यारेलाल की पैंट की जिप खोल देती है, और अपना हाथ उसके अंडरवेर में डालकर उसका लण्ड पकड़कर बाहर निकाल लेती है।

प्यारेलाल का गरम और एकदम कड़क लण्ड देखकर सुखजीत खुश हो जाती है। फिर सुखजीत पेड़ का शहरा लेकर प्यारेलाल के आगे घोड़ी बन जाती है। प्यारेलाल भी सुखजीत का पल्ला उठाकर ऊपर कर देता है। फिर प्यारेलाल अपना एक हाथ उसकी सलवार में डालता है, और उसका नाड़ा खोल देता है। सुखजीत अपनी सलवार को पकड़ लेतीटी है। ताकी अगर कल की तरह कोई अचानक से आ जाए तो वो अपनी सलवार आसानी से ऊपर करके वहां से भाग सके।

उसके बाद प्यारेलाल ने सुखजीत की पैंटी उतारकर नीचे कर दी और उसे पूरा नंगी कर दिया। सुखजीत जैसी गोरी चिकिनी मस्त पंजाबन के मोटे-मोटे कोमल नंगे चूतर देखकर प्यारेलाल के मुँह से आह्ह... की आवाज निकल जाती है, और फिर वो उसके दोनों चूतरों को अपने हाथों में कसकर पकड़कर बोला।

प्यारेलाल- “हाए भाभी तेरे चूतरों ने तो आतंक मचाया हुआ है..”

सुखजीत- आतंक तो अब आपने मचा देना है मेरे चूतरों के साथ भाईजी।

सुखजीत की तड़प देखकर प्यारेलाल लण्ड चूत में सेट करता है, और एक धक्के में ही अपना लण्ड सुखजीत की चूत में डाल देता है। सुखजीत जितने लंबे और मोटे लण्ड अपनी चूत में ले चुकी थी। उस मुकाबले में प्यारेलाल का लण्ड अभी बहुत पीछे थे। पर प्यारेलाल का लण्ड जैसा भी था, सुखजीत को मजा बहुत दे रहा था।
 
प्यारेलाल अपनी पूरी ताकत से धक्के मार-मारकर सुखजीत का बाजा बजा रहा था- “भाभी आज पूरा मजा दे अपने देवर को, कभी का तुझे ठोंकने के चक्कर में था मैं। पर तू आज मेरे सामने घोड़ी बनी है..."

सुखजीत की चूत में अब प्यारेलाल की रगड़ लगने लगी थी। सुखजीत अब और मजा लेना और देना चाहती थी। इसलिए उसने अपने एक हाथ को पीछे करके अपना एक चूतर पकड़ लिया और फिर अपनी दोनों टाँगें एक साथ जोड़कर अपनी चूत पूरी टाइट कर दी। इस बार जब प्यारेलाल ने धक्का मारकर अपना लण्ड उसकी चूत में डाला, तो प्यारेलाल का लण्ड पूरा सुखजीत की टाइट और गीली चूत को चीरता हुआ पूरा अंदर चला गया।

सुखजीत को तो मजा आया ही था, पर प्यारेलाल की हालत खराब हो चुकी थी। उसका लण्ड सुखजीत की टाइट और गरम चूत में फंस चुका था। और उसका लण्ड सुखजीत की चूत की गरमी और कसावट को सहन नहीं कर पाया और उसके लण्ड ने अपना सारा पानी सुखजीत की चूत के अंदर ही निकाल दिया। सुखजीत को पता चल जाता है, की प्यारेलाल के लण्ड ने जवाब दे दिया है।

सुखजीत इस बात पर हँसते हुए बोली- “बस भाईजी हो गया?"

प्यारेलाल शर्मिंदा होकर- “भाभी मैं करूँ? तू बहनचोद चीज ही ऐसी है की खड़े-खड़े बंदे का पैंट में निकाल दे.."

सुखजीत भी हँसते हुए बोली- “भाईजी जट्टी को खुश करना हर किसी के बस की बात नहीं है...” कहकर सुखजीत अपनी सलवार ऊपर करती है, और वो पार्क में वापिस चली जाती है। फिर वो अपने घर चली जाती है।

सुखजीत घर जाकर देखती है की रीत बहुत खुश होकर फोन पर किसी से बात कर रही होती है। पर जैसे ही वो उसे देखती है तो वो बोलती है।

रीत- “मम्मी आ गई है, मैं बाद में बात करती हूँ..."

सुखजीत बोली- “कौन था फोन पर रीत?"

रीत- चरणजीत ताई मम्मी।

सुखजीत ये सुनकर खुश हो जाती है और रीत से फोन पकड़कर खुद बात करने लगती है। रीत भी अब खुश थी, क्योंकी उसके यार जान मलिक के कभी से उसके पास मेसेज आ रहे थे। इसलिए वो फोन मम्मी को पकड़ाकर ऊपर अपने रूम में चली जाती है।

सुखजीत अब रूम में अकेली रह जाती है। इसलिए वो खुलकर बात करते हुए बोली- “कैसी हो बहनजी?"

चरणजीत- मैं अच्छी हूँ, आप सुनाओ बहनजी?

सुखजीत- मैं भी अच्छी हूँ। और मजे हो रहे हैं?

चरणजीत धीरे से बोली- “वो ही जिनके साथ शादी में हो रहे थे?"

सुखजीत- हाए अब तो आपको भी चस्का लग गया है, शादीशुदा होते हुए भी कमाल की मस्त रंडी बन गई हो आप।

चरणजीत- क्या करें बहनजी, बनना पड़ता है, जब बात स्वाद की आ जाए तो।

सुखजीत- अब मीता आपकी रोज लेता होगा?

चरणजीत- बहनजी आप बस पूछो ना, उन दोनों सालों ने मिलकर मेरी अकेली की ना करा दी थी मोटर पर लेजाकर।

सुखजीत- हाए अब आप मोटर पर भी जाने लगे?

चरणजीत- हाए बहनजी... सच बताऊँ चुदाने का मजा तो मोटर पर ही आता है। वैसे आप बताओ, आपने कोई मुर्गा फँसाया की नहीं?

सुखजीत- हाए मैं भी अभी-अभी चुद कर ही आई हूँ, अपने एक पड़ोसी से।

चरणजीत- बहनजी फिर स्वाद आया या नहीं आपको?

सुखजीत- कहां बहनजी? बहुत जल्दी निकल गया उसके लण्ड का पानी, साले बहन का लण्ड।

चरणजीत- अच्छा अगर ऐसी बात है, तो आ जाओ गाँव में अगर अपनी ना करवानी है तो।

सुखजीत- हाए बहनजी... सच्ची मेरा दिल तो बहुत करता है। पर यहां के कामों से टाइम ही नहीं मिलता।

चरणजीत- कोई बात नहीं आ जाओ दोनों मिलकर मजे लेंगे।

सुखजीत- हाँ जरूर बहनजी।

चरणजीत- ठीक है फिर बहनजी मिलते हैं।

सुखजीत- ठीक है बहनजी बाइ।
 
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