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Horror चामुंडी

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१०

अगले दिन सुबह ठीक दस बजे थाने के बाहर पुलिस की जीप आ कर रुकी.

इंस्पेक्टर भटाचार्य उतरा और थाने की सीढ़ियाँ चढ़ा.

दरवाज़े के दोनों तरफ दो सिपाही अपनी अपनी राइफलें ले कर सतर्क बैठे थे... भटाचार्य को देखते ही झट से खड़े हो कर सैल्यूट किया. भटाचार्य ने हाथ उठा कर उनके सैल्यूट का उत्तर दिया.

अंदर अपने टेबल के सामने हवलदार कुछ लोगों के साथ बात कर रहा था. उसने भी भटाचार्य को देख कर खड़े हो कर सैल्यूट किया. भटाचार्य ने भी पहले जैसे ही उत्तर दिया. हवलदार के बैठने के स्थान के ठीक बगल में; दाएँ साइड भटाचार्य का कमरा है.

कमरे में घुसने से पहले भटाचार्य ठिठक गया. सिर घूमा कर देखा; आज और दिन के मुकाबले कुछ ज्यादा ही लोग आए हैं. उसने प्रश्नसूचक दृष्टि डाली श्याम पर. श्याम ने तुरंत आँखों के इशारे से ही कुछ कहा भटाचार्य को जिसे भटाचार्य एक क्षण में ही समझ गया.

बेंच और चेयरों पर बैठे लोगों की ओर एक नज़र देख कर श्याम को बोला,

“तुम पाँच मिनट बाद अंदर आना.”

“यस सर!”

अपने कमरे में जाने के बाद सबसे पहले भटाचार्य ने टेबल पर पहले से रखे ग्लास से पानी पिया, फिर अपने पॉकेट से अपने भगवान की फ़ोटो निकाल कर उन्हें प्रणाम किया और फिर अपने गुरुदेव के फ़ोटो को.

फ़िर आराम से अपनी कुर्सी पर बैठा.

सामने कुछ फाइलें रखी थीं.

उनमें से दो – तीन फाइल के पन्ने पलट कर देखा, दूसरे पॉकेट से सिगरेट का पैकेट निकाला, सिगरेट सुलगाया और ऊपर चलते पंखे की ओर देखते हुए मन ही मन कुछ बातों को क्रमवार सजाने लगा.

ठीक पाँच मिनट बाद ही दरवाज़े पर श्याम आया और विनम्र स्वर में बोला,

“आपने बुलाया था सर?”

श्याम के आवाज़ से विचारों के उधेड़बुन से बाहर आया भटाचार्य ने पहले श्याम की ओर देखा और फ़िर उसपर से नज़रें हटा कर सामने रखे आधे खाली ग्लास की ओर देखते हुए बोला,

“हाँ... सुनो.”

श्याम अंदर आया और सैल्यूट मार कर सावधान की पोजीशन में खड़ा हो गया.

“श्याम... सब आ गए हैं?”

“जी सर!”

“किसी ने भी नखरे दिखाए... ना नुकुर किया?”

“दो – तीन ने किया सर.”

“दो – तीन?! कौन कौन?”

“रंजन, उनकी पत्नी सुचित्रा और किशन चायवाला.”

“बाकी सब तैयार हो गए थे?”

“सभी कुछ न कुछ कहना चाहते थे शायद... पर पुलिस के डर के कारण शायद कुछ बोला नहीं गया इनसे, सर.”

“हम्म... और कोई नयी बात?”

“नहीं सर, फिलहाल नहीं. पर इतना ही की रंजन और दूसरे जन बोल रहे हैं कि उन्हें जल्दी छोड़ दिया ताकि तुरंत अपने काम पर जा सके.”

“हाँ.. हाँ.. ऐसा ही होगा... अब तुम जाओ और अगले दस मिनट बाद एक एक कर के सब को भेजना. जब कोई एक आए तो तुम भी यहाँ रहोगे? ओके?... और बद्री को बोलो बाहर तुम्हारे काम को तब तक वो सम्भाले.”

“यस सर.”

“और ये लो... ये लिस्ट है.. जिसका जिस नम्बर पर नाम है उसे वैसे ही अंदर भेजना.”

“यस सर.”

कह कर श्याम सैल्यूट दे कर कमरे से निकल गया.

इधर, उसके बाहर निकलते ही भटाचार्य जल्दी से आँखें बंद कर अपने उन्हीं विचारों पर फिर से ध्यान केन्द्रित कर दिया.

ठीक दस मिनट बाद श्यामाप्रसाद अंदर आया और भटाचार्य से अनुमति लेने के बाद एक एक कर सबको बुलाने लगा.

सबसे पहले सुरेंद्रनाथ को बुलाया गया.

भटाचार्य ने उसे टेबल के विपरीत अपने सामने वाले चेयर पर बैठने को कहा.

उसके बैठते ही भटाचार्य ने अपने दाएँ हाथ की ऊँगलियों से कुछ इशारा किया श्याम को जिसे सिर्फ़ श्याम ही समझ सकता था. सुरेंद्रनाथ का ध्यान तो इस तरफ गया ही नहीं. उस बेचारे का तो डर से ही हालत ख़राब हुए जा रहा था कि न जाने क्या क्या पूछा जायेगा और अगर किन्ही प्रश्नों का उत्तर अगर वो न दे सका तो कहीं उस जेल में न डाल दे.

पुलिस और उनसे जुड़े कुछ अफवाहों को सुरेंद्रनाथ ने इतना सुन रखा था बचपन से की आज जैसे उसकी आँखों के सामने वे सभी अफवाहें किसी चलचित्र की भांति एक एक कर के चलने लगी हो.

भटाचार्य ने उसे पहले पानी पीने को कहा.

सुरेंद्रनाथ ने उसके लिए सामने रखे ग्लास को उठाया और गटागट पूरा ग्लास खाली कर दिया.

उसकी हालत देख कर भटाचार्य और श्याम दोनों एक दूसरे की ओर देख कर मुस्कराए.

“ठीक हो सुरेंद्रनाथ?”

“जी, साहब.”

“कुछ सवाल करूँगा... सही जवाब दोगे?”

“पूरी कोशिश करूँगा माई बाप.”

सुरेंद्रनाथ हाथ जोड़कर मिमियाते हुए बोला.

भटाचार्य हल्का सा मुस्कराया. सीधा बैठा. श्याम को इशारा कर के सुरेंद्रनाथ से एक हाथ दूर खड़े रहने को कहा.

और फ़िर शुरू हुआ प्रश्नकाल.

किसी प्रश्न का सुरेंद्रनाथ बड़ी सहजता के साथ उत्तर दे गया तो किसी प्रश्न में बुरी तरह गड़बड़ा गया.

एक एक कर उससे कुल बारह प्रश्न किए गए. सभी प्रश्नों के उत्तर देते सुरेंद्रनाथ के हरेक गतिविधि को बहुत सूक्ष्मता से देख रहा था भटाचार्य.

इधर, बाहर बैठी सुचित्रा को धीरे धीरे बेचैनी होने लगी थी.

उसे ऐसा लगने लगा मानो उसके अंदर... उसके सीने में किसी ने दहकता आग का गोला रख दिया हो.

वो सामने श्याम के स्थान पर बैठे बद्री को पानी के लिए बोली. बद्री ने दूसरे सिपाही को पानी के लिए बोला. दूसरा सिपाही एक नया भर्ती हुआ बाईस वर्षीय लड़का था जो निर्देश मिलते ही जल्दी से एक ग्लास पानी ला कर सुचित्रा को दिया. सुचित्रा ने जरा सा नज़र उसकी ओर करके कृतज्ञता पूर्ण स्वर में धन्यवाद कहा और पानी पीने लगी.

वो लड़का वापस जाने से पहले दो मिनट वहीं खड़ा रहा.

दरअसल उसे सुचित्रा की सुंदरता भा गई थी. अत्यधिक टेंशन के कारण पीठ पर से साड़ी को हटाने के फलस्वरूप सुचित्रा के डीप बैक स्क्वायर कट ब्लाउज से पर्याप्त अंश में बाहर दिखती उसकी स्वच्छ, निर्मल, बेदाग़ पीठ और उसपे भी टाइट ब्लाउज के कारण मांसल गदराई पीठ पर बनती हल्की सी क्लीवेज ने तो बस उसे पल भर में ही सुचित्रा का दीवाना बना लिया.

काजल लगी आँखें, होंठों पर लाल लिपस्टिक ऐसा मानो अभी अभी ताज़े रक्त में भीगी हुई हो, एक सुंदर पतली चेन जो आंचल के नीचे वक्षस्थल में कहीं समाई हो, दोनों में लाल चूड़ियों के साथ एक एक सफ़ेद शाखा चूड़ी. आंचल सीने पर अच्छे से लिए होने के बावजूद भी उस लड़के को सुचित्रा के वक्षों के आकार का अनुमान करने में कोई असुविधा नहीं हुई.

इतना कुछ देखने के बाद वो लड़का अपने धड़कनों पर नियंत्रण नहीं रख पाया.

उसका दिल धाड़ धाड़ से ज़ोरों से धड़कने लगा. सूख गए होंठों पर बार बार जीभ फिरा कर उन्हें भिगाने की कोशिश करने लगा. इतना तो फिर भी ठीक था.. असल मुश्किल तो तब हुई जब उसे अपने चड्डी के अंदर बेलगाम हलचल होने का आभास हुआ.

बिन हड्डी वाला मांसल अंग अपने दूसरे रूप में आ चुका था जिस कारण पैंट के अंदर से बनी तम्बू के कारण उस लड़के को अपने आप से लज्जा होने लगी. वह तुरंत वहाँ से चला गया.

पानी पीने के बाद बेचैनी तो पूरी तरह से गई नहीं सुचित्रा की पर थोड़ा आराम ज़रूर मिला उसे. कुर्सी के बैकरेस्ट से पीठ टिका कर आराम से बैठ गई और अंदर ही अंदर खुद को पुलिस इंटेरोगेशन के लिए दोबारा तैयार करने लगी.

इधर बिपिन काका की पत्नी रेणुका सुचित्रा को खा जाने वाली निगाहों से देख रही थी.

दरअसल जब से वो थाने में आई है और सुचित्रा को अपने सामने देखी है तब से ही उसे उसी खा जाने वाली नज़रों से देखे जा रही थी. आँखों में गज़ब का गुस्सा झलक रहा था. बिपिन काका, रंजन बाबू, कालू और यहाँ तक की सुचित्रा ने भी रेणुका के इस बर्ताव को देखा. पर सिवाए बिपिन काका और रंजन बाबू के सुचित्रा को रत्ती भर का आश्चर्य नहीं हुआ.

सच कहा जाए तो कहीं न कहीं दोनों स्त्रियों में बहुत पहले से कुछ ख़ास नहीं बनती थी. सुचित्रा रेणुका को पसंद ही नहीं करती थी और रेणुका को भी सुचित्रा के रूप लावण्य से सदैव ईर्ष्या रही.

सुचित्रा अपने आप में अलग थी ज़रूर और इसी कारण विवाहिता होते हुए भी गाँव के कई पुरुषों के रातों की, उनके सपनों की रानी भी थी; पर कहीं न कहीं रेणुका सुचित्रा को टक्कर देती जान पड़ती थी और कभी कभी यही बात सुचित्रा को भी तनिक असुरक्षा का बोध करा देती थी.

थोड़ी ही देर बाद सुरेंद्रनाथ कमरे से निकला और चुपचाप एक खाली कुर्सी पर जा के बैठ गया.

फ़िर एक एक कर के सबको बुलाया गया.

सबसे औसतन करीब पन्द्रह मिनट तक सवाल जवाब होते रहे.

सिवाय सुचित्रा और रेणुका के.

इन दोनों को दो दो बार सवाल जवाब के लिए बुलाया गया और आधे - आधे घंटे तक प्रश्न सत्र चलता रहा.

इन दोनों को बार बार बुलाए जाने से इन दोनों के पति, रंजन बाबू और बिपिन काका भी काफ़ी परेशान रहे पर क्या करते... पुलिस के काम में रुकावट डालने का जोखिम भला कौन ले?

जब सब बाहर अपने जगह पर बैठे थे तब भटाचार्य और श्याम अलग से १५ मिनट तक आपस में बातें करते रहे.

फ़िर एकाएक अपने कमरे से निकले.

भटाचार्य ने सबको एकबार अच्छे से देखा और कहा,

“आप लोगों ने काफ़ी अच्छा सहयोग किया. इसके लिए बहुत धन्यवाद. आज के लिए इतना ही. आगे अगर ज़रूरत पड़ी तो फ़िर से आप लोगों थाने बुलाया जाएगा.”

गोपाल और बसु ने गला खँखार कर धीरे से कहा,

“साहब, फ़िर से आना पड़ेगा? साहब... हम लोगों का काम....”

उनका वाक्य ख़त्म होने से पहले ही भटाचार्य गुस्सा करता हुआ बोला,

“तुम्हें क्या लगता है... आज यहाँ पार्टी करने के लिए बुलाया था क्या? हँसी मसखरी होती है यहाँ? इन सवाल जवाबों में हमारा भी समय जाता है... कई काम हमारे धरे के धरे रह जाते हैं. जो कहा जा रहा है.. सुनो और करो.”

इतना कह कर भटाचार्य गुस्से से अंदर चला गया.

श्यामाप्रसाद ने सबको इशारे से जाने को कहा... भटाचार्य के गुस्से को देख कर किसी को किसी से कुछ कहने पूछने का हिम्मत नहीं हुआ. सब चुपचाप अपने अपने जगह से उठे और बाहर जाने लगे.

तभी अंदर से भटाचार्य ने आवाज़ दिया,

“श्याम... इधर सुनना.”

“यस सर.”

श्याम तुरंत अंदर आया.

“श्याम... सब गए या नहीं?”

“जी सर, जा ही रहे हैं.”

“ह्म्म्म.. सबके बातों को नोट किया?”

“जी सर... सबने जो भी कहा... उसमें जो कुछ भी महत्वपूर्ण लगा; मैंने वो सब नोट कर लिया.”

“गुड. वैरी गुड. अब एक और बात बताओ...”

“जी सर...”

“सबसे सवाल जवाब होते समय तुम यहीं थे... पूरे समय... तुमने हर किसी के जवाबों को सुना... नोट किया.... सबकी बातों को सुनने के बाद तुम्हें प्रथमदृष्ट्या क्या लगता है... कौन अपराधी हो सकता है... किसपे संदेह सबसे अधिक हुआ है?”

“सर, मुझे तो लगता है कि..........”

श्याम ने जैसे ही बोलना शुरू किया बाहर से चीख पुकार की आवाज़ आने लगी.

बहुत ज़ोरों से आवाजें आ रही थीं... आदमी और औरत... दोनों के.

भटाचार्य और श्याम पहले तो कुछ समझ नहीं पाए. पहले पाँच सेकंड तक एक दूसरे को देखते रहे... फ़िर एक साथ लगभग दौड़ते हुए कमरे से बाहर निकले. दोनों ने देखा की थाने के सिपाही सब भी थाने के बाहर खड़े हैं और किन्हीं को छुड़ाने का असफल प्रयास कर रहे हैं.

भटाचार्य और श्याम दोनों जल्दी से थाने के मेन दरवाज़े तक आए.

बाहर आ कर जो देखा उससे दोनों ही स्तब्ध रह गए.

बाहर रेणुका और सुचित्रा दोनों एक दूसरे से भीड़ी हुई थीं. दोनों ही एक दूसरे को थप्पड़ों से मार रही थी और जितना ज़ोर से हो सके उतना मारने का प्रयास कर रही थी. खास कर रेणुका... उसके गुस्से का कोई पार नहीं दिख रहा था.

वो तो ऐसे कर रही थी जैसे की अभी के अभी सुचित्रा के कई टुकड़े कर के उसे कच्चा ही चबा जाएगी. सुचित्रा भी पलट कर उसके थप्पड़ों का जवाब दे रही थी पर मारने से कहीं ज्यादा वो खुद को बचाने का प्रयास कर रही थी.

रेणुका रह रह के बार बार एक ही बात दोहरा रही थी,

“तू...तूने ही खाया है जतिंद्र... तूने ही छीना है हमसे... मेरे जतिंद्र को... उस बेचारे ... भोले लड़के को तूने ही निगला है. बता... बोल न.. क्यों की ऐसा... कमीनी...”

दोनों के पति और वहाँ उपस्थित बाकी सभी लोग दोनों को छुड़ाने का प्रयास कर रहे थे लेकिन थोड़ा छूटने के तुरंत बाद रेणुका फिर से सुचित्रा पर टूट पड़ती. धीरे धीरे वहाँ बहुत भीड़ जमा हो गई.

थाने के सामने इस तरह का एक तमाशा होता देख कर भटाचार्य बुरी तरह गुस्से में भर गया और बहुत ज़ोर से चीखते हुए गरज उठा,

“बस करो... क्या लगा रखा है यहाँ? कोई बाज़ार है?? या गाँव का अखाड़ा है??? जो करना है अपने गाँव में... अपने घर में करो... जाओ... अब अगर एक शब्द भी तुम लोगों में से किसी के भी मुँह से सुना तो अभी के अभी बिना किसी कंप्लेंट के तुम सबको पूरे एक महीने के लिए अंदर डाल दूँगा... समझे..! जाओ यहाँ से!!”

भटाचार्य के इस धमकी ने तुरंत वहाँ जमा हुए लोगों पर अपना असर दिखाया और सब हड़बड़ा कर वहाँ से भाग खड़े हुए. रेणुका और सुचित्रा ने भी अब तक एक दूसरे को छोड़ दिया था और आगे बढ़ गई थी.

रेणुका अब भी गुस्से से बीच बीच में सुचित्रा को देख रही थी पर कुछ कह नहीं पा रही थी क्योंकि वो तो खुद अब भटाचार्य के गुस्से से डर गई थी.

और भला एक गुस्सैल पुलिस वाला को कौन उकसाए?

यही सोच कर उसने फ़िलहाल अपने गुस्से को काबू करने का पूरजोर कोशिश कर रही थी.
 
सबके चले जाने के करीब आधे घंटे बाद थाने के अंदर की गतिविधि भी थोड़ी शांत हुई और जब दैनिक कामकाज पटरी पर आई तब भटाचार्य ने बद्री को बुला कर चाय लाने को कहा और साथ ही श्याम को भी बुलवा भेजा.

श्याम ने आते ही सैल्यूट मारा और कहा,

“आपने बुलाया सर?”

“अं.. हाँ... पहले बैठो... कुछ बात करनी है.”

श्याम तुरंत आदेश का पालन करता हुआ भटाचार्य के सामने चेयर पर बैठ गया.

“तुमने तो सब देखा... सुना... और तो और थाने के ठीक बाहर हुए तमाशे के समय भी तुम वहाँ मेरे साथ ही थे...क्या लगता है... कौन है असली अपराधी?”

उत्तर देने से पहले श्याम दो क्षण सोचा और बड़े विचारणीय ढंग से बोला,

“सर... मुझे लगता है इन सब में ये.... सुचित्रा... सुचित्रा जी का हाथ है.”

“ऐसा क्यों?”

“सर, वो जब प्रश्नों के उत्तर दे रही थी तब काफ़ी अटक जा रही थी.. लग रहा था मानो वो बोलना चाह कर भी नहीं बोलना चाहती.. या फ़िर सही बात किसी भी हाल में न निकले इसका भरसक प्रयास कर रही थी.”

“यस, राईट! सुचित्रा चटर्जी कुछ जानती ज़रूर है पर कहना नहीं चाहती. और कुछ?”

श्याम सोचते हुए बोला,

“सर, और कुछ तो अभी याद नहीं आ रहा. मैंने जो सबके स्टेटमेंट्स नोट किया है; एकबार उनको अच्छे से स्टडी करना पड़ेगा. थोड़ा टाइम लगेगा सर.”

“हाँ... थोड़ा टाइम तो ज़रूर लगेगा. लेकिन कोशिश करना पड़ेगा की टाइम थोड़ा ही लगे... ज्यादा न हो जाए. ओके?”

“यस सर.”

“हम्म.. और कोई नयी बात? अच्छा....वो नया लड़का कैसा काम कर रहा है?”

“काम तो ठीक ही कर लेता है सर... पर आज थोड़ी सी गलती हो गई उससे... अभी जब मैं यहाँ आया तो देखा बद्री उसे समझा रहा था.”

“गलती!! कैसी गलती?”

“व..वो...सर...”

“ओह.. कम ऑन श्याम. जल्दी बोलो.”

“स...सर...वो... बाहर कुर्सी पर जब सुचित्रा और लोगों के साथ बैठी हुई थी तब उसे प्यास लगी थी... बद्री को बोलने पर उसने उस लड़के को पानी देने को कहा. लड़का जब पानी दिया तो सुचित्रा के बहुत पास था... अ...औ...”

“और??” भटाचार्य की उत्सुकता बढ़ने लगी.

“और व.. वो... सुचित्रा जी.. पर .... मोहित हो गया.”

“हैं?!!”

“जी सर.”

भटाचार्य ने श्याम को गौर से देखा.

श्याम सच बोल रहा था. ये बात समझते ही भटाचार्य खिलखिला कर हँस पड़ा. उसे हँसता देख कर श्याम भी हँसी रोक नहीं सका और हँस पड़ा.

“ओके.. जो हुआ सो हुआ... अब काम की बात.. मैं अभी पुराने कुछ केसेस को लेकर व्यस्त रहूँगा.. उनको स्टडी करूँगा; तो ध्यान रहे कोई मुझे डिस्टर्ब न करे. बहुत ज़रूरी होने पर ही मेरे पास किसी को आने देना. समझे?”

“यस सर.”

“ओके. यू मे गो नाउ.”

अनुमति मिलते ही श्याम वहाँ से चला गया.

श्याम के जाते ही भटाचार्य ने बगल में रखी एक फाइल को उठा कर उसके नीचे दबी कुछ पासपोर्ट साइज़ के फ़ोटो निकाले. ये वो फ़ोटो थे जिन्हें उसने आज सवाल जवाब के समय रंजन बाबू, सुचित्रा और अन्य लोगों को लाने को कहा था.

दो सफ़ेद पेपर लिया, उनमें से एक पर उसने सभी पुरुषों के फ़ोटो रख दिया और दूसरे पर दोनों महिला, अर्थात् रेणुका और सुचित्रा का फ़ोटो रखा और पेपर पर ही एक जगह पेन से पासपोर्ट साइज़ का एक चतुर्भुज बनाया. अब दोनों फ़ोटो और वो चतुर्भुज ऐसे बने और रखे थे कि अगर तीनों को रेखाओं से जोड़ा जाए तो एक त्रिकोण बन जाए.

भटाचार्य ने अब एक सिगरेट सुलगाया, तीन – चार कश लगाया और अपने आप से ही कहा,

“पता नहीं श्याम ने इस बात को नोटिस किया या नहीं... ये दो औरतें... रेणुका और सुचित्रा... शुरू से ही संदेह के घेरे में हैं. दोनों के लंबे बाल हैं... दोनों के ही बालों का रंग लाइट ब्राउन है, दोनों ने ही अपने नाखूनों को थोड़ा बढ़ाया हुआ है, नाखूनों पर नेलपॉलिश लगी है, दोनों ने ही मैनीक्योर किया है. सुचित्रा चटर्जी तो है ही सुंदर... लेकिन रेणुका को भी इस मामले में नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. दोनों ने ही शायद परफ्यूम भी शायद एक सा लगाया था.... या शायद.... म्मम्म....खैर...”

भटाचार्य ने अब दो कागज और लिया; और उन दोनों कागज़ों में से एक पर रंजन बाबू, सुरेंद्रनाथ और बिपिन काका के फ़ोटो उसी त्रिकोण तरीके से रखा और दूसरे पर गोपाल, कालू और अजोय के.

इसके बाद भटाचार्य ने टेबल का ही एक और दराज खोला, हेडफ़ोन निकाला और उसे उसी दराज में रखे एक छोटे से टेप रिकॉर्डर से कनेक्ट कर के कुछ सुनने लगा. ज्यों ज्यों सुनता गया... त्यों त्यों उसके चेहरे के भाव कई बार बदलते गए.
 
११

इधर गाँव में :

एक बड़े घने छाँवदार वृक्ष के नीचे गाँव के कुछ प्रबुद्ध और वरिष्ठ लोग एकत्र हुए थे. सबके ही मुख मंडल पर घोर चिंता के घनघोर बादल छाए हुए थे. सभी किसी सोच में एक साथ डूबे हुए थे. सब के सब बिल्कुल चुप.

बड़ी देर बाद गाँव के सबसे वरिष्ठ सज्जन श्री सुमलय बिस्वास ने गला साफ़ करते हुए कहा,

“नहीं मेरे मित्रों... व्यक्तिगत रूप से मेरा यही मानना है कि इस समस्या का समाधान हमारे खुद के हाथों में नहीं है. पुलिस चाहे कुछ भी कहे या करे; मेरा स्वयं का मानना है की ये सभी घटनाएँ किसी बहुत ताकतवर ऊपरी बला का काम है... और इसका मुकाबला करने के लिए हमें भी ऐसे ही किसी ताकत की सहायता लेनी होगी.”

एक वृद्ध सज्जन बोल पड़े,

“वो तो हम सब समझ ही रहें हैं बिस्वास जी... पर असल प्रश्न तो यही है कि क्या आप या इस गाँव में कोई भी ऐसी किसी शक्ति को जानता है जो हमारी सहायता करने के लिए तैयार हो?”

इस प्रश्न पर सभी चुपचाप एक दूसरे का मुँह ताकने लगे... और जब उत्तर नहीं मिला तो परे देखने लगे... सिवाय बिस्वास जी के.

उन्होंने कांपते लहजे में कहा,

“हाँ... मैं जानता हूँ ऐसे किसी को.”

उनका ये कहना था कि सभी आश्चर्य से बिस्वास जी की ओर देखने लगे. लेकिन बिस्वास जी के चेहरे पर दृढ़ता के साथ साथ एक अनिश्चितता का भी भाव था. एक घबराहट थी उनमें.

उन्हें ऐसा देख कर एक दूसरा सज्जन उनके पास आया और पूछा,

“कौन? किसकी बात कर रहे हैं आप?”

होंठों पर जीभ फेर कर खुद को नार्मल दिखाने की कोशिश करते हुए बिस्वास जी बोले,

दस दिन बीत गए.

इसी बीच एक और लड़के की मृत्यु हुई.

गाँव में कुछ लोगों को अब रेणुका और सुचित्रा पर संदेह तो होने लगा था पर उस संदेह को बल देने योग्य पर्याप्त कारण नहीं था उनके पास.

पंद्रहवें दिन खबर लगी की बगल के गाँव में एक सिद्ध बाबा आए हुए हैं और इस गाँव के कुछ लोग उन्हें लाने गए हैं. सिद्ध बाबा के दर्शन के लिए गाँव के भोले और सीधे लोगों में एक उत्तेजना, एक उद्वेग, एक उल्लास घर कर गया और सब के सब जल्द से जल्द बाबा के अपने गाँव में पाने की इच्छा करने लगे.

यहाँ तक की सुचित्रा ने भी उस बाबा के खाने के लिए तीन – चार स्वादिष्ट पकवान बनाए और अपने पति, बेटे और अपना भविष्य जानने पूछने के लिए मन ही मन भिन्न भिन्न प्रश्न सजाने बुनने लगी.

ऐसा ही कुछ रेणुका भी करने लगी थी.

उसने भी कुछेक पकवान बनाए और बाबा से पूछने के लिए कुछ प्रश्न तैयार कर ली थी.

गाँव में हर जगह, हर कोने में सिर्फ़ उस बाबा के ही चर्चे थे.

बाबा ये हैं, बाबा ऐसे हैं, बाबा वैसे हैं.... बाबा ऐसा कर सकते हैं, बाबा वैसा कर सकते हैं... इत्यादि इत्यादि.

आखिरकार वो दिन भी आ गया. सब नदी के तट पर जा कर खड़े हो गए. थोड़ी देर की प्रतीक्षा के बाद जैसे ही बाबा की नाव दूर से आती दिखि; सब अति प्रसन्नता से बाबा का जयकारा लगाने लगे.

बाबा ने जैसे ही नाव से उतर कर नदी तट पर अपने कदम रखे, गाँव वालों में धक्कामुक्की शुरू हो गई उनका चरण छूने के लिए. हर कोई बाबा के चरण छू कर अपना भाग्य बदलना चाहता था. गाँव वालों की ख़ुशी देखते ही बनती थी. उन्हें इस तरह इतना प्रसन्न और अपने प्रति इतना स्नेह, प्रेम और भक्ति देख कर बाबा गदगद हो गए. उनके तेजयुक्त मुखमंडल पर भी प्रसन्नता नाचने लगी. पर उनकी आँखों और भृकुटियों के उतार चढ़ाव कुछ और ही कहानी कह रही थी.

उनके साथ उनके दो चेले भी चल रहे थे. दोनों बाबा के अगल बगल थे.

बाबा अपनी चाल थोड़ा धीरे करते हुए अपने दाएँ चल रहे चेले के कान में कुछ कहा.

चेला बहुत गम्भीरतापूर्वक सारी बात सुना और सिर हिला कर आज्ञा माना.

सभी गाँव वाले पूरी श्रद्धा से उन्हें एक बहुत ही साफ़ सुथरे और सुगंधी लगे पालकी में बैठा कर गाँव से थोड़ा हट कर एक सुनसान जगह में उनके लिए बनी एक कुटिया में ले गए.

इधर वह चेला, जिसका नाम हरि था, वो बिस्वास जी को एक किनारे ले गया और पूछने लगा,

“बिस्वास जी, आपने जिस कारण गुरूजी जो यहाँ बुलाया है क्या वो एकबार फ़िर से दोहराएँगे? .... विस्तार से.”

बिस्वास जी तनिक चकित को कर पूछे,

“क्यों श्रीमन, गुरूजी को कोई असुविधा हो गई है क्या? यदि किसी भी प्रकार की असुविधा हुई है तो मैं पूरे गाँव वालों की ओर से उनसे एवं आपसे क्षमा माँगता हूँ.”

कहते हुए बिस्वास जी रुआंसा होते हुए हाथ जोड़ लिए.

चेले को दया आई. उसने तुरंत बिस्वास जी के हाथों को पकड़ कर नीचे करता हुआ बोला,

“अरे बिस्वास जी... ये आप क्या कर रहे हैं? ऐसी कोई बात नहीं है. हमें किसी भी तरह की कोई असुविधा नहीं हुई है. बल्कि मैं, चांदू और गुरूजी .... सब के सब आप लोगों के स्नेह और विश्वास को देख कर आश्चर्य और प्रसन्नता से भरे जा रहे हैं. पर मैं जो पूछ रहा हूँ आपसे उसका सीधा कारण आप ही लोगों की परेशानी से जुड़ा हुआ है. अतः बिना विलम्ब किए कृपया सब कुछ दोबारा मुझे कह सुनाइए.”

“सीधा....कारण....ह..हम..लोगों....से ज...जुड़ा.... क्यों.... आप को... ल... लग..लगता है एस... ऐसा...?”

“गुरूजी को लगता हैं.”

हरि ने सीधा सपाट और संक्षिप्त उत्तर दिया.

स्पष्ट था कि वह शीघ्र से शीघ्र बिस्वास जी से अपना वाँछित उत्तर पाने की अपेक्षा कर रहा था.

बिस्वास जी ने थूक गटका... चेहरा पोछा, चश्मा ठीक किया और फ़िर बोले,

“दरअसल ये कहानी आज से कई वर्ष पहले की है.. इसी गाँव की........”

कहते हुए बिस्वास जी ने वही कहानी सुना दी जो कुछ महीने पहले दुर्गा ने सुचित्रा को सुनाई थी.

हरि सब कुछ पूरे धैर्य से सुनता रहा.

चेहरा पढ़ने वाला कोई पारखी आदमी आसानी से बता सकता था कि इस समय कहानी सुनते हुए हरि बहुत कुछ सोच रहा था, विश्लेषण कर रहा था और शायद कोई तोड़ ढूँढने की कोशिश कर रहा था.

पूरी घटना सुनाने के बाद बिस्वास जी थोड़ा रुक कर पूछे,

“श्रीमन, कोई विशेष बात है क्या? आपने दोबारा पूरा विवरण क्यों जानना चाहा? गुरूजी ने आपको ऐसा करने को क्यों कहा?”

हरि से तुरंत कुछ बोला नहीं गया.

परन्तु उसका चेहरा देख कर ये स्पष्ट समझा जा सकता था कि उसका मन शांत नहीं है. बिस्वास जी से सब कुछ सुन तो लिया पर शायद कहीं कुछ जमता हुआ सा नहीं लगा रहा था उसे....या फ़िर शायद कोई ऐसी बात थी जो उसे पल भर में ही विचलित कर दिया था.

उसने बिस्वास जी को इशारा कर के पास में ही एक पेड़ के नीचे चलने को कहा.

दोनों अभी जा कर वहाँ खड़े ही हुए थे कि बिस्वास जी को कुछ सूझा और हरि को वहाँ बैठने को बोल कर बगल के एक दुकान में चले गए.

थोड़ी ही देर में चाय लेकर उपस्थित हुए.

एक हरि को दिया; पूरे श्रद्धा भाव से और दूसरा स्वयं लिया.

चाय पीते हुए पूछ बैठे,

“श्रीमन, कृपया बताइए की आप वास्तव में क्या जानना चाहते हैं? क्या उलझन है? क्या गुरूजी ने किसी संकट की ओर संकेत किया है? क्या समस्या बहुत भयावह है?”

हरि शांत रहा.

चाय खत्म कर कुल्हड़ एक ओर रखते हुए कहा,

“समस्या है तो सही... क्या है ये तो आपको और पूरे गाँव वालों को पता है... पर...”

“पर क्या श्रीमन?”

अधीर होते हुए कहा बिस्वास जी ने.

“गुरूजी को लगता है की इस पूरे समस्या का मूल कहीं और छुपा हुआ है.”

“मूल?”

“हम्म.”

“गुरूजी ने ऐसा कहा?”

“हाँ... गुरूजी ने ऐसा ही कहा है और पूरे विश्वास के साथ उनका यही मानना भी है.”

“तो क्या समस्या वो नहीं है जो इतने दिनों से हम सोचते और समझते आ रहे थे?”

“नहीं... समस्या तो है वही जो आप समझ रहे हैं... यहाँ ध्यान दीजिए की मैंने आपको क्या कहा है?”

“क्या कहा है?”

“यही की समस्या का मूल कहीं और है.”

“ओह हाँ... तो क्या.... म.. मतलब... समस्या का... स.. स...समाधान होगा न?”

“हाँ होगा... अवश्य होगा..”

हरि ने पूरे विश्वास के साथ कहते हुए अपने जांघ पर एक थपकी दी.

उसका ऐसा विश्वास देख कर बिस्वास जी के मन को भी बल मिला.

कुछ देर वहीँ बैठ यहाँ वहाँ की बातें करने के बाद दोनों उठ खड़े हुए और उस कुटिया की ओर चल पड़े जहाँ बाबा ठहरे हुए हैं और अभी भी गाँव वालों का तांता लगा हुआ है.

धीरे धीरे ही सही पर अंत में सभी गाँव वाले अपने अपने घरों को लौट गए.

बिस्वास जी के अलावा वहाँ अन्य किसी को बैठने नहीं दिया गया.

अब उस कुटिया में चार लोग थे.

स्वयं बाबा जी, उनके दो चेले / शिष्य; हरि और चांदू, और बिस्वास जी.
 
दोपहर के दो बजे रहे थे.

गाँव वालों के ही लाए गए पकवानों में से कुछ बिस्वास जी को खाने को दे कर बाबा जी स्वयं थोड़ा भोग खाने लगे.

उनका खत्म होते ही उन्होंने शिष्यों को तुरंत खा लेने को कहा जिसका उन दोनों ने अक्षरशः पालन किया और खाने बैठ गए. अब तक बिस्वास जी ने भी खाना समाप्त कर लिया था.

हाथ मुँह धो कर वापस आ कर बाबा अपने आसन पर बैठ गए.

बिस्वास जी भी उनके आगे हाथ जोड़ कर बैठ गए.

“वत्स...”

मधुर वाणी में बिस्वास जी को सम्बोधित किया बाबा ने.

“ज...जी... गुरूजी.”

“हरि ने तुमसे कुछ पूछा होगा?”

“जी गुरूजी. नदी के बारे.....”

बाबा ने हाथ उठा कर बिस्वास जी को रुकने का संकेत किया. बिस्वास जी तुरंत चुप हो गए.

“हम जानते हैं हरि ने तुमसे क्या पूछा होगा. हमने ही उसे ऐसा करने को कहा था.”

“ओह... जी गुरूजी.. समझा.”

बाबा एकाएक शांत हो गए. जो प्रसन्नचित्त चेहरा अब तक दमक रहा था वो अचानक से बेहद गम्भीर हो गया. बड़े शुष्क स्वर में बोले,

“वत्स बिस्वास.. जिस समस्या के समाधान हेतु मैं यहाँ आया हूँ; वो तो मैं कर के ही जाऊँगा. परन्तु मेरे विचार से एक बात पहले से ही तुम लोगों को... विशेष कर तुम्हें बता देना मैं उचित समझता हूँ. देखो वत्स, ऐसे मामलों में... मेरा मतलब ऐसे नदी, तालाब या पोखर जैसे मामलों में; मामला उतना पेचीदा नहीं होता जितना की दिखता है अपितु इससे कहीं अधिक जटिल होता है.

क्योंकि जहाँ भी पानी की अधिकता या प्रचुरता होती है; जैसे की नदी, तालाब या पोखर जैसे जगह; वहाँ का वातावरण और उस वातावरण में पाए जाने वाले अन्य वस्तुओं में उपस्थित कुछ ऐसे तत्व होते हैं जिनसे नकारात्मक शक्तियों को बहुत बल मिलता है. ऐसे जगहों के तापमान में सदैव ही एक भारीपन रहता है जिसे साधारण जन झेल नहीं पाते क्योंकि इस तरह के भारीपन को वो झेलने योग्य नहीं बने होते.

अब जैसा की तुम्हें हरि से पता चल ही गया होगा कि वास्तविक समस्या ये नहीं है वरन, समस्या का मूल तो कहीं और ही है. अब ये मूल क्या है और कहाँ का है, क्यों है इत्यादि बातों का तो मुझे स्वयम ही पता लगाना पड़ेगा.

मैं जानता हूँ कि तुम्हारे मन में बार बार यही एक प्रश्न उठ रहा है की आखिर मैं समस्या के किस मूल की बात कर रहा हूँ. यह तो अभी के लिए मेरे लिए भी एक पहेली है. लेकिन एक सच बताता हूँ. इसे अपने तक ही रखना; गाँव वालों को बताया तो वे लोग बहुत डर जाएँगे.... जब तुम लोग नाव से मुझे और मेरे शिष्यों को बैठा कर ला रहे थे तब तुम्हारे गाँव से कुछ दूर रहते समय ही मैंने जाग्रत सिद्धि मन्त्र पढ़ कर स्वयं की ही आँखों पर फूँक मारी और दक्षिण दिशा की ओर देखा.

उस ओर देखते ही मैंने देखा कि एक सिर पानी से थोड़ा ऊपर उठा हुआ है. मतलब केवल आँखों तक का हिस्सा ही पानी से ऊपर उठा हुआ है. उसकी आँखों में एक अजीब सी बात थी. कुछ कह रही थी उसकी आँखें.... शायद शिकायत कर रही हो... या शायद गुस्सा कर रही या फिर शायद गाँव जाने से मना कर रही हो. ऐसा लग रहा था मानो उसे मेरे यहाँ आने का उद्देश्य का पहले से ही ज्ञात हो गया हो.

इतना तो निश्चित है कि वो सिर किसी युवक का था और यदि अनुमान के बल पर कहा जाए तो कदाचित उसी युवक का होगा जो आज से कई, कई वर्ष पहले उसी नदी के दक्षिण दिशा में डूब कर अपना प्राण गँवा बैठा था.

कई प्रचलित मान्यताओं, कथाओं, लोक कथाओं, दंतकथाओं इत्यादि में दक्षिण दिशा को वर्षों से यमलोक का द्वार कहा व माना जाता है... और उस नवयुवक की मृत्यु भी वहीँ हुई है... अप्राकृतिक मृत्यु ! स्वाभाविक रूप से उस दिवंगत आत्मा में रोष व प्रतिशोध की भावना कहीं अधिक होगी और ये भी एक अच्छा कारण हो सकता है उस आत्मा का शक्तिवान होने का.

परन्तु.....”

बोलते हुए चुप हुए बाबा और उनके चुप होते ही उत्सुकता के मारे बिस्वास जी बोल पड़े,

“परन्तु क्या गुरूजी?”

“परन्तु उस युवक की आँखों को देख कर मैं उन्हें उस कम समय में जितना पढ़ पाया उसके अनुसार उस आत्मा में इतनी शक्ति होना कोई बच्चों का खेल नहीं. और तो और, इतनी शक्ति उसकी स्वयं की भी नहीं है. ये शक्ति उसे कहीं और से मिल रही है.”

बाबा के इस कथन से अब तक भोग समाप्त कर हाथ मुँह धो कर उनके पास बैठे हरि और चांदू भी आश्चर्य के सागर में गोते लगाने से खुद को नहीं रोक सके.

बिस्वास जी का मुँह भी खुला का खुला रह गया.

उन तीनों ने लगभग एक साथ ही पूछा,

“अर्थात्??!!”

“अर्थात्... मम्म... कदाचित वो लड़की... जो... उस वन में मृत पाई गई थी.. वही इस लड़के को शक्ति दे रही है... और आवश्यकता होने पर लड़के की आत्मा भी उस लड़की की आत्मा को शक्ति प्रदान करती है. अगर ऐसा है तो भी......”

बाबा फ़िर चुप हो गए.

उनके मुखमंडल पर उभर आए चिंता की रेखाएँ ये चुगलियाँ करने लगी थीं कि बाबा ने अब तक जो कुछ भी कहा है उस लड़के और लड़की की आत्मा और उनकी शक्ति के बारे में; अगर वो सब सच भी हों तो भी कहीं कुछ ऐसा है जो इस पूरे परिदृश्य में फिट नहीं बैठ रहा. कुछ ऐसा है जो सामने हो कर भी नहीं दिख रहा... कहीं कुछ छूट रहा है.

काफ़ी देर तक कोई किसी से कुछ नहीं बोला.

अंत में बाबा ने ही वहाँ छाई शान्ति को भंग करते हुए बिस्वास जी से समय पूछा. बिस्वास जी ने समय बताया.

तीन बज चुके थे.

बाबा खिड़की से बाहर देखा और बिस्वास जी को घर जाने को कहा.

बिस्वास जी भी चुपचाप मान गए और बाबा को प्रणाम कर के वहाँ से चले गए.

दोनों शिष्यों ने देखा, बाबा को चैन नहीं है. बड़े गहन सोच में डूबे हुए हैं. अपने में ही कोई जोड़ - तोड़ कर रहे हैं.

अभी शायद आधा घंटा ही बीता था कि अचानक बाबा की भृकुटियाँ तन गयीं. दायाँ हाथ काँप उठा. ये दो लक्षण बाबा को ठीक नहीं लगे. उन्होंने चांदू को जल्दी से उनकी पोटली लाने को कहा.

पोटली हाथ में आते ही बाबा ने जल्दी से पोटली के अंदर से एक निम्बू निकाला और मन्त्र पढ़ते हुए उसे अपने सामने थोड़ी दूरी बना कर रख दिया. केवल क्षण भर उस स्थान पर रहने के फौरन बाद वो निम्बू वहाँ से लुढ़क कर उस स्थान पर चला गया जहाँ कुछ देर पहले बिस्वास जी बैठे हुए थे.

उस स्थान पर जा कर निम्बू रुक गया और बहुत तेज़ी से अपने स्थान पर घूम गया. और फ़िर, धीरे धीरे लाल होते हुए उसका रंग काला पड़ने लगा.

ये देखते ही बाबा की त्योरियां चढ़ गयी. हरि की ओर देखा और कहा,

“हरि... अतिशीघ्र बिस्वास के पास जाओ. जाओ.”

इतना कह कर बाबा ने एक संकेत करते हुए उसे एक और निम्बू दिया. हरि बाबा का आशय समझ गया. तुरंत अपने स्थान से उठा, अपना एक पोटली उठाया और लपकते हुए कुटिया से बाहर निकल गया.

इधर बाबा ने चांदू को अपने पास बिठा कर उसे कुछ जाप करने को कहा और स्वयं भी जाप करने लगे.

इधर ज़मीन पर पड़ा वो पहला वाला निम्बू धीरे धीरे काला होता जा रहा था....

बिस्वास जी अपने कदम जल्दी चला रहे थे.

उनको जल्दी अपने घर पहुँचना था क्योंकि दोपहर को अगर एकाध घंटे की नींद न ले तो उनको बदहजमी होने लगती है... तबियत खराब होने लगता है.

अभी कुछ दूर, यही कोई आधा किलोमीटर चले होंगे कि उन्हें अचानक से एक अंजाना भय सताने लगा. लोग बाग़ तो फ़िलहाल अभी भी सड़कों पर हैं पर संख्या बहुत कम है.

और जितने भी हैं; सब के सब कहीं न कहीं जल्द से जल्द जाने की होड़ में हैं. बात भी सही है.

भला कौन इस सूरज चढ़े दोपहरी में बाहर सड़कों पर खुला घूमे.

मन ही मन खुद को इतना विलम्ब होने का कारण मानते व कोसते हुए बिस्वास जी तेज़ कदमों में और तेज़ी लाते हुए आगे बढ़ते रहे.

चलते चलते वो एक ऐसे स्थान पर पहुँचे जो सुनसान या वीरान तो नहीं है पर दिन और देर शाम को अक्सर वो स्थान मनुष्य अथवा जीव जंतुओं से रहित हो जाया करता है.

बिस्वास जी डरते हुए आगे बढ़ने लगे.

डरने का कोई विशेष कारण नहीं था और न ही इससे पहले कभी उनको डर लगा था पर न जाने क्यों आज डर के मारे उनका पूरा शरीर ऐसे काँप रहा था जैसे घनघोर आँधी में कोई सूखा पत्ता.

उनके तेज़ कदम अब धीरे हो गए.

धीरे क्या हुए... अचानक से उठाना ही बंद हो गए. बहुत कठिनाई से उनको एक एक पग आगे रखना पड़ रहा था.

चार पग ही आगे बढ़ पाए थे बिस्वास जी कि तभी उन्हें आस पास के झाड़ियों में और पेड़ों के नीचे गिरे सूखे पत्तों की चरमराहट सुनाई दी. पलट कर आवाज़ वाली दिशा की ओर देखा.

जहाँ तक दृष्टि जा सकती थी... वहाँ तक देखा... पर संदेहास्पद कुछ भी दिखाई नहीं दिया.

निश्चित हुए ज़रूर पर धड़कनें तेज़ हो गयीं. कुछ अनिष्ट होने का भय एक बार फिर से उनके मन मस्तिष्क में छाने लगा.

फिर आगे बढ़ना शुरू किया उन्होंने...

एक एक पग सावधानी और आहिस्ते से रखते हुए. बिल्कुल ऐसे जैसे की वो धरती माता को कोई कष्ट नहीं देना चाहते हैं.

ऐसे ही चलते हुए उन्होंने यही कोई १० – १२ कदम चल लिया. धड़कनें अब भी तेज़ थी. सिर के दोनों ओर से पसीना बहते हुए दोनों कान के साइड से नीचे चला गया.

पहले भी कई बार उन्होंने इस तरह का वातावरण झेला है... पर इस तरह से छक्के छुड़ा देने वाली स्थिति पहले कभी नहीं आई थी उनके सामने. दो पग और आगे बढ़ते ही उन्हें फिर वैसी ही एक सरसराने की आवाज़ सुनाई दी.

बिस्वास जी तुरंत सिर उठा कर ऊपर पेड़ों की ओर देखा.

पेड़ थे तो सही... पर बहुत अधिक संख्या में नहीं... लेकिन जितने भी थे; ऐसे वातावरण में भय में कई गुणा वृद्धि कर देने वाले थे.

कुछेक पेड़ तो ऐसे भी थे जिनकी टहनियाँ पत्तों सहित इस तरह से फैले हुए थे मानो वो सूरज की रौशनी को नीचे धरती पर आने ही नहीं देना चाहती हो. अन्य समय में ये पथिकों के लिए; यहाँ तक की कई बार बिस्वास जी के लिए भी गर्मी के दिनों में घनघोर छाया प्रदान कर वरदान साबित हुई है लेकिन आज यही ऐसे पेड़ बिस्वास जी को भयावह और प्राणघातक लग रहे हैं.

पेड़ों के झुरमुठों का निरीक्षण करते हुए आगे बढ़ते बिस्वास जी को किसी के पदचाप सुनाई दिए.

और केवल पदचाप ही नहीं; कुछ और भी सुनाई दिया उनको पर वो पूरी तरह से निश्चित नहीं थे.
 
पेड़ों के झुरमुठों का निरीक्षण करते हुए आगे बढ़ते बिस्वास जी को किसी के पदचाप सुनाई दिए.

और केवल पदचाप ही नहीं; कुछ और भी सुनाई दिया उनको पर वो पूरी तरह से निश्चित नहीं थे.

अपने आसपास और ऊपर की ओर ध्यान रखते हुए बिस्वास जी आगे बढ़ने के लिए जैसे ही फिर एक पग आगे रखा तभी उन्हें फिर वही आवाज़ सुनाई दी.

अब बिस्वास जी निश्चित थे... पदचाप तो है ही... साथ ही घुँघरूओं की भी आवाज़ है!

कोई और समय होता तो शायद यही ध्वनि उन्हें अत्यंत कर्णप्रिय लगी होती... या आयु के जिस पड़ाव पर वो हैं कदाचित ऐसे ध्वनियों पर ध्यान ही नहीं देते... परन्तु आज का ये वातावरण, निर्जन पथ, अकेले वो और उस पर भी आस पास से ऐसे आवाजों का आना; निश्चित ही किसी के भी मन को भयाक्रांत करने के लिए पर्याप्त हैं.

ऐसा तीन से चार बार हुआ.

बिस्वास जी चार पग आगे बढ़ते... वही पदचाप सुनाई देती... वही घुँघरूओं की आवाज़ सुनाई देती... और साथ ही पत्तियों की चरमराहट और हवाओं में सरसराहट.

डरते हुए ही सही पर अंततः बिस्वास जी ने धीमे स्वर में बोलना प्रारंभ किया,

“मैं नहीं डरता... मेरा भगवान मेरे साथ है..... मैं नहीं डरता... मेरे गुरु मेरे साथ है.... मैं नहीं डरता... मुझे नहीं डरना....”

दो ही बार उन्होंने ऐसा कहा था कि अचानक से एक तेज़ हवा चली और साथ में धूल का एक आँधी से चला. दो मिनट में ही आँधी शांत भी हो गई.

अपनी आँखों को मलते हुए बिस्वास जी आगे अपना रास्ता देखने की कोशिश कर ही रहे कि तभी उनके कानों से एक आवाज़ आ टकराई,

“बिsssस्वाsssसssssss..!!”

बेहद ठंड अंदाज़ में ये स्वर बिस्वास के कानों से टकराई.

बिस्वास जी हड़बड़ा गए.

अपना नाम ऐसे अंदाज़ में सुनना उनको वाकई हजम नहीं हुआ और अब उनका डर अपने सभी सिमा को पार कर चुका था.

अपने गुरु अर्थात् बाबा जी का नाम लिया उन्होंने और बहुत मुश्किल से अपना एक पैर आगे बढ़ाया.

ऐसा करते ही एक बार फिर वही धूल भरी आँधी उड़ी और बिस्वास जी को कुछ भी देखना असंभव हो गया.

आँधी जब थमी तब बिस्वास जी ने बहुत धीरे से आँखें खोला.

सामने दूर दूर तक धूल ही धूल उड़ रही थी. जब धूल थोड़ी कम हुई तब बिस्वास जी ने सामने जो देखा उसे देख कर उन्हें बिल्कुल भी विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने तुरंत अपना चश्मा उतार कर उसे अच्छे से पोंछा और फिर आँखों पर चढ़ा कर सामने की ओर बहुत ध्यान से देखा.

उनसे थोड़ी दूर पर, एक बड़े से छायादार पेड़ के नीचे एक अतिसुंदर रमणी खड़ी थी.

अपने समय के बड़े रसिक श्रेणी के व्यक्ति रह चुके बिस्वास जी ने इतनी दूरी से भी उस नवयौवना के शारीरिक ढांचे को बखूबी देख लिया. गौर व बादामी वर्ण मिश्रित शरीर, हिरणी जैसी बड़ी बड़ी आँखें... पके पपीते समान तने हुए और पुष्ट स्तन द्वय, लम्बे अधखुले बाल जो कदाचित कमर तक आ रही थी, कोमल कंधे, हाथ और पैर.

सच में बहुत सांचे में ढला बदन था उसका...

उन्नत वक्षस्थल, पतली कमर और इन दोनों से अपेक्षाकृत थोड़ा अधिक फैला हुआ नितम्ब.... रह रह कर बिस्वास जी के मन मस्तिष्क में यौन प्रेम जगाने लगी.

बिस्वास जी का गला सूखने लगा. आयु के बहत्तरवें पड़ाव पर ऐसे एक दिन में, ऐसे समय में ऐसा कुछ देखने को मिलेगा; यह तो उन्होंने भूल से भी कभी नहीं सोचा था.

हाँ, अपने जवानी के दिनों में कई गुलछर्रे उड़ाए थे उन्होंने, बहुत मस्ती की थी. हर तरह की मस्ती. लेकिन जैसे जैसे आयु बढ़ती गई, वैसे वैसे वो स्वतः इन चीज़ों से दूर होते गए. मन में बीच बीच में कभी कोई आशा उठी भी होगी तो अपनी समझदारी, समाज और घर परिवार का दायित्व निर्वहन के चक्कर में अपनी ऐसी उत्तेजक इच्छाओं का गला घोंट देना पड़ा था उनको जिसे उन्होंने सहर्ष किया भी क्योंकि जितनी इच्छा उनको अपनी इन यौन इच्छाओं को पूरी करने की होती उससे कहीं अधिक अपने घर परिवार और समाज में अपनी बढ़ती सम्मान, प्रतिष्ठा और दायित्वों के प्रति जागरूकता का बोध रहता.

और साठ के बसंत पर पहुँचने के साथ ही ऐसी इच्छाओं के पूर्ण होने की आशा को भी त्यागना पड़ा.

लेकिन... लेकिन...

जिन इच्छाओं और अल्हड़पन को बहुत पहले ही वो छोड़ और भूल चुके थे... वो इस तरह आज उनके सामने किसी भोज पात्र के भांति सामने खड़ा है. दृष्टि हट नहीं रही, मन कहीं और जाने का नाम नहीं ले रहा, सोया, मुरझाया जननांग जो अब केवल मूत्र त्यागने का एक साधन मात्र रह गया था उसमें भी न जाने कहाँ से प्राण का संचार होने लगा.

अनुमति लिए बिना ही दिमाग किसी रणनीतिज्ञ की भांति सोचने लगा.

‘उस ओर जाना चाहिए? ... नहीं.. नहीं... नहीं जाना ही श्रेयकर होगा... परन्तु... क्या अतिशय सुंदरता की ऐसी अनुपम मूर्ति को अनदेखा करना उचित होगा? जल से लबालब भरा और सुगन्धित फूलों से युक्त एक ऐसा नयनाभिराम सरोवर जो स्वयं आज मेरे सामने आ खड़ा हुआ है... इसमें डूबकी न सही... क्या हाथ की एक अंजुलि मात्र जल से अपने कंठ को तर कर लेने में भी पाप लगेगा? दोष है इसमें?’

स्वयं से ही ऐसे तार्किक प्रश्न करते हुए किसी अनिष्ठ की आशंका को ह्रदय के एक कोने में दबा कर मन में रह रह कर हिलोरें मारता, जन्म लेता वर्षों की लालसा को सम्भालने का अथक प्रयास करते हुए बिस्वास जी छोटे पर एक एक पग बड़ी सावधानी से रखते हुए आगे बढ़ते रहे.

अपनी ओर बढ़े आ रहे इस पुरुष को अपने मन में उठ रहे संशयों, संदेहों व नाना प्रकार के प्रश्नों से जूझता समझ कर वो सुंदरी लाज से भरे अपने मुख पर एक मीठी सी मुस्कान बिखेर दी. पूरी तरह आश्वस्त. इस बात से कि चाहे लाख रोकना चाहे खुद को कोई पर उसके इस लावण्यमयी मृदु मुस्कान के आघात से बचना किसी के लिए भी असंभव है.

बिस्वास जी उस युवती के सौन्दर्यमन्त्र में वशीभूत हो कर उसकी ओर बढ़ते ही रहे और तभी रुके जब उस युवती के पास, बहुत पास आ गए थे.

अपलक उसके संगमरमर से पूरे बदन को देखते हुए बस किसी तरह इतना ही पूछ पाए,

“कौन हो तुम?”

“लड़की.” कहते हुए हल्के से हँस दी वो. उसकी वो क्षण भर की हँसी मानो कई सौ मन (वजन) शहद घोल दिया बिस्वास जी के कानों में.

“वो...त... तो देख ही रहा... हूँ...न.. ना..नाम क्या है?”

“लाडली.”

इस बार फिर शरमाई वो. गालों पर पलक झपकते ही लाज की लालिमा छा गई.
 
तभी बिस्वास जी को ऐसा कुछ दिखा जिसे स्पष्ट देख कर भी बिस्वास जी के लिए विश्वास कर पाना बहुत बहुत ही कठिन था. युवती से दो बातें करने के बाद पहली बार बिस्वास जी की आँखें युवती के शरीर के उस स्थान पर गई जो हरेक पुरुष और यहाँ तक की अन्य स्त्रियों के आकर्षण का प्राकृतिक केंद्रबिंदु होता है... वक्ष !

उसके वक्षस्थलों की ओर दृष्टि जाते ही बिस्वास जी को दुनिया का सबसे बड़े आश्चर्य का एक जबरदस्त झटका लगा. वो युवती अपने शरीर के ऊपरी भाग को केवल एक पतली साड़ी से ही ढक कर रखी थी. उसके पुष्ट, बड़े और भरे हुए स्तन पतली साड़ी के अंदर से सामने की ओर किसी भाले की तरह तने हुए थे और स्तनाग्र तो जैसे उस भाले की नोक हों.

“आहा... सुंदर नाम है... लाडली...”

कहते हुए बिस्वास जी उस युवती के और निकट आ गए. उसके जिस्म से आती सुंदर सुगंध मानो तन मन को भिगो दे रही थी और बिस्वास जी जितना संभव हो सके उस सुगंध में खुद को सराबोर कर लेना चाह रहे थे.

युवती अब आँखें थोड़ा तिरछी रखते हुए बिस्वास जी की ओर देखी. बिस्वास जी की दृष्टि उस समय उसके बड़े वक्षों की ओर ही थी.... और रह रह कर उसके पतले कमर पर फिसल जाती. इसके साथ उनके मन में यौन क्रियाओं की भावना जाग जाती,

‘आहा! नाभि भी दिख रही है... कितना सुंदर और गोल है! जी चाह रहा है कि अभी इसे दबोच कर इसके कमर को सहलाऊं और फिर जी भर कर इसके इस सुंदर नाभि को चूमूँ और जीभ घुसा घुसा कर खूब अच्छे से चाटूं!’

पता नहीं अचानक से ऐसा क्या हुआ जो बिस्वास जी स्वयं को रोक नहीं सके और एकदम से हाथ बढ़ा कर उसके कमर को हल्के से सहलाते हुए अपनी मध्यमा ऊँगली उसकी नाभि में डाल दिया.

युवती एकदम से एक हल्की पर तेज़ सीत्कार ले उठी...

चेहरे के भावों से साफ़ कर दिया की उसे बिस्वास जी की इस हरकत का मज़ा ही मिला है.

मतलब, बिस्वास जी इतना में ही नहीं रुक कर अगर इससे भी आगे बढ़ना चाहें तो उसे कोई शिकायत नहीं होगी.

प्रफुल्लित मन से युवती की नाभि में ऊँगली को गोल गोल घूमा कर हल्का दबाव दे कर उसकी काम प्रतिक्रिया देखने में बिस्वास जी को बहुत आनंद आने लगा था. रह रह कर उसके पूरे कमर को सहलाते और फिर नाभि के पास आ कर उसके चारों ओर अँगुली के पोर से सहलाते हुए नाभि में अँगुली डालते और फिर वहाँ भी गोल गोल घूमाने लगते.

लाडली, अर्थात वो युवती काँपने – थरथराने लगी. खुद को खड़े रखने के लिए उसने नीचे झुकी हुई पेड़ की एक डाली को थाम लिया. धड़कने तेज़ हो गई उसकी और इसी के साथ उसके स्तन द्वय का ऊपर नीचे होने की गति भी बढ़ गई जोकि निःसंदेह सभी पुरुषों की भांति बिस्वास जी के भी दृष्टि आकर्षण का केंद्र बन गई फिर से.

लाडली के देह से निकलने वाली सुगंध ने धीरे धीरे अपने और बिस्वास जी के चारों ओर एक अदृश्य घेरा सा बना लिया था अब तक और बिस्वास जी उसी में सुध बुध खो कर इस अनुपम सुंदरी नवयौवना के सुंदर शरीर रूपी सरोवर में अब डूबकी लगाने के लिए छटपटाने लगे थे. हिम्मत कर के अपने बूढ़े, शुष्क होंठों को लाडली के होंठों से सटा बैठे....लाडली रोकी नहीं.. पीछे नहीं हटी... वरन, अपना बायाँ हाथ बढ़ा कर बिस्वास जी के दाएँ हाथ को थाम ली और दूसरे हाथ को उनके पेट पर बहुत हल्के से रखी.

उसके होंठों के नर्म छुअन ने बिस्वास जी के अंदर के कामाग्नि के लिए घी का काम किया.

बिस्वास अब इतने निकट आ गए कि अब लाडली के स्तनों के स्तनाग्र उनके सीने पे गड़ते हुए से प्रतीत होने लगे.

‘आह! अब और नहीं.’

ऐसा सोच कर बिस्वास जी लाडली को पकड़ कर बगल में ही एक झाड़ी के पीछे ले गए और कस कर उसका आलिंगन करके उसे बेतरतीब चूमने लगे. क्या गला, गाल, होंठ, नाक... कुछ भी बाकी नहीं छोड़ना चाहते थे बिस्वास जी. लाडली अभी भी पहले की ही तरह बिस्वास जी का दायाँ हाथ पकड़े थी और दूसरा हाथ जो कि अभी तक उनके पेट पर था; अब धीरे धीरे ऊपर उठ कर सीने पर आ गया था.

कुछ ही क्षणों बाद बिस्वास जी को अचानक से एक हुक सी लगी अपने सीने के अंदर.

ऐसा लगा मानो किसी ने एक छोटी पिन चुभो दिया हो उनके दिल में.

थोड़ा तड़पे ज़रूर, पर इस अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे इसलिए इसे अनदेखा करते हुए पुनः काम क्रीड़ा में रत होने का प्रयास करने लगे.

झाड़ी के पास ही एक ठूंठ से सटा कर लाडली को खड़ी कर के उसके आंचल को गिरा कर ऊपर के पूरे बदन को बेतहाशा चूमने लगे बिस्वास जी. मन ही मन एक दृढ़ संकल्प ले लिया था उन्होंने कि आज या तो वो इस कमलनयना के साथ सहवास करेंगे ही करेंगे या फिर घर बार छोड़ हमेशा के लिए सन्यास ले लेंगे.

यूँ तो लाडली के गदराए देह का हरेक इंच प्रेम पाने के योग्य था परन्तु दृष्टि व लालसा का केंद्र अब भी उसके उन्नत स्तन ही बने हुए थे.

उसके स्तनों के साथ जिस प्रकार से भी संभव हो; बिस्वास जी पूरा मन लगा कर खेलने लगे. चूमना, चाटना, दबाना, चूसना, दोनों स्तनों के मध्य अपना मुँह घुसा कर रगड़ते हुए स्तनों की रेशमी छूअन को अपने चेहरे के दोनों साइड से महसूस करना... स्तनाग्रों को दो ऊँगलियों से निर्ममतापूर्वक दबाना, नाखूनों को हल्के से गड़ाना इत्यादि...

कुछ भी बाकी न छोड़ा उन्होंने.

कमर के नीचे धोती में तम्बू तो बहुत पहले ही बन चुका था.... पर इतने देर तक कपड़ों के अंदर रह कर खड़े रहने से उनका जननांग अब दर्द करने लगा था.

वो भी चाहने लगे कि कई साल बाद आज पहली बार इस तरह मूसल की भांति अकड़ कर खड़े अपने इस अंग को शीघ्र से शीघ्र आराम पहुँचाया जाए और आराम पहुँचाने का फिलहाल जो एकमात्र उपाय किया जा सकता है वो उनके सामने स्वयं को बिना किसी मान मनुहार के समर्पित कर चुकी इस लाडली नाम की लड़की के पास है.

अपने छाती पर रखे लाडली के हाथ को उन्होंने पकड़ कर अपने जननांग पर ले जाना चाहा पर लाडली नहीं मानी. वो अपने इस हाथ को उनके ह्रदय के पास से हटाना नहीं चाही.

बिस्वास जी को थोड़ा आश्चर्य हुआ कि इतनी देर से न जाने उन्होंने इस युवती के जिस्म के साथ क्या कुछ नहीं किया... केवल सहवास छोड़ कर के; पर ये पहली बार किसी चीज़ को मना की.

‘लगता है इसे शर्म आ रही है.. पगली... ही ही ही.. एकबार तेरे अंदर प्रवेश कर जाऊं... फिर देखता हूँ कैसे और क्या क्या रोकेगी.... ही ही ही... फिर तो खुद ही उछल उछल कर लेगी तू. हाहाहा....’
 
ऐसा सोच कर प्रसन्न होते हुए बिस्वास जी ने लाडली के बाएँ स्तन का स्तनाग्र सहित करीब दो चौथाई हिस्सा अपने मुँह में भर लिया और फिर ‘चुक चुक’ की आवाज़ कर के चूसते हुए उसकी साड़ी को पैरों पर से उठाते हुए घुटनों के ऊपर तक ले आए. इस दौरान पूरी तल्लीनता के साथ एक ओर स्तन को चूसते रहे तो दूसरी ओर साड़ी को उठाते हुए पैरों और घुटनों के ठीक ऊपर के थोड़े से हिस्से को बड़े प्यार से सहलाते रहे.

इधर उस लाडली की आँखें बंद हो आई थीं.

अपने बाएँ हाथ को बिस्वास जी गर्दन के पीछे से ले जा कर उनको कस कर पकड़ी और दाएँ हाथ की हथेली को उनके सीने पर अच्छे से जमा दी. उत्तेजना के मारे बिस्वास जी का हालत खराब होने लगा. सांसें फूलने लगीं उनकी. सीने पर दिल वाले जगह पर फिर से हल्का हल्का दर्द होने लगा.

बिस्वास जी ने देर न करते हुए उसके स्तनों पर मुँह लगा दिया.

और सिसकारी लेते हुए चूसने लगे.

पर उनको इस बात का तनिक भी भान नहीं हुआ कि जिस युवती के साथ वो काम क्रीड़ा में लिप्त हो रहे हैं; उसी में धीरे धीरे एक परिवर्तन आने लगा है. जिस हाथ को वो बिस्वास जी के सीने पर रखी थी उसके नाखून अचानक से बढ़ने लगे.

बढ़ते बढ़ते एक बड़े आकार के सुई की लम्बाई जितनी लंबी हो गए नाखून अब बहुत आहिस्ते से बिस्वास जी के सीने में गड़ने लगे.

पीड़ा कुछ अधिक होती पा कर बिस्वास जी मुलायम स्तन पर से मुँह हटा कर के सीने की ओर देखना चाहा पर लाडली ने तुरंत ही उनका सिर पकड़ कर दोबारा अपने स्तन पर रख दी.

बिस्वास जी इसे लाडली का उनके लिए प्यार और तड़प समझ कर मन ही मन गदगद होते हुए पूरे मनोयोग से उसके तड़प को शांत करना अपना कर्तव्य समझ कर बड़े प्यार से स्तनपान करने लगे.

लेकिन कुछ ही देर बाद उनके हृदय में एक ऐसा भयानक दर्द शुरू हुआ कि उन्हें अपने सीने पर दोनों हाथों से दबाव बनाते हुए वहीँ गिर जाना पड़ा. इस भयानक पीड़ा से तड़पते हुए ही उनका ध्यान गया लाडली की बढ़े हुए नाखूनों पर जिनके सिरों पर खून लगे हुए थे.

होंठों पर एक ऐसी मुस्कान लिए जिससे ये लगे कि उसे अपनी सफ़लता पर गर्व और बिस्वास जी के बेवकूफी पर बड़ा तरस और हँसी आ रही है; वह अपनी जीभ निकाल कर नाखूनों पर लगे खून को चाटने लगी.

बिस्वास जी ने गौर किया कि वो पसीने से ऊपर से नीचे तक भीग चुके थे.... पीड़ा बढ़ते ही जा रही थी.

और तभी बिस्वास जी की दृष्टि एकबार फिर लाडली की ओर गई जो खून चाटने में व्यस्त थी... और जो देखा उससे उनके आँखों के आगे अत्यधिक डर के मारे अँधेरा छाने लगा.

लाडली बड़े आराम से सभी नाखूनों को अच्छे से चाटने के बाद धीरे धीरे बड़े प्यार से मटकते हुए बेहोश प्राय हो चुके बिस्वास जी की ओर बढ़ने लगी.

परन्तु ज्यादा आगे न बढ़ पाई.

एक छोटी सी गेंद जैसी कोई चीज़ कहीं से उछल कर आई और सीधे उसके और बिस्वास जी के बीच आ कर रुक गई. अपने स्थान पर खड़ी लाडली हतप्रभ हो उस चीज़ को देख कर समझने का प्रयत्न करने लगी कि ये आखिर है क्या?

लाडली आगे की ओर झुक कर जैसे ही उस चीज़ को हाथ में लेना चाही तभी वह गोल सी चीज़ ‘भप्प’ की एक धीमी ध्वनि से फट पड़ी.

इसी के साथ उसमें से एक हरा रंग का धुआँ निकल कर चारों ओर बड़ी तेज़ी से फैलने लगा और लाडली के कुछ समझ पाने के पहले ही बेहोश बिस्वास जी को ऐसे घेर लिया मानो उनकी रक्षा कर रही हो!

उस धुएँ को देख कर कुछ पल के लिए लाडली डर गई. पर जल्द ही खुद को सम्भालते हुए उठ खड़ी हुई और अपने चारों ओर देखने लगी. दो पल बाद ही उसे सामने से एक तेजस्वी युवक आता दिखाई दिया.

लाडली गुस्से से पूछी,

“कौन हो तुम?”

“एक महान गुरु का शिष्य और इस समय इनका (बिस्वास जी की ओर ऊँगली से संकेत करते हुए) रक्षक... नाम, हरि.”

“क्यों आए हो यहाँ?”

“अभी अभी तो कहा, इनकी रक्षा करने हेतु.”

“भाग जा.... नहीं तो बेमौत मारा जाएगा.”

लाडली की आँखें गुस्से से लाल हो चुकी थीं. लग रहा था मानो अभी ही हरि को चीर फाड़ देगी.

हरि हँस पड़ा,

बोला,

“नहीं... भागने के लिए नहीं आया हूँ. पर तुझ महा पापिन को एक अवसर अवश्य दूँगा... भाग जाने के लिए.”

यह सुनकर तो लाडली के क्रोध का कोई पार ही नहीं रहा.

पूर्णतः लाल हो आई आँखों से हरि को कुछ क्षण देखती रही.

हरि राह का रोड़ा था, ये तो स्पष्ट था!

और उसके दिलेरी से लाडली को ये स्पष्ट हो गया था कि उसके रहते बिस्वास जी को मारना तो क्या; एक मामूली खरोंच तक दे पाना संभव नहीं है.

इतनी ही देर में हरि ने भी लाडली के भाव भंगिमाओं का अवलोकन – विश्लेषण कर लिया था. कम से कम इतना तो समझ ही गया था कि यह कोई साधारण युवती नहीं है.

"चला जा! जा यहाँ से" लाडली ने फिर हुंकार भरी.

“नहीं.” हरि ने कहा.

"नहीं समझा मेरी बात?"

"समझ गया, तभी तो बोला, नहीं जाऊँगा."

" बहुत सुन ली मैंने, व्यर्थ के तर्क न कर और इस आदमी को मेरे लिए छोड़ कर चला जा." वो बोली

"और मैंने भी तेरा बहुत सम्मान करते हुए चेतावनी दे चुका.” हरि ने पलट कर जवाब दिया.

"प्राण से जाएगा" वो बोली.

"देखा जाएगा."

"देख युवक, मान जा मेरी बात, ये आदमी तुझसे सम्बंधित नहीं है."

"इसका कोई अहित न हो; मेरे गुरु का ऐसा आदेश है और उनका आदेश ही मेरे लिए सर्वोपरि है."

“यानि गुरु के लिए मरना स्वीकार है तुझे?”

“हाँ.”

हरि को टस से मस न होते देख लाडली ने उसपर एक के बाद एक कई ख़तरनाक तंत्र वाले हमला किया. हरि ने जल्दी से पहले अपने गुरुमंत्र से स्वयं को और बिस्वास जी को पोषित किया और प्राण रक्षा मन्त्र से दोनों की ही प्राणों की रक्षा करते हुए लाडली के सभी हमलों का मुँह तोड़ जवाब दिया. कोई और समय होता या हरि यदि अकेला होता तो लाडली से और भी अच्छे से लड़ता पर इस समय उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण था बिस्वास जी की रक्षा करना.

अतः हरि ने और विलम्ब न करते हुए व्योम-विनाशिनी का आह्वान किया.

आह्वान मंत्र सुनते ही लाडली का चेहरा तो जैसे एकदम सफ़ेद हो गया और क्षण भर में ही वहाँ से लोप हो गई!

हरि ने जल्दी से बिस्वास जी को सहारा दे कर उठाया और वैसे ही कुछ दूर तक ले गया. फिर एक रिक्शा पकड़ कर बिस्वास जी को उनके घर तक छोड़ आया.

कुटिया में पहुँच कर थोड़ी देर के विश्राम के पश्चात बाबा जी के सामने उपस्थित हो कर सब बातें कह सुनाया.

सब कुछ धैर्यपूर्वक सुनने के बाद बाबा गंभीर रूप से ही मुस्कराते हुए कहा,

“जो और जितना सोचा था पूरा मामला उससे भी कहीं अधिक खतरनाक है. अच्छा हुआ जो तुमने काफ़ी बुद्धिमानी से उसके हरेक प्रहार का उत्तर दिया और सबसे बढ़िया ये हुआ कि वह तुम्हारे व्योम – विनाशिनी के आह्वान मात्र से ही भाग गई.”

“यही तो आश्चर्य की बात है गुरूदेव... अगर वो कोई साधिका या तांत्रिका थी तो और मुकाबला क्यों नहीं की?”

बाबा जी प्रश्न सुनकर हँस पड़े.

बोले,

“वो कोई साधिका – तांत्रिका नहीं थी और सबसे बड़ी बात तो यह कि वो तो मनुष्य तक नहीं थी!”

“क्या?!!”

दोनों ही शिष्य बहुत बुरी तरह चौंक उठे. अपने कानों पर उन्हें ज़रा भी विश्वास नहीं हुआ.

बाबा बोले,

“कल किसी को भेज कर बिस्वास को बुलवा भेजना. कल उसी के सामने कई और रहस्योद्घाटन करूँगा.... और अब की बार सब कुछ ठीक कर दूँगा.”

“जी गुरु जी.”

दोनों शिष्य हामी भर कर बेसब्री से आने वाले कल की प्रतीक्षा करने लगे.

प्रतीक्षा तो अब बाबा जी को भी थी.
 
१२

“सब सच सच बताओ बिस्वास...”

“म..मम.. मैं...क्या बताऊँ गुरूदेव?”

“वही जो मैं जानना चाहता हूँ.

बिस्वास चुप.. कोई आवाज़ नहीं.. कोई शब्द नहीं. नज़रें झुका कर इधर उधर देखने लगते हैं.

परन्तु बाबा जी के चेहरे के भावों पर कोई अंतर नहीं दिखा.

अपनी तीक्ष्ण दृष्टि से वो बिस्वास के चेहरे रुपी दुर्ग पर कड़ा प्रहार कर रहे थे. उनका तेज़ सह पाना उच्च स्तरीय ज्ञानी और सिद्ध पुरुष के लिए भी सरल नहीं था तो बिस्वास तो मात्र एक साधारण मनुष्य है.

थूक निगलते हुए उन्होंने अपने गुरूजी की ओर देखा.

समझने में अब कोई परेशानी नहीं रही कि गुरूजी बिना सत्य जाने नहीं मानने वाले. गुरूजी एक बहुत ही उच्च स्तर के सिद्ध पुरुष हैं ये तो बिस्वास जी जानते ही थें परन्तु वो भूतकाल का भी आंकलन कर सकते हैं ये कभी नहीं सोचा था.

फिर भी बात को टालने के लिए एक और प्रयास ... अंतिम प्रयास करने का सोचा उन्होंने.

नासमझ व भोला बनने का प्रयत्न करते हुए एक बार फिर बाबा के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा,

“गुरूदेव... मैं कुछ भी समझ नहीं पा रहा हूँ. किस सत्य को बताने को कह रहे हैं आप? कब की बात है? कौन सी बात है? म.. मैं....”

बिस्वास जी और कुछ कहे उसके पहले ही बाबा ने हाथ उठा कर उसे चुप हो जाने का संकेत किया.

विचार और कथन में पूरी स्थिरता और चेहरे पर गम्भीरता लिए बाबा ने कहा,

“देखो बिस्वास... मैं और तुम... दोनों ही जानते हैं कि जो सत्य अब तक सबसे छुपा हुआ है उसे अब सामने आना चाहिए और मुझसे कोई भी सत्य छिप नहीं सकता. जानते हो न इस बात को?”

बिस्वास जी आँखें नीची करते हुए सहमति में सिर हिलाया.

बाबा बोले,

“तो जब तुम जानते ही हो इस बात को तो फिर क्यों कुछ छुपाने का प्रयास कर रहे हो? जो भी सत्य है; चाहे वो कितना भी कड़वा क्यों न हो... आखिर सत्य ही है. देर सवेर हमें सत्य को अपनाना ही पड़ता है. सत्य की यही एक सबसे बड़ी गुण होती है कि वो सदैव स्वयं को सामने प्रकट करने के लिए तत्पर रहता है. जैसे कितना भी घनघोर वर्षा क्यों न हो... कितनी भी काली घटा क्यों न छाई रहे.. सूर्य निकलता ही निकलता है... ठीक वैसे ही, सत्य चाहे कैसा भी क्यों न हो; सत्य आखिर में सत्य ही होता है.”

अपनी बात को कहते कहते बाबा बिस्वास जी के हाव भाव पर गौर कर रहे थे.

बाबा द्वारा कही गई बातों से बिस्वास के मन में जमी कोई बर्फ पिघल रही है... उसे कुछ अपराधबोध हो रहा है... ये बात बाबा के अनुभवी आँखों ने तुरंत ही ताड़ लिया.

“कहो बिस्वास. डरो नहीं... यदि उस सत्य में तुम्हारी किसी तरह की भूमिका हो भी तो यदि तुम स्वीकार कर लो तो तुम पर से बोझ उतर जाएगा. यदि कोई अपराधबोध हो...तो वो भी पल भर में समाप्त हो जाएगा.”

बिस्वास जी के मन में अब तक जो संदेह था... वो अब विश्वास में बदल गया. वो भली भांति समझ गए कि बाबा जी यूँ ही उनसे पूछ रहे हैं; सत्य क्या है ये उनको पहले ही ज्ञात हो गया है.

कुछ देर की चुप्पी के बाद बिस्वास जी अचानक बाबा के पैरों पर गिर पड़े.

रोने लगे...

क्षमा याचना करने लगे.

“गुरूदेव... मुझे क्षमा कीजिए गुरूदेव... मेरी रक्षा कीजिए...!”

बिस्वास जी की अचानक ऐसी अप्रत्याशित प्रतिक्रिया देख कर कुछ क्षणों के लिए तो बाबा भी चकित से हो गए.

उन्होंने गौर किया..

बिस्वास जी वाकई रो रहे थे...

बिलख रहे थे.

बिलख बिलख कर क्षमा याचना कर रहे थे और स्वयं की रक्षार्थ हेतु प्रार्थना – निवेदन भी कर रहे थे.

बाबा तो पहले से जान रहे थे कि सत्य क्या है... अतः उन्हें बिस्वास जी के ऐसे व्यवहार पर अधिक आश्चर्य न हुआ. अपितु प्रसन्न ही हुए कि वो सत्य को कहने का साहस करते हुए गुरु चरणों में क्षमा की भी याचना कर रहे हैं.

मुस्कराते हुए अपने पैरों पर रखे बिस्वास जी के सिर पर हाथ रखते हुए बाबा इतना ही बोले,

“शांत वत्स... शांत.”

बाबा के हाथ का स्पर्श अपने सिर पर पा कर बिस्वास जी फूले न समाए और अत्यधिक उद्गार से उनकी और भी अधिक रुलाई फूट पड़ी.

बाबा के स्नेह वचन और आशीर्वाद स्वरूप हाथ को सिर पर पा कर बिस्वास जी न केवल प्रसन्न हुए अपितु उनके अंदर एक नए साहस और विश्वास का संचार भी होने लगा.

बाबा के पैरों पर से सिर तो उठा लिया अपना पर अभी भी बाबा से नज़रें मिलाने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे.

बाबा अभी भी गम्भीर रूप में ही थे.. फिर भी होंठों पर एक हल्की मुस्कान थी..

चांदू की ओर देखा...

और आँखों के संकेत से बिस्वास जी को पानी पिलाने के लिए कहा.

चांदू ने शीघ्र ही एक बड़े से तांबे के ग्लास में शीतल जल भर कर बिस्वास जी को दिया.

बिस्वास जी ने ग्लास तो ले लिया पर पीना तभी शुरू किए जब बाबा ने उन्हें दोबारा आदेश दिया.

पानी पी कर कुछ देर में रोने के कारण अपनी उखड़ती सांसों पर नियंत्रण पा कर बिस्वास जी शांत हुए पर अब भी कुछ बोले नहीं.

थोड़ी देर तक प्रतीक्षा करने के बाद जब बाबा ने देखा कि बिस्वास जी के कंठ से बोल नहीं फूटे तब उन्होंने ही एक धमाका करने का सोचा और एक हल्की सी मुस्कान लिए, परन्तु पूरी गम्भीरता से; पैरों के पास नीचे बैठे बिस्वास जी की ओर तनिक झुकते हुए कहा,

“वत्स, उस दिन तुम भी उन लोगों के साथ थे न?”

कहीं खोए हुए बिस्वास जी ने अनमने भाव से बाबा की ओर बिना देखे ही उत्तर दिया,

“कहाँ... कब ... किसके साथ?”

“उस दिन... जब उन दोनों युवक युवती को पूरा गाँव ढूँढ रहा था... उन लोगों में से एक तुम भी थे न?”

बाबा के इस प्रश्न ने वाकई एक धमाका किया बिस्वास जी के कानों में. पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई.

अपने स्थान पर बैठे बैठे ही लगभग उछलते हुए बाबा को शंकित नज़रों से देखा... मानो ये निश्चित करना चाहते हों कि अभी अभी उन्होंने जो सुना वो बाबा के ही श्रीमुख से निकली है.

बाबा एकटक बिस्वास जी की ओर देखते रहे... चश्मे के पीछे से झाँकती बिस्वास जी के विस्फारित नेत्रों पर टिकी थी बाबा की आँखें.

बिस्वास जी को अब भी कुछ बोलता न देख कर बाबा फिर बोले,

“उनमें से एक की मृत्यु का कारण स्वयं को मानते हो न?”

ये वाला प्रश्न पर्याप्त था बिस्वास जी को ये विश्वास दिलाने के लिए कि अब तो वो लाख चाह कर भी सच्चाई को अपने भले के लिए अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ कर पेश भी नहीं कर सकता क्योंकि निश्चित ही ये भी बाबा के हाथों पकड़ी ही जाएगी.

झूठ बोलने का अब तो कोई मतलब ही नहीं रह गया था.

बिस्वास जी ने गले में जम गए थूक को निगला और निगलते हुए ही सिर हिला कर सहमति जताया.

बाबा के हाव भाव में कोई परिवर्तन नहीं आया.

जिससे ये स्पष्ट हो गया कि वे ऐसे ही किसी उत्तर की अपेक्षा कर रहे थे.

“किसकी?”

धीर गम्भीर स्वर में उन्होंने अगला प्रश्न किया.

बड़ी कठिनाई से उत्तर निकला परन्तु बहुत ही धीमा,

“शांतनु”

“ज़ोर से बोलो, बिस्वास.”

“श...शांतनु.!”

हकलाते हुए अब भी कठिनाई से ही बोले बिस्वास जी.

“ह्म्म्म.” बाबा इतना ही बोले.

कदाचित अब दृष्टि फेरने की बारी बाबा की थी.

बिस्वास जी के मुँह से नाम सुनने के बाद बाबा तुरंत कुछ न बोलकर कमरे की खिड़की से बाहर देखने लगे. बाबा की चुप्पी ने तीनों; चांदू, हरि और बिस्वास जी को सस्पेंस में डाल दिया.

थोड़ी देर बाद बाबा बिस्वास जी की ओर देखते हुए फिर पूछे,

“बिस्वास... अब जो पूछूँगा उसका उत्तर एकदम स्पष्ट शब्दों में देना... ठीक?”

मुखमंडल पर चिंता की आभा लिए बिस्वास जी सहमति जताते हुए ‘ठीक है गुरूदेव’ कहा.

“बिस्वास.... शांतनु की मृत्यु हत्या थी या दुर्घटना?... स्मरण रहे... मैंने तुम्हें सब सच बताने के लिए कहा है.”

“ज...जी...!”

बाबा के इस प्रश्न ने तो निःसंदेह बिस्वास जी को अब भारी दबाव में ला दिया. हाथ में थामा हुआ ग्लास अब काँपने लगा. साँसें उखड़ने लगी. ललाट पर पसीने की कई बूँदें एक साथ छलक आईं.

स्वयं को संयत करने के लिए दोबारा होंठों को ग्लास से लगाया.

दो लंबे घूँट लगाए.

फिर बाबा की ओर देखा.

बाबा उत्तर की प्रतीक्षा में उन्हीं की ओर देख रहे थे.

“बाबा.. थी तो वो... दुर्घटना ही..”

“पर वास्तविकता में वो एक हत्या थी... यही न?”

बाबा ने बिस्वास जी के वाक्य को पूरा किया. जैसे ही बाबा ने इस वाक्य को कहा; वैसे ही तुरंत हरि और चांदू की आँखें अविश्वास से बड़ी बड़ी हो गई.

बिस्वास जी ने सिर हिला कर धीमे स्वर में ‘जी’ कहा.

“कौन कौन सम्मिलित थे इस पाप कार्य में ?”

“लगभग सभी.”

“क्यों मारना चाहते थे सब उसे?”

“अ..अम.... व.. वो... काला जादू.... करता था... हानि करता था गाँव वालों का.... गुरूदेव.”

इस वाक्य को बिस्वास जी ने ऐसे कहा मानो वो अपने साथ साथ पूरे गाँव वालों की रक्षा करना चाहते हों.

बाबा धीरे से हँस दिए...

बोले,

“तुम्हें कैसे पता वो काला जादू करता था?”

“ग..गाँव वालों.....”

“झूठ!”

बिस्वास जी के वाक्य को पूरा करने के पहले ही बाबा गरज उठे.. डांटते हुए उन्हें चुप कर दिया.

बाबा के क्रोध से बिस्वास जी सकपका गए.

कोई बहाना दे कर अपनी बात को सही ठहराने का साहस न किया.

“बिस्वास.. मैं बार बार कह रहा हूँ... सच बोलो. यदि तुम अपने साथ साथ समस्त गाँव वालों की रक्षा करना चाहते हो तो सत्य कहो. कल हरि ने तुम्हें बचा लिया था.. परन्तु हर बार... हमेशा तुम्हें बचाने के लिए नहीं रहने वाला. यदि पूर्ण सत्य नहीं बताओगे तो मैं भी तुम्हारी यथोचित रक्षा नहीं कर पाऊंगा और वो युवती जो कल तुम्हें लगभग मार ही चुकी थी; वो ज्यादा दिनों तक चुप नहीं बैठेगी. वो फिर हमला करेगी और कदाचित अगले हमले में वो वाकई में तुम्हें एक हौलनाक मृत्यु दे दे!”

बाबा के इस चेतावनी में भय का ऐसा पुट था कि बिस्वास जी के सिट्टी पिट्टी गुम हो गए.

हाथ जोड़ लिया...

फिर से क्षमा माँगी..

कहा,

“गुरूदेव... ग...गुरूदेव.... म..मैं....”

कहते हुए रो ही पड़े.

बाबा ने उनके सिर पर हाथ रख कर उन्हें सांत्वना दिया और चुप कराते हुए उनसे बगैर लाग लपेट के पूरी बात सच सच कह सुनाने को कहा.

“गुरूदेव... व.. वो... एक प्रकार से हत्या ही थी गुरूदेव... वह युवक बच सकता था... पर... पर... किसी ने सहायता नहीं की. उसका उस नदी तक पीछा करना... खास कर दक्षिण दिशा की ओर... वहाँ तक उसे दौड़ाते ... उसका पीछा करते हुए जाना .... सब.. कुछ... कुल मिलाकर एक प्रकार से उसकी हत्या ही है गुरूदेव.”

कहते हुए अब तो और भी बुरी तरह से बिलखने लगे थे बिस्वास जी. नदी की बात क्या करना; स्वयं उनकी आँखों से ही अश्रुओं की नदी बहने लगी. स्पष्ट था कि इस बात को... जोकि स्वयं एक प्रकार से रहस्य ही था आज तक; कहने में उन्हें बहुत कष्ट हुई है. सहज नहीं था इस रहस्य को स्वीकार कर पाना.
 
बिस्वास जी के इस प्रकार बिलखने से बाबा को बुरा तो लगा पर वो जानते हैं कि बिस्वास जी का ये पूर्ण स्वीकारोक्ति नहीं है! सत्य तो ये है कि बाबा को उनके योगबल से ही संपूर्ण सत्य का पता चल गया था परंतु वे बिस्वास जी के मुँह से सत्य जानना चाहते थे.

इसलिए धीरे से व बड़े प्यार से पूछे,

“और?”

बिस्वास जी तुरंत न बोले पर इस बार बाबा को भी अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी.

कुछ क्षण बाद बिस्वास जी स्वयं ही बोले,

“अ... व... व... उ.. उस हत्या... में मैं स्वयं भी भागीदार था.”

“वो कैसे?”

“म... मैंने...नहीं... म... .मैं चाहता था... वो... मरे..”

“क्यों?”

“क... क्योंकि.. मैं बरखा... बरखा... स...”

“हाँ... वत्स... आगे बोलो...”

“क्योंकि मैं बरखा से .... प्यार करता ... था... उस...उससे स... श.. शादी कर.. करना चाहता था.”

“और... ये बरखा कौन है वत्स?”

“अ.. बरखा है नहीं गुरूदेव... थी..”

“थी??”

“ज..जी गुरूदेव... व.. वो उस रात.. के दो दिन बाद मर गई.”

“कहाँ मरी थी वो?”

“जंगल.. जंगल में... फाँसी लगा कर.”

“ओह!”

“ज..जी गुरूदेव.”

अब धीरे धीरे पूरी विषयवस्तु बाबा के सामने स्पष्ट होती जा रही थी.

थोड़ा रुक कर बाबा फिर पूछे,

“फाँसी लगाने के लिए फंदा कहाँ से मिला होगा उसे...?”

“उसे फंदे के लिए अलग से किसी रस्सी वगैरह की क्या आवश्यकता थी गुरूदेव. व.. वो तो... स.. साड़ी को ही फंदा बना कर झूल गई.”

“ओह्ह... बहुत बुरा हुआ! ... अच्छा, तुम तो बरखा से प्रेम करते थे... है न?”

“जी.”

“उसे बताया नहीं कभी?”

“बताया था.. पर उसका कहना था कि वो पहले से ही किसी ओर से प्रेम करती है और जिससे प्रेम करती है; उसके प्रेम के सिवा अब किसी और का प्रेम नहीं चाहिए उसे.”

“तो तुमने क्या किया?”

“क..कई बार उसे मनाने का प्रयास किया.. पर सफल नहीं रहा.. वो उस शांतनु के प्रेम में पूरी तरह अंधी थी... उस.. उस आवारा के पास था ही क्या...? एक टूटी फूटी झोंपड़ी... एक बूढ़ी माँ.. वही किसी तरह अपना और अपने उस निकम्मे बेटे का पेट पाल रही थी. क्या मिलता बरखा को ऐसे लड़के से शादी करके... उल्टे उस लड़के के ही वारे न्यारे होते अगर उसकी शादी बरखा से होती.. अगर बरखा उसकी पत्नी हो जाती... क्योंकि बरखा का परिवार काफ़ी धनी जो था.”

“लेकिन जब तुम देख ही रहे थे कि वह लड़की शांतनु के अलावा किसी और के साथ शादी नहीं करना चाहती तो तुम्हें उसे छोड़ देना चाहिए था. उसके निर्णय का सम्मान करना चाहिए था.”

“व..वही तो नहीं हो पा रहा था मुझसे.. गुरूदेव.. मेरे तो जैसे मन में ही बैठ गया था कि मुझे अगर शादी करनी है तो इसी से करनी है.. नहीं तो.. नहीं तो..”

“नहीं तो क्या वत्स?”

अब तक ग्लास ज़मीन पर एक ओर रख चुके बिस्वास जी बाबा के इस प्रश्न पर उत्तर देने के स्थान पर अपना सिर दोनों हाथों से पकड़ कर बैठ गए और बहुत धीमे स्वर में कहा,

“पता नहीं.. गुरूदेव... उस समय मुझे जो सूझता... मैं तब वही करता.”

“तो क्या इसलिए शांतनु की सहायता नहीं की तुमने?”

“जी गुरूदेव. वो निकम्मा कामचोर... कोई माने या न माने गुरूदेव.. पर मैं और गाँव के और भी कई लोग ये जानते थे कि शांतनु जादू टोना सीखता – करता था... और... आखिर में बरखा से शादी कर ही ली उसने. शादी की पहली रात भी मनाने वाला था. बरखा की शादी किसी ओर से होता देख मैं सहन तो नहीं कर पाता लेकिन फिर भी खुद को मना लेता. पर... पर... शांतनु की उससे शादी की खबर सुन कर मैं तो बुरी तरह से गुस्से से पागल हो गया था. स्वयं पर इतना सा भी नियंत्रण न रख पाया. उसे मारना मेरा उद्देश्य नहीं था.. केवल प्रताड़ित करना चाहता था.. डराना चाहता था.. दंड देना चाहता था. जब देखा की वह नदी के उस दक्षिण दिशा के उस खास जगह में डूब रहा था तो यही सोच कर उसकी सहायता नहीं किया की चलो अब कम से कम बरखा को पाने का मार्ग कुछ तो सरल हुआ. पर... ”

बिस्वास जी के वाक्य को अब बाबा ने पूरा किया,

“पर कौन जानता था की नियति को कुछ और ही स्वीकार था... यही न!”

बिस्वास जी केवल सिर हिला कर सहमति जता पाए. उनकी आँखों से फिर अश्रुधारा बहने लगी.

बाबा ने कुछ कहा नहीं. बिस्वास जी को थोड़ी देर रो लेने का समय दिया ताकि उनका मन कुछ हल्का हो जाए.

बिस्वास जी जब शांत हुए तब,

“बिस्वास... बस एक अंतिम प्रश्न रह गया है पूछने को. आशा है की उसका भी तुम बिल्कुल सही उत्तर दोगे.”

“जी गुरूदेव.. अवश्य.. वैसे भी अब छुपाने को रह ही क्या गया है. आप पूछिए.”

“क्या सुरेंद्रनाथ भी इन सब में बराबर का भागीदार था?”

एक क्षण के लिए बिस्वास जी चौंक पड़े.. लेकिन तुरंत ही सामान्य हो गए.

ये प्रश्न ऐसा अवश्य था जिसकी अभी बिस्वास जी ने कल्पना नहीं की थी पर अब जब बाबा ने पूछ ही लिया है तो बिस्वास जी को भली भांति पता है कि क्या उत्तर देना है.

“जी गुरूदेव. वो इन सब में भागीदार भी था और मेरा साझीदार भी था. उसे मेरी मंशा का पूरा पूरा भान था.”

दृढ़ स्वर में उत्तर दिया उन्होंने.

उनके उत्तर देने के दौरान बाबा उनके मुखमंडल को ऐसे देख रहे थे मानो कुछ पढ़ने – ताड़ने का प्रयास कर रहे हों.

कुछ और इधर उधर के प्रश्न करने के बाद बाबा ने बिस्वास जी को विदा किया. विदा करने से पहले एक मन्त्र सिद्ध माला भी दिया ताकि कोई बुरी शक्ति उनका हानि लाख चाह कर भी न कर पाए.
 
कुछ और इधर उधर के प्रश्न करने के बाद बाबा ने बिस्वास जी को विदा किया. विदा करने से पहले एक मन्त्र सिद्ध माला भी दिया ताकि कोई बुरी शक्ति उनका हानि लाख चाह कर भी न कर पाए.

बिस्वास जी के जाने के बाद हरि बड़े असमंजस भाव से बोल उठा,

“गुरु देव.. मैं जिसे अब तक सबसे अच्छा समझ रहा था; अंततः वही बुरा निकला?!”

बाबा मुस्कराए और बोले,

“तुम्हारी स्थिति समझ सकता हूँ. तुम्हारा प्रश्न सर्वथा उचित ही है. इस संसार में अक्सर ही ऐसा होता है वत्स.. किसी को कुछ समझो तो वो कुछ और ही समझा जाता है.”

अब चांदू बोला,

“तो इसका ये मतलब हुआ क्या गुरूदेव कि ये पूरा गाँव... सभी गाँव वाले दोषी हैं?”

“नहीं वत्स.. गाँव वाले तो बरखा के घर वालों के साथ मिल कर बस उन दोनों को पकड़ना चाहते थे.. पकड़ कर उचित दंड भी देते.. लेकिन हत्या जैसा जघन्य अपराध नहीं करते.. पर ये जो कुछ भी हुआ है.. इसका दोषी तो बिस्वास, सुरेंद्रनाथ और उनके कुछ साथी हैं जो इस पूरे घटनाक्रम को अपने लाभ हेतु दुरूपयोग करते हुए इसे दूसरा ही रूप दे दिया.”

“परन्तु गुरूदेव... लोग जो इस तरह मर रहे हैं... इसका कारण?”

“वत्स, कारण या तो बिस्वास की कही गई घटना से जुड़ी हो सकती है या फ़िर इस कारण के पीछे कोई और कारण हो सकता है.”

“आप ऐसा क्यों कह रहे हैं गुरूदेव?”

चांदू ने ऐसे प्रश्न किया मानो उसे अब भी बाबा के बातों में कुछ अजीब होने की आशंका हो रही है.

“ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ऐसा ही कुछ होने का आभास हो रहा है मुझे. दक्षिण दिशा में नदी में डूब कर प्राण गँवाने वाले शांतनु का क्रोध, उसकी प्रतिशोध की भावना तो समझ में आ रही है.. पर.. जंगल में होने वाले मृत्यु के कारण मुझे फ़िलहाल समझ में नहीं आ रहा है.”

“आपका अर्थ समझ में नहीं आया गुरूदेव.. क्या नदी में जितनी भी मृत्यु हुई है.. सब शांतनु की आत्मा ने किया है?”

“हाँ वत्स, नदी के उस भाग में आज तक जितनी भी मृत्यु हुई है; उन सब के पीछे शांतनु की आत्मा का ही हाथ है. सभी मरने वाले या तो विवाहिता या फिर नवयौवनाएँ थीं. इसका यही अर्थ हो सकता है कि विवाह के तुरंत बाद वाली क्रिया पूर्ण न हो पाने के कारण ही वो औरतों और युवतियों को दक्षिण भाग के भंवर में फँसा कर पहले अपनी तुष्टि करता है; फ़िर निर्दयता के साथ मार देता है.. किन्तु... जंगल में होने वाले मृत्यु के कारण समझ में नहीं आ रहे हैं. शांतनु मरता नहीं यदि पूरे परिदृश्य की संरचना वैसी नहीं होती जैसा की बिस्वास ने कुछ देर पहले हमें बताया था. लेकिन बरखा ने तो जंगल में आत्महत्या की थी. उसके घर वाले तो उसे ले जाने गए थे.. सकुशल.. तो फिर... आत्महत्या क्यों की? क्या वो भी विवाह की पहली रात न मना पाने के कारण दुखी थी? क्या ये दुःख इतना बड़ा था कि आत्महत्या कर ली जाए?”

बाबा के इस प्रश्न का उत्तर दोनों शिष्यों में से किसी के पास भी नहीं था और स्वयं बाबा के पास भी नहीं.

सभी कुछ देर तक चुप रहते हुए कुछ न कुछ; अंदर ही अंदर सोच रहे थे कि बाबा फिर बोल पड़े,

“सच कहूँ तो शांतनु और बरखा से संबंधित प्रश्न मुझे उतना दुविधा में नहीं डाल रहे जितना की उस युवती का उद्देश्य जो उस दिन बिस्वास को प्रायः मार ही चुकी थी...”

सुनते ही हरि तपाक से बोल उठा,

“कौन? वो... अ... क्या नाम... हाँ... लाडली??”

“हाँ.. लाडली. वो वहाँ क्यों थी... वो भला बिस्वास को क्यों मारना चाहेगी.. और तो और... उसे भेजने.. उससे कार्य करवाने की क्षमता भला किस में है?”

“क्यों गुरूदेव.. आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?”

“क्योंकि वो कोई साधारण मनुष्य नहीं थी.. अरे साधारण तो क्या.. वो तो कोई मनुष्य ही नहीं थी. ये बात तो मैं पहले भी बता चुका हूँ तुम लोगों को.”

“जी गुरूदेव. परन्तु कृपया ये बताइए कि आप उस लाडली को लेकर बारम्बार चिंतित क्यों हुए जा रहे हैं? क्या वो ही बरखा नहीं थी? क्या आप उसे जानते हैं?”

“नहीं. वो बरखा नहीं थी. हरि के माध्यम से हरि के साथ साथ मैंने भी उसके शरीर की ऊर्जा अनुभव किया है.. और अनुभव करते ही मैं जान गया था कि वो कौन है. इसलिए मैं चिंतित हूँ कि उससे अपना कार्यसिद्ध करवाने की क्षमता रखने वाला कौन है.. कौन है वो जिसने इस लाडली को भेजा था क्योंकि जिसने भी लाडली को भेजा था वह निःसंदेह काफ़ी क्षमतावान सिद्धहस्त है... क्योंकि ये लाडली तो स्वयं अपने आप में बहुत.. बहुत ही शक्तिशाली चीज़ है.”

हरि और चांदू ने एक दूसरे को देखा.. फिर एक साथ ही पूछा,

“व.. वो.. कौन थी, गुरूदेव?”

बाबा का चेहरा बहुत ही गम्भीर हो गया.

शरीर एक ऐसे भाव में आ गया मानो तुरंत ही किसी अदृश्य सुरक्षा कवच से स्वयं के साथ साथ अपने शिष्यों को भी घेर लिया हो.

चेहरे के भाव उनके हृदय की अवस्था की स्पष्ट चुगली करने लगे की बाबा चिंतित तो हैं लेकिन दृढ़ संकल्पित भी हैं.

बाबा को चुप देख हरि और चांदू ने फिर एक दूसरे को देखा.

फिर बाबा को देखा.

अपने स्थान से थोड़ा आगे बढ़ कर बाबा के थोड़ा निकट आए दोनों.

और दोबारा अपना प्रश्न किया,

“वो कौन थी गुरूदेव?”

प्रश्न के समाप्त होते ही बाबा बोल पड़े; एकदम सर्द... भाव रहित अंदाज़ में,

“चामुंडी !!”
 

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