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''आप तो बहुत ही जल्दबाज निकले
, मिस्टर अनुराग।
"-उसकी सर्द आवाज वहां गूंज उठी-
''आपको अभी से ये सब खत्म होने की जल्दी होने लगी। जल्द ही वो वक्त आएगा
, जब आप सभी ऐसा ही चाहेंगें।
"
उसकी आवाज में कुछ ऐसा था कि कमरे में उपस्थित हर शख्स के मुंह पर ताला सा लग गया।
''अब मैं इन शुभकामनाओं के साथ आप सबसे विदा लेता हूं कि आप सब यहां पहले आने वाले लोगों जितने बदनसीब न हों।
"
कहकर वो हवा के झोंके की तरह कमरे से बाहर निकल गया।
'कॉफिन मैन
' के कमरे से बाहर निकलने के कुछ सेकेंड तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा
, फिर अनुराग बिजली की तेजी से लपकते हुए उसके पीछे कमरे से बाहर निकला।
''ए कॉफिन मैन...।
"-अनुराग ने जोर से आवाज लगाई लेकिन बाहर आकर वो खामोश हो गया।
बाहर कोई नहीं था।
सिवाय अंधेरे के!
उसके पीछे-पीछे बाकी लोग भी बाहर निकल आये।
''कहां गया वो
?"-प्रीति हैरत और भयमिश्रित स्वर में बोली।
''ये तो सचमुच बहुत डरावना था।
"-मोहिनी ने झुरझुरी ली।
बाहर अंधकार में ज्यादा देर खड़े रहना उन सभी के लिए असहनीय होने लगा तो वो वापस उस कमरे में लौट आये।
''बढिय़ा।
"-फिर अनुराग भी
'कॉफिन मैन
' की तरह ही ऊंची गूंजती सी आवाज बनाकर बोला-
''बहुत बढिय़ा।
"
''क्या हुआ
?"-जय ने चौंक कर उसकी ओर देखा।
''पहले मुझे लग रहा था यहां रहने के एक लाख डॉलर बहुत ज्यादा हैं। लेकिन अब यहां की हालत और ये सब ड्रामा देखकर लग रहा है कि यहां तीन दिन बिताने के तो दस लाख डॉलर भी कम हैं।
"
''कम ऑन
, यार!
"-जय बोला-
''मैंने तुम लोगों को बताया था न कि वो लोग हमें डराने की कोशिश करेंगें...।
"
''जिसमें वो कामयाब भी हुए।
"-मोहिनी बोली।
''देखो!
"-जय समझाने के से अंदाज में बोला-
''यहां हम सब एक-दूसरे के साथ हैं। एक दूसरे का ख्याल रख सकते हैं। हमें किसी से डरने की कोई जरूरत नहीं है।
"
''मुझे तो ये मामला कुछ ज्यादा ही गड़बड़ लग रहा है।
"-राज
गम्भीर स्वर में बोला।
''पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर बोले!
"-अनुराग बड़बड़ाया।
''अगर ये
'कॉफिन मैन
' ही हमारा होस्ट था
"-अनुराग की बात को नजरअंदाज करते हुए राज बोला-
''तो वो यहां से चला क्यों गया
?"
''मुझे क्या पता क्यों चला गया
?"-जय ने हैरानी से राज की ओर देखते हुए कंधे उचकाए-
''हो सकता है कल फिर आ जाए।
"
''चूल्हे में जाए वो!
"-प्रीति बोली-
''क्या हमें सचमुच तीन दिन इसी तरह रहना होगा
? ऐसे ही
? इस...इस लैम्प की रोशनी में
?"
''नहीं।
"-कहकर डोंगरा आगे बढ़ा और उसने दरवाजे के साइड में लगे एक स्विचबोर्ड का बटन दबाया तो कमरा दूधिया रोशनी से नहा उठा।
''थैंक गॉड!
"-प्रीति ने राहत की सांस ली।
बाकी के चेहरों पर भी थोड़े सुकून के भाव आए।
''जब यहां लाइट की व्यवस्था है
"-मोहिनी बोली-
''तो ये लैम्प का नाटक क्या था
?"
''हॉरर इफैक्ट देने के लिये भई।
"-जय बोला।
''क्या मतलब
?"
''अरे
, मैंने तुम लोगों को बताया था न
, ये लोग हमें तीन दिन यहां चैन से नहीं रहने देंगें। ये तो सिर्फ शुरूआत है। अभी तो जाने और कितनी टांग खींची जाएगी हमारी।
"
''मेरी टांग किसी ने खींची तो उसकी टांगें तोड़ देनी हैं मैंने।
"-अनुराग गुस्से से बोला।
''बस
, बस।
"-मोहिनी मुंह बिगाड़कर बोली-
''देख ली तुम्हारी सारी बहादुरी। उस कॉफिन मैन के सामने तो कुछ नहीं कर पाए। खुद तुम्हारे भी हाथ-पांव फूल गए थे उसे ताबूत से बाहर निकलते देख कर।
"
''इस तरह रहना तो सचमुच डरावना है।
"-प्रीति अपनी दोनों बांहों को एक-दूसरे से लपेटकर झुरझुरी लेते हुए बोली।
''क्या बाहर के लिए भी लाइट है
?"-अनुराग ने डोंगरा से पूछा। डोंगरा ने सहमति में सिर हिलाते हुए स्विचबोर्ड पर लगा एक दूसरा बटन दबाया। बाहर भी एक शक्तिशाली बल्ब रोशन हो उठा
, जिससे बाहर उजाला तो हो गया लेकिन बाहर का हिस्सा काफी बड़ा और खुले में होने के कारण चारों ओर जंगल में अब भी अंधेरा था।
''ये सब बहुत ज्यादा अजीब लग रहा है।
"-मोहिनी बोली।
''डोंट वरी।
"-डोंगरा सांत्वना देने के से अंदाज में बोला-
''ऐसा सोचो कि ये सब एक खेल है। एक ड्रामा। आप लोगों को इससे डरने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि आप लोगों को पहले से पता है कि यहां जो कुछ हो रहा है या जो कुछ होगा
, वो स्टेज किया हुआ है। नकली है। असली नहीं है क्योंकि असली हो ही नहीं सकता। क्योंकि भूत-प्रेत जैसी कोई चीज होती ही नहीं।
"
''आपको पूरा यकीन है इस बात पर
?"-डॉली बोली।
''बिल्कुल।
"-कहने के साथ ही डोंगरा के होंठों पर मुस्कान आ गई-
''सॉरी अगर ऐसा कहकर मैंने आपकी भावनाओं को ठेस पहुंचाई हो तो। आखिर आप और मिस्टर वरूण पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हैं। वैसे
"-फिर वो दिलचस्पी भरे स्वर में बोला-
''मुझे आपसे एक बात पूछनी थी। क्या आपने सचमुच किसी भूत को देखा है
?"
डॉली ने इनकार में सिर हिलाया।
''फिर
? फिर आप लोग पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर कैसे बने
? मतलब इस प्रोफेशन में आने की प्रेरणा आपको कहां से मिली
?"
''वो किस्सा फिर कभी।
"-डॉली बोली-
''आज पहले ही बहुत ड्रामा हो गया है।
"
''तब आप लोग चलकर पूरे घर को देख लीजिये।
"
''आपके होस्ट साहब तो गायब हो गए।
"-अनुराग डोंगरा से बोला।
''उनके इस तरह गायब हो जाने से मैं भी हैरान हूं।
"-डोंगरा के चेहरे से भी हैरानी झलक रही थी-
''हो सकता है वे कल दर्शन दें। तब तक के लिये आप लोग मुझे ही अपना होस्ट समझिये। इन तीन दिनों के लिये कंपनी वालों की क्या स्ट्रेटेजी है
, इसके बारे में मुझे भी ज्यादा जानकारी नहीं है। मुझे सिर्फ इतना ही पता है कि यहां किसी तरह की जरूरत पडऩे पर मुझे आप लोगों की मदद करनी है और विटनेस की भूमिका भी निभानी है कि आपने तीन दिन यहां बिताए।
"
''और आपकी ये मैडम रिंकी
"-अनुराग ने रिंकी की ओर इशारा किया-
''इन्हें क्या करना है
?"
''ये बतौर असिस्टेंट मेरे साथ हैं। मेरी ही तरह आपकी मदद के लिए।
"
''कितने मददगार लोग हैं!
"-प्रीति धीमे से बुदबुदाई।
फिर डोंगरा के साथ उन्होंने पूरे घर का भ्रमण किया। सबसे बाहर वाले कमरे के पीछे एक और कमरा था और उन दोनों कमरों के बीच एक गलियारा था
, जिसकी दिशा उन कमरों के दरवाजों की ओर न होकर एक तरफ बने किचन की ओर थी। गलियारे का दूसरा सिरा ऊपर की ओर जाती सीढिय़ों पर खत्म होता था
, जिसके बगल में ही मीटिंग रूम और अंदर वाले कमरे के दरवाजे थे। उन्होंने किचन में जाकर देखा तो वहां इतना पैक्ड फूड और पानी था
, जो तीन दिनों के लिए तो क्या पांच दिनों के लिए पर्याप्त था।
यानि उन्हें खाने-पीने को लेकर तो किसी तरह की समस्या नहीं होने वाली थी।
, मिस्टर अनुराग।
"-उसकी सर्द आवाज वहां गूंज उठी-
''आपको अभी से ये सब खत्म होने की जल्दी होने लगी। जल्द ही वो वक्त आएगा
, जब आप सभी ऐसा ही चाहेंगें।
"
उसकी आवाज में कुछ ऐसा था कि कमरे में उपस्थित हर शख्स के मुंह पर ताला सा लग गया।
''अब मैं इन शुभकामनाओं के साथ आप सबसे विदा लेता हूं कि आप सब यहां पहले आने वाले लोगों जितने बदनसीब न हों।
"
कहकर वो हवा के झोंके की तरह कमरे से बाहर निकल गया।
'कॉफिन मैन
' के कमरे से बाहर निकलने के कुछ सेकेंड तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा
, फिर अनुराग बिजली की तेजी से लपकते हुए उसके पीछे कमरे से बाहर निकला।
''ए कॉफिन मैन...।
"-अनुराग ने जोर से आवाज लगाई लेकिन बाहर आकर वो खामोश हो गया।
बाहर कोई नहीं था।
सिवाय अंधेरे के!
उसके पीछे-पीछे बाकी लोग भी बाहर निकल आये।
''कहां गया वो
?"-प्रीति हैरत और भयमिश्रित स्वर में बोली।
''ये तो सचमुच बहुत डरावना था।
"-मोहिनी ने झुरझुरी ली।
बाहर अंधकार में ज्यादा देर खड़े रहना उन सभी के लिए असहनीय होने लगा तो वो वापस उस कमरे में लौट आये।
''बढिय़ा।
"-फिर अनुराग भी
'कॉफिन मैन
' की तरह ही ऊंची गूंजती सी आवाज बनाकर बोला-
''बहुत बढिय़ा।
"
''क्या हुआ
?"-जय ने चौंक कर उसकी ओर देखा।
''पहले मुझे लग रहा था यहां रहने के एक लाख डॉलर बहुत ज्यादा हैं। लेकिन अब यहां की हालत और ये सब ड्रामा देखकर लग रहा है कि यहां तीन दिन बिताने के तो दस लाख डॉलर भी कम हैं।
"
''कम ऑन
, यार!
"-जय बोला-
''मैंने तुम लोगों को बताया था न कि वो लोग हमें डराने की कोशिश करेंगें...।
"
''जिसमें वो कामयाब भी हुए।
"-मोहिनी बोली।
''देखो!
"-जय समझाने के से अंदाज में बोला-
''यहां हम सब एक-दूसरे के साथ हैं। एक दूसरे का ख्याल रख सकते हैं। हमें किसी से डरने की कोई जरूरत नहीं है।
"
''मुझे तो ये मामला कुछ ज्यादा ही गड़बड़ लग रहा है।
"-राज
गम्भीर स्वर में बोला।
''पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर बोले!
"-अनुराग बड़बड़ाया।
''अगर ये
'कॉफिन मैन
' ही हमारा होस्ट था
"-अनुराग की बात को नजरअंदाज करते हुए राज बोला-
''तो वो यहां से चला क्यों गया
?"
''मुझे क्या पता क्यों चला गया
?"-जय ने हैरानी से राज की ओर देखते हुए कंधे उचकाए-
''हो सकता है कल फिर आ जाए।
"
''चूल्हे में जाए वो!
"-प्रीति बोली-
''क्या हमें सचमुच तीन दिन इसी तरह रहना होगा
? ऐसे ही
? इस...इस लैम्प की रोशनी में
?"
''नहीं।
"-कहकर डोंगरा आगे बढ़ा और उसने दरवाजे के साइड में लगे एक स्विचबोर्ड का बटन दबाया तो कमरा दूधिया रोशनी से नहा उठा।
''थैंक गॉड!
"-प्रीति ने राहत की सांस ली।
बाकी के चेहरों पर भी थोड़े सुकून के भाव आए।
''जब यहां लाइट की व्यवस्था है
"-मोहिनी बोली-
''तो ये लैम्प का नाटक क्या था
?"
''हॉरर इफैक्ट देने के लिये भई।
"-जय बोला।
''क्या मतलब
?"
''अरे
, मैंने तुम लोगों को बताया था न
, ये लोग हमें तीन दिन यहां चैन से नहीं रहने देंगें। ये तो सिर्फ शुरूआत है। अभी तो जाने और कितनी टांग खींची जाएगी हमारी।
"
''मेरी टांग किसी ने खींची तो उसकी टांगें तोड़ देनी हैं मैंने।
"-अनुराग गुस्से से बोला।
''बस
, बस।
"-मोहिनी मुंह बिगाड़कर बोली-
''देख ली तुम्हारी सारी बहादुरी। उस कॉफिन मैन के सामने तो कुछ नहीं कर पाए। खुद तुम्हारे भी हाथ-पांव फूल गए थे उसे ताबूत से बाहर निकलते देख कर।
"
''इस तरह रहना तो सचमुच डरावना है।
"-प्रीति अपनी दोनों बांहों को एक-दूसरे से लपेटकर झुरझुरी लेते हुए बोली।
''क्या बाहर के लिए भी लाइट है
?"-अनुराग ने डोंगरा से पूछा। डोंगरा ने सहमति में सिर हिलाते हुए स्विचबोर्ड पर लगा एक दूसरा बटन दबाया। बाहर भी एक शक्तिशाली बल्ब रोशन हो उठा
, जिससे बाहर उजाला तो हो गया लेकिन बाहर का हिस्सा काफी बड़ा और खुले में होने के कारण चारों ओर जंगल में अब भी अंधेरा था।
''ये सब बहुत ज्यादा अजीब लग रहा है।
"-मोहिनी बोली।
''डोंट वरी।
"-डोंगरा सांत्वना देने के से अंदाज में बोला-
''ऐसा सोचो कि ये सब एक खेल है। एक ड्रामा। आप लोगों को इससे डरने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि आप लोगों को पहले से पता है कि यहां जो कुछ हो रहा है या जो कुछ होगा
, वो स्टेज किया हुआ है। नकली है। असली नहीं है क्योंकि असली हो ही नहीं सकता। क्योंकि भूत-प्रेत जैसी कोई चीज होती ही नहीं।
"
''आपको पूरा यकीन है इस बात पर
?"-डॉली बोली।
''बिल्कुल।
"-कहने के साथ ही डोंगरा के होंठों पर मुस्कान आ गई-
''सॉरी अगर ऐसा कहकर मैंने आपकी भावनाओं को ठेस पहुंचाई हो तो। आखिर आप और मिस्टर वरूण पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हैं। वैसे
"-फिर वो दिलचस्पी भरे स्वर में बोला-
''मुझे आपसे एक बात पूछनी थी। क्या आपने सचमुच किसी भूत को देखा है
?"
डॉली ने इनकार में सिर हिलाया।
''फिर
? फिर आप लोग पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर कैसे बने
? मतलब इस प्रोफेशन में आने की प्रेरणा आपको कहां से मिली
?"
''वो किस्सा फिर कभी।
"-डॉली बोली-
''आज पहले ही बहुत ड्रामा हो गया है।
"
''तब आप लोग चलकर पूरे घर को देख लीजिये।
"
''आपके होस्ट साहब तो गायब हो गए।
"-अनुराग डोंगरा से बोला।
''उनके इस तरह गायब हो जाने से मैं भी हैरान हूं।
"-डोंगरा के चेहरे से भी हैरानी झलक रही थी-
''हो सकता है वे कल दर्शन दें। तब तक के लिये आप लोग मुझे ही अपना होस्ट समझिये। इन तीन दिनों के लिये कंपनी वालों की क्या स्ट्रेटेजी है
, इसके बारे में मुझे भी ज्यादा जानकारी नहीं है। मुझे सिर्फ इतना ही पता है कि यहां किसी तरह की जरूरत पडऩे पर मुझे आप लोगों की मदद करनी है और विटनेस की भूमिका भी निभानी है कि आपने तीन दिन यहां बिताए।
"
''और आपकी ये मैडम रिंकी
"-अनुराग ने रिंकी की ओर इशारा किया-
''इन्हें क्या करना है
?"
''ये बतौर असिस्टेंट मेरे साथ हैं। मेरी ही तरह आपकी मदद के लिए।
"
''कितने मददगार लोग हैं!
"-प्रीति धीमे से बुदबुदाई।
फिर डोंगरा के साथ उन्होंने पूरे घर का भ्रमण किया। सबसे बाहर वाले कमरे के पीछे एक और कमरा था और उन दोनों कमरों के बीच एक गलियारा था
, जिसकी दिशा उन कमरों के दरवाजों की ओर न होकर एक तरफ बने किचन की ओर थी। गलियारे का दूसरा सिरा ऊपर की ओर जाती सीढिय़ों पर खत्म होता था
, जिसके बगल में ही मीटिंग रूम और अंदर वाले कमरे के दरवाजे थे। उन्होंने किचन में जाकर देखा तो वहां इतना पैक्ड फूड और पानी था
, जो तीन दिनों के लिए तो क्या पांच दिनों के लिए पर्याप्त था।
यानि उन्हें खाने-पीने को लेकर तो किसी तरह की समस्या नहीं होने वाली थी।