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" विनाश ...!!" डॉली ने तेज आवाज में उसे डपट दिया, " इस तरह से नही बोलते हैं!!"
"तो बच्चों को भी इस तरह सबके सामने नही डांटते हैं..! अकेले में समझा सकती हैं आप..!!" राज भी अब तुरंत तेज आवाज में बोला।
"मेरा बच्चा है , डाँटूं या कुछ भी करूँ..?" डॉली भी तुरंत बोली, जबकि जस्सी उसका हाथ दबा रही थी।
" ऐसा है क्या..??"
" हां है.!!"
" तो बस इतना कि मेरा घर है.., यहाँ ऐसा करने की अनुमति नही है आपको!" राज उसके सामने जाकर धीरे से बोला और रूम से बाहर निकल गया।
डॉली उसके चले जाने की दिशा में घूरने लगी तो आज राज ने भी पहली बार पलटकर नाराजगी भरी निगाहों से उसकी तरफ देखा!
"डॉली जूस ला दो बच्चे! दवाइयों से मुँह कड़वा हो जाएगा तो जूस पी लूँगी!" सुभद्रा देवी ने जल्दी से कहा।
डॉली विनाश का हाथ पकड़कर अपने साथ ही ले गयी तो जैस्मिन
अंदर आते हुए बोली, " देखा दादी जी! कितनी गहरी खाई है इनके बीच?"
" नजरिये का फर्क है बच्चे! मैं खाई नही पुल देख रही हूँ!! विनाश वो पुल है जो इस खाई को पाट देगा!"
समीर अब बोल उठा, "इतना आसान नही दादी! राज बहुत मजबूत है, जहां तक मैं उसे जानता हूँ, वो अगर जान भी जाएगा न कि उसे डॉली से प्यार हो गया तो भी वो इस बात को मानेगा नही, फीलींग्स को जल्दी जाहिर करने वालो में से वो कभी रहा ही नही!!"
डॉली जूस तैयार करने लगी तो विनाश चुपके से भागकर उस तरफ चला गया जिधर राज गया था!
राज जब अपनी बात कहने कभी कभार उसके करीब आता था तो उस से उठती महक डॉली के मन मे कुछ अलग सा ही अहसास जगाने का काम करती थी इसलिए वो राज से दूर भागने को बेचैन रहती थी!! खुद पर भी गुस्सा होती कि क्या होता है कभी कभी..! रुकना होगा , पीछे हटना होगा ऐसी हर बात से, हर अहसास से! अपना दायरा नही लांघ सकती मैं...!!"
उधर राज खिड़की के पास खड़ा हो गया और शर्ट के ऊपर के बटन खोलते हुए पल भर को आँख बंद करके मन ही मन बोला, " क्या कह दिया था मैने..? बात तो संभाल ली लेकिन कहना नही चाहिए था!! उसके सामने ही ऐसा कैसे कह सकता हूँ मैं..? भाव बढ़ जाएंगे उसके तो..!! झुकती तो वैसे भी नही है वो लेकिन ये जाहिर होने पर तो लहजा और ज्यादा बदल जायेगा!"
" आप मुझसे बात करेंगे या आप भी नाराज हैं मेरी बात से..??" विनाश की आवाज आई तो राज उसकी तरफ पलटा और बोला, " मैं जरा भी नाराज नही हूँ आपसे..!"
" मम्मा क्यों नाराज है? मैं तो उनके ही बारे में सोच रहा था न??"
" हम्म! आपसे नही, अपनी सिचुएशन से नाराज हैं आपकी मम्मा!"
" ये सिचुएशन कब ठीक होगी..?"
" जल्दी हो जाएगी..!! आप खेलने कूदने पर ध्यान दीजिए, बच्चे इतने गम्भीर अच्छे नही लगते..!!"
"अच्छा..! पर मम्मा तो कहती है कि पढूँगा लिखूंगा तब सिचुएशन बदलेगी, फिर तो बहुत ज्यादा वक्त लगेगा न!"
" छोड़िये ये सब! ये बताइये की आपका घूमने का मन होता है तो पापा कहीं ले नही जाते...?"
" पापा तो है ही नही न..! मैंने तो कभी पापा को देखा ही नही है!" विनाश बोला तो राज हैरानी से उसे देखने लगा, " मतलब..!!" उसके मुंह से निकला।
"मतलब पापा को तो अभी ढूंढ रहा हूँ , जो मम्मा को घुमाएंगे औऱ मुझे भी!" विनाश मासूमियत से बोला।
राज ने अब असमंजस से अपने बालों में हाथ फेरा और मन ही मन बोला, " वो कहती है कि हसबैंड इसी शहर में है, मैंने खुद देखा है, समीर ने भी देखा और इस बच्चे ने कभी पापा नही देखे....! ये कैसी पहेली है...?"
" बेबी...!! विनाश ..!!" डॉली ने अब उसे गायब देखकर आवाज दी तो विनाश ने आवाज दे दी!
" यहाँ क्या कर रहे हो..? इनसे दूर रहा करो..!" डॉली फौरन बोली।
विनाश डॉली की तरफ चला गया तो राज बोला, " आप अपनी मासी के पास जाइये विनाश ! मुझे आपकी मम्मा से बात करनी है!"
विनाश ऊपर चला गया तो डॉली भी जाने को हुई लेकिन राज ने टोक दिया, " बात करनी है आपसे.!!"
" मुझे नही करनी..!!"
" ऐसा है क्या..??"
" हां , ऐसा ही है!"
" तो बस इतना कि बात सुने बिना आपको जाने नही दूँगा!!"
डॉली ने फिर भी कदम बढ़ा दिया तो राज ने अचानक तेजी से
बढ़कर दरवाजा को धक्का दे दिया और डॉली के सामने बन्द दरवाजे से टिक गया..!!
डॉली उसे घूरने लगी तो वह जेब मे हाथ रखते हुए बोला, " पहली बात तो मुझमें कांटे नही लगे और दूसरा ये की आप हमारी आपसी टकराहट के बीच बच्चे को न घसीटे! वो बहुत छोटा है अभी!!"
" मेरे बच्चे के बारे में मैं खुद सोच सकती हूँ!"
"ऐसा है...!! तो बताओ उसे की उसका बाप कहाँ है, खुद के अरमान पूरे करती हो , सरे राह उससे लिपटती हो, और वो बच्चा खेलने की उम्र में अपने उस पापा को ढूंढता फिर रहा है, जिसे उसने कभी देखा ही नही!"
" मिस्टर शर्मा ...!! पहले भी कहा है कुछ जानते नहीं तो बोलने की जरूरत नही...!! और कोई लिपटे मुझसे आपको क्या..? आपका जी कर रहा है लिपटने का..??" डॉली अब गुस्से से बोली।
" एक और शब्द नही..!! मैं कोई ऑक्टोपस नही जो तुमसे लिपटने आऊंगा...!! और खुद की आंखों से देखा था उस रोज रोड पर उस आदमी की....!!" राज ने बात अधूरी छोड़ दी और दूसरी तरफ मुँह फेर लिया।
डॉली ने उसकी पीठ देखते हुए कहा, " मैं भी कोई बेल नही हूँ कि किसी से भी लिपटती फिरूँ..!! ठंड लगने पर भी मैं खुद ही खुद की बाहों में अपने आप को लपेट लेती हूं, किसी और से लिपटने की
जरूरत नही मुझे!! वैसे भी माँग भरते ही दिल भी भर जाता है मर्दों का, फिर तो कोई और चाहिए होती है।"
राज अब उसकी तरफ पलटा, पहली बार डॉली की आवाज में हमेशा सा उफान नही था बल्कि अजीब सी गहराई थी!
वह आगे बोली, " जहां तक बात मेरे बच्चे की है तो वो आगे जाकर सब समझने लगेगा, अभी के लिए आप इतना जान लीजिए कि मेरे पति के साथ रिश्ते पर पूर्ण विराम कब का लग चुका है...! और मैं नही चाहती कि जिंदगी के किसी भी मोड़ पर विनाश कभी भी उस आदमी को देखे या मिले..!!
उसे छोड़ दिया मैंने , जैस्मिन के साथ रहती हूं...!! छोड़ी हुई औरत या छोड़कर आयी हुई औरत समाज से दो ही चीजे हासिल करती है- तिरस्कार और बहिष्कार।
हमारी उपलब्धियों पर तालियाँ और शाबाशियाँ नही मिलती, लोगो की टटोलती नजरे मिलती है जो ये कहती हैं की हमने ये उपलब्धि अपना शरीर किसी के लिए बिछाकर पाया है!!
आपको मेरे पलटकर जवाब देने से दिक्कत होती है न तो यही वजह समझ लीजिए मेरे आपसे बहस की...! क्योंकि मैं कोई वजह नही देना चाहती कि आप मेरे करीब आयें.... या आपके मन को मैं भा जाऊँ..!"
"और आपका क्या....? अगर मैं आपको भा जाऊँ तो...!!"
"ये दिन कभी नही आएगा!!" कहते हुए डॉली दरवाजा खोलकर जाने को हुई तो राज पीछे से बोला, " सवालों से भागो मत, खुद को
निडर कहती हो न......!! लेकिन अब तुम अपने ही जज्बातों से डर रही हो, निगाह मिलाकर बात करने से डर रही हो, इसलिए भाग रही हो!
क्या लगता है तुम्हे मैं तुम्हारे काबिल नही? क्यों डरती हो मुझसे मोहब्बत होने से? मेरे मन को भाने से...??"
डॉली बिना पलटे ही बोली, " क्योंकि मेरा एकाकीपन मेरे लिए बहुत है, इसमें प्यार के लिये कोई जगह नही है।"
राज भी बोल उठा , " जो तुम्हे छोड़ गए..... या फिर जिन्हें तुम छोड़ आयी हो, उनके लिए दूसरों को और खुद को सजा क्यों देना....? जब लौटकर जाना नही है तो आगे क्यों नही बढ़ती.....? अगर दिल किसी के लिये बेकरार होता है तो होने नही देती...? किसी खास को देखकर दिल बेतहाशा जब धड़कता है तो फिर बेकाबू धड़कनों को अनदेखा कर देना सही है क्या..??"
" ऐसे अहसासों पर जाया करने के लिए वक़्त नही मेरे पास!!" डॉली बोली और बाहर निकलने को हुई तो राज बोला, " तो आप कहना चाह रही है कि आप मुझे अनदेखा करने की हैसियत रखती हैं....!!"
डॉली अब रुकी और पलटकर बोली, " मैं दिया बनकर जलना चाहती हूँ और तुम आंधी बनकर मुझे बुझाना चाहते हो...!! हर बार अपनी हैसियत का हवाला क्यों देते हो? मैं जिस भी हैसियत में जी रही हूँ, खुद जी रही हूं न...!! आपसे तो कहने नही आती कुछ!! आज भी नही कहती अगर विनाश यहां नही मिलता!! अपनी किसी भी चाह
का जिक्र आपसे तो कभी भी नही किया मैंने! आप समुद्र हो तो रहो समुद्र ,, मैं नदी बनकर ही खुश हूँ। मैं खुद से मोहब्बत करती हूँ और यही मुझे किसी के भी आगे डटकर खड़े रहने की शक्ति देता है।
"ऐसा है क्या..??"
" हाँ ! ऐसा ही है!"
" तो बस इतना कि दूसरों को भी खुद से मोहब्बत करने पर मजबूर कर उन्हें उनसे ही जुदा करने का हक नही आपको!! आप खुद ही खुद की मिसाल हैं तो दूसरों को भी उनकी मिसाल बने रहने दे, उन्हें बदलने का हक नही आपको..!!"
" मुझे ऐसा क्यों लग रहा है की ख़ुद सख्त बनकर औरों को अपने लिए फिसलने पर मजबूर करने वाला शख्स आज जब किसी पर फिसल रहा है तो शिकायत हो रही है उसे...??"
"हुँह्ह!! मुझे क्यों शिकायत होगी, तुम्हारे उस चितकबरे पति जैसा नही हूँ मैं की किसी पर भी फिसल जाऊँ!!"
डॉली ने बस एक नजर उठाकर उसे देखा औऱ बाहर जाने को हुई तो राज बोल उठा, " लेकिन एक बात याद रखना, जिस दिन भी खुद से आकर मुझसे लिपटी न , उस दिन के बाद मुझसे जमानत मुमकिन नही होगी!!"
डॉली अब फिर पलटी और निग़ाहों में देखकर बोली, " तन को तो
जबरदस्ती भी हासिल किया जा सकता है, लेकिन हमारी जिंदगी में इम्पोर्टेन्ट वो होता है जिस पर हम अपना मन वार दे!!"
वह पलटकर बाहर निकल गयी तो राज बोला, " मर्दो के प्रति तुम्हारी विरक्ति को आसक्ति में बदल दूँगा! अनमनी उदास आँखो में सुलगते चटख रंग भरूँगा और वो भी अपने अंदाज में...!!"
वह बाहर आया तो दादी से बात करती डॉली के गालों पर जुल्फों को ढलकते देखकर मन मे ख्याल आया, " क्या कोई दिन ऐसा होगा, जब जुल्फों को हटाकर उनकी जगह मेरा चेहरा ले सकेगा!!"
"तो बच्चों को भी इस तरह सबके सामने नही डांटते हैं..! अकेले में समझा सकती हैं आप..!!" राज भी अब तुरंत तेज आवाज में बोला।
"मेरा बच्चा है , डाँटूं या कुछ भी करूँ..?" डॉली भी तुरंत बोली, जबकि जस्सी उसका हाथ दबा रही थी।
" ऐसा है क्या..??"
" हां है.!!"
" तो बस इतना कि मेरा घर है.., यहाँ ऐसा करने की अनुमति नही है आपको!" राज उसके सामने जाकर धीरे से बोला और रूम से बाहर निकल गया।
डॉली उसके चले जाने की दिशा में घूरने लगी तो आज राज ने भी पहली बार पलटकर नाराजगी भरी निगाहों से उसकी तरफ देखा!
"डॉली जूस ला दो बच्चे! दवाइयों से मुँह कड़वा हो जाएगा तो जूस पी लूँगी!" सुभद्रा देवी ने जल्दी से कहा।
डॉली विनाश का हाथ पकड़कर अपने साथ ही ले गयी तो जैस्मिन
अंदर आते हुए बोली, " देखा दादी जी! कितनी गहरी खाई है इनके बीच?"
" नजरिये का फर्क है बच्चे! मैं खाई नही पुल देख रही हूँ!! विनाश वो पुल है जो इस खाई को पाट देगा!"
समीर अब बोल उठा, "इतना आसान नही दादी! राज बहुत मजबूत है, जहां तक मैं उसे जानता हूँ, वो अगर जान भी जाएगा न कि उसे डॉली से प्यार हो गया तो भी वो इस बात को मानेगा नही, फीलींग्स को जल्दी जाहिर करने वालो में से वो कभी रहा ही नही!!"
डॉली जूस तैयार करने लगी तो विनाश चुपके से भागकर उस तरफ चला गया जिधर राज गया था!
राज जब अपनी बात कहने कभी कभार उसके करीब आता था तो उस से उठती महक डॉली के मन मे कुछ अलग सा ही अहसास जगाने का काम करती थी इसलिए वो राज से दूर भागने को बेचैन रहती थी!! खुद पर भी गुस्सा होती कि क्या होता है कभी कभी..! रुकना होगा , पीछे हटना होगा ऐसी हर बात से, हर अहसास से! अपना दायरा नही लांघ सकती मैं...!!"
उधर राज खिड़की के पास खड़ा हो गया और शर्ट के ऊपर के बटन खोलते हुए पल भर को आँख बंद करके मन ही मन बोला, " क्या कह दिया था मैने..? बात तो संभाल ली लेकिन कहना नही चाहिए था!! उसके सामने ही ऐसा कैसे कह सकता हूँ मैं..? भाव बढ़ जाएंगे उसके तो..!! झुकती तो वैसे भी नही है वो लेकिन ये जाहिर होने पर तो लहजा और ज्यादा बदल जायेगा!"
" आप मुझसे बात करेंगे या आप भी नाराज हैं मेरी बात से..??" विनाश की आवाज आई तो राज उसकी तरफ पलटा और बोला, " मैं जरा भी नाराज नही हूँ आपसे..!"
" मम्मा क्यों नाराज है? मैं तो उनके ही बारे में सोच रहा था न??"
" हम्म! आपसे नही, अपनी सिचुएशन से नाराज हैं आपकी मम्मा!"
" ये सिचुएशन कब ठीक होगी..?"
" जल्दी हो जाएगी..!! आप खेलने कूदने पर ध्यान दीजिए, बच्चे इतने गम्भीर अच्छे नही लगते..!!"
"अच्छा..! पर मम्मा तो कहती है कि पढूँगा लिखूंगा तब सिचुएशन बदलेगी, फिर तो बहुत ज्यादा वक्त लगेगा न!"
" छोड़िये ये सब! ये बताइये की आपका घूमने का मन होता है तो पापा कहीं ले नही जाते...?"
" पापा तो है ही नही न..! मैंने तो कभी पापा को देखा ही नही है!" विनाश बोला तो राज हैरानी से उसे देखने लगा, " मतलब..!!" उसके मुंह से निकला।
"मतलब पापा को तो अभी ढूंढ रहा हूँ , जो मम्मा को घुमाएंगे औऱ मुझे भी!" विनाश मासूमियत से बोला।
राज ने अब असमंजस से अपने बालों में हाथ फेरा और मन ही मन बोला, " वो कहती है कि हसबैंड इसी शहर में है, मैंने खुद देखा है, समीर ने भी देखा और इस बच्चे ने कभी पापा नही देखे....! ये कैसी पहेली है...?"
" बेबी...!! विनाश ..!!" डॉली ने अब उसे गायब देखकर आवाज दी तो विनाश ने आवाज दे दी!
" यहाँ क्या कर रहे हो..? इनसे दूर रहा करो..!" डॉली फौरन बोली।
विनाश डॉली की तरफ चला गया तो राज बोला, " आप अपनी मासी के पास जाइये विनाश ! मुझे आपकी मम्मा से बात करनी है!"
विनाश ऊपर चला गया तो डॉली भी जाने को हुई लेकिन राज ने टोक दिया, " बात करनी है आपसे.!!"
" मुझे नही करनी..!!"
" ऐसा है क्या..??"
" हां , ऐसा ही है!"
" तो बस इतना कि बात सुने बिना आपको जाने नही दूँगा!!"
डॉली ने फिर भी कदम बढ़ा दिया तो राज ने अचानक तेजी से
बढ़कर दरवाजा को धक्का दे दिया और डॉली के सामने बन्द दरवाजे से टिक गया..!!
डॉली उसे घूरने लगी तो वह जेब मे हाथ रखते हुए बोला, " पहली बात तो मुझमें कांटे नही लगे और दूसरा ये की आप हमारी आपसी टकराहट के बीच बच्चे को न घसीटे! वो बहुत छोटा है अभी!!"
" मेरे बच्चे के बारे में मैं खुद सोच सकती हूँ!"
"ऐसा है...!! तो बताओ उसे की उसका बाप कहाँ है, खुद के अरमान पूरे करती हो , सरे राह उससे लिपटती हो, और वो बच्चा खेलने की उम्र में अपने उस पापा को ढूंढता फिर रहा है, जिसे उसने कभी देखा ही नही!"
" मिस्टर शर्मा ...!! पहले भी कहा है कुछ जानते नहीं तो बोलने की जरूरत नही...!! और कोई लिपटे मुझसे आपको क्या..? आपका जी कर रहा है लिपटने का..??" डॉली अब गुस्से से बोली।
" एक और शब्द नही..!! मैं कोई ऑक्टोपस नही जो तुमसे लिपटने आऊंगा...!! और खुद की आंखों से देखा था उस रोज रोड पर उस आदमी की....!!" राज ने बात अधूरी छोड़ दी और दूसरी तरफ मुँह फेर लिया।
डॉली ने उसकी पीठ देखते हुए कहा, " मैं भी कोई बेल नही हूँ कि किसी से भी लिपटती फिरूँ..!! ठंड लगने पर भी मैं खुद ही खुद की बाहों में अपने आप को लपेट लेती हूं, किसी और से लिपटने की
जरूरत नही मुझे!! वैसे भी माँग भरते ही दिल भी भर जाता है मर्दों का, फिर तो कोई और चाहिए होती है।"
राज अब उसकी तरफ पलटा, पहली बार डॉली की आवाज में हमेशा सा उफान नही था बल्कि अजीब सी गहराई थी!
वह आगे बोली, " जहां तक बात मेरे बच्चे की है तो वो आगे जाकर सब समझने लगेगा, अभी के लिए आप इतना जान लीजिए कि मेरे पति के साथ रिश्ते पर पूर्ण विराम कब का लग चुका है...! और मैं नही चाहती कि जिंदगी के किसी भी मोड़ पर विनाश कभी भी उस आदमी को देखे या मिले..!!
उसे छोड़ दिया मैंने , जैस्मिन के साथ रहती हूं...!! छोड़ी हुई औरत या छोड़कर आयी हुई औरत समाज से दो ही चीजे हासिल करती है- तिरस्कार और बहिष्कार।
हमारी उपलब्धियों पर तालियाँ और शाबाशियाँ नही मिलती, लोगो की टटोलती नजरे मिलती है जो ये कहती हैं की हमने ये उपलब्धि अपना शरीर किसी के लिए बिछाकर पाया है!!
आपको मेरे पलटकर जवाब देने से दिक्कत होती है न तो यही वजह समझ लीजिए मेरे आपसे बहस की...! क्योंकि मैं कोई वजह नही देना चाहती कि आप मेरे करीब आयें.... या आपके मन को मैं भा जाऊँ..!"
"और आपका क्या....? अगर मैं आपको भा जाऊँ तो...!!"
"ये दिन कभी नही आएगा!!" कहते हुए डॉली दरवाजा खोलकर जाने को हुई तो राज पीछे से बोला, " सवालों से भागो मत, खुद को
निडर कहती हो न......!! लेकिन अब तुम अपने ही जज्बातों से डर रही हो, निगाह मिलाकर बात करने से डर रही हो, इसलिए भाग रही हो!
क्या लगता है तुम्हे मैं तुम्हारे काबिल नही? क्यों डरती हो मुझसे मोहब्बत होने से? मेरे मन को भाने से...??"
डॉली बिना पलटे ही बोली, " क्योंकि मेरा एकाकीपन मेरे लिए बहुत है, इसमें प्यार के लिये कोई जगह नही है।"
राज भी बोल उठा , " जो तुम्हे छोड़ गए..... या फिर जिन्हें तुम छोड़ आयी हो, उनके लिए दूसरों को और खुद को सजा क्यों देना....? जब लौटकर जाना नही है तो आगे क्यों नही बढ़ती.....? अगर दिल किसी के लिये बेकरार होता है तो होने नही देती...? किसी खास को देखकर दिल बेतहाशा जब धड़कता है तो फिर बेकाबू धड़कनों को अनदेखा कर देना सही है क्या..??"
" ऐसे अहसासों पर जाया करने के लिए वक़्त नही मेरे पास!!" डॉली बोली और बाहर निकलने को हुई तो राज बोला, " तो आप कहना चाह रही है कि आप मुझे अनदेखा करने की हैसियत रखती हैं....!!"
डॉली अब रुकी और पलटकर बोली, " मैं दिया बनकर जलना चाहती हूँ और तुम आंधी बनकर मुझे बुझाना चाहते हो...!! हर बार अपनी हैसियत का हवाला क्यों देते हो? मैं जिस भी हैसियत में जी रही हूँ, खुद जी रही हूं न...!! आपसे तो कहने नही आती कुछ!! आज भी नही कहती अगर विनाश यहां नही मिलता!! अपनी किसी भी चाह
का जिक्र आपसे तो कभी भी नही किया मैंने! आप समुद्र हो तो रहो समुद्र ,, मैं नदी बनकर ही खुश हूँ। मैं खुद से मोहब्बत करती हूँ और यही मुझे किसी के भी आगे डटकर खड़े रहने की शक्ति देता है।
"ऐसा है क्या..??"
" हाँ ! ऐसा ही है!"
" तो बस इतना कि दूसरों को भी खुद से मोहब्बत करने पर मजबूर कर उन्हें उनसे ही जुदा करने का हक नही आपको!! आप खुद ही खुद की मिसाल हैं तो दूसरों को भी उनकी मिसाल बने रहने दे, उन्हें बदलने का हक नही आपको..!!"
" मुझे ऐसा क्यों लग रहा है की ख़ुद सख्त बनकर औरों को अपने लिए फिसलने पर मजबूर करने वाला शख्स आज जब किसी पर फिसल रहा है तो शिकायत हो रही है उसे...??"
"हुँह्ह!! मुझे क्यों शिकायत होगी, तुम्हारे उस चितकबरे पति जैसा नही हूँ मैं की किसी पर भी फिसल जाऊँ!!"
डॉली ने बस एक नजर उठाकर उसे देखा औऱ बाहर जाने को हुई तो राज बोल उठा, " लेकिन एक बात याद रखना, जिस दिन भी खुद से आकर मुझसे लिपटी न , उस दिन के बाद मुझसे जमानत मुमकिन नही होगी!!"
डॉली अब फिर पलटी और निग़ाहों में देखकर बोली, " तन को तो
जबरदस्ती भी हासिल किया जा सकता है, लेकिन हमारी जिंदगी में इम्पोर्टेन्ट वो होता है जिस पर हम अपना मन वार दे!!"
वह पलटकर बाहर निकल गयी तो राज बोला, " मर्दो के प्रति तुम्हारी विरक्ति को आसक्ति में बदल दूँगा! अनमनी उदास आँखो में सुलगते चटख रंग भरूँगा और वो भी अपने अंदाज में...!!"
वह बाहर आया तो दादी से बात करती डॉली के गालों पर जुल्फों को ढलकते देखकर मन मे ख्याल आया, " क्या कोई दिन ऐसा होगा, जब जुल्फों को हटाकर उनकी जगह मेरा चेहरा ले सकेगा!!"