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Romance अनमोल अहसास

डॉली बर्तन धोने चली गयी थी फिर उबासियां लेते हुए ही बातें करने लगी, बात करते करते ही झपकियाँ ले रही थी और अब कुछ ही पलों में वो नींद की आगोश में थी, जैस्मीन ने उसकी तरफ देखा और फिर मुस्कुराते हर अपनी जगह पर लेटकर मन ही मन बोली, "लड़का अड़ियल है , गुस्सैल है

लेकिन जाने क्यों मुझे वो आदमी बुरा नही लग रहा।"

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अगले दिन डॉली काम पर गयी तो किचन में सुभद्रा देवी के लिए खाना तैयार करने लगी, राज नीचे उतरा और नाश्ते की चेयर पर आ बैठा तो संतोष खाना परोसने लगा तभी डॉली भी किचन से बाहर आते हुए बोली, " गुड मॉर्निंग मिसेज शर्मा ! ये रहा आपका नाश्ता!"

राज ने एक नजर नाश्ते की तरफ देखा फिर अपना नाश्ता करने लगा। रात भर राज के जहन में डॉली की कही बातें घूम रही थी, और वो आज पूरी तरह बिजनेस सूट पहने बैठा था।

दादी ने जब देखा की दोनो ने एक दूसरे की तरफ देखा तक नही तो वह अचानक ही खाँसने लगी, डॉली ने फटाफट उनकी पीठ सहलाने के लिए हाथ उनकी पीठ पर रखा तो वहीं राज ने भी चेयर से उठकर एक हाथ उनकी पीठ पर हाथ रखा और दूसरे से पानी का गिलास उनके सामने कर दिया, " पानी लीजिये!"

अनजाने में ही डॉली के हाथ के ऊपर राज का हाथ था

तो राज ने फौरन अपना हाथ हटा लिया और डॉली ने भी अपने हाथ को अपनी तरफ खींच लिया। इसी दौरान दोनो की नजर एक दूसरे के चेहरे से गुजरी तो फौरन अपनी अपनी नजर हटाते हुए वे अलग अलग दिशाओ में देखने लगे।

सुभद्रा देवी मन ही मन मुस्काई और बोली, " पहली बार मुझे लग रहा है कि मेरी मेहनत सफल हो जाएगी, राज इस लड़की को आज नही तो कल पसन्द करने ही लगेगा।"

राज ने खाना शुरू ही किया तब तक डॉली मन ही मन बोली, "केयरटेकर मैं हूँ न, इसे हाथ रखने की क्या जरूरत थी? हुँह ! फिर कहेगा की मुझ पर डोरे डाल रही है, मौके तलाश रही है! नवाबजादा।"

राज को तभी खाँसी उठ गई तो दादी ने डॉली से कहा, " पानी दो बेटा!"

डॉली ने मुस्कुराते हुए कहा, " उन्हें पानी नही चाहिए , वो तो थूक गटक कर काम चला लेंगे।"

राज को ये सुनते ही डॉली का थूकना फिर याद आ गया और वो उसकी तरफ घूरने लगा तो डॉली खड़ी होते हुए बोली, " मैं अपना फोन आपके कमरे में ही भूल आयी हूँ,

शायद रिंग हो रहा है!"

उसके जाते ही राज भी उठ खड़ा हुआ और फाइल लेने के बहाने ऊपर चला गया! डॉली जैसे ही दादी के कमरे से बाहर निकलने को हुई राज ने उसकी बाँह को पकड़ते हुए खुद के सामने खींच लिया।

"कल की बात को सिर्फ धमकी समझ लिया क्या? बाँह छोड़िये।" डॉली ने गुस्से से कहा।

राज ने बाँह छोड़े बिना ही कहा, " थूक से काम चला लेंगे से मतलब क्या है तुम्हारा? काम करती हो तो तमीज से बात करना सीखो, वरना बद्तमीजी करने में मुझे भी बहुत मजा आता है। हम्म।" कहते हुए राज ने अपने दूसरे हाथ को उसकी गर्दन के बेहद करीब दीवार पर रख दिया।

डॉली ने एक नजर उसके हाथ की तरफ देखा फिर बोली, "बेशक! आपसे ऐसी ही उम्मीद थी मुझे, लेकिन आपको बता दूं की मुझसे जरूरत से ज्यादा नजदीकी अच्छी नही आपके लिए।'

" और मुझसे ज्यादा उलझना आपके लिए भी बहुत सी बाधाएं खड़ी कर सकता है।" राज ने सख्ती से कहने के

साथ ही उसकी नरम बाँह छोड़ दी और जाने को मुड़ा तो गिरते गिरते बचा क्योंकि डॉली ने अड़ंगा लगा दिया था और फिर गिरने से पहले ही उसकी बाँह को थाम भी लिया था।

राज ने उसकी तरफ एक कदम बढ़ाते हुए गुस्से से कहा, " ये हरकत करके...!'

" साबित क्या करना चाहती हूँ..? यही न!" डॉली ने उसकी बात काटते हुए कहा

राज भयंकर नाराजी का भाव आंखों में लिए उसे देख रहा था तभी डॉली बोल उठी, "सिर्फ इतना की आप मुझे धमकाना बन्द कर दीजिए क्योंकि जितना परेशान आप मुझे करेंगे , मैं उससे दोगुना करूँगी।"

राज ने उसकी निग़ाहों में देखते हुए कहा, " अपनी ये बात याद रखना, हो सकता है की किसी दिन सामने से मौका दूँ आपको दुगना करने का और आप न कर पाओ!"

डॉली असमंजस में उसे देखती रह गयी और वह पलटकर चला गया।

दादी मुस्कुरा उठी और बोली, " बहुत देर लगी फाइल लेने

में!"

राज हल्का सा रुका और बोला, " मिल नही रही थी दादी, और जो आप सोच रही हैं वैसा नही है, मुझे सेटल करने के ख्वाब देखना छोड़कर अपनी सेहत का ध्यान रखिये! वो लड़की फोन पर बात कर रही है किसी से!"

" लेकिन उसके बारे में तो मैंने पूछा ही नही!!" सुभद्रा देवी शरारत से बोली तो राज चलते हुए बोला, " वो बहुत ही बेअदब लड़की है, ऐसा कोई सवाल ही नही उठता।"

" इस नागफनी की तो..! मुझे बेअदब कहा, खुद की हरकतें इसे नजर नही आती क्या?" सीढ़ियों से उतरती डॉली मन ही मन बोली।

दादी मन ही मन बोली, " अदब वाली लड़कियां भी तुम्हे कब भायी हैं?"

डॉली ने नीचे आकर दादी के बर्तन हटा दिए और उन्हें ड्राइंग रूम में लिवा ले गयी।

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कुछ रोज इसी तरह बीत गए, दादी और डॉली के बीच घनिष्ठता बढ़ गयी थी ।

एक शाम सुभद्रा देवी ने उसे करीब बैठाते हुए पूछा----

" अपने बारे में कुछ बताओ बच्ची!"

" मेरे बारे में कुछ ज्यादा नही है जानने को, मैं अपनी सहेली जैस्मीन के साथ रहती हूँ, परिवार मे भाई और भाभी है।"

" शादी को लेकर क्या सोचती हो?"

" शादी के बारे में ख्याल बहुत बुरे है, अकेला रहना अच्छा है।"

" ऐसा नही होता, अगर तुम्हारे मम्मी पापा यही सोचते हो क्या तुम दुनिया में आती?"

"मिसेज राठौर , यही तो मैं सुनना चाहती थी! शादी सिर्फ इसलिए होती है कि एक नया सदस्य दुनिया मे आ सके। उससे ज्यादा कुछ नही!"

"इतनी नकारात्मक सोच!" सुभद्रा देवी ने हैरानी से कहा।

" सोच का क्या है मिसेज शर्मा , सोच को भी तो दुनिया ही प्रभावित करती है।"

" क्या तुम्हारे भाई भाभी के बीच कुछ!"

"अरे नही दादी! भगवान न करे, इसलिए तो उनसे अलग रहती हूं ताकि मेरी वजह से कभी कोई मनमुटाव न हो दोनो के बीच! मुझे शादी नही करनी तो उनकी शादीशुदा जिंदगी को क्यों प्रभावित करूँ?"

"दादी ही कहो, अच्छा लग रहा है! मिसेज शर्मा बड़ा अजनबी सा भाव देता है।"

डॉली खिड़की के पास आ खड़ी हुई थी ,चेहरे पर तनाव था।

सुभद्रा देवी ने उसे देखते हुए कहा, " किसी से प्यार किया था क्या?"

डॉली ने अब उनकी तरफ देखा तो वह बोली, " घबराओ मत! बाल सफेद हो चुके हैं तो चेहरा देखकर कुछ अंदाजा तो लग ही जाता है। और मैं वो डरावनी दादी नही हूँ, मैं खुले

विचार रखती हूं, मुझसे तुम बात कर सकती हो।"

" माफी चाहूँगी दादी! लेकिन मैं आज इस बारे में कोई और बात नही करना चाहती, जब मुझे आपके साथ सहज महसूस होगा तब जरूर बताऊँगी आपको सब कुछ।"

"जैसा तुम्हे ठीक लगे!" सुभद्रा देवी ने कहा।

डॉली ने पानी पीते हुए कहा, " आप बताइए न की आपकी शादी के दिनों में क्या होता था?"

सुभद्रा देवी का चेहरा इस उम्र में भी जगमगा उठा और वो बोली, " हम तो छिप छिपकर एक दूसरे को देखते थे।"

" शादी से पहले...?" डॉली ने हैरानी से कहा तो सुभद्रा देवी ने प्यार से झड़कते हुए कहा, " धत्त!! शादी के बाद!"

" क्यों? छिपना क्यों?"

"मेरी सासु मां को मैं सरकार जी कहती थी, बहुत कड़क थी! उनके सामने क्या मजाल की हम दोनो साथ खड़े भी हो जाये तो इसलिए मौका मिलता तो नजर बचाकर छिप छिपकर आंखों से ही छू लेते थे एक दूसरे को!"

" वाओ..!!' डॉली के मुंह से खुशी से निकल गया!

" क्या वाओ..? वो हमारे जमाने की बात थी!'

" अब के जमाने मे भी ऐसा खूबसूरत प्यार होता तो मोहब्बत की खूबसूरती बनी रहती, कौन बताए की सिर्फ जिस्मो को छूना प्यार नही , बल्कि आंखों से रूह छू लेना प्यार है।"

सुभद्रा देवी मुस्कुराते हुए उसे देखने लगी और बोली, " प्यार को गहराई से समझती हो, फिर डरती क्यों हो?"

" क्योंकि ये आपका जमाना नही है न, इस जमाने मे ऐसे प्यार को ढूंढना नामुमकिन है।"

" हर जमाने मे हर तरह के लोग होते हैं! अब मुझे ही देख लो , मैंने अपने बेटे बहु पर कोई कड़ाई नही की थी , उन्हें आजादी दी थी जबकि अभी भी कुछ सरकार जी मिल जाएंगी, जो साथ देखकर नाक भौं सिकोड़ लेती हैं।"

" तो ये बताइये की आप सरकार जी से बचकर नागफनी के पापा को कैसे ले आयी दुनिया मे?"

" नागफनी...!!" सुभद्रा देवी हैरानी से बोली तो डॉली बात संभालते हुए बोली, " अरे हमारे मोहल्ले में बहुत साँप निकल आते है तो नागफनी लगाने का सोच रही थी ताकि सांप न आये , तो बस मुँह से भी नागफनी ही निकल गया। वैसे मेरा मतलब मिस्टर शर्मा से था।"

सुभद्रा देवी मुस्कुराते हुए बोली, " ये सब साख तो अब है न बेटा! पहले संयुक्त परिवार होते थे और कमाने वाला कोई एक! ऐसे में सरकार जी को लगता था की बच्चे अभी हो गए तो खर्चे और बढ़ जाएंगे, इसी चक्कर मे वो अपना तख्त मेरे दरवाजे के सामने ही लगा कर सोती थी।

अब दूर कब तक रहे कोई तो बस एक रोज मेरे पतिदेव ने हिम्मत की और तख्त के नीचे से ही सपाटा मारकर आ गए कमरे में।"

डॉली पेट पकड़कर हँसने लगी और बोली, " फिर!"

" फिर क्या? रोज का हो गया यही मिलना मिलना, वो इसी तरह आते और इसी तरह भोर होते होते चले जाते।"

" आपकी सरकार जी को पता नही चला!!'

" हाँ ! पहले की तरह बुझे चेहरे की जगह अब हमारे खिले

खिले चेहरे देखकर उन्हें शक होने लगा तो उन्होंने पूछताछ की, हम दोनों साफ मुकर गए तो वो बोली, " अच्छा ठीक है , अभी छिपा रहे हो न! जब बालक होने को होगा ,उस दिन खबर लूँगी।"

डॉली अब हँस हँस कर लोट पोट हो गयी, और बोली, " फिर!"

"फिर वही हुआ, अभिनव होने को हुआ तो सरकार जी को पता लग गया, खूब खरी खोटी सुनाई उन्होंने! मैं तो रोने लगी थी लेकिन तुम्हारे दादाजी उस दिन मेरे साथ खड़े हो गए और फिर अभिनव इस दुनिया मे आया लेकिन उसके बाद हम दोनों की हिम्मत नही हुई की और बाते सुन सके तो बस अभिनव को ही पाल लिया।"

"बस हाँ! अब मैं जरा आराम कर लूँ! बहुत बोल ली न आज!" कहते हुए दादी ने करवट ले ली तो डॉली अब अपने बाल सेट करते हुए उठ खड़ी हुई तभी उसकी नजर राज पर पड़ी , जो दरवाजे के पास ही खड़ा था।

डॉली ने उससे नजर हटाकर आगे बढ़ना चाहा तो राज ने उसकी कलाई पकड़ ली, डॉली ने जैसे ही कलाई झटकी! राज ने निग़ाह चेहरे से नीचे उसकी गर्दन पर की और कुछ कदम आगे बढ़ गया तो डॉली को ख्याल आया की हड़बड़ी

में दुपट्टा तो लिया ही नही! वह जैसे ही मुड़ी राज ने दुपट्टा उठाकर सामने कर दिया तो डॉली ने झट से उसके हाथ से लेकर ओढ़ते हुए इधर उधर देखा तो राज ने उसे अपनी सागर सी गहरी आंखों से देखते हुए पूछा , " इंटेंस लुक देने वाली लड़की अचानक झेंपने का नाटक क्यों कर रही है?"

डॉली बिना कोई जवाब दिए किचन में चली गयी तो राज मुस्कुरा उठा औऱ बोला, " मुझे तो मालूम ही नही था की ये उल्कापिंड धमाके करना छोड़कर शरमा भी सकती है!"
 
रात में डॉली खाना देकर निकलते हुए बोली, "दादी मैं जा रही हूँ!"

" एक्सक्यूज मी, ये मिसेज शर्मा से दादी कब बन गयी? ज्यादा रिश्ते बनाने की जरूरत नही है!" राज ने अपनी प्लेट सीधी करते हुए कहा।

"जब दो लोग बात कर रहे हो तो बीच मे बोलने वाले को क्या कहते हैं ये तो पता ही होगा! खैर चलती हूँ अब!" डॉली ने सपाट लहजे में कहा।

" बीच मे बोलना जरूरी हो तो बोला ही जायेगा! इस तरह से

यहाँ मैं आपका घुलना मिलना खामोशी से देख नही सकता!" राज ने कहा।

" हाँ कैसे देखेंगे, जलन जो होती होगी !"

" क्यों होगी जलन , हो क्या तुम? हम्म.!!" राज ने तल्ख लहजे में कहा।

" मैं वो हूँ जो आपको एहमियत नही देती और हर वक़्त मुझ पर आपकी नाराजगी का कारण भी बस इतना ही है।"

राज बिना किसी भाव के आराम से खाते हुए बोला, " इतनी लड़कियाँ मुझे अहमियत देती है कि किसी एक के अहमियत न देने से मुझे कोई फर्क नही पड़ता! खुद को मेरी जिंदगी में इतना अहम मानने का वहम मत पालो। ज्यादा ख्वाहिश पालने से परहेज करो।"

डॉली ने जाने के लिये कदम बढ़ा दिया तो राज बोला, " जाते जाते एक बात ध्यान से सुनती जाओ...!! हर बात पर टेढ़ा जवाब देना जरूरी नही होता, सब्र से काम लेने का मतलब ये नही की मैं हद से गुजरना नही जानता।"

डॉली ने रुककर उसकी तरफ मुड़कर देखा तो राज ने भी

निगाह ऊपर करके एक पल को उसकी तरफ देखा फिर निगाह खाने की तरफ मोड़ ली।

डॉली बाहर निकल गयी तो राज खाने पर से उठ गया और कमरे में चला आया और खिड़की पर खड़े होते हुए सोचा, "समझ नही आया की ये आज झेंपी क्यों थी, क्या कुछ गलत किया था मैंने?"

डॉली रूम पर आयी तो विनाश खुश होते हुए बोला, " मम्मा! देखो आज मैं आपका इंतजार कर रहा था, रोज तो नींद आ जाती थी।"

"मेरा बच्चा !" कहते हुए विनाश को गोद मे लेकर वह उसकी दिन भर की बातें सुनने लगी।

जैस्मीन चुपचाप दोनो को देखती रही , डॉली ने कुछ देर बाद उसे सुला दिया तो जैस्मीन खाना लाते हुए बोली, " काम पर सब ठीक है।"

" हां!" डॉली ने शांति से कहा।

"फिर चेहरे की चमक को क्या हुआ?"

"कुछ नही! थकान है यार! मैं ऑफिस की जॉब ढूंढ लूँ क्या? पूरा दिन वहाँ रहना मुझे अच्छा नही लगता!"

" हम्म! क्या हो गया अचानक..?"

" कुछ खास नही! मेरी आदत तो तू जानती ही है, मुझे मस्ती मजाक करने और लोगो से घुलने मिलने में वक़्त नही लगता! वहाँ सब मुझसे घुल मिल गए है, और मुझे लगता है की वो नागफनी इस बात से चिढ़ रहा है , उसे लग रहा है कि मैं गलत नीयत से घर वालो से ज्यादा घुल मिल रही हूँ!"

" उसे लग रहा है न, तो तुझे क्यों फर्क पड़ रहा है? तू तो जानती है न कि तेरी नीयत में कोई खोट नही!!"

" फर्क उसके गलत सोचने से नही पड़ रहा, उसकी जगह कोई भी होता तो इतना ही फर्क पड़ता! मुझे कोई इस नजरिए से देखे, ये मुझे बर्दाश्त नही होता।"

" चिल न यार..!! खुद ही तो कहती है कि कोई कुछ भी सोचे तू जैसी है वैसी ही रहेगी , फिर भी तू बहुत प्रभावित होती है लोगो के नजरिये से। तेरा नजरिया सही है न , तो भाड़ में जाये लोगो का नजरिया!"

" भाड़ में ही है वो नागफनी मेरे लिए, लेकिन मैं पूरा दिन उसके यहाँ बिताती हूँ, अपने बच्चे से दूर रहती हूं और बदले में मुझे शक मिले तो मुझे नही करनी ऐसी सड़ी हुई नौकरी! किसी कम्पनी में जॉब करूँगी तो कम से कम कोई शक तो नही करेगा न!"

" शक नही करेंगे लेकिन वो नजरे जो तुझे टटोलेंगी और तुझे एक मौके के रूप में देखेंगी उसका क्या..? यहाँ तुझसे कभी किसी ने ये जानने की कोशिश नही की कि तुम कहाँ से आती हो, कहाँ जाती हो? क्या करती हो? तुम्हारे काम से खुश है, सैलरी भी वक़्त पर दे रहे हैं! क्यों मचल रही है दूसरी जॉब के चक्कर मे? मक्कार लोगों से भरी हुई है दुनिया।"

डॉली ने पलके बन्द करके खुद को शांत किया तो जैस्मीन उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोली, " जरा जरा सी बात पर हर्ट होने से कुछ नही होगा, सम्भाल खुद को!"

" संभाल ही तो रही हूँ! मैं बेबाक, बहादुर बनकर जी रही हूँ , लेकिन मैं जानती हूँ कि ये सिर्फ एक भ्रम है! मैं अब भी उतनी ही संवेदनशील हूँ , जितनी पहले थी! मैं कमजोर नही कहलाना चाहती लेकिन बहादुर बनने के चक्कर मे बहुत कुछ झेलना पड़ता है! सच मे कभी कभी उसकी कड़वी बात सुनकर जी करता है कि बहुत गालियां दूँ उसे, बहुत.!!

बिना खता के सजा भुगते जा रही हूँ, नफरत होती है आदमियों से; उनकी बातों से और यहाँ तक की उनके अच्छा होने के ढोंग से भी!"

"ढोंग नही है डॉली, सब बुरे नही होते!"

" तो फिर मुझे क्यों नही मिला अच्छा आदमी?"

"इस क्यों का जवाब नही है लेकिन इतना जानती हूँ की तय वक़्त पर ही कुछ भी मिलता है! हो सकता है की वो वक़्त सही न हो!"

" अगर वो सही वक्त नही था तो आगे मैं नही होने दूँगी! नही दूँगी किसी को कभी भी मौका!"

" मौका देना मेरे तुम्हारे बस की बात नही, कदम चले या न चले! लेकिन मन ऐसे रिश्ते की तरफ चल ही पड़ता है जहाँ सुकून मिलता है। रिश्ते को समाज स्वीकार करे न करे , लेकिन मन तो स्वीकार करेगा।"

"मेरे पास मन ही नही बचा, हम क्या चाहते है ये बात समाज नही देखता लेकिन समाज क्या चाहता है ये हमें क्यों देखना पड़ता है?"

"क्योंकि रवायत है! लेकिन मन इन सबसे परे है , वो सिर्फ अपना सुकून देखता है।"

" लोग सिर्फ सुकून छीन सकते हैं , दे नही सकते!"

" क्या पता मिल जाये कोई सुकून देने वाला! सुकून देकर दीवानी बना ले जो तुझे!"

" दीवानी, औऱ मैं....!! ये दिल धड़कना भूल चुका है, किसी को देखकर मेरा दिल धड़कता ही नही! कुछ महसूस नही होता! सब बस चलते फिरते पुतले से नजर आते है, अहसास मुझे छू भी नही सकते अब। मैं कुछ अरसा पहले मर चुकी हूँ, अब तो बस जिस्म भाग दौड़ कर रहा है।'

जैस्मीन ने उससे दूर हटकर अपने बिस्तर पर लेटते हुये मन ही मन प्रार्थना की, " मत करो भगवान ऐसा! इसे नाउम्मीदी में बुझने से रोक लो! राज शर्मा का दिल बेकरार कर दो इसके लिए, इसे धड़कन में बसाने को मजबूर कर दो! कुछ ऐसा कर दो की वो वजह ढूँढने लगे इसके पास रहने को! इसके मन मे रुके आँसुओं को हटाकर प्यार की थाली परोस दो इसे!

ये कसम खाये बैठी है न, इश्क़ में न पड़ने की..! लेकिन आप

चाह दो तो फिर क्या नामुमकिन है.....??"

उधर डॉली विनाश को अपनी बाँहों के दरम्यान लेकर सो गयी।

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अगले दिन वो काम पर गयी तो सुभद्रा देवी बोली, " कल की उसकी बात का बुरा लगा है न!"

" आप इन बातों में मत पड़े मिसेज शर्मा ! उनका तो हमेशा का है और मैं काफी हूँ उनको बुरा महसूस करवाने के लिए!"

" ये तो सही कह रही हो! उसे बहुत बुरा लगता है तुम्हारी बातों का। मुँह से कुछ नही कहता लेकिन उसका चेहरा बताता है की वह जहर के घूँट पीकर रह जाता है।"

" अच्छा हैं न! आपको एक राज की बात बताऊँ , मैं चाहती हूँ की वो मुझे बातें सुनाए! अपनी देह पर लोगो की घूरती नजरें सहने से अच्छा है न उनकी कड़वी बाते सुन लेना! और फिर मैं कौन सा सहती हूँ? मैं भी तो सुना ही देती हूं!"

डॉली उन्हें जूस देकर चली गयी और किचन में खाना बनाने

आयी तभी संतोष की जगह किचन में राज को देखकर चौंक गई, " आप यहाँ!"

राज बिना कोई जवाब दिए , बिना उसकी तरफ देखे चुपचाप पोहा बनाता रहा तो डॉली भी साइड वाले बर्नर पर दादी के लिए खाना बनाने लगी!

राज के वहाँ होने के कारण उसका ध्यान भटक रहा था कि कहीं कुछ गलती न हो जाये और इसी चक्कर मे गर्म बर्तन नंगे हाथो से उठाकर अपना हाथ जला बैठी।

गर्म होने के कारण बर्तन उसके हाथ से छूटने ही वाला था तभी राज ने बर्तन पकड़कर संभालते हुए स्लैब पर रखते हुए कहा, " इतना खाना बर्बाद होता न अभी अभी!"

डॉली उसका मुंह देखती रह गयी और अपने हाथों पर फूँक मारते हुए बेसिन की तरफ बढ़ गयी और टँकी के नीचे हथेली करते हुए बोली, "अक्सर लोग जब तरक्की कर लेते हैं तो उनके अंदर की संवेदना मर जाती है, इंसानियत खो जाती है। कहा जाता है न की लक्ष्मी आती है तो घमंड साथ लाती है! सही कहा है।

मेरा हाथ जल गया और आपको उसकी कोई परवाह न होकर ये फिक्र सता रही है कि खाना गिरकर बर्बाद हो गया होता! इंसान ही हो, या बर्फ की सिल्ली..!!"

राज ने पोहा टेस्ट करते हुए कहा, "आशाएं या ख्वाहिशें जब टूटती है तो मंजर खतरनाक होता है, जिंदगी दिशाहीन हो जाती है। खुद के जख्म खुद सहना आना चाहिए।"

डॉली पानी की टँकी के नीचे हथेली किये हुए थी तभी राज ने उसके ठीक पीछे से हाथ बढ़ाकर टँकी बन्द करते हुए कहा, " वैसे मुझे ये जानकर काफी हैरानी हुई की आपको मुझसे ये उम्मीद थी की मैं आपकी जली हुई हथेलियों की फिक्र करूँगा...!!"

"कोई उम्मीद नही थी लेकिन इंसानियत नाम की कोई चीज होती है!" डॉली ने बिफरते हुए कहा।

"हुँह...!! मैं किसी को इतनी तवज्जो नही देता की इंसानियत के बहाने कोई सपने सजाने के हक ले ले।"

डॉली गुस्से से बोली, " अरे भाड़ में गए आपके सपने...! मैं थूकती भी नही ऐसे सपनो पर! मैं तो आपके बारे में जो सोचती हूँ वो तो बस...!! अरे छोड़ो...!!"

राज ने उसके सामने खड़े होते हुए आवाज में बल का पुट लाते हुए कहा, " क्यों छोड़ो...? बताओ , क्या सोचती हो मुझे देखकर?"

"......की जी भर कर गालियां दूँ!" डॉली नेउसकी निग़ाहों में देखते हुए बेहद सहजता से कहा।

राज ने मन ही मन कहा, "और अगर मैं कहूँ की इतनी ही प्रबल ख्वाहिश मुझमे ये उठती है की तुम मेरे प्यार में पड़ जाओ तो..!!"

जबाब के इंतज़ार में डॉली की नजरों को खुद पर टिका देखकर वह प्रत्यक्ष में बोला, " और वो गालियाँ कौन सी है...?"

" साले, कुत्ते, कमीने...!!" डॉली दाँत जमाते हुए फ्लो में बोलने लगी तो वह बात काटकर बोला, "एक्सक्यूज़ मी...! अपनी सीमा मत लाँघो!"

" आपने पूछा तो मैंने बता दिया, ऐसे प्रतिक्रिया क्यों दे रहे हैं आप? कौन सा आपको गालियां दे रही हूँ? सिर्फ बता ही तो रही हूँ।"

राज ने पोहा उठाकर बाहर निकलना चाहा तभी डॉली ने पीछे से टोका, " मुझे सिर्फ इतना बताइये की टँकी बन्द करने का क्या मतलब निकालूं, आपकी टँकी का पानी भी बरबाद

हो रहा है क्या?"

राज ने फ्रिज खोलकर अपने लिए पानी की बोतल निकाली और बर्फ की कटोरी स्लैब पर उसके सामने रखते हुए बोला, " आपकी नजर में अगर मैं बर्फ की सिल्ली हूँ तो सुझाव दूँगा की आप भी ऐसी बन जाइये, इससे ज्यादा मुझे कुछ नही कहना।"

" कितना बुरा इंसान है ये, मेरा हाथ जल गया और इसके चेहरे पर इंसानियत के नाते जरा सी शिकन तक नही आई!"

फिर वह बर्फ की तरफ देखते हुए बोली, " ऐसी बन जाऊँ? हुँह!! ऐसा एक ही इंसान काफी है धरती पर, मेरे को ऐसा नही बनना लेकिन इसको काम में लाना आता है।"

वह बर्फ से हथेलियों की सिकाई करने लगी तो वही राज टेबल पर पोहा रखकर चम्मच भर भरकर खाने लगाराज कुछ देर बाद पोहा खाकर आया और इधर उधर देखते हुए बोला, " मैं गलती से बर्फ का बाउल यही रखकर भूल गया था, फ्रिज में रख दिया क्या?"

डॉली उसे एक नजर देखकर निगाह हटाते हुए बोली, " रखा नही बल्कि उससे अपनी हथेलियों की सिकाई कर ली!"

" मौके का फायदा उठाना बखूबी आता है न आपको, अवसरवादी!" राज व्यंग्य से बोलता हुआ हटने लगा तो डॉली कटकर रह गयी, वह बड़बड़ाई, " रत्ती भर भी इंसानियत नही।"

" जो लोग एक बार इंसानियत को बद्तमीजी का नाम दे दे, फिर उनसे इंसानियत नही फाइटिंग ही करना भला है।" राज ने बाहर निकलते निकलते बिना मुड़े कहा।

" निष्ठुर, निर्मोही, निर्दयी और भी पता नही क्या क्या है ये आदमी, मतलब बर्फ का बाउल ढूंढने आया था, न की हाल चाल पूछने, खुद को जाने क्या समझता है? यही हरकते रही तो ये कुंवारा ही रहेगा जिंदगी भर! लड़की इससे शादी करने से अच्छा पत्थर में सिर मार लेगी।"

राज कमरे में जाकर अपनी हथेली पर बरनोल लगा रहा था, गरम बर्तन सम्भालने में उसकी भी हथेली जल गई थी लेकिन उसने जरा भी जाहिर नही होने दिया था।
 
डॉली दादी के साथ बैठी बाते बना रही थी,

"आपको पता है मेरी पहली फ्लाइट में मुझे इतना दुष्ट आदमी मिला था की क्या बताऊँ!!"

राज भी तभी वहाँ चला आया, इतवार का दिन था औऱ अभी काम करने का मन नही था।

" आओ आओ बेटा बैठो...!" उन्होंने राज से कहा फिर

डॉली की तरफ देखते हुए बोली, " अरे तुम क्यों रुक गयी, बताओ..! मैं सुनना चाहती हूँ की कैसे कैसे लोग है इस नई पीढ़ी में?"

"और कैसे? महा घमंडी और अहंकारी लोग भरे पड़े हैं!" डॉली ने कहा

"हम्म ! आपकी तरह ....! जैसी खुद, वैसी सोच!" राज ने मन ही मन कहा।

" ऐसा क्या हुआ?" सुभद्रा देवी ने कहा।

" होना क्या है? मतलब जरा सी गलतफहमी हो गई मुझे तो उस आदमी ने बदला लेने के लिए मुझे गाड़ी मे लॉक कर दिया , उतरने नही दिया।"

" क्या? कितने घटिया इंसान है इस दुनिया में! कोई ऐसा कैसे कर सकता है?" सुभद्रा देवी घृणा से बोली तो राज दाँत जमाते हुए डॉली की तरफ देखने लगा।

" होते है मिसेज शर्मा ! और बकायदा कहते भी है की वह बदला लेने के लिए ऐसा कर रहे है।"

" ऐसे कैसे..?" सुभद्रा देवी ने कहना चाहा तभी राज ने बात काटते हुए कहा, " तो परेशानी क्या है दादी? सामने से कह रहा है न, पीठ पीछे चाल तो नही चल रहा।"

" मतलब आपकी नजर में वो सही है।" डॉली ने झट से कहा।

" हाँ सही है!" कहते हुए राज ने भी उसकी तरफ निगाह उठायी।

" राज ..!! तुम ऐसे कब से हो गए?" दादी ने उसकी ओर देखते हुए अचरज से कहा।

"जब से ये यहाँ आयी है तबसे!"

"मतलब?"

" मतलब, आप इसकी बातों से इतनी प्रभावित कैसे हो जाती हैं, कोई भी व्यक्ति दूसरे का किया हुआ बताता है लेकिन अपना नही! क्या सम्भव नही की इन्होंने ही उसे ऐसा करने को उकसाया हो!'

" मेरा दिमाग नही खराब की मैं खुद कहूँगी किसी से की मुझे

गाड़ी में लॉक करो!"

"ओ, प्लीज हां! सारी दुनिया आपके कहे मुताबिक ही तो नही चलेगी।"

"अब बस ! मौका मिला नही की बहस शुरू!" सुभद्रा देवी ने डपटते हुए कहा।

" कौन था, कैसा था?" उन्होंने डॉली की तरफ मुड़ते हुए कहा।

राज अब व्यंग्य से मुस्कुराते हुए डॉली की तरफ देखने लगे, आंखों में चेलेंज का भाव था की अब बताओ जरा!"

डॉली ने भी उस भाव को पहचान लिया और लम्बी मुस्कुराहट चेहरे पर लाते हुए बोली, " ये सामने बैठे है न!"

राज की मुस्कुराहट अब गायब हो गयी और वो सीधा होकर बैठते हुए उसे हैरानी से देखने लगा तो दादी हैरानी से बोली, " राज तुम!!'

डॉली ने राज की तरफ देखते हुए भौंहे उछाली जैसे पूछ रही हो, " मजा आया?"

राज तो बस जबड़े भींचे उसकी तरफ देख रहा था कि तभी सुभद्रा देवी बोली, " उसको धमकाने के अंदाज में क्यों घूर रहा है, मेरी तरफ़ देख!"

"मैं...!" राज कुछ कहने को हुआ तभी डॉली बात काटते हुए बोल उठी, " आप क्यों सकपका रहे हैं मिस्टर शर्मा ? और मिसेज राठौर , आप भी न, मैं तो ये कहने जा रही थी की ये सामने बैठे हैं न , इनकी तरह ही कुछ कुछ लुक था उसका!"

"अच्छा! फिर कोई बात नहीं..! वरना मुझे बहुत दुख हुआ था ये सोचकर की वो राज था।" सुभद्रा देवी ने राहत की सांस लेते हुए कहा, डॉली ने उन्हें पानी दिया तो वह पीकर लेटते हुए बोली, "ये तो नही था वो, लेकिन ये भी कम नही है! शादी के लिए लड़कियाँ दिखा दिखाकर थक गई हूँ, सुनता ही नही!! कोई पसन्द ही नही आती!"

राज वहां से उठकर चला गया तो डॉली ने मन मे कहा, "नवाबों से नखरे तो हैं ही! समझते भी खुद को नवाब ही है, पसंद कैसे आएगी कोई?"

सुभद्रा देवी ने उसे न बोलते देखकर कहा, " तुमसे भी तो

सीधे मुँह बात नही करता वरना तुम्हे कहती कि उसे मनाने की कोशिश करो, शादी करने को समझाओ, अब कब शादी करेगा? बूढ़ा हो जाएगा तब!!"

" कितने साल के होंगे ये?" डॉली ने कहा तो दादी बोली, " बत्तीस का हो गया।"

डॉली ने अब कुछ नही कहा, कुछ देर और बाते करके बाहर निकल आयी, तभी राज सामने आ खड़ा हुआ तो डॉली ने उससे कटकर जाना चाहा लेकिन राज ने तुरंत कहा, " हमारे बीच की बात हम तक ही रहे तो बेहतर है! मेरी दादी के सामने कुछ भी कहने की कोशिश मत करना! ये तो बिल्कुल मत सोचना की डर रहा हूं ....!! मेरी हर प्रतिक्रिया आपके किये धरे का परिणाम होती है तो अगर मेरी प्रतिक्रिया झेलने की शक्ति नही है तो कोई ऐसा काम भी मत किया कीजिये , जिस पर मैं प्रतिक्रिया दूँ, मैं अपनी दादी के लिए बेहद फिक्रमंद हूँ।"

" तो रहिए फिक्रमंद , मैं कौन सा उनको बीमार करने को प्रतिबद्ध हूँ? मैं भी उनका ख्याल ही रखती हूं।

" इस तरह से!"

" ऐसा कुछ नही था कि आपकी दादी की तबियत खराब हो जाती!"

" मैं तुमसे ज्यादा अच्छे से अपनी दादी को जानता हूँ।"

"ओह! तो अगर इतना ही जानते हैं तो क्यों नही करते शादी? वो तो ज्यादा इसी चिंता में घुली जा रही हैं की...!"

"एक मिनट..!" राज ने उसकी बात काटते हुए कहा, " इस बारे में आगे से आप मुझसे कोई बात नही करेंगी , ये मेरी जिंदगी है और उसमें घुसपैठ करने की इजाजत किसी को नही! आपको दादी के लिए यहाँ लाया गया है और आप उन तक ही सीमित रहेंगी।"

"फिक्र न करें , मैं उन तक ही सीमित हूँ, आपसे तो मेरा कोई रिश्ता कभी बनने भी नही वाला।" डॉली ने चिढ़कर कहा।

"अच्छा है..!! लेकिन फिर भी जानना चाहूँगा की ऐसी कौन सी काबिलियत आप मे है, जो मुझमें नही! इतना गुमान किस बात का है आपको?"

" गुमान तो आपको भी बहुत है न?"

"अब तक तो था लेकिन तुम्हारे आने के बाद से गुमान नही बल्कि शक होने लगा है खुद पर।" राज ने मन ही मन कहा।

राज को जवाब न देते देखकर वह आगे बोली, "....... और रही बात काबिलियत की तो बस इतना कहना है कि अगर तुम हुकूमत करने के आदी हो तो मैं बगावत करने की आदी हूँ।"

राज ने व्यंग्य से कहा "निस्संदेह! बातें बनाने की काबिलियत है आप मे..! लेकिन मुझ में इतनी काबिलियत है हर दूसरी लड़की मेरे प्यार में पड़ जाती है, मेरी मुहब्बत के सैलाब में बहने को अधीर हैं लाखो लड़कियाँ।'

"जो तुम्हारी मोहब्बत के सैलाब में बहना चाहती है ,वो जाने कौन होगी। मुझे तो तुम्हारी तरफ देखना तक पसन्द नही.....! अधीरता और वो भी तुम्हारे लिए......हुँह...!!!"
 
" वो तो कदम न बहक जाए इसलिए बचती फिरती हो।" कहते हुए राज ने अपनी नजरो और बातों से उसे टटोला।

डॉली बिना किसी भाव के बोली, " च्च! च्च! मैं तवज्जो नही दे रही तो बहुत परेशानी हो रही है न?"

" खुद को इतनी अहमियत दे कैसे लेती हो? हैसियत ही क्या है मेरे सामने , ये बात जहन में बिठा लो कि तुम्हारी तवज्जो मेरे लिए कोई मायने नही रखती।" राज ने नाराजगी से कहा।

अब डॉली हंसते हुए बोली, "खुद पर इतना भी आत्म मुग्ध होना अच्छा नही जनाब! और ये जो सैलाब वगैरह की बातें कर रहे हैं न! आपको मैं सच्चाई से अवगत कराती हूँ, जिसे आप जानते हुए भी झुठला रहे हैं।

सच्चाई ये है कि वो हर लड़की जो आपके आस पास मंडरा रही है , आपके स्टेटस की वजह से है, न की आपकी मुहब्बत की वजह से!!

वो लोग और होंगे जो तुम्हारे स्टेटस की वजह से तुम्हारे फेवर में बोले लेकिन मेरे लिए मेरा तेवर मायने रखता है, किसी का फेवर नही!!"

राज ने नाखुशी से उसकी तरफ नजर उठायी तो वो आगे बोली, " और गुमान करने के लिए हैसियत ही काफी नही होती, सच्ची मुहब्बत करके देखना कभी! तब समझ आएगा की हैसियत वाले आकर्षण और सच्ची वाली मुहब्बत में क्या अंतर है!!"

राज गम्भीरता से बोला, "मुझे मोहब्बत का नाम भी पसंद नही! करना तो दूर की बात है, क्योंकि मोहब्बत सामने वाले के सामने झुकने को मजबूर कर देती है, और मुझे झुकना पसंद नही!!

मैं मजबूरी से ज्यादा मजबूती पर यकीन रखता हूँ; कमजोर बनने का कोई इरादा नही। वैसे जब मोहब्बत के इतने कसीदे पढ़ रही हैं तो आप ही क्यों नही कर लेती मुहब्बत?"

" नँगे पाँव अंगारों पर चलना मंजूर है मुझे , लेकिन मोहब्बत करना मंजूर नही!" डॉली ने फौरन तल्खी से कहा तो उसे देखते हुए राज के मन मे जिज्ञासा उठी की इस तरह क्यों कहा इसने?

डॉली तब तक बोल उठी, " मोहब्बत की चर्चा करना ही बेकार है , पर आपकी हैसियत वाली बात पर कुछ कहना है।

आप अमीर लोग हम जैसे मामूली कमाने - खाने वालों को अपने पैर की धूल समझते क्यों हो? हमारे आत्मसम्मान को जब चाहे जिसके सामने कुचल दो जैसे ये कोई मामूली बात है , लेकिन जब बात आपके आत्मसम्मान की हो तो फुफकारना शुरू हो जाते हो, आपके पास भावनाएं और आत्मसम्मान है तो हमारे पास भी है! हमे भगवान ने आपके पैरों के नीचे रहने के लिए नही बनाया है।"

" तो ऊपर उठो, रोका किसने है!" राज ने भी फौरन कहा।

" ऊपर उठने कहाँ देते हो आप लोग? जिस दिन ऊपर उठना चाहेंगे, तरह तरह की चालों से हमारी राह में रोड़े अटकाने लगोगे।"

" ओह! तो आप चाहती हैं कि तश्तरी में परोस कर आपको कामयाबी दे दे कोई! ख्याली पुलाव बहुत अच्छा है।"

" मैं ऐसा कुछ नही चाहती।"

" तो आप चाहती क्या है?"

" मैं बस चैन से जीना और खाना चाहती हूँ, बेवजह किसी से उलझना नही चाहती!"

"ये तो मैं मान ही नही सकता! हर वक़्त मुझसे उलझने के बावजूद कह रही हो की उलझना नही चाहती!"

" मैं नही उलझती , आप उकसाते हैं!"

" मेरे उकसाने से क्या क्या करने का इरादा है?"

"मतलब ?"

" छोड़ो!'

" क्यों?"

" क्योंकि मैंने कहा , और हाँ! चैन से जीना खाना ही तुम्हारे लिए जिंदगी है, कोई इच्छा नही, कोई महत्वकांक्षा नही!! तो मुझे ये कहने में कोई संकोच नही की आप मे और जानवर में कोई फर्क नही!"

" मिस्टर शर्मा !! तमीज से बात कीजिये, और जानवर औऱ इंसान की बात आप तो कीजिये मत! संवेदना शून्य आदमी के मुंह से ये बात अच्छी नही लगती!"

राज अब हल्का सा मुस्कुरा उठा और बोला, " उफ्फ! ये तड़प!! मैंने आपकी परवाह नही की, ये बात आपको इतनी खल क्यों रही है? इतना अंतरंग सम्बन्ध तो नही मेरा और आपका...!!"

डॉली ने सिर को दाएं बाएं हिलाते हुए कहा, "उफ्फ! ये आपके सपने.....! तड़प औऱ मुझे!! वो भी आपकी संवेदना की!! कैसे कैसे ख्वाब देख रहे हैं आप? हँसी आती है

आपकी इस सोच पर!"

"इतनी ही हँसी आती है तो सुबह से ये नामकरण किस खुशी में किये जा रही है? कभी बर्फ की सिल्ली, कभी संवेदनाशून्य आदमी!! क्यों..??"

" जो नजर आएगा वो तो कहूँगी ही! अपनी दादी के अलावा आप किसी के लिए कुछ महसूस नही करते!"

" तो क्यों करूँ? परिवार के लिए ही संवेदनशील हुआ जाता है और वो मैं हूँ! अब और कोई भी आर्ग्युमेंट नही करनी मुझे।"

" तो मत कीजिए, कौन सा मैं आयी थी आपके पास आर्ग्युमेंट करने, आपने खुद मेरा रास्ता रोका औऱ तब से आर्ग्युमेंट किये जा रहे हैं। मैं आपसे बात करने को मरी नही जा रही!"

" तो क्या मैं मरा जा रहा हूँ?"

" मैंने तो नही कहा ऐसा!"

" मतलब तो वही था!"

" खड़े होकर निकालते रहिए मतलब , मुझे और भी काम है।" कहते हुए डॉली चल दी तो राज का धीरज छूट गया और उसने उसकी कलाई पकड़कर सामने खींचते हुए कहा, " इस तरह से दो टूक लहजे में मुझसे बात मत किया करो! आज तक किसी लड़की ने मुझसे इस लहजे में बात नही की!"

डॉली ने अपने सिर से उसकी छाती में मारते हुए कहा," और मुझसे इस तरह जबरदस्ती करने की कोशिश आप मत किया करें, कलाई न हो गयी , क्रिकेट बॉल हो गयी कि जब चाहा लपक लिया।"

राज का हाथ खुद के सीने पर चल गया और डॉली की कलाई छूट गयी तो वह बेहद गुस्से से उसे घूरने लगा।

डॉली भी उसकी जलती निग़ाहों में देखते हुए बोली, " मैं परेशान होने में नही बल्कि परेशान करने में यकीन रखती हूँ, एक बार सह लो तो लोग दस्तूर ही बना लेते है जुल्म करने का.....!! लेकिन नागफनी जैसे लोगो को फनफना कर भागने पर मजबूर करना मुझे बखूबी आता है; और हाँ! कड़वी चीजे अक्सर फायदेमंद होती हैं, बाकी लड़कियों की तरह चाशनी में घुली बातों की उम्मीद मुझसे मत कीजियेगा, क्योंकि मैं मैं हूँ! किसी और से मेरी तुलना मुझे पसन्द

नही!!"

दोनो अपनी अपनी दिशाओं में चल दिए तो दादी थककर बिस्तर पर बैठते हुए बोली, " हाय मेरे रब्बा...!! प्यार के फूल खिले तो खिले कैसे..? दोनो ही तूफान बनकर सारे अहसास उड़ा देते है।"

राज यहाँ वहां चक्कर काटते हुए सोचे जा रहा था, " खुद को समझती क्या है ये लड़की? इतनी अकड़ क्यों है इसमें? मुझे नजरअंदाज करती है, मुझे ये अहसास कराती है कि मैं आम हूँ और वो खास!

मेरे लुक से, मेरे चार्म से , मेरी हैसियत से अप्रभावित कैसे रह लेती है, कैसे? ऐसा एटिट्यूड मैने पहले कभी किसी लड़की में नही देखा...!! तुम्हे मैं अपने पीछे पागल करके छोडूंगा मिस डॉली ! एक दिन तुम मेरी न हो गयी तो कहना!! जैसे आज मैं तुम्हारे बारे में सोचकर बावला हुआ जा रहा हूँ , 'क्यों' का जवाब ढूंढ रहा हूँ , वैसे एक रोज तुम मेरे बारे मे सोचोगी, चाहे कहीं भी रहो , किसी के भी साथ रहो , सोच में सिर्फ मैं रहूँगा! सिर्फ मैं...!! तुम्हारे दिल मे अपने लिए तलब न जगा दी तो कहना!!"
 
शाम को राज बाहर जाने के लिए गाड़ी में बैठा तो सुभद्रा देवी ने आवाज देते हुए कहा, " बेटा , उसी तरफ जा रहे हो तो डॉली को छोड़ देना रास्ते मे!"

" नही! नही..!!! आप जाइये! मैं ऑटो से चली जाऊंगी।" डॉली ने फटाफट कहा।

" क्यों बेटा, जाओ न साथ! इतनी औपचारिकता मत निभाया करो।" दादी बोली।

डॉली फिर भी इंकार में सिर हिलाते हुए बोली, " औपचारिक रिश्ता ही है मिसेज शर्मा ! बड़े लोगो से मेरा कोई मेल नही!!'

" दादी मेंरे पास इतना वक़्त नही की किसी का इंतज़ार करूँ, अगर इन्हें जाना है कह दीजिये की नखरे दिखाना छोड़कर चुपचाप बैठ जाये।"

"जाओ न!"

"नही! अब तो मुझे जाना ही नही! देख लिया न इनका लहजा, ये ऐसे बोल रहे है कि साफ साफ एहसान वाला लहजा समझ में आ रहा है।"

राज ने अब तीखी नजरो से उसकी तरफ देखा तो दादी बोली, " क्यों हो तुम दोनो ऐसे?"

"मैं बैठूंगी तो ऑटो को जितना किराया देती हूं उतना इन्हें भी दूँगी!" डॉली ने कहा तो राज ने गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा, " भाड़ में जाओ! अब तो अगर मुझे कभी बिठाना भी पड़ गया तो बीच रास्ते मे उतार दूँगा।"

वह नाराजगी से गाड़ी स्टार्ट करके चला गया तो डॉली भी कुछ देर बाद ऑटो से चली गयी।

सुभद्रा देवी ने अब अंदर जाते हुए धीरे से कहा, "इश्क से तुम दोनों अपना दामन चाहे कितना ही बचा लो, उसे जब तुम्हे रंगना होगा तब रंग ही देगा अपने रंग में।"

डॉली घर पहुंची तो विनाश और जैस्मीन पहले ही तैयार थे, तीनो साथ मे मार्किट निकल गए, आइसक्रीम खाते हुए तीनो बहुत खुश थे, मस्ती करते वह इधर उधर घूम रहे थे तो मार्केट में ही मौजूद राज की नजर उन पर पड़ी।

विनाश को खिलखिलाकर हंसते हुए देखा तो उसकी क्यूट सी स्माइल देखकर सहज ही उसके चेहरे पर भी मुस्कान आ

गयी। राज उसे देखते हुए मन ही मन सोचने लगा, " इसी बच्चे के साथ ये उस रोज मैन्स सैलून में थी, है कौन ये बच्चा? ये तो सिंदूर भी नही लगाती, किसी तरह से शादीशुदा नही लगती, साथ वाली लड़की भी कुँवारी ही लग रही है! शायद किसी फैमिली मेम्बर का होगा।"

डॉली विनाश के साथ दूसरी तरफ चली गयी तो राज भी अपने दोस्त के साथ बात करने लगा।

वीकेंड प्रोग्राम से खुश विनाश थककर रात में जल्दी सो गया तो डॉली के आंखे बंद करते ही जस्सी ने टोका, " सुन न!!"

"बोल!"

"मुझे ऐसा क्यों लगा कि मार्किट में तुझे वो नागफ़नी नजर आया था!"

" ये मैं कैसे बताऊँ, तुझे लगा तो तू जान!"

" झूठी, सच सच बोल! वो दिखा था न?"

"हम्म!"

" हम्म! तो मुझे दिखाती न, तू तो कुछ बताती भी नही है!"

"ऐसा कौन सा सेलिब्रिटी है वो, जो बताती!"

"आज भी कुछ हुआ क्या?"

" हम्म! वो घर पर हो और कुछ न हो तो रिकार्ड न टूट जाये।"

"अब क्या हो गया है?"

" उसकी मौजूदगी के कारण हाथ जल गया मेरा!"

" हैं..!! इतना हॉट है वो??" जस्सी ने मुस्कुराते हुए कहा तो डॉली ने तकिया फेंक कर उसे मारते हुए कहा, " बर्तन हॉट था , न की वो!"

"दिखा , कहाँ जला?" जैस्मीन ने डॉली के बेड पर बैठते हुए कहा।

"ठीक है यार अब, जरा सी लालिमा रह गयी ! वो तो उसके गलती से बर्फ का बाउल भूल जाने के कारण बर्फ से सिकाई

कर ली वरना फफोले ही पड़ जाते हथेलियों पर।"

"गलती से..!!" जैस्मीन ने असमंजस से कहा।

" हम्म! पानी ले रहा था फ्रिज से और साथ ही मुझसे बहस भी कर रहा था, इसी चक्कर मे शायद बर्फ बाहर रख कर भूल गया। वरना इतना निर्दयी है की टोंटी बन्द कर दी थी जलनखट्टू ने!"

"तुझे उसमें बुराई ढूंढने की आदत हो गयी है डॉली, इसलिए तुझे उसकी अच्छाई नजर नही आती! वो भूला नही था, बल्कि घमंड के कारण सीधे सीधे न देकर तेरे लिए ही रखा होगा।"

" रहने दे! उसके बारे में अच्छी अच्छी बातें करके तू अच्छाई का भी अपमान कर रही है। मैं खुद से नही बोल रही हूं कुछ भी, उसने ही कहा की वो गलती से भूल गया था बर्फ का बाउल, अजीब है!

और तो और...!! जानती है जब गरम होने के कारण बर्तन मेरे हाथ से छूट कर गिरने वाला था तो बर्तन उसने ही संभालकर स्लैब पर रखा , लेकिन उसे मेरे जलने की फिक्र नही थी, कहता है की अगर बर्तन गिर जाता तो उतना खाना बर्बाद हो जाता न!! पता नही कैसा संवेदनहीन आदमी है,

इंसानियत तो उसे छूकर भी नही गुजरी।"

" और तुझे!!"

" क्या मतलब?"

"जब उसने बर्तन संभाला तो उसके खुद के हाथ भी जले होंगे! लेकिन तेरी बातों से ये साफ जाहिर है कि उसने माथे पर शिकन तक नही आने दी होगी, तभी तो तेरा ध्यान उसकी तरफ नही गया!!

और बर्तन संभालकर उसने तेरे साथ बड़ी दुर्घटना होने से रोक दिया, गर्म खाना और बर्तन नीचे गिरता तो तू और भी ज्यादा जलती, समझी! उसने सब संभाल लिया और क्रेडिट भी नही लिया, उल्टे ऐसी हरकतें कर दी कि तू उसे गलत समझकर गालियाँ सुना रही है।"

" अच्छा! तो अब समझ आया , वो बर्फ का बाउल रखकर भूला नह था बल्कि उसने अपने हाथ की सिकाई करने के लिए बर्फ निकाला होगा।"

" तुझसे तो बात ही करना बेकार है, तू वही समझेगी जो समझना चाहती है! गुड नाईट, मैं अब सोऊंगी।"

"मैं वहीं समझ रही हूँ , जो वो है! गुड नाईट!"

दोनो ने करवट फेर ली तो जैस्मीन मन ही मन बोली, " मेरा शक सही था, वो आदमी खराब नही है! खराब बनने का नाटक कर रहा है! वो नही चाहता कि डॉली उसे अच्छा समझे, लेकिन क्यों? या फिर और कोई बात है जो मैं भी नही पकड़ पा रही!"

डॉली चुपचाप विनाश के बालों को सहलाते हुए सो गई।

कुछ रोज बाद एक दिन डॉली को "चाइल्ड डे केयर सेंटर" से फोन आया कि विनाश की तबियत खराब है तो डॉली बेचैन हो गयी, वो सुभद्रा देवी से बहाना बनाकर घर चली गयी।

पूरा दिन वो बीमार विनाश की तीमारदारी में लगी रही, शाम को उसका बुखार हल्का हुआ तो वह डॉली की गोद मे सो गया। इस बीच कई बार सुभद्रा देवी ने फोन किया, राज ने भी दादी के कहने पर एक - दो बार फोन किया लेकिन डॉली ने फोन को स्विच ऑफ कर दिया था।

राज बुरी तरह चिढ़ा बैठा था, " काम के बीच से गयी है तो फोन स्विच ऑफ कर कैसे सकती है? बहुत लापरवाह इंसान है ये लड़की!"

सुभद्रा देवी तुरंत बोली, " राज , इस तरह नही कहते हैं! उसकी फ्रेंड की तबियत ठीक नही थी, फैमिली के नाम पर सिर्फ वही है डॉली के पास! अपने भाई भाभी से अलग रहती है वो!! वो नही चाहती होगी कि कोई डिस्टर्ब करे तो ऑफ कर दिया होगा फोन!"

"इतना वक़्त किसके पास है कि उसे डिस्टर्ब करने के लिए फोन करता फिरेगा, और कोई काम नही है क्या?" कहते हुए राज वहाँ से अपने कमरे में चला गया।

सुभद्रा देवी उसके जाने के बाद खुद से ही बोली, "केयरटेकर आने से पहले भी तो मैं रह ही रही थी न, फिर हॉफ डे करके डॉली के चले जाने से ये इतना नाराज क्यों हो रहा है? पहली बार तो वो गयी है, जेनुइन परेशानी है, वरना इससे पहले तो उसने कभी कोई बहाना तक नही बनाया।"

डॉली एक दिन बाद आयी तो सज्जन पोंछा लगा कर तभी हटा था, फर्श गीला ही था लेकिन डॉली का ध्यान विनाश पर होने की वजह से वह फिसल गई! राज चाहता तो उसे बचा सकता था लेकिन वह मुट्ठी कसकर, दांत भींचते हुए दूसरी तरफ घूम गया।

डॉली गिरने से तो बाल बाल बच गयी लेकिन हाथ से बैग छूटकर गिर पड़ा था, वह बैठकर सामान उठाने लगी तो राज एक तरफ को चला गया औऱ फाइल को सोफे पर पटकते हुए बोला, " अब तक समझ नही पा रहा था लेकिन अब समझ आया , ये आँखो को खटकती ही इसलिए है क्योंकि मन इसमें अटकता है, फिसलती वो है और मन मेरा नही संभल पाता है।

क्या हो रहा है ये सब? इसे काम से हटाना होगा, कोई दूसरी केयर टेकर ले आऊंगा दादी के लिए लेकिन ये जो भी हो रहा है उसे रोकना ही होगा! नही चाहिए ये सब अहसास....! इस वक्त तो बहाना भी है हटाने का! यही सही मौका है!!"

राज ने फोन मिलाया और बोला, " हैलो! विशाल मुझे कोई और केयर टेकर चाहिए दादी के लिए, जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी ढूंढ कर इन्फॉर्म करो मुझे।"

डॉली अपने काम मे लग गयी और दादी को नाश्ता कराने के बाद जब उनके पास आकर बैठी तो सुभद्रा देवी ने पूछा, " सब ठीक है न?"

" हाँ! पहले से बेहतर है।" डॉली ने सहजता से कहा।

" पर तुम बेहतर नही हो! चेहरा दो दिन में ही इतना उतर गया! भरी भरी सी खिली खिली लड़की दो दिन में ही मुरझा गयी।"

" ऐसा नही है मिसेज शर्मा ! नींद पूरी न होने की वजह से चेहरा ऐसा नजर आ रहा है वरना मैं बिल्कुल वैसी की वैसी हूँ।"

" लो तुम जूस पी लो आज मेरा मन भी नही है!"

" मिसेज शर्मा ! ये सब मत किया कीजिये, उस नागफनी ने...! मेरा मतलब था की......!!"

" मतलब - वतलब रहने दो! मुझे पता है की तुम राज को ही नागफनी बुलाती हो।"

"आपको...! आपको कब पता चला!" डॉली ने आंखे गोल करते हुए कहा।

"पहली बार जब तुमने कहा था तभी समझ गयी थी, भई हम भी तुम्हारे दौर से गुजरने के बाद ही बूढ़े हुए है, ऐसे ऐसे नामकरण हमने भी बहुत किये थे!"

" वाओ...!! आप न बहुत कूल हैं! आपको बुरा नही लगा आपके पोते को मैंने ऐसा नाम दिया तो...!"

" नही! वो हमेशा नाग की तरह फन काढ़े तैयार बैठा रहता है तुझसे लड़ने भिड़ने को! अब ऐसे में नाम तो नागफनी ही सूट करेगा न उसे!!"

"वाह! वाह मिसेज शर्मा ! नागफनी की क्या परिभाषा दी

है। लव यू!!" कहते हुए वह उनके गले लगने को हुई लेकिन फिर रुकते हुए बोली, " सॉरी! ज्यादा ही एक्साइटेड हो गयी थी।"

सुभद्रा देवी उसे पकड़कर गले लगाते हुए बोली, "आओ इधर! औपचारिक होना है तो उस नागफनी से होना, मुझसे नही!!"

डॉली ने उन्हें कसकर गले लगा लिया और फिर हटते हुए बोली, " बहुत अच्छा महसूस हुआ आपके गले लगकर! अब जाती हूँ काम करने।"
 
डॉली नीचे किचन में जाकर उनके लिए फ्रूट सलाद तैयार करने लगी तभी विनाश की याद आ गयी तो उसने सोचा, " क्यों न काम करते करते ही उससे बात कर लूँ?"

डॉली ने नम्बर मिलाकर कान से लगाते हुए कन्धे में मोबाइल दबा लिया और फिर सलाद काटने लगी।

राज को पहले से पता तो था नही की डॉली आज भी आएगी या नही, इसलिए उसने घर से ही काम करने का फैसला किया हुआ था। डॉली के आने के बाद भी उसने इस फैसले को बदला नही था औऱ सोचा की कल से चला

जाऊँगा ऑफिस।"

वह किसी को फोन मिलाते हुए हॉल में आया तो डॉली को मुस्कुराते हुए देखकर उसे घूरने लगा।

" हैलो,, लव यू बेबी!"

राज ने जब यह सुना तो जाने क्यों मन मे एक कसक सी उठी और चेहरे पर नाराजगी के भाव आ गए।

तभी डॉली ने फोन पर ही किस दिया, "मुआआहह....!! अभी पूरा दिन बाकी है; ख्याल रखना बेबी, जानते हो न मुझे कितनी फिक्र रहती है आपकी....! मैं शाम को मिलती हूँ, कोशिश करूँगी जल्दी आने की! आपके साथ कितना भी समय बिताओ, कम ही लगता है!"

राज उसकी तरफ बढ़ा औऱ फोन छीनकर काटते हुए बोला, "बस कुछ दिन और ...!! फिर बिताना अपने बेबी - शोना, रोना- धोना के साथ ही सारा समय! यहाँ काम के पैसे मिलते हैं , बातें करने के लिए नही!!"

डॉली ने हाथ जल्दी जल्दी चलाते हुए कहा, " मेरे हाथ काम ही कर रहे हैं, बातें मुँह से कर रही हूँ.....! समझ

आयी...! और पैसों की धौंस मुझे तो मत ही दिखाया कीजिये! मेरी जिससे मर्जी; उससे बात करूँगी!! मेरा फोन , मेरा मुँह.....आपको कोई परेशानी नही होनी चाहिए।"

" मुझे कैसी परेशानी? लेकिन आपको परेशानी जरूर है।"

" मतलब..??"

" मतलब आपको भी झूठ नही बोलना चाहिए! बातें करना क्यों कह रही है? सीधा ये कहिए न की जिससे चाहूं रोमांस करूँ!"

"राज शर्मा !! माइंड योर लैंग्वेज! कहीं ऐसा न हो कि मेरा हाथ उठ जाए आप पर!" डॉली ने गुस्से से कहा, औऱ बेख्याली में चाकू से उसकी अँगुली कट गई, जिससे खून निकलने लगा तो राज फौरन बोला,

"हाथ कट गया है आपका।"

डॉली दांत जमाते हुए नफरत से बोली, "जिस्म ही सारा कट गया है , इक हाथ को क्या देखते हो? आत्मा तक कट गई आपकी इस तरीके की बात से!

हैसियत की बात करती हो न ; अरे तुमसे ज्यादा ऊँची

हैसियत है मेरी! जिसकी सोच ऊँची न हो सकी, उसकी हैसियत क्या खाक ऊँची होगी...? तुच्छ सोच वाले , तुच्छ आदमी हो तुम।"

"अबे ऐ, जबान काबू में रखो!" राज अब बेहद गुस्से से अमर्यादित लहजे में बोला।

"अबे ओए!! ध्यान से सुन! इस लहजे में मुझसे बात मत करना दोबारा...!!" डॉली ने भी उसी लहजे में गुस्से से कहा तभी यकबयक राज ने उसकी गर्दन पकड़ते हुए कहा, " मेरे आगे तमीज मत भूलना , जबान ही नही , साँस भी छीन लूँगा!"

डॉली ने घुटने से उसकी जांघ पर दमदार वार कर दिया तो राज का हाथ उसके गले से हट गया औऱ वह झुकते हुए नीचे बैठ गया तो डॉली बोली, " बेकाबू होना सबको आता है, और ये तो बिल्कुल मत सोचना की निशाना चूका है! मुझसे दूर नही रहे तो बहुत ज्यादा संभावना है की तुम्हारी आने वाली नस्ल ही खतरे में पड़ जाए!

मुझे अबला टाइप नारी समझने की गलतफहमी मन मे पाल रखी हो तो उसे दूर कर लेना क्योंकि मंजर बदलने पर मैं खंजर चलाने में भी देर नही करूँगी, फिर चाहे वो गर्दन मेरी अपनी हो..... या किसी और की!"

राज खड़े होते हुए बोला, " मैं क्या कर सकता हूँ इसका अंदाजा भी नही तुम्हे! अगर चाह दूँ तो जिन पैरों से वार किया है, उन पैरों को चलने लायक भी नही छोडूंगा।"

डॉली मुस्कुराते हुए बोली, "हुँह...!! शीतल झरना नही हूँ मैं, ज्वालामुखी का भीषण ताप हूँ मैं। मेरे साथ गलत करोगे तो मेरे वार से अछूते तो तुम भी नही रहोगे।"

डॉली उसके देखते देखते एक तरफ को बढ़ गयी और बैग उठाते हुए बोली, " जा रही हूँ क्योंकि इससे ज्यादा बेइज्जती न अपनी सुनना चाहती हूं और न आपकी करना चाहती हूँ। पैसे याद से काट लेना आज के।"

राज जोर से चीख कर कहना चाहता था की "तुम्हे काम से निकाला जाता है!" लेकिन वो चुप रह गया क्योंकि वो दूसरी केयरटेकर के सामने उसे नौकरी से निकालकर नीचा दिखाना चाहता था।

डॉली तेज कदमों से बाहर चली गयी तो राज ने गुस्से में सारा सामान पटकते हुए कहा, " समझती क्या है खुद को ये लड़की? इतना आत्मविश्वास लाती कहाँ से है?"

राज ने गुस्से में फोन मिलाते हुए कहा, " विशाल! मुझे कल तक हर हाल में नई केयरटेकर चाहिए! कल मतलब कल, वरना अपनी भी पैकिंग कर लेना।"

" ओके सर! वादा रहा, कल सुबह आपके सामने नई केयरटेकर होगी।"

"हम्म!"राज ने फोन काट दिया औऱ कमरे में आकर यहाँ वहाँ चक्कर काटने लगा।

"अबे ओए....!" "अबे ओए...!!" डॉली की आवाज उसके कानों में गूंजती रही और उतना ही ज्यादा मिजाज खराब होता रहा।

उधर डॉली जाकर कुछ देर के लिए एक पार्क में बैठ गयी और जब दिमाग कुछ शांत हुआ तो वह घर जाने के लिए ऑटो रुकवाने को खड़ी हुई।

वह सड़क के किनारे खड़ी ऑटो का इंतज़ार कर रही थी कि तभी सामने उसे बलजीत नजर आ गया तो वह हड़बड़ा गयी क्योंकि उसकी नजर डॉली पर ही थी।

डॉली ने उसे खुद की तरफ बढ़ते देखा तो वह वहाँ से भागने को हुई और जल्दीबाजी में सड़क पार करने लगी तो

दूसरी तरफ से आती तेज रफ्तार कार से टकरा गयी और उछलकर कुछ दूर जा गिरी।

खून से लथपथ बेसुध डॉली को देखकर लोगो ने भीड़ इकट्ठी कर ली तो बलजीत ने रास्ता बदल लिया।
 
विशाल उसे हॉस्पिटल ले गया क्योंकि उसी की गाड़ी से एक्सीडेंट हुआ था, भीड़ में जैस्मीन के मोहल्ले की ही एक लड़की श्रेया भी थी तो उसने डॉली को पहचान लिया और वो भी विशाल के साथ हॉस्पिटल चली गयी।

वहाँ पहुँचकर उसने जैस्मीन को फोन कर दिया! जैस्मीन घबरा गई और विनाश की तरफ देखते हुए कलेजा मुँह को आने लगा, " अब बच्चे को कैसे समझाऊँ? क्या कहूँ? अभी तो वो खुद ठीक हुआ है, और अभी ही...!!"

वह पर्स लेते हुए विनाश को साथ लेकर हॉस्पिटल के लिए निकल गई।

हॉस्पिटल में डॉली का इलाज चल रहा था, विशाल यहाँ वहाँ घूम रहा था और मन ही मन सोच रहा था, " सर भी न ,

दिमाग खराब कर देते हैं! न मेरी नौकरी पर बात आती, न ये एक्सीडेंट होता! जाने क्या होगा लड़की के साथ?"

तभी श्रेया ने पानी का गिलास विशाल की तरफ बढ़ाया और बोली, "वो ठीक हो जाएगी, गलती से एक्सीडेंट हुआ है ; आपने जान बूझकर नही किया तो फिर आप इतने परेशान क्यों है?"

विशाल ने पानी ले लिया और पीने के बाद थैंक्स बोला तो श्रेया को देखकर दिमाग मे केयरटेकर वाली बात आ गयी। साधारण कद काठी की सामान्य रंग रूप वाली लड़की थी, व्यवहार से भी ठीक ही लग रही थी।

"केयरटेकर के रूप में इसे ले जाऊँ क्या?" विशाल ने मन ही मन सोचा, वह उससे बात तो करना चाहता था लेकिन हिम्मत नही हो रही थी।

"पता नही मेरे बारे में क्या सोचेगी? ऐसी सिचुएशन में भी ये नौकरी देने का झांसा दे रहा है! पर क्या करूँ? मेरी भी तो ऐसी सिचुएशन नही की किसी और की सिचुएशन पर ध्यान दे सकूँ!"

विशाल की परेशानी देखते हुए श्रेया बोली, " आप इतने परेशान क्यों है? आप जल्दी में लगते हैं, चले जाइये फिर

आप! मैं यहीं हूँ।"

विशाल अब जल्दी से बोला, " यहां से जाने से मेरी परेशानी दूर नही होगी, आप चाहे तो आप मेरी मदद कर सकती हैं।"

" मैं! कुछ समझी नही!"

" हाँ आप! प्लीज इंकार मत करना!"

" पहले ये तो बताइये मदद कैसी चाहिए? अभी 'हाँ' कैसे कर दूँ?"

"मुझे एक केयरटेकर की जरूरत है! अपने बॉस की दादी के लिए, अगर कल तक नही ढूंढा तो वो मुझे भी निकाल देंगे, इसीलिए परेशान हूँ और इसी चक्कर मे एक्सीडेंट भी हो गया।"

श्रेया उसे इस तरह परेशान देखकर बोली, " ठीक है! मैं तैयार हूँ, मैं भी जॉब की तलाश में ही निकली थी।"

विशाल ने खुश होकर उसका हाथ पकड़कर हाथ मिलाते हुए कहा, " ग्रेट! थैंक यू वेरी मच।"

श्रेया उसके हाथ की तरफ देखने लगी तो उसने जल्दी से हाथ छोड़ते हुए कहा, " सॉरी!"

हॉस्पिटल के अंदर आते ही श्रेया पर जैस्मीन की नजर पड़ी तो वह लपककर उसकी तरफ जाते हुए बोली, " क्या हुआ उसे? कहाँ है वो?"

"इमरजेंसी में!!"

" किसे क्या हुआ मासी?" विनाश ने पूछा।

अभी जैस्मीन कोई जबाव देती, तब तक दरवाजा खुल गया तो जैस्मीन डॉक्टर की तरफ बढ़ गयी, " सब ठीक है न डॉक्टर?"

"ठीक तो हैं लेकिन वो अब एक महीना बेड रेस्ट करें क्योंकि एक पैर की हड्डी टूटने की वजह से प्लास्टर करना पड़ा, 24 - 25 दिन से पहले प्लास्टर नही खुलेगा। सिर पर भी चोट है लेकिन कोई गम्भीर बात नही, चोट ऊपरी है।"

विनाश ने जैस्मीन का हाथ खींचते हुए कहा, " किसकी बात कर रही हैं आप? कौन है यहाँ? जिसे इतनी चोट आयी है!"

"आओ मिलवाती हूँ!" कहते हुए जैस्मीन विनाश को लेकर अंदर चली गयी।

डॉली की आंखे अभी भी बन्द थी तो विनाश हाथ छुड़ाकर उसकी तरफ दौड़ गया," मम्मा! चोट कैसे लग गयी मम्मा..? मम्मा को ये सुई क्यों लगी है मासी? निकालो उनके हाथ से ये, उन्हें दर्द हो रहा होगा।

विनाश के बढ़े हुए हाथ को पकड़ते हुए जैस्मीन प्यार से बोली, " नही बच्चा! छूते नही!! डॉक्टर खुद ही निकाल देंगे ड्रिप को।"

"मम्मा ठीक तो हो जाएंगी न! मैं अकेले नही रहूँगा, पापा पहले ही नहीं है , मम्मा को नही खोना!!"

" मम्मा! कहीं नही जाएंगी बेबी!" डॉली ने आंखे खोलते हुए कहा तो विनाश उससे चिपक गया, " मम्मा! जल्दी आने की बात हुई थी हमारे बीच, लेकिन इतनी जल्दी नही की आप चोट लगवा बैठी।"

" ये चोट तो कुछ दिन में ठीक हो जाएगी! परेशान मत हो। बहादुर मम्मा के बहादुर बेटे हो तुम।"
 
विनाश उससे चिपका रहा तो वह प्यार से बोली, " मैं आपके बिना नही रह सकती! आपका नाम विनाश इसीलिए रखा था क्योंकि आपसे विनाश प्रेम करती हूँ मैं।"

जैस्मीन डॉली के पास हॉस्पिटल में रुक गयी थी, विनाश जब सो गया तब वह धीरे से बोली, " एक्सीडेंट कैसे हो गया? तेरी नजर रोज जैसी क्यों नही है? क्या चल रहा है तेरे अंदर?"

"बलजीत नजर आ गया था आज!" डॉली ने सोए हुए विनाश की तरफ देखते हुए कहा।

" तो उसकी वजह से...!" जैस्मीन ने बात अधूरी छोड़ दी।

"हाँ! मैं विनाश के बिना नही रह सकती! अगर वो जान जाएगा औऱ मेरे बच्चे को हासिल करने की कोशिश करेगा तो...??"

" तू डर रही है उससे?"

" डर नही रही हूँ, लेकिन एक बार फिर से मैंटली प्रेशर झेलने की शक्ति नही है मुझमे! कहाँ सोचा था की अभी लौट कर आये 2 महीने नही हुए औऱ वो कमीना सामने आ जायेगा!!

इसीलिए मैं ये शहर छोड़कर चली गयी थी क्योंकि मुझे उस गलीच आदमी के बारे में सोचकर ही घृणा होने लगती है! उसके सामने तो मैं आना ही नही चाहती! पहली बार का उसका वो लिजलिजा स्पर्श मुझे आज भी मुँह चिढ़ाता है, उसकी छुअन से तो दूर हो गयी लेकिन मैं उसकी रेंगती आंखों को भी बदन पर बर्दाश्त नही कर सकती!

मैं सुकून से जीना चाहती हूँ, नही पड़ना मुझे किसी कानूनी दाव पेंच में!विनाश को उसकी नजरो में नही आने देना चाहती किसी भी कीमत पर नही! वो सिर्फ मेरा बच्चा है, सिर्फ मेरा।"

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उधर राज को पूरी रात नींद नही आई , वह परेशान था की " सुबह नई केयरटेकर आएगी या नही! मुझे उससे कोई दुश्मनी नही है लेकिन आँखे उसे ढूंढती रहती है, ख्याल में भी वो आने लगी है बस इसलिए मुझे उससे दूर जाना है! एक लड़की इस तरह मुझ पर, मेरे वजूद पर हावी नही हो सकती।

दादी उसके पास आई औऱ बोली, " वक़्त हो तो बात करना चाहती हूँ!"

"आइये न!"

"नही! अब पूछना जरुरी लगने लगा है! क्या पता कब तुम्हारा ईगो हर्ट हो जाये?"

" दादी प्लीज! आप मेरी दादी हैं और वो एक बाहरी लड़की!! आपकी औऱ उसकी कोई तुलना ही नही।"

" फिर आज इतने उद्विग्न क्यों हो?"

"आपके मन का वहम है, क्योंकि मेरा मुझ पर पूरा नियंत्रण है। किसी को देख कर जो मतवाला हो उठे, ऐसा मन नही राज शर्मा का।"

"सब कुछ तुम्हारे हिसाब से ही चलेगा ये मुग़ालता पाल लेना सही नही, क्योंकि कुछ चीजें ऊपर वाले के हिसाब से चलती हैं! और मन का क्या है राज , उसे सब्र में रख लेते हो अच्छी बात है...!! लेकिन एक रोज मन बगावत कर उठेगा तो हद से गुजरना पड़ेगा। उसके बिना रहना चाह रहे हो, जिसके बिना रह नही पा रहे।"

"हद से तो गुजरने को तैयार ही हूँ, लेकिन उसे करीब लाने के लिए नही बल्कि उसे खुद से दूर करने के लिए! मुझे वो जरा भी पसन्द नही!!"

" जो मर्जी आये, करो! लाये भी तुम ही थी उसे, हटाने का भी अधिकार है! मैं कुछ नही कहूँगी।"

सुभद्रा देवी चली गयी तो राज ने मन ही मन सोचा, " दादी को तो बहुत पसंद है न वो! फिर भी दादी ने उसे रोकने की कोशिश नही की, क्यों?? इतनी आसानी से इनके मानने की उम्मीद तो बिल्कुल भी नही थी मुझे, खैर ; अच्छा है।"

उधर दादी अपने बेड पर लेटते हुए बोली, " बहुत अजीब हो तुम राज ! लड़कों को जो लड़की पसंद आती है उसे हर तरह से पाने की कोशिश करते हैं, उसे हर वक़्त नजरों के सामने रखने की तरकीबें सोचते हैं....!! और एक तुम हो , जो लड़की तुम्हारे जहन पर हावी हो रही है उसे खुद से दूर करने की तरकीबें सोच रहे हो! खैर, अच्छा है!! ये दूरियां ही तुम्हे अहसास कराएंगी की चाहे वो सामने रहे या न रहे , तुम उसके प्रति अपनी भावनाओं से दूर नही भाग सकते, दूर होने पर भी वो तुम्हारे अंदर ही रहेगी!

मैंने इसीलिए उस लड़की को हटाने से तुम्हे नही रोका क्योंकि मैं जानती हूँ कि उसकी करीबी से ज्यादा असर तुम पर उसकी दूरी का होगा!! बस इंतज़ार रहेगा अब तो तुम्हारे इस अहसास को स्वीकार करने का।"

सुबह श्रेया को लेकर विशाल राज के दरवाजे पर खड़ा था, जैसे ही डोरबेल की आवाज आई, सज्जन ने आकर दरवाजा खोल दिया। राज भी हॉल में निकल आया, विशाल के साथ लड़की को देखकर उसके मन को तसल्ली मिल गयी।

" सर! ये श्रेया! आपकी दादी की केयर टेकर बनने के तैयार हैं।"

" ठीक है! संतोष सारे दिन का टाइम टेबल समझा देना इन्हें, औऱ हाँ! मिस श्रेया , किसी भी काम मे कोई कोताही नही होनी चाहिए वरना मुझसे बुरा कोई नही होगा। दादी के मामले में मैं जरा भी रियायत नही बरतता।"

"मेरी पूरी कोशिश रहेगी की आपको शिकायत का मौका न दूँ!"

"गुड!" राज ने कहा और जाने को मुड़ा लेकिन नजर बार बार दरवाजे की तरफ उठ रही थी, "आयी क्यों नही आज ये लड़की अभी तक? मुझे उसके चेहरे के भाव देखने थे, जब उसे यहाँ से हटाया जाता!"

राज मन मसोस कर रह गया, जब काफी देर बाद भी वह नही आई और न ही उसका फोन आया तो राज मन ही मन बोला, "इस लड़की ने मेरे हर मंसूबे पर पानी फेरने की कसम खायी हुई है! नही आना था तो फोन तो करना चाहिए था न! नौकरी करती है यहाँ, कोई अपना घर थोड़ी है की जब जी चाहा मुँह उठाकर चले आये और जब जी चाहा गायब हो गए......!!"

विशाल वहाँ से चला गया और हॉस्पिटल में डॉली से मिलने गया तो पता चला की वो घर चली गयी है, उसे हॉस्पिटल की गंध पसंद नही थी औऱ वो खुद को अधिक बीमार महसूस कर रही थी।

विशाल ऑफिस चला गया औऱ अपने काम मे लग गया, बीच बीच मे उसे श्रेया के ख्याल आते रहे तो उसने मन ही

मन सोचा, " पता नही उसका काम पसंद आया या नही सर को?"

उधर डॉली ने किसी को भी फोन नही किया था, उसे हमदर्दी हासिल करना अच्छा नही लगता था, जैस्मीन के कहने पर भी वो नही मानी और कहने लगी "पैर टूटना था तो टूट गया, कौन सी बड़ी बात है!! ठीक हो ही जाएगा न एक महीने बाद, दूसरी नौकरी तलाश लूँगी!कौन बताने जाए उस नागफनी को? मैं वैसे भी छोड़ने का मन काफी वक्त से बना रही थी, बहुत जलील करता है वो और खुद भी जलील होता है। मिसेज शर्मा बहुत प्यारी हैं लेकिन उनकी आंखों में पलता ख्वाब मैं पढ़ सकती हूँ, वो उस नागफनी और मुझे लेकर सपने बुन रही है , ये नही जानती की ये धूमकेतू जिस दिन अपनी सच्चाई बताएगी न, उस दिन उनके सारे ख्याल तहस नहस हो जाएंगे! एक बच्चे की माँ से वो अपने इकलौते मोस्ट हैंडसम बैचलर पोते की शादी क्यों कराएंगी? सब कुछ बुरे तरीके से बर्बाद हो इससे अच्छा है की समय रहते थोड़ी बर्बादी पर ही इसे रोक दिया जाए।"

विनाश स्कूल से घर आया तो जैस्मीन उसके लिए पानी लाने चली गयी, विनाश एकटक डॉली को देखे जा रहा था तो डॉली ने उसे अपने पास आने का इशारा किया! विनाश तुरंत उसके गले मे बाँहे डालकर उसके करीब लेट गया तो

वह बोली, " ऐसे क्या देख रहे थे?"

"मुझे बहुत बुरा लग रहा है, आपको कितना दर्द हो रहा होगा!"

" सच बताओ! जो आपके दिमाग मे चल रहा था , वो ये तो नही था!"

"मैं आपके बिना नही रह सकता, आप मुझे छोड़कर तो नही जाओगी? पहले ही मेरे पास बाकी बच्चों की तरह पापा नही है! मैं आपसे कहता नही लेकिन मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ, मुझे आप चाहिए ही चाहिए! आप सबसे अच्छी हो, जब मैं जल्दी जल्दी बड़ा हो जाऊँगा न तो आपके लिए एक अच्छा सा साथी लाऊंगा, जो मेरे पापा भी बनेंगे।"

डॉली ने उसे पकड़कर उसके माथे को चूम लिया और बोली, " लव यू बेबी! इतना नही सोचते हैं, जब बड़े होने लगोगे तो आपको सारी बातें खुद ही समझ आने लगेगी! मुझे नही चाहिए कोई साथी, मेरे लिए आप हो न!"

"मैं तो हूँ ही! मैं आपको छोड़कर कभी रह ही नही सकता!" विनाश ने अपनी भोली सी आवाज में कहा तो डॉली ने मुस्कुराते हुए अपनी आंखें बंद कर ली।

विनाश ने उससे चिपके हुए मन ही मन कहा, " आप झूठ बोल रही हो मम्मा! टीवी में तो दिखाते है न की सब अपने अपने साथी के साथ घूमने जाती है समुद्र के पास! आपको भी तो मन करता होगा, मैं तो पता नही कब बड़ा होऊंगा, तब तक आपको यूँ ही कैसे छोड़ दूँ? जस्सी मासी से बात करूंगा कि वो मेरी सुंदर सी मम्मा के लिए सुंदर सा साथी ढूंढने में मेरी मदद करे, फिर मैं भी सबसे कहूँगा की मेरे पापा है ये।"

दूसरी ओर बलजीत कमरे में बैठा सोच में गुम था, " गायब कहाँ हो जाती है ये? पिछली बार तो शहर छोड़कर चली गयी थी , अब इतने साल बाद नजर आयी तो मुझे देखकर उसके भागने की जल्दबाजी ने इतना तो साबित कर ही दिया कि वो अब तक मुझे भूली नही है!

उस रोज एक्सीडेंट की वजह से मैं तो भाग गया लेकिन घर पर तो वो फिर भी लौटकर आयी ही नही...!! मर गयी क्या....??

लेकिन मरी होती तो उसके घर मातम तो होता न!! वहाँ तो सब सही ही नजर आ रहा था। चली कहाँ गयी.....?"

"जीत.!! कहाँ खोए रहते हो आजकल...? कब से आवाजें दे रही हूँ?" बलजीत की पत्नी शिवी ने कमरे में आते हुए कहा।

"कहीं नही!! ऑफिस के काम की वजह से स्ट्रेस था, कुछ काम हो तो बोलो!" बलजीत ने कहा।

" हम्म! जाओ अंकुश और अंकिता को कहीं घुमा ले आओ? चिड़चिड़े हो गए है घर मे बैठे बैठे!" शिवी बोली।

"ठीक है! उन्हें तैयार करो, आता हूँ!"

शिवी चली गयी तो बलजीत निक्कर उतारकर जींस चढ़ाते हुए बोला, " उसी पार्क में ले जाता हूँ, क्या पता उस तरफ फिर से नजर आ जाये वो?"

बलजीत अपने जुड़वा बच्चों अंकुश और अंकिता को लेकर पार्क की तरफ निकल गया।
 
उधर राज ऑफिस में बैठा था और कलीग्स पर बेवजह ही गुस्सा कर रहा था!! फाइल में जरा सी गलती के लिए पूरे स्टाफ की क्लास लग चुकी थी, सब आपस मे खुसर फुसर कर रहे थे, " हो क्या गया है सर को? आजकल तो पहले से भी ज्यादा गुस्सा कर रहे हैं! कुछ समझ नही आता कि कब किसे निकाल बाहर करेंगे, और कब किसकी डाँट पड़ेगी?"

राज अपने केबिन में लौट आया था और मीटिंग्स के जरूरी

दस्तावेज देखते हुए उन्हें एक तरफ को सरका कर यकायक खड़ा हो गया और बोला, " इस लड़की की इतनी हिम्मत की मेरे यहाँ से काम छोड़कर चली गयी,,, और इन्फॉर्म तक करना जरूरी नही समझा.....!! हिम्मत कैसे हुई उसकी...? कैसे..?

मैं उसे नौकरी से निकालना चाहता था, उसका वो लटका हुआ अपमानित चेहरा देखना चाहता था, लेकिन वो...!! वो...! हट साला..!!"

राज ने गुस्से में सब कुछ नीचे फेंक दिया और टेबल पर हाथ मारते हुए बोला, " वो मुझे नीचा दिखाकर चली गयी!! मुझे..! राज शर्मा को..!! जिसके साथ सब काम करने की दुआएं मांगते हैं, उसकी दी हुई नौकरी को वो लड़की छोड़कर चली कैसे गयी......? कैसे..? इस तरह उसका चले जाना मेरा अपमान है! मेरा अपमान..!! मेरे दिये पैसों से उसे मतलब नहीं, मेरी हैसियत को वो अपने आगे दो कौड़ी का समझती है! मेरा चार्म उस पर कोई असर नही करता..! कैसी लड़की है जो हर बात से अप्रभावित है....? इतना तटस्थ कोई हो कैसे सकता है...? ठीक नही किया ये तुमने..? ठीक नही किया..!!

मेरी ही चाल को मुझ पर पलट दिया, मैंने सिर्फ सोचा और तुमने कर दिया....!! मैं तुम्हे निकाल कर खुश होना चाहता था, जीतना चाहता था लेकिन तुम खुद ही क्विट कर गयी और क्विट करने के बावजूद जीत गयी....., मुझे ये

नाकाबिले बर्दाश्त है! मेरी जीत को मेरी हार में तब्दील करके चली गयी।

दिन हो या रात हो..,हर वक़्त तुम्हारे ख्याल ही जहन में घूमते रहते हैं! मुबारक हो मिस डॉली ! मेरा ध्यान आकर्षित करने में तुमने कामयाबी हासिल कर ही ली...! बहुत अच्छे दांव पेंच आते हैं अमीरों को जाल में फँसाने के, लेकिन यहाँ ये दाव काम नही आएगा क्योंकि हमारा मिलना दोबारा नही होगा! तुम्हारी ये कहानी मुख्तसर ही रह जायेगी, तुम कितना भी आगे बढ़ना चाहो, मैं इसे आगे नही बढ़ने दूँगा!! ध्यान आकर्षित करना और बात है,,,,लेकिन तुम्हे जिंदगी में जगह नही दूँगा!"

मेरे जहन मे अस्तित्व बनाने के लिए बधाई,,, लेकिन मेरे जीवन मे रहने का अधिकार अभी भी तुमने हासिल नही किया है!! तुम चाहती तो होगी की मैं बावला सा होकर तुम्हे ढूंढता फिरूँ, लेकिन अफसोस की मैं तुम्हे नही ढूंढूंगा! राज शर्मा के आगे पीछे हज़ारों लड़कियाँ घूमती है , वो तुम्हारे पीछे आएगा,,, ऐसा ख्वाब देख भी कैसे सकती हो..? बहुत देखी हैं ऐसी सोच वाली लड़कियाँ, लेकिन मैं कभी किसी के पीछे नही गया! न तो तुम बारिश हो...और न मैं वो पौधा, जिसे तुम्हारी जरूरत है, तुम्हारे आने से मैं हरा भरा हो जाऊँगा और न होने से मुरझा जाऊँगा! ऐसा सोचना भी बेवकूफी है....! तुम्हारे आने या चले जाने से मुझे कोई फर्क नही पड़ता! दिमागी गेम खेल रही हो मेरे साथ तो खेलो, जीत

हासिल हो जाये तो कहना, मुझे भी ये जंग मंजूर है!!"

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दिन बीत रहे थे, डॉली को जॉब छोड़े हुए दूसरा महीना खत्म होने को आया था,,,,

एक तरफ डॉली को बलजीत ढूंढ कर थक चुका था तो दूसरी तरफ राज के जहन में डॉली अब भी रह गयी थी। वह बात बेबात श्रेया को डाँटता रहता था!

जरा जरा सी गलती पर वो उसे बहुत कुछ कहता औऱ श्रेया चुपचाप सिर झुकाए सुनकर सॉरी बोल हट जाती। उसकी इस हरकत पर राज औऱ बौखला उठता क्योंकि तब उसे डॉली याद आ जाती की ' वो होती तो ऐसे नही जाती, वो होती तो बहस करती....!! वो होती तो बेखौफ मेरी निग़ाहों में देखती न की यूँ निगाहें झुकाती....! वो होती तो हर बात के बाद धड़कन बढ़ती की अगले पल वो बातों से वार करेगी या फिर हाथ- पैर- सिर से..!! हर बात को बेदर्दी से काटती और एक आग धधका देती मन मे..!! उसकी गूढ़ निग़ाहों में मैं उलझकर रह जाता की वो कोई फरेब रच रही है,,,,,, या है ही ऐसी सीधी - साफदिल...??"

आज भी वो श्रेया को डाँटकर जैसे ही अपने कमरे में आया,

सुभद्रा देवी उसके कमरे में चली आयी और बोली,

"क्यों जरा जरा सी बात पर चिढ़ जाते हो?"

"नही मालूम!"

"तो करो आत्म मंथन!"

"कर चुका!'

"फिर भी नही जान पाए!"

"नही!!"

"मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि जान चुके हो इसीलिए और ज्यादा चिढ रहे हो...??"

" जान जाता तो वजह दूर कर देता!"

"वजह ही तो तुम दूर नही करना चाहते! ह्रदय की धड़कनों का जो अधार है , तुम तो उस आधार को ही अपनी अकड़ की वजह से दूर कर बैठे हो!"

"धड़कनों का आधार साँसे होती हैं और साँसे चल रही है।"

" राज शर्मा !! मैंने भी दुनिया देखी है ,, और ये वक़्त भी..,जिससे आप गुजर रहे हैं! आपकी आंखें औऱ चेहरा देखकर बता सकती हूँ आपका दाव उल्टा पड़ गया, यही आप सहन नही कर पा रहे..इसलिए बात बात पर बिगड़ उठते हैं..!!

आप उसे यहाँ टॉर्चर करने की नीयत से लाये थे, चले थे उसके दिल मे अपने लिए तलब उठाने, लेकिन यहाँ तो आप ही उसके मोहताज बन गए......, और ये बात आप स्वीकार करने से भाग रहे हैं!"

राज अब चिढ़ उठा और बोला, "राज शर्मा किसी का मोहताज नही..!! अगर ऐसा होता तो वो इस वक़्त मेरे घर मे होती! मैं हर दूसरी लड़की की हसरत में शामिल हूँ...!"

"......लेकिन उसकी हसरत में नहीं!! और यही बात आपको कचोट रही है, क्योंकि उसकी हसरत में शामिल होने की आपकी हसरत, हसरत ही रह गयी!!" सुभद्रा देवी उसकी बात काटकर बोली।

"ऐसा कुछ नही...!!" राज ने बात पूरी भी नही की थी तब तक दादी फिर बोल उठी, " उसके दिल मे नही उतर पाए

आप..!! उसकी आँखों मे नही बस पाए आप....! हर लड़की को अपनी हैसियत की मिसाल देकर उसकी हद बताते रहे आप, लेकिन उस लड़की ने अपनी हैसियत ऊँची कर ली, आपकी हद में आने से नकार दिया उसने।"

राज अब तल्खी से बोला, " दादी प्लीज!! एक अंजान लड़की के लिए आप मुझसे बहस मत कीजिये! उसकी वजह से मेरे वजूद पर प्रश्न उठाना बन्द कीजिये! मैं जैसा था, वैसा हूँ और वैसा ही रहूँगा,,,,,! न तो मैं जलता सहरा हूँ, और न वो बारिश! जो मैं उसके लिए तरसूंगा..!!"

सुभद्रा देवी अब भी मुस्कुराते हुए बोली, " इतनी बौखलाहट तभी होती है जब मन मे किसी के लिए भाव जाग उठते है....! मन ही मन किसी से कोई रिश्ता जुड़ चुका होता है और उसे हम बयां नही कर पाते....!! जब मन किसी निर्णय पर न पहुंचकर मंझधार में फंसा होता है , भावनाओं के ज्वार की वजह से होती है इतनी बौखलाहट....!! वही ज्वार इस वक़्त आपके अंदर उठा हुआ है और इसलिए आप हर बात पर चिढ़ उठते हैं! इतना अहंकार किस काम का अगर वो आपकी अंदर ही अंदर खोखला कर दे तो....!!"

" इनफ दादी!! मैं उसके बारे में एक शब्द भी नही सुनना चाहता! अगर हमारे बीच बातचीत के लिए सिर्फ यही एक

टॉपिक बचा है तो अच्छा है की हम बात ही न करें! दोनो की इज्ज़त बची रहेगी!" राज ये कहकर तेजी से कमरे से बाहर निकल गया।

सुभद्रा देवी उसके जाते ही धीमे से बोली, " मेरा शक बिल्कुल सही है, राज उसकी तरफ झुकाव महसूस करने लगा है और यही वजह है की वो इतना चिड़चिड़ा हो गया है। वो समझ नही पा रहा कि क्या करे , क्या न करे....? अहसासों से दूर भागने के लिए उसे भी नीचा दिखाना चाहता था, लेकिन वो बच्ची अनजाने में ही इसे और ज्यादा नाराज कर गयी।

मैं तो बस इसे खुद के एहसास समझने के लिए वक़्त देना चाहती थी लेकिन ये अपनी अकड़ के आगे सब कुछ समझते हुए भी मानने को तैयार नही है! लगता है, मुझे ही अब कुछ करना पड़ेगा!"

पूरे दिन राज घर नही आया ,,,,

शाम को श्रेया विशाल से फोन पर बात करते हुए बोली, " बहुत डांटते हैं आपके बॉस मुझे! गलतियां तो हो ही जाती हैं न लेकिन आपके बॉस को सब परफेक्ट चाहिए,, उनके डांटने की वजह से अब तो ऐसा हो गया है कि वो नजर आ जाते हैं

तो खुद ब खुद गलतियां भी होनी लगती है! हाथ ही काम नही करते, कभी कुछ हो जाता है तो कभी कुछ।"

विशाल दूसरी ओर से समझाते हुए बोला, "जहां दो महीने संभाल लिया, वहाँ प्लीज कुछ दिन संभाल लीजिये, तब तक मैं ढूंढता हूँ कोई दूसरी केयरटेकर!"

" रहने दीजिए!! जब तक बॉस खुद नही कहते काम छोड़ने को, तब तक मैं करूँगी,,,, आखिर इसी काम की वजह से तो मैं आपसे मिल पाई।" श्रेया ने कहा।

"मतलब मेरा मिलना आपके लिए इतना खास है की आप बॉस की डाँट भी सुनने को तैयार है!"

श्रेया सामने से चुप हो गयी तो विशाल फिर बोला, " चुप क्यों हो गयी? बोलिये न!!"

"आपके लिए कुछ भी....!!" श्रेया धीरे से बोली और कॉल कट कर दिया।

" हैलो..! हैलो...!!" विशाल बोलता रह गया लेकिन श्रेया तो कॉल कट कर चुकी थी! विशाल और श्रेया अक्सर फोन पर बाते कर लिया करते थे, लेकिन औपचारिक ही!! आज

पहली बार था जब श्रेया ने इस तरह कहा था की विशाल की धड़कने बढ़ गयी थी,,"आपके लिए कुछ भी...!!"

ये चार लफ्ज़ उसे "आई लव यू!" से भी ज्यादा कीमती लग रहे थे।

विशाल के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी और वो मन ही मन बोला, " बस यही तो मैं भी मानता हूँ की डॉली जी की वजह से हम मिले,, इसलिये वो भी अब मेरे लिए बहुत मायने रखती हैं! उन्हें बताऊंगा की हमारी बात आगे बढ़ गयी है तो वह बहुत खुश होंगी।"

इधर राज लौट आया था और किचन के दरवाजे तक पानी लेने के लिए आया था कि तभी श्रेया की बात सुनकर चुपचाप अपने कमरे में लौट आया और दरवाजा बन्द करके दोनो हाथ सिर के पीछे दबाए सोफे पर बैठ गया, आंखे बंद कर ली!

"आपके लिये कुछ भी...!!" श्रेया के ये शब्द उसके कानों में गूंजे तो उसने भौंहे सिकोड़ ली और फिर आंखे खोलते हुए बोला, " कितनी आसानी से उसने विशाल से ऐसे शब्दों को कह दिया, और एक वो है, जो कहना तो दूर अपनी निगाहों से भी ये एहसास तक नही कराती की मुझ में कुछ खास है भी!!"

राज उठकर वर्कआउट करने चल दिया और लौटकर आया तो पसीना पोंछते हुए शीशे के सामने खड़ा हो गया,,,,, पीछे उसे डॉली होंठ टेढ़े किये मुँह चिढ़ाते हुए नजर आयी तो वह फौरन गुस्से में पीछे पलटा लेकिन वहाँ कोई नही था।

राज ने तौलिया फेंक दिया औऱ खिड़की पर हाथ जमाते हुए बोला, " दादी जो कह रही हैं वो सही नही हो सकता, है न...?? मैं उसके प्रति कुछ महसूस नही करता! जब कुछ है नही, तो मैं क्यों मानूँ?"

वह नहाने चल दिया औऱ जब लौटकर आया तो उसे कुछ शांति मिली! वह बैठकर कल की मीटिंग की फाइल देखने लगा।
 
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