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Horror चामुंडी

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दो दिन बाद एक शुभ मुहूर्त देख कर बाबा ने एक विशेष अनुष्ठान का शुभारंभ किया.

करना तो वो एक विशेष प्रकार का यज्ञ चाहते थे लेकिन कुछ सोच कर उन्होंने अपने इस अनुष्ठान को एक भिन्न रूप से करने का निश्चय किया.

जप करने के लिए चांदू को साथ बिठाया और स्वयं भी कुछ जपते हुए ध्यान में लीन हो गए.

किसी भी प्रकार की विघ्न – बाधा; विशेषतः यदि वो आसुरिक, तांत्रिक, मांत्रिक या अज्ञात अदृश्य कोई आक्रमण हो तो उनसे लड़ने और उनके उद्देश्यों पर पानी फेरने के लिए बाबा ने हरि को पहरे पर बिठा दिया.

बाबा और हरि ने मिलकर कुटिया को चारों ओर से मंत्रों से पोषित कर दिया था और कुटिया के बाहर बिस्वास जी समेत दस और लोगों को पहरे पर लगा रखा था ताकि कोई आदमी, औरत या जानवर इत्यादि कुटिया के आस पास या बाबा से मिलने की बात कह कर अनुष्ठान में विघ्न न डाले.

और कहीं बिस्वास जी और अन्य साथियों पर कोई ऊपरी शक्ति हावी हो कर किसी प्रकार का हानि न पहुँचाए इसके लिए भी बाबा ने पर्याप्त व्यवस्था कर रखा था.

अनुष्ठान आरम्भ हुआ.

मंत्र जाप भी आरम्भ हुआ.

कुटिया के अंदर बाबा और चांदू से थोड़ी दूरी पर बैठा हरि चौकन्ना हो गया.

कुटिया के बाहर उपस्थित बिस्वास जी और अन्य लोग भी सतर्क और सावधान हो गए.

किसी ऊपरी बला के आ कर उन लोगों को नुकसान पहुँचाए; इस बात का डर तो था उन लोगों में परन्तु बाबा की शक्तियों पर भी उन्हें अगाध विश्वास और श्रद्धा थी.

हरि भी बहुत सतर्क था लेकिन बाहर उपस्थित लोगों के जैसे भयभीत नहीं था.

कई प्रकार की ऊपरी बाधा और शक्तियों से वो पहले भी निपट चुका था. स्वभाव से तो वीर था ही; बाबा के मार्गदर्शन में वह तंत्र - मंत्र विद्या में महारत प्राप्त कर चुका था.

बाबा के सामने पाँच फल रखे हुए थे.

पाँचों ही बिल्कुल ताज़े.

कुछ देर पहले ही पानी से अच्छे से धोया गया थे इन्हें.

जप करते करते बाबा ने ‘हुम’ कर के एक गम्भीर नाद किया.

चांदू के लिए ये एक संकेत था. उसने अपना मंत्रजाप वहीँ रोका और आँखें खोल कर पहले बाबा की ओर देखा जो अब भी आँखें बंद किए जाप किए जा रहे थे. उसने तुरंत सामने रखे फलों में से एक फल उठा लिया और तुरंत उसे चाक़ू से काटा.

फल अंदर से भी ताज़ा ही निकला.

चांदू तनिक निराश हुआ. हरि की ओर देखा.

वो भी निराश हुआ सा लगा.

चांदू को सफ़लता मिलने का पूरा भरोसा था.. पर ऐसा हुआ नहीं.

लेकिन वो भी एकदम निराश नहीं हुआ था. बाबा पर पूरा भरोसा था उसे.

इसलिए तुरंत ही अपने आसन पर पूर्ववत् बैठ गया और मंत्रजाप शुरू कर दिया.

इधर हरि ने भी अपने नेत्रों को मन्त्र से सिंचित कर खिड़की से बाहर की ओर देखा. कहीं कुछ पारलौकिक नज़र नहीं आया.

बिस्वास जी और अन्य लोग किसी भी प्रकार के दुर्घटना या चुनौती के लिए पूरी तरह तत्पर दिख रहे थे.

उस खिड़की से हरि को जितने भी लोग नज़र आए; उन सबको बारी बारी से बहुत अच्छे से देखा.

किसी में भी कुछ भी संदिग्ध नज़र नहीं आया.

किसी बात का संदेह तो बारम्बार हो रहा था हरि को किन्तु जब कहीं कोई ऐसी बात न दिखी जो उसके संदेह को बल देती तब वो स्वयं ही निश्चिन्त हो गया.

इधर बाबा का अनुष्ठान चलता रहा.

तीन से चार घंटे बीत गए.

बाबा और चांदू मंत्रों का जाप करते रहे.

बीच बीच में बाबा के ‘हुम’ करके संकेत करने पर चांदू एक एक कर के फल काटता रहा; लेकिन हरेक फल अंदर से ताज़ा ही निकला.

अंततः बाबा को भी एक निश्चित समय बाद अपना मन्त्र जाप बंद करना पड़ा.

मन्त्र जाप और अनुष्ठान तो पूरा हुआ पर जिस उद्देश्य के लिए किया गया था वो पूरा नहीं हुआ. सभी कटे फलों को बिस्वास जी और उनके अन्य साथियों के बीच बाँट दिया गया.

बिस्वास जी ने बहुत पूछा लेकिन उनको केवल इतना ही बताया गया कि अनुष्ठान पूरा हुआ और कम से कम दो - तीन दिनों के लिए कोई संकट नहीं है इस गाँव पर.

सभी को विदा करने से पहले बाबा ने कुछ आवश्यक दिशा निर्देश दिया और उन दिशा निर्देशों को पूरी सजगता के साथ पालन करने को कहा.

बाबा के दिशा निर्देशों को अपना आदेश मान कर सबने बाबा को प्रणाम किया और अपने अपने घरों की ओर प्रस्थान कर गए.

इधर बाबा अपने स्थान पर विश्राम हेतु बैठे लेकिन बहुत चिंतित दिखाई दे रहे थे.

हरि ने आगे बढ़ कर हाथ जोड़ते हुए बाबा से कहा,

“गुरूदेव?”

“हम्म..”

“कुछ पूछने को जी चाह रहा है.. आपकी आज्ञा हो तो पूछूँ?”

“वैसे तो हमें अनुमान है कि तुम क्या पूछना चाह रहे हो वत्स.. फिर भी हम तुम्ही से सुनना चाहेंगे. पूछो.. क्या पूछना है?”

एक बार फिर बाबा को प्रणाम कर किया हरि ने और फिर पूछा,

“गुरूदेव, क्या आज का अनुष्ठान सच में पूरा हुआ?”

“हाँ.. हुआ. और.. नहीं भी.”

“अर्थात् गुरूदेव?”

“आज के इस अनुष्ठान के दो उद्देश्य थे. एक, अपनी सिद्धियों को पोषित करना. दो, किसी को यहाँ बुलाना.”

“किसे बुलाना चाहते थे आप गुरूदेव?”

“शांतनु और बरखा को.”

एक क्षण रुक कर कुछ सोचते हुए पूछा हरि ने,

“तो.. वो.....”

उसका प्रश्न पूरा होने से पहले ही गुरूदेव ने उत्तर दे दिया,

“नहीं आए, वत्स.”

कहते हुए बाबा थोड़ा निराश दिखे. कदाचित उन्होंने इसमें सफ़लता मिलने की ही आशा की थी.

बाबा के चेहरे पर उभर आए निराशा को देख हरि से रहा नहीं गया, पूछा,

“तो क्या इसका और कोई उपाय नहीं है गुरूदेव?”

“हम्म.. है... अवश्य है. परन्तु अभी हम वो उपाय करेंगे नहीं.”

“क्यों गुरूदेव?”

“क्योंकि इन दोनों या इनमें से किसी एक को भी बुलाना इतना सरल सहज नहीं होगा. आज के अनुष्ठान के दो उद्देश्यों में से एक उद्देश्य शांतनु और बरखा या इन में से कोई एक को अपने पास बुला कर उनसे वार्तालाप करना, प्रश्नोत्तर करना था. पर ऐसा हुआ नहीं... और ऐसा न होने का केवल एक ही कारण है.”

“वो क्या गुरूदेव?”

तनिक रुक कर बाबा बोले,

“कारण ये कि कोई इनको यहाँ मेरे पास आने से रोक रहा है !”

“क्या?!”

“हाँ वत्स, कोई है ऐसा जिनके सामने इनकी एक नहीं चल रही है. वो जो कोई भी है इनसे कई गुणा अधिक शक्तिशाली है और बड़ी सरलता से मेरा इनके साथ किसी भी प्रकार का कोई भी सम्पर्क होने से रोक रहा है.”

“वो कौन है गुरूदेव?”

“अभी इसका पता नहीं चला है वत्स. पता कर सकता था यदि मैं इस बात के लिए भी तैयार रहता. परन्तु ऐसा कुछ होगा इसका तो मुझे रत्ती भर का आभास नहीं था.”

ये सुनकर हरि को बहुत निराशा हुई. चांदू को भी.

बाबा ने और कुछ नहीं कहा क्योंकि उनके मन में भी कई विचार एक साथ उमड़ घुमड़ कर रहे थे.

कुछ समय और बीता.

अचानक चांदू को कुछ याद आया और तुरंत बाबा के पास आकर पूछा,

“गुरूदेव.. मुझे भी कुछ पूछना है.”

“पूछो वत्स.”

“गुरूदेव.. ये चामुंडी कौन है?”

प्रश्न सुनते ही हरि भी बाबा के सामने चांदू के पास आ कर बैठ गया.

दोनों का कौतुक देख बाबा मुस्कराए.

बोले,

“बहुत शक्तिशाली होती है ये चामुंडी.. इनसे पार पाना हर किसी के बस की बात नहीं. इनसे या तो बहुत ही उच्च कोटि का सिद्ध पुरुष या सिद्ध साधक ही जीत सकता है या फिर ईश्वर का कोई विशेष कृपा प्राप्त व्यक्ति.”

“ओह.. ऐसा?! ये तो इसी से पता चलता है कि ये कितनी खतरनाक है.”

“ह्म्म्म.”

“पर गुरूदेव... ये आखिर है कौन?”

बाबा मुस्कराए.. पर स्वेच्छा से नहीं... ये इस बात का संकेत था कि अब बाबा जो बोलने जा रहे हैं वो अप्रत्याशित होगा. क्षणमात्र में उनका चेहरा पहले से भी अधिक गम्भीर हो गया.

गम्भीर आवाज़ में ही बोले,

“रानी चुड़ैल!”

सुनते ही दोनों शिष्य अपने स्थान पर बैठे बैठे ही उछल पड़े.

बाबा का ये उत्तर वाकई काफ़ी अप्रत्याशित था.

दोनों को ही अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ कि उन्होंने अभी अभी जो सुना.. वो क्या सच में सुना या फिर अत्यधिक उत्तेजना व उत्सुकता में उन्हें कोई भ्रम हुआ?

लगभग एक साथ ही दोनों का मुँह खुला,

“क्या?? कौन??!!”

“रानी चुड़ैल!” बाबा ने धिरगंभीर स्वर में फिर कहा
 
१३

इधर पुलिस स्टेशन में :

“जी सर.. श्योर सर. बिल्कुल होगा. सर, मैं उसी काम में लगा हुआ हूँ.”

इसी तरह कुछ और बातें करने के बाद इंस्पेक्टर भटाचार्य ने फ़ोन क्रेडल पर रखा.

एक लंबी साँस छोड़ते हुए कुर्सी पर बैठ गया. पास रखी ग्लास से पानी पिया. दो कागजों पर साईन किया. थोड़ा ठहर कर बेल बजाया.

बेल के बजते ही श्यामाप्रसाद तुरंत कमरे में आया,

“यस सर.”

“काम कैसा चल रहा है श्याम?”

“अ.. सब ठीक है सर.”

“हम्म.. अच्छा, मैं पूछ रहा था कि गाँव के केस का क्या हुआ?”

“गाँव...?”

“अरे वही जतिंद्र, बिपिन काका इत्यादि वाला मामला... क्या हुआ उसका?”

“अम..स..सर... जाँच तो अभी चल ही रही है.”

“क्या... अभी भी...? श्याम... करीब डेढ़ महीना खत्म होने को आया और तुम कह रहे हो जाँच अभी भी चल रही है?”

श्याम ने सिर झुका लिया. वाकई लज्जित था वो.

सीरियस होते हुए भटाचार्य ने पूछा,

“बात क्या है श्याम... जाँच अगर अभी भी चल रही है तो फिर उसका कोई प्रोग्रेस रिपोर्ट ही दे दो.”

“ज..जी सर... प्रोग्रेस तो है. व..”

“हम्म.. क्या प्रोग्रेस है बोलो?”

“सर, अभी तक के जाँच में इतना स्पष्ट हो गया है कि जतिंद्र की हत्या में किसी मर्द का हाथ नहीं है; मतलब, हमने जिन लोगों पर संदेह किया था, उनमें जितने भी पुरुष थे सब के सब निर्दोष प्रतीत हो रहे हैं.”

“हम्म.. तो क्या ये फाइनल है?”

“सर, फाइनल के बारे में अभी कहना थोड़ा जल्दबाजी होगा. परन्तु प्रथम दृष्ट्या तो ऐसा ही लगता है.”

“ओके.. तो इसका मतलब हुआ की महिलाओं; सुचित्रा और रेणुका, ये दोनों संदेह के घेरे में अब भी हैं?”

“यस सर.”

“ओके.. तो फिर देर किस बात की. दोनों को फिर बुलाओ थाने. कड़ाई से पूछताछ करो. खुद ही सब उगल देंगी.”

“सर..”

“क्या?”

“यहीं पर एक छोटा सा प्रॉब्लम आ गया है.”

“प्रॉब्लम?!! कैसी प्रॉब्लम?”

“सर.. हमारे खबरी के अनुसार, सुरेंद्रनाथ की बीवी निरुपमा के भी लाल बाल हैं.. थोड़ा शेड लिए हुए.”

“मेहँदी?”

“जी सर.”

“तो? बालों को तो रंगा ही जा सकता है. गैर कानूनी नहीं है.”

“जी सर. गैर कानूनी नहीं है.”

“तो फिर?”

“सर, खबरी के अनुसार, वारदातों वाले स्थानों के आस पास उसे भी देखा गया है.”

“व्हाट?!!”

“जी सर.”

“त... तो क्या वो भी.....”

“सर, यहीं एक और पेंच है. निरुपमा को उन स्थानों पर देखा तो गया है पर उसकी उपस्थिति के समय से वारदात के समय से ठीक मेल नहीं खा रहे हैं.”

अब इस बात ने भटाचार्य का दिमाग और भी घूमा दिया. श्याम की ओर एकटक देखते हुए पूछा,

“आर यू श्योर?”

श्याम ने भी उतनी ही तत्परता से उत्तर दिया,

“यस सर.”

“ओह.. खबरी ने ठीक से पता किया है सब?”

“जी सर. खबरी अभी भी इसी काम में लगा हुआ है.”

“ओके. ओके... और कोई नयी बात?”

“हाँ सर. गाँव में कोई बाबा आया है. गाँव वालों ने ही बुलाया है. उन लोगों का मानना है कि गाँव में ये सब जो कुछ हो रहा है; किसी ऊपरी बला का काम है और इन सब से कोई अत्यंत सिद्ध साधक ही उन लोगों का व इस गाँव का उद्धार कर सकता है.”

भटाचार्य धीरे से हल्का हँसा.. बोला,

“गाँव वालों की तो बात ही अलग है. क्या लगता है तुम्हें, कैसा है ये बाबा? ढोंगी? या सच में कोई चमत्कार दिखा सकता है??”

“सर, मैंने पूछा था खबरी से इस बारे में, उसके अनुसार बाबा वाकई बड़ा सिद्धहस्त ज्ञात होता है. स्वभाव भी काफी अच्छा है. सबसे बड़ी आत्मीयता से बात करते हैं. गाँव आए उनको यही कुछ पंद्रह दिन के आस पास हो गए और इतने ही दिनों में कईयों के दुःख दर्द को दूर किया है उन्होंने.”

“हम्म.. तुम्हारी बातों से लगता है तुम भी उन पर विश्वास करते हो.”

भटाचार्य ने हँसते हुए व्यंग्य किया.

उत्तर में श्याम चुप रहा.

मुस्करा कर सिर नीचे कर लिया.

भटाचार्य को और भी कई काम करने थे इसलिए श्याम को जाने को कहा ये निर्देश देते हुए कि जाँच के काम में तेज़ी लाए और जल्द से जल्द प्रोग्रेस की हर खबर उन तक पहुँचाए.

श्याम के जाते ही भटाचार्य दोबारा सामने पड़ी फाइल को उठा कर देखने लगा.
 
१४

बाबा अपने दोनों शिष्यों को समझा रहे थे..

“हाँ वत्स.. ये जो शक्ति है ये बहुत ही शक्तिशाली होती है. साफ़ शब्दों में कहा जाए तो महाशक्तिशाली होती है ये. इनसे टक्कर ले पाना या लेना आत्मघात के समान होता है. दुष्ट व काली शक्तियों की प्रधान देवियों में से एक होती है ये चामुंडी. हर कोई इनकी साधना नहीं करता है... क्योंकि हर कोई इनकी साधना कर ही नहीं सकता. इन्हें प्रसन्न करने का मार्ग व उपाय बड़ा विषम और दुष्कर है... और यदि इन्हें प्रसन्न कर लिया गया तो समझो आधी से अधिक काली शक्तियाँ तुम्हारे इशारों पर नाचने के लिए तत्पर रहेंगी सदा. उन शक्तियों से कोई भी साधक – साधिका दुनिया की कोई भी कार्य कर और करवा सकती है. चामुंडी सिद्ध साधक – साधिका अजेय तो नहीं पर कम से कम इतना दम ज़रूर रखते हैं की कोई भी उन्हें सरलता से नहीं हरा पाए.”

बाबा के मुँह से ऐसी बातें सुन कर हरि और चांदू का तो जैसे मन ही मर गया.

अभी कुछ देर पहले तक दोनों यही सोच रहे थे कि अपराधी को शीघ्र से शीघ्र पकड़ कर गाँव को आंतक व विपदा से मुक्त कर लेंगे परन्तु यहाँ तो मामला ही कुछ टेढ़ी खीर वाला निकला.

दोनों शिष्यों के मनोभावों को समझने में बाबा को देर न लगी.

मुस्करा कर बोले,

“चिंता न करो वत्स.. मन छोटा न करो....”

चांदू अधीरता के कारण बीच में ही बोल पड़ा,

“चिंता कैसे न करें गुरूदेव. आपने बात ही ऐसी कह दी. एक तो ऐसे साधक और शक्ति अजेय होती हैं और ऊपर से यदि इनसे टकराते समय आपको कुछ हो गया तो?”

“हा हा हा. तुम्हारी ये चिंता अच्छी लगी चांदू और ये उचित भी है. पर लगता है अत्यधिक चिंता में तुमने मेरे अंतिम वाक्य पे गौर नहीं किया.”

चांदू असमंजस वाली दृष्टि से बाबा को देखने लगा.

बाबा ने कहा,

“वत्स, मैंने कहा की ‘चामुंडी सिद्ध साधक – साधिका अजेय तो नहीं पर कम से कम इतना दम ज़रूर रखते हैं की कोई भी उन्हें सरलता से नहीं हरा पाए’ इसका अर्थ ये हुआ कि इन्हें हराया जा सकता है. इन्हें हराने के लिए विशेष मंत्र तंत्र की आवश्यकता होती है जो हर कोई नहीं जानता है और न ही अधिकांश लोग जानने का ही प्रयास करते हैं.”

“अर्थात् आप इन्हें हरा सकते हैं?”

“बिल्कुल.”

“अर्थात् आप इन्हें हराने का उपाय जानते हैं?”

चांदू की इस बात पर बाबा ज़ोर से हँस पड़े,

“हा हा हा हा हा हा... वत्स.. अगर नहीं जानता तो ये कहता ही क्यों की मैं इन्हें हरा सकता हूँ. हा हा हा.”

चांदू अपने इस बेवकूफी वाले प्रश्न पर स्वयं बड़ा लज्जित हुआ.

हरि भी चांदू के इस तरह के व्यवहार पर हँसने से स्वयं को रोक न सका.

कुटिया में वातावरण इसी बहाने थोड़ा हल्का हो गया.

बाबा भी हँस-मुस्करा रहे थे... पर अंदर ही अंदर इस बात से भी चिंतित थे कि चामुंडी शांत नहीं बैठी होगी. शांतनु और बरखा के आत्माओं के संग अपने अगले शिकार की तलाश में होगी!

१५

एक दिन श्याम सुबह सुबह... भटाचार्य के थाने आते ही उसके सामने जा कर उपस्थित हो गया.

चेयर पर आराम से बैठते हुए भटाचार्य ने बड़े इत्दुर्गान से पूछा,

“क्या बात है श्याम? कुछ विशेष है??”

“जी सर... ए..एक टिप मिली है.”

“टिप.. कैसी टिप?”

“जतिंद्र मर्डर केस में, सर.”

“खबरी से??”

“जी सर.”

“पक्की है न?”

भटाचार्य ने सीरियस होते हुए पूछा.

श्याम ने भी उतनी ही तत्परता से उत्तर दिया,

“जी सर... और अगर खबर पूरी तरह से गलत न भी हुआ तो भी हमें इससे बहुत इम्पोर्टेन्ट लीड मिल सकती है.”

“हम्म.. दैट्स वैरी गुड.”

“थैंक्यू सर.”

“तो.. क्या कहते हो.. चलना है अभी?”

“सर, अगर आप अभी फ्री हों तो...”

“हम्म... मैं भी वही सोच रहा था. अच्छा, एक बात बताओ.. जा कर जाँच पड़ताल करनी है या उठा कर लाना है.”

“सर, मैं तो सोच रहा था की सीधे उठा कर ही ले आएँ. लेकिन ऐसा होना....”

“क्यों नहीं हो सकता... एक काम करो, तुम जाओ... साथ में ५-६ साथियों को ले जाओ. और जिसको लाना है, ले आओ... पूछताछ के नाम पर. वैसे कोई कुछ कहेगा नहीं पर अगर कोई पूछे तो कहना ऊपर से आर्डर आया है... समझे?”

“यस सर.”

“गुड.. अब जाओ. गुड लक.”

“थैंक्यू सर.”

सैल्यूट मार कर श्याम ख़ुशी ख़ुशी कमरे से निकल गया.

करीब दो घंटे बाद श्याम लौटा... अपने पाँच अन्य साथियों के साथ.

और साथ में थे बिपिन काका, उनकी पत्नी रेणुका और भांजा बसु.

थाने में लौटने के साथ ही श्याम, भटाचार्य के पास गया और खबर सुनाई.

भटाचार्य खुश हुआ पर जैसे ही कमरे से निकला; उन तीनों को देख कर हतप्रभ हो गया.

उसकी तो बुद्धि ही चकरा गई.

प्रश्नसूचक दृष्टि लिए श्याम की ओर देखा.

श्याम ने पास आ कर कहा,

“सर, खबर मिली है की जतिंद्र मर्डर केस में रेणुका किसी तरह संलिप्त है और इस केस में और अधिक प्रकाश डालने के लिए इसके पति और भांजे को भी साथ ले आएँ हैं.”

“वैरी गुड. गुड जॉब.”

श्याम की चतुराई देख कर भटाचार्य खुश होता हुआ उसे शाबाशी दिया.

अपने सीनियर से शाबाशी मिलने से श्याम भी काफ़ी गदगद हो उठा.

परन्तु क्षण भर बाद ही चेहरे पर चिंता लिए बोला,

“लेकिन सर... एक छोटी सी दुविधा है..”

“वो क्या?”

“इन तीनों को ले तो आया.. पर अब इनसे असल बात कैसे उगलवाया जाए ये एक समस्या है.”

“समस्या की क्या बात है श्याम. एक काम करते हैं, पहले एक एक कर तीनों को अलग अलग बैठा कर सवाल जवाब करेंगे... अगर इस प्रक्रिया से हमारा काम हो जाता है तो ठीक है.. नहीं तो ज़रुरत पड़ने पर तीनों को साथ बैठा कर क्रॉस क्वेश्चन करेंगे.”

भटाचार्य के इस आईडिया से श्याम बहुत खुश हो गया,

“ओके सर.”

कह कर आगे की कार्रवाई को ले कर व्यस्त हो गया.
 
बाबा की कुटिया में :

हरि और चांदू बाबा के विशेष दिशा निर्देश के अंतर्गत कुछ विशेष तैयारियों में लगे हुए थे. दोनों के ही हाथ काफ़ी तेज़ी से चल रहे थे और कई सामानों को इकठ्ठा करने में व्यस्त थे.

कई पवित्र और दैव सम्बन्धी वस्तुओं को अच्छी तरह से देखा परखा जा रहा था.

काफ़ी देर तक यही चलता रहा.

जब सभी तैयारी पूरी हुई तब तीनों ही आराम करने लगे. सुस्ताते हुए चांदू पूछा,

“गुरूदेव, इतने से हो जाएगा न?”

“हाँ वत्स.”

“और कार्य?”

“हाहाहा... क्यों.. गुरु पर विश्वास नहीं?”

“क्षमा करें गुरूदेव.. मेरा ये अभिप्राय नहीं था. दरअसल, जब से चामुंडी के बारे में सुना है.. मन हमेशा ही भयग्रस्त व संदेहग्रस्त रहता है.”

“अपनी क्षमताओं को लेकर इतना संशययुक्त रहना क्या शोभा देता है वत्स?”

“नहीं गुरूदेव... म..”

उसे बीच में ही रोकते हुए बाबा बोले,

“वत्स.. सदैव स्मरण रखना.. चाहे कुछ भी हो.. अपने क्षमताओं पर कभी भी संदेह नहीं करना चाहिए. इस व्यक्ति विशेष की योग्यता का ही ह्रास होता है. स्वयं पर विश्वास नहीं रहता इससे कार्य विशेष को लेकर मन में भय रहता है और अरुचि भी जाग जाती है.”

चांदू सिर झुका लिया,

बोला,

“जी गुरूदेव.”

बाबा ने मुस्करा कर चांदू के सिर पर हाथ फेरा और दोनों को ही सम्बोधित करते हुए बोले,

“मेरी चिंता अपनी योग्यता, क्षमता या कार्य के पूरा होने या न होने को लेकर नहीं है.. मेरी चिंता है गाँव वासियों को लेकर.”

दोनों ने प्रश्नसूचक दृष्टि से बाबा की ओर देखा...

बाबा कहते गए,

“पता नहीं.. न जाने क्यों मेरा मन कह रहा है कि आने वाले सात दिनों के अंदर अंदर कुछेक गाँव वासियों पर इसी चामुंडी का या फिर शांतनु और बरखा का कोप होने वाला है.”

“तो क्या हुआ.. आप उन्हें बचा तो सकते ही हैं गुरूदेव.”

“नहीं वत्स, आखिर मैं भी एक मनुष्य हूँ.. मेरी अपनी भी कुछ सीमाए हैं. मैं बहुत कुछ तो कर सकता हूँ.. पर सब कुछ नहीं.”

“तो फिर उन लोगों को बचाने का और कोई मार्ग शेष नहीं है?”

“है वत्स.. है... मैंने इन लोगों को जो दिशा निर्देश दिया है अगर उसका पालन पूरी निष्ठा से किया जाए तो अवश्य ही सबके प्राण सुरक्षित रहेंगे.. अन्यथा दुर्घटना होने की पूरी सम्भावना है.”

“अर्थात् गुरूदेव.. आपको ये संदेह है कि कदाचित सभी आपके निर्देशों का पालन नहीं करेंगे?”

“संदेह नहीं वत्स... विश्वास!... विश्वास है इस बात का.”

“क..क्यों... गुरूदेव...?”

बाबा ने उत्तर में कुछ नहीं कहा.

वो चुप रहे और खिड़की से बाहर आसमान की ओर देखने लगे.

हरि और चांदू इस संकेत को समझ गए. बाबा ने कुछ देर पहले खुद ही कहा था कि वे बहुत कुछ कर सकते हैं... लेकिन सब कुछ नहीं. सब कुछ उनके हाथ में नहीं है. पता नहीं आने वाले सात दिनों में गाँव में क्या क्या होगा...

दोनों अत्यंत चिंतित हो उठे.।

थाने में इंटेरोगेशन शुरू हो चुका था.

शुरुआत बिपिन काका से ही हुआ...

पर तब इंस्पेक्टर भटाचार्य और श्यामाप्रसाद का आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब इंटेरोगेशन को शुरू हुए दस मिनट ही मुश्किल से हुए थे कि बिपिन काका बिलख बिलख कर रोने लगे और हाथ जोड़ कर पुलिस वालों से एक ही बात बार बार दोहराने लगे कि,

“दया कीजिए साब, मुझसे मेरी बीवी के बारे में मत पूछो; मैं नहीं बोल पाऊंगा... साब... मत पूछो साब... कृपा करो साब.”

“क्यों.. क्यों कुछ नहीं बोल पाओगे?”

भटाचार्य ने थोड़ा सख्ती से पूछा.

बिपिन काका रोते हुए ही बोले,

“साब, जीवन में आज तक अपने आचार, विचार, व्यवहार और व्यापर से बहुत नाम कमाया. बहुत सम्मान मिला पूरे गाँव में... पूरे समाज से. मेरी तो विवाह की भी इच्छा नहीं थी.. माँ के गुजर जाने के बाद बाबूजी की जिद्द कहिये या उनकी इच्छा; देर से ही सही... मैंने शादी कर ली. संतान नहीं हुआ.. इसे भी भाग्य समझ कर समझौता कर लिया. ल...ले.. लेकिन य.. ये थाना.. प... पुलिस... सवाल... ज...जवाब... मुझसे न.. नहीं होगा साब... नहीं होगा.”

बच्चों की तरह रोते बिलखते बिपिन काका झुक कर लगभग भटाचार्य के पांव ही पड़ गए...

भटाचार्य तुरंत पीछे हट गया.

बिपिन काका का रोना धोना देख कर श्याम तो बिल्कुल किंकर्तव्यविमूढ़ सा हो गया. उससे कुछ बोलते नहीं बना. वैसे भी, जब उसके सीनियर वहाँ पर उपस्थित हैं तो फिर वो क्यों बोले.

कुछ पलों के लिए भटाचार्य का दिमाग भी एकदम से ब्लैंक हो गया था पर था वो एक बहुत ही स्मार्ट ऑफिसर. खुद को सम्भालने में कम समय लगा उसे. तुरंत ही समझ गया कि बिपिन काका ऐसा कुछ अवश्य ही जानते हैं जो इस केस में बहुत सहायक हो सकता है पर साथ ही कदाचित बिपिन काका और उनके परिवार के सम्मान को चोट पहुँचा सकता है.

इसलिए उस समय तो बिपिन काका को वहाँ से उठ कर बाहर जा कर बैठने बोल दिया पर ये दृढ़ निश्चय भी कर लिया की थोड़ी देर बाद बिपिन काका के अंतर्मन को फिर से खोदेगा.

भटाचार्य ने बसु को बुलवाया.

बसु अंदर आया ...

घबराया..

बैठा.. उसे पहले पानी दिया गया...

भटाचार्य ने उसे पाँच मिनट का टाइम दिया.

बसु का घबराहट धीरे धीरे कुछ कम हुआ.

भटाचार्य अब उसके ठीक सामने चेयर पर बैठा... उसकी ओर देखते हुए..

पूछा,

“बसु... अब कैसा लग रहा है..?”

“ज..जी.. ठ.. ठीक हूँ ...स... साब..”

“और पानी चाहिए?”

“न..नहीं साब..”

“हम्म.. तो अब हम जो कुछ पूछेंगे उसका तुम सही सही जवाब देना... ठीक है?”

“ज..ज..जी...साहब... ब.. बिल्कुल..”

“ह्म्म्म.. तो बसु.. ये बताओ... तुम्हारा अच्छा नाम क्या है...तुम यहाँ कब से रहते हो.. क्यों रहते हो... तुम्हारे माता पिता कहाँ हैं.. इत्यादि..”

“ज.. जी साब.. बचपन में माता पिता के देहांत के बाद से ही मामा के पास यहाँ रहने लगा था. मामा मामी से बहुत प्यार मिला है. बिल्कुल उनके अपने बेटे जैसा. उनकी अपनी कोई संतान नहीं है न... इसलिए देखा जाए तो एक तरह से... उन लोगों ने मुझे अपना लिया... था... म.. मेरा न.. नाम भी मामा जी ने ही र..रखा था ... पंचमन दास... पर चूँकि सिर पर असल माँ बाप का ही छाँव नहीं था इसलिए अपना ही बेटा मानते हुए... म.. मामा न..ने मेरा नाम पंचमन पाल रखना ही अ..अच्छा समझा.”

“ओके.. मामा और मामी के साथ तुम्हारे संबंध कैसे हैं?”

“बहुत अ.. अच्छे ह..हैं साब.”

“मामा और मामी के बीच के संबंध कैसे हैं?”

“ब.. बा.. बहुत बढ़िया है साब.”

“उनका अपना कोई सन्तान नहीं है.. इस बात को लेकर दोनों के बीच कभी कोई खटपट नहीं हुई?”

“स.. साब.. म.. मैं तो बचपन से ही इनके साथ रहता हूँ.. न..नहीं साब, कभी कोई खटपट नहीं हुई है.”

“सच कह रहे हो?”

“ज.. जी.. साब...”

“दोनों की आयु में बहुत अंतर है.. कम से कम पंद्रह साल का. विवाह करने में इतनी देर क्यों की बिपिन काका ने?”

“नहीं पता साब... भ.. भला मुझे कैसे पता होगा?”

“इस आयु अंतर के कारण भी कभी कोई खिटपिट हुई है दोनों में?”

“अम... ज..जहाँ तक मुझे मालूम है साब... ऐसा तो कभी क..कुछ हुआ नहीं दोनों में.”

“पक्का?”

“जी साब.”

“हम्म.. और जतिंद्र...?’

“म.. जतिंद्र का क्या साब..?”

“ये जतिंद्र का क्या किस्सा है? उसके बारे में कुछ बताओ.”
 
“जतिंद्र भी बहुत कम आयु से ही हमारे यहाँ रहते आया है साब.. दरअसल, उसके माँ बाप बहुत गरीब थे.. बच्चे कुल सात थे.. समुचित पालन पोषण में बहुत ही असमर्थ थे दोनों इसलिए बिपिन मामा के यहाँ जतिंद्र को छोड़ गए थे. काम भी करेगा.. रहना खाना होगा.. और बड़ा भी हो जाएगा..”

“क्यों.. तुम्हारे बिपिन मामा के यहाँ ही क्यों छोड़ा जतिंद्र को?”

“जी.. व.. वो क्या है कि... जतिंद्र के पिताजी को भी उनके पिताजी ने बिपिन मामा के पिताजी स्वर्गीय दिलीप सेन जी के यहाँ छोड़ गए थे. वो भी हमारे यहाँ ही बड़े हुए थे.. परिवार के सदस्य की भांति रहते खाते पीते और .. बदले में घर से सम्बन्धित काम कर देते.... चाहे घर में हो या बाहर का काम हो.”

“बाहर का काम...?”

“जी.. जैसे पुआल ले आना, सब्जी ले आना.. कहीं कुछ पहुँचा कर आना.. इत्यादि.. सब.”

“ओह्ह.. ओके..ओके..”

“ज.जी साब.”

“बसु... तुम्हें याद होगा शायद.. जिस दिन हम तुम्हारे घर गए थे.. जतिंद्र की बॉडी देखने... उस दिन तुमने हमें बताया था कि तुम्हारे मामा मामी; विशेषतः तुम्हारी मामी जतिंद्र को सगे बेटे से भी अधिक मानती थी... ऐसा क्यों? तुम तो थे ही बेटे के रूप में.. फिर कोई और क्यों?”

“न.. नहीं साब.. वो मुझे ही अधिक मानती हैं.”

“क्या मानती हैं?”

इस प्रश्न पर बसु एकदम सुन्न सा हो गया. उसने कल्पना ही नहीं किया था कि इस तरह से भी प्रश्न कर सकते हैं पुलिस वाले.

थूक निगलते हुए तनिक मुश्किल से बोला,

“ब.. बेटा मानती है.. साब.”

“पक्का..??”

“जी साब.”

“तो फिर जतिंद्र को सगा बेटा जैसा मानने का कारण??”

“पता नहीं सर.”

कह कर बसु ने नज़रें फेर लिया. घबराहट के लक्षण फिर से दिखाई देने लगे थे. भटाचार्य ने कुछ सोचा और बसु को जाने दिया.

अब बारी रेणुका की थी.

“ठास!!”

एक ज़ोर का आवाज़ गूँजा.. एक थप्पड़ की आवाज़.

और इसी के साथ एक और आवाज़ निकली,

“र..रुक जाइए.. म.. मैं.. ब.. ब...बताती...ह.. हूँ...”

और ये आवाज़ थी रेणुका की.

रेणुका, अर्थात् बिपिन काका की बीवी.. रेणुका पाल.

गाल पर रसीदे गए उस ज़ोरदार थप्पड़ ने अपनी छाप तो छोड़ी ही; साथ में रेणुका की सारी हेकड़ी भी निकाल दी जो अब से कुछ मिनटों पहले भटाचार्य, श्याम और तीसरे पुलिस वाले को दिखा रही थी.

हालाँकि जब रेणुका को इंटेरोगेशन रूम में बुलाया गया तब वहाँ दो लेडी पुलिस वाली भी थी... पर रेणुका ने मानो कुछ न बोलने की कसम खा रखी थी.. एक तो कुछ बोलना नहीं चाह रही थी; दूसरा, कुछ बोले भी तो इतना कम की समझ में ही न आए की बात का मतलब क्या हुआ..

थोड़ी देर बाद ही भटाचार्य के दिमाग ने उसे एक उत्तम विचार दिया और उसने बिपिन काका और बसु; दोनों को अंदर बुलवा लिया. रेणुका से फिर दो चार सवाल किए गए लेकिन जब उसने फिर कोई जवाब न दिया और अपने उसी रवैये पर अड़ी रही तब मजबूरन भटाचार्य को अपने सिपाहियों को एक खास इशारा करना पड़ा उन लोगों ने भी तुरंत सांकेतिक आदेश का पालन करते हुए बिपिन काका और बसु को डंडों से अच्छे से कूटने लगे.

मुश्किल से दस से बारह डंडे ही पड़े होंगे कि रेणुका प्रश्नों के उत्तर देने को तैयार हो गई.

शुरू के चार पाँच प्रश्नों के उत्तर उसने सही दिए भी पर फ़िर धीरे धीरे अपने उसी पुराने रवैये में लौटने लगी और अपने उत्तरों को सीमित करने लगी.

वार्निंग भी दी गई उसे...

कुल छह वार्निंग...

पर नहीं मानी..

तब फ़िर से मजबूरन भटाचार्य को दोनों महिला पुलिस कर्मियों को वही विशेष संकेत देना पड़ा..

और इस बार निशाना रेणुका थी.

शुरू के सात आठ थप्पड़ खाने के बाद भी उसने थोड़ी प्रतिरोध करने की और स्वयं को निर्दोष बताने की पूरी कोशिश की लेकिन उन दोनों हट्टे कट्टे महिला कर्मियों के ज़ोरदार बरसते थप्पड़ों के सामने शीघ्र ही हथियार डाल दी.

भटाचार्य ने गौर से देखा रेणुका को...

मार और भय से अब वो थरथर काँप रही थी.

अभी ही सही समय है; ऐसा जान कर भटाचार्य ने दोबारा प्रश्नोत्तर का भार संभाला.

रेणुका के बिल्कुल सामने बैठा.

बोतल दिया पानी पीने को.

रेणुका ने कांपते हाथों से बोतल थामा और भटाचार्य से किसी इशारे की प्रतीक्षा किए बगैर ही गटागट पानी पीने लगी.

पानी पी कर तीन मिनट सुस्ताने के बाद,

“तो रेणुका जी.. अब आप सब कुछ सच सच कहने के लिए तैयार हैं?”

“ज..जी.. साब.”

“ठीक है.. तो शुरू करते हैं प्रश्नोत्तर काल. और ध्यान रहे, इस बार सब सीधे सीधे ही बताइयेगा.. होशियारी जहाँ की... ये दोनों छोड़ेंगी नहीं आपको.. और मैं भी इन्हें रुकने नहीं कहूँगा.”

रेणुका की आँखों में देखते हुए भटाचार्य ने बेहद गंभीर स्वर में कहा.

रेणुका ने डरते हुए कनखियों से अपने अगल बगल खड़े दोनों महिला कर्मियों को देखी और फिर भटाचार्य की ओर देखते हुए हाँ में सिर हिलाई. साथ ही धीरे से बोली,

“स..साब.. मैं इनके सामने नहीं ब...बो.. बोल पाऊँगी..”

कह कर उसने याचना भरी दृष्टि से भटाचार्य को देखा.

भटाचार्य खुश हुआ. उसने सिपाहियों को इशारा कर के बिपिन काका और बसु को वहाँ से ले जाने को कहा.

उनके वहाँ से जाते ही उसने बड़े प्यार से प्रश्न करना शुरू किया,

“रेणुका जी, ये बताइए.. बिपिन जी के साथ आपके संबंध कैसे थे?”

“अ..अच्छे ... थ.. थे...स..साब..”

“कितने अच्छे?”

“ब.. बहुत अच्छे..”

“बसु के साथ आपके सम्बन्ध कैसे हैं?”

“अच्छे हैं.”

“क्या सम्बन्ध है?”

“हम हैं तो मामी और भांजा.. लेकिन माँ बेटे का भी सम्बन्ध मान कर चलते हैं.”

इस उत्तर पर भटाचार्य थोड़ा ठिठक गया और दो सेकंड के लिए रेणुका की ओर देखा.

फिर तुरंत ही यथावत प्रश्न करना शुरू किया,

“ओके रेणुका जी; अगर आप दोनों के बीच माँ बेटे वाला सम्बन्ध है तो फिर कहने वाले ये क्यों कह रहे हैं कि आप दोनों के बीच कोई और सम्बन्ध भी है?”

“ज..जी?!!”

रेणुका ऐसी प्रतिक्रिया दी मानो भटाचार्य का प्रश्न सुन कर उसे आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा हो.

भटाचार्य बिल्कुल शांत बैठा रहा... रेणुका की ओर एकटक देखता हुआ.

बड़े आराम से बोला,

“जी, आपने सही सुना.. लोग ऐसा ही कहते हैं... और यदि ऐसा कहते हैं तो अवश्य ही कोई विशेष आधार होगा ऐसी बातों का...या... फ़िर कोई विशेष प्रयोजन!”

“अ.. आधार? ... प्रयोजन??”

“जी बिल्कुल.”

“नहीं.. ऐसा कुछ नह..”

रेणुका की बात पूरी होने से पहले ही भटाचार्य बोल पड़ा,

“हमारे सूत्रों से हमें ऐसी ही खबर मिली है.. और हमारे सूत्र ऐसी बातों में इस तरह की गलतियाँ नहीं करते. व्यर्थ लांछन लगने – लगाने वाले कार्य नहीं करते. चलिए.. अब सब सच सच बताइए... नहीं तो ....”

कहते हुए भटाचार्य ने रेणुका को दोनों महिला पुलिस कर्मियों की ओर संकेत कर के दिखाया.

रेणुका अब और भी अधिक सहम गई.
 
पानी की तरह अब स्पष्ट था कि रेणुका वाकई ऐसा कुछ जानती है जो वो चाह कर भी बता नहीं सकती; लेकिन भटाचार्य के पास भी अब अधिक समय नहीं था. उसे शीघ्र से शीघ्र परिणाम तक पहुँचना था.

अतः वो चेयर से उठ खड़ा हुआ और पीछे हटते हुए बोला,

“ये अब भी नहीं बोलेंगी.. सुनो, कुछेक और लगाओ तो इसे.”

इतना सुनना था कि रेणुका विद्युत् की तेज़ी को भी मात देती हुई हड़बड़ा कर बोल उठी,

“न.. नहीं.. नहीं... सुनिए..”

आगे बढ़ती दोनों महिला कर्मी रुक गयीं.

भटाचार्य पलट कर रेणुका की ओर देखा...

रेणुका अत्यंत भयभीत होते हुए बोली,

“स..सुनिए... म.. मैं स..सब बताऊँगी...”

“यही तो आपने कुछ देर पहले भी कहा था... फ़िर भी कुछ नहीं बोल रही थीं... अब भी यही कह रही हैं.. क्या अब आप सच में सब सच सच बोलेंगी? यदि नहीं.. या कोई भी चालाकी हुई.. तो फिर इन दोनों को मैं नहीं रोकूंगा... ठीक??”

“ज.. जी.. ब... बिल्कुल ठीक..”

रेणुका अपने चेहरे से पसीना पोंछते हुए बोली.

भटाचार्य दोबारा रेणुका के ठीक सामने रखे अपने चेयर पर जा कर बैठ गया.

“चलिए रेणुका जी.. कहना शुरू कीजिए.”

रेणुका ने बोतल उठा कर पानी पी, एक गहरी साँस ली और कहना शुरू की,

“आपके सूत्रों ने खबर तो सही दी पर थोड़ी गलत भी है. जिस तरह की सम्बन्ध की बात आप कर रहे हैं वो बसु के साथ नहीं अपितु जतिंद्र के साथ था. मेरे स्वर्गीय ससुर ने जब जतिंद्र को अपने घर में स्थान दिया था तब वो बहुत छोटा था और मैं भी उस समय यहाँ नहीं थी... मतलब.. ब्याह नहीं हुआ था उस समय मेरा. मैं तो बहुत बाद में आई थी. तब तक जतिंद्र भी बड़ा हो गया था. काफ़ी घुल मिल कर रहने वालों में से एक था वो. हँसमुख था, युवा था, बहुत सम्मान करता था और हमेशा ही भाभी भाभी करता रहता था.

मेरे यहाँ आने के बाद शुरू के कुछ महीने ऐसे ही हँसी ख़ुशी बीते.

पर, धीरे धीरे मैंने गौर करना शुरू किया कि जतिंद्र सदैव ही एक अलग ही दृष्टि से मुझे देखता है. भाभी भाभी कर के तो वो तब भी बोलता रहता था और बड़े आदर से सन्मुख आता था. जितनी देर बात करनी होती; बड़े हँसमुख तरीके से करता था लेकिन जो मैंने गौर किया वो ये था कि अवसर मिलते ही वो मेरे शरीर के कटावों को बड़े लोलुप तरीके से देखने लगता था... और ऐसा कोई भी अवसर वो व्यर्थ नहीं जाने देता था जिसमें वो मेरे शरीर के अंगों को न देख पाए.

(तभी भटाचार्य अपने चेयर से उठा और उन दोनों महिला कर्मियों को एक संकेत कर के अपने साथ श्याम और एक और सिपाही को ले कर उस सेल से बाहर चला गया. भटाचार्य के बाहर जाते ही एक महिला कर्मी रेणुका के सामने भटाचार्य वाले कुर्सी पर बैठ गई और दूसरी ने भी पास ही रखे एक चेयर पर बैठ गई. रेणुका ने अनवरत बोलना चालू रखा था.)

शुरू में तो मैंने यही सोचा की कदाचित मेरे स्त्री सुलभ प्रवृति के कारण ही ऐसा लग रहा है और मैं नाहक ही इस बेचारे पर संदेह कर रही हूँ; लेकिन शीघ्र ही मुझे आभास हुआ कि मेरी स्त्री प्रवृति ऐसी गलती नहीं कर सकती.

कोई तो कारण होगा जो मेरी इंद्रियाँ मुझे इस प्रकार के संकेत दे रही हैं.

पहले तो मैं ध्यान नहीं दी... सच कहूँ तो ध्यान नहीं देना चाही पर जल्द ही मैंने अपनी स्त्री प्रवृति और इन्द्रियों पर भरोसा कर के जतिंद्र के गतिविधियों पर नज़र रखने लगी.

और बहुत शीघ्र ही उसे भोला व मासूम समझने की मेरी भूल का मुझे पता चल गया.

वो वाकई अक्सर मुझसे नज़रें चुराकर मेरे जिस्म के कटावों को लालसा भरी नज़रों से देखता था. छोटा सा अवसर मिलते ही छूने की कोशिश करता था. कई बार किसी न किसी बहाने से मेरे कमर व स्तनों को छूने में वो सफल रहा.

कुछ दिन तो केवल मुझे देखने और मुझे कहीं कहीं से छूने तक सीमित रहा... और धीरे धीरे ही सही... उसका दुस्साहस बढ़ता गया...

कभी मेरे नहाने के समय आ आकर बाथरूम का दरवाज़ा खटखटाता और खोलने पर कुछ भी इधर उधर की छोटी मोटी बात पूछता.. और आँखें उसकी मेरे अर्धनग्न शरीर पर होती.

कभी मैं कपड़े बदल रही होती तो अचानक से कहीं से आ टपकता और वासना से मुझे घूरने लगता.

मैंने कई बार कोशिश की उससे दूर रहने की, अपने पति को उसके बारे में बताने की पर असफल रही. बसु को कुछ इसलिए नहीं बोली कभी क्योंकि क्या भरोसा वो शायद कुछ कर बैठता और फिर गाँव भर में हमारे परिवार के चर्चे होते... जोकि अपने आप में ही बदनामी है.

एक ओर जहाँ मैं जतिंद्र के बढ़ते दुस्साहसों से परेशान और चिंतित होती जा रही थी वहीँ दूसरी ओर अपने पति की उपेक्षा से भी काफी निराश, हताश व उदास थी.

विवाह के छह साल होने को आ रहे थे... लेकिन न ही हमारी अपनी कोई संतान थी और न ही हम दोनों में पति-पत्नी वाला सम्बन्ध. कहते हैं कि विवाह के आठ दस सालों बाद वैसे भी अधिकतर पति पत्नी के बीच पति पत्नी वाला संबंध न हो कर भाई बहन वाला संबंध हो जाता है. और यहाँ हम दोनों में तो पहले से ही भाई बहन वाला रिश्ता होने को आ रहा था. केवल कहने के लिए ही हम दोनों पति-पत्नी थे.

हर रात को ये खाना खा कर सो जाते थे और मैं करवट बदलते रह जाती थी. कुछेक बार मैंने खुद से पहल भी किया, लेकिन इनकी आँखें ही नहीं खुलती.. इन्होंने भी कुछेक बार प्रयास किया लेकिन काम शुरू होते ही इनका काम ख़त्म हो जाता था.

कई दिन, महीने और साल मैंने ऐसे ही गुजार दिए... मान मर्यादाओं में रहते हुए.

लेकिन ये क्षुधा ऐसी है कि बस बढ़ती ही जाए... बढ़ती ही जाए.

और इधर जतिंद्र भी अपनी गतिविधियों में धीरे धीरे उन्मुक्त होता जा रहा था.

जतिंद्र रोज़ सुबह उठ कर घर के पीछे, जहाँ तबेला है और उसके बगल में ही वो कमरा जहाँ वो रहता है; वहीँ खुले में व्यायाम किया करता था. एक दिन अचानक ही मेरी नज़र उस पर गई. उसके युवा होते शरीर में गठित होते सुपुष्ट मांसपेशियों को देख कर मेरा मन मचलने – बहकने लगता. मैं चाहती तो नहीं थी.. बिल्कुल भी नहीं... पर न जाने क्यों रह रह कर उसकी ओर मेरा मन खींचता चला जाने लगा. चाहे मैं कोई काम कर रही हूँ या फिर आराम; रह रह कर उसका कसरती बदन मेरी आँखों के सामने छा जाता.

तब अचानक एक दिन मेरे मन में ये विचार आया कि मैं अपने अंदर ये बोझ क्यों ढोती फिरूँ.. मन तो पति से भरना चाहिए था.. लेकिन अगर पति से नहीं हो रहा.. तब क्यों न किसी और से करूँ.

और अगले ही दिन से मैंने भी जतिंद्र को इशारे देना शुरू कर दिया.

उसके युवा होते मन को मेरे इशारे समझते देर न लगी और....”

कहते हुए रेणुका चुप हो गई.

दोनों महिला पुलिसकर्मियों ने अगले पाँच मिनट तक की प्रतीक्षा की कि रेणुका अब कुछ बोलेगी.

लेकिन जब रेणुका कुछ न बोली तब सामने बैठी महिला कर्मी ने अपनी नज़रें पैनी करते हुए उससे पूछी,

“और??”

एक पल रुक कर रेणुका होंठ खोली,

“और फिर उसके बाद से हम दोनों के बीच एक संबंध बन गया.”

“कैसा संबंध... और ‘हम दोनों’ मतलब किन दोनों के बीच?”

“अ...अ..व.....”

“जल्दी बोलो!!”

महिला कर्मी ने ज़ोर से डांटा.

रेणुका और अधिक डर से सहम गई.

फ़ौरन बोली,

“अ..अव..अ...अवैध संबंध..”

“किनके बीच??”

“म...म...मेरे..अ...और.. र....और... जतिंद्र के बीच..”

“ह्म्म्म... ठीक... अब ये बता कि उसे मारी क्यों...??”

“क..किसे?”

“जतिंद्र को!”

सुनते ही रेणुका का चेहरा फक्क से सफ़ेद पड़ गया..

आँखों से अविश्वास व्यक्त करती हुई बोली,

“य..ये..अ..आप क्या कह रही हैं...? भला म.. मैं.. जतिंद्र की ह.. हत्या क्यों करुँगी??”

“तूने नहीं किया?”

“न.. नहीं.”

“नहीं किया?”

“नहीं.”

“सच में?”

“ज..जी.”

“सच कह रही है तू?”

“ज..जी.. सच कह रही हूँ.”

“सुन, तूने जतिंद्र को नहीं मारा.. ये बात बिल्कुल अच्छे से सोच समझ कर ही बोल रही है न?”

“जी, ब.. बिल्कुल..”

“पक्का??”

“जी.....”

रेणुका आगे भी कुछ कहने जा रही थी कि तभी उसके कान के पास एक तेज़ धमाका सा हुआ और इसी के साथ अत्यधिक पीड़ा से रेणुका दोहरी होती चली गई.

अपने बाएँ गाल पर हाथ रख कर वो सिर झुका ली.. आँखों के आगे अँधेरा छा गया.

अगले कुछ क्षणों तक कोई कुछ नहीं बोली.
 
कुछ और समय बीतने के बाद जब रेणुका धीरे धीरे सामान्य हुई तब उसके सामने बैठी महिला पुलिस कर्मी ने चेहरे पर बिना कोई अतिरिक्त भाव लिए एक एक शब्द पर ज़ोर देते हुए बड़े शांत स्वर में पूछी,

“अब बोलो, तुमने जतिंद्र को क्यों मारा?”

पीड़ा की अधिकता के कारण रेणुका की आँखों में आँसू आ गए थे..

तुरंत कुछ कहते नहीं बना उससे..

जब बगल में बैठी दूसरी महिला कर्मी ने सख्ती से दोबारा उससे प्रश्न किया तब फफक कर उत्तर दिया रेणुका ने,

“ज..जी...म..म..मैं.. मैंने.... मारा है...था...उ..उसे..”

“हम्म.. हालाँकि मेरा प्रश्न ये नहीं था कि तुमने उसे मारा है या नहीं या फिर उसे किसने मारा है... लेकिन ठीक है.. तुमने इसका उत्तर स्वयं ही दे दिया.. तो अब ये बताओ मोहतरमा कि तुमने उसे मारा क्यों?? असल प्रश्न यही है और मैं अपने इसी प्रश्न को फिर से तुमसे पूछ रही हूँ.”

रेणुका अब भी अपने गाल को सहला रही थी...

गाल उसका टमाटर से भी अधिक लाल हो गया था..

बोलने का प्रयास कर के भी उसके मुँह से बोल नहीं फूट रहे थे... आँसू झर झर गिर रहे थे..

उसकी स्थिति देख सामने बैठी महिला कर्मी ने पानी वाला बोतल उसकी ओर बढ़ाया,

“चल.. पी ले ये... उसके बाद फटाफट एकदम धरल्ले से कहना शुरू करना.”

रेणुका बिना कोई ना नुकुर किए बोतल ले ली और पानी पीने लगी.

पानी पीने के बाद कुछ क्षण रुक कर बोलना शुरू की,

“पहले के कुछ महीने तो अच्छे से बीते लेकिन फिर जतिंद्र की सीमाए धीरे धीरे बढ़ने लगी थीं. वो खुद को मेरा मालिक समझने लगा था. अधिकार तो ऐसे जताने लगा था मानो अगर मुझे नहाने भी जाना पड़े तो उससे पूछ के जाऊं. जब भी मेरे साथ होता; मेरे पति और भांजे को गंदी गंदी गालियाँ देता. शुरू के कुछ महीने तो वो बिस्तर में भी मुझे किसी देवी की तरह पूजता था.. लेकिन उसके बाद धीरे धीरे ही सही.. उसके बातों और व्यवहार में बहुत परिवर्तन आने लगा. मुझसे; विशेष कर संसर्ग के समय किसी बाजारू औरत से भी कहीं अधिक तिरस्कृत करता हुआ पेश आता. पूछे जाने पर कहता कि ऐसा करके उसे एक विशेष.. एक अलग प्रकार का सुख व आनंद मिलता है. ऐसी बातें वो सिर्फ़ कहने के लिए कहता है.. उसे गलत न समझा जाए. उसका और कोई मतलब नहीं होता. बहुत समय तक ऐसा चलता रहा.. न चाहते हुए भी मैंने हालात के साथ समझौता कर लिया था. परन्तु जैसे सूरज अधिक समय तक बादलों के पीछे नहीं छुप सकता ठीक वैसे ही हमारे संबंध भी किसी से छुपे न रह सके. हम पकड़े ही गए. हम दोनों को आपत्तिजनक अवस्था में पहले मेरे पति और बाद में भांजे बसु ने देख लिया था.

पति के साथ तो मेरी काफ़ी कहा – सुनी हुई ही थी.. बसु ने भी कड़ी आपत्ति जताया था.

कुछ दिन शांत रहने के बाद हम दोनों में फिर से संबंध बनने लगा. पिछली बार तो जतिंद्र को कुछ नहीं कहा गया था सिवाय थोड़े से डांट के.. वो भी मेरे पति के द्वारा.. लेकिन इस बार हम फिर पकड़े गए और वो भी मेरे भांजे बसु के हाथों.

उसने मुझे और जतिंद्र को काफ़ी कुछ सुनाया. मुझे सुनाया... मैं सुनती रही.. पर जब जतिंद्र को सुनाने लगा तब जतिंद्र को गुस्सा आ गया और वो भी बहुत उल्टा सीधा बोलने लगा.

और उस क्षण तो मैं डर ही गई जब जतिंद्र ने मेरे पति और बसु को जान से मार देने की धमकी दी.

सिर्फ़ उसी एक दिन नहीं बल्कि अक्सर कई बार अकेले में या मेरे साथ होने पर भी वह मेरे पति और भांजे को मार देने की कसमें खाता था.

ब.. बस....इसी क.. कारण.......”

“इसी कारण क्या?”

“इसी कारण मैंने उसे... मार दिया.”

“कब?”

“रात में...”

“ठीक से बताओ.”

“उसे मारने के पहले पिछले दो महीने से मैं अक्सर उसे रात में कुछ अलग बना कर खिलाने लगी. कभी गाजर का हलवा, कभी खीर, कभी कुछ तो कभी कुछ. और इसी तरह एकदिन खीर के दूध में ही अच्छे से ज़हर मिला कर उसे दे दी. काफ़ी तेज़ और धीरे असर करने वाला ज़हर था. उसे खाने के कोई दो घंटे बाद ही जतिंद्र मर गया होगा.”

“उसके बाद वो घृणित काम क्यों किया?”

“क.. कौन सा घृणित क... काम?”

“तुझे अच्छे से पता है कि हम किस घृणित काम की बात कर रहे हैं... हमारे खोजी कुत्तों को जतिंद्र के कमरे से पंद्रह कदम दूर ज़मीन के चार हाथ नीचे वो मिली है... ऐसा तो वही कर सकता या सकती है जिसके दिल में हद से अधिक घृणा भरी हुई हो.”

सामने बैठी महिला कर्मी की बात सुन कर होंठों पर एक हल्की मुस्कान लाते हुए रेणुका थोड़ा सा सिर झुका कर बोली,

“जैसा की अ.. अभी अभी आपने ब.. बताया... कि ‘ऐसा तो वही कर सकता या सकती है जिसके दिल में हद से अधिक घृणा भरी हुई हो’... मेरे दिल में भी उसके प्रति घृणा कूट कूट कर भरी हुई थी... अ.. और.. सच कहूँ ..त.. तो घृणा के साथ साथ उससे भी अधिक दिल में डर अपना डेरा डाले हुए था....”

रेणुका की बात खत्म होने से पहले ही बगल में बैठी दूसरी महिला कर्मी अपना कौतुहल न छिपा पाने के कारण पूछ बैठी.

रेणुका अबकी बिना झिझक बोली,

“घृणा इसलिए क्योंकि वो मुझे एक बाजारू औरत से भी कहीं अधिक अपमानित करता रहता था. सड़क की कुतिया से भी अधिक नीचे गिरा हुआ होने का अहसास दिलाते रहता था... दिनोंदिन इतने अपमान से मैं थक चुकी थी... (कहते हुए रेणुका फिर रोने लगती है).... और डर इसलिए क्योंकि उसने मेरे पति और भांजे को मार डालने की धमकी दी थी.. एक बार नहीं.. कई कई बार.. जब भी वो मेरे साथ होता था... संबंध बनाते समय हमेशा ही कहता था कि वो मेरे पति और भांजे को इस दुनिया से अलविदा करवा कर पूरे घर के साथ साथ मुझ पर भी अधिकार कर लेगा और धन – ऐश्वर्य भोगते हुए मुझे अपनी रखैल बना कर मुझे भी जब चाहे तब भोगेगा... जिसके साथ बाँटना चाहे .. बाँटेगा...

जब मुझे लगा की अब बात हद से अधिक बढ़ने लगा है तो मुझे ही कोई उपाय करना सूझा. अपने पति और भांजे से तो सहायता माँग नहीं सकती थी.. जो कुछ करना था मुझे अकेले ही करना था. सो उसे ज़हर दे दी. दिल में कई सौ गुणा घृणा भरा हुआ था... इसलिए......”

रेणुका ने अपनी बात खत्म की.

उसकी पूरी कहानी सुनने के बाद दोनों महिला कर्मी कुछ देर तक चुपचाप बैठे रहे.
 
दोनों की ही सूरत ये साफ़ साफ़ बता रही थी कि रेणुका की आपबीती पर वो विश्वास करे या अंत में जतिंद्र के मरने के बाद जो दरिंदगी की उसने उस पर अविश्वास करे.

खैर, रेणुका अब सब कुछ बोल चुकी थी इसलिए उससे कुछ और पूछने का कोई मतलब नहीं था; खास कर ऐसी कोई भी बात जो पुलिस वालों को पहले से ही पता हो.

और जो बातें पता नहीं थीं... वो भी अब पता चल चुकी थी.

रेणुका को वहीँ छोड़ कर दोनों महिला कर्मी सेल से बाहर आईं और भटाचार्य के कमरे में जा कर उसे रिपोर्ट किया. पूरी कहानी संक्षेप में सुनाई और एक पॉकेट साइज़ रिकॉर्डर उसे सौंप दिया. इसमें रेणुका की पूर्ण स्वीकारोक्ति रिकॉर्ड हो गयी थी.

दोनों को आभार और शाबाशी दिया भटाचार्य ने. वो भी दिल खोल कर. सीनियर से प्रशंसा पा कर वो दोनों भी बहुत खुश हुई.

थोड़ी देर बाद जब दोनों चली गई तब भटाचार्य ने रिकॉर्डर ऑन कर के उसे पूरा सुना; पूरे ध्यान से. फिर श्याम को बुलाया;

दोनों ने साथ में रिकॉर्डिंग सुना.

सुनने के बाद,

“क्या लगता है श्याम?”

“सर?”

“रेणुका की स्वीकारोक्ति के बारे में?”

“जैसी घटनाएँ उसने सुनाई उससे तो मुझे ये सही लगती है.”

“सही लगती है?!!”

“जी सर.”

“तुम्हारे कहने का मतलब ये हुआ कि उसने जो कुछ भी किया वो सब सही था? अंत में हुई दरिंदगी भी??”

“ओ.. न.. नहीं नहीं सर... मेरा मतलब था कि रेणुका की स्वीकारोक्ति मुझे सही लगी.”

“पक्का...? यही मतलब था न तुम्हारा??”

“ज..जी सर.”

श्याम सकपका गया था बेचारा. बोलने में हुई एक छोटी सी गलती उसे ही गलत ठहराने लगी थी.

“तो अब आगे का क्या लगता है? क्या होना चाहिए?”

“स..सर.. मेरे हिसाब से तो... अब इसकी इस स्वीकारोक्ति को रजिस्टर में कलमबद्ध कर के इसे जेल में डाल देना चाहिए.”

सुन कर भटाचार्य फुसफुसाते हुए बोला,

“जेल में तो समझो ये ऑलरेडी है.”

“स..सर.. आपने कुछ कहा?”

“अम.. नहीं.. कुछ नहीं..”

फिर थोड़ा रुक कर,

“जेल में डालने के बाद?”

“सर, जेल में डाल देने के बाद तो और कुछ रह नहीं जाता. केस तो क्लोज़ हो गया न?”

“हम्म.. राईट! तुम्हारे दृष्टिकोण से रेणुका वाला मामला तो क्लोज़ हो गया.... पर गाँव वाले मामले का क्या?”

“स..सर... ग.. गाँव व..वाला मामला?”

“हाँ.. गाँव वाला मामला.”

“स.. सॉरी सर.. मैं स..समझा नहीं.”

“श्याम!!... ये भूलने की बीमारी तुम्हें कब से लगी? हाँ?!”

श्याम सहम कर सिर नीचे झुका लिया.

भटाचार्य ने फिर समझाया,

“जतिंद्र को तो रेणुका ने मारा है ये मामला सुलझ गया. पर गाँव में और भी जो हत्याएँ हो रही हैं? जो मर्डर्स हो रहे हैं? उनका क्या?”

“ओह. यस सर.. जी सर... वो सब तो अभी भी बाकी हैं.”

“इसलिए मैं कह रहा था कि रेणुका वाले इस केस के बाद अपना सारा फोकस सुचित्रा, दुर्गा और निरुपमा की ओर कर दो. ध्यान रहे श्याम, गाँव में अब भी मौतें हो रही हैं और सुचित्रा अब भी संदिग्ध है. सुचित्रा के साथ साथ उसकी सहेली दुर्गा पर भी नज़र रखना. दोनों काफ़ी अच्छी सहेली हैं. अगर गाँव में हो रही मौतों के साथ इनका किसी भी तरह का संबंध है तो एक पर नज़र रखने से दूसरे की भी कोई न कोई खबर निकल ही आएगी. और साथ में खबर रखना निरुपमा का भी. वो भी मुख्य संदिग्ध है. कोई न कोई खबर ज़रूर मिलेगी उसके बारे में. मत भूलना कि उसे अक्सर ही वारदात वाले स्थानों के आस पास वारदात के पहले देखा गया है कई बार.”

“जी सर. समझ गया. आप निश्चिन्त रहें सर. मैं कड़ी से कड़ी निगरानी करवाऊंगा.”

“गुड. अब तुम जा सकते हो श्याम.”

श्याम कुर्सी से उठ कर भटाचार्य को सलाम ठोका और कमरे से निकल गया.

उसके जाते ही भटाचार्य ने एक सिगरेट सुलगाया और उस रिकॉर्डिंग को फिर से सुनने लगा.।

१६

बाबा की कुटिया में :

“चांडक?!! ये चांडक कौन है गुरूदेव?”

बाबा का ध्यान समाप्त होते ही उनके मुँह से यह नाम निकला जिसे सुनकर उनके पास अब तक उनके साथ ही ध्यानमुद्रा में बैठे हरि और चांदू चौंक गए और तुरंत ही प्रश्न कर बैठे.

बाबा के चिंतित मुँह से स्वतः ही उत्तर निकला,

“एक तांत्रिक.. यहीं.. इसी गाँव का रहने वाला... आज से कुछ वर्ष पहले तक रहता था... अब इस गाँव को छोड़ चुका है.. कुछ दिन पहले ही छोड़ कर गया है.. कई तरह की तांत्रिक क्रियाओं में सिद्धहस्त एवं बुरी शक्तियों का स्वामी.”

“ग...गुरूदेव.. तो फिर... ये तांत्रिक......”

हरि का प्रश्न पूरा होने से पहले ही बाबा बोल पड़े,

“ये सब... सब कुछ... उसी का किया धरा है.”

“अर्थात्.. गुरूदेव?”

“अर्थात् इस गाँव में जो कुछ भी हो रहा है; इन सब के मूल में यही दुष्ट तांत्रिक है.”

“ये दुष्ट तांत्रिक ही वास्तविक मूल है इन सब दुर्घटनाओं एवं हत्याओं के पीछे?”

“हाँ वत्स.”

“परन्तु... गुरूदेव.. आपने तो कहा था कि कोई चामुंडी है इन सबके पीछे?”

“चामुंडी इन सबके पीछे अवश्य है वत्स.. उसका हाथ भी है इन सब घटनाओं में.. परन्तु वास्तविक मूल तो यही चांडक नामक तांत्रिक है. वो चामुंडी सिद्ध तांत्रिक है. उसी ने चामुंडी को इन सब में लगाया है.”

हरेक शब्द के साथ बाबा की चिंता की गहराईयाँ बढ़ती जा रही थीं.

इस बात को दोनों शिष्य भली भांति समझ रहे थे पर बाबा से अधिक प्रश्नोत्तर करना भी नहीं चाह रहे थे.. क्योंकि दोनों ही इस बात को बहुत अच्छे से समझ रहे थे की बाबा दिन-ब-दिन गाँव और गाँव वासियों के सुरक्षा को लेकर बहुत अधिक चिंतित होते जा रहे हैं.

“आपको क्या लगता है गुरूदेव; तांत्रिक के जाने के बाद भी ये चामुंडी क्या स्वेच्छा से लोगों का शिकार कर रही है या तांत्रिक ने ही इसे इसी काम में लगा कर गाँव छोड़ कर चला गया है?”

“उस तांत्रिक चांडक ने ही इसे इस घृणित कार्य में लगा छोड़ा है वत्स.. और ये मेरा अनुमान नहीं है.. मैं जानता हूँ की ऐसा ही हुआ है.”

“और ये शांतनु और बरखा; गुरूदेव?”

“जीवन के अंतिम क्षणों में वे दोनों अत्यंत भयभीत, दुखी एवं आकांक्षी थे... जीवन जीने की इच्छा बहुत बलवती थी उस समय; पर जी न सके. इसलिए मरणोपरांत इनकी आत्माएँ प्रतिशोध की भावना से भरी हुई है.. और यही कारण है की ये दूसरी आम आत्माओं से अधिक बलवान भी हैं.. लेकिन फिर भी चामुंडी जैसी एक बड़ी शक्ति के सामने दोनों ही नतमस्तक हैं. चूँकि ये दोनों ही गाँव वालों से प्रतिशोध लेना चाहते थे इसलिए चामुंडी ने इन्हें अपने अधीन रख लिया और इन्हीं के माध्यम से गाँव वालों को लुभा कर या किसी और तरह से फँसा कर मार रही है.”

“इस सबसे चामुंडी को क्या लाभ है, गुरूदेव?”

“मानव रक्त पी कर एवं स्तरीय स्तरीय आत्माओं को अपने अधीन कर वो और अधिक बलवती होना चाहती है. स्मरण रहे वत्स, चामुंडी एक रानी चुड़ैल है. एक ऐसी शक्ति जिसे या तो भगवान या फिर कोई अत्यंत उच्च कोटि का सिद्ध पुरुष ही समाप्त या रोक सकता है.”

“आप भी तो एक अत्यंत ही उच्च कोटि के सिद्ध महात्मा हैं गुरूदेव; आप भी तो समाप्त कर सकते हैं इसे.”

“अवश्य ही कर सकता हूँ वत्स... (थोड़ा रुक कर)... लेकिन......”

“लेकिन क्या गुरूदेव?”

“गाँव में कुछेक और अनिष्ट होने की सम्भावना दिख रही है मुझे. ये मेरी कोरा आशंका नहीं अपितु विश्वास है क्योंकि गाँव के सभी लोग मेरा कहा, मेरा निर्देश नहीं मानेंगे... दुर्भाग्य है ऐसी जनता का, ऐसे लोगों का जो अपने हित की बातों को समय पर ना तो सुनते हैं और ना ही मानते हैं. जब भी थोड़ी पाबंदी लगाईं जाती है तो ये सोचते हैं की मानो उनका जीवन ही उनसे छीन लिया जा रहा है. इसी कारण छोटी सी लगने वाली संकट एक बड़ी भारी विपदा बन जाती है. और यही वो कारण है वत्स, जिससे की मैं आश्वस्त हूँ कि सभी मेरा निर्देश नहीं मानेंगे... और इसलिए कुछ अनिष्ट अवश्य होगा.”

कहते हुए बाबा का चेहरा इतनी दृढ़ता से सख्त हो गया था की हरि और चांदू को आगे कुछ और कहने-पूछने का साहस नहीं हुआ. इस बात को लेकर दोनों ही दृढ़ निश्चित थे कि अगर गुरूदेव ने कुछ अनिष्ट होने की बात कही है तो वो अवश्य ही होगा.

रात नौ बजे के आस पास जब सारा गाँव हमेशा की तरह शांत हो गया था...

अँधेरे में कालू मस्ती में डूबा अपने घर की ओर जा रहा था.

रोज़ की तरह आज भी अपना दुकान बढ़ा कर (बंद कर) के वो आजकल अपने नए ठिकाने; केष्टो दादा के दुकान में जाने लगा था.. सिर्फ़ चाय-ब्रेड-बिस्कुट ही नहीं अपितु, दारू और अंडा भी उपलब्ध रहता था वहाँ. अब हाई ब्रांड या विदेशी किस्म के दारू तो मिलने से रहे... इसलिए या तो सस्ते वाला लोकल दारू ही मिलता था वहाँ या फिर ताड़ी (एक पेय पदार्थ जिसे नशे के लिए पिया जाता है).

दुकान से निकल कर काफ़ी दूर तक निकल आने के बाद एक जगह अचानक से कालू के साइकिल का ब्रेक अपनेआप लग गया.

नशे में धुत कालू को कुछ समझ नहीं आया.

वो तो साइकिल पर ही थोड़ी देर खड़ा रह कर झूमता रहा.. जब थोड़ा होश हुआ तब पेडल मारा.. साइकिल आगे चल पड़ी.

मुश्किल से दस कदम चला होगा कि फिर ब्रेक लगा.. अपने आप.

कालू को अब भी कोई होश नहीं था. नशे में उसे तो यही लग रहा था की वो साइकिल तो चला रहा है पर शायद स्पीड थोड़ी कम है.

जब करीब पन्द्रह मिनट के बाद भी सामने दिख रहा आम का पेड़ पीछे नहीं हुआ तब कालू को थोड़ा होश हुआ... जितना भी होश हुआ उसमें उसे इतना महसूस हो गया कि उसके साइकिल में कुछ गड़बड़ है.

वो बैठे बैठे ही थोड़ा नीचे झुक कर ब्रेक और चेन को चेक किया.

दोनों को ठीक पाने पर वो फिर पेडल पर दबाव डाला...

साइकिल आगे बढ़ी.

फिर रुकी...

इस बार कालू बुरी तरह से झुंझला उठा.

कई गंदी गालियाँ देता हुआ वह साइकिल से नीचे उतरा और ब्रेक व चेन चेक करने लगा. सब ठीक था.

नशे में उसे होश तो नहीं था.. पर घर समय पर पहुँचने के लिए उसे होश में आना और रहना बहुत ज़रूरी था. और अब जिस तरह की दिक्कतें हो रही हैं इससे तो वह ऐसे घर पहुँचने से रहा.

अभी वो अपने इस ताज़े समस्या के बारे में सोच ही रहा था कि तभी उसका एक और साथी वहाँ साइकिल चलाता हुआ आ पहुँचा. ये सुमित था. वैसे तो बड़ा व्यवहार-कुशल था; पर चरित्र से एक नंबर का ठरकी लड़का था. पहले शहर में टिकट ब्लैक किया करता था.. अब किसी कारणवश शहर छोड़ कर गाँव में ही रहते हुए कोई न कोई काम किया करता था.

कुछ देर पहले इसने भी कालू के साथ ही दारू पिया था. अंडे अलग से.

कालू को बीच रास्ते; जोकि वास्तव में एक पतली पगडंडी है; में खड़ा देख कर उसने भी साइकिल कालू के पास आ कर रोक दिया. कालू की आँखें ठीक से खुल नहीं रही थी. खड़े खड़े ही झूम रहा था. उसकी ये हालत देख कर सुमित हँस दिया... कारण, सुमित ने कालू से ज्यादा पिया था लेकिन होश अभी भी दुरुस्त था.

बड़े बदतमीजी से हँसते हुए पूछा,

“क्या हुआ हीरो? ऐसे अँधेरे में बीच रास्ते में क्या कर रहा है?”

“क..कुछ न..नहीं.. चेन उ..उतर गई है.”

“किसकी?”

“किसकी म... मतलब... साला, साइकिल की उतरी ह.. है.”

“अच्छा.. तो चढ़ा नहीं पा रहा है क्या?”

“ह्म्म्म.. अ... अगर.. चढ़ा ल.. लेता तो अ...अभी तक... ग.. घ... घर नहीं चला जाता.”

कालू को सुमित के बेतुके प्रश्नों पर बड़ा गुस्सा आ रहा था; और कोई समय होता और वो अगर नशे में नहीं होता तो शायद अच्छे से निपट लेता सुमित से. पर करे भी क्या, उसे तो पता ही था कि सुमित कैसा लड़का है. भले ही मज़े ले रहा है अभी... पर अगर सहायता की बात आई तो यही लड़का सबसे पहले आगे बढ़ कर आएगा.

सुमित अगले दो मिनट तक कालू को देखता रहा.

समझ गया की अगर इसकी सहायता नहीं की गई अभी तो शायद रात भर यहीं रह जाएगा.

इसलिए वो अपने साइकिल से उतरा और कालू को एक ओर होने को बोल कर खुद उसके साइकिल की चेन चेक करने लगा. चेन देखते ही बोला,

“अबे बेवकूफ, चेन तो बिल्कुल ठीक है. तुझे कहाँ से ये उतरा हुआ लग रहा है बे?”

कहते हुए वो उठ गया और साइकिल के दूसरे हिस्सों को देखने लगा किसी सम्भावित गड़बड़ी को देखने के लिए. कालू तब तक अपने बायीं ओर थोड़ी दूर पर स्थित एक पेड़ के पीछे पेशाब करने चला गया था.

और इधर सुमित कालू की साइकिल की जाँच परख कर रहा था.

पर ऐसा कुछ मिला नहीं.

अभी वो आगे कुछ सोचे या बोले; तभी उसे पायल की आवाज़ सुनाई दी. वो जल्दी पलट कर अपने पीछे देखा; जहाँ से वो और कालू आये थे.

पीछे देखते ही उसकी आँखें आश्चर्य से फ़ैल गयीं.

कुछ क्षणों के लिए उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि वो जो देख रहा है वो वास्तविक है या फिर उसे भी थोड़ी थोड़ी कर के चढ़नी शुरू हो गई है.

पीछे से एक बहुत ही सुंदर महिला धीमे क़दमों से चलती हुई आ रही थी.

हालाँकि उसने घूंघट किया हुआ था परन्तु घूंघट पूरी तरह से चेहरे को ढक नहीं रही थी. बदन पर साड़ी बहुत ही अच्छे से फिट बैठ रही थी लेकिन सुमित जैसे लड़के फिगर का अंदाज़ा किसी न किसी तरह से कर ही लेते हैं.

और सुमित को वह वाकई भा गई.

बिना चेहरा देखे केवल शरीर पर कस कर फिट बैठते कपड़ों से फिगर का अनुमान लगा कर ही उसका दिमाग ख़राब होने लगा था और कमर के नीचे वाले हिस्से में हलचल होने लगी.

उस महिला ने एक बार बस एक क्षण के लिए नज़रें फेरा कर सुमित की ओर देखी और फिर आगे चल पड़ी. जैसे ही वो सुमित के बगल से गुजरी; सुमित को एक बहुत ही मदमस्त कर देने वाला बहुत प्यारी सी सुगंध का आभास हुआ. आज से पहले कभी इतनी अच्छी सुगंध उसके नाक से कभी नहीं टकराई थी.

वो बरबस ही उसकी ओर आकर्षित होने लगा.

जब महिला थोड़ा ओर आगे बढ़ तब सुमित को होश आया और तुरंत अपनी साइकिल लेकर उस महिला के पीछे चल दिया.

महिला के पास पहुँच कर अपनी साइकिल को धीरे करते हुए बोला,

“आप इसी गाँव की हैं?”

उसके इस प्रश्न पर महिला की ओर से कोई उत्तर न आया.

सुमित ने फिर पूछा.

महिला फिर भी कुछ न बोली; केवल अपने सिर को थोड़ा नीचे कर ली.

तीसरी बार पूछे जाने पर धीमे और शरमाई स्वर में बोली,

“जी.”

उसकी आवाज़ शहद सी मीठी थी.

सुमित को इतनी अच्छी लगी कि वो उससे और बातें करने की सोचने लगा.

इधर पेड़ के पीछे से कालू सुमित की इन हरकतों को देख रहा था.. और नशे में ही मन ही मन हँसते हुए उसे गाली दे रहा था कि जहाँ नारी दिखी वहीँ जोगाड़ लगाना शुरू कर दिया कमीने ने.

कालू ने देखा की सुमित और वो महिला कुछ कदम आपस में कुछ बातें करते हुए चले.. फिर रुक गए... कुछ और बातें हुईं... और अचानक से वो महिला सड़क की दूसरी ओर बेतरतीब उगी हुई झाड़ियों के पीछे चली गई.

सुमित पीछे मुड़ कर देखा.. कालू अभी भी पेड़ के पीछे ही था. सुमित को बस उसकी बीच पगडंडी पर खड़ी साइकिल दिखी. कुछ क्षण कालू की साइकिल को देख कर कुछ सोचता रहा.. फिर उन झाड़ियों की ओर देखा जिधर वो महिला अभी अभी गई.

कुछ पल और सोचने के बाद सुमित भी अपनी साइकिल को उसी ओर ले कर बढ़ गया जिधर वो महिला गई थी.

करीब पाँच मिनट बीत गए.

सुमित नहीं लौटा.

नशे में भी कालू को थोड़ी चिंता हुई.

जब पाँच मिनट और बीत गए और सुमित फिर भी नहीं लौटा तब कालू ने जा कर देखने का सोचा की आखिर बात क्या है. अगर इन्हीं कुछ पलों में सुमित ने उस महिला को पटा लिया है तो फिर ठीक है... नहीं तो मामला गड़बड़ है.

साइकिल बिना लिए ही कालू आगे बढ़ने लगा... धीमे चाल से.

झाड़ियों के पास जा कर उसने बहुत आहिस्ते से इधर उधर देखना शुरू किया. हालाँकि नशे में होने के कारण उसके द्वारा ये सब करना थोड़ा मुश्किल हो रहा था परन्तु इन सब में उसे एक अलग ही मज़ा आने लगा था अब तक.

जल्द ही उसे झाड़ियों की ही झुरमुठ में एक ओर कुछ हलचल होती दिखी. दूर के एक स्ट्रीट लाइट की धुंधली रौशनी में उस ओर देखने में थोड़ी आसानी हुई.
 
उन झाड़ियों से वो मुश्किल से ३ – ४ फीट की दूरी पर होगा की अचानक ही उसे एक मरदाना स्वर में ‘आर्र्ग्घघघघघर्घ’ सुनाई दिया.

ध्यान से ओर जब कालू ने देखा तो उसे वाकई बहुत ज़ोर की हैरानी हुई. इसलिए नहीं की उसने कुछ अलग देखा... बल्कि इसलिए की वो जो संदेह कर रहा था; वही सच हो गया.

उसने देखा कि सुमित और वो महिला परस्पर आलिंगनबद्ध थे... दोनों कामातुर हो कर एक दूसरे का चुम्बन लिए जा रहे थे... इस बात से पूरी तरह बेखबर की अभी इस समय भी कोई आ कर शायद उन्हें देख सकता है.

सिर्फ़ यही नहीं... इतनी ही देर में सुमित ने अपना जननांग उस महिला की योनि में प्रविष्ट करा चुका था तथा धीरे और लम्बे धक्के लगा रहा था. उस धुंधलके रौशनी में भी उस महिला के सुमित के कमर के पास से ऊपर की ओर उठे उसके दोनों गोरे पैर बहुत अच्छे से दिख रहे थे.

महिला स्वयं भी पागलों की तरह सुमित के चेहरे, गले और कंधे पे चुम्बन पर चुम्बन लिए जा रही थी और अपने हाथों को सुमित के पूरे नंगे पीठ पर चला रही थी और रह रह के अपने लाल रंग के नेलपॉलिश से रंगे नाखूनों को उसके पीठ पर जहाँ तहां गड़ा देती.

सुमित का भी इधर हालत ख़राब भी था और पागल भी. उस महिला का ब्लाउज तो उसने खोल दिया था पर शरीर से अलग नहीं किया. धक्के लगाते समय रह रह के वो भी कस कर उस महिला को अपने बाँहों में भर लेता था. उसने अपने हाथों को ब्लाउज के ऊपर से उसकी नंगी पीठ पर रगड़ना जारी रखा.

उसका मुँह उस महिला की क्लीवेज पर चला जाता और स्वतः ही उसके काँपते होंठ उसके क्लीवेज और स्तनों की मुलायम गोरी त्वचा से जा मिलते. उस मुलायम त्वचा से होंठों का स्पर्श होते ही दोनों ही लगभग एक साथ एक गहरी सिसकारी लेते और फिर सुमित तुरंत ही उस पूरे अंश को चूमने – चाटने लग जाता.

काफ़ी देर तक ऐसा ही चलता रहा...

अचानक उस महिला ने एक ख़ास करवट ली और सुमित के कानों में कुछ बोली.

जवाब में सुमित मुस्कराते हुए धक्के लगाना छोड़ कर उठ बैठा और उसके ऐसा करते ही महिला उसके सामने उसके गोद में आ बैठी.

अब दोनों एक दूसरे की ओर सीधे देख सकते थे... महिला बिल्कुल सुमित के कमर के ठीक नीचे बैठ गई थी... उसके जननांग के ठीक ऊपर.

कुछ क्षण एक दूसरे को काम दृष्टि से देखने के बाद झट से दोनों फिर से पागलों की तरह एक दूसरे को चूमने लगे. थोड़ी देर इसी तरह चूमते रहने के बाद वो महिला रुकी; पीछे की ओर झुक गई, लेकिन सुमित ने उसे कमर से कस कर पकड़े रखा.

किसी हिंसक भूखे जानवर की मानिंद सुमित आवाज़ निकालता हुआ फिर से झपट पड़ा सामने मुस्तैदी से खड़े – निमंत्रण देते दोनों गौर वर्ण स्तनों पर टूट पड़ा और एक एक को चूस चूस कर लाल करते हुए दूसरे चूची को बड़ी निर्दयता से मसलने लगता.

कालू ने जैसे ही उन गोरे स्तनद्वय पर गौर किया; उसका तो कंठ ही सूखने को आ गया. महिला की दोनों सफेद स्तनों को आज से पहले कभी उसने इतने उचित आकार के हल्के भूरे रंग के निपल्स के साथ नहीं देखा था.

इतने भरे, इतने पुष्ट इतने सुंदर आकार से बड़े बड़े.... उफ्फ्फ...!!

वो महिला बड़े आराम से, समय लेते हुए सुमित के उस लौह अंग के ऊपर नीचे हो रही थी... और इधर सुमित ने अपना मुंह उसके गोरे स्तनों पर रख करजीभ से ही उसे सहलाना शुरू कर दिया.

लेकिन जैसा की स्पष्ट था कि इतने सुंदर स्तन मिलने पर कोई भी सिर्फ़ सहलाने तक ही सीमित नहीं रहने वाला... वही हुआ भी... सुमित दोनों स्तनों के स्तनाग्र को मुँह में भर कर ज़ोरों से आवाज़ करते हुए चूसने लगा और दोबारा उतनी ही निर्दयता से उन्हें मसलने लगा.

इसी तरह यह दृश्य अगले करीब आधे घंटे तक चलता रहा.

एक समय पर सुमित अपने चरम पर पहुँच कर झड़ने ही वाला था कि उस औरत ने उसे रोक दिया..

सुमित की गोद से उठ गई.

उसकी इस हरकत पर कालू और सुमित दोनों ही बड़े आश्चर्यचकित हो गए.

क्या बात है? क्या करने वाली है ये?

अगले ही पल जो हुआ... उसके बारे में दोनों ने ही कोई कल्पना नहीं की थी.

औरत थोड़ा पीछे हट कर दोबारा बैठी... और बैठे बैठे ही पीछे होते हुए घोड़ी बन गई... और फिर कामातुर नेत्रों से सुमित की ओर देखते हुए उसके जननांग को अपनी दायीं हाथ की हथेली में अच्छे से मुट्ठी बना कर पकड़ी और फिर एक भूखी शेरनी की तरह उस लौह अंग को लालसा भरी आँखों से देखने लगी. सुमित की ओर क्षण भर देख कर; एक शैतानी मुस्कान होंठों पर लाते हुए वो उस अंग के मुंड पर हलके से अपनी जीभ फिराई.

उसकी वो लंबी जीभ देख कर कालू का दिमाग घूम गया.. कम से कम एक हथेली बराबर होगी वो जीभ!

वह जीभ बड़े प्यार से, धीरे धीरे सहलाते हुए बार बार उस जननांग के मुंड को छू रही थी और उसके प्रत्येक छूअन से सुमित के पूरे शरीर में... अंग अंग में... एक कंपकंपी दौड़ जाती.

वो तो बेचारा समस्त तेज़... पूरा का पूरा वीर्य उस कोमल, गर्म योनि में उड़ेल देना चाहता था.. पर इस कमबख्त महिला ... ख़ूबसूरत महिला ने उसे ऐसा करने से मना करने के बाद अब उसके गुप्त अंग से इस प्रकार प्रेम जता रही थी मानो वर्षों से प्यासी रही हो.

उस औरत का प्रेम उस अंग पर धीरे धीरे बढ़ता ही जा रहा था. उसने सुमित के जननांग की ऊपरी चमड़े से शुरू कर अंदरूनी त्वचा को चाटना शुरू कर दिया. उसके ऐसा करते ही सुमित की एक तेज़ सिसकारी निकल गई. उसके इस कृत्य ने उसे असीम आनंद दिया.

सुमित ज़मीन पर उगी बड़ी बड़ी घासों को कस कर पकड़ा और सिर ऊपर आसमान की ओर कर दिया.

जी भर के चाटने के बाद अब जी भर कर चूसने का दौर शुरू हुआ. पहले मुंड को १०-१२ मिनट तक कामाग्नि में जलती किसी नवयौवना की भांति चूसती रही.. और फिर उस पूरे के पूरे अंग को अपने मुँह में गायब करती चली गई.

जैसे जैसे जननांग उसके मुँह में घुसता जाता; सुमित तो सुख के मारे तड़प उठता ही.. कालू को भी पता नहीं क्यों ऐसा सुख मिलता जैसे सुमित को भी मिल रहा है.

हर बार महिला अपने जीभ के अग्र भाग से जननांग के नीचे से ऊपर तक अत्यधिक प्रेम में डूबे भावुक – कामुक कामसुख प्यासी प्रेयसी की भांति चाटती हुई आती और मुंड पर आते ही एक प्यारी सी चुम्बन दे कर पूरे अंग को मुँह में गायब कर लेती.

और फिर वो क्षण भी जल्दी ही आया जब सुमित का मांसल अंग उस महिला की मुँह की गहराईयों में बहुत अंदर तक जाने लगा. उसके गले पर उभर आती नसें और आगे की ओर उबल पड़ती आँखें साफ बता देती कि ये महिला न सिर्फ़ सुमित को डीप थ्रोट मुखमैथुन दे रही है; वरन इस क्रीड़ा में काफ़ी खेली – खिलाई खिलाड़ी है.

उस औरत की एक ओर कृत्य ने सुमित के सुख की सीमाओ को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया. वो औरत उसके अंग को पूरी तरह से अपने मुँह में तो भर ही रही थी... अब मुँह में घुसाने के साथ ही साथ जीभ से जननांग के निचले भाग को बड़े कामुक तरीके से सहला दे रही थी.

इस कृत्य ने चरम आनंद से सुमित के शरीर के समस्त रोम रोम को खड़ा करने लगी. सुमित के मुँह से आनंद की अधिकता के कारण ‘आह आह’ निकलने लगी.

इस रोमहर्षक आनंद ने सुमित को अधिक देर तक मैदान ए जंग में टिकने न दिया...

वीर्यपात हुआ...

महिला के मुँह में ही...

दोनों ने ही सोचा की शायद वो गुस्सा करेगी, बिफर कर कुछ बोलेगी... पर नहीं...

ऐसा कुछ नहीं हुआ...

वरन, जो हुआ वो बिल्कुल उलट हुआ..

वो बड़े प्रेम से स्वाद ले ले कर समस्त वीर्य को पी गई... यहाँ तक की होंठों और जननांग से बह कर नीचे गिरते वीर्य को कुछ अंश और बूँदों तक को चाट गई.

उसके इस रूप को देख कर सुमित और कालू; दोनों को ही आश्चर्य का ठिकाना न रहा. कोई औरत ऐसी भी हो सकती है... इस तरह से स्वाद ले कर कामसुख दे सकती है ये कभी नहीं सोचा था उन्होंने... सोचना क्या... इस तरह के विचार आधुनिक दुनियादारी से बेखबर दूर गाँव में बसने वाले इन युवकों के मन में कैसे व कहाँ से आयेंगे?

शरारती नज़रों से देखते हुए बड़े कामुक स्वर में सुमित को बोली,

“कैसा लगा?”

सुमित उसकी ओर मन्त्रमुग्ध सा देखता हुआ बोला,

“बहुत अच्छा...”

“बस, बहुत अच्छा?”

“सच कहूँ तो मुझे पता ही नहीं की इस अप्रतिम सुख का मैं किन सठीक शब्दों में विवरण दूँ.... तुम्हारी काम कुशलता का किन शब्दों में प्रशंसा करूँ?!”

सुमित की इन बातों को सुन कर औरत खिलखिला कर हँस पड़ी. उसकी हँसी वातावरण में ऐसी गूंजी की मानो शरीर की कुल्फी ही जमा देगी.

हँसते हुए बोली,

“प्रशंसा के शब्दों के मोती आप अपने पास रखिए... मुझे तो बस वो दीजिए जिसका आपने कुछ देर पहले वादा किया था! याद है न आपको कि आपने क्या वादा किया था??”

“बिल्कुल.. मैंने जब आपसे ये सब के लिए कहा तब आप इस शर्त पर राज़ी हुई थी की ये सब करने के बाद आप मुझसे जो माँगेगी वो मुझे आपको देना होगा.”

ये सुनने के बाद वो औरत किसी भोली मासूम लड़की की तरह बोलने लगी,

“तो क्या आप तैयार हैं देने के लिए?”

“बिल्कुल!”

“पक्का?”

“हाँ.”

“सहमति दे रहे हैं न आप?”

“हाँ.. पर ये तो बताइए की आपको चाहिए क्या?”

“आपके प्राण!”

सुनते ही सुमित सकबका गया.

“क.. क्या...??”

सुमित को सकपका कर उसके चेहरे के रंग बदलते देख वो औरत एकबार फिर खिलखिला कर हँस पड़ी...

उसकी हँसी में एक खिंचाव तो था..पर खून जमा देने वाला भी था!

अचानक कालू ने जो देखा उससे तो उसका सारा नशा ही एक झटके में उड़ गया.

उसने देखा की उस धुंधले रौशनी में भी उस औरत की आँखें बहुत भयावह तरीके से चमकने लगी है. उसके आँखों की काली मोती धीरे धीरे सुर्ख लाल में बदलते हुए मानो जल रहे हैं... साथ ही आँखों का सफ़ेद अंश काला पड़ता जा रहा है.

सुमित का तो डर के मारे गला ही सूख गया.. वो हड़बड़ा कर उठ कर भागने को मुश्किल से उठा ही था कि उस महिला ने सुमित का एक पैर पकड़ कर एक ज़ोर का झटका देते हुए सुमित को उसके उसी स्थान पर यथावत गिरा दिया.

उस महिला के हाथों के नाखून एकदम से बहुत बढ़ गए... और उतने ही तेज़ और नुकीले भी.

एक क्षण भी व्यर्थ न गंवाते हुए उसने दाएँ हाथ की तर्जनी ऊँगली की नाखून का एक ज़ोरदार वार करते हुए सुमित के गले के बाएँ ओर से घुसा कर दाएँ ओर से निकाल दी.

सुमित की आँखें गोल और बड़ी हो कर आगे की ओर उबल आने को हो पड़ी.

तर तर कर के रक्त बहने लगा.

पीड़ा से विह्वल सुमित बेचारा कराह भी नहीं पा रहा था.

और वो औरत उसकी ये तड़प देख बहुत खुश हो गई.. होंठों पर एक बड़ी सी शैतानी मुस्कराहट आ गई. इस बड़ी मुस्कराहट के कारण उसके सामने के कुछ दांत दिखाई दिए जो बड़े भयावह रूप से बड़े और अद्भुत सफेदी लिए चमक रहे थे.

और तभी!!

एक तेज़ झटके से वो अपने नख सुमित के गले से सामने की ओर निकाल ली और उसके इस कृत्य से सुमित का गला सामने से बुरी तरह से फट गया. सुमित अपने फटे गले को दोनों हाथों से पकड़ कर तड़पते हुए लेट गया और कुछ देर बिन पानी मछली की भांति तड़पते हुए ही मर गया.

वो औरत अब और भी भयानक रूप से हँसते हुए सुमित के गले से बहते रक्त को अपने दोनों हथेलियों में भर कर रक्तपान करने लगी. बहुत देर तक रक्तपान करने के बाद वो बड़े आराम और कामुक ढंग से अंगड़ाई लेते हुए उठी और अपने कपड़ों को ठीक कर के झाड़ियों से निकल कर पगडंडी पर आगे की ओर बढ़ गई.

झाड़ियों से निकलते समय दूर स्ट्रीट लाइट और ऊपर चंद्रमा की धुंधली रौशनी उस औरत के चेहरे से टकरा कर जब उसके मुखरे को थोड़ा स्पष्ट किया तब उसे देख कर कालू को जो घोर आश्चर्य हुआ वो हज़ारों शब्दों में भी बता पाने योग्य नहीं था. चाहे जितने भी शब्द उठा कर कालू को दे दिए जाते; कालू फिर भी अपने जीवन के इस क्षण और इस आश्चर्य का वर्णन नहीं कर पाता.

बस एक ही शब्द ने ज़ोरों से धड़कते उसके ह्रदय के किसी कोने में किसी तरह से साँस लिया,

“सुचित्रा भाभी!!”

१७

“गुरूदेव... मुझे बचा लीजिए गुरूदेव... मैं जीना चाहता हूँ गुरूदेव.”

“शांत... शांत हो जाओ वत्स.. पहले शांत हो कर बैठो तो सही.”

बाबा जी ने डर से काँपते कालू के सिर पर हाथ रखते हुए कहा. कालू बहुत डरा हुआ था. बुरी तरह काँप रहा था. होश उड़े हुए थे उसके. चेहरा सफ़ेद सा पड़ चुका था और पसीने से तर था.

सिर पर बाबा के हाथ का स्नेहमयी स्पर्श पा कर शांत होने का व्यर्थ प्रयास करने लगा कालू पर भय में रत्ती भर की भी कमी न आई.

पहले की अपेक्षा उसे अब थोड़ा शांत होता देख बाबा ने बहुत स्नेह से पूछा,

“वत्स.. अब बोलो.. क्या बात है?”

“ग..ग...ग...गुरु...गुरूदे... गुरूदेव... व..व..वो.. म..म..मार... मार देगी... मार डालेगी... म...मु..मुझे भी..”

“कौन मार देगी?”

बाबा ने स्नेहिल ढंग से ही पूछा परन्तु अब स्वयं को कालू की बातों में थोड़ा केन्द्रित भी कर लिया,

कालू पूर्ववत् काँपते हुए ही उत्तर दिया,

“न..नाम... न...नहीं बताऊंगा...”

“क्यों?”

“क...क्योंकि....क...क्यों...कि...”

“आगे बोलो वत्स... क्योंकि....??”

“क्योंकि... व.. वो... म..मुझे... म.. म.. मा... मार डा.. डालेगी... गुरूदेव.... म..मुझे बचा... ल...लीजिए... ग..गुरूदेव...”

अब की बार तो लगभग रो ही पड़ा कालू.

उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बाबा ने बड़े अपनेपन से कहा,

“देखो वत्स.. अगर तुम नाम नहीं भी बताओगे... तो भी वो तुम्हें मार देगी... हैं न... क्योंकि उसका तो कदाचित लक्ष्य तो तुम अब बन ही गए हो... यदि नाम बता दोगे तो कदाचित मैं तुम्हारी कोई सहायता कर पाऊं. बोलो वत्स... कौन है वो जिसे तुम्हारे प्राण चाहिए?”

“भ.. भा... भाभी.”

“भाभी? कौन भाभी?”

“स..स.....”

“बोलो वत्स.. कौन भाभी?”

“स...सुचित्रा भाभी.”

“सुचित्रा भाभी??”

“ह... हा.. हाँ ग..ग.. गुरूदेव....”

“सुचित्रा भाभी.. अर्थात् गाँव की शिक्षिका?”

“ज.. जी.. गुरूदेव.. पहले ग... गाँव में पढ़ाती थ.. थी...”

“अब नहीं पढ़ाती?”

“पढ़ाती ह.. है.”

“अभी तो तुमने कहा कि वो पहले पढ़ाती थी?”

“अ.. अब.. शहर में... छ... छोटे ब...ब... बच्चों के स्कूल में...”

“ओह.. अच्छा..!”

“ज.. जी.. ग.. गुरूदेव.”

एक क्षण रुक कर बाबा जी ने फिर पूछा,

“हम्म... अच्छा वत्स.. तुमने ये तो बता दिया की तुम्हें कौन मारना चाहती है.. अब ये तो बताओ की वो तुम्हें क्यों मारना चाहती है?”

“क....क.. क्यों... क्योंकि......”

“हाँ वत्स, बोलो... डरो नहीं.”

“क.. क्यों...कि... म.. मैंने उ...उसे मारते उ... उन्हें दे देख लिया थ.. था.”

“किसे मारते किसे देख लिया?”

“र.. सुचित्रा भाभी को दे.. देखा... स.. सुमित को....मारते हुए.. अ... और.... ब.. बब्लू को भी.”

“बब्लू?”

“ज... जी.. स...सुमित को मारने के अगले तीन र.. रात बाद बब्लू को भी मार दिया उन्होंने.”

“किसने? सुचित्रा भाभी ने?”

“जी गुरूदेव.”

“ओह्ह.”

कह कर बाबा जी चुप हो गए.

पूरा मामला तो उन्हें बहुत हद तक बहुत स्पष्ट तो था ही... बस ये नया काण्ड उन्हें थोड़ा परेशान कर दिया.

अगले कुछ मिनटों तक बाबा जी को कुछ न बोलते देख कर कालू ने रोते हुए उनके पैर पकड़ लिया,

“गुरूदेव.. गुरूदेव... मुझे बचा लीजिए गुरूदेव.. म.. मैं न... नहीं मरना... चाहता.. गुरूदेव.”

रोते बिलखते कालू के सिर पर हाथ रखते हुए बाबा जी अत्यंत शांत व धीर-गम्भीर स्वर में बोले,

“अब जब हमारे पास आए हो तो हम तुम ऐसे ही कुछ नहीं होने देंगे. शांत हो जाओ.. रोना बंद करो.”

बाबा जी के कहने पर कालू ने धीरे धीरे रोना तो बंद किया पर सिसकियाँ अब भी चालू थीं.

इधर बाबा जी भी चुपचाप बैठे हुए थे...

उन्हें चिंतामग्न देख चांदू से न रहा गया. समीप आ कर पूछा,

“क्या बात है गुरूदेव? आपको किस चिंता ने इतना चिंतित कर दिया है?”

“अंह?!... ओह.. कुछ नहीं.” बाबा जी जैसे गहरी चिंता से बाहर आए.

कालू की ओर देखते हुए पूछा,

“तुम्हें सुचित्रा ने कब देखा था? सुमित को मारते समय या बब्लू को?”

“सुमित को म... मारते समय शायद... उन..उनको स.. संदेह... रहा ह... होगा की कोई उन्हें द.. दे.... देख र.. रहा है... पर बब्लू को म.. मारते समय... म.. मु... मुझे.... म.. मे... मेरी ओर देखते हुए ही उ.. उसे... मारी.”

“बब्लू को कैसे मारा उसने?”

“ग.. गर्दन... स... से रक्त... च..चूसते ह...हुए.”

“और?”

“और....??”

“मतलब फिर क्या किया उसने?”

“म.. मे...मेरी ओ.. ओर दे.. देख कर मुस्कराई अ... और चेहरा पोंछते हुए चली गई. उसकी वो मुस्कान और भयानक रूप... म.. मुझसे भ... भूले... नहीं भूलती... गुरूदेव.”

“क्या बब्लू को मारने से पहले... अ.. अच्छा छोड़ो... (हरि की ओर देख कर बाबा ने एक विशेष संकेत किया जिसपे हरि ने भी हाँ में सिर हिला कर स्वीकृति दिया)... ये बताओ कि क्या उसने तुम्हें कुछ कहा था जाने से पहले?”

“नहीं गुरूदेव.”

“अच्छे से याद है?”

“ज.. जी गुरूदेव.”

“ह्म्म्म.. कोई अनोखी बात... कोई भी ऐसी बात जो तुम्हें उसमें बिल्कुल ही अलग दिखा या लगा हो?”

“ग.. गुरु... देव.. सुचित्रा भाभी हत्याएँ कर रही हैं.... र.. रक्त पी रही हैं... इससे ब... बड़ा अलग और अ.. अविश्वसनीय बात और क्या होगा मेरे लिए.. या.. किसी के लिए भी.”

कालू का उत्तर सुन कर बाबा जी चुप हो गए.

सत्य भी है, जिसे समस्त ग्रामवासी हमेशा से एक सुसंस्कृत, शिक्षित व समाज को एक नूतन दिशा – पथ दिखाने वाली जानता – मानता आया हो; उनके लिए सुचित्रा का यह रूप वास्तव में ही बहुत ही अविश्वसनीय होगा.

कुछ सोच कर बाबा जी कालू को बोले,

“सुनो कालू, क्या तुमने इन घटनाओं की चर्चा किसी से की है अभी तक?”

“न.. नहीं गुरूदेव.”

“हम्म.. वाह! बहुत अच्छा. करना भी नहीं.”

“क.. क्यों गुरूदेव?”

“किसी से इस घटना की चर्चा जब तक तुम नहीं करोगे.. तब तक तुम सुरक्षित रहोगे.”

“सच में.. गुरूदेव?”

“बिल्कुल.”

“प.. पर.. वो मेरी... ओर....”

“अब और कोई प्रश्न नहीं वत्स, जाओ.. बहुत समय व्यतीत हो गया. अब लौट जाओ. और निश्चिन्त रहो.. जब तक तुम इन घटनाओं की चर्चा किसी से नहीं करोगे तब तक तुम पूरी तरह से सुरक्षित रहोगे. समझे?”

“ज.. जी.. गुरूदेव... आपकी जय हो...”

बोलते हुए कालू बाबा जी के चरणों में लोट गया. बाबा जी ने उसे अच्छे से सान्तवना और आशीष दिया.
 
उसके जाने से पहले बोले,

“पूजा-पाठ करते हो?”

“न... नहीं गुरूदेव.. कुछ विशेष नहीं करता.”

“ओह.. तब तो शरीर पर कोई कवच आदि भी धारण नहीं किए होगे?”

“क.. कवच.. गुरूदेव?”

“समझा. नहीं धारण किए हो.”

“न.. नहीं गुरूदेव... मैंने य... ये पहना है.”

“क्या.. दिखाओ.”

कालू ने गले में पहना एक छोटा सा ताबीज नुमा लॉकेट दिखाया बाबा जी को.

बाबा जी ने कुछ क्षण अच्छे से देखने के बाद बोले,

“कहाँ से मिला तुम्हें ये?”

“मिला??”

“हाँ.. मिला... ये तुम्हें मिला है कहीं से. तुम्हें किसी ने दिया नहीं है... है न?”

कालू लज्जा से सिर झुकाता हुआ बोला,

“जी गुरूदेव.”

“तो बताओ फिर.. कहाँ से मिला तुम्हें ये?”

“घर के पीछे.. हमारा जो पुआल घर है.. गायों का चारा जहाँ रखते हैं... वहीँ से.”

“वहाँ से?”

“जी गुरूदेव..”

“अच्छा... ठीक है.. इसे सदैव ही पहने रहना. अब तुम जाओ... तुम्हारा कल्याण हो.”

कालू ने एक बार फिर बाबा जी को प्रणाम किया और बाहर चला गया. उसके जाते ही बाबा जी ने हरि को संकेत दिया. हरि लपक कर कालू के पीछे पीछे गया.

कालू को पीछे से टोकते हुए हरि बोला,

“कालू... सुनो..”

“कहिए.”

“एक और प्रश्न है जिसे गुरूदेव स्वयं नहीं पूछ सकते इसलिए मुझे कहा है तुमसे पूछने के लिए.”

“पूछिए... क्या पूछना चाहते हैं आप?”

“जिस दिन.. जिस समय बब्लू को सुचित्रा भाभी ने मारा था... तुम वहीँ थे?”

“जी.. था.”

“बहुत पहले से?”

“जी.”

“बब्लू को मारने से पहले सुचित्रा भाभी ने कुछ किया उसके साथ?”

इस प्रश्न पर कालू से तुरंत उत्तर देते नहीं बना. हिचक और संकोच से हरि की ओर देखते हुए सिर हाँ में हिलाया.

“क्या किया था सुचित्रा भाभी ने?”

कालू चुप रहा. बेचारे को समझ में नहीं आ रहा था कि बोले तो आखिर कैसे बोले?

हरि के द्वारा फिर से प्रश्न किए जाने और ज़ोर देने पर झिझकते हुए कहा,

“हाँ... उन दोनों में.....”

कालू की बात को काटते हुए हरि बोला,

“सहवास हुआ था?”

“न.. न.. नहीं... स.. सहवास नहीं.. पर.. वैसा ही... कुछ... अ... अर्थात्... दो... दोनों अर्धनग्न अवश्य हो गए थे... परन्तु.... सहवास.... नहीं हुआ.... था.”

“ये सच बोल रहे हो न?”

कालू की ओर दृष्टि तीक्ष्ण करता हुआ हरि बोला.

कालू थोड़ा सहम कर पर दृढ़ता से बोला,

“ज..जी.. बिल्कुल...”

“ह्म्म्म.. ठीक है... अब तुम जाओ.”

कालू अपनी साइकिल सम्भाला और जल्दी से वहाँ से विदा हो लिया.

कुटिया में घुसने के साथ ही हरि बोल पड़ा,

“गुरूदेव... क्रीड़ा हुआ भी ... और नहीं भी.”

सुनकर बाबा जी गम्भीर स्वर में ‘ह्म्म्म’ कर के चुप रहे.

चांदू और हरि; दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा और फिर बाबा जी को देखते हुए उनके पास आ कर चरणों के समीप बैठ गए.

बाबा बोले,

“ये सुचित्रा नहीं है...”

“क्या?!!”

चांदू और हरि अचम्भित से होते हुए बोल पड़े.

बाबा जी बोलते रहे,

“यदि ये सुचित्रा होती तो सदैव ही इस बात का बड़ी भली भांति ध्यान रखती की उसे कोई देख न ले. वो पकड़ी न जाए. पर यहाँ हो रहा है उल्टा. कोई उसे किसी को मारने से पहले प्रणय क्रीड़ा करते हुए देख रहा है इस बात से बहुत आनंदित होती है वो. कालू को मारने के बजाए उसकी ओर देख कर मुस्कराते हुए अपने आखेट का रक्त पीना... (थोड़ा रुक कर सिर हिलाते हुए)... नहीं... मैं निश्चित हूँ. ये सुचित्रा नहीं है.”

“तो क्या इसलिए आपने कालू को इस बात का चर्चा किसी से करने से मना किया गुरूदेव?”

“हाँ वत्स.. जब वो घटना का वर्णन कर रहा था.. तभी मुझे ये बात स्पष्ट हो गया था..”

“व.. वो कैसे गुरूदेव...?”

चांदू ने यह प्रश्न बड़े भोलेपन से किया.

बाबा जी दोनों शिष्यों की ओर देखते हुए मुस्कराए और फिर बोले,

“वो ऐसे की आज से करीब पाँच दिन पहले जब मैं ध्यानमग्न था तब मुझे बरखा की आत्मा से कुछ क्षणों के लिए साक्षात्कार होने का अवसर प्राप्त हुआ. मैंने उसे उसका मानव रूप दिखाने का निवेदन किया जिसे वो तुरंत ही मान गई और मुझे तभी की तभी अपना मानव रूप दिखाई. उसके जीवित रहते उसका जो मानव... नारी रूप था उसे देख कर मैं अचंभित रह गया. मुझे ये जान कर बड़ा आश्चर्य हुआ की इस चेहरे को मैंने पहले भी इसी गाँव में कहीं देखा है. अपना मानव नारी रूप दिखाने के तुरंत बाद ही बरखा चली गई. मैं उसे दोबारा बुला सकता था पर उसका यूँ ऐसे चले जाना इस बात का संकेत था कि उसे अभी कहीं और आवश्यक रूप से होना है.....”

चांदू बाबा जी के वाक्य का पूरा होने तक प्रतीक्षा नहीं कर सका और बड़ी अधीरता से पूछा बैठा,

“कहीं और..? कहाँ गुरूदेव..? क्या किसी और के पास होना चाहिए था उसे?”

चांदू के बालसुलभ व्यवहार को देख बाबा जी हँसते हुए बोले,

“हाँ वत्स.. उसके ऐसे व्यवहार से तो ऐसा ही लगा था.”

“तो क्या आप जानते हैं कि उसे कहाँ होना चाहिए था?”

“हाँ वत्स.”

“कहाँ गुरूदेव.. कृपया बताईए.”

“चामुंडी के पास!”

चामुंडी का नाम सुन कर दोनों शिष्य एक क्षण के लिए सहम गए. सच कहा जाए तो दोनों को ही समझ में नहीं आया की इस बात पे क्या प्रतिक्रिया दी जाए.

कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद हरि ने धीरे से कहा,

“गुरूदेव.. आप कह रहे थे की आपने बरखा के मानव नारी रूप को इसी गाँव में कहीं देखा है. क्या आपको इसका भी उत्तर मिल गया?”

“हाँ वत्स, मैंने इसी गाँव में देखा था उसे.”

हरि ये पूछना चाह रहा कि ‘किसे देखा है आपने’.. पर गुरूदेव से एक के बाद एक इतने प्रश्न करना वो अपने सभ्य आचरण के प्रतिकूल मान कर न चाहते हुए भी चुप रहा. लेकिन उसकी ये उत्कंठा उसकी आँखों में जिज्ञासा लिए गुरूदेव की ओर बराबर बनी रही.

गुरु तो आखिर गुरु होते हैं. शिष्य के मनोभाव उन्होंने तुरंत ताड़ लिया.

बोले,

“इसी गाँव की शिक्षिका रह चुकी.... सुचित्रा!”

असीमित आश्चर्य का गुबार एकाएक दोनों के कंठों से विस्मित स्वरों के रूप में फूट पड़ा,

“क्या?!! सुचित्रा भाभी?!!”

“हाँ.. वही.”

“वही जिनके विषय में अभी कुछ देर पहले कालू बता रहा था??” हरि पूछा.

बाबा जी ने उसे ऐसे देखा मानो उसी से कोई प्रश्न करने लगे हों.

हरि को पलक झपकते ही अपनी भूल का आभास हुआ एवं सहमते हुए धीरे से कहा,

“नहीं... नहीं... कालू वाली सुचित्रा भाभी कोई और है.”

हरि के चुप होते ही चांदू बोल पड़ा,

“परन्तु गुरूदेव.... ये बरखा और सुचित्रा भाभी...??”

“ह्म्म्म.. वत्स, इसे विधि का विधान कहो... या नियति का कोई चक्कर... आज से वर्षों पहले जो बरखा थी... ठीक वैसी ही सुचित्रा भी दिखने – सुनने में है. यहाँ तक की दोनों की कुंडली में कई तरह योग एवं गणना तक एक समान है. अपने योगबल से मैं जितना जान पाया.. उस अनुसार दोनों के न केवल चेहरे अपितु लंबाई और शरीर भी एक समान ही है... अंतर इतना है कि सुचित्रा का शरीर.... अं......”

गुरूदेव को वाक्य पूरा करने थोड़ी झिझक होते देख चांदू स्वयं ही बोल पड़ा,

“सुचित्रा जी का शरीर बरखा के शरीर के अपेक्षाकृत अधिक भरा हुआ है?”

“हाँ... यही बात. वैसे भी विवाह और संतानोत्पत्ति के इतने वर्ष बाद ऐसे परिवर्तन आना सामान्य बात है.”

“तो....??”

“तो अब यही वत्स की अब पूरा माजरा हमें या तो शांतनु और बरखा दोनों बताएँगे या फिर चामुंडी स्वयं!”

“चामुंडी?”

“हाँ.. परन्तु लगता नहीं है की उसके साथ मेरा कोई सामना होगा... क्योंकि यदि ये सब कुछ... अर्थात् गाँव में जो कुछ भी हो रहा है... इन सबमें यदि चामुंडी प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी होती तो अभी तक ये गाँव आधा श्मशान बन चुका होता... अब रही बात तांत्रिक चांडक की तो अब इस गाँव में नहीं है.. वो कहाँ है ये मैंने जानने का प्रयास नहीं किया... वो अब इस दुनिया में है भी या नहीं.. ये जानने में भी मेरी कोई रूचि नहीं है. रुचिकर एवं करने योग्य कार्य अभी के लिए यही है की इन ग्रामवासियों को कैसे बचाया जाए और शांतनु और बरखा का कैसे उद्धार किया जाए.”

“अ... और गुरूदेव... आप कालू से कुछ कवच इत्यादि के बारे में पूछ रहे थे??” हरि ने पूछा.

“हाँ वत्स.. तुमने कालू के गले में वो माला, बेहतर है उसे लॉकेट या ताबीज बोल दो; तो देखा ही होगा. वो उसका नहीं है. वो लॉकेट एक सिद्ध महात्मा का है जो कदाचित इस लॉकेट के वास्तविक धारक का गुरूदेव रहे होंगे. यदि ये लॉकेट कालू का ही होता तो सुचित्रा भाभी...या वो जो कोई भी है... उसके साथ कालू का यूँ आमना सामना नहीं होता. पर आमना सामना हुआ... इसका अर्थ ये हुआ की लॉकेट वास्तविक रूप से किसी ओर का है... जो कि अब कालू के पास है.. उसके गले में शोभायमान है... परन्तु शक्ति अभी भी वैसी की वैसी ही है. इसलिए वह नकारात्मक शक्ति कालू के आस पास नहीं फटक पा रही है.”

कहते हुए बाबा जी ने अपने दोनों शिष्यों की ओर देखा.

दोनों को ही तनिक उलझन में देख कर बोले,

“याद करो... कालू ने क्या क्या कहा था.. जब वो मूत्र त्यागने सुमित से कुछ क़दमों से दूर हुआ, तभी वो रहस्यमयी महिला आई. फिर बब्लू के साथ भी वो था.. कुछ कदम चल कर उससे दूर हुआ नहीं की वो शक्ति बब्लू के पास आ पहुँची.”

“अर्थात्... गुरूदेव.. जब तक कालू उस लॉकेट को पहना हुआ है तब तक कोई भी नकारात्मक शक्ति न तो कालू के पास आ सकती है और न ही कालू जिनके साथ है; उनके पास.”

“बिल्कुल.”

“लेकिन... गुरूदेव... ये लॉकेट... कालू के घर के पीछे...?”

“जब अजोय की मृत्यु हुई तब मैंने तुम्हें उसके घर और आस पास जानकारी इकठ्ठा करने भेजा था... याद है?”

“ज..जी गुरूदेव.”

“उस दिन तुम लौट कर आए थे और कहा था कि मृत्यु वाले दिन ही सुबह सुबह अजोय कालू से मिलने उसके घर गया था... और उस समय कालू अपने घर के पीछे पुआल घर में था?”

“जी गुरूदेव.”

“तो बस... हो सकता है वहाँ उन दोनों में कोई कहा सुनी हुई हो... या हाथापाई... या किसी और तरीके से वह लॉकेट अजोय के गले से निकल गया और फलस्वरूप रात में वो मारा गया.”

“अर्थात्, उस शक्ति को पता चल चुका था की अजोय के गले में अब वो लॉकेट नहीं है?!” हरि कुछ सोचता हुआ बोला.

“हाँ... यही संभव होता प्रतीत होता है... कदाचित वो उस पर दृष्टि जमाए हुए थी बहुत पहले से या... फिर... ये सब संयोग मात्र है.”

थोड़ी देर चुप रह कर बाबा जी फिर बोले,

“हरि, अमावस्या कब है?”

दो क्षणों की गणना के तुरंत बाद ही हरि बोला,

“आज से १२ दिन बाद गुरूदेव.”

बाबा जी ने हाथ बढ़ा कर पत्रिका माँगा. चांदू के द्वारा पत्रिका देते ही बाबा जी उसमें किसी चीज़ का बहुत ध्यानपूर्वक आंकलन एवं विश्लेषण करने लगे. फिर पत्रिका को एक ओर रखते हुए एक दीर्घ, गहरी साँस छोड़ते हुए बोले,

“ये अमावस्या ही उपयुक्त रहेगा.”

“वो क्या गुरूदेव?”

“वैसे तो अमावस्या वाले रात ऐसे कुछ योग बनते हैं की कुछ विशेष प्रकार के नकारात्मक शक्तियों को विशेष ऊर्जा प्राप्त होती है. परन्तु ये अमावस्या कुछ ऐसी है जिस दिन... पूरे २४ घंटे के लिए कुछ योग ऐसे बन रहे हैं जिसके कारण ऐसी ही विशेष प्रकार की शक्तियाँ अपेक्षाकृत थोड़ी सरलता से वश में आ सकती हैं. यद्यपि शक्तिशाली तो ये तब भी होंगी एवं कड़ा प्रतिरोध भी होगा इनकी ओर से... पर अब करना तो पड़ेगा ही... इसी विशेष दिन की प्रतीक्षा कर रहा था मैं इतने दिनों से.”

“किस बात की प्रतीक्षा गुरूदेव?” चांदू ने पूछा.

बाबा जी जप के लिए आसन बिछाते हुए दृढ़ गंभीर स्वर में बोले,

“एक निर्णायक लड़ाई की..! तुम दोनों तैयारियाँ शुरू कर दो.”
 

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