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Horror मौत की चाल

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राज और डॉली ने एक-दूसरे की ओर देखा।

''कम ऑन!

"-जय उन्हें उकसाते हुए बोला-

''तुम्हारे लिए तो इसमें और भी बड़ा बोनस है यार। तुम्हें एक ऐसी जगह पर जाने को मिलेगा

, जो हॉन्टेड है। क्या पता वहां सचमुच किसी भूत से ही सामना हो जाए

? तुम्हारा पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर का कैरियर चमक जाएगा।

"

राज ने कुछ नहीं कहा। वो अब इस चीज का आदि हो गया था। लोग भूत-प्रेतों से जुड़ी चर्चा को सीरियसली लेते ही नहीं थे। और न ही उसे जय से ऐसी कोई उम्मीद थी कि वो उनकी टांग नहीं खींचेगा।

''तो क्या कहते हो

?"-जय उत्साहित स्वर में बोला।

''इसमें उन लोगों का क्या फायदा है

?"-डॉली बोली-

''एक लाख डॉलर बहुत बड़ी रकम होती है। तीन लाख डॉलर इस तरह लुटाने पर उन्हें भी तो कोई फायदा होगा

? आखिर इस तरह कुछ लोग एक भुतहा मकान में रहें तो इससे उन्हें किस तरह का फायदा हो सकता है

?"

''उन्हें फायदा ही फायदा है।

"

''कैसे

?"

''असल में वो कंपनी हॉरर थीम पर फनहाउस संचालित करने वाली एक बहुत बड़ी कंपनी है। विदेशों में उनके कई ऐसे फनहाउस हैं। तुम लोगों ने डिजनी वर्ल्ड का नाम तो सुना ही होगा

? उसी तरह के लेकिन हॉरर थीम पर आधारित एंटरटेनमेंट पार्क वगैरह चलाते हैं वो लोग। इतना ही नहीं

, उनका प्रोडक्शन हाउस हॉरर फिल्में भी बनाता है। उनकी कई हॉरर फिल्में तो सुपरहिट भी रहीं हैं। अब ये मत कहना तुम लोगों ने

'घोस्ट आई

' नहीं देखी

? लॉकडाउन लगने से पहले लोग पागल हुए जा रहे थे ये फिल्म देखकर। बीते साल की सबसे बड़ी हॉरर फिल्मों में से एक है। इतनी सुपरहिट कि अगर बीच में ये कोरोना वाला पंगा नहीं होता तो अब भी मल्टीप्लेक्सों में करोड़ों डॉलर कमा रही होती। और फिल्म सुपरहिट होने का मतलब जानते हो न

? मतलब उन पर पैसों की बरसात हो रही है। और वो अपने पैसों को बिजनेस में इन्वेस्ट कर उसे दुगुने से तिगुना

, तिगुने से चौगुना करने में जुटे हुए हैं। एक लाख डॉलर की रकम तो उनके लिए सौ के नोट के बराबर होगी।

"

राज की भंवें उठीं।

''अच्छा

,"-जय ने स्वीकार किया कि वो कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर बोल गया था-

''दो हजार के नोट के बराबर होगी। दो-दो हजार के दो नोटों के बराबर होगी। लेकिन एक लखपति आदमी को दो-चार

, पांच-दस हजार रूपए की रकम उड़ा देने से क्या फर्क पड़ता है। और वो भी तब जब उसमें उसका भी फायदा हो रहा हो...।

"

''वही तो मैंने पूछा

"-डॉली बोली-इसमेें उनका क्या फायदा है

?"

''उस हॉन्टेड जगह का प्रचार होगा। लोग उसके बारे में जानेंगेंं। आर्टिकल वगैरह छपवाएंगें। हम लोगों ने वहां तीन दिन

, तीन रात बिताए तो वहां हमें कैसा लगा

, हमारे अनुभवों वगैरह को वो उस जगह के प्रचार-प्रसार में इस्तेमाल करेंगें

, और क्या

?"

''उस जगह का प्रचार प्रसार करने से उन्हें क्या फायदा होगा

?"

''वो लोग वहां हॉरर थीम पर आधारित कोई फनहाउस या होटल वगैरह बनाना चाहते हैं। अभी बीच में लॉकडाउन लग जाने के कारण उनका प्रोजेक्ट टल गया। लेकिन अब वो इस खाली समय का उपयोग इस तरह के इवेंट का आयोजन करके करना चाहते हैं। जिससे इस बीच उस जगह के प्रचार-प्रसार का सिलसिला शुरू हो सके।

"

डॉली ने राज की ओर देखा।

''प्लीज!

"-जय अनुनयपूर्ण स्वर में राज से बोला-

''मेरे लिए मान जाओ

, यार। सच कह रहा हूं

, बहुत मजा आयेगा। एक हॉन्टेड जगह में तीन दिन

, तीन रात। इतना मजा तो भानगढ़ में भी नहीं आया था क्योंकि वहां से हमें जल्दी लौटना पड़ा था। और जहां तक मैंने सुना है

, ये जगह भी बहुत डरावनी है।

"

''बहुत ज्यादा डरावनी

"-प्रीति बोली।

''और क्या

?"-अनुराग बोला-

''किसी हॉन्टेड प्लेस पर जाओ और रात में वहां न ठहरो तो साला जाने का मतलब ही क्या हुआ

? दिन में तो बेचारे भूत-प्रेत लोग आराम करते हैं। दिन में तो वैसे भी वहां कुछ दिखने वाला नहीं होता।

"

''वैसे भी

"-प्रीति बड़े स्टाइल से सिर को झटककर बोली-

''भूत-प्रेत जैसा कुछ नहीं होता।

"

''अरे...अरे...।

"-अनुराग ने प्रतिरोध जताया-

''ऐसा मत कहो। बेचारे

राज

और डॉली की जॉब पर ही सवाल खड़ा कर दिया तुमने।

"

राज के चेहरे पर अब भी अनिश्चय के भाव दिखाई दे रहे थेे।

''कम ऑन यार!

"-जय आकर उसके बगल में बैठ गया और उसके हाथ पकड़कर बोला-

''तुम लोग तो वैसे ही ऐसी जगहों पर रिसर्च करने जाते रहते हो। क्या हमारे साथ तीन दिन नहीं रूक सकते

? प्लीज! पुराने दिनों की खातिर!

"

''ओके!

"-राज बोला-

''हम लोग तैयार हैं।

"

''हुर्रे।

"-प्रीति ने खुशी से नारा सा लगाया-

''हम दुनिया की दस सबसे डरावनी जगहों में से एक पर घूमने जा रहे हैं। ये हमारी जिन्दगी के सबसे यादगार तीन दिन होंगें।

"

''लेकिन वहां हमें और क्या-क्या करना पड़ेगा

? मुझे इस इवेंट के बारे में पूरी जानकारी चाहिए।

"

''ये हुई न बात!

"-जय जोश के साथ बोला-

''जानकारी की चिंता तुम मत करो। वो सब मैं तुम्हें दे दूंगा। तुम और डॉली बस तैयार रहना। तीन दिनों बाद हम सब यहां से साथ-साथ ही चलेंगें...।

"

''यहां से तो साथ-साथ नहीं जा पाएंगें।

"-राज बोला-

''हमें दिल्ली में कुछ जरूरी काम है। आज शाम ही वापस लौटना पड़ेगा।

"

''फिर

?"

''तुम हमें उस जगह का एड्रेस भेज देना। हम कार से वहां आ जाएंगें।

"

''ठीक है। मैं तुम्हें इवेंट से जुड़ी सारी जानकारी मेल कर दूंगा।इसकी टर्म्स एंड कंडीशंस वगैरह तुम सब उस फार्म पर देख सकोगे। मेरा यकीन करो। इसमें कोई जाल

, धोखाधड़ी जैसी बात नहीं है। मैंने उस कंपनी के बारे में अच्छी तरह तस्दीक करने के बाद ही इस इवेंट में पर्टिसिपेट करने के लिए एप्लाई किया था। ये बहुत पुरानी और काफी प्रसिद्ध कंपनी है। मेरा एक दोस्त भी इस कंपनी में काम करता है। उसी के माध्यम से मुझे इस इवेंट के बारे में पता चला था।

"

''ठीक है। ठीक है।

"

''वैसे हम सबके अलावा वहां उस मकान का केयरटेकर और कंपनी की ओर से भेजा गया एक होस्ट भी होगा। यानि हम अकेले भी नहीं होंगें।

"

''अकेले

?"-अनुराग बोला-

''वो तो वैसे भी नहीं होंगें।

66 लोग अकेले थोड़े ही होते हैं।

"

''बेचारे वहां रहने वाले भूत भी पूरी बारात आते देखकर परेशान हो जाएंगें।

"-प्रीति हंसते हुए बोली।

फिर उस कंपनी और उस इवेंट के बारे में वो लोग देर तक बातें करते रहे। वही उनके बीच बातचीत का मुख्य मुद्दा रहा। इस दौरान उनकी अनुराग और मोहिनी से भी अच्छी जान-पहचान हो गई। राज ने नोट किया कि अनुराग और मोहिनी जय और प्रीति के काफी क्लोज थे।

उतने ही जितना एक समय वो हुआ करता था।

राज को भी वे दोनों पसंद ही आये। जय के ट्रेवलिंग वीडियोज में राज ने पहले भी उन दोनों को जय और प्रीति के साथ देखा था लेकिन उस समय ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

करीब एक घंटे बाद जब वे दोनों वापस लौटने लगे तो जय और प्रीति बाहर गेट तक उन्हें छोडऩे आये।

डॉली और प्रीति आपस में बातें करते हुए आगे चल रहे थे जबकि जय और राज उनसे थोड़ा पीछे थे।

''इस इवेंट में जो एक लाख डॉलर मिलेंगें

"-जय राज से बोला-

''उससे फाइनांशियल रूप से हमारी काफी हैल्प होगी।

"

''फाइनांशियल

?"-राज की भंवें उठीं।

''मैंने तुम्हें बताया नहीं।

"-जय थोड़े नर्वस भाव से बोला-

''हमारी आर्थिक स्थिति थोड़ी ठीक नहीं चल रही है। अण्टार्कटिका की ट्रिप को तो छोड़ो

, यहां तो क्रेडिट काड्र््स के बिल भरना तक मुश्किल हो रहा है। ये ऑफर तो जैसे भगवान ने सीधे लॉटरी की तरह मेरी झोली में भेज दिया। वरना बहुत मुश्किल हो जाती।

"

''तुम तो ऐसे कह रहे हो

, जैसे पैसे मिल गए हैं।

"

''मिल ही जाएंगें। ये तो अच्छा हुआ कि हम लोगों को पहले मौका मिल गया। वरना मेरे ख्याल से तो ऐसे ऑफर पर लोग टूट पडऩे थे।

"

''तो क्यों नहीं टूट पड़े लोग

?"

'' 'पैरानॉर्मल होल्ड

' ने इसका ज्यादा प्रचार-प्रसार ही नहीं किया। उनकी भारत की ब्रांच का एक आदमी इत्तफाक से मेरा दोस्त है। उसी के माध्यम से मुझे इसके बारे में पता चला।

"

''कंपनी ने इसका प्रचार-प्रसार क्यों नहीं किया

?"

''क्योंकि उन्हें पता था कि बिना प्रचार किए ही ऐसे ऑफर के लिए लाइन लग जानी थी। प्रचार करते तब तो उनके लिए सलेक्ट करना मुश्किल हो जाता।

"

''इसकी सारी जानकारी मुझे मेल करना। मैं एक बार इस बारे में अच्छी तरह पढ़ लेना चाहता हूं।

"

''बिल्कुल। बिल्कुल। मैं शाम तक तुम्हें मेल करता हूं।

"

''और तुम्हारी फाइनांशियल कंडीशन के बारे में कुछ कहना चाहूंगा। वैसे तो कॉलेज में ही मैंने तुम्हें कम से कम नहीं तो हजार बार समझाया था लेकिन एक बार फिर कह रहा हूं। हाथ रोक कर खर्च करना सीखो। जितनी धुआंधार स्पीड से तुम पैसे उड़ाते हो

, उससे तो कुबेर का खजाना खाली होने में भी देर न लगे।

"

''यार

, तुम फिर शुरू हो गए।

"

''अभी तुम्हीं ने बताया न कि प्रॉब्लम में चल रहे हो।

"

''अरे मेरे बाप

, सांस लेने में दिक्कत होती है तो आदमी इलाज करवाता है या सांस लेना ही बंद कर देता है

?"

''फिजूल की बात है। लेकिन तुम्हें समझाना भी बेकार है। मैंने तो कॉलेज टाइम में ही हार मान ली थी। अपने नहीं तो कम से कम प्रीति के बारे में तो सोचो।

"

''प्रीति!

"-जय ने गहरी निगाहों से उसे देखा-

''तो ये बात है! अभी तक प्रीति की फिक्र करते हो

? तो बीच-बीच में कॉल वगैरह क्यों नहीं करते

? मुझे बुरा लग जायेगा

, इसलिए

?"

राज ने कुछ नहीं कहा। वो एक ऐसी बात थी

, जो उन तीनों के बीच आज तक अनकही थी। और इतने सालों बाद की मुलाकात में जय का अचानक इस तरह बोल देने पर राज को समझ ही नहीं आया कि उससे क्या कहे।

तभी जय का मोबाइल पर किसी की कॉल आ गई। वो राज से इजाजत लेकर मोबाइल पर बात करते हुए दूसरी ओर चला गया।
 
आगे चल रही डॉली और प्रीति में से डॉली कार में बैठ चुकी थी। प्रीति ने उसे बाय किया

, फिर घूमकर राज के पास आई।

''जा रहे हो

?"-वो राज से बोली।

प्रीति के पास आते ही राज के दिल की धड़कनें अपने-आप ही बढ़ गईं। इतने सालों बाद ये पहला मौका था

, जब प्रीति और वो करीब-करीब अकेले थे। डॉली कार में बैठी थी और जय फोन पर बात करते हुए काफी दूर चला गया था।

''हां।

"-राज ने यूं ही हाथ से कार की ओर इशारा करते हुए कहा-

''जाना तो होगा ही।

"

''ठीक है फिर। बाय!

"-कहते हुए प्रीति आगे बढ़कर उसके गले से लग गई। प्रीति के उस तरह गले मिलने से राज और भी ज्यादा अचकचा गया।

''मुझे पता था।

"-फिर उससे अलग होकर प्रीति मुस्कुराते हुए बोली।

''क्या पता था

?"-राज हैरानी से बोला।

''कि तुम कोई मुझसे भी अच्छी ढूंढ लोगे।

"-कहकर प्रीति ने उसे आंख मारी और हंसती हुई वहां से चली गई।

राज पीछे खड़ा हैरानी से उसे देखता रहा। उसकी तन्द्रा तब भंग हुई

, जब पीछे कार मेें बैठी डॉली ने उसका ध्यान आकर्षित करने के लिए जोर से हॉर्न बजाया।

पुराने दोस्तों से हुई वो मुलाकात ही उन्हें वहां ले आई थी। जय ने उन्हें उस हॉन्टेड घर का जो एड्रेस भेजा था-जहां उन्हें तीन दिन बिताने थे-वो दिल्ली से कालका जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-

44 पर कालका से थोड़ा पहले मुख्य मार्ग से हटकर एक सड़क पर आगे कहीं था

, जो काफी सुनसान थी। काफी देर बाद उन्हें एक पेट्रोल पंप दिखा था

, वो भी कबाडख़ाने जैसी हालत में और उसके पंप अटेंडेंट ने भी राज का अच्छा-खासा दिमाग खराब कर दिया।

उनकी कार फिर उसी सड़क पर आगे दौड़ी जा रही थी। सड़क के दोनों ओर दूर-दूर तक जंगल के सिवाय कुछ नहीं दिख रहा था।

उस रास्ते पर चलते हुए उन्हें काफी देर हो गई थी लेकिन अब तक एक भी गाड़ी नजर नहीं आई थी। गाड़ी तो दूर की बात

, उस पागल पम्प अटेंडेंट के पेट्रोल पंप के अलावा और कुछ भी नजर नहीं आया था।

सिर्फ जंगल!

''मैंने तुमसे कार रोकने के लिए कहा था

"-राज बोला-

''तुमने रोकी क्यों नहीं

?"

''किसलिए

?"-डॉली कार चलाते हुए सामने सड़क की ओर देख रही थी-

''जिससे तुम जाकर उस पागल से भिड़ सकते

?"

''तुमने सुना नहीं उसने क्या कहा...

?"

''मैंने सुना। लेकिन मुझे वो पंगेबाज आदमी लगा। जानबूझकर भड़काने की कोशिश कर रहा था। ये तो अच्छा हुआ कि तुम बाहर ही उससे नहीं भिड़ गये थे।

"

राज चुप हो गया। उस पम्प अटेंडेंट ने चलते समय जो अजीब बात उनसे कही थी

, वो उसके दिमाग से निकलने का नाम ही नहीं ले रही थी।

डॉली ने एक बार उसके चेहरे पर नजर डाली

, फिर उसके कंधे पर हाथ रखकर थपकते हुए बोली-

''कम ऑन

, डूड। तुमने उसे बताया न कि तुम पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हो

, तो वो तुम्हारा मजाक उड़ाने की कोशिश कर रहा होगा। डोंट ओवरथिंक इट!

"

''मुझे लगता है

"-राज ने सिगरेट का पैकेट निकालकर एक सिगरेट होंठो से लगाई और लाइटर से उसे सुलगाते हुए बोला-

''दुनिया में कुछ भी बिना मतलब के नहीं होता है।

"

''क्या मतलब

? तुम्हें उस सनकी की बातों में कोई मतलब नजर आता है

? चलो

, लगी एक-एक हजार की शर्त। अगर तुम उसकी बातों में कुछ भी सेंस साबित कर पाये तो।

"

तभी रास्ते में किसी चीज ने राज का ध्यान खींच लिया।

''मुझे लगता है

"-वो सीट पर सम्भलकर बैठ गया-

''हमारी मंजिल आ गई है।

"

डॉली की नजरों ने उसकी नजरों का पीछा किया।

सामने सड़क पर एक बोर्ड तेजी से नजदीक आता जा रहा था

, जिस पर बड़े-बड़े लाल अक्षरों में लिखा था-

खतरा

कृपया इधर न जाएं।

डॉली ने उसी बोर्ड के पास सड़क पर ही कार रोक दी और सवालियों निगाहों से राज की ओर देखा।

बोर्ड के बगल से एक कच्चा रास्ता अंदर जंगल की ओर जा रहा था

, जो उस सड़क की तरह ही दोनों ओर से घने विशाल पेड़ों से घिरा हुआ था।

''तुम्हें क्या लगता है

"-डॉली बोली-

''यही वो रास्ता है

?"

''होना तो यही चाहिए।

"-राज सोचपूर्ण भाव से बोला-

''जैसा बताया गया था

, उस हिसाब से तो यही रास्ता है।

"

''तो चलें

?"

''इतनी दूर यहां इस बोर्ड को देखने तो नहीं आए हैं।

"

''एक बार फिर सोच लो

"-डॉली बोली-

''ये सब मुझे काफी अजीब लग रहा है।

"

''अजीब तो है

"-राज ने स्वीकार किया-

''लेकिन जिस लाइन में मैं हूं

, उसमें जो अजीब न देखने को मिल जाये...

"

उसकी बात अधूरी ही रह गई।

एक ट्रक तेजरफ्तार में उनकी कार के एकदम बगल से गुजरा।

ट्रक बेहद हल्के से कार के बगल के हिस्से को छूते हुए गुजरा

, जिससे जोर की आवाज गूंजी और कार बुरी तरह हिल गई। कार के ट्रक से रगडऩे वाली साइड के शीशे टूट कर अंदर की ओर नीचे गिर गए। कांच के कुछ टुकड़े डॉली की गोद में आकर गिरे। दूसरी ओर के शीशों में भी दरार पड़ गई। कार ढुलकते हुए आगे बढ़ी और सीधी सड़क किनारे लगे बोर्ड से जा टकराई

, जिससे बोर्ड उखड़कर सड़क किनारे ही ढेर हो गया।

''ओ माई गॉड!

"-डॉली के मुंह से चीख निकल गई। उस आकस्मिक घटना से राज भी हैरान रह गया। वे दोनों उस रास्ते में और उस पर आगे बढऩे के डिसीजन को लेकर सोच-विचार करने में इतने खो गये थे कि उन्हें पता भी नहीं चला कि वो ट्रक कब उनके पास तक पहुंच गया था।

क्या वो ट्रक वाला अंधा होकर गाड़ी चला रहा था

?
 
राज कार से बाहर निकला और उसने ट्रक के जाने की दिशा में देखा। ट्रक काफी दूर निकल चुका था। ट्रक की स्पीड सचमुच बहुत ज्यादा थी।

अंदर डॉली ने कार का अपनी ओर वाला दरवाजा खोलने की कोशिश की लेकिन वो एक्सीडेंट के कारण पिचक कर फंस गया था। थोड़ी देर कोशिश करने के बाद डॉली हार मानकर खिसककर दूसरी ओर वाले दरवाजे से ही बाहर निकली।

उसने हतप्रभ से खड़े राज के चेहरे के आगे अपनी हथेली लहराई।

''हैलो!

"-वो बोली-

''चला गया है वो! अब पीछे से इस तरह से घूरते रहने से बिजली नहीं गिर जाएगी उस पर।

"

''मुझे तो अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा है।

"-राज होंठों ही होंठों में बुदबुदाया।

''हां

"-डॉली नाराजगी भरे स्वर में बोली-

''मुझे भी अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा है कि हम अभी भी जिंदा है। एक फुल साइज के ट्रक द्वारा हमें रौंद दिए जाने की कोशिश किए जाने के बाद भी। पता नहीं किस चीज की जल्दी थी ट्रक वाले को। मुझे तो यही समझ नहीं आया कि ट्रक चला रहा था कि ट्रक उड़ा रहा था।

"

''तुमने एक बात नोट की

"-राज बोला-

''उतनी देर से हमेंं इस पूरे रास्ते पर एक साइकिल भी नहीं दिखाई दी। और अभी मुश्किल से एक मिनट के लिए तुमने कार यहां रोकी तो ये ट्रक एकदम से हमारे सिर पर पहुंच गया।

"

उसकी बात सुनकर डॉली भी सोचने के लिए मजबूर हो गई लेकिन फिर उसने सिर को झटका देते हुए कहा-

''जिंदा बच गए वही बहुत बड़ी बात है। मुझे तो लगता है ये हमारे लिए संकेत है कि अभी भी समय है। हमें वापस लौट जाना चाहिए।

"

''पहले तो ये बोर्ड खड़ा करना है।

"

''क्यों

? इस बोर्ड में क्या है

?"

''अरे। इसी पर तो लिखा है कि इधर न जाएं। अगर हमने इसे इस तरह गिरा छोड़ दिया तो हो सकता है कोई अनजाने में इस ओर चला जाए...।

"

डॉली को हंसी आ गई।

''इसमें हंसने की क्या बात है

?"

''हंसने की बात नहीं तो और क्या है

? तुम्हें क्या लगता है इस जंगल में कोई इस सड़क पर जा रहा होगा और सीधे रास्ते पर जाना छोड़कर जंगल में गाड़ी घुसा देगा

?"

''फिर भी

"-राज झुककर बोर्ड को उठाने की कोशिश करता हुआ बोला-

''ये बोर्ड जैसा था

, वैसा लगा देना ही ठीक होगा।

"

बोर्ड काफी बढ़ा था। डॉली झुककर दूसरी ओर से बोर्ड को पकड़कर उठाने की कोशिश करने लगी। दोनों ने मिलकर बोर्ड को सीधा खड़ा किया

, फिर उसके लोहे के पायों को उन्हीं गढ्ढों में धंसा कर-जिनसे उखड़कर वो गिरा था-उनमें मिट्टी भरकर बोर्ड को फिर खड़ा कर दिया।

तभी एक कार वहां पहुंची।

''ये लोग भी आ गए।

"-राज डॉली से बोला।

कार जय चला रहा था। राज और डॉली को देख कर उसने कार के अंदर से ही उनकी ओर हाथ हिलाया। फिर उसने कार साइड में रोक दी। उसके साथ प्रीति भी थी। वो और प्रीति दोनों कार से उतरकर उनके पास पहुंचे।

''तो

"-जय उनके पास आकर दोनों हाथ कमर पर रखकर खड़े हो गया-

''बोर्ड लगाया जा रहा है? गुड जॉब! गुड जॉब!

"

''बको मत!

"-राज झुंझलाकर बोला।

''अभी हमारा एक ट्रक से एक्सीडेंट हो गया था।

"-डॉली राज की झुंझलाहट की सफाई देती हुई बोली।

''अरे

?"-जय हैरानी से बोला।

''ट्रक वाला अंधों की तरह चला रहा था। साइड से टक्कर मारते हुए निकला। कार का उस ओर का तो दरवाजा ही फंस गया है।

"

''हे भगवान!

"-प्रीति कार के दूसरी ओर जाकर ट्रक से रगड़ खाए हिस्से का जायजा लेती हुई बोली-""ये तो सचमुच बहुत खराब लग रहा है।

"

''सस्ते में छूट गए

"-राज बोर्ड लगा कर हाथ झाड़ते हुए बोर्ड के पास से हटते हुए बोला-

''थोड़ा-सा इधर-उधर और हो जाता तो उस साले ट्रक वाले ने तो पूरी कार ही उड़ा देनी थी।

"

''मुझे हैरानी है।

"-जय बोला-

''हम लोगों को तो काफी देर से इस रास्ते पर और कोई गाड़ी दिखाई नहीं दी।

"

''हमें खुद नहीं दिखी।

"-राज बोला-

''वो ट्रक तो जैसे आसमान से टपका था।

"

''एक काम करो

"-प्रीति बोली-

''तुम लोग हमारी कार में हमारे साथ चलो।

"

''थैंक्स!

"-डॉली बोली-

''पर इस कार को ऐसे ही तो नहीं छोड़ सकते न। पहले चैक कर लेते हैं।

"

''ओके।

"

डॉली और राज फिर कार में बैठ गए। कार आराम से स्टार्ट हो गई। जय और प्रीति बाहर खड़े उन्हीं की ओर देख रहे थे। कार स्टार्ट होते ही डॉली ने मुस्कुराकर उनकी ओर

'थम्ब्स अप

' किया

, जिसके जवाब में वे भी मुस्कुराए और अपनी कार मे जा बैठे।

''एक बार फिर सोच लो

"-डॉली बोली-

''मुझे ऐसा लगता है जैसे अब भी हमारे पास मौका है।

"

''किस चीज का मौका

?"-राज हैरानी से बोला-

''हम इतनी दूर क्या वापस लौट जाने के लिए आए हैं

?"

''एक मिनट!

"-डॉली ने गौर से उसके चेहरे को देखा-

''क्या तुम एक लाख डॉलर के चक्कर में...

?"-उसने अपनी बात अधूरी छोड़ दी।

''मेरे लिए बात पैसों की नहीं है।

"-राज बोला-

''जय ने इस जगह की तारीफ ही इतनी कर दी है कि अब उस घर को देखना तो बनता है।

"

''वाह!

"-डॉली प्रशंसात्मक स्वर में बोली-

''तुम तो संत आदमी हो। माया-मोह से कोसों दूर!

"

डॉली के चिढ़ाने वाले अंदाज पर राज मुस्कुरा दिया।

''अच्छा बाबा

, पैसों की भी बात है। मरा जा रहा हूं पैसों के लिये। अब ठीक है

?"

डॉली जोर से हंसी।

''मजाक मत उड़ाओ।

"

''फिर जरूर अपनी पुरानी गर्लफ्रेंड के साथ कुछ प्यार भरे लम्हें बिताने की चाहत तुम्हें यहां खींच लाई होगी।

"

''बकवास मत करो। प्रीति जय की गर्लफ्रेंड है।

"

''इसका मतलब तुम्हारे दिल में उसके लिए कुछ नहीं है

?"

''मैंने कहा न वो मेरे बेस्ट फ्रेंड की गर्लफ्रेंड है। और मेरी भी बेस्ट फ्रेंड है। और कुछ नहीं।

"

''हां। वो तो मैंने देखा ही था

, जब हम लोग शिमला से लौट रहे थे। तुम अपने बेस्टफ्रेंड की गर्लफ्रेंड से कैसे चिपककर गले मिल रहे थे!

"

''तुम वापस जाना चाहती हो क्या

?"-राज टॉपिक चेंज करने की कोशिश करते हुए बोला।

''मैं तुम्हारा फैसला जानना चाहती हूं।

"

''मुझे यकीन नहीं हो रहा है

, हम इस बारे में बात भी कर रहे हैं। पूरी बातचीत करने के बाद फैसला करने के बाद ही तो हम यहां आये हैं। अगर वापस ही जाना ही था तो हम यहां आते ही क्यों

? वो देखो

, वो दोनों तो आगे चले भी गए।

"

जय और प्रीति की कार कच्चे रास्ते पर आगे बढ़ गई थी।

''क्योंकि उन दोनों को अभी-अभी एक हैवी ट्रक ने कुचलने की कोशिश नहीं की है।

"-डॉली बोली लेकिन कहने के साथ ही उसने भी अपनी कार उनकी कार के पीछे डाल दी।
 
रास्ता काफी लम्बा

, टेढ़ा-मेढ़ा और घुमावदार था। कहीं-कहीं तो रास्ते के किनारे उगी झाडिय़ों के कारण रास्ता इतना संकरा हो गया था कि उनकी कार दोनों ओर से झाडिय़ों से रगड़ खाते हुए आगे बढ़ी।

अपनी मंजिल पर पहुंचकर उन्होंने कार रोकी।

वो एक मकान था।

पुराना

, दो मंजिला मकान। वो पुराना तो लग रहा था लेकिन उस सुनसान उजाड़ जगह पर होने के बाद भी काफी अच्छी हालत में दिख रहा था। जंगल के बीच में एक छोटे से मैदान जैसी जगह में वो मकान बना हुआ था। हालांकि उसे देखने वाले के दिमाग में-अगर कोई भूला-भटका वहां पहुंच जाए तो-सबसे पहले यही बात आनी थी कि ऐसी वीरान जगह पर आखिर किसी ने मकान क्यों बनाया होगा

?

मकान के सामने काफी खुली जगह थी। उन्होंने अपनी कारें वहीं खड़ी कर दीं। मकान के सामने इतनी खाली जगह थी कि अभी वहां आठ और कारें खड़ी की जा सकती थीं और उसके बाद भी आराम से काफी खाली जगह बच जाती। उस मैदान में ढेर सारी घास-फूंस और छोटे-मोटे

, कहीं-कहीं बड़े भी

, पौधे भी उगे हुए थे

, जिससे वो जंगल का हिस्सा लगता था। जंगल का ऐसा हिस्सा

, जिस पर पेड़ नहीं थे।

वो खाली मैदान जैसी जगह चारों ओर से जंगल से घिरी हुई थी। मकान के बगल से एक रास्ता पीछे की ओर जाता दिख रहा था।

मकान के सामने के हिस्से में थोड़ा साइड से जंगल की ओर सटकर एक लकड़ी का बड़ा-सा पुराना केबिन भी बना हुआ था

, जिसका दरवाजा बंद था।

वे चारों कार से उतरे।

पहली ही नजर में वो किसी भुतहा मकान से कम नहीं लग रहा था।

लेकिन वो कोई साधारण भुतहा मकान नहीं था।

दुनिया के

'टॉप टेन हॉन्टेड प्लेसेज

' में से एक था।

''हमें...

"-प्रीति के स्वर में हिचकिचाहट के भाव आ गए-

''इस मकान में रहना होगा

?"

किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। जय की गम्भीर नजरें भी उसी मकान पर टिकी हुईं थीं।

मकान लम्बे अरसे से रंगाई-पुताई नहंीं होने से बदहाल दिख रहा था। खिड़की के पल्ले शीशे के थे

, जिन पर धूल की मोटी परत जमी हुई थी। मकान की दूसरी मंजिल पर अगल-बगल में दो खिड़कियां थीं

, जिसके नीचे पहली मंजिल पर दरवाजा ऐसा लुक दे रहा था

, जैसे मकान न होकर कोई चेहरा हो। वो खिड़कियां आंखों की जगह हों और दरवाजा मुंह की जगह।

''ये दिन में इतना डरावना दिख रहा है

"-डॉली बोली-

''तो रात के समय तो जरूर इसे देख कर किसी साधारण आदमी का हार्टफेल ही ही हो जाए।

"

प्रीति और जय ने उसकी बात के जवाब में स्वीकृति में सिर हिलाये।

''बाकी लोग कहां हैं

?"-राज बोला।

तभी मकान के पीछे की ओर से अनुराग और मोहिनी आते दिखे।

''लव बर्ड्स।

"-जय बोला।

दोनों उनके पास आ पहुंचे।

''और

?"-अनुराग राज से बोला-

''कैसा रहा सफर

?"

अनुराग उनमें सबसे हट्टा तगड़ा था। उसकी हाइट छ: फीट दो इंच के करीब थी और शरीर भी पहलवानों की तरह हट्टा कट्टा लेकिन फिल्म स्टारों की तरह फिट भी था। वो क्लीन शेव्ड भी रहता था

, जिससे देखने में ही किसी हीरो जैसा ही लगता था।

''ठीक था।

"-राज

बिना रास्ते में हुए एक्सीडेंट का जिक्र किए बोला-

''बस एक सनकी पेट्रोल पंप वाले ने दिमाग खराब किया। तुम लोग यहां कितनी देर से पहुंचे हुए हो

? और किस चीज से आए हो

?"

''कार से।

"-अनुराग बोला-

''पीछे खड़ी की है। हम लोग भी अभी थोड़ी ही देर पहले यहां पहुंचे हैं।

"

''तुमने कहा था

"-डॉली जय से बोली-

''यहां हमें कोई और भी मिलेगा

?"

''एक तो इस मकान का केयरटेकर ही है

"-जय बोला-

''उसके अलावा एक उस कंपनी का आदमी भी है

, जिसके ऑफर पर हम यहां आये हैं। वो हमारे होस्ट की भूमिका निभाएगा।

"

''उसे तो यहां पहले से होना चाहिये था।

"-अनुराग असंतोषपूर्ण स्वर में बोला।

''मैं उस बारे में तुम लोगों को कुछ बताना चाहता हूं।

"-जय सफाई देने वाले अंदाज में बोला।

''क्या

?"-राज बोला। उसकी आवाज में अजीब भाव नोट करके वे सभी सावधान हो गए।

''देखो

"-जय बोला-

''अब हम यहां तक आ ही गए हैं

, यहां तीन दिन बिताने के इरादे से आये हैं और एक लाख डॉलर के ईनाम के लिये आये हैं तो जाहिर है कि हमें कुछ न कुछ चुनौतियों का सामना तो करना ही पड़ेगा...।

"

''कुछ न कुछ

?"-मोहिनी उस मकान को घूरते हुए बोली-

''इस भूत बंगले में तीन दिन दिन बिताना कम चुनौती है क्या

?"

''नहीं। मेन चुनौती तो वही है। लेकिन कंपनी वाले चाहते हैं साथ में कुछ एंटरटेनमेंट भी होता रहे।

"

''एंटरटेनमेंट

?"-अनुराग बोला-

''किस तरह का एंटरटेनमेंट होगा यहां

?"

''उसी तरह का जिस तरह में वे माहिर हैं।

"

''क्या मतलब

?"

''मतलब ये

, भोले बलम

, कि वो ऐसी कंपनी है

, जो हॉरर थीम पर आधारित पार्क

, रेस्टोरेंट वगैरह बनाती है। इसीलिये तो उनका इंट्रेस्ट ऐसी हॉन्टेड मानी जानी वाली जगहों में है...।

"

''मानी जाने वाली

?"-मोहिनी बोली-

''कहीं सचमुच ही न हो ये हॉन्टेड

!"

''...तो जब उन्होंने ईनाम इतना बड़ा रखा है तो जाहिर है कि चैलेंज भी उतना ही बड़ा होगा।

"

''बात को गोल-गोल मत घुमाओ।

"-अनुराग बोला-

''सीधे-सीधे बताओ

, बात क्या है

?"

''बात ये है कि यहां हमें कुछ डराने वाली चीजें दिखेंगीं

, जिन्हें देखकर हमें डरना नहीं है।

"

''क्या

?"

''हां। समझ लो ये उन कंपनी वालों की उस हॉरर थीम के पार्क में सैर करने जैसा ही है। फर्क सिर्फ इतना ही है कि उनके हॉरर पार्क में लोग पैसे खर्च करके भूत देखने जाते हैंं और यहां हमें वो फ्री में भूत दिखाएंगें। बल्कि भूत देखने के पैसे देंगें।

"

अनुराग का मुंह खुला-का-खुला रह गया। उसने राज की ओर देखा। राज भी जय की बात सुनकर गम्भीर हो गया था। उसने अनुराग की ओर

देखा

, फिर जय से बोला-

''किस तरह के भूत दिखाई देंगें हमें यहां पर

?"

''अरे

, यार!

"-जय बोला-

''मैं ये नहीं कह रहा हूं कि यहां हमें भूत ही दिखाई देंगें। मेरे कहने का मतलब है कि हमारे इन तीन दिनों के स्टे को रोचक और यादगार बनाने के लिये उन लोगों ने यहां कुछ सैटअप किये होंगें

, जो डरावने लग सकते हैं। लेकिन हमें डरना नहीं है। हमें याद रखना है कि अगर ऐसा कुछ दिख रहा है तो वो नकली है।

"

''बकवास!

"-अनुराग मुंह बिगाड़कर बोला।

''क्या हुआ

?"-जय बोला।

''मेरे साथ किसी ने भूत-प्रेत बनकर मजाक किया तो मैं उसका टेंटुआ दबा दूंगा। सचमुच का भूत बना दूंगा उसे।

"

''देखो

, ये सब उनकी टर्म्स एंड कंडीशंस में शामिल है

, जो इस चैलेंज में शामिल होने का फॉर्म भरने के साथ ही हमने एक्सेप्ट किया है।

"-जय गम्भीर स्वर में बोला-अब हम पीछे नहीं हट सकते। और हटते हैं-या अब उनकी किसी भी शर्त को मानने से इनकार करते हैं-तो हमारी इतनी दूर आने की मेहनत पर पानी फिर जायेगा।

"

''साफ-साफ बताओ

"-राज अपनी हथेली सामने लहराकर बोला-

''कि वो किस तरह से हमें डराने की कोशिश करेंगें

?"

''मुझे खुद नहीं पता कि वो लोग क्या करेंगें

?"-जय ने कंधे उचका दिए-

''मुझे बस इतना बताया गया है कि हमारे स्वागत के लिये उनका आदमी तैयार रहेगा। अब जाहिर है

, जो कुछ करेगा

, वो उनका आदमी ही करेगा।

"

''उनका आदमी क्या करेगा

?"

''अरे भई मुझे नहीं पता।

"-जय के स्वर में झुंझलाहट के भाव आ गये-

''लेकिन जो भी करेगा

, हमें डराने के लिये ही करेगा। तो ऐसी कोई भी ऊल-जलूल चीज यहां दिखे तो हमें डरना नहीं है। मैं यही तुम लोगों को समझाने की कोशिश कर रहा हूं।

"

''बहुत अच्छी कोशिश कर रहे हो।

"-अनुराग व्यंग भरे स्वर में बोला-

''और अगर हम लोगों के साथ सचमुच कुछ गलत हो जाता है और हम उसे उन कंपनी वालों का ही काम समझ कर मूर्ख बनते रहें

, तब क्या होगा

?"

''राइट!

"-मोहिनी ने अनुराग का समर्थन किया-

''तुमने वो भेडिय़ा आया वाली कहानी नहीं सुनी क्या

?"

''अरे!

"-जय हतप्रभ स्वर में बोला-

''तुम लोग कहना क्या चाह रहे हो

? भाई एक लाख डॉलर-वो भी तीन दिन में-कमाना हंसी-खेल नहीं है। तुम्हें क्या लगा था

, हलवा होगा

?"

''मुझे तो ये अब पहले से ज्यादा खतरनाक लग रहा है।
 
"-मोहिनी बोली।

''खतरनाक-वतरनाक मैं नहीं जानता।

"-अनुराग का स्वर सख्त हो गया-

''मैं अपनी बात पर कायम हूं। मुझे यहां तीन दिन

, तीन रातें बिताने में कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन तुम्हारे वो कम्पनी वाले हमें डराने के लिये कोई होकस-पोकस करने वाले हैं तो वो हमें डराने से पहले अपनी चिंता खुद करें। अगर उनके आदमी हम लोगों के साथ कोई स्टंट करने की कोशिश करेंगें तो फिर अपनी हड्डी-पसली टूटने के जिम्मेदार भी वही होंगें।

"

''नहीं।

"-जय बोला-

''ये भी बात है। हमें उनके आदमी के साथ को ऑपरेट करने के लिये कहा गया है।

"

''आदमी

?"

''हां। जो यहां हमारा होस्ट बनेगा।

"

''कौन है वो आदमी

?"

''मैं उसका नाम वगैरह नहीं जानता। असल में मैं उसके बारे में कुछ भी नहीं जानता। मुझे सिर्फ इतना बताया गया है कि वो हमें यहीं पर मिलेगा। आगे जो भी होगा

, उसके बताए अनुसार होगा। हमें यहां कैसे रहना है

, किन-किन रूल्स को फॉलो करना है

, ये सब भी वही बतायेगा।

"

''रूल्स को भी फॉलो करना है

?"

''और नहीं तो क्या

? भाई

, समझ लो तीन दिन के लिए हम यहां एक रियलिटी शो में हिस्सा ले रहे हैं।

"

अनुराग ने पलटकर उस घर की ओर देखा और थोड़ी देर तक देखता रहा।

''और वो ट्रक

?"-यकायक राज बोला।

''क्या

?"-जय चौंका।

''वो जो अचानक जैसे हवा से प्रगट हो गया था। जिसने हमारी कार को टक्कर मारी थी।

"

''तो उसका क्या

?"-जय अचकचा गया।

''तुम्हारा एक्सीडेंट हुआ था

?"-अनुराग हैरानी से बोला

, फिर उसने थोड़ी दूर पर खड़ी राज की कार पर नजर मारी। कार के एक हिस्से पर लगे रगड़ के निशान देख कर उसकी आंखें फैल गईं।

''हां।

"-राज ने अनुराग को जवाब दिया

, फिर जय से बोला-

''क्या वो भी उन कंपनी वालों का ही काम हो सकता है

?"

''क्या मतलब

?"-जय हैरानी से बोला।

''तुम्हीं तो कह रहे हो कि वो लोग हमें डराने की कोशिश करेंगें।

"

''कम ऑन

, यार

, वो एक्सीडेंट तो रियल ही होगा। वो लोग हमें यहां डराने की कोशिश करेंगें लेकिन किसी ऐसे तरीके से नहीं

, जिससे हमें नुकसान पहुंचे। हमारी जान नहीं लेने वाले वो लोग। वो लोग कोई खूनी दरिंदे नहीं है

, फनहाउस चलाने वाले हैं।

"

राज चेहरे पर शांत भाव लिए उसे देखता रहा।

जय ने डॉली की ओर देखा।

''क्या तुम्हें भी लगता है

"-फिर वो डॉली से बोला-

''कि वो एक्सीडेंट भी इन कंपनी वालों ने ही किया होगा

?"

डॉली ने जवाब देने के लिए मुंह खोला ही था कि तभी एक कार की आवाज ने उनका ध्यान खींच लिया।

सबकी नजरें उस रास्ते की ओर उठ गईं

, जिस रास्ते से वे लोग खुद वहां आए थे। एक कार धूल उड़ाते हुए उसी ओर आ रही थी।

''अब ये कौन है

?"-मोहिनी बोली।

जय ने कार को ड्राइव कर रहे शख्स को पहचाना

, फिर बोला-

''ये यहां का केयरटेकर है।

"

केयरटेकर का नाम सुरेश डोंगरा था। वो एक करीब

50 वर्षीय आदमी था

, जिसके सारे बाल डाई की कृपा से एकदम शाइनी ब्लैक थे। डाई की बदौलत अपने बालों की सफेदी तो उसने छुपा ली थी लेकिन अपने मोटापे को छुपाने का उसके पास कोई साधन नहीं था।

उसके साथ एक बला की खूबसूरत युवती भी थी।

जैसे ही वे दोनों कार से उतरेे

, डोंगरा के साथ आई युवती पर नजर पड़ते ही मोहिनी का हाथ अपने मुंह पर चला गया।

''ओ माई गॉड!

"-उसके मुंह से निकला।

''क्या हुआ

?"-डॉली ने चौंक कर उसकी ओर देखा।

मोहिनी ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया। वो बस मुंह पर हाथ रखे हुए डोंगरा के साथ आई उस युवती को देखती रही।

''ये केयरटेकर है यहां का

?"-अनुराग डोंगरा की ओर देखते हुए बोला।

''हां।

"-जय बोला।

''अपनी बेटी के साथ आया है!

"-अनुराग उसके साथ आई खूबसूरत युवती पर नजर डालते हुए संतुष्टिपूर्ण स्वर में बोला।

''बोल भी मत देना उसके सामने वैसा। मंगेतर है उसकी।

"

''तौबा तौबा! सारा मूड खराब कर दिया।

"

''हूर के साथ लंगूर!

"-जय बोला।

''लंगूर के हाथ में अंगूर!

"-अनुराग ने भी उसके सुर में सुर मिलाया।

तब तक डोंगरा और वो युवती दोनों ही उनके पास पहुंच चुके थे। जय ने तुरंत चेहरे पर गम्भीरता की परत ओढ़ ली और बड़ी गर्मजोशी से डोंगरा से हाथ मिलाया। फिर उसने बाकी सब लोगों से डोंगरा का परिचय भी करवाया।

''ये मेरी मंगेतर है।

"-डोंगरा अपने साथ आई युवती का परिचय उनसे कराते हुए बोला-

''रिंकी। आप लोगों के तीन दिन के स्टे के दौरान हम दोनों भी आपके साथ यहीं रहेंगें।

"

''मोर

"-अनुराग बड़े दार्शनिक अंदाज में बोला-

''द मैरियर।

"

''क्या

?"-डोंगरा की भंवें उठीं।

''मैंने कहा

, जितने ज्यादा हों उतना अच्छा।

"

''ओह!

"

मोहिनी ने अपने मुंह पर से हाथ हटा लिया था लेकिन वो रिंकी के चेहरे से अब भी नजरें नहीं हटा पा रहीं थीं। रिंकी की नजरें कुछ देर के लिए मोहिनी के चेहरे पर ठिठकीं

, फिर वो बाकियों की ओर देखने लगी।

''आप अपनी मंगेतर को ऐसी जगह ले आये

?"-प्रीति बोली।

''क्या मतलब

?"-डोंगरा ने उसकी ओर देखा।

''मतलब ये कोई पिकनिक स्पॉट थोड़े ही है।

"

डोंगरा ने प्रीति की ओर देखा

, फिर बोला-

''हमारे लिये तो पिकनिक ही है। और मेरे ख्याल से आपके लिये भी।

"

''दैट्स माई बॉय!

"-अनुराग प्रशंसात्मक स्वर में बोला।

डोंगरा ने अनुराग की ओर देखा
 
, फिर बोला-

''वैसे देखा जाए तो ये एक लाख डॉलर आप लोगों के लिये

'ईजी मनी

' ही साबित होगा। बस

, तीन दिन इस मकान में बिताने हैं

, जिसे दुनिया की दस सबसे भुतहा जगहों में से एक माना जाता है

, फिर रकम आप लोगों के एकाउंट में ट्रांसफर हो जाएगी। इट्स सिम्पल एज दैट!

"

''कई बार

"-राज बोला-

''हद से ज्यादा सिम्पल दिखने वाली चीज उतनी ही ज्यादा मुश्किल साबित होती है।

"

डोंगरा ने राज की ओर देखा

, फिर उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ गई-

''मिस्टर पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर! आपके लिये ही मुश्किल होगा क्योंकि आपके लिये तो भूत-प्रेतों पर विश्वास करना लाजिमी है। आपका तो प्रोफेशन ही है।

"

''आप नहीं करते भूत-प्रेतों पर विश्वास

?"-राज शांत स्वर में बोला।

''बिल्कुल नहीं करता। घोस्ट्स डोंट एग्जिस्ट्स

"

''ये तो एक फिल्म का नाम है।

"-अनुराग ने चुटकी बजाई-

''मैंने देखी है।

"

''अगर घोस्ट्स एग्जिस्ट नहीं करते

"-राज बोला-

''तो आप ही बताइयेे इस मकान को दुनिया की दस सबसे भुतहा जगहों में शामिल करने की क्या वजह है

?"

''मार्केटिंग।

"

''क्या

?"

''बाजार में कोई चीज बेचनी हो

, और उसके लिए ग्राहक न हो

, तो बेस बनाना पड़ता है

, ग्राहक तैयार करने पड़ते हैं। और जब हद से ज्यादा चालाक लोग ये काम करते हैं तो इतने शातिर ढंग से करते हैं कि जिस चीज को कोई खरीदने वाला नहीं था

, उसके पीछे लोग पागल होने लगते हैं। उसका नाम ले-लेकर चिल्लाने लगते हैं। खुद ही उस चीज का ऐसा हौव्वा खड़ा करने लगते हैं कि लोग भागे-भागे उसे लेने आते हैं और न मिल पाए तो मातम मनाने लगते हैं जैसे उनका पता नहीं कितना बड़ा नुकसान हो गया हो।

"

''यहां कौन सी चीज बिक रही है और कौन सी चीज के पीछे लोगों को पागल किया जा रहा है

, स्पष्ट करने की कृपा करेंगें

?"

''भूत-प्रेत। भूत-प्रेत का जबर्दस्त मार्केट तैयार किया गया है पूरी दुनिया में। जबकि ये ऐसी चीज है

, जिससे बच्चे ही डरते हैं। भूत-प्रेत की कपोल-कल्पना पर आज पूरी दुनिया में खरबों रूपये का कारोबार होता है। फिल्मों की कतार लगी है

, किताबें लिखी जा रही हैं

, टीवी पर शोज आ रहे हैं

, थीम पार्क बन रहे हैं-जैसा कि इस मकान को भी बनाया जाने वाला है-और भी पता नहीं क्या-क्या हो रहा है

? मैं भूत-प्रेत पर बिल्कुल विश्वास नहीं करता और मेरे हिसाब से कोई भी शख्स जिसका दिमागी तवाजन हिला हुआ नहीं होगा

, ऐसी चीज पर विश्वास नहीं करता होगा

, जो होती ही नहीं है। जिसका कोई अस्तित्त्व ही नहीं है।

"

''तो आपके हिसाब से ये मकान सिर्फ इसलिए दुनिया की दस सबसे भुतहा जगहों में शामिल है क्योंकि इसकी मार्केटिंग की गई है

? ऐसा भ्रामक प्रचार-प्रसार किया गया है कि ये मकान भुतहा है

? जबकि ये है ही नहीं

?"

''ये पूरी तरह सच नहीं है।

"-डोंगरा के स्वर में हिचकिचाहट के भाव आ गये।

''फिर सच क्या है

?"

''इस घर का एक लम्बा इतिहास है।

"

''कैसा इतिहास

?"

''बुरी घटनाओं का। भयानक डरावनी घटनाएं। हालांकि मैं उन घटनाओं के बारे में ज्यादा नहीं जानता लेकिन मैंने सुन रखा है कि इस मकान में जो भी रहा

, उसके साथ कुछ न कुछ ऐसी घटनाएं हुईं

, जिसके चलते उन्हें ये जगह छोड़कर जाना पड़ा। हालांकि कुछ तो इतने खुशकिस्मत भी नहीं थे। इस मकान के कई पिछले मालिकों की यहां रहते हुए रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु हो चुकी है। इस तरह की घटनाएं ही इस घर को भूत बंगले के रूप में प्रचारित होने का एक बड़ा कारण रहीं हैं।

"

''कौन-सी घटनाएं

?"-अनुराग दिलचस्पी लेते हुए बोला-

''कुछ बताइये तो सही

?"

''मैं जरूर बताता।

"-डोंगरा खेदपूर्ण स्वर में बोला-

''लेकिन हॉरर कहानियों में मेरा कभी इंट्रेस्ट नहीं रहा। इसलिए शायद मैं आपको उस ढंग से न बता सकूं

, जिस ढंग से आपको इस घर के भूतग्रस्त होने पर पूरा विश्वास हो जाए। जैसे इस घर में पहले रहने वाले लोगों की किसी घटना-दुर्घटना में मृत्यु

, हत्या वगैरह। मेरी नजर से देखेंगें तो वो घटनाएं दशकों पहले हुई ऐसी अपराधिक घटनाएं ही थीं

, जिनका अपराधी संयोग से पकड़ा नहीं जा सका और लोगों ने उन घटनाओं का कारण भूत-प्रेत को मान लिया। और जहां तक मेरा मानना है भूत-प्रेत से सम्बन्धित कही जाने वाली लगभग सभी घटनाओं के साथ ऐसा ही होता है। कई सालों से तो ये घर खाली ही पड़ा है। इसके भूतग्रस्त होने के कारण लोगों में इसका खौफ इतना ज्यादा है कि कोई यहां रहने की सोच भी नहीं सकता। इसके अलावा ये पास के गांव से थोड़ा आउटसाइड के इलाके में भी पड़ जाता है तो ये भी एक मुख्य वजह है कि कोई यहां नहीं रहना चाहता। लेकिन मैं फिर कहना चाहूंगा कि यहां अगर कुछ दशक पहले किसी का खून हो गया था तो इसका ये मतलब नहीं कि उससे मकान ही हॉन्टेड हो गया। अब इतना लम्बा अरसा बीतने के बाद इस बात को लेकर किसी मकान से डरने की कोई वजह नहीं बनती कि वहां कोई हत्या या हत्याएं हुईं थीं। आखिर हर मकान में कभी न कभी

, कोई न कोई मौत तो हुई होती है। इसका मतलब ये तो नहीं कि हर मकान भुतहा हो जाता है।

"

''शुक्र है

"-राज बोला-

''कि आपने ये नहीं कहा कि हर मकान में कभी न कभी

, कोई न कोई हत्या तो हुई होती है।

"

डोंगरा ने नाराजगी के भाव के साथ राज की ओर देखा।

अनुराग मकान की ओर पलटा और उसकी सीध में दोनों हाथ कमर पर रखकर खड़ा हो गया। उसने उस भुतहा माने जाने वाले मकान पर भरपूर नजर डाली

, फिर एक-एक शब्द पर जोर देते हुए बोला-

''ये मकान तो बहुत ही ज्यादा बदनाम है।

"

''आप कब से यहां केयरटेकर हैं

?"-डॉली ने डोंगरा से पूछा।

''करीब साल भर से। लेकिन मैं दूसरी बार ही यहां आया हूं।

"

''अरे!

"

''ऑनलाइन केयरटेकिंग करता होगा।

"-प्रीति धीमे से बुदबुदाई

, जो कि पास खड़े होने के कारण केवल डॉली को ही सुनाई दिया।

''हां। दरअसल

, कंपनी के निर्देश पर ही मैं यहां आता था। शहर में मेरा मेन बिजनेस दूसरा है। पहली बार मैं यहां तब आया था

, जब कंपनी वालों ने शुरू-शुरू में इस मकान को खरीदा था और मुझे बतौर केयरटेकर नियुक्त किया था। मुझे कहते हुए अजीब लग रहा है लेकिन उस समय इस मकान में कदम रखते हुए मुझे काफी अजीब लगा था। मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता लेकिन कुछ तो अजीब था। उस समय मेरी जल्दी से जल्दी यहां से दूर चले जाने की तीव्र इच्छा होने लगी थी। और मुझे स्वीकार करते हुए कोई संकोच नहीं है कि मैं थोड़ा डर भी गया था। लेकिन यहां से लौटने के बाद मुझे इस बात को याद करके काफी हंसी आती थी और शर्मिंदगी भी महसूस होती थी। आखिर एक मकान से डरने की क्या वजह हो सकती है

? शायद यहां जंगल में सूनेपन के माहौल का मेरे दिमाग पर असर हो गया था। मैंने उसी समय सोच लिया था कि दोबारा यहां आऊंगा तो किसी तरह का वहम नहीं पालूंगा। लेकिन मुझे उतने अरसे में दोबारा यहां आने का मौका अब मिला है। कंपनी वालों की ओर से निर्देश था कि जब वो कहें

, तभी मुझे यहां आना है।

"

''ऐसा क्यों

?"-राज बोला।

''ये तो अब कंपनी वाले ही बता सकते हैं। शायद उन्हें यहां अनावश्यक दखल पसंद न हो। या

"-उसने मकान पर नजर मारी-

''वे यहां कुछ करते रहें हों।

"

''इतनी बड़ी प्रॉपर्टी खरीदी और उसे साल भर के लिए यूं ही छोड़ दिया

?"-प्रीति मकान की ओर देखते हुए बोली।

''वैसे केयरटेकर होने के नाते

"-जय मकान की खिड़कियों पर जमी धूल की ओर देखता हुआ बोला-

''आपका फर्ज नहीं बनता था कि इस मकान की थोड़ी झाड़-पोंछ करवा देते

, जिससे ये इंसानों के रहने लायक बन जाता

?"

डोंगरा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

''डोंट वरी।

"-वो सांत्वना देने वाले ढंग से बोला-

''अंदर मकान को व्यवस्थित किया गया है। यहां जो एक और शख्स आने वाला है-जो कि हमारा होस्ट होगा

, मतलब कंपनी का प्रतिनिधि-वो यहां एक-दो दिन पहले ही आकर पूरी व्यवस्था कर गया है। राशन वगैरह भी किचन में मिल जायेगा। हम लोगों को यहां तीन दिन बिताने में कोई दिक्कत नहीं होगी। बाहर से बस झाड़-पोंछ इसलिए नहीं करवाई गई है क्योंकि ऐसा करने पर मकान का हॉरर लुक चला जाता।

"

''ये तो आप गलत कह रहे हैं।

"-डॉली गहरी नजरों से मकान को देखते हुए बोली-

''इस मकान को तो सोने में भी जड़वा दो

, तब भी इसका हॉरर लुक नहीं जाने वाला।

"

डोंगरा हंसा।

''वो कंपनी वाले इस मकान को हॉरर फनहाउस बनाना चाहते हैं न

?"-जय बोला।

''हां। वो लोग तो यहां हॉन्टेड थीम पार्क बनाने का काम शुरू भी करने वाले थे। लेकिन इसी बीच लॉकडाउन भी लग गया

, जिसके चलते वे काम शुरू नहीं कर पाए। लेकिन कंपनी वालों का दिमाग भी कम खुन्दकी नहीं है। आखिर इतनी अजीब कंपनी के मालिक हैं।

"

''अजीब तो है।

"-अनुराग ने स्वीकार किया।

''अजीब से याद आया।

"-कहकर डोंगरा ने अपनी कार से एक लोहे का पुराना सा दिखने वाला संदूक

निकाला।

''ये क्या है

?"-जय बोला।

''इस 'आइसोलेशन इवेंट' का एक छोटा-सा ट्रेडीशन।

"

''कैसा ट्रेडीशन

?"

''आप सब अपने मोबाइल ऑफ करके मुझे सौंप दें

, जिससे मैं उन्हें अपनी कार की डिक्की रखकर लॉक कर सकूं। अब ये डिक्की तीन दिन बाद ही खुलेगी और तभी आपको आपके मोबाइल वापस मिल सकेंगें। एक भुतहा मकान में तीन दिन बिताने की इस चुनौती को पूरा करने के दौरान आपके पास बाहरी दुनिया से सम्पर्क करने का कोई जरिया नहीं होगा।

"
 
इवेंट के टर्म्स एंड कंडीशंस में वे लोग उस शर्त को पहले ही पढ़ चुके थे। सब अपने मोबाइल निकाल कर उन्हें ऑफ करते हुए डोंगरा के हवाले करने लगे।

''ये सबसे ज्यादा तकलीफदेह है।

"-मोबाइल देते हुए जय के चेहरे पर पीड़ा के भाव थे-

''तीन दिनों मैंने अपनी स्टेट्स अपडेट नहीं की तो मेरे सोशल मीडिया के फ्रेंड तो मुझे मरा हुआ समझने लगेंगें।

"

''सोचेंगें

"-अनुराग हंसते हुए बोला-

''कि तुम्हें जरूर कोरोना हो गया होगा।

"

''और इस दौरान

"-राज अपने मोबाइल को हाथ में पकड़े हुए ही गम्भीर स्वर में बोला-

''हमें सचमुच ही बाहर किसी से सम्पर्क करने की जरूरत पड़ी तो

?"

''क्या मतलब

?"-डोंगरा बोला।

''मतलब अगर यहां हमारे साथ कोई घटना-दुर्घटना हो जाती है या ऐसी ही किसी आपात स्थिति में हमें सहायता की जरूरत हो तो हम पुलिस या एम्बुलेंस वगैरह भी नहीं बुला सकते फिर तो

?"

''देखिए

"-डोंगरा बोला-

''मेरे ख्याल से आप स्थिति को अच्छी तरह समझने के बाद ही यहां आए होंगें। पहली बात तो यहां नेटवर्क ही मुश्किल से मिलता है। दूसरी बात कॉल करते ही इतनी दूर

, बियाबान जगह में मदद तुरंत हाजिर नहीं हो जाएगी। उससे तो अच्छा होगा कि ऐसी किसी स्थिति में हम अपने शरीर को ही थोड़ा कष्ट देकर इन कारों का प्रयोग करेंगें

, जो हम मुंह देखने के लिए नहीं लाए हैं और इनमें बैठकर शहर चले जाएंगें। लेकिन उस स्थिति में आप सबको मिलने वाली प्राइज की रकम जरूर कैंसल हो जाएगी क्योंकि तीन दिन की अवधि में इस मकान को छोडऩे का मतलब है खेल खत्म! गेम ओवर! तो सबसे बेहतर तो यही होगा कि आप सब अपना-अपना ध्यान रखें और कोई घटना-दुर्घटना होने ही न दें

, जिससे ऐसी कोई नौबत ही न आने पाए। वैसे भी हमें यहां सिर्फ तीन दिन गुजारने हैं। कोई मिलिट्री ट्रेनिंग नहीं करनी है

, जो हममें से कोई घायल हो जायेगा।

"

जय ने राज को टहोका। राज ने अपना स्विच्ड ऑफ किया हुआ मोबाइल डोंगरा की ओर बढ़ा दिया।

डोंगरा ने सारे मोबाइल डिक्की में बंद कर डिक्की को लॉक कर दिया। फिर कार के बोनट के पास पहुंचकर बोला-

''अभी मुझे आप लोगों से कुछ और भी लेना है।

"-बोनट पर उसने वो संदूक रखा था

, जो उसने कार से निकाला था।

''अब क्या चाहिए इसे

?"-अनुराग धीमे से बड़बड़ाया।

''ये आपको काफी अजीब लगेगा लेकिन इस तरह के इवेंट में ये एक ट्रेडीशन की तरह ही है। इस काम की जिम्मेदारी कंपनी वालों ने मुझे ही सौंपी है।

"

''सस्पेंस मत बढ़ाओ भाई।

"-जय खाली संदूक में झांकते हुए बोला-

''जल्दी बताओ

, बात क्या है

?"

''हमें अपने पास के सभी रिलीजियस सिम्बल वाली चीजें-जैसे लॉकेट

, नैकलैस या कोई भी धार्मिक तस्वीर वगैरह इसमें रखनी होगी। इस मकान में प्रवेश करते समय हमारे पास ऐसी कोई चीज नहीं होनी चाहिए। फिर इस सन्दूक को छिपाने का काम यहां का केयरटेकर होने के नाते मेरे जिम्मे है।

"

''छिपाने का

?"-प्रीति बोली-

''इसे छिपाने की क्या जरूरत है भला

?"

''जिससे आप में से कोई इसमें से अपने लॉकेट वगैरह निकाल नहीं सके। फिक्र मत करिये। आपके मोबाइलों की तरह ही तीन दिन बाद ये भी आपको वापस मिल जाएंगें।

"-डोंगरा आश्वासन भरे स्वर में बोला।

सबने एक-दूसरे की ओर देखा।

''एक लाख डॉलर के लिये छोटी-सी कीमत!

"-फिर शुरूआत अनुराग ने अपने गले में ओम के लॉकेट को उतारते हुए की।

''अनुराग!

"-प्रीति आश्चर्य से बोली-

''मैं तो तुम्हें नास्तिक समझती थी। मैंने कभी तुम्हारे लॉकेट की ओर ध्यान ही नहीं दिया।

"

''सही समझती थीं।

"-अनुराग बोला-

''ये मेरी मां ने मुझे दिया था। इसीलिये पहनता हूं। पहली बार इसे इतने लंबे अरसे के लिये खुद से दूर कर रहा हूं।"-कहते हुए अनुराग ने लॉकेट संदूक में डाल दिया।

फिर जय ने भी अपने हाथ पर पहना स्वास्तिक वाला ब्रेसलेट उतारकर संदूक में डाल दिया।

उनका अनुसरण करते हुए बाकी सबने भी उनके पास जो-जो धार्मिक प्रतीक चिह्नों वाली चीजें थीं

, उस सन्दूक में रख दीं।

''तुम

?"-डोंगरा ने रिंकी की ओर देखा।

''मैं इन सब चीजों में विश्वास नहीं करती।

"-रिंकी भावहीन स्वर में बोली।

फिर डोंगरा ने सन्दूक को बंद किया

, उसे उठाया और मकान के बगल से चक्कर काटते हुए पीछे की ओर चला गया।

''ये तो अच्छा-खासा तमाशा है।

"-पीछे मोहिनी बड़बड़ाई।

''ऐसे तमाशे अभी और होंगें।

"-अनुराग बोला-

''तुम्हें क्या एक लाख डॉलर कमाना इतना आसान होगा

?"

कुछ देर बाद जब डोंगरा वापस लौटा तो उसके पास सन्दूक नहीं था।

"कहाँ छिपा आए?"-डॉली बोली

जवाब में कुछ कहने की जगह डोंगरा मुस्कुरा दिया।

''नाओ वी आर वल्नरेबल टू घोस्ट्स!

"-जय आंखें नचाकर बोला।

उसकी बात पर कोई नहीं हंसा।

''कम ऑन यार!

"-जय अपनी आवाज में जोश भरते हुए बोला-

''ये सब तो ड्रामा बस है। हमें तो एक तरह से दुनिया में सबसे ज्यादा आसानी से इतनी बड़ी रकम कमाने का मौका मिला है। बस तीन दिन और हम सबके एकाउंट्स में एक-एक लाख डॉलर होंगें। तुम लोग ऐसी बोझिल सूरतें बनाओगे तो कैसे चलेगा

? अभी तो हमने इस मकान के अंदर कदम भी नहीं रखा है। तुम्हारे चेहरे देखकर तो लगता है जैसे यहां सचमुच भूत प्रेत हैं और वो लॉकेट वगैरह नहीं होने से वो अब हमें कच्चा ही चबा जायेंगें।

"

''इनफ

, जय...।

"-राज बोला।

"आप लोगों को ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है"-डोंगरा आश्वासन भरे लहजे में बोला-"आप लोगों को पहले से ही पता होगा लेकिन मैं भी बता दूं कि इस इवेंट में पर्टिसिपेट करने के साथ ही 'पैरानॉर्मल होल्ड' द्वारा आपका दो-दो लाख डॉलर का बीमा कर दिया गया है। यानि अगर किन्हीं परिस्थितियों में किसी को कुछ हो जाता है-जो कि भगवान न करे हो-तो उसके परिवार वालों को दो लाख डॉलर मिलेंगें। जो कि इस इवेंट की प्राइज मनी का भी डबल है। करीब डेढ़ करोड़ रूपए।"

"ये क्या सुन लिया!"-अनुराग बड़बड़ाने के से अंदाज में बोला-"अब तो मरना होगा!"

''हमें दो लाख डॉलर की कोई जरूरत नहीं है

"-प्रीति मीठे स्वर में बोली-

''खास तौर से मरने के बाद तो बिल्कुल नहीं।

"

''हां

"-मोहिनी ने प्रीति की हां में हां मिलाई-

''हमारे लिए एक लाख डॉलर ही बहुत हैं।

"

''मेरे ख्याल से

"-अनुराग डोंगरा से बोला-

''यहां एक और शख्स आने वाला था

?"

''नहीं।

"-डोंगरा ने उस ओर आने वाले कच्चे रास्ते की ओर देखते हुए कहा-

''आने वाला नहीं था। उसे अब तक पहुंच जाना चाहिये था।

"
 
उन्हें इंतजार करते-करते शाम हो गई।

अंधेरा छाने लगा था।

''तुम्हारा ये आदमी कब आयेगा

?'-अनुराग झल्लाकर बोला। वो पिछले दो-तीन घंटों में करीब आठ-दस बार वो सवाल दोहरा चुका था।

जय ने डोंगरा की ओर देखा।

''उसे अब तक आ जाना चाहिए था।

"-डोंगरा फिक्रमंद स्वर में बोला।

''शायद हमें अंदर चल कर देखना चाहिए।

"-जय बोला।

''लेकिन दरवाजे पर तो ताला लगा है।

"-डोंगरा ने कहा।

''ताला तोड़ा भी जा सकता है।

"

''लेकिन...

"-प्रीति हिचकिचाते हुए बोली-

''क्या इस तरह ताला तोडऩा ठीक रहेगा

?"

''तो कब तक यहां ऐसे बेवकूफों की तरह खड़े रहें

?"-अनुराग भन्नाए स्वर में बोला।

''हम ताला तोड़ सकते हैं।

"-डोंगरा बोला।

''क्या

?"-जय ने डोंगरा की ओर देखा।

''मेरा मतलब...मुझे निर्देश मिले थे कि अगर हमारे होस्ट को आने में देर हो जाए या कुछ और परिस्थिति निर्मित हो तो हम ताला तोड़कर भी अंदर जा सकते हैं।

"

''तो उतनी देर से मुंह में दही क्यों जमा रखा था

?"-कहकर अनुराग ने जमीन पर पड़ा

, एक बड़ा-सा पत्थर उठाया और मकान के दरवाजे की ओर बढ़ गया।

अचानक ऊपरी मंजिल की लाइट रोशन हो गई।

अनुराग अपनी जगह पर जड़ हो गया। अनुराग ही क्या बल्कि वहां उपस्थित सभी लोग जड़वत जैसे हो गए।

हल्का अंधेरा हो चुका था। ऐसे माहौल में उस भुतहा दिखने वाले मकान की ऊपरी मंजिल की खिड़कियों से निकल रही रोशनी एक अजीब-सा अहसास दिला रही थी।

अनुराग ने एक बार घूमकर बाकी लोगों की ओर देखा

, फिर अकेला ही मकान की ओर बढ़ गया।

बाकी लोग भी उसके पीछे चलते हुए दरवाजे के पास तक पहुंचे।

अनुराग मकान के सामने लगी सीढिय़ां चढ़कर छोटी सी बरामदे जैसी जगह में पहुंचा

, फिर उसने लकड़ी के पुराने लेकिन काफी मजबूत लगने वाले दरवाजे पर लगी कुण्डी से लटके ताले को हाथ से पकड़कर पत्थर वाला हाथ ऊंचा किया। जंग लगे ताले की हालत खस्ता हो रही थी। पत्थर के एक ही सधे हुए वार से ताला टूट कर नीचे जा गिरा।

फिर उसने दरवाजा खोला और अंदर प्रवेश किया।

अंदर प्रवेश करते ही उसके पैर जहां के तहां जम गए।

''क्या हुआ

?"-पीछे से जय ने कहा।

अनुराग उसके सामने से एक ओर हट गया।

तब दरवाजे के बाहर खड़े लोगों को अंदर का दृश्य नजर आया।

मकान के अंदर पहले ही कमरे में बीचों-बीच...

...एक बड़ा-सा ताबूत रखा था।

सब कमरे के अंदर आ गए।

सबकी नजरें ताबूत पर टिकी हुई थीं।

''ये ताबूत कैसा है

?"-जय बोला।

''क्या पता

?"-राज सावधान स्वर में बोला।

''और इसे यहां किसने रखा

?"-प्रीति बोली।

''अब हम क्या करें

?"-अनुराग बोला।

उसका जवाब शायद किसी के भी पास नहीं था।

सब कुछ दौर मौन साधे कमरे के वातावरण को मनहूस बना रहे बीचों-बीच पड़े उस पुराने लेकिन काफी बड़े आकार के ताबूत को देखते रहे।

तभी छत पर किसी के चलने की आहट ने सबका ध्यान खींच लिया।

सबकी नजरें छत की ओर उठ गईं।

''ऊपर कौन चल रहा है

?"-मोहिनी सस्पेंस भरे स्वर में बोली।

''वही

"-जय छत की ओर देखते हुए बोला-

''जिसने लाइट जलाईं होंगीं।

"

''हमें छत पर जाकर देखना चाहिए।

"-कह कर अनुराग आगे बढ़ा।

तभी कमरे मेें एक चीख गूंज उठी।

चीख रिंकी की थी।

सबकी नजरें रिंकी की ओर हो गईं। वो घबराई-सी पास खड़ी मोहिनी से ही लिपट गई थी।

''क्या हो गया

?"-राज

ने रिंकी से पूछा।

''इसमें...इसमें कुछ हलचल हुई थी।

"-वो भयभीत सी ताबूत की ओर इशारा करते हुए बोली।

सबकी नजरें फिर ताबूत पर जम गईं।

तभी ताबूत के भारी ढक्कन में हरकत हुई।

कोई उसे खिसका रहा था।

अंदर की ओर से!

सभी थोड़ा पीछे हट गए।

ताबूत के ढक्कन पर अंदर की ओर से निकले दो हाथ जमे हुए साफ दिख रहे थे।

फिर उन हाथों ने ताकत लगा कर ढक्कन को एक ओर धकेल दिया और फिर...।

...फिर उस ताबूत से सफेद कफन में लिपटी हुई मानवाकृति उठ खड़ी हुई।

सब दम साधे उसी की ओर देख रहे थे।

उसका कद असाधारण रूप से लम्बा था। जय और उसके साथियों में सबसे लम्बा अनुराग था

, जिसकी हाइट

6 फीट

2 इंच थी। लेकिन ताबूत से निकला वो रहस्यमयी शख्स अनुराग से भी कम से कम

46 इंच लम्बा था।

उसके चेहरे पर भी सफेद रंग का नकाब था

, जो कि उसके सफेद लबादे का ही हिस्सा लगता था। उस नकाब में केवल आंखों की जगह दो बड़े-बड़े काले छेद थे

, जिनके अंदर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।

वो अपने हाथ को अपने सिर पर ले गया और उसने अपना नकाब उतार दिया।

उसका चेहरा चाक की तरह सफेद था

, आंखें बड़ी-बड़ी और काफी चौड़ाई में खुली हुईं थीं

, जैसे कटोरियों से बाहर निकलकर गिर पड़ेंगीं। आंखों की रंगत भी सुर्ख हो रही थी।

उसकी शक्ल सूरत किसी भी अच्छे-भले आदमी का हार्टफेल करने के लिए पर्याप्त थी।

उसे देखकर वहां उपस्थित सब लोगों के मुंह पर भी ताले जड़ गए थे।

''वेलकम दोस्तों!

"-ताबूत से निकले उस शख्स की सर्द आवाज कमरे में गूंज उठी-

''उम्मीद है

, आप सबको यहां आने में ज्यादा तकलीफ नहीं हुई होगी। मैं

'कॉफिन मैन

' मौत के घर में तहेदिल से आप सबका स्वागत करता हूं।

"

कमरे में सन्नाटा छाया हुआ था।

वैसे स्वागत की वहां शायद किसी को भी उम्मीद नहीं थी।

सबकी जबानें जैसे तालू से चिपक गईं थीं। कड़ाके की ठण्ड में भी उनके माथे पर पसीनें की बूंदें झिलमिला रहीं थीं।

''अब मुझे इजाजत दो

, मेरे दोस्त!

"-सफेद कफन जैसे लबादे में लिपटा वो शख्स-जिसने अपना परिचय

'कॉफिन मैन

' के रूप में दिया था-ताबूत में झांककर ऐसे बोला

, जैसे किसी से बात कर रहा हो-

''मुझे अपने अजीज मेहमानों का स्वागत करना है।

लम्बे अरसे बाद इस घर में मेहमानों के कदम पड़े हैं।"

बाकियों ने झांककर देखा कि वो उस बड़े ताबूत में किससे बात कर रहा था।

ये देख कर उनकी आंखें फैल गई कि ताबूत में एक कंकाल पड़ा था।

जहां वो लोग तीन दिन बिताने की सोच कर आए थे

, उसमें कदम रखने से भी पहले से उनके साथ एक से एक अजीब वाकये हो रहे थे।
 
उस कमरे का माहौल भी कम अजीब नहीं था। वहां कोई बल्ब या ट्यूबलाइट नहीं बल्कि पुराने अंदाज के लैम्प लगे हुए थे। कमरे में बस उन्हीं लैम्पों की रोशनी हो रही थी। एक ओर एक हिरण का सिर दीवार पर शो पीस की तरह लगा हुआ था। कमरे में जिधर नजर डालो

, अजीब चीजें ही नजर आतीं थीं

, जिससे उन्हें लग रहा था

, जैसे वे किसी टाइम मशीन से

2020 से सीधे सत्रहवीं-अठाहरवीं सदी के किसी घर में आ गये हों।

उस शख्स ने ताबूत से बाहर कदम रखा

, फिर एक ओर पड़ी कुर्सी खींच कर उस पर बैठ गया।

''प्लीज!

"-फिर उसने बाकी लोगों को भी दीवार से सटी बाकी कुर्सियों की ओर इशारा करते हुए आग्रहपूर्ण लेकिन वैसी ही सर्द आवाज में कहा-

''आप लोग भी बैठ जाइये।

"

''और ये ताबूत

?"-जय बोला-

''ये यहीं पड़ा रहेगा

? इसी तरह

?"

ताबूत साइज में सामान्य से काफी बड़ा था और कमरे के बीचों-बीच पड़ा काफी जगह घेरता लग रहा था।

'कॉफिन मैन

' मुस्कुराया।

''जब तक हम बात नहीं कर लेते

"-उसने कहा-

''तब तक ये यहां ऐसे ही रहेगा। मेरा दोस्त भी हम लोगों की बातें सुनना चाहता है।

"

''तुम्हारा दोस्त

? ये कंकाल

?"-अनुराग कड़वे स्वर में बोला।

जय ने आंखों ही आंखों में अनुराग को

'ठण्ड रखने

' का इशारा किया।

''कृपया ऐसा कुछ न कहें

, जिससे उसे बुरा लग जाए

, जो अब इस दुनिया में नहीं है।

"-उसकी आवाज और भी ज्यादा सर्द हो गई।

''आपके दोस्त से क्षमा-याचना के साथ कहना चाहूंगी

"-प्रीति व्यंगात्मक स्वर में बोली-

''बीच में इस तरह ताबूत रखकर-जिसमें एक स्केलेटन भी पड़ा है-बात करना अच्छा लगेगा क्या

?"

''मैडम

प्रीति

!

"-उसका स्वर बेहद शान्त था-

''हमारा अभी बात कर लेना जरूरी है। जैसा कि आप सब देख ही रहे हैं कि अंधेरा होने लगा है। फिर रात्रिभोज का समय हो जायेगा। मैं यहां आप लोगों के साथ ज्यादा समय नहीं रहूंगा। आप सबको यहां अकेले ही रहना है। एक-दूसरे का साथ देना है। और जो मुश्किलें आपके सामने आयेंगीं

, उनका सामना भी आपको मिलकर ही करना होगा।

"

''मुश्किलें

?"-अनुराग का स्वर तीव्र हो उठा-

''किस तरह की मुश्किलें

?"

''उसी तरह की मुश्किलें

, जैसी इस जगह पर आपको अपेक्षित हो सकती हैं।

"-उसकी मुस्कान गहरी हो गई।

''पहले तो ये बताओ

, तुम यहां हमारे होस्ट हो न

? ये सब ड्रामा है न

?"

उसकी मुस्कान और भी गहरी हो गई।

''मैं वहीं हूं

"-वो बोला-

''जो आप समझ रहे हैं।

"

अनुराग ने जय की ओर देखा। जय ने आंखों ही आंखों में उसे शांत रहने का इशारा किया।

''देखो

"-जय के संकेत को नजरअंदाज करते हुए अनुराग चेतावनी भरे स्वर

'कॉफिन मैन

' से बोला-

''ये अब कुछ ज्यादा ही हो रहा है...।

"

''अनुराग!

"-जय ने अनुराग को शांत रहने का इशारा किया

, फिर वो खुद

'कॉफिन मैन

' से बोला-

''तुम्हारे पास हम लोगों के लिए कोई मैसेज है क्या

?"

''मैसेज नहीं

"-उस पुराने मकान के भुतहा वातावरण में

'कॉफिन मैन

' की सर्द आवाज गूंज रही थी-

''कुछ निर्देश हैं

, जिनका पालन करना आप लोगों के ही हित में रहेगा।

"

''कैसे निर्देश

?"

''ऐसा लग रहा है

"-डोंगरा राज के कान की ओर मुंह करके धीरे से बोला-

''जैसे किसी हॉरर मूवी के सैट पर आ गया हूं।

"

राज ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। उसका चेहरा गम्भीर था। वो एकटक

'कॉफिन मैन

' की ओर ही देख रहा था।

''सबसे पहली बात

, आप लोगों को यहां से दूर नहीं जाना है।

"

''मतलब

?"

''मतलब आप सबको इस मकान के आसपास ही रहना है। आसपास जंगल के जो पेड़ दिख रहे हैं

, वो समझ लीजिये प्रकृति ने आपके लिये सीमारेखा खींची है। आपको किसी भी हालत में उस सीमारेखा को पार नहीं करना है।

"

''क्या मतलब सीमारेखा को पार नहीं करना है

?"-अनुराग का पारा चढ़ता ही जा रहा था-

''क्या होगा सीमारेखा पार कर लेेंगें तो

?"

''कौन करेगा

?"-उसने प्रश्रसूचक भाव से अनुराग की ओर देखा।

''क्या

?"-अचानक इस तरह प्रश्र किए जाने पर अनुराग अचकचा गया।

''कौन करेगा सीमारेखा पार

?"-उसका स्वर बेहद ठण्डा था।

''मैं।

"-अनुराग चुनौतीपूर्ण स्वर में बोला।

वो कुछ देर तक अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से अनुराग को देखते रहा

, फिर उसके होंठों पर एक विचित्र लेकिन भयावह मुस्कान आ गई।

''जो भी सीमारेखा पार करेगा

"-फिर वो बोला-

''वो अपने साथ-साथ सात और लोगों की जान भी खतरे में डालेगा।

"

''ओके।

"-अनुराग को नाराज होते देख कर जय जल्दी से बोला-

''हममें से कोई सीमारेखा पार नहीं करने वाला...मेरा मतलब...जंगल में नहीं जाने वाला। और कुछ

?"

''घर के पिछले हिस्से में एक स्टोर रूम है। चाहे कुछ भी हो जाये

, आप लोगों को उस स्टोर रूम में भी नहीं जाना है।

"

''ये भी डन।

"

''और कहां-कहां नहीं जाना है

?"-अनुराग कड़वे स्वर में बोला।

''बस। इतना ही।

"-उसने अपनी आंखें अनुराग के चेहरे पर गड़ा दीं। अनुराग को ऐसा लगा जैसे उसकी आंखें उसके शरीर को भेदते हुए अंदर उतर जाना चाहती हों।

अचानक छत पर कुछ आहट सुनकर सबकी नजरें ऊपर की ओर उठ गईं।

''ऊपर कौन है

?"-राज बोला।

''कोई नहीं।

"-कॉफिन मैन बोला-

''यहां सिर्फ हम लोग हैं।

"

''ऊपर छत पर किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।

"-जय बोला।

''बिल्ली या कोई जानवर होगा।

"

''ये बिल्ली वगैरह की तो आवाज नहीं लगती।

"-मोहिनी बोली।

''फिर कोई पिशाच होगा।

"-अचानक

'कॉफिन मैन

' की आवाज बेहद सर्द हो गई। उसकी आवाज में ऐसा कुछ था कि कमरे में उपस्थित हर शख्स खामोश हो गया। उसकी आंखों में एक हिंसक चमक दिखाई दी

, जो कि तुरंत ही लुप्त हो गई।

उनके बीच एक अजीब सी खामोशी छा गई

 
''आइये!

"-फिर सन्नाटे को भंग करती हुई

'कॉफिन मैन

' की आवाज गूंजी-

''इस ताबूत को इसकी जगह पर पहुंचाने में मेरी सहायता करिये। फिर मैं आप लोगों से विदा लेता हूं।

"

कहकर वो आगे बढ़कर दरवाजे के पास पहुंचा और उसने ताबूत को सामने से पकड़कर उठा लिया।

जय ने अनुराग को टहोका और थोड़ी दूर खड़े राज को इशारा किया

, फिर तीनों आगे बढ़े और जय और अनुराग ने ताबूत के पिछले हिस्से को पकड़ा और राज ने सामने की ओर से

'कॉफिन मैन

' के साथ ताबूत को कंधे पर उठा लिया।

जिस तरह से

'कॉफिन मैन

' ने सहजता से ताबूत को आगे से उठा लिया था

, उससे उन्हें यही लग रहा था कि ताबूत ज्यादा भारी नहीं होगा लेकिन उसे उठाने पर वे हैरान रह गये। ताबूत इतना वजनी लग रहा था

, जैसे उसमें पत्थर भरे हुए हों। उन तीनों को मिलकर भी ताबूत को उठाने में दिक्कत हो रही थी जबकि

'कॉफिन मैन

' ने उस ताबूत को किसी फूल की तरह उठा रखा था।

वे चारों ताबूत को उसी तरह अपने कंधों पर लेकर बाहर निकले। दरवाजा बड़ा होने से उन्हें ताबूत सहित बाहर निकलने में विशेष दिक्कत नहीं हुई।

जिस तरह वे चारों कंधे पर ताबूत रख कर ले जा रहे थे

, उससे लग रहा था जैसे वो सचमुच में कोई शवयात्रा हो।

'किटिर्र...किटिर्र...।

'

आगे

'कॉफिन मैन

' के साथ ताबूत को कंधे पर रखकर चल रहे

राज

को अचानक ताबूत के अंदर से आती हल्की आवाज सुनाई पड़ी।

वो आवाज ऐसी थी

, जैसे कोई नाखून से ताबूत के अंदर की ओर घिस रहा हो।

''ये...ये आवाज कैसी है

?"-उसने

'कॉफिन मैन

' से कहा।

''कैसी आवाज

?"-वो मुस्कुराया।

''इस ताबूत के अंदर से कुछ आवाज आ रही है।

"

''आपके कान बजे होंगें। ताबूत के अंदर से आवाज कैसे आ सकती है

? ये इस बियाबान जंगल के माहौल का असर है। वहम होते रहते हैं।

"

लेकिन राज को पक्का यकीन था कि वो वहम नहीं था। लेकिन वो ये भी समझ गया था कि उसकी शंका का समाधान कम से कम

'कॉफिन मैन

' के माध्यम से तो बिल्कुल नहीं होने वाला था।

बाहर अब तक पूरा अंधेरा हो चुका था। अंधेरे में जंगल का वो सुनसान हिस्सा और भी ज्यादा रहस्यमयी और डरावना लग रहा था। उतने भारी ताबूत को कंधों पर संभाले

'कॉफिन मैन

' के तेज कदमों के साथ कदम मिलाकर चलने में उन तीनों को ही बेहद परेशानी हो रही थी। ताबूत इतना भारी था कि कुछ ही देर में उन्हें अपने कंधे टूटते हुए से महसूस होने लगे थे और उनके मन में ताबूत को जमीन पर पटक देने की तीव्र इच्छा हो रही थी।

वो लोग ताबूत लेकर घर के सामने के हिस्से में थोड़ी दूरी पर जंगल से सटकर बने लकड़ी के केबिन तक पहुंचे।

'कॉफिन मैन

' ने एक हाथ से केबिन का दरवाजा खोला। केबिन के अंदर से पीली रोशनी बाहर आ रही थी। दरवाजा खुलने पर उन्होंने देखा कि अंदर एक लालटेन जल रही थी। हालांकि वो लालटेन वहां कौन

, कब जलाकर चला गया था

, ये उनमें से किसी की भी समझ में नहीं आया।

उन चारों ने अंदर प्रवेश किया और ताबूत को जमीन पर रख दिया। केबिन इतना ही बड़ा था कि वे चारों ताबूत लेकर उसमें आ गए थे लेकिन उनके आने के बाद अब वो पूरा भरा-भरा लग रहा था। केबिन में कुछ पुराने कबाड़ जैसे सामान के अलावा कुछ भी नहीं था।

जंगली इलाका होने के कारण वहां ठण्ड सामान्य से अधिक थी लेकिन उस वजनी ताबूत को वहां लाने की मेहनत करने के बाद

राज

, जय और अनुराग तीनों ही पसीने से नहा गए थे और उनकी सांसें भी तेज चल रही थीं जबकि

'कॉफिन मैन

' के चाक जैसे सफेद चेहरे पर पसीने के एक बूंद तक नहीं थी और न ही उसके हाव-भाव से ऐसा लग रहा था

, जैसे उसने तिनका भी हिलाया हो।

वे तीनों अविश्वसनीय भाव से उसे देखते रहे।

'कॉफिन मैन

' ने उनके चेहरों पर नजर डाली। उसके चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान नाच रही थी। फिर वो ताबूत की ओर देखकर बोला-

''यहां आराम करो

, मेरे दोस्त। मेहमानों को जरा भी तंग मत करना।

"-कह कर उसने रहस्यपूर्ण मुस्कान के साथ उन तीनों की ओर देखते हुए कहा-

''जब तक वे तुम्हें तंग न करें।

"

फिर वे चारों उस केबिन से बाहर निकल आए।

राज

ने आसपास नजरें दौड़ाईं। केबिन के खुले दरवाजे से आ रही लालटेन की पीली रोशनी और थोड़ी दूर पर उस मकान के दरवाजे से आ रही रोशनी के अलावा वहां रोशनी का कोई और साधन नहीं था। सब कुछ अंधेरे में डूबा बेहद रहस्यपूर्ण और डरावना-सा लग रहा था।

रोशनी के दोनों में से एक साधन को

'कॉफिन मैन

' ने बंद कर दिया। उसने केबिन के दरवाजे को बंद कर दिया और उनके साथ चलते हुए वापस कमरे में पहुंचा।

''मेरी आप सबसे गुजारिश है

"-कमरे में पहुंचने के बाद वो उन सभी से बोला-

''कि उस केबिन में भी अनावश्यक रूप से न जाएं। उसमें मेरा दोस्त आराम कर रहा है। अगर आपने उसके आराम में खलल डालने की कोशिश की तो हो सकता है उसे ये पसंद न आये।

"

''हममें

से कोई भी उस केबिन में नहीं जायेगा।

"-जय ऐसे बोला

, जैसे उसे सांत्वना दे रहा हो-

''और कुछ

?"

''और मेरी आप लोगों को सलाह है कि रात सोने के लिए होती है। उसे सोकर ही गुजारें। रात में अनावश्यक रूप से जगे नहीं। अगर जग भी गये तो बाहर क्या हो रहा है

, ये जानने की कोशिश बिल्कुल न करें।

"

''क्यों

?"-राज बोला।

''क्योंकि रात के समय यहां घर से बाहर निकलना बेहद खतरनाक है। रात के समय बाहर से चाहे कैसी भी आवाज क्यों न आये

, बाहर चाहे कुछ भी क्यों न हो रहा हो लेकिन आप सब बाहर न निकलें।

'कॉफिन मैन

' जानता है कि दुनिया में अनेक शापित जगह हैं लेकिन उन सभी शापित जगहों में इस जगह का एक विशेष स्थान है। इसीलिए इसे

'मौत का घर

' भी कहा जाता है। यहां ऐसी बहुत सी चीजें होती हैं

, जिन्हें आंखें नहीं देखना चाहतीं

, कान नहीं सुनना चाहते। इसलिए रात आप सोते हुए ही गुजारें। घर से बाहर किसी हालत में न निकलें। दरवाजे बंद ही रखें।

"

''मुझे भी आपसे एक बात पूछनी थी श्रीमान!

"-अनुराग बोला।

'कॉफिन मैन' ने उसकी ओर देखा।

''इस बकवास की कोई लिमिट है

"-अनुराग हाथ मलते हुए बोला-

''या ये यूं ही चलती रहेगी

?"

''अनुराग...।

"-जय ने अनुराग को टोका। अनुराग ने नाराजगी के भाव से जय की ओर देखा।

अनुराग की बात सुनकर 'कॉफिन मैन' के सुर्ख खून जैसे लाल अधरों पर नाच रही रहस्यमयी मुस्कान और भी गहरी हो गई।
 
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