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Fantasy मोहिनी

आधी रात बीत चुकी थी।

अचानक पहरेदार अन्दर आ गया। हम उस वक्त सोने की तैयारी कर रहे थे। उसे देखकर मैंने चौंककर गोरख को टहोका दिया।

“शायद तुम्हें बुलाने आया है।”

गोरख ने उससे पूछा–“क्या बात है ?”

“आप दोनों को रानी माता ने बुलाया है।”

“इस समय ?”

“जी हाँ, इसी समय और अभी।”

“यह भी कोई समय है मिलने का।” मैं बड़बड़ाकर उठ खड़ा हुआ।

गोरख भी फुर्ती के साथ तुरन्त ही तैयार हो गया और हम पहरेदार के साथ चल पड़े। हमारे आगे-आगे वह चल रहा था। मुझे हैरत इस बात की हुई थी कि वह हमें खेमों की तरफ ले जाने के बजाय पहाड़ी गुफाओं की तरफ ले जा रहा था। यहाँ तक कि हम एक ऐसी शमशान भूमि पर पहुँच गये जहाँ पर इँसानी शवों के पिंजर पड़े थे।

मोहिनी का ऐसे स्थान में जो अत्यंत भयंकर थे, दिलेरी के साथ घूमना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। आश्चर्य की बात तो यह थी कि उसने हमें यहाँ बुलाया क्यों था ?

हम जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे, इन पिंजरों की सँख्या भी बढ़ती जा रही थी। पिंजर ही पिंजर!

मुझे बड़ा खौफ महसूस हो रहा था। यह भयानक स्थान मैंने पहले कभी न देखा था। यूँ मालूम होता था जैसे पिंजर अभी खड़खड़ाते हुए उठकर खड़े हो जायेंगे और हमारी गर्दनें दबोच लेंगे।

उन इँसानी पिंजरों के बीच हमने अपने सरदारों के बीच घिरी मोहिनी को देखा, तो हमारे दिलों को कुछ शांति महसूस हुई।

“मोहिनी का ऐसे भयंकर स्थान पर रात में आने का क्या कारण है ?” मैंने उससे पूछा।

मोहिनी ने मेरी बात का कोई उत्तर नहीं दिया, बल्कि उसने अपना मुँह इँसानी पिंजरों की ओर किया। दोनों हाथ उनकी ओर फैलाकर कुछ श्लोक पढ़ने लगी।

उसके साथ ही हमारे आस-पास के अँधेरों में कुछ आवाजें आने लगीं। मैंने घूमकर देखा तो आश्चर्य और भय से मेरा बुरा हाल हो गया। क्योंकि हमारे चारों ओर इँसानी पिंजर और खोपड़ियाँ, हड्डियाँ अपने आप हिलने लगीं थीं। ऐसा लगा जैसे कोई मरी हुई सेना जीवित हो उठी हो।

उफ! मेरे ईश्वर यह सब कुछ क्या है ? इससे भयंकर दृश्य इँसान क्या देख सकता है! यह मोहिनी सचमुच बहुत बड़ी जादूगरनी है। उसके जादू की शक्ति से बचना बहुत कठिन है।

अचानक चौंका देने वाला हाल नजर आया। हड्डियों के ढाँचे खड़े हो गये थे और एकाएक वातावरण में रण हुंकारे गूँजने लगे। ये ढाँचे हमारे सैनिकों के साथ लड़ रहे थे।

दोनों ओर से युद्ध शुरू हो गया था और मेरी समझ में कुछ भी न आ रहा था कि यह हुआ क्या ? दोनों सेनाएँ एक-दूसरे पर टूट पड़ी थीं।

“देखो सरदार! इस व्यक्ति की पूरी रक्षा हो। इसे जरा सी भी चोट न लगने पाए।”

मैं चौंका। यह आवाज़ तो मोहिनी की न थी! बल्कि तराई की रियासत की महारानी की थी!

इसका अर्थ साफ था।

यह सब महारानी का फैलाया हुआ जाल था और उसने धोखे से हमें पकड़ लिया था।

❑❑❑
 
रियासत की महारानी ने मुझे अपने महल में कैद कर लिया था। हालाँकि मुझे अधिक चोटें नहीं आयी थीं, फिर भी मैं जख्मी था। उस कैदखाने में मेरा तीसरा दिन था और इस बीच मैं बराबर युद्ध की घन-गरज सुनता रहा था। युद्ध का यह शोर निरन्तर निकट आता जा रहा था।

“वह चुड़ैल हमारी सेना को मारती-काटती आगे बढ़ रही है; और किसी भी समय इस महल तक पहुँच सकती है।” महारानी किसी नागिन की तरह फुफकार रही थी। “मेरी मौत लिखी जा चुकी है। मैं उसकी जादुई शक्तियों का मुकाबला नहीं कर सकती। यह मैं अच्छी तरह जानती थी, परन्तु जीत वह भी नहीं सकेगी, बोलो राज ठाकुर, क्या तुम युद्ध समाप्त होने से पहले मुझसे विवाह करोगे ?”

“विवाह! इससे क्या होगा महारानी ? अगर तुम्हारी मौत लिखी जा चुकी है, तो क्या यह विवाह करना तुम्हें बचा लेगा ?”

“हाँ! एक ही सूरत है मेरे बचने की। अगर तुम मुझसे विवाह कर लो तो मोहिनी की सेनाएँ मार-काट रोक देंगी और उसे खाली हाथ वापस लौटना पड़ेगा। यही मेरी सबसे बड़ी जीत होती कि मैं उसके प्रेमी को जीतने में सफल हो गयी। तुम यहाँ के राजा कहलाओगे और वह तुम्हारे विरुद्ध कभी युद्ध नहीं लड़ेगी।”

“यानी मुझे ढाल बनाकर तुम उसे शिकस्त देना चाहती हो ?”

“जंग और मोहब्बत में सब कुछ जायज होता है। कुँवर! बोलो अब भी वक्त है।”

“मेरा जवाब पहले की तरह इनकार में होगा।”

“तो फिर तुम भी सुन लो, यह धरती तबाह हो जाएगी। मेरी रूह उस चुड़ैल से भयानक इंतकाम लेगी। अगर मैं मर गयी तो जानते हो मैंने तुम लोगों की तबाही का क्या सामान जुटाया है ? इसे मोहिनी भी न जानती होगी कि मेरी मौत की खबर पाते ही हमारा बूढ़ा राज ज्योतिषी चीनी सेनाधिकारियों से जा मिलेगा। मोहिनी उसे रोक नहीं सकती। क्योंकि वह रियासत की सरहदों से बाहर जा चुका है और मेरे आखिरी सन्देश की प्रतीक्षा करेगा।”

मैं चौंक पड़ा। यह एक खतरनाक स्थिति थी। एक बार अगर चीनी सेनाएँ यहाँ पहुँच गयीं तो मोहिनी की मुट्ठी भर सेना उनके आधुनिक शस्त्रों का मुकाबला न कर सकेगी। और अगर मोहिनी ने उन पर अपनी जादुई शक्तियों से हमला किया तो स्थिति और भी भयानक हो जाएगी। वे लोग अपनी समस्त शक्ति मोहिनी के विरुद्ध झोंक सकते थे।

“जानते हो कुँवर, चीनी शासकों ने तिब्बत की धरती पर क्यों आक्रमण किया था ? मैं बताती हूँ।” महारानी पागलों के से अन्दाज में कह रही थी। “एक बार चीनी शासकों के हाथ ऐसा भिक्षु आ गया जो पूरे दो सौ पचास साल का था और जवान था। वह भिक्षु इन्हीं पहाड़ियों में रहा करता था और मोहिनी का पुजारी था। हालाँकि चीन के शासक उससे इस धरती के बारे में कुछ भी न जान सके थे; परन्तु उन्हें इतना इल्म जरूर हो गया था कि तिब्बत में कोई जगह ऐसी अवश्य है जहाँ अमर तत्त्व प्राप्त किया जा सकता है। तिब्बत पर हमला करने का पहला कारण यही बना। इस धरती की खोज का दूसरा कारण था यांगदेरम की खानकाह का वह मकबरा जिसे शैतान का मकबरा कहा जाता है। यह मकबरा एक चीनी लुटेरे का है, जिसने खानकाह का बहुत बड़ा खज़ाना प्राप्त कर लिया था। परन्तु वह ले न जा सका। वह खजाना इसी मकबरे में दफन है जो उस काल की देवी की इच्छा से चोरी छिपे वहाँ गाड़ दिया गया था।

“देवी माता उससे प्रेम करने लगी थी। उसने अपनी मृत्यु के समय यह रहस्य प्रकट किया था। उसके प्रेमी सरदार की यही अंतिम इच्छा थी कि जिस खजाने के लिए वह आया था, जिसे वह ले जा न सका था, उसे कोई न ले जा सके और वह उसी के पास रहे। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह मिस्र के पिरामिडों में फिरऔन अपने साथ खजाना भी दफनाने का आदेश देते थे। ऐसा ही कुछ उसके साथ भी हुआ।

“और चीनी शासकों को उस खजाने का पता किसी तरह चल गया। उसे ये चीन की सम्पत्ति मानते हैं। परन्तु अभी तक उन्हें यह नहीं मालूम हो सका कि वह मकबरा कहाँ है। वे यांगदेरम की खानकाह तक भी नहीं पहुँच पाए हैं और मैंने उनके पास संदेश भिजवाया है कि वह दोनों काम मैं कर सकती हूँ। यह संदेशा उस वक़्त उनके हाथों में पड़ेगा जब मेरी मृत्यु हो चुकी होगी। मैंने उन्हें बताया है कि यदि वे इस जादूगरनी को समाप्त करने में सफल हो गये तो सारी चीजें उन्हें मिल जायेंगी।”

पागलों की तरह वह हँसी।

“तुम इस पवित्र धरती की सबसे बड़ी गद्दार हो।” मैं चीख पड़ा। “तुम्हारी आत्मा कभी चैन से नहीं रहेगी।”

“मेरी आत्मा को चैन मिला ही कब है रामोन ? मेरे राजकुमार, मैं तो इस चुड़ैल के कारण जन्म-जन्मान्तर से दुःख भोग रही हूँ और मैं उसी के हाथों मरना पसन्द करूँगी। उसके बाद वह देखेगी कि किस तरह मेरी आत्मा इंतकाम लेती है। पहले भी वह इसी तरह समाप्त हुई थी क्योंकि उसने मेरा लहू पी लिया था। वह कहानी अब फिर दोहराई जाएगी। तब वह फिरऔन सेनाओं से लड़ती हुई मारी गयी थी। अब चीन के आग उगलने वाले हथियार उसके विनाश का कारण बनेंगे। मैंने उन्हें सब समझा दिया है कि यह चुड़ैल जादूगरनी है, इसलिए इसके जादू की काट साथ लेकर आयें। वे कच्चा काम नहीं करेंगे। बोलो, क्या अब भी तुम मुझसे शादी नहीं करोगे ?”

“हरगिज नहीं।” मेरे भीतर से जैसे मोहिनी का प्रेम बोल उठा।

“तो फिर तुम पछताओगे। सारी उम्र पछताओगे। तुमने इतना बड़ा ताजोतख्त ठुकराया है। एक ऐसी बूढ़ी जादूगरनी के लिए जिसकी बाँहों का स्पर्श तुम्हें जलाकर खाक कर सकता है। तुम्हें उससे कुछ भी हासिल नहीं होगा और एक दिन तुम्हें चीनी दरिन्दे पकड़कर ले जायेंगे, तब तुम मुझे याद करना।”

काश कि मैं उस वक्त महारानी की बात मान लेता तो वह सब कुछ न होता जो उस धरती के लिए पवित्र पुस्तकों में लिखा जा चुका था। हर युग में औरत ही इतनी बड़ी तबाही का कारण बनी है।

मेरे जेहन पर तो मोहिनी का प्रेम, मोहिनी का नशा हावी था। मेरी सोच अब मोहिनी की सोच थी, कोई मुझे उससे जुदा नहीं कर सकता था। मैंने बहुत दुःख उठाए थे इसी मोहिनी के कारण और अब जीवन कि कोई आकांक्षा भी शेष नहीं रही थी। सोचने का ढंग कुछ यूँ हो गया था कि अगर मेरा दम निकले तो मोहिनी की गोद में निकले।

एक बार फिर कैदखाने की तन्हाईयाँ मुझे कचोटने लगीं।

उसके बाद महारानी मुझसे मिलने नहीं आयी थी। महल में भी मुझे सन्नाटा सा छाया प्रतीत होता। न जाने पहरेदार भी कहाँ चले गये थे। वहाँ मुझे खाने-पीने को पूछने वाला भी कोई नहीं था।

युद्ध की आवाजें करीब और करीब आती जा रही थीं। मेरा दिल तेज-तेज धड़क रहा था। फिर एक रात मैंने जबरदस्त धमाकों और बिजली की कड़क जैसी विप्लवकारी आवाजें सुनी। यह आखिरी शोर था जो बहुत उग्र था। उसके बाद एकदम से खामोशी छा गयी।

अजीब थी यह खामोशी जिसमें शमशान की सी खामोशी जैसा भय छिपा था। मुझे यूँ लगा जैसे मेरे इर्द-गिर्द सैकड़ों लाशों का मरघट है जहाँ मैं तन्हा खड़ा हूँ। मेरी तलवार से खून टपक रहा है और उन लाशों में मैं किसी जिंदा इँसान को खोजता फिर रहा हूँ। लेकिन मुझसे बात करने वाला कोई नहीं है। सर्वत्र मौत की खामोशी फैली है।

फिर चौथा रोज बीता। भूख-प्यास के कारण मेरा बुरा हाल हो रहा था। इँसान भूखा तो कुछ दिन बिता सकता है, परन्तु प्यास! प्यास एक दो रोज में ही अच्छे-अच्छों का हौसला पस्त कर देती है।

चार दिन में मेरी यह हालत हो गयी कि मैं कैदखाने के फर्श से जा लगा और अपनी मौत की प्रतीक्षा करने लगा।

फिर कुछ आवाजें कानों में पड़ीं...हल्की सी; परन्तु इतना होश मुझे कहाँ था कि मैं उन आवाजों को ठीक से सुन पाता। मुझ पर बेहोशी के दौरे पड़ रहे थे। मेरे शरीर के छोटे जख्म भी फोड़े की मानिंद दुख रहे थे और फिर वह आवाजें भी गुम हो गयीं। शायद यह बेहोशी थी...गहरी बेहोशी।

जब मुझे होश आया तो मैं कैदखाने में न था।

वह एक खूबसूरत शयनागार था जिसके मखमली बिस्तर पर मैं पड़ा था। मैंने पलकें खोल दी थीं और टकटकी लगाये छत को देखता रहा। जेहन अब भी सोया-सोया था। फिर बीती घटनाओं की याद आने लगी और मैंने चौंककर दाएँ-बाएँ देखा।

“मैं कहाँ हूँ ?” मेरे मुँह से एक कराह के साथ निकला।

देखा तो सामने एक अजनबी चेहरा नजर आया।

चोगा पहने एक वृद्ध पुरुष मेरे सामने बैठा था। उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कुराहट उजागर हुई।

“खतरे की कोई बात नहीं।” वह स्थानीय भाषा में बोला–“मैं राजवैद्य हूँ। अब आप स्वस्थ हैं महाराज।”

“ओह! मगर यह जगह... ?”

“राजमहल है...वही राजमहल जहाँ आप कैद थे। यह उसी का शयनागार है।”

“और महारानी ?”

“उसके भाग्य में मृत्यु-योग था और पराजय के बाद उसका मर जाना ही उचित था। अन्यथा वह बहुत कष्ट उठाती। रियासत में बहुत खून बहा है। परन्तु अब धीरे-धीरे स्थिति में सुधार आता जा रहा है। फिर स्वयं महात्मा देवी माँ ने शासन की बागडोर सँभाल ली है। जानता में जो आतंक की लहर युद्ध के कारण दौड़ रही थी, वह अब सामान्य होती जा रही है। अधिकांश सेनाएँ मर-खप गयीं। दिन-रात लाशों को ढोने और उन्हें दफनाने का कार्य चल रहा है। महारानी के कुछ भगोड़े सैनिकों का एक टुकड़ी पीछा कर रही है। शायद आप यही सब जानना चाहते थे न ?”

“परन्तु मोहिनी देवी इस समय कहाँ हैं ?” मैंने पूछा।

“इतनी बड़ी जंग के बाद सामान्य हालात बनाना, लोगों में फिर से विश्वास जगाना इतना आसान काम तो नहीं। देवी माता को शायद ही इतना परिश्रम कभी करना पड़ा हो। जगह-जगह वह भाषण देने जाती हैं। इसके अलावा नए पदाधिकारियों का चुनाव, सेना को एक नया रूप देना, बहुत सारी जिम्मेदारियाँ हैं और उन्हें एक पल की भी फुर्सत नहीं मिल पा रही है।”

“महारानी को मरे हुए कितने दिन बीत चुके हैं ?”

“आज सातवाँ रोज है।”
 
सात दिन...मैं सोचने लगा। काफी समय बीत चुका है। इतने समय में अवश्य ही महारानी का संदेशा चीनी जानवरों तक पहुँच चुका होगा और इसकी संभावना भी हो सकती है कि उन्होंने तेज़ी से आक्रमण की तैयारियाँ प्रारम्भ कर दी होंगी। अगर महारानी ने सच कहा था तो।

“मैं तुरन्त मोहिनी देवी से मुलाकात करना चाहता हूँ।” मैंने वैद्य से कहा।

“परन्तु महाराज, यह कैसे सम्भव है ? उचित होगा कि आप विश्राम करें। देवी माता की भी यही इच्छा है।”

“वैद्य जी! मैं बिल्कुल स्वस्थ हूँ और मुझे और अधिक विश्राम की जरूरत भी नहीं। आप मेरा सन्देश तुरन्त देवी तक पहुँचा दें कि मैं तुरन्त मिलना चाहता हूँ। बहुत जरूरी बात करनी है। या फिर आप मुझे बतायें कि वह इस समय कहाँ हैं, मैं स्वयं जाकर उनसे मिल लूँगा।”

“इसका तो मुझे कोई ज्ञान नहीं कि देवी माता इस समय कहाँ होंगी; परन्तु मैं आपका संदेश सेनापति तक पहुँचा सकता हूँ। संदेश पहुँचाने में भी दो दिन लगेंगे। क्योंकि सेनापति पूरब की बस्तियों में ठहरे हुए हैं। शायद उन्हें मालूम होगा कि देवी माता इस समय कहाँ होंगी।”

“ओह!”

मेरा दिल तेज-तेज धड़कने लगा। मन ही मन मैं मोहिनी को पुकार रहा था–‘मोहिनी तुम जहाँ भी हो फौरन मेरे पास चली आओ।’

परन्तु यह वह मोहिनी नहीं थी जो मेरी बाँदी हुआ करती थी और मेरी पुकार पर जहाँ भी होती पलक झपकते मेरे सिर पर आ जाती।

मैं कर भी क्या सकता था।

सही रास्ता यही था कि सेनापति गोरखनाथ को संदेशा पहुँचा दूँ। जैसे ही मोहिनी को पहली फुर्सत मिलेगी, मुझसे मिल लेगी।

मैंने संदेशा लिखवा दिया और राजवैद्य उसे लेकर बाहर चला गया।

❑❑❑

आठवें रोज सेनापति गोरखनाथ राजमहल में आया। जितने दिन बीतते जाते थे, मेरी बेचैनी बढ़ती जाती थी। मोहिनी को मुझसे शीघ्र मिलना चाहिए था, परन्तु वह अब तक नहीं आयी थी।

“गोरख, क्या तुम्हें मेरा संदेशा मिल गया था ?”

“मिल गया था।” गोरख ने थकी-थकी आवाज में कहा।

“और तुमने मोहिनी तक संदेश पहुँचा दिया था ?”

“हाँ महाराज, पहुँचा दिया था!”

“फिर वह अब तक मुझसे क्यों नहीं मिली ?”

“मोहिनी देवी पीकिंग की यात्रा पर गयी हैं, महाराज।”

“पीकिंग की यात्रा पर ?” मैं चौंक पड़ा।

“जी हाँ महाराज! वहाँ वह अपना कोई राजदूत नियुक्त करके आएँगी।”

“कब तक लौटने की सम्भावना है ?”

“जैसे ही वह लौटेंगी आपसे उनकी भेंट अवश्य हो जाएगी।”

“लेकिन गोरख, क्या तुम्हें जानकारी है कि इस धरती पर किसी भी समय चीनी आक्रमण हो सकता है ?”

“चीनी आक्रमण! यह सूचना आपको कहाँ से प्राप्त हुई है ?”

मैंने गोरख को सारी बातें समझाईं तो वह परेशान नजर आने लगा। उसने तुरन्त ही सेना के सरदारों को बुलाया और सेनाएँ अभी एक युद्ध की थकान मिटा भी नहीं सकीं थीं कि उन्हें सीमाओं पर तैयार होने की तैयारियाँ करनी पड़ गयीं।

उसी दिन जासूस ने सूचना दी कि चीनी फौजें बड़ी तादाद में बढ़ी चली आ रही हैं और उनकी सँख्या हजारों में है। जंग का खतरा निरन्तर बढ़ता जा रहा था।

और जैसे ही सीमा पर युद्ध प्रारम्भ हुआ, मुझे मोहिनी के लौटने का समाचार मिला।

“आपको तुरन्त पहाड़ों के मन्दिर में देवी ने बुलाया है।” गोरखनाथ ने मुझे सूचना दी। “चीनी सेनाएँ तेज़ी के साथ आगे बढ़ रही हैं। उन्हें मार्ग में पड़ने वाले कबीलों का समर्थन प्राप्त है।”

मुझे तुरन्त ही वहाँ से रवाना होना पड़ा। मेरे साथ एक सैनिक दस्ता था जो मेरी रक्षा के लिए था। जब हम पहाड़ी की चढ़ाई चढ़ रहे थे तो दो विमानों ने अचानक बमबारी शुरू कर दी। धमाकों से पहाड़ियाँ गूँज उठीं। निश्चित रूप से वह चीनी विमान थे जो आधे घंटे तक बमबारी करने के उपरान्त वापस पलट गये।
 
लेकिन वापसी के समय वह उस पहाड़ के निकट से गुजरे जहाँ मोहिनी देवी का पहाड़ था। उसी समय बिजली की सी एक लकीर आसमान की तरफ लपकी। यह लकीर मन्दिर की मीनार की ओर से लपकी थी। यह चमकीली रेखा एक विमान से टकराई और एक धमाके के साथ विमान के परखच्चे उड़ गये।

दूसरा विमान भाग निकलने में सफल हो गया।

जिस समय मैं मोहिनी के मन्दिर में पहुँचा तो रात हो चुकी थी और तराई में बहुत दूर धमाकों का शोर गूँज रहा था।

मोहिनी अपने पूजा-गृह में मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। पूजा-गृह में मोहिनी अपने चेहरे पर नकाब नहीं डालती थी। वह अपने तख्त पर आसन जमाए बैठी थी। उसका ललाट रोशनी में चमक रहा था।

“राज!” उसने मुझे सम्बोधित किया। “मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में बेकरार थी। आओ, मेरे पास बैठ जाओ।”

मोहिनी के स्वर में वह उत्साह और खुशी नहीं थी। वह थकी-थकी सी मालूम पड़ती थी।

“मोहिनी, तुम इतने दिनों तक मुझसे दूर क्यों रही ?”

“मैं अपने विश्व की राजधानी में भ्रमण करने गयी थी, लेकिन जाने क्या हुआ कि मैं अपने उद्देश्य में नाकाम रही। मुझे तभी कुछ खतरे की गंध महसूस हुई और मैं वापस लौट आयी। कोई बहुत बड़ा साधू माओ के दरबार में मौजूद है और उसने मेरे सामने रुकावट की दीवार खड़ी कर रखी है। न जाने कैसे उन लोगों को पीकिंग में मेरे आगमन का पता चल गया था। उन्होंने मुझे पकड़ने की नाकाम कोशिश की। फिर मैंने देखा कि महारानी की आत्मा उसका साथ दे रही है। उसने मेरे बहुत से रहस्यों से उन्हें अवगत करा दिया और अब देखो, जिन चीनियों पर मैं भरोसा कर रही थी उन्होंने ही मेरे साथ विश्वासघात किया। उनकी फौजें निरन्तर आगे बढ़ रही हैं। मैं विनाश नहीं चाहती थी, पर अब वह सब होकर रहेगा।”

“मैंने पहले ही कहा था मोहिनी कि विश्व जीतना इतनी आसान बात नहीं। बीसवीं सदी के इँसान का जादू उसका विज्ञान है। अब भी समय है मोहिनी, अगर हम यहाँ से निकल चलें तो।”

“नहीं राज! बुजदिली की बातें मत करो। मैं यहाँ से कहीं नहीं जा सकती। मैंने कितने परिश्रम से यह दुनिया बसायी है। मैं इन सबकी माँ हूँ और माँ अपने बच्चों को मौत के मुँह में छोड़कर कभी नहीं जा सकती। मेरी बनायी दुनियाँ पर आक्रमण करने वाला यहाँ से जीवित नहीं लौट सकता।”

“मोहिनी अगर उनकी फौजें समाप्त हो गयीं तो वे सारी शक्ति झोंक देंगे।”

“उनकी सारी शक्ति इसी धरती पर नष्ट हो जायेगी।” मोहिनी का स्वर भयानक हो गया। “मैं इस कौम को ही तबाह कर दूँगी। लेकिन राज, तुम डरते क्यों हो ? मैंने तुम्हें वचन दिया था कि तुम्हें विश्व-सम्राट बनाऊँगी। हालाँकि मैं हिंसा के बल पर विश्व नहीं जीतना चाहती थी। इसीलिए कुछ समय शांति से बिताना चाहती थी; पर ऐसा मालूम होता है कि विश्वयुद्ध इसी धरती से शुरू होने जा रहा है।

“मैं देख रही हूँ कि करीब पंद्रह बमवर्षक विमान इस ओर बढ़े आ रहे हैं।”

मोहिनी अचानक उठ खड़ी हुई। वह आकाश की तरफ देख रही थी।

“सुनो राज! शायद मैं कुछ समय बाद ही युद्ध में व्यस्त हो जाऊँगी। मैं भयँकर खतरा मँडराते देख रही हूँ। इससे पहले मैं एक काम करना चाहती हूँ। तुम एक इँसान हो इसलिए सदा से ही मुझे तुम्हारी चिंता बनी रहती है। किसी भी क्षण अगर मेरी निगाहें चूक गयीं तो वह गंदी आत्मा तुम पर हमलावर हो सकती है। युद्ध एक ऐसी चीज है जिसमें इँसान की जिंदगी-मौत का कोई भरोसा नहीं रहता। मैं एक प्रतिशत भी इसकी गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहती कि तुम मृत्यु को प्राप्त हो जाओ। बड़ी मुश्किल से तो हमारा मिलन इस जन्म में हुआ है। हाँ राज, मैं तुम्हें वह शक्ति देना चाहती हूँ कि तुम मेरी तरह सदा के लिए अमर हो जाओ। फिर सारी दुनियाँ की शक्ति मिल कर भी हमें मार नहीं सकेगी। हम एक-दूसरे से कभी जुदा न हो सकेंगे।”

“अमर!” मैं चकित सा उसे देखने लगा।

“हाँ राज! देखो डरना नहीं। एक बार अगर तुमने वही किया जो मैं कहूँगी तो फिर तुम इस योग्य हो जाओगे कि मुझे स्पर्श कर सको। तिब्बत में यही एक स्थान ऐसा है जहाँ इँसान अमरत्व प्राप्त कर सकता है। अब देखो न मैंने भी बार-बार इँसानी जून में जन्म लेने का झंझट ही समाप्त कर दिया है। क्योंकि इँसानी जून पाने का फासला सदियों का होता है और इतनी सदियों तक मुझे भटकना पड़ता है एक छिपकली की जून में।”

“लेकिन मैं अमर किस तरह हो सकता हूँ ?”

“आओ मेरे साथ। मैं तुम्हें उस स्थान पर ले चलती हूँ। पवित्र लामाओं ने अपनी आहुतियाँ देकर एक हवन किया था। हवन के लिए एक पहाड़ की गार चुनी गयी थी। उन्होंने यह हवन ज्योति मेरे लिए रोशन की थी; ताकि मोहिनी देवी हमेशा इँसानी जून में रहकर उनकी रक्षा करती रहे। सदियों से वह आग इन पहाड़ों में धधक रही है। उसकी लपटें दूसरे पहाड़ों की खाईयों से भी कभी-कभी प्रकट हो जाया करती है। उसी आग को रोशन करने के लिए आज भी मेरे बच्चे कुर्बानियाँ देते हैं, खून चढ़ाते हैं ताकि हवन की अग्नि जलती रहे और उनकी देवी रक्षा करती रहे।”

अचानक मुझे ध्यान आया कि ऐसी आग का एक कुँड मैं पहले भी देख चुका हूँ, जो मोहिनी के मन्दिर में ही है; जहाँ मोहिनी पहाड़ों की रानी के कँकाली शरीर में अवतरित हुई थी।

कितनी भयानक जगह थी वह और कितना भयानक था वह दृश्य जब मैंने एक छिपकली की मुर्दा देह पर अपनी उँगली का लहू टपकाया था। और फिर मारे भय के या किसी और कारण से मैं बेहोश हो गया था।

❑❑❑
 
यह इँसान की फितरत है कि कैसी भी जिंदगी क्यों न जी रहा हो; चाहे कितने ही दुखों के पहाड़ उसके सिर पर से गुज़र जाएँ, परन्तु वह मौत से हमेशा ही खौफ खाता रहा है। यदि मौत सिर पर आ जाए तो वह हरचंद जीने के लिए सँघर्ष करता है।

और मैं भी इँसान था।

मैं उस जादूगरनी मोहिनी से प्रेम करता था जिसे पाने के लिए लोग अपनी जान की बाजी तक लगाया करते थे। मैं एक लम्बा सफर तय करके इस स्थान पर पहुँचा था। मोहिनी के दर्शनों की मुराद तो पूरी हो चुकी थी; परन्तु बाद की घटनाओं ने मेरे जेहन में तूफान लाकर रख दिया था। विश्व की महानतम सुन्दरी विश्व जीतना चाहती थी और लाशों पर यह खूनी दास्तान लिखी जाने वाली थी। पहली ही जंग ने मेरे छक्के छुड़ा दिए थे।

उस रात बमवर्षकों ने जोरदार हमला किया और चारों ओर हाहाकार मच गया। कई बमवर्षक मोहिनी के वैज्ञानिक स्टाफ ने मार भी गिराए, परन्तु उनकी बमबारी भी कम घातक नहीं थी।

मोहिनी मुझे एक स्थान पर लेकर पहुँच गयी।

सामने एक कुंड था। परन्तु उस कुंड की तरफ देखते ही दहशत का एक जज्बा मेरे सीने में उठ खड़ा हुआ। यह कुंड रक्त से लबालब भरा था। न जाने कहाँ से इतना खून बहकर उस कुंड में जमा हो गया था। अगर वह इँसानी खून था, तो कम से कम सैकड़ों इँसानों का रहा होगा। मैंने रक्त का यह तालाब पहली बार देखा था जो पहाड़ों की गहराई में था। उस स्थान तक पहुँचने के लिए मैंने सीढ़ियों का लम्बा रास्ता तय किया था। मोहिनी मशाल लेकर आगे बढ़ती रही थी और मैं उस खतरनाक गहराई का रास्ता तय करते हुए इस जगह तक पहुँचा था। बाहर के धमाके अब सुनायी देने बन्द हो गये थे। क्योंकि मैं पहाड़ की उस गहराई तक जा उतरा था जहाँ साँस भी कठिनाई से ली जा रही थी।

मुझे यूँ लग रहा था कि जैसे कई आत्मायें वहाँ मँडरा रही हैं, जो तरह-तरह की आवाजें निकालकर मुझे भयभीत कर रही थी। फिर मैंने उस रास्ते पर पड़ने वाले कई सुराखों में छिपकलियों को रेंगते देखा। वह वैसी ही बड़ी पहाड़ी छिपकलियाँ थीं और उनकी अँगारों जैसी चमकती आँखें मुझे खौफजदा कर रही थीं। ऐसा मालूम पड़ता था कि वे इस जगह की रक्षक हैं और उन्हें मेरा वहाँ उतरना नागवार गुजर रहा था।

आगे उनकी सँख्या बढ़ती गयी। वे रास्ता रोक लेती थीं, परन्तु मोहिनी जैसे ही उनके करीब पहुँचती, वे सुराखों में घुस जातीं और मुझे दहकती नजरों से घूरती रहतीं।

आखिर वह रक्त का तालाब भी आ गया।

इस स्थान पर तालाब के इर्द-गिर्द एक प्लेटफार्म सा बना था, जिस पर चंद इँसानी पिंजर समाधि की सी मुद्रा में बैठे थे। परन्तु इन पिंजरों के सिर उनके सामने रखे थे जो खोपड़ियों की शक्ल में थे और गर्दन तक हिस्सा आलथी-पालथी मारे पद्मासन की मुद्रा में बैठा था। यह दृश्य बड़ा ही भयानक था। मशाल की रोशनी की वहाँ कोई आवश्यकता नहीं थी क्योंकि वहाँ चारों तरफ से रोशनी की किरणें फूट रही थीं; और जिन सुराखों से यह रोशनी फूट रही थी, वहाँ मुझे आग की चमक दिखायी दी। ऐसी आवाजें भी आ रही थीं जैसे चारों तरफ आग की भट्टियाँ दाहक रही हों।
 
मैंने यूँ तो बहुत से भयानक क्षणों में साँस ली थी, परन्तु ऐसा भयानक दृश्य पहले कभी मेरी आँखों के सामने से नहीं गुजरा था। इस जगह के वातावरण में भी एक अजीब सी बू थी। ऐसी बू जैसे माँस जलने की चिरांध आती है। यह बू मेरे मनो-मस्तिष्क पर बुरी तरह हावी होती जा रही थी। मुझे यूँ लगा जैसे मोहिनी कोई भयानक शैतानी बला है जिसके जाल में मैं बुरी तरह फँस चुका हूँ और यह जाल मुझे जहन्नुम की नदी की ओर ले जा रहा है।

मेरा जेहन चीख-चीखकर कह रहा था कि यहाँ से भाग निकलो। मान जाओ राज, वरना तुम शैतान की जहन्नुमी आग में सारा जीवन जलते रहोगे। तुम मौत के लिए गिड़गिड़ाओगे, परन्तु मौत तुमसे दूर होगी।

“राज!” अचानक मोहिनी की आवाज ने मौन तोड़ा।

मैं एक झटके के साथ चौंककर सीधा हो गया, बल्कि सावधान हो गया। मुझे न जाने क्यों इसका अँदेशा हो गया था कि कोई भयानक घटना घटने वाली है।

“राज, तुम इँसान हो जो फानी होना है और उसकी आत्मा हमेशा कायर बनाकर रखती है। क्योंकि वह शरीर को त्यागना नहीं चाहती। यह तो एक विधान है और तुम उस विधान से अलग कैसे हो सकते हो। हाड़-माँस के पुतले हो। तुम्हें भी अपने शरीर से प्रेम है; जबकि आत्मा अमर है। शरीर परिधान है। आज तुम इस फानी परिधान को त्यागकर एक ऐसा परिधान पहन लोगे जो समाप्त नहीं हो सकता। तुम अपने उस शरीर को साधारण इँसानों से अदृश्य रखने में भी सक्षम हो जाओगे। लेकिन इसके लिए तुम्हें साहस से काम लेना होगा। अपने दिल से उन बुरे ख्यालों को निकाल दो, जो तुम्हें भयभीत कर सकते हैं।”

मुझे यूँ महसूस हुआ जैसे मोहिनी मेरे दिल की बात जान चुकी है और वह अपने शिकँजे को धीरे-धीरे मज़बूत करती जा रही है। मैं टकटकी लगाये उसकी तरफ देखने लगा।

“यह सब पवित्र लामा थे जिन्हें जीवन का रहस्य ज्ञात हो चुका था। यह मेरे पुजारी थे और देखो इन्होंने किस तरह सबसे पहले अपने सिरों को काटकर अपना रक्तदान मुझे दिया था। इनका रक्त आज भी सूखा नहीं और वे उसी प्रकार अपनी समाधियों में लीन हैं। एक ऐसी ज्योति जलाये हैं जो उनकी देवी को अमर रखती है।”

“मोहिनी! क्या...क्या यह इँसानी खून है ?”

“हाँ, और जो मेरे सेवक मेरे मन्दिर में रक्तदान करते हैं, वह सब इसी जगह एकत्रित होता है। मैंने तुम्हें बताया था कि इँसानी खून मेरी गिजा है। वही मेरे अस्तित्व को जीवित रखती है। जब मैं यहाँ न रही थी, तो मुझे स्वयं अपनी गिजा का प्रबन्ध करना पड़ता था। परन्तु यह तालाब कभी नहीं सूख सकता और अब मैं सदैव के लिए इँसानी जून में आकर अमर हो चुकी हूँ। देखो राज! मैं चाहती थी कि यहाँ कुछ दिन अध्ययन और तप करने के उपरान्त एक दिन तुम भी जीवन के इस रहस्य को समझ जाओगे और फिर तुम्हारे लिए अमरत्व प्राप्त करना कोई कठिन कार्य नहीं होगा। परन्तु परिस्थितियाँ अभी बदल चुकी हैं और मैं इतने लम्बे समय तक इन्तजार नहीं कर सकती। अपने वस्त्र उतार दो राज। यहाँ तक कि तुम्हारे शरीर पर एक भी चीथड़ा न रहे।”

मोहिनी का स्वर वहाँ गूँज रहा था और मेरे जेहन में अंधड़ चल रहे थे।

“वस्त्र उतार दूँ...ल...लेकिन...क़...क्यों ?”

“ओह राज! तुम कितने भोले हो और मेरी विवशता देखो कि मैं तुम पर हुक्म भी नहीं चला सकती, अन्यथा इस दुनियाँ में कौन व्यक्ति ऐसा है जो मोहिनी का हुक्म टाल सके। और कौन ऐसा है जो अमर न होना चाहे। चलो राज देर न करो। तुम्हें इस तालाब में स्नान करना है और मैं तुम्हें स्नान करते देखूँगी।”

मारे भय के मेरी घिग्गी बँध गयी। खून में नहाने की कल्पना कितनी भयानक होती है। वह भी ऐसे डरावने माहौल में! यूँ भी मुझे अपना दम घुटता प्रतीत हो रहा था।

“म...मगर मोहिनी...यह सब....यह सब किस लिए ?”

“जब तुम इस लहू में स्नान कर लोगे तो यह रक्त तुम्हारे भीतर मिलकर एक नयी चेतना जगा देगा। फिर तुम आग की नदी में उतर सकोगे और फिर तुम्हारा वास्तविक लहू जल जाएगा और यह रक्त तुम्हारी रगों में गर्दिश करने लगेगा। फिर तुम अमर हो जाओगे मेरी तरह।”

“तो क्या उसके बाद मेरी गिज़ा भी इँसानी खून बन जाएगी ?”

“हाँ राज, और जब तक मैं तुम्हें इस योग्य नहीं बना लेती, तुम मुझे स्पर्श नहीं कर सकते।”

“नहीं मोहिनी, यह मुझसे नहीं हो सकेगा!” मेरे मुँह से अचानक निकला।‘

मेरा दिल अब बैठने लगा था।

“राज! ऐसी बातें मत करो वक्त बहुत कम है। मैं आग के दहकते कुंड का रास्ता खोल रही हूँ।”

मोहिनी प्लेटफार्म पर चढ़ गयी। उसने दूसरी दीवार की तरफ मुँह करके दोनों हाथ फैलाये और कुछ श्लोक बुदबुदाने लगी। जबकि मैं वहाँ से फरारी की कोई राह तलाश कर रहा था। परन्तु ऊपर सीढ़ियों पर छिपकलियाँ राह रोके थीं और उनकी जीभ लपलपा रही थी। मुझे यह समझते देर नहीं लगी कि मोहिनी की इच्छा के बिना मैं यहाँ से निकल नहीं सकता।

अचानक एक जोरदार गड़गड़ाहट की आवाज सुनायी दी और मैं चौंक पड़ा।

उस आवाज के साथ ही मैंने शोलों की तपिश महसूस की। यह तपिश उन शोलों की थी जो उस खोली से निकल रही थी, जहाँ दीवार फट गयी थी। मोहिनी उन शोलों के ऐन सामने खड़ी थी। फिर वह मेरी तरफ पलट पड़ी।

“चलो राज! देर न करो। अरे! तुमने अपने वस्त्र नहीं उतारे ?”

मैं तेजी के साथ उस जहन्नुम की भट्ठी से बचने का उपाय सोच रहा था। शैतानी रूहों ने मेरे गिर्द एक हिस्सार सा बना दिया था। यह सोच-सोचकर मैं थर्रा उठा कि मेरी यह इँसानी देह एक ऐसा परिधान धारण कर लेगी जिसकी गिजा फिर इँसानी लहू होगी। मैं मोहिनी की रूह को तो पा लूँगा, परन्तु यह ख्याल ही दहशतअंगेज़ था।

“क्या बात है राज, तुम क्या सोच रहे हो ?” मोहिनी का स्वर गूँजा।

वह शोले के ऐन सामने खड़ी खुद भी एक शोला नजर आ रही थी। मेरा मस्तिष्क जल्दी से कोई युक्ति सोच रहा था।

“मोहिनी!” अचानक मैंने बोला। “क्या इस तरह मेरा शरीर जल न जायेगा और क्या मैं मर न जाऊँगा ? नहीं मोहिनी, मैं मरकर तुम्हें खोना नहीं चाहता। मुझे खौफ आता है कि कहीं ऐसा न हो कि फिर कभी हमारा मिलन हो ही न सके।”

मैंने महसूस किया कि मेरी आवाज काँप रही है।

“तुम मरोगे नहीं राज।” मोहिनी हँसी। “यह आग अमृत की आग है। इँसान इसमें जलने के बाद गैर फानी हो जाता है। और फिर जब मैं कह रही हूँ तो फिर तुम्हें भय किस चीज का ?”

“मोहिनी! क्या मैं इसी रूप में ठीक नहीं हूँ ?” मैंने अपनी बात के पाँव जमाने की कोशिश की। “ठीक है कि मैं तुम्हें स्पर्श नहीं कर सकता; परन्तु स्पर्श से होता भी क्या है ? हमारे शरीर एक दूसरे को स्पर्श नहीं कर सकते तो क्या हुआ, हमारी आत्मा तो एक-दूसरे का स्पर्श कर सकती हैं।”

“ओह! तुम देवताओं की इस पवित्र अग्नि से खौफ खाते हो राज ? यह आग तुम्हारी देह को नहीं जलायेगी। तुम अपने आप को तरो-ताजा और एक नए जीवन में पदार्पण करते पाओगे। अच्छा मेरे प्रेमी! तुम्हें इससे डर लगता है तो मैं तुम्हारा यह डर भी दूर कर दूँगी। इसमें तुम्हारा दोष ही क्या है ? यह तो इँसान की एक फितरत है इसीलिए कि वह जीवन का रहस्य नहीं जानता। इसीलिए कि आत्मा उस शरीर से बेपनाह मोहब्बत करती है जिसे वह धारण कर लेती है। आत्मा तो अमर है राज। वह कभी नहीं मरती; परन्तु जीवन-धारी यही सोचते हैं कि यह उसकी सदैव के लिए मृत्यु है। देखो राज, मैंने भी एक इँसानी शरीर धारण कर रखा है और मेरे इसी शरीर ने इसी आग में स्नान करके स्वयं को सदियों तक जीवित रखा है। तुम्हारा भय दूर करने के लिए मैं अपनी यह देह एक बार फिर इस आग के हवाले करती हूँ और तुम देखोगे कि मेरा शरीर ज्यों का त्यों बना रहेगा। बल्कि इसकी सुन्दरता भी बढ़ जाएगी। उसके बाद भी अगर तुमने समय नष्ट किया तो फिर मुझे प्राप्त करने की सभी आशायें तुम्हें त्यागनी पड़ेगी। खैर, तुम्हारा यह त्याग एक लम्बी कठिन साधना में परिणित होगा। हमारा फासला वर्षों तक के लिए बढ़ जाएगा।”

मोहिनी ने इतना कहकर अपना लबादा उतार दिया और विश्व की महानतम सुन्दरी मेरे सामने चमकते सौंदर्य के वस्त्रों में खड़ी नजर आयी। मेरा दिल तेज-तेज धड़कने लगा। ऐसा रूप किसी ने कभी न देखा होगा।

उसकी पलकें बन्द थीं। होंठों पर कंपन था। माथे का प्रकाश और भी चौड़ा हो गया था। उसकी देह से विशेष चमकीली रश्मियाँ फूट रही थीं, जो उस वक्त न दिखायी देती थी जब देह वस्त्र पहने होती थी।
 
अचानक वह आग की तरफ घूम गयी।

और फिर मेरे देखते-देखते उसने आग के शोलों में छलाँग लगा दी। उसके साथ ही मेरा दिल न जाने क्यों बैठने लगा।

मोहिनी अब शोलों में थी। वह अब भी मुस्कुरा रही थी।

“देख लिया राज! यह है पवित्र आग! देखो! मेरी देह अब और भी कुंदन हो जाएगी। अब तो तुम्हारा...”

अचानक मोहिनी की आवाज ठहर गयी। मैंने उसके चेहरे की कैफ़ियत बदलते देखी। उसके चेहरे पर एक तनाव, एक पीड़ा देखी और फिर कुछ ही क्षण गुज़रे होंगे कि मोहिनी की दिल दहला देने वाली दर्दनाक चीखों से नगर थर्रा उठा।

“...राज...”

वह मुझे पुकार रही थी। चीख रही थी और उसके साथ-साथ मानों सैकड़ों रूहें चीख रही थीं।

“मोहिनी!” मैं पुरजोर शक्ति से चिल्लाया। “इस आग से बाहर निकल आओ मोहिनी। देखो! हे भगवान! देखो तुम्हारी देह जल रही है। तुम्हारा चेहरा! उफ!”

न तो मुझसे मोहिनी की वह सूरत ही देखी जा सकी और न मेरी आवाज ही कंठ से बाहर निकली। मोहिनी के चेहरे का माँस जल रहा था। वह एक कुरूप चेहरा था जिसकी वीभत्सता बढ़ती ही जा रही थी। उसके चेहरे पर भी एक दहशत थी और शायद किसी पीड़ा के कारण वह चीख रही थी।

“मोहिनी! बाहर आ जाओ...बाहर।” मैं पागलों की तरह फिर चीख पड़ा।

“नहीं राज, तुम मेरे पास आ जाना। मैं फिर मिलूँगी...मैं फिर मिलूँगी ज़रूर...इस दुनियाँ में कहीं न कहीं।”

सारी जमीन पर जैसे जलजला आ गया था। मैं अपने पाँव उठाने से पहले ही गिर पड़ा। मोहिनी को उस हालत में जलता देख मैं आग में कूद पड़ना चाहता था। उसे बाहर खींच लेना चाहता था; परन्तु जमीन इस जोर से काँपी कि मैं वहीं गिर पड़ा।

दीवारों में दरारें पड़ने लगी थीं।

शोलों की चड़चड़ाहट के साथ ही माँस जलने की बू और तेज़ हो गयी। मैं एक बार फिर उठा, परन्तु फिर गिर पड़ा। एक पत्थर मुझसे आ टकराया था। मैंने देखा मोहिनी के शरीर का तकरीबन सारा माँस जल चुका है। वह कँकाल मात्र रह गयी है और अब यह कँकाल भी धीरे-धीरे घटता जा रहा है।

और फिर अचानक ही जमीन फटने लगी।

“राज! रक्त के तालाब में छलाँग लगा दो।” मोहिनी की आवाज दूर से आती हुई महसूस हो रही थी। “एक बार मैं फिर तुमसे बिछड़ रही हूँ। इस पवित्र आग में दोबारा स्नान करने से मैं सदियों के फासले पर चली गयी हूँ। आह! मेरे प्यारे...तुम...तुम यामदरंग की खानकाह...”

आनन-फानन में मैंने उस रक्त के तालाब में छलाँग लगा दी। मैं मोहिनी की पूरी बात भी न सुन पाया।

मैंने बेशुमार छिपकलियों को ऊपर रेंगते देखा। वे तालाब के गिर्द मंडरा रही थीं और खूनी आँखों से मुझे निहार रही थीं।

गार ढह रहा था।

धड़ाम-धड़ाम की आवाजें!

शोले ही शोले!

और फिर मारे भय के मैं चेतना शून्य हो गया।

❑❑❑
 
जब मुझे होश आया तो मैं एक तट पर पड़ा था। यह एक झील थी जिसका जल एकदम निर्मल और स्वच्छ था। मनोरम पहाड़ियों से घिरी एक खूबसूरत झील। दूर-दूर तक किसी आदम जात का पता नहीं।

मेरी समझ में नहीं आया कि मैं कहाँ हूँ। खुले आसमान पर सूरज चमक रहा था जिसकी भरपूर किरणें मुझ पर पड़ रही थीं। गुजरी हुई बातें एक भयानक ख्वाब की तरह महसूस होती थीं। वह कौन सी भूमि थी जहाँ मैंने इतना समय व्यतीत किया था ?

और अब मैं कहाँ आ गया हूँ ?

मैं उठ खड़ा हुआ और फिर आँखें फाड़-फाड़कर चारों तरफ देखने लगा। यह जगह मेरे लिए बिल्कुल अजनबी थी। एक बार फिर मैं अपने जीवन की तन्हाइयों में भटकने के लिए अनजान राहों पर खड़ा था।

“अलख निरंजन!” अचानक एक आवाज वातावरण में गूँजी और मैंने चौंककर उस ओर देखा जिधर से आवाज गूँजी थी। एक साधू वहाँ इस प्रकार अवतरित हुआ जैसे आकाश से उतर आया हो।

मैंने गौर से साधू को देख कर तुरन्त ही साधू जगदेव को पहचान गया। एक मुद्दत के बाद साधू जगदेव के दर्शन हुए थे। मेरे जीवन में चंद व्यक्तित्व ऐसे भी आये थे जो मेरे लिए रहस्य बने रहे। साधू जगदेव भी उन्हीं उलझी हुई गुत्थियों में से एक था।

“महाराज!” मैंने चौंककर कहा।

“मोहिनी का सपना टूट गया बालक ?” साधू जगदेव ने कहा। “और जान लिया कि वह क्या चीज है ? एक जमाना था बालक जब तुम्हें अनेक पवित्र शक्तियाँ वरदान में प्राप्त हुई थीं। परन्तु तुम्हारे सिर से मोहिनी का नशा न उतरा और तुम अपने मार्ग से भटककर भावनाओं के भँवर में फँसकर रह गये।

तुमने उस देवी कुलवन्त का मान भी तोड़ दिया। याद है तुम्हें कि तुमने कितने घर उजाड़े हैं ? कितने जीवन बर्बाद किये हैं ? कुलवन्त भी उनमें से एक थी जिसका जीवन तुमने छीना है।”

“महाराज...!” मैं कराह उठा। “तुम भी जहर बो रहे हो महाराज ? तुम भी तो मुझे मझधार में छोड़कर चले गये थे। जिस समय हरी आनन्द ने मुझे एड़ियाँ रगड़ने के लिए विवश कर दिया था, मैंने तुम सबको पुकारा था; परन्तु कोई मेरी सहायता के लिए नहीं आया। उस वक्त सिर्फ मोहिनी ही थी जिसने मेरी प्राणों रक्षा की थी। न सिर्फ प्राण रक्षा, बल्कि मेरे दुश्मन का भी खून चाट लिया था। क्यों महाराज, आप ही ने तो मुझसे कहा था कि मैं अधर्मियों के नाश के लिए पैदा हुआ हूँ। उन ढोंगी तांत्रिकों के लिए जो समाज और धर्म के नाम पर एक कोढ़ हैं। हरी आनन्द क्या ऐसा नहीं था ?”

“था...।” साधू जगदेव ने अपना त्रिशूल हवा में उछाला। “उसके अलावा भी बहुत से हरी आनन्द थे और हैं जिसके सर्वनाश के लिए हमने तुम्हें नियुक्त किया था। इसलिए तुम्हें वह शक्तियाँ दान मिली थीं। कुलवन्त ने पूरे सौ महापुरुषों का जाप करके उनकी शक्तियाँ तुम्हारे लिए हासिल की थीं, परन्तु मूर्ख आदमी...पापियों की श्रेणी में वे लोग कब आते थे, जिन्हें तुमने अपनी हवस का शिकार बनाया ? हरी आनन्द को पाने के लिए तुम इतने पागल हो गये कि तुम्हें इसका ख्याल ही न रहा कि कौन निर्दोष है, कौन पापी ? बब्बन अली की बहनों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था ? और क्या तुम्हें वह नारियाँ याद हैं जो तुम्हारी हवस का निशाना बनीं थीं ? तुमने अपने को स्वयं पाप के दलदल में डालकर अपनी शक्तियों का नाश किया। और हरी आनन्द इसीलिए तुम्हें छकाता रहा ताकि तुम क्रोध में आकर इसी तरह अपने होश गँवाते रहो और तुम्हें वरदान में मिली शक्तियों का विनाश होता रहे। बोलो राज ठाकुर! क्या अब भी तुम्हारी आँखें नहीं खुलीं ? तुमने तो मोहिनी के साथ बहुत से सुन्दर सपने सजाये होंगे। परन्तु तुमने उसकी बर्बाद होती दुनियाँ को भी देख लिया होगा। हजारों लोग वहाँ आग के लावे में बह गये। कौन है उन निर्दोषों की मौत का जिम्मेदार ?”

“हाँ...हाँ महाराज, मैं उन सबका जिम्मेदार हूँ। मैं पापी हूँ और अब मुझे किसी की सहायता की जरूरत नहीं। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिये। बस मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिये।”

“जरूर छोड़ दूँगा। लेकिन चीनी फौजें तुम्हें तुम्हारे हाल पर नहीं छोड़ सकतीं। जिस जगह तुम मौजूद हो, इसके चारों तरफ उनकी सेनाएँ फैली हुई हैं। यही वह स्थान था जहाँ मोहिनी का मन्दिर था और उन्होंने एक बड़ी तबाही देखी है। जब उस पहाड़ पर जलजला आया था और वह आग का पहाड़ प्रलय बनकर फट पड़ा था। तुम बच गये कुँवर राज। यह तुम्हारे हक में अच्छा न हुआ। अगर तुम उस रक्त के तालाब में न कूद गये होते तो तुम्हारी मृत्यु निश्चित थी। पर होनी को कौन टाल सकता है।”

जगदेव कोई पहुँचा हुआ साधू था। पहले भी मैंने उसके अनगिनत चमत्कारों को देखा था। मेरी तो समझ में कुछ नहीं आता था। अगर यही वह जगह है जहाँ मोहिनी का मन्दिर था तो फिर वह सब कुछ कहाँ अदृश्य हो गया ? उस सारी दुनियाँ का कोई चिह्न यहाँ नजर नहीं आता था।

“यह रक्त का वही तालाब राज, जो अब शांत झील बन गया है और वह सब बुरी आत्मायें थीं जो मोहिनी के मन्दिर की देखभाल करती थीं। वह सब मोहिनी के इँसानी शरीर के साथ-साथ जल गयीं। तुम जमीन के बहुत गहरे हिस्से में थे जहाँ तालाब में सुरक्षित थे। ऊपर पहाड़ फट पड़ा था और उसने चारों तरफ तबाही फैलाई थी। निरन्तर सात दिन तक तबाही। कुछ लोग अपनी जानें बचाकर भागे। उनमें से अधिकाँश चीनियों के हाथों मारे गये और जो शेष हैं, उन्हें चीनियों ने कैद कर लिया। उन्हें यह तो पहले ही ज्ञात हो चुका था कि जंग किसकी वजह से शुरू हुई। वे मृत लोगों की लाशों में भी तुम्हें खोज रहे हैं और एक दो रोज बाद इस पहाड़ी पर भी आ जायेंगे। बोलो राज ठाकुर, अब तुम चीनियों से जान बचाकर भागोगे ?”

“अगर मौत आनी ही है महाराज तो चीनियों के हाथों ही मारा जाऊँगा।”

“वे तुम्हें मारेंगे नहीं राज। मौत तो तुम्हारे भाग्य में लिखी ही नहीं है। वे तो तुमसे अमरत्व का रहस्य जानना चाहेंगे। वे जानना चाहेंगे कि एक ज्वालामुखी फटने के बावजूद भी तुम किस तरह बच गये।और मोहिनी का वह मन्दिर कहाँ विलीन हो गया। तुम यही कहोगे न कि तुम्हें कुछ नहीं मालूम, लेकिन तुमने अभी यातनायें देखी कहाँ हैं।”

“लेकिन तुम क्यों यह सब सुनाने आये हो महाराज ? तुम्हारा मुझसे अब सम्बंध ही क्या रहा है ?”

“पुराने रिश्ते याद आ गये तो मैं कैलास पर्वत से इधर निकल आया। यह देखने कि मोहिनी को पाकर तुमने क्या खोया और क्या पाया ?”

“ठीक है महाराज, अब तुमने जान लिया कि मैंने क्या पाया और क्या खोया है तो मेहरबानी करके मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो।”

“मैं तुम्हें इस तरह छोड़कर नहीं जाऊँगा। कुछ कर्तव्य मेरे भी शेष हैं। मैं जानता हूँ कि इन विषम परिस्थितियों में तुम मौत को गले लगाने से न हिचकोगे। लेकिन अभी तुम्हारा जीवन शेष है। तुम्हें प्रायश्चित करना है। जिन लोगों का तुमने अपमान किया है, उनके लिए तुम्हारा प्रायश्चित आवश्यक है। और इससे पहले कि कोई जादुई शक्ति या असुर शक्ति तुम्हें दूसरी राह पर ले जाए और तुम्हें चीनियों के हाथों न पड़ने दे, मैं यहाँ आया हूँ। मेरा एकमात्र उद्देश्य यही है कि तुम्हें यहाँ से न जाने दूँ।” इतना कहकर साधू जगदेव ने तेजी के साथ मेरे चारों तरफ एक घेरा त्रिशूल से खींचा और फिर त्रिशूल वहीं गाड़ दिया।
 
“अब तुम्हें कोई भी असुर शक्ति इस घेरे से निकालकर नहीं ले जा सकती, और न ही तुम अपनी इच्छा से इस घेरे को तोड़कर बाहर निकल सकते हो। इस घेरे को केवल इँसान तोड़ सकता है। ऐसा इँसान जिस पर किसी के जादू का असर न हो और सिवाय चीनियों के इस क्षेत्र में आएगा भी कौन ? अच्छा ठाकुर, मैं चलता हूँ। मेरा कर्तव्य पूरा हुआ।”

जगदेव जिस तरह प्रकट हुआ था, उसी तरह अदृश्य हो गया। और एक बार फिर मेरे चारों तरफ वीराना छा गया। कुछ देर तक तो मैं ठगा सा वहीं खड़ा रहा फिर जैसे कुछ सुध आयी और मैं उस घेरे के पास पहुँच गया जो जगदेव ने खींचा था। परन्तु घेरा पार करते समय मेरे पाँव इतने भारी हो गये कि उठाए न गये और मैं समझ गया कि असीम शक्तियों के स्वामी जगदेव ने मुझे उस घेरे में कैद कर लिया है।

मैं घेरे के भीतर ही सिर थामकर बैठ गया। मेरा सब कुछ मुझसे छिन गया था। कितनी अजीब बात थी कि जिस पर मोहिनी मेहरबान हो और जिसे मोहिनी ने विश्व-सम्राट बनाने की ठानी हो, वह इस तरह अदृश्य दीवारों में कैद अपने भाग्य पर आँसू बहा रहा था। कोई उसके पास नहीं। दूर-दूर तक कोई नहीं। भयानक तन्हाईयाँ हैं। और न पाँवों में जंजीरें हैं, न हाथों में बेड़ियाँ, न कोई पहरेदार है और न ही दीवारों का घेरा है; परन्तु मैं कैदी हूँ।

एक ऐसा कैदी जो न जी सकता है, न मर ही सकता है। वहाँ कोई पत्थर भी न था, जिससे मैं अपना सिर फोड़ लेता।

कहाँ थी मोहिनी ? कहाँ थी वह नन्ही-मुन्नी हसीनों-जमील और कहाँ थी विश्व की वह महान सुन्दरी जिसके दर्शन का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था ? उसकी अनगिनत बेशुमार शक्तियाँ अब कहाँ थीं ? वह आत्मायें कहाँ थीं, जो मोहिनी की गुलाम थीं ?कुछ भी न था। सिर्फ धुआँ था, मेरी जिंदगी का धुआँ।

जिस तरह कोई सुनहरा ख्वाब टूटता है, वैसा ही मेरे साथ हुआ था। मैं वास्तविक संसार में था और इसीलिए जिंदा था कि मुझे प्रायश्चित करना है, और यह प्रायश्चित मेरे जीवन में क्या-क्या रंग दिखायेगा, मैं न जानता था।

दिन छिप गया।रात आयी तो ठंडी हवाओं का जोर भी बढ़ गया। सूरज की गर्मी से मुझे दिन भर मौसम की सर्दी का आभास न हो पाया था; परन्तु रात होते ही मौसम की शीतलता ने मेरा बुरा हाल कर दिया।न बिछौना था, न ओढ़ना। दूर बहुत दूर बर्फ़ की बुलन्द चोटियों की सफेदी अब भी नजर आती थी। मैं ठंड से ठिठुरने लगा। रात बीतते-बीतते मेरा बुरा हाल हो गया। मेरे दाँत बज रहे थे। एक-दो बार झपकी सी आयी। फिर मैंने एकाध बार उस घेरे के गिर्द कुछ परछाईंयाँ मँडराते देखीं; परन्तु उसे मैं अपनी नजरों का धोखा ही समझता था। यह सफेद परछाईंयाँ थीं। धुंधली-धुंधली, जैसे कुहासे ने तस्वीरें बनायी हों। वह कुहासा भी हो सकता था क्योंकि सवेरा होने तक कुहासे की चादर तन गयी थी।

अब हर तरफ सफेद-सफेद कुहासा था। उस कुहासे के सिवा कुछ भी नजर नहीं आता था। एक बार मेरे दिमाग में आया कि अगर मेरे पाँव घेरे के पास पहुँचकर भारी हो जाते हैं तो क्यों न मैं रेंगकर उस घेरे को पार करूँ। और मैंने ऐसा किया भी, परन्तु तब भी वही हाल रहा। शरीर ही पत्थर बन गया। मैं काँपता थर्राता अपनी जगह बैठ गया। कोहरा तरह-तरह की तस्वीरें बनाकर गुड़-मुड़ हो रहा था। सूरज नहीं निकला था। मेरा ख्याल था कि सूरज की गर्मी से थोड़ी राहत पा लूँगा और दिन को थोड़ा चैन से सो सकूँगा। प्यास भी बड़ी शिद्दत से लग रही थी। परन्तु न तो सूरज निकला, न पानी मिला। भूखे पेट तो खैर मैं रह सकता था; परन्तु प्यास और ठंडक का मुकाबला करना बड़े धैर्य की बात थी।

कोहरे ने ठंड को और भी बर्फीला बनाकर रख दिया था।जब प्यास बहुत बढ़ गयी तो मैं पागलों की तरह इधर-उधर फिरने लगा। मैं जानता था कि मैं एक झील के पास हूँ, परन्तु वह झील अब मुझसे कोसों दूर थी। कितनी अजीब बात थी कि जिसके घर में गंगा बहे वह प्यासा रहे। फिर मुझे ध्यान आया कि कुहासे के कारण धरती कुछ नम हो चली है। वहाँ घास थी और शायद ही कोई इस बात पर यकीन करें कि मैं घास की नमी चाट-चाटकर प्यास बुझाने का प्रयत्न करने लगा। परन्तु यह नमी ऊँट के मुँह में जीरे जैसी बात थी। प्यास फिर भी न बुझी, परन्तु तनिक राहत सी मिल गयी। कुहासे के कारण अब कुछ भी दिखायी देना बन्द हो गया था।

वह दिन भी ठिठुरते बीता। अधिक थकान के कारण और जागती आँखों की पीड़ा ने सोने का बहाना बनाया। मैं घुटनों में सिर छिपाए सो गया। कितनी देर सोया यह तो पता नहीं; आँख तब खुली जब मैंने शरीर पर सर्द फुहार सी महसूस की।

मैं चौंककर उठ बैठा। बारिश! चूँकि मैं बहुत प्यासा था इसलिए उस वक्त मुझे बड़ी खुशी हुई कि कुदरत ने मेरी सुन ली थी। चाहे वह पानी वर्षा का ही था, परन्तु प्यास तो बुझ ही सकती थी। मैंने ऊपर मुँह उठाकर खोल दिया। थोड़ी देर तक तो पानी की बूँदें टपकती रहीं फिर अचानक जब मुझे कँपकँपी महसूस हुई तो ख्याल आया कि मैं भीग गया हूँ।

हे मेरे भगवान! अगर पानी यूँ ही सर्द फुहारों के साथ बरसता रहा तो मेरा क्या होगा ? जगदेव ने मुझे भयंकर यातना के घेरे में छोड़ दिया था! मैं चीखने लगा। कभी पागलों की तरह जगदेव को पुकारता तो कभी मोहिनी को; परन्तु कौन वहाँ मेरी सुनने वाला था ? फिर उस समय तो मेरी दहशत और भी बढ़ गयी जब बर्फबारी शुरू हुई।

घेरे से बाहर निकलने की मैंने एक आखिरी कोशिश की। हवा में छलांग लगाकर घेरा पार करना चाहा, परन्तु घेरे से बाहर निकलने से पूर्व ही किसी अदृश्य दीवार से टकराकर मैं पुनः अपनी कैदखाने की जमीन पर आ रहा।

अब मेरी हर उम्मीद टूट चुकी थी। डर मौत का नहीं था पर इस तरह तड़प-तड़प कर मरना मुझे गवारा न था। फिर थक-हार कर एक स्थिति ऐसी आयी जब मैं इस योग्य भी नहीं रहा कि अपनी जगह से हिल सकूँ।

मुझे मालूम नहीं था कि बर्फ का मौसम शुरू हो गया है; या यह बे-मौसम की बर्फबारी थी। बहरहाल बर्फ मुझ पर गिर रही थी और क्षण-प्रतिक्षण मैं उसमें फँसता चला जा रहा था। पहले मेरी कमर तक का भाग बर्फ में फँसकर दब गया। बदन पर भी किसी टीले की तरह बर्फ जमनी शुरू हो गयी। अब मैं शरीर का कोई भी अंग न हिला पा रहा था। मेरी आँखों के सामने सफेद अँधेरा फैलता जा रहा था। कब दिन हुआ, कब रात आयी, इसका आभास समाप्त हो चुका था। मेरी सोच भी आख़िर कब तक साथ देतीं ? उन्होंने भी मुझसे नाता तोड़ लिया। जाने कब तककितने अरसे तक मैं इँसान होकर बर्फ का बुत बना रहा।

या बर्फ के भीतर मेरी जिंदा कब्र बन गयी थी।

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जब मुझे होश आया तो मैंने अपने आपको नर्म बिस्तर पर पाया। मैंने धीरे-धीरे अपने अस्तित्व को जगाने की कोशिश की तो अपने आपको जीवित पाया। हैरत की बात तो यह थी कि मैं जीवित था। अब हकीकत भी मेरे सामने खुल गयी थी कि मैं इतनी आसान मौत मरने वाला न था। जीवन के अँधेरों में भटकने वाला एक प्राणी था, जिसकी कोई मंजिल नहीं थी।

समय ने कितने खेल दिखाए थे। हर बार मौत की आरजू मेरे दिल में रह जाती और अब मुझे यकीन हो गया था कि मौत और जिंदगी पर इँसान का कोई बस नहीं।

मैं कहाँ था ? यह जानना सबसे पहले जरूरी था। पहली ही नजर में देखने से पता चल गया कि यह कोई फौजी कैम्प है। जिस खेमे में मैं था वहाँ दो बेड पड़े थे। दूसरा बेड खाली था। रेडक्रॉस के चिह्न को देखते ही मुझे पता चल गया कि मिलिट्री रेडक्रॉस का खेमा है। जिस तरह की बोतलें बेड के सिरहाने वाले स्टैंड पर टंगी थीं उससे पता चलता था कि मुझे ग्लूकोज़ चढ़ाया गया है। हालाँकि मैं बहुत कमजोरी महसूस कर रहा था, परन्तु था पूरे होश- ओ-हवास में।

काफी देर तक मैं बिस्तर पर पड़ा रहा। अतीत की घटनाएँ मेरे जेहन पर आँधियाँ चलाती रहीं और मैं उन आँधियों को सहता रहा। एक-एक घटना मेरे सामने चलचित्र की तरह घूम गयी।

न जाने कितना वक्त उसी तरह पड़े-पड़े बीत गया। फिर मैंने आहट सुनी। खेमे का पर्दा हिला और एक चीनी अन्दर प्रविष्ट हुआ। उसकी सैनिक वर्दी पर रेडक्रॉस का चिह्न स्पष्ट नजर आया था।

उसने सिर को जुम्बिश देकर मुस्कुराते हुए मेरा अभिवादन किया। जवाब में मैं भी मुस्कुरा दिया। उसके बाद वह अंग्रेजी जुबान में बोला–“आपका स्वास्थ्य अब कैसा है ?”

उसके व्यवहार और भाषा में बड़ी शालीनता थी।

“मैं ठीक हूँ।” मैंने उत्तर दिया और पूछा। “लेकिन मैं कहाँ हूँ ?”

“चाइनीज मिलिट्री कैम्प में।” उसने मेरे पास आकर मेरा चेकअप शुरू कर दिया। ब्लड प्रेशर चेक किया। थर्मामीटर से बुख़ार नापा,नब्ज़ देखी, फिर इत्मिनान से स्टूल पर बैठ गया।

रिपोर्ट बुक में कुछ लिखने के बाद वह बोला–“अब कोई खतरे की बात नहीं। आश्चर्य की बात है कि कोई इँसान बीस रोज तक बर्फ की समाधि में भी जीवित रह सकता है! परन्तु तिब्बत में ऐसे करिश्मों की कमी भी नहीं। आप जैसे महान पुरुषों ने ही इस धरती की गरिमा बनाये रखी है। अगर मैं फौजी डॉक्टर न होता तो फिलॉस्फर बनता और आपके जीवन पर रिसर्च करता। फिर भी मैं यहाँ खुश हूँ। खासे तजुर्बे हासिल कर रहा हूँ।”

डॉक्टर एक नौजवान था और काफी खुशमिजाज था। वह मुझे कोई पहुँचा हुआ भिक्षु समझ रहा था।

“मेरा नाम ली संग है।” उसने अपना परिचय दिया। “और मेजर के रैंक पर हूँ। जिस सैनिक टुकड़ी ने आपको तलाश किया था, उसने आपको मृत घोषित किया था। वे इसलिए शव को उठाकर लाये थे क्योंकि वे परीक्षण के लिए आपको कोई नायाब वस्तु समझते थे। जिस जगह ज्वालामुखी फटा हो, जबरदस्त भूकम्प से पहाड़ियाँ ढह गयीं हों; जहाँ दूर-दूर तक जीवन शेष न रहा हो, वहाँ कोई भिक्षु बर्फ की समाधि में आसीन पाया जाए तो यकीनन वह एक नायाब खोज होती है। ऐसी हर चीज पीकिंग पहुँचाई जाती है। परन्तु जब आपको चेक करने का अवसर मिला तो मैंने देखा कि आपकी नब्ज और धड़कन तो बन्द थी परन्तु लहू में गर्मी थी। आपके शरीर का यह विरोधाभास बड़ा विचित्र था। मैंने ऐसे लोगों के बारे में सुना था जो धड़कन और नब्ज बन्द करके समाधि लगाकर महीनों तक जीवित रह सकते हैं। वे ऑक्सीजन के बिना जीवित रह सकते हैं। इसलिए मुझे यकीन हो गया कि आप जीवित हैं और किसी कारणवश आपको मूर्च्छा आ गयी है। और मुझे खुशी है कि मैंने अपनी बात को सफल कर दिखाया।”

चीनियों के बारे में जो मैंने भयानक कहानियाँ सुनी थीं, इस डॉक्टर ने मेरी सारी भ्रांतियाँ दूर कर दी।

“मेरे बारे में अब उनका क्या निर्णय होगा ?”

“शायद आपको पीकिंग के राजदरबार में सम्मानित किया जाए। निश्चित ही आप युद्ध बंदी तो हैं नहीं; न ही आपका सम्बंध तिब्बत के किसी बागी दल से है। और अगर उन्होंने युद्ध बंदी समझा तो मुझे बड़ा अफसोस होगा।”

“मुझे यहाँ कब तक रखा जायेगा ?”

“इसका फैसला कमांडिंग ऑफिसर करेगा, जो पाँच रोज बाद इस सप्ताह के अंत तक यहाँ पहुँच जायेंगे। उन्हें आपके बारे में सूचना दे दी गयी है और वह स्वयं आपसे मिलने यहाँ आ रहे हैं। इस युद्ध का ऑपरेशन उन्हीं के पास था...मेरा मतलब उस युद्ध से, जो तिब्बत के उस रहस्यमयी प्रदेश में लड़ा गया, जहाँ केवल आप अकेले जीवित बरामद हुए हैं।”

“तो क्या मेरी हैसियत यहाँ किसी कैदी के समान है ?”

वह कुछ खिसियानी हँसी हँसकर बोला–“लेकिन आपको किसी प्रकार का कष्ट नहीं होगा। कैदी वह होता है जिस पर निरंकुशता बरती जाती है। आप यहाँ आजादी से घूम फिर सकते हैं, परन्तु कैम्प की सीमा तक ही।”

“यह कैम्प किस जगह स्थापित है ?”

“गाप सोंग से आठ मील उत्तर में।”

मैंने फिर उससे कुछ नहीं पूछा। कुछ देर तक मुझसे बातें करने के उपरान्त वह चला गया।

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