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शादी का मन्त्र
भाग 1
"शर्मिला अरे कहाँ मर गई शर्मिला(शर्मिला)? कोई है घर में कि नही,दरवाजा तो सदा ही खुल्ला छोड़े रखती हो दोनों माँ बेटी।"
बुआजी शर्मिला को आवाज़ लगाती घर के भीतर दालान तक चली आई,दालान के एक ओर बने रसोईघर में शर्मिला चाय चढ़ा रही थी,उसने झट से पल्लू सर मे सजाया और बुआजी को आकर धोक दिया(प्रणाम )
बुआजी अपने लपटें मारते गोरे रंग की तरह ही आग उगलती फिरतीं थीं,नाटे से कद की बुआजी रंग रूप में भटूरे का गुन्था हुआ आटा यानी मैदा लगतीं थी,उनके चमकीले रूप ने उन्हें इस कदर गर्व से भर दिया कि अपने शरीर पे चढ़ती चर्बी की तरफ उनका कभी ध्यान ही नही गया,बढ़ते बढ़ते अब उनके पेट कमर और कूल्हों पर ऐसे टायर तैनात थे कि वो एक छोटा मोटा सा ट्रक प्रतीत होती थीं ।।
पर बुआजी में परोपकार की भावना कूट कूट कर भरी थी,किस किस के घर ब्याह के लायक लड़का लड़की मौजूद हैं,वो सूंघ के पता लगा लेती थी ,और ऐसे ऐसे रिश्ते खोज के बताती थीं कि लड़के लड़की के माता पिता अपना सर धुन लें,पर बुआजी की दबंग पर्सनैलिटी के सामने ज़बान खोलना माने महाभारत का शंखनाद करना था इसीसे सब उनके सामने चुप लगा जाते,और घर से उनके जाते ही घर की महिलायें अपने पेट से आवाज़ निकाल निकाल कर उन्हें गालियाँ देती,पर मजाल किसी की जो उनके सामने चूं भी कर दें।
शर्मिला उनके सगे भाई की पत्नि थी,पर एक तो भाई की पत्नि की वैसे ही कोई कदर नही,उसपे शर्मिला ने एक के पीछे एक दन्न से दो दो लड़कियाँ जन के हमेशा हमेशा के लिये खुद को उनके कोप का भाजन बना लिया था,बड़की तो फिर भी गोरी सुन्दर थी तो उस पे बुआ जी की नाराजगी कम रहती पर छुटन्कि!! एक तो मोटी उसपे निपट काली ,ना गेहूँई,ना सांवली ,,पूरी की पूरी काली।। अब ऐसी कन्या के ब्याह का आसमान नीला कैसे रहेगा वहाँ तो हमेशा काली बदरी छायी रहती वो भी सिर्फ गरजती हुई,बरसना तो जैसे उसने जाना ही नही ,अच्छा इतने से ही खैर हो जाती तो भी ठीक था,पर छुटंकी एक नम्बर की मुहँफट भी थी,
।। भगवान ने चुन चुन के अवगुण उसमें पिरोये थे, अपनी माँ सा सपाट सादा फीका चेहरा चपटी नाक ,पिता का घोर कृष्ण वर्ण और बुआ की जलती ज़बान और इन सब के साथ बेहिसाब मोटापा!!
कहने का तात्पर्य ये कि अगर 'जीवनसाथी डॉट कॉम ' पे छुटकी का प्रोफाइल बनाया जाये तो ये प्रोफायल 5-6सालों तक प्रीमियम मेम्बरशिप के साथ भी वहाँ अपने ,
पैर अंगद की तरह जमाये रहेगा ,बल्कि हो सकता है कि प्रोफाइल के इस अडिग,अचल व्यवहार के कारण ' जीवनसाथी' वाले छुटकी को लाइफटाईम मेम्बरशिप दे दे,वो भी बिल्कुल फ़्री .
घर की बड़ी लड़की वीणा का ब्याह हो चुका था,और अब बुआ जी की कृपादृष्टी छुटकी पर थी।।
बुआ जी नित नये तरह तरह के रंगीन सफेद काले, गोरे, अमीर ,गरीब हर तरह के रिश्तों की पोटली लिये चली आती,पर शर्मिला को उनकी इतनी कीमती पोटली में अपनी मुटल्लो के लिये कोई सजीला पसंद ही नही आता।।
"अरे शर्मिला अबकी ऐसा रिश्ता लाई हूँ,आंखे चुन्धिया जायेंगी तेरी,ये देख फोटू,लड़का सरकारी दफ्तर में काम करता है,,सारी बड़ी बड़ी फाइलें उसी की नाक के नीचे से इधर उधर होती हैं ।।"
शर्मिला ने फोटो देखी,लड़का पुराने वाले अदनान सामी को मात देता पूरा डबल डेकर बस लग रहा था।।
"हाय जिज्जी!! जे लड़का तो बहुतै मोटा है,हमरी प्रिया का क्या होगा??"
"अरे तो तुम्हरी प्रिया भी तो बस नामे की प्रिया है,लगे तो वो भी ढोल सी है,कहे दे रही हूँ शर्मिला जादा नाक भौ सिकोडोगी तो अंत में मिलेगा कोई दुहेजू तिहेजू,तब नई कहना कि जिज्जी कहाँ जाके मरूं ।"
,
"पर जिज्जी जे लड़का बिल्कुलै नही सुहा रहा का करें।"
अभी ननन्द भौजाई की गोष्ठी चाय के साथ चल ही रही थी कि शर्मिला की बड़ी लड़की वीणा भी अपने दो साल के लड़के को बेतरतीबी से खींचती घसीटती चली आई।।
"परनाम करते हैं बुआ,औ अम्मा कैसी हो?? कही कोनो बात आगे बढ़ी हमार मोटल्लो की या नही।"
"खुस रहो बिटिया!! बस तुम्हरे मुहँ मे घी सक्कर, लड़का सरकारी दफ्तर में काम करे है,ये देखो फोटू।"
"अरे वाह!! जोड़ी तो बहुत जमेगी ,दोनो डील डौल मे एक ही से हैं,देखो अम्मा अब तुम जादा ना नुकुर ना करना,हमरी मानो तो इस अक्ती ब्याह निपटा दो, एक तो जैसे तुम पूड़ी कचौड़ी खिला खिला के उसे सींच रही हो लगता है पूरा सौ किलो का कर के ही मानोगी,बुआ वैसे लड़का करता क्या है?"
"सरकारी दफ्तर में . " वीणा बड़ी बेसब्री थी,उसने बुआजी की बात आधे में ही काट दी-
"अरे बुआजी वो तो सुन लिये हम कि सरकारी दफ्तर में काम करता है,पर करता क्या है, अर्जिनवीस है,बाबू है कलेक्टर है,अरे है क्या,वो बताओ।"
,
"बिटिया वो . बहुत खांस खखार के अपने गले को बार बार साफ कर अपनी आवाज़ को जितना धीमा कर सकती थी उतना धीमा कर के फुसफुसा के कहा- चपरासी है"
जितना ही आवाज़ दबा के बुआजी ने भावी दूल्हे का पद बताया उससे दुगुनी तेज़ आवाज़ में चिल्ला कर वीणा ने उस पदनाम को दुहराया -"क्या चपरासी है!! पर चपरासी के हिसाब से कुछ जादा मोटा नही है लड़का।।।"
भावी दूल्हे की पदप्रतिष्ठा सुन शर्मिला का मन बुझ गया,आखिर वो माँ थी,और हर माँ को अपना बच्चा जान से ज्यादा प्यारा होता है . एक स्वाभाविक सी बात ये भी है कि सभी बच्चों में सबसे कमजोर बच्चा माँ का सबसे अज़ीज़ होता है,हालांकी यहाँ वो कमजोरी शारीरिक नही अपितु सामाजिक थी।।
।"अम्मा सुनो ,एक बात कहे दे रहे तुम्हें,इसे ना थोड़ा डायटिंग वाइटिँग कराओ वर्ना ऐसे ही अमजद खान,कादर खान के रिश्ते आयेंगे,तुम्हरी मुटकि भी तो टुनटुन बनती जा रही है।"
"ए दीदी तुमको इतना हमारी फिकर करने की ज़रूरत नही है,तुम उधर अपने सपूत को देखो, नाक बहा रहा है,ए गोलू इधर आओ,तुम्हारा नाक पोछ दें।"
"छुटकी तनिक अपनी ओर भी ध्यान दो,एक बात कहें,लड़के खुद भले ही ओम पूरी दिखते हों पर लड़की उन्हें कटरीना , कैफ ही चाहिये,अब भई सब की किस्मत हमारे समान थोड़े ही ना होती है, हमारी सादी(शादी) ,में तो अम्मा बाऊजी को कोई मेहनत ही नई करना पड़ा,हम तो हुआं मेला में खड़े चाट खा रहे थे,और तुम्हरे जिज्जा को हमरा चटखारे लेना ऐसा भाया कि घर रिस्ता(रिश्ता) भेज दिये, और देखो चट मंगनी पट ब्याह ।"
"और झट गोलू"कह कर प्रिया हंसने लगी।।
"हमारे जिज्जा को चश्मा भी तो कितना मोटा लगा है दीदी बेचारे दूर से जाने किसे देख हमारे घर रिश्ता भेज डाले,,खैर जिज्जा में एक खूबी तो है ,सहनशक्ती बहुत है उनमें,क्यों दीदी सही कहे ना हम।ए गोलू इधर आओ मौसी के पास ।"
बच्चे ने बडी अदा से सर हिला के मना कर दिया, और अपनी माँ से कुछ खिलाने की जिद करने लगा, उसकी जिद सुन छुटकी रसोई से कचौड़ियाँ प्लेट में सजा लाई और साथ में सोंठ की चटनी!!
कचौड़ी देख बच्चे ने गन्दा सा मुहँ बनाया और क्रीम बिस्किट पाने को मचलने लगा,उसकी माँ जो बड़ी तल्लीनता से एक बेहद रोचक विषय पर अपनी माँ और बुआ से परिचर्चा में लीन थी,इस तरह बार बार अपनी साड़ी झकझोरे जाने पे झल्ला उठी और पलट के बेटे को दो करारे हाथ जड़ दिये, जितनी ज़ोर का थप्पड़ नही था,उससे तेज़ पोंगा फाड़ कर बच्चा रो पड़ा,छुटकी ने आगे बढ़ कर उसे गोद में उठा लिया,और पवनपुत्र सी एक हाथ में भांजे और दूसरे हाथ मे कचौड़ी की तशतरी थामे वो अपने कमरे में चली गई ।।
भाग 1
"शर्मिला अरे कहाँ मर गई शर्मिला(शर्मिला)? कोई है घर में कि नही,दरवाजा तो सदा ही खुल्ला छोड़े रखती हो दोनों माँ बेटी।"
बुआजी शर्मिला को आवाज़ लगाती घर के भीतर दालान तक चली आई,दालान के एक ओर बने रसोईघर में शर्मिला चाय चढ़ा रही थी,उसने झट से पल्लू सर मे सजाया और बुआजी को आकर धोक दिया(प्रणाम )
बुआजी अपने लपटें मारते गोरे रंग की तरह ही आग उगलती फिरतीं थीं,नाटे से कद की बुआजी रंग रूप में भटूरे का गुन्था हुआ आटा यानी मैदा लगतीं थी,उनके चमकीले रूप ने उन्हें इस कदर गर्व से भर दिया कि अपने शरीर पे चढ़ती चर्बी की तरफ उनका कभी ध्यान ही नही गया,बढ़ते बढ़ते अब उनके पेट कमर और कूल्हों पर ऐसे टायर तैनात थे कि वो एक छोटा मोटा सा ट्रक प्रतीत होती थीं ।।
पर बुआजी में परोपकार की भावना कूट कूट कर भरी थी,किस किस के घर ब्याह के लायक लड़का लड़की मौजूद हैं,वो सूंघ के पता लगा लेती थी ,और ऐसे ऐसे रिश्ते खोज के बताती थीं कि लड़के लड़की के माता पिता अपना सर धुन लें,पर बुआजी की दबंग पर्सनैलिटी के सामने ज़बान खोलना माने महाभारत का शंखनाद करना था इसीसे सब उनके सामने चुप लगा जाते,और घर से उनके जाते ही घर की महिलायें अपने पेट से आवाज़ निकाल निकाल कर उन्हें गालियाँ देती,पर मजाल किसी की जो उनके सामने चूं भी कर दें।
शर्मिला उनके सगे भाई की पत्नि थी,पर एक तो भाई की पत्नि की वैसे ही कोई कदर नही,उसपे शर्मिला ने एक के पीछे एक दन्न से दो दो लड़कियाँ जन के हमेशा हमेशा के लिये खुद को उनके कोप का भाजन बना लिया था,बड़की तो फिर भी गोरी सुन्दर थी तो उस पे बुआ जी की नाराजगी कम रहती पर छुटन्कि!! एक तो मोटी उसपे निपट काली ,ना गेहूँई,ना सांवली ,,पूरी की पूरी काली।। अब ऐसी कन्या के ब्याह का आसमान नीला कैसे रहेगा वहाँ तो हमेशा काली बदरी छायी रहती वो भी सिर्फ गरजती हुई,बरसना तो जैसे उसने जाना ही नही ,अच्छा इतने से ही खैर हो जाती तो भी ठीक था,पर छुटंकी एक नम्बर की मुहँफट भी थी,
।। भगवान ने चुन चुन के अवगुण उसमें पिरोये थे, अपनी माँ सा सपाट सादा फीका चेहरा चपटी नाक ,पिता का घोर कृष्ण वर्ण और बुआ की जलती ज़बान और इन सब के साथ बेहिसाब मोटापा!!
कहने का तात्पर्य ये कि अगर 'जीवनसाथी डॉट कॉम ' पे छुटकी का प्रोफाइल बनाया जाये तो ये प्रोफायल 5-6सालों तक प्रीमियम मेम्बरशिप के साथ भी वहाँ अपने ,
पैर अंगद की तरह जमाये रहेगा ,बल्कि हो सकता है कि प्रोफाइल के इस अडिग,अचल व्यवहार के कारण ' जीवनसाथी' वाले छुटकी को लाइफटाईम मेम्बरशिप दे दे,वो भी बिल्कुल फ़्री .
घर की बड़ी लड़की वीणा का ब्याह हो चुका था,और अब बुआ जी की कृपादृष्टी छुटकी पर थी।।
बुआ जी नित नये तरह तरह के रंगीन सफेद काले, गोरे, अमीर ,गरीब हर तरह के रिश्तों की पोटली लिये चली आती,पर शर्मिला को उनकी इतनी कीमती पोटली में अपनी मुटल्लो के लिये कोई सजीला पसंद ही नही आता।।
"अरे शर्मिला अबकी ऐसा रिश्ता लाई हूँ,आंखे चुन्धिया जायेंगी तेरी,ये देख फोटू,लड़का सरकारी दफ्तर में काम करता है,,सारी बड़ी बड़ी फाइलें उसी की नाक के नीचे से इधर उधर होती हैं ।।"
शर्मिला ने फोटो देखी,लड़का पुराने वाले अदनान सामी को मात देता पूरा डबल डेकर बस लग रहा था।।
"हाय जिज्जी!! जे लड़का तो बहुतै मोटा है,हमरी प्रिया का क्या होगा??"
"अरे तो तुम्हरी प्रिया भी तो बस नामे की प्रिया है,लगे तो वो भी ढोल सी है,कहे दे रही हूँ शर्मिला जादा नाक भौ सिकोडोगी तो अंत में मिलेगा कोई दुहेजू तिहेजू,तब नई कहना कि जिज्जी कहाँ जाके मरूं ।"
,
"पर जिज्जी जे लड़का बिल्कुलै नही सुहा रहा का करें।"
अभी ननन्द भौजाई की गोष्ठी चाय के साथ चल ही रही थी कि शर्मिला की बड़ी लड़की वीणा भी अपने दो साल के लड़के को बेतरतीबी से खींचती घसीटती चली आई।।
"परनाम करते हैं बुआ,औ अम्मा कैसी हो?? कही कोनो बात आगे बढ़ी हमार मोटल्लो की या नही।"
"खुस रहो बिटिया!! बस तुम्हरे मुहँ मे घी सक्कर, लड़का सरकारी दफ्तर में काम करे है,ये देखो फोटू।"
"अरे वाह!! जोड़ी तो बहुत जमेगी ,दोनो डील डौल मे एक ही से हैं,देखो अम्मा अब तुम जादा ना नुकुर ना करना,हमरी मानो तो इस अक्ती ब्याह निपटा दो, एक तो जैसे तुम पूड़ी कचौड़ी खिला खिला के उसे सींच रही हो लगता है पूरा सौ किलो का कर के ही मानोगी,बुआ वैसे लड़का करता क्या है?"
"सरकारी दफ्तर में . " वीणा बड़ी बेसब्री थी,उसने बुआजी की बात आधे में ही काट दी-
"अरे बुआजी वो तो सुन लिये हम कि सरकारी दफ्तर में काम करता है,पर करता क्या है, अर्जिनवीस है,बाबू है कलेक्टर है,अरे है क्या,वो बताओ।"
,
"बिटिया वो . बहुत खांस खखार के अपने गले को बार बार साफ कर अपनी आवाज़ को जितना धीमा कर सकती थी उतना धीमा कर के फुसफुसा के कहा- चपरासी है"
जितना ही आवाज़ दबा के बुआजी ने भावी दूल्हे का पद बताया उससे दुगुनी तेज़ आवाज़ में चिल्ला कर वीणा ने उस पदनाम को दुहराया -"क्या चपरासी है!! पर चपरासी के हिसाब से कुछ जादा मोटा नही है लड़का।।।"
भावी दूल्हे की पदप्रतिष्ठा सुन शर्मिला का मन बुझ गया,आखिर वो माँ थी,और हर माँ को अपना बच्चा जान से ज्यादा प्यारा होता है . एक स्वाभाविक सी बात ये भी है कि सभी बच्चों में सबसे कमजोर बच्चा माँ का सबसे अज़ीज़ होता है,हालांकी यहाँ वो कमजोरी शारीरिक नही अपितु सामाजिक थी।।
।"अम्मा सुनो ,एक बात कहे दे रहे तुम्हें,इसे ना थोड़ा डायटिंग वाइटिँग कराओ वर्ना ऐसे ही अमजद खान,कादर खान के रिश्ते आयेंगे,तुम्हरी मुटकि भी तो टुनटुन बनती जा रही है।"
"ए दीदी तुमको इतना हमारी फिकर करने की ज़रूरत नही है,तुम उधर अपने सपूत को देखो, नाक बहा रहा है,ए गोलू इधर आओ,तुम्हारा नाक पोछ दें।"
"छुटकी तनिक अपनी ओर भी ध्यान दो,एक बात कहें,लड़के खुद भले ही ओम पूरी दिखते हों पर लड़की उन्हें कटरीना , कैफ ही चाहिये,अब भई सब की किस्मत हमारे समान थोड़े ही ना होती है, हमारी सादी(शादी) ,में तो अम्मा बाऊजी को कोई मेहनत ही नई करना पड़ा,हम तो हुआं मेला में खड़े चाट खा रहे थे,और तुम्हरे जिज्जा को हमरा चटखारे लेना ऐसा भाया कि घर रिस्ता(रिश्ता) भेज दिये, और देखो चट मंगनी पट ब्याह ।"
"और झट गोलू"कह कर प्रिया हंसने लगी।।
"हमारे जिज्जा को चश्मा भी तो कितना मोटा लगा है दीदी बेचारे दूर से जाने किसे देख हमारे घर रिश्ता भेज डाले,,खैर जिज्जा में एक खूबी तो है ,सहनशक्ती बहुत है उनमें,क्यों दीदी सही कहे ना हम।ए गोलू इधर आओ मौसी के पास ।"
बच्चे ने बडी अदा से सर हिला के मना कर दिया, और अपनी माँ से कुछ खिलाने की जिद करने लगा, उसकी जिद सुन छुटकी रसोई से कचौड़ियाँ प्लेट में सजा लाई और साथ में सोंठ की चटनी!!
कचौड़ी देख बच्चे ने गन्दा सा मुहँ बनाया और क्रीम बिस्किट पाने को मचलने लगा,उसकी माँ जो बड़ी तल्लीनता से एक बेहद रोचक विषय पर अपनी माँ और बुआ से परिचर्चा में लीन थी,इस तरह बार बार अपनी साड़ी झकझोरे जाने पे झल्ला उठी और पलट के बेटे को दो करारे हाथ जड़ दिये, जितनी ज़ोर का थप्पड़ नही था,उससे तेज़ पोंगा फाड़ कर बच्चा रो पड़ा,छुटकी ने आगे बढ़ कर उसे गोद में उठा लिया,और पवनपुत्र सी एक हाथ में भांजे और दूसरे हाथ मे कचौड़ी की तशतरी थामे वो अपने कमरे में चली गई ।।