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Horror चामुंडी

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सुचित्रा अचानक से हड़बड़ा कर उठी,

और इसी के साथ वर्तमान स्थिति को देख कर हतप्रभ रह गई...

सीने पर आँचल अनुपस्थित है.. ब्लाउज के सारे बटन खुले हुए हैं... ब्रा भी गैर हाजिर... पेटीकोट कमर तक उठा हुआ और खुद उसका हाथ... बायीं हाथ की मध्यमा और अनामिका ऊँगली उसकी योनि में अंदर तक प्रविष्ट हैं जो खुद भी गीली है!

सुचित्रा अविश्वास से अपने आस पास देखी...

बगल में ही उसके पति श्री रंजन चटर्जी, अर्थात् “रंजन बाबू” बड़े आश्चर्य से आँखें फाड़े उसे देख रहे थे...

बोले,

“सुचित्रा.. ये क्या कर रही हो... सुबह सुबह ही... छी: ... कोई और समय होता तो और बात होती... क्या हुआ है तुम्हें..?”

सहवास को लेकर रंजन बाबू आज भी उतने ही अपरिचित हैं जितना की सत्रह साल पहले अपने शादी के समय थे.. सफलता बस इतनी ही रही की किसी तरह अपने खड़े अंग को किसी तरह सुचित्रा के ताज़ी योनि में डाल पाए और समय समय पर थोड़ा बहुत कर के एक संतानोपत्ति कर पाए.

ऐसा नहीं की सहवास के मामले में एकदम भोंदू हैं रंजन बाबू... फ़िर भी सहवास किसी रॉकेट साइंस की ही तरह रहा है हमेशा से उनके लिए.

“ज..जी... वो....म”

“चलो चलो... जल्दी उठो... मुझे देर हो रही है.. आठ बजने को आया है.”

“आप नहा लिए?”

“हाँ.”

“ओह.. ठीक है. नाश्ता टेबल पर है. खा लीजिए.” खुद को सम्भालते हुए बोली सुचित्रा.

रंजन बाबू कुछ बोले नहीं.. आश्चर्य से देखते रहे सुचित्रा को.

सुचित्रा को अजीब लगा.. बोली,

“क्या हुआ... क्या देख रहे हैं?”

“देख रहा हूँ की ये तुम क्या अनाप शनाप बक रही हो... तुम सुबह से एक बार भी उठी ही कब थी? मैंने तुम्हें उठाया... अभी... जब उठी ही नहीं तब नाश्ता कैसे बना ली?”

“ओह्हो... मैं बना चुकी हूँ... टेबल पर है... चलिए .. दिखाती हूँ.”

सुचित्रा रंजनको लेकर नीचे वाले कमरे में आई...

“देखिए... टेबल प...”

डाइनिंग टेबल की ओर इशारा करते करते सुचित्रा के हाथ और होंठ थम गए.

टेबल पर कुछ नहीं था!

सुचित्रा आश्चर्य से दोहरी हो गई.

उसे अपने सामने खाली टेबल को देख कर खुद पे विश्वास नहीं हो रहा था.

कहाँ गया सारा नाश्ता...??

कुछ देर पहले ही तो रखी थी....

रंजन बाबू कुछ बोले नहीं.. काम के प्रेशर का नतीजा बता कर उसे स्कूल से छुट्टी लेकर आज घर पर ही रहने को कहा.

रंजन को बिना कुछ खाए ही ऑफिस के लिए निकल जाते देख सुचित्रा को बहुत दुःख हुआ.

पर दुखी होने से भी ज़्यादा अपने साथ सुबह से हो रही घटनाओं को लेकर परेशान हो रही थी.

बिस्तर पर लेटी हुई पूरे घटनाक्रम के बारे में सोच ही रही थी कि मुख्य दरवाज़े पर दस्तक हुई.

साथ ही एक आवाज़ भी आई,

“मैडम जी, दूध ले लीजिए...”

इच्छा तो नहीं थी उठने की... फ़िर भी उठी....

रसोई में गई, बर्तन ली और जा कर दरवाज़ा खोल कर बर्तन आगे बढ़ा दी.

“नमस्ते मैडम जी.”

“हम्म.. नमस्ते.”

अनमने भाव से सुचित्रा प्रत्युत्तर देते हुए गोपाल की ओर देखी.. और एक बार फ़िर बुरी तरह चौंक उठी,

“अरे...ये क्या.... ये तो बिल्कुल सुबह जैसे.... उफ़..!!”

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एक दिन बिपिन काका के घर के सामने बहुत भीड़ लग गई. ऐसी भीड़ की लगे मानो सारा गाँव उठ कर बिपिन काका के घर आ गया हो. जवान हो, या बच्चा या बूढ़ा या फ़िर महिलाएँ... सबके मुँह में केवल यही बातें हो रही हैं कि ‘हाय राम.. ये कैसे हो गया?’, ‘न जाने बूढ़े माँ बाप का क्या होगा?’, ‘अभी तो जवान हो ही रहा था.. इतनी जल्दी... न जाने कैसे हो गया....?’ इत्यादि.

तभी ‘जगह दीजिए...’ ‘आगे जाने दीजिए.’ ‘हटिए हटिए’ ‘साइड होइए’ कहते हुए सात पुलिसियों वाला एक दल उस ठसाठस भीड़ में से खुद के लिए जगह बनाते हुए काका के घर के मुख्य दरवाज़े तक पहुंची.

दल को लीड करने वाला एक मोटा तोंदू सा पुलिस वाला आगे बढ़ा और घर के ही एक सदस्य से पूछा,

“घटना कहाँ घटी है...? बिपिन काका कौन हैं?”

उस सदस्य के मुँह से बोली नहीं फूट रही थी. चेहरे पर ऐसी हवाईयाँ उड़ रही थी मानो कुछ ऐसा देखा है उसने जो इस जीवन में कभी देखने या सुनने की उम्मीद बिल्कुल नहीं की होगी.. कभी नहीं की होगी.

काँपते हाथ से घर के एक तरफ़ इशारा किया उसने.

उस पुलिस वाले ने आँखों से इशारा कर के उसे आगे चलने को कहा. वो जाना बिल्कुल नहीं चाह रहा था पर पुलिस वाले की रोब झलकाती आँखों को देख कर और भी डर गया. मान गया.

चुपचाप आगे आगे चलने लगा.

चार सिपाहियों को वहाँ भीड़ संभालने की जिम्मेदारी दे कर वह तोंदू पुलिस वाला अपने साथ दो पुलिस वाले को लेकर उस सदस्य के पीछे पीछे चलने लगा.

कच्चे मार्ग से आगे बढ़ कर दाएँ मुड़ना पड़ा और फ़िर दस कदम चलने के बाद एक छोटा सा खटाल/गोशाला में पहुंचे सब. यहाँ तीन गाय और दो भैंसे बंधी हैं.. साफ़ सुथरा ही है सब.

“ये किसका है?” उस मोटे पुलिसिये ने पूछा.

“बिपिन जी का ही है.” उस सदस्य ने कहा.

“आप कौन लगते हैं उनके??”

“जी, मैं उनका भांजा हूँ. चार दिनों के लिए घूमने आया था.”

“ह्म्म्म... तो आज कितने दिन हुए?”

“जी दो ही दिन हुए.”

“बिपिन जी कहाँ हैं?”

“सुबह जब से वह भयावह काण्ड देखा है... मानो सुध बुध ही खो चुके हैं. वहीं उसी जगह बैठे हुए हैं.”

“ले चलिए हमें वहाँ.”

आदेश दिया पुलिसिए ने.

तुरन्त पालन हुआ आदेश का.

उन सब को ले कर थोड़ा और आगे बढ़ा वो युवक. खटाल से सटा हुआ एक छोटे से कमरे के पास पहुँचा.

उस कमरे के पास पहुँचने पर सबने देखा की आस पास फर्श पर खून ही खून है जो कि अंदर कमरे से बह कर बाहर निकल रही है. सभी तुरन्त अंदर घुसे... और घुस कर अंदर का जो दृश्य देखा उससे तो सबका दिमाग ही घूम गया. दिल दहल गया. उल्टी होने को आई. सामने जो दृश्य था ऐसा कभी कुछ उन लोगों को जीवन में कभी देखना भी होगा ये अपने सबसे बुरे सपने में भी नहीं सोचा था किसी ने.

सामने फर्श पर पाँच कदम आगे एक नवयुवक का शव पड़ा हुआ था. शरीर तो सामने की ओर था पर सिर पूरी तरह पीछे घूमा हुआ था. साथ ही पूरे शरीर में जगह जगह से माँस नोचा हुआ था. सबसे भयावह था उस शरीर का सीने वाला हिस्सा जहाँ बहुत बड़ा सा गड्ढा बना हुआ था...

वो मोटा पुलिस वाला आगे बढ़ कर शव को तनिक ध्यान से देखने पर पाया कि सीने से तो दिल ही गायब है!

“हे भगवान! इतनी क्रूरता!”

बरबस ही निकला उसके मुँह से.

बगल में ही, शव से चार हाथ दूर फर्श पर ही एक प्रौढ़ आदमी बैठा हुआ था. अत्यंत उदास... बदहवास... आँखों से अविरल आँसू बहाता हुआ.

उस आदमी की हालत देख कर मोटा पुलिसिया को भी थोड़ा बुरा लगा पर क्या करे... पुलिस जो ठहरा... ये समय संवेदना जताने से अधिक ड्यूटी बजाने का है.

गला खंखार कर उस आदमी से पूछा,

“सुनिए...आप ही बिपिन काका हैं क्या?”

वह आदमी कुछ बोला नहीं.. अभी भी कहीं खोया हुआ अपलक उस शव को निहारे जा रहा था. उसे तो शायद इस बात का भी भान न हुआ होगा कि कोई उस कमरे में घुस कर उनके सामने खड़ा भी हुआ है.

पुलिस वाला साथ आए युवक को इशारे से पास बुलाया और धीमे स्वर में पूछा,

“बिपिन काका यही हैं न?”

युवक पूरे आत्मविश्वास के साथ सिर हिलाता हुआ बोला,

“हाँ साहब.”

“ह्म्म्म... और ये मृत युवक कौन है? क्या लगता है इनका?”

“ये इस घर में काम करता था. नौकर जैसा ही था पर चूँकि बहुत ही कम उम्र से ही इस घर में रहता आ रहा था इसलिए घर के सदस्य जैसा ही हो गया था. यहाँ तक कि बिपिन काका और रेणुका काकी ने भी सभी को कह दिया था कि कोई इसे नौकर न समझे और हमेशा अच्छे से नाम ले कर ही बुलाया करे.”

“नाम क्या है इसका?”

“नाम तो कुछ और था... पर रेणुका काकी प्यार से जतिंद्र कह कर बुलाती थी... धीरे धीरे घर में सभी और गाँव वाले भी इसे जतिंद्र नाम से ही बुलाने लगे थे.”

उस युवक का वाक्य खत्म होते ही तपाक से पुलिस वाले ने पूछा,

“ये रेणुका काकी कौन हैं?”

“इनकी (बिपिन काका की ओर इशारा करते हुए) पत्नी है साहब.”

“हम्म.. और तुम्हारा नाम?”

“पंचमन दास, साहब... घर और बाहर सब प्यार से बसु कह कर बुलाते हैं.”

“बसु... हम्म.. अच्छा नाम है.. मैं भी इसी नाम से बुलाऊँगा तुझे.. कोई दिक्कत?”
 
खैनी और गुटखा से पीले पड़ चुके दांतों को एक बड़ी सी मुस्कान से दिखाते हुए चापलूसी वाले अंदाज़ में हाथ जोड़ते हुए बसु बोला,

“आप माई बाप हो सरकार... जो जी में आए...कह सकते हैं.”

पुलिस वाला पैनी नज़रों से एकबार उस युवक की आँखों में अच्छे से देखा; फ़िर बिपिन काका की ओर इशारा करते हुए धीमे पर गंभीर आवाज़ में बोला,

“इन्हें पानी दो... सम्भालो.”

युवक जल्दी से एक बड़े से ग्लास में पानी ले आया और हथेली में थोड़ा पानी ले बिपिन काका के चेहरे पर छींट दिया.

वास्तविकता में लौटने में एक-दो मिनट और लग गए बिपिन काका को.

सामने पुलिस वाला को अचानक से देख सहम गए. प्रश्नसूचक नेत्रों से बसु की ओर देखा. बसु ने शव की ओर इशारा कर के पुलिस के आने का आशय समझा दिया काका को.

बिपिन काका उठे और हाथ जोड़ कर पुलिस वाले के सामने जा कर खड़े हो गए.

“बिपिन काका आप ही हैं न?” उत्तर जानते हुए भी पुलिस वाले ने पूछा.

काका ने सिर हिलाते हुए जवाब दिया,

“जी मालिक.”

“आपका पूरा नाम...बढ़िया नाम?”

“तपन दिलीप सेन, मालिक.”

“हम्म.. पिताजी का नाम दिलीप सेन?”

“जी मालिक.”

“हैं?”

“नहीं मालिक... चार साल हो गए उनके गुज़रे हुए.”

“ओह.. सॉरी.”

एक पल चुप रह कर पुलिसिए ने फ़िर कहा,

“मेरा नाम जोयदीप भटाचार्य है. इंस्पेक्टर जोयदीप भटाचार्य. थाना इंचार्ज.”

प्रत्युत्तर में बिपिन काका ने केवल हाथ जोड़ कर अभिवादन जताया.

“ये युवक आपका कौन था?”

“बेटा था मालिक.” कहते हुए बिपिन काका फफक पड़े.

“जी?!”

इंस्पेक्टर चौंक कर उछल पड़े.

“मतलब मालिक... कम उम्र से ही मेरे यहाँ काम कर रहा है न मालिक... इसलिए घर का सदस्य और मेरे बेटे जैसा हो गया था. बहुत अच्छा लड़का था... कर्मठ, आज्ञाकारी, विनोदी....”

और भी बहुत कुछ कहना चाह रहे थे बिपिन काका... पर गला भर आया था उनका... फ़िर से रोने लगे.

इंस्पेक्टर भटाचार्य से भी बिपिन काका की हालत देखी नहीं जा रही थी. उन्होंने बगल में खड़े हवलदार को बुलाया.. आगे की पूछताछ और कुछेक कार्यवाही का निर्देश दिया और वहाँ से निकल गए.

जा कर भीड़ हटाते हुए अपनी जीप में बैठ गए.

सीट पर ही रखा पानी का बोतल उठा कर पीने लगे.

पानी पीते पीते ही उनकी नज़र गई बिपिन काका के घर के दूसरी मंजिल की खिड़की पर.
 
खिड़की से लगे पर्दे के ओट से एक महिला नीचे भीड़ को देख रही थी. महिला गुमसुम सी थी... बहुत उदास... इंस्पेक्टर समझ गए की हो न हो यही रेणुका जी हैं... बिपिन काका की धर्मपत्नी.

इंस्पेक्टर भटाचार्य को कुछ अलग लगा रेणुका में. उसके चेहरे में, चेहरे के कसावट में, बालों में....

इंस्पेक्टर ने गौर किया... रेणुका जी की नज़रें उस भीड़ पर एकदम स्थिर है... लगातार एक ही ओर देखे जा रही है... कदाचित उस भीड़ में से किसी एक ही व्यक्ति को देख रही है... इंस्पेक्टर ने उस ओर देखने का प्रयास किया. भीड़ में सबकुछ स्पष्ट तो नहीं था पर इतना ज़रूर दिख गया की रेणुका जी जिसे लगातार अपलक देखे जा रही है वो एक महिला है.

इंस्पेक्टर के दिमाग ने शक उपजाऊ प्रश्न करना शुरू कर दिया,

‘रेणुका जी उस महिला को ऐसे क्यों देख रही हैं? क्या रेणुका जी कुछ जानती हैं इस हत्या के बारे में? जिसे वो देख रही हैं क्या उस महिला का इस हत्या से कोई सम्बन्ध है?’

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थाने में :

टेबल पर गरमागर्म चाय रखा हुआ है पर इंस्पेक्टर भटाचार्य दोनों हाथों को सिर के पीछे रख आँखें बंद किए किसी गहन सोच में डूबा हुआ है. तभी हवलदार वहाँ आया और सलाम कर के खड़ा हो गया.

इंस्पेक्टर भटाचार्य ने आँख खोला, सामने हवलदार को देख कर मुस्कराया और कुर्सी पर ठीक से बैठते हुए पूछा,

“और... क्या ख़बर लाए हो?”

“ख़बर तो है सर, पर बहुत अटपटी सी.”

“क्या अटपटी है.. ज़रा हम भी तो सुने.”

“सर, आपके आ जाने के बाद मैंने और दूसरे सिपाहियों ने घटना से संबंधित पूछताछ की ग्रामीणों से... अधिकतर तो कुछ बता पाने की स्थिति में नहीं थे... पर कुछेक ऐसे भी मिले जिनसे जो कुछ जानने को मिला.. उस पे विश्वास कर पाना थोड़ा मुश्किल हो रहा है.”

“हुंम.”

“सर, एक ग्रामीण का कहना था कि वैसे तो जतिंद्र अर्थात् मृत युवक का गाँव के सभी लोगों के साथ उठाना बैठना था और काफ़ी व्यवहार कुशल भी था... पर सप्ताह – दस दिन से बहुत गुमसुम चुपचाप सा रहने लगा था. पहले किसी को देखते ही बोल पड़ता था पर कुछ दिनों से ऐसा हो गया था कि कुछ पूछने पर ही जवाब देता था... कड़े मेहनत से कड़ा हुआ उसका शरीर पिछले दिनों से काफ़ी सूख सा गया था. चेहरा निस्तेज हो गया था.”

“ओह.. ये बात थोड़ा अलग तो है... पर अजीब तो नहीं.”

“एक अजीब बात बिपिन काका ने बताया सर.”

“बिपिन काका ने? कैसे है वो अभी...??”

“आपके जाने के पन्द्रह बीस मिनट बाद तक रोते रहे वो... धीरे धीरे शांत हुए... शांत होने के बाद ही उन्होंने बताया की पिछले कुछ समय से जतिंद्र प्रायः अपने आप से ही बातें करता रहता और पहले की तुलना में थोड़ा आलसी भी हो गया था. लगातार तीन रात उन्होंने जतिंद्र को मध्यरात्रि में आँगन में चहलकदमी करता और बात करता हुआ देखा था... देख कर लग रहा था कि अपने आप से बातें नहीं कर वो मानो किसी और के साथ बातें कर रहा था. हँस रहा था.. मुस्करा रहा था.”

“हुमम्म... ये बातें तो कुछ और ही इशारा कर रही हैं... मैं तो सोच रहा था की कोई षड्यंत्रकारी होगा... हत्यारा होगा... हत्या का कोई मोटिव होगा... पर यहाँ तो... कुछ और ही खिचड़ी पक रही है.”

“जी सर.”

“अच्छा श्याम... वो लड़का.. क्या नाम...”

“जतिंद्र.”

“हाँ.. जतिंद्र!.. वो दिमागी तौर पर कैसा था?”

“ठीक था सर. कोई बीमारी नहीं.”

“और बिपिन काका ने कुछ देखा था क्या... उस रात... जब जतिंद्र आँगन में किसी से बातें कर रहा था..? कोई था वहाँ?”

“नहीं सर ... कोई नहीं था.. जतिंद्र अकेला था... मैंने बहुत अच्छे से पूछा है बिपिन काका से.”

“तुम तो उसी गाँव से हो न?”

“यस सर.”

“तब तो बिपिन काका को बहुत पहले से और शायद अच्छे से जानते होगे?”

“यस सर.”

“उनके बारे में तुम्हारे क्या विचार हैं?”

“अच्छे इंसान हैं... गाय और भैंस पालते हैं. उन्हीं के दूध बेच कर उनका गुज़ारा चलता है. पुश्तैनी धंधा है. बाप दादा परदादा.. सब यही व्यापार करते आए हैं. दूध बेचने में कभी कोई घपला घोटाला नहीं हुआ है उनकी तरफ़ से. बाप दिलीप सेन भी बहुत अच्छे थे. इतना दूध बेचते आए हैं कि दूध बेच कर जमा किए पैसो से एक बहुत अच्छा दो मंजिला घर बना लिया बिपिन काका ने.”

“ओह... ओके.”

इंस्पेक्टर थोड़ा चिंतित स्वर में बोला.

ऐसी भयावह हत्या का दृश्य बार बार उनके आँखों के सामने तैर रहा था.

हवलदार इंस्पेक्टर को चिंतित देख कर बोला,

“क्या बात है सर... परेशान लग रहे हैं?”

“हाँ... एक बात समझ में नहीं आ रही... वहाँ से आने से पहले मैंने दूसरी मंजिल की खिड़की पे एक महिला को देखा था.. रेणुका जी ही होंगी... वो वहाँ चुपचाप खड़ी नीचे घर के सामने जमा भीड़ की ओर देख रही थी. पता नहीं मुझे बार बार उनका चेहरा, रंगत आदि सब अलग सा क्यों लग रहा था?”

हवलदार दो पल चुप रहा... फ़िर बोला,

“सर, अलग लग सकती है... क्योंकि उनकी आयु बहुत कम है. करीब १२ साल छोटी हैं बिपिन काका से. दरअसल काका शादी करने के खिलाफ़ थे.. आजीवन अकेले रहना चाहते थे और अपने वृद्ध हो चले माँ बाप की सेवा करना चाहते थे.. सब ठीकठाक चल रहा था. एक दिन अचानक उनकी माँ को दिल का दौरा पड़ा और गुज़र गईं. तब उनके पिताजी ने ही ज़िद कर के उनकी शादी करवाई कि माँ तो बहु नहीं देख पाई.. कम से कम वो मतलब पिताजी ही देख ले. साथ ही, वृद्धावस्था में कोई साथी हो होगा पास में. बिपिन काका की जो उम्र हो रही थी उस वक़्त उतनी उम्र की दुल्हन मिलना बड़ा दुष्कर कार्य था. तब बहुत खोजने पर एक गरीब परिवार की लड़की मिली. रेणुका. उसी के साथ काका की शादी हो गई.”

“ओह.. ये बात है. बच्चे हैं इनके?”

“पता नहीं सर. मैंने उतना खोज ख़बर लिया नहीं. पर जहाँ तक लगता है.... शायद नहीं है.”

“ह्म्म्म.. अच्छा ठीक है.. तुम जाओ अभी.”

“जी सर.”

सलाम ठोक कर श्यामाप्रसाद वहाँ से चला गया और इधर इंस्पेक्टर भटाचार्य फ़िर किसी सोच में डूब गया.
 
संध्या समय...छ: बज रहे होंगे.

सुचित्रा और रंजन गाँव में ही एक परिचित के यहाँ से लौट रहे थे...

एक चाय दुकान में कालू, गोपाल और अजोय चाय पीते हुए आपस में हंसी मजाक कर रहे थे. तभी सुचित्रा और रंजन उस दुकान के सामने से गुज़रे और साथ ही साथ चाय पीते तीनों दोस्तों की नजर भी उन दोनों पर गई.

कालू तुरन्त खड़ा हो गया और सधे कदमों से उन दोनों की ओर बढ़ कर हाथ जोड़ कर ‘नमस्ते’ किया...

रंजन और सुचित्रा ने भी मुस्करा कर नमस्ते का उत्तर दिया. कालू को कुछ कहने जा रही थी सुचित्रा की तभी उसकी नज़र गई गोपाल पर. उसे वहाँ देख कर सुचित्रा डर से सहम कर चुप हो गई. उसकी ये प्रतिक्रिया रंजन और कालू; दोनों ने नहीं देखा.

रंजन और कालू में कोई और ही बातें शुरू हो चुकी थीं.

रंजन हँसते हुए बोले,

“अरे कालू! कैसे हो?”

“बढ़िया हूँ भैया... आप कैसे हैं... और भाभीजी?”

“अच्छे हैं..” “बढ़िया हैं.” रंजन और सुचित्रा ने एक साथ जवाब दिया.

“आपसे एक बात पूछनी है भैया.”

“हाँ कालू .. बोलो.”

“आप तो पोस्ट ऑफिस में काम करते हैं न?”

“हाँ.”

“मुझे एक टी. डी. करवानी है.”

“टी. डी. ?? किसके लिए?”

“जी, अपने लिए ही... नॉमिनेशन के लिए मम्मी का नाम दे दूँगा.”

“एक बात बोलूँ ... कालू?”

“जी भैया.. बिल्कुल.”

“तुम टी. डी. करवाने से बेहतर, आर. डी खोलवा लो.”

“क्यों भैया...??”

“अम्म्म... देखो... ये सब थोड़ा विस्तार से बताना पड़ता है. एक काम करो... तुम कल मिलना मुझसे... यहीं... चाय पीते हुए हम आगे की बात करेंगे. ठीक है?”

“ठीक है भैया. मुझे कोई दिक्कत नहीं.”

“ठीक है.. आज चलता हूँ.”

एक बार फ़िर हाथ जोड़ कर दोनों को नमस्ते कर के कालू वापस दुकान में आ गया और एक चाय का ऑर्डर दे कर बेंच पर अच्छे से बैठ गया.

अजोय हँसते हुए बोला,

“क्यों बे... अचानक ये टी. डी. खोलवाने की क्या ज़रुरत आन पड़ी है तुझे?”

“अबे नहीं बे... कोई टी. डी. वी. डी. नहीं खोलवाना मुझे.”

“तो फ़िर?”

“भाभी को देखने गया था.”

“क्या? सुचित्रा भाभी को..?? साले... तूने पहले कभी बताया नहीं कि सुचित्रा भाभी पर तेरा दिल आ गया है?” अजोय मज़े लेता हुआ बोला.

लेकिन कालू सीरियस था,

बोला,

“यार... जो तू समझ रहा है... वो बात नहीं है... बिल्कुल नहीं है.”

“तो असल बात ही समझा ना साले.” गोपाल ने चिढ़ते हुए कहा.

“यार... जतिंद्र के साथ हुए हादसे की ख़बर है न तुझे?”

“हाँ भाई.. बिल्कुल है.. हमारा गाँव है ही कितना बड़ा जो ऐसी बातों की ख़बर देर से हो या बिल्कुल ही न हो.”

“लेकिन ऐसी एक बात है जो बहुत ही अजीब है और वो सिर्फ़ मुझे पता है.. तुम लोगो को नहीं... किसी को नहीं.”

“भाई...क्या सस्पेंस पे सस्पेंस दे रहा है... सीधे असल बात बता ना.” अजोय ने कहा.

“जतिंद्र के मृत्यु वाले दिन से कुछ रोज़ पहले तक मैंने खुद अपनी इन्हीं आँखों से सुचित्रा भाभी और जतिंद्र को एक साथ देखा था. कई बार.”

“क्या बात कर रहा है बे?” गोपाल और अजोय दोनों चौंक उठे.

“सच कह रहा हूँ.”

गोपाल कुछ सोचते हुए बोला,

“एक मिनट यार... तुमने सुचित्रा भाभी को जतिंद्र के साथ देखा.. शायद किसी काम से कहीं जाते वक़्त दोनों रास्ते में मिल गए हों और साथ चल पड़े हों? या फ़िर शायद सुचित्रा भाभी को ही कोई काम आन पड़ा हो जिसके लिए उन्हें जतिंद्र की सहायता लेने की ज़रुरत पड़ी हो??”

“हो सकता है... ये सही है की मैंने दोनों को साथ जाते हुए तो मैंने देखा था... पर बाद में जो देखा......”

कहते हुए कालू बीच में ही चुप हो गया.

देख के ऐसा लगने लगा मानो किसी और ही दुनिया में खो गया है.

अजोय ने उसके कंधे को पकड़ कर हिलाते हुए पूछा,

“बाद में क्या देखा था भाई; बता तो सही?”

कालू तुरंत कुछ बोलना नहीं चाह रहा था पर गोपाल और अजोय की ओर से लगातार पड़ते दबाव ने उसको अपना विचार बदलने को मजबूर किया.
 
चाय की अंतिम चुस्की लेकर कप को बेंच के नीचे रखा.. शर्ट के पॉकेट से एक मुड़ा हुआ पेपर निकाल कर उसमें से एक बीड़ी निकाल कर अपने दांतों के बीच दबाया और माचिस से सुलगाते हुए बोला,

“दरअसल बात है ही ऐसी जिसपे मैं आज भी यकीं नहीं कर पा रहा हूँ... और शायद तुम लोग भी नहीं कर पाओगे... पहले दिन दोनों को साथ जब सब्जी दुकानों की ओर जाते देखा तो मुझे कुछ अजीब नहीं लगा. दूसरे दिन भी मैंने दोनों को शम्भू जी के घर की ओर जाते देखा.. मुझे तब भी कुछ भी अजीब नहीं लगा. इसी तरह तीसरे दिन भी उन दोनों को मैंने देखा... साथ में... दोनों आपस में हँसते मुस्कराते हुए बातें करते जा रहे थे. तभी मेरा दिमाग ठनका... याद आया कि पिछले दो दिन भी ये दोनों इसी तरह आपस में हँसते मुस्कराते बातें करते हुए जा रहे थे. मेरा बदमाश मन ज़ोरों से मचलने लगा. मन अनजाने में ही गवाही देने लगा की कुछ तो गड़बड़ झाला है. उनसे थोड़ी दूरी बनाते हुए मैं भी उनके पीछे हो लिया. कुछ दूर चलने पर पाया की दोनों तो जंगल की ओर जा रहे हैं! उस भयावह भूतिया जंगल में! जहाँ शायद परिंदा भी मुश्किल से पर मारता होगा.. दिल बैठने लगा मेरा.. सोचा, अब आगे नहीं जाऊँ. पर दोनों क्या गुल खिलने वाले हैं ये जानने के लिए मन भी बहुत बेचैन हो रहा था.

अपने अंदर चल रही इस उथल पुथल को शांत करने के लिए मैंने एक बीड़ी निकाल लिया. दो तीन धुआं छोड़ने के बाद निश्चय किया कि आगे ज़रूर जाऊँगा. जब तक कुछ देखूँगा नहीं... तब तक मन शांत नहीं होगा मेरा.

अपने सामने देखा तो चौंक गया.. कुछ देर पहले जहाँ दोनों मेरे सामने ही थोड़ी दूरी पर आगे आगे चल रहे थे; अभी अचानक से इतनी ही देर में दोनों न जाने कहाँ गायब हो गए? मैं तुरंत दौड़ कर आगे गया और उन दोनों को ढूँढने लगा. पर दोनों मुझे कहीं नहीं मिले. मैं ऐसे ही हार मानने वालों में नहीं.. खोजबीन जारी रखा. मुझे लगता है करीब एक घंटे तक उन दोनों को ढूँढता रहा था मैं... अपने आस पास गौर किया तो डर गया. मैं घने जंगल में था! पता नहीं उन दोनों को ढूँढने के चक्कर में कब उस घने भूतिया जंगल के एकदम अंदर घुस गया था.. थक हार कर और अंदर ही अंदर डर से काँपता हुआ मैं एक आम के पेड़ के नीचे बैठ गया. अपनी मूर्खता पर बड़ा क्रोध आ रहा था.. जहाँ मैं बैठा था; उससे कुछ दूरी पर सामने एक पुआल घर था.. ऊपर नीचे, आगे पीछे, पुआल ही पुआल... और स्थिति भी ऐसी कि उसे भी देख कर एक बार के लिए कोई भी डर जाए. अब भला ऐसे घने जंगल में पुआल से भरा और बना वीरान घर देख कर कौन न डरे...? घर नहीं बोल कर कुटिया कहना भी गलत नहीं होगा. अनमने भाव से ही गुस्से में एक पत्थर उठाया और सामने की ओर ज़ोर से फेंक दिया.

पत्थर सीधे पुआल के ढेर में जा गिरा.

और तभी एक हलचल हुई.

पुआलों के ढेर से जतिंद्र उठ बैठा और इधर उधर देखने लगा. मैं जल्दी से उस पेड़ के ओट में आ गया. जतिंद्र पत्थर फेंकने वाले को देखने की कोशिश कर ही रहा था कि एक जनाना हाथ उसका हाथ पकड़ के नीचे की ओर खींचा और जतिंद्र वापस उन ढेरों पर जा गिरा. फ़िर से मुझे उस ओर चलने वाली गतिविधियाँ दिखनी बंद हो गई थी इसलिए मैं पेड़ पर चढ़ गया ये सोच कर की शायद ऊँचाई से कुछ दिख जाए.

पेड़ पर चढ़ कर मैंने उस ओर देखा... और जो देखा उस पे विश्वास नहीं हुआ.

जतिंद्र पुआल के ढेरों पर लेटा हुआ है और सुचित्रा भाभी उसके कमर पर बैठी हुई ऊपर नीचे हो रही है. साड़ी पेटीकोट जांघ तक उठा हुआ था. आँचल भी शायद नीचे गिरा हुआ था.

जतिंद्र के होंठों पर मुस्कान और चेहरे पर तृप्ति के भाव थे.

थोड़ा और अच्छे से देखने के लिए मैं एक डाली पर आगे बढ़ कर पैर रखा ही था की वह डाली टूट गई. टूटने से जो आवाज़ हुई वो उन दोनों के कानों तक तो नहीं पहुँचना चाहिए था पर एक क्षण के लिए भाभी रुक ज़रूर गई थी और बैठे बैठे ही, ऊपर नीचे होते होते मेरी दिशा की ओर देखी... बड़ी अजीब ढंग से देख रही थी... हाँ, नज़र उनका कहीं और था... पेड़ पर नहीं. बस एक ही बार इधर उधर देख लेने के बाद भाभी फ़िर जतिंद्र की ओर मुड़ गई.

मुझे वहाँ से निकल जाने लायक यही सही समय उचित जान पड़ा और मैंने वही किया भी.

चुपचाप पेड़ से उतरा और सरपट गाँव की ओर जाने वाले रास्ते की ओर दौड़ पड़ा. भूल कर भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा.”

पूरी बात कहने के बाद कालू चुप हुआ. एक गहरी साँस लिया और एक और चाय मँगवाया.

गोपाल और अजोय को काटो तो खून नहीं.

डर तो नहीं पर घोर अविश्वसनीय लगा ये घटना उन दोनों को. ऐसा कुछ पहली बार सुना था गोपाल और अजोय ने इसलिए आगे क्या कहे दोनों को समझ में नहीं आ रहा था. दोनों ही भाभी को बहुत मानते थे. एक अच्छी संस्कारी बहु और शिक्षिका के रूप में काफ़ी अच्छी पहचान और सम्मान है सुचित्रा भाभी का इस गाँव में. ऐसी चरित्रहीनता वाली चीज़ें करना तो दूर शायद सोचती तक नहीं होंगी वो.

गोपाल ने दबे स्वर में पूछा,

“भाई.. तू बिल्कुल पक्का है न... कि वो सुचित्रा भाभी ही थी?”

“अरे हाँ भाई हाँ... उनके पीछे उस दिन करीब २ घंटे बीत गए थे मेरे... उन दो घंटे तक मुझे ये पता नहीं चलेगा क्या की मैं किसे देख रहा हूँ और किसे नहीं?” कालू ने बीड़ी बुझाते हुए कहा.

इस पे गोपाल शांत रहा. शायद कुछ और ही सोचने लगा वो.

अजोय ने चिंतित स्वर में कहा,

“यार कालू, क्या जतिंद्र की मृत्यु में सुचित्रा भाभी का कोई सम्बन्ध .... हो सकता है?”

“लगता तो नहीं पर....”

“पर क्या?”

“जो कुछ अविश्वसनीय सा देखा... उसके बाद किसी तरह की बात या घटना पे विश्वास करना या संदेह होना कोई बड़ी बात नहीं. इसलिए मैंने सोचा है कि जब तक जतिंद्र की मृत्यु की गुत्थी सुलझ नहीं जाती तब तक मैं भाभी पे नज़र रखूँगा. अकेले.”

ये सुनकर गोपाल और अजोय चौंक गए.\

एक साथ ही बोले,

“अबे क्या बात कर रहा है? पागल हो गया है क्या? भाभी के पीछे लगेगा? किसी ने देख लिया तो? मान ले भाभी को ही पता चल गया तो? क्या सोचेगी वो? शोर मचा कर तुझे पकड़वा देगी और फ़िर गाँव वालों के हाथों भरपेट मार खिलवाएगी.”

कालू हँसा...

बोला,

“अबे निश्चिन्त रहो बे अक्ल के अंधों... मेरा नाम कालू है कालू...हर काम पर्फेक्ट्ली करता हूँ. टेंशन न लो. समझे?”

कोई कुछ न बोला.

दुकान के मालिक घोष काका को शायद कालू के अंतिम तीन चार वाक्य सुनाई दे गए थे. उन तीनों की ओर मुड़ कर कुछ बोलने के लिए मुँह खोला ही था कि चार ग्राहक और आ गए. काका उसी तरफ़ व्यस्त हो गए और पल भर में ही कालू की बातों को भूल गए.

इधर कुछ देर शांत बैठे रहने के बाद तीनों दूसरे विषयों पर बात करते हुए हंसी मजाक में रम गए.

चाय पर चाय चलता रहा.

परन्तु तीनों को ही ये नहीं पता था की उनसे कुछ दूरी पर ज़मीन से दो फूट ऊँची.. हवा में स्थिर एक काला साया उन तीनों की बातें सुन रही थी ... चेहरे पर निष्ठुरता... होंठों पर मुस्कान और आँखें चमकती हुईं!
 


सुबह जब कालू सो के उठा तो उसे अपने सीने पर हल्का चुभता हुआ दर्द महसूस हुआ. एक टीस सी... जलन महसूस हो रही थी.

अपने सीने की ओर देखते ही वो चौंका. वहाँ तीन लकीर सी खरोंचें थीं जो सीने के दाएँ ओर से शुरू हो कर सीने के बाएँ तरफ़ तक गई थी. कालू बुरी तरह डर गया. वो जल्दी से एक छोटा आइना लेकर अपने सीने पर हुए उस घाव को देखने लगा.

सीने के जिस जगह वो तीन खरोंचें थीं.. उसके आस पास के जगह में सूजन आ गई थी.

कालू को बहुत आश्चर्य हुआ.

आश्चर्य होना स्वाभाविक भी है क्योंकि रात को सोते समय तो ऐसा कुछ नहीं था उसके सीने पर... और फ़िर सीना ही क्या पूरे शरीर में इस तरह का कोई दाग कोई निशान नहीं था.

सीने पर उभर आईं उन तीन खरोंचों के बारे में सोच ही रहा था कि अचानक से उसे पिछली शाम उस चाय दुकान में अजोय और गोपाल के साथ हुई अपनी दीर्घ वार्तालाप याद आ गई.

और साथ ही याद आई उस वार्तालाप का प्रमुख विषय... ‘सुचित्रा और जतिंद्र!’...

हालाँकि और भी कई सारी बातें हुईं थीं उन तीन दोस्तों में पर जैसे ही ‘सुचित्रा भाभी और जतिंद्र की मृत्यु’ से संबंधित हुई वार्तालाप वाला अंश उसे याद आया; पता नहीं क्यों कालू के पूरे शरीर में एक झुरझुरी सी दौड़ गई.

अनायास ही उसे एक अपरिचित से भय का अनुभव होने लगा.

उसका मन इस संदेह का गवाही देने लगा की हो न हो, इन खरोंचों का सम्बन्ध कहीं न कहीं जतिंद्र की मृत्यु से हो सकती है... या फ़िर शायद साँझ के समय ऐसी विषयों पर बात करने के फलस्वरुप कोई बुरी शक्ति उन लोगों के तरफ़ आकर्षित हो गई होगी और उचित समय मिलते ही चोट पहुँचा दी.

कालू अब बहुत बुरी तरह घबराने लगा.

घरवालों से अपनी घबराहट किसी प्रकार छुपाते हुए नित्य क्रिया कर्म से फ़ौरन निवृत हो, नहा धो कर तैयार हो, चाय नाश्ता खत्म करके दुकान खोलने के नाम पर जल्दी से घर से निकल गया.

तेज़ कदमों से चलता हुआ कालू अजोय के घर पहुँचा..

अजोय हमेशा से ही सूरज उगने के पहले ही उठ जाने का आदि था और इसलिए जब कालू उसके घर पहुँचा तो वो उसे जगा हुआ ही मिला.

कालू ने अपने साथ हुई घटना को बताया और प्रमाण हेतु अपना टी शर्ट उतार कर खरोंचों को दिखाया. अजोय को भी विश्वास नहीं हुआ... आम तौर पर इस तरह के खरोंच गिरने से या किसी नुकीली चीज़ के शरीर पर रगड़ जाने से नहीं बनते हैं. सीने पर दाएँ से बाएँ तक बनी ये खरोंच देखने में ही अजीब सी हैं और इनमें तो अब सूजन भी है. अजोय को एकदम से कुछ समझ में नहीं आया की वो बोले तो क्या बोले. पर कालू के मन में बहुत सारी जिज्ञासाओं का जन्म होने लगा था... और ये जिज्ञासाएँ कालू से ही शांत हो जाए ऐसा अकेले उसके बस की बात नहीं.

इसलिए प्रश्न करने की पहल उसी ने करने की सोची,

“अजोय... क्या लगता है यार?”

अजोय अब भी कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था... वो तो हतप्रभ सा बस उन्हीं खरोंचों को देखे जा रहा था. कालू के दोबारा पूछने पर कहा,

“पता नहीं यार. मुझे ठीक से कुछ समझ में नहीं आ रहा है.”

“बिल्कुल भी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है?”

“नहीं!”

“पर मैं कुछ कुछ समझ रहा हूँ.”

कहते हुए कालू का चेहरा डरा हुआ सा हो गया.. आँखें भी उसकी भय से पथराई सी लगने लगी. कालू की ये स्थिति देख कर अजोय उत्सुकता और जिज्ञासा से भर गया.

कुछ क्षण उसकी तरफ़ अपलक देखता रहा और जब रहा नहीं गया तब बोल उठा,

“अबे बोल न.. क्या समझ में आ रहा है तेरे को?”

कालू तुरंत कुछ न बोला.

बेचारा बुरी तरह डरा और घबराया हुआ था. थूक निगला.. आस पास देखा... सामने टेबल पर पानी का बोतल रखा हुआ था. लपक कर बोतल उठा लिया और गटागट पूरा पानी पी गया. अजोय इसे गंभीर मामला मानते हुए जल्दी से उसे अपने गद्देदार बिस्तर पर बिठाया और स्टोव पर रखी केतली को हल्के आंच में गर्म कर एक कप में चाय परोस कर कालू की ओर बढ़ाया.

कप लेने से पहले कालू एक क्षण ठिठका.. फ़िर हाथ बढ़ा कर कप ले कर थोड़ा थोड़ा फूँक कर पीने लगा. इतने देर में अजोय ने दो बिस्कुट भी बढ़ा दिया था कालू की तरफ़.

पाँच मिनट बाद,

“हाँ भई, अब बोल... तू क्या कह रहा था उस समय... क्या समझ रहा था तू?”

कालू को अब थोड़ा नार्मल देख कर अजोय ने पूछने में समय नहीं गँवाया.

कालू ने अजोय की तरफ़ देखा, एक गहरी साँस लिया और बोलने लगा,

“यार क्या बताऊँ.. तुझे याद है न .. कल शाम हम तीन, मैं, तू और गोपाल; चाय दुकान में थे... और कई सारी बातें हो रही थी हमारे बीच. बहुत सी बातों के बीच हमने; खास कर मैंने सुचित्रा भाभी को लेकर कुछ बातें की थीं?”

“हाँ भाई, याद है.. ऐसी कुछ बातें हुई तो थी हमारे बीच... क्यों... क्या हुआ?”

“यार... सुचित्रा भाभी और जतिंद्र के जंगल वाली घटना को बताने के बाद से ही न जाने क्यों मुझे ऐसा लगने लगा था कि हम तीनों की बातों को हमारे अलावा कोई और भी सुन रहा था...या... या शायद ..... खैर, पहले तो मुझे लगा कि दुकान मालिक घोष काका हमारी बातें सुन रहे हैं पर मैंने गौर किया... ऐसा नहीं था.. वो ग्राहकों के साथ व्यस्त थे.. फ़िर पता नहीं.. क्यों मुझे लगने लगा की जो हमारी बातें सुन रहा है.. वो शायद सामने नहीं आना चाहता... या दिख नहीं सकता... या उसे मैं चाह कर भी नहीं देख सकता.... म.. मैं....”

“अबे... रुक ...रुक भाई ..रुक.. क्या अनाप शनाप बक रहा है...? सामने आ नहीं सकता.. दिख नहीं सकता... तू देख नहीं सकता.... साले मुझे गधा समझा है क्या... या एकदम भोर में एक बोतल चढ़ा लिया?”

“अरे नहीं यार... मैं... मैं.. पता.. नहीं कैसे समझाऊँ.. यार... म....”

अजोय ने फ़िर कालू की बात को बीच में काटते हुए बोला,

“सुन भाई... तू अभी ठीक से सोच नहीं रहा है.. तू अंदर से डरा और हिला हुआ है... घर जा.. दवाई लगा... आराम कर.. आज दुकान मत जा... समझा? मुझे देर हो रही है.. समय से पहले दुकान खोलना होता है मेरे को... नहीं तो न जाने कितने ग्राहक लौट जाएँगे... शाम को मिल.. चाय दुकान पे.. वहीँ बात करते हैं.. ठीक है?”

कालू बेचारा और क्या बोले...

अजोय तैयार हुआ.. कालू उसी के साथ घर से निकल गया.

कोई बीस – पच्चीस कदम आगे चल कर अजोय को दाएँ मुड़ जाना था जबकि कालू को वहीँ से बाएँ मुड़ कर अपने घर की ओर जाना था. इसलिए थोड़ी दूर तक दोनों साथ साथ चले. जब तक साथ चले; अजोय कालू को हिम्मत देता रहा, मन बहलाता रहा. कालू को भी थोड़ा अच्छा लग रहा था. मोड़ के पास पहुँच कर अजोय कालू से विदा लिया और चल दिया अपने गन्तव्य की ओर.

कालू भी सोचता विचारता अपने घर की ओर जाने लगा. सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि अजोय के बहुत तरह से समझाने के कारण कालू के मन से डर बहुत हद तक दूर हो गया था. वो अब नार्मल फ़ील करने लगा था.

लेकिन सीने पर लगे खरोंचों के निशान अभी भी दर्द कर रहे थे. अजोय के साथ होती बातों के बीच कालू तो इस दर्द को लगभग भूल ही चुका था पर अब अकेला होते ही दर्द ने अपनी ओर उसका ध्यान खींचना आरंभ कर दिया.

डर तो निकल चुका था उसके दिल और दिमाग से पर ये खरोंच लगे कैसे यही सोचता हुआ कालू तनिक तेज़ी से आगे बढ़ता जा रहा था. वैसे भी अजोय के घर जा कर कुछ देर ठहरने और अब आते आते बहुत समय निकल गया है. अतः अपनी चाल में तेज़ी लाना तो स्वाभाविक ही है.

अचानक वो किसी से ज़ोर से टकराया.
 
एक महिला की ‘आआऊऊऊ...’ आवाज़ से कालू अपनी विचारों के दुनिया से बाहर आया. हालाँकि इतना वो समझ चुका था कि वो अभी अभी जिससे टकराया है वो.. और कालू खुद एक दूसरे के विपरीत दिशा में गिर चुके हैं.

कालू झटपट उठ कर इधर उधर देखा.

दूर से आती एक रिक्शा के अलावा आस पास कोई नहीं था.

कालू अब नीचे गिर पड़े व्यक्ति की ओर देखा....

अरे ये क्या?!

ये तो सुचित्रा भाभी हैं..!!

सुचित्रा अब तक उठ कर बैठ चुकी थी.. अपने हाथों और कोहनियों को झाड़ रही थी. वाकई काफ़ी धूल लग गया था उनके कपड़ों और हाथों पर. बाएँ कोहनी के पास तो थोड़ा छिल भी गया है.

खीझ भरे स्वर में डांटते हुए बोली,

“आँखें क्या केवल लोगों को दिखाने के लिए है? देख कर नहीं चल सकते क्या? कम से कम सही जगह तो नज़र होनी चाहिए! रास्ते केवल खुद के चलने के लिए नहीं होते.”

इसी तरह न जाने और कितना ही कुछ कहती चली गई सुचित्रा.

पर कालू का ध्यान अब तक उठ बैठी सुचित्रा भाभी द्वारा उनके थैली से गिर पड़े सामानों को एक एक कर के डालते समय आगे की ओर थोड़ा झुके होने के कारण वक्षों के उभार पर थी.

सामान थैले में डालने के उपक्रम में ही सुचित्रा का आँचल थोड़ा और साइड हुआ और अब आसमानी रंग के शार्ट स्लीव ब्लाउज के बड़े गले से झाँकते बाहर आने को तत्पर उनका दायाँ स्तन किसी भरे हुए बड़े से गोल फल की तरह लग रहा था और गले की सोने की पानी चढ़ी चेन तो जैसे उस लंबी क्लीवेज की गहराईयों में कहीं फँस गई थी शायद.

कालू तो जैसे पलक झपकाना ही भूल गया.

जीवन में ऐसा दृश्य आज से पहले कभी नहीं देखा था उसने. एक स्त्री का अर्ध नग्न स्तन इस तरह से किसी का मन भ्रमित कर सकता है, मोह सकता है ये आज उसने पहली बार अनुभव किया. ब्लाउज कप से फूल कर उठे हुए स्तन ही नहीं अपितु बाहर निकल आई करीब पाँच इंच लंबी क्लीवेज भी रह रह कर कालू की दिल की धड़कन को किसी हाई स्पीड ट्रेन की तरह दौड़ा दे रही थी.

कालू को पहली बार नारी देह की महत्ता का पता चला. नारी देह की शक्ति, क्षमता, सामर्थ्य और सुंदरता, उसकी वैभवता... मानो ईश्वर ने सभी सर्ववांछित गुण एक देह में ही डाल दिया है.

सभी सामान थैले में डाल लेने के बाद सुचित्रा भाभी उठी..

उठ कर कालू को कुछ कहने जा रही थी कि ठिठक गई... कालू की नज़रें अब भी सुचित्रा भाभी की वक्षों की ओर था... सुध बुध खोया हुआ सा सुचित्रा के शारीरिक कटावों और सौन्दर्य को देखे जा रहा था... सुचित्रा दो मिनट के लिए रुक गई... सोची, ‘देखूँ ज़रा.. कब तक.. कहाँ कहाँ ... और क्या क्या देखता है...?’ पर वो जानती थी कि हर किसी के तरह ही कालू भी उसके पूरे शरीर पे केवल एक ही जगह पूरा ध्यान केन्द्रित करेगा और वाकई में ऐसा हुआ भी.

हाथों और कोहनियों पर लगे चोट को भूल सुचित्रा अपने चेहरे पर गर्वीली मुस्कान की एक आभा लिए कालू को उसके इस प्रकार के व्यवहार और रास्ते में यूँ ऐसे चलने पर थोड़ा झिड़की और अब तक पास आ चुकी रिक्शा वाले को रुकवा कर उसपे सवार हो कर अपने गन्तव्य की ओर बढ़ गई.

पीछे कालू अब भी रास्ते पर उसी जगह खड़ा हो कर धीरे धीरे दूर होती जा रही रिक्शे पर बैठी सुचित्रा को देख रहा था.

पूरे दिन बेचारे कालू का ज़रा भी मन न लगा कहीं.

घर लौटने के थोड़ी ही देर बाद दुकान पर गया तो ज़रूर.. पर दिमाग अब भी सुचित्रा के क्लीवेज पर अटका पड़ा था. आज पहली बार एक महिला, एक भाभी के यौवन रस को एक ज़रा चखने का मन कर रहा था उसका. रह रह कर उसके आँखों के सामने सुचित्रा का गुब्बारे जैसा फूल कर ऊपर उठे हुए दाएँ चूची का नज़ारा छा जाता. दिन भर बीच बीच में मन करने पर दुकान से बाहर निकल कर पीछे झाड़ियों की ओर जाता और झाड़ियों में ही थोड़ा अंदर घुस कर अपना पैंट उतार कर काले लिंग को बाहर निकाल कर बेरहमी के साथ मसल मसल कर हस्तमैथुन करता.

शाम को अपने दोस्तों से मिलने घोष काका के चाय दुकान पर भी नहीं गया.

मन बेचैन था.. रह रह कर मन में एक हुक सी लगती... कुछ पाने की चाह उसके कोमल हृदय पर एक ज़ोर का प्रहार करती... पर वो अपने मन को समझाते हुए अपना काम करता रहा.

मन ही मन सोच लिया था कि आज उसे हर हाल में ममता के पास जाना ही होगा.

ममता गाँव की ही एक मनचली लड़की थी जिसपे कालू का दिल आ गया था.

पिछले कई महीनों से नैन मटक्का के बाद कुछ ही दिन पहले दोनों पहली बार एक दूसरे के करीब... बहुत करीब आये थे. हालाँकि सहवास होते होते रह गया था.. पर उस दिन ऊपर ही ऊपर जो आनंद मिला था कालू को उसे वो भूले से भी भूल नहीं पाया था. दोनों ने एक दूसरे से वादा भी किया था कि जल्द ही एक दिन दोनों सब कुछ नज़रअंदाज़ कर के एक सुखद समागम करेंगे. अपने पहले संसर्ग को कुछ ऐसा करेंगे की वह ताउम्र यादगार बन जाए.

जल्दी से काम निपटा कर कालू दुकान बढ़ाया (बंद किया) और ममता की घर के रास्ते चल पड़ा. सुबह सुचित्रा को देखने के बाद से ही उसके दिमाग में सहवास के कीड़े उछल कूद कर रहे थे. इसलिए उसका इस बात पे जल्दी ध्यान नहीं गया कि आज उसे लौटने में काफ़ी देर हो गई है. और दिनों में संध्या सात होते होते दुकान बढ़ा दिया करता है और कभी कभी तो छह बजने से पहले ही दुकान बढ़ा कर दोस्तों के साथ चाय दुकान में गप्पे शप्पे हांका करता.. और फ़िर घर लौटते लौटते नौ बज जाते.पर आज तो साढ़े आठ यहीं बज गए.

वह तेज़ क़दमों से ममता के घर की ओर बढ़ा जा रहा था. चाहे कुछ भी हो जाए... चाहे सहवास न हो... पर थोड़ी शांति तो आज उसे चाहिए ही. ममता का कमरा घर के पीछे तरफ़ था जहाँ वो आराम से जा सकता है और उतने ही आराम से ममता के कमरे में घुस सकता है. उसके माँ बाप और बूढ़ी दादी उसके कमरे में जल्दी नहीं आते. कुछ कहना होता तो बाहर से आवाज़ देते या दरवाज़ा खटखटाते. इसलिए सहवास के संभावना तो बनती ही बनती है.. और कुछ नहीं तो ऊपर ऊपर से ही मज़े ले लेगा. वो भी तो कितना तरसती है उसके आलिंगन के लिए. होंठों पर भी चुम्मा लिया जाता है ये तो उसे पता ही नहीं था. ये भी ममता ने ही उसे कर के दिखाया था. ‘आहा! सच में. कितना मज़ा आता है न... खास कर संतरे जैसे कोमल नर्म ताज़े उगे स्तनों को कस कर मुट्ठियों में भींच कर गोल गोल घूमाते हुए मसलने में तो एक अलग ही आनंद है.’ मन ही मन ऐसा सोचता चहकता हुआ कालू बढ़ा चला जा रहा था ममता के घर.

अभी मुश्किल से कोई आधा किलोमीटर दूर होगा वो ममता के घर से कि अचानक उसे लगा की उसने कुछ सुना.

वो फ़ौरन पलट कर पीछे घूम कर देखा.

रात के अँधेरे में जहाँ तक और जितना स्पष्ट देखा जा सकता है... देखा.

नहीं... कहीं कुछ नहीं.

‘तो फ़िर... वो आवाज़... कहीं भ्रम तो नहीं? शायद सुनने में गलती हुई है.’

कुछ कदम और चलने पर फिर वैसी ही एक आवाज़.

कालू फिर रुका...

इधर उधर देखा..

पीछे मुड़ कर भी देखा.

पर कहीं कुछ नहीं दिखा. दूर दूर तक कोई इन्सान तो छोड़िये; परिंदा तक नहीं था.

सन्नाटा गहरा रहा था.
 
इस गाँव में आठ बजते बजते सब अपना अपना दुकानदारी वगैरह निपटा कर अपने घरों की ओर प्रस्थान करने के लिए प्रस्तुत होने लगते हैं. साढ़े आठ या पौने नौ होते होते अधिकांश घरों के दरवाज़े बंद हो जाते हैं और कई के घरों के तो लालटेन, मोमबत्ती, बल्ब इत्यादि बुझ जाते हैं. कुछ आवारा मवाली टाइप लड़के और पियक्कड़ प्रौढ़ ही जगह जगह रास्तों में मिल जाते हैं. वो भी हर रात नहीं.

आज की रात भी शायद ऐसी ही एक रात है.

कालू आगे बढ़ने के लिए जैसे ही अपना दायाँ कदम उठाया; वही आवाज़ फिर सुनाई दी.

वो सिहर उठा. ममता से मिलने के रोमांच के जगह अब धीरे धीरे डर अपना घर करने लगा उसके मन में.

अब भला रात के ऐसे माहौल में किसे डर न लगे.

डरते डरते किसी तरह कदम आगे बढ़ाया.. अब कोई आवाज़ नहीं... वो अब पहले से थोड़ा तेज़ गति में चलने लगा. पर रह रह कर उसके टांग काँप उठते. वो लड़खड़ा जाता. खुद को स्थिर करने के लिए उसने अपने कमीज़ की पॉकेट से माचिस और एक बीड़ी निकाल लिया. जलाने लगा. पर तीली जली नहीं. फिर कोशिश किया.. फिर नाकाम रहा. उसने गौर किया; उसके हाथ कांप रहे हैं.

दो बार और कोशिश किया उसने. तीसरी बार में सफल रहा.

बीड़ी फूँकते हुए कुछ कदम आगे बढ़ा कि फिर वही आवाज़. पर इस बार वो आवाज़ को पहचान गया. पायल की आवाज़ थी!

और इस बार तुरंत ही एक और आवाज़ भी सुनाई दिया जो स्पष्टतः एक महिला की थी.

कालू एक झटके में पीछे घूमा... और पीछे जिसे देखा उसे अभी इस समय देखने की उसने कल्पना तक नहीं की थी.

घोर आश्चर्य में बरबस ही उसके मुँह से निकला,

“अरे भाभी जी... आप??!!”

सुचित्रा ही खड़ी थी..!

बड़ी ही अदा से मुस्कराई. आँखें तो ऐसी लग रही थी मानो पूरा एक बोतल गटक कर आई हो... नशा ही नशा छाया था उन आँखों में. करीने से काजल लगा हुआ. होंठों पर बड़ी खूबसूरती से लगी लाल लिपस्टिक. पहले कभी गौर किया नहीं पर आज देखा की निचले होंठ के बायीं तरफ एक बहुत ही छोटा सा तिल भी है. बालों को भी बिल्कुल अलग ही अंदाज़ में कंघी की हुई है उसने. खोपा में एक छोटा सा लाल गुलाब खोंसा हुआ. सामने चेहरे पर दोनों साइड से दो लटें लटकी हुईं.

कालू की नज़रें अब नीचे फिसली.

लाल रंग की शोर्ट स्लीव ब्लाउज.. लाल साड़ी जिसे बहुत कस कर लपेटा गया है बदन पर... आँचल दाएँ वक्ष पर से हट कर पूरी तरह से बाएँ पर है. इससे उस टाइट ब्लाउज में उसके भरे स्तन और भी फूल कर ऊपर को उठे हुए दिख रहे हैं. सोने की चेन बिना रौशनी पाए ही चमचम कर रही है... और सुबह की ही तरह ब्लाउज से ऊपर निकल आए उस लम्बे क्लीवेज के अंदर घुसी हुई है. ब्लाउज के पहले दो हुक आपस में ऐसे लगे हुए हैं मानो थोड़ा और दबाव पड़ते ही टूट जाएँगे. दोनों हाथों में लाल चूड़ियाँ और बंगाली औरतों के हाथों में पहनी जाने वाली सफ़ेद शाखा चूड़ी भी है.

साड़ी कमर पे पीछे से अच्छे से लिपटी हुई पर आगे आते आते नीचे की ओर झुक गई है. इससे नाभि स्पष्ट दिख रही है. कमर पर भी एक सोने की कमरबंद है जोकि गले की चेन की ही तरह बिना किसी रौशनी के चमक रही है.

कालू को तो रत्ती भर का विश्वास नहीं हो रहा कि जिसे पूरा गाँव एक शालीन वधू और सुशिक्षित शिक्षिका के रूप में जानता है; वो आज, अभी उसके सामने एक खेली खिलाई औरत की भांति इतराते हुए खड़ी है!

बहुत मुश्किल कालू के मुँह से शब्द निकले,

“भाभी.. आप.. इस...इस समय... यहाँ.... क्यों?”

सुचित्रा हँसी... उसकी वो हँसी वहां गूँजती हुई सी प्रतीत हुई,

“हाहाहा... क्यों कालू... मैं आ नहीं सकती क्या?”

कहते हुए अपना मुँह एक रुआँसे बच्चे के जैसे बना ली.

कालू के मुँह से शब्दों ने जैसे न निकलने की ठान ली हो. डर तो उसे ज़रूर लग रहा था और अब भी लग रहा है पर अब डर के साथ साथ कामोत्तेजना भी हावी होने लगी है.

कालू की नज़रें एक बार फिर सुचित्रा की काजल लगी आँखों से होते धीरे धीरे उसके लाल होंठ और फिर वहाँ से सीधे ब्लाउज कप्स में समाने से मना करते ऊपर की ओर निकल आए स्तनों और उनके बीच की गहरी घाटी में जा कर रुक गई. कुछ क्षण अच्छे से देखने के बाद उसने जल्दी से एक नज़र सुचित्रा की गोल गहरी नाभि और थोड़ा नीचे बंधे कमर के कटाव की महत्ता बढ़ाती कमरबंद पर डाली.

बेचारा बुरी तरह कंफ्यूज होने लगा कि जी भर कर क्या देखे....

रसीले, फूले हुए स्तनों और बीच की घाटी को.... या फिर गहरी नाभि और कमर को?

सुचित्रा इठलाती, मुस्कराती हुई तीन कदम चल कर कालू के और पास आई. उसकी आँखों में देखते हुए खनकती आवाज़ में बोली,

“सुनो.. मेरा एक बहुत ज़रूरी काम है.... कर दोगे?”

सुचित्रा के ये शब्द कालू के कानों में कोयल की मधुर आवाज़ सी सुनाई दी. कालू मन ही मन एक बार फिर ऐसा ही कुछ सुनने को मतवाला होने लगा. वो अपनी इस आदरणीय आकर्षणीय भाभी से ऐसी ही खनकती आवाज़ को फिर से सुनाने के लिए विनती करने की सोचने लगा. पर बेचारा सोच भी कहाँ पा रहा था... सुचित्रा उसके इतने करीब आ गई थी कि उसकी नज़र तो अब सीधे सुचित्रा के चेहरे और वक्षों पर ही जा कर रुक रही थीं.

कालू को कुछ न बोलते देख सुचित्रा मुस्कराते हुए अपना दायाँ हाथ कालू के सीने के बाएँ तरफ उसके दिल के ठीक ऊपर रखती हुई बोली,

“कालू.... तुम मेरा काम कर दोगे न?”

बात ख़त्म करते करते सुचित्रा हौले हौले कालू के दिल के ऊपर रखे अपने हाथ को गोल गोल घूमाने लगी.

“हाँ भाभी... करूँगा.”

कालू बोला तो सही; पर उसे खुद नहीं पता की उसने क्या बोला और किस बात पे बोला.

पर शायद सुचित्रा को इस बात से कोई मतलब नहीं था.

एक बार फिर एक बहुत ही खूबसूरत मुस्कान होंठों पर लाई, अँगुलियों के एक छोटी सी करतब से कालू के शर्ट के एक बटन को खोल कर उसके सीने पर नए नए उगे बालों पर एक ऊँगली फिरा कर बोली,

“तो फिर आओ मेरे साथ....”

“क...क...हाँ... भाभी...”

“अरे आओ तो सही... आओगे तो खुद पता चल जाएगा... है न?”

“ज....जी भा...भाभी.”

सुचित्रा एक बार फिर हँसी... वही खनकदार... मीठी... कोयल से स्वर में.

हँस कर वो एक तरफ चल दी. आगे आगे वो.. पीछे पीछे कालू उसके मटकते पिछवाड़े को देखता हुआ चला जा रहा था.

इस पूरे घटनाक्रम को दो जोड़ी आँखें देख रही थीं.

एक तो अपने घर के पीछे वाले कमरे की खिड़की से खुद ममता और दूसरा एक मताल पियक्कड़... जो दो बोतल खाली करने के बाद बेहोश होने के कगार पर था. वो शराबी न तो ठीक से कुछ देख सका और न ही अधिक देर तक होश में रह पाया; पर ममता... जिसका घर अपेक्षाकृत थोड़ा नजदीक था और जिसकी खिड़की से कालू जहाँ खड़ा था; रास्ते के उस हिस्से को आसानी से देखा जा सकता है; वो भी ठीक से कुछ देख न पाई. एक तो वैसे ही स्ट्रीट लाइट की कोई व्यवस्था नहीं है और दूसरे, थोड़ा ही सही पर कालू दूर तो था ही...

ममता को सिर्फ इतना ही दिखा की एक कोई मर्द खड़ा है और एक औरत. दोनों में कुछ बातें हो रही हैं और फिर औरत के पीछे पीछे मर्द एक ओर चल देता है. दोनों ही कुछ कदम चले होते हैं कि अचानक कोहरा सा एक धुंध सामने प्रकट हो जाता है और कुछ क्षण बाद जब धुंध हटता है तो वो आदमी और औरत कहीं दिखाई नहीं देते.

ऐसा दृश्य चूँकि ममता ने आज पहली बार देखा इसलिए बेचारी बहुत डर गई और झट से खिड़की बंद कर के अंदर चली गई.

कालू सुचित्रा के पीछे चलते चलते एक वीरान मैदानी जगह के बीचोंबीच पहुँच गया... अब जहाँ वो और सुचित्रा थे उससे यही कोई दस बारह क़दमों की दूरी पर चारों तरफ खंडहर नुमा घरों के बचे खुचे अवशेष उन्हें घेरे हुए थे.

कालू कहाँ पहुँच गया... क्यों आया... और सबसे बड़ी बात कि किसके साथ आया... ये सब कुछ भी उसे नहीं पता... किसी भी बात का होश नहीं.

वो तो बस अपने सामने उसकी तरफ पलट कर खड़ी स्वर्ग से भी सुंदर अप्सरा को अप्रतिम कामेच्छा से निहार रहा था... उसे आमंत्रित करते सुचित्रा के लाल होंठों की मुस्कान, पुष्ट वक्ष और कटावदार कमर बस जैसे उसी के लिए बने थे.

कालू की आँखें धीरे धीरे बोझिल हो आई थीं.

धीरे धीरे सुध बुध खोता जा रहा था..

पूरी तरह से आँखें बंद होने के पहले का जो अंतिम दृश्य उसने देखा वो उसके अंदर की कामोत्तेजना में कई गुणा वृद्धि कर गई. अपनी लगभग बंद हो आई आँखों से उसने सुचित्रा के कंधे से आँचल के सरकने और क्षण भर बाद ही उस टाइट लाल ब्लाउज को सुचित्रा के बदन से अलग होते देखा.....
 

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