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Adultery Nakhara chadhti jawani da (नखरा चढती जवानी दा )

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कड़ी_63

स्कूल की छुट्टी हो जाती है और रीत अपनी अक्टिवा लेने के लिए पार्किंग में जाती है। और ज्योति बाहर खड़ी होती है, हरी मोका देखकर अपनी बुलेट लेने के बहाने रीत के पास जाता है और रीत से बोला।

हरी- “किसी ने सही कहा है, मोका मिलता नहीं लेना पड़ता है। देखो आज मैंने बात करने का मोका ले लिया..."

रीत हँसकर बोली- अच्छा जी, वो जो आपकी सहेली बाहर खड़ी है, उसका क्या होगा फिर?

हरी- अब उसका भी कुछ करना होगा।

रीत- अच्छा फिर ऐसा करो पहले उसका कुछ करके, फिर आप मेरे साथ बात करना।

हरी- ठीक है।

फिर हरी अपनी बुलेट स्टार्ट करता है, और वहां से चला जाता है। रीत भी ज्योति को लेकर स्कूल से निकल लेती है। उसे उसके घर छोड़कर आगे अपने घर की ओर निकलती है। जैसे ही रीत ज्योति को उसके घर छोड़ती है, तभी हरी अपनी बुलेट उसके साथ लगाकर चलने लगता है।

रीत उसको देखकर फिर से स्माइल करती है, और अपने मन में सोचती है- "ये मुर्गा फँस गया मेरे जाल में.."

हरी- मिल गया जी मोका अब तो।

रीत- अब मोका मिल गया है, तो मोका का फायदा भी उठाओ ना।

हरी का लण्ड रीत की डबल मीनिंग बातें सुनकर खड़ा हो जाता है और फिर बोला- “कैसे उठाऊँ रीत?"

रीत- क्या?

हरी- मोका का फायदा?

रीत भी हरी की बातों का मतलब समझ जाती है और बोलती है- “बातें करके और कैसे?"

हरी- वैसे बातें तो फोन पर काफी अच्छी होती है।

रीत देखती है, की आगे उसकी कालोनी आने वाली है। इसलिए वो रुक कर हरी को अपना फोन नंबर दे देती है,

और हरी को वहां से भेज देती है। घर जाकर रीत अपने कपड़े चेंज करके अपने रूम में आराम करती है।

दूसरी तरफ सोशल क्लब की हेड सुखजीत पूरी जोर-शोर के साथ तैयार हो रही होती है। उसके बाहर निकले चूतर और उसकी चूचियां एकदम खड़ी थीं। उसकी चूचियां और चूतर ब्लू कलर के टाइट सूट में काफी अच्छी लग रही थीं। उसको इस रूप में देखकर अच्छे-अच्छों का लण्ड बड़े आराम से खड़ा हो सकता था।

सुखजीत बाहर जाने ही वाली होती है, इतने में हरपाल घर आ जाता है। हरपाल बहुत ही परेशान लग रहा होता है। और वो ऊँची आवाज में फोन पर गुस्से में किसी से बात कर रहा होता है। ये देखकर सुखजीत घबरा जाती है, क्योंकी उसने हरपाल को कभी भी इतना परेशानी में नहीं देखा था।

हरपाल ऊँची आवाज में बोल रहा था- “सर, मैंने सच में कुछ नहीं किया, मैं निर्दोष हूँ। मुझ जैसे शरीफ आदमी को फँसाने की कोशिश करी जा रही है...” ।

सुखजीत ये सुनकर अब और भी घबरा जाती है।

रीत भी अब अपने रूम से बाहर आ जाती है और बोली- “मम्मी पापा को क्या हो गया है?"

हरपाल रीत को देखकर बोला- “कुछ नहीं हुआ, तू अपने रूम में जा...” कहकर हरपाल भी अपने रूम में चला जाता है।

सुखजीत भी उसके पीछे-पीछे जाकर बोली- “क्या हुआ जी?"

हरपाल परेशानी में बोला- “कार्पोरेसन में मेरे ऊपर एक रिश्वत लेने का इल्ज़ाम लगाकर मुझे दफ्तर से निकल दिया है। पर मैंने कुछ नहीं किया है, मैं एकदम बेकसूर हूँ। मुझे फंसाया जा रहा है.."

सुखजीत अपने पति हरपाल को दिलाशा देती हुई बोली- “देखो जी कुछ नहीं होता, कोई ना कोई हल तो जरूर निकल जाएगा..."

इतने में हरपाल फिर से फोन मिलाने लगता है, अपने दोस्तों को।

इतने सोनू और रिंकू घर आ जाते हैं, उन दोनों को कुछ भी नहीं पता होता। वो दोनों आकर सोनू के रूम में जाते हैं। पर रिंकू सोनू के रूम में जाने से पहले रीत के रूम में जाता है। रीत के रूम का दरवाजा थोड़ा सा खुला होता है, वो उसमें से अंदर देखता है, तो उसका लण्ड एकदम से खड़ा हो जाता है, क्योंकी उसके सामने रीत की उभरी गाण्ड थी, जो साफ-साफ दिखाई देती है।

रीत अपने बेड पर उल्टी लेटी हुई थी। उसने एक टाइट पाजामा डाला हुआ था। जिसमें उसकी पैंटी भी साफ-साफ चमक रही थी। रिंकू के आगे रीत के एकदम गोल-गोल चूतर साफ-साफ नजर आ रहे थे। रीत के चूतर देखकर रिंकू का बुरा हाल हो गया था। वो अपनी पैंट में हाथ डालकर अपना लण्ड मसलने लगा था। वो सोच रहा था, की अब ऐसे बात नहीं बनेगी। अब उसे ही कुछ करना होगा, तभी उसके दिमाग एक आइडिया आता है।
 
रीत उल्टी लेट कर लैपटाप पर फेसबुक पर हरी से बातें कर रही थी। और बातों ही बातों में रीत हरी से ठरक से भरी बातें करके मजे ले रही थी। जितनी शरीफ रीत पहले थी, आज से उससे काफी ज्यादा चालू बन चुकी थी। मजे लेते-लेते रीत की चूचियां एकदम टाइट हो गई थी।

इतने में रिंकू ने भी आइडिया लगया की क्यों ना सोनू से छुपकर वो रीत से एक मुलाकात कर ले। क्योंकी उस दिन के बाद रिंकू और रीत की एक बार भी बात नहीं हुई थी। रिंकू सोनू से बोला- “भाई माल आया हुआ है तेरे मतलब का?"

सोनू के मुँह पर एक शरारती मुश्कान आई और वो बोला- “भाई फिर दे ना जल्दी से.."

रिंकू अपनी जेब से स्मैक की एक पुड़िया निकालकर सोनू को देता है। सोनू स्मैक देखकर खुश हो जाता है, और झट से रिंकू के हाथ से छीन लेता है। फिर वो दोनों स्मैक लेते है। पर रिंकू सिर्फ सोनू के आगे स्मैक लेने की आक्टिंग करता है। स्मैक लेते ही सोनू बेड पर ढेर हो जाता है। और अब रिंकू के पास बहुत अच्छा मोका होता है। वो सोनू के रूम में से निकालकर सीधा रीत के रूम में जाता है।

रीत अभी भी वैसे ही उल्टी लेटी हुई अपने दोनों चूतर बाहर निकाले बेड पर लेटी हुई थी। रिंकू जैसे-जैसे रीत के पास जाता है, वैसे-वैसे उसकी आँखों में रीत के चूतर बड़े होने लगते हैं। रिंकू का लण्ड अब उसकी पैंट में पूरा खड़ा हो चुका था। रिंकू बेड पर धीरे से बैठ जाता है। रिंकू के बेड पर बैठने से बेड पर हलचल हो जाती है। और रीत उस हलचल से एकदम डर जाती है।

रीत झट से अपना लैपटाप बंद करके रिंकू को देखती है और बोलती है- “रिंकू तू यहां क्या कर रहा है? जा यहाँ से अभी..."

रिंकू- तू तो बात करती नहीं मेरे साथ, तो मैंने सोचा क्यों ना जाकर खुद ही हालचाल पूछ लूँ मैं।

रीत- तू पागल हो गया है क्या? सोनू आ जाएगा। तू बस जा अभी यहाँ से मुझे कुछ नहीं पता।

रिंकू- सोनू नहीं आता, मैं उसका जुगाड़ करके ही यहाँ आया हूँ। तू उसकी फिकर ना कर।

रीत- कौन सा जुगाड़ कर दिया है तूने सोनू का?

रिंकू- उसको एक पटियाला पेग पिला दिया है, जिससे उसे नींद आ गई है।

रीत ये सुनकर थोड़ी ढीली हो जाती है, और सोचती है- "अपने यार मालिक के लिए तेरे पास सारा दिन टाइम है, हम जैसे गरीबो के लिए नहीं है...”

रीत- हाँ पता है मुझे आया बड़ा गरीब।

रिंकू जब से बेड पर बैठा हुआ था, तब से उसकी नजर रीत के चूतरों पर ही जमी हुई थी। रीत अब अपनी टाँगें थोड़ी खोल लेती है, जिससे उसके चूतर भी खुल चुके थे। अब उसे चूतर अलग-अलग नजर आ रहे थे। ये देखकर रिंकू की पैंट में तंबू बन गया था। जिसको रीत ने अपनी तिरछी नजरों से देख लिया था।

हरी के साथ गरम-गरम बातें करके रीत पहले से ही गरम हो रखी थी, और अब रिंकू के पैंट में बना तंबू देखकर रीत और ज्यादा गरम हो जाती है। फिर रीत रिंकू को पाइंट मारते हुए बोली।

रीत- "रिंकू मैं तेरा सारा गरीबपना देख चुकी हूँ..”

रिंकू मुश्कुरा पड़ा क्योंकी वो रीत की बात का मतलब समझ चुका था, की वो कहाँ इशारा करके बोल रही है। रिंकू अपना लण्ड मसलते हुए बोला- “गरीबपना तूने कभी देखा भी है?"

रीत जब रिंकू को लण्ड मसलते हुए देखती है, तो उसके दिल में हलचल होने लगती है। उसकी चूचियां और ज्यादा खड़ी हो जाती हैं। रीत की नजरें रिंकू के लण्ड को देख रही थीं, और रिंकू की आँखें रीत के चूतरों से हटने का नाम नहीं ले रही थीं। पर रीत को इस सब में बहुत मजा आ रहा था।

रीत अपनी ठरक भूलकर बोली- “अच्छा अगर ऐसी बात है तो आज दिखा मुझे अपना गरीबपना। आज मैं भी देखती हूँ की तेरे जैसे गरीब का गरीबपना कैसा होता है?

रीत के मुँह से ये बात निकलते ही रिंकू का वो सारा सबर तोड़ देती है, और रिंकू झट से रीत के एक चूतर पर हाथ रखकर उसके एक चूतर को अच्छे से मसल देता है। ऐसा होते ही रीत के शरीर में एक करेंट लगता है और वो सिसकारियां भरते हुए बोली- “आहह... ये तू क्या कर रहा है रिंकू?"

रिंकू रीत के चूतरों को अच्छे से मसलता हुआ बोला- “मैं तुझे अपना गरीबपना दिखा रहा हूँ बस...”

रीत- “आह्ह... आहह... मुझे नहीं देखना कुछ, बस तू अपना हाथ हटा जल्दी से..."

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दर्शल रीत को भी बहुत मजा आ रहा था, पर जानबूझ कर शो नहीं कर रही थी। जैसे ही रीत रिंकू का हाथ हटाने के लिए अपना हाथ उसके हाथ पर रखती है। तभी रिंकू उसका हाथ पकड़कर अपने लण्ड पर रख लेता है। लण्ड के हाथों में आते ही रीत की बोलती बंद हो जाती है। लण्ड की गरमी से उसकी चूत अपना पानी निकालने लगती है।

रीत को अब कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। इससे पहले और कुछ होता, तभी सीढ़ियों से किसी के आने की आवाज आई। जिसे सुनते ही रीत एकदम होश में आई, उसने अपना हाथ रिंकू के लण्ड से हटा लिया। और रिंकू भी बेचारा तड़पता हुआ उसके रूम से निकलकर सीधा सोनू के रूम में चला गया।

रिंकू जब घर वापिस गया तो वो रीत को स्माइल करके गया। अब रीत का बुरा हाल हो रहा था। उसने अपना रूम अंदर से बंद किया और पूरी नंगी होकर अपनी चूत में दो उंगलियां डाल ली। फिर रीत रिंकू के लण्ड के बारे में सोचकर उंगलियां अंदर-बाहर करने लगी, और कुछ ही देर ही उसकी चूत ने अपना पानी निकाल दिया।

उसके बाद उन सबने डिनर किया और डिनर के बाद सब सोने के लिए अपने-अपने रूम में चले गये।

सुखजीत अपने पति को साथ लेते हुए, आज उस हादसे के बारे में सोचने लगी। उसे समझ में आ गया था की इस सरकारी काम में किसी बड़े बंदे का जब तक साथ नहीं मिलेगा, तब तक उनकी कोई नहीं सुनेगा। तभी उसे एम.एल.ए. रंधावा की याद आती है। सुखजीत सुबह होते ही उसके पास जाने का प्रोग्राम बनाती है। सुखजीत को पूरा यकीन था, की एम.एल.ए. उसकी हेल्प जरूर करेगा।

***** *****
 
कड़ी_64

डेली की तरह रीत मस्त पटोला बनकर स्कूल के लिए निकलती है। डेली की तरह वो ज्योति को लेने उसके घर पर पहुँच जाती है। उधर ज्योति भी तैयार खड़ी होती है। और तो और ऐसे ही वो उसके पीछे बैठकर चल पड़ती है। उधर हरी भी अपनी बुलेट पर पूरा तैयार होकर आ रहा होता है।

हरी जब रीत को देखता है तो बड़ी सी स्माइल पास करता है। उधर रीत भी उसको देखकर एक सेक्सी सी स्माइल देती है। वो हरी को पूरी तरह तड़पाती है, क्योंकी उसको ऐसे करने में बहुत मजा आता है। इससे हरी और चिढ़ जाता है। वो ये सब इसलिए कर रही होती है क्योंकी उसने ज्योति से बदला लेना होता है। रीत हरी को तो अपना मोहरा बना कर चलती है, क्योंकी उसने तो ज्योति से बदला लेना होता है।

अब क्लास में सब बैठे होते हैं, और अकाउंट्स का पीरियड चल रहा होता है। तभी ज्योति बीच में उठकर वाशरूम के लिए जाती है। तभी उसके जाते ही रीत उसके बैग में से उसका फोन निकलती है और फिर उसके और मलिक के मेसेज पढ़ने लगती है।

उसके मेसेज में लिखा होता है की ज्योति कल मलिक से मिलने वाली है और दोनों ने मूवी देखने का प्रोग्राम बनाया है। और वो सुबह वहीं मलिक से मिलेगी जहां पिछली बार नीचे पार्किंग में मिली थी। ये सब पढ़कर उसको बहुत गुस्सा आ रहा होता है। पर वो अपने गुस्से को शांत कर लेती है। और जब ज्योति आने वाली होती है तो उसका फोन वैसे ही उसके बैग में डाल देती है।

अब अकाउंट्स का पीरियड खतम हो जाता है और उधर अब अगला बिजनेस का पीरियड होता है जो की सबसे बोरिंग होता है। इस पीरियड में सभी लेक्चर को बंक करते हैं या तो एक दूसरे के दोस्त साथ उनको छेड़ते हैं।

अब ऐसे ही डेली की तरह हरी ज्योति को छेड़ता है और वैसे ही बैठा होता है। पर आज ज्योति आगे बैठी होती है। क्योंकी उसको टीचर ने आगे बिठाया होता है क्योंकी वो स्टडी में ध्यान नहीं दे रही होती है। तो अब पीछे रीत बैठी होती है और साथ में हरी होता है। फिर रीत हरी को कहती है की मैंने कुछ बात करनी है तो वो कहता है हाँ करो।

हरी- क्या बात है अकेले ही लगी हुई हो?

रीत- अब क्या करें, अकेले ही टाइम स्पेंड करना है।

हरी- अच्छा मेरे होते तू अकेली होगी क्या?

रीत- आप ज्योति को छोड़कर ऐसे किसी के साथ कुछ नहीं कर सकते।

हरी- अगर दूसरी लड़की तेरी जैसी सुंदर हो तो कुछ भी हो सकता है।

रीत ये सब सुनकर खुश हो जाती है और कहती है- “अच्छा जी। ये बात है?"

हरी- “हाँ जी यही बात है...” और फिर रीत के पास आ जाता है, और ऐसे ही वो उसकी चूचियां दबाने लगता है।

तभी बेल बज जाती है और लेक्चर खतम हो जाता है। खतम होते ही आधे से ज्यादा बच्चे बाहर चले जाते हैं

और ज्योति भी उठकर अपने हरी पास आ जाती है क्योंकी उसको भी अपनी चूचियां मसलवानी होती है।

अब ज्योति जैसे ही पास आकर बैठती है, तभी रीत उठ जाती है और हरी को एक कागज देती है जिसे खोलकर हरी पढ़ता है।

रीत- “अगर अपनी माशूका को धोखा देना ही है तो अभी पानी वाली टंकी के पास आकर मिल.."

हरी ये सब पढ़कर खुश ही जाता है और उधर रीत भी शर्माते हुए वहां से चली जाती है। अब हरी उठने लगता है

तब ज्योति बोलती है- “कहां जा रहे हो.."

हरी- “वो यार कँटीन में जा रहा हूँ वहा दोस्तों के बीच लड़ाई हो गई है.”

ज्योति ये सुनकर गुस्सा हो जाती है और कहती है- “फिर मेरा क्या होगा?”

हरी- “तू प्लीज़्ज... आज खुद ही कर ले.."

ज्योति को ये सुनकर और गुस्सा आता है और कहती है- “जा दफा हो जा.."

अब हरी वहां से आ जाता है और फिर भागकर पानी की टंकी के पीछे जाता है। वहां पर कोई भी नहीं आता है। क्योंकी वो काफी दूर थी जगह, और तो और वहां पर कोई टीचर भी नहीं आता था। और ऐसे ही हरी जब वहां पर पहुँचा तो रीत उसकी तरफ पीठ करके खड़ी हुई थी। अब ऐसे ही हरी उसको पीछे से झप्पी देता है, और फिर उसके बाद जोर से दबा देता है।
 
रीत- "आ गया है तू हरी। और इतना टाइट झप्पी क्यों दी है?"

हरी उसको पीछे से दबाता हुआ अपना लण्ड उसकी गाण्ड में दबाकर कहता है- “हाँ, मुझे तो आना ही था..”

रीत भी सब समझ जाती है और अपनी गाण्ड को पीछे का धक्का देते हुए अब मुड़ जाती है और कहती है- “ये सब ज्योति साथ कर, ये सब मेरे साथ नहीं चलेगा.."

हरी- यार तेरे आगे उसकी क्या पर्सनलिटी है?

रीत ये सुनकर और खुश हो जाती है, और फिर ऐसे ही मुश्कुरा देती है। अब हरी उसको जोर से झप्पी देता है और उसके होंठों में अपने होंठ डालकर चूसने लगता है। रीत भी उसका साथ देती है और खुद भी उसके होंठ चूसती है। पर बाद में अलग करती है और कहती है- “तू ने तो ज्योति को बहुत घुमाया है और खूब मजा भी दिलवाया है...”

हरी अब उसकी चूचियों को दबाते हुए कहता है- “तो इसमें कौन सी बड़ी बात है, तू भी चल लियो.."

रीत- हाँ मैं तो जाना चाहती हूँ।

हरी- अच्छा तो फिर तू कल मुझे सुबह 9:00 बजे पार्किंग लाट में मिल फिर हम चलेंगे।

रीत ये सुनकर खुश हो जाती है और उसे हाँ कर देती है। अब हरी भी उसकी चूचियों को दबा रहा होता है। और वो भी इसके मजे ले रही होती है। अब मजे तो वो ले रही होती है पर उसका मकसद तो कुछ और ही होता है। असल में तो वो ज्योति से बदला लेना चाहती है और हरी तो सिर्फ एक मोहरा होता है जिसे वो इश्तेमाल कर रही होती है। अब ऐसे ही ये सब सोचते हुये स्कूल की बेल बज जाती है तो वो एकदम से हरी से अलग होती है

और अपनी कमीज को सेट कर रही होती है।

फिर रीत वहां से जाने लगती है तो उसको पीछे से हरी पकड़ लेता है। और फिर से एक बार अपने लण्ड को उसकी गाण्ड में फँसा देता है और फिर एक बार चूचियों को मसलता है। फिर वो अब दोनों वहां से निकल लेते है और फिर क्लास में आते हैं।

वहां पर ज्योति बैठी होती है तो उसके सामने हरी और रीत दोनों कुछ भी शो नहीं करते हैं। और बस फिर घर आने का इंतेजार कर रहे होते हैं।

दूसरी तरफ सुखजीत हरपाल के साथ लिए डिसिशन से परेशान होती है। और फिर वो तैयार होकर क्लब के लिए निकल पड़ती है। क्योंकी वो घर पर रहेगी तो और परेशान हो जायगी। अब क्लब में आकर वो एक लेडी से अपनी प्राब्लम शेयर करती है तो वो कहती है की उसके साथ भी कुछ ऐसा हुआ था इसलिये उसने एम.एल.ए. साहब की हेल्प ली थी और तुम्हें भी लेनी चाहिए।

सुखजीत ये सुनकर सोचती है की इसमें एम.एल.ए. जी मदद का सकते हैं, और फिर बैग में से फोन निकालती है और फिर ऐसे ही फोन मिलाती है।

सुखजीत- हेलो रंधावा जी।

रंधावा- हाँ जी कौन?

सुखजीत- इतनी जल्दी भूल गये? उस दिन ही अपने कहा था की कोई हेल्प हुई तो याद करना।

रंधावा- हाँ हाँ पहचान लिया। मैं आया था आपके क्लब की उदघाठन में और सच में काफी मजा आया था।

सुखजीत मन में सोचती है- “हाँ हाँ वो तो आना ही था क्योंकी सारा ध्यान तो मेरी चूचियों पर था.."

सुखजीत बोली- “हाँ जी... वो तो मैंने ये बात करनी थी की कुछ प्राब्लम आ गई है.."

रंधावा- कहां क्लब में?

सुखजीत- “नहीं नहीं अपनी पर्सनल लाइफ में..” और फिर उसे पूरी बात बता देती है।

रंधावा- “हाँ हाँ कोई बात नहीं इस प्राब्लम का हलभी निकल आएगा, तुम टेन्शन मत करो। बस एक बार मिलकर बात बात कर लो..."

त समझ जाती है की रंधावा एक नंबर का ठरकी इंसान है।

* * * * * * * * * *
 
कड़ी_65

अगली सुबह हो जाती है, रीत आज बहुत खुश होती है। क्योंकी अब वो ज्योति से अपना इंतेकाम लेने के लिए तैयार खड़ी थी। उसने ऐसा जाल बनाया होता है, की जिसमें ज्योति रीत की पक्की सहेली भी बनी रहेगी और वो उससे बदला भी ले लेगी।

खुशी-खुशी रीत स्कूल जाने के लिए तैयार हो जाती है। रोज की तरह स्कूल की कसी हुई ड्रेस सलवार कमीज में अपनी चूचियां खड़ी करके, और पीछे से अपनी बड़ी-बड़ी गोल-गोल गाण्ड बाहर निकालकर तैयार हो जाती है।

इतने में रीत के पास ज्योति का फोन आ जाता है, की आज वो स्कूल में नहीं आ रही है। ज्योति के फोन से अब रीत को यकीन हो जाता है, की आज वो पक्का मलिक के साथ स्कूल बंक करने जा रही है। रीत ज्योति का फोन कट करने के बाद सीधा हरी को फोन करती है।

रीत- हेलो।

हरी- कैसी है मेरी पटोला, और फिर तैयारी है आज की?

रीत खुश होती हुई बोली- “हाँ जी तैयारी ही तैयारी है, बस एक बार मिलो तो सही..."

हरी- हाँ जी आज तो कसकर मिलता हूँ तुझे मैं।

रीत- जितना मर्जी कस लेना, पर पहले 9:30 बजे मिलो माल की पार्किंग में, मैं वहीं पर इंतेजार करूँगी।

हरी- हाए मुझे लगता है, की आज तो तू असली नजारा देने वाली है।

रीत- “तू एक बार आ तो सही, फिर नजारे ही नजारे हैं...” कहकर वो फोन कट कर देती है।

पर रीत को ही ये पता था, की आज वो हरी को कौन से नजारे देने वाली है। रीत नाश्ता करके अपनी अक्टिवा निकाल लेती है। रीत 8:00 बजे घर से निकल जाती है, पर रास्ते में ट्रैफिक होने की वजह से उसे एक घंटा माल तक पहुँचने में लगता है।

रीत पूरे 9:00 बजे माल में आ जाती है। फिर वो माल की पार्किंग में अपनी अक्टिवा एक साइड में लगाकर एक कार के पीछे खड़ी हो जाती है। पार्किंग बेसमेंट में होने के कारण वहां अंधेरा होता है, और वहां कोई होता भी नहीं है। 15 मिनट बाद मलिक अपनी कार लेकर वहां आता है। मलिक कार से बाहर निकालकर अपनी कार के बोनट पर बैठकर ज्योति का इंतेजार करने लगता है।

कुछ ही देर में ज्योति स्कूल आई, ड्रेस और मिनी स्कर्ट और टाइट शर्ट डालकर आ जाती है। रीत कार के पीछे छुपकर सब कुछ देख रही होती है। ज्योति आते ही मलिक को कसकर अपनी बाहों में भर लेती है। मलिक उसके होंठों को होंठों डालकर उसे कार के बोनट पर बिठा देता है। फिर वो अपना एक हाथ उसकी स्कर्ट में डालकर उसके चूतरों को मसलता हुआ उसके होंठों को चूसने लगता है।

रीत को ये देखकर बहुत गुस्सा आ रहा था, और वो हरी को मेसेज करती है की वो कहाँ रह गया है?

हरी का रिप्लाइ आता है- “जी बस एक मिनट में पहुँच गया...”

इतने में मलिक ज्योति की शर्ट के ऊपर वाले दो बटन खोल देता है, और एक हाथ शर्ट में डालकर ब्रा के ऊपर से ही उसकी चूचियों को मसलता है। इतने में ज्योति मलिक के होंठों में से अपने होंठ निकालकर बोली।

ज्योति- “जान, कार के अंदर कर ले ये सब, बाहर किसी ने देख लिया तो?"

रीत ये सुनकर अपने मन में बोली- "तुझे तो अब तारे दिखेंगे बहन की लौड़ी, साली कुत्ती यारमारी करती है। वो भी रीत के साथ। अब देख रीत तेरा क्या हश्र करती है?"

मलिक ज्योति की बात मान लेता है और दोनों कार में चले जाते हैं। कार में जाने के कारण अब रीत को वो दोनों नजर आने बंद हो जाते हैं। इतने में हरी आ जाता है बलेट पर। वो अपना बलेट साइड में लगाकर आगे आता है। तभी उसकी नजर कार पर पड़ती है। पर उसको ये पता नहीं होता की कार में ज्योति होती है। हरी को समझ में आ जाता है, की सुबह-सुबह कार में ठुकाई चल रही है।

ज्योति जैसे ही मलिक का लण्ड अपनी चूत में लेने के लिये ऊपर होती है, तभी उसकी शकल हरी को दिख जाती है, और ये देखते ही हरी का पारा एकदम ऊपर चढ़ जाता है। उसके सिर पर खून सवार हो जाता है। हरी बहुत ही गुस्से वाला लड़का होता है। स्कूल में उसकी लड़ाइयों के बड़े-बड़े कारनामे उसके नाम है। हरी गुस्से में आगे जाता है, और वो कार का दरवाजा खोलकर मलिक के लण्ड पर बैठी ज्योति की बाजू पकड़कर उसे बाहर खींच लेता है। ज्योति उस टाइम सिर्फ ब्रा और स्कर्ट में होती है, उसने नीचे पैंटी भी नहीं डाली हुई थी।

ज्योति हरी को अपनी आँखों के सामने देखकर हक्की-बक्की रह जाती है और वो काँपती हुई आवाज में बोली।

ज्योति- हाँ हाँ... हरी तू यहां क्या कर रहा है?

हरी एक जोरदार थप्पड़ ज्योति के मुँह पर रखता है, और ज्योति सीधी कार के शीशे पर जाकर गिरती है। हरी

का इतना गुस्सा देखकर मलिक की गाण्ड फट जाती है। और वो डरपोको की तरह कार में बैठा रहता है। रीत ये सब अपने चेहरे पर मुश्कान लाकर देख रही होती है।

ज्योति थोड़ा होश में आकर रोते हुए हरी से बोली- “हरी मुझे माफ कर दे, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई है..."

हरी गुस्से में लाल हो गया था और वो बोला- “साली गश्ती दूर हो जा मेरी नजरों से, वर्ना तुझे आज मैं जान से मार दूंगा...”

हरी मलिक की तरफ देखता है और बोला- “ओई माँ के लौड़े, ले जा यहाँ से अपनी इस गश्ती को, वर्ना यहीं पर तुझे इसके साथ जिंदा गाड़ दूंगा मैं..."

ज्योति झट से समझ जाती है, की अब उसके लिए यहाँ से निकलना ही ठीक रहेगा। वो मलिक की कार में बैठकर अपने कपड़े डालकर वहां से निकल जाती है।

इतने में रीत मोका देखकर पार्किंग वाले गेट की तरफ से अंदर आती है। जिससे ऐसा लगे की वो बाहर से अभी

अभी आई है, और उसने कुछ नहीं देखा। रीत आकर अंजान बनते हुए बोली- “लो जी मैं आ गई अब.."

हरी गुस्से में कुछ भी नहीं बोलता।

रीत- क्या हुआ हरी तू इतने गुस्से में क्यों है?

हरी रीत को सारी बात बता देता है, जो की रीत को पहले से ही पता थी।

रीत भी नाटक करते हुए बोलती है- “ये अच्छा नहीं किया ज्योति ने तेरे साथ.."

हरी रीत की बात से सहमत होता है।

रीत हरी का मूड ठीक करते हुए बोली- “हरी फिर उस प्रोग्राम का क्या होगा जो हमने बनाया है?"

हरी रीत के सेक्सी जिश्म को नीचे से ऊपर तक देखकर, रीत को कसकर अपनी बाहों में भरकर बोला- “प्रोग्राम

तो वो ही रहगा मेरी जान...”

रीत नीचे से अपने हाथ में हरी का लण्ड पकड़कर बोली- “कहीं ज्योति के चक्कर में मूड तो खराब तो नहीं?”

हरी रीत के होंठों में होंठ डालता है और उसके चूतरों को हाथ में मसलते हुए बोला- “उस साली गश्ती के लिए मैं अपना मूड खराब क्यों करूँ?"

रीत- हाए चल फिर चलते हैं, मूवी देखने के लिए।

हरी- मेरा दिल तो तेरी फिल्म देखने का कर रहा है।

रीत हरी का लण्ड पकड़कर मसल देती है और फिर उससे अलग होकर बोली- "मेरी फिल्म भी अंदर ही देख लियो मूवी हाल में..”

हरी ये सुनकर खुश हो जाता है, और फिर वो दोनों मूवी देखने चले जाते हैं। माल में हरी रीत को काफी अच्छे

से मसलता है।

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दूसरी तरफ, सुखजीत ने आज रंधावा को मिलना होता है। सुखजीत को पता था, की वो सुंदर पुंजबान औरतों का शौकीन होता है। सुखजीत आज आरेंज कलर का टाइट सूट डाल लेती है। पीछे बालों की पोनी कर लेती है। पोनी के साथ पीछे निकली बड़ी सी गाण्ड ने उसकी कमीज का पल्ला उठाया हआ था। और

था। और साइड में उसके मोटे-मोटे चूतड़ सलवार फाड़कर बाहर आ रहे थे। ऊपर उसके टाइट सूट में फँसी हुई चूचियां पूरी बाहर निकल रही थीं। सूट के गले में से उसकी दोनों चूचियों के बीच की लाइन दिख रही थी। सुखजीत अपने गालों पर हल्की सी लाली लगाकर कार में बैठकर रंधावा के पास जाने के लिए निकल जाती है।

सुखजीत रंधावा के आफिस में जाती है। रंधावा आफिस में रखे सोफे पर बैठा होता है। उसके सामने भी एक सोफा रखा हुआ था। रंधावा बैठा कुछ लिख रहा था। जैसे ही उसकी नजर आती सुखजीत पर पड़ती है। तो वो सुखजीत को देखता ही रह जाता है।

सुखजीत रंधावा को देखकर स्माइल करते हुए बोली- “सत श्री अकाल जी..”

रंधावा- सत श्री अकाल जी आप खड़े क्यों हो, प्लीज़्ज़... बैठिए ना।

सुखजीत आकर सामने वाले सोफे पर एक टांग दूसरी टांग के ऊपर रखकर बैठ जाती है। इससे सुखजीत के बड़े बड़े मोटे चूतड़ साफ-साफ दिखने लगते हैं।

रंधावा सुखजीत की चूचियों के बीच की लाइन और सुखजीत के मोटे चूतड़ों को देखकर बोला- “क्या हाल है बहनजी? बोलों क्या सेवा कर सकती है हम आपकी?

सुखजीत भी पूरी चालू थी, उसको पता था की रंधावा क्या चीज है? और उसे ये भी पता था की रंधावा की नजर कहां है? और अब सीधी उंगली से घी नहीं निकालने वाला। इसलिए स्माइल करते हुए बोली- “वो भाईजी मैंने आपको फोन पर बताया था, की मेरे पति के साथ धोखा हो गया है...”

रंधावा डबल मीनिंग में बोला- “कोई बात नहीं जी, जब आप जैसी संदर खूबसूरत पंजाबी मुतियार किसी के पास किसी काम से आए, तो भला वो बंदा आपका काम ना करे ये तो कभी हो ही नहीं सकता..."

सुखजीत समझ जाती है की और शर्माकर नजरें नीचे कर लेती है।

रंधावा फोन निकालकर एक फोन मिलाता है और किसी से बात करता है। बात करते हुए उसकी नजरें सुखजीत

की बड़ी-बड़ी चूचियों पर थी। फिर रंधावा फोन कट करके बोला- "बहनजी आपका काम हो जाएगा...”

सुखजीत खुश होकर बोली- “बहुत-बहुत धनवाद भाईजी आपका...”

रंधावा मूछों को ताव देते हुए बोला- “बहनजी, अब कुछ मिलेगा इस दास को?"

सुखजीत समझ जाती है, पर अब उसके पास कोई और चारा भी नहीं था। उसने अपने पति की नौकरी भी बचानी थी। सुखजीत ने कहा- “बोलो क्या चाहिये भाईजी?"

रंधावा- बहनजी हम तो समाज सेवक है, हमको सिर्फ सेवा का मोका चाहिये बस।

सुखजीत- मैं कुछ समझ नहीं भाईजी।

इतने में रंधावा सुखजीत को खींचकर अपनी गोद में बिठा लेता है, और वो सुखजीत के चूतड़ों को मसलते हुए बोला- “सारा कुछ समझा दूंगा मैं बहनजी...”

सुखजीत रंधावा की गोद में मचलते हुए बोली- “आहह... भाईजी आप ये क्या कर रहे हो, छोड़ो मुझे प्लीज़्ज़... कोई भी आ सकता है...”

रंधावा- “कोई नहीं आता बहनजी, मैं तो आपकी सेवा उसी दिन कर देता। जिस दिन आपने मुझे उदघाटन में बुलाया था...”

सुखजीत को अपने चूतरों पर रंधावा का खड़ा लण्ड महसूस होता है और फिर सुखजीत बोलती है- “आहह.. भाईजी मुझे भी उसी टाइम पता चल गया था, की आप जरूर कुछ करने की फिरत में हो मेरे साथ..."

रंधावा सुखजीत की मोटी-मोटी चूचियों को कमीज के ऊपर से ही मसलते हुए बोला- “करने को तो मैं बहुत कुछ

सोच रहा था..."

सुखजीत पहले अपना काम करवाना चाहती है, और बाद में सबका काम करवाने वाली बंदी थी। इसलिए वो रंधावा की बात पर जोर डालती हुई बोली- "भाईजी, आप पहले मेरा काम करो बाद ये सब करना..."

रंधावा सुखजीत के होंठों पर किस करके बोला- “काम तो हो गया समझा बस तू तैयार रहना बहनजी। तेरी सेवा

तो मैं पूरे जोश से करूँगा..”

सुखजीत अपने चूतर हिलाकर रंधावा के लण्ड को मसलकर उसके छाती से अपनी चूचियां लगाकर बोली- आहह.. आss हाए भाईजी, अगर आप उनकी प्रमोशन करा दो, तो ये जट्टी पूरी एक रात के लिए आपकी सेवा लेने को तैयार है..."

ये सुनकर रंधावा की आँखें चमक जाती हैं, और फिर रंधावा सुखजीत के जिश्म पर हाथ फेरते हुए एक किस करके बोला- “अगर एक पूरी रात की बात है तो कल ही हो जाएगा प्रमोशन भी.”

सुखजीत ये सुनकर खुश हो जाती है और एक किस रंधावा को करके बोली- “ठीक है भाईजी, फिर मुझे इंतेजार रहेगा उनकी प्रमोशन का..” कहकर सुखजीत उठकर जाने लगती है।

तभी रंधावा जाते-जाते सुखजीत के चूतरों पर थप्पड़ मारता है।

सुखजीत नखरे से उसे देखती है और कहती है- “आहह... आss भाईजी आप भी ना बस..” ये सुनकर रंधावा अपनी मूछों को ताव देकर मुश्कुराने लगता है, और सुखजीत वहां से अपने घर चली जाती है।

* * * * * * * * * *
 
कड़ी_66

सुखजीत घर चली जाती है, रीत भी अब तक घर आ चुकी थी। आज दोनों माँ बेटी का दिन बहुत ही गरमी से भरा हुआ गया था। रीत को मूवी में हरी ने बहुत रगड़ा था, और सुखजीत को एम.एल.ए. ने बहुत रगड़ा था।

सुखजीत अपने रूम में जाती है, जहाँ हरपाल पूरी टेन्शन में लंबा लेटा हुआ था। सुखजीत हरपाल को एक झूठी कहानी बताती है, की वो एक क्लब की औरत की सिफारिश से इस मामले को ठीक करवा रही है। पर असल में सुखजीत अपनी जवानी का सौदा रंधावा के साथ करके ये सब ठीक कर रही थी।

हरपाल ये सुनकर थोड़ा शांत हो जाता है।

रंधावा की चूसा चुसाई के बाद सुखजीत आग से भरी हुई थी। अब उसे लण्ड की प्यास सबसे ज्यादा लग रही

थी, इसलिए सुखजीत हरपाल को थोड़ा शांत देखकर, उससे अपनी जवानी आग बुझाने की सोचती है। सुखजीत हरपाल के चूतड़ों पर अपने चूतड़ रखकर बैठ जाती है, और हरपाल के गले में अपनी बाहें डालकर वो अपने होंठ उसके होंठ से जोड़ दी और उसके होंठों को चूसने लगी।

हरपाल टेन्शन में होता है, इसलिए वो एक बार तो कोई जवाब नहीं देता। पर जब वो सुखजीत की गर्मी देखता है, तो अगले ही पल उसका हाथ सुखजीत की कमर पर चला जाता है, और अपना दूसरा हाथ सुखजीत के चूतड़ों पर फेरते हुए वो सुखजीत के होंठों को चूसने लगता है।

सुखजीत को पता चल गया, की अब उसका सरदार एकदम तैयार हो गया है। इसलिए सुखजीत अपनी कमीज उतार देती है, और वो अपनी सलवार का नाड़ा खींचकर सलवार को भी उतार देती है। अब सुखजीत बेड पर लंबी लेट जाती है, सुखजीत को इस हालत में देखकर हरपाल भी अपने कपड़े उतार देता है, सुखजीत के ऊपर चढ़ जाता है, और सुखजीत को चूमने लगता है।

सुखजीत बेगाने हाथों में इतनी ज्यादा चल चुकी थी की अब उसे अपने पति के नीचे लेटकर जरा सा भी मजा नहीं आ रहा था। पर इस टाइम उसकी मजबूरी थी, क्योंकी इस टाइम वो बहुत ज्यादा गरम हो चुकी थी। और लगी हुई आग बुझाने के लिए पानी की एक बूंद की बहुत ज्यादा जरूरत होती है।

हरपाल सुखजीत को पूरा अच्छे से किस करता है, और सुखजीत हरपाल को अपनी बाहों और टांगों से उससे एकदम लिपट जाती है। सुखजीत हरपाल के खड़े लण्ड के ऊपर अपनी चूत रखकर उसे दबा देती है।

हरपाल अपनी वाइफ की इतनी ज्यादा गरमी जो बस से बाहर हो रही थी, देखकर बोला- "हाए भागवान कमरे का दरवाजा तो बंद कर ले...”

सुखजीत मदहोशी में बोली- “कोई नहीं आता, आप तो काम करो। रीत अपने रूम में है, और सोनू बाहर है..."

हरपाल ये सुनकर अपना लण्ड पाजामे से बाहर निकलता है, और सुखजीत अपनी पैंट और ब्रा उतारकर साइड में फेंक देती है। फिर वो आपनी टाँगें खोल देती है। हरपाल उसकी दोनों टांगों के बीच में आ जाता है।

सुखजीत की चूत में से पानी निकल रहा था। हरपाल अपना लण्ड उसकी चूत पर लगता है, और एक धक्का मारता है। सुखजीत की चूत पहले से ही पानी से भीगी होती है, इसलिए उसका लण्ड एकदम फिसलता हुआ अंदर उतर जाता है।

सुखजीत को अब लंबे-लंबे लण्ड की आदत पड़ चुकी थी, जो सीधा उसकी बच्चेदानी तक जाकर लगते थे| पर हरपाल का वहां तक कभी नहीं जाता था। पर इस टाइम लण्ड की प्यासी सुखजीत इस छोटे लण्ड से भी काम चलाने को तैयार थी। वो अपने पति हरपाल को अपनी बाहों में भरकर नीचे से अपनी गाण्ड उठाकर जोर-जोर से लण्ड अपनी चूत में अंदर-बाहर करवा रही थी।

सुखजीत अपना एक हाथ अपनी चूत पर ले गई और अपने दाने को अपनी उंगलियों से मसलने लगी। क्योंकी सुखजीत को पता था, की हरपाल बहुत जल्दी ही फ्री हो जाएगा। इसलिए ऐसा करने से सुखजीत का पानी निकल गया, और 10 मिनट बाद हरपाल के लण्ड ने अपना सारा पानी सुखजीत की चूत में निकाल दिया। हरपाल जोर-जोर से सांसें लेता हुआ, बेड पर लेट गया। सुखजीत पहले से ही अपना काम कर चुकी थी, इसलिए

अब उसकी गरमी काफी २

दूसरी तरफ सोनू रिंकू के साथ कालेज गया था। आज बहुत दिनों बाद कालेज में उन्हें दीप नजर आता है।

सोनू- "और भाई दीप कहाँ रहता है आजकल? यार ना तू कालेज में आता है, और ना ही हमारा फोन पिक करता है?"

दीप- “ओहह... यार अगले हफ्ते मेरी बहन की शादी है। बस उसकी ही तैयारी में लगे हुए हैं सब..."

रिंकू- “अच्छा तो हमें बताया तक नहीं कुछ भी। हम क्या खराब लगते है तेरे साथ तैयारी करवाते हुए?”

दीप- “हाहाहाहा... ओहह... नहीं यार ऐसी कोई बात नहीं है। अच्छा चलो अब घर चलते हैं, पेग शेग लगाते हैं..."

रिंकू और सोनू दोनों दीप के साथ उसके घर की ओर निकल जाते हैं। दीप के घर उसके मम्मी डैडी और उसका एक बड़ा भाई और भाभी और एक बहन होती हैं। जिसकी शादी अगले हफ्ते होने वाली है। सोन और रिंकू दोनों दीप के घर जाते हैं, घर में सारे शादी के तैयारियों में लगे हुए थे। और वो दोनों दीप के मम्मी डैडी को मिलते हैं, और बहन की शादी की बधाईयां देते हैं।

दीप पीछे से बोला- "रुको यार, अभी पेग शेग लगाते हैं ऊपर छत पर बैठकर..." फिर वो दोनों बाहर आँगन में बैठ जाते हैं।

इतने में दीप की मम्मी ऊँची आवाज में बोली- “आई कंवल्ल..."

एक दबी हुई आवाज ऊपर वाले रूम से आती है- “आई मम्मीजी.."
 
तभी सोनू की नजर एक शोणी सुंदर मुतियार पर पड़ती है, जो बिना चुन्नी के सीढ़ियां उतर रही होती है। जिससे उसकी मोटी-मोटी चूचियां ऊपर-नीचे बहुत ही मस्त तरीके से हिल रही थीं, और उसके दोनों चूतर आपस में टकरा रहे थे।

वो सुंदर मुतियार और कोई नहीं दीप की भाभी होती है। जिसका नाम कंवल होता है। दीप का भाई देल्ही में जाब करता है। और वो एक हफ्ते में एक बार ही घर आता है। वैसे कंवल बहुत ही चालू औरत होती है। उसके मोहाले में उसकी पूरी चर्चा होती है। पर अभी तक वो अपने पति के सिवा और किसी के नीचे नहीं लेटी थी। कंवल सीढ़ियों से नीचे आती है, और अपनी तिरछी नजरों से सोनू को अपनी तरफ देखते हुए देखती है और वो आगे निकल जाती है। सोनू भी उसको जाते हुए उसके चूतरों को देखकर मस्त हो रहा था।

इतने में रिंकू बोलता है- “हाई ओई रब्बा... इतना खतरनाक माल दीप के घर हो सकता है, ऐसा तो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था..."

सोनू ये सुनते ही अपनी एक टांग दूसरी टांग पर रख लेता है, क्योंकी उसका लण्ड अब खड़ा हो चुका था। सोनू ने कहा- “सही कहा भाई, पर ये माल है कौन?"

रिंकू- दीप की भाभी है ये, इस साली की चारों तरफ बहुत चर्चा है.."

सोनू- “चर्चा तो होनी ही है, भाई चीज भी देख ना कितनी मस्त है। साली की चूचियां देखी तूने कैसे जोर-जोर से उछाल-उछालकर चलती है..."

इतने में दीप आ जाता है, और फिर वो तीनों छत पर जाकर शराब पीने लगते हैं। ऊपर छत पर एक तार बँधी होती है, जिस पर कपड़े सूखे हुए होते हैं। उन कपड़ों में 3-4 पैंटी टंगी होती है। जिसमें से दो बहुत सेक्सी होती हैं, और एक बहुत पुरानी होती है। सोनू देखते ही पहचान जाता है, की दोनों सेक्सी वाली पैंटी दीप की बहन और भाभी की हैं, और पुरानी वाली पैंटी उसकी माँ की होगी।

इतने में दीप बोला- “ओये कहां खो गया?"

सोनू को होश आता है, और वो अपना मुँह दूसरी तरफ कर लेता है। फिर तीनों दारू पीने लगते हैं, एक बोतल खतम हो जाती है, और वो तीनों सेट हो जाते हैं।

रिंकू को दारू पीकर रीत की याद आ जाती है, और वो फोन निकालकर उसको व्हाटसप करता है। रीत का रिप्लाइ आ जाता है, और फिर वो दोनों चाटिंग करने लगते हैं।

दीप रिंकू को चैटिंग करते हुए देखता है तो बोलता है- “भाई किससे साथ लगा हुआ है, जो आज फोन में घुसा हुआ है तू...”

सोनू ये सुनकर बोला- “हाँ भाई एक तितली फँसाई हुई है मैंने..."

अब रिंकू क्या बोले, जिस तितली की वो बात कर रहा है। वो और कोई नहीं सोनू की बहन है।

इतने में नीचे से कंवल की आवाज आती है- “ओये दीप ऊपर पड़े कपड़े सूख गये होंगे जरा नीचे पकड़ा मुझे..."

दीप- “ओ भाभी मुझे नहीं पता तू आकर अपने आप ले जा.."

कंवल नखरे के साथ बोली- “कोई काम करके राजी नहीं है ये लड़का...” कहकर कंवल ऊपर आ जाती है।

एक बार फिर से कंवल की मस्त चूचियों और बाहर निकले चूतर सोन की आँखों के आगे आ जाते हैं। कंवल फिर से तिरछी नजरों से सोन को देखती है। पर सोन तो पहले से ही दीप और रिंकू से आँखें बचाकर वो उसको

घूर होता है। कंवल तार से एक-एक कपड़ा उतार रही होती है। फिर जैसे ही वो अपनी पैंटी उतारने लगती है, तभी एकदम से सोनू बोला।

सोनू- “हाए यार सामान बहुत टाइट हो गया है..”

ये सुनकर एक बार कंवल उसकी तरफ देखती है और अगले ही पल मुँह दूसरी तरफ करके हँसने लगती है। सोनू को भी पता चल जाता है की उसकी बात अब बन सकती है।

दीप दारू से पूरा टुन्न हुआ पूछता है- “ओये तू क्या बोले जा रहा है?"

सोनू बात को बदलते हुए बोला- “ओह... यार दारू का नशा अब चढ़ रहा है."

ये सुनकर तीनों हँसने लगते है, और कंवल भी जाते हुए एक बार हँसकर सोनू को देखती है। और अपने चूतर मटकाती हुई नीचे चली जाती है।

दिन निकल जाता है, और अगली सुबह हो जाती है। रीत के +2 के पेपर अब शुरू हो जाते हैं। और अब वो घर

बैठकर तैयारी करने लगती है। अब उसको भी होश आता है, की वो बदला लेने के चक्कर में अपनी स्टडी को पीछे छोड़ चुकी थी। इसलिए अब तैयारियों में जुट जाती है।

सुखजीत भी आज घर ही होती है, दोपहर का टाइम होता है।

हरपाल घर आता है, और आते ही खुशी से सुखजीत को अपनी बाहों में भर लेता है और बोला- "भागवान, मुझे फिर से जाब भी मिल गई, और तो और मेरी प्रमोशन भी हो गई है.."

सुखजीत ये सुनकर खुश हो जाती है, और सोचती है की उसकी मेहनत रंग ले आई है, बोली- “चलो जी ये बहुत अच्छा हुआ, ऊपर वाले ने मेहर करी..” पर ये मेहर रब्ब ने नहीं सुखजीत की जवानी ने करी थी।

रोटी खाने के बाद हरपाल फिर से आफिस चला जाता है।

फिर सुखजीत के फोन पर रंधावा का फोन आता है।

सुखजीत- हेलो।

रंधावा- क्या हाल है सोहनियो?

सुखजीत- हाल तो बहुत खुशहाल है भाईजी।

रंधावा- खुशहाल तो होना ही है, तेरे पति की प्रमोशन जो करवा दी है।

सुखजीत- हाँ जी भाईजी, बहुत-बहुत धनवाद आपका जी।

रंधावा- तेरा धन्यवाद फोन पर नहीं लेना मैंने।

सुखजीत ठरकी आवाज में बोली- “अच्छा तो और कैसे लेना है भाईजी?"

रंधावा- तेरी रात अपने नाम करके लेना है। रात 9:00 बजे तेरे घर के बाहर मेरा ड्राइवर कार लेकर खड़ा होगा। उसके साथ आ जइओ।

सुखजीत- अगर मैं नहीं आई फिर?

रंधावा- अगर नहीं आई तो जैसे प्रमोशन हुआ है। वैसे ही डिमोशन भी हो जाएगा।

सुखजीत- “ओहो मैं तो मजाक कर रही थी। जट्टी ने जुबान दी थी, भाईजी मैं जरूर आऊँगी आज रात को.."

रंधावा- "ठीक है फिर गश्ती सी बनकर आईओ.."

सुखजीत- ठीक है भाईजी।

फिर सुखजीत फोन कट कर देती है। अब बस सुखजीत ये सोचती है, की अब वो घर पर ऐसा क्या कहे की जिससे वो पूरी रात के लिए घर से बाहर रह सके, या वो बिना किसी को बताए चोरी से घर से बाहर निकल

जाए।

*****

*****

* * * * * * * * * *
 
कड़ी 67

आखीरकार, दिन निकल जाता है और धीरे-धीरे रात होने लगती है। सुखजीत बहुत ही घबराई होती है। और तो और वो घबराहट में बस टाइम की तरफ ही ध्यान दे रही होती है। क्योंकी उसके दिल की धड़कन बहुत ही तेज चल रही होती है। जिसको वो खुद भी महसूस कर सकती है।

असल में वो हरपाल का इंतेजार कर रही होती है और उसने रंधावा से भी मिलने जाना होता है। पर वो हरपाल को ये भी कहकर नहीं निकल सकती है की उसे क्लब के किसी कम से जाना है। और अभी हरपाल भी नहीं आया हुआ होता है।

सुखजीत अब फैसला करती है की वो किसी को बिना बताए ही चली जाएगी और रंधावा को कहती है की 11:00 बजे तक रात को भेज दियो अपने किसी बंदे को, क्योंकी तब तक सारे सो जाएंगे। उधर रंधावा भी उसकी बात में हाँ मिला देता है।

अब सुखजीत रीत और सोनू को आवाज लगाती है और कहती है- “अपना खाना खा लो.."

दोनों सुखजीत की आवाज सुनकर आ जाते है और दोनों खाना खाकर अपने बिस्तर पर यानी अपने कमरे में चले जाते हैं। अभी सिर्फ 9:30 बजे होते है और अब बस सुखजीत हरपाल का इंतेजार कर रही होती है। क्योंकी उसके आने और उसके सोने के बाद ही सुखजीत बाहर जा सकती है।

अब ऐसे ही इंतेजार करते हुए 10:00 बज जाते है, और तभी घर की बेल बजती है और सुखजीत बाहर जाकर देखती है तो वहां हरपाल होता है। हरपाल आज परा नशे में होता है क्योंकी वो बाहर अपने दोस्तों के साथ अपनी प्रमोशन की खुशी मनाकर आ रहा होता है। उससे चला भी नहीं जाता है और उधर ये सब सुखजीत देखकर अंदर ही अंदर खुश हो रही होती है। क्योंकी अब हरपाल नशे की हालत में धुत्त होकर सो रहा होगा और वो आसानी से बाहर चली जाएगी।

अब वो उसे अंदर लाती है और कमरे में लेटा देती है और तभी खाना डालकर उसके लिए लाती है पर जैसे ही सुखजीत कमरे में आती है तो देखती है की हरपाल तो खर्राटे मारकर सो रहा होता है। ये देखकर वो बहुत खुश हो जाती है और फिर उसके बाद ऐसे ही वो अपने कपड़े लेकर कमरे की लाइट आफ करके बाथरूम में चली जाती है।

अब सुखजीत बड़े प्यार से तैयार हो रही होती है। उसने अपने गोरे चिट्टे बदन पर पिंक कलर की ब्रा और पैंटी डाली होती है और ऊपर से पिंक कलर का सूट डाला होता है। अब वो अंदर से ही पिंक लिपस्टिक, खुल्ले बाल और हाइ हील पहनकर बाहर आती है। उसकी कमीज से खिल्ली सलवार और नीचे हील डालने से उसके बाम्ब ऊपर की ओर उठ से जाते हैं। ये देखकर वो और पागल हो जाती है। और फिर बड़े अच्छे से तैयार होकर बाहर आती है, फिर सबको देखती है की बाहर का माहौल कैसा है।

ये सब वो देख ही रही होती है की तभी उसके पास फोन वाइब्रेट करने लगता है। वो किसी अंजान नम्बर को देखकर फोन उठती है।

सुखजीत- हेलो।

वो- हाँ जी मेडम हम आपके घर के बाहर खड़े हैं।

सुखजीत ये सुनकर समझ जाती है की ये तो उस रंधावा का भेजा हुआ बंदा है। जो मुझे लेने आया है- “हाँ मैं बस आई...” कहकर फोन कट कर देती है।

वो अब सबको एक बार फिर से देखती है की सब सो रहे हैं ना। और फिर अपनी एक चादर को अपने ऊपर लेकर धीरे-धीरे बाहर की ओर चली आती है।

बाहर ब्लैक कलर की बड़ी सी कार इंनोवा खड़ी होती है। तो वो उसकी पीछे वाली सीट पर जाकर बैठ जाती है

और अपने ऊपर ली चादर को उतारकर अपने बाल सवारने लगती है। रंधावा का भेजा हुआ भैया उसे घूर-चूर कर देख रहा होता है।

सुखजीत- “ऐसे क्या देख रहा है, अपनी कार चला सीधा होकर?"

वो बंदा अपने मन में सोचता है की आज तो रंधावा सर की मौज ही मौज है। फिर वो धीरे-धीरे चल पड़ता है, और थोड़ी ही देर बाद कार को खेतों के बीच बने फार्महाउस के बाहर लगा लेता है। अब सुखजीत भी उतरकर फार्महाउस देखती है और जब अंदर जाती है तो देखती है की रंधावा किसी बंदे के साथ बैठकर शराब पी रहा होता है।

सुखजीत मन में सोचती है- “कहीं ये भी तो नहीं?"

अब वो वहीं खड़ी होती है की तभी रंधावा की नजर सुखजीत पर पड़ती है तो वो उसे पटियाला शाही सलवार सूट में देखकर देखता ही रह जाता है। सुखजीत को देखकर रंधावा को और नशा चढ़ जाता है।

रंधावा- “सतबीर इतनी देरी से पी रहा हूँ पर नशा तो अब चढ़ा है..”

उधर सतबीर भी अब उसको देखता है और कहता है- “हाँ बात तो सही कही."

दर्शल सतबीर उसी कुर्सी पर होता है जिस पर अब हरपाल आया हुआ होता है। और फिर अब उसको देखकर रंधावा को कहता है।

सतबीर- "मेरी तो नजर इस पर तब से थी जब ये महकमे में आई थी...”

सुखजीत भी उसको देखती है और सोचती है की उसको देखकर की अब तो ये भी मेरे पीछे पड़ेगा। अब इतना सब होने के बाद अब सुखजीत धीरे-धीरे आगे बढ़ती है।

तभी रंधावा कहता है- “हाई ओईए मर जावां..."

तभी उसकी बाजू को रंधावा पकड़ लेता है और वो उसकी गोद पर आकर गिर जाती है, और उठने की कोशिश करती है की तभी उसकी चुन्नी को रंधावा हटा देता है जिससे उसकी चूचियां नजर आती हैं।

उधर सतबीर उसकी चूचियों को देखकर पागल हो रहा होता है, और तभी सुखजीत उसको छिपा लेती है।

सतबीर ये देखकर अपना लण्ड मसलते हुए बोला- “हाए अब तू मुझसे क्यों शर्मा रही है? एहसान तो मैंने भी तेरे ऊपर किया है, तेरे बंदे को फिर से नौकरी पर रखकर। और तू सिर्फ एहसान रंधावा का उतार रही है...”

रंधावा ये सुनकर हंसता है और सुखजीत को धक्का दे देता है। जिससे सुखजीत उछालकर सतबीर की गोद में जाकर गिरती है। उसकी चूचियां सीधे सतबीर के मुँह पर जाकर लगती हैं।

सुखजीत की मोटी गोरी नंगी चूचियां देखकर सतबीर ने जो पेग अपने हाथ में पकड़ा हुआ था। वो पेग को सुखजीत की चूचियां के ऊपर गिरा देता है। शराब से सुखजीत की चूचियां पूरी तरह से भीग जाती हैं। फिर सतबीर चूचियों के बीच की लाइन में अपनी जीभ रखकर वहां से शराब सो चाटने लगता है।

सुखजीत इससे पागल होने लगती है और बोलती है- “ओहो... ये क्या कर रहे हो आप?"

सतबीर वैसे ही सुखजीत की चूचियों को चाटता हुआ बोला- "मैं वो ही कर रहा हूँ, जो रंधावा ने करना था...”

सुखजीत समझ जाती है, की अब सतबीर उसे चोदने वाला है। आखीरकार, वो अपनी शर्म को तोड़कर बेशर्म होकर बोली- “भाईजी बस किसी को पता ना चल जाए."

रंधावा एक पेग पीकर बोला- “तू फिकर ना कर सतबीर अपना ही आदमी है। ये किसी को कुछ नहीं बताएगा।

और तो और इसी ने तेरा सारा काम किया है..."

सुखजीत ये सुनकर अपने अंदर की आग बाहर निकाल देती है, और सतबीर के सिर को पकड़कर वो अपनी चूचियों में दबा देती है। सतबीर भी सुखजीत की ये हरकत देखकर गरम हो जाता है। सतबीर भी अब जोर-जोर से अपना मुँह सुखजीत की चूचियों में दबाता है। सुखजीत भी अपने आँखें बंद करके पूरे मजे ले रही थी।

रंधावा फिर से बोलता है- “सतबीर जा ले जा इस रंडी को रूम में और जो करना है वो कर ले इसके साथ...”

सतबीर जोर से सुखजीत की चूचियां मसलता है और बोला- "इसकी चूत मारने की तो मैं उस दिन से सोच रहा था, जिस दिन मैंने इसे पहली बार आफिस में गाण्ड मटकाते देखा था। आज बहनचोद मेरा ये सपना पूरा हो गया है..”

सतबीर अपने होंठ सुखजीत के होंठों में डालकर उसको ऐसे ही अपनी गोद में उठाकर उसे सीधा रूम में ले जाता है। रूम में आते ही सतबीर सुखजीत को नीचे उतारता है, और उसके होंठों को चूसते हुए उसके चूतरों को जोर

जोर से मसलता है।

सुखजीत भी अब पूरी गरम हो जाती है, और वो भी सतबीर का पूरा साथ देते हुए अपने हाथ से उसका लण्ड पकड़ लेती है। सतबीर एक बार सुखजीत के ऊपर वाले होंठ को जमकर चूसता है। और फिर उसका सूट उतार देता है। अंदर सुखजीत ने पिंक कलर की सेक्सी ब्रा डाली हुई थी, जिसे देखते ही सतबीर के मुँह से निकाला।

सतबीर- “हाए ओये रब्बा... मुझे नहीं पता था, की हरपाल की वाइफ अंदर से गुलाबी है...”

सतबीर की ये बात सुनकर वो शर्मा जाती है। फिर सतबीर धीरे-धीरे सुखजीत के सारे कपड़े निकालकर उसे नंगी कर देता है। सतबीर के सामने सुखजीत पूरी नंगी होकर शर्माने लगती है। सतबीर का लण्ड अब पूरा खड़ा हो गया था, क्योंकी उसके सामने सुखजीत जैसी जवान जट्टी बिना कपड़ों के लेटी हुई थी। फिर सतबीर भी अपने कपड़े निकालकर नंगा हो गया।

सतबीर का लंबा काला लण्ड देखकर सुखजीत के मुँह पर स्माइल आ गई। फिर सतबीर अपना लण्ड सुखजीत के होंठों पर लगा देता है। सुखजीत सतबीर के लण्ड की खुश्बू से मदहोश होने लगती है। फिर वो सतबीर का लण्ड धीरे-धीरे अपने मुँह में लेने लगती है। सतबीर भी एक बार अपना पूरा लण्ड सुखजीत के मुँह में डाल देता है। फिर सुखजीत उसका लण्ड अपने मुँह से बाहर निकलती है, और अपनी जीभ बाहर निकालकर वो सतबीर के

लण्ड को अपनी जीभ से चाटने लगती है।

सतबीर ने आज से पहले सुखजीत जैसी कमाल की खूबसूरत और इतनी गरम औरत नहीं देखी थी, और ना ही कभी इतनी गरम औरत को अपने नीचे लेटाया था। इसलिए वो सुखजीत की गरमी को देखकर पागल हो रहा था। सतबीर से अब कंट्रोल करना मुश्किल हो रहा था। सतबीर ने सुखजीत का सिर पकड़ा और वो जोर-जोर से सुखजीत का मुँह चोदने लगा।

सुखजीत भी सतबीर का लण्ड जोर-जोर से लालिपोप की तरह चूस रही थी। पर सतबीर सुखजीत की इतनी गर्मी को झेल नहीं पा रहा था। इसलिए उसने सुखजीत के मुँह से अपना लण्ड बाहर निकाला, और उसने सुखजीत को बेड पर सीधा लेटा दिया। उसने सुखजीत की दोनों टाँगें ऊपर उठाकर खोल दी, और अपने लण्ड को सुखजीत की रस से भारी चूत पर जोर-जोर से रगड़ने लगा।

सुखजीत ऐसा करने से मचलने लगी और बोली- “आहह... आऽs भाईजी अब डाल भी दो अंदर...”

सतबीर लण्ड अंदर नहीं डालता, बल्कि वो और जोर से सुखजीत की रस से भीगी हुई चूत पर लण्ड रगड़कर बोला- “साली तूने बहुत आग लगा रखी थी मेरे लण्ड को इतने दिनों से..."

सुखजीत- “फिर भाईजी, आज आपके नीचे मैं लेट भी तो गई हूँ ना... अब डाल दो अपना लण्ड मेरी चूत में..."

सतबीर का ये सुनते ही दिमाग खराब हो जाता है, और वो एक जोर से धक्का मारकर अपना पूरा लण्ड सुखजीत की चूत में डाल देता है। सतबीर का लण्ड सुखजीत की चूत की चीरता हुआ पूरा अंदर चला जाता है। और सुखजीत के मुँह से आह्ह... आहह... की आवाज निकलती है। फिर वो जोर-जोर से धक्के मारने लगता है, और सुखजीत भी नीचे से अपनी गाण्ड उठा-उठाकर सतबीर के हर धक्के का पूरा जमकर जवाब देती है।

पर सतबीर का लण्ड भी सुखजीत जैसी गरम औरत की गरमी नहीं झेल पाया, और करीब 10 मिनट की चुदाई के अंदर ही सतबीर के लण्ड ने अपना पानी छोड़ दिया।

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