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Romance दो कतरे आंसू
सुषमा ने दरवाजे पर दस्तक सुनी तो कुछ झुंझलाई हुई आवाज में बोली‒ ‘क्या बात है, कौन है?’
‘ओह मम्मी डार्लिंग।’ बाहर से डॉली की आवाज आई, ‘नाश्ते को देर हो रही है और आज मेरा पहला पीरियड भी जरा जल्दी शुरू होगा।’
‘कैरी ऑन यूअर जॉब बेबी।’ सुषमा ने कहा, ‘मुझे थोड़ी देर और लगेगी।’
‘मम्मी, दीपू को भी जल्दी जाना है।’
‘तो लो जाओ, दर्शन को बोलो, ब्रेक-फास्ट लगा दे टेबल पर।’
‘ओ. के. मम्मी।’
‘और तुम दोनों ने दूध ले लिया था मॉर्निंग में?’
‘यस ममा, बोर्नविटा के साथ।’
‘ओ. के. नाऊ यूमे गो।’
बाहर डॉली ने शायद फ्लाइगं किस किया था। सुषमा अपने आप हंसकर बड़बड़ाई‒
‘नॉटी बेबी।’ फिर उसने जूली से कहा, ‘ठहरो।’
जूली के हाथ रुक गए। सुषमा उल्टी लेट गई। और जूली फिर उसके बदन पर मालिश करने लगी। सुषमा का कुन्दन जैसा बदन चन्दन मिले दूध की तरह दमक रहा था। पूरे शरीर की मालिश कराने के बाद सुषमा ने खड़ी होकर आदमकद आईने के सामने अपने शरीर का जायजा लिया। और जूली की तरफ देखकर मुस्कराकर बोली‒
‘कैसा लगता है मेरा बदन ?’
‘एकदम फेन्टास्टिक मैडम।’ जूली दाद देनेवाले लहजे में बोली, ‘अभी भी आपको कोई अट्ठारह-बीस से ज्यादा की उम्र की नहीं समझ सकता।’
सुषमा हंसने लगी। उसने फर्श पर फैले गद्दे पर लेटकर एक भारी यन्त्र अपनी टांगों पर रखवाया। फिर निश्चित समय तक उसे साईकिल की तरह चलाती रही। फिर खड़ी हुई और बुलवरकर से व्यायाम किया। फिर अपना चेहरा गौर से देखकर उसने जूली से पूछा-
‘मेरे चेहरे पर अभी ब्लीचिंग की जरूरत तो नहीं?’
‘ओह नो मैडम। अभी तो रूई की तरह मुलायम और साफ है।’
‘तो ठीक है, फिर सिर्फ मसाज कर दो।’
सुषमा एक ईजीचेयर पर पसर गई और जूूली ने ऑटोमैटिक मसाज मशीन निकालकर उसका प्लग बोर्ड में लगाया। काफी देर की मसाज के बाद सुषमा ने जूली से कहा‒
‘अब तुम बाहर जाओ, अपना काम देखो।’
जूली बाहर जाओ। सुषमा ने एक नजर अपने चेहरे पर डाली। फिर बालों की जड़ों को अच्छी तरह चैक किया, उनमें कहीं सफेदी तो नहीं झलक रही। फिर बालों की बनावट देखी और गुनगुनाती हुई, बाथरूम में चली गई।
लगभग आधे घंटे बाद जब वह बाहर निकली तो उसके बदन पर कहीं-गहरे नीले और कहीं-कहीं बादलों के रंग जैसी साड़ी और उससे मैच करता ब्लाउज उसे अप्सरा बनाए हुए थे। गले में उसी रंग के मोतियों का हार और कानों की बालियों में नीचे-नीले रंग के आंसू की बूंदों जैसी मोती लटक रहे थे। कलाई में बढ़िया चेनवाली घड़ी। पैरों में ट्रांसपैरेंट रबर के हाई हीलवाले सेन्डल, जिनमें उसके सुन्दर पैरों की बनावट और चमकीले नाखून गजब ढा रहे थे। होंठों पर ऐसी लिपस्टिक, जिसके शेड में सितारों की-सी चमक थी और होठों के उभार इतने दिलकश कि देखनेवालों के दिल धड़क उठें। आंखों की पुतलियों पर नीली कॉन्टेक्ट लैंस थी, जिनसे चेहरे पर खूबसूरती और भी बढ़ गई थी।
बाहर आकर उसने जूली को पुकारा, जूली जल्दी से कई तरह के फलों का मिक्स रस-भरा गिलास और एक प्लेट में सूखे मेवे ले आई। सुषमा ने सूखे मेवे खा कर जूस पिया और एक बार अच्छी तरह उसने अपने शरीर पर खुशबू का छिड़काव किया और फिर बोली‒
‘अच्छा जूली, मैं चलती हूं।’
‘यस मैडम, मगर मिक्सर-ग्राइण्डर का ख्याल रखिएगा।’
‘मुझे याद है, उसमें कोई खराबी हो गई है।’
‘आप कहें तो मरम्मत के लिए दे आऊं?’
‘ओह नो, मैं आजकल में नया ले आऊंगी। उसे डिस्पोज ऑफ करेंगे।’
‘ओ. के. मैडम।’
सुषमा अपने छोटे-से फ्लैट के दरवाजे से बाहर निकली। फ्लैट के आगे एक छोटा-सा बगीचा भी था और इतनी जगह भी थी कि वहां दो तीन गाड़ियां आसानी से पार्क की जा सकती थीं। बरामदे में लाल रंग की सेंडोज कार खड़ी थी। सुषमा ने उसमें सवार होते हुए पूछा‒
‘बेबी की गाड़ी रात को साफ कर दी थीं?’
‘यम मैडम।’
‘और दीपू का स्कूटर?’
‘वह भी साफ कर दिया था, मैडम।’
‘कल इतवार है। शायद मैं भूल जाऊं। आज गैराज टेलीफोन कर देना, कल मैकेनिक दोनों गाड़ियां ले जाकर एक्सल वगैरह से चमका दें।’
‘ओ. के. मैडम।’
सुषमा ने कुछ और निर्देश जूली को दिए और गाड़ी स्टार्ट कर दी। बड़ी सावधानी से गेट सरका और कार कंपाउण्ड से निकल आई। थोड़ी देर बाद उसकी गाड़ी बड़ी शान से सड़क पर दौड़ रही थी। उसकी आंखों पर नीला गॉगल चढ़ा हुआ था। वह जिधर से भी गुजरती लोगों की नजरें उसकी ओर ही उठ जातीं। मगर वह ऐसे लापरवाही से सामने देखती रहती, जैसे उसे किसी को भी परवाह न हो। थोड़ी देर बाद उसकी स्टैन्डर्ड एक फर्म के कंपाउंड में दाखिल हुई, जिसके ऊपर बड़ा-सा बोर्ड लगा था, ‘सावित्री एडवरटाइजिंग एजेंसी।’
सुषमा ने दरवाजे पर दस्तक सुनी तो कुछ झुंझलाई हुई आवाज में बोली‒ ‘क्या बात है, कौन है?’
‘ओह मम्मी डार्लिंग।’ बाहर से डॉली की आवाज आई, ‘नाश्ते को देर हो रही है और आज मेरा पहला पीरियड भी जरा जल्दी शुरू होगा।’
‘कैरी ऑन यूअर जॉब बेबी।’ सुषमा ने कहा, ‘मुझे थोड़ी देर और लगेगी।’
‘मम्मी, दीपू को भी जल्दी जाना है।’
‘तो लो जाओ, दर्शन को बोलो, ब्रेक-फास्ट लगा दे टेबल पर।’
‘ओ. के. मम्मी।’
‘और तुम दोनों ने दूध ले लिया था मॉर्निंग में?’
‘यस ममा, बोर्नविटा के साथ।’
‘ओ. के. नाऊ यूमे गो।’
बाहर डॉली ने शायद फ्लाइगं किस किया था। सुषमा अपने आप हंसकर बड़बड़ाई‒
‘नॉटी बेबी।’ फिर उसने जूली से कहा, ‘ठहरो।’
जूली के हाथ रुक गए। सुषमा उल्टी लेट गई। और जूली फिर उसके बदन पर मालिश करने लगी। सुषमा का कुन्दन जैसा बदन चन्दन मिले दूध की तरह दमक रहा था। पूरे शरीर की मालिश कराने के बाद सुषमा ने खड़ी होकर आदमकद आईने के सामने अपने शरीर का जायजा लिया। और जूली की तरफ देखकर मुस्कराकर बोली‒
‘कैसा लगता है मेरा बदन ?’
‘एकदम फेन्टास्टिक मैडम।’ जूली दाद देनेवाले लहजे में बोली, ‘अभी भी आपको कोई अट्ठारह-बीस से ज्यादा की उम्र की नहीं समझ सकता।’
सुषमा हंसने लगी। उसने फर्श पर फैले गद्दे पर लेटकर एक भारी यन्त्र अपनी टांगों पर रखवाया। फिर निश्चित समय तक उसे साईकिल की तरह चलाती रही। फिर खड़ी हुई और बुलवरकर से व्यायाम किया। फिर अपना चेहरा गौर से देखकर उसने जूली से पूछा-
‘मेरे चेहरे पर अभी ब्लीचिंग की जरूरत तो नहीं?’
‘ओह नो मैडम। अभी तो रूई की तरह मुलायम और साफ है।’
‘तो ठीक है, फिर सिर्फ मसाज कर दो।’
सुषमा एक ईजीचेयर पर पसर गई और जूूली ने ऑटोमैटिक मसाज मशीन निकालकर उसका प्लग बोर्ड में लगाया। काफी देर की मसाज के बाद सुषमा ने जूली से कहा‒
‘अब तुम बाहर जाओ, अपना काम देखो।’
जूली बाहर जाओ। सुषमा ने एक नजर अपने चेहरे पर डाली। फिर बालों की जड़ों को अच्छी तरह चैक किया, उनमें कहीं सफेदी तो नहीं झलक रही। फिर बालों की बनावट देखी और गुनगुनाती हुई, बाथरूम में चली गई।
लगभग आधे घंटे बाद जब वह बाहर निकली तो उसके बदन पर कहीं-गहरे नीले और कहीं-कहीं बादलों के रंग जैसी साड़ी और उससे मैच करता ब्लाउज उसे अप्सरा बनाए हुए थे। गले में उसी रंग के मोतियों का हार और कानों की बालियों में नीचे-नीले रंग के आंसू की बूंदों जैसी मोती लटक रहे थे। कलाई में बढ़िया चेनवाली घड़ी। पैरों में ट्रांसपैरेंट रबर के हाई हीलवाले सेन्डल, जिनमें उसके सुन्दर पैरों की बनावट और चमकीले नाखून गजब ढा रहे थे। होंठों पर ऐसी लिपस्टिक, जिसके शेड में सितारों की-सी चमक थी और होठों के उभार इतने दिलकश कि देखनेवालों के दिल धड़क उठें। आंखों की पुतलियों पर नीली कॉन्टेक्ट लैंस थी, जिनसे चेहरे पर खूबसूरती और भी बढ़ गई थी।
बाहर आकर उसने जूली को पुकारा, जूली जल्दी से कई तरह के फलों का मिक्स रस-भरा गिलास और एक प्लेट में सूखे मेवे ले आई। सुषमा ने सूखे मेवे खा कर जूस पिया और एक बार अच्छी तरह उसने अपने शरीर पर खुशबू का छिड़काव किया और फिर बोली‒
‘अच्छा जूली, मैं चलती हूं।’
‘यस मैडम, मगर मिक्सर-ग्राइण्डर का ख्याल रखिएगा।’
‘मुझे याद है, उसमें कोई खराबी हो गई है।’
‘आप कहें तो मरम्मत के लिए दे आऊं?’
‘ओह नो, मैं आजकल में नया ले आऊंगी। उसे डिस्पोज ऑफ करेंगे।’
‘ओ. के. मैडम।’
सुषमा अपने छोटे-से फ्लैट के दरवाजे से बाहर निकली। फ्लैट के आगे एक छोटा-सा बगीचा भी था और इतनी जगह भी थी कि वहां दो तीन गाड़ियां आसानी से पार्क की जा सकती थीं। बरामदे में लाल रंग की सेंडोज कार खड़ी थी। सुषमा ने उसमें सवार होते हुए पूछा‒
‘बेबी की गाड़ी रात को साफ कर दी थीं?’
‘यम मैडम।’
‘और दीपू का स्कूटर?’
‘वह भी साफ कर दिया था, मैडम।’
‘कल इतवार है। शायद मैं भूल जाऊं। आज गैराज टेलीफोन कर देना, कल मैकेनिक दोनों गाड़ियां ले जाकर एक्सल वगैरह से चमका दें।’
‘ओ. के. मैडम।’
सुषमा ने कुछ और निर्देश जूली को दिए और गाड़ी स्टार्ट कर दी। बड़ी सावधानी से गेट सरका और कार कंपाउण्ड से निकल आई। थोड़ी देर बाद उसकी गाड़ी बड़ी शान से सड़क पर दौड़ रही थी। उसकी आंखों पर नीला गॉगल चढ़ा हुआ था। वह जिधर से भी गुजरती लोगों की नजरें उसकी ओर ही उठ जातीं। मगर वह ऐसे लापरवाही से सामने देखती रहती, जैसे उसे किसी को भी परवाह न हो। थोड़ी देर बाद उसकी स्टैन्डर्ड एक फर्म के कंपाउंड में दाखिल हुई, जिसके ऊपर बड़ा-सा बोर्ड लगा था, ‘सावित्री एडवरटाइजिंग एजेंसी।’