चैप्टर 9: बंगले में लगातार डर
खौफ्फ़ और डर से करण ने बाकी की रात बाहर, दूर बंगले से बितायी. अगले सुबह उसकी नींद खुली तो उसने अपने आपको झाड़ियो में पाया. ठण्ड लगने से उसका शरीर बहुत जोरो से कांप रहा था. वो रात में कहाँ आ गया था, उसे इसका कुछ आभास नहीं था, उसे तो बस उस बंगले से दूर भाग जाना था.
करण को लगा की वो अपने पापा को सब कुछ सच सच बता दे, पर फिर उसे बाद में लगा की उसके पापा उसके बातो पर विश्वास नहीं करेंगे, और वो ऐसे ही बंगले को छोड़ कर लन्दन भी नहीं जा सकता था, नहीं तो उसके पापा फिर उस से सवाल पूछते जिसका वो जवाब नहीं दे पता.
“क्या मैंने जो कल रात देखा वो सच था, बेचारी उस लड़की का बलात्कार हो गया, उस आदमी का खून हो गया, और उस लड़की ने खुदखुशी कर ली, पर जब मैं कमरे में गया तो वहा कोई ना था, कहाँ गायब हो गए वो दोनों ? क्या वो दोनों भूत थे जिसे मैंने देखा था ?”
“और सबसे बड़ी बात की उस लड़की की शक्ल निहारिका से हूँ-ब-हूँ मिल रही थी, कही वो सचमुच निहारिका तो नहीं थी, कही उसके साथ ही तो ऐसी अनहोनी नहीं हो गयी, पर अगर मैं मान लू की वो निहारिका ही थी तो वो आधी रात मेरे बंगले में क्या कर रही थी, और फिर कहा गायब हो गयी ?”
“पर अगर वो दोनों भूत थे, तो मुझे एक लड़की का बलात्कार का दृश्य क्यों दिखाया, कुछ समझ में नहीं आ रहा.” करण उठा तो देखा की उसके मोबाइल पे मनोहर का मिस कॉल था. उसने मनोहर को कॉल लगाया जिस से पता चला की वो थोड़ी देर में अपनी पत्नी के साथ वापस बंगले पे आ रहा है.
“अब तो मुझे उस बंगले में जाने से डर लग रहा है, पर जाना तो पड़ेगा ही, बहुत से काम बाकी है बंगले में.” कहते हुए वो पैदल ही बंगले के तरफ चल दिया.
बंगले की गेट पे पहुचते ही करण को कल रात वाली घटना याद आ गयी, उसके पैर मानो बंगले के अन्दर जाना ही नहीं चाहते थे, फिर भी वो अन्दर चला गया. अन्दर मनोहर पहले ही आ गया था.
“इतनी सुबह सुबह कहाँ गए थे सर जी ?” मनोहर ने करण को सुबह बंगले से बाहर देख कर हैरानी हुई.
“कुछ नहीं मनोहर, सुबह ज़रा सा मोर्निंग वाल्क और जोग्गिंग करने गया था.” करण ने झूट बोला.
“कोई बात नहीं सर जी, आइये मैं आपको म्हारी लुगाई से मिलवाता हूँ.”
करण ने देखा तो मनोहर के पीछे एक 30 35 साल की औरत खड़ी थी. देखने में साधारण थी, जैसी बाकी गाँव की औरतें होती है.
“सर जी यह है म्हारी पत्नी रेखा, बेचारी गूंगी है...” मनोहर ने अपनी पत्नी को करण से मिलवाया.
“कैसे हुआ तुम्हारी तुम्हारी बीवी के साथ यह सब ?” करण ने मनोहर से पुछा.
“क्या करू सर जी, यह तो बचपन से ही गूंगी है, पर मुझे पसंद आ गयी इसीलिए मैंने इस से शादी कर ली.” मनोहर ने जवाब दिया.
पर करण तो अपने ही ख्यालो में खोया हुआ था. ऐसी भयंकर उथल पुथल उसके सीधे साधे ज़िन्दगी में कभी नहीं हुई थी. उसे लगा शायद उसे निहारिका की खबर लेनी चाहिए.
करण ने तुरंत अपना मोबाइल निकाला और निहारिका का नंबर डायल किया.
“हेल्लो करण, आखिर हम याद आ ही गए ...” उधर से निहारिका की वोही मीठी आवाज़ आई.