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राजमहल।
शंकरगढ़ का सबसे आलीशान आवास होने के साथ-साथ इस बात का भी गवाह कि बीते हुए दौर में शंकरगढ़ एक सम्पन्न रजवाड़ा हुआ करता था, जिसके हुक्मरान राजमहल जैसे भव्य भवन में रहा करते थे। कई एकड़ में फैला राजमहल आज भी पांच सौ साल पुरानी वास्तुकला की भव्यता से लोगों को दांतों तले उंगली दबाने पर विवश करता था। राजमहल देश की उन ऐतिहासिक इमारतों में से एक था, जो मुस्लिम शासकों की बादशाहत से लेकर अंग्रेजों की गुलामी तक के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं। महल, प्राचीर से पांच सौ मीटर अन्दर स्थित था, जहां तक पहुंचने के लिये मुख्य व्दार से दो पक्की सड़कें विपरित दिशा में गयी हुई थीं, जिनके दोनों ओर अमरैन्थस की घनी क्यारियां थीं। महल के प्रांगण के ठीक मध्य में, लगभग पन्द्रह मीटर त्रिज्या के वृत्ताकार घेरे में मखमली और मुलायम घास उगायी गयी थी। उस घेरे की परिधि पर गेंदा, गुलाब, कुमुदनी इत्यादि भिन्न-भिन्न फूलों के पौधे बगैर किसी अन्तराल के लगाये गये थे, जिनमें उगने वाले भिन्न-भिन्न रंगों और अलग-अलग प्रजाति के फूल शोभायमान थे। उस वृत्ताकार घेरे के बीच में कमर पर घड़ा टिकाए हुए एक युवती की संगमरमर की मूर्ति थी। उसके घड़े से निकलने वाली पानी की पतली धारा को इस प्रकार समायोजित किया गया था कि थोड़ी उंचाई तक उठने के बाद धारा सीधे मैदान की परिधि पर लगाए गये फूलों के पौधों पर ही गिरती थी।
युवती की प्रतिमा विद्युत युक्ति के जरिये अपने स्थान पर घूर्णन भी कर सकती थी। इस युक्ति का सबसे बड़ा लाभ राजमहल के मालियों को होता था, क्योंकि उन्हें फूलों के पौधों को अलग से पानी नहीं देना पड़ता था, यह काम फब्बारे के रूप में घूर्णन करती युवती की बेजान प्रतिमा कर देती थी। रात के समय फूलों के पौधों तथा प्रतिमा की दोनों आंखों में पुतलियों के स्थान पर लगे सजावटी बल्बों की रोशनी स्वार्गिक सौन्दर्य का बोध कराती थी। संगमरमर की प्रतिमा के जूड़े से भी जल की धारा निकलती थी, जो घड़े से निकलने वाली धारा की अपेक्षाकृत अधिक मोटी थी। ये धारा वैकल्पिक थी, जिसे किसी विशेष आयोजन पर ही, जब फब्बारे को आकर्षण का प्रमुख केन्द्र बनाना आवश्यक होता था, तब छोड़ा जाता था।
मुख्य प्रवेश व्दार से विपरित दिशाओं में जाने वाली दोनों सड़कें, इसी फब्बारे वाले वृत्ताकार घेरे के दोनों ओर से होते हुए महल के मुख्य व्दार पर आकर मिल जाती थीं। राजमहल के प्रत्येक मंजिल के बरामदे में बैंगनी रंग के रेशमी लटक रहे थे, जिनके किनारों पर सितारे टंकी हुई सुनहरी पट्टियां लगी हुई थीं, ताकि सूरज की रोशनी में वे चमक सके। कम शब्दों में इतना ही कहना पर्याप्त था कि शंकरगढ़ का राजमहल ऐसे लोगों की तलाश का अंत था, जो इस आधुनिक युग में राजसी ठाठ देखने हेतु लालायित रहते हैं।
दिग्विजय ठाकुर।
शंकरगढ़ रियासत की बागडोर सम्भालने वाले वंश की वर्तमान पीढ़ी के अगुआ। वक्त के सदैव परिवर्तित होने के सर्वोत्तम गुण और भारत में लोकतंत्र के आगमन के बाद राजशाही प्रथा का अन्त भले ही हो गया था, किन्तु आजादी के सत्तर साल बाद भी शंकरगढ़ में दिग्विजय ठाकुर का वही रुतबा था, जो भारत में लोकतंत्र आने से पहले इनके पूर्वजों का हुआ करता था।
सत्ता के गलियारे में गहरी पैठ होने के कारण दिग्विजय ठाकुर आज भी अपने पूर्वजों की राजशाही प्रथा को जीवित रखने का ‘गौरवशाली’ कार्य कर रहे थे। हालांकि तीन भाइयों में सबसे बड़े दिग्विजय की गोद में ईश्वर ने संतान के रूप में केवल संस्कृति को ही डाला था, किन्तु अन्य दो भाइयों अरुणोदय और चन्द्रोदय के सन्दर्भ में ईश्वर ने ऐसा नहीं किया था और उन्हें संतान के रूप में लड़कों के सुख से नवाजा था। अरुणोदय और चन्द्रोदय, दोनों के ही एकलौते लड़के संस्कृति से छोटे थे और बोर्डिंग स्कूल में रहकर पढ़ाई कर रहे थे। कुल मिलाकर संस्कृति अगली पीढ़ी में सबसे उम्रदराज थी, जो आज पूरे दस साल बाद, ‘यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैम्ब्रिज’ के ट्रिनिट हॉल से मैथेमैटिक्स में ग्रेजुएट होकर शंकरगढ़ लौट रही थी।
राजमहल के प्रत्येक नौकर की सुबह से ही भागदौड़ जारी थी। दर्जन भर नौकरों में से शायद ही ऐसा कोई नौकर था, जिसने चैन से बैठकर कुछ देर तक आराम किया था। राजमहल के प्रांगण में सफेद तम्बू लगा हुआ था। जगह-जगह पर हवा के लिये मिनी कुलर्स और लोगों के बैठने के लिये वीआईपी चेयर्स के इन्तजाम थे। जमीन पर ईरानी कालीन बिछाये गये थे। पण्डाल में एक तरफ मंच भी बना हुआ था, जो धरातल से छः फीट ऊंचा था। चारों ओर ईत्र और गुलाब जल के छिड़काव के कारण वातावरण सुगन्ध से परिपूर्ण था। फब्बारा ऑन था। हर रोज दोपहर के वक्त कुम्हलाये रहने वाले फूल भी आज रोज की अपेक्षाकृत मुस्कुराते से लग रहे थे। प्रत्येक रोज भीषण गर्मी से झुलसने वाला राजमहल का प्रांगण आज लोगों की चहल-पहल से गुलजार था। मेहमानों का आगमन शुरू हो गया था, अत: लोगों की गर्दिश में भी धीरे-धीरे इजाफा होने लगा था। शाही पोशाक पहने हुए कुछ नौकर हाथ में ट्रे लिये हुए टहल रहे थे। दिग्विजय के खानदान अथवा रिश्ते से ताल्लुक रखने वाला हर शख्स केसरिया साफा बांधे हुए था, क्योंकि राजमहल के प्रत्येक समारोह में सिर पर केसरिया साफा बांधना उनके खानदानी उसूलों में से एक था।
अचानक गूंज उठी गाड़ी की आवाज ने पण्डाल में मौजूद सभी लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। सफेद इण्डिगो मेन गेट से अन्दर दाखिल हुई थी, और अब सड़क को रौंदते हुए तेजी से राजमहल के मुख्य व्दार की ओर बढ़ रही थी।
‘छोटी मालकिन आ गयीं...छोटी मालकिन आ गयीं।’
पण्डाल में मेहमानों का स्वागत कर रहे नौकर इण्डिगो को देखते ही खुशी से चिल्ला उठे। अन्य सदस्यों को सूचित करने के ध्येय से एक नौकर सारे काम छोड़कर अन्दर की ओर भाग खड़ा हुआ।
इण्डिगो महल के मुख्य व्दार पर रुकी। पहले ड्राइविंग डोर खोलकर बंशीधर बाहर आया। फिर उसने पिछला डोर खोलकर संस्कृति को बाहर आने का इशारा किया। अब-तक राजमहल की महिलाओं के साथ-साथ संस्कृति के पिता दिग्विजय और उसके दोनों चाचा भी बाहर आ चुके थे। सबसे आगे संस्कृति की मां सुजाता थीं, उनके हाथ में पूजा की थाली थी।
गाड़ी से बाहर आते ही संस्कृति दौड़ कर दिग्विजय से जा चिपकी।
“मिस्ड यू अ लॉट डैडी।”
संस्कृति ने दिग्विजय के ऊपर चुम्बनों की बौछार कर दी। बाप-बेटी का प्यार देख पण्डाल में उपस्थित सभी मेहमानों के होठों पर मुस्कान रेंग गयी। कुछ देर तक दिग्विजय के साथ प्रेमालाप करने के बाद संस्कृति अपने दोनो चाचाओं और छोटी मांओं से भी उतने ही उत्साह से रूबरू हुई, जितने उत्साह से दिग्विजय से रूबरू हुई थी। अंतत: वह सुजाता की ओर मुड़ी।
“फाइनली...इट्स योर टाइम मम्मम।”
“सबसे अन्त में हमारी याद आई तुम्हें?” सुजाता ने शिकायती स्वर में कहा।
संस्कृति, सुजाता के गले लगने को आतुर हुई, किन्तु उनके हाथ में पूजा की थाली होने के कारण ठहर गयी।
“ये क्या मम्मी? आते ही पूजा की थाली?”
“पूरे दस साल बाद हमारी लक्ष्मी घर लौटी है। बिना आरती के घर में प्रवेश करेगी तो इसे अशुभ माना जाएगा।”
“एक्सक्यूज मी मम्मी।” संस्कृति चिढ़ कर बोली- “आई एम संस्कृति, नॉट लक्ष्मी।”
सुजाता बगैर कुछ बोले थाली में रखा कपूर जलाने लगी।
“ये क्या जला रही हो मम्मी?”
“कपूर जला रही हूं, आरती के लिये। दस साल के लिये विलायत क्या चली गयी, सारे कायदे ही भूल गयी?”
“नो मम्मी। प्लीज।” संस्कृति ने झपटकर सुजाता के हाथ से थाली छिनते हुए कहा- “प्लीज ये आरती वाला आइडिया ड्रॉप कर दीजिए। आप तो जानती ही हैं कि मुझे बचपन से ही आग से डर लगता है।”
शंकरगढ़ का सबसे आलीशान आवास होने के साथ-साथ इस बात का भी गवाह कि बीते हुए दौर में शंकरगढ़ एक सम्पन्न रजवाड़ा हुआ करता था, जिसके हुक्मरान राजमहल जैसे भव्य भवन में रहा करते थे। कई एकड़ में फैला राजमहल आज भी पांच सौ साल पुरानी वास्तुकला की भव्यता से लोगों को दांतों तले उंगली दबाने पर विवश करता था। राजमहल देश की उन ऐतिहासिक इमारतों में से एक था, जो मुस्लिम शासकों की बादशाहत से लेकर अंग्रेजों की गुलामी तक के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं। महल, प्राचीर से पांच सौ मीटर अन्दर स्थित था, जहां तक पहुंचने के लिये मुख्य व्दार से दो पक्की सड़कें विपरित दिशा में गयी हुई थीं, जिनके दोनों ओर अमरैन्थस की घनी क्यारियां थीं। महल के प्रांगण के ठीक मध्य में, लगभग पन्द्रह मीटर त्रिज्या के वृत्ताकार घेरे में मखमली और मुलायम घास उगायी गयी थी। उस घेरे की परिधि पर गेंदा, गुलाब, कुमुदनी इत्यादि भिन्न-भिन्न फूलों के पौधे बगैर किसी अन्तराल के लगाये गये थे, जिनमें उगने वाले भिन्न-भिन्न रंगों और अलग-अलग प्रजाति के फूल शोभायमान थे। उस वृत्ताकार घेरे के बीच में कमर पर घड़ा टिकाए हुए एक युवती की संगमरमर की मूर्ति थी। उसके घड़े से निकलने वाली पानी की पतली धारा को इस प्रकार समायोजित किया गया था कि थोड़ी उंचाई तक उठने के बाद धारा सीधे मैदान की परिधि पर लगाए गये फूलों के पौधों पर ही गिरती थी।
युवती की प्रतिमा विद्युत युक्ति के जरिये अपने स्थान पर घूर्णन भी कर सकती थी। इस युक्ति का सबसे बड़ा लाभ राजमहल के मालियों को होता था, क्योंकि उन्हें फूलों के पौधों को अलग से पानी नहीं देना पड़ता था, यह काम फब्बारे के रूप में घूर्णन करती युवती की बेजान प्रतिमा कर देती थी। रात के समय फूलों के पौधों तथा प्रतिमा की दोनों आंखों में पुतलियों के स्थान पर लगे सजावटी बल्बों की रोशनी स्वार्गिक सौन्दर्य का बोध कराती थी। संगमरमर की प्रतिमा के जूड़े से भी जल की धारा निकलती थी, जो घड़े से निकलने वाली धारा की अपेक्षाकृत अधिक मोटी थी। ये धारा वैकल्पिक थी, जिसे किसी विशेष आयोजन पर ही, जब फब्बारे को आकर्षण का प्रमुख केन्द्र बनाना आवश्यक होता था, तब छोड़ा जाता था।
मुख्य प्रवेश व्दार से विपरित दिशाओं में जाने वाली दोनों सड़कें, इसी फब्बारे वाले वृत्ताकार घेरे के दोनों ओर से होते हुए महल के मुख्य व्दार पर आकर मिल जाती थीं। राजमहल के प्रत्येक मंजिल के बरामदे में बैंगनी रंग के रेशमी लटक रहे थे, जिनके किनारों पर सितारे टंकी हुई सुनहरी पट्टियां लगी हुई थीं, ताकि सूरज की रोशनी में वे चमक सके। कम शब्दों में इतना ही कहना पर्याप्त था कि शंकरगढ़ का राजमहल ऐसे लोगों की तलाश का अंत था, जो इस आधुनिक युग में राजसी ठाठ देखने हेतु लालायित रहते हैं।
दिग्विजय ठाकुर।
शंकरगढ़ रियासत की बागडोर सम्भालने वाले वंश की वर्तमान पीढ़ी के अगुआ। वक्त के सदैव परिवर्तित होने के सर्वोत्तम गुण और भारत में लोकतंत्र के आगमन के बाद राजशाही प्रथा का अन्त भले ही हो गया था, किन्तु आजादी के सत्तर साल बाद भी शंकरगढ़ में दिग्विजय ठाकुर का वही रुतबा था, जो भारत में लोकतंत्र आने से पहले इनके पूर्वजों का हुआ करता था।
सत्ता के गलियारे में गहरी पैठ होने के कारण दिग्विजय ठाकुर आज भी अपने पूर्वजों की राजशाही प्रथा को जीवित रखने का ‘गौरवशाली’ कार्य कर रहे थे। हालांकि तीन भाइयों में सबसे बड़े दिग्विजय की गोद में ईश्वर ने संतान के रूप में केवल संस्कृति को ही डाला था, किन्तु अन्य दो भाइयों अरुणोदय और चन्द्रोदय के सन्दर्भ में ईश्वर ने ऐसा नहीं किया था और उन्हें संतान के रूप में लड़कों के सुख से नवाजा था। अरुणोदय और चन्द्रोदय, दोनों के ही एकलौते लड़के संस्कृति से छोटे थे और बोर्डिंग स्कूल में रहकर पढ़ाई कर रहे थे। कुल मिलाकर संस्कृति अगली पीढ़ी में सबसे उम्रदराज थी, जो आज पूरे दस साल बाद, ‘यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैम्ब्रिज’ के ट्रिनिट हॉल से मैथेमैटिक्स में ग्रेजुएट होकर शंकरगढ़ लौट रही थी।
राजमहल के प्रत्येक नौकर की सुबह से ही भागदौड़ जारी थी। दर्जन भर नौकरों में से शायद ही ऐसा कोई नौकर था, जिसने चैन से बैठकर कुछ देर तक आराम किया था। राजमहल के प्रांगण में सफेद तम्बू लगा हुआ था। जगह-जगह पर हवा के लिये मिनी कुलर्स और लोगों के बैठने के लिये वीआईपी चेयर्स के इन्तजाम थे। जमीन पर ईरानी कालीन बिछाये गये थे। पण्डाल में एक तरफ मंच भी बना हुआ था, जो धरातल से छः फीट ऊंचा था। चारों ओर ईत्र और गुलाब जल के छिड़काव के कारण वातावरण सुगन्ध से परिपूर्ण था। फब्बारा ऑन था। हर रोज दोपहर के वक्त कुम्हलाये रहने वाले फूल भी आज रोज की अपेक्षाकृत मुस्कुराते से लग रहे थे। प्रत्येक रोज भीषण गर्मी से झुलसने वाला राजमहल का प्रांगण आज लोगों की चहल-पहल से गुलजार था। मेहमानों का आगमन शुरू हो गया था, अत: लोगों की गर्दिश में भी धीरे-धीरे इजाफा होने लगा था। शाही पोशाक पहने हुए कुछ नौकर हाथ में ट्रे लिये हुए टहल रहे थे। दिग्विजय के खानदान अथवा रिश्ते से ताल्लुक रखने वाला हर शख्स केसरिया साफा बांधे हुए था, क्योंकि राजमहल के प्रत्येक समारोह में सिर पर केसरिया साफा बांधना उनके खानदानी उसूलों में से एक था।
अचानक गूंज उठी गाड़ी की आवाज ने पण्डाल में मौजूद सभी लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। सफेद इण्डिगो मेन गेट से अन्दर दाखिल हुई थी, और अब सड़क को रौंदते हुए तेजी से राजमहल के मुख्य व्दार की ओर बढ़ रही थी।
‘छोटी मालकिन आ गयीं...छोटी मालकिन आ गयीं।’
पण्डाल में मेहमानों का स्वागत कर रहे नौकर इण्डिगो को देखते ही खुशी से चिल्ला उठे। अन्य सदस्यों को सूचित करने के ध्येय से एक नौकर सारे काम छोड़कर अन्दर की ओर भाग खड़ा हुआ।
इण्डिगो महल के मुख्य व्दार पर रुकी। पहले ड्राइविंग डोर खोलकर बंशीधर बाहर आया। फिर उसने पिछला डोर खोलकर संस्कृति को बाहर आने का इशारा किया। अब-तक राजमहल की महिलाओं के साथ-साथ संस्कृति के पिता दिग्विजय और उसके दोनों चाचा भी बाहर आ चुके थे। सबसे आगे संस्कृति की मां सुजाता थीं, उनके हाथ में पूजा की थाली थी।
गाड़ी से बाहर आते ही संस्कृति दौड़ कर दिग्विजय से जा चिपकी।
“मिस्ड यू अ लॉट डैडी।”
संस्कृति ने दिग्विजय के ऊपर चुम्बनों की बौछार कर दी। बाप-बेटी का प्यार देख पण्डाल में उपस्थित सभी मेहमानों के होठों पर मुस्कान रेंग गयी। कुछ देर तक दिग्विजय के साथ प्रेमालाप करने के बाद संस्कृति अपने दोनो चाचाओं और छोटी मांओं से भी उतने ही उत्साह से रूबरू हुई, जितने उत्साह से दिग्विजय से रूबरू हुई थी। अंतत: वह सुजाता की ओर मुड़ी।
“फाइनली...इट्स योर टाइम मम्मम।”
“सबसे अन्त में हमारी याद आई तुम्हें?” सुजाता ने शिकायती स्वर में कहा।
संस्कृति, सुजाता के गले लगने को आतुर हुई, किन्तु उनके हाथ में पूजा की थाली होने के कारण ठहर गयी।
“ये क्या मम्मी? आते ही पूजा की थाली?”
“पूरे दस साल बाद हमारी लक्ष्मी घर लौटी है। बिना आरती के घर में प्रवेश करेगी तो इसे अशुभ माना जाएगा।”
“एक्सक्यूज मी मम्मी।” संस्कृति चिढ़ कर बोली- “आई एम संस्कृति, नॉट लक्ष्मी।”
सुजाता बगैर कुछ बोले थाली में रखा कपूर जलाने लगी।
“ये क्या जला रही हो मम्मी?”
“कपूर जला रही हूं, आरती के लिये। दस साल के लिये विलायत क्या चली गयी, सारे कायदे ही भूल गयी?”
“नो मम्मी। प्लीज।” संस्कृति ने झपटकर सुजाता के हाथ से थाली छिनते हुए कहा- “प्लीज ये आरती वाला आइडिया ड्रॉप कर दीजिए। आप तो जानती ही हैं कि मुझे बचपन से ही आग से डर लगता है।”