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रह रह कर कालू के आँखों के सामने कुछ दृश्य उभर आते और उसी के साथ कालू का सिर दुखने लगता. इसी दर्द से कालू बिस्तर पर पड़े पड़े छटपटाने लगता.
बंद आँखों से सजग रहते हुए ही उन दृश्यों को समझने का प्रयत्न करता; पर जैसे ही दिमाग पर जरा सा ज़ोर क्या लगाता सिर फिर से दुखने लगता. कुछ टूटे बिखरे से रंगीन दृश्य; जो यदि जरा सा थम जाए या धीमे हो जाए तो तब शायद कुछ समझ पाए कालू... पर.... पर... दृश्य तो जैसे सब खिचड़ी से आते जाते.
बस इतना ही समझ पाया था कालू कि इन दृश्यों का उससे अवश्य कोई सम्बन्ध है अन्यथा वो स्वयं को इन दृश्यों में नहीं पाता.
पर... पर... ये दूसरा व्यक्ति कौन है?
जिन दृश्यों को अपने बंद आँखों से देख रहा है... जिन्हें वो सपना समझ रहा है.... उन सपनों में उसके अलावा कोई और भी है जिसे वो महसूस तो कर पा रहा है पर स्पष्ट देख नहीं पा रहा.
तभी किसी ने उसे ज़ोर से हिलाया, झकझोरा...
एक झटके से उठ बैठा वो.
देखा, उसके आस पास उसे घेरे हुए बहुत लोग हैं; दोस्त हैं, सम्बन्धी हैं, गाँव के कुछ लोग हैं, पड़ोसी हैं, पिताजी बिस्तर पर उसके पास बैठे हुए हैं, माताजी सिरहाने बैठी उसे हाथ वाले पंखे से हवा कर दे रही हैं.
कालू अपनी आँखें मलता हुआ चारों ओर और अच्छे से देखा तो पाया कि वो इस समय अपने कमरे में ही है.
कालू हैरानी से सबको देखने लगा. खास कर माँ की आँखों में आँसू और पिताजी के चेहरे पर गहरी चिंता देख कर उसे बहुत ज्यादा हैरानी हुई. अजोय और गोपाल थोड़ा पास आ कर उसकी ओर झुक कर पूछे,
“कालू... यार... कैसा है तू... क्या हुआ था तुझे?”
उनका ये पूछने भर की देरी थी कि जितने भी लोग वहाँ उपस्थित थे, सब के सब यही प्रश्न एक साथ करने लगे.
गहरी नींद से उठा कालू बेचारा कुछ समझ ही नहीं पा रहा था की गोपाल और अजोय ने उससे क्या पूछा और उसके परिवार जनों के साथ साथ बाकी के लोग भी आखिर उससे क्या जानना चाहते हैं. उसने असमंजस भरी निगाहों से अपने माँ बाबूजी की ओर देखा. दोनों को देख कर ये साफ़ महसूस किया उसने की दोनों अभी अभी किसी गहरी दुष्चिन्ता से बाहर निकले हैं.
उसे घेर कर खड़े लोगों ने फिर से प्रश्नोत्तर का पहला चरण शुरू कर दिया और इसी में पूरा दिन पार हो गया.
शाम को वो घर पर ही रहा.
लोगों के प्रश्नों के बारे में सोचता रहा.
सबके प्रश्न उसे बहुत अटपटे और मजाकिया लग रहे थे.
“तुम्हें क्या हुआ था... कहाँ चले गए थे... ऐसा क्यों हुआ... और कौन था साथ में....” इत्यादि इत्यादि प्रश्न.
इन सबके अलावा जो चीज़ उसे सबसे अजीब लग रही थी वो ये कि उसे कुछ भी याद क्यों नहीं है. यहाँ तक की उसे अजोय के घर जाने के बारे में भी कुछ याद नहीं. वो तो अजोय ने उससे जब पूछा की उसके घर से जाने के बाद वो कहाँ गया था और शाम को मिलने क्यों नहीं आया था.. तब कालू को पता चला की वो अजोय के घर गया था और शाम को मिला भी नहीं अपने दोस्तों से.
कालू ने शर्ट के बटन खोल कर अपने सीने पर अभी भी ताज़ा लग रहे उन तीन खरोंचों को देखा.
आश्चर्य..
इनके बारे में भी कुछ याद नहीं उसे.
बस यही समझ पाया की इनमें अब सूजन और दर्द नहीं है.
अगले दिन सुबह आठ बजे अजोय उसके घर आया.
जल्दी ही आया क्योंकि उसे फिर जा कर अपनी दुकान भी खोलनी थी.
कालू अपने कमरे में ही बैठा चाय पी रहा था. दोस्त को आया देख बहुत खुश हुआ और बैठा कर उसे भी चाय बिस्कुट दिया. थोड़ी देर के कुशल क्षेम और इधर उधर की बातचीत के बाद कालू गम्भीर होता हुआ बोला,
“यार, कुछ पूछना है तेरे से... पूछूँ?”
गर्म चाय की एक सिप लेता हुआ अजोय बोला,
“हाँ ... पूछ.”
“यार.... हुआ क्या था?”
होंठों तक चाय के कप को लाते हुए अजोय रुक गया और शंकित लहजे में कालू से पूछा,
“मतलब?”
“मतलब, मेरे साथ क्या हुआ था... मुझे कुछ भी याद क्यों नहीं है? आधे से ज्यादा गाँव वाले, दोस्त, रिश्तेदार, माँ बाबूजी.. सब के सब मुझे घेर कर क्यों खड़े थे? मामला क्या है?”
चाय खत्म कर कप को एक साइड रखते हुए पॉकेट से बीड़ी निकाल कर होंठों के बीच दबाते हुए अजोय पूछा,
“यार एक बात तो मुझे समझ नहीं आ रही और वो यह कि तू सच बोल रहा है या झूठ ... की तुझे कुछ भी याद नहीं. वैसे तू जिस हालत में मिला था, उससे तो तेरी इस बात पे की तुझे कुछ पता नहीं या कुछ भी याद नहीं; पर विश्वास किया जा सकता है.”
“हालत? कैसी हालत?”
कालू उत्सुक हो उठा.
बीड़ी सुलगाते हुए अजोय बोला,
“नंगा!”
कालू समझा नहीं... इसलिए दोबारा पूछा,
“क्या? क्या बोला तू?”
कालू की ओर देख कर अजोय फिर अपनी बात को दोहराया; पर इस बार थोड़ा अच्छे से बोला,
“अबे तू नंगा था... नंगा ! एकदम निर्वस्त्र!... नंगी हालत में गाँव के ताल मैदान में मिला था तू. नंगा तो था ही... साथ ही बुखार से तड़प रहा था... और...”
“और?”
“और धीमे आवाज़ में एक ही बात को बार बार दोहरा रहा था... ‘और चाहिए... और चाहिए’... सबने सुना पर किसी को कुछ भी समझ में नहीं आया. अब ये ‘और क्या चाहिए’ ये तो तू ही बता सकता है. है न?”
व्यंग्य करता हुआ अजोय कालू को तीक्ष्ण दृष्टि से देखा.
कालू तो अजोय की बात सुनकर ही हैरान परेशान हो गया. अभी अभी अजोय ने उसे जो कुछ भी बताया; उनसे वो कुछ भी नहीं समझा... पर कालू के चेहरे पर उमड़ते चिंता के बादल से इतना तो तय है कि कालू वाकई में कुछ नहीं जानता है.
अजोय सामने दीवार घड़ी पर नज़र डाला.
अब उसके उठने का समय हो आया है अतः बीड़ी को जल्दी खत्म कर के उठता हुआ बोला,
“देख भाई, सही गलत, याद आना या नहीं आना बाद की बात है. सबसे पहले तो तू कुछ दिन और आराम कर... ठीक हो जा, हम लोग के साथ चाय दुकान पर बैठना शुरू कर, पहली वाली दिनचर्या शुरू होने दे.. फिर इस बारे में कभी सोचेंगे. ठीक है? अब चलना चाहिए मेरे को. समय हो रहा है.”
कहते हुए अजोय कालू के कंधे पर सहानुभूति से हाथ रखा, फिर पलट कर जाने लगा.
दरवाज़े तक पहुँचा ही था कि कालू ने पीछे से पूछा,
“यार... गोपाल नहीं आया?”
ठीक दरवाज़े के पास जा कर ठिठक कर रुका अजोय; कालू की ओर पीछे मुड़ा और एक मुस्कान लिए बोला,
“वो तो अभी नहीं आ सकता न... सुबह सुबह सबको दूध पहुँचाता है... पर कह रहा था कि तुझसे ज़रूर मिलेगा. उसे भी तेरी बहुत चिंता हो रही थी.”
इतना कह कर अजोय कमरे से निकल गया.
इस समय कालू अजोय का चेहरा नहीं देखा पाया; अन्यथा बड़ी आसानी से बता देता की अजोय ने उससे झूठ बोला.
इधर कालू के घर से निकल कर अजोय अपनी दुकान की ओर साइकिल चलाता कालू के बारे में सोचता हुआ जा रहा था.
अभी कुछ दूर गया ही होगा कि तभी उसे दूर से गोपाल आता दिखा. वो भी अपनी साइकिल पर दूध के बड़े बड़े तीन कैन लिए मस्ती में झूमता हुआ सा चला आ रहा था. सुबह सुबह अपने एक और जिगरी यार को देख कर अजोय बहुत खुश हुआ और साइकिल तेज़ चलाता हुआ आगे बढ़ा.
पर उसके आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा जब उसने देखा की गोपाल न सिर्फ अपनी धुन में उस के आगे आया, अपितु उसके बगल से ऐसे निकल गया मानो अजोय वहाँ है ही नहीं. अजोय की ओर नज़र फेर कर भी नहीं देखा.
अजोय के बिल्कुल बगल से निकल जाने के बाद भी गोपाल के साइकिल के स्पीड में कोई कमी नहीं आई. पहले की ही भांति अपनी ही दुनिया में मग्न वह चला जा रहा था. अजोय पीछे मुड़ कर गोपाल को आवाज़ लगाया ये सोच कर कि अगर गोपाल ने उसे वाकई में नहीं देखा होगा तो कम से कम आवाज़ सुन कर रुक जाएगा.
पर ऐसा हुआ नहीं.
उल्टे ऐसा लगा मानो गोपाल ने अपना स्पीड बढ़ा दिया है.
बंद आँखों से सजग रहते हुए ही उन दृश्यों को समझने का प्रयत्न करता; पर जैसे ही दिमाग पर जरा सा ज़ोर क्या लगाता सिर फिर से दुखने लगता. कुछ टूटे बिखरे से रंगीन दृश्य; जो यदि जरा सा थम जाए या धीमे हो जाए तो तब शायद कुछ समझ पाए कालू... पर.... पर... दृश्य तो जैसे सब खिचड़ी से आते जाते.
बस इतना ही समझ पाया था कालू कि इन दृश्यों का उससे अवश्य कोई सम्बन्ध है अन्यथा वो स्वयं को इन दृश्यों में नहीं पाता.
पर... पर... ये दूसरा व्यक्ति कौन है?
जिन दृश्यों को अपने बंद आँखों से देख रहा है... जिन्हें वो सपना समझ रहा है.... उन सपनों में उसके अलावा कोई और भी है जिसे वो महसूस तो कर पा रहा है पर स्पष्ट देख नहीं पा रहा.
तभी किसी ने उसे ज़ोर से हिलाया, झकझोरा...
एक झटके से उठ बैठा वो.
देखा, उसके आस पास उसे घेरे हुए बहुत लोग हैं; दोस्त हैं, सम्बन्धी हैं, गाँव के कुछ लोग हैं, पड़ोसी हैं, पिताजी बिस्तर पर उसके पास बैठे हुए हैं, माताजी सिरहाने बैठी उसे हाथ वाले पंखे से हवा कर दे रही हैं.
कालू अपनी आँखें मलता हुआ चारों ओर और अच्छे से देखा तो पाया कि वो इस समय अपने कमरे में ही है.
कालू हैरानी से सबको देखने लगा. खास कर माँ की आँखों में आँसू और पिताजी के चेहरे पर गहरी चिंता देख कर उसे बहुत ज्यादा हैरानी हुई. अजोय और गोपाल थोड़ा पास आ कर उसकी ओर झुक कर पूछे,
“कालू... यार... कैसा है तू... क्या हुआ था तुझे?”
उनका ये पूछने भर की देरी थी कि जितने भी लोग वहाँ उपस्थित थे, सब के सब यही प्रश्न एक साथ करने लगे.
गहरी नींद से उठा कालू बेचारा कुछ समझ ही नहीं पा रहा था की गोपाल और अजोय ने उससे क्या पूछा और उसके परिवार जनों के साथ साथ बाकी के लोग भी आखिर उससे क्या जानना चाहते हैं. उसने असमंजस भरी निगाहों से अपने माँ बाबूजी की ओर देखा. दोनों को देख कर ये साफ़ महसूस किया उसने की दोनों अभी अभी किसी गहरी दुष्चिन्ता से बाहर निकले हैं.
उसे घेर कर खड़े लोगों ने फिर से प्रश्नोत्तर का पहला चरण शुरू कर दिया और इसी में पूरा दिन पार हो गया.
शाम को वो घर पर ही रहा.
लोगों के प्रश्नों के बारे में सोचता रहा.
सबके प्रश्न उसे बहुत अटपटे और मजाकिया लग रहे थे.
“तुम्हें क्या हुआ था... कहाँ चले गए थे... ऐसा क्यों हुआ... और कौन था साथ में....” इत्यादि इत्यादि प्रश्न.
इन सबके अलावा जो चीज़ उसे सबसे अजीब लग रही थी वो ये कि उसे कुछ भी याद क्यों नहीं है. यहाँ तक की उसे अजोय के घर जाने के बारे में भी कुछ याद नहीं. वो तो अजोय ने उससे जब पूछा की उसके घर से जाने के बाद वो कहाँ गया था और शाम को मिलने क्यों नहीं आया था.. तब कालू को पता चला की वो अजोय के घर गया था और शाम को मिला भी नहीं अपने दोस्तों से.
कालू ने शर्ट के बटन खोल कर अपने सीने पर अभी भी ताज़ा लग रहे उन तीन खरोंचों को देखा.
आश्चर्य..
इनके बारे में भी कुछ याद नहीं उसे.
बस यही समझ पाया की इनमें अब सूजन और दर्द नहीं है.
अगले दिन सुबह आठ बजे अजोय उसके घर आया.
जल्दी ही आया क्योंकि उसे फिर जा कर अपनी दुकान भी खोलनी थी.
कालू अपने कमरे में ही बैठा चाय पी रहा था. दोस्त को आया देख बहुत खुश हुआ और बैठा कर उसे भी चाय बिस्कुट दिया. थोड़ी देर के कुशल क्षेम और इधर उधर की बातचीत के बाद कालू गम्भीर होता हुआ बोला,
“यार, कुछ पूछना है तेरे से... पूछूँ?”
गर्म चाय की एक सिप लेता हुआ अजोय बोला,
“हाँ ... पूछ.”
“यार.... हुआ क्या था?”
होंठों तक चाय के कप को लाते हुए अजोय रुक गया और शंकित लहजे में कालू से पूछा,
“मतलब?”
“मतलब, मेरे साथ क्या हुआ था... मुझे कुछ भी याद क्यों नहीं है? आधे से ज्यादा गाँव वाले, दोस्त, रिश्तेदार, माँ बाबूजी.. सब के सब मुझे घेर कर क्यों खड़े थे? मामला क्या है?”
चाय खत्म कर कप को एक साइड रखते हुए पॉकेट से बीड़ी निकाल कर होंठों के बीच दबाते हुए अजोय पूछा,
“यार एक बात तो मुझे समझ नहीं आ रही और वो यह कि तू सच बोल रहा है या झूठ ... की तुझे कुछ भी याद नहीं. वैसे तू जिस हालत में मिला था, उससे तो तेरी इस बात पे की तुझे कुछ पता नहीं या कुछ भी याद नहीं; पर विश्वास किया जा सकता है.”
“हालत? कैसी हालत?”
कालू उत्सुक हो उठा.
बीड़ी सुलगाते हुए अजोय बोला,
“नंगा!”
कालू समझा नहीं... इसलिए दोबारा पूछा,
“क्या? क्या बोला तू?”
कालू की ओर देख कर अजोय फिर अपनी बात को दोहराया; पर इस बार थोड़ा अच्छे से बोला,
“अबे तू नंगा था... नंगा ! एकदम निर्वस्त्र!... नंगी हालत में गाँव के ताल मैदान में मिला था तू. नंगा तो था ही... साथ ही बुखार से तड़प रहा था... और...”
“और?”
“और धीमे आवाज़ में एक ही बात को बार बार दोहरा रहा था... ‘और चाहिए... और चाहिए’... सबने सुना पर किसी को कुछ भी समझ में नहीं आया. अब ये ‘और क्या चाहिए’ ये तो तू ही बता सकता है. है न?”
व्यंग्य करता हुआ अजोय कालू को तीक्ष्ण दृष्टि से देखा.
कालू तो अजोय की बात सुनकर ही हैरान परेशान हो गया. अभी अभी अजोय ने उसे जो कुछ भी बताया; उनसे वो कुछ भी नहीं समझा... पर कालू के चेहरे पर उमड़ते चिंता के बादल से इतना तो तय है कि कालू वाकई में कुछ नहीं जानता है.
अजोय सामने दीवार घड़ी पर नज़र डाला.
अब उसके उठने का समय हो आया है अतः बीड़ी को जल्दी खत्म कर के उठता हुआ बोला,
“देख भाई, सही गलत, याद आना या नहीं आना बाद की बात है. सबसे पहले तो तू कुछ दिन और आराम कर... ठीक हो जा, हम लोग के साथ चाय दुकान पर बैठना शुरू कर, पहली वाली दिनचर्या शुरू होने दे.. फिर इस बारे में कभी सोचेंगे. ठीक है? अब चलना चाहिए मेरे को. समय हो रहा है.”
कहते हुए अजोय कालू के कंधे पर सहानुभूति से हाथ रखा, फिर पलट कर जाने लगा.
दरवाज़े तक पहुँचा ही था कि कालू ने पीछे से पूछा,
“यार... गोपाल नहीं आया?”
ठीक दरवाज़े के पास जा कर ठिठक कर रुका अजोय; कालू की ओर पीछे मुड़ा और एक मुस्कान लिए बोला,
“वो तो अभी नहीं आ सकता न... सुबह सुबह सबको दूध पहुँचाता है... पर कह रहा था कि तुझसे ज़रूर मिलेगा. उसे भी तेरी बहुत चिंता हो रही थी.”
इतना कह कर अजोय कमरे से निकल गया.
इस समय कालू अजोय का चेहरा नहीं देखा पाया; अन्यथा बड़ी आसानी से बता देता की अजोय ने उससे झूठ बोला.
इधर कालू के घर से निकल कर अजोय अपनी दुकान की ओर साइकिल चलाता कालू के बारे में सोचता हुआ जा रहा था.
अभी कुछ दूर गया ही होगा कि तभी उसे दूर से गोपाल आता दिखा. वो भी अपनी साइकिल पर दूध के बड़े बड़े तीन कैन लिए मस्ती में झूमता हुआ सा चला आ रहा था. सुबह सुबह अपने एक और जिगरी यार को देख कर अजोय बहुत खुश हुआ और साइकिल तेज़ चलाता हुआ आगे बढ़ा.
पर उसके आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा जब उसने देखा की गोपाल न सिर्फ अपनी धुन में उस के आगे आया, अपितु उसके बगल से ऐसे निकल गया मानो अजोय वहाँ है ही नहीं. अजोय की ओर नज़र फेर कर भी नहीं देखा.
अजोय के बिल्कुल बगल से निकल जाने के बाद भी गोपाल के साइकिल के स्पीड में कोई कमी नहीं आई. पहले की ही भांति अपनी ही दुनिया में मग्न वह चला जा रहा था. अजोय पीछे मुड़ कर गोपाल को आवाज़ लगाया ये सोच कर कि अगर गोपाल ने उसे वाकई में नहीं देखा होगा तो कम से कम आवाज़ सुन कर रुक जाएगा.
पर ऐसा हुआ नहीं.
उल्टे ऐसा लगा मानो गोपाल ने अपना स्पीड बढ़ा दिया है.