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आधी रात बीत चुकी थी।
अचानक पहरेदार अन्दर आ गया। हम उस वक्त सोने की तैयारी कर रहे थे। उसे देखकर मैंने चौंककर गोरख को टहोका दिया।
“शायद तुम्हें बुलाने आया है।”
गोरख ने उससे पूछा–“क्या बात है ?”
“आप दोनों को रानी माता ने बुलाया है।”
“इस समय ?”
“जी हाँ, इसी समय और अभी।”
“यह भी कोई समय है मिलने का।” मैं बड़बड़ाकर उठ खड़ा हुआ।
गोरख भी फुर्ती के साथ तुरन्त ही तैयार हो गया और हम पहरेदार के साथ चल पड़े। हमारे आगे-आगे वह चल रहा था। मुझे हैरत इस बात की हुई थी कि वह हमें खेमों की तरफ ले जाने के बजाय पहाड़ी गुफाओं की तरफ ले जा रहा था। यहाँ तक कि हम एक ऐसी शमशान भूमि पर पहुँच गये जहाँ पर इँसानी शवों के पिंजर पड़े थे।
मोहिनी का ऐसे स्थान में जो अत्यंत भयंकर थे, दिलेरी के साथ घूमना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। आश्चर्य की बात तो यह थी कि उसने हमें यहाँ बुलाया क्यों था ?
हम जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे, इन पिंजरों की सँख्या भी बढ़ती जा रही थी। पिंजर ही पिंजर!
मुझे बड़ा खौफ महसूस हो रहा था। यह भयानक स्थान मैंने पहले कभी न देखा था। यूँ मालूम होता था जैसे पिंजर अभी खड़खड़ाते हुए उठकर खड़े हो जायेंगे और हमारी गर्दनें दबोच लेंगे।
उन इँसानी पिंजरों के बीच हमने अपने सरदारों के बीच घिरी मोहिनी को देखा, तो हमारे दिलों को कुछ शांति महसूस हुई।
“मोहिनी का ऐसे भयंकर स्थान पर रात में आने का क्या कारण है ?” मैंने उससे पूछा।
मोहिनी ने मेरी बात का कोई उत्तर नहीं दिया, बल्कि उसने अपना मुँह इँसानी पिंजरों की ओर किया। दोनों हाथ उनकी ओर फैलाकर कुछ श्लोक पढ़ने लगी।
उसके साथ ही हमारे आस-पास के अँधेरों में कुछ आवाजें आने लगीं। मैंने घूमकर देखा तो आश्चर्य और भय से मेरा बुरा हाल हो गया। क्योंकि हमारे चारों ओर इँसानी पिंजर और खोपड़ियाँ, हड्डियाँ अपने आप हिलने लगीं थीं। ऐसा लगा जैसे कोई मरी हुई सेना जीवित हो उठी हो।
उफ! मेरे ईश्वर यह सब कुछ क्या है ? इससे भयंकर दृश्य इँसान क्या देख सकता है! यह मोहिनी सचमुच बहुत बड़ी जादूगरनी है। उसके जादू की शक्ति से बचना बहुत कठिन है।
अचानक चौंका देने वाला हाल नजर आया। हड्डियों के ढाँचे खड़े हो गये थे और एकाएक वातावरण में रण हुंकारे गूँजने लगे। ये ढाँचे हमारे सैनिकों के साथ लड़ रहे थे।
दोनों ओर से युद्ध शुरू हो गया था और मेरी समझ में कुछ भी न आ रहा था कि यह हुआ क्या ? दोनों सेनाएँ एक-दूसरे पर टूट पड़ी थीं।
“देखो सरदार! इस व्यक्ति की पूरी रक्षा हो। इसे जरा सी भी चोट न लगने पाए।”
मैं चौंका। यह आवाज़ तो मोहिनी की न थी! बल्कि तराई की रियासत की महारानी की थी!
इसका अर्थ साफ था।
यह सब महारानी का फैलाया हुआ जाल था और उसने धोखे से हमें पकड़ लिया था।
❑❑❑
अचानक पहरेदार अन्दर आ गया। हम उस वक्त सोने की तैयारी कर रहे थे। उसे देखकर मैंने चौंककर गोरख को टहोका दिया।
“शायद तुम्हें बुलाने आया है।”
गोरख ने उससे पूछा–“क्या बात है ?”
“आप दोनों को रानी माता ने बुलाया है।”
“इस समय ?”
“जी हाँ, इसी समय और अभी।”
“यह भी कोई समय है मिलने का।” मैं बड़बड़ाकर उठ खड़ा हुआ।
गोरख भी फुर्ती के साथ तुरन्त ही तैयार हो गया और हम पहरेदार के साथ चल पड़े। हमारे आगे-आगे वह चल रहा था। मुझे हैरत इस बात की हुई थी कि वह हमें खेमों की तरफ ले जाने के बजाय पहाड़ी गुफाओं की तरफ ले जा रहा था। यहाँ तक कि हम एक ऐसी शमशान भूमि पर पहुँच गये जहाँ पर इँसानी शवों के पिंजर पड़े थे।
मोहिनी का ऐसे स्थान में जो अत्यंत भयंकर थे, दिलेरी के साथ घूमना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। आश्चर्य की बात तो यह थी कि उसने हमें यहाँ बुलाया क्यों था ?
हम जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे, इन पिंजरों की सँख्या भी बढ़ती जा रही थी। पिंजर ही पिंजर!
मुझे बड़ा खौफ महसूस हो रहा था। यह भयानक स्थान मैंने पहले कभी न देखा था। यूँ मालूम होता था जैसे पिंजर अभी खड़खड़ाते हुए उठकर खड़े हो जायेंगे और हमारी गर्दनें दबोच लेंगे।
उन इँसानी पिंजरों के बीच हमने अपने सरदारों के बीच घिरी मोहिनी को देखा, तो हमारे दिलों को कुछ शांति महसूस हुई।
“मोहिनी का ऐसे भयंकर स्थान पर रात में आने का क्या कारण है ?” मैंने उससे पूछा।
मोहिनी ने मेरी बात का कोई उत्तर नहीं दिया, बल्कि उसने अपना मुँह इँसानी पिंजरों की ओर किया। दोनों हाथ उनकी ओर फैलाकर कुछ श्लोक पढ़ने लगी।
उसके साथ ही हमारे आस-पास के अँधेरों में कुछ आवाजें आने लगीं। मैंने घूमकर देखा तो आश्चर्य और भय से मेरा बुरा हाल हो गया। क्योंकि हमारे चारों ओर इँसानी पिंजर और खोपड़ियाँ, हड्डियाँ अपने आप हिलने लगीं थीं। ऐसा लगा जैसे कोई मरी हुई सेना जीवित हो उठी हो।
उफ! मेरे ईश्वर यह सब कुछ क्या है ? इससे भयंकर दृश्य इँसान क्या देख सकता है! यह मोहिनी सचमुच बहुत बड़ी जादूगरनी है। उसके जादू की शक्ति से बचना बहुत कठिन है।
अचानक चौंका देने वाला हाल नजर आया। हड्डियों के ढाँचे खड़े हो गये थे और एकाएक वातावरण में रण हुंकारे गूँजने लगे। ये ढाँचे हमारे सैनिकों के साथ लड़ रहे थे।
दोनों ओर से युद्ध शुरू हो गया था और मेरी समझ में कुछ भी न आ रहा था कि यह हुआ क्या ? दोनों सेनाएँ एक-दूसरे पर टूट पड़ी थीं।
“देखो सरदार! इस व्यक्ति की पूरी रक्षा हो। इसे जरा सी भी चोट न लगने पाए।”
मैं चौंका। यह आवाज़ तो मोहिनी की न थी! बल्कि तराई की रियासत की महारानी की थी!
इसका अर्थ साफ था।
यह सब महारानी का फैलाया हुआ जाल था और उसने धोखे से हमें पकड़ लिया था।
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