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Horror ख़ौफ़

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वह आदमी बुरी तरह हांफ रहा था। गली के एक मोड़ पर ठहरकर उसने पीछे देखा। गली सुनसान थी, अतः सुनसान ही नजर आयी। पीछे पसरे सन्नाटे को देख उसने राहत की सांस ली और एक दीवार की टेक लेकर पंजों के बल बैठ गया। ‘जिन लोगों व्दारा उसका पीछा किया जा रहा था, वे गलियों की भुलभलैया में उलझ गये।’ इस ख्याल ने उसके पकडे जाने की प्रबल संभावना को धराशायी कर दिया। उसका सीना तेजी से ‘फुल-पिचक’ रहा था। दौड़ने के कारण पसलियों के पास वाले हिस्से में होने वाले दर्द के समाप्त होने तक उसने यथास्थान पर ही बैठ कर सुस्ताने का निर्णय लिया और आंखें बन्द कर ली। उसके जिस्म पर मौजूद कपड़े इस श्रेणी के नहीं थे कि उसे भगौड़ा या लुच्चा समझा जा सकता, किन्तु उसकी वर्तमान अवस्था इंगित कर रही थी कि वह तीन किलोमीटर से कम की दौड़ लगा कर नहीं आया था। झुग्गी-झोपडियों से भरी गली ये बताने के लिये पर्याप्त थी कि वह शहर का ‘स्लम’ एरिया था। गली में कोई आदमजात नजर आ नहीं आ रहा था। एक-दो कुत्ते जगह-जगह पर जमा गन्दगियों पर मुंह मारते हुए जरूर नजर आ रहे थे।

“वह आदमी इसी तरफ आया था यश।”

गली के सन्नाटे में उपरोक्त वाक्य के गूंजते ही खौफ की एक सर्द लहर आदमी के जिस्म में सरगोशी करती चली गयी। उसने आंखें खोली, और खुद को दीवार से चिपकाए हुए पीछे देखा। गली के जिस मोड़ पर इस वक्त वह था, उसके ठीक पहले वाले मोड़ पर दो आदमी नजर आ रहे थे। उनमें से एक सामान्य था, जबकि दूसरे की शारीरिक भाषा ऐसी थी, जैसे उसे ये संसार नया लग रहा हो। मोड़ पर आकर उनके ठिठक जाने की वजह ये थी कि उसी मोड़ से एक अन्य गली दूसरी दिशा में गयी थी। कदाचित वे इस इस सवाल में उलझ गये थे कि भागने वाला शख्स किस गली में गया होगा? जिस मोड़ पर वे दोनों थे, आदमी उसके ठीक बाद आने वाले मोड़ पर ही छिपा हुआ था। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि वे दोनों आपस में कुछ विचार करने के बाद उस गली में घुस गये, जो इस मोड़ के विपरित दिशा में गयी थी। ये चमत्कार होते ही भगौड़े ने चैन की सांस ली, किन्तु वह समझ चुका था कि बगैर गंतव्य तक पहुंचे ही ठहर जाना खतरे से खाली नहीं था, इसलिये वह उठा और अपनी मंजिल की ओर बढ़ चला। हालांकि वह दौड़ नहीं रहा था किन्तु उसके चाल की तेजी असाधारण थी।

करीब दस मिनट बाद वह एक झुग्गी के सामने पहुंचकर ठहरा। उसकी हालत अब पचहत्तर फीसदी सामान्य हो चुकी था। जिस झुग्गी के सामने पहुंचकर वह ठहरा था, वह भी गली के अन्य झुग्गियों जैसा ही था, यानी कि टिन की सीलिंग और पैरों का एक मजबूत प्रहार तक झेल पाने में अक्षम लकड़ी का दरवाजा।

ताला खोलने के ध्येय से आदमी ने जेब से चाबी निकाला तो जरूर लेकिन उस वक्त बुरी तरह उछल पड़ा जब पाया कि दरवाजे पर कोई ताला नहीं लटक रहा था। तात्पर्य ये था कि कोई उससे पहले ही अन्दर दाखिल हो चुका था। तेजी से धड़कते दिल के साथ उसने दरवाजा भीतर की ओर धकेला और अन्दर प्रविष्ट हुआ। अन्दर वही था, जिसके होने का अनुमान उसने उसी समय लगा लिया था, जब दरवाजे का ताला खुला हुआ पाया था।

“अरुणा दादी आप? इस समय?”

उस औरत की उम्र पचास वर्ष से अधिक थी, रंग निहायत ही गोरा था। बदन पर काले रंग की प्लेन साड़ी और दोनों भौहों के ठीक बीच में पचास पैसे के सिक्के के आकार वाली लाल रंग की साधारण सी बिन्दी थी। मांग सूनी थी। लम्बे काले और अधपके केश खुले हुए थे, जो पीछे कमर तक लटक रहे थे। गले में बड़े-बड़े मनकों वाली माला थी। आंखें सामान्य से अधिक आकार वालीं और काजल से परिपूर्ण थीं। देखने वाला पल भर में ही अनुमान लगा सकता था कि उसने काजल आंखों की खूबसूरती बढ़ाने के ध्येय से नहीं, अपितु उन्हें भयानक बनाने के ध्येय से लगाया था। वह दरवाजे के ठीक सामने पड़ने वाली दीवार से सटाकर रखी गयी लकड़ी की कुर्सी पर बैठी हुई थी। एक पैर को जमीन पर टिकाए हुई थी, जबकि दूसरे को घुटने से मोड़कर कुर्सी पर ही रखे हुए थी। उसके बाएं हाथ में एक लाठी थी, जिसका ऊपरी सिरा चमगादड़ की मुखाकृति वाला था। दाहिने हाथ में एक लंबा चाकू था, जिसके चमचमाते फल में वह अपना अक्स निहार रही थी। चेहरे पर व्याप्त भयानक क्रोध और असमान्य ढंग से काजल किये हुए आंखों के कारण उसका गोरा चेहरा डरावना हो उठा था। लगातार पान चबाने की आदी होने के कारण उसके होठों की सुर्खी कई गुना बढ़ी हुई थी। आदमी का सम्बोधन सुनकर ‘अरुणा दादी’ नामधारी उस भयानक औरत की दृष्टि सामने की ओर उठी।

“अ....आप...इस वक्त...?” आदमी हकला उठा।

“एक चाकू खरिदा है हमने।” अरुणा ने चाकू के फल पर अपनी उंगलियां फिराते हुए भयानक अंदाज में कहा- “हम इसके धार की जांच करना चाहते थे, इसीलिए यहां चले आए।”

“म....म....मैं....स....म....झा नहीं अरुणा दा....दी।” आदमी का हलक सूख गया।

चाकू के फल पर उंगलियां फिराने के कारण उनसे बह निकले खून को चाटते हुए अरुणा ने पूर्ववत् भयानक अंदाज में कहा- “कपाट बन्द करके हमारे पास आओ। ढंग से समझा देते हैं।”

आदमी शायद अरुणा का अंदाज देख कर भावी घटना की कल्पना कर चुका था। कपाट बन्द करके उसकी ओर बढ़ते हुए आदमी की टांगें कांपी। लम्बी दौड़ के बाद शक्ति क्षीण होने में जो कसर बाकी रह गयी थी, उसे अरुणा के खौफ ने पूरा कर दिया। आदमी के पीले चेहरे और कांपते बदन को देख ऐसा लगा मानो वह पचास वर्षीय किसी औरत की ओर नहीं, बल्कि अपनी मौत की ओर बढ़ रहा था।

“ज....जी अरुणा द...दा...दी।” अरुणा के सम्मुख पहुंचकर उसने थूक सटका।

“घुटनों पर बैठ जाओ।”

आदमी ने आदेश का पालन किया। अरुणा ने चाकू के फलक में फिर से अपना अक्स देखा, तत्पश्चात उसे आंखों के नजदीक ले जाकर धार की तीक्ष्णता को परखा और अगले ही पल आदमी के गले पर लाल रंग की पतली रेखा खींच गयी। एक सेकेण्ड से भी कम समय लगा उस आदमी को बेजान मुर्दे में तब्दील होने की राह पर अग्रसर होने में। उसके होंठों में कम्पन हुआ, किन्तु वह कम्पन को वाक्य में तब्दील कर सके, इसके लिये आवश्यक सामर्थ्य खो चुका था। पलकें खोले रखने का प्रयास किया किन्तु उसे ऐसा महसूस हुआ मानो पलकों पर मन भर वजनी पत्थर रख दिया गया हो। आदमी का बेजान जिस्म जमीन पर गिरता, इससे पहले ही अरुणा ने उसके लम्बे बालों को अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया। जिस्म जमीन पर गिरने के बजाय लहराकर रह गया। बन्द हो चुकी पलकों का कम्पन बता रहा था कि वह प्राणोत्सर्जन के अंतिम चरण में था।

“क्यों...?” अरुणा ने अधमरे आदमी के चेहरे पर इस कदर दृष्टिपात किया मानो वह जीवित हो। उसकी भावभंगिमाओं में तेजी से परिवर्तन हुआ। काजलयुक्त भयानक आंखों में लहू उतर आया। उसने इस कदर दांत पीसे मानो लफ्जों को उगलने से पहले चबाना चाहती हो- “क्यों तूने बेवकूफी कर दी भीमा? झुग्गी में रहने वाले तुझ जैसे दरिद्र को कैम्ब्रिज की चमक-धमक से रूबरू कराया हमने, क्या इसीलिये कि तू यश नाम के छोकरे की हत्या में विफल हो जाए? तेरी पहली खता को माफ करते हुए तुझे यश को ठिकाने लगाने के लिये यहां हिन्दुस्तान में दूसरा मौका दिया, क्या इसीलिये ताकि इस बार तू विफल होने के साथ-साथ उन दोनों को अपने ठिकाने का भी पता बता दे? नहीं भीमा, हमें तुझसे बहुत उम्मीदे थीं। हमारे पूर्वज राजमहल के तहखाने में कैद जिस अभिशाप के उपासक थे, उस अभिशाप को हम एक बार फिर राजमहल पर जलजला बनकर टूटते हुए देखना चाहते हैं, और इस काम में हमने तुझे सहयोगी के रूप में चुना था, लेकिन तू.....तू हमारा सहयोगी कहलाने की एक भी कसौटी पर खरा नहीं उतर पाया। कैम्ब्रिज में यश पर सार्वजनिक स्थल पर हमला करने की गलती करके तूने अपनी मूर्खता का पहला परिचय दिया, और फिर यहां हिन्दुस्तान में उसी गलती को दोहरा कर तूने अपनी मौत के फरमान पर दस्तखत कर दिये। तेरा अंजाम यही होना था, और हो भी गया।”

अरुणा ने भीमा का बाल छोड़ दिया, और उसका जिस्म कटे वृक्ष की मानिंद लहराकर जमीन पर गिर पड़ा। इसके बाद उसने चाकू पर लगा खून साड़ी में पोछा और उसकी नोक को भीमा के लहू में डूबोकर जमीन पर कुछ लिखने लगी।

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“हमलावर इसी गली में आया था। अब कहाँ गायब हो गया?” गली को सुनसान पाकर साहिल परेशान लहजे में बोला।

“व...वह था कौन?”

“शायद वही, जिसने तुम पर कैंब्रिज में हमला किया था।” साहिल यश की ओर मुड़ा- “मैंने तुमसे पहले ही कहा था यश कि कोई जरूर है, जो तुम्हारी जिन्दगी से ग्रहण की तरह जुड़ चुका है।”

“लेकिन क्यों? मैं किसी अज्ञात हत्यारे के निशाने पर आ गया हूँ, इसकी क्या वजह हो सकती है?”

“उस वजह को ही तो तलाशना है यश।”

“मुझे लगता है हम गलत दिशा में आ गये हैं भइया।”

साहिल चौंका। कई दिनों बाद यश के मुंह से खुद के लिए ‘भइया’ शब्द सुन उसके चेहरे पर हर्ष के भाव आने को उद्यत हुए किन्तु उससे पहले ही पीछे से एक आवाज आयी- “किसी की तलाश है तुम दोनों को?”

दोनों लगभग एक साथ पीछे पलटे। पीछे अधेड़ उम्र की एक महिला थी, जिसके हाव-भाव सामान्य होने के बाद भी रहस्यमयी लग रहे थे। उसके हाथ में एक लाठी थी। लाठी के जिस सिरे को उसने थाम रखा था वह चमगादड़ की मुखाकृति वाला था। वह यश को ऐसे घूर रही थी, जैसे कोई डायन अपने शिकार को घूरती है।

“ह....हाँ...! लेकिन आप को कैसे पता?”

“गलत दिशा में आ गये हो तुम दोनों। भगौड़ा इसके विपरीत दिशा में भागा था, यानी कि इस गली के ठीक सामने वाली गली में।”

‘उन्हें इस महिला की बातों पर विश्वास करना चाहिए या नहीं?’ इस सवाल का जवाब पाने की उम्मीद में साहिल ने यश की ओर देखा। महिला, साहिल की दुविधा भांप गयी। उसने कहा- “मैं उसी गली से होकर आ रही हूँ। थोड़ी देर पहले एक आदमी को बदहवास सा भागते हुए देखा था। यहाँ तुम दोनों को देखा तो मुझे लगा कि वह आदमी तुम्हीं लोगों से बच कर भाग रहा था।”

“क्या आप जानती है कि वह किस तरफ गया?”

“उसकी झोपड़ी इसी गली में है। जाहिर है कि अपनी झोपड़ी में ही गया होगा।” कहते समय महिला की आँखों में एक तीक्ष्ण चमक उभरी, किन्तु साहिल और यश, दोनों में से किसी ने इस बात पर गौर नहीं किया।

“क्या....क्या अप हमें उसकी झोपड़ी तक पहुंचा सकती हैं?”

“सामने वाली गली में नाक की सीध में दो सौ कदम जाने पर जिस झोपड़ी के

दरवाजे खुले हुए मिलेंगे वही उसकी झोपड़ी होगी।”

कहने के बाद वह महिला विचित्र अंदाज में मुस्कुराई और आगे बढ़ गयी। साहिल को अब उस महिला में कोई रूचि नहीं रह गयी थी, वह यश की ओर पलटा- “अगर वह आदमी हमारे हाथ लग गया तो कोई खुलासा जरूर कर सकता है।”

यश भी रोमांचित हो उठा था। अपनी पिछली जिन्दगी पर पड़े धूल के आवरण हटाने के लिए वह भी उद्वेलित था, इसलिए बिना किसी वाद-प्रतिवाद के साहिल के पीछे दौड़ पड़ा। जल्द ही वे महिला के कहे अनुसार खुले हुए दरवाजे के झोपड़ी के सामने खड़े थे।

“शायद वह औरत इसी झोपड़ी की बात कर रही थी।”

साहिल ने यश को यथा-स्थान खड़े रहने का संकेत किया और खुद झोपड़ी की चौखट पर कदम रखा, किन्तु अन्दर झांकते ही बुरी तरह चौंक पड़ा।

“क...क्या...ह...हुआ?” यश का सशंकित लहजा।

“लाश....अन्दर एक आदमी की लाश है।”

“व्हाट...?” यश भी लपककर उसी स्थान पर पहुंचा जहाँ साहिल खड़ा था।

अन्दर वास्तव में आदमी की लाश थी। वह औंधे मुंह पड़ा हुआ था। गर्दन के नीचे से खून बहकर जमीन पर फ़ैल रहा था। जिस स्थिति में लाश जमीन पर पड़ी हुई थी, उस स्थिति में बाहर से यह नहीं ज्ञात हो सकता था कि उसके गर्दन पर चाकू फेरा गया था।

“अब हमें क्या करना चाहिए?” यश ने पूछा।

साहिल ने आस-पास देखा। गली में सन्नाटा फैला हुआ था। सिवाय उन दोनों के और कोई आदमजात नजर नहीं आ रहा था। साहिल के जेहन में कोई विचार तेजी से पनपा। उसने यश की कलाई पकड़ी और उसे साथ लिये हुए बिजली की तेजी से झोपड़ी के अन्दर प्रविष्ट होने के बाद कपाट अन्दर से बंद कर लिया। यश कुछ पूछता, इससे पहले ही वह बोल पड़ा- “इस हत्या की खबर फैले और यहाँ पुलिस आ जाए, इससे पहले ही हमें इस जगह की तलाशी लेनी होगी। इस आदमी के बारे में कुछ पता चल सकता है।”

वे दोनों लाश के पास पहुंचे। साहिल ने लाश को पहचान लिया, किन्तु इसके साथ ही उसकी आँखें हैरत और अविश्वास के कारण फैल गयीं। वह लाश उसी हमलावर की थी। उसकी गर्दन पर चाकू फेर कर नसों को काट दिया गया था। गर्दन से बहने वाला खून जमीन पर फैल रहा था। झोपड़ी को देखकर मरने वाले हमलावर की आर्थिक स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता था। सरसरी दृष्टि से माहौल का जायजा लेने के बाद साहिल के जेहन में दो सवाल कौंधे। पहला- इसके पास रिवाल्वर कहाँ से आया? दूसरा-यदि इसी ने यश पर कैंब्रिज में हमला किया था, तो फिर अति निम्न हैसियत वाला आदमी कैंब्रिज कैसे पहुंच गया था? आदमी देखने भर से सुपारी किलर नहीं कहा जा सकता था। इन सबके अलावा साहिल की हैरत का सबसे बड़ा कारण जमीन पर खून से लिखा हुआ वह वाक्य था, जिसके अधिकांश अक्षर खून के बहाव के कारण बिगड़ गये थे, किन्तु फिर भी लिखा हुआ अच्छी तरह समझ में आ रहा था।

‘माया आ चुकी है। श्मशानेश्वर भी आयेंगे। वह मरेगा जो दाहिनी कलाई पर स्वास्तिक-चिह्न के साथ जन्मा है।’

साहिल ने यश की ओर देखा, जो सहमा हुआ था। वह लपककर उसके पास पहुंचा और उसकी दाहिनी कलाई पर नजर डाली। वहां जो जन्मजात निशान नजर आ रहा था, वह काफी हद तक स्वास्तिक से मिल रहा था। साहिल जानता था कि यश की कलाई पर ये निशान उसके जन्म से ही है, किन्तु इससे पहले न तो उसने, और न परिवार के किसी अन्य सदस्य ने उस निशान की पहचान स्वास्तिक के रूप में की थी।

‘तो क्या यह स्वास्तिक ही मेरे भाई पर दो बार हुए जानलेवा हमलों का कारण है? क्या कोई केवल इसलिए यश को मारना चाहता है, क्योंकि वह दाहिनी कलाई पर स्वास्तिक-चिह्न के साथ जन्मा है? कौन हो सकता है वह?’

अब-तक यश भी खून से लिखे वाक्य को पढ़ चुका था, और साहिल की व्यग्रता का करण भी समझ चुका था।

“स्वास्तिक-चिह्न मेरी ही दाहिनी कलाई पर है। तो...तो क्या मैं भी मरने वाला हूँ?”

“नहीं।” साहिल उत्तेजित हो उठा- “मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा। मौत तुम्हारी परछाईं तक को नहीं छू सकती है। अब मुझे लगने लगा है कि तुम्हारे याद्दाश्त के जाने का तुम्हारे ऊपर हुए हमलों से कोई सम्बन्ध नहीं है। हमलावर तुम्हें मारना चाहता था। उसने तुम्हें मारने के लिए तुम पर गोली चलाई थी, न कि तुमसे तुम्हारी पहचान छिनने के लिए।”

“तो फिर मेरी याद्दाश्त कैसे गयी? मुझे याद क्यों नहीं आ रहा है कि मेरे साथ क्या हुआ था?” यश झुंझला उठा। उसकी झुंझलाहट में विवशता थी।

“वह महिला...।” साहिल यश की झुंझलाहट को नजरअंदाज करते हुए कहता चला गया- “वह महिला सब-कुछ जानती है। श्मशानेश्वर कौन है? माया कौन है? ये सब उसे मालूम होगा। उसने ही इस आदमी को मारा है। सोचो यश...उसे कैसे पता चला कि हम इसी आदमी का पीछा कर रहे थे।”

“लेकिन वह इसे क्यों मारेगी?”

“क्योंकि यह आदमी दो-दो बार तुम्हारी जान लेने में विफल हो चुका था। और इस बार तो हम भी इसके पीछे पड़ गये थे। अगर यह ज़िंदा हम लोगों के हाथ लग जाता, तो कई रहस्यों से परदा उठ सकता था। इसीलिये उसने इसे मार डाला।”

साहिल ने बिल्कुल सही निष्कर्ष निकाला था।

“लेकिन वह औरत थी कौन?”

“वही, जो इसलिए तुम्हारे जान की दुश्मन बन चुकी है क्योंकि तुम्हारी दाहिनी कलाई पर स्वास्तिक-चिह्न है।”

“हमें उसको तलाशना चाहिए। वह ज्यादा दूर नहीं गयी होगी।”

“नहीं यश। हमें जल्द से जल्द यहाँ से निकल जाना चाहिए। उस औरत ने पुलिस को फोन कर दिया होगा। यहाँ रहने पर हम फंस सकते हैं।”

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“संस्कृति की हालत कैसी है?” ड्राइंग हाल की निस्तब्धता के कुलगुरु के गंभीर स्वर ने भंग किया।

“सामान्य है कुलगुरु, किन्तु कुछ अधिक भयभीत है।” दिग्विजय ने उत्तर दिया।

ड्राइंग हाल में कुलगुरु के साथ केवल दिग्विजय और उनके दोनो भाई अरुणोदय तथा चन्द्रोदय थे। इनके अलावा वहां न तो कुलगुरु के अंगरक्षक शिष्य थे, और न ही राजमहल के पारिवारिक सदस्यों में से कोई था। थोड़ी देर पहले ही कुलगुरु ने अन्य लोगों को यह कहकर वहाँ से हटा दिया था कि वे तीनों भाइयों के साथ जो परिचर्चा करने वाले हैं, उसमें राजमहल के इतिहास का जिक्र होगा। अत: ठाकुर खानदान की इतिहास की गोपनीयता के लिए यह आवश्यक है कि इस परिचर्चा में केवल विश्वसनीय और महत्वपूर्ण लोग ही उपस्थित रहें।

तहखाने में मिला ताबूत भी ड्राइंग हाल में ही था। संस्कृति की खौफनाक कहानी सुनने के बाद किसी की हिम्मत ने ताबूत खोलने के पक्ष में गवाही नहीं दिया था। अंत में दिग्विजय ने कुलगुरु को बुलाने का निर्णय लिया था।

“संस्कृति का भय अकारण नहीं है। जिस लोमहर्षक घटना की वह साक्षी बनी है, वह घटना साधारण नहीं है।”

“तो क्या सचमुच सदियों पहले हमारे पूर्वजों द्वारा किसी ब्राह्मण पर जुल्म किया गया था? और उसे एक पीपल के तने से बाँध कर ज़िंदा जला दिया गया था? क्या इस कुकृत्य के कारण जन्में अभिशाप को उन्होंने ताबूत में बंद करके तहखाने में दफ़न कर दिया था, ताकि आने वाली पीढ़ी भी उनके कुकृत्य का मोल चुका सके?” चन्द्रोदय ने कहा।

“नहीं! राजमहल के पूर्वजों ने उस ब्राह्मण पर जुल्म नहीं किया था। वह ब्राह्मण तो स्वयं एक दुराचारी प्राणी था। उसने कापालिक-साधना को अपना लिया था। राजमहल की राजकुमारी माया पर उसकी कुदृष्टि थी। वह राजकुमारी को अपनी भैरवी बनाना चाहता था।”

“विस्तार से बताएं कुलगुरु।” दिग्विजय रोमांचित हुए।

“यह समय विस्तार में जाने का नहीं है। मात्र इतना ही समझा लेना तुम लोगों के लिए पर्याप्त होगा कि सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में जब हमारे देश में तंत्र-साधना अपने चरम पर थी, तब उन्हीं दिनों शंकरगढ़ में गुप्त रूप से कापालिकों का एक समुदाय पनप रहा था। कापालिक उन तांत्रिकों को कहा जाता था जो अपनी तंत्र-साधना का गलत इस्तेमाल करते थे। कापालिक-साधना विलासिता, वीभत्सता और नर-संहार से परिपूर्ण हुआ करती थी। ये कापालिक मानव-बस्तियों से षोडश वर्षीय अक्षत यौवनाओं का अपहरण कर लिया करते थे, तत्पश्चात उन्हें या तो माँ काली को बलि चढ़ा दिया करते थे या फिर अपनी भैरवी बना लिया करते थे। चूंकि शंकरगढ़ में इस प्रकार की तामसी तंत्र-साधना निषेध थी, इसलिए कापालिकों का समुदाय अपनी साधनाएं गुप्त रूप से करता था, विशेषत: शंकरगढ़ के दक्षिण में पड़ने वाले जंगल में। चूंकि अभयानन्द राजकुमारी माया पर आसक्त था और उन्हें अपनी भैरवी बनाने हेतु प्रयत्नशील था, इसलिए महाराज के सामने यह रहस्य ज्यादा देर तक न टिक सका कि वह एक कापालिक है। तामसी साधकों के विरूध्द सख्त नियम होने के कारण महाराज ने अभयानन्द के लिए बहुत ही भयानक मृत्यु की घोषणा की। उन्होंने उसे पीपल के पेड़ से जीवित जला देने का आदेश दिया था।”

“ओह!...लेकिन जब उसे जीवित जला दिया गया था तो फिर ताबूत में किस अभिशाप को बंद किया गया है?”

“अभयानन्द एक ब्राह्मण था और एक कापालिक भी, साथ ही साथ अकाल मृत्यु की भेंट चढ़ा था, इसलिए उसे मुक्ति नहीं मिल पाई थी। कहा जाता है कि अभयानन्द को जीवित जलाए जाने की घटना के बाद शंकरगढ़ पर विनाश के बादल छा गये थे। उस साल की सारी फसल नष्ट हो गयी थी। राज्य के पालतू चौपायों ने दूध देना बंद कर दिया था। कुत्ते और बिल्लियाँ आठों पहर आकाश की ओर मुंह उठाकर रोने लगे थे। शाम ढलते ही राज्य के मुख्य चौराहों पर निस्तब्धता छा जाया करती थी। लोगों को हर रात पीपल के उस पेड़ से अभयानन्द की मर्मान्तक चीखें सुनाई देती थीं। वह पशु रूप धारण करके हर रात शंकरगढ़ में आता था और लोगों को मृत्यु के घाट उतारता था।”

“ओह....!” तीनों भाईयों के होठों से समवेत स्वर में निकला- “फिर क्या हुआ था?”

“राजमहल के तत्कालीन कुलगुरु और हमारे पूर्वज दिव्यपाणी ने पीपल के उस वृक्ष को अभयानन्द से मुक्त कराया था। कहा जाता है कि दिव्यपाणी ने उस वृक्ष के नीचे चैत्र नवरात्र में नौ दिन तक कठिन साधना करते हुए जागृत अवस्था में स्व-प्रेरणा से देह-त्याग किया था, ताकि वे सूक्ष्म-शरीर के रूप में सदैव उस पीपल के वृक्ष पर वास करते हुए दुराचारी अभयानन्द की आत्मा को मनमानी करने से रोक सकें। यही कारण है कि राजमहल की प्रत्येक पीढ़ी के लोगों द्वारा वह पीपल का वृक्ष ‘ब्रह्म बाबा’ के रूप में पूजित होता आया है।”

“किन्तु कुलगुरु, इतिहास की इस घटना से संस्कृति के साथ घटी घटनाएं किस प्रकार सम्बन्धित हैं? आपके अनुसार अभयानन्द को जिन्दा जला दिया गया था और स्वयं दिव्यपाणी ने प्राणाहुति देकर उसकी आत्मा के प्रकोप को भी शांत कर दिया था, तो फिर गुप्त तहखाने में पाए गये इस ताबूत में क्या है, जिसने संस्कृति को माया नाम से बुलाया था?”

“ताबूत में मौजूद रहस्यमयी शक्ति ने संस्कृति को माया नाम से संबोधित करते हुए स्वयं को उसका वह प्रेमी बताया था, जिसे राजमहल के पूर्वजों ने जीवित जला दिया था। इस कारण हमें यह संदेह हो रहा है कि इस ताबूत में जो कुछ भी है, वह अभयानन्द के ही प्रकरण से सम्बन्धित है। संभव है कि दिव्यपाणी की प्राणाहुति के बाद भी अभयानन्द का प्रकोप शांत न हुआ रहा हो। और फिर उसके प्रकोप को शांत करने के लिए किसी अन्य अनुष्ठान को क्रियान्वित किया गया रहा हो। हमारा अनुमान है कि उसी अनुष्ठान के अंतर्गत अभयानन्द की किसी कमजोरी को ताबूत में बंद किया गया है। आने वाली पीढ़ी उस ताबूत के साथ छेड़खानी करने का दुस्साहस न कर सके, इसलिए उस ताबूत को गोपनीय तहखाने में रखा गया और आने वाली पीढ़ियों से इस रहस्य को छुपाया गया।”

“आप अनुमान के आधार पर उपरोक्त निष्कर्ष दे रहे हैं; तो क्या इसका अर्थ हम ये समझें कि अभयानन्द की पूरी कहानी आपको भी नहीं मालूम हैं?” अरुणोदय ने कहा।

कुलगुरु ने गहरी सांस लेते हुए एक दृष्टि तीनों भाईयों पर डाली और कहा- “हाँ। कह सकते हो। अभयानन्द की जितनी कथा हमें ज्ञात है उसके आधार पर संस्कृति के साथ घटी घटनाओं पर अधिक प्रकाश नहीं पड़ता, इसलिए हमें यह आभास हो रहा है कि अभयानन्द की कथा मात्र उतनी ही नहीं है, जितनी हमें ज्ञात है। अभयानन्द का पूरा प्रकरण जानने के लिए हमें राजमहल के इतिहास पर शोध करने की आवश्यकता है। अर्थात हमें राजमहल में बने उस ग्रंथागार में जाना होगा, जहाँ इस खानदान से जुड़े ऐतिहासिक ग्रन्थ संरक्षित हैं।”

थोड़ी देर के लिए उनके मध्य खामोशी छा गयी, तत्पश्चात दिग्विजय ने ताबूत की ओर देखते हुए कहा- “इस ताबूत में जो कोई भी है, उसने संस्कृति को माया नाम से बुलाया था। कहीं ऐसा तो नहीं कि संस्कृति, माया की पुनर्जनम है?”

“निसंदेह ऐसा ही होगा।” गहन चिंतन में डूबे होने के कारण कुलगुरु ने संक्षिप्त उत्तर दिया।

“तो फिर हमारा मार्गदर्शन कीजिये कुलगुरु। हमें बताइये कि ऐसी परिस्थिति में हम क्या करें?”

कुलगुरु ने इस बार कोई उत्तर नहीं दिया। उन्हें खामोश पाकर दिग्विजय ने कहा- “हमें इस ताबूत को खोलना चाहिए। शायद....।”

“नहीं...!” दिग्विजय का विचार पूरा सुने बगैर ही कुलगुरु चौंक उठे- “ऐसी मूर्खता भूल कर भी मत करना। इस ताबूत में यदि कोई साधारण बला होती, तो इसे एक अज्ञात तहखाने में नहीं छुपाया गया होता।”

“आखिरकार इस ताबूत का हम करें क्या?” चन्द्रोदय ने कहा।

कुलगुरु एक बार फिर मनन करने लगे। थोड़ी देर बाद उनके चेहरे पर नजर आये भावों ने इंगित किया कि वे किसी निष्कर्ष पर पहुँच गये थे। उन्होंने कहा- “इस ताबूत को बगैर खोले, बिल्कुल इसी अवस्था में मरघट में दफ़न करवा दिया जाए। संस्कृति पर विशेष निगरानी रखी जाए। यदि उसके साथ कोई असामान्य गतिविधि होती है तो इसे उसका वहम कहकर नजरअंदाज करने के बजाय हमें सूचित किया जाए। इसके अतिरिक्त तुम हमें संस्कृति की कुण्डली भिजवा देना।

हम उसका विश्लेषण करना चाहते हैं।”

कहने के बाद कुलगुरु प्रस्थान के ध्येय से सोफे से उठ खड़े हुए।

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पहले तीक्ष्ण बिजली कौंधी और फिर बादलों की कर्णभेदी गर्जना से समूचा क्षेत्र दहल गया। जब हवाओं ने दरख्तों से सिर टकराकर चीत्कार किया तो प्रतीत हुआ मानो किसी रक्त-पिशाचिनी के चंगुल में फंसा कोई शिकार तड़प कर छटपटा उठा हो। यह शंकरगढ़ का वही श्मशान था, जहाँ राजमहल के लोगों ने कुलगुरु के कहने पर तहखाने से बरामद हुए रहस्यमयी ताबूत को दफन किया था। राजगुरु की चेतावनी के बाद किसी ने भी ये जानने की कोशिश नहीं की थी कि उस ताबूत में क्या था? और वह राजमहल के अज्ञात तहखाने में क्यों था?

उस अधेड़ औरत की स्याह साड़ी बारीश में बुरी तरह भीग कर बदन से लिपट गयी थी। सर्दी की अधिकता के कारण उसके दांत बज रहे थे, किन्तु अपनी अवस्था के प्रति लापरवाह होकर वह पूरी तन्मयता से फावड़ा चला रही थी। वह अब-तक लगभग एक हाथ गहरी खुदाई कर चुकी थी। जिस ताबूत को बाहर निकालने के लिए वह ऐसे लोमहर्षक वातावरण में खुदाई कर रही थी, उसके प्राप्त होने की अब-तक कोई संभावना नजर नहीं आयी थी। वह शायद इस बात को लेकर आश्वस्त थी कि ताबूत को उसी स्थान पर दफनाया था क्योंकि खुदाई करते हुए लंबा वक्त गुजर जाने के बाद भी उसके चेहरे पर शिकन जैसा कोई भाव नहीं नजर आ रहा था, बल्कि इसके विपरीत हर गुजरते क्षण के साथ उसके फावड़े की गति तीव्र होती जा रही थी।

लगभग घंटे भर बाद, जब वह दो हाथ गहरी खुदाई कर चुकी, तब कहीं जाकर उसे महसूस हुआ कि इस बार उसका फावड़ा किसी सख्त चीज से टकराया है। और उसके परिश्रम का सार्थक परिणाम सामने आने वाला है। उसने ताबूत बाहर निकालने के लिए किनारे से मिट्टी निकालना शुरू किया।

लगभग बीस मिनट बाद; जब बिजली की चमक से श्मशान-क्षेत्र फिर से उद्भासित हुआ तो गड्ढे में ताबूत स्पष्ट नजर आया। ताबूत पर दृष्टि पड़ते ही औरत की आँखों में खौफनाक चमक उभरी। होठों पर अनायास ही थिरक उठी मुस्कान के कारण उसका वीभत्स चेहरा रहस्यमय हो उठा।

“राजमहल का अतीत अब वर्तमान को तबाह कर देगा। पुरखों के जुल्म-ओ-सितम का हिसाब वर्तमान पीढ़ी को चुकाना होगा। वे आयेंगे। अपनी माया को हासिल करने के लिए वे आयेंगे। राजमहल के पुरखों ने जिस अभिशाप को तहखाने में कैद कर रखा था, वही अभिशाप अब जलजला बन कर उन पर टूटेगा। जिंदगी मौत के आगे घुटने टेककर श्मशानेश्वर के साथ किये गये अत्याचार की माफी मांगेगी। शंकरगढ़ में फिर वही खौफ पाँव पसारेगा। गौण के वंशजों की तपस्या पूर्ण हुई। श्मशानेश्वर के अवतरण का समय आ गया। उस रक्तरंजित गाथा के पूरे होने का समय आ गया, जिसे श्मशानेश्वर को ज़िंदा जलाने के बाद अधूरा छोड़ दिया गया था। मैं धन्य हुई। इस धरती पर आपका पुन: स्वागत है श्मशानेश्वर।”

ताबूत बाहर निकालने से पहले औरत ने जी भर अट्टहास किया। उसकी खौफनाक हंसी के आगे बारिश का स्वर भी दब गया। उसकी हंसी तब थमी, जब उसे प्रतिक्रिया स्वरूप दूर कहीं किसी शिशु के रोने का स्वर सुनाई दिया।

उस करुण रुदन को सुनते ही मानो औरत को कुछ याद आया। उसने एक नजर ताबूत पर डाली, फिर रोने के स्वर की दिशा में पलटी और अँधेरे को लक्ष्य करके भयावह अंदाज में कह उठी- “कुछ क्षण और ठहर जा। उसके बाद सदैव के लिए तेरी चीत्कार बंद कर दूंगी।”

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“मुझे ऐसा क्यों लग रहा है मम्मी कि कहीं कुछ ऐसा होने वाला है, जिसे नहीं होना चाहिए।” दूध लेकर कमरे में आयी सुजाता को देखते ही संस्कृति ने डरे हुए लहजे में कहा।

सुजाता ने चौंक कर उसकी ओर देखा। वह बिस्तर पर पद्मासन मुद्रा में बैठी हुई थी, कुछ वैसे ही अंदाज में जैसे लोग प्राय: नींद उचट जाने के बाद बैठते हैं। मौसम खराब देखते हुए गाँव में बिजली-आपूर्ति बाधित कर दी गयी थी, और शायद राजमहल में मौजूद बिजली-आपूर्ति के व्यक्तिगत स्रोत भी आज ठप्प पड़े हुए थे, क्योंकि इस समय राजमहल का अधिकांश हिस्सा अंधकारमय था। पोर्टेबल लैंप के कारण कमरे में व्याप्त प्रकाश केवल इतना पर्याप्त था कि आपात स्थिति पड़ने पर अँधेरे में टटोलने की नौबत नहीं आ सकती थी।

सुजाता, संस्कृति के निकट पहुँचीं, और दूध का गिलास उसकी ओर बढ़ाते हुए बोलीं- “तहखाने की घटना तुम्हारे दिमाग से गयी नहीं है, इसीलिये ऐसा अनुभव हो रहा है।”

संस्कृति द्वारा दूध का गिलास थाम लिए जाने के बाद सुजाता खिड़की की ओर बढीं। बाहर तूफानी बारिश थी। हवा के तेज झोंकों के कारण खिड़की के कपाट जोर-जोर से चीख रहे थे, जिसे रोकने के लिए उन्होंने पल्लों पर चिटकनी चढ़ा दी।

“बारिश उग्र हो चुकी है।” कहते हुए वे वापस संकृति के पास आयीं, और बिस्तर के सिरहाने पड़ी एक स्टूल पर बैठ गयीं। उसने दूध का गिलास अभी तक होठों से नहीं लगाया था।

“दूध पी लो संस्कृति।”

“पता नहीं क्यों मुझे बार-बार ऐसा लग रहा है कि ताबूत वहां से गायब हो चुका है, जहाँ उसे दफनाया गया है।”

“ताबूत का खौफ तुम पर हावी हो गया है, जो तुम्हें बेवजह परेशान कर रहा है। जिस मरघट में उसे दफनाया गया है, उस मरघट में लोग दिन में भी जाने के नाम पर सिहर उठते हैं, तो भला भयानक बारिश वाली इस अंधेरी रात में उस मरघट में जाने का साहस कौन करेगा?”

“ये मेरे डर की नहीं बल्कि मेरी आत्मा की आवाज है। किसी ने उस ताबूत को बाहर निकाला है। वह ताबूत साधारण नहीं है। हम इतनी आसानी से उससे छुटकारा नहीं पा सकते हैं। कुछ उथल-पुथल जरूर होने वाला है। दफनाये जाने के बाद ताबूत की कहानी ख़त्म नहीं बल्कि शुरू हुई है।”

“तो क्या तुम ये कहना चाहती हो कि किसी ने ताबूत उस स्थान से निकाल लिया है, जहाँ उसे दफनाया गया है?”

“हाँ! शायद ऐसा ही कुछ हुआ है। उस ताबूत से आती आवाज में एक आकर्षण था। एक ऐसा आकर्षण; जिसमें बंध कर, मैं डरी हुई होने के बावजूद भी उससे बातें कर सकी थी। एक ऐसा आकर्षण; जिसमें बंधकर आग से डरने वाली मैं लैंप के साथ तहखाने में उतर गयी। वह रहस्यमयी आकर्षण अभी तक ख़त्म नहीं हुआ है मम्मी। मैं अभी तक खुद को उस आकर्षण में बंधी हुई महसूस कर रही हूँ। वे आवाजें अब भी मुझे सुनाई दे रहीं हैं। अब भी मुझे लग रहा है कि ताबूत मेरे आस-पास ही कहीं है। मैं जब आँखें बंद करती हूँ तो तहखाने का माहौल मेरी आँखों के सामने घूम जाता है। कुछ तो जरूर होने वाला है मम्मी। कुछ ऐसा, जो बेहद खौफनाक और कई जिंदगियों को तबाह करने वाला होगा।”

“कहीं कुछ नहीं होगा। तुम दूध पी लो और आँखें बंद करके सो जाओ।”’

“कोई मरने वाला है मम्मी।” संस्कृति अचानक बोल पड़ी।

सुजाता यह सुनकर चौंकीं, जबकि संस्कृति सम्मोहित अवस्था में शून्य को घूरते हुए कहती चली गयी- “ह...ह...हां! ऐसा ही होने वाला है। कोई इंसान मरने वाला है। मैं बादलों की गड़गड़ाहट में छुपे खौफ को महसूस कर रही हूँ। बारिश की छम-छम में घुला मौत का संगीत मुझे सुनाई दे रहा है। मुझे बारिश में धुली हुई एक वीरान सड़क नजर आ रही है। एक नरपिशाच सधी हुई चाल से अपने शिकार की ओर बढ़ रहा है...और वह....शिकार...!”

“संस्कृति.....!!!!” सुजाता ने उसे जोर से झकझोर दिया। गिलास का दूध छलक कर बिस्तर पर फ़ैल गया।

“ये कैसी अनाप-शनाप कल्पनाएँ कर रही है तू? हर रात की तरह ये रात भी एक साधारण रात है। कहीं कुछ नहीं होने वाला है। ताबूत में जो कुछ भी था, वह ताबूत के साथ ही मरघट में दफन हो चुका है। तू दूध पी कर सो जा।”

“ये रात साधारण नहीं है मम्मी। किसी की जान खतरे में है।” संस्कृति ने दूध का गिलास बिस्तर पर रखा और सुजाता की हथेलियों को अपनी दोनों हथेलियों के बीच लेते हुए गिड़गिड़ा उठी- “कोई है, जो मरने वाला है।”

“कौन है वह? कौन मरने वाला है? नाम बता उसका?” इस बार सुजाता झुंझला उठी।

“शायद..।” संस्कृति ने कुछ याद करने का उपक्रम करते हुए कहा-“शायद वैभव.!”

“वैभव?”

सुजाता सिहर उठीं। उन्हें कुलगुरु की चेतावनी याद आ गयी, जिसके अनुसार वैभव सात दिनों के अन्दर बेहद दर्दनाक अवस्था में अकाल-मृत्यु को प्राप्त होने वाला था।

“लेकिन....लेकिन तुझे कैसे पता?”

अब सुजाता का भी लहजा काँप गया। इस बार वे संस्कृति के रहस्यमय बर्ताव को नजरअंदाज न कर पायीं।

“पता नहीं मम्मी। मेरे अन्दर से बस यही आवाज आ रही है कि किसी ने ताबूत को बाहर निकाला है, और उसमें सोये जलजले को जगा दिया है। मुझे शायद प्रीमोनिशन हो रहा है.... प्रीमोनिशन....यानी कि पूर्वाभास।”

सुजाता परेशान हो गयीं।

“आप वैभव को फोन लगाईये!”

“ऐसे कैसे फोन लगा दूं? थोड़ी देर पहले ही तेरे पापा ने फोन पर उन्हें तुम दोनों के रिश्ते के लिए मना किया है। वे हमसे भड़के हुए हैं। पार्टी वाले दिन तूने स्टेज पर जो कुछ किया था, उसके कारण भी वे राजमहल वालों से सख्त नाराज हैं। पता नहीं वे लोग फोन रिसीव करेंगे भी या नहीं।”

“प्लीज मम्मी आप ट्राई कीजिये।”

“ठीक है। कोशिश करती हूँ।”

सुजाता अपनी जगह से उठीं। कमरे में पड़े टेलीफोन तक आयीं। नंबर डायल किया और रिंग जाने का स्वर सुनते ही रिसीवर कान से लगा लिया।

जब तक सुजाता फोन पर बात करती रहीं, तब तक संस्कृति की निगाह उन पर ही ठहरी रहीं। ज्यों ही उन्होंने रिसीवर क्रेडिल पर रखा, त्यों ही संस्कृति ने अधीर लहजे में पूछा- “क्या हुआ?”

“आधे घंटे पहले वैभव अपने कमरे में था। थोड़ी देर पहले बंगले के चौकीदार ने उसे गाड़ी लेकर अकेले बाहर जाते हुए देखा। उसने किसी को नहीं बताया है

कि वह कहाँ जा रहा है।”

“ओह माय गॉड!”

इसी क्षण जोरों से बादल गरजे और संस्कृति-सुजाता दोनों बुरी तरह चौंक गयीं।

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चारों ओर से खुला हुआ वह मंदिर शंकरगढ़ की श्मशान-भूमि के ठीक मध्य में बना हुआ था। मूर्ति के रूप में मंदिर में स्थापित उस पाषाण-प्रतिमा को किसी भी दृष्टिकोण से ‘देव-प्रतिमा’ नहीं कहा जा सकता था, जो सर्वत्रव्यापी स्याह अँधेरे में ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे कोई पिशाच दम साधे हुए शिकार की राह देख रहा हो।

क्षणिक अंतराल पर अनवरत कौंधती बिजली पुन: कौंधी और पाषाण-प्रतिमा का वजूद रोशनी से नहा उठा। वह पाषाण-प्रतिमा एक नर-भेड़िये की थी, जो संहार की मुद्रा में खड़ा था। उसका विकराल मुंह खुला हुआ था। होठों के किनारों से बाहर झांकते रक्तरंजित दांत नश्तर की मानिंद नुकीले थे। आँखों में पुतलियों के रूप में जड़े कंचे चमक रहे थे। बायें हाथ की मुट्ठी में एक नरमुंड की केशराशि थी। मुंड के उस निचले हिस्से से लहू टपकता दर्शाया गया था, जो धड़ पर अवस्थित होता है। दायें हाथ में एक कटार थी। शिल्पकार ने नर-भेड़िये की उपर्युक्त मुद्रा यह दर्शाने के लिए निर्मित की थी कि सजीव अवस्था में वह पहले बायें हाथ की मुट्ठी में इंसानों की केशराशि जकड़ता था और फिर दाहिने हाथ में थमी कटार से उनका शीश धड़ से अलग कर देता था। तत्पश्चात वह रक्तपान से तृप्त होकर आदमजात को खौफजदा करने के लिए उनकी बस्तियों में कटे मुंड के साथ तांडव करता था।

मूर्ति काले रंग की थी। कपड़े के रूप में उसके कमर में मात्र एक लंगोट का आकार उकेरा गया था, जो घुटने से कुछ अंगुल ऊपर ही समाप्त हो गया था। उसके हाथ-पैर की उँगलियों के नख अप्रत्याशित ढंग से बढे हुए और नुकीले दर्शाए गये थे। शिल्पकार ने उस मूर्ति के निर्माण में इस दर्जे का कौशल अपनाया था कि कमजोर दिल वालों को सहज ही ये भ्रम हो सकता था कि नर-भेड़िया सजीव है। मरघट के एक निर्जन मंदिर में पाषाण-प्रतिमा के रूप में स्थापित यह प्राणी जो कोई भी था, इसके विषय में ये निर्विवाद सत्य था कि यदि यह किसी काल में जीवित रहा होगा तो एक नर-संहारक के रूप में कुख्यात रहा होगा।

मूर्ति के सामने ही एक बलि यूथ बना हुआ था, जिससे थोड़े ही फासले पर लगभग सात-आठ महीने की वयस का एक नग्न शिशु लिटाया गया था, जिसका क्रंदन मरघट के भयावह वातावरण में करुण रस घोल रहा था।

लगभग आधा घंटा गुजर गया। इस दौरान मंदिर कई दफे प्रकाशित हुआ और कई दफे गहन अँधेरे में डूबा। शिशु के रोने का स्वर अब धीमा हो चला था। सर्दी और अनवरत रूदन के कारण आयी थकान से उसका शरीर शिथिल पड़ चुका था। अत्यल्प अवधि का वह अबोध अपने जीवन की आख़िरी सांसें गिन रहा था। अचानक मंदिर के बाहर बारिश की छम-छम के बीच कोई पदचाप गूंजी। शायद कोई था, जो मंदिर की ही ओर आ रहा था।

सीढ़ियों के निकट पहुंचते ही आने वाले की आकृति स्पष्ट हुई। वह एक अधेड़ उम्र की औरत थी, जो किसी ताबूत को घसीटते हुए मंदिर में लाने की कोशिश कर रही थी। ताबूत वजनी था, क्योंकि उसे सीढियों पर चढ़ाकर मंदिर में लाने के बाद वह औरत बुरी तरह हांफने लगी। उसने कुछ पल ठहरकर आराम किया, और फिर अंधकार की चादर में लिपटी नर-भेड़िये की पाषाण-प्रतिमा की ओर पलटी।

“हे श्मशानेश्वर! कापालिकों के वंश की आखिरी निशानी और अपनी दासी अरुणा का साष्टांग प्रणाम स्वीकार करें।” अरुणा ने मूर्ति के सम्मुख लेटकर नर-भेड़िये को साष्टांग प्रणाम किया और फिर यथा-स्थान पर खड़ी होकर विजयी स्वर में कह उठी- “जो कार्य कापालिकों के पूर्वज सैकड़ों वर्षों में नहीं पूर्ण कर सके, उस कार्य को आज मैंने पूर्ण कर दिखाया। आज मैंने अपना जन्म सार्थक कर लिया श्मशानेश्वर। आज मैं आपकी कृपा-पात्र, आपके इस धरा पर पुन: अवतरित होने की निमित्त और राजमहल में होने वाले महाविनाश की सूत्रधार बन गयी।” आखिरी वाक्य बोलते समय अरुणा की आँखें जल उठीं। किसी पुराने जख्म की टीस को महसूस करके वह तड़प उठी- “मैंने महसूस किया है प्रभु। उस कष्ट को मैंने महसूस किया है, जो आपको उस समय हुआ था, जब राजमहल के क्रूर पूर्वजों ने आपको पीपल के तने से बांधकर ज़िंदा जला दिया था। कापालिकों के वंश की प्रत्येक संतति को कापालिक-दीक्षा के समय ज़िंदा जलाए जाने पर होने वाले असहनीय कष्ट की अनुभूति कराई जाती है, ताकि वह भी आपके कष्ट को महसूस कर सके और प्रतिशोध की ज्वाला में जल उठे। मैंने भी कापालिका बनते समय दाह का कष्ट भोगा है। उसी कष्ट का प्रतिशोध साधने के जूनून में मैं उस कार्य-सिध्दी के निकट पहुँच चुकी हूँ, जिसमें मेरे पूर्वज भी विफल रहे थे।”

सहसा अरुणा के कानों में शिशु के रुदन का धीमा स्वर गया और वह चौंक गयी। हर्षातिरेक में वह जिस कार्य को भूल गयी थी, उस कार्य का स्मरण हो आया। उसने ताबूत को खींचकर नर-भेड़िये की मूर्ति के सामने बलि यूथ के ठीक पहले एक विशेष कोण पर रखा। इसके बाद मूर्ति के पीछे किसी स्थान पर रखा एक काला झोला लेकर आयी। मूर्ति की ओर चेहरा किये हुए, ताबूत के सम्मुख पद्मासन मुद्रा में बैठने के बाद उसने झोले में से पांच दीये निकाले। उनमें तेल और बाती डालने के पश्चात चार दीयों को ताबूत के चारों कोनों पर तथा पांचवे दीये को ताबूत के आयताकार अनुप्रस्थ के केंद्र पर रखा। उपर्युक्त क्रिया के बाद उसने अपने नेत्र बंद किये और मन ही मन कोई मंत्र-जाप करने लगी। एक ओर उसके होठों का कम्पन बंद हुआ और दूसरी ओर पाँचों दीप प्रज्वलित हो उठे। तेज आंधी और बारिश की बौछारों का उन दीपों पर कोई असर नहीं हुआ। अरुणा ने अभिमंत्रित दीप प्रज्वलित किये थे, ताकि उद्देश्य पूर्ण होने से पूर्व वे बुझने न पाए।

दीपों के प्रज्वलित होते ही अरुणा ने आँखें खोल दी। पीले प्रकाश में प्रदीप्त हो उठा उसका गौर वर्ण मुखमंडल रहस्यमयी लगने लगा था। उसने निकट ही विलाप कर रहे शिशु पर एक दृष्टि डाली और कुटिल अंदाज में मुस्कुरा उठी। यदि परिस्थितियाँ सामान्य होतीं तो उसके ख़ूबसूरत चेहरे पर सजने वाली ये मुस्कान नि:संदेह आकर्षक होती, किन्तु वर्तमान परिवेश में उसकी मुस्कान भी डरावनी ही लगी। उसने खुली हुई केशराशि चेहरे पर बिखरा ली, और दोनों मुट्ठियों को भींच कर घुटनों पर टिका लिया। ताबूत पर प्रज्वलित दीप निर्बाध रूप से जल रहे थे।

अरुणा कुछ देर तक गर्दन नीचे किये हुए निश्चल बैठी रही। जब उसने गर्दन ऊपर उठायी तो उसके रंग-रूप में इतना अंतर आ चुका था कि देखने वाला विश्वास नहीं कर सकता था कि ये वही अरुणा थी जो थोड़ी देर पहले एक अधेड़ उम्र की महिला थी।
 
उसका चेहरा अब ख़ूबसूरत नहीं रह गया था। उसके रक्तिम होंठ स्याह हो चुके थे। आकर्षक चेहरा झुर्रियों से भरकर विकृत हो चुका था। रतनारी आँखें संकुचित होकर कोटरों में धंसी हुई नजर आने लगी थीं। श्याम-वर्ण केशराशि श्वेत-वर्ण हो चुकी थी। संक्षेप में, अरुणा अब अस्सी वर्ष की वृद्धा में तब्दील हो चुकी थी। वह अपनी गर्दन चारों दिशा में घुमाने लगी। धीरे-धीरे उसकी गति तीव्र होने लगी और कुछ क्षणोंपरान्त वह इस तीव्रता से झूमने लगी, मानो किसी बुरी आत्मा के चंगुल में जकड़ गयी हो। उसके होठों से कोई मंत्रोच्चार भी प्रस्फुटित हो रहा था किन्तु उसका स्वर स्पष्ट नहीं था।

अचानक परिवेश में ‘खट’ की आवाज गूंजी और अरुणा ने झूमना बंद कर दिया।

वह सामान्य अवस्था में आयी और अपनी एक दृष्टिपात मात्र से ही ताबूत पर जल रहे दीपों को बुझा दिया। उसने ताबूत से लटक रहे स्वास्तिक-आकार वाले ताले को देखा। ताला खुल चुका था। ‘खट’ की आवाज ताले के खुलने की ही थी। अरुणा ने ताले को निकाला और मंदिर से बाहर उछाल दिया।

उसने श्मशानेश्वर की मूर्ति की ओर देखा। हालांकि दीपों के बुझ जाने के बाद

मंदिर में अन्धेरा था, किन्तु मूर्ति का चेहरा प्रदीप्त हो उठा था। सामान्य प्राणी के लिए यह आश्चर्य का विषय था, किन्तु अरुणा के चेहरे के भावों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। उसके लिए यह घटना इस बात का संकेत थी कि उसका कार्य, सिद्धी के अंतिम चरण में है। उसने एक झटके से ताबूत खोल दिया। ताबूत के खुलते ही उसमें से काले धुंए का एक गुब्बार निकला, जो थोड़ी देर तक मंदिर के वायुमंडल में चक्कर काटता रहा तत्पश्चात श्मशानेश्वर की मूर्ति में समा गया। ऐसा होते ही एक दबी हुई उल्लासपूर्ण हंसी न जाने कहाँ से उद्गमित हुई और बारिश की छम-छम में घुल गयी। ऐसा लगा जैसे कोई सदियों की कैद से आजाद हुआ था। श्मशानेश्वर की मूर्ति पहले से और अधिक प्रदीप्त हो उठी। मानो श्मशानेश्वर सजीव होने हेतु प्रयत्नशील हो उठा था।

ताबूत में एक हांडी रखी हुई थी। जिस पर काला कपड़ा बाँध कर उसका मुंह बंद किया गया था। अरुणा ने उस हांडी को बाहर निकाला और शिशु के बगल में रख दिया। इसके बाद उसने ताबूत को घसीटकर मंदिर के बाहर अँधेरे में धकेल दिया। जिस अनुष्ठान को वह क्रियान्वित करने जा रही थी, उस अनुष्ठान में ताबूत पर लिखे गीता के श्लोक बाधक थे।

अरुणा ने हांडी पर बंधा कपड़ा खोला। हांडी में आकंठ राख भरी हुई थी। इसमें कोई संदेह नहीं था कि वह शव-दाह के पश्चात बचने वाली राख थी। उसने राख को भूमि पर उड़ेल दिया। राख में कुछ अस्थियाँ भी नजर आ रही थीं, जिन्हें उसने चुन-चुन कर पृथक कर दिया। इसके बाद उसने राख के ढेर को इस प्रकार व्यवस्थित किया, मानो उसमें पानी डालकर गूंथने वाली हो।

उपरोक्त क्रिया-कलापों के उपरांत उसने शिशु को उठाया। उसकी आँखों में व्याप्त क्रूर और हिंसक चमक देखते ही उस अबोध प्राणी का क्रंदन पुन: तीव्र हो उठा। संभवत: वह अरुणा के कुत्सित इरादों को भांप गया था। शिशु के चीत्कार से असहज होकर अरुणा ने उसके चेहरे पर अपना हाथ फिराया और बच्चे के रोने का स्वर थम गया। वह रोने का उपक्रम करता नजर आ रहा था, किन्तु आवाज गले से बाहर नहीं आ पा रही थी। अरुणा अपने स्थान से उठी। बच्चे को एक हाथ में थामे हुए वह बलि यूथ तक आयी, और अगले ही सिम्त उसने निहायत ही बेरहमी के साथ उसे बलि यूथ पर यूं पटक दिया, मानो वह कोई प्राणविहीन वस्तु हो।

शिशु के हृदयविदारक चीत्कार से मंदिर का परिसर जरूर गूँज उठता, यदि अरुणा ने उसके स्वर-यन्त्र को मंत्रबाधित न किया होता। आगामी दृश्य वीभत्स था। इतना वीभत्स कि यदि उस दृश्य को कोई कसाई भी देख लेता तो द्रवित हो उठता। अरुणा ने बलि यूथ के बगल में रखी कटार उठाई थी और फिर उसने शिशु के धड़ को शीशविहीन करने में क्षण भर भी विलम्ब नहीं किया था। बच्चा न तो रो सका और न ही चीत्कार कर सका। मंत्रबाधित स्वर-यन्त्र के साथ ही इस संसार से कूच कर गया। उसके रक्त से धरती की छाती लाल हो उठी। वह गोद सूनी हो गयी, जिस गोद में उसने आठ महीने पहले ही अपने जीवन की पहली किलकारी भरी थी। शिशु का मुंड छटक कर श्मशानेश्वर के कदमों में जा गिरा और धड़ बलि यूथ पर ही कुछ देर तक छटपटा कर शांत हो गया। अरुणा के तामसी अनुष्ठान का पहला चरण पूर्ण हो चुका था। शिशु-बलि की प्रथा सम्पन्न हो चुकी थी। श्मशानेश्वर की मूर्ति पहले से अधिक प्रदीप्त हो उठी।

शिशु-रक्त बलि यूथ से प्रवाहित होते हुए राख के इर्द-गिर्द जमा होने लगा। अरुणा ने इंतजार किया। तब तक इन्तजार किया, जब तक बलि यूथ से रिसता हुआ रक्त राख में पूरी तरह समा नहीं गया। शिशु-रक्त से राख अब इतना गीला हो चुका था कि उसे आसानी से गूंथा जा सकता था। अरुणा ने वही किया। उसने राख को गूंथा। तत्पश्चात गूंथे हुए राख को उसने एक पुतले की शक्ल दे डाली। एक ऐसा पुतला, जिसके सजीव होने हेतु केवल प्राण प्रवाहित होने भर की देर थी। पुतले का निर्माण करने के बाद उसने एक खूंटी से टंगा काला झोला उतारा और उसे लेकर पुतले के सामने पद्मासन मुद्रा में बैठ गयी। एक बार फिर उसका रुख श्मशानेश्वर की मूर्ति की ओर था। उसने झोले में से नर-खोपड़ी निकाल कर सामने रख लिया। दूसरी बार में उसने झोले में से सामान्य से थोड़े बड़े आकार का एक नींबू और छोटा सा चाकू, जिस पर सिंदूर पुता हुआ था, बाहर निकाला। वह चाकू की धार को नींबू पर रखते हुए उसे इस प्रकार नर-खोपड़ी के ऊपर ले गयी कि यदि नींबू को काटा जाता तो रस की प्रत्येक बूँद खोपड़ी के ऊपर ही गिरती। उसने आँखें बंद कर ली। अकस्मात प्रारंभ हुआ उसके होठों का कम्पन, गुजरते क्षणों के साथ तेज हुआ और इसी अनुपात में उसका शरीर भी झूमने लगा। लगभग दस मिनट बाद अरुणा ने नींबू काट दिया। नींबू दो भागों में बंट गया और दोनों भाग विपरीत दिशाओं में जा गिरे।

नींबू का रस ज्यों ही खोपड़ी पर गिरा, त्यों ही खोपड़ी जल उठी और इसी के साथ मरघट में दूर कहीं लोमहर्षक अट्टहास गूँजा। अरुणा ने झूमना बंद किया, आँखें खोली और चेहरे पर संतुष्टि का भाव लिए हुए श्मशानेश्वर की मूर्ति को देखते हुए हर्षोन्मुक्त हो कर कह उठी- “प्रभु आ आरहे हैं।......मेरे प्रभु आ रहे हैं।”

श्मशानेश्वर की प्रतिमा अब इस हद तक प्रदीप्त हो उठी थी, मानो उसके भीतर हजारों वाट के बल्ब जल रहे हों। अरुणा आँखों में किसी चमत्कार के घटित होने की उम्मीद लिए हुए मूर्ति की ओर देख रही थी। उसकी उम्मीद बेवजह नहीं थी, क्योंकि अगले ही पल सचमुच चमत्कार हो गया था। उसके देखते ही देखते मूर्ति से एक प्रकाशपुंज बाहर निकला और राख के पुतले की ओर बढ़ा। प्रकाशपुंज के बाहर आते ही मूर्ति की प्रदीप्ति समाप्त हो गयी थी। यूं लगा था मानो वह सारा प्रकाश, जिसके कारण मूर्ति प्रदीप्त थी, सिमटकर प्रकाशपुंज के रूप में बाहर निकल आया था। रोशनी की तीव्रता के कारण मंदिर का कोना-कोना नमूदार हो उठा। किन्तु कुछ क्षण के लिए ही, क्योंकि प्रकाश-पुंज के पुतले में समाते ही मंदिर फिर से गहन अंधकार में डूब गया।

अरुणा की सांसें थम गयीं। वह दम साधे राख के पुतले को देखती रही। कुछ पल तो सब-कुछ सामान्य रहा, किन्तु उसके बाद जो कुछ हुआ वह असाधारण था। पुतले का आकार बढ़ने लगा था। सुखद आश्चर्य के वशीभूत होकर अरुणा अपने स्थान से उठ खड़ी हुई।

पुतले का आकार तब तक बढ़ता रहा जब तक कि वह आठ फीट के वयस्क पुरुष के पुतले में नहीं तब्दील हो गया। तेज बिजली कड़की और अगले ही क्षण पुतले ने आँखें खोल दी। उसमें प्राण-ऊर्जा प्रवाहित हो उठी थी। राजमहल के तहखाने में दफन अभिशप्त ताबूत में रखी राख अब एक जीते-जागते इंसान में परिवर्तित हो गयी थी। अरुणा ने दृष्टि फेर ली, क्योंकि जो इंसान अभी-अभी वजूद में आया था उसके तन पर कपड़े के नाम पर एक धागा तक नहीं था।

आदमी खड़ा हुआ। अँधेरे में ही उसने अपने हाथ-पैर को गौर से देखा, फिर नर-भेड़िये की मूर्ति की ओर पलटा। मूर्ति अब पहले से भी अधिक भयावह हो चुकी थी। ‘नवजात पुरुष’ ने गंभीर और प्रभावशाली, किन्तु सर्द लहजे में कहा- “हमारे वस्त्र कहाँ हैं अरुणा?”

“मैं ले आयी हूँ प्रभु।”

कहने के साथ ही अरुणा काले झोले की ओर लपकी।

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वैभव का क्रोध सातवें आसमान पर था। थोड़ी देर पहले ही दिग्विजय ने फोन के जरिये उन्हें सूचना दी थी कि ग्रह-दशाएं अनुकूल न होने के कारण वे संस्कृति और वैभव की शादी का विचार स्थगित कर चुके हैं। उनका यह निर्णय वैभव और मृत्युंजय की इच्छाओं पर तुषारापात था। जहाँ एक ओर शंकरगढ़ को वोट बैंक के रूप में भुनाने की मृत्युंजय की महत्वाकांक्षा खतरे में पड़ चुकी थी, तो वहीं दूसरी ओर संस्कृति के रूप में ख़ूबसूरत बीबी पाने का वैभव का सपना भी टूट चुका था। दिग्विजय की ओर से रिश्ते के विषय में विवशता जताए जाने के बाद मन में ज्वार की तरह उफनने वाले विचारों पर मृत्युंजय ने नियंत्रण पा लिया था, और अपना हेतु साधने के लिए कोई योजना बनाने में जुट गये थे, किन्तु वैभव का जवान खून उबल पड़ा था। संस्कृति की ओर से उपेक्षित किये जाने पर उसने यह सोचकर अपने क्रोध पर अंकुश लगा लिया था कि अपने अपमान की कीमत वह शादी के बाद सूद समेत वसूल कर लेगा, किन्तु अब, जब संस्कृति उसे हाथ से निकलती हुई नजर आयी तो वह अपना आप खो बैठा और बरसात भरी तूफानी रात की परवाह न करते हुए गाड़ी लेकर शंकरगढ़ की ओर कूच कर गया।

उसका इरादा राजमहल में जम कर उत्पात मचाने और संस्कृति को धमकाने का था। उन्मादी तथा विकृत स्वभाव वाले उस बेवकूफ से और अपेक्षा ही क्या की जा सकती थी? इस समय वह शंकरगढ़ से ठीक पहले पड़ने वाले जंगल से गुजर रहा था। हवाओं का वेग अत्यधिक तीव्र था। भीषण बारिश के कारण जंगल भयानक हो उठा था। हवाओं के थपेड़े झेलते दरख़्त अत्यधिक पी चुके शराबी की भांति लहरा रहे थे। संभव था कि उनमें से कुछ की शाखाएं टूट भी रही थीं, किन्तु बादलों की गर्जना के बीच उनके टूटने की आवाज दब जा रही थी। जंगल का जर्रा-जर्रा भीग चुका था। लगभग आठ फीट चौड़ी उस पक्की सड़क पर भी पानी जमा होने लगा था, जो जंगल की छाती को रौंदती हुई शंकरगढ़ को चली गयी थी।

जंगल इस सीमा तक डरावना हो उठा था कि किसी सख्त जान के भी रोंगटे खड़े कर सकता था, किन्तु वैभव की क्रोधाग्नि इतनी प्रचंड हो चुकी थी कि वह अपने हित-अहित से जुड़े विचारों को नजरअंदाज करके हुए घर से निकल पड़ा था। न किसी को बता कर, और न ही किसी को साथ लेकर।

सहसा उसने गाड़ी की रफ़्तार धीमी कर ली, और अंतत: उसे विवश होकर

गाड़ी रोकनी पड़ी। सामने एक पेड़ गिरा होने के कारण रास्ता बंद था। गाड़ी रुकते ही वैभव मानो यथार्थ की दुनिया में वापस लौटा। उसे पहली दफा बोध हुआ कि अब वह एक खौफनाक जंगल में है और यह रात पिछली रातों की साधारण नहीं है।

“डैम इट!” क्रोध में भनभनाते हुए उसने अपना हाथ स्टीयरिंग पर पटका- “अब क्या होगा?”

वैभव ने बेचैनी से नीचला होंठ दाँतों तले दबाया। स्टीयरिंग पर सिर टिका कर उसने कुछ देर तक चिंतन-मनन किया, तत्पश्चात ‘यू-टर्न’ लेने के ध्येय से गाड़ी को स्टार्ट करना चाहा, पर अफसोस, यह चाहत पूरी न हो सकी। इंजन विचित्र किस्म का शोर करते हुए शांत हो गया। उसने कई दफे प्रयास किया, किन्तु सफलता किसी भी प्रयास में हाथ न लगी। बाहर निकल कर खराबी दुरुस्त करने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। हार कर उसने सेलफोन बाहर निकाला।

एक और निराशाजनक स्थिति उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। डिस्प्ले के टॉप पर नजर आ रहा नेटवर्क आइकॉन पूरी तरह खाली था। झुंझला कर उसने सेलफोन को बगल वाली पैसेंजर सीट पर पटक दिया। उसे अब बोध होने लगा कि आवेश में लिए गये निर्णय हमेशा पछतावे का कारण बनते हैं, किन्तु अब कुछ नहीं हो सकता था। बाहर बारिश उफान पर थी। समूचा जंगल अँधेरे की स्याह चादर से ढका हुआ था। ऐसे में बाहर निकल कर मदद तलाशने का कोई औचित्य नहीं था। खराब मौसम के कारण सेलफोन का नेटवर्क आना भी अब मुश्किल था। कुल जमा वैभव की दशा ऐसी थी कि उसे कोई मदद नहीं मिल सकती थी। अत: उसने गाड़ी के सारे डोर को लॉक किया और सीट की पुश्त से सिर टिकाकर आँखें बंद कर ली। उसका क्रोध अब इस विवशता में बदल चुका चुका था कि वह तब तक गाड़ी में बंद रहे जब तक कि नेटवर्क उपलब्ध नहीं हो जाता, या फिर किसी चमत्कार के तहत उसकी गाड़ी स्टार्ट नहीं हो जाती।

वैभव को आँखें बंद किये हुए कुछ ही पल बीते थे कि अचानक ‘ठक-ठक’ की आवाज सुन उसकी तन्द्रा भंग हो गयी। बाहर से कोई ड्राइविंग डोर के शीशे को ठोक रहा था। अँधेरा होने और शीशे पर बारिश की बौछारें जमा हो जाने के कारण बाहर मौजूद शख्स की मुखाकृति तो स्पष्ट नहीं हो सकी, किन्तु वैभव ने अनुमान लगाया कि वह भी उसी की भांति बारिश में फंसा कोई राहगीर था। निर्जन जंगल में कंपनी मिल जाने की उम्मीद में उसने ड्राइविंग डोर खोल दिया।

“कौन...?” बगैर नीचे उतरे ही उसने बाहर झांकने की कोशिश की, किन्तु अगले ही पल उसे महसूस हुआ मानो उसकी गर्दन किसी शिकंजे में जकड़ गयी हो। इससे पहले कि कुछ सोच पाता, उसने स्वयं को हवा में तैरता महसूस किया। कुछ सेकेंडों बाद उसका गर्दन अज्ञात शिकंजे से मुक्त हुआ और वह द्रुतगति से पीठ के बल सड़क से टकराया।

“आह....।” उसके हलक से चीख उबल पड़ी। संभवत: पीठ की कोई हड्डी टूट गयी थी। वैभव को लगा कि वह कोई ताकतवर प्राणी था, जिसने उसे न केवल गर्दन से पकड़कर कार से बाहर खींचा था, बल्कि बड़ी बेरहमी से जमीन पर भी पटक दिया था।

कुछ मिनटों बाद, दर्द बर्दाश्त के काबिल होने पर उसने आँखें खोली, किन्तु आस-पास दृष्टि पड़ते ही बुरी तरह चौंका। वह गाड़ी के पास नहीं था। असहनीय पीड़ा को नजरअंदाज करते हुए वह कुहनी के बल आधा उठकर बैठ गया। उसे अपनी कार काफी दूर नजर आयी। यह समझने में उसे ज़रा भी विलम्ब नहीं हुआ कि कार से बाहर खींचने वाले ने उसे काफी दूर पटका था। इससे पहले कि उसका जेहन आगे कुछ सोच पाता, एक हैरतंगेज दृश्य ने उसके होश उड़ा दिए।

“ओह माय गॉड....! यह....यह क्या चीज है?” जान बचाने के ध्येय से वैभव किसी अपाहिज की भांति पीछे खिसकते हुए चीखा।

कार के ड्राइविंग डोर से थोड़ी दूर पर खड़ा वह आठ फीट ऊंचा प्राणी इंसान नहीं था और न ही उसे जंगली जानवर कहा जा सकता था। वह दो पैरों पर खड़ा एक विशालकाय भेड़िया था। उस वहशी के चेहरे पर लाल आँखें यूँ लग रही थीं, जैसे कोटरों में दहकते अंगारे रख दिए गये हों। उसके दाहिने हाथ में कटार थी। शिकार को पीछे खिसकता देख वह नरपिशाच चिंघाड़ते हुए उसकी ओर बढ़ा।

“वु...उल्फ....वेयरवुल्फ.....!” खौफ की अधिकता के कारण वैभव ढंग से चीख भी नहीं सका।

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अलार्म ने जोर से फटकार लगाई और साहिल ने चौंककर आँखें खोल दी। उसने जान-बूझकर स्नूज नहीं किया, क्योंकि वह पहले ही चार बार ऐसा कर चुका था। अनमने ढंग से उसने चादर एक ओर फेंका और अलार्म बन्द करने के बाद रोज की भांति सबसे पहले व्हाट्सएप मेसेज चेक किया, फिर फेसबुक नोटिफिकेशंस और अंत में मेल बॉक्स चेक करने के बाद बिस्तर छोड़ दिया।

दिन काफी चढ़ चुका था। पिछली शाम यश को गाँव छोड़कर आने के बाद उसने रात के दो बजे तक एक यूएस क्लाईंट के ग्राफिक नॉवेल के कवर और उसके इंटीरियर पेजेज के कुछ इलस्ट्रेशन्स पर काम किया था, यही वजह थी जो आज उसे बिस्तर छोड़ते वक्त दस बज गये थे।

लम्बी जम्हाई लेते हुए वह किचन में पहुंचा। ओवन में चाय उबलने के लिए रखने के बाद ड्राइंग हाल में आया। जैसा कि उसका अनुमान था; ‘दैनिक जागरण’ का आज का अंक फर्श पर दरवाजे के पास ही पड़ा हुआ था। अखबार साथ लिए हुए वह फिर से किचन में आ गया। आदत के मुताबिक़; चाय उबलने में लगने वाले कुछ मिनटों को वह अखबार की हेडलाइंस पढ़ते हुए गुजारता था। उसने फोल्ड किया हुआ न्यूज़पेपर खोला और जैसे ही मुख्य पृष्ठ पर छपी हेडलाइन पर उसकी दृष्टि पड़ी, वह बुरी तरह उछल पड़ा।

राज्य ऊर्जा मंत्री मृत्युंजय सिंह ठाकुर के एकलौते बेटे की क्षत-विक्षत लाश शंकरगढ़ के जंगल में पायी गयी ।

उपरोक्त हेडलाइन के अंतर्गत छपे समाचार का मजमून कुछ यूं था-

हादसे हमारी जिन्दगी में दबे पाँव दाखिल होते हैं; यह कहावत एक बार फिर कल रात ग्यारह बजे उस वक्त चरितार्थ हुई जब सूबे के ऊर्जा मंत्री माननीय मृत्युंजय सिंह ठाकुर के एकलौते बेटे वैभव सिंह ठाकुर की लाश शंकरगढ़ के जंगल से क्षत-विक्षत अवस्था में बरामद हुई। लाश को देख कर ये अनुमान लगाना मुश्किल है कि हत्यारा इंसान है या फिर कोई वहशी जानवर। हमारे संवाददाता के मुताबिक लाश का सिर धड़ से अलग पाया गया है। चेहरे से दोनों आँखें गायब हैं। आँखें, सिर को धड़ से अलग करने के बाद निकाली गयीं, या फिर ये बेरहम हरकत सिर को धड़ से अलग करने के बाद की गयी? इस सवाल का जवाब फिलहाल अँधेरे में है। वैभव के धड़ पर नजर आ रहे नाखूनों से खरोंचे जाने के गहरे निशान इस बात की ओर भी इशारा कर रहे हैं कि हत्यारा इंसान या जानवर जो कोई भी है, वैभव के साथ बेहद बेरहमी से पेश आया था। उसके जिस्म पर बने खरोंचों के निशान या तो हत्यारे के साथ उसके संघर्ष के साक्षी हैं

या फिर हत्यारे की हैवानियत के।

द्रवित कर देने वाली क्षत-विक्षत लाश के अलावा घटनास्थल से जो चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है, वो है गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर वैभव के खून को स्याही बना कर लिखा गया चार शब्दों का एक छोटा सा वाक्य– ‘माया केवल हमारी है’ । कल रात तूफानी बारिश थी, यदि हत्यारे ने ये इबारत सड़क या किसी अन्य स्थान पर लिखी होती तो उसके धुल जाने का खतरा था, इसीलिए उसने उपरोक्त इबारत गाड़ी के भीतर ड्राइविंग सीट पर लिखी। हत्यारे द्वारा बरती गयी ये होशियारी संकेत करती है कि उसने उक्त इबारत को किसी चेतावनी के तहत लिख छोड़ा है।

सूत्रों के मुताबिक़ वैभव रात के लगभग नौ बजे किसी को कुछ बताये बिना ही घर से अकेले निकला था। अधिक समय बीत जाने के बाद; उसके न लौटने और मोबाइल के जरिये संपर्क न हो पाने की दशा में परिवार द्वारा इत्तला किये जाने पर पुलिस सक्रिय हुई। चेकपोस्ट से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस ने लगभग आधे घंटे के अन्दर ही वैभव की लाश को शंकरगढ़ के जंगल से बरामद कर लिया। ज्ञातव्य हो कि दो दिन पहले ही शंकरगढ़ के राजसी खानदान की एकलौती लड़की संस्कृति की ओर से वैभव की शादी का प्रस्ताव ठुकराए जाने से मंत्री जी की बड़े पैमाने पर किरकिरी हुई थी। बताते चलें कि संस्कृति शंकरगढ़ की सर्वाधिक प्रतिष्ठित शख्सियत दिग्विजय ठाकुर की एक मात्र संतान है, जो कुछ दिन पहले ही कैंब्रिज से मैथ में ग्रेजुएट होकर लौटी है। अपनी घर-वापसी की खुशी में आयोजित किये गये समारोह में संस्कृति ने बिना कोई विशेष कारण बताये वैभव को अपने लिए अयोग्य करार दे दिया था।

दिल दहला देने वाले इस बड़े हत्याकांड ने जहाँ एक ओर लोगों के दिलों में दहशत भर दिया है, वहीं दूसरी ओर पुलिस को कई मुद्दों पर सोचने को विवश भी कर दिया है। प्राथमिक जांच में पुलिस ने संदेह व्यक्त किया है कि हत्यारा कोई जंगली जानवर है, किन्तु उस वक्त पुलिस अपने इस संदेह के प्रति भी संदेह से घिर जा रही है जब उससे ये पूछा जा रहा है कि यदि हत्यारा कोई जानवर है तो फिर ‘माया केवल हमारी है’ यह इबारत किसने लिखी? हमारी टीम को अभी-तक इस पूरे प्रकरण पर माननीय ऊर्जा मंत्री जी की प्रतिक्रया जानने का अवसर नहीं मिल पाया है।

माया कौन है? उसका वैभव की हत्या अथवा हत्यारे से क्या ताल्लुक है? वजह क्या थी जो वैभव तूफानी रात होने के बावजूद भी फ्रस्टेशन की अवस्था में शंकरगढ़ की ओर अकेले रवाना हुआ? खबर लिखे जाने तक उपरोक्त सवालों के

जवाब नहीं मिले थे।

“माया...!” पूरा समाचार पढ़ते ही साहिल के होठों से अनायास ही निकल पड़ा- “य....ये तो वही नाम है, जिसके बारे में कोमल ने बताया था। उसके कहे अनुसार यश ने जिस राजकुमारी का स्केच बनाया था, उसे माया नाम से ही संबोधित किया था।”

साहिल ने चाय का मग ओवन से बाहर निकाल लिया, किन्तु उसे छानने के बजाय जस का तस रहने दिया। खबर पढ़ने के बाद उसके जेहन से चाय का विचार रुख्सत हो चुका था।

“कहीं ये माया वही तो नहीं, जिसका सम्बन्ध यश की याद्दाश्त चले जाने से है?” उसने खुद से कहा और चाय को भूल कर फिर से ड्राइंग हाल में आ गया।

“नहीं-नहीं.....!” उसने थोड़े व्यग्र स्वर में कहा- “ऐसा कैसे हो सकता है। इस घटना का सम्बन्ध एक पालीटिशियन के लड़के की हत्या से कैसे हो सकता है?...एक मिनट...!”

अगले ही पल साहिल के जेहन में मानो बिजली कौंधी। उसने खबर के मजमून पर दृष्टि डाली और अधोलिखित अंश को फिर से पढ़ गया-

ज्ञातव्य हो कि दो दिन पहले ही शंकरगढ़ के राजसी खानदान की एकलौती लड़की संस्कृति की ओर से वैभव की शादी का प्रस्ताव ठुकराए जाने से मंत्री जी की बड़े पैमाने पर किरकिरी हुई थी। बताते चलें कि संस्कृति शंकरगढ़ की सर्वाधिक प्रतिष्ठित शख्सियत दिग्विजय ठाकुर की एक मात्र संतान है, जो कुछ दिन पहले ही कैंब्रिज से मैथ में ग्रेजुएट होकर लौटी है। अपनी घर-वापसी की खुशी में आयोजित किये गये समारोह में संस्कृति ने बिना कोई विशेष कारण बताये वैभव को अपने लिए अयोग्य करार दे दिया था।

“खबर के मुताबिक संस्कृति नाम की यह लड़की कैंब्रिज से ग्रेजुएट है। इसका एकेडेमिक बैकग्राउंड मैथ है और यह हाल में ही कैंब्रिज से लौटी है। संभव है कि इस लड़की ने भी वहां आयोजित वर्कशॉप में हिस्सा लिया रहा हो, या फिर इसे उस वर्कशॉप के बारे में कुछ मालूम हो।” साहिल के होंठ सोचने की मुद्रा अख्तियार करते हुए अंग्रेजी के अक्षर ‘ओ’ के आकार के हो गये- “एब्सोल्युटली यस.....! मुझे इस लड़की से मिलना चाहिए। हो सकता है इससे मिलने के बाद यश के साथ घटी घटनाओं के बारे में कुछ और पता चले।”

एक नए सूत्र के हाथ लगते ही साहिल उत्साहित नजर आने लगा। उसे अपने चाय की याद आयी। वह किचन में पहुंचा। चाय छानते वक्त वह अपने कांटेक्ट लिस्ट में प्रोफ़ेसर चव्हाण का नंबर ढूंढ रहा था। उसका इरादा प्रोफ़ेसर चव्हाण से भी मिलने का था, ये जानने के लिए कि वर्कशॉप में हिस्सा लेने वाले ऐसे कितने स्टूडेंट्स थे, जिनका टॉपिक यश की टॉपिक से मिलता-जुलता था।

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“वह एक इंटरनेशनल वर्कशॉप था, इसलिए उस वर्कशॉप में जितनी भी शैक्षणिक परिचर्चाएं हुई थीं, वे कांफिडेंशियल केटेगरी में आती हैं। उस वर्कशॉप में प्रस्तुत किये गये रिसर्च पेपर्स के बारे में बाहरी को बताना नियमों के विरूद्ध है।”

“प्लीज सर!” साहिल ने निवेदनपूर्ण लहजे में कहा- “मेरी हेल्प कीजिये। मैं रिसर्च पेपर्स के बारे में नहीं बल्कि उन स्कॉलर्स के बारे में जानना चाहता हूँ जिनके रिसर्च का टॉपिक यश के टॉपिक से मिलता-जुलता था।”

“बट व्हाई? आखिरकार तुम ये जानना क्यों चाहते हो? इसका यश की बीमारी से क्या वास्ता है?”

जवाब में साहिल ने एक दृष्टि बगल वाली विजिटर्स चेयर पर मौजूद कोमल पर डाली। उसके प्रोफ़ेसर अभी तक चेन्नई से नहीं लौटे थे, इसलिए वह इन दिनों प्रोफ़ेसर चव्हाण के ही चैम्बर में पाई जाती थी। उसके चेहरे को भावहीन पाकर साहिल ने प्रोफ़ेसर को लक्ष्य करके कहा- “आपको वे बातें नहीं पता हैं सर, जो कोमल ने मुझे बताई है। यश के साथ कैंब्रिज में कुछ एब्नार्मल हुआ था। कोमल ने उसके बारे में आपको इसलिए नहीं बताया क्योंकि यश ने उसे मना किया था। यश नहीं चाहता था कि उसे अपना वर्कशॉप बीच में ही छोड़ना पड़े।”

“ऐसी क्या बात हुई थी जो तुमने मुझे नहीं बताई?” प्रोफ़ेसर ने चश्मा दुरुस्त करते हुए कोमल पर दृष्टिपात किया।

“दरअसल सर, एक जानलेवा हमले के बाद यश की मानसिक हालत बिगड़ने लगी थी।” जवाब साहिल ने दिया।

“व्हाट?” प्रोफ़ेसर चौंके।

“आई मीन वह नींद में चलने लगा था और अजीब-अजीब सी हरकतें करने लगा था। जैसे कि खुद से बातें करना..... ।”

“लेकिन...!” प्रोफ़ेसर ने साहिल की बात बीच में ही काटते हुए कहा- “उसके इस बीमारी की वजह तलाशने के लिये तुम वर्कशॉप में हुए पेपर प्रेजेंटेशन का रिकॉर्ड क्यों खंगालना चाहते हो?”

“मुझे लगता है यश पर हमला उसके किसी प्रतिद्वंद्वी ने करवाया था। छात्रों के बीच ऐसी प्रतिद्वंदिता तब पनपती है, जब उनके टॉपिक या कांसेप्ट मेल खाते हों। मेरे ख्याल से यश के जिस राइवल ने उस पर अटैक करवाया था, उसी ने अटैक फेल हो जाने के बाद यश के साथ कुछ ऐसा किया है जिसके कारण पहले तो वह मानसिक व्यतिक्रम का शिकार हुआ, उसके बाद अपनी स्मृतियाँ गँवा बैठा। इसलिए मैं उन स्कॉलर्स के बारे में जानना चाहता हूँ जिनके शोध की विषयवस्तु यश के विषयवस्तु से मिलती-जुलती है।”

साहिल का तर्क सुनकर प्रोफ़ेसर ने गहरी सांस ली और कहा- “तुम्हें पुलिस की मदद लेनी चाहिए। वही इस मामले की ढंग से पड़ताल कर सकती है।”

“जरूरत पड़ने पर मैं ऐसा भी करूंगा सर, लेकिन फिलहाल आप मेरी मदद कीजिये। प्लीज मुझे उन स्कॉलर्स के बारे में बताईये।”

प्रोफ़ेसर, साहिल के आग्रह को टाल न सके और थोड़ी देर तक मनन करने के बाद बोले- “ठीक है साहिल। मैं तैयार हूँ लेकिन इसके बाद रिसर्च स्कॉलर्स के प्रोजेक्ट्स के बारे में जानने के लिए मुझसे कोई उम्मीद मत रखना, क्योंकि मैं पहले ही बता चुका हूँ कि हर यूनिवर्सिटी के रिसर्च प्रोजेक्ट्स कांफिडेंशियल होते हैं, और उनका जिक्र हर किसी से नहीं किया जा सकता। कम से कम ऐसे शख्स से तो बिल्कुल भी नहीं जो एक साधारण व्यक्ति होने के साथ-साथ यूनिवर्सिटी का स्टूडेंट भी न हो।”

“थैंक यू सो मच प्रोफ़ेसर।”

“यश का पेपर ‘एच-एच मॉडल’ यानी कि ‘हाडकिन-हक्सले मॉडल’ पर केन्द्रित था।” प्रोफ़ेसर ने साहिल के उत्साहित लहजे को नजरअंदाज करते हुए कहना शुरू किया- “इस मॉडल का उपयोग ह्यूमन फिजियोलॉजी में होता है। यह न्यूरोनल सेल मेम्ब्रेन से गुजरने वाले आयन करंट और मेम्ब्रेन वोल्टेज के बीच के पारस्परिक सम्बन्ध पर आधारित है, जो न्यूरॉन्स में एक्शन पोटेंशियल की उत्पत्ति और उनके संचरण का विवरण प्रस्तुत करता है। जहाँ तक मुझे याद आ रहा है; पन्द्रह दिन के वर्कशॉप में ‘हाडकिन-हक्सले मॉडल’ के अलावा अन्य किसी बायोलॉजिकल न्यूरॉन मॉडल का जिक्र नहीं किया गया था, और न ही किसी इंडियन या फोरेन स्टूडेंट ने इस मॉडल पर आधारित कोई पेपर प्रेजेंट किया था। लेकिन हाँ, एक लड़की जरूर थी जिसके पेपर का सब्जेक्ट ‘एच-एच मॉडल’ तो नहीं था, किन्तु थीम वही था। उस लड़की ने ह्यूमन फिजियोलॉजी में प्रयुक्त होने वाले गणितीय मॉडल्स पर काफी दिलचस्प आलेख पढ़ा था।”

“क्या नाम था उस लड़की का? क्या वह इंडिया से थी?” साहिल का उद्वेलित लहजा।

“हालांकि वह लड़की इंडिया से तो थी, लेकिन स्टूडेंट कैंब्रिज की थी। दरअसल वह कैंब्रिज की फाइनल इयर की स्टूडेंट थी।”

“लेकिन वह वर्कशॉप तो रिसर्च स्कॉलर्स के लिए था। परम्परागत छात्र होते हुए भी उस लड़की ने वर्कशॉप में हिस्सा कैसे ले लिया?”

“उसे डीन की स्पेशल परमिशन मिली हुई थी। संभवत: वह लड़की कैंब्रिज के ब्राइट स्टूडेंट्स में से एक थी।”

“क्या नाम था उस लड़की का?” साहिल ने अपना सवाल दोहराया।

“संस्कृति ठाकुर।”

“स....संस्कृति ठाकुर..।” साहिल के जेहन में मानो कोई कांच असंख्य टुकड़ों में टूट कर बिखरा- “आर यू श्योर अबाउट दिस नेम?”

“यस....आयम श्योर। मैं ही क्यों, उसका आर्टिकल सुनने वाला कोई भी प्रोफ़ेसर उसका नाम नहीं भुला होगा। शी वाज अ ब्राइट स्टूडेंट। लेकिन तुम इस तरह हैरान क्यों हो रहे हो? क्या तुम इस लड़की को पहले से जानते हो?”

“नहीं; लेकिन इस नाम की एक लड़की आज सुबह से ही मेरे कौतुहल का केंद्र बनी हुई है। अगर आपने आज की सबसे बड़ी न्यूज़ पढ़ी होगी तो आपको मालूम होगा कि उस लड़की का भी यही नाम है जिसने दो दिन पहले ही मंत्री के बेटे वैभव से शादी करने से साफ़ मना कर दिया था।”

“हाँ। वह भी हाल में ही कैंब्रिज से ग्रेजुएट होकर लौटी है। इट मे बी कि ये संस्कृति वही संस्कृति हो जिसका मैंने अभी-अभी जिक्र किया।”

“मुझे अब किसी भी कीमत पर इस लड़की से मिलना है।” साहिल कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। वह व्यग्र नजर आने लगा था- “थैंक्स प्रोफ़ेसर फॉर योर वैल्युएबल टाइम। मुझे लगता है कि यश के साथ कैंब्रिज में क्या हुआ था; ये जानने का मुझे एक ठोस जरिया मिल चुका है।”

साहिल प्रोफ़ेसर की प्रतिक्रिया जाने बगैर चैम्बर से बाहर निकल गया। प्रोफ़ेसर तो नहीं समझ सके कि वह, संस्कृति को जरिया क्यों समझने लगा था, किन्तु वहां मौजूद कोमल, उसकी मन:स्थिति को भांप गयी थी।

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मरघट में खामोशी पसरी हुई थी। एक छोर से धुंआ उठ कर आकाश में विलीन हो रहा था, शायद स्थानीय लोगों द्वारा किसी का दाह-संस्कार किया जा रहा था। दूर-दूर तक परिंदे भी नजर नहीं आ रहे थे। अरुणा ने दृष्टि की सीमा तक फैले जनशून्य श्मशान पर दृष्टि डाली और फिर उस प्राणी की ओर मुड़ी, जो नर-भेड़िये की मूर्ति के पास खड़ा था।

उस आदमी की मुखमुद्रा अजीबोगरीब थी। लगभग तीस वर्ष की अवस्था वाले उस व्यक्ति के सांवले चेहरे पर अप्रत्याशित तेज था। वह काजल युक्त बड़े-बड़े नेत्रों से शून्य को यूं घूर रहा था, मानो उसे कुछ नजर आ रहा था। उसने जिस्म पर अत्यंत उजली धोती लपेट रखी थी। उसके चौड़े मस्तक पर त्रिपुंड था और सफाचट सिर पर किसी वयस्क व्यक्ति के अंगूठे के समान मोटी चोटी थी, जो गर्दन तक लटक रही थी। आठ फीट से भी अधिक लम्बाई होने के उपरांत भी उसके कमर में लेशमात्र भी झुकाव नहीं था। अत्यधिक ऊंचे कद, गठीली देहयष्टि और चेहरे पर व्याप्त तेज के कारण उसका व्यक्तित्व किसी देव-पुरुष की भांति विलक्षण प्रतीत हो रहा था। हालांकि वह सामान्य प्राणी ही था, किन्तु उसकी रहस्यमयी शारीरिक भाषा और मुखमंडल के भाव देख किसी को भी उसके सामान्य प्राणी होने पर संदेह हो सकता था।

अरुणा चहलकदमी करते हुए उस व्यक्ति के निकट आयी और सम्मान भरे लहजे में बोली- “संकेत प्राप्त हो रहे हैं प्रभु कि द्विज का बड़ा भाई शहर से यहाँ आने के लिए प्रस्थान कर चुका है।”

आदमी की मुद्रा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

“उसके साथ द्विज नहीं है। संभव है कि द्विज को उसने किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया है।”

आदमी की मुद्रा में इस बार भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

“प्रतिक्रिया दीजिये प्रभु।”

आदमी ने अरुणा की ओर गर्दन घुमाई। हलचल केवल उसके धड़ के ऊपरी हिस्से में ही हुई, गर्दन के नीचे के हिस्से में जरा भी कम्पन नहीं हुआ। उसने प्रभावशाली अंदाज में कहा- “आज रात्रि हम उसका शिकार करेंगे।”

जवाब पाकर अरुणा ने श्रद्धा-भाव से सिर झुका लिया।

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