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Romance दो कतरे आंसू

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Romance दो कतरे आंसू

सुषमा ने दरवाजे पर दस्तक सुनी तो कुछ झुंझलाई हुई आवाज में बोली‒ ‘क्या बात है, कौन है?’

‘ओह मम्मी डार्लिंग।’ बाहर से डॉली की आवाज आई, ‘नाश्ते को देर हो रही है और आज मेरा पहला पीरियड भी जरा जल्दी शुरू होगा।’

‘कैरी ऑन यूअर जॉब बेबी।’ सुषमा ने कहा, ‘मुझे थोड़ी देर और लगेगी।’

‘मम्मी, दीपू को भी जल्दी जाना है।’

‘तो लो जाओ, दर्शन को बोलो, ब्रेक-फास्ट लगा दे टेबल पर।’

‘ओ. के. मम्मी।’

‘और तुम दोनों ने दूध ले लिया था मॉर्निंग में?’

‘यस ममा, बोर्नविटा के साथ।’

‘ओ. के. नाऊ यूमे गो।’

बाहर डॉली ने शायद फ्लाइगं किस किया था। सुषमा अपने आप हंसकर बड़बड़ाई‒

‘नॉटी बेबी।’ फिर उसने जूली से कहा, ‘ठहरो।’

जूली के हाथ रुक गए। सुषमा उल्टी लेट गई। और जूली फिर उसके बदन पर मालिश करने लगी। सुषमा का कुन्दन जैसा बदन चन्दन मिले दूध की तरह दमक रहा था। पूरे शरीर की मालिश कराने के बाद सुषमा ने खड़ी होकर आदमकद आईने के सामने अपने शरीर का जायजा लिया। और जूली की तरफ देखकर मुस्कराकर बोली‒

‘कैसा लगता है मेरा बदन ?’

‘एकदम फेन्टास्टिक मैडम।’ जूली दाद देनेवाले लहजे में बोली, ‘अभी भी आपको कोई अट्ठारह-बीस से ज्यादा की उम्र की नहीं समझ सकता।’

सुषमा हंसने लगी। उसने फर्श पर फैले गद्दे पर लेटकर एक भारी यन्त्र अपनी टांगों पर रखवाया। फिर निश्चित समय तक उसे साईकिल की तरह चलाती रही। फिर खड़ी हुई और बुलवरकर से व्यायाम किया। फिर अपना चेहरा गौर से देखकर उसने जूली से पूछा-

‘मेरे चेहरे पर अभी ब्लीचिंग की जरूरत तो नहीं?’

‘ओह नो मैडम। अभी तो रूई की तरह मुलायम और साफ है।’

‘तो ठीक है, फिर सिर्फ मसाज कर दो।’

सुषमा एक ईजीचेयर पर पसर गई और जूूली ने ऑटोमैटिक मसाज मशीन निकालकर उसका प्लग बोर्ड में लगाया। काफी देर की मसाज के बाद सुषमा ने जूली से कहा‒

‘अब तुम बाहर जाओ, अपना काम देखो।’

जूली बाहर जाओ। सुषमा ने एक नजर अपने चेहरे पर डाली। फिर बालों की जड़ों को अच्छी तरह चैक किया, उनमें कहीं सफेदी तो नहीं झलक रही। फिर बालों की बनावट देखी और गुनगुनाती हुई, बाथरूम में चली गई।

लगभग आधे घंटे बाद जब वह बाहर निकली तो उसके बदन पर कहीं-गहरे नीले और कहीं-कहीं बादलों के रंग जैसी साड़ी और उससे मैच करता ब्लाउज उसे अप्सरा बनाए हुए थे। गले में उसी रंग के मोतियों का हार और कानों की बालियों में नीचे-नीले रंग के आंसू की बूंदों जैसी मोती लटक रहे थे। कलाई में बढ़िया चेनवाली घड़ी। पैरों में ट्रांसपैरेंट रबर के हाई हीलवाले सेन्डल, जिनमें उसके सुन्दर पैरों की बनावट और चमकीले नाखून गजब ढा रहे थे। होंठों पर ऐसी लिपस्टिक, जिसके शेड में सितारों की-सी चमक थी और होठों के उभार इतने दिलकश कि देखनेवालों के दिल धड़क उठें। आंखों की पुतलियों पर नीली कॉन्टेक्ट लैंस थी, जिनसे चेहरे पर खूबसूरती और भी बढ़ गई थी।

बाहर आकर उसने जूली को पुकारा, जूली जल्दी से कई तरह के फलों का मिक्स रस-भरा गिलास और एक प्लेट में सूखे मेवे ले आई। सुषमा ने सूखे मेवे खा कर जूस पिया और एक बार अच्छी तरह उसने अपने शरीर पर खुशबू का छिड़काव किया और फिर बोली‒

‘अच्छा जूली, मैं चलती हूं।’

‘यस मैडम, मगर मिक्सर-ग्राइण्डर का ख्याल रखिएगा।’

‘मुझे याद है, उसमें कोई खराबी हो गई है।’

‘आप कहें तो मरम्मत के लिए दे आऊं?’

‘ओह नो, मैं आजकल में नया ले आऊंगी। उसे डिस्पोज ऑफ करेंगे।’

‘ओ. के. मैडम।’

सुषमा अपने छोटे-से फ्लैट के दरवाजे से बाहर निकली। फ्लैट के आगे एक छोटा-सा बगीचा भी था और इतनी जगह भी थी कि वहां दो तीन गाड़ियां आसानी से पार्क की जा सकती थीं। बरामदे में लाल रंग की सेंडोज कार खड़ी थी। सुषमा ने उसमें सवार होते हुए पूछा‒

‘बेबी की गाड़ी रात को साफ कर दी थीं?’

‘यम मैडम।’

‘और दीपू का स्कूटर?’

‘वह भी साफ कर दिया था, मैडम।’

‘कल इतवार है। शायद मैं भूल जाऊं। आज गैराज टेलीफोन कर देना, कल मैकेनिक दोनों गाड़ियां ले जाकर एक्सल वगैरह से चमका दें।’

‘ओ. के. मैडम।’

सुषमा ने कुछ और निर्देश जूली को दिए और गाड़ी स्टार्ट कर दी। बड़ी सावधानी से गेट सरका और कार कंपाउण्ड से निकल आई। थोड़ी देर बाद उसकी गाड़ी बड़ी शान से सड़क पर दौड़ रही थी। उसकी आंखों पर नीला गॉगल चढ़ा हुआ था। वह जिधर से भी गुजरती लोगों की नजरें उसकी ओर ही उठ जातीं। मगर वह ऐसे लापरवाही से सामने देखती रहती, जैसे उसे किसी को भी परवाह न हो। थोड़ी देर बाद उसकी स्टैन्डर्ड एक फर्म के कंपाउंड में दाखिल हुई, जिसके ऊपर बड़ा-सा बोर्ड लगा था, ‘सावित्री एडवरटाइजिंग एजेंसी।’
 
दरबान ने सुषमा को देखते ही सैल्यूट किया। उसने बड़ी अदा से चलते हुए, सिर के हल्के-से झटकेे से उसे जवाब दिया। गाड़ी पार्किंग में खड़ी कर दी। फिर जब वह बड़ी सम्भल-सम्भल कर चलती हुई इमारत के दरवाजे तक पहुंची तो वहां खड़े चौकीदार ने सलाम करते हुए बड़ी जल्दी-से दरवाजा खोला ओर सुषमा बिना किसी की तरफ देखे, बड़ी शान से खट-खट करती हुई हॉल से गुजरने लगी। वह जिधर से गुजरती उधर ही देखनेवालों की नजरें उठ जाती। फिर वह एक केबिन के सामने पहुंची ही थी कि किसी ने जल्दी से दरवाजा खोला और वह केबिन के अन्दर चली गई। हॉल में बैठे हुए स्टाफ के लोगों ने एक-दूसरे की तरफ अर्थ पूर्ण नजरों से देखा और एक नौजवान ने टाई की गिरह दुरुस्त करते हुए, बराबर वाले क्लर्क से सरगोशी की‒

‘हाय, क्या जालिम चीज है, कमबख्त!’

‘सर से पांव तक कयामत है, कयामत।’

‘मगर घमण्ड भी तो किल्योपेट्रा जैसा है।’

‘हां यार, नजरें तक उठाकर नहीं देखती। दो साल से इस आशा को दिल में छिपाए हुए बैठा हूं।’

तभी उन दोनों के पीछे बैठे हुए हेडक्लर्क विश्वनाथ खांसे और दोनों ने चौंककर देखा। विश्वनाथ ने ठंडी सांस लेकर कहा, ‘यहां पंद्रह वर्ष से दिल में हसरत लिए बैठे हैं।’

‘पन्द्रह वर्ष!’ नए क्लर्क ने हैरत से कहा।

‘पूरे पन्द्रह वर्ष।’

‘पिछले पन्द्रह वर्ष से तो बाईस और चौबीस के दरम्यान ही चल रही है।’

‘तुम लोग खुद ही हिसाब लगा लो।’

‘नामुमकिन, चालीस वर्ष की औरत और इतनी कम उम्र नजर आए।’

‘मैंने यह कब कहा है कि मेरी बात पर विश्वास करो।’ विश्वनाथ ने ठंडी सांस लेकर कहा, ‘अभी तो तुमने भी अगले पन्द्रह वर्ष यहीं गुजारने हैं।’

फिर वह अपने रजिस्टर पर झुक गए। दूसरी तरफ सुषमा ने अपनी रिवाल्विंग चेयर पर बैठकर, गॉगल उतारकर मेज पर रखा ही था कि इन्टरकाम पर आवाज आई‒

‘मिस सुषमा वर्मा।’

‘यस बॉस।’

‘थोड़ी तकलीफ कीजिए’

‘यस सर।’

सुषमा ने पर्स से छोटा-सा आईना निकालकर अपना मेकअप दुरुस्त किया। फिर उठी और अपने केबिन से निकलकर बॉस के केबिन की तरफ बढ़ी। फिर उसने जल्दी-से दरवाजा खोला ओर सुषमा मुस्कराती हुई बोली।

‘मैं अन्दर आ सकती हूं, सर?’

‘यस, कम इन प्लीज।’

सुषमा अन्दर दाखिल हुई। दरवाजा बन्द हो गया।

एक बहुत खूबसूरत सजे हुए ऑफिस में ऊंचे तकिए की रिवाल्विंग चेयर पर एक अधेड़ उम्र का आदमी बैठा था। उसने बदन पर बेहद बढ़िया कपड़े का सूट था और उसकी दायीं तरफ एक बूढ़ा आदमी बैठा था। वह भी सूटेड-बूटेड था। सिगार पी रहा था। सिगार वाले ने सुषमा की तरफ देखा और अजनबी की तरफ इशारा करके बोला, ‘मीट मिस्टर काम्बले, मैनेजर ऑफ रूपमति गारमेंट्स।’ फिर उसने काम्बले की तरफ इशारा करके कहा, ‘मिस सुषमा वर्मा। मेरी पर्सनल सेक्रेटरी भी है और हमारी कंपनी की सबसे खूबसूरत मॉडल थी।’

‘प्लीज्ड टू सी यू।’ सुषमा अपने दिलकश अंदाज में मुस्कराई।

‘मी टू।’ काम्बले ने सुषमा की और भरपूर नजरों से देखते हुए कहा। सुषमा सिगार वाले के कहने पर सामने खाली कुर्सी पर एक खास स्टाइल बनाती हुई बैठ गई। काम्बले ने सिगारवाले से कहा‒‘बिल्कुल ठीक कहा था आपने, यह हमारे एडवरटाइजमेंट के लिए बिल्कुल फिट रहेंगी।’

‘फिट रहना ही चाहिए मिस्टर काम्बले। मिस सुषमा की उम्र अभी बाईस से कुछ ही महीने आगे है। उन्होंने शादी भी नहीं की और अपने आपको मेंटेन करके भी रखा हुआ है।

‘नाइस।’ काम्बले ने कहा।

‘मिस सुषमा।’ सिगार वाले ने सुषमा से कहा, ‘मिस्टर काम्बले रूपमति गारमेंट्स के मैनेजर हैं। यह लोग एक नए डिजाइन की ब्रेजियर और पेंटी निकाल रहे हैं। उसी की एडवरटाइजिंग फिल्म बनाने के लिए इन्होंने हमें निकाल दिया है। उसके लिए मैंने आपके नाम का प्रस्ताव रखा था।’

‘थैंक्स।’ सुषमा ने कहा, ‘यह मेरी खुशनसीबी है कि मिस्टर काम्बले ने भी मुझे ओ. के. कर दिया।’

‘ओह, नो मिस सुषमा, यह तो हमारी फर्म की खुशनसीबी है कि आपके जैसी फिगर मिल गई। इस फिगर के साथ तो हमारे दोनों आइटम एकदम चल निकलेंगे।



थोड़ी-सी औपचारिक बातचीत के बाद सिगारवाले ने कहा‒

‘ठीक है, मिसेज सुषमा वर्मा। प्लीज वेट फॉर माई कन्फॉर्मेशन। शायद हम लोग यह फिल्म आज रात को ही होटल होराइजन के स्विमिंग पूल पर शूट करेंगे।

‘ओ. के. सर।’ सुषमा एक खास अंदाज से उठी ओर जब काम्बले से हाथ मिलाले लगी तो काम्बले जैसे उत्तेजना से हड़बड़ाकर खड़ा हो गयां सुषमा के होंठों पर एक कातिलाना मुस्कराहट फैल गई और बड़े इत्मीनान से केबिन से बाहर निकल आई।

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सावित्री एडवरटाइजिंग के मालिक घनश्याम की कार सड़क पर दौड़ रही थी एक एयरकन्डीशन्ड कार थीं जिसे एक वर्दीवाला ड्राइवर ड्राइव कर रहा था। पिछली सीट पर घनश्याम और सुषमा बैठे थे और घनश्याम कह रहा था, ‘एक्चुअली इट इज वन्डर, आपने अपनी फिगर को क्या मेन्टेन करके रखा है!’

‘थैंक्स सर।’ सुषमा ने मुस्कराकर कहा, ‘अगर मैं शादी कर लेती तो शायद इस तरह अपने आपको मेन्टेन न कर पाती।’

‘यू. आर. एब्सल्यूटली राइट।’

थोड़ी देर बाद गाड़ी होराइजन के गेट पर खड़ी थी। दरबान ने जल्दी-से उतरकर दरवाजा खोला। तब सुषमा उतरी और दूसरे क्षण पार्किंग में खड़ी हुई लाल स्पोर्टिंग कार को खड़े देखकर उसे लगा जैसे उसके पैरों के नीचे से जमीन निकल गई हो। डॉली भी वहां मौजूद थी। कहीं उसने मुझे देख लिया और मम्मी कह कर सम्बोधित कर लिया तो सारा किया धरा मिट्टी में मिल जाएगा। पलक झपकते ही मेरा रूप एक ऐसी मां का-सा हो जाएगा जिसकी लड़की सोलह-सत्रह वर्ष की जवान हो। लेकिन सुषमा ने चेहरे पर जरा सी भी घबराहट नहीं झलकने दी। वे दोनों आगे बढ़े। घनश्याम ने दरवाजा खोला और दोनों अन्दर दाखिल हो गए।’

‘क्या हमारा स्टाफ यहां पहुंच चुका है?’ सुषमा ने पूछा।

‘कभी का। अब तक तो वे लोग कैमरा और लाइटिंग भी सैट कर चुके होंगे।’ तभी हॉल में बैठे मिस्टर काम्बले ने उठकर उन दोनों का स्वागत किया।

‘हाय मिस वर्मा, हाय मिस्टर घनश्याम।’

‘हाय!’ सुषमा ने मुस्कुराकर कहा, ‘आप यहां क्यों बैठे हैं? क्या अन्दर टेबल बुक नहीं थी?’

‘टेबल बुक है।’ काम्बले ने कहा, ‘मैं तो आप लोगों के स्वागत के लिए यहां बैठा था।’

‘ओह थैंक्स।’ सुषमा ने कहा, फिर घनश्याम से बोली, ‘क्यों न कास्ट्यूम बदलने से पहले एक पैग ले लिया जाए।’

‘ओह! श्योर‒श्योर‒आपको पानी में उतरना है।’

फिर वे लोग बॉररूम की तरफ बढ़े ही थे कि अचानक एक लिफ्ट नीचे आकर रुकी। उसका दरवाजा खुला तो डॉली लाल जींस और लाल जैकेट में एक मॉडर्न और नीले लिबास वाले लड़के के साथ बाहर निकली। ऐन उसी वक्त उसकी निगाहें सुषमा पर पड़ीं, लेकिन सुषमा फुर्ती से झुककर अपनी एक आंख मसलने लगी। काम्बले ने जल्दी से पूछा‒

‘क्या हुआ मिस सुषमा?’

‘ओह, मेरी आंख में कोई कीड़ा घुस गया।’

सुषमा वहीं सोफे पर बैठकर धीरे-धीरे आंख मलने लगी। और उसने देखा कि डॉली चुपके-चुपके उस लड़के के साथ बाहर के दरवाजे की तरफ खिसक रही थी। शायद उसने सुषमा को देख लिया था। सुषमा ने दिल में थैंक्स गॉड कहा और आंख खोलकर उठती हुई बोली‒

‘अब ठीक है।’

फिर वे तीनों बॉर में घुस गये। काम्बले बड़े शाही अंदाज में आगे-आगे चल रहा था, और सुषमा घनश्याम के साथ धीरे-धीरे चल रही थी। बार-काउंटर के गिर्द स्टूलों पर बैठकर तीनों ने तीन लाल पैग मंगवाए और धीरे-धीरे चुस्कियां लेने लगे। सुषमा बड़े तरीके से, बड़े अंदाज में एक हल्का-सा कहकहा लगाती काम्बले उससे ज्यादा बेतकल्लुफ न होने पाए। और न आत्म सम्मान में कमी हो। वह घनश्याम से ज्यादा सम्बोधित होती और काम्बले के दांत खुले रहते थे। सुषमा की कल्पना में बार-बार डॉली के साथ वाले छोकरे की छवि घूम जाती थी। वह क्यों था, कौन था? दोनों, उस होटल में क्या कर रहे थे और ऊपर क्यों गए थे?

इतने में घनश्याम के मैनेजर ने आकर बड़े सम्मान से कहा‒

‘सर, सारा इन्तजाम हो गया।’

‘आप चलिए, हम आते हैं।’

‘मैनेजर चला गया। काम्बले ने बड़ी बेचैनी से कलाई घड़ी देखी और दांत निकालकर बोला‒

‘मिस्टर घनश्याम, दरअसल शूटिंग की बुकिंग दस बजे तक है।’

‘ओह डोंट माइंड, मिस्टर काम्बले। मैं मैनेजर कपूर से कह दूंगी’

‘थैंक्स सर।’

सुषमा ने बातों की रफ्तार कुछ और कम कर दी थी। वह जानती थी कि किस अवसर पर अपना महत्व कैसे बढ़ाया जा सकता है। एक पैग लेने के बाद सुषमा अच्छे खासे मूड में आ गई थीं। वह एक अंदाज के साथ ड्रेसिंग रूम में गई। कास्ट्यूम पहनकर उसने आईने में अपने शरीर का जायजा लिया तो स्वयं उसका जी चाहा कि घण्टों अपना सुन्दर शरीर देखती रहे। फिर उसे इस बात का गर्व होने लगा कि जब उसे अपना शरीर खुद अच्छा लगता है तो दूसरों की क्या हालत होती होगी देखकर।

फिर थोड़ी देर बाद कंधों पर गाउन डाले हुए बाहर निकली। घनश्याम और काम्बले उसके साथ-साथ चल रहे थे। काम्बले का अंदाज बिल्कुल गुलामों जैसा था। जब वे लोग लोकेशन पर पहुंचे तो वहां सैकड़ों लोग मौजूद थे, जिन्होंने सुषमा को देखकर जोर-जोर से तालियां बजाई। फिर सुषमा पर एक स्पॉट लाइट पड़ी। वह मदहोश अंदाज में मुस्कराकर लोगों को विश करती हुई आगे बढ़ रही थी। लोग प्रशंसा के वाक्य एक-दूसरे की तरफ फेंकते रहे।

सीढ़ियां चढ़कर सुषमा ऊपर पहुंची। उसने एक खास अंदाज में चारों तरफ देखा, मगर किसी को देख न सकी क्योंकि स्पॉट लाइट उस पर पड़ रही थी। अब चारों तरफ से ताकतवर रोशनी रिफ्लेक्स द्वारा उस पर पड़ रही थी। ऐसा लगता था कि जैसे सचमुच उसका बदन चन्दन और सोने का बनाकर उस पर दूध और मलाई की मालिश कर दी गई हो। बारीक लबादे में उसका बदन उसी तरह झिलमिला रहा था। दर्शक बेचैन थे कि कब उसके जिस्म से यह गॉउन हटे।

कम्पनी का डायरेक्टर माइक पर सुषमा को निर्देशन दे रहा था कि ऊपर बने हुए निशानों के अनुसार सुषमा को कहां से चलकर कहां पहुंचना है और फिर किस अंदाज में दोनों हाथों को हवा में उठाकर ड्राइव लगानी है। कई बार निर्देश मिलने के बाद सुषमा ने अचानक अपने शरीर से गाउन उतारकर हवा में उछाल दिया। तालियों और प्रशंसा के वाक्यों का एक जोरदार तूफान उठा।
 
फिर सुषमा ऊपर बने हुए निशानों के हिसाब से चलती हुई किनारे तक आई और फिर डायरेक्टर के निर्देश के अनुसार उसने हवा में हाथ ऊपर उठाए और पानी में डाइव लगाई और दूर तक पानी में चली गई। फिर थोड़ी देर बाद वह पानी से उभरी और सीढ़ियां चढ़ती हुई ऊपर आई। अब कैमरा उसे बिल्कुल निकट से देख रहा था। उसके सिर के ऊपर आई। अब कैमरा उसे बिल्कुल निकट से देख रहा था। उसके सिर के ऊपर माइक टंगा हुआ था जो कैमरे की आंख से दूर था। उसके सुनहरे बदन पर पानी की बूंदें ऐसे लग रही थीं जैसे किसी ने सुनहरी चादर पर मोती बिछा दिए हों। उसने बड़े ही कातिल अंदाज से गर्दन को एक झटका दिया और फिर उसके चेहरे पर एक बहुत की दिलकश और दिलफरेब मुस्कराहट फैल गई।

‘वाह, रूपमति गारमैंट्स की ब्रेजियर और पेंटी कितनी कम्फर्टेबल होती है। मैं तो हमेशा रूपमति गारमैंट्स की ब्रेजियर और पेंटी इस्तेमाल करती हूं।’

‘कट एण्ड ओ. के.।’ डायरेक्टर की आवाज आई।

फिर अचानक ही तालियां का एक जोरदार शोर उभरा। किसी कर्मचारी ने जल्दी से गाउन लाकर दिया। सुषमा शरीर को गाउन से ढक कर घनश्याम और काम्बले के बीच बड़े ही प्रभावशाली अंदाज से चलती हुई ड्रेसिंगरूम की तरफ बढ़ गई।

बारॅरूम में अब सुषमा, काम्बले और घनश्याम दूसरा पैग ले रहे थे। काम्बले सुषमा के जिस्म को ऐसे घूर रहा था जैसे कोई बच्चा अपनी पसन्द की चीज पर लार टपका रहा हो। घनश्याम की निगाहें भी सुषमा के शरीर का बार-बार जायजा लेती थी। सुषमा सिर्फ धीरे से मुस्करा देती थी, मगर उसकी भवें इस तरह तनी हुई थीं कि घनश्याम या काम्बले की यह हिम्मत न हुई कि कुछ कह सकें।

सुषमा ने दूसरे पैग से ज्यादा नहीं लिया। काम्बले तीसरा पैग लेने के बाद अपने आपको कंट्रोल से बाहर महसूस करते हुए उठ खड़ा हुआ। लेकिन घनश्याम चौथे पैग पर भी जमा हुआ था। चौथे पैग के बाद दोनों बाहर आ गए। और भी कई नौजवानों की निगाहें सुषमा को ललचाई नजरों से देख रही थी। लेकिन उसकी तनी हुई भवें और माथे के तेवर देखकर किसी की भी हिम्मत नहीं थीं कि उसकी तरफ बढ़ आए।

डांसफ्लोर पर जोड़े नृत्य कर रह थे। घनश्याम दास ने अपने दोनों हाथ फैला दिए और सुषमा बड़ी ही दिलकश मुस्कराहट के साथ उसकी बांहों में आकर डांस-फ्लोर पर चली गई। दर्जनों नौजवान दिल हसरत से धड़कते रह गए। डांसफ्लोर पर कदम-से-कदम मिलाते हुए, चार पैग पी जानेवाले घनश्याम में शायद कुछ ज्यादा ही हिम्मत पैदा हो गई थी। उसने सुषमा की कमर और हाथ को बड़ी मजबूती से पकड़ रखा था। उसने बड़े ललचाए हुए अंदाज में कहा‒

‘मिस वर्मा, आज तो आप बहुत सुन्दर लग रही हैं।’

‘मिस्टर घनश्याम, मेरी कमर और हाथ नर्म खाल रखते हैं। हड्डियों की चुभन बर्दाश्त नहीं कर सकते।’

‘आई एम सॉरी, मिस वर्मा।’ घनश्याम ने जल्दी से पकड़ ढीली की और बोला‒‘मैं दरअसल रिक्वेस्ट करना चाहता था।’

‘यह याद रखते हुए कि मैं डिनर सिर्फ अपने घर में लेती हूं।’

‘मिस वर्मा, आप जानती हैं, मेरी एडवरटाइजिंग फर्म भारत की सबसे बड़ी और मशहूर फर्म है। और हम सबसे ज्यादा पेमेंट आपको ही देते हैं। बतौर प्राइवेट सेक्रेटरी पांच हजार रुपया महीना और मॉडल गर्ल की हैसियत से प्रत्येक का दस हजार रुपये।’

‘मिस्टर घनश्यामदास, इस शहर में आपकी कम्पनी से छोटी भी एक कम्पनी हैं और उसके मैनेजिंग डायरेक्टर का कहना है कि अगर मैं उसकी फर्म में चली आऊं तो आपकी फर्म चन्द महीनों से ही कई साल पीछे रह जाएगी। आप जो कुछ मुझे देते हैं उससे दुगनी उनकी ऑफर है। बगैर किसी डिनर की ऑफर के।’

‘आप यह मत भूलिए कि सावित्री एडवरटाइजिंग ने ही आपको इतनी जबर्दस्त शोहरत दी है और सफलता दी हैं।

‘इसीलिए तो दुगनी कीमत को भी ठुकरा चुकी हूं। मगर सावित्री एडवरटाइजर्स क्यों है? घनश्यामदास एडवरटाइजर्स क्यों नहीं?

‘सावित्री मेरी स्वर्गीय पत्नी का नाम है, जिसकी याद में फर्म का नाम रखा है।’

‘और उसकी याद में ही दूसरी औरतों को डिनर पर बुलाते रहते हैं?’ सुषमा ने व्यंग्य भरी मुस्कराहट के साथ कहा।

‘देखिए, यह मेरा निजी मामला है।’

‘मिस्टर घनश्यामदास, जहां मामला सिर्फ औरत और मर्द के बीच आ जाता है, वहां बात निजी नहीं रहती।’

‘क्या तुमने जिन्दगी भर शादी न करने का फैसला कर लिया है?’

‘मेरी आपसे इतनी बेतकल्लुफी तो नहीं।’

‘सॉरी, तुम की जगह आप समझो।’

‘यह मामला औरत और मर्द के बीच का नहीं, इसलिए यह सवाल नितान्त निजी है और मैं यह नापसन्द करती हूं कि कोई गैर-आदमी मेरे निजी मामलों में दखल दे।’

‘मैं इस दखल की माफी चाहते हुए एक ऑफर कर सकता हूं?’

‘मैं जानती हूं, आप क्या ऑफर करेंगे। सुषमा तल्ख मुस्कराहट के साथ बोली, ‘आप अपनी एडवरटाइजिंग कम्पनी का नाम सावित्री एडवरटाइजिंग रखना चाहते हैं।’

‘यह एक नैतिक, कानूनी और इन्सानी समझौता है।’

‘अगर मैं यह समझौता न कर सकूं तो?’

‘किसी भी फैसले पर पहुंचने के लिए इतनी जल्दी नहीं करनी चाहिए।’

‘जो फैसला बरसों पहले ही चुका हो, उसे जल्दबाजी का नतीजा नहीं कहा जा सकता।’

‘लगता है किसी ने तुम्हारा दिल तोड़ दिया है।’

‘अभी आपसे निवेदन कर चुका हूं कि हम लोगों में बेतकल्लुफी नहीं है।’

‘आई एम सॉरी।’

‘कल सुबह मैं अपना इस्तीफा भेज दूं, मेरा दस हजार का चेक तैयार मिलेगा?’

‘मर्द किसी फैसले में इतने जल्दबाज नहीं होते।’ घनश्यामदास मुस्कराया।

‘थैंक्स।’ सुषमा ने कहा, ‘मैं अब घर जाना चाहती हूं।’

इतने में डांस का राउण्ड खत्म हुआ तो वे लोग बाहर निकले। एक सूटेड-बूटेड आदमी ने सुषमा के पास जाकर कहा, ‘मिस वर्मा, आपसे आयरन किंग श्री पाण्डुरंग चन्द मिनट का समय चाहते हैं।’

‘आई एम सॉरी, मैं काफी एग्जास्ट हो चुकी हूं। सुषमा बिना रुके आगे बढ़ती हुई बोली।

‘मिस वर्मा!’ एक दूसरे आदमी ने उसका रास्ता रोका, ‘मैं आपका इन्टरव्यू लेना चाहता हूं। देश के सबसे बड़े मैगजीन ग्रुप के लिए।’

‘सॉरी मिस्टर, भारत की सारी जनता अब तक मुझे अच्छी तरह पहचान चुकी है।’

सुषमा और घनश्याम बाहर आये। सुषमा ने पूछा, ‘आपने मेरी गाड़ी मंगवा ली थी?’

‘मंगवा ली थी, लेकिन आप एग्जॉस्ट फील कर रही हैं तो मैं आपको अपनी गाड़ी में छोड़ आऊं?’

‘मैं अपने घर किसी को भी ले जाना पसन्द नहीं करती।’

घनश्याम के एक नौकर से चाबी लेकर सुषमा अपनी गाड़ी की ओर बढ़ गई। फिर वह कार का दरवाजा खोल रही थी कि अचानक एक बेहद अपटूडेट सूटेड-बूटेड शख्स पाइप हाथ में लिए सामने आ गया और बड़ी सभ्यता से बोला।

‘दखलंदाजी की माफी चाहता हूं।’

‘हुक्म फरमाइए!’

‘मेरा नाम रजनीकांत नागेश है।’

‘फिर?’

‘क्या आपने यह नाम कभी सुना है?’

‘शायद सुना हो। कभी-कभी स्मरण शक्ति भी तो साथ नहीं देती।’ मुझे स्टार मेकर कहते हैं। इस वर्ष पहले मैंने एक फ्लाप हीरों महेंदर को अपनी फिल्म ‘गर्ज’ में लिया था और वह शेर भी गर्जता हुआ सारी फिल्मी दुनिया में छा गया। तब मैंने महेश को दोबारा लेना चाहा तो उसने इसलिए इन्कार कर दिया कि मैं फ्लाप डायरेक्टर था, क्योंकि गर्ज के बाद मेरी कुछ फिल्में फ्लाप हो गई थीं। तब मैंने उसकी जगह फिर एक फ्लाप न्यू कमर रतन छत्रपति को लिया और फिल्म ‘रक्षा’ बनाई। आज मेरी फिल्म ‘रक्षा’ गोल्डन जुबली की तरफ बढ़ रही है। और रतन छत्रपति आज टॉप का हीरो बन चुका है।’

‘शायद आप इस फिल्म का जिक्र कर रहे हैं, जिसके बड़े पोस्टरों पर एक बड़े फिल्मी राइटर सतीश नीलकण्ठ का नाम आता है।’

‘जी हां, वही-वही।’

‘हालांकि उसका असली राइटर वसराज है। आपकी फिल्म ‘गर्ज’ एक मशहूर इन्टरनेशनल फिल्म की नकल पर हिट हुई थी। आपकी फिल्म रक्षा भी कहानी पर हिट हुई है, इसलिए रतन छत्रपति को आपने नहीं, कहानी और उसकी प्रतिभा ने स्टार बनाया और आपने कहानी का क्रेडिट इसलिए सतीश नीलकण्ठ को दे दिया कि वह फिल्मी दुनिया में बड़ा नाम रखता है। आप फिल्में बनाते हैं या इसकी टोपी उसके सिर पर रखते हैं?’

‘ओह!’ रजनीकान्त मुस्कराकर नर्म लहजे में बोला, ‘आप तो नाराज हो गई मैडम, मैं तो‒।’
 
‘मैं सीमा का इन्टरव्यू पढ़ चुकी हूं। आप उसे अपनी फिल्म में लेना चाहते थे। उसने कहा कि वह आपके टाइप की फिल्मों को पसन्द नहीं करती। लोग कहते हैं कि चेहरे पर सीमा के चेहरे की झलक है। शायद आप इसलिए मेरे द्वारा सीमा को डाउन करना चाहते हैं।’

‘करेक्ट! मैं आपको एक ही फिल्म में एक करोड़ की हीरोइन बना दूंगा।’

‘मिस्टर रजनीकान्त कोई किसी को कुछ नहीं बनाता। वरना आज पन्द्रह लाख रुपये पानेवाला हीरो प्रताप लखन भी तो आपके साथ काम कर चुका है। आपने उसकी किस्मत क्यों नहीं चमकाई? क्योंकि उस फिल्म में न कहानी थी न प्रताप लखन के लिए कहानी का स्कोप।’

फिर वह गाड़ी में बैठने लगी तो रजनीकान्त ने कहा, ‘अरे, सुनिए तो मैडम।’ \

‘माफ कीजिए, मुझे हीरोइन बनने का शोक नहीं।’

फिर उसकी गाड़ी तेजी से बढ़ती चली गई और रजनीकान्त भौंचक्का-सा आंखें फाड़े गाड़ी का पिछला रोशनियां देखता रह गया।

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सुषमा को गाड़ी फ्लैट के कम्पाउंड में दाखिल हुई। उसने देखा, पूरे साढ़े दस बज चुके थे। सुषमा ने गाड़ी रोकी। आगे डॉली की स्पोर्ट्स कार भी खड़ी हुई थी और दीपू का स्कूटर थी। अन्दर बत्ती जल रही थी। सुषमा गाड़ी खड़ी करके, बरामदे में बढ़ी तो फौरन दरवाजा खुल गया। दरवाजा खोलने वाली जूली थी। जो उसे देखकर बड़ी ही चिंतापूर्ण अंदाज में मुस्कराई।

‘बच्चे कहां हैं?’ सुषमा ने पूछा।

‘डायनिंग रूम में। सब आपकी राह देख रहे हैं।’

‘तुम खाना गर्म करो, मैं अभी हाथ धोकर आती हूं।’

थोड़ी देर बाद जब सुषमा डाइनिंग रूम में दाखिल हुई तो ग्यारह बारह साल का दीपू डाइनिंग टेबल पर सिर टिकाए सो रहा था और डॉली कुर्सी से पीठ लगाए ऊंघ रही थी। सुषमा के दिल में ममता की एक गहरी भावना उभरीं और उसने बढ़कर दीपू के सिर पर हाथ फेरा। दीपू हड़बड़ाकर जागा और सीधा बैठता हुआ बोला‒

‘हाय मम्मी!’

दीपू की आवाज से डॉली भी जाग गई थी। वह भी जल्दी से हड़बड़ाकर उठते हुई बोली‒

‘हाय, मम्मी डार्लिंग!’

‘हाय।’ सुषमा बोली, ‘आई एम सॉरी...आज में काफी लेट हो गई।’

‘ओह डोंट माइंड मम्मी! भला हम लोग आपके बगैर डिनर ले सकते हैं! चाहे पूरी रात ही क्यों न गुजर जाए।’

‘नहीं मेरे बच्चो। तुम्हें आगे कभी सारी रात अपनी मम्मी के इंतजार में नहीं गुजारनी पड़ेगी। जब तक हम तीनों एक जगह हैं, तुम दोनों भी डिनर नहीं खाओगे और मैं भी डिनर तुम्हारे साथ लूंगी।’

‘क्यों डॉली बेटी ठीक है ना?’

‘ओह, यस एब्सल्यूटली ऑल राइट।’

फिर जूली ने खाना लगा दिया और वे लोग खाने लगे मगर जाने क्यों डॉली कुछ सहमी-सहमी सी थी। खाते-खाते वह इस तरह बार-बार अपनी मम्मी की तरफ देखने लगती थी जैसे सुषमा ने उसकी कोई चोरी पकड़ी तो नहीं। मगर सुषमा इस तरह खाने में व्यस्त थी, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

यह देखकर डॉली के चेहरे पर इत्मीनान झलकने लगा था।

खाने के बाद ब्रश करके सुषमा अपने रूम में आ गई। मगर उसने अपने रूम का दरवाजा खुला रखा। थोड़ी देर बाद जब जूली उसके कमरे के बाहर से गुजरी तो उसने जुली को बुलाया।

‘यस मैडम।’

‘डॉली को मेरे पास भेज दो।’

‘यस मेम साहब।’

जूली चली गई। सुषमा ने थोड़ी-सी रुई निकाली और एन फ्रेंच क्लीनिजिंग मिल्क में डुबो कर चेहरे और हाथों पर मलने लगी। कुछ क्षण बाद डॉली अन्दर दाखिल हुई। वह काफी सहमी-सहमी-सी थी। चेहरा पीला हो गया था। सुषमा ने आईने में उसकी परछाई देखकर कहा‒

‘आओ-आओ बेटी, झिझक क्यों रही हो?’

‘ओह, नो मम्मी डार्लिंग।’

सुषमा मुस्कराकर डॉली की तरफ मुड़ी और बोली‒

‘अब तुम काफी बड़ी हो गई हो। कद में तो लगभग मेरे ही बराबर हो।’

‘जी नहीं‒नहीं तो।’

‘खैर, तुम एस. एस. सी. पास कर रही हो। यह इंसान की उम्र की वह सरहद होती है, जिससे निकलकर इंसान के पास आधी उम्र रह जाती हैं। इस उम्र में इंसान हालांकि अपना अच्छा बुरा सोचना खुद भी जान जाता है फिर भी अगर उसे कोई रहनुमा मिल जाए तो वह अच्छा ही होता है।’

‘मम्मी!’ डॉली नजरें झुकाकर बोली, ‘आप शायद उस लड़के के बारे में बात कर रही हैं। मुझे विश्वास था कि आपने उसे देख लिया था मेरे साथ।’

‘बहुत सुन्दर लड़का है। स्मार्ट और मॉडर्न भी।’ सुषमा मित्रतापूर्ण अंदाज में डॉली के कंधे पर हाथ रख कर बोली।

‘सुदर्शन कुमार लोहिया।’

‘गुड, क्या बैकग्राऊंड है उसका?’

‘आयरन किंग पाण्डुरंग लोहिया का इकलौता बेटा है?’
 
सुषमा ने एक ठंडी और लम्बी सांस ली ओर बोली‒

‘तुमने मुझे देखकर यह तो नहीं बताया कि मैं तुम्हारी कौन हूं।’

‘जी नहीं। मैं कभी किसी को यह नहीं बताती।’

‘एक्सीलैंट। अच्छा, वह तुम से प्यार करता है?’

‘कहता तो यही है।’

‘और तुम?’

‘मुझे भी अच्छा लगता है।’

‘तुम दोनों की जोड़ी भी अच्छी रहेगी। शादी करना चाहता है वह तुमसे?’

‘कहता है, शादी करूंगा तो तुझसे, वरना कुंवारा ही मर जाऊंगा।’

‘गुड ! अच्छा एक बात और।’

‘जी!’

‘हां बेटी! यह बात मैं इसलिए कह रही हूं कि इस दुनिया में मेरे लिये सिर्फ तुम और दीपू और तुम्हारे लिए मैं और दीपू और दीपू के लिए मैं और तुम। सिर्फ हम तीनों ही एक-दूसरे के लिए अच्छी बात सोच सकते हैं और एक-दूसरे को अच्छी तरह सलाह दे सकते हैं। मेरी बात समझ गई तुम?’

‘जी समझ गई।’

‘कल वह तुम्हें ऊपर क्यों ले गया था?’

डॉली का चेहरा पीला पड़ गया और होंठ कांप गए। सुषमा ने प्यार से उसके कन्धे को थपका और बोली‒

‘देखों, मैं इस समय तुम्हारी मम्मी भी हूं और दोस्त भी। दोस्त से झूठ कभी मत बोलना, क्योंकि कभी कोई छोटा-सा झूठ भी बहुत बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है। मैं तुमसे वादा करती हूं कि तुम्हें दकियानूसी मम्मी बनकर नहीं दोस्ती बनकर सलाह दूंगी।’

डॉली के होंठ सिर्फ हिलकर रह गए।

‘देखिए, उसने रूम बुक कर लिया था।’

‘कितनी देर के लिए?’

‘यों तो रात-भर के लिए बुक कराया था। लेकिन हमारा सिर्फ दो घंटे रुकने का प्रोग्राम था।’

‘तुम कितनी देर रुकी थी, रूम में?’

‘सिर्फ दो मिनट।’

और सुषमा को लगा जैसे उसके सिर से एक बड़ा बोझ उतर गया और बोली, ‘सिर्फ दो मिनट क्यों?’

‘पता नहीं, उसने कुछ ऐसी हरकत शुरू कर दी थी कि मैं डर गई और मैं धोखे से निकल कर भाग आई।’

‘अब तुम उससे कब मिलोगी?’

‘जी, कालेज में तो कल मिलेंगे ही।’

‘वह तुमसे नाराज तो नहीं हो गया?’

‘शायद नाराज हो, क्योंकि उस समय उस पर पागलपन सवार था।’

‘ठीक है, कल तुम उससे माफी मांगना और कहना तुम उसे जुहू बीच पर मिलोगी और कहना होराइजन की बजाए किसी छोटे होटल का इंतजाम करो।’

‘मगर मम्म...!’

‘बेटी, यह मैं तुम्हें एक दोस्त की तरह सलाह दे रही हूं। और तुम जुहू-बीच पर उसे शाम को आठ बजे मिलने का टाइम देना। अजन्ता पैलेस में आकर किसी केबिन में बैठ जाना।’ \

‘मगर मम्मी...?’

‘नाऊ गो एंड स्लीप साउंडली। सुषमा ने उसका कन्धा थपकते हुए कहा, ‘एंड डोंट वरी।’

फिर सुषमा ने उसके गाल पर किस किया और डॉली उलझी-उलझी-सी चली गई। सुषमा बाथरूम की तरफ बढ़ गई।

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सुषमा ने कलाई घड़ी देखी। ठीक आठ बजे थे। उसने गाड़ी पार्क की और इधर-उधर नजर दौड़ाई। उसके अनुमान और प्लान के अनुसार एक काली ऑस्टन के बोनट से पीठ टिकाए सुदर्शन खड़ा था। वह बड़ी बेचैनी से पहले बदल-बदलकर हर आने जानेवाली लड़की को देख रहा था। सुषमा ने सुदर्शन को उसी जगह इन्तजार करने के लिए रुकवाया था।

सुषमा ने कार में बैठे-बैठे ही शैम्पेन की बोतल से एक लम्बा घूंट भरा और फिर नीचे उतर आई। इस समय वह गहरी नीली साड़ी में थी। नीले ही सेन्डल पहले थी। ब्लाउच इतना ऊंचा था कि उसका पेट काफी ऊंचाई तक खुला था। और उसमें शरीर से इन्टीमेट और बरोट की मिजीजुली खुशबू उठ रही थी।

वह कुछ लड़खड़ाती हुई-सी सुदर्शन की कार के पास से गुजरने गली। कार के नजदीक पहुंचकर वह इस तरह लड़खड़ायी जैसे गिरनेवाली हो और उसके रुकने के लिए जल्दी से कार के बोनट का सहारा लिया और गले से बड़ी हल्की-सी सुरीली चीख निकाली।

सुदर्शन ने झपटकर उसे बाजू से पकड़कर सम्भालते हुए कहा, ‘सम्भल कर मिस, सम्भल कर।’

सुषमा के चिकने संगमरमरी बाजू खुले हुए थे। सुदर्शन ने जैसे ही उन्हें हाथ लगाया उसके बदन में बिजली-सा करेन्ट दौड़ गया था। सुषमा ने बड़ी मुश्किल से सम्भालने की कोशिश की और लड़खड़ाती जबान में बोली‒‘थैैंक्स, मिस्टर मिस्टर...सुदर्शन।

‘वेलकम मिस।’ सुदर्शन उसे गौर से देखकर’ बोला और फिर चौंक कर उछल पड़ा।

‘ओह, आप तो मिस वर्मा हैं, सुषमा वर्मा।’

‘बहुत खूब! तुमने इतने नशे में भी पहचान लिया।’

‘नशे में मैं नहीं आप हैं।’ सुदर्शन जल्दी से बोला।

‘यानी तुम नशा करते ही नहीं?’

‘नशा!’ सुदर्शन जल्दी से बोला, ‘जी करता हूं, मगर मगर‒।’

‘मगर मेरे साथ एतराज है कुछ?’

‘एतराज!’ सुदर्शन हाथ मलता हुआ बोला, ‘मैं बौखलाहट में कुछ सोच ही नहीं पा रहा, मैं कोई सपना देख रहा हूं या यह सच है।’

‘कैसा सपना, कैसा सच!’

‘अरे इतनी मशहूर, हजारों दिलों की महबूब कलाकर और कहां, ‘लगता है, तुम्हें किसी का इन्तजार है?’

‘इन्तजार।’ सुदर्शन झपटकर उसके पास आता हुआ बोला।

‘ओह नो, मुझे किसी का इन्तजार नहीं, लेकिन लगता है आपको किसी की तलाश कर जरूर है।’

‘हां मुझे किसी की तलाश है।’

‘भला आपका इन्तजार करने वालों को भी कमी है इस दुनिया में।’

‘कमी है, एक ऐसे आदमी की जो चेक देकर मुझे डिनर पर इन्वायट न करे।’

‘क्या मतलब?’

‘डार्लिंग।’ सुषमा ने सुदर्शन के गले में बांहें डालकर झूमते हुए कहा।

‘चेक तो नहीं दोगे?

‘अरे कैश भी नहीं।’

‘कमरे और डिनर का बिल भी मैं ही दूंगी।’

‘आपकी खुशी में ही मेरी खुशी है।’

‘तो चलो मुझे यहां से ले चलो।’
 
सुदर्शन ने इधर-उधर ऐसे देखा जैसे उसे डर हो कि डॉली न आ जाए। वह सुषमा को उसकी गाड़ी तक लाया। दोनों गाड़ी में सवार हुए। सुदर्शन ने खुद स्टीयरिंग सम्भाला और पूछा, ‘किधर चलें, होराइजन?’

‘नहीं, वहां सब जानने वाले मिल जाते हैं।’

‘फिर जहां आप कहें।’

‘अजन्ता पैलेस।’

सुदर्शन ने तेजी से गाड़ी घुमाई और अजन्ता पैलेस की ओर मोड़ दी। कुछ देर बाद गाड़ी पैलेस के कम्पाउंड में प्रविष्ट हो रही थी। कम्पाउंड में गाड़ी रोककर, सुदर्शन सीढ़ियां चढ़ा और पहले से ही बुक एक कमरे की तरफ बढ़ा तो एक कोने से डॉली झांककर देख रही थी। जिसकी आंखें भीगी हुई थीं और होंठ भिंचे हुए थे। जब सुदर्शन सुषमा के साथ रूम में दाखिल हो गया तो डॉली तेजी से पीछे मुड़कर सीढ़ियां उतरने लगी। वह बड़ी मुश्किल से अपने आंसू रोक रही थी।

कमरे में पहुंचकर सुषमा ने सुदर्शन के गले बांहें में डाल दीं और सिसक-सिसककर रोने लगी। सुदर्शन बौखलाकर बोला, ‘अरे, अरे, यह क्या कर रही हैं आप?’

‘सुदर्शन डार्लिंग, लोग मुझे जीतने की कोशिश करते हैं, मगर मेरा दिल जीतने की कोशिश कोई नहीं करता। मेरे पास लाखों रुपए हैं, फिर भी लोग मुझे लाखों की ऑफर करते हैं, एक रात गुजारने के लिए। लेकिन मैं जो हर वक्त शराब में डूबी रहती हूं। हर समय शरीर के कपड़े उतारे स्विमिंग-पुल में तैरती रहती हूं, फिर भी प्यासी हूं। मेरी आत्मा प्यासी है।’

‘डार्लिंग, डार्लिंग मैं तुम्हारी आत्मा की प्यास बुझाऊंगा।’ सुदर्शन ने सुषमा को चिपटाते हुए कहा।

‘सच डार्लिंग?’

‘हां, मैं तुम्हारे अधूरे सपने पूरे करूंगा। मैं‒मैं तुमसे शादी करूंगा।’

‘शादी!’ सुषमा खुश होकर बोली, ‘तुम मुझसे शादी करोगे?’

‘हां डार्लिंग, तुमसे शादी करनेवाला तो दुनिया का सबसे खुशनसीब आदमी होगा।’

‘तो तुम सचमुच मुझसे शादी करोगे?’

‘तुम आयरन किंग पाण्डुरंग लोहिया के बेटे हो ना?’

‘हां अरबपति बाप का बेटा।’

सुषमा कहकहे लगाने लगी। जैसे वह पागल हो गई हो। सुदर्शन उसे देखता रहा। फिर उसके कन्धे हिलाकर बोला‒

‘क्या हो गया है तुम्हें, डार्लिंग? क्या तुम्हें मुझ पर शक है? आयरन किंग का इकलौता बेटा हूं और भविष्य का आयरन किंग हूं।’

‘तो तुम मुझे आयरन किंग की बहू बनाओगे?’

‘बिल्कुल।’

‘हालांकि कल ही रात वह मुझे तुम्हारी मां बनाने के लिए खरीद रह थे।’

‘सुषमा!’

मगर-सुषमा जवाब में सिर्फ कहकहे लगाती रही। सुदर्शन ने गुस्से से मुट्ठियां भींचकर, गर्राती हुई आवाज में कहा‒

‘मैं, मैं नहीं समझता था कि मेरा बाप इतना नीच निकलेगा।’ फिर उसने सुषमा के कन्धे पकड़कर कहा, ‘मगर तुम चिन्ता मत करो। मैं तुम्हारे प्यार के लिए अपने बाप से भी बगावत करूंगा। चाहे मुझे उसकी दौलत को भी लात मारनी पड़े। मगर आज तो मेरी बन जाओ, मुझे विश्वास दिला दो कि तुम केवल मेरी हो।’ सुदर्शन ने सुषमा को चिपटाकर उसके होंठ चूमने चाहे, मगर सुषमा ने झटके से उसे पीछे धकेल दिया। सुदर्शन इतनी जोर से पीछे हटा कि मेज से टकराकर गिरते-गिरते बचा। हैरानी से बोला, क्या हुआ डार्लिंग?’

‘बको मत।’ सुषमा झूमती हुई बोली, ‘तुम्हारा नाम सुदर्शन लोहिया है। तुम्हारे बाप का नाम पाण्डुरंग लोहिया है जो मुझे सुदर्शन की मां बनाना चाहता है। और तुम दोनों सिर्फ मेरी एक-एक रात हासिल करना चाहते हो।’

‘यह-यह आप क्या कह रही हैं?’

‘सुदर्शन बेटे।’ सुषमा ने आराम से कहा, ‘जरा अपनी शक्ल आईने में देखो। तुम्हारे मुंह से अभी दूध की बू आती है। यह होटल अजन्ता पैलेस है। इसमें तुम्हारे बाप के जाननेवाले भी बहुत होंगे और मुझे तो सारा भारत जानता है। और अगर मैं इसी वक्त शोर मचा दूं कि तुमने मुझे पिलाई और घर पहुंचाने का धोखा देकर यहां ले आए तो तुम्हारी क्या इज्जत रह जाएगी?’

‘जी?’

‘अगर मैं बाहर निकलकर यहां के वेटरों से कह दूं तो वे यह सोचे बगैर कि तुम आयरन किंग के बेटे हो, तुम्हें जूते मार-मारकर नंगा करके यहां से निकालेंगे। जिस तरह तुम्हारा बाप और तुम मेरे दीवाने हो, उसी तरह इस होटल के बैरे भी दीवाने हैं।’

‘मगर...’

‘और फिर कल ही किसी बहुत बड़े, देश के, मशहूर अखबार के रिपोर्टर की बुलाकर इन्टरव्यू छपवां दूं कि एक मॉडल गर्ल से बाप और बेटे...दोनों का इश्क। तब क्या होगा?’

‘नहीं नहीं! सुदर्शन थूक निगलकर बोला, ‘आप ऐसा नहीं कर सकती। मैं आपके आगे हाथ जोड़ता हूं।’

‘नाऊ गेटअप एण्ड गेट आऊट।’

सुदर्शन इस तरह वहां से निकलकर भागा जैसे थोड़ी-सी देर भी उसके लिए मौत बन सकती थी। फिर सुषमा ने अपने पर्स में रखे छोटे-से-टेप-रिकार्डर का स्विच ऑफ कर दिया जिसमें उसने अपने और सुदर्शन के सारे डायलॉग भर लिए थे।

थोड़ी देर बाद वह बड़े आराम से काउंटर पर खड़ी, रूम का बिल और किराया अदा कर रही थी। काउंटर क्लर्क सहमा-सा उसे देख रहा था।

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सुषमा ने कार बाहर रोकी। उसी वक्त दरवाजा खुल गया। सुषमा के सामने जूली खड़ी थी। उसने जूली से पूछा‒

‘डॉली आ गई?’

‘यस मेम साहब, पता नहीं, क्या हुआ बेबी को।’

‘क्या हुआ?’

‘बस रोए जा रही है।’

‘दीपू कहां है?’

‘थक-हारकर, चुप कराते-कराते अपने रूम में जाकर सो गया।’

‘ठीक है, तुम जाओ। आराम करो।’

‘मगर बात क्या है, मैम साहब?’

‘जूली तुम अपने काम से काम रखो।’

जूली चली गई। सुषमा डॉली के कमरे में आई तो डॉली बिस्तर पर औंधी लेटी हुई थी और तकिए में सिर छिपाए रो रही थी। सुषमा ने उसे सम्बोधित नहीं किया बस चुपचाप, टेप निकाला और उसका ‘स्विच’ ऑन कर दिया। जैसे ही टेप पर सुषमा और सुदर्शन के डायलॉग शुरू हुए, डॉली उछलकर बैठ गयी। सुषमा के होंठों पर अजीब-सी मुस्कराहट खेल रही थी। डॉली की आंखें सुर्ख थीं। पपोटे सूजे हुए थे और सांस तेज-तेज चल रही थी। वह कुछ देर तक डायलॉग सुनती रही। फिर अचानक उठी और टेप को उठाकर जोर से एक तरफ फेंक दिया। मगर सुषमा ने फुर्ती से उसे लपक लिया। उसका स्विच बन्द किया और मुस्कराकर बोली‒

‘देखा तुमने, डॉली रोकर उसके कंधे से लग गई। ‘मुझे सुदर्शन से ऐसी उम्मीद नहीं थी।’

‘बेटी, यह तो पहला सुदर्शन है। अभी तुम्हें इस उम्र में, इस छोटी-बड़ी उम्र के न जाने कितने सुदर्शन मिलेंगे। इसलिए एक सुदर्शन को दोष देने की जरूरत नहीं।’

‘क्या सब मर्द ऐसे ही होते हैं?’

‘नहीं बेटी, पांचों अंगुलियां बराबर नहीं होती। कहीं हालात बुरे, कहीं उम्र भी गलत होती है, कहीं कोई लालच तो कहीं भावनाओं का बहाव और कहीं-कहीं आदमी खुद अपने आप भी बुरा हो जाता है, चाहे वह मर्द हो या औरत। आदमी वह है जो कोयले की खान में रहे और उसके कपड़े भी काले न हों।’

‘मम्मी, तुमने सचमुच मुझे डूबने से बचा लिया।’

यकायक ऐसा लगा जैसी सुषमा के गले में गोला-सा आकर अटक गया हो।

उसने चुपचाप डॉली को गले से लगा लिया। उसकी आंखों से आंसुओं के दो कतरे ढुलककर डॉली के बालों में गिरे। और उसके कानों में जैसे एक मर्द की आवाज गूंजने लगी‒

‘मत जाओ, सुषमा। भगवान के लिए वहां मत जाओ।’ तुम पागल हो गए हो। कल अगर मैं नहीं गई तो हमारा सब कुछ तबाह हो जाएगा। मैं तुम्हें किसी कीमत पर नहीं जाने दूंगा, सुषमा।’

‘क्या अधिकार है, मुझे रोकने का?’

‘कोई अधिकार नहीं।’ जैसे बहुत सारे शीशे झनझनाकर टूटकर ढुलकते हुए आंसुओं के कतरे समुद्र बन गए थे, जिन्हें वह आज तक तैर कर पार नहीं कर पाई थी।

तभी क्लॉक ने रात के ग्यारह के घंटे और सुषमा चौंककर अलग हुई। जल्दी-जल्दी आंखें पोंछने लगी। डॉली ने हैरत से पूछा‒

‘मां तुम रो रही हो?’

‘मैं और यह आंसू। सुषमा मुस्कराई।’ बेटी यही तो दुनिया का वह खजाना है, जिसकी दुनिया की दौलत भी अदा नहीं कर सकती। आंसू की एक बूंद की कीमत लाखों कहकहों से नहीं चुकाई जा सकती, क्योंकि आंसू जहां गम के साथी हैं, वहां खुशी के भी साथी हैं। मेरे लिए इससे बड़ी खुशी क्या होगी कि मैंने गलत रास्ते पर पड़ते हुए तेरे कदम रोक लिए, जिस पर चलकर तेरा न जाने क्या अंजाम होता। मगर हां, दुनिया के हर मर्द को सुदर्शन मत समझ लेना, जिस तरह लाखों सीपियों में से किसी एक सीपी में मोती निकल आता है, उसी तरह हर औरत के जीवन में एक ऐसा मर्द जरूर आता है। बस, उसे पहचानने वाली नजरें चाहिए। इसलिए तुम अपने जीवन के बारे में कोई भी आखिरी फैसला करते हुए, अपनी मम्मी से मम्मी समझकर नहीं दोस्त समझकर सलाह जरूर लेना।’

फिर उसने डॉली को पीठ ठोकी और बोली‒

‘जाओ बेटी, सो जाओ, बहुत रात हो गई।’

फिर वह पलटकर दरवाजे से बाहर निकली। डॉली उस दरवाजे को देखती रही जिससे सुषमा निकल कर गई थी। आज जाने क्यों उसे सुषमा पर इतना प्यार आया था कि उसका जी चाह रहा था कि मम्मी के पास जाकर उसके साथ बच्चों की तरह लिपटकर सोए। फिर वह बिस्तर पर लेटी तो अपने आपको ऐसा हल्का महसूस कर रही थी जैसे अभी-अभी पैदा हुई है।

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4

सुषमा अपनी विशिष्ट चाल से पर्स हाथ में लिए बाहर निकली तो दोनों बच्चों की गाड़ियां जा चुकी थीं। सुषमा ने दरवाजा खोला और अपनी गाड़ी में सवार हो गई। जूली उससे आगे जाकर फाटक खोलकर खड़ी हो गई थी और एक ओर हैरानी से देख रही थी। सुषमा की गाड़ी फाटक के पास पहुंची तो जूली ने जल्दी से कहा‒

‘ठहरिए, मेम साहब।’

‘क्या-बात है?’ सुषमा ने जल्दी से ब्रेक लगा दिए।

‘वह देखिए, उस फ्लैट के सामने पता नहीं भीड़ क्यों जमा है?’

‘होगा कुछ‒तुझे क्या। जाओ अपना काम करो।’

‘मेम साहब, कोई लम्बा चक्कर मालूम होता है। सारे पड़ोसी धीरे-धीरे जमा हो रहे हैं। जरा गौर से देखिए।’

सुषमा ने दूसरी तरफ देखा तो अच्छी-खासी भीड़ जमा होती जा रही थी और लोग भी आते जा रहे थे। ऐसी स्थिति में उसका यों लापरवाही से चले जाना भी अच्छा नहीं था। आखिर वहां एक पड़ोसी का फ्लैट था। सुषमा ने मुड़कर जूली से पूछा‒ ‘कौन लोग रहते है उस फ्लैट में?’

‘मिस्टर एण्ड मिसेज छाबड़ा।’

‘क्या करते हैं मिस्टर छाबड़ा?’

‘किसी सरकारी प्राजेक्ट में ऑफिसर हैं।’

‘और उनकी पत्नी?’

‘मिसेज आशा छाबड़ा भी नौकरी करती है।’

‘क्या नौकरी करती है?’

‘किसी गर्ल्ज स्कूल में प्रिसिंपल है।’

‘बस, दोनों ही हैं?’

‘कुछ समझ में नहीं आता।’

सुषमा ने कुछ सोचा। फिर कार से उतरती हुई बोली‒

‘मैं देखती हूं।’

सुषमा चलती हुई छाबड़ा के फ्लैट के पास पहुंची, जहां अच्छी खासी भीड़ थी। सुषमा पड़ोसियों से बहुत कम मिलती थी। उसके रख-रखाव से वह लोग प्रभावित भी रहते थे और उसे किसी बड़े घर की समझते थे। उनमें से बहुत सारे सुषमा की तरफ देखने लगे। सुषमा ने एक अधेड़ उम्र के गम्भीर व्यक्ति को सम्बोधित किया और पूछा, ‘क्या बात है जनाब?’

‘पता नहीं, क्यों उस फ्लैट से एक अजीब-सी बू आ रही है’

‘तो घरवालों से मालूम कीजिए।’

‘घरवाला ही तो कोई मौजूद नहीं है।’

‘वे शाम तक तो आ ही जाएंगे।’

‘वे लोग तो एक हफ्ते से कहीं गये हुए हैं।’

‘एक हफ्ते से?’

‘जी हां, मिस्टर छाबड़ा की मां अक्सर बीमार रहती हैं। शायद वहीं गये होंगे।’

‘नौकरानी को भी ले गये हैं?’

‘नौकरानी लोकल ही है, शायद उसे छुट्टी दे दी गई हो।’

‘यह तो गड़बड़ है, कहीं आग-वाग न लग गई हो।’ ‘

‘फिर किसे बोलें?’

‘आप खुद ही सोचिए।’

सुषमा ने भी नथुने सिकोड़कर सूंघा तो उसका जी मितला गया। बदबू बिल्कुल ऐसी थी जैसे कही बन्द रखा हुआ कच्चा मांस जल रहा हो। सुषमा के मुंह से अचानक निकला‒

‘यह तो सड़े हुए गोश्त की गन्ध लगती है।’

‘कई और लोगों का भी यही ख्याल है।’

‘मुमकिन है वे लोग किचन में गोश्त भूल गए हों।’

‘जी नहीं, ऐसा हो ही नहीं सकता।’

‘क्यों?’

‘मिस्टर एण्ड मिसेस छाबड़ा वेजिटेरियन है। मेरे यहां तो वह आते जाते थे। हम लोग मटन खाते है, लेकिन वह तो ऐसे घर का पानी भी पीना पसन्द नहीं करते थे। ऐसे गिलास में पानी पीना भी पसन्द नहीं करते थे, जिसमें पानी पीते वक्त हमारे हाथ लगे हों।’

‘कोई चूहा मर कर न सड़ गया हो?’

‘चूहे की बदबू ऐसी नहीं होती।’

‘शायद कोई बिल्ली-बिल्ली फंस कर भूख से मर गई।?’

‘मेरा फ्लैट तो पड़ोस में है, कोई बिल्ली फंस जाती तो रात को उसकी आवाज तो आती।’

‘आप ठीक कहते हैं। किसी ने कहा।

‘फिर क्या किया जाए?’

‘अब तो पुलिस ही कुछ करेगी।’

‘क्या मतलब ?’

‘हमने पुलिस को रिपोर्ट कर दी है।’

तभी गाड़ी की आवाज आई। वे लोग मुड़े तो एक पुलिस जीप रुक रही थी। किसी ने कहा‒

‘वह लो, पुलिस भी आ गई।’
 
जीप से एक सब इंस्पेक्टर और कुछ कांस्टेबल उतरे। उनकी तरफ वही अधेड़ आदमी बढ़ा और बोला‒

‘हम लोगों ने ही फोन किया था।’

‘फरमाइए, क्या मसला है?’

अधेड़ व्यक्ति ने विस्तार से बताया। सब इंस्पेक्टर ने भी सूंघकर देखा और एक आदमी से बोला‒

‘सबसे पहले किसे बू का अहसास हुआ?’

‘मैंने ही किया था। पड़ोसी हूं। रोजाना सुबह उठकर कंपाउंड में टहलता हूं। दातुन करता हूं। पहले तो अपना वहम ही समझता रहा। जब बर्दाश्त नहीं हुआ तो फिर सामने जोशी साहब को खबर की।’

सब इंस्पेक्टर ने रूमाल से पकड़कर फाटक खोला फिर कांस्टेबलों के साथ अन्दर दाखिल हो गया।

गेट के बाहर भीड़ बढ़ती जा रही थी। सुषमा भीड़ से हटकर एक तरफ खड़ी हो गयी थीं जाने क्यों उसका दिल नहीं चाह रहा था कि वास्तविकता मालूम किए बगैर वहां से चली जाए। एक अजीब सी खलबली उसके मस्तिष्क में मची हुई थी। कुछ नौजवान लड़के इस हालत में भी सुषमा के जिस्म की ओर भूखी नजरों से देख रहे थे। उनकी आंखों से साफ झलक रहा था कि वह किसी तरह सुषमा के साथ बात कर लें। लेकिन उसके तेवर देखकर किसी को यह साहस नहीं हुआ कि उसे सम्बोधित कर सके। वे लोग आपस में ही खुसर-फुसर कर रहे थे।

सब इंस्पेक्टर ने फ्लैट का चारों तरफ से जायजा लिया था। उसने और कांस्टबेलों ने अपनी-अपनी नाक पर रूमाल रखे हुए थे। इसका मतलब था कि वहां बदबू काफी तेज है। फिर सब-इंस्पेक्टर के हुक्म पर कांस्टेबलों ने दरवाजा तोड़ा। उन लोगों ने दरवाजे के हैंडल को हाथ नहीं लगाया था कि कहीं आखिरी बार दरवाजा बंद करने वाले व्यक्ति के हाथों के निशान न मिट जाएं।

दरवाजा टूटकर अंदर गिरा। फिर सब इंस्पेक्टर सिर्फ दो कांस्टेबलों के साथ सावधानी से पैर रखता हुआ अंदर गया। अंदर कमरे में बहुत तेज बदबू फैली हुई थी और उन लोगों को रूमालों के बावजूद बदबू से घुटन का अहसास हो रहा था।

इंस्पेक्टर कमरे के बीच खड़ा होकर इस बात का अंदाजा लगा रहा था कि बू कहां से आ रही है। फिर उसने बेडरूम के दरवाजेे की ओर से इशारा करके कहा‒

‘यह तो उस रूम से आ रही है।’

फिर कांस्टेबलों ने मिलकर बेडरूम का दरवाजा भी तोड़ डाला। दरवाजा टूटते ही बदबू का तेज झोंका बाहर आया। सामने ही बिस्तर पर कोई औरत चित्त लेटी हुई थी। उसकी आंखें फटी हुई थीं। मुंह भी फटा हुआ था। चेहरा भी ध्वस्त हो चुका था। बिस्तर की चादर पर खून फैला हुआ था। फर्श पर भी खून बिखरा था जो सूखकर स्याह हो चुका था।

सब इंस्पेक्टर सावधानी से पैर रखता हुआ भीतर प्रविष्ट हुआ। उसके सामने बिस्तर पर जिस औरत की लाश थी, वह निश्चय ही सुन्दर रही होगी। उसके बदन पर रात का लिबास था, मगर उसकी गर्दन धड़ से अलग रखी थी। दोनों बाजू भी जिस्म से अलग थे। एक क्षण के लिए सब इंस्पेक्टर के रोंगटे खड़े हो गए। फिर उसने इधर-उधर देखा। कार्निस पर एक तस्वीर रखी थी, जिसमें वही औरत एक खूबसूरत नौजवान के साथ बैठी थी और दोनों के शरीर दूल्हा और दुल्हन की पोशाक थी। इसका मतलब यह औरत ही घर की मालकिन है और जो नौजवान उसके साथ बैठा था, फ्लैट का मालिक होगा।

कुछ देर बाद इंस्पेक्टर बाहर आया। लोग उसकी तरफ उत्सुकता से देखने लगे। अधेड़ पड़ोसी उसकी तरफ बढ़ा और सब इंस्पेक्टर ने पूछा‒

‘यहां टेलीफोन होगा?’

‘क्यों, क्या हुआ?’

‘मुझे स्टाफ-फोटोग्राफर का बुलाना है, किसी ने मिसेज छाबड़ा का खून कर दिया है?’

‘मिसेज छाबड़ा का खून।’

कई हल्की-हल्की-सी चीखें भी गूंजी और इसके साथ ही चारों तरफ सनसनी फैल गई। सुषमा का दिल बड़े जोर-जोर से धड़क रहा था। सब इंस्पेक्टर फोन के लिए जाना ही चाहता था कि अचानक एक टैक्सी आकर फ्लैट के पास रुकी और सुषमा ने देखा उसमें छाबडा बैठा हुआ था। कई आवाजें गूंजी, ‘अरे यह तो मिस्टर छाबड़ा हैं।’

छाबड़ा ने नीचे उतरकर टैक्सी का किराया दिया और कई आदमियों ने एक साथ छाबड़ा से सम्बोधित होकर कहा। उसकी शेव बढ़ी हुई थी। कपड़ों पर भी शिकने थीं। जाने क्यों, सुषमा उसका चेहरा देखकर कांप गई।

छाबड़ा का नाम सुनकर सब इंस्पेक्टर भी चौंककर रुक गया था। वह छाबड़ा की तरफ बढ़ आया और बोला, ‘आप ही मिस्टर छाबड़ा हैं?’

‘जी हां।’ छाबड़ा ने निश्चित लहजे में जवाब दिया।

‘आप एक महीने से कहां गए हुए थे?’

‘अपनी मां के पास‒दिल्ली।’

‘क्यों, किसी खास काम से?’

‘अपने एक साल के बच्चे को पहुंचाने गया था।’

‘क्यों? सब इंस्पेक्टर ने चौंककर पूछा।

‘इसलिए कि मेरी गिरफ्तारी के बाद वह मां के आने तक किसके पास रहता।’ छाबड़ा ने लम्बी सांस लेकर कहा, ‘आपको किसी इंवेस्टीगेशन या जांच की जरूरत नहीं है ओर न ही कातिल की खोज करने की‒ अपनी पत्नी का खून मैंने की किया है।’

यह खबर पड़ोसियों पर किसी बम के धमाके की तरह गिरी। चारों तरफ ऐसा सन्नाटा छा गया, जैसे सबको सांप सूंघ गया हो। सब इंस्पेक्टर छाबड़ा से पूछ रहा था‒

‘मगर आपने यह खून क्यों और किस तरह किया?’

‘ऑफिसर।’ छाबड़ा ने ठंडी सांस लेकर कहा, ‘पति-पत्नी के रिश्ते की नींव एक विश्वास पर टिकी होती है। मगर मेरा यह तजुर्बा है कि जरूरत से ज्यादा विश्वास भी विश्वास करने वाले की मूर्खता बन जाता है। जिस पर विश्वास किया जाए, वह अवसर मिलने पर फायदा उठाने से नहीं चुकता। वैसे इस विश्वास में खुद मेरी मर्जी थी थोड़ी-सी खुदगर्जी और आजाद जिंदगी गुजारने के सपने शामिल हैं। मैं आशा से बहुत प्यार करता था। हम दोनों ने प्रेम करके शादी की थी। शादी के बाद भी एक-दूसरे के प्यार में खोए रहे जिसकी निशानी हमारा वह नन्ना-मुन्ना है, जो अब अपनी दादी के पास है। मगर मुझे अपने पिताजी का एक कथन याद आता है कि औरत घर की जन्नत होतीं है। घर की शोभा होती है। उसे अपनी दासी मत समझो। दोस्त बनाकर रखो। उसे अपने साथ घुमाओ-फिराओ। फिल्में देखो। कार्यक्रमों में भाग लो, मगर सिर्फ अपने साथ। मगर आज की दुनिया में औरतों को साथ लाकर, उनके हुस्न से आंखें सेंकने के लिए औरतों को एक नया नारा दिया है...औरतों की आजादी, औरतों मर्दों सेक कम नहीं। उसे मर्द के कंधे-से-कंधे मिलाकर काम करना चाहिए और उसे भी मर्दों की तरह तरक्की करनी चाहिए।

‘यह नारा औरतों को मर्दों ने दिया है, मगर अपने लाभ के लिए, क्योंकि औरतें उनके कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं। उनमें से हर औरत चरित्र की या खुद अपने-आप में इतनी मजबूत नहीं हो सकती कि हमेशा अपने गिर्द अपने पति के प्यार की फौलादी दीवार का हिस्सा बनी रहे। कोई क्षण कोई घटना या कोई व्यक्तित्व उसे किसी न किसी तौर पर प्रभावित न करे। चाहे थोड़े समय के लिए ही, उसके इर्द-गिर्द की दीवार टूट सकती है।

‘जब हमारी शादी हुई थी तो आशा गर्ल्स स्कूल की टीचर थी। शादी के बाद मेरी पोस्टिंग यहां बम्बई हो गई। यहां मुझे सरकार की तरफ से यह फ्लैट भी रहने को मिल गया। आने जाने के लिए गाड़ी भी मिल गई। हम दोनों जब इस फ्लैट में आए तो हमने महसूस किया कि आज जब मैं जूनियर इंजीनियर हूं तो कल इंजीनियर भी हो सकता हूं। मेरे पास फ्लैट और कार तो है, मगर फ्लैट में हैसियत के मुताबिक फर्नीचर भी होना चाहिए। आजकल जिस घर में कलर टी. वी. न हो वह कम हैसियत का समझा जाता है। वैसे ही एयर कंडीशनर, फ्रिज और प्रेशर कुकर, मिक्सर, ग्राइंडर भी होने चाहिए। फिर ड्राइंग-रूम होना, एक फ्रिज भी जरूर होना चाहिए, ताकि चीजें रखने के लिए आराम रहे और लोगों को यह भी मालूम हो कि यहां फ्रिज भी है।
 
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