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Horror ख़ौफ़

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राजमहल।

शंकरगढ़ का सबसे आलीशान आवास होने के साथ-साथ इस बात का भी गवाह कि बीते हुए दौर में शंकरगढ़ एक सम्पन्न रजवाड़ा हुआ करता था, जिसके हुक्मरान राजमहल जैसे भव्य भवन में रहा करते थे। कई एकड़ में फैला राजमहल आज भी पांच सौ साल पुरानी वास्तुकला की भव्यता से लोगों को दांतों तले उंगली दबाने पर विवश करता था। राजमहल देश की उन ऐतिहासिक इमारतों में से एक था, जो मुस्लिम शासकों की बादशाहत से लेकर अंग्रेजों की गुलामी तक के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं। महल, प्राचीर से पांच सौ मीटर अन्दर स्थित था, जहां तक पहुंचने के लिये मुख्य व्दार से दो पक्की सड़कें विपरित दिशा में गयी हुई थीं, जिनके दोनों ओर अमरैन्थस की घनी क्यारियां थीं। महल के प्रांगण के ठीक मध्य में, लगभग पन्द्रह मीटर त्रिज्या के वृत्ताकार घेरे में मखमली और मुलायम घास उगायी गयी थी। उस घेरे की परिधि पर गेंदा, गुलाब, कुमुदनी इत्यादि भिन्न-भिन्न फूलों के पौधे बगैर किसी अन्तराल के लगाये गये थे, जिनमें उगने वाले भिन्न-भिन्न रंगों और अलग-अलग प्रजाति के फूल शोभायमान थे। उस वृत्ताकार घेरे के बीच में कमर पर घड़ा टिकाए हुए एक युवती की संगमरमर की मूर्ति थी। उसके घड़े से निकलने वाली पानी की पतली धारा को इस प्रकार समायोजित किया गया था कि थोड़ी उंचाई तक उठने के बाद धारा सीधे मैदान की परिधि पर लगाए गये फूलों के पौधों पर ही गिरती थी।

युवती की प्रतिमा विद्युत युक्ति के जरिये अपने स्थान पर घूर्णन भी कर सकती थी। इस युक्ति का सबसे बड़ा लाभ राजमहल के मालियों को होता था, क्योंकि उन्हें फूलों के पौधों को अलग से पानी नहीं देना पड़ता था, यह काम फब्बारे के रूप में घूर्णन करती युवती की बेजान प्रतिमा कर देती थी। रात के समय फूलों के पौधों तथा प्रतिमा की दोनों आंखों में पुतलियों के स्थान पर लगे सजावटी बल्बों की रोशनी स्वार्गिक सौन्दर्य का बोध कराती थी। संगमरमर की प्रतिमा के जूड़े से भी जल की धारा निकलती थी, जो घड़े से निकलने वाली धारा की अपेक्षाकृत अधिक मोटी थी। ये धारा वैकल्पिक थी, जिसे किसी विशेष आयोजन पर ही, जब फब्बारे को आकर्षण का प्रमुख केन्द्र बनाना आवश्यक होता था, तब छोड़ा जाता था।

मुख्य प्रवेश व्दार से विपरित दिशाओं में जाने वाली दोनों सड़कें, इसी फब्बारे वाले वृत्ताकार घेरे के दोनों ओर से होते हुए महल के मुख्य व्दार पर आकर मिल जाती थीं। राजमहल के प्रत्येक मंजिल के बरामदे में बैंगनी रंग के रेशमी लटक रहे थे, जिनके किनारों पर सितारे टंकी हुई सुनहरी पट्टियां लगी हुई थीं, ताकि सूरज की रोशनी में वे चमक सके। कम शब्दों में इतना ही कहना पर्याप्त था कि शंकरगढ़ का राजमहल ऐसे लोगों की तलाश का अंत था, जो इस आधुनिक युग में राजसी ठाठ देखने हेतु लालायित रहते हैं।

दिग्विजय ठाकुर।

शंकरगढ़ रियासत की बागडोर सम्भालने वाले वंश की वर्तमान पीढ़ी के अगुआ। वक्त के सदैव परिवर्तित होने के सर्वोत्तम गुण और भारत में लोकतंत्र के आगमन के बाद राजशाही प्रथा का अन्त भले ही हो गया था, किन्तु आजादी के सत्तर साल बाद भी शंकरगढ़ में दिग्विजय ठाकुर का वही रुतबा था, जो भारत में लोकतंत्र आने से पहले इनके पूर्वजों का हुआ करता था।

सत्ता के गलियारे में गहरी पैठ होने के कारण दिग्विजय ठाकुर आज भी अपने पूर्वजों की राजशाही प्रथा को जीवित रखने का ‘गौरवशाली’ कार्य कर रहे थे। हालांकि तीन भाइयों में सबसे बड़े दिग्विजय की गोद में ईश्वर ने संतान के रूप में केवल संस्कृति को ही डाला था, किन्तु अन्य दो भाइयों अरुणोदय और चन्द्रोदय के सन्दर्भ में ईश्वर ने ऐसा नहीं किया था और उन्हें संतान के रूप में लड़कों के सुख से नवाजा था। अरुणोदय और चन्द्रोदय, दोनों के ही एकलौते लड़के संस्कृति से छोटे थे और बोर्डिंग स्कूल में रहकर पढ़ाई कर रहे थे। कुल मिलाकर संस्कृति अगली पीढ़ी में सबसे उम्रदराज थी, जो आज पूरे दस साल बाद, ‘यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैम्ब्रिज’ के ट्रिनिट हॉल से मैथेमैटिक्स में ग्रेजुएट होकर शंकरगढ़ लौट रही थी।

राजमहल के प्रत्येक नौकर की सुबह से ही भागदौड़ जारी थी। दर्जन भर नौकरों में से शायद ही ऐसा कोई नौकर था, जिसने चैन से बैठकर कुछ देर तक आराम किया था। राजमहल के प्रांगण में सफेद तम्बू लगा हुआ था। जगह-जगह पर हवा के लिये मिनी कुलर्स और लोगों के बैठने के लिये वीआईपी चेयर्स के इन्तजाम थे। जमीन पर ईरानी कालीन बिछाये गये थे। पण्डाल में एक तरफ मंच भी बना हुआ था, जो धरातल से छः फीट ऊंचा था। चारों ओर ईत्र और गुलाब जल के छिड़काव के कारण वातावरण सुगन्ध से परिपूर्ण था। फब्बारा ऑन था। हर रोज दोपहर के वक्त कुम्हलाये रहने वाले फूल भी आज रोज की अपेक्षाकृत मुस्कुराते से लग रहे थे। प्रत्येक रोज भीषण गर्मी से झुलसने वाला राजमहल का प्रांगण आज लोगों की चहल-पहल से गुलजार था। मेहमानों का आगमन शुरू हो गया था, अत: लोगों की गर्दिश में भी धीरे-धीरे इजाफा होने लगा था। शाही पोशाक पहने हुए कुछ नौकर हाथ में ट्रे लिये हुए टहल रहे थे। दिग्विजय के खानदान अथवा रिश्ते से ताल्लुक रखने वाला हर शख्स केसरिया साफा बांधे हुए था, क्योंकि राजमहल के प्रत्येक समारोह में सिर पर केसरिया साफा बांधना उनके खानदानी उसूलों में से एक था।

अचानक गूंज उठी गाड़ी की आवाज ने पण्डाल में मौजूद सभी लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। सफेद इण्डिगो मेन गेट से अन्दर दाखिल हुई थी, और अब सड़क को रौंदते हुए तेजी से राजमहल के मुख्य व्दार की ओर बढ़ रही थी।

‘छोटी मालकिन आ गयीं...छोटी मालकिन आ गयीं।’

पण्डाल में मेहमानों का स्वागत कर रहे नौकर इण्डिगो को देखते ही खुशी से चिल्ला उठे। अन्य सदस्यों को सूचित करने के ध्येय से एक नौकर सारे काम छोड़कर अन्दर की ओर भाग खड़ा हुआ।

इण्डिगो महल के मुख्य व्दार पर रुकी। पहले ड्राइविंग डोर खोलकर बंशीधर बाहर आया। फिर उसने पिछला डोर खोलकर संस्कृति को बाहर आने का इशारा किया। अब-तक राजमहल की महिलाओं के साथ-साथ संस्कृति के पिता दिग्विजय और उसके दोनों चाचा भी बाहर आ चुके थे। सबसे आगे संस्कृति की मां सुजाता थीं, उनके हाथ में पूजा की थाली थी।

गाड़ी से बाहर आते ही संस्कृति दौड़ कर दिग्विजय से जा चिपकी।

“मिस्ड यू अ लॉट डैडी।”

संस्कृति ने दिग्विजय के ऊपर चुम्बनों की बौछार कर दी। बाप-बेटी का प्यार देख पण्डाल में उपस्थित सभी मेहमानों के होठों पर मुस्कान रेंग गयी। कुछ देर तक दिग्विजय के साथ प्रेमालाप करने के बाद संस्कृति अपने दोनो चाचाओं और छोटी मांओं से भी उतने ही उत्साह से रूबरू हुई, जितने उत्साह से दिग्विजय से रूबरू हुई थी। अंतत: वह सुजाता की ओर मुड़ी।

“फाइनली...इट्स योर टाइम मम्मम।”

“सबसे अन्त में हमारी याद आई तुम्हें?” सुजाता ने शिकायती स्वर में कहा।

संस्कृति, सुजाता के गले लगने को आतुर हुई, किन्तु उनके हाथ में पूजा की थाली होने के कारण ठहर गयी।

“ये क्या मम्मी? आते ही पूजा की थाली?”

“पूरे दस साल बाद हमारी लक्ष्मी घर लौटी है। बिना आरती के घर में प्रवेश करेगी तो इसे अशुभ माना जाएगा।”

“एक्सक्यूज मी मम्मी।” संस्कृति चिढ़ कर बोली- “आई एम संस्कृति, नॉट लक्ष्मी।”

सुजाता बगैर कुछ बोले थाली में रखा कपूर जलाने लगी।

“ये क्या जला रही हो मम्मी?”

“कपूर जला रही हूं, आरती के लिये। दस साल के लिये विलायत क्या चली गयी, सारे कायदे ही भूल गयी?”

“नो मम्मी। प्लीज।” संस्कृति ने झपटकर सुजाता के हाथ से थाली छिनते हुए कहा- “प्लीज ये आरती वाला आइडिया ड्रॉप कर दीजिए। आप तो जानती ही हैं कि मुझे बचपन से ही आग से डर लगता है।”
 
“लेकिन.....।” सुजाता ने कुछ कहना चाहा, किन्तु उनका वाक्य पूरा होने से पहले ही संस्कृति ने थाली दिग्विजय को थमाते हुए कहा- “प्लीज पापा। ये आरती वाला आइडिया ड्रॉप करवाइए न?”

“रहने दो सुजाता। जब बिटिया मना कर रही है, तो तुम्हें जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए।”

दिग्विजय ने संस्कृति का पक्ष लिया। इस वजह से नहीं कि वह दस साल बाद लौटी थी। दरअसल वजह ये थी कि उन्हें संस्कृति की हर छोटी-बड़ी मांग के आगे घुटने टेकने की आदत थी। उनकी इस आदत के कारण कभी-कभी सुजाता बुरी तरह चिढ़ जाती थीं, ठीक वैसे ही जैसे इस समय चिढ़ गयी थीं। उन्होंने आरती की थाली को अनमने ढंग से एक नौकर की ओर बढ़ा दिया।

“थैंक यू, माय क्यूट मम्मम।”

कहने के बाद संस्कृति ने सुजाता को जोर की झप्पी दी।

“चलो अब जल्दी करो। संस्कृति को अभी तैयार भी होना है। हमारे स्पेशल गेस्ट आधे घण्टे में पहुंचने वाले हैं।”

दिग्विजय की उपरोक्त घोषणा सुनते ही सबने मानो यथार्थ में वापसी की।

“पापा किस स्पेशल गेस्ट की बात कर रहे हैं मम्मी?” संस्कृति, सुजाता की कान में फुसफुसायी।

“सब्र रख। जल्द ही पता चल जाएगा।” सुजाता ने मुस्कुराते हुए कहा।

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मृत्युंजय सिंह ठाकुर, राज्य मंत्रिमण्डल में ऊर्जा मंत्री था। फितरत से इस दर्जे का अय्याश था कि कई बार पार्टी की साख पर बट्टा लगने का प्रमुख कारण बन चुका था। लूट-खसोट को वह राजनेताओं का जन्मसिध्द अधिकार समझता था। उसका मानना था कि कोई भी राजनेता हंस के सदृश जीवनपर्यन्त उजला नहीं बना रह सकता। यदि सच्चाई और ईमानदारी जैसे घातक रोग की वजह से वह अपना कुर्ता सफेद रखने में सफल होता भी है, तो देर से ही सही, अपोजिशन की ओर से उछाले गये किचड़ उसे गन्दा कर ही देते हैं। दिग्विजय का करीबी होने के कारण राजमहल के हर छोटे-बड़े समारोह में उसकी उपस्थिति अनिवार्य होती थी, इसीलिये संस्कृति के आगमन के उपलक्ष्य में आयोजित पार्टी में उसका आना तय था। दिग्विजय-सुजाता के साथ-साथ अरुणोदय और चन्द्रोदय भी सपत्निक पण्डाल में ही थे। मेहमानों की आवाभगत के साथ-साथ दिग्विजय क्षणिक अन्तराल पर मेन गेट की ओर भी देखते जा रहे थे। पण्डाल में कोई वेस्टर्न धुन चल रही थी।

“मृत्युंजय कहां रह गया?” दिग्विजय रिस्टवॉच देखते हुए बड़बड़ाये।

“पॉलिटिशियन लोग हैं भइया। समारोहों में प्रतीक्षा करवाना इनकी आदत में शुमार होता है।” चन्द्रोदय ने कहा।

इससे पहले कि चन्द्रोदय की बात पर दिग्विजय ठहाका लगा पाते, उनकी प्रतीक्षा अन्त को प्राप्त हो गयी। मेन गेट से कई गाडियां अप्रत्याशित तेजी के साथ अन्दर दाखिल हुयीं।

“मंत्री साहब आ गये भइया।” अरुणोदय ने उत्साहित स्वर में कहा।

मंत्री महोदय की बीएमडब्ल्यू के आगे और पीछे चार-चार काले मार्शल थे, जिन पर चढ़े ब्लैक शीशों में पण्डाल के ज्यादातर हिस्सों के अक्स छप गये। सारी गाड़ियां एक ही स्विच से जुड़ी हों, कुछ इसी अंदाज में रुकीं। सभी मार्शल्स के डोर एक साथ खुले। सुरक्षाकर्मी बाहर निकले और पण्डाल में छिटककर पोजीशन अख्तियार कर लिए। इस गहमागहमी के बीच पण्डाल की हलचल थम सी गयी। थोड़ी देर पहले चल रही वेस्टर्न धुन भी रोक दी गयी। गाड़ियों की कतार के ठीक बीच में खड़ी बीएमडब्ल्यू के भी डोर खुले। सबसे पहले मंत्री महोदय के चार निजी अंगरक्षक बाहर आये, तत्पश्चात मंत्री महोदय के पाँव गाड़ी से बाहर आये। दिग्विजय इत्यादि एक साथ उनकी ओर लपके।

मृत्युंजय के साथ उसकी पत्नी और एकलौता बेटा भी था। मृत्युंजय सांवले वर्ण और औसत कद का पचास की उम्र पार कर चुका प्राणी था। उसकी आँखें छोटी-छोटी थीं, जो चेहरे के भरे हुए होने कारण कोटरों में धंसी हुई नजर आती थीं। जिस्म पर मौजूद सफेद कुर्ता उसकी तोंद पर से होते हुए घुटनों तक लटक रहा था।
 
मृत्युंजय की पत्नी का कद नाटा था। रंग गोरा तो था किन्तु नैन-नक्श इस दर्जे के न थे कि उसे ‘खूबसूरत’ विशेषण से नवाजा जा सकता। चर्बीयुक्त बेडौल जिस्म पर लदे गहने देख कर उसे औरत की बजाय गहनों की चलती-फिरती दुकान कहना ज्यादा मुनासिब था। वैभव नामधारी मृत्युंजय के बेटे का कद अधिक ऊंचा न होते हुए भी कम से कम मां-बाप से तो ऊंचा ही था। उसके बाल घुंघराले थे। चमड़े की रंगत बाप की रंगत से मेल खाती थी। रंगीनमिजाजी में वह बाप से भी कई हाथ आगे था। तेजरहित आंखों में व्याप्त लालिमा के बीच नशे के डोरे भी नजर आ रहे थे। कदमों की लड़खड़ाहट बता रही थी कि उसने ड्रिंक कर रखा था। शायद यही वजह थी, जो मंत्री महोदय के निजी अंगरक्षकों में से एक उसके करीब था, ताकि कदमों की लड़खड़ाहट उसके लुढ़कने की वजह न बनने पाए।

“राजमहल में तुम्हारा स्वागत है मृत्युंजय।” दिग्विजय अपनी दोनों बाहें फैलाये हुए मृत्युंजय की ओर बढ़े और देखते ही देखते वे दोनों एक दूसरे से लिपट गये।

“माफी चाहता हूं ठाकुर साहब। थोड़ी सी देर हो गयी।” मृत्युंजय मुंह फाड़ते हुए बाकी लोगों की ओर मुखातिब हुआ।

“हमें कोई ऐतराज नहीं है मंत्री महोदय। हमने ये समझकर संतोष कर लिया कि आप करीबी दोस्त की पार्टी को भूल से किसी स्कूल या कॉलेज का फंक्शन समझ बैठे होंगे।”

अरुणोदय के कथन पर ठहाके गूंज उठे। मृत्युंजय, अरुणोदय और चन्द्रोदय से भी उतनी ही गर्मजोशी से मिला, जितनी गर्मजोशी से वह दिग्विजय से मिला था।

“कई अर्से गुजर गये इस आपसी रिश्ते को ‘करीबी दोस्ती’ का नाम देते हुए। अब तो हम चाहते हैं कि इस रिश्ते का नाम बदलकर कुछ और रख दिया जाए।” मृत्युंजय की बीबी ने खींसे निपोरी।

“जी हाँ...जी हाँ...! क्यों नहीं? हम तो कब से आपकी ओर से ‘हां’ का इन्तजार कर रहे हैं।”

“रिश्ते से याद आया....संस्कृति कहीं नजर क्यों नहीं आ रही है?” मृत्युंजय ने चारों ओर नजरें घुमाते हुए कहा।

“संस्कृति कहां रह गयी सुजाता?” दिग्विजय, सुजाता की ओर पलटे।

“अभी तैयार हो रही होगी शायद। गांव की लड़कियां उसके साथ हैं।”

“अगर संस्कृति को तैयार करने के लिये तुमने गांव की लड़कियों को लगाया है तो इस काम में अभी एक घण्टा और लगेगा। उनका ध्यान संस्कृति को तैयार करने में कम और विलायत के अनुभव सुनने में ज्यादा होगा। तुम जाओ और उसे अपने साथ लेकर आओ।”

“अभी जाती हूं।”

सुजाता पलटीं और महल की ओर बढ़ चलीं।

“विराजिए मंत्री जी।”

मृत्युंजय बीबी और बच्चे के साथ अपने लिए निर्धारित स्थान पर विराजमान हो गया। थोड़ी ही देर में नौकरों ने मेज को नाश्ते से भर दिया।

“राजनीतिक जीवन कैसा चल रहा है मंत्री जी?”

“अभी तक पानी शांत है।” मृत्युंजय ने अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ कहा- “विपक्ष की ओर से कंकड़ मारकर कोई हलचल पैदा करने की कोशिश नहीं की गयी है।”
 
“आगामी चुनाव में आपको विपक्ष की ओर से कड़ी टक्कर मिलने की उम्मीद है। आपकी सरकार की दो-चार खामियों को मुद्दा बनाकर उन्होंने कई दिनों तक विधानसभा की कार्यवाही को ठप्प कर रखा था।”

“विपक्ष की ओर से अगर इतना भी हंगामा न हो तो फिर उसे विपक्ष कौन कहेगा।” मृत्युंजय लापरवाह अंदाज में हंसा- “फिलहाल हमारी पार्टी भी चुनावी जीत का चाणक्य कही जाने वाली दिग्गज हस्तियों से भरी पड़ी है। इस बार भी जीत हमारी ही होगी।”

“आमीन।”

उनके बीच चल रही इस तरह की बातों का सिलसिला लगभग बीस मिनट बाद तब थमा जब सुजाता, संस्कृति को लेकर आती हुई नजर आयी। वैभव की निगाहें संस्कृति पर ठहरीं तो फिर वहां से फिसल न सकीं।

संस्कृति ने गोल्डन बॉर्डर वाली नीली साड़ी पहन रखी थी, और उसी के साथ मैच करता स्लीवलेस ब्लाउज भी। चूंकि उसने पहली बार साड़ी पहनी थी, इसलिये सम्भल कर चलने के प्रयास में नजाकत उसकी चाल में स्वतः ही शामिल हो गयी थी। उसकी खूबसूरती वैभव के दिल पर बिजली बनकर गिरी। रोकने के लाख प्रयासों के बाद भी उसके होठों से अस्फुट स्वर में निकल ही पड़ा- “गॉर्जियस।”

संस्कृति ने आते ही सबसे पहले मृत्युंजय और उसकी बीबी के पांव छुए।

“जीती रहो।” मृत्युंजय के कुछ बोलने से पहले ही उसकी बीबी चहक उठी- “हमें डर था कि कहीं हमारी होने वाली बहु विलायती संस्कारों में रंग कर भारतीय परम्पराओं को भूल न गयी हो, लेकिन ईश्वर का शुक्र है कि ऐसा नहीं हुआ। दस साल विलायत में गुजारने के बाद भी तुम्हारे अन्दर भारतीय संस्कार जीवित हैं।”

संस्कृति पर मानो वज्रपात हुआ। ‘होने वाली बहु।’ इस वाक्यांश ने उसे पाषाणप्रतिमा में तब्दील कर दिया। मृत्युंजय की बीबी के साथ-साथ वहां मौजूद हर शख्स के चेहरे पर मुस्कान देख वह सुजाता की ओर पलटी। मां होने के नाते सुजाता उसकी भावनाओं को समझ गयीं। उन्होंने मृत्युंजय के बगल में बैठे वैभव, जिसकी निगाहें अब-तक एक पल के लिये भी संस्कृति के चेहरे से नहीं हटी थी, की ओर इशारा करते हुए कहा- “ये वैभव है। मंत्री साहब का इकलौता लड़का। इसी साल एमबीए पासआउट हुआ है।”

वैभव मानो इसी की प्रतीक्षा कर रहा था। संस्कृति की ओर से कोई प्रतिक्रिया आती, इससे पहले ही वह तपाक से उठ खड़ा हुआ, और अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाते हुए बोला- “आपको देख कर खुशी हुई मिस गॉर्जियस। यू ऑर रियली सो हॉट एण्ड सेक्सी।”

बोलते समय वैभव की सांसों से आती शराब की दुर्गन्ध के कारण संस्कृति को ऊबकाई आयी। पहली मुलाकात में ही उसका जेहन वैभव के प्रति घृणा से भर गया। उसे ज़रा भी अनुमान नहीं था कि वैभव सभ्यता से इतना दूर होगा कि बड़ों के सामने ही उसके लिए ‘हॉट एण्ड सेक्सी’ जैसे घटिया कॉम्प्लिमेण्ट का प्रयोग कर देगा। उसने ऐसे इंसान के साथ हाथ मिलाने के बजाय हाथ जोड़ना बेहतर समझा।

“सेम हियर।” हाथ जोड़ते हुए वह बड़ी मुश्किल से मुस्कुरा पायी। इस दौरान उसे पहली दफा पता चला कि किसी के प्रति मन में घृणा रखते हुए मजबूरीवश उसके लिये मुस्कुराना कितना दुरुह कार्य होता है।

वैभव ने शर्मिंदगी महसूस करते हुए अपना हाथ वापस खींच लिया, जबकि अन्य लोग संस्कृति के इस व्यवहार को नारी सुलभ आचरण समझ कर हंस पड़े।

“हमें इन दोनों को अकेला छोड़ कर किसी और टेबल पर चलना चाहिए, ताकि घोषणा होने तक ये दोनों एक-दूसरे से बेहतर ढंग से रूबरू हो जाएंगे।”
 
दिग्विजय का निर्णय सुन सभी खड़े हो गये। संस्कृति समझ गयी कि उसके डैड क्या घोषणा करने वाले हैं। ‘डैडी मेहमानों के सामने इस लम्पट के साथ मेरी शादी की ऑफिसियल अनाउन्समेण्ट करेंगे।’ इस अनुमान के जेहन में दस्तक देते ही संस्कृति ने एक बार फिर असहज होकर सुजाता की ओर देखा। सुजाता भी अन्य लोगों की तरह वहां से जा रही थीं, किन्तु संस्कृति उन पर झपट पड़ी।

“य....ये अचानक हो क्या रहा है मम्मी? क्या डैडी के पास टाइम पास करने के लिये यही एक घटिया जोक था?”

“धीरे बोल। तेरे ग्रेजुएट होने की खुशी में डैडी ने तुझे सरप्राइज गिफ्ट दिया है।”

“ये नमूना? य..ये नमूना मेरा सरप्राइज गिफ्ट है?” हैरान संस्कृति ने वैभव पर एक नजर डाली।

“हां। अब जा।”

“लेकिन मम्मी......।”

संस्कृति की बात अनसुनी करते हुए सुजाता भी वहां से निकल गयीं। मां-बेटी के बीच हुए इस संक्षिप्त वार्तालाप को कोई तीसरा न सुन सका। संस्कृति टेबल की ओर पलटी, जहाँ अकेला बैठा वैभव उसी की ओर देख रहा था। संस्कृति ने निचला होंठ दांतों तले दबाया। आँखें बन्द की। गहरी सांस लेकर आने वाली चुनौतियों के लिये खुद को तैयार किया और टेबल के पास पहुंची।

“मैंने सुना है कि तुम उस कॉलेज से पढ़ कर आयी हो, जहां से न्यूटन ने अपनी रिसर्च पूरी की थी।” संस्कृति के बैठते ही वैभव ने कहा।

“हां।” ‘तुम’ शब्द के इस्तेमाल से संस्कृति फिर तिलमिलाई, किन्तु उसने इसका प्रभाव वार्तालाप की शैली पर नहीं पड़ने दिया और आगे कहा- “कैम्बिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनिटी कॉलेज से। यहीं से स्टीफन हॉकिंग ने भी कॉस्मोलॉजी में रिसर्च की थी।”

“तुमने मुझसे हाथ क्यों नहीं मिलाया?”

“क्योंकि मुझे अजनबियों के साथ शेकहैंड्स करना पसंद नहीं है।”

“हम अजनबी नहीं हैं। हम दोनों के परिवार वाले एक-दूसरे के बेहद करीब हैं।”

“मैं हर उस शख्स को अजनबी मानती हूं, जिसे मैं पर्सनली नहीं जानती।”

“हम एक दूसरे को पर्सनली जान सकें, इसलिये हमें अकेला छोड़ा गया है। तुम मेरे बारे में जो कुछ जानना चाहती हो, पूछ सकती हो।”

“मैं आप में इंटरेस्टेड नहीं हूँ।”

“कमाल है।” वैभव ने खींसे निपोरी- “हमारी शादी होने वाली है। एक-दूसरे से जुड़ी बेसिक चीजें तो जाननी ही होंगी।”

“किसने कहा कि हमारी शादी होने वाली है?”

संस्कृति का सख्त स्वर और वैभव भौचक्क।

“तो क्या....तो क्या तुम्हें नहीं मालूम कि तुम्हारे कैम्ब्रिज से लौटने की खुशी के नाम पर ये पार्टी इसीलिये ऑर्गेनाइज की गयी है ताकि मेरे और तुम्हारे डैड, हम दोनों की शादी की ऑफिसियल अनाउन्समेण्ट कर सकें?”

“हां। लग तो मुझे भी ऐसा ही रहा है कि मेरे फैमिली वाले मुझे बताये बिना ही मेरी लाइफ की एक इम्पोर्टेण्ट डिसीजन ले चुके हैं। लेकिन इतना तो तय हैं कि इस टॉपिक पर जब तक मैं कुछ नहीं बोलूंगी, तब तक किसी भी अनाउन्समेण्ट को ऑफिसियल नहीं कहा जा सकता। शादी मुझे करनी है, मेरे डैड को नहीं।”

वैभव आसामान से सीधा जमीन पर आ गिरा। उसे सूझा ही नहीं कि क्या जवाब दे।

“क्या हुआ? साड़ी में लिपटी एक लड़की के होठों से मॉडर्न बातें सुन कर भौच्चक रह गये आप?” संस्कृति, वैभव की मनोदशा पर खुल कर हंसी।

“जब खुद को इतना मॉडर्न समझती हो कि अपने किसी फैसले में पैरेण्ट्स की थिंकिंग को कोई अहमियत नहीं देती हो, तो फिर भारतीय आचरण का अनुसरण करने का ये दिखावा किसलिये?” वैभव चिढ़ गया।

“मैं कोई दिखावा नहीं करना चाहती थी, और न ही दो गज के कफन जैसी इस साड़ी में लिपटना चाहती थी, लेकिन मम्मी के कहने पर मुझे ऐसा करना पड़ा। मम्मी चाहती थीं कि मैं मेहमानों के सामने भारतीय परम्पराओं में ढली लड़की के रूप में पेश आऊँ।”

परिवार के सदस्यों की अनुपस्थिति में संस्कृति को मानो अपनी भड़ास निकालने का पूरा मौका मिल गया था।

“तुम कहना क्या चाहती हो?” वैभव आशंकित नजर आने लगा।

“मैं डैडी के फैसले के पक्ष में नहीं हूँ।” संस्कृति ने दो टूक लहजे में कहा।

“यानी कि तुम इस शादी से इनकार कर रही हो?”

“हाँ, क्योंकि मैंने अभी शादी के बारे में दूर-दूर तक कुछ नहीं सोचा है।”

“तो अब सोचो। हमारे देश में लड़कियों की शादी के लिये मिनिमम एज बार अट्ठारह साल है। तुम उस एज बार को क्रॉस कर चुकी हो।”

“जरूरत होने पर मैं भी सोचना शुरू कर दूंगी।”

“तो मैं ये मान लूं कि तुम अपने पैरेण्ट्स के खिलाफ जाकर हमारे रिश्ते को नामंजूर कर दोगी?”

“बेशक। मुझे तो यहां आने तक ये पता भी नहीं था कि मेरे ग्रेजुएट होने की खुशी में डैडी मुझे ऐसी बेहूदा सरप्राइज गिफ्ट देने वाले हैं।”

“तुम ऐसा नहीं कर सकती।” अब-तक नर्म स्वर में बातें करता वैभव अचानक उग्र हो उठा। उसने हाथ के दोनों पंजे मेज पर टिकाए और संस्कृति की आंखों में झांकते हुए बोला- “मैं तुम्हें ऐसा नहीं करने दूंगा।”

वैभव की सांसों से आती शराब की दुर्गन्ध को संस्कृति झेल न सकी। आखिरकार उसने रुमाल निकाल लिया।

“आप बेवकूफ हैं।”

“माइण्ड योर लैंग्वेज।” वैभव इतनी तेज चीखा कि आस-पास के मेहमानों का रुख उन दोनों की ओर हो गया- “मैं कोई तमाशा नहीं करना चाहता।”

“तमाशा मैं भी नहीं करना चाहती हूँ, इसीलिये ये बातें मैं अकेले में कह रही हूँ। चाहती तो उसी समय कह सकती थी, जिस समय आपकी माँ ने ओवरएक्साइटमेंट में मुझे ‘होने वाली बहु’ का दर्जा दे दिया था।”

“यदि तुमने ये रिश्ता ठुकराया तो तुम्हारा बाप तुम्हें जीते जी जमीन में दफन कर देगा।” वैभव की आँखों से चिंगारियां बरसने लगी थीं। नशे के कारण पहले से ही सूर्ख उसकी आँखें और अधिक सूर्ख हो उठीं।

“आप मेरी कब्र पर दिये जलाने जरूर आना।”
 
संस्कृति के अब-तक के बेबाक अन्दाज पर वैभव बुरी तरह तिलमिला उठा था। उसने दूर मौजूद टेबल पर बैठे अपने मां-बाप को देखा। यहां के हालात से बेखबर वे अपने आप में मगन थे।

“तुम जानती नहीं हो कि तुम क्या कर रही हो।”

“मैं बस उस रिश्ते को ना कर रही हूं, जो मुझे मंजूर नहीं है।”

वैभव गुस्से को निगलने के प्रयास में वह इधर-उधर देखने लगा।

“तो अब मैं चलूं?” जब खामोशी लम्बी हो गयी तो संस्कृति ने उठने का उपक्रम करते हुए कहा।

“बहरहाल; जाते-जाते इतना याद रखना कि मुझे तीखी मिर्च बेहद पसंद है।” वैभव ने दांत पीसते हुए कहा।

“यदि हमारे यहां मिर्च की खेती होती होगी तो जाते समय आपकी गाड़ी में दो-चार टोकरे रखवा दूंगी।” संस्कृति ने सामान्य स्वर में मुस्कुराते हुए कहा और कुर्सी से खड़ी हो गयी।

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“ये सब क्या है मम्मी? मैंने आपको अपना डिसीजन बता दिया है, उसके बाद भी आपने डैडी को...।”

“मुझमें इतनी हिम्मत नहीं है।” संस्कृति की बात काट कर सुजाता ने सख्त स्वर में कहा- “जो फैसला उन्होंने सालों पहले ले लिया है, उसे तुम्हारी जिद के आगे पल भर में बदल नहीं सकते।”

“क्यों नहीं बदल सकते? क्या उनका फैसला मेरी जिन्दगी से बढ़कर है? आप भी कभी मेरी तरह एक लड़की रही होंगी, तो क्या उस समय आपने भी पति के रूप में एक ऐसे वहशी और शराबी की ख्वाहिश की थी, जो किसी लड़की को चाय या कॉफी समझकर उसे ‘हॉट’ जैसे बेहूदे कॉम्प्लिमेण्ट्स पास करता है?”

“वैभव उतना बुरा नहीं है, जितना तुम समझ रही हो। हमारी जिन्दगी में कई बार ऐसा होता है कि हम पहली नजर में जिससे नफरत करते हैं, आने वाले दिनों में उसी से बेइंतहा प्यार कर बैठते हैं।”

“ऐसा सिर्फ नाइंटीज की हिंदी फिल्मों में होता था मम्मी। हिरोईनें जिसे थप्पड़ मारती थीं, बाद में उसी से मोहब्बत कर बैठती थीं।”

“वैभव में तुम्हें क्या बुराई नजर आयी? वह पोस्टग्रेजुएट है। उसके पिता एक सक्सेजफुल पॉलिटिशियन हैं। आलीशान बंगला है। परिवार भी छोटा है।”

“मुझे उसकी आंखों में वह बात नहीं नजर आयी, जो एक लड़की अपने हमसफर की आंखों में देखना चाहती है। उसकी मुस्कुराहट, घूरने का अंदाज और बॉडी लैंग्वेज, सब-कुछ मुझे थर्ड क्लास का लगा। जिसके साथ पांच मिनट स्पेण्ड में मुझे वोमिंग जैसी फीलिंग आने लगी, उसके साथ मैं पूरी लाइफ कैसे स्पेण्ड करुंगी? मैं तो ये सोचकर सरप्राइज्ड हूं कि मुझसे एक बार भी बात किये बगैर डैडी ने इस रिश्ते को अपनी ओर से पक्का कैसे कर दिया? एनी वे, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। डैडी ने इस रिश्ते को लेकर कोई बिग अनाउन्समेण्ट नहीं की है। उनके फैसले से अभी-तक केवल हमारा और वैभव का परिवार ही वाकिफ है।

आप उन्हें कुछ भी बोलने से रोक लीजिए। दो परिवारों की इज्जत नीलाम होने से रह जाएगी।”

“और अगर उन्होंने तुम-दोनों के रिश्ते की घोषणा कर दी तो?....तो क्या करोगी तुम?”

संस्कृति के चेहरे पर दृढ़ता ताण्डव करने लगी। उसने निर्णायक लहजे में कहा- “तो मैं चाहकर भी दो परिवारों की बदनामी को नहीं रोक पाऊँगी। जिस समय डैडी रिश्ते की घोषणा करेंगे, उसके तुरन्त बाद, गेस्ट्स के सामने ही मैं उस रिश्ते को ये कहकर खारिज कर दूंगी कि वैभव मुझे पसंद नहीं है।”

“तो क्या तुम मेहमानों के सामने ये उदाहरण प्रस्तुत करोगी कि ठाकुर खानदान की लड़कियां अब मां बाप की पसंद के बजाय अपने पसंद के लड़कों से शादी करने लगी हैं?”

“हां।” संस्कृति ने लापरवाही से कंधे ऊंचकाए- “इसमें गलत क्या है? लोग तो डेली रूटीन की चीजें खरिदते वक्त भी अपने पसंद के रंगों का ध्यान रखते हैं, ऐसे में जब हम लड़कियां लाइफ पार्टनर ढूंढते वक्त अपनी पसंद को ऊपर रखेंगी तो इसमें हैरानी की क्या बात है?” इससे पहले कि सुजाता कुछ बोलतीं, स्टेज पर मौजूद दिग्विजय की आवाज माइक पर गूंज उठी- “लेडिज एण्ड जेण्टलमैन, शायद मुझे आपको ये बताने की जरूरत नहीं कि संस्कृति अपने परदादा के बाद कैम्ब्रिज से ग्रेजुएट होने वाली ठाकुर खानदान की दूसरी शख्सियत बन गयी है।”

दिग्विजय के खामोश होते ही पण्डाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। चूंकि अब संस्कृति लोगों की निगाहों का केन्द्रबिन्दु बन गयी थी, इसलिये माँ-बेटी के बीच चल रही महत्वपूर्ण बातचीत का अन्त हो गया। तालियों की गड़गड़ाहट तब तक नहीं थमी, जब तक दिग्विजय ने दाहिना हाथ उठाकर लोगों को शांत होने का इशारा नहीं किया। तालियों का स्वर शांत होने के बाद दिग्विजय ने माइक सम्भाला और आगे कहा-“विश्वस्तरीय संस्थान से सफलतापूर्वक अपनी पढ़ाई पूरी करके संस्कृति ने न सिर्फ ठाकुर खानदान को बल्कि पूरे शंकरगढ़ को इस बात के लिये फख्र करने का मौका दिया है कि गांवों में बसने वाले भी विदेशों में जाकर अपनी योग्यता का परचम लहरा सकते हैं। संस्कृति की इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के उपलक्ष्य में आज मैं उसे ऐसा उपहार देने वाला हूँ, जिसे पाने के बाद उसका सारा जीवन इतराते हुए गुजरेगा। आप सभी ये जानते हैं कि एक बाप की ओर से बेटी के लिये सबसे कीमती उपहार एक योग्य जीवनसाथी से बेहतर और कुछ नहीं होता है, इसलिये आज इस महफिल में मैं ये घोषणा करने वाला हूं कि संस्कृति के जीवन की डोर किस लड़के के जीवन से बंधेगी।”

एक ओर पण्डाल में मौजूद प्रत्येक प्राणी रोमांचित हो उठा, तो वहीं दूसरी ओर संस्कृति की चेतावनी के बारे में सोचकर सुजाता बुरी तरह सहम उठीं। अब इतना वक्त नहीं था कि वे स्टेज पर जाकर पति को बेटी के फैसले से अवगत करा पातीं। भावी अनिष्ट को टालने के लिये उन्होंने आँखें बन्द कर ली और मन ही मन भगवती की स्तुति करने लगी। ठीक इसी क्षण दिग्विजय की आवाज दोबारा गूंजी- “लेकिन घोषणा करने से पहले मैं संस्कृति को अपने पास बुलाना चाहता हूं।”

सुजाता ने चौंक कर आँखें खोल दी। उनकी स्तुति अधूरी रह गयी। बगल में देखने पर उन्होंने पाया कि संस्कृति अब अपनी जगह पर नहीं थी, वह आगे बढ़ चुकी थी। उसके कदम भले ही स्टेज की ओर बढ़ रहे थे, किन्तु नेत्र सुजाता पर ही ठहरे हुए थे, मानो आंखों के जरिये जता रही थी कि दो खानदानों की साख का तमाशा बनने की वजह वही हैं। सुजाता जड़वत् रह गयीं। उनकी हिम्मत नहीं हुई कि वह भी स्टेज पर जा सकें। बेटी के एक फैसले ने उन्हें दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया था।
 
मां के अंतर्द्वंद्व की परवाह न करते हुए संस्कृति स्टेज पर पहुंची, जहाँ दिग्विजय के साथ-साथ मृत्युंजय, उसकी पत्नी और वैभव भी थे। संस्कृति ने पहले से ही सोच रखा था कि उसे क्या प्रतिक्रिया देनी है।

संस्कृति के फैसले से अनभिज्ञ दिग्विजय ने उसे वात्सल्यपूर्वक अपने वक्षस्थल से लगाया और दूसरे हाथ में माइक सम्भालते हुए बोले- “हम अपनी बेटी की शादी राज्य के ऊर्जामंत्री मृत्युंजय सिंह ठाकुर के सुपुत्र वैभव सिंह ठाकुर के साथ करने की आधिकारिक घोषणा करते हैं।”

पण्डाल में एक बार फिर तालियों की बाढ़ आ गयी, किन्तु इस बार दिग्विजय ने तालियों को रोकने का कोई उपक्रम नहीं किया।

“साइलेन्स प्लीज।”

पण्डाल में अचानक संस्कृति की आवाज गूंजते ही तालियों का शोर अप्रत्याशित ढंग से बंद हुआ। लोगों को नजर आया कि संस्कृति ने माइक अपने हाथ में ले ली थी। कुछ बोलने से पूर्व उसने दिग्विजय की ओर देखा। उसकी हरकत पर दिग्विजय, मृत्युंजय और उसकी बीबी सकते में आ गये, जबकि वैभव के चेहरे पर मौजूद भाव बता रहे थे कि वह संस्कृति की हरकत का आशय भांप चुका था। स्टेज के नीचे मौजूद सुजाता का कलेजा हलक में आ फंसा।

“हमारी लाइफ में कुछ डिसीजन्स ऐसे होते हैं, जिन्हें हम कभी-कभी अपने पैरेन्ट्स से कहीं ज्यादा बेहतर ढंग से ले सकते हैं।” संस्कृति ने माइक को दोनों हाथों से थामकर होंठों तक ले जाते हुए कहा- “शादी उन्हीं डिसीजन्स में से एक है।”

पण्डाल में उपस्थित प्रत्येक शख्स अवाक रह गया। दिग्विजय को यकीन ही नहीं हुआ कि जिस बेटी की उपलब्धियों की उन्होंने थोड़ी देर पहले तारीफ़ की, उसी बेटी ने चौंका दिया है। दिग्विजय की निगाहें सुजाता को तलाशने लगीं, किन्तु सुजाता उन्हें कहीं नहीं नजर आयीं। मौके की नजाकत को भांपते हुए उन्होंने वहां से हट जाना ही बेहतर समझा था। धीरे-धीरे मेहमानों के बीच खुसर-फुसर शुरू हो गयी।

“मैं ये बताते हुए जरा भी गिल्टी नहीं फील नहीं कर रही हूं कि डैड जिसे मेरा लाइफपार्टनर चुनना चाहते है, उसे मैं इस काबिल नहीं समझती कि वह मेरा पति बन सके।”

मेहमानों की खुसर-फुसर को ब्रेक लग गया। ऐसा लगा जैसे किसी थ्रिलर फिल्म का क्लाइमेक्स ख़त्म हो गया। माहौल में व्याप्त हुए तनाव के बीच किसी में इतना साहस नहीं हुआ कि वह कोई ध्वनि उत्पन्न कर सके। दिग्विजय के चेहरे पर हैरत और अविश्वास के साथ-साथ क्रोध भी था, जो गुजरने वाले हर सेकेण्ड के साथ गहराता चला गया।

“मैं लोगों की प्राइवेसी की रेस्पेक्ट करती हूं, इसलिये मि. वैभव की उन कमियों को यहां नहीं बताना चाहती, जिनके कारण मैंने इन्हें खुद के लिये इलिजिबल नहीं समझा।” कहने के बाद संस्कृति ने माइक छोड़ दिया, और लम्बे-लम्बे डग भरते हुए स्टेज से नीचे उतर गयी।

दिग्विजय कुछ भी बोल पाने की स्थिति में नहीं रहे। बोलते भी क्या? संस्कृति तो उनके मुंह पर कालिख पोत कर स्टेज से उतर चुकी थी। गुस्से के कारण मृत्युंजय की हालत खस्ता थी। वह सिर्फ संस्कृति पर ही नहीं, बल्कि दिग्विजय पर भी ये सोचकर भड़का हुआ था कि जब खुद की बेटी पर उसका अख्तियार नहीं था, तो उसने उसे स्टेज पर बुलाकर सरेआम जलील क्यों किया? मृत्युंजय की गोल-मटोल बीबी के हाथों के भी तोते उड़े हुए थे, उसे अब-तक यकीन नहीं हो पाया था कि नालायक बेटे के लिये ‘हाई एजुकेटेड’ बहु लाने का उसका सपना दो मिनट पहले धराशायी हो चुका है। वैभव की हालत तो ऐसी थी जैसे लोगों के सामने किसी शरारती बच्चे ने उसकी पतलून खींच दी हो।

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साहिल ने फ्लैट का दरवाजा अन्दर की ओर धकेला। अन्दर से खुला होने के कारण दरवाजा खुलता ही चला गया। फ्लैट में दाखिल होने के बाद उसने हाथ में मौजूद सब्जियों का थैला टेबल पर रखा और उस लड़के को लक्ष्य करके कहा, जो सोफे पर बैठा किसी पुरानी एल्बम की तस्वीरें देख रहा था- “हाउ वाज द डे यश?”

“फाइन।” लड़के ने एल्बम से नजरें उठाए बगैर कहा।

“तुम्हारे पसंद की सब्जी लाया हूं।”

“थैंक यू।” यश ने सब्जी के थैले पर नजर डालना जरूरी नहीं समझा।

वॉशरूम जाने से पहले साहिल ने उसे गौर से देखा। तस्वीरों को देखने का उसका अन्दाज बता रहा था कि वह उनके जरिये यादों की बिखरी हुई कड़ियां जोड़ने का प्रयास कर रहा था। साहिल के चेहरे पर अनगिनत भाव आये और चले गये। बगैर कुछ कहे वह वॉशरूम की ओर बढ़ गया। उसके जाने के बाद यश ने टेबल पर पड़े सब्जियों के थैले को देखा। थैले में आलू, टमाटर आदि के अलावा कुछ बैंगन भी थे।

लगभग बीस मिनट बाद साहिल वॉशरूम से बाहर आया। रेफ्रीजरेटर से कोल्डड्रिंक का बॉटल निकाला और कांच के दो गिलास के साथ यश के पास आकर बैठ गया। कोल्डड्रिंक को गिलास में पलटने के दौरान उसकी निगाहें यश पर ही ठहरी हुई थीं। उसके वॉशरूम से आकर सोफे पर बैठने के दौरान यश ने एक भी बार उसकी ओर नहीं देखा था।

“ये मम्मी-पापा हैं।” साहिल ने एक तस्वीर पर उंगली रखते हुए कहा। उसकी टिप्पणी के बाद यश ने उस फोटो को गौर से देखा।

“य....यही मम्मी-पापा हैं?”

“हां। तुम गौर से देखोगे तो पाओगे कि तुम्हारी आंखों का रंग और होंठों की शेप बिल्कुल मम्मी के जैसी हैं। मैंने तो माँ-बाप से अनुवांशिक विरासत के रूप में केवल पापा का चौड़ा माथा और लम्बी नाक ही पायी है।”

यश मुस्कुरा उठा। उसने साहिल के बात की सच्चाई परखने के लिये पहले उसके चेहरे पर दृष्टिपात किया, और फिर तस्वीर पर। तस्वीर में एक जोड़ा गार्डन के झूले पर बैठा मुस्कुरा रहा था।

“कोल्डड्रिंक लो।” साहिल ने गिलास उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा।

यश ने गिलास थामने के बजाय चेहरे पर नासमझी का भाव लिये हुए उसकी ओर देखा।

“माउण्टेन ड्यू....। तुम्हारी फेवरिट कोल्डड्रिंक।.....डर के आगे जीत है।”

यश ने एल्बम बन्द करके बगल में रखने के बाद गिलास थाम लिया।

“चीयर्स नहीं करोगे?”

“ओह....या....चीयर्स।”

कांच के टकराने की ध्वनि समाप्त होते ही दोनों ने गिलास अपने-अपने होठों से लगा लिया।

“अरे हां....।” साहिल चौंका- “एक बात तो मैं तुम्हें बताना ही भूल गया।.....जस्ट अ मिनट।”

साहिल ने गिलास सेंटर टेबल पर रखा और जीन्स की साइड पॉकेट से वैलेट निकाला। थोड़ी ही देर में उसके हाथ में दो मूवी टिकट्स नजर आ रहे थे।

“ये ‘द नन’ के मैटिनी शो के टिकट्स हैं। तुम हॉलीवुड की हॉरर फिल्मों के शौकीन हो, स्पेशियली ‘द कांजरिंग यूनिवर्स’ की फिल्मों के, इसीलिये मैं ले आया। यह फिल्म द कांजरिंग सीरीज की अब तक आयी फिल्मों की प्रीक्वल है। इसमें वैलक की ओरिजिन के बारे में बताया गया है।”

“ये कितनी अजीब बात है न भइया कि मेरी पसंद के बारे में मुझसे ज्यादा आप जानते हैं। जिन सब्जियों को आप मेरी पसंद बता रहे हैं, मुझे खुद नहीं मालूम कि उन्हें मैंने आखिरी बार कब खाया था। जिस जेनर की फिल्मों को आप मेरी पसंदिदा फिल्में बता रहे हैं, उस जेनर की किसी फिल्म का नाम तक मुझे नहीं मालूम।” यश ने झुंझलाते हुए कहा और गिलास सेंटर टेबल पर रख दिया- “अतीत को खोकर जीना कितना मुश्किल होता है, ये मुझे आज समझ में आ रहा है। जेहन में अब ना तो किसी दोस्त की पहचान बाकी रह गयी है, और ना ही किसी दुश्मन की। चारों ओर फैली धुंध भरी वीरानी में अपनी पहचान तलाशने के लिए मैं जितनी बार भटकता हूँ, उतनी बार ठोकर खाकर गिर पड़ता हूँ। करोड़ों की भीड़ में खुद को एक ऐसे इंसान के रूप में अकेला पाता हूं, जो कभी तस्वीरों के जरिये मां-बाप को पहचानने की कोशिश करता है, तो कभी एक अनजान शख्स के जरिये अपनी पसंद-नापसंद से रूबरू होता है।”

“नहीं यश।” साहिल ने उसके दोनो कन्धों को पकड़कर झकझोरते हुए कहा- “मैं अनजान नहीं हूं। तेरा भाई, तेरा सगा हूं मैं। हमने....हमने साथ में बचपन बिताया है।”

“जो इंसान अपनी पहचान से महरूम हो, जो इंसान खुद के वजूद से अनजान हो और जो इंसान अपने आप को भी सगा नहीं कह सकता, वह किसी और को सगा कैसे मान सकता है?”

“तुम्हारी यादें वापस आएंगी। मैं वापस लाऊंगा उन्हें।”

साहिल के इस तरह के दावे यश पहले भी सुन चुका था और अब फिर से नहीं सुनना चाहता था, इसीलिये उसने बगैर कुछ कहे चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया। साहिल ने उसकी आंखों में भर आये पानी की पहचान आंसुओं के रूप में की। दोनों में से फिर किसी ने सेंटर टेबल पर रखे गिलास को दोबारा हाथ नहीं लगाया। काफी देर की खामोशी के बाद यश अपनी जगह से उठा।

“कहां जा रहे हो?”

“टैरेस पर। शायद शाम की खूबसूरती मेरे दर्द और बेचैनी को कम कर सके।”

कहने के बाद यश बाहर निकल गया। उसके जाने के बाद साहिल थोड़ी देर तक ख्यालों में गुम रहा, फिर उसने ‘द नन’ की टिकट को वापस वैलेट में रखा और स्टडी टेबल के पास पहुंचा। लैपटॉप का पॉवर बटन ऑन किया। सिस्टम के स्टार्ट होने तक उसने टेबल पर बिखरी बुक्स और नोटबुक्स को किनारे किया।

लैपटॉप स्टार्ट होने के बाद उसने डेक्स्टॉप पर मौजूद क्रोम ब्राउजर के आइकन पर क्लिक किया। गूगल के सर्च बॉक्स में हिन्दी इनपुट टूल की सहायता से ‘ब्रह्मराक्षस’ टाइप किया और एण्टर पर क्लिक करने के बाद सर्च रिजल्ट की प्रतीक्षा करने लगा। थोड़ी ही देर में मॉनीटर पर ब्रह्मराक्षस से जुड़ी जानकारियां रखने वाले ब्लॉग्स और वेबसाइट्स की सूची नजर आने लगी। साहिल ने इत्मीनान से उस सूची का अवलोकन किया और फिर एक यूआरएल पर क्लिक कर दिया। यूआरएल के वेबपेज पर ब्रह्मराक्षस के विषय में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध थी। लगभग बीस मिनट तक उसने उस वेबपेज पर मौजूद कंटेंट को पढ़ा और फिर एक ब्लैंक पेपर पर उनका सारांश लिखने लगा।

‘हिन्दू धर्म में वर्णित चौरासी लाख योनियों में से एक योनि ब्रह्मराक्षस की होती है। इनमें देवताओं और राक्षसों के गुण समान रूप से पाये जाते हैं। पीपल के पुराने पेड़ और वीरान पड़ी हवेलियों में इनका वास होता है। ब्रह्मराक्षस योनि को प्रायः वे ब्राह्मण प्राप्त होते हैं, जो दुराचारी होते हैं और अकाल मृत्यु के कारण शरीर त्यागते हैं।

अब-तक ज्ञात सभी पैशाचिक शक्तियों में ब्रह्मराक्षस को सर्वोच्च पैशाचिक शक्ति माना गया है। इन्हें सामान्य तांत्रिक अनुष्ठानों से काबू में नहीं किया जा सकता है। ये दिखने में सामान्य मनुष्यों की भांति होते हैं, किन्तु इनकी शारीरिक भाषा और चेहरे के हाव-भाव डरावने होते हैं। रक्त इतना सर्वाधिक पसंदीदा पेय होता है। शिकार के दौरान ये पशु का रूप धारण कर लेते हैं। हर ब्रह्मराक्षस का पशु-रूप अलग-अलग होता है। श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक और स्वास्तिक चिन्ह इनकी सबसे बड़ी कमजोरी होती है, इसलिये इन्हें काबू में करने वाले अनुष्ठानों में गीता के श्लोक और स्वास्तिक चिन्ह की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भारत के मध्य और दक्षिणी भागों में ब्रह्मराक्षस के मन्दिर पाये जाते हैं, जिनमें केरल के कोट्टायम जिले का ब्रह्मराक्षस-मन्दिर सर्वाधिक प्रसिध्द है।’

ब्लैंक पेपर पर उपरोक्त सारांश लिखने के बाद साहिल ने वेबपेज को क्लोज कर दिया। उसका चेहरा तनावग्रस्त हो उठा था। उसने माथा थामकर कुछ देर तक चिन्तन-मनन किया, फिर खड़ा हो गया।

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चटाक।

दुबली-पतली संस्कृति दिग्विजय के तेज थप्पड़ का आवेग नहीं सह सकी, और लहराकर सोफे पर गिर पड़ी।

दिग्विजय के भीषण क्रोध के आगे परिवार का प्रत्येक सदस्य सहम कर रह गया। संस्कृति एक बार सोफे पड़ी तो पड़ी ही रह गयी। उसने उठने का प्रयास नहीं किया और सोफे की पुश्त पर माथा टिकाकर सिसकने लगी। सुजाता बेटी की ओर बढ़ने को उद्यत हुई ही थीं कि दिग्विजय दहाड़ उठे- “वहीं ठहर जाओ सुजाता। किसी भी प्रकार की ममता जताने की कोई जरूरत नहीं है। हमारे थप्पड़ की चोट, उस थप्पड़ की चोट से अधिक नहीं होगी, जो इसने भरी महफिल में हमारे सम्मान के गाल पर मारा है। चार दिन तक अंधेरी कोठरी में बन्द रहेगी तो इसके अन्दर से वह विलायती संस्कार खुद-ब-खुद बाहर निकल जाएगा, जो दस सालों में इसकी रग-रग में दाखिल हो चुका है।”

कोई कुछ नहीं बोला। मेहमानों के सामने हुए अपमान की तिलमिलाहट दिग्विजय के चेहरे के जर्रे-जर्रे से नुमाया हो रही थी। क्रोध की अधिकता के कारण उनके चेहरे का गौर वर्ण रक्तिम पड़ गया था। श्वासों की गति हांफने के स्तर तक तेज थी। शरीर का कम्पन देख कर कोई भी इस गफलत का शिकार हो सकता था कि वे जूड़ी के मरीज हैं।

“वर्षों के कमाये हुए मेरे शान और रुतबे को इस लड़की ने पल भर में ही नेस्तनाबूंद कर दिया। ठाकुर खानदान के माथे पर इसने कलंक का जो टिका लगाया है, वह काला टीका इसके आंसुओं से नहीं धुल सकता।” क्रोध के कारण दिग्विजय की वाणी लड़खड़ायी, किन्तु शीघ्र ही संयत होकर आगे बोले- “यदि ये तुम्हारी जिद है कि तुम मृत्यंजय के बेटे से शादी नहीं करोगी, तो हमारी भी ये जिद सुन लो कि राजमहल की दहलीज से तुम्हारी डोली उठेगी तो सिर्फ मृत्युंजय सिंह ठाकुर की दहलीज तक जाने के लिये।”

दिग्विजय का फैसला सुन संस्कृति ने आंसुओं से भीगा चेहरा ऊपर उठाया, और हिचकियों के बीच कहा- “मेरी जिद के आगे आपकी जिद हार जाएगी। मैं मरना कुबूल कर लूंगी, लेकिन उस लड़के से शादी करना कभी नहीं क़ुबूल करूंगी, जिसकी आंखों में मैंने खुद के लिये वहशीपन देखा है। आप अपना पॉलिटिकल कैरियर संवारने के चक्कर में अपनी बेटी की जिन्दगी एक हैवान के साथ जोड़ना चाहते हैं। आप मेरी लाइफ की इतनी इम्पोर्टेन्ट डिसिजन बिना मुझे बताये कैसे ले सकते हैं? क्या मुझे इतना भी अधिकार नहीं कि मैं उस शख्स को अपनी कसौटी पर परख सकूं, जिसके साथ मुझे जिन्दगी गुजारनी है?”

“ये तुम नहीं तुम्हारी विलायती सोच बोल रही है। आधुनिक बनने की अंधी दौड़ में आज की युवा पीढ़ी इस कदर गुमराह हो चुकी है कि मां-बाप की पसंद को अपने पैमाने पर परखने की मांग करने लगी है। मृत्युंजय के बेटे को इस परिवार का हर सदस्य तुम्हारे लिये योग्य मानता है।”

“हर फैमिली मेम्बर नहीं डैडी। सिर्फ आपके जिद ने वैभव को मेरे लिये परफैक्ट माना है। कोई भी फैमिली मेम्बर ये जानते हुए भी कि वह एक अय्याश पॉलिटिशियन का शराबी और निकम्मा बेटा है, उसे मेरे पति के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता।”

“इस बेवकूफ लड़की की सोच से कितने लोग सहमत हैं?” दिग्विजय ड्राइंग रूम में मौजूद सदस्यों को लक्ष्य करके चिल्ला उठे- “कितने लोग हैं, जो ये मानते हैं कि हम अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिये इसे एक हैवान के साथ बांधना चाहते हैं?”

सभी सदस्यों ने नजरें झुका ली। दिग्विजय के भीषण क्रोध के दावानल से भयभीत थे, या वास्तव में उनके फैसले से सहमत थे? कहना मुश्किल था।

“देखा तुमने? हर कोई ये मान रहा है कि हमारा फैसला तुम्हारे हित में है।”

संस्कृति बगैर कुछ कहे सिसकती रही।

“हम कल कुलगुरु को विवाह का मुहूर्त निकलवाने के लिये राजमहल बुला रहे हैं। हमें उम्मीद है कि तब तक तुम हमारे फैसले को स्वीकार कर चुकी होगी।”

कहने के बाद दिग्विजय वहां एक पल भी नहीं ठहरे।

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वह कमरा राजमहल का स्टोररूम था, जिसमें संस्कृति को बन्द किया गया था। क्योंकि दिग्विजय को विश्वास था कि यदि उसे चार दिन तक अंधेरे कमरे में बन्द कर दिया जाएगा, तो वह वैभव से शादी न करने की जिद छोड़ देगी।

रोशनी के नाम पर कमरे में केवल एक मोमबत्ती जल रही था, जिसकी लौ रोशनदान से आती हवाओं के कारण कभी इधर-उधर लहरा रही थी तो कभी बुझने के कगार पर पहुंच जा रही थी। कमरे का आधा से अधिक हिस्सा उन चीजों से भरा पड़ा था, जो घर की मरम्मत और साफ-सफाई के दौरान कबाड़ के रूप में निकलती हैं। बाकी बचे हिस्से के एक कोने में संस्कृति सिमटी हुई थी। उसके चेहरे पर शिकन या अफसोस के बजाय दृढ़ता के भाव थे। उसने मन ही मन ये फैसला कर लिया था कि वैभव जैसे लम्पट से शादी करने से बेहतर यही था कि वह जिन्दगी भर इस काल कोठरी में ही पड़ी रहे।

थोड़ी देर बाद वह ऊब कर उठ खड़ी हुई और खिड़की तक पहुंची। खिड़की के पट खुलते ही सर्द हवा का झोंका उसके जिस्म से टकराया। उमस से राहत पाने के बाद उसने आसमान की ओर देखा। रात पूनम की थी। पूरे आकार का चाँद, आसमान में तैर रहे सफ़ेद बादलों के कतरों के बीच अठखेलियां कर रहा था। हालांकि कमरे में हवा आने के बाद मोमबत्ती बुझ गयी थी, किन्तु कमरे में दाखिल होने वाली धवल चाँदनी ने संस्कृति को उसकी कमी नहीं महसूस होने दी।

स्टोररूम राजमहल के भूतल पर था। खिड़की के सामने से ईंटों की एक पतली सड़क गुजरती थी, जो गाँव के विभिन्न मुहल्लों से होते हुए बाहर खेतों की ओर चली जाती थी। संस्कृति कुछ देर तक ठंडी हवा खाने के ध्येय से खिड़की की ग्रिल पकड़कर खड़ी हो गयी। रात नित्य की अपेक्षा थोड़ी डरावनी थी। वातावरण में जब पत्तों की सरसराहट गूंजती थी, तो भ्रम होता था कि बादलों से भरी खामोश रात किसी की मौत पर सिसक रही है। आसामान से तारे नदारद थे। जब बादलों का कोई टुकड़ा चाँद को ढांप लेता था तो धवल चाँदनी में नहायी पूर्णिमा की रात अमावस की स्याह रात में तब्दील हो जाती थी। कुछ रात का असर था, तो कुछ कभी न खोले जाने वाले कमरे में अकेले मौजूद होने का एहसास, जो संस्कृति पर अब धीरे-धीरे खौफ हावी होने लगा था।

उसे स्टोररूम में बन्द हुए चार घण्टे से ऊपर हो गये थे। इस बीच कोई उसकी दशा देखने नहीं आया था। एक-दो बार दरवाजे पर हुई आहट से संस्कृति ने अनुमान लगाया था कि सुजाता दरवाजे की झिर्री इत्यादि से झांक कर उसकी सुरक्षा के प्रति आश्वस्त होने आयी थीं।

आखिरकार सुजाता, पत्नी और मां होने से पहले एक स्त्री थीं। वह जानती थीं कि संस्कृति का फैसला बिल्कुल सही था, किन्तु एक हाई प्रोफाइल पॉलिटिशियन से सम्बन्ध बनाने की महत्वाकांक्षा ने दिग्विजय को इस कदर अंधा बना दिया था कि उन्होंने वैभव के सारे अवगुणों को नजरअंदाज कर दिया था। जब-जब सुजाता वैभव की कमियों को गिनाते हुए उसे संस्कृति के लिये अयोग्य साबित करने की कोशिश करतीं, तब-तब दिग्विजय का यही कहते -

‘शादी के बाद एक लड़की के सारे अरमान आरामदायक जीवन जीने की इच्छा के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह जाते हैं। वैभव भले ही अवगुणों की खान हो, लेकिन संस्कृति को एक आरामदायक जीवन तो मुहैया करा ही सकता है।’

सुजाता जानती थीं कि जिस खानदान में वह ब्याह कर लायी गयी थीं, उस खानदान में शुरू से ही स्त्री को ‘सजावट की वस्तु’ से अधिक नहीं समझा गया था। इसी कारण वे स्त्री की भावनाओं, संवेदनाओं इत्यादि का हवाला देकर बहस को अधिक लम्बा नहीं खींच पाती थीं। आज जब खुद संस्कृति ने वैभव को सरेआम इनकार कर दिया था, तो कहीं न कहीं सुजाता के अन्दर बैठी स्त्री आह्लादित हो उठी थी, किन्तु उस इंसान की पत्नी होने के कारण, जो अपनी बेटी के वजह से भरी महफिल में जलील हो चुका था, वह चाह कर भी स्त्रित्व की खुशी में शामिल न हो सकीं।

संस्कृति समझदार थी और मां के अंतर्द्वंद्व से वाकिफ भी थी, किन्तु साथ ही साथ इस तथ्य से भी वाकिफ थी कि अगर आज उसने मां के अंतर्द्वंद्व पर तरस खाकर, पिता के खानदानी साख जैसे ‘मनोरोग’ के आगे घुटने टेककर जीवन के साथ समझौता कर लिया तो उसे ताउम्र अपने अरमानों का गला घोंट कर जिन्दगी को घसीटना पड़ जाएगा, इसीलिये उसने परिणाम की परवाह न करते हुए प्रतिरोध करने की ठान ली थी।

उसने रिस्टवॉच पर नजर डाली। दस बजकर लगभग सात मिनट हो रहे थे। उसे अब खिड़की के पास खड़े हुए पंद्रह मिनट से अधिक हो चले थे। वह पलटने ही वाली थी कि अचानक हवाओं का वेग इस सीमा तक तीव्र हो गया कि स्टोररूम में मौजूद कबाड़ खड़खड़ा उठे। वातावरण में कई कुत्तों के रोने का समवेत स्वर गूंजा और संस्कृति का कलेजा हलक में आ फंसा।

कुत्तों का रोना और मौसम के रुख में आकस्मिक परिवर्तन संस्कृति को सामान्य नहीं लगा। उसने खिड़की बन्द करने के उद्देश्य से पल्लों को हाथ लगाया ही था कि सरसाराती हवाएं उसके कान में कुछ कह गयीं।

“मा.....या.....।”

वह बुरी तरह चौंकी। दामिनी सी चपलता के साथ पीछे पलटी, किन्तु पीछे कुछ नहीं था। हवा के कारण दिवारों पर टंगी पुरानी तस्वीरों और कबाड़ों के हिलने की आवाजें जरूर आ रही थीं, किन्तु वे इस श्रेणी की नहीं थीं कि उसे स्पष्ट रूप से ‘माया’ शब्द में तब्दील होकर सुनाई दे जाएं। वह आवाज ऐसी थी, जैसे किसी ने पीछे खड़े होकर उसके कानों में फुसफुसा कर अपनी मौजूदगी का एहसास कराया हो।

संस्कृति ने सीने पर हाथ रखकर इत्मीनान की सांस ली। इस घटना को वहम नाम देकर जेहन से बाहर किया और दोबारा खिड़की की ओर पलटी। कुत्तों का रोना अब तेज हो उठा था। वातावरण के अचानक बदले रूख ने उसकी मानसिकता पर भी प्रभाव डाला। थोड़ी देर पहले जो चाँद सामान्य नजर आ रहा था, वही चाँद अब उसे डरावना लगने लगा था। उसे लगा मानो कोई मनहूसियत कमरे में झांक रही हो।

“अ...अचानक..अचानक ये सब क्या होने लगा?” उसके होंठ थरथराये।

“मा......या.....।” वही फुसफुसाहट।

“क.....कौन है....?”

प्रत्युत्तर में हवा का एक तेज झोंका कमरे में प्रविष्ट हुआ और स्टोररूम के कबाड़ यूं खड़खड़ा उठे, मानो उसकी अवस्था पर अट्ठहास कर रहे हों। संस्कृति का जिस्म बर्फ की तरह सर्द पड़ने लगा। उसका शक यकीन में तब्दील हो गया। कोई तो जरूर था स्टोररूम में, जिसने उसे अपनी मौजूदगी का एहसास कराया था। लेकिन कहां? कमरे का ज्यादातर हिस्सा टूटे हुए फर्नीचर्स तथा धूल भरे कबाड़ से भरा पड़ा था और खाली हिस्से में तो वह खुद थी।

“क....कौन है....? य...ये कैसा बेहूदा मजाक है?” खौफजदा संस्कृति हकला उठी।

“मा....या....।”

इस बार संस्कृति के होठों से शब्द नहीं फिसल सके। भय से थरथराते हुए उसने प्रत्येक कोने का मुआयना किया, किन्तु आवाज का उद्गम तलाशने में विफल रही। फुसफुसाहट किसी कोने से न आकर इस प्रकार उसके कानों में पड़ी थी, जैसे फुसफुसाने वाला ठीक उसके पीछे खड़ा हो।

“तुम....हमारी.....हो......सिर्फ हमारी।”

संस्कृति चौंक पड़ी। इस बार फुसफुसाहट उस कोने से आयी थी, जहां पुराने और टूटे हुए फर्नीचर्स का ढेर लगा हुआ था। वह अपना कलेजा मजबूत करते हुए थरथराते कदमों के साथ उस कोने की ओर बढ़ी। लकड़ी के टुकड़ों का कम्पन देख कर लग रहा था कि ढेर के नीचे दबा हुआ कोई प्राणी बाहर निकलने का प्रयास कर रहा हो। संस्कृति ने हाथ आगे बढ़ाकर उन्हें छुआ। परिणाम चौंका देने वाला था। लकड़ियों का कम्पन आश्चर्यजनक ढंग से थम गया। नीचे से इस प्रकार सांस लेने की आवाज आयी, जैसे दर्द से तड़प रहे किसी इंसान के जख्मों पर मरहम लगा दिया गया हो।

अनिश्चितताओं से घिरी संस्कृति ने लकड़ी के टुकड़ों को हिलाया। सांसों का स्वर तेज हुआ। दोबारा हिलाया, इस बार भी सांसों के स्वर में वृध्दि हुई। संस्कृति के मन-मस्तिष्क में खौफ और कौतुहल का द्वंद्व शुरू हो गया। अंतत: जीत कौतुहल की हुई और उसने एक-एक करके लकड़ी के टुकड़ों को हटाना शुरू कर दिया। उन पर जमीं धूल की मोटी परतें हवा में तैरने लगीं, किन्तु संस्कृति ने अपना काम जारी रखा। जैसे-जैसे लकड़ी के टुकड़े हटते गये, वैसे-वैसे अज्ञात सांसों का स्वर बढ़ता गया और उसी अनुपात में संस्कृति की सांसें भी रफ़्तार पकड़ती चली गयीं। लगभग पन्द्रह मिनट बाद स्टोररूम का वह कोना खाली हो गया और ये हकीकत सामने आयी कि हांफने का स्वर लकड़ियों के नीचे से नहीं, बल्कि फर्श के नीचे से आ रहा था।

“हाउ इज इट पॉसिबल?” संस्कृति दंग रह गयी- “फर्श के नीचे कौन हो सकता है?”

संस्कृति का जेहन उपरोक्त सवाल के जवाब में कोई तर्क प्रस्तुत करता, इससे पहले ही दरवाजे पर दस्तक पड़ी। दस्तक के खत्म होते ही हांफने का स्वर आश्चर्यजनक ढंग से बन्द हो गया।

“संस्कृति.....।” बाहर से सुजाता की आवाज आयी।

उसके कानों में माँ का स्वर नहीं गया। वह आंखों में खौफ लिये हुए फर्श के उसी हिस्से को देखती रही, जिसे देखकर अब ये अंदाजा लगाना मुश्किल था कि उसके नीचे से थोड़ी देर पहले किसी के हांफने की आवाज आ रही थी।

“संस्कृति।” दस्तक के बीच सुजाता की आवाज दोबारा आयी।
 

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