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Guest
दो दिन बाद एक शुभ मुहूर्त देख कर बाबा ने एक विशेष अनुष्ठान का शुभारंभ किया.
करना तो वो एक विशेष प्रकार का यज्ञ चाहते थे लेकिन कुछ सोच कर उन्होंने अपने इस अनुष्ठान को एक भिन्न रूप से करने का निश्चय किया.
जप करने के लिए चांदू को साथ बिठाया और स्वयं भी कुछ जपते हुए ध्यान में लीन हो गए.
किसी भी प्रकार की विघ्न – बाधा; विशेषतः यदि वो आसुरिक, तांत्रिक, मांत्रिक या अज्ञात अदृश्य कोई आक्रमण हो तो उनसे लड़ने और उनके उद्देश्यों पर पानी फेरने के लिए बाबा ने हरि को पहरे पर बिठा दिया.
बाबा और हरि ने मिलकर कुटिया को चारों ओर से मंत्रों से पोषित कर दिया था और कुटिया के बाहर बिस्वास जी समेत दस और लोगों को पहरे पर लगा रखा था ताकि कोई आदमी, औरत या जानवर इत्यादि कुटिया के आस पास या बाबा से मिलने की बात कह कर अनुष्ठान में विघ्न न डाले.
और कहीं बिस्वास जी और अन्य साथियों पर कोई ऊपरी शक्ति हावी हो कर किसी प्रकार का हानि न पहुँचाए इसके लिए भी बाबा ने पर्याप्त व्यवस्था कर रखा था.
अनुष्ठान आरम्भ हुआ.
मंत्र जाप भी आरम्भ हुआ.
कुटिया के अंदर बाबा और चांदू से थोड़ी दूरी पर बैठा हरि चौकन्ना हो गया.
कुटिया के बाहर उपस्थित बिस्वास जी और अन्य लोग भी सतर्क और सावधान हो गए.
किसी ऊपरी बला के आ कर उन लोगों को नुकसान पहुँचाए; इस बात का डर तो था उन लोगों में परन्तु बाबा की शक्तियों पर भी उन्हें अगाध विश्वास और श्रद्धा थी.
हरि भी बहुत सतर्क था लेकिन बाहर उपस्थित लोगों के जैसे भयभीत नहीं था.
कई प्रकार की ऊपरी बाधा और शक्तियों से वो पहले भी निपट चुका था. स्वभाव से तो वीर था ही; बाबा के मार्गदर्शन में वह तंत्र - मंत्र विद्या में महारत प्राप्त कर चुका था.
बाबा के सामने पाँच फल रखे हुए थे.
पाँचों ही बिल्कुल ताज़े.
कुछ देर पहले ही पानी से अच्छे से धोया गया थे इन्हें.
जप करते करते बाबा ने ‘हुम’ कर के एक गम्भीर नाद किया.
चांदू के लिए ये एक संकेत था. उसने अपना मंत्रजाप वहीँ रोका और आँखें खोल कर पहले बाबा की ओर देखा जो अब भी आँखें बंद किए जाप किए जा रहे थे. उसने तुरंत सामने रखे फलों में से एक फल उठा लिया और तुरंत उसे चाक़ू से काटा.
फल अंदर से भी ताज़ा ही निकला.
चांदू तनिक निराश हुआ. हरि की ओर देखा.
वो भी निराश हुआ सा लगा.
चांदू को सफ़लता मिलने का पूरा भरोसा था.. पर ऐसा हुआ नहीं.
लेकिन वो भी एकदम निराश नहीं हुआ था. बाबा पर पूरा भरोसा था उसे.
इसलिए तुरंत ही अपने आसन पर पूर्ववत् बैठ गया और मंत्रजाप शुरू कर दिया.
इधर हरि ने भी अपने नेत्रों को मन्त्र से सिंचित कर खिड़की से बाहर की ओर देखा. कहीं कुछ पारलौकिक नज़र नहीं आया.
बिस्वास जी और अन्य लोग किसी भी प्रकार के दुर्घटना या चुनौती के लिए पूरी तरह तत्पर दिख रहे थे.
उस खिड़की से हरि को जितने भी लोग नज़र आए; उन सबको बारी बारी से बहुत अच्छे से देखा.
किसी में भी कुछ भी संदिग्ध नज़र नहीं आया.
किसी बात का संदेह तो बारम्बार हो रहा था हरि को किन्तु जब कहीं कोई ऐसी बात न दिखी जो उसके संदेह को बल देती तब वो स्वयं ही निश्चिन्त हो गया.
इधर बाबा का अनुष्ठान चलता रहा.
तीन से चार घंटे बीत गए.
बाबा और चांदू मंत्रों का जाप करते रहे.
बीच बीच में बाबा के ‘हुम’ करके संकेत करने पर चांदू एक एक कर के फल काटता रहा; लेकिन हरेक फल अंदर से ताज़ा ही निकला.
अंततः बाबा को भी एक निश्चित समय बाद अपना मन्त्र जाप बंद करना पड़ा.
मन्त्र जाप और अनुष्ठान तो पूरा हुआ पर जिस उद्देश्य के लिए किया गया था वो पूरा नहीं हुआ. सभी कटे फलों को बिस्वास जी और उनके अन्य साथियों के बीच बाँट दिया गया.
बिस्वास जी ने बहुत पूछा लेकिन उनको केवल इतना ही बताया गया कि अनुष्ठान पूरा हुआ और कम से कम दो - तीन दिनों के लिए कोई संकट नहीं है इस गाँव पर.
सभी को विदा करने से पहले बाबा ने कुछ आवश्यक दिशा निर्देश दिया और उन दिशा निर्देशों को पूरी सजगता के साथ पालन करने को कहा.
बाबा के दिशा निर्देशों को अपना आदेश मान कर सबने बाबा को प्रणाम किया और अपने अपने घरों की ओर प्रस्थान कर गए.
इधर बाबा अपने स्थान पर विश्राम हेतु बैठे लेकिन बहुत चिंतित दिखाई दे रहे थे.
हरि ने आगे बढ़ कर हाथ जोड़ते हुए बाबा से कहा,
“गुरूदेव?”
“हम्म..”
“कुछ पूछने को जी चाह रहा है.. आपकी आज्ञा हो तो पूछूँ?”
“वैसे तो हमें अनुमान है कि तुम क्या पूछना चाह रहे हो वत्स.. फिर भी हम तुम्ही से सुनना चाहेंगे. पूछो.. क्या पूछना है?”
एक बार फिर बाबा को प्रणाम कर किया हरि ने और फिर पूछा,
“गुरूदेव, क्या आज का अनुष्ठान सच में पूरा हुआ?”
“हाँ.. हुआ. और.. नहीं भी.”
“अर्थात् गुरूदेव?”
“आज के इस अनुष्ठान के दो उद्देश्य थे. एक, अपनी सिद्धियों को पोषित करना. दो, किसी को यहाँ बुलाना.”
“किसे बुलाना चाहते थे आप गुरूदेव?”
“शांतनु और बरखा को.”
एक क्षण रुक कर कुछ सोचते हुए पूछा हरि ने,
“तो.. वो.....”
उसका प्रश्न पूरा होने से पहले ही गुरूदेव ने उत्तर दे दिया,
“नहीं आए, वत्स.”
कहते हुए बाबा थोड़ा निराश दिखे. कदाचित उन्होंने इसमें सफ़लता मिलने की ही आशा की थी.
बाबा के चेहरे पर उभर आए निराशा को देख हरि से रहा नहीं गया, पूछा,
“तो क्या इसका और कोई उपाय नहीं है गुरूदेव?”
“हम्म.. है... अवश्य है. परन्तु अभी हम वो उपाय करेंगे नहीं.”
“क्यों गुरूदेव?”
“क्योंकि इन दोनों या इनमें से किसी एक को भी बुलाना इतना सरल सहज नहीं होगा. आज के अनुष्ठान के दो उद्देश्यों में से एक उद्देश्य शांतनु और बरखा या इन में से कोई एक को अपने पास बुला कर उनसे वार्तालाप करना, प्रश्नोत्तर करना था. पर ऐसा हुआ नहीं... और ऐसा न होने का केवल एक ही कारण है.”
“वो क्या गुरूदेव?”
तनिक रुक कर बाबा बोले,
“कारण ये कि कोई इनको यहाँ मेरे पास आने से रोक रहा है !”
“क्या?!”
“हाँ वत्स, कोई है ऐसा जिनके सामने इनकी एक नहीं चल रही है. वो जो कोई भी है इनसे कई गुणा अधिक शक्तिशाली है और बड़ी सरलता से मेरा इनके साथ किसी भी प्रकार का कोई भी सम्पर्क होने से रोक रहा है.”
“वो कौन है गुरूदेव?”
“अभी इसका पता नहीं चला है वत्स. पता कर सकता था यदि मैं इस बात के लिए भी तैयार रहता. परन्तु ऐसा कुछ होगा इसका तो मुझे रत्ती भर का आभास नहीं था.”
ये सुनकर हरि को बहुत निराशा हुई. चांदू को भी.
बाबा ने और कुछ नहीं कहा क्योंकि उनके मन में भी कई विचार एक साथ उमड़ घुमड़ कर रहे थे.
कुछ समय और बीता.
अचानक चांदू को कुछ याद आया और तुरंत बाबा के पास आकर पूछा,
“गुरूदेव.. मुझे भी कुछ पूछना है.”
“पूछो वत्स.”
“गुरूदेव.. ये चामुंडी कौन है?”
प्रश्न सुनते ही हरि भी बाबा के सामने चांदू के पास आ कर बैठ गया.
दोनों का कौतुक देख बाबा मुस्कराए.
बोले,
“बहुत शक्तिशाली होती है ये चामुंडी.. इनसे पार पाना हर किसी के बस की बात नहीं. इनसे या तो बहुत ही उच्च कोटि का सिद्ध पुरुष या सिद्ध साधक ही जीत सकता है या फिर ईश्वर का कोई विशेष कृपा प्राप्त व्यक्ति.”
“ओह.. ऐसा?! ये तो इसी से पता चलता है कि ये कितनी खतरनाक है.”
“ह्म्म्म.”
“पर गुरूदेव... ये आखिर है कौन?”
बाबा मुस्कराए.. पर स्वेच्छा से नहीं... ये इस बात का संकेत था कि अब बाबा जो बोलने जा रहे हैं वो अप्रत्याशित होगा. क्षणमात्र में उनका चेहरा पहले से भी अधिक गम्भीर हो गया.
गम्भीर आवाज़ में ही बोले,
“रानी चुड़ैल!”
सुनते ही दोनों शिष्य अपने स्थान पर बैठे बैठे ही उछल पड़े.
बाबा का ये उत्तर वाकई काफ़ी अप्रत्याशित था.
दोनों को ही अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ कि उन्होंने अभी अभी जो सुना.. वो क्या सच में सुना या फिर अत्यधिक उत्तेजना व उत्सुकता में उन्हें कोई भ्रम हुआ?
लगभग एक साथ ही दोनों का मुँह खुला,
“क्या?? कौन??!!”
“रानी चुड़ैल!” बाबा ने धिरगंभीर स्वर में फिर कहा
करना तो वो एक विशेष प्रकार का यज्ञ चाहते थे लेकिन कुछ सोच कर उन्होंने अपने इस अनुष्ठान को एक भिन्न रूप से करने का निश्चय किया.
जप करने के लिए चांदू को साथ बिठाया और स्वयं भी कुछ जपते हुए ध्यान में लीन हो गए.
किसी भी प्रकार की विघ्न – बाधा; विशेषतः यदि वो आसुरिक, तांत्रिक, मांत्रिक या अज्ञात अदृश्य कोई आक्रमण हो तो उनसे लड़ने और उनके उद्देश्यों पर पानी फेरने के लिए बाबा ने हरि को पहरे पर बिठा दिया.
बाबा और हरि ने मिलकर कुटिया को चारों ओर से मंत्रों से पोषित कर दिया था और कुटिया के बाहर बिस्वास जी समेत दस और लोगों को पहरे पर लगा रखा था ताकि कोई आदमी, औरत या जानवर इत्यादि कुटिया के आस पास या बाबा से मिलने की बात कह कर अनुष्ठान में विघ्न न डाले.
और कहीं बिस्वास जी और अन्य साथियों पर कोई ऊपरी शक्ति हावी हो कर किसी प्रकार का हानि न पहुँचाए इसके लिए भी बाबा ने पर्याप्त व्यवस्था कर रखा था.
अनुष्ठान आरम्भ हुआ.
मंत्र जाप भी आरम्भ हुआ.
कुटिया के अंदर बाबा और चांदू से थोड़ी दूरी पर बैठा हरि चौकन्ना हो गया.
कुटिया के बाहर उपस्थित बिस्वास जी और अन्य लोग भी सतर्क और सावधान हो गए.
किसी ऊपरी बला के आ कर उन लोगों को नुकसान पहुँचाए; इस बात का डर तो था उन लोगों में परन्तु बाबा की शक्तियों पर भी उन्हें अगाध विश्वास और श्रद्धा थी.
हरि भी बहुत सतर्क था लेकिन बाहर उपस्थित लोगों के जैसे भयभीत नहीं था.
कई प्रकार की ऊपरी बाधा और शक्तियों से वो पहले भी निपट चुका था. स्वभाव से तो वीर था ही; बाबा के मार्गदर्शन में वह तंत्र - मंत्र विद्या में महारत प्राप्त कर चुका था.
बाबा के सामने पाँच फल रखे हुए थे.
पाँचों ही बिल्कुल ताज़े.
कुछ देर पहले ही पानी से अच्छे से धोया गया थे इन्हें.
जप करते करते बाबा ने ‘हुम’ कर के एक गम्भीर नाद किया.
चांदू के लिए ये एक संकेत था. उसने अपना मंत्रजाप वहीँ रोका और आँखें खोल कर पहले बाबा की ओर देखा जो अब भी आँखें बंद किए जाप किए जा रहे थे. उसने तुरंत सामने रखे फलों में से एक फल उठा लिया और तुरंत उसे चाक़ू से काटा.
फल अंदर से भी ताज़ा ही निकला.
चांदू तनिक निराश हुआ. हरि की ओर देखा.
वो भी निराश हुआ सा लगा.
चांदू को सफ़लता मिलने का पूरा भरोसा था.. पर ऐसा हुआ नहीं.
लेकिन वो भी एकदम निराश नहीं हुआ था. बाबा पर पूरा भरोसा था उसे.
इसलिए तुरंत ही अपने आसन पर पूर्ववत् बैठ गया और मंत्रजाप शुरू कर दिया.
इधर हरि ने भी अपने नेत्रों को मन्त्र से सिंचित कर खिड़की से बाहर की ओर देखा. कहीं कुछ पारलौकिक नज़र नहीं आया.
बिस्वास जी और अन्य लोग किसी भी प्रकार के दुर्घटना या चुनौती के लिए पूरी तरह तत्पर दिख रहे थे.
उस खिड़की से हरि को जितने भी लोग नज़र आए; उन सबको बारी बारी से बहुत अच्छे से देखा.
किसी में भी कुछ भी संदिग्ध नज़र नहीं आया.
किसी बात का संदेह तो बारम्बार हो रहा था हरि को किन्तु जब कहीं कोई ऐसी बात न दिखी जो उसके संदेह को बल देती तब वो स्वयं ही निश्चिन्त हो गया.
इधर बाबा का अनुष्ठान चलता रहा.
तीन से चार घंटे बीत गए.
बाबा और चांदू मंत्रों का जाप करते रहे.
बीच बीच में बाबा के ‘हुम’ करके संकेत करने पर चांदू एक एक कर के फल काटता रहा; लेकिन हरेक फल अंदर से ताज़ा ही निकला.
अंततः बाबा को भी एक निश्चित समय बाद अपना मन्त्र जाप बंद करना पड़ा.
मन्त्र जाप और अनुष्ठान तो पूरा हुआ पर जिस उद्देश्य के लिए किया गया था वो पूरा नहीं हुआ. सभी कटे फलों को बिस्वास जी और उनके अन्य साथियों के बीच बाँट दिया गया.
बिस्वास जी ने बहुत पूछा लेकिन उनको केवल इतना ही बताया गया कि अनुष्ठान पूरा हुआ और कम से कम दो - तीन दिनों के लिए कोई संकट नहीं है इस गाँव पर.
सभी को विदा करने से पहले बाबा ने कुछ आवश्यक दिशा निर्देश दिया और उन दिशा निर्देशों को पूरी सजगता के साथ पालन करने को कहा.
बाबा के दिशा निर्देशों को अपना आदेश मान कर सबने बाबा को प्रणाम किया और अपने अपने घरों की ओर प्रस्थान कर गए.
इधर बाबा अपने स्थान पर विश्राम हेतु बैठे लेकिन बहुत चिंतित दिखाई दे रहे थे.
हरि ने आगे बढ़ कर हाथ जोड़ते हुए बाबा से कहा,
“गुरूदेव?”
“हम्म..”
“कुछ पूछने को जी चाह रहा है.. आपकी आज्ञा हो तो पूछूँ?”
“वैसे तो हमें अनुमान है कि तुम क्या पूछना चाह रहे हो वत्स.. फिर भी हम तुम्ही से सुनना चाहेंगे. पूछो.. क्या पूछना है?”
एक बार फिर बाबा को प्रणाम कर किया हरि ने और फिर पूछा,
“गुरूदेव, क्या आज का अनुष्ठान सच में पूरा हुआ?”
“हाँ.. हुआ. और.. नहीं भी.”
“अर्थात् गुरूदेव?”
“आज के इस अनुष्ठान के दो उद्देश्य थे. एक, अपनी सिद्धियों को पोषित करना. दो, किसी को यहाँ बुलाना.”
“किसे बुलाना चाहते थे आप गुरूदेव?”
“शांतनु और बरखा को.”
एक क्षण रुक कर कुछ सोचते हुए पूछा हरि ने,
“तो.. वो.....”
उसका प्रश्न पूरा होने से पहले ही गुरूदेव ने उत्तर दे दिया,
“नहीं आए, वत्स.”
कहते हुए बाबा थोड़ा निराश दिखे. कदाचित उन्होंने इसमें सफ़लता मिलने की ही आशा की थी.
बाबा के चेहरे पर उभर आए निराशा को देख हरि से रहा नहीं गया, पूछा,
“तो क्या इसका और कोई उपाय नहीं है गुरूदेव?”
“हम्म.. है... अवश्य है. परन्तु अभी हम वो उपाय करेंगे नहीं.”
“क्यों गुरूदेव?”
“क्योंकि इन दोनों या इनमें से किसी एक को भी बुलाना इतना सरल सहज नहीं होगा. आज के अनुष्ठान के दो उद्देश्यों में से एक उद्देश्य शांतनु और बरखा या इन में से कोई एक को अपने पास बुला कर उनसे वार्तालाप करना, प्रश्नोत्तर करना था. पर ऐसा हुआ नहीं... और ऐसा न होने का केवल एक ही कारण है.”
“वो क्या गुरूदेव?”
तनिक रुक कर बाबा बोले,
“कारण ये कि कोई इनको यहाँ मेरे पास आने से रोक रहा है !”
“क्या?!”
“हाँ वत्स, कोई है ऐसा जिनके सामने इनकी एक नहीं चल रही है. वो जो कोई भी है इनसे कई गुणा अधिक शक्तिशाली है और बड़ी सरलता से मेरा इनके साथ किसी भी प्रकार का कोई भी सम्पर्क होने से रोक रहा है.”
“वो कौन है गुरूदेव?”
“अभी इसका पता नहीं चला है वत्स. पता कर सकता था यदि मैं इस बात के लिए भी तैयार रहता. परन्तु ऐसा कुछ होगा इसका तो मुझे रत्ती भर का आभास नहीं था.”
ये सुनकर हरि को बहुत निराशा हुई. चांदू को भी.
बाबा ने और कुछ नहीं कहा क्योंकि उनके मन में भी कई विचार एक साथ उमड़ घुमड़ कर रहे थे.
कुछ समय और बीता.
अचानक चांदू को कुछ याद आया और तुरंत बाबा के पास आकर पूछा,
“गुरूदेव.. मुझे भी कुछ पूछना है.”
“पूछो वत्स.”
“गुरूदेव.. ये चामुंडी कौन है?”
प्रश्न सुनते ही हरि भी बाबा के सामने चांदू के पास आ कर बैठ गया.
दोनों का कौतुक देख बाबा मुस्कराए.
बोले,
“बहुत शक्तिशाली होती है ये चामुंडी.. इनसे पार पाना हर किसी के बस की बात नहीं. इनसे या तो बहुत ही उच्च कोटि का सिद्ध पुरुष या सिद्ध साधक ही जीत सकता है या फिर ईश्वर का कोई विशेष कृपा प्राप्त व्यक्ति.”
“ओह.. ऐसा?! ये तो इसी से पता चलता है कि ये कितनी खतरनाक है.”
“ह्म्म्म.”
“पर गुरूदेव... ये आखिर है कौन?”
बाबा मुस्कराए.. पर स्वेच्छा से नहीं... ये इस बात का संकेत था कि अब बाबा जो बोलने जा रहे हैं वो अप्रत्याशित होगा. क्षणमात्र में उनका चेहरा पहले से भी अधिक गम्भीर हो गया.
गम्भीर आवाज़ में ही बोले,
“रानी चुड़ैल!”
सुनते ही दोनों शिष्य अपने स्थान पर बैठे बैठे ही उछल पड़े.
बाबा का ये उत्तर वाकई काफ़ी अप्रत्याशित था.
दोनों को ही अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ कि उन्होंने अभी अभी जो सुना.. वो क्या सच में सुना या फिर अत्यधिक उत्तेजना व उत्सुकता में उन्हें कोई भ्रम हुआ?
लगभग एक साथ ही दोनों का मुँह खुला,
“क्या?? कौन??!!”
“रानी चुड़ैल!” बाबा ने धिरगंभीर स्वर में फिर कहा