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डॉली बर्तन धोने चली गयी थी फिर उबासियां लेते हुए ही बातें करने लगी, बात करते करते ही झपकियाँ ले रही थी और अब कुछ ही पलों में वो नींद की आगोश में थी, जैस्मीन ने उसकी तरफ देखा और फिर मुस्कुराते हर अपनी जगह पर लेटकर मन ही मन बोली, "लड़का अड़ियल है , गुस्सैल है
लेकिन जाने क्यों मुझे वो आदमी बुरा नही लग रहा।"
-----
अगले दिन डॉली काम पर गयी तो किचन में सुभद्रा देवी के लिए खाना तैयार करने लगी, राज नीचे उतरा और नाश्ते की चेयर पर आ बैठा तो संतोष खाना परोसने लगा तभी डॉली भी किचन से बाहर आते हुए बोली, " गुड मॉर्निंग मिसेज शर्मा ! ये रहा आपका नाश्ता!"
राज ने एक नजर नाश्ते की तरफ देखा फिर अपना नाश्ता करने लगा। रात भर राज के जहन में डॉली की कही बातें घूम रही थी, और वो आज पूरी तरह बिजनेस सूट पहने बैठा था।
दादी ने जब देखा की दोनो ने एक दूसरे की तरफ देखा तक नही तो वह अचानक ही खाँसने लगी, डॉली ने फटाफट उनकी पीठ सहलाने के लिए हाथ उनकी पीठ पर रखा तो वहीं राज ने भी चेयर से उठकर एक हाथ उनकी पीठ पर हाथ रखा और दूसरे से पानी का गिलास उनके सामने कर दिया, " पानी लीजिये!"
अनजाने में ही डॉली के हाथ के ऊपर राज का हाथ था
तो राज ने फौरन अपना हाथ हटा लिया और डॉली ने भी अपने हाथ को अपनी तरफ खींच लिया। इसी दौरान दोनो की नजर एक दूसरे के चेहरे से गुजरी तो फौरन अपनी अपनी नजर हटाते हुए वे अलग अलग दिशाओ में देखने लगे।
सुभद्रा देवी मन ही मन मुस्काई और बोली, " पहली बार मुझे लग रहा है कि मेरी मेहनत सफल हो जाएगी, राज इस लड़की को आज नही तो कल पसन्द करने ही लगेगा।"
राज ने खाना शुरू ही किया तब तक डॉली मन ही मन बोली, "केयरटेकर मैं हूँ न, इसे हाथ रखने की क्या जरूरत थी? हुँह ! फिर कहेगा की मुझ पर डोरे डाल रही है, मौके तलाश रही है! नवाबजादा।"
राज को तभी खाँसी उठ गई तो दादी ने डॉली से कहा, " पानी दो बेटा!"
डॉली ने मुस्कुराते हुए कहा, " उन्हें पानी नही चाहिए , वो तो थूक गटक कर काम चला लेंगे।"
राज को ये सुनते ही डॉली का थूकना फिर याद आ गया और वो उसकी तरफ घूरने लगा तो डॉली खड़ी होते हुए बोली, " मैं अपना फोन आपके कमरे में ही भूल आयी हूँ,
शायद रिंग हो रहा है!"
उसके जाते ही राज भी उठ खड़ा हुआ और फाइल लेने के बहाने ऊपर चला गया! डॉली जैसे ही दादी के कमरे से बाहर निकलने को हुई राज ने उसकी बाँह को पकड़ते हुए खुद के सामने खींच लिया।
"कल की बात को सिर्फ धमकी समझ लिया क्या? बाँह छोड़िये।" डॉली ने गुस्से से कहा।
राज ने बाँह छोड़े बिना ही कहा, " थूक से काम चला लेंगे से मतलब क्या है तुम्हारा? काम करती हो तो तमीज से बात करना सीखो, वरना बद्तमीजी करने में मुझे भी बहुत मजा आता है। हम्म।" कहते हुए राज ने अपने दूसरे हाथ को उसकी गर्दन के बेहद करीब दीवार पर रख दिया।
डॉली ने एक नजर उसके हाथ की तरफ देखा फिर बोली, "बेशक! आपसे ऐसी ही उम्मीद थी मुझे, लेकिन आपको बता दूं की मुझसे जरूरत से ज्यादा नजदीकी अच्छी नही आपके लिए।'
" और मुझसे ज्यादा उलझना आपके लिए भी बहुत सी बाधाएं खड़ी कर सकता है।" राज ने सख्ती से कहने के
साथ ही उसकी नरम बाँह छोड़ दी और जाने को मुड़ा तो गिरते गिरते बचा क्योंकि डॉली ने अड़ंगा लगा दिया था और फिर गिरने से पहले ही उसकी बाँह को थाम भी लिया था।
राज ने उसकी तरफ एक कदम बढ़ाते हुए गुस्से से कहा, " ये हरकत करके...!'
" साबित क्या करना चाहती हूँ..? यही न!" डॉली ने उसकी बात काटते हुए कहा
राज भयंकर नाराजी का भाव आंखों में लिए उसे देख रहा था तभी डॉली बोल उठी, "सिर्फ इतना की आप मुझे धमकाना बन्द कर दीजिए क्योंकि जितना परेशान आप मुझे करेंगे , मैं उससे दोगुना करूँगी।"
राज ने उसकी निग़ाहों में देखते हुए कहा, " अपनी ये बात याद रखना, हो सकता है की किसी दिन सामने से मौका दूँ आपको दुगना करने का और आप न कर पाओ!"
डॉली असमंजस में उसे देखती रह गयी और वह पलटकर चला गया।
दादी मुस्कुरा उठी और बोली, " बहुत देर लगी फाइल लेने
में!"
राज हल्का सा रुका और बोला, " मिल नही रही थी दादी, और जो आप सोच रही हैं वैसा नही है, मुझे सेटल करने के ख्वाब देखना छोड़कर अपनी सेहत का ध्यान रखिये! वो लड़की फोन पर बात कर रही है किसी से!"
" लेकिन उसके बारे में तो मैंने पूछा ही नही!!" सुभद्रा देवी शरारत से बोली तो राज चलते हुए बोला, " वो बहुत ही बेअदब लड़की है, ऐसा कोई सवाल ही नही उठता।"
" इस नागफनी की तो..! मुझे बेअदब कहा, खुद की हरकतें इसे नजर नही आती क्या?" सीढ़ियों से उतरती डॉली मन ही मन बोली।
दादी मन ही मन बोली, " अदब वाली लड़कियां भी तुम्हे कब भायी हैं?"
डॉली ने नीचे आकर दादी के बर्तन हटा दिए और उन्हें ड्राइंग रूम में लिवा ले गयी।
--------
कुछ रोज इसी तरह बीत गए, दादी और डॉली के बीच घनिष्ठता बढ़ गयी थी ।
एक शाम सुभद्रा देवी ने उसे करीब बैठाते हुए पूछा----
" अपने बारे में कुछ बताओ बच्ची!"
" मेरे बारे में कुछ ज्यादा नही है जानने को, मैं अपनी सहेली जैस्मीन के साथ रहती हूँ, परिवार मे भाई और भाभी है।"
" शादी को लेकर क्या सोचती हो?"
" शादी के बारे में ख्याल बहुत बुरे है, अकेला रहना अच्छा है।"
" ऐसा नही होता, अगर तुम्हारे मम्मी पापा यही सोचते हो क्या तुम दुनिया में आती?"
"मिसेज राठौर , यही तो मैं सुनना चाहती थी! शादी सिर्फ इसलिए होती है कि एक नया सदस्य दुनिया मे आ सके। उससे ज्यादा कुछ नही!"
"इतनी नकारात्मक सोच!" सुभद्रा देवी ने हैरानी से कहा।
" सोच का क्या है मिसेज शर्मा , सोच को भी तो दुनिया ही प्रभावित करती है।"
" क्या तुम्हारे भाई भाभी के बीच कुछ!"
"अरे नही दादी! भगवान न करे, इसलिए तो उनसे अलग रहती हूं ताकि मेरी वजह से कभी कोई मनमुटाव न हो दोनो के बीच! मुझे शादी नही करनी तो उनकी शादीशुदा जिंदगी को क्यों प्रभावित करूँ?"
"दादी ही कहो, अच्छा लग रहा है! मिसेज शर्मा बड़ा अजनबी सा भाव देता है।"
डॉली खिड़की के पास आ खड़ी हुई थी ,चेहरे पर तनाव था।
सुभद्रा देवी ने उसे देखते हुए कहा, " किसी से प्यार किया था क्या?"
डॉली ने अब उनकी तरफ देखा तो वह बोली, " घबराओ मत! बाल सफेद हो चुके हैं तो चेहरा देखकर कुछ अंदाजा तो लग ही जाता है। और मैं वो डरावनी दादी नही हूँ, मैं खुले
विचार रखती हूं, मुझसे तुम बात कर सकती हो।"
" माफी चाहूँगी दादी! लेकिन मैं आज इस बारे में कोई और बात नही करना चाहती, जब मुझे आपके साथ सहज महसूस होगा तब जरूर बताऊँगी आपको सब कुछ।"
"जैसा तुम्हे ठीक लगे!" सुभद्रा देवी ने कहा।
डॉली ने पानी पीते हुए कहा, " आप बताइए न की आपकी शादी के दिनों में क्या होता था?"
सुभद्रा देवी का चेहरा इस उम्र में भी जगमगा उठा और वो बोली, " हम तो छिप छिपकर एक दूसरे को देखते थे।"
" शादी से पहले...?" डॉली ने हैरानी से कहा तो सुभद्रा देवी ने प्यार से झड़कते हुए कहा, " धत्त!! शादी के बाद!"
" क्यों? छिपना क्यों?"
"मेरी सासु मां को मैं सरकार जी कहती थी, बहुत कड़क थी! उनके सामने क्या मजाल की हम दोनो साथ खड़े भी हो जाये तो इसलिए मौका मिलता तो नजर बचाकर छिप छिपकर आंखों से ही छू लेते थे एक दूसरे को!"
" वाओ..!!' डॉली के मुंह से खुशी से निकल गया!
" क्या वाओ..? वो हमारे जमाने की बात थी!'
" अब के जमाने मे भी ऐसा खूबसूरत प्यार होता तो मोहब्बत की खूबसूरती बनी रहती, कौन बताए की सिर्फ जिस्मो को छूना प्यार नही , बल्कि आंखों से रूह छू लेना प्यार है।"
सुभद्रा देवी मुस्कुराते हुए उसे देखने लगी और बोली, " प्यार को गहराई से समझती हो, फिर डरती क्यों हो?"
" क्योंकि ये आपका जमाना नही है न, इस जमाने मे ऐसे प्यार को ढूंढना नामुमकिन है।"
" हर जमाने मे हर तरह के लोग होते हैं! अब मुझे ही देख लो , मैंने अपने बेटे बहु पर कोई कड़ाई नही की थी , उन्हें आजादी दी थी जबकि अभी भी कुछ सरकार जी मिल जाएंगी, जो साथ देखकर नाक भौं सिकोड़ लेती हैं।"
" तो ये बताइये की आप सरकार जी से बचकर नागफनी के पापा को कैसे ले आयी दुनिया मे?"
" नागफनी...!!" सुभद्रा देवी हैरानी से बोली तो डॉली बात संभालते हुए बोली, " अरे हमारे मोहल्ले में बहुत साँप निकल आते है तो नागफनी लगाने का सोच रही थी ताकि सांप न आये , तो बस मुँह से भी नागफनी ही निकल गया। वैसे मेरा मतलब मिस्टर शर्मा से था।"
सुभद्रा देवी मुस्कुराते हुए बोली, " ये सब साख तो अब है न बेटा! पहले संयुक्त परिवार होते थे और कमाने वाला कोई एक! ऐसे में सरकार जी को लगता था की बच्चे अभी हो गए तो खर्चे और बढ़ जाएंगे, इसी चक्कर मे वो अपना तख्त मेरे दरवाजे के सामने ही लगा कर सोती थी।
अब दूर कब तक रहे कोई तो बस एक रोज मेरे पतिदेव ने हिम्मत की और तख्त के नीचे से ही सपाटा मारकर आ गए कमरे में।"
डॉली पेट पकड़कर हँसने लगी और बोली, " फिर!"
" फिर क्या? रोज का हो गया यही मिलना मिलना, वो इसी तरह आते और इसी तरह भोर होते होते चले जाते।"
" आपकी सरकार जी को पता नही चला!!'
" हाँ ! पहले की तरह बुझे चेहरे की जगह अब हमारे खिले
खिले चेहरे देखकर उन्हें शक होने लगा तो उन्होंने पूछताछ की, हम दोनों साफ मुकर गए तो वो बोली, " अच्छा ठीक है , अभी छिपा रहे हो न! जब बालक होने को होगा ,उस दिन खबर लूँगी।"
डॉली अब हँस हँस कर लोट पोट हो गयी, और बोली, " फिर!"
"फिर वही हुआ, अभिनव होने को हुआ तो सरकार जी को पता लग गया, खूब खरी खोटी सुनाई उन्होंने! मैं तो रोने लगी थी लेकिन तुम्हारे दादाजी उस दिन मेरे साथ खड़े हो गए और फिर अभिनव इस दुनिया मे आया लेकिन उसके बाद हम दोनों की हिम्मत नही हुई की और बाते सुन सके तो बस अभिनव को ही पाल लिया।"
"बस हाँ! अब मैं जरा आराम कर लूँ! बहुत बोल ली न आज!" कहते हुए दादी ने करवट ले ली तो डॉली अब अपने बाल सेट करते हुए उठ खड़ी हुई तभी उसकी नजर राज पर पड़ी , जो दरवाजे के पास ही खड़ा था।
डॉली ने उससे नजर हटाकर आगे बढ़ना चाहा तो राज ने उसकी कलाई पकड़ ली, डॉली ने जैसे ही कलाई झटकी! राज ने निग़ाह चेहरे से नीचे उसकी गर्दन पर की और कुछ कदम आगे बढ़ गया तो डॉली को ख्याल आया की हड़बड़ी
में दुपट्टा तो लिया ही नही! वह जैसे ही मुड़ी राज ने दुपट्टा उठाकर सामने कर दिया तो डॉली ने झट से उसके हाथ से लेकर ओढ़ते हुए इधर उधर देखा तो राज ने उसे अपनी सागर सी गहरी आंखों से देखते हुए पूछा , " इंटेंस लुक देने वाली लड़की अचानक झेंपने का नाटक क्यों कर रही है?"
डॉली बिना कोई जवाब दिए किचन में चली गयी तो राज मुस्कुरा उठा औऱ बोला, " मुझे तो मालूम ही नही था की ये उल्कापिंड धमाके करना छोड़कर शरमा भी सकती है!"
लेकिन जाने क्यों मुझे वो आदमी बुरा नही लग रहा।"
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अगले दिन डॉली काम पर गयी तो किचन में सुभद्रा देवी के लिए खाना तैयार करने लगी, राज नीचे उतरा और नाश्ते की चेयर पर आ बैठा तो संतोष खाना परोसने लगा तभी डॉली भी किचन से बाहर आते हुए बोली, " गुड मॉर्निंग मिसेज शर्मा ! ये रहा आपका नाश्ता!"
राज ने एक नजर नाश्ते की तरफ देखा फिर अपना नाश्ता करने लगा। रात भर राज के जहन में डॉली की कही बातें घूम रही थी, और वो आज पूरी तरह बिजनेस सूट पहने बैठा था।
दादी ने जब देखा की दोनो ने एक दूसरे की तरफ देखा तक नही तो वह अचानक ही खाँसने लगी, डॉली ने फटाफट उनकी पीठ सहलाने के लिए हाथ उनकी पीठ पर रखा तो वहीं राज ने भी चेयर से उठकर एक हाथ उनकी पीठ पर हाथ रखा और दूसरे से पानी का गिलास उनके सामने कर दिया, " पानी लीजिये!"
अनजाने में ही डॉली के हाथ के ऊपर राज का हाथ था
तो राज ने फौरन अपना हाथ हटा लिया और डॉली ने भी अपने हाथ को अपनी तरफ खींच लिया। इसी दौरान दोनो की नजर एक दूसरे के चेहरे से गुजरी तो फौरन अपनी अपनी नजर हटाते हुए वे अलग अलग दिशाओ में देखने लगे।
सुभद्रा देवी मन ही मन मुस्काई और बोली, " पहली बार मुझे लग रहा है कि मेरी मेहनत सफल हो जाएगी, राज इस लड़की को आज नही तो कल पसन्द करने ही लगेगा।"
राज ने खाना शुरू ही किया तब तक डॉली मन ही मन बोली, "केयरटेकर मैं हूँ न, इसे हाथ रखने की क्या जरूरत थी? हुँह ! फिर कहेगा की मुझ पर डोरे डाल रही है, मौके तलाश रही है! नवाबजादा।"
राज को तभी खाँसी उठ गई तो दादी ने डॉली से कहा, " पानी दो बेटा!"
डॉली ने मुस्कुराते हुए कहा, " उन्हें पानी नही चाहिए , वो तो थूक गटक कर काम चला लेंगे।"
राज को ये सुनते ही डॉली का थूकना फिर याद आ गया और वो उसकी तरफ घूरने लगा तो डॉली खड़ी होते हुए बोली, " मैं अपना फोन आपके कमरे में ही भूल आयी हूँ,
शायद रिंग हो रहा है!"
उसके जाते ही राज भी उठ खड़ा हुआ और फाइल लेने के बहाने ऊपर चला गया! डॉली जैसे ही दादी के कमरे से बाहर निकलने को हुई राज ने उसकी बाँह को पकड़ते हुए खुद के सामने खींच लिया।
"कल की बात को सिर्फ धमकी समझ लिया क्या? बाँह छोड़िये।" डॉली ने गुस्से से कहा।
राज ने बाँह छोड़े बिना ही कहा, " थूक से काम चला लेंगे से मतलब क्या है तुम्हारा? काम करती हो तो तमीज से बात करना सीखो, वरना बद्तमीजी करने में मुझे भी बहुत मजा आता है। हम्म।" कहते हुए राज ने अपने दूसरे हाथ को उसकी गर्दन के बेहद करीब दीवार पर रख दिया।
डॉली ने एक नजर उसके हाथ की तरफ देखा फिर बोली, "बेशक! आपसे ऐसी ही उम्मीद थी मुझे, लेकिन आपको बता दूं की मुझसे जरूरत से ज्यादा नजदीकी अच्छी नही आपके लिए।'
" और मुझसे ज्यादा उलझना आपके लिए भी बहुत सी बाधाएं खड़ी कर सकता है।" राज ने सख्ती से कहने के
साथ ही उसकी नरम बाँह छोड़ दी और जाने को मुड़ा तो गिरते गिरते बचा क्योंकि डॉली ने अड़ंगा लगा दिया था और फिर गिरने से पहले ही उसकी बाँह को थाम भी लिया था।
राज ने उसकी तरफ एक कदम बढ़ाते हुए गुस्से से कहा, " ये हरकत करके...!'
" साबित क्या करना चाहती हूँ..? यही न!" डॉली ने उसकी बात काटते हुए कहा
राज भयंकर नाराजी का भाव आंखों में लिए उसे देख रहा था तभी डॉली बोल उठी, "सिर्फ इतना की आप मुझे धमकाना बन्द कर दीजिए क्योंकि जितना परेशान आप मुझे करेंगे , मैं उससे दोगुना करूँगी।"
राज ने उसकी निग़ाहों में देखते हुए कहा, " अपनी ये बात याद रखना, हो सकता है की किसी दिन सामने से मौका दूँ आपको दुगना करने का और आप न कर पाओ!"
डॉली असमंजस में उसे देखती रह गयी और वह पलटकर चला गया।
दादी मुस्कुरा उठी और बोली, " बहुत देर लगी फाइल लेने
में!"
राज हल्का सा रुका और बोला, " मिल नही रही थी दादी, और जो आप सोच रही हैं वैसा नही है, मुझे सेटल करने के ख्वाब देखना छोड़कर अपनी सेहत का ध्यान रखिये! वो लड़की फोन पर बात कर रही है किसी से!"
" लेकिन उसके बारे में तो मैंने पूछा ही नही!!" सुभद्रा देवी शरारत से बोली तो राज चलते हुए बोला, " वो बहुत ही बेअदब लड़की है, ऐसा कोई सवाल ही नही उठता।"
" इस नागफनी की तो..! मुझे बेअदब कहा, खुद की हरकतें इसे नजर नही आती क्या?" सीढ़ियों से उतरती डॉली मन ही मन बोली।
दादी मन ही मन बोली, " अदब वाली लड़कियां भी तुम्हे कब भायी हैं?"
डॉली ने नीचे आकर दादी के बर्तन हटा दिए और उन्हें ड्राइंग रूम में लिवा ले गयी।
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कुछ रोज इसी तरह बीत गए, दादी और डॉली के बीच घनिष्ठता बढ़ गयी थी ।
एक शाम सुभद्रा देवी ने उसे करीब बैठाते हुए पूछा----
" अपने बारे में कुछ बताओ बच्ची!"
" मेरे बारे में कुछ ज्यादा नही है जानने को, मैं अपनी सहेली जैस्मीन के साथ रहती हूँ, परिवार मे भाई और भाभी है।"
" शादी को लेकर क्या सोचती हो?"
" शादी के बारे में ख्याल बहुत बुरे है, अकेला रहना अच्छा है।"
" ऐसा नही होता, अगर तुम्हारे मम्मी पापा यही सोचते हो क्या तुम दुनिया में आती?"
"मिसेज राठौर , यही तो मैं सुनना चाहती थी! शादी सिर्फ इसलिए होती है कि एक नया सदस्य दुनिया मे आ सके। उससे ज्यादा कुछ नही!"
"इतनी नकारात्मक सोच!" सुभद्रा देवी ने हैरानी से कहा।
" सोच का क्या है मिसेज शर्मा , सोच को भी तो दुनिया ही प्रभावित करती है।"
" क्या तुम्हारे भाई भाभी के बीच कुछ!"
"अरे नही दादी! भगवान न करे, इसलिए तो उनसे अलग रहती हूं ताकि मेरी वजह से कभी कोई मनमुटाव न हो दोनो के बीच! मुझे शादी नही करनी तो उनकी शादीशुदा जिंदगी को क्यों प्रभावित करूँ?"
"दादी ही कहो, अच्छा लग रहा है! मिसेज शर्मा बड़ा अजनबी सा भाव देता है।"
डॉली खिड़की के पास आ खड़ी हुई थी ,चेहरे पर तनाव था।
सुभद्रा देवी ने उसे देखते हुए कहा, " किसी से प्यार किया था क्या?"
डॉली ने अब उनकी तरफ देखा तो वह बोली, " घबराओ मत! बाल सफेद हो चुके हैं तो चेहरा देखकर कुछ अंदाजा तो लग ही जाता है। और मैं वो डरावनी दादी नही हूँ, मैं खुले
विचार रखती हूं, मुझसे तुम बात कर सकती हो।"
" माफी चाहूँगी दादी! लेकिन मैं आज इस बारे में कोई और बात नही करना चाहती, जब मुझे आपके साथ सहज महसूस होगा तब जरूर बताऊँगी आपको सब कुछ।"
"जैसा तुम्हे ठीक लगे!" सुभद्रा देवी ने कहा।
डॉली ने पानी पीते हुए कहा, " आप बताइए न की आपकी शादी के दिनों में क्या होता था?"
सुभद्रा देवी का चेहरा इस उम्र में भी जगमगा उठा और वो बोली, " हम तो छिप छिपकर एक दूसरे को देखते थे।"
" शादी से पहले...?" डॉली ने हैरानी से कहा तो सुभद्रा देवी ने प्यार से झड़कते हुए कहा, " धत्त!! शादी के बाद!"
" क्यों? छिपना क्यों?"
"मेरी सासु मां को मैं सरकार जी कहती थी, बहुत कड़क थी! उनके सामने क्या मजाल की हम दोनो साथ खड़े भी हो जाये तो इसलिए मौका मिलता तो नजर बचाकर छिप छिपकर आंखों से ही छू लेते थे एक दूसरे को!"
" वाओ..!!' डॉली के मुंह से खुशी से निकल गया!
" क्या वाओ..? वो हमारे जमाने की बात थी!'
" अब के जमाने मे भी ऐसा खूबसूरत प्यार होता तो मोहब्बत की खूबसूरती बनी रहती, कौन बताए की सिर्फ जिस्मो को छूना प्यार नही , बल्कि आंखों से रूह छू लेना प्यार है।"
सुभद्रा देवी मुस्कुराते हुए उसे देखने लगी और बोली, " प्यार को गहराई से समझती हो, फिर डरती क्यों हो?"
" क्योंकि ये आपका जमाना नही है न, इस जमाने मे ऐसे प्यार को ढूंढना नामुमकिन है।"
" हर जमाने मे हर तरह के लोग होते हैं! अब मुझे ही देख लो , मैंने अपने बेटे बहु पर कोई कड़ाई नही की थी , उन्हें आजादी दी थी जबकि अभी भी कुछ सरकार जी मिल जाएंगी, जो साथ देखकर नाक भौं सिकोड़ लेती हैं।"
" तो ये बताइये की आप सरकार जी से बचकर नागफनी के पापा को कैसे ले आयी दुनिया मे?"
" नागफनी...!!" सुभद्रा देवी हैरानी से बोली तो डॉली बात संभालते हुए बोली, " अरे हमारे मोहल्ले में बहुत साँप निकल आते है तो नागफनी लगाने का सोच रही थी ताकि सांप न आये , तो बस मुँह से भी नागफनी ही निकल गया। वैसे मेरा मतलब मिस्टर शर्मा से था।"
सुभद्रा देवी मुस्कुराते हुए बोली, " ये सब साख तो अब है न बेटा! पहले संयुक्त परिवार होते थे और कमाने वाला कोई एक! ऐसे में सरकार जी को लगता था की बच्चे अभी हो गए तो खर्चे और बढ़ जाएंगे, इसी चक्कर मे वो अपना तख्त मेरे दरवाजे के सामने ही लगा कर सोती थी।
अब दूर कब तक रहे कोई तो बस एक रोज मेरे पतिदेव ने हिम्मत की और तख्त के नीचे से ही सपाटा मारकर आ गए कमरे में।"
डॉली पेट पकड़कर हँसने लगी और बोली, " फिर!"
" फिर क्या? रोज का हो गया यही मिलना मिलना, वो इसी तरह आते और इसी तरह भोर होते होते चले जाते।"
" आपकी सरकार जी को पता नही चला!!'
" हाँ ! पहले की तरह बुझे चेहरे की जगह अब हमारे खिले
खिले चेहरे देखकर उन्हें शक होने लगा तो उन्होंने पूछताछ की, हम दोनों साफ मुकर गए तो वो बोली, " अच्छा ठीक है , अभी छिपा रहे हो न! जब बालक होने को होगा ,उस दिन खबर लूँगी।"
डॉली अब हँस हँस कर लोट पोट हो गयी, और बोली, " फिर!"
"फिर वही हुआ, अभिनव होने को हुआ तो सरकार जी को पता लग गया, खूब खरी खोटी सुनाई उन्होंने! मैं तो रोने लगी थी लेकिन तुम्हारे दादाजी उस दिन मेरे साथ खड़े हो गए और फिर अभिनव इस दुनिया मे आया लेकिन उसके बाद हम दोनों की हिम्मत नही हुई की और बाते सुन सके तो बस अभिनव को ही पाल लिया।"
"बस हाँ! अब मैं जरा आराम कर लूँ! बहुत बोल ली न आज!" कहते हुए दादी ने करवट ले ली तो डॉली अब अपने बाल सेट करते हुए उठ खड़ी हुई तभी उसकी नजर राज पर पड़ी , जो दरवाजे के पास ही खड़ा था।
डॉली ने उससे नजर हटाकर आगे बढ़ना चाहा तो राज ने उसकी कलाई पकड़ ली, डॉली ने जैसे ही कलाई झटकी! राज ने निग़ाह चेहरे से नीचे उसकी गर्दन पर की और कुछ कदम आगे बढ़ गया तो डॉली को ख्याल आया की हड़बड़ी
में दुपट्टा तो लिया ही नही! वह जैसे ही मुड़ी राज ने दुपट्टा उठाकर सामने कर दिया तो डॉली ने झट से उसके हाथ से लेकर ओढ़ते हुए इधर उधर देखा तो राज ने उसे अपनी सागर सी गहरी आंखों से देखते हुए पूछा , " इंटेंस लुक देने वाली लड़की अचानक झेंपने का नाटक क्यों कर रही है?"
डॉली बिना कोई जवाब दिए किचन में चली गयी तो राज मुस्कुरा उठा औऱ बोला, " मुझे तो मालूम ही नही था की ये उल्कापिंड धमाके करना छोड़कर शरमा भी सकती है!"