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Horror मौत की चाल

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''आप तो बहुत ही जल्दबाज निकले

, मिस्टर अनुराग।

"-उसकी सर्द आवाज वहां गूंज उठी-

''आपको अभी से ये सब खत्म होने की जल्दी होने लगी। जल्द ही वो वक्त आएगा

, जब आप सभी ऐसा ही चाहेंगें।

"

उसकी आवाज में कुछ ऐसा था कि कमरे में उपस्थित हर शख्स के मुंह पर ताला सा लग गया।

''अब मैं इन शुभकामनाओं के साथ आप सबसे विदा लेता हूं कि आप सब यहां पहले आने वाले लोगों जितने बदनसीब न हों।

"

कहकर वो हवा के झोंके की तरह कमरे से बाहर निकल गया।

'कॉफिन मैन

' के कमरे से बाहर निकलने के कुछ सेकेंड तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा

, फिर अनुराग बिजली की तेजी से लपकते हुए उसके पीछे कमरे से बाहर निकला।

''ए कॉफिन मैन...।

"-अनुराग ने जोर से आवाज लगाई लेकिन बाहर आकर वो खामोश हो गया।

बाहर कोई नहीं था।

सिवाय अंधेरे के!

उसके पीछे-पीछे बाकी लोग भी बाहर निकल आये।

''कहां गया वो

?"-प्रीति हैरत और भयमिश्रित स्वर में बोली।

''ये तो सचमुच बहुत डरावना था।

"-मोहिनी ने झुरझुरी ली।

बाहर अंधकार में ज्यादा देर खड़े रहना उन सभी के लिए असहनीय होने लगा तो वो वापस उस कमरे में लौट आये।

''बढिय़ा।

"-फिर अनुराग भी

'कॉफिन मैन

' की तरह ही ऊंची गूंजती सी आवाज बनाकर बोला-

''बहुत बढिय़ा।

"

''क्या हुआ

?"-जय ने चौंक कर उसकी ओर देखा।

''पहले मुझे लग रहा था यहां रहने के एक लाख डॉलर बहुत ज्यादा हैं। लेकिन अब यहां की हालत और ये सब ड्रामा देखकर लग रहा है कि यहां तीन दिन बिताने के तो दस लाख डॉलर भी कम हैं।

"

''कम ऑन

, यार!

"-जय बोला-

''मैंने तुम लोगों को बताया था न कि वो लोग हमें डराने की कोशिश करेंगें...।

"

''जिसमें वो कामयाब भी हुए।

"-मोहिनी बोली।

''देखो!

"-जय समझाने के से अंदाज में बोला-

''यहां हम सब एक-दूसरे के साथ हैं। एक दूसरे का ख्याल रख सकते हैं। हमें किसी से डरने की कोई जरूरत नहीं है।

"

''मुझे तो ये मामला कुछ ज्यादा ही गड़बड़ लग रहा है।

"-राज

गम्भीर स्वर में बोला।

''पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर बोले!

"-अनुराग बड़बड़ाया।

''अगर ये

'कॉफिन मैन

' ही हमारा होस्ट था

"-अनुराग की बात को नजरअंदाज करते हुए राज बोला-

''तो वो यहां से चला क्यों गया

?"

''मुझे क्या पता क्यों चला गया

?"-जय ने हैरानी से राज की ओर देखते हुए कंधे उचकाए-

''हो सकता है कल फिर आ जाए।

"

''चूल्हे में जाए वो!

"-प्रीति बोली-

''क्या हमें सचमुच तीन दिन इसी तरह रहना होगा

? ऐसे ही

? इस...इस लैम्प की रोशनी में

?"

''नहीं।

"-कहकर डोंगरा आगे बढ़ा और उसने दरवाजे के साइड में लगे एक स्विचबोर्ड का बटन दबाया तो कमरा दूधिया रोशनी से नहा उठा।

''थैंक गॉड!

"-प्रीति ने राहत की सांस ली।

बाकी के चेहरों पर भी थोड़े सुकून के भाव आए।

''जब यहां लाइट की व्यवस्था है

"-मोहिनी बोली-

''तो ये लैम्प का नाटक क्या था

?"

''हॉरर इफैक्ट देने के लिये भई।

"-जय बोला।

''क्या मतलब

?"

''अरे

, मैंने तुम लोगों को बताया था न

, ये लोग हमें तीन दिन यहां चैन से नहीं रहने देंगें। ये तो सिर्फ शुरूआत है। अभी तो जाने और कितनी टांग खींची जाएगी हमारी।

"

''मेरी टांग किसी ने खींची तो उसकी टांगें तोड़ देनी हैं मैंने।

"-अनुराग गुस्से से बोला।

''बस

, बस।

"-मोहिनी मुंह बिगाड़कर बोली-

''देख ली तुम्हारी सारी बहादुरी। उस कॉफिन मैन के सामने तो कुछ नहीं कर पाए। खुद तुम्हारे भी हाथ-पांव फूल गए थे उसे ताबूत से बाहर निकलते देख कर।

"

''इस तरह रहना तो सचमुच डरावना है।

"-प्रीति अपनी दोनों बांहों को एक-दूसरे से लपेटकर झुरझुरी लेते हुए बोली।

''क्या बाहर के लिए भी लाइट है

?"-अनुराग ने डोंगरा से पूछा। डोंगरा ने सहमति में सिर हिलाते हुए स्विचबोर्ड पर लगा एक दूसरा बटन दबाया। बाहर भी एक शक्तिशाली बल्ब रोशन हो उठा

, जिससे बाहर उजाला तो हो गया लेकिन बाहर का हिस्सा काफी बड़ा और खुले में होने के कारण चारों ओर जंगल में अब भी अंधेरा था।

''ये सब बहुत ज्यादा अजीब लग रहा है।

"-मोहिनी बोली।

''डोंट वरी।

"-डोंगरा सांत्वना देने के से अंदाज में बोला-

''ऐसा सोचो कि ये सब एक खेल है। एक ड्रामा। आप लोगों को इससे डरने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि आप लोगों को पहले से पता है कि यहां जो कुछ हो रहा है या जो कुछ होगा

, वो स्टेज किया हुआ है। नकली है। असली नहीं है क्योंकि असली हो ही नहीं सकता। क्योंकि भूत-प्रेत जैसी कोई चीज होती ही नहीं।

"

''आपको पूरा यकीन है इस बात पर

?"-डॉली बोली।

''बिल्कुल।

"-कहने के साथ ही डोंगरा के होंठों पर मुस्कान आ गई-

''सॉरी अगर ऐसा कहकर मैंने आपकी भावनाओं को ठेस पहुंचाई हो तो। आखिर आप और मिस्टर वरूण पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हैं। वैसे

"-फिर वो दिलचस्पी भरे स्वर में बोला-

''मुझे आपसे एक बात पूछनी थी। क्या आपने सचमुच किसी भूत को देखा है

?"

डॉली ने इनकार में सिर हिलाया।

''फिर

? फिर आप लोग पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर कैसे बने

? मतलब इस प्रोफेशन में आने की प्रेरणा आपको कहां से मिली

?"

''वो किस्सा फिर कभी।

"-डॉली बोली-

''आज पहले ही बहुत ड्रामा हो गया है।

"

''तब आप लोग चलकर पूरे घर को देख लीजिये।

"

''आपके होस्ट साहब तो गायब हो गए।

"-अनुराग डोंगरा से बोला।

''उनके इस तरह गायब हो जाने से मैं भी हैरान हूं।

"-डोंगरा के चेहरे से भी हैरानी झलक रही थी-

''हो सकता है वे कल दर्शन दें। तब तक के लिये आप लोग मुझे ही अपना होस्ट समझिये। इन तीन दिनों के लिये कंपनी वालों की क्या स्ट्रेटेजी है

, इसके बारे में मुझे भी ज्यादा जानकारी नहीं है। मुझे सिर्फ इतना ही पता है कि यहां किसी तरह की जरूरत पडऩे पर मुझे आप लोगों की मदद करनी है और विटनेस की भूमिका भी निभानी है कि आपने तीन दिन यहां बिताए।

"

''और आपकी ये मैडम रिंकी

"-अनुराग ने रिंकी की ओर इशारा किया-

''इन्हें क्या करना है

?"

''ये बतौर असिस्टेंट मेरे साथ हैं। मेरी ही तरह आपकी मदद के लिए।

"

''कितने मददगार लोग हैं!

"-प्रीति धीमे से बुदबुदाई।

फिर डोंगरा के साथ उन्होंने पूरे घर का भ्रमण किया। सबसे बाहर वाले कमरे के पीछे एक और कमरा था और उन दोनों कमरों के बीच एक गलियारा था

, जिसकी दिशा उन कमरों के दरवाजों की ओर न होकर एक तरफ बने किचन की ओर थी। गलियारे का दूसरा सिरा ऊपर की ओर जाती सीढिय़ों पर खत्म होता था

, जिसके बगल में ही मीटिंग रूम और अंदर वाले कमरे के दरवाजे थे। उन्होंने किचन में जाकर देखा तो वहां इतना पैक्ड फूड और पानी था

, जो तीन दिनों के लिए तो क्या पांच दिनों के लिए पर्याप्त था।

यानि उन्हें खाने-पीने को लेकर तो किसी तरह की समस्या नहीं होने वाली थी।
 
पहले कमरे को-जिसमें उनकी

'कॉफिन मैन

' से मुलाकात हुई थी-डोंगरा ने

'मीटिंग रूम

' का नाम दिया। उसका कहना था कि वहां तीन दिनों तक रूकने के दौरान उनकी महफिल उसी कमरे में जमा करेगी। उस कमरे में एक आतिशदान भी था और उसमें जलाने के लिए लकड़ी की भी पर्याप्त व्यवस्था थी। वैसे भी वहां ठण्ड भी ज्यादा थी

, जिसके चलते आतिशदान सभी को पसंद आया।

'मीटिंग रूम

' के बाद सीढ़ी और किचन के बीच वाले गलियारे के बाद वाला कमरा उससे थोड़ा छोटा था और खाली-खाली सा ही था। एक बड़ी सी पुरानी मेज के अलावा वहां ज्यादा सामान नहीं था। उस कमरे से जुड़े दो-तीन कमरे और भी थे लेकिन वहां भी थोड़े-बहुत पुराने फर्नीचर के अलावा कुछ नहीं था। उस कमरे के अंत में एक दरवाजा था

, जो एक गलियारे में खुलता था। उस गलियारे में रोशनी की कोई व्यवस्था नहीं थी और वो काफी लम्बा भी था

, जिससे अगले कमरे की रोशनी भी उसमें पूरी नहीं आती थी। गलियारे के अंत में एक दरवाजा था

, जो मकान के पिछले हिस्से में खुलता था लेकिन उस पर अंदर की ओर से ताला जड़ा हुआ था।

''हमें बाहर आने-जाने के लिए सामने के दरवाजे का ही उपयोग करना होगा।

"-डोंगरा ने कहा।

''इस गलियारे में लाइट नहीं लग सकती थी

?"-जय बोला।

''लग सकती थी लेकिन ये सब इंतजाम मैंने नहीं किए हैं। ये हमारे होस्ट साहब ने ही एक-दो दिन पहले यहां आकर किए थे। अब उन्होंने ही गलियारे में लाइट नहीं लगाई तो क्या किया जा सकता है

? यहां कोई व्यवस्था भी नहीं दिख रही है

, जिससे यहां लाइट लगाई जा सके। वैसे भी यहां लाइट की कोई खास जरूरत नहीं है। हमें इस गलियारे में आने की कोई जरूरत ही नहीं है। ये दरवाजा तो वैसे भी लॉक्ड है।

"

फिर वे लोग सीढिय़ां चढ़कर ऊपर पहुंचे।

सीढिय़ां ऊपर एक चौड़े गलियारे में खत्म होती थीं

, जिसके अंत में एक दरवाजा था

, जिस पर नीचे घर के पिछले दरवाजे की तरह ही ताला लगा हुआ था। गलियारे में दोनों ओर दो-दो कमरे थे लेकिन उनमें एक अजीब बात थी। आम तौर पर ऐसे कमरों के दरवाजे आमने-सामने होते हैं लेकिन उन कमरों के दरवाजे आमने-सामने न होकर एक-दूसरे से थोड़ी दूरी पर बने हुए थे

, जिससे दरवाजों के सामने सामने वाले कमरे का दरवाजा न होकर दीवार थी।

उन्होंने कमरों में जाकर भी देखा। हर कमरे में दो-दो पलंग थे। बिस्तर अच्छे से लगा हुआ था और चादर

, कम्बल वगैरह की भी पूरी व्यवस्था थी। हर पलंग के पास एक बड़ी खिड़की भी थी

, जिसमें कोई ग्रिल नहीं लगी थी। बस लकड़ी के पल्ले थे। उन्हें खोलकर देखने पर बाहर रात के घनघोर अंधेरे में डूबा जंगल दिखाई दे रहा था

, जो अपने-आप में बेहद रहस्यमयी और डरावना प्रतीत हो रहा था।

''और ये कमरा

?"-कमरों को अंदर से देखकर जब वे लोग वापस बाहर गलियारे में लौटे तो अनुराग गलियारे के अंत वाले कमरे-जिसमें ताला लगा था-की ओर इशारा करते हुए बोला-

''इसमें भी नहीं जाना है

?"

"अब ताला लगा है तो नहीं ही जाना है।

"-डोंगरा बोला।

''क्या मतलब ताला लगा है

? तुम्हारे पास इसकी भी चाभी नहीं है

?"

''मेरे पास इसकी चाभी क्यों होगी

?"-डोंगरा हैरानी से बोला।

''क्यों

? तुम केयरटेकर हो या घसखुदे

?"

''मिस्टर अनुराग!

"-डोंगरा सख्त स्वर में बोला-

''माइण्ड योर लैंग्वेज।

"

''अनुराग की ओर से मैं माफी मांगता हूं

, डोंगरा साहब।

"-जय जल्दी से बोला-

''लेकिन हम सभी ये जानना चाहते हैं कि आप बिना चाभियों के ही इस मकान के केयरटेकर कैसे बने हुए हैं

?"

डोंगरा ने जय के चेहरे पर नजर मारी

, जैसे उसके स्वर में छिपे हुए व्यंग्य को समझ गया हो। फिर बोला-

''मैं नाम के लिए ही यहां का केयरटेकर हूं। इस मकान की देखरेख मुख्य रूप से कंपनी ही करती है। मुझे बस मकान की उतनी देख-रेख करने के लिए कहा गया था

, जितनी की जरूरत है। और जितना कि कहा जाए। बिना निर्देश के मुझे यहां कुछ भी करने की बल्कि यहां आने तक की सख्त मनाही है। पिछले एक साल में मुझे एक बार भी यहां आकर कुछ करने के लिए नहीं कहा गया। इन बंद दरवाजों की चाभी मेरे ख्याल से कंपनी वालों के पास ही होनी चाहिए।

"

''ये दरवाजा बंद। पिछला दरवाजा बंद। स्टोर रूम में नहीं जाना है। इस घर का आधे से ज्यादा हिस्सा तो रिस्ट्रिक्टेड एरिया बना रखा है।

"-अनुराग बोला।

जवाब में डोंगरा ने कुछ नहीं कहा।

घर काफी बड़ा था। रात होने के कारण उन लोगों ने घर के मुख्य-मुख्य कमरों में जाकर देख लिया। फिर ऊपर गलियारे वाले कमरों में ही सोने का निर्णय लिया गया। उन लोगों ने डिसाइड किया कि एक कमरे में राज और जय

, बगल वाले में प्रीति और डॉली

, उसके सामने वाले में डोंगरा और अनुराग और उसके बगल वाले कमरे में रिंकी और मोहिनी रहेंगें।

''हमें अपनी सुरक्षा का भी ध्यान रखना होगा।

"-राज गम्भीर स्वर में बोला।

''सुरक्षा

?"-अनुराग बोला-

''बड़ी जल्दी याद आ गई सुरक्षा की

?"

राज ने अनुराग की ओर देखा

, फिर बोला-

''देखो

, अब हम यहां इतनी दूर आ ही गए हैं तो जो चीजें जरूरी हैं

, उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते।

"

''तुम कहना क्या चाहते हो

?"-जय बोला।

''हम शहर से काफी दूर हैं। हमारे पास शहर से कॉन्टैक्ट करने का कोई साधन नहीं है। और यहां भी उस

'कॉफिन मैन

' जैसी शख्सियत ने जिस तरह हमारा स्वागत किया

, वो कुछ ज्यादा राहत देने वाला नहीं है। इससे तो अच्छा था वो आता ही नहीं।

"

''सही कहा।

"-मोहिनी सिर हिलाते हुए बोली-

''मुझे तो पूरा विश्वास है कि आज रात मुझे डरावने सपने आएंगें और उनमें वो

'कॉफिन मैन

' ही दिखेगा। मेरे दिमाग में वही घूम रहा है।

"

''बेहतर यही होगा कि रात को हम निगरानी का इंतजाम करके रखें।

"

''निगरानी

?"

''हां। हममें से दो-दो लोग दो शिफ्ट में जागकर पहरा देंगें। बाकी लोग कमरे में सोएंगें जरूर लेकिन एकदम बेखबर होकर नहीं। सबको ऐसे सोना है कि जरूरत पडऩे पर एक आहट होने पर तुरंत जाग सकें।

"

''सोने पर भी किसी का बस चलता है क्या

?"-प्रीति हैरानी से बोली-

''मैं तो घोडिय़ां बेचकर सोती हूं।

"

''घोडिय़ां

?"-मोहिनी चौंककर बोली।

''आदमी लोग घोड़े बेचकर सोते हैं। मैं घोडिय़ां बेचकर सोती हूं।

"

मोहिनी ने हंसते हुए हाथ से प्रीति के कंधे पर हल्के से धक्का दिया।

''तीन दिन के लिए अपनी घोडिय़ां मत बेचना।

"-राज बोला-

''यहां से लौटने के बाद सारी घोडिय़ां इकट्ठे बेच देना। लेकिन यहां हमें सावधान रहने की जरूरत है।

"

''भाई सही कह रहा है।

"-इस बार अनुराग ने भी राज के फैसले को सहमति प्रदान की।

''कमरों के दरवाजे खुले रहेंंगें

, जिससे किसी भी तरह की मदद की जरूरत पडऩे पर हम तुरंत एक-दूसरे के पास जा सकें।

"

''तुम्हारे बात करने के ढंग से तो लग रहा है

"-मोहिनी सस्पेंस भरे स्वर में बोली-

''जैसे रात में हम पर कोई हमला करने वाला है।

"

''अगर वो भी हो जाए तो कोई हैरानी की बात नहीं होगी।

"-राज सपाट स्वर में बोला।

''चिल मारो यार!

"-जय बोला-

''हमारा बाहर से कोई कॉन्टैक्ट नहीं है लेकिन हम

'पैरानॉर्मल होल्ड

' की जानकारी में यहां आए हैं। इस चैलेंज में भाग लेने के लिए हमारा अलग से दो-दो लाख डॉलर का बीमा है

, जो हममें से किसी को भी कुछ होने की स्थिति में कंपनी देगी। तो हमारी जान की फिक्र हमसे ज्यादा कंपनी को होनी चाहिए। हॉरर एंटरटेनमेंट के माध्यम से पैसा कमाना उनका काम है तो थोड़ा-बहुत इफैक्ट तो वो देंगें ही-जैसे वो 'कॉफिन मैन'-और ये बात हम पहले से जानते थे लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि कोई हमें मार देना चाहता है। मेरे ख्याल से यहां का सूनेपन का माहौल तुम्हारे दिमाग पर कुछ ज्यादा ही हावी हो गया है।

"

''तुम चाहे जो भी कहो

"-राज बोला-

''लेकिन मुझे अब सारी चीजें उतनी सीधी नहीं लग रहीं

, जितनी होनी चाहिए।

"

''राज

सही कह रहा है।

"-अनुराग बोला।

''और तुम्हारी ये बात भी गलत है

"-जय बोला-

''कि हमारे पास बाहर कॉन्टैक्ट करने का कोई साधन नहीं है। मिस्टर डोंगरा के पास मोबाइल है क्योंकि वे इस चैलेंज के प्रतिभागी नहीं हैं। कंपनी के प्रतिनिधि के रूप में हमारे साथ हैं। हमारी मदद के लिए। जरूरत पडऩे पर ये हमारे लिए बाहर कॉन्टैक्ट कर सकते हैं।

"

''लेकिन उसी हालत में

"-डोंगरा बोला-

''जब एकदम ज्यादा जरूरी है। एकदम किसी की जान पर बनी होने जैसी इमरजेंसी हो। वरना तीन दिनों तक मुझे भी मोबाइल को हाथ नहीं लगाना है। मैंने अभी ही मोबाइल ऑफ करके रखा हुआ है। अगर कुछ विशेष गड़बड़ नहंी होती है-जो कि नहीं ही होनी चाहिए-तो इन तीन दिनों में मैं मोबाइल को हाथ भी नहीं लगाऊंगा।

"

''देखा

?"-जय डोंगरा की ओर हाथ करके राज से बोला-

''हमारे पास मोबाइल भी है। हम बस शहर से दूर जंगल के एक सूने मकान में हैं

, जो हॉन्टेड प्लेस के रूप में कुख्यात है। बस इसीलिए तुम इतना डर रहो हो। और मुझसे पूछो तो तुम कुछ ज्यादा ही जल्दी डर गए। उस 'कॉफिन मैन' के ड्रामे से तुम इतनी ज्यादा दहशत में आ जाओगे

, ये मैंने नहीं सोचा था।

"

''भूल जाओ

'कॉफिन मैन

' को।

"-राज सख्त स्वर में बोला-

''मुझे ये बताओ

, मैं जो कह रहा हूं

, उसे मानने में कोई दिक्कत है क्या

? क्या ऐसी जगह में तुम सचमुच बेफिक्र होकर चादर तान कर सो जाना चाहोगे

, जब बाहर कोई निगरानी करने वाला भी न हो

?"

जय खामोश हो गया।

''भाई

, मैं तो राज से पूरी तरह सहमत हूं।

"-अनुराग दोनों हाथ सामने की ओर करते हुए बोला-

''मुझे तो इसमें सेंस ही सेंस नजर आ रहा है। वैसे भी उन कंपनी वालों को हमें डराने का जो भी प्लान है तो हम इतने सावधान रहेंगें

, तभी उन डराने वालों को मुंह तोड़

, सिर तोड़ जवाब दे सकेंगें। बेखबर होकर सो जाएंगें

, तब तो वो साले हमारा तमाशा बना कर रख देेंगें।

"

''मिस्टर राज जो कह रहे हैं

"-डोंगरा भी बोला-

''उसे मानने में भी कोई बुराई नहीं है।

"

''ओके।

"-जय ने हार मानने वाले अंदाज में अपने हाथ आगे कर दिए।
 
मीटिंग रूम में ही खाना खाने के बाद सभी लोग ऊपर अपने कमरों में पहुंच गए।

ऊपर जाने से पहले उन्होंने नीचे के दरवाजे-खिड़कियां अंदर से बंद करके उन्हें अच्छी तरह चैक कर लिया था। सीढिय़ों पर भी दरवाजा था

, जिसे उन्होंने बंद कर लिया था।

अब सीढिय़ों के रास्ते नीचे से किसी के ऊपर आने का सवाल ही पैदा नहीं होता था।

गलियारे में डॉली मोहिनी से टकरा गई।

''मजा आ रहा है न

?"-मोहिनी के स्वर में एक्साइटमेंट था।

''हां।

"-डॉली बोली-

''तुमसे एक बात पूछनी थी।

"

''क्या

?"

''तुम रिंकी को देखकर इतनी चौंक क्यों गई थी

?"

डॉली का सवाल सुनकर मोहिनी के चेहरे पर हल्की उदासी की झलक दिखाई देने लगी।

''क्या हुआ

?"-डॉली चौंक गई-

''अगर तुम नहीं बताना चाहती हो तो जाने दो। ऐसा कोई जरूरी नहीं है...।

"

''मेरी एक छोटी बहन थी

"-मोहिनी उसकी बात बीच में ही काटते हुए बोली-

''मैं बहुत प्यार करती थी उससे। लेकिन एक एक्सीडेंट में वो नहीं रही।

"

''ओह!

"-मोहिनी का स्वर इतना उदास हो गया था कि डॉली को धक्का-सा लगा-

''आई एम सॉरी!

"

''रिचा था उसका नाम। रिंकी बिल्कुल रिचा जैसी दिखती है।

"

''अरे!

"

''हां। मैं भी उसे देखकर हैरान रह गई थी।

"

''तुम दोनों यहां गलियारे में खड़ी रहकर ही बातें करती रहोंगीं क्या

?"-अनुराग कमरे से एक पुरानी कुर्सी लेकर बाहर निकलते हुए बोला-

''अगर गप्पें ही मारनी हैं तो अपने पार्टनर एक्सचेंज कर लो। रात भर गप्पें मारना। हम लोगों का भी यहां बाहर बैठे-बैठे टाइम पास होते रहेगा।

"

डॉली ने मोहिनी को

'गुड नाइट

' कहा और अपने कमरे में चली गई।

वहां प्रीति पहले ही बिस्तर पर लेटी थी और सोने की तैयारी कर रही थी।

दोनों के पलंग के सिरहाने बनी खिड़कियां बंद थीं लेकिन बाहर चल रही तेज हवाओं से खिड़की के पल्ले भड़भड़ा रहे थे। साथ ही बाहर से पेड़ों के हिलने से होने वाली सरसराहट की तेजी आवाज भी सुनाई दे रही थी।

''निगरानी ड्यूटी पर कौन-कौन है

?"-प्रीति बोली।

''अनुराग और जय।

"-डॉली अपने बिस्तर पर लेटते हुए बोली।

''राज ने अच्छा प्लान बनाया।

"-प्रीति डॉली की ओर करवट करके लेटते हुए बोली-

''वरना यहां इस तरह के माहौल में नींद भी मुश्किल से आती।

"

''हां।

"-डॉली मुस्कुराई-

''राज के फैसले ज्यादातर सही ही होते हैं।

"

''तुम तो उसकी फैन बन गई हों।

"-प्रीति शरारत भरे स्वर में बोली-

''पता है

, कॉलेज में वो मेरे पीछे लट्टू हुआ करता था। मुझे हमेशा डर लगता था कि कभी उसने मुझसे अपने दिल की बात कह दी तो मैं उसे इनकार कैसे कर पाऊंगी। कर भी पाऊंगी या नहीं

? लेकिन उसने कभी एक शब्द भी नहीं कहा।

"

''पता है।

"-डॉली बोली-

''वो तुम्हारे बारे में जब भी बात करता है

, उसी से पता चल जाता है कि वो तुम्हें कितना चाहता था।

"

''था

? मतलब अब नहीं चाहता

? ओह हां। अब भला क्यों चाहेगा

? अब तो उसे तुम मिल गई हो।

"

''ऐसा नहीं है। मैं और राज बस दोस्त हैं।

"

''सच में

?"-प्रीति का स्वर और भी शरारती हो उठा।

''सच

, लेकिन

"-डॉली थोड़ा ठहरकर बोली-

''आगे की नहीं कह सकती।

"

उसकी उस बात पर प्रीति जोर से हंस पड़ी।

फिर वैसे ही हल्की-फुल्की बातें करते हुए दोनों को कब नींद ने अपने आगोश में ले लिया

, उन्हें पता भी नहीं चला।

पहला दिन

''जाग गईं

?ÓÓ

डॉली की नींद खुली। सामने राज बैठा था।

''तुम!

"-डॉली बिस्तर पर उठ बैठी-

''किस टाइम सोये रात में

?"

''टाइम से सो गया था। तुम बताओ

, अच्छे से सोईं या नहीं

?"

वो खोई-खोई सी खिड़की से अंदर आ रही सुबह की गुलाबी धूप को देखती रही।

''क्या हुआ

?"-राज बोला।

''यहां बहुत सन्नाटा है।

"-वो धूप की ओर देखते हुए बोली।

''जंगल है न। दिल्ली थोड़े ही है

, जहां गाडिय़ों का शोर सुनाई देगा।

"

''सही कहा

"-वो बोली

, फिर कुछ देर रूककर उसने कहा-

''वैसे सच पूछो तो दिन भर के डरावने अनुभव के बावजूद मेरी रात बहुत बढिय़ा बीती।

"

''गुड!

"

''सब कुछ एकदम शान्त लग रहा था। शहर से दूर आकर सचमुच अच्छा लगता है। मैं पहले भी शहर की भीड़-भाड़ से दूर रह चुकी हूं लेकिन इस जगह की बात कुछ अलग है। यहां तो ऐसा लगता है...जैसे हम किसी और ही दुनिया में आ गए हों।

"

''बस...बस...।

"-राज उठते हुए बोला-

''अब ज्यादा कल्पनाशील होने की जरूरत नहीं है। फ्रैश होकर तैयार हो जाओ। आज किचन की ड्यूटी प्रीति और मोहिनी की है। वो दोनों ब्रेकफास्ट बनाने में जुटी हैं। कल पूरा दिन तुम्हें और रिंकी को किचन सम्भालना होगा।

"

''ओके।

"-डॉली बिस्तर से उठते हुए बोली।

उन्होंने घर के बाहर कुर्सियां डाल लीं थीं

, जहां सबने एक साथ बैठकर खामोशी के साथ ब्रेकफास्ट किया।

''वाह!

"-अनुराग बोला-

''मजा आ गया। इसे कहते हैं पिकनिक!

"

''तुम यहां पिकनिक मनाने आये हो

?"-जय बोला।

''क्यों

? मनाने आया हूं तो इसमें तुम्हारे बाप का क्या जाता है

?"

''अबे

, बाप तक मत जा।

"-जय ने धमकाया।

''क्यों तुम लोग सुबह-सुबह राशन-पानी लेकर एक-दूसरे पर चढ़े जा रहे हो

?"-प्रीति ने जय को टहोका।

''कुछ सोचा है

, अब हम लोगों को करना क्या है

?"-डोंगरा बोला।

सबकी नजरें उसकी ओर घूम गईं।

''क्या क्या करना है

?"-अनुराग बोला।

''मतलब

, हम सारा दिन यहीं ऐसे बैठे तो नहीं रह सकते न

?"

''नहीं।

"-अनुराग ने दांये-बांये सिर हिलाया-

''हम पार्टी करेंगें। आइये

, आप हमें यहां आकर डांस दिखाइये।

"

डोंगरा के चेहरे पर नाराजगी के भाव उभरे।

''अभी सुबह-सुबह क्या करना है

?"-मोहिनी जल्दी से बोली-

''घूमेंगें यहीं आसपास। दूर जाने से तो उस

'कॉफिन मैन

' ने मना किया है।

"

''ऐसी तैसी उस साले

'कॉफिन मैन

' की।

"-अनुराग ने बुरा-सा मुंह बनाया।

''नहीं

, अनुराग!

"-मोहिनी नाराजगी भरे स्वर में बोली-

''हमें तीन दिन ही यहां रूकना है। एक-दो छोटे-मोटे नियमों का पालन करने से कुछ घिस नहीं जायेगा।

"

''नियमों का पालन करता है मेरा जूता!

"-अनुराग कॉफी की चुस्की लेते हुए धीमे से बड़बड़ाया।

''क्या कहा

?"

''कुछ नहीं। मैंने कहा नियमों का पालन करना ही होगा। खबरदार कोई जंगल की ओर गया तो!

"

मोहिनी अनिश्चित भाव से उसकी ओर देखती रही।

कुछ देर तक वो लोग यूं ही इधर-उधर की बातें करते रहे।

''मैं अभी आया।

"-फिर अनुराग वहां से उठकर चला गया।

अनुराग घर के अंदर जाने की जगह घर के बगल से होते हुए पीछे की ओर चला गया। वो सब लोग वहां बातों में व्यस्त थेे। राज ने ही अनुराग का घर के पीछे की ओर जाना नोटिस किया।
 
अनुराग को गए हुए थोड़ी देर हो गई तो राज कुर्सी से उठते हुए बोला-

''मैं अभी आया।

"

''किधर

?"-जय बोला-

''वो अनुराग ही नहीं आया अभी तक।

"

''उसी को देखने जा रहा हूं।

"

''ओके।

"

राज घर के पिछले हिस्से में पहुंचा। पिछले हिस्से में भी सामने की तरह ही जंगल से घिरी हुई काफी बड़ी खुली जगह थी। वहां एक ही कार खड़ी थी

, जो कि अनुराग की थी। लेकिन अनुराग वहां कहीं नजर नहीं आ रहा था।

अनुराग की तलाश में राज ने चारों ओर नजरें दौड़ाईं। फिर उसकी नजरें मकान के पिछले हिस्से पर स्थिर हो गईं।

वहां वो दरवाजा नजर आ रहा था

, जिसके उस पार अंदर की ओर जाने के लिए गलियारा था। जिसमें उस ओर से ताला लगा था।

दरवाजे से नीचे उतरने के लिए सीढिय़ां थीं। दरवाजे के बगल में थोड़ी ही दूरी पर एक कमरा ऐसा बना था

, जो मकान से बाहर की ओर उभरा हुआ प्रतीत हो रहा था। उस कमरे का बड़ा-सा लकड़ी का दरवाजा बंद था

, जिस पर ताला झूल रहा था। ताले और दरवाजे पर जमी धूल की परत बता रही थी कि वो लम्बे समय से नहीं खुला था।

शायद वही वो स्टोर रूम था

, जिसमें जाने के लिए उस रहस्यमयी कॉफिन मैन ने उन्हें मना किया था।

क्या था उस स्टोर रूम के अंदर

?

उस स्टोर रूम को देख कर रात की सारी बातें राज को याद आ गईं। उस ताबूत से उस रहस्यमयी

'कॉफिन मैन

' का निकलना

, फिर उतने ही रहस्यमयी ढंग से गायब हो जाना।

तभी पीछे से किसी ने राज के कंधे पर हाथ रखा।

राज चौंक कर पीछे घूमा। वो ख्यालों में इतना खो गया था कि भूल ही गया था कि वो वहां अनुराग को देखने आया था।

उसके पीछे अनुराग खड़ा था। उसका चेहरा गम्भीर था।

''अनुराग!

"-राज बोला-

''तुम कहां थे

? तुम्हें देर हो गई तो मैं तुम्हें देखना आया था...।

"

''मैं यहां कार में सामान चैक करने आया था। कार में रखी पेट्रोल की कैन गायब है। और यहां

"-उसने पीछे पेड़ों की कतार की ओर नजर डाली-

''मुझे कुछ मिला है।

"

''क्या मिला है

?"

''तुम लोग भी देखना चाहोगे

?"

''क्यों नहीं

?"

''चलो

, बाकी सबको भी बुला लो। फिर सब एक साथ ही चलते हैं।

"

वे मकान के सामने वाले हिस्से में पहुंचे।

''मेरी कार में पेट्रोल की कैन रखी थी

"-अनुराग बोला-

''सच सच बताओ

, उसे किस ने निकाला

?"

''मैंने!

"-मोहिनी बोली-

''और कौन निकालेगा

? मैंने उसे अंदर रख दिया है।

"

''क्यों

? कार में कौन खाए जा रहा था उसे

?"

''पता नहीं। मुझे लगा वो

'कॉफिन मैन

' या कोई शरारत में उसे ही उठाकर न फेंक दे। कार में पेट्रोल कम है न।

"

''अनुराग ने पीछे कुछ देखा है

"-राज बोला-

''जिसे देखना हो

, हमारे साथ चलो।

"

सभी उठकर उनके साथ हो लिए।

वो लोग मकान के पिछले हिस्से में पहुंचे। अनुराग जंगल की ओर बढ़ गया।

''एक मिनट।

"-मोहिनी बोली-

''तुम जंगल में क्यों जा रहे हो

? हमें मना किया गया है...।

"

''अब तो जा ही चुका हूं।

"-अनुराग बिना रूके आगे बढ़ते हुए बोला-

''और मुझे जो मिला है

, वो काफी दिलचस्प है। तुम सब लोग भी देखना चाहोगे। इसलिए फिजूल बातें करके परेशान मत करो।

"

सब लोग अनुराग के पीछे-पीछे जंगल में प्रवेश कर गए। पेड़ काफी घने थे

, जिससे उनके उस पार नजर नहीं आ रहा था। थोड़ी दूर चलने के बाद सबके कदम थम गए।

उनके सामने एक कब्रिस्तान था।
 
वो काफी पुराना और काफी बड़ा कब्रिस्तान था। उसके चारों ओर चार फीट ऊंची चहारदीवारी जैसी भी बनी हुई थी। वो जिस हिस्से से निकलकर आए थे

, उनके सामने दीवार ही थी। अनुराग और उसके पीछे बाकी सब लोग चलते हुए दूसरी ओर पहुंचे

, जहां एक पुराना लोहे का गेट भी नजर आ रहा था। गेट भी बेहद पुराना और जंग खाया हुआ था।

''कब्रिस्तान

?"-डॉली बोली-

''इतनी वीरान जगह पर

?"

''एग्जैक्टली यही बात मेरे दिमाग में आई थी

"-अनुराग बोला-

''जब थोड़ी देर पहले मैं यहां आया था।

"

''तुम यहां क्यों आए थे

?"-मोहिनी गुस्से भरे स्वर में बोली।

''इनफ मोहिनी!

"-अनुराग बोला-

''बहुत हो गया। मुझे इस ओर से कुछ आहट जैसी सुनाई दी थी तो मैं जानने के लिए इधर आ गया था। मुझे लगा कोई जानवर वगैरह होगा। कल रात छत पर हमने आहट सुनी थी

, उसके लिए भी तो

'कॉफिन मैन

' ने यही कहा था न कि वो कोई जानवर हो सकता है...।

"

''उसने तो ये भी कहा था

"-जय बोला-

''कि पिशाच भी हो सकता है।

"

''बकवास।

"-कहते हुए अनुराग आगे बढ़ा और उसने कब्रिस्तान का गेट खोल दिया।

''हे।

"-जय लपककर आगे आया-

''अंदर जाना जरूरी है क्या

?"

अनुराग ने उपेक्षा के भाव से जय की ओर देखा और कब्रिस्तान में प्रवेश कर गया।

उसके पीछे सबने एक-दूसरे की ओर देखा

, फिर वे लोग भी कब्रिस्तान में प्रवेश कर गए।

कब्रिस्तान सचमुच काफी पुराना था। लेकिन काफी बड़ा भी था। ज्यादातर कब्रें टूटी-फूटी

, जर्जर हालत में थीं। कुछ तो इतनी ज्यादा टूट-फूट चुकीं थीं कि गौर से देखने पर ही उनके होने का पता चलता था।

अचानक उन्हें एक बच्चे की खिलखिलाहट सुनाई दी।

वहां उपस्थित हर शख्स को जैसे सांप सूंघ गया।

सबकी नजरें कब्रिस्तान के एक कोने से दूसरे कोने तक दौड़ गईं।

लेकिन उनके अलावा वहां कोई नहीं दिख रहा था।

''वो आवाज कैसी थी

?"-मोहिनी सस्पेंस भरे स्वर में बोली।

''इन कब्रों को देखो

"-राज बोला-

''पता लगाओ

, क्या इनमें किसी बच्चे की कब्र भी है।

"

वे सभी वहां बनी कब्रों पर नजरें दौड़ाने लगे।

बच्चे की कब्र ढूंढने में उन्हें ज्यादा देर नहीं लगी। कब्रिस्तान के आखिरी कोने में छोटी कब्र नजर आ रही थी। उसके पास पहुंचकर उन्होंने उस कब्र पर लगे टूम्बस्टोन पर खुदी इबारत को पढ़ा।

अवर बिलव्ड सन (हमारा प्यारा बेटा)

डेविड कीन

18821890

उस टूम्बस्टोन की इबारत को पढ़कर सबको मानो सांप सूंघ गया।

''ये कब्रिस्तान इतना पुराना है

?"-जय हैरानी से बोला।

''इस पर लगा टूम्बस्टोन तो यही कह रहा है।

"-राज गम्भीर स्वर में बोला।

''तुमने हमें बच्चे की कब्र खोजने के लिए क्यों कहा

?"-अनुराग राज से गोली मारने के-से अंदाज में बोला।

''अभी थोड़ी देर पहले हमने एक बच्चे के हंसने की आवाज सुनी थी। और अब हमारे सामने एक बच्चे की सौ साल से भी ज्यादा पुरानी कब्र है। तुम्हें मुझसे कुछ और पूछना है

?"

अनुराग ने होंठ भींच लिए।

बाकी सब भी खामोश खड़े रहे।

''यहां आसपास और कब्रों को चैक करो

"-राज बोला-

''और देखो कीन सरनेम वाली और कौन-कौन सी कब्रें हैं।

"-कहने के बाद राज वहां रूका नहीं। वो खुद एक-एक कब्र के पास जाकर उनके टूम्बस्टोन चैक करने लगा।

बाकी लोग भी हरकत में आ गए।

''कीन वन!

"-एक कब्र को चैक करते हुए मोहिनी जोर से बोली।

''कीन टू!

"-थोड़ी ही देर में दूसरी कब्र को देख रहे जय ने जोर से कहा।

''कीन थ्री!

"-कुछ ही देर में अनुराग की आवाज सुनाई दी।

''कीन फोर!

"-एक कब्र पर झुकी हुई डॉली चिल्लाई।

वहां उन्हें

'कीन

' सरनेम वाली उतनी ही कब्रें मिलीं।

यानि उस बच्चे डेविड कीन को मिलाकर वहां उस सरनेम की पांच कब्रें थीं।

कब्रों की गणना करने के बाद सब फिर इकट्ठे हुए।

''लगता है

"-अनुराग बोला-

''पूरी कीन फैमिली यहीं पर रेस्ट कर रही है।

"

''ये कब्र कुछ खास लग रही है।

"-जय 'कीन फैमिली' की कब्रों के रूप में चिह्नांकित की गई कब्रों में से एक कब्र की ओर इशारा करते हुए बोला।
 
सभी उस कब्र के पास पहुंचे। वो बाकी कब्रों से थोड़ी बड़ी थी।

उस कब्र का टूम्बस्टोन भी काफी बड़े आकार का था। उस पर पत्थर पर ही खोदकर लिखा गया था-

हेयर लाइज रॉबर्ट कीन

हू लिव्ड अपॉन ह्यूमन ब्लड

(यहां जेम्स कीन सोया हुआ है। जो इंसानी खून पर जीवित रहा।)

''ओ माई गॉड!

"-मोहिनी ने अपने मुंह पर हाथ रख लिया।

सिर्फ मोहिनी ही नहीं

, कब्र पर लिखी इबारत पढ़कर वहां उपस्थित हर शख्स स्तब्ध रह गया।

''शायद हमें यहां नहीं आना चाहिए था।

"-राज गम्भीर स्वर में बोला।

कोई कुछ नहीं बोला।

तभी बादलों की गडग़ड़ाहट ने सबका ध्यान आकृष्ट किया। सबकी नजरें ऊपर की ओर उठ गईं। यकायक आसमान में इतने घने काले बादल घिर आए थे कि दिन के समय ही रात जैसा अहसास होने लगा था।

वे सब लोग कब्रिस्तान से बाहर निकले और वापस उसी मकान की ओर बढ़ गए।

बारिश की हडबडी में किसी ने किसी ने कब्रिस्तान का गेट बंद करने की ओर ध्यान नहीं दिया।

कब्रिस्तान से वापस लौटते समय जब वे लोग पेड़ों के बीच से गुजर रहे थे तो डॉली एक जगह ठिठक गई।

उसे वहां रूकते देखकर डोंगरा भी ठिठक गया हालांकि बाकी लोग आगे थे इसलिए किसी ने ध्यान नहीं दिया।

डॉली गौर से जमीन के उस हिस्से को देख रही थी।

वहां जमीन पर हर जगह घास थी लेकिन जमीन का वो हिस्सा घासविहीन था। उसे देखकर ऐसा लग रहा था

, जैसे वहां हाल ही में खुदाई करके फिर मिट्टी पाट दी गई हो।

डॉली ने डोंगरा की ओर देखा।

डोंगरा के होंठों पर मुस्कान आ गई। उसने स्वीकृति में सिर हिलाया।

''ओह!

"-डॉली के मुंह से निकला।

''तीन दिन बाद।

"-कहकर डोंगरा उसे अपने पीछे आने का इशारा करते हुए बाकी लोगों के साथ हो लिया।

डॉली ने भी एक नजर जमीन के उस हिस्से पर डाली

, फिर तेजी से चलते हुए बाकी सबके साथ हो ली।

जब तक वे घर के अंदर पहुंचे

, तब तक बाहर जोरदार बारिश शुरू हो चुकी थी।

वे लोग बाहरी कमरे में ही एक साथ बैठे

, जिसे

'मीटिंग रूम

' का नाम दिया गया था।

उस समय उनके बीच चर्चा का हॉट टॉपिक उनकी हालिया खोज वो पुराना कब्रिस्तान ही था।

''इतनी वीरान जगह में कब्रिस्तान होना अजीब नहीं है

?"-प्रीति बोली।

''वो कब्रिस्तान अभी का नहीं है।

"-अनुराग बोला-

''काफी पुराना है। उस समय यहां लोग रहते होंगें। आसपास कोई बस्ती वगैरह होगी।

"

''लोग रहते थे

"-प्रीति अनुराग की ओर घूमी-

''तो चले क्यों गए

?"

''क्या पता क्यों चले गए

?"-अनुराग ने कंधे उचका दिए-

''होगी कोई वजह। मैंने यहां का इतिहास जानने का ठेका थोड़े ही ले रखा है।

"

''लेकिन उस कब्रिस्तान को ढूंढने का ठेका तो लिया था।

"-मोहिनी नाराजगी भरे स्वर में बोली।

''कम ऑन

, मोहिनी। छोटी सी बात का बतंगड़ मत बनाओ।

"

''क्या मतलब छोटी-सी बात

? जब हमसे साफ-साफ कहा गया था कि हमें जंगल में नहीं जाना है

, यहीं इसी मकान के दायरे में रहना है तो तुम्हें जंगल में जाने की क्या जरूरत थी

? न तुम वहां जाते और न हमें वहां कब्रिस्तान होने का पता चलता।

"

''तुम कुछ ज्यादा ही एक्साइटेड हो रही हो। वो एक कब्रिस्तान ही तो है। वहां से कोई हमें खाने नहीं आ रहा है।

"

मोहिनी ने गुस्से में फिर कुछ कहने के लिए मुंह खोला लेकिन फिर सिर को इनकार में हिलाते हुए चुप ही रही।

''वैसे मुझसे पूछो तो

"-जय बोला-

''उस

'कॉफिन मैन

' के सामने तो वो कब्रिस्तान बिल्कुल भी अजीब नहीं है।

"

''ये तो बिल्कुल सही बात है।

"-अनुराग बोला-

''बहुत दिमाग खराब किया उसने कल रात। मन तो कर रहा था उसे सबक सिखा ही दूं...।

"

''तुम उसे सबक सिखाते

?"-मोहिनी उपहासपूर्ण स्वर में बोली-

''उसे ताबूत से निकलते देखकर सबसे पहले तो तुम्हारा चेहरा ही फक्क पड़ गया था।

"

''बकवास मत करो

"-अनुराग झुंझलाया-

''वो एकदम से जिस तरह वो ताबूत से बाहर निकला

, उससे मैं बस थोड़ा चौंक गया था।

"

''ही ही ही।

"

''और वैसे भी तुमसे ज्यादा ही लम्बा था वो।

"-प्रीति भी मोहिनी की साइड लेते हुए बोली।

''लम्बा होने से कुछ नहीं होता। वो ठण्डे-ठण्डे बात कर रहा था इसलिए बर्दाश्त कर गया। अगर हम लोगों को टच वगैरह करने की कोशिश करता तो उसकी दुर्गति कर देनी थी मैंने।

"

''वो तो हमारी सुरक्षा के बारे में ही बात कर रहा था।

"-राज सोचपूर्ण स्वर में बोला।

''क्या मतलब

?"-अनुराग ने चौंककर उसकी ओर देखा।

''उसने हमें यहीं रहने के लिए कहा था। जंगल में जाने से मना किया था।

"

''फिर वही बात। यार

, चले भी गए तो कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा

?"

राज ने जवाब में कुछ नहीं कहा। वो किसी सोच में डूबा लग रहा था।

''कब्रिस्तान में हमें जो बच्चे की हंसी सुनाई दी थी

"-जय राज से बोला-

''उसी के बारे में सोच रहे हो न

?"

''हां।

"-राज ने स्वीकृति में सिर हिलाया-

''पहले वो बच्चे का हंसना

, फिर एक बच्चे की कब्र का मिलना...।

"

''छोड़ो यार ये सब बातें!

"-अनुराग बोला-

''अब तो वापस लौट आए न। अब नहीं जाएंगें उस कब्रिस्तान में। ठीक है

?"

कोई कुछ नहीं बोला।

''केयरटेकर साहब दिखाई नहीं दे रहे।

"-अचानक अनुराग का ध्यान इस बात की ओर गया कि डोंगरा उनके साथ नहीं था।

''वो बाहर गए हैं।

"-मोहिनी बोली।

''अरे! मैंने ध्यान नहीं दिया।

"

तभी दरवाजे पर डोंगरा नजर आया। बारिश से बचने के लिए उसने एक हाथ में छतरी पकड़ रखी थी

, जिसके किनारों से पानी की बूंदें टपक रहीं थीं। दूसरे हाथ में उसने एक संदूक पकड़ा हुआ था।

''सन्दूक। सन्दूक। सन्दूक।

"-अनुराग ऐसे बोला

, जैसे कविता पढ़ रहा हो-

''आखिर कितने सन्दूक हैं आपके पास

?"
 
डोंगरा मुस्कुराया। उसने संदूक एक तरफ दीवार से सटकर रखी एक छोटी मेज पर रखा

, फिर छाता बंद करते हुए बोला-

''बस ये आखिरी है।

"

''अब इसमें क्या रखवायेंगें आप हम लोगों से

? हम लोगों के सिर

?"

''कपड़े उतरवा लेगा।

"-जय इतने धीरे से बुदबुदाया कि उसके बगल में बैठे अनुराग को ही सुनाई दिया-

''नंगे घूमने के लिए बोलेगा।

"

''नहीं।

"-डोंगरा वहां खाली पड़ी इकलौती कुर्सी पर बैठते हुए बोला-

''इसमें कुछ रखना नहीं है। इसमें से निकालना है।

"

''क्या है इसमें

?"-राज बोला।

''ये आप लोगों को रात में ही पता चलेगा।

"

''रात में

?"-मोहिनी बोली।

''हां।

"-अनुराग ने तुरंत मोहिनी की बात पकड़ी-

''अब रात में निकलेगा तो जाहिर है भूत ही होगा इस सन्दूक में।

"

''दरअसल

"-डोंगरा बोला-

'' 'पैरानॉर्मल होल्ड

' की ओर से मेरे द्वारा आपको दिया जाने वाला ये इकलौता टास्क है। मेरे ख्याल से हमारे होस्ट द्वारा भी आपको यहां कुछ टास्क दिए जाने थे लेकिन

'कॉफिन मैन

' ने तो इस बारे में कुछ नहीं कहा। उसने तो बस जंगल में नहीं जाने और स्टोर रूम में नहीं जाने के लिए ही कहा और गायब हो गया।

"

''यानि उस सन्दूक में क्या है

"-राज बोला-

''ये जानने के लिए हमें रात तक का इंतजार करना पड़ेगा

?"

''रात आठ बजे तक। तब तक हम खाना-पीना करके फुर्सत में हो चुके होंगें। तभी वो सन्दूक खुलेगा और तभी पता चलेगा कि टास्क क्या है

?"

''तो रात में ही लाते इस मुसीबत को।

"-जय गहरी सांस लेकर बोला-

''अभी से लाकर हमारी जान गले में अटका देने से क्या सुख मिला आपको

?"

उसकी बात से डोंगरा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

''वैसे आपको तो पता ही होगा उस सन्दूक में क्या है

?"-अनुराग गहरी निगाहों से डोंगरा को देखते हुए बोला।

''पता

? मुझे रत्ती भर भी आइडिया नहीं है कि उसमें क्या है।

"

''तो अभी खोलकर देख लें

? यहां कौन देखने वाला है

?"

''रूल मिस्टर अनुराग! आपकी नियमों को तोडऩे में बहुत दिलचस्पी रहती है। ये मत भूलिए कि इस कैम्प के कुछ छोटे-मोटे रूल भी हैं

, जिनका पालन कर लेंगें तो हमारी शान नहीं घट जाएगी। और वैसे भी मुझे तो यहां भेजा ही इसलिए गया है कि मैं सुनिश्चित करूं कि कैम्प का संचालन रूल के मुताबिक हुआ या नहीं।

"

''तो उस कब्रिस्तान में जाने के लिए भी आप हमारे कोई पॉइंट काटने वाले हैं क्या

?"-जय की भंवें उठीं।

''नहीं। उसके लिए मैं कुछ नहीं करूंगा। जंगल में न जाने के लिए

'कॉफिन मैन

' ने कहा था। अगर बाद में मुझसे पूछा जाता है कि तो मुझे जरूर बताना होगा कि आप लोग वहां गए थे। वरना मुझे इसके लिए आप पर कोई कार्यवाही करने के निर्देश नहीं हैं।

"

''उस कब्रिस्तान का झंझट कम था

"-अनुराग बोला-

''जो अब आप ये सन्दूक उठा लाए। अब रात तक यही सस्पेंस बना रहेगा कि साले सन्दूक में है क्या

?"

''बियर विद अस

, मिस्टर अनुराग।

"-डोंगरा सांत्वना भरे स्वर में बोला-

''मेरे पास तो ये सन्दूक पिछले तीन दिन से है। आपको तो कुछ ही घंटों में पता चल जायेगा कि उसमें क्या है। वैसे जहां तक मेरा अंदाजा है कोई खास चीज नहीं होगी। आप लोगों के लिए कोई टास्क ही है।

"

अनुराग खामोश हो गया।

आठ बजे से पहले ही वे सब डिनर करके फुर्सत से

'मीटिंग रूम

' में आकर बैठ गए थे।

सभी ये जानने के लिए उत्सुक थे कि उस सन्दूक में से क्या निकलने वाला था।

ठण्ड कल के मुकाबले अधिक थी इसलिये अनुराग ने आतिशदान में लकडिय़ां भी जला ली थीं

, जिससे कमरे में गर्माहट थी। लकडिय़ां लेने उसे घर से बाहर नहीं जाना पड़ा था। वहीं एक कमरे में उसे लकडिय़ों का ढेर मिल गया था

, जो शायद आतिशदान के लिये ही वहां रखी गईं थीं।

अंदर वाले कमरे में एक बड़े साइज की पुरानी मेज रखी थी

, जिसे उन्होंने लाकर उस कमरे के बीचों-बीच रख दिया था। डोंगरा जो सन्दूक लाया था

, वो उसी मेज पर रखा था।

''खोलो इसे!

"-प्रीति दोनों हाथ आगे बढ़ाकर कमरे के बीचों-बीच एक छोटी मेज पर रखे उस दूसरे सन्दूक की ओर इशारा करते हुए बड़े फर्माइशी ढंग से बोली।

''अभी रूको।

"-राज ने कहा।

''क्यों

?"

''अभी

7.59 हुआ है। आठ बजने में एक मिनट बाकी है।

"

''वाह। कमाल की समय की पाबंदी है।

"

राज कुछ नहीं बोला।

''यहां ठण्ड बहुत है।

"-मोहिनी ने दोनों हाथों से अपनी जैकेट के सामने के हिस्से को पकड़कर जैकेट को अपने शरीर पर कसते हुए कहा।

''जंगल के कारण।

"-अनुराग बोला-

''यहां बहुत घने पेड़ हैं

, जिनसे वातावरण में आद्र्रता अधिक है।

"

मोहिनी ने स्वीकृति में सिर हिलाया

, साथ ही वो धीमे से आतिशदान के और करीब खिसक गई। आतिशदान के बिल्कुल पास बैठी अपने हाथ सेंक रही प्रीति उसकी ओर देखकर मुस्कुरा दी। जवाब में मोहिनी भी मुस्कुराई।

आठ बजते ही डोंगरा आगे बढ़ा और उसने वो दूसरा सन्दूक खोला।

सन्दूक में जो कुछ था

, उसे देखकर वो हैरान हुए बिना नहीं रह सके।

एक पुराना

, बहुत पुराना टेप रिकॉर्डर!

और एक अजीब सा मोटा-सा कागज

, जो कि कागज कम

, चमड़े या ऐसी ही किसी चीज का टुकड़ा अधिक लग रहा था।

उस टुकड़े पर बड़े-बड़े सुर्ख लाल अक्षरों में एक ही शब्द लिखा था।

डोंगरा खामोशी के साथ उस शब्द को घूरता रहा।

''क्या लिखा है

?"-जय उत्सुकता के साथ बोला।

डोंगरा कुछ नहीं बोला तो राज ने वो टुकड़ा उसके हाथ से ले लिया और उसे पढ़ा।

''भूत।

"-फिर राज बोला-

''इस पर भूत लिखा है।

"

चेहरे पर हैरानी के भाव लिए जय ने उसके हाथ से वो टुकड़ा ले लिया। उसने उस पर लिखे शब्द पर नजर डाली।

राज सच कह रहा था।

उसने बाकी लोगों की ओर देखा।

सबको जैसे सांप सूंघ गया था।

''इसका क्या मतलब हुआ

?"-फिर प्रीति बोली।

''एक खाली कैसेट

, एक पुराना टेप रिकॉर्डर और इस चमड़े के टुकड़े पर लिखा है भूत। लेकिन अब सवाल ये है कि हमें क्या करना है

?"

डोंगरा ने टेप रिकॉर्डर के ऊपर लगे बटनों में से एक बटन दबाया

, खट् की आवाज के साथ कैसेट वाला खांचा खुल गया

, जिसमें उसने खाली कैसेट फंसाया और खांचे को वापस बंद कर दिया और रिकॉर्डिंग का बटन दबा दिया।

कैसेट में रिकॉर्डिंग शुरू हो गई।

''मुझसे कहा गया था

"-डोंगरा गम्भीर स्वर में बोला-

''आप लोगों का टास्क होगा इस सन्दूक में दिए सब्जेक्ट पर चर्चा करना। सन्दूक में से निकले टेप रिकॉर्डर और कैसेट से साफ है कि हमें अपनी बातचीत के सेशन को रिकॉर्ड भी करना है। चर्चा पूरी होने के बाद मुझे इस सन्दूक से निकला सारा सामान ज्यों-का-त्यों वापस सन्दूक में बंद करके सन्दूक को सील करने के निर्देश हैं। तीन दिन बाद इन्हें कंपनी को सौंप दिया जायेगा।

"

''रात के इस वक्त

"-मोहिनी बोली-

''इस जगह हमें भूत पर चर्चा करनी है

?"

''उन लोगों के पास कोई और टॉपिक नहीं था क्या

?"-प्रीति भुनभुनाई।

डोंगरा मुस्कुराया और वापस अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गया।

''मेरे ख्याल से

"-फिर वो बोला-

''हम सबको अपनी-अपनी कुर्सियां टेबल के और पास ले आनी चाहिए

, जिससे हमारी आवाजें टेप रिकॉर्डर में और भी अच्छे से रिकॉर्ड हो सकें।

"

सबने सुझाव पर अमल किया।

वे अपनी कुर्सियां उठाकर मेज पर रखे टेप रिकॉर्डर के और नजदीक खिसक आए। अब उनके बीच का घेरा और भी छोटा हो गया था।

''तो

"-डोंगरा राज से बोला-

''शुरूआत आप ही करिये।

"

''मैं

?"-राज बोला।

''आप और मिस डॉली। आखिर आप दोनों पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हैं। भूत के विषय में आपसे ज्यादा और कौन जानता होगा

? और मुझे ये जानने में भी काफी दिलचस्पी है कि आप इस दिलचस्प और गैर परंपरागत पेशे में कैसे आए

?"

''ये कोई पेशा नहीं है

, डोंगरा साहब।

"-राज गहरी सांस लेकर बोला।

''फिर

? फिर क्या है

?"

''ये एक शोध का क्षेत्र है।

"

''शोध करना भी तो पेशा ही होता है। आखिर रिसर्च स्कॉलर्स को शोध करने का पैसा मिलता है।

"

''आप ऐसा कह सकते हैं। लेकिन मेरे हिसाब से शोध करना एक जुनून होता है। कुछ जानने की दिलचस्पी

, कुछ ऐसा पता करने की महत्त्वाकांक्षा जो बहुत कम लोग जानते हों या अब तक कोई भी न जान पाया हो।

"

''शोध तो ऐसी चीजों पर किए जाते हैं

, जो वास्तविक होती हैं। जिनका अस्तित्त्व होता है। जैसे विज्ञान।

"

''विज्ञान क्या है

?"-राज बोला।

''चीजों को भौतिक

, रसायनिक या जैविक रूप से तथ्यों

, प्रयोगों

, साक्ष्यों के आधार पर समझना ही विज्ञान है।

"

''क्या पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर ऐसा नहीं करते

? क्या पैरानॉर्मल साइंस नहीं होता

?"

सब राज को देखते रहे।

''पैरानॉर्मल साइंस भी है। लेकिन सब लोगों को इसकी जरूरत नहीं पड़ती। इसलिये लोग इसका मजाक उड़ाते हैं। एक स्वस्थ्य आदमी-जो कभी बीमार न पड़ता हो-डॉक्टरों का मजाक उड़ा सकता है। उसे चिकित्सा विज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं होता कि चिकित्सा विज्ञान का अस्तित्त्व ही नहीं है। एक ट्रेन ड्राइवर का इस बात से कोई वास्ता नहीं होता कि प्लेन कैसे उड़ाया जाता है

? इसलिये अगर कभी उसे इस बारे में चर्चा करने को कहा जाये तो वो प्लेन हवा में उड़ाने का भी मजाक उड़ा सकता है। विज्ञान की ही ऐसी कई शाखाएं हैंं

, जिनका आम लोगों ने नाम तक नहीं सुना होता। जिनके बारे में आम आदमी सुनेगा तो वो उसे एकदम फिजूल लगेंगीं। उसे पर फूटी कौड़ी खर्च करना भी पैसा बर्बाद करना ही लगेगा। लेकिन लोग अरबों रूपए खर्च कर विज्ञान के उन क्षेत्रों में दिन-रात प्रयोग कर रहे हैं। न सिर्फ पैसा लगा रहे हैं बल्कि मेहनत भी कर रहे हैं। दिन-रात एक करके विज्ञान के रहस्यों का पता लगाने

, नई खोजें करने में जुटे हुए हैं। क्या उन्हें इस बात की चिंता होनी चाहिए कि आधी से ज्यादा आबादी ने उस साइंस फील्ड का नाम भी नहीं सुना

, जिसमें वे काम कर रहे हैं

? पैरानॉर्मल साइंस भी इसी तरह है। जो चीज समझ में नहीं आती

, उसका मजाक उड़ाना आसान होता है। क्योंकि उसे समझना मुश्किल होता है।

"

''इसमें अंतर है।

"-डोंगरा बोला-

''प्लेन उड़ता है। सब जानते हैं। भूत होते है या नहीं

, ये सब नहीं जानते हैं। किसी के पास भी इस बात के अकाट्य प्रमाण नहीं हैं कि भूूत होते हैं या नहीं। प्रमाण तो दूर की बात

, किसी ने देखा तक नहीं है।

"

''जो चीज दिखती ही नहीं हो

"-डॉली बोली-

''उसे देखेंगें भी कैसे

?"

''करैक्ट।

"-राज बोला-

''और इसीलिये पैरानॉर्मल साइंस का कुछ लोग-बल्कि बहुत सारे लोग-मजाक उड़ाते हैं। क्योंकि हम भूत का अस्तित्त्व साबित ही नहीं कर सकते। पैरानॉर्मल का मतलब सिर्फ भूत ही नहीं होता। ऐसी घटनाएं

, जो मानव समझ से परे हों

, सामान्य विज्ञान जिन्हें एक्सप्लेन न कर सकता हो

, पैरानॉर्मल की श्रेणी में आती हैं।

"

''लेकिन हम यहां भूतों के अस्तित्त्व के बारे में चर्चा कर रहे हैं।

"-अनुराग बोला-

''अगर भूत दिखता नहीं है तो उसकी उपस्थिति का पता कैसे चलता है

?"

''प्रेतात्माएं स्वयं अपनी उपस्थिति का अहसास कराती हैंं।

"-डॉली बोली-

''आसपास की चीजों से छेड़छाड़ करके। या फिर कभी हवा के किसी झोंके के रूप में। तापमान में परिवर्तन से भी। जैसे गर्म माहौल में अचानक बिना किसी कारण के ठण्डक का अहसास हो या ठण्डे माहौल में गर्म हवा के झोंके के रूप में।

"

उनके बीच पड़े टेप रिकॉर्डिर में कैसेट में सब रिकॉर्ड हो रहा था।

''इससे मुझे याद आया

"-अनुराग ने चुटकी बजाई-

''तुम लोगों के इक्विपमेंट कहां हैं

?"

''कैसे इक्विपमेंट

?"-राज की भंवें उठीं।

''मैंने सुना है पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर अपने साथ कुछ यंत्र जैसे रखते हैं

, जिनसे उन्हें आसपास भूत-प्रेत की उपस्थिति का अहसास हो जाता है। जैसे वो क्या कहते हैं उसे

, हां

, ईएमएफ रीडर।

"

राज और डॉली दोनों मुस्कुराए।

''क्या हुआ

? ऐसे इक्विपमेंट नहीं होते क्या

?"-अनुराग बोला।

''होते हैं।

"-डॉली बोली-

''लेकिन उनकी विश्वसनीयता अधिक नहीं होती। इसलिए हम उनका इस्तेमाल नहीं करते।

"

''ओह!

"

''वैसे भी मैंने सुना है ये इक्विपमेंट्स काफी महंगे आते हैं।

"-डोंगरा बोला-

''और मुझे संदेह है कि भूत-प्रेत पर रिसर्च करने के भी कोई पैसे देता होगा। जब पैसे ही नहीं होंगें तो कहां के इक्विपमेंट्स!

"

''ये बात वो शख्स कह रहा है

"-अनुराग मजाक उड़ाने वाले अंदाज में बोला-

''जो खुद एक भूत-प्रेतों पर आधारित फनहाउस बनाने वाली कंपनी द्वारा खरीदे गए भूत बंगले का केयरटेकर है।

"
 
डोंगरा ने घूरकर अनुराग को देखा और कोई सख्त बात कहने के लिए मुंह खोला ही था लेकिन बीच में ही राज बोल पड़ा-

''आपका कहना सही है डोंगरा साहब। भूत-प्रेत पर शोध करने के कोई पैसे नहीं देने वाला। खासतौर पर सरकार तो बिल्कुल भी नहीं। तो आप कह सकते हैं कि पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर होना मेरे लिए रोजी-रोटी का जरिया नहीं है। ये काम में पार्टटाइम

, अपनी रूचि के कारण ही करता हूं। प्रोफेशनली मैं एक राइटर हूं।

"

''राइटर

? किस तरह की किताबें लिखते हो आप

?"

''फिक्शन। मेरी अब तक दो किताबें प्रकाशित हो चुकीं हैं। दोनों हिस्टोरिकल थ्रिलर हैं। लेकिन मैं इस जोनर से काफी उकता गया था। और लिखने के लिए कुछ नया ढूंढ रहा था। आप ही की तरह मिस्टर डोंगरा

, मुझे भी भूत-प्रेतों पर बिल्कुल विश्वास नहीं था

, जब तक मेरी मुलाकात दिल्ली के मशहूर पैरासाइकोलॉजिस्ट डॉ. सतीश भारद्वाज से नहीं हो गई।

"

''डॉ. सतीश भारद्वाज!

"-प्रीति ने चुटकी बजाई-

''मैंने ये नाम सुना है।

"

''डॉ. भारद्वाज काफी मशहूर हस्ती हैं।

"-डॉली बोली।

''उनसे मिलने के बाद ही मुझे पता चला कि भूत-प्रेतों की भी एक अलग दुनिया है

, जिस पर शोध किए जाने की आवश्यकता है। ज्यादातर लोग भूत-प्रेतों के अस्तित्त्व को सीधे नकारकर पल्ला झाड़ लेते हैं और इस विषय पर बात करना भी पसंद नहीं करते या करते भी हैं तो बस मजाक ही उड़ाते हैं। और जो मानते हैं

, वे डरते हैं। खुद को इस सबसे दूर रहना चाहते हैं। हम पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर का काम है भूत-प्रेतों पर रिसर्च कर उनकी सच्चाई दुनिया के सामने लाना।

"

''लाए आप

?"

''क्या

?"

''भूत-प्रेतों की सच्चाई। दुनिया के सामने।

"

''नहीं।

"-डोंगरा की आवाज मेें व्यंग को महसूस करने के बावजूद राज शांत स्वर में बोला-

''अगर आप एकदम सीधे मुझसे पूछेंगें तो मुझे भी कहना ही होगा कि पूरी तरह तो मुझे भी भूत-प्रेतों पर विश्वास नहीं है।

"

''अरे। तब कैसे पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हुए आप

? जो खुद ही भूत-प्रेतों पर विश्वास नहीं करता वो दूसरों को क्या विश्वास दिलाएगा उनके होने का

?"

''शायद आप गलत समझ रहे हैं। पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर होने का मतलब भूत-प्रेतों पर विश्वास करना या दूसरों को भूत-प्रेतों का विश्वास दिलाना नहीं होता। पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटिंग से मतलब है ऐसी घटनाओं की छानबीन कर उनकी सच्चाई का पता लगाना

, जिन्हें पारलौकिक माना जाता है। रहस्यमयी

, अनसुलझी घटनाओं की सच्चाई का पता लगाना।

"

''ओह!

"-डोंगरा ने समझने वाले भाव से सिर हिलाया-

''तो अब तक ऐसी कितनी घटनाओं का पर्दाफाश किया है आपने

?"

''एक भी नहीं।

"

''अरे।

"

''जी हां। जैसा कि मैं आपको बता रहा था कि डॉ. सतीश भारद्वाज से हुई मुलाकात ने भूत-प्रेतों के अस्तित्त्व को लेकर मेरी विचारधारा को बहुत हद तक बदल दिया। वे इस क्षेत्र के बहुत बड़े जानकार हैं

, रिसर्चर हैं और और भी बहुत कुछ हैं। मेरी डॉली से भी मुलाकात उन्हीं के माध्यम से हुई थी। डॉली उन्हीं के यहां काम करती थी।

"

''फिर तो सच पूछो तो

"-प्रीति डॉली को कोहनी मारते हुए शरारती अंदाज में धीमे से फुसफुसाई-

''राज के पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर बनने में सबसे बड़ा हाथ तुम्हारा ही है।

"

''शटअप!

"-डॉली भी उतने ही धीमे से बोली।

''डॉ. भारद्वाज से हुई मुलाकात में उन्होंने मुझे अपने सारे जीवन के रिसर्च के बारे में बताया

, उन्होंने मुझे बताया कि किस तरह उन्होंने वर्षों तक भूत-प्रेत

, आत्माओं के संसार की सच्चाई जानने के लिए शोध किए

, विदेशों में पैरानॉर्मल रिसर्च के क्षेत्र में सक्रिय लोगों से मिले

, ऐसी जगहों पर गए

, जो हॉन्टेड जगहों के रूप में कुख्यात थीं और उन्हें ऐसे कई अनुभव हुए

, जिनके बाद अब उन्हें आत्माओं के अस्तित्त्व को लेकर किसी तरह का संदेह नहीं रह गया।

"

''यानि उन्होंने भूत देखे हैं

?"

''उन्होंने स्पष्ट रूप से तो ये मुझसे कभी नहीं कहा लेकिन जहां तक मेरा ख्याल है इस सवाल का जवाब हां है।

"

''ये तो घुमाने वाली बात हो गई।

"

''कुछ बातें कई बार सीधी कहने की जरूरत नहीं होती

, मिस्टर डोंगरा। जैसे लोग सांस लेते हैं लेकिन चिल्लाते नहीं घूमते कि वे सांस ले रहे हैं। लोग खाना खाते हैं लेकिन चिल्लाते नहीं घूमते कि उन्होंने खाना खा लिया है।

"

''मतलब

?"

''मतलब जो लोग भूत-प्रेतों के अस्तित्त्व से वाकिफ हैं

, वे भी चिल्लाते नहीं घूमते कि उनकी मुलाकात भूत से हुई है। और वैसे भी बहुत से लोग तो इस बात पर विश्वास ही नहंी करते। गम्भीरता से नहीं लेते। मजाक में उड़ा देते हैं। जो कि और भी शर्मनाक और हतोत्साहित करने वाला होता है।

"

''हतोत्साहित करने वाला

? क्यों

? भूत-प्रेत से मुलाकात होना क्या कोई इतनी बड़ी घटना होती है कि मुलाकात करने वाले का सम्मान किया जाना चाहिए

?"

''नहीं मिस्टर डोंगरा। उस नजरिए से नहीं होती

, जिस नजरिए से आप देख रहे हैं। लेकिन एक पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर के लिए होती है

, जिसने अपना जीवन ही इस उद्देश्य को समर्पित किया हो कि वो इस अनसुलझे रहस्य की गुत्थी को सुलझा कर ही रहेगा। ऐसा शख्स

, जो अपनी जान खतरे में डालकर भूत-प्रेत

, आत्माओं से सम्बन्धित कोई जानकारी दुनिया के सामने लाने की कोशिश करे और उसकी बातों का मजाक उड़ाया जाए तो ये हतोत्साहित करने से भी कहीं आगे की चीज है।

"

''राइट!

"-अनुराग बोला।

''चलिए

"-डोंगरा बोला-

''डॉ. भारद्वाज ने अपनी आंखों से कोई भूत-प्रेत देखा या नहीं

, ये तो वही बता सकते हैं लेकिन आपका क्या

? आप और मिस डॉली तो पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हैं। काफी अरसे से इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। क्या आप लोगों ने कोई भूत देखा है

?"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

सबकी नजरें राज और डॉली पर थीं।

''नहीं।

"-राज बोला-

''हम अब तक कई ऐसी जगहों पर जा चुके हैं

, जो हॉन्टेड प्लेसेज के रूप में कुख्यात हैं। लेकिन हमने अब तक कोई भूत नहीं देखा।

"

''ऐसी जगहों पर हमने कुछ अजीब चीजें

, कुछ अजीब घटनाएं जरूर नोट कीं

"-डॉली बोली-

''लेकिन सचमुच में हमारा किसी भूत-प्रेत जैसी चीज से सामना नहीं हुआ।

"

''ऐसी जगहों पर भी जो हॉन्टेज प्लेसेज के रूप में कुख्यात हैं

?"-डोंगरा बोला।

''हां। वैसे इस बारे में डॉ. भारद्वाज का कहना है कि भूत-प्रेत या आत्माएं किसी को अपनी उपस्थिति का अहसास कराना चाहें

, तभी सामने आते हैं। वरना आम तौर पर वे अंधेरे की दुनिया में ही रहना पसंद करते हैं। यही कारण है कि उनकी दुनिया इतनी रहस्यमयी है। इतनी कि उनके अस्तित्त्व पर ही प्रश्रचिह्न लगा हुआ है।

"

''तो जब आपने किसी भूत को देखा ही नहीं

"-डोंगरा बोला-

''तो इस बात का सबूत ही क्या है कि भूत होते हैं

?"

''आप जीवित हैं या नहीं

?"

अचानक उस सवाल पर डोंगरा अचकचा गया।

''ये कैसा सवाल हुआ?

"-वो बोला।

''आपका ये दिमाग जो

24 घंटे काम करता है

, यहां तक कि नींद में भी सक्रिय रहता है और शरीर की तमाम क्रियाओं का संचालन करता है

, सपने दिखाता है

, सैंकड़ों

, बल्कि हजारों कम्प्यूटरों जितना डेटा एकत्र करके रखता है

, आपको क्या लगता है आपकी मौत के बाद ये एकदम से खत्म हो जाएगा

?"

''मतलब

?"

''मतलब यही कि जो शक्ति शरीर को चलाती है

, दिमाग का संचालन करती है

, जिसे कुछ लोग आत्मा भी कहते हैं

, कई बार मृत्यु के बाद भी अपना स्वतंत्र अस्तित्त्व बनाए रखती है। उसे ही भूत या आत्मा की संज्ञा दी जाती है।

"

''अगर ऐसा है तो इतनी हत्याओं की घटनाएं होती हैं। उनमें मरने वालों की आत्माएं

, उनके भूत खुद हत्यारे को मार कर या उनका खून पीकर अपना बदला क्यों नहीं ले लेते

? विश्वयुद्ध में बेतादाद में लोग मारे गए

, उनकी आत्माएं

, उनके भूत क्या अब भी पृथ्वी पर ही विचरण कर रहे हैं

? कर रहे हैं तो लोगों को दिखते क्यों नहीं

?"

''यही तो रहस्य हैं

, जिनका पता लगाना है।

"

''ये तो टालने वाली बात हुई। सवाल से भागने की कोशिश हुई।

"

''आप गणित के बारे में क्या जानते हैं मिस्टर डोंगरा

?"

''अब ये गणित कहां से आ गया

?"

''मेरे सवाल का जवाब दीजिये। मेरी तरह सवाल से भागिये मत।

"

''मैंने मैथ्स से स्नातक किया है।

"-वो गर्व से बोला।

''दैट्स गुड। तो अब आप ही बताइए

, एक गणित का लम्बा-चौड़ा सवाल आपको हल करने के लिए दिया जाता है। लेकिन उसके बीच के एक खास हिस्से को गायब कर दिया जाता है। क्या अब आप उस सवाल को हल कर सकेंगें

?"

''अरे। ऐसा कैसे हो सकता है

? हिस्सा गायब करना तो दूर की बात

, गणित में तो अगर एक चिह्न बदल गया तो पूरा सवाल गड़बड़ा सकता है। गड़बड़ा क्या सकता है

, उसे हल करना ही मुश्किल हो जायेगा।

"

''इसी में आपके सवाल का जवाब छिपा है।

"

''वो कैसे

?"

''भूत कैसे बनते हैं

?"

''मैं कैसे जानूंगा

? मैंने आपको बताया न कि मैं तो भूत-प्रेत पर विश्वास ही नहीं करता।

"

''आम धारणा के अनुसार ही बताइये। जो आपने सुन रखा है

, उसी के आधार पर बताइये।

"

''मरने के बाद ही भूत बनते हैं।

"

''बिल्कुल। मौत खुद एक ऐसा रहस्य है

, जिसे आज तक वैज्ञानिक तक नहीं सुलझा पाए हैं। मौत के बाद क्या होता है

? आत्मा

, चेतना या उस ऊर्जा को जो भी नाम दे दो

, वो कहां जाती है

? तो जब इंसान मौत के रहस्यों को ही नहीं सुलझा पाया है तो मौत के बाद की चीजों को समझ पाना

, उनके बारे में निश्चित रूप से कुछ भी कह पाना तो लगभग असम्भव जैसा ही है। यानि जिस तरह गणित का सवाल हल करने के लिए उसकी पूरी जानकारी होनी जरूरी है
 
, उसी तरह भूत-प्रेतों की दुनिया के रहस्यों को सुलझाने के लिए मौत के बाद की दुनिया के रहस्य को सुलझाना बेहद जरूरी है कि आखिर मौत के बाद शरीर को संचालित करने वाली ऊर्जा कहां जाती है

? समझ लीजिए

, यही उस गणित के सवाल का गायब हिस्सा है

, जिसके बिना भूत-प्रेतों से जुड़े रहस्यों को समझ पाना यानि पूरे सवाल को हल कर पाना बेहद मुश्किल है।

"

''और जितना मैं मैथ्स को जानता हूं

"-अनुराग बोला-

''उसके आधार पर कह सकता हूं कि मैथ्स को कोई भी ऐसा सवाल जो हल न हो रहा हो

, किसी भयानक से भी भयानक भूत से भी ज्यादा डरावना है।

"

अनुराग की उस बात पर सभी हंस पड़े।

''तो जब ये इतना अनसुलझा है

"-डोंगरा बोला-

''उस हिसाब से तो फिर भूत-प्रेतों के रहस्य को सुलझाया ही नहीं जा सकता। फिर उनकी चर्चा करने या उन पर शोध करने का क्या फायदा

?"

राज हंस पड़ा।

''क्या हुआ

?"-डोंगरा की भंवें तन गईं-

''मैंने कोई हंसी की बात कह दी क्या

?"

''आपने बच्चों जैसी बात की है। मान लीजिये

, डोंगरा साहब

, आप एक एग्जाम हॉल में बैठे हैं। उसमें आपके पेपर में मैथ्स का एक दस नम्बर का सवाल है और ये दस नम्बर आपके लिये बेहद बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। आप चाहते हैं कि किसी भी तरह ये दस नम्बर आपको मिल ही जायें। दस नहीं तो कम से कम उनमें से दो-तीन

, पांच नम्बर तो मिल ही जायें। पूरे दस मिल जायें तो बात ही क्या है! लेकिन प्रश्रपत्र में प्रिंटिंग मिस्टेक के कारण उस सवाल में कहीं एक निशान-जोड़ या घटाने या गुणा-भाग का या कोई और इम्पोर्टेट अंक मिसिंग है

, जिसकी वजह से आप उसे बना नहीं सकते। अब आप क्या करेंगें

?"

डोंगरा कुछ क्षण खामोश रहा

, फिर बोला-

''मैं उस सवाल को बनाने की कोशिश करूंगा।

"

''चाहे वो न बन रहा हो

?"

''बिल्कुल।

"

''यानि आप हाथ पर हाथ धरके नहीं बैठ जायेंगें

?"

''ओह!

"-बात डोंगरा के भेजे में घुसी।-

''ओह!

"

''एग्जैक्टली। और मैं आपसे कहना चाहूंगा कि अगर आप उस सवाल पर मेहनत करेंगें

, उसे पूरे ध्यान से बनाने की कोशिश करेेंगें

, और आपकी तैयारी अच्छी है

, आपका मैथ्स स्ट्रांग है तो आप उस प्रिंटिंग मिस्टेक को भी समझ जायेंगें और प्रश्रपत्र की गलती को नजरअंदाज करते हुए सवाल को पूरा सही-सही हल कर देंगें। और आपका पेपर जांचने वाला भी फिर आपको उस सवाल पर पूरे-पूरे ही नम्बर देगा क्योंकि उसे प्रिंटिंग मिस्टेक से कोई लेना-देना नहीं है। वो सवाल जानता है और उसका हल भी। क्या मैं गलत कह रहा हूं

?''

''नहीं।

"-डोंगरा ने इनकार में सिर हिलाया-

''प्रश्रपत्रों में प्रिंटिंग मिस्टेक तो कई बार देखने को मिल जाती है। इंटेलीजेंट स्टूडेंट खुद ही सवाल को समझ जाते हैं।

"

''बस। तो भले ही वैज्ञानिक अभी मौत के रहस्य को नहीं सुलझा पाए हैं और भूत-प्रेतों

, आत्माओं की दुनिया रहस्यों के साये में है लेकिन पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेशन ऐसा ही प्रयास है एक अधूरे सवाल को हल करने का।

"

''आपका समझाने का तरीका इम्प्रैसिव है

, मिस्टर राज। ये बात तो माननी ही पड़ेगी।

"-डोंगरा प्रशंसात्मक स्वर में बोला।

राज उसकी बात पर मुस्कुरा दिया।

''लेकिन सवाल तो अपनी जगह पर कायम है

"-अनुराग बोला-

''एक पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर के रूप में जब तुम दोनों भूत-प्रेतों के अस्तित्त्व को साबित नहीं कर सकते

, तुम्हारा कहना है कि कई हॉन्टेड मानी जाने वाली जगहों पर जाने पर भी आज तक तुम लोगों ने कोई भूत नहीं देखा तो इससे तो यही साबित होता है न कि भूत होते ही नहीं है।

"

''नहीं। नहीं साबित होता।

"-राज बोला।

''कैसे

?"

''मान लो मुझे पता नहीं है कि हवा अदृश्य है। लेकिन मुझे हवा को ढूंढना है। तो मैं चाहे कुछ कर लूं

, हवा को नहीं ढूंढ सकता।

"

''मतलब?"

''समझ लो भूत-प्रेतों के साथ भी ऐसा ही है। वे दिखते नहीं हैं। या उसे ही दिखते हैं

, जिसे वे दिखना चाहते हैं। सम्भव है इसीलिए मेरा

, डॉली का या इस कमरे में बैठे किसी और शख्स का आज तक किसी भूत से सामना नहीं हुआ।

"

''मुझे तो ये घुमाने वाली बात ही लगती है। सामना नहीं हुआ

, देखा नहीं तो हम साबित कैसे करें

, मानें कैसे कि भूत होते हैं

?"

''ये तुम पर डिपेंड करता है। एक डॉक्टरी की पढ़ाई करने वाला शख्स जब किसी बीमारी के बारे में

, उसके इलाज के बारे में पढ़ता है तो क्या वो इस जिद पर अड़ा रहता है कि जब तक उसे वायरस के दर्शन नहीं होंगें

, तब तक वो ये नहीं मानेगा कि वायरस होते भी हैं

? या होते भी हैं तो वे ऐसा कुछ करते भी हैं

, जिससे बीमारी फैलती है।

"

''लेकिन वायरस तो होते हैं।

"

''एक डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहे शख्स के लिए भूत की तरह ही होते हैं

, जब तक वो उन्हें अपनी आंखों से न देख ले।

"

''लेकिन वो किताबों में उनके चित्र वगैरह तो देख सकता है।

"

''चित्र मैं भी तुम्हें भूत-प्रेतों के कितने ही दिखा सकता हूं। देखने हैं

?"

''लेकिन भूत-प्रेतों के चित्र कल्पना के आधार पर बने होते हैं। असली नहीं होते।

"

''वायरस के भी असली चित्र तुम्हें कम ही देखने को मिलेंगें।

"

''लेकिन वायरस का अस्तित्त्व वैज्ञानिक तौर पर साबित किया जा चुका है।

"

''और भूत-प्रेतों का अस्तित्त्व वैज्ञानिक तौर पर साबित किया जाना अभी बाकी है। बस इतनी सी बात है। या हो सकता है कि ये साइंस की पहुंच से ही परे हो। शायद इसीलिए साइंस इन सब चीजों को अब तक नहीं समझ पाया है।

"

''अच्छा ठीक है।

"-अनुराग बोला-

''चलो

, तुमने भूत नहीं देखा। लेकिन ऐसी कोई घटना तो बताओ

, जो भूत-प्रेतों से सम्बन्धित हो या उनके अस्तित्त्व को साबित करती हो। मैं तुमसे उस घटना का कोई सबूत भी नहीं मांगूंगा। तुम अपनी ईमानदारी से ही बताओ कि क्या ऐसी कोई घटना है

?"

राज के होंठ भिंच गए।

''यानि नहीं है।

"-अनुराग बोला।

''ऐसी कई घटनाएं हैं।

"-फिर राज बोला-

''लेकिन उनके बारे में विस्तार से चर्चा करते रहे तो पूरी रात निकल जायेगी। मैं तुम्हें उनमें से एक घटना के बारे में बताता हूं

, जो मुझे काफी दिलचस्प लगी और मैं इस घटना की मुख्य किरदार से मिलना चाहता हूं।

"

''की

?"-जय बोला-

''वो किरदार कोई औरत है

?"

''एक टीनएजर लड़की। उसका नाम क्लेयर स्मिथ है। ये केस काफी पहले डॉ. सतीश भारद्वाज के पास आया था और उन्हीं की मार्फत मुझे इसके बारे में पता चला। क्लेयर स्मिथ नाम की ये लड़की क्लेयरवोयेंट है। मतलब इसके पास एक खास ताकत है

, जिससे वो अतीत में हुई या भविष्य में होने वाली घटनाओं को महसूस कर सकती है। लेकिन उसकी ये ताकत उसे मौत के बाद की दुनिया में अस्तित्त्व रखने वाली ताकतों के प्रति वल्नरेबल बना देती हैं। कमजोर बना देती हैं। ऐसी किसी भी जगह

, जहां कुछ बहुत बुरी घटना हुई हो या होने वाली हो

, जाना उस लड़की को मानसिक रूप से बुरी तरह प्रभावित करता है। उसे उस घटना की झलकियां दिखाई देती हैं

, जिससे उसके दिमाग पर काफी विपरीत प्रभाव पड़ता है। कुछ ही दिनों पहले की बात है

, संयोग से ये लड़की-क्लेयर-एक ऐसी जगह पर थी

, जहां एक कत्ल हो जाता है। फिर क्लेयर को उस लड़की की आत्मा दिखाई देती है

, जो मर चुकी थी।

"

कमरे में केवल राज की आवाज गंूज रही थी। हर कोई दम साधे उस विचित्र घटना के बारे में सुन रहा था।
 
''फिर वो आत्मा क्लेयर के शरीर पर कब्जा कर लेती है

, जिसे भूत-प्रेत विशेषज्ञों की भाषा में

'पजेशन

' कहा जाता है। और क्लेयर के ही हाथों से उसके पिता की हत्या कर देती है। अब दोषी कौन हुआ

? क्लेयर

? या उस लड़की की प्रेतात्मा

, जिसने क्लेयर के माध्यम से उसके पिता का खून करवाया

?"

''प्रेतात्मा।

"-मोहिनी के मुंह से निकला।

''एग्जैक्टली। लेकिन इस कमरे में बैठे ज्यादातर साहेबान की तरह ही कानून भी तो भूत-प्रेतों पर विश्वास नहीं करता। तो उनकी नजर में कातिल कौन है

?"

''क्लेयर।

"-डोंगरा मंत्रमुग्ध स्वर में बोला।

''जी हां। और अब समस्या ये है कि उस बेचारी लड़की को-जो पहले ही अपने ही हाथों से अपने पिता की हत्या होने के गम में घुल-घुलकर मरी जा रही है-कानून से कैसे बचाया जाये

? ये तो अच्छा हुआ कि इस केस की जांच में जो इंस्पैक्टर लगा था

, वो भला आदमी निकला और उसके कुछ साथी भी उस लड़की की सहायता के लिए प्रयास कर रहे हैं वरना पता नहीं उस बेचारी लड़की का क्या होता

?"

''ये सच्ची घटना है

?"-अनुराग ऐसे बोला

, जैसे उसे विश्वास न आ रहा हो।

''डॉ. सतीश भारद्वाज काफी समय से क्लेयर का केस देख रहे हैं। ये सब मुझे उन्हीं से पता चला है। मैंने क्लेयर की तस्वीर

, वीडियो से लेकर उसकी मेडिकल हिस्ट्री वगैरह भी देखी है। शायद किसी दिन उससे मुलाकात भी हो जायेगी।

"

''जैसा तुमने बताया

"-जय बोला-

''उस हिसाब से तो ये जगह तुम्हारी उस क्लेयर के लिए काफी खतरनाक है।

"

राज ने प्रश्रसूचक भाव से उसकी ओर देखा।

''अरे भाई

"-जय बोला-

''जब वो ऐसी किसी जगह पर नहीं जा सकती

, जहां कुछ गलत हुआ हो

, तो ये तो दुनिया के टॉप

10 हॉन्टेड प्लेसेज में से एक है।

"

''राइट!

"-प्रीति ने जय का साथ दिया-

''यहां तो बेचारी का सर्किट ही उड़ जायेगा।

"

''मैं भी ऐसी लड़की से मिलना चाहूंगीं

"-प्रीति बोली-

''जो भविष्य देख सकती हो।

"

''वो ऐसा अपनी मर्जी से नहीं करती। उसे कुछ झलकियां जैसी दिखतीं हैं। ऐसा किन्हीं खास सिचुएशन में ही होता है। समझ लो

, जैसे चुम्बक पास लाने पर लोहा उसकी ओर खिंचता है। जिस तरह सपनों पर हमारा बस नहीं होता

, उसी तरह क्लेयर भी मनचाहे ढंग से अतीत या भविष्य की किसी घटना को नहीं देख पाती हालांकि...।

"-बोलते-बोलते राज चुप हो गया।

''हालांकि क्या

?"-मोहिनी उत्सुक स्वर में बोली।

''डॉ. भारद्वाज का कहना है कि क्लेयर की शक्ति को नियंत्रित किया जा सकता है। वो अगर कन्सेन्ट्रेट करे

, प्रयास करे तो अपनी इस ताकत को अपने काबू में कर सकती है।

"

''इंट्रेस्टिंग है।

"-जय बोला।

''और ऐसे और भी कई केसेज हैं। डॉ. भारद्वाज के पास एक पूरा आर्काइव भरा पड़ा है

, जिसमें आपको ऐसे अनेक मामलों के बारे में पढऩे को मिल जायेगा। लेकिन जैसा कि मैंने पहले भी कहा था कि अगर हम उन पर चर्चा करते रहे तो पूरी रात ही बीत जायेगी

, फिर भी मैं उनमें से आधे केसेज के बारे में भी नहीं बता पाऊंगा। और आपका वो सवाल अपनी जगह पर कायम ही रहेगा कि मैंने भूत देखा ही नहीं है तो मैं उसे साबित कैसे करूं

? मैं वो डिबिया भी लाना भूल गया

, जिसमेें मैंने भूत को कैद करके रखा है वरना उसे ही खोलकर आपको भूत के दर्शन करा देता।

"

राज की उस बात पर सबके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

''नहीं।

"-फिर अनुराग ने इनकार में सिर हिलाते हुए कहा-

''मैंने तुमसे कहा था न कि तुम अपनी ईमानदारी से ऐसी किसी घटना के बारे में बताओ। तुमने बताया। मैंने विश्वास कर लिया। दैट्स ऑल।

"

''मैं तो भूत-प्रेतों के बारे में इतना ही जानता हूं

"-जय बोला-

''कि तुम किसी भी ऐसी जगह चले जाओ

, जहां चालीस-पचास लोग हों

, जैसे किसी स्कूल की कोई क्लास या ऐसी ही कोई जगह

, तो वहां तुम्हें ऐसा एक भी शख्स नहीं मिलेगा

, जिसने भूत-प्रेतों के बारे में न सुन रखा हो।

"

''राइट।

"-डोंगरा बोला।

''लेकिन उनमें से ऐसा भी कोई शख्स नहीं होगा

"-इस बात पर जय ने ज्यादा जोर दिया-

''जिसने अपनी आंखों से भूत देखा हो।

"

''डबल राइट।

"-डोंगरा बोला।

''और अगर उनमें से किसी ने भूत देखा भी होगा

"-राज बोला-

''और उसे साबित करने को कह दिया जाये कि उसने देखा है

, तो वो कैसे साबित करेगा

?"

जय को कोई जवाब नहीं सूझा।

कुछ क्षण कमरे में सन्नाटा छाया रहा।

''मुझे कुछ पूछना है।

"-मोहिनी हाथ उठाकर ऐसे बोली

, जैसे किसी स्कूल की क्लास में बैठी हो और टीचर से कुछ पूछना चाहती हो।

''पूछो।

"-राज बोला।

''जैसा कि हमारे यहां कदम रखने से पहले हमसे वो सब धार्मिक प्रतीक चिह्नों वाली चीजें

, लॉकेट

, ब्रेसलेट वगैरह उतरवा लिये गये। क्या सचमुच भूत-प्रेत ऐसी चीजों से डरते हैं

? डरते हैं तो क्यों

? आखिर दुनिया में सब कुछ तो ईश्वर की सत्ता ही है। ऐसी तो कोई जगह नहीं है

, जहां भगवान न हो। फिर किस्से-कहानियों में ऐसा क्यों दिखाया जाता है कि धार्मिक प्रतीक चिह्नों वगैरह से भूत-प्रेत डर कर भाग जाते हैं। अगर ऐसा सचमुच होता है तो उस हिसाब से तो भूत-प्रेत का अस्तित्त्व ही नहीं होना चाहिए फिर।

"

''वो एक स्टंट था

"-डोंगरा गर्दन इनकार में हिलाते हुए बोला-

''बस आप लोगों को थोड़ा डराने के लिए। ऐसे गेम्स में पर्टीसिपेन्ट्स के दिमाग पर साइकोलॉजिकल इफैक्ट पैदा करने के लिए ही कंपनी इस तरह के चोंचले करती है। इसमें डरने जैसी कोई बात नहीं है।

"

''मैं इस पॉइंंट पर डॉ. भारद्वाज के विचार आपको बताता हूं।

"-राज गहरी सांस लेकर बोला-

''उनका मानना है कि मृत्यु के पश्चात आत्मा को संसार में रूकने का नियम नहीं है। और जो आत्माएं जबर्दस्ती रूकती हैं

, उन्हें ईश्वर का डर होता है। अब चाहे ईश्वर कह लीजिए या दुनिया को चलाने वाली परमशक्ति। और ये आत्माएं उस शक्ति के सामने बेबस होती हैं। यही कारण है कि धार्मिक चिह्नों से ये घबराती हैं। क्योंकि वो ईश्वरीय ताकत का अंश समेटे होती हैं। जैसे जेल से भागा अपराधी पुलिस को देखकर डर जाता है

, उसी तरह ये आत्माएं धार्मिक चिह्नों से घबराती हैं। उनसे दूर भागती हैं। और इसमें आपके सवाल का जवाब भी शामिल है

, डोंगरा साहब

"-राज डोंगरा से बोला-

''आपने कहा था न कि सभी मरने वाले भूत क्यों नहीं बन जाते

? क्योंकि शायद वे भूत बनना ही नहीं चाहते। वे जीवन-मृत्यु के चक्कर से मुक्ति पाना चाहते हैं। परमशक्ति के पास वापस लौट जाते हैं। या उनका पुनर्जन्म हो जाता है। या और कुछ भी हो सकता है। कुछ ही भूत के रूप में अपना अस्तित्त्व बचाए रखते हैं। ऐसा वे क्यों करते हैं

, किन परिस्थितियों में

, किस आधार पर करते हैं

, ये सभी रहस्य है। हालांकि एक प्रचलित मान्यता तो यही है कि मरते समय किसी व्यक्ति की कोई बहुत इच्छा पूरी न हो पाए तो उसकी आत्मा इसी लोक में भटकती रहती है।

"

''लेकिन ऐसा तो बहुत पहले से माना जाता है।

"-डोंगरा बोला-

''किस्से कहानियों में सालों

, दशकों बल्कि सदियों से ये सब कहा जाता रहा है। तो तब लोग ये सब कैसे जानते थे

? क्या तब भी पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर होते थे

?"

''बिल्कुल होते थे।

"

''क्या

?"

''क्या मैथ्स की पढ़ाई कोई आज से या सिर्फ दस-बीस साल पहले से ही शुरू हुई है

? आर्यभट्ट कौन थे

? क्या अंतरिक्ष विज्ञान के बारे में लोगों ने तब पढऩा शुरू किया था

, जब पहला रॉकेट अंतरिक्ष में भेजा गया था

? गैलीलियो कौन था

? कॉपरनिकस कौन था

? इन्हीं की तरह ही पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेशन का कार्य भी सदियों से किया जाता रहा है। भूत-प्रेतों से जुड़ी ये जितनी भी जानकारी है

, उन्हीं की मेहनत और प्रयासों के बल पर मिल पाई है। लेकिन वो लोग गले में ढोल लटकाकर उसे पीटते नहीं घूमते थे कि हमने ये खोज कर ली है

, हमारा नाम अखबार में छापो। हमें न्यूज चैनलों पर दिखाओ। हम पर डिबेट बैठाओ। विज्ञान के क्षेत्र से जुड़े खोजकर्ताओं को इतना अपार यश इसलिए प्राप्त हुआ क्योंकि विज्ञान की ओर लोगों का झुकाव ज्यादा रहा। लोगों ने उसे अपने दैनिक जीवन के उपयोग के लिए चुना। क्योंकि विज्ञान का रास्ता कदरन आसान था। आपको लिखी हुई निश्चित बातों को पढऩा था और उनके सहारे आगे बढऩा था। कोई तपस्या नहीं करनी थी। कोई आत्मशक्ति नहीं जगानी थी

, जिससे आप अपनी सोच को इतने ऊंचे स्तर तक ले जा सको कि हजारों साल पहले-जब आज की तरह संसाधन भी नहीं हुआ करते थे-ऐसे गं्रंथों की रचना कर सको

, जिनमें जीवन का सार छिपा हो। मैं इसी कमरे में बैठे लोगों से पूछता हूं कि आपमें से कितने हैं

, जिन्हें कॉपी-पैन पकड़ा दिया जाये तो वे एक कहानी भी लिख सकते हैं

? क्या आप आज से हजारों साल पहले ऋग्वेद

, यजुर्वेद

, अथर्ववेद

, सामवेद जैसे ग्रंथों की रचना कर सकते थे

? मैं तो नहीं कर सकता था। मैं तो उनका एक परसेंट भी नहीं कर सकता था। अध्यात्म और आत्मचेतना की रहस्यपूर्ण लेकिन शक्तिशाली दुनिया को लोग खोखली मानकर उससे दूर भागने लगे। उसे नकारने लगे। मजाक उड़ाने लगे। हर चीज पर सवाल उठाने लगे। वो भी इस माइण्डसैट के साथ कि उन्हें जवाब सुनना ही नहीं है। सुनना भी है तो मानना नहीं है। यही कारण है कि अध्यात्म और विज्ञान के बीच दूरी इतनी बढ़ती चली गई कि आज अध्यात्म से जुड़ी बातों को नकारने के लिए

, उनका मजाक उड़ाने के लिए विज्ञान का इस्तेमाल हथियार की तरह करने लगे हैं। लोग कहते हैं कि वैज्ञानिक रूप से साबित करो

, तभी हम इस चीज को मानेेंगें वरना नहीं मानेंगें। लेकिन ऐसा आमतौर पर वही लोग कहते हैं

, जो खुद विज्ञान को ठीक तरह से नहीं समझते।

"

''क्या मतलब

?"-डोंगरा बोला।

''लोगों ने विज्ञान की मजबूरी नहीं देखी। उन्हें बस दूर से विज्ञान की दुनिया बड़ी चमक-दमक वाली

, बड़ी रौबदार दिखाई देती है

, जैसे सारे सवालों के जवाब विज्ञान में ही छिपे हों। लेकिन विज्ञान के ही क्षेत्र में जो शीर्ष पर हैं

, वे खुद अपने सवालों के जवाब पाने के लिए भटक रहे हैं। दुनिया कैसे बनी

? जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई

? मरने के बाद जीवन का अस्तित्त्व पूरी तरह समाप्त हो जाता है या कुछ और भी होता है

? इन सब सवालों के जवाब पाने में दशकों से वैज्ञानिकों के पसीने छूट रहे हैं और अब भी वे घिसट-घिसट कर ही जवाबों की ओर बढ़ पा रहे हैंं। प्रत्यक्ष उदाहरण कोरोना के रूप में सबके सामने है। इतने शक्तिशाली

, समर्थ

, टेक्नोलॉजिकल रूप से एडवांस्ड होने के बावजूद इस वायरस ने आज पूरी दुनिया को घुटनों पर ला दिया है। तमाम देशों के इतने वैज्ञानिक अपनी पूरी क्षमता

, बेशुमार संसाधनों के साथ इस बीमारी का इलाज ढूंढने में लगे हैं लेकिन क्या वे ढूंढ पाए

? लास्ट मैंने चैक किया था

, तब तक तो नहीं।

"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

''तो क्या अध्यात्म से कोरोना का इलाज सम्भव है

?"-कुछ क्षण की खामोशी के बाद डोंगरा बोला।
 
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