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Adultery Nakhara chadhti jawani da (नखरा चढती जवानी दा )

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चरणजीत की ऐसी बातें सुनकर सुखजीत समझ जाती है की चरणजीत अब एक नंबर की चुड़दकड़ बन गई है। जो मोटर पर जाने से डरती थी, आज वो खुद अकेली मोटर पर चुदने के लिए जाती है।

दूसरी तरफ रीत का स्कूल बंक करने की पूरी तैयारी कर लेती है। ज्योति और रीत कल मलिक के साथ स्कूल बंक करने वाली होती हैं।

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कड़ी_54

अगले दिन सुबह होते ही रीत बहुत खुश होती है, क्योंकी आज वो अपने यार मलिक से मिलने वाली होती है। खुशी के मारे आज उसके पैर जमीन पर नहीं लग रहे थे, वो शीशे के सामने खड़ी होकर अपने आपको देखकर मुश्कुराने लगती है। और अपने आपको प्यार से थप्पड़ मारकर बाथरूम में सीधा नहाने के लिए चली जाती है।

नहाने के बाद रीत स्कूल वाली यूनिफार्म डाल लेती है। खुली सलवार और एकदम टाइट कमीज में उसके मोटी खड़ी चूचियां बहुत कमाल की लग रही थीं। आग की तरह किसी को भी गरम करने वाली रीत आज बहुत खुशी के साथ तैयार हो रही थी, अपने यार मलिक ले लिए। पर अंदर ही अंदर रीत का दिल डर रहा होता है। क्योंकी वो आज पहली बार स्कूल का बंक मार रही थी। पर अबतक शरीफ रीत अब शरीफ रीत नहीं रही थी। उसका ये सपना उसकी चूत की सील टूटने के साथ ही टूट चुका था। इतने में मलिक का फोन आता है और रीत फोन उठाकर बोली।

रीत- हेलो।

मलिक- जान आज हमारी मुलाकात का दिन है।

रीत- हाँ मैं भी आज अपनी जान से मिलने के लिए तैयार हूँ।

मलिक- हाँ मेरे मस्त पटोले, बता फिर तुझे कहां लेने के लिए आऊँ?

रीत कुछ सोचने के बाद बोली- “मलिक तू ऐसा करियो यार, तू ओमेक्स माल में आ जइओ। मैं तुझे ज्योति के साथ वहीं पर मिलूंगी..."

मलिक- “ठीक है...” कहकर फोन कट कर देता है।

रीत भी अब घर से निकल जाती है। और वो कुछ ही देर में अक्टिवा लेकर सीधी ज्योति के घर पहुँच जाती है। ज्योति डेली की तरह मिनी स्कर्ट डालकर रीत का इंतेजार करती हुई खड़ी थी, और वो रीत को देखकर बोली।

ज्योति- आ गई हीर आज पटोला बनकर अपने रांझे को मिलने?

रीत ये सुनकर शर्माते हुए बोली- "जल्दी बैठ अभी ओमेक्स माल जाना है..."

ज्योति अपनी दोनों टाँगें अक्टिवा के दोनों ओर करके बैठ जाती है, जिससे उसकी छोटी सी स्कर्ट ऊपर हो जाती है। और उसके नंगे चूतड़ एकदम ऊपर तक दिखने लगते हैं। फिर वो दोनों कुछ ही देर में ओमेक्स माल में पहुँच जाती है, रीत अपनी अक्टिवा पार्किंग में लगाती है।

वहीं पर मलिक अपनी बी.एम.डब्लू. कार के बाहर खड़ा था। मलिक रीत को देखकर दूर से स्माइल करता है, रीत भी उसे स्माइल करती है। पर ज्योति मलिक को देखकर उसपर फिदा हो जाती है। और वैसे भी हो भी क्यों ना, एकदम हैंडसम लड़का और उसकी गाण्ड के नीचे बी.एम.डब्लू. कार। अच्छी से अच्छी लड़की भी मलिक पर एक सेकेंड में फिदा हो सकती है।

ज्योति रीत को मोढ़ा मारकर बोली- “हाए रीत, तेरा रांझा तो बहुत मस्त है.."

रीत बोली- “और नहीं तो क्या मेरी जैसी जट्टी छोटे मोटे रांझे के हाथ में इतनी आसानी से नहीं आती..”

ज्योति फिर से मोढ़ा मारकर बोली- “अच्छा यहाँ तो जट्टी इस जाट के नीचे भी आ चुकी है एक बार..."

रीत शर्माकर बोली- “यार तू चुप कर प्लीज़्ज़..."

फिर वो दोनों मलिक के पास जाती हैं, और रीत मलिक से मिलते हए बोली- “मलिक ये है मेरी सबसे अच्छी दोस्त ज्योति.."

मलिक ज्योति के नंगे और मोटे चूतड़ों को देखकर एक स्माइल करते हुए बोला- “हेलो ज्योति.."

ज्योति भी स्माइल करते हुए बोली- “हेलो मलिक, मैं बहुत दिनों से रीत के मुँह से आपकी बहुत सारी तारीफ सुन रही थी। लो आज मैंने आपको देख ही लिया..” ।

मलिक हँसकर बोला- "अच्छा फिर कैसा लगा देखकर?"

ज्योति रीत की तरफ देखकर आँख मारकर बोली- “एकदम हीरो..."

मलिक हँसा और रीत बोली- “मलिक प्लीज़्ज़... आप बुरा ना मानना इस पागल की बातों का। इसका काम ही यही है की सबको तंग करना..."

फिर वो तीनों कार में बैठ जाती है, और मलिक कार चला लेता है। कुछ ही देर में वो तीनों एक जगह पर आ जाते है। दर्शल वहां एक फ्लैट होता है। फिर तीनों कार से नीचे उतार जाते हैं।

ज्योति थोड़े नखरे के साथ बोली- "रीत यार ये हम कहां आ गये?"

मलिक ज्योति की नंगी चिकनी टांगों को देखकर बोला- “वहीं पर, जहाँ एक बार आने के बाद बार-बार आने का दिल करता है...”

ज्योति मलिक की नजरें देखकर पढ़ लेती है, जो बार-बार उसकी नंगी टांगों पर आ रही थी। पर ज्योति उसे कुछ नहीं कहती, क्योंकी मलिक उसकी पक्की दोस्त का यार होता है। फिर वो तीनों उस फ्लैट में चले जाते हैं। वहां एक 23 साल का लड़का होता है, और उसका नाम विरेंदर होता है। वो मलिक का दोस्त होता है, और ये फ्लैट उस लड़के विरेंदर का ही होता है। मलिक उसको देखता है हँसकर उससे मिलता है। मिलते हुए विरेंदर की आँख रीत की कमाल की चढ़ी जवानी पर होती है। फिर उसकी नजरें रीत से मिल जाती है, और बार-बार मिलती हैं।

विरेंदर की नजरें बार-बार रीत की मोटी-मोटी बाहर निकली चूचियों पर आकर रुक जाती हैं। पर रीत इस काम में अभी कच्ची होती है, इसलिए वो बार-बार अपनी आँखें उससे चुरा रही थी।

मलिक- रीत ये मेरा दोस्त विरेंदर है, और ये फ्लैट इसका ही है।

विरेंदर स्माइल करते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाकर बोला- “हेलो रीत."

रीत हाथ मिलाती है और एक बार वो विरेंदर की नशे से भरी हुई आँखों में देख लेती है। उसके बाद विरेंदर की आँखें ज्योति की नंगी टांगों पर जाती हैं। फिर वो ज्योति से हाथ मिलाकर हेलो कहता है। पर ज्योति अपना नखरा चढ़ाकर उससे हेलो करती है। फिर वो चारों अंदर आ जाते हैं। जाते हुए विरेंदर और मलिक उन दोनों के पीछे होते हैं। वो दोनों रीत और ज्योति के मोटे भारी चूतरों को देखते हैं, और विरेंदर उन दोनों के चूतर देखकर धीरे से मलिक से बोला।

विरेंदर- "बहनचोद तू कबूतरियां तो कमाल की लेकर घूम रहा है...”

मलिक- बस यार तेरे भाई के छज्जे पर कबूतरी हमेशा कमाल की ही आती है।

विरेंदर- बहनचोदों कभी अपने भाई के बारे में ना सोच लियो।

मलिक- कोई बात नहीं, तू फिकर ना तुझे भी आज नजारे दिला दूंगा।

विरेंदर हँसकर बोला- "ओ मेरे भाई ने आज खुश कर दिया ओये..."
 
फ्लैट में दो बेडरूम होते हैं, एक रूम में ही वो चारों पहँच जाते हैं, और एक रूम खाली होता है। मलिक रीत को इशारा करके दूसरे रूम में जाने के लिए कहता है। रीत भी बिना किसी से बोले दूसरे रूम में चली जाती है। विरेंदर भी सिगरेट पीने के लिए फ्लैट से बाहर चला जाता है। रूम में आते ही मलिक रीत को अपनी बाहों में भर लेता है, और उसकी चूचियों को पकड़कर उसे निचोड़ देता है।

मलिक की इतनी बेसबरी देखकर रीत बोली- “अफफ्फ... मलिक प्लीज़्ज़... यार आराम से कर लो, मैं कौन सा कहीं भाग रही हूँ...”

मलिक रीत के होंठों को चूसकर बोला- "मेरी जान आग धीरे-धीरे नहीं एकदम से चढ़ती है...” कहते हये मलिक ने अपने हाथ पीछे करकर रीत के चतरों को कसकर मसल दिया।

रीत तभी नीचे से अपनी एंड़ियां उठाकर अपनी दोनों आँखें बंद कर लेती है। रीत अपना मुँह ऊपर उठाने लगती है, मलिक रीत की गर्मी को देखकर पागल हो गया। वो फिर से रीत के होंठों को अपने होंठों में कसकर पकड़कर जोर-जोर से चूसने लगता है। रीत भी अब गर्मी से मोदहोश हो जाती है, इसलिए वो अपने यार मलिक का पूरा खुलकर किसिंग में साथ देती है। फिर मलिक रीत की कमीज के पल्ले को पकड़कर उसका सूट उतारता है। रीत ने भी बिना किसी हिचकिचाहट के अपने हाथ ऊपर कर लिए, और मलिक रीत की कमीज उतारकर साइड में फेंक देता है। अब मलिक के सामने रीत की गोरी-गोरी चूचियां सफेद कलर की ब्रा में खड़ी थीं।

मलिक रीत की चूचियों को मसलता हुआ उसकी गर्दन पर किस करने लगता है। रीत भी गरम होकर मलिक का सिर अपनी गर्दन पर दबा रही थी। मलिक भी पूरा गरम हो रहा था, वो रीत की कमर पर हाथ डालकर उसकी ब्रा के हुक खोल देता है, और रीत को बेड पर लंबी लेटा देता है।

रीत की एकदम गोरी और नंगी नुकीली चूचियां देखकर मलिक एकदम उसकी चूचियां अपने मुँह में भर लेता है,

और उसकी चूचियों को जोर-जोर से चूसना शुरू कर देता है। रीत अपनी आँखें बंद करके उसका सिर अपनी चूचियों पर दबाकर अपनी चूचियां उसे चुसवाती है। ऐसे ही रीत की चूचियां चूसते-चूसते मलिक रीत की सलवार का नाड़ा खोल देता है, तो उसकी ढीली सलवार उसके चूतड़ों तक आ जाती है।

रीत- “हाए मलिक प्लीज़्ज़... ऊपर से ही कर लो ना प्लीज़्ज़..."

मलिक रीत की चूचियों को अपने दाँत से काटकर बोला- "ऊपर क्या रखा है, असली जुगाड़ तो नीचे है..."

रीत- आह्ह... आह्ह... ऐसे मत किया करो प्लीज़्ज़... दर्द होता है यार।

मलिक रीत की पैंटी के साथ ही सलवार उतारकर बोला- “अब दाँत नहीं मैं तो कुछ और ही मारूँगा..."

मलिक रीत की दोनों टाँगें खोलकर अपनी पैंट नीचे करके अपना लण्ड बाहर निकाल लेता है। रीत ने मलिक का लण्ड पूरा खड़ा किया हुआ था। मलिक रीत की दोनों टांगों के बीच में बैठता और रीत के होंठों को चूसते हुए अपने लण्ड का आगे वाला हिस्सा उसकी चूत पर रगड़ने लगता है।

रीत की पानी छोड़ती चूत पर जब मलिक का लण्ड रगड़ खाता है, तो रीत पागल हो जाती है। वो मलिक को अपनी बाहों में भर लेटी है, और मलिक को जोर-जोर से किस करने लगती है। लण्ड की रगड़ रीत को लण्ड का दीवाना बना रही थी। वो नीचे से अपनी गाण्ड हिलाकर अपनी चूत पर लण्ड को अच्छे से रगड़ रही थी।

मलिक समझ जाता है, की आज रीत चुदने के लिए पूरी तैयार है। इसलिए वो अब अपना लण्ड उसकी चूत के मुँह पर रखकर थोड़ा सा जोर लगाता है। मलिक का लण्ड धीरे-धीरे रीत की टाइट चूत को चीरता हुआ अंदर जा रहा था। जैसे-जैसे लण्ड अंदर जा रहा था, रीत ने चादर को अपने हाथ में कसकर पकड़ लिया था। रीत की चूत की सील तो पहले ही टूट चुकी थी, पर उस दिन उसकी चुदाई अच्छे से नहीं हुई थी। इसलिए अब मलिक धीरे धीरे अपना पूरा लण्ड रीत की चूत में डाल देता है।

रीत अपनी आँखें बंद करके मलिक को कसकर अपनी बाहों में भर लेती है। आज रीत को दर्द के साथ-साथ मजा भी मिल रहा था। इसलिए आज वो कुछ नहीं बोल रही थी। अब धीरे-धीरे मलिक रीत को ठोंकना शुरू कर देता है। तभी अचानक रीत की नजर दरवाजे पर जाती है, तो दरवाजा थोड़ा सा खुला होता है, जिसमें से एक आँख उसको देखती है। रीत को शक होता है और वो मलिक से बोली।

रीत- “मलिक मुझे लगता है, की कोई हमें देख रहा है..."

मलिक- नहीं रीत तुझे वहम हो रहा है, हमें कोई नहीं देख रहा है।

ये कहकर मलिक अपनी चुदाई को जारी रखता है, और अब वो खुलकर जोर-जोर से धक्के मारने शुरू कर देता है। रीत भी उसके हर धक्के का स्वागत अपनी गाण्ड को उठाकर कर रही थी। रीत अभी भी पूरी मस्त होकर उस आँख को देख रही थी। पर हवस और जवानी के इस नशे में पूरी डूबी रीत कुछ नहीं बोलती।

रीत की कुंवारी गरम चूत के आगे मलिक का लण्ड अब और ज्यादा देर नहीं टिक पाता। इसलिए वो अपना लण्ड बाहर निकालकर रीत की चूचियों के ऊपर अपने लण्ड का सारा पानी निकाल देता है। रीत भी अपना पानी निकाल चुकी थी, इसलिए अब वो आराम से लेट जाते हैं।

रीत देखती है, की अब वो आँख दरवाजे पर नहीं थी। फिर रीत उठकर वाशरूम में जाती है, और मलिक उठकर बाहर जाता है।

ज्योति मलिक को देखकर बोलती है- "बस हो गया हीर रांझे का प्यार?"

मलिक भी अपनी मूछों को ताव देकर बोला- "हाँ हीर रांझे का तो हो गया, बस अब जीजा साली का रह गया.."

ज्योति ये सुनकर शर्माकर बोली- “ये साली नहीं हाथ आती किसी के.."

मलिक ये सुनते ही ज्योति को पकड़कर खींचकरके अपने सीने से लगा लेता है।

ज्योति इस हरकत से थोड़ी से हिल जाती है और अपने आपको बचाते हुए बोली- “छोड़ो मुझे छोड़ो ये क्या कर रहे हो आप?"

मलिक- “इतना हक तो बनता है, जीजा साली का...”

जैसे ही मलिक ज्योति के होंठों को चूसने वाला होता है, तभी वाशरूम से रीत के आने की आवाज आ जाती है। तभी मलिक ज्योति को छोड़ देता है। रीत के आते ही ज्योति मलिक की ओर देखकर बोली।

ज्योति- “कहा था मैंने इतनी आसानी से हाथ नहीं आती मैं.."

फिर वो तीनों बाहर आ जाते हैं, बाहर विरेंदर खड़ा होता है है। विरेंदर मलिक को देखकर शैतानी सी स्माइल करता है और मलिक उसे देखकर हँसने लगता है। रीत और ज्योति कार में बैठ जाती हैं, रीत जाते-जाते एक बार विरेंदर को बड़े ध्यान से देखती है, और रीत नोट करती है, की वो आँख विरेंदर की ही थी। इस बारे में सोचते-सोचते थोड़ी देर में मलिक रीत और ज्योति को माल में छोड़ देता है। वहां से रीत और ज्योति अपनी अक्टिवा उठाकर सीधा घर की ओर निकल जाती है।

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कड़ी_55

रीत घर आ जाती है, और चुदाई की वजह से उसे थकान हो जाती है। इसलिए उसे नींद आने लगती है। दूसरी तरफ सुखजीत को जगरूप की काल आती है।

जगरूप- हेलो बहनजी वो बैंक का कुछ बना?

सुखजीत- हाँ जी, वो काम हो जाएगा दो-तीन दिनों में, आप बताओ आपका काम किया की नहीं किसी ने?

जगरूप सुखजीत की बात का मतलब समझ जाती है- “हाँ बहनजी मेरे काम तो होते ही रहते हैं, मेरे लिए कौन सा मुश्किल है?"

सुखजीत हँसते हुए बोली- “हाँ बहनजी किसी के नीचे आना तो सबसे आसान है..."

जगरूप- बहनजी आपके लिए भी आसान ही है। आप भी तो बहुत बार अपनी टाँगें उठाती है बेगान के आगे।

सुखजीत- बहनजी जट्टी को जवानी चढ़ी हुई है। और अपनी जवानी के मन की करना कौन सा बुरी बात है?

जगरूप- हाँ बहन, आप एकदम ठीक कह रही हो। अच्छा अब मैं फोन रखती हूँ, घर पर कोई आया है।

सुखजीत- पता है मुझे कौन आया होगा, जीजू का असिस्टेन्ट आया होगा।

जगरूप- हाँ बहनजी वो ही आया है।

सुखजीत- “ओके फिर करो ऐश। मैं फोन कट कर रही हूँ...” कहकर सुखजीत फोन कट कर देती है।

तभी उसका फोन फिर से रिंग करने लगता है। सुखजीत देखती है की ये किसी अंजान नंबर से काल आ रही है। सुखजीत फोन पिक करती है और दूसरी तरफ से आवाज आती है- “हेलो सोहनी क्या हाल चाल है?"

सुखजीत आवाज सुनते ही समझ जाती है, की ये बैंक मैनेजर गगन बोल रहा है।

फिर सुखजीत धीरे से बोली- “मैं ठीक हूँ जी आप सुनाओ?"

गगन- मैं ठीक नहीं हूँ, आप ही मुझे ठीक करो।

सुखजीत- हाए क्या हो गया आपको?

गगन- जिस दिन आपका हाथ पकड़ा है, उस दिन से मुझे नशा हो गया है।

सुखजीत- हाँ हाँ बस हाथ ही पकड़कर खुश रहना, बैंक का काम ना करना।

गगन- ओहहो... सोहनी नाराज क्यों होते हो, कर दूंगा बैंक वाला काम भी और साथ में आपका भी।

सुखजीत- सिर्फ बैंक का ही करो आई समझ में?

गगन- हसहाहा... बैंक का काम करने में क्या मजा, असली मजा तो आपका करने में है।

सुखजीत गगन की ये तड़प देखकर गरम होने लगती है। सुखजीत गगन का ये ही फायदा उठाना चाहती थी और फिर वो बोली- “चुप करके मेरे क्लब का अकाउंट खोलो..."

गगन- लगता है आज खोलना ही पड़ेगा अकाउंट पर उसके लिए मिलना पड़ेगा एक बार।

सुखजीत- क्यों मिलना पड़ेगा?

गगन- "आपके बड़े-बड़े चूतरों ने... ..."

सुखजीत- क्या?

गगन- ओहह... साइन चाहिये हैं आपके।

सुखजीत- हाँ हाँ ठीक है मैं आती हूँ बैंक।

गगन- नहीं बैंक में नहीं आप रेस्टोरेंट में आ जाओ। वहां हम दोनों आरम से मिलेगे आ जाओ दो बजे।

सुखजीत मान जाती है- “ठीक है मैं आती हूँ....
 
सुखजीत तैयार होने लगती है, सुखजीत अपने रूम में जाकर कपड़े चेंज करती है। वो एक टाइट कमीज डालकर उसमें अपने मोटी-मोटी चूचियां एकदम खड़ी कर लेती है। कमीज के पल्ले के बीच में से उसके मोटे-मोटे चूतड़ साफ दिख रहे थे। जिसे देखते ही किसी का भी लण्ड आराम से खड़ा हो जाएगा। सुखजीत अपने गोरे चेहरे पर काला चश्मा लगा लेती है, और घर से रेस्टोरेंट के लिए निकल जाती है। पटियाला की ट्रफिक से निकलने के बाद वो बड़ी मुश्किल से रेस्टोरेंट पहुँच जाती है। वो बेसमेंट में कार खड़ी करती है और लिफ्ट से अंदर चली जाती है।

गगन वहां बैठ अपनी मूछों को ताव देता हुआ सुखजीत का इंतेजार कर रहा था। जब वो सुखजीत को सामने से आता देखता है, तो वो जट्टी के रूप और उसकी खड़ि बड़ी-बड़ी चूचियां देखकर एक बार हिल जाता है। नीचे उसकी पैंट में उसका लण्ड सुखजीत की खूबसूरती को देखकर सलामी देने लगता है।

सुखजीत गगन के पास जाकर बोली- “हाँ जी मैनेजर साहब..."

गगन सुखजीत से हाथ मिलाता है, और उसका हाथ मसल देता है।

सुखजीत शर्माकर अपना हाथ गगन से छुड़वाकर बोली- “हाँ जी बताओ फिर कैसे और क्यों बुलाया है?"

गगन- बस आपके दर्शन करने थे, इसलिए मैंने आपको बुलाया है।

सुखजीत- अच्छा वो बैंक के पेपर?

गगन- बैंक के पेपर का तो एक बहाना था, मैं तो आपके हश्न के दर्शन करना चाहता था।

सुखजीत ये सुनकर तिरछी नजरों से देखकर हँसते हुए बोली- “बातें अच्छी कर लेते हो आप.."

गगन- “बातें तो आपको देखकर अपने आप निकलनी शुरू हो जाती हैं.." और फिर से सुखजीत का हाथ पकड़कर उसका हाथ मसलने लगता है।

सुखजीत नखरे के साथ बोली- “गगन जी आप जौन सा काम करने के लिए आए हो वो करो प्लीज़्ज़..."

गगन- करने तो मैं बहुत कुछ आया हूँ, सुखजीत जी पर क्या करूं? मेरा बस नहीं चलता।

सुखजीत हँसकर बोली- “हीहीही... बस तो आपका चलना भी नहीं है..."

गगन बैंक के पेपर्स पर सुखजीत के साइन करवाता है, और फिर वो दोनों वहां काफी पीकर वहां से निकल जाते है। वो नीचे पार्किंग में जाते हैं, जहाँ दोनों की गाड़ियां खड़ी हुई थीं पार्किंग में अंधेरा होता है, इसलिए गगन अंधेरे का फायदा उठाकर सुखजीत को पीछे से अपनी बाहों में भर लेता है। वो अपना लण्ड सुखजीत के चूतरों में दबा देता है।

सुखजीत अचानक अपने ऊपर हमले से घबरा जाई है और बोली- “हाए छोड़ो मुझे गगन ये क्या कर रहे हो?"

गगन अपने हाथ आगे ले जाता है, और उसकी चूचियों को मसलकर बोला- "उस दिन डान्स करते हुए, तब तो तू मुझे कुछ नहीं कह रही थी। मैंने तब भी तुझे हाथ लगाया था। तो अब क्या हो रहा है तुझे?"

सुखजीत ये सुनकर ढीली पड़ जाती है और बोली- “हाए यहाँ कोई आ सकता है, प्लीज़्ज़... ऐसा ना करो..."

गगन- कोई नहीं आता जान मेरी।

गगन सुखजीत को कार के बोनट पे लंबी लेटा देता है, और खुद उसके ऊपर चढ़ जाता है। जैसे ही सुखजीत कुछ बोलने लगती है, तभी गगन सुखजीत के होंठों में अपने होंठ फँसाकर जोर-जोर से उसके होंठों को चूसने लगता है। सुखजीत को पता था की गगन जवान लड़का है। इसलिए ये आग जल्दी पकड़ जाता है, इसलिए सुखजीत गगन का साथ देने लगती है। वो गगन के सिर पर हाथ फेरने लगती है।

गगन- “आहह... मेरी जान तू मुझे उसी दिन पसंद आ गई थी। जब मैंने तुझे डान्स करते हुए देखा था। तेरे हिलते चूतरों ने मेरे लण्ड को खड़ा कर दिया था.."

सुखजीत- आss आह्ह... मुझे नहीं पता था, की मेरे हिलते चूतरों ने एक गबरू जवान को पटा लेना है।

गगन दोनों हाथ सुखजीत की चूचियों पर रखकर जोर-जोर से मसलने लगता है। सुखजीत भी गरम होकर अपनी टाँगें गगन से लपेट लेती है। इससे गगन का लण्ड सुखजीत की दोनों टाँगों के बीच में आ जाता है। गगन कपड़ों के ऊपर से ही धक्के मारने लगता है। अब गगन पूरा गरम हो जाता है और मोका देखकर सुखजीत उसके होंठों में से अपने होंठ निकालकर बोली।

सुखजीत- “हाए गगन, अभी बहुत सारे काम पड़े हैं करने वाले। जो बैंक के लोन पास होने के बाद ही होंगे मैं अकेली कैसी करूँगी?

गगन जोर-जोर से ऊपर से धक्के मारते हुए बोला- “जान तू फिकर ना कर, मेरी मुटियार बनकर रह। मैं तेरे सारे काम कर दूंगा। बस तू मेरा काम कर और मैं तेरा काम कर दूंगा..."

सुखजीत ये सुनकर खुश हो जाती है और गगन को कसकर अपनी बाहों में भर लेती है, और फिर से वो उसके होंठों को चूसने लगती है। इतने में एक कार के हार्न की आवाज आती है। जिसको सुनकर सुखजीत और गगन झट से सुखजीत के ऊपर से उठ जाता है, और सुखजीत भी उठकर अपनी चूचियां सेट करती है। फिर वो दोनों अपनी-अपनी कार में बैठकर अपने-अपने घर चले जाते हैं।

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कड़ी_56

गगन ने उसके दाने को मसलकर छोड़ दिया था। और सुखजीत उसके मसलने के बाद अपनी कार को घर की ओर मोड़ लेती है। गगन ने उसको इतना क्यों मसल दिया था। और वो तो लण्ड लेने के लिए पागल हो रही थी। उसके जिश्म में आग सी लगी हुई थी। उसकी चूत लण्ड को लेने के लिए बहुत तड़प रही थी। पर उसने पता नहीं खुद को कैसे कंट्रोल रखा था। सुखजीत ने अब सोच लिया था की वो रात को हरपाल के नीचे अच्छे से आएगी। इसलिये तब तक वो खुद को शांत करके बैठी हुई थी।

सुखजीत अब घर पहुँच जाती है। और जब घर आती है तो वो देखती है की ड्राइंग रूम में सोनू का दोस्त रिंकू बैठा होता है, और साथ में सोनू भी बैठा था।

रिंकू जैसे ही सुखजीत आंटी को देखता है तो वो पागल हो जाता है और बोलता है- “सत श्री अकाल आंटी.."

सुखजीत- “सत श्री अकाल..." और ये कहकर अंदर रूम की ओर चल पड़ती है।

अब वो थोड़ी देर बाद नीचे की ओर अपना फोन चलाती हुई आ रही होती है। रिंकू बैठा सुखजीत को ही देख रहा होता है, और सुखजीत की मोटी-मोटी खड़ी चूचियां और मस्त फिगर पर अपनी नजर रखते हुए अपनी मूछो को ताव दे रहा होता है।

सुखजीत भी उसकी आँखों को पढ़ लेती है और उसको इग्नोर करना शुरू कर देती है। क्योंकी उसे पता होता है की वो उसपर लाइन मार रहा है। अब वो जैसे ही रिंकू और सोनू के पास से निकल रही होती है की तभी रिंकू थोड़ा ऊंची आवाज में सोनू से बोलता है।

रिंकू- “भाई आजकल पता है तुझे क्या हो रहा है?"

सोनू- क्या हो रहा है बता?

रिंकू- पता है आजकल की लड़कियां स्कूल से बंक मारने लगी हैं, और वो भी पता है किसके लिए?

सोनू- किसके लिए।

रिंकू- अपने आशिक के लिए।

रीत ये सब सुन लेती है और वो समझ जाती है की रिंकू मेरे बारे ही कह रहा है।

सोनू- अच्छा पर तू किस लड़की के बारे बात कर रहा है पहले ये तो बता?

रिंकू- अरे तुझे पता है आजकल बंक मारकर लड़कियां बी.एम.डब्लू. कार में घूमती है।

ये सुनकर रीत के पैरों नीचे से जमीन खिसक जाती है और वो सोचती है की इसे कैसे पता चला?

रिंकू भी उसकी तरफ आँख मारते हुए और स्माइल देते हुए बोलता है- “हमें तो सब पता है."

रीत ये सब सुनकर वहां से उठकर अपने कमरे में आ जाती है, और कमरे में आते ही ये सोचती है की रिंकू को कैसे पता चला की मैं मलिक साथ थी। और चलो अब पता चला तो चला, पर ये कही सोनू को ना बता दे नहीं तो बहुत बड़ा कलेश हो जायगा। अब रीत नीचे की और आती है और वो देखती है की अब रिंकू जा चुका है।

और फिर वो बस ये ही सोचती है की उसने कहीं सोनू को ना बता दिया हो। नहीं तो बहुत बड़ा कलेश हो जाएगा।

अब रीत उसके पास जाती है और बोलती है- “सोनू मम्मी कहां हैं तुझे पता है?"

सोनू- नहीं मुझे नहीं पता, तू वैसे देख ले कमरे में ही होंगी...”

रीत की ये बात सुनकर जान में जान आती है की शुकर है रिंकू ने अभी कुछ नहीं बताया है। और फिर वो कमरे की ओर चल पड़ती है। बस फिर उसके बाद ऐसे ही रात हो जाती है और फिर सब खाना खाकर अपने-अपने रूम की ओर चल पड़ते हैं।

उधर रीत भी अब मलिक के साथ फोन पर बातें कर रही होती है, तो दूसरी तरफ अब सुखजीत अपनी चूत अपने सरदार से मरवाने के लिए तैयार होती है। वो आज बहुत टाइम बाद हरपाल से चुदने वाली होती है। और फिर वो हरपाल साथ आकर लेट जाती है।

सुखजीत- सुनो जी।

हरपाल- हाँ जी बोलो।

सुखजीत- थोड़ा टाइम इधर भी दे दो।
 
हरपाल थका हुआ होता है और कहता है- “सुखजीत यार सोने दे, तुझे पता तो है आफिस वालों ने तो हमारी गाण्ड की ऐसी तैसी कर रखी है..."

सुखजीत- अच्छा वो जो मर्जी करें पर आपके पास यहां के लिए टाइम नहीं है?

सुखजीत की ये बात हरपाल समझ जाता है, और फिर चद्दर के अंदर से ही सुखजीत की चूचियों को हाथों में लेकर मसलते हुए बोलता है- “अच्छा ध्यान तो बीवी को देना चाहिए, क्योंकी आदमी सारा दिन काम करके थक जो जाता है...”

सुखजीत भी उसके लण्ड को हाथों में लेकर ऊपर-नीचे करती है और कहती है- “अच्छा अब सारा काम करने के बाद इसमें भी बीवी ही ध्यान दे..."

सुखजीत ये कहकर हरपाल के लण्ड को बाहर निकल लेती है, और उसके ढीले से लण्ड को हिलाने लगती है। इतने बड़े और मोटे लंबे लण्ड के लेने के बाद अब सुखजीत को अपने पति हरपाल का लण्ड जरा सा भी अच्छा नहीं लगता।

सुखजीत के हाथों में आने के बाद अब हरपाल के लण्ड में थोड़ी सी जान आती है। फिर हरपाल सुखजीत के होंठों को चूसना शुरू कर देता है। चूसा चुसाई के बीच सुखजीत चादर के अंदर ही पूरी नंगी हो जाती है। उसकी चूत में जो आग लग रही थी, अब उससे और ज्यादा कंट्रोल नहीं होता। सुखजीत ने खुद ही हरपाल को अपने ऊपर चढ़ा लिया और अपनी दोनों टाँगें खोलने के बाद वो खुद ही हरपाल के लण्ड को अपने हाथ से पकड़कर उसके लण्ड को अपनी चूत पर सेट करके खुद ही नीचे से अपनी गाण्ड हिलाकर अपनी चूत उसके लण्ड से चुदवाने लगती है।

सुखजीत जितनी भी मजे लेने के कोशिश कर रही थी, पर हरपाल के साथ अब सुखजीत को इतना मजा नहीं आ रहा था। पर सुखजीत को पता था, की जब तक वो अपनी आग को शांत नहीं करेगी। तब तक उसे नींद नहीं आएगी। हरपाल का छोटा सा लण्ड सुखजीत की चूत की गरमी के आगे ज्यादा देर नहीं टिक पाया। और करीब 10 मिनट के बाद हरपाल जोर-जोर से सांसें लेता हुआ अपने लण्ड का सारा पानी सुखजीत की चूत में ही निकाल देता है।

सुखजीत का अभी भी कुछ नहीं बना था, पर अब वो हरपाल को भी कुछ नहीं कह सकती थी। क्योंकी जैसे ही हरपाल के लण्ड का पानी निकला था।तभी वो बेड पर गिरकर सो गया था। सुखजीत ये सब देखकर काफी निराश हो जाती है, की अब उसके लण्ड में वो पहले वाली बात नहीं रही है। ये सब सोचते-सोचते सुखजीत भी सो जाती है।

अगला दिन चढ़ जाता है, और फिर हमेशा की तरह सोनू अपने कमरे में ही पड़ा होता है। उधर सुखजीत भी रोज की तरह उठकर अपने काम में लग जाती है। वो थोड़ी अपसेट होती है क्योंकी रात जो हरपाल साथ हुआ था उससे उसका मूड आफ होता है। उधर हरपाल भी डेली की तरह आफिस के लिए निकल जाता है। रीत भी सलवार कमीज पहनकर अच्छी सी बनकर अक्टिवा पर बैठकर स्कूल के लिए चल पड़ती है। आज वो फिर से ज्योति के घर जाती है पर डेली की तरह ज्योति आज बाहर नहीं खड़ी होती है।

अब रीत वहां पहुँचकर हार्न बजती है तो ज्योति टी-शर्ट और निक्कर में बाहर आती है औरर ये देखकर रीत बोलती है- “क्या बात है तूने आज स्कूल नहीं जाना क्या?"

ज्योति- हाँ यार आज तू चली जा।

रीत- पर तुझे हुआ क्या है?

ज्योति धीरे से बोलती है- “यार पीरियड्स आ रखे हैं..”

रीत- तो क्या हुआ यार चल ले।

ज्योति- यार पैड नहीं है और बुरा हाल हो रखा है।

रीत- “चल तू आराम कर मैं जा रही हूँ.” और फिर वो स्कूल के लिए चली जाती है और थोड़ी ही देर में वो स्कूल पहुँच जाती है।

अब रीत वहां पहुँचकर पार्किंग में अपनी अक्टोबा लगा रही होती है और तभी वहां पर वो देखती है की रिंकू अपनी बुलेट पर बैठा होता है। वो उसको देखकर घबरा जाती है की ये यहां पर क्या कर रहा है? और वहां से चलने का करती है। पर जब वो देखती है उसकी तरफ तो वो स्माइल कर देता है। फिर वो जा रही होती है।

तभी रिंकू पीछे से बोलता है- “हाय... फिर आज नहीं जाना बी.एम.डब्लू. में.."

रीत ये सुनकर रुक जाती है और डरती हुई उसके पास आती है और कहती है- “तुम ये क्या कह रहे हो? तुम्हें जरूर गलत फहमी हुई होगी, वो लड़की मैं नहीं कोई और होगी.."

रिंकू- “नहीं। मुझे और गलत फहमी हो ही नहीं सकती है। और मैं ये भी बता दूँ की तुम टेन्शन मत लो क्योंकी मैं ये सब कुछ किसी को नहीं बताने वाला हूँ..”

ये सुनकर रीत की जान में जान आती है और फिर वो वहां से जाने लगती है, तो पीछे से रिंकू उसकी बाजू को पकड़ लेता है।

रीत- ये क्या बदतमीजी है? तुम मेरा हाथ छोड़ो।

तभी रिंकू कहता है- "मेरे पास पिक्स भी हैं, जो की पूब करती है की तुम मलिक को झप्पियां दे रही थी। देख मैं ये सब सोनू को बताने में देर नहीं करूंगा। क्योंकी मुझे किसी का डर नहीं है, और तू फिर देखना क्या होगा तेरे साथ..."

रीत ये सुनकर उससे मिन्नतें करने लगती है और फिर वो उसको अपना फोन निकालकर उसको पिक दिखाता है तो वो जैसे ही पिक देखती है तो उसके होश उड़ जाते हैं।

रिंकू उसके बाद कहता है- “मैं ये सब एक शर्त पर नहीं बताऊँगा?"

रीत- हाँ बता क्या है वो शर्त?

रिंकू- मैं तेरे साथ एक दिन के लिए कहीं जाना चाहता हूँ।

रीत ये बात सुनकर हैरान हो जाती है और फिर उसके पास और कोई भी चारा नहीं होता तो वो उसको मजबूरी में हाँ कर देती है। रिंकू उससे उसका मोबाइल नम्बर ले लेता है और फिर वहां से चला जाता है। और फिर रीत भी स्कूल चली जाती है।

***** * * * * *
 
कड़ी_57

दूसरी तरफ घर पर सुखजीत को जगरूप का फोन आ जाता है। और जगरूप सुखजीत को बताती है की आज उसने क्लब के लिए मीटिंग रखी है।

सुखजीत नहा धोकर तैयार हो जाती है। एकदम कमाल की खूबसूरत औरत अपने कमाल के हश्न को टाइट सूट में फँसाकर, अपनी चूचियों को खड़ी कर लेती है। टाइट कमीज का पल्ला भी उसके चूतरों से उठ रहा होता है। साइड में से उसके मोटे-मोटे चूतड़ पटियाला शाही सलवार में आग लगा रहे होते हैं। जो भी उसे देखता है, वो उसका दीवाना बन जाता है। सुखजीत एकदम कमाल का पटोला बनकर जगरूप की तरफ अपनी कार में बैठकर निकल जाती है।

उधर बाकी सारी औरतें पहले से बैठी होती हैं, जो क्लब की मेंबर होती हैं। सुखजीत बारी-बारी से सबको मिलती है, और वो बताती है की बैंक का लगभग हो ही गया है। ये सुनकर सब औरतें खुश हो जाती हैं। कालोनी में अब होने वाले फंक्सन की तैयारियां शुरू होती हैं, क्योंकी फंक्सन में एम.एल.ए. रंधावा साहब को आना था।

रंधावा साहब जगरूप के मोहल्ले के लीडर होते हैं। जगरूप का पति रंधावा को काफी अच्छे से जानता था। इसलिए वो फंक्सन में चीफ गेस्ट की तरह आने वाले थे, और उनकी तरफ से सुखजीत के क्लब को थोड़ी डोनेशन भी मिलने वाली थी।

सुखजीत सब के साथ चेयर पर बैठी होती है और बैठे-बैठे सबसे बोलती है- "देखो नागरिको बहनजी, रंधावा साहब से डोनेशन भी आनी चाहिए, वर्ना इस फंक्सन का कोई फायदा नहीं होने वाला.."

जगरूप- "आप फिकर ना करो बहनजी मैं अपने पति से बात कर लूँगी, वो आगे इस बारे में खुद उनसे बात कर लेंगे। पर जो हम बैंक से लोन ले रहे हैं, वो हमें उससे ज्यादा लेना पड़ेगा, कम से कम 5 लाख रूपए ऊपर.."

सुखजीत- बहनजी 5 लाख की कौन सी बात है।

जगरूप- "देखो बहनजी, हमने सिर्फ फंक्सन ही नहीं उसके साथ-साथ आए हुए लोगों के चाय नाश्ते का भी इंतेजाम करना है। और उसके साथ गरीब लोगों के लिए लँगर भी लगाना है। आप तो ये सब आराम से कर सकती हो। क्योंकी बहनजी आपकी बहुत जान पहचान है."
 
सुखजीत जगरूप की बात सुनकर थोड़ी देर सोचकर बोलती है- “ठीक है बहनजी, मैं कोशिश करूँगी."

फिर सुखजीत बाकी औरतों को कहती है- “सब औरतें अपने-अपने लिंक की हिसाब से ज्यादा से ज्यादा बंदे फंक्सन में लाएं। ताकी हमारे पास ज्यादा से ज्यादा डोनेशन मिल सके..."

इतने में मीटिंग खतम हो जाती है, और सब औरतें अपने-अपने घर चली जाती हैं। सुखजीत के ऊपर अब बैंक का और लोन चुकाने की जानकारी बढ़ गई थी। पर बैंक मैनेजर सुखजीत का आशिक था, और सुखजीत को काफी अच्छे से पता था की गगन को उसने कैसे काबू करना था। सुखजीत अब जगरूप के घर से निकल जाती है, और अपनी कार में बैठकर गगन को फोन करती है।

गगन अपने फोन पर सुखजीत जैसी सेक्सी औरत का नंबर देखकर खुश हो जाता है। वो फोन उठते ही बोल “हाए ओये आज तो इस गबरू की लाटरी लगी है। जो इतनी शोणी कमाल के पटोले ने इस जाट को खुद फोन कर लिया है..."

गगन की बातें तो पहले से ही सुखजीत के सीधे दिल पर जाकर लगती थी। आज भी उसके मुँह से ये बात सुनकर खुश हो जाती है, और हँसते हए बोली- “लाटरी तो आपकी उस दिन लग गई थी, जिस दिन मैं आपके कार के बोनट पर मैं आपके नीचे लेट गई थी...”

सुखजीत की ये बात सुनकर गगन का लण्ड खड़ा हो गया, और वो अपना लण्ड मसलने लगा और फिर वो बोला- "आए हाए अगर ऐसी लाटरी मेरी रोज लगे, तो मजा ही आ जाएगा..."

सुखजीत हँसते हुए बोली- “हाए आए आप बस मेरा एक छोटा सा काम कर दो, इस लाटरी की टिकेट भी मैं ही दूँगी..”

गगन- आए हाए बोलो मेरे हुजूर क्या काम है?

सुखजीत- जो अभी हम बैंक से लोन लेने वाले हैं, उस रकम के इलावा 5 लाख का एक और लोन मुझे चाहिए..."

गगन- ये कैसे हो सकता है भला? कोई सेक्योरिटी है?

सुखजीत- मेरी जान को रख लो सेक्योरिटी आप।

गगन- “हाए तू तो मेरी जान है मेरी जान। तेरा काम हो जाएगा, मैं एक और लोन पास कर दूंगा। बस तू मुझे ये बता तू.."

सुखजीत- मेरा काम कल आपने कर तो लिया था पार्किंग में।

गगन- ले वो भी कोई काम था, सब कुछ ऊपर-ऊपर से ही किया था उस दिन तो।

सुखजीत- अच्छा फिर तुझे और क्या चाहिए?

गगन- मैं वो ही चाहता हूँ, जो तू अपने मोटे-मोटे चूतरों के बीच में लेकर घूमती फिरती है।

गगन के मुँह से ये सुनकर सुखजीत गरम हो जाती है। क्योंकी गगन सुखजीत की चूत के बारे में बात कर रहा था। जिसे सुनते ही उसकी चूत में आग सी लगाने लगती है।

सुखजीत- तू पहले मेरा काम कर, फिर हम दूसरे काम के बारे में सोचते हैं समझा।

गगन- तेरा पहला काम तो एक मिनट में हो जाएगा। बस तू अब दूसरे काम के लिए तैयार रह समझी।

सुखजीत- ठीक है अब मैं फोन रखती हूँ।

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गगन का लण्ड पूरा खड़ा हो चुका था। गगन अब किसी भी कीमत पर सुखजीत की जवानी को जमकर खाने के लिए पागल हो चुका था। हालत ही ऐसी थी, की गगन सुखजीत को चोदने के लिए अब कुछ भी बिना सोचे समझे करने को तैयार था। ये बात सुखजीत को पहली मीटिंग में ही पता चल गई थी। इसलिए अब वो गगन का जमकर पूरा फायदा उठाना चाहती थी। क्योंकी अब उसको गैर मर्दो से चुदने का शौक तो लग ही गया था। इसलिए अब गगन से चुदने में उसे कोई दिक्कत नहीं थी।

दूसरी तरफ रीत स्कूल में बैठी ये सोच रही थी, की ये उसके साथ क्या हो गया है? एक तरफ तो वो मलिक को अपनी जान से ज्यादा सच्चा प्यार करती है। पर दूसरी तरफ आज उसने रिंकू के साथ डेट पर जाने के लिए हाँ कर दी थी। पर ये सब वो मजबूरी में कर रही थी। क्योंकी उसके पास अब कोई और रास्ता ही नहीं था। इसलिए वो चुपचाप उसके साथ जाने को तैयार हो गई थी। अब उसने ये सोचा की अब वो रिंकू के साथ डेट पर तो जाएगी ही, पर इस बात का किसी को पता नहीं लगने देगी।

इतने में स्कूल की बेल बज जाती है, और रीत अपनी अक्टिवा उठाकर सीधा घर की ओर निकल जाती है।

* * * * * * * * * *
 
कड़ी_58

घर पर जाकर रीत वही सब सोच रही होती है जिसकी वजह से वो परेशान हो रही होती है। बैठी सोच रही होती है की अब उसके साथ ये क्या हो रहा है। तभी रिंकू का फोन आ जाता है और उसे ना चाहते हुए भी मजबूरी में फोन उठाना पड़ता है और वो फोन उठा लेती है।

रीत- हेलो।

रिंकू- हाँ जी क्या हाल है मेरी मेडम के?

रीत- ठीक हूँ। पर तू मेरे पीछे क्यों पड़ा हुआ है?

रिंकू- बस क्या कहूँ।

रीत- देख रिंकू मैं तेरे साथ डेट पर नहीं जाना चाहती हूँ पर तू किसी को सब ना बता दे इसलिये जा रही हूँ।

रिंकू- तू कल बस मिल ले। चल ले मेरे साथ।

रीत- हाँ ठीक है। मैं कल मिल लूँगी, पर तू ये बात हमेशा के लिए याद रख ले की मेरा पहला और आखिरी प्यार मलिक है। और मेरी एक शर्त भी है।

रिंकू- क्या शर्त है?

रीत- मैं बस तेरे से कल पहली और आखिरी बार मिलूंगी और उसके बाद कभी नहीं मिलूंगी क्योंकी मैं तुझसे मजबूरी में मिल रही हूँ और मैं बस यही चाहती हूँ की तू बस भैया को कुछ ना बता दे।

रिंकू- ठीक है। पर तू मिल तो सही और रही बात तुझे डेट पर ले जाने की तो उसके लिए ही मैंने तेरे भाई के साथ दोस्ती करी थी ताकी तुझे देख पाऊँ। और अगर तू ना मिली तो मैं सब कुछ सोनू को बताऊँगा।

रीत- चल ठीक है। कल मिलूंगी पर मेरी शर्त भी याद रख।

रिंकू- “हाँ हाँ याद है...” और फिर वो फोन कट कर देता है। और बाद वो मूछों को ताव देते हुए कहता है- “ऐसे कैसे आखिरी बार होगा, अभी तो शुरुवात हुई है."

दूसरी तरफ सुखजीत गगन साथ बहुत सी सेक्सी बातें करती है जिससे की उसका निपल खड़ा हो जाता है। और फिर ऐसे ही उसकी चूत भी सलवार में से गीली हो जाती है और उसे लण्ड की तड़प होने लगती है। तभी शाम का मौसम और टाइम देखकर उसको ख्याल आता है की वो पार्क में चली जाए और फिर वो पार्क के लिए घर से निकलती है और उधर शीला को भी कह देती है।

अब जैसे ही वो बाहर आती है तो सामने प्यारेलाल अपने घर के बाहर खड़ी कार में से निकल रहा होता है और सुखजीत को देखकर बहुत ही अच्छी वाली स्माइल पास करता है।

प्यारेलाल- कहां चले हो?

सुखजीत भी उसको सेक्सी स्माइल देते हुए कहती है- “बस पार्क में जा रहे हैं, बहुत टाइम हो गया कसरत किये को तो सोचा जाकर कर ही लूं..”

प्यारेलाल- “हाँ हाँ सही है...” प्यारेलाल भी ये मोका ऐसे कैसे गवांने देता तो बोल दिया- “तुम चलो मैं भी आ रहा

सुखजीत- “हाँ हाँ आ जाओ। मैं तो कब से तैयार खड़ी हूँ। ढीले तो आप पड़ते हो..” और अपनी गाण्ड को मटकाती हई पार्क की ओर चल पड़ती है।

प्यारेलाल उसकी हिलती मस्त गाण्ड को देखकर पागल हो जाता है और फिर अपने लण्ड को हाथ में लेकर मसलने लगता है, और खुद से ही कहता है- “आज तो कसरत करनी ही पड़ेगी."

अब सुखजीत पार्क पहुँच जाती है और वहां पर वो ट्रैक पर आकर अपनी वाक कर रही होती है। उसने अब तक एक चक्कर लगा लिया होता है की तभी उसे प्यारेलाल आता हुआ दिखाई देता है। सुखजीत उसकी आँखों को देखकर खुश हो जाती है। क्योंकी उसकी आँखों में भी सुखजीत की तलाश होती है।

प्यारेलाल उसको देखता है और वो दिख ही जाती है, और फिर उस तक पहुँचने के लिए तेज-तेज चलता है और उस तक पहुँच ही जाता है। सर्दिया आने की वजह से अब अंधेरा भी जल्दी पड़ जाता है और अब दोनों वाक कर रहे होते हैं। सुखजीत तेज-तेज चल रही होती है, जिससे की उसकी गाण्ड बहुत ही ज्यादा हिल रही होती है, और ये देखकर प्यारेलाल का मूड खराब हो रहा हो जाता है।
 
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