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Romance शादी का मन्त्र

महिलायें बिना वजह ही बतकही के नाम पे अधिक बदनाम है वर्ना पुरूष भी इधर उधर की गप्पे हाँकने में कहीं से पीछे नही रहते,,दस मिनट में समाप्त होने वाली पूरी कचौरी पूरे डेढ़ घन्टे तक थाली में अपने उदरस्थ होने की प्रतीक्षा करती रही।।

तभी छन छन पायल छनकाती सुशीला वहाँ आयी और थोड़ी दूर से ही आवाज़ लगा दी__

" अजी सुनिये!! अब निकलना भी पड़ेगा,घर पहुँचते पहुँचते रात हो जायेगी,,बो तो अच्छा है फूलमणि को घर छोड़ आये थे तो सांझ का दिया बाती हो जायेगा।।"

" हाँ हाँ!! ठीके कह रही हो,चलो युव की अम्मा,निकलते हैं अब।।"

अबकी बार सुशीला पूरी तैयारी में थी,कौन किस गाड़ी में सवार होगा,कहाँ बैठेगा उसने मन ही मन पूरा खाँचा खींच रखा था,उसने महिलाओं के बीच खड़ी प्रिया और रूपा को ठेल ठाल के युवराज की गाड़ी में बैठा दिया,और खुद प्रिंस प्रेम और एक दो नौकरों को लिये राज की गाड़ी में जा बैठी।।

राज जब शास्त्री जी की चरण वन्दना कर अपनी गाड़ी पे ,

आया तो प्रिया को वहाँ ना पा कर असमंजस में प्रिंस को देखा,प्रिंस ने त्वरित गति से बड़े भैय्या की गाड़ी की ओर इशारा कर दिया, बड़े भैय्या की गाड़ी में प्रिया को बैठे देख राज को आश्चर्य हुआ __ :कि ये वहाँ कैसे चली गयी: पर प्रत्यक्ष में बिना कुछ कहे चुपचाप आकर ड्राईविंग सीट पर बैठ गया।।

उधर अम्मा जी के कड़े तेवर देख बिना ना नुकुर किये प्रिया चुपचाप युवराज भैय्या की गाड़ी में जा बैठी थी,रूपा भाभी से भी कम ही मिलना हुआ था उसका और उसे उनकी स्वप्रशंसा की बातें पसंद भी कम ही आती थी इसीसे मन ही मन उदास प्रिया अपने ही मन के आगे लाचार हुई जा रही थी।।

कैसा द्वंद उसके मन में चल रहा था,दो दिन पहले तक जिस राज से सिर्फ जिम मे एक डेढ़ घन्टे की मुलाकात ही काफी होती थी आज उसके बिना पांच मिनट भी काटना कितना मुश्किल लग रहा था।। उसे पता था कि राज की गाड़ी भी उसके आगे या पीछे ही चलेगी फिर भी कैसा खालीपन सा मन में भर गया था,जैसे बहुत सारे बादल छा तो गये हैं,पर बरस नही रहे . तभी गाड़ी का सामने का दरवाजा खोल राज अन्दर आकर बैठ गया__

" अरे राज तुम यहाँ कैसे?? तुम्हारी गाड़ी कौन चला रहा बाबू??"

" भैय्या वो प्रिंस चला रहा,हमारा हाथ में ज़रा दर्द था तो ,

प्रिंस को चलाने बैठा दिये,बाऊजी को उसी गाड़ी में बैठाए,काहे अम्मा नही तो अकेली हो जाती ,अम्मा बोली भी कि बाऊजी आपकी गाड़ी में बैठेंगे,तो हम बोल दिये हम चले जाते हैं भैय्या के पास,और यहाँ चले आये . अम्मा आवाज़ भी दी ,हम बोले चिंता ना करो अम्मा ,हम दोनो भाई समय से पहुंच जायेंगे घर।।ठीक है ना भैय्या।।"

" ठीके है छुटके ।चलो फिर गाड़ी भगायी जाये।।तुम्हरी भौजाई को अपना मायका गावँ का चाट भी खिलाना है,और उनको यहाँ तालाब पार शिव मन्दिर का दर्शन भी करना है,तो ये सब करते चलते हैं . काहे प्रिया तुमको कोनो जल्दी तो नही है ना?"

" नही भैय्या जी कोई जल्दी नही,,हम मम्मी को फोन करके बता देते हैं ।"

गाड़ी चारों को लिये सरपट कानपुर की ओर दौड़ चली।।

तैनु ले के मैं जावांगा,दिल दे के मै जावांगा

तेरे नाल मैं आवान्गी,ससुराल मैं जावान्गी।।।
 
भाग 10

"अरे ए फूलमनी जा तो ओ रखिया को घीस घास के रख !! राज के बाऊजी भी ,बस काम फैलाना जानते है,इत्ता बड़ा पेठा उठा लाये,अब इसकी बरी तोड़ने के लिये उत्ता सारा उरद भी तो पीसे पड़ी,का का देखें हम,अब हमारा भी उत्ता जी नही चलता।।"

"हो जायेगा अम्मा जी ,सब काम हो जायेगा,काहे इत्ता परेसान हुई जा रही हैं।"

" काहे ना हो !! हम तो अपना किस्मत मे लिखा के लाये हैं परेसान होना,,पन्द्रह के हुए थे कि सादी हो गयी उसके बाद मजाल है ये घर के लोगो की, कि कभी हमको चैन से अपना मायका में चार दिन रुकने दिये हों,जैसी महतारी वैसने लड़का!!

भगवान झूठ ना बुलवाये,,बड़के की जचकी में अम्मा जी भेजी रही तब भी एक महीना नही पूरा की वापिस बुला ली,वही हाल राज के मे रहा,अब का- का बताएं,अच्छा भी नही लगता ,सब सोचेंगे अपनी सास की बुराई गा रही ,पर हम जितना झेले हैं ना कोई ना झेल सकता,,ये आज कल की , Page

लड़कियाँ जरा सा कुछ बोल भर दो इत्ता बड़ा मुहँ फूला लेंगी।"

स्वगत भाषण में आकन्ठ डूबी सुशीला बीच बीच मे कनखियों से देखती भी जाती कि कहीं उसकी अग्निगर्भा बहु रसोई से आंगन में टपक तो नही पड़ी।।

शन्नो मौसी और प्रेमा बुआ का इन सब बतकही में खूब मनोरंजन होता था।।सुशीला की सास जीवित थी और अभी भी अपने सास वाले पूरे रूतबे के साथ मौजुद थी,हालांकि वो पुराने ज़माने की न्यायप्रिय महिला थी फिर भी थी तो सुशीला की सास ही।।

अपने जमाने में उन्होनें ढेरों दुख देखे थे।। छोटी उमर में वैधव्य का दंश और अकेले बच्चों का पालन पोषण वो भी सिर्फ खेती खार के भरोसे उन्होने किया था,इसीसे हर छोटी से छोटी वस्तु पे उनकी अपार ममता थी जो स्वाभाविक भी थी पर सुशीला को यही उनकी कंजूसाई लगा करती थी।

सुशीला ठीक ठाक खाते पीते घर की नौ भाई बहनों में सबसे बड़ी बहन थी,जब ब्याह के आयी तब भले ही उमर से कम परन्तु सीख समझ में चतुर थी,बनाने खिलाने में उसकी अटूट भक्ति थी,कोई मेहमान घर से बिना मीठा खारा लिये निकल नही सकता था,यही यजमानी सास को कष्ट दे देती थी,वो अक्सर बहु को उसके खुले हाथ घर लुटाने की आदत पे खरी खरी सुनाती रहती थी,पर इतने साल बीत गये . कल की नवेली बहु आज खुद सास बन गयी पर अपने खिलाने पिलाने के रुचिकर गुणों को आज भी त्याग ,

नही पायीं ।।

इतने सालों में रुपया पैसा भी जम गया पर सुशीला की सास नही बदली, और ना बदली सुशीला ।।

वो प्रारम्भ से ही अपनी सास की अनुपस्थिती में उन्हें पानी पी पी के कोसा करती थी,वही आदत आज तक उसमें शुमार थी,हालांकि खुद की बहु आने के बाद शुरु शुरु में उसने सोचा भी कि मैं ऐसा करूंगी तो मेरी बहु क्या सीखेगी पर ये विचार बिल्कुल ' चार दिन की चान्दनी' साबित हुआ,और वो वापस अपने ढर्रे पे आ गयी।।

सुशीला के साथ यही होता था,बात कोई भी हो वो घूम फिर के अपने प्रारब्ध को कोसती हुई अपनी सास की बुराई पे उतर आती थी ,और यही सुनना शन्नो मौसी जैसों के लिये अति रुचिकर होता था, ऐसे लोग अपने साथ एक अदृश्य दिया सलाई लेकर बैठते हैं और जब जैसे मौका मिलता है तीली लगाने से पीछे नही हटते।।

शन्नो मौसी की संगत के लिये प्रेमा बुआ भी तैयार बैठी होती थी,प्रेमा राधेश्याम जी की दूर की बहन की बेटी थी,उन्हें भी अपनी मामी की बुराई का रस गुदगुदा जाता था।।

' तुमको बुलाऊं के पलकें बिछाऊँ,कदम तुम जहां-जहां रखो,ज़मीन को आस्माँ बनाऊं सितारों से सजाऊँ,अगर तुम कहो . '

राज अपनी धुन में गुन गुनाता जा रहा था कि उसकी अम्मा ने आवाज़ लगा दी__

" अरे कुछ काम का भी काम कर लिया कर लल्ला . जब देखो मरे जिम में मूसल बेलन उठा उठा के वर्जिश करता फिरे है।"

" बोलो ना कुछ काम है तो कर के ही जायेंगे।"

" मेरा कोई काम ना है . अब कल रात इत्ती अबेर हो गयी वापस आते आते ,का ज़रूरत सुबह सबेरे उठ के जिम निकलने की।"

" अम्मा तुम भी तो लग गयी हो सुबह सुबह अपने काम में! फिर !! हम भी तुम्हारे ही बेटा हैं ।" हँसता हुआ राज निकल गया और सुशीला वापस अपनी रामकथा में लग गयी।।

2.

दोपहर राज की अम्मा खाना पीना निपटा कर अपने कमरे में ऊन और सलाई लिये बैठी स्वेटर बुन रही थी कि राज पहुंच गया,उसे जितना कठिन प्रिया से बात करना नही लगा था उससे कहीं अधिक कठिन अपनी अम्मा से बात करना लग रहा था . " अम्मा . क्या कर रही हो।"

" का करेंगें,तुम्हारे लिये स्वेटर बुन रहें हैं,बस पूरा होने को है उसके बाद तुम्हारे बाऊजी के लिये शुरु करेंगे।।"

,

" सारा दिन काम मे लगी रहती हो,थोड़ा तो अपने आपको भी आराम दिया करो,बस घर भर की चिंता में दुबला रही हो।"

" कहाँ से दुबला रहें हैं,अच्छे खासे तो हैं ।" सुशीला को ज़ोर की हँसी आ गयी . अम्मा को हँसते देख राज को भी थोड़ी हिम्मत आ गयी वो आगे बढ अम्मा के पैरों के पास ज़मीन में ही आलथी पालथी मार बैठ गया।।

अम्मा की गोद में सर रखे राज अपनी बात की भूमिका बना रहा था कि सुशीला का चचेरा भाई धर्मेश दौड़ा दौड़ा आया __

" जिज्जी बाबू( पिता जी) को फालिज मार गया है अभी अस्पताल ले जा रहे हैं,जल्दी चलो ।।"

सुशीला हड़बड़ा कर उठ बैठी,और जल्दी जल्दी सीधी उल्टी चप्पल पैरों में डाल धर्मेश के साथ अस्पताल निकल गयी ,जाते जाते राज को ताकीद कर गयी

" राज अपने बाऊजी को फोन लगा दो,और बोलो तुरंत अस्पताल पहुँचे।"

सुशीला के मायके में संयुक्त परिवार था,उसके पिता और चाचा दोनो ही के परिवार एक साथ ही रहा करते थे,बचपन से सब को साथ देखते सुशीला के मन में अपने चचेरे भाई बहनों के लिये भी अपने सगे भाई बहनों सा ही प्रेम अनुराग था,घर ,

में सबसे बड़ी होने के कारण सारे छोटे भाई बहन हर बात में सुशीला जिज्जी की सहमती अवश्य लेते थे।और सुशीला भी पूरे मन से सबके सहयोग को सदा तैयार रहती थी।।

कुछ आठ दस साल पहले सुशीला के पिता का निधन हुआ था इसीसे उसके चाचा ही अब उसके लिये पिता समान थे,चाचा की ऐसी नाज़ुक हालत सुन वो अपने भाई के साथ दौड़ पड़ी,उसके पीछे राज भी भागा।।

वो पूरा दिन दोनो माँ बेटे का अस्पताल में ही बीत गया,आई सी यू में भर्ती सुशीला के चाचा शाम होते तक खतरे से बाहर आ चुके थे . भाई भावज को सारी देखभाल के नुस्खे थमा के सुशीला राज के साथ रात नौ बजते बजते घर पहुंची,,रूपा दोनो का रास्ता देखती भीतर वाले आंगन में बैठी कोई काम निपटा रही थी,जैसे ही सास को आते देखा झट घूंघट सर में खींच उठ कर चली आयी__

" कैसी तबीयत है अब चच्चू नाना की अम्मा जी।"

रूपा भले ही ज़बान की तेज़ और कड़वी थी,पर मन ही मन अपनी सास का सम्मान करती थी,, और राज के लिये तो उसे सच में ममता थी, इसिलिए दोनो को खाने के समय पर घर पहुंचा देख उसे संतुष्टी मिली, वो फौरन दौड़ कर चाय चढ़ा आयी और दोनो के लिये पानी लेती आयी।।

राज तो पानी पीकर अपने कमरे में चला गया पर सुशीला वही बैठी चाय पीते हुए अस्पताल का सब हाल समाचार रूपा ,

को सुनाती रही।।।

रात खाना पीना निपटने के बाद राज एक बार फिर अम्मा के पास चला आया,उसे पता था बाऊजी रात के खाने के बाद चहलकदमी करते चौक के पान वाले तक चले जाते हैं,यही सुयोग उसे अपनी बात रखने के लिये उचित जान पड़ा __

" अम्मा!! सुनो तुमसे कुछ बात करनी थी।"

" हाँ कहो!! क्या हुआ बिटवा??"

" देखो पहले हमारी बात ध्यान से सुनना ,और पूरी बात सुनना ,उसके बाद अपनी राय देना।।"

" हां भई !! पर का बात हो गयी?? वो भी तो बताओ?"

" अम्मा . हमारी दोस्त है ना प्रिया,तुम जानती हो उसे ,पिछली गली वाले तिवारी जी ,उनकी लड़की है।।"

" हाँ !! तो ??"

सुशीला ने चेहरे पर एकदम ऐसे भाव रखे जैसे उसे प्रिया या किसी भी अन्य से कोई फर्क नही पड़ता।।

" अम्मा वो हमारी बहुते अच्छी दोस्त बन गयी है, और . और हम दोनों सोच रहे कि अगर तुम हाँ बोलो तो,,तो .

,

" तो क्या??"सुशीला के कठोर शब्दों ने अचानक से राज में हिम्मत भर दी

" हम प्रिया से शादी कर सकते हैं क्या अम्मा??"

सुशीला के चेहरे का रंग उड़ गया,आखिर इतने दिन से जिस बात का डर सता रहा था वही हुआ . सुशीला इस बात से बेखबर तो नही थी पर एकाएक इतनी जल्दी राज उससे बात करने आ जायेगा ऐसा भी नही सोचा था उसने,सामने सर झुकाये बैठे लाड़ले पर एकदम से ममता उमड़ आयी पर अपने आप को यथासम्भव कठोर कर उसने अपनी बात रखी__

" नही . तुम्हारे बाऊजी कभी नही मानेंगे।"

" अम्मा पहले तुम तो मान जाओ,फिर बाऊजी भी मान जायेंगे।।सुनो ना अम्मा,हम दोनो बहुत अच्छे दोस्त हैं,प्रिया बहुत अच्छी लड़की है अम्मा।"

" राज,अब क्या समझायें तुमको,यही तो करते हैं आजकल के लड़के लड़कियाँ,सब कुछ अपने मन का ।।अब हम का बोलें,जब सोच ही लिये तो जाओ कर आओ तुम दोनो भी किसी मन्दिर में सादी।"

" अम्मा ऐसे ही करना होता तो हम तुमसे काहे बात करते,विश्वास करो अम्मा,हम कुछ भी गलत नही किये,,आज ,

तक हम उसे छुए तक नही।।"

" बहुत अच्छा किये,और छूना भी नही,बेटा तुम्हरी अम्मा है,अच्छे से जानते है हमारा लड़का कभी कोई गलत काम कर ही नही सकता ,पर बस एक बात पूछना चाहते हैं,ऐसा का दिख गया उस लड़की में,इससे कही सुन्दर लडकियों की लाइन लगा देंगे राज,पर इस लड़की को भूल जाओ।"

" काहे ऐसा बोल रही अम्मा,तुम जानती हो तुम्हरी मर्ज़ी के बिना हम कुछ नही करेंगे।"

" उसी हक से बोल रहे बेटा,,समझा दो उसे वो भी अपने घर वालों के हिसाब से कर ले सादी ब्याह और तुम्हें भी करने दे,,कुछ नही रखा ये सब प्यार व्यार के चक्कर में,,एक बार सादी हो जाये फिर सब बराबर हो जाता है।।"

" मान जाओ अम्मा ,,काहे मना कर रही ,आखिर वो भी तो ब्राम्हण है।।

" कहाँ की बाम्हन?? सरजूपारिन है . और हम कनौजिये कान्यकुब्ज ,,बीस बीसंवा है लल्ला हम लोग, ऐसे सरजुपारिन को ब्याह लाएंगे तो पूरा समाज पूछेगा नही कि हमारे "के के" में लड़की नही मिली का।।तुम्हारे बाऊजी किस किस को जवाब देंगे बेटा,इस बुढऊती में काहे उनका पगड़ी उछाल रहे हो।।

" अब आजकल ये सब कौन मानता है अम्मा,हम तो नही ,

मानते।।"

" ना मानो!! हम तो पहले ही कहे रहे कि जाओ कर लो किसी मन्दिर मे सादी।।"

" तुम तो नाराज हो गयी अम्मा,अरे एक बार हमारे लिये उससे मिल तो लो!!"

" मिल तो चुके हैं,दो तीन बार !! हमें तो बिलकुले पसंद नही आयी,ना सकल ना सूरत ,रंग भी साँवला।

" अरे वो तो तुम इतनी ज्यादा गोरी हो ना इसिलिए सब तुम्हारे सामने सांवले ही लगते हैं,,वैसे दिखने में तो ठीक ठाक है अम्मा।।"

" हम अपने राजकुमार की सादी दिखने में बस ठीके ठाक लड़की से काहे करें,इससे तो शन्नो जो रिस्ता बताई रही तुम्हारे लाने वही अच्छा है,और रूपा के बाबूजी भी बताये रहे ,,दुनो लड़की गोरी सुन्दर हैं और तुम्हे पसंद आ रही ये कलूटी।।"

" राज अब हमें कोई बहस बात नही सुननी ना करनी,तुमने पहले ही कहा था कि तुम हम से पूछ कर करोगे,जो भी करोगे तो हम यही कह रहे लल्ला जाओ और उसे समझा दो कि हमारे घर में कोई उसके लिये तैयार नही है, जाओ मना कर दो उसे। जाओ बेटा हम थक गये हैं बहुत,सोने दो अब।।"

,

" अम्मा . काहे इत्ता गुस्सा रही हो ,सच में बहुत अच्छी लड़की है प्रिया ।।"

" होगी लल्ला!! पर हमे नही पसंद ।।हम एक बिदेसिनी को अपन बहु ना बनाई, जो समझ आ गयी हमारी बात तो जाओ ,नही पड़े रहो ।।हम सोने जा रहे।।"

सुशीला बिना काम के भी निरर्थक चप्पल पट पट कर बजाती कमरे से बाहर निकल गयी।

कमरे में अकेले बैठे राज का दिल कराह उठा, वो चुपचाप उठा और ऊपर अपने कमरे में चला गया, सीढिय़ां चढ़ रहा था कि रूपा ने आवाज़ लगायी

" लल्ला जी ये दूध लेते जाइये,पी लीजियेगा।"

" हमें नही पीना भाभी।।" बिना रुके राज अपने कमरे में चला गया,पर उसकी आवाज़ सुशीला के कानों तक पहुंच गयी,उसने छिप कर अपने आंचल से अपनी आंखों की कोर पोंछ ली।।

कितनी शालीनता से उसने प्रिया को कहा था_" अगर अम्मा नही मानी तो हम पहले जैसे ही दोस्त बने रहेंगे।"

अम्मा तो नही मानी और क्या अब उसका खुद का दिल वापस प्रिया को सिर्फ दोस्त मानने को कर रहा??

क्या कोई भी ऐसी बात है जो उसके और प्रिया के बीच की जो वो भूल पा रहा है??

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चाहे प्रिया का पूरी तन्मयता से उसे पढाना हो या उसके जिम के सारे लेखे जोखे को सहेजना हो,कहीं भी तो प्रिया ने उसे अकेले नही छोड़ा,अपनी इतनी बुरी आदत डाल दी कि अब यही सोच सोच के कलेजा मुहँ को आ रहा कि यदि प्रिया की कहीं और शादी हो गयी तो वो क्या करेगा??

हर शाम आंखों पर तेरा आंचल लहराए

हर रात यादों की बारात ले आये,

मैं सांस लेता हूँ तेरी खुशबू आती है

इक महका महका सा पैगाम लाती है

मेरे दिल की धड़कन भी तेरे गीत गाती है

पल पल दिल के पास तुम रहती हो।।।

ये गाना कहीं दूर किसी के रेडियो पे बज रहा था जिसे सुन राज को अपनी और प्रिया की प्रथम औपचारिक मुलाकात याद आ गयी,उस दिन भी जिम में यही गाना बज रहा था जब प्रिया निरमा के साथ पहली बार जिम मे आयी थी।।

अपनी पहली मुलाकात याद कर अचानक राज के चेहरे पे मुस्कान आ गयी,कैसे उसे धडाधड़ गधा बुला रही थी . और खुद कितनी गोल मटोल सी थी,अब तो आधी रह गयी प्रिया ।।और अब वो खुद भी कहाँ गधा रह गया।।

एक बार फिर उसे ज़ोर की हँसी आ गयी,अचानक ध्यान आया कि कमरे में अकेले बैठा हँस रहा है,कहीं किसी ने देख लिया तो सोचेगा ,पागल हो गया है लड़का!!

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क्या सभी के साथ ऐसा ही होता होगा ,जैसा उसके साथ हो रहा है।।उसे खुद अपने ऊपर आश्चर्य हो रहा था,आज तक अम्मा की कोई बात कभी ना काटने वाला लड़का आज कैसे अपनी बात पे अड़ा रह गया . वाकई ऐसा क्या जादू किया प्रिया ने कि अम्मा के मना करने के बाद भी वो अम्मा को मनाने की कोशिश करता रहा . पर अब उसके सामने एक और कठिन चुनौती खड़ी थी,प्रिया को मना करने की।।

उसने बहुत सोचा,,,सोचना कभी भी राज का काम नही था!! बचपन से भले ही वो मनमौजी था पर घर पर किसी बड़े की बात उसने कभी नही काटी थी,इसीसे शायद उसकी मन की हर बात सभी मन मे आने से पहले ही पूरी कर जाते थे,अम्मा दादी बाऊजी चाचा जी, पिंकी ,बुआ जी मौसियां ,मामा लोग और इन सब के ऊपर बड़के भैय्या हर कोई उसे बच्चा ही समझते आये थे,जिद क्या होती है राज ने जाना ही नही थी।।आज तक जो मांगा तुरंत ही मिल गया . इसी से आज पहली बार मांगी हुई चीज़ ना मिलने की पीड़ा चेहरे पे छलक आयी।।

प्रिया के साथ समय कैसे पंख लगा कर उड़ जाता था,और बीच में जब उसने जिम आना बन्द कर दिया था,तब तो एक एक पल काटना मुश्किल हो गया था,कैसे कहे कि प्रिया हमें भूल जाओ, हमारे घर वाले नही मानेंगे।।

अपनी सारी हिम्मत जुटा के आखिर राज ने अपना फोन उठाया और प्रिया को लिख भेजा__

,

" प्रिया . अम्मा ने मना कर दिया,अभी और कोई बात नही कर पायेंगे ,बस यही कहना चाहतें हैं कि हमें भूल जाओ।।"

" ठीक है" ।। प्रिया का तुरंत ही जवाब आ गया,ऐसा ठंडा और थका सा जवाब देख कर राज ने उसे फ़ोन लगा लिया।।

" क्या हुआ प्रिया ( प्रिया के त्वरित सन्देश से राज की उसे प्रिया पुकारने की हिम्मत नही हुई) कुछ नाराज़ हो गयी क्या??"

" नही,काहे की नाराजगी?? तुमने तो पहले ही कह दिया था कि अगर अम्मा मना करेंगी तो बात आगे नही बढ़ाएँगे।।"

" तो फिर ऐसा रुखा रुखा काहे बोल रहीं।"

" हे भगवान तो अब हम कैसे बोले कैसे बतियाएं ये भी तुमसे पूछना पड़ेगा।।"

" अरे यार!! तुम पूरा लड़ने की तैयारी से ही बैठी हो, हम क्या बोल रहे, तुम क्या समझ रही,,ऐसे ही वाद विवाद होता है,रहने दो हम रखते हैं फोन।

" हाँ रख दो,अब बात भी क्या बची ?? "

दोनों बात कर ही रहे थे कि प्रिया की अम्मा की आवाज़ राज को सुनाई पड़ी,वो प्रिया से खाने को पूछ रही थी जिसे ,

प्रिया ने नकार दिया,ये कह कर की सर मे दर्द है अम्मा आज नही खायेंगे।।

" अब खाना काहे नही खा रही?? ये अच्छा नौटंकी है ,हमसे शादी नही होगी तो जीवन भर नही खाओगी क्या।।"

" नही खायेंगे!! ऐसे ही भूखे मर जायेंगे,तुम्हे इससे क्या??"

" पगला गयी हो क्या?? कोई ऐसे करता है,,??फिर हम अभी तुम्हारे घर आ जायेंगे।"

" आ जाओ ,हम कब मना किये . ले जाओ हमे घर से भगा कर .

" प्रिया कैसी बातें कर रही हो तुम?? जानती हो कि हम कभी ऐसा नही करेंगे,,अपने अम्मा बाऊजी को कभी दुखी नही कर सकते।"

" जानतें हैं राज,सब जानतें हैं हम!! पर हम भी क्या करें,,।।हम भी तो अपने मम्मी पापा को दुखी नही देख सकते,पर तुम्हारे बिना भी तो नही जी सकते,,तुम हमारे लिये चिंता मत करो,ये सब हमारा थोड़ी देर का गुस्सा है,अभी सो जायेंगे सुबह तक ठीक हो जायेंगे।।"

राज का दिल कसमसा के रह गया,उसे उसी वक्त प्रिया से मिलने उसे एक झलक देखने का मन करने लगा__

,

" प्रिया !! सुनो तुमसे मिलना है।।"

" कल जिम आयेंगे ना तब मिल लेना।"

" नही अभी मिलना है,तुम्हें देखने का मन कर रहा है।"

" अब तुम पगला गये हो,रात के दस बजे तुमको हमे देखने का मन कर रहा,,हमारे बाहर वाले दरवाजे पे पापा ताला भी डाल दिये हैं,पीछे आंगन वाला दरवाजा भी बन्द हो गया है, घर में सब सो चुके हैं,ऐसे में कैसे आओगे??"

" तुम तो ऐसे मना कर रही कि लग रहा चोरी से बुला रही हो,कि सब सो गये हैं,अब आ जाओ।"

ऐसे बोलते ही राज को हँसी आ गयी ,उसकी हँसी सुन प्रिया भी खिलखिला उठी . दोनो को बातें करते दो घन्टे से ज्यादा बीत चुके थे,,राज का मन प्रिया को देखे बिना मानने को तैयार ही नही था, आखिरकार सबकी नज़रे बचाता राज चोरी छिपे धीमे धीमे कदम बढ़ाता घर से बाहर निकला,अपने घर का ताला खोलते हुए उसे एक बार खटका सा लगा कि दादी जाग गयी,पर वो उसका अन्देशा ही था,,अपनी बुलेट को खींचते हुए गेट से बाहर निकाला और उसपे सवार राज प्रिया के घर उड़ चला
 
मासूम चेहरा नीची निगाहें भोली सी लड़की भोली अदायें

ना अप्सरा है,ना वो परी है,लेकिन ये उसकी जादुगरी है

दीवाना कर दे वो,एक रंग भर दे वो,शरमा के देखे जिधर

घर से निकलते ही कुछ दूर चलते ही रास्ते में है उसका घर।।

मोबाईल पे गाने सुनता राज प्रिया के घर के सामने वाले रास्ते पे पहुंच गया,अपनी रॉयल एनफील्ड से उतर उसके सहारे खड़े होकर उसने प्रिया को मेसेज भेजा__

" आ गये हैं . ,तुम्हारी खिड़की के सामने वाली सड़क पे खड़े हैं ।"

राज ने मेसेज पे नज़र जमाई हुई थी,पहले एक राइट का निशान हुआ,फिर दो हुए और तुरंत ही दोनो निशान नीले हो गये,राज के चेहरे पे एक मुस्कान उभर आयी ,मतलब उसने मेसेज पढ़ लिया,तभी राज के पैर के पास कुछ आ कर गिरा,नीचे देखा तो बालों में लगाने वाला क्लचर था,जिधर से आकर गिरा उधर राज ने सर उठाया तो सामने छत पर प्रिया खड़ी मुस्कुरा रही थी।।

दोनो एक दूसरे को कुछ देर तक देखते रह गये . फिर राज ने इशारे से प्रिया को हाथ हिला के कहा कि वो जा रहा है,प्रिया ने ना में सर हिला दिया।।

राज देख ही रहा था कि प्रिया छत पर से अपने कमरे में चली गयी,राज इधर उधर झांकता रहा,ताकता रहा कि अब आयेगी छत पर,,अपनी आंखे छत पे जमाये राज टकटकी लगाये खड़ा था कि प्रिया उसके सामने आ कर खड़ी हो गयी।।

दोनो एक दूसरे की आंखों में देखते रह गये,,दोनो को ही ऐसा लग रहा था जैसे आज ही पहली बार एक दूजे को देखा है .

. सही कहा है किसी ने, अगर किसी बात के लिये टोका जाये रोका जाये तो दिल ही क्या शरीर का हर हिस्सा उस चीज़ को पाने तरसने लगता है,और ये अनुभव सर्वाधिक होता है प्रेमियों के साथ।।

अगर लैला मजनूँ,हीर राँझा के घर वाले एक बार में ही उनके प्यार को कबूल लेते तो शायद ही ऐसी सफल प्रेम कहानियाँ रची जातीं।।

अम्मा की ना ने दोनो के मन में छिपा रहा सहा संकोच भी समाप्त कर दिया,दोनो को ही समझ आ गया कि एक दूसरे के बिना जीना व्यर्थ है,और अब वो दोनों सिर्फ दोस्त से कहीं आगे निकल चुके हैं ।।

" राज!! ऐसे क्यों देख रहे ,जैसे पहली बार देखा हो।।"

प्रिया की बात पर राज मुस्कुराने लगा।।।

" सुनो !! हम तुम्हें छूना चाहते हैं,तुम्हें छू कर तसल्ली करनी है कि हम सपना नही देख रहे,राज बाबू सच में हमारे घर के सामने खड़े हैं ।

" अच्छा!! सच में ??" और मुस्कुराते हुए राज ने प्रिया को अपनी तरफ खींच कर गले से लगा लिया।।
 
भाग 11

अब तक आपने पढ़ा

" राज!! ऐसे क्यों देख रहे ,जैसे पहली बार देखा हो।।"

प्रिया की बात पर राज मुस्कुराने लगा।।।

" सुनो !! हम तुम्हें छूना चाहते हैं,तुम्हें छू कर तसल्ली करनी है कि हम सपना नही देख रहे,राज बाबू सच में हमारे घर के सामने खड़े हैं ।

" अच्छा!! सच में ??" और मुस्कुराते हुए राज ने प्रिया को

अपनी तरफ खींच कर गले से लगा लिया।।

अब आगे

दोनों एक दूसरे के गले से लगे एक दूसरे में डूबे खड़े थे कि

__

" प्रिया !!इत्ती रात गये यहां का कर रही हो।"

दोनो इस आवाज़ को सुन झटके से अलग हो गये

" पापा आप!! ये . वो राज हैं,हमारे जिम इंस्ट्रक्टर,जिन्हें हम पढाते भी थे।" राज ने लपक के प्रिया के पिता के पैर छूने चाहे,पर उन्होनें हाथ बढ़ा कर उसे रोक दिया__" हाँ ठीक है ठीक है,तुम अभी घर चलो ।"

" हां पापा चल रहे!! " प्रिया ने आंखों ही में राज से बिदा ली और अपने पापा के पीछे सर झुकाये घर चली गयी।।

राज अपने बालों पे हाथ फेरता रह गया,अपनी बुलेट वापस उसने घर की तरफ मोड़ ली __

पूरे रास्ते मुस्कुराते हुए राज घर पहुँचा ,हालांकि प्रिया के पिता ने उन्हें रंगे हाथों पकड़ लिया था,पर इस बात से डरने की जगह उसे एक सुखद एहसास था कि बताना तो आखिर सभी को है,चाहे किसी ढंग से पता चला पर खुशी की बात है कि प्रिया के घर पे भी पता तो चल ही गया।।

प्रिया के पिता पढ़े लिखे सरकारी मुलाजिम थे, इसीसे उन्हें कितनी भी गम्भीर विषय से जुड़ी बात हो उसपे अनावश्यक हाय तौबा मचाना पसंद नही था,साधारण तबीयत के साधारण पुरूष थे।।

प्रिया से ना उन्होनें कुछ पूछा ना प्रिया ने ही आगे बढ़ कर कोई कैफियत दी,पर अपने धीर गम्भीर पिता की आवाज़ से ही उसने भांप लिया कि उसका यह कार्य पिता को कहीं अन्दर तक कष्ट दे गया है।।

अगले दिन सुबह और दिनों की तरह प्रिया जिम नही गयी,उसे घर पे ही इधर उधर निरर्थक डोलते देख उसकी अम्मा से रहा नही गया__

" का हुआ?? आज जिम नही जाओगी का प्रिया ?"

शर्मिला के सवाल का जवाब प्रिया की जगह उसके पिता ने दिया__

" नही! आज के बाद ये कभी जिम नही जायेगी, वर्मा से बात हुई है,कल लड़के वालों को घर बुला लिया है . सोच रहा हूँ अब इसी साल इसके भी हाथ पीले कर दूँ ।"

प्रिया ने अपनी माँ को देखा और उन्होनें प्रिया को,आंखों ही आंखों में दोनो ने एक दूसरे की पीड़ा पढ़ ली।।

" हुआ क्या?? कुछ बताएंगे भी . ऐसे कैसे तुरंत हाथ पीले कर देंगे।"

" देखो शर्मिला,मेरा यही मानना है कि हर काम अपने समय पर हो जाना चाहिये,चाहे विद्या ग्रहण हो या

पाणिग्रहण!! बहुत पढ लिख ली प्रिया,अब इसका भी ब्याह कर दूँ तो मुझे भी चैन मिले।"

" मर गयी रे,ये जोड़ गठान का दर्द मुआ मेरे परान लेकर ही जायेगा . " अपने घुटने हाथों से सहलाती बुआ जी ने घर में प्रवेश किया_" ठीके तो कह रहा है मेरा भाई,अब इत्ता सारा तो पढ़ लिख ली है,कौन सा हमें छोकरी को कलेक्टर कमिस्नर बनाना है,अब निबटो इससे भी,उमर हुई जा रही इसकी भी।"

" परनाम करते हैं जिज्जी!! छोटा मुहँ बड़ी बात हो जायेगी,पर अभी बाईस की तो हुई है और अगले हफ्ते इसका बैंक का पेपर भी है,एक बार चुन ली जाये फिर अपने पैर पे खड़ी हो जायेगी फिर निबटाते रहेंगे ब्याह।।"

" हम तुमसे पूछ नही रहे,तुम्हे बता रहे कल शाम को खाने पे बुला लिया है उन लोगों को,तुम अपना सब तैयारी ठीक-ठाक रखना।"

" जी अच्छी बात है!!" शर्मिला ने एक बार प्रिया को देखा और रसोई में वापस चली गयी,प्रिया भी सर झुकाये ऊपर अपने कमरे में चली गयी।।

" सांसों में बड़ी बेकरारी आंखों में कई रतजगे

कभी कही लग जाये दिल तो,कहीं फिर दिल ना लगे

अपना दिल मैं ज़रा थाम लूँ,जादू का मैं इसे नाम दूँ

जादू कर रहा है,असर चुपके चुपके . "

जिम में चलता गाना असल में राज भैया के मन में चल रहा था,रह रह के नज़र दरवाजे पे जा कर अटक रही थी8 Full stopसब आ रहे थे जा रहे थे पर ना उसे आना था ना वो आई।।

आखिर इन्तजार की घडियां पहाड़ बनने लगी और राज ने प्रिया को फ़ोन लगा दिया, पूरी रिंग बजती रही पर फ़ोन नही उठा,अब कल रात की एक एक बात किसी फिल्म की रील की तरह आंखों के सामने से गुजरने लगी।।।

और समझ में आ गया कि प्रिया क्यों नही आयी , उसने फोन क्यों नही उठाया।।राज की मोटी अकल को आखिर समझ आ ही गया की प्रिया के पापा को उन दोनों का यूँ मिलना रास नही आया, अजीब बेचैनी से राज व्याकुल हो उठा,उसने एक बार फिर प्रिया को फोन लगाया,इस बार थोड़ी देर में ही फ़ोन उठा लिया गया।।

" फोन क्यों नही उठा रही थी प्रिया??"

" पापा थोड़ा गुस्से में लग रहे राज,अब हमे जिम आने नही मिलेगा,अगले हफ्ते हमारा पेपर है,पता नही दे पाएँगे या नही?"

दोनो अभी अपनी बातों में लगे थे कि राज की अम्मा किसी से बात करती राज के कमरे तक आ गयी__

" ए राज!! देखो कौन आया है??आओ बेटा बन्टी, तुम राज के कमरे में आराम करो हम तुम्हरा सामान ऊपरे भिजाये दे रहे।"

" जी मौसी जी।"

राज की मौसी का बेटा बन्टी राज का ही हमउम्र था और पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली में रह कर नौकरी कर रहा था,वही अचानक बिना किसी पूर्वसूचना के अपना बैग टाँगे राज के घर टपक पड़ा था।

" तुमसे बाद में बात करते हैं प्रिया अभी मेहमान आ गये हैं,रख रहे फोन।"

राज ने आगे बढ़ कर भाई को गले से लगा लिया__

" का हो गुरू!! एकदम दाढ़ी वाढी बढ़ाए बैठे हो, क्या हो गया ??"

" क्या बताऊँ राज!! ब्रेक अप हो गया यार,दिमाग एकदम खराब हो गया,दिल्ली में मन नही लग रहा था साला,और मम्मी पापा के पास जाता तो शादी शादी रट लगा देते इसिलिए छुट्टी लेके यहाँ आ गया।"

" ब्रेक अप हो गया ,पर काहे,हमारा मतलब कैसे?"

" वो तो मैं बाद में बताऊंगा,पहले तुम बताओ,किससे इतना घुस घुस के बात कर रहे थे,जो मुझे और मासी को देखते ही फोन रख दिया।"

" अरे वो ?? वो कोई नही ,,बस ऐसे ही ,,तुम अपनी कहानी बताओ पहले।"

" अच्छा !! तो हमारी कहानी सुनने के बाद साहब अपनी सुनायेंगे।अबे कुछ नही रखा यार मेरी कहानी में,बस एक लड़की थी ,पसंद आ गयी थी .

" फिर?"

" फिर क्या??फिर भाई ने प्रपोस कर दिया,और किस्मत खराब थी साला ,उसने भी एक बार में हाँ कह दी।।"

" इसमें किस्मत का क्या दोष बन्टी,ये तो अच्छा ही हुआ।"

" खाक अच्छा हुआ . राज कानपुर से बाहर निकल के देखो,लोग कितना फॉरवर्ड हो गये हैं,अच्छा एक बात बताओ क्या पढ़ाई करी है मैनें?"

" तुमने वो क्या कहते हैं .

" हाँ हाँ बताओ बताओ,निसंकोच बोलो बे।"

" बन्टी वो इंजीनियरिंग वाली पढ़ाई . "

" हाँ वही बी टेक किया है मैनें ,एम बी ए करने वाला हूँ,अच्छी खासी नौकरी कर रहा हूँ,है की नही?"

" हाँ भाई सौ टका!!"

" अब इसके बाद सुनो ,,इतना सब करने के बाद भी मैं मैडम को गंवार लगता हूँ,कहती है तुम्हारी प्रनन्सियेशन सही नही है।।"

" क्या ??क्या सही नही है??"

" अबे उच्चारण यार . कहती है बेबी तुम ना सही से बोल नही पाते हो,मैनें कहा यार सेक्रेड हार्ट इंग्लिश मीडियम स्कूल से पढ़ा हूँ,कहती है_ होगा पर तुम्हारा एक्सेन्ट सही नही है,तुम ना ब्रिटिश इंग्लिश नही बोल पाते . हिन्दुस्तानी हूँ यार अपनी इंग्लिश बोलूंगा ना भाई।।अब मैं तुझे शुरु से अपनी कहानी सुनाता हूँ ।"

" तो अभी तक क्या सुना रहे थे गुरू!!"

" दिमाग ना खराब कर भाई का यार,वर्ना नही सुनाऊंगा।"

" मजाक कर रहे थे भाई ,तुम सुनाओ यार अपनी राम

कहानी।"

"जानते हो ,पहली बार कहाँ मिला उससे,,अरे वहीं यार . आजकल का प्रेम तीर्थ !! आज कल वही एक जगह है जहां रोज़ हजारों प्रेम कहानियाँ सुबह शुरु होती हैं और शाम होते होते खतम!! मेरी तो फिर भी तीन महीना चल गयी .

" अबे ऐसी कौन जगह है दिल्ली में??"

"अबे दिल्ली नही ,,,,फेसबुक पे!! बन्दी ने ऐसी ऐसी खूबसूरत फोटो डाल रखी थी कि बस पूछ मत भाई . भाई बहक गया,,मैनें फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी उसने मान ली ,,गप्पे शप्पे शुरु हो गयी . अब तो बन्दी रोज़ नया प्रोफाइल पिक लगाये ,कभी लेफ्ट से कभी राईट से ,कभी सामने से,ऊपर से ,नीचे से . मतलब ये की फोटो देख देख के ही मैनें तो यार बच्चों के नाम तक सोच लिये,फिर एक दिन धीरे से प्रपोज़ भी कर दिया,उसने झट मान भी लिया,फिर मैनें मिलने को बुलाया,तब नखरे चालू हुए।।फिर भी आखिर मान गयी . अच्छा उसके ऊपर भी पहली डेट कैसी होनी चाहिये पर भी घुमा फिरा के खूब क्लास ले ली मेरी,कहती है __ 'मेरी हर फ्रेंड को उसके बी एफ ने पहली मुलाकात में कोई ना कोई गिफ्ट दिया है,जैसे टॉमी हाईफ्लायर की वॉच या रिंग..लायक दैट यू नो!!' अब मैं इतना भी नासमझ नही हूँ यार एक सोने की अँगूठी खरीद के ले गया।"

" फिर क्या हुआ??"

" फिर क्या ,जब मैं वहाँ पहुँचा और उसकी शकल देखी . कसम से भाई ,दिल का दौरा आते आते बचा,,भगवान बेड़ा गर्क करे इन चीनियों का ऐसे ऐसे फोन बनाये है ना,ओपो-विवो कि साला इस मोबाईल से अपनी ही फोटो खींच के बंदा ना पहचान पाये,जन्मजात कोयला भी इनमें फिरंगी लगे।। खैर मैनें अपना दिल सम्भाला और जाकर बैठ गया,अब उसके आत्मविश्वास की इन्तेहा देखो,पूछती है__ कैसी लग रही हूँ मैं? मैनें कहा_ तुम हूर हो परी हो, इस दिल्ली की नही लगती,शिमला मसूरी हो। मेरे इस भद्दे जोक पे भी हंसने लगी ,कहती है _ शुक्रिया !! खैर अँगूठी ले आया था तो मैनें निकाल लिया देने के लिये, कहती है __ omg ridiculous! तुम गोल्ड रिंग लाये हो ,मैं तो सिर्फ diamonds पहनती हूँ,,फिर सोच क्या हुआ।।"

" ब्रेकअप??"

" नही यार!! इतना झल्ला भी नही है तेरा भाई ,, बहुत सबर है भाई में . दिल में तो आवाज़ उठी कि जाहिल औरत किसी भी एंगल से तू डायमन्ड के लायक नही लगती पर ऊपर से मैनें कहा__ चलो बेबी शॉपिंग चलतें हैं,ले लेना अपनी पसंद का कुछ!!

अब भाई मैं तो उसे ' शाह जी' ,' अनोपचंद तिलोकचंद' टिकाने वाला था,कम्बख्त ' गीतांजली' ले गयी यार . पूरे बहत्तर हज़ार खरचे तब जाके मैडम के चेहरे पे स्माइल आयी।।

फिर पूरा दिन घुमाती रही ,कभी यहाँ कभी वहाँ, शाम को

जब उसे घर छोड़ने गया,तो मैने बाय बाय के साथ सोचा एक छोटी सी किस ले लूं,कहती है __ नो बेबी !! ये सब शादी के बाद!! मैनें कहा हमारे यहाँ भी गहने शादी में ही चढाये जाते हैं ।।पर मेरा ये खून्खार जोक भी उस नामुराद के पल्ले ना पड़ा ।।

फिर तो बस सिलसिला ही चल निकला,हर वीकएंड पे शॉपिंग मूवी डिनर!! अब यार इतना भी नही कमा रहा था तेरा भाई .

" तो इस बात पे ब्रेकअप हुआ।"

" अबे नही यार!! इतना सब कर के देने के बाद मैडम को ये समझ आया की मैं केयरलेस हूँ मैं उससे रीलेटेड महत्वपूर्ण तारीखें भूल जाता हूँ,जैसे उसके कुत्ते का जन्मदिन, उसकी फुफी की शादी की सालगिरह,हम पहली बार कब एफ बी पे दोस्त बने, इसी तरह के कई बिल्कुल ही भुला देने योग्य तारीखों को कैसे कोई याद रखे।।कहने लगी_ " तुम मुझसे सच्चा प्यार नही करते,तुम बस मेरी खूबसूरती से प्यार करते हो।।" माँ कसम भाई कलेजा मुहँ को आ गया,जी मे आया चिल्ला चिल्ला के कहूं __ कम्बख्त किसी अच्छे आंखों के डॉक्टर से इलाज करा अपना।।पर मैं फिर ज़ब्त कर गया।।फिर उसकी लाईफ मे आ गया एक एन आर आई बंदा!! बिल्कुल फिल्मी स्टाइल में!! उसके पापा के दोस्त का लड़का !! और भाई विदेशियों ने सदियों हम हिन्दुसतानीयों पे राज किया ही है,वही हुआ ।।मैडम भी उड़ गयी सात समंदर पार,और तेरा भाई पी पिला के गम गलत करने लगा।।"

" अरे दारु की लत लगा ली तुमने गुरू।"

" अबे दारु की लत लगाये मेरे दुश्मन।।दारु तो बेटा ऐसा है कि भाई के खून में घुली है,इन्जीनियरिंग फर्स्ट ईयर में रैगिंग में कमीने सीनियर्स ने जब पहली बार पिलायी,हमने फुल एक्टींग करी जैसे हमे बिल्कुल नही जन्ची ।।उन्होनें और पिलायी,हमने भी खूब ढकोल के पिया,,तो दारु तो अब ऐसा है कि चढ़नी ही बन्द हो गयी बे।।हम तो चाय पीने पिलाने की लत की बात कर रहे थे।।

तो बेटा इस तरह हमारी प्रेम कथा शुरु हुई और अपने अंजाम तक पहुंच भी गयी अब तुम बताओ,ये तुम्हारा क्या चक्कर चल रहा है।"

" क्या बताएँ बन्टी,हमारा ऐसा कुछ चलने लायक चल ही नही रहा!! एक लड़की है प्रिया!! पहले हमारी दोस्त बनी, धीरे धीरे अच्छी लगने लगी . अब तो यार आदत सी पड़ गयी है उसकी,पर हमने पहले ही उसे कह दिया कि अम्मा से पूछ कर ही आगे कदम बढ़ाना है।"

" तो मान गयी मासी जी।"

" अबे कहाँ यार!! अम्मा तो अलगे राग छेड़े बैठी हैं सरजूपारी है तो ब्याह नही हो सकता।।"

" अरे तो सरजूपारी भी तो ब्राम्हण ही है,यहाँ तो हमारे पिता श्री ने हमारा नाम ही अजीब रख दिया __ ' रविवर्मा'

इसिलिए बन्टी नाम चलाते हैं ।।कोई बहुत फेमस पेंटर बाबू थे रवि वर्मा साहब!! तुम्हारे कला पारखी मौसा जी यानी मेरे पिताजी को और कोई नाम नही मिला . पहले पहले तो मुझे कॉलेज में सब वर्मा समझते थे फिर जब पूरा नाम बताया तो खासा मजाक भी बन गया__ रविवर्मा उपाध्याय .

हां तो बेटा आगे क्या हुआ?"

" क्या होना था? कुच्छो नही हुआ,ना हो पायेगा,,हम सोच रहे अम्मा के एकदम पैर पकड़ लेते हैं,क्या बोलते हो तुम?"

" क्यों लड़की वाले तैयार बैठे हैं क्या?"

" अबे कहाँ यार!! पहले अम्मा तो तैयार हो जायें ।"

" और अम्मा के तैयार होने के बाद कहीं लड़की वाले मुकर गये तब,क्या करोगे।"

" ये तो सोचे ही नही भाई"

" हमारी मानो तो एक बार लड़की के घर वालों से मिल आओ!! अपने मन की बात बता दो उन्हें,,फिर वो लोग मां गये तो अम्मा तो यार मान ही जायेंगी, आत्महत्या की धमकी चमकी दे डालना और क्या।"

" हम्म!! तो मतलब हम पहले प्रिया के घर वालों से मिल लें और बात कर लें ।"

" बिल्कुल!! और किसी तरह जुगत लगा के दोनो घर की औरतों की मीटिंग करा दो,किसी मन्दिर में!! घर की औरतें तैयार हो जायें ना तो आदमियों को मानना ही पड़ता है बंधु ।"

" बात तो पते की बोले हो बन्टी भाई ,तो फिर निकलते हैं हम प्रिया के घर के लिये,तुम अपनी तलब मिटाओ चाय पीकर!!"

" अबे रुको यार!! बड़ी हडबडी में हो क्या बात है?? चाय पीकर मैं भी चले चलता हूँ,,देखूँ तो ज़रा कौन सी प्रिया बजा रहे हो तुम।"

मेरी हर मन मानी बस तुम, तक बातें बचकानी बस तुम तक

मेरी नज़र दीवानी बस तुम तक

तुम तक तुम तक।।

दोनो भाई चाय खतम कर प्रिया के घर की ओर निकल चले।।

" क्या बात है राज . तुम तो बेटा सच में प्यार में पड़ गये हो जभी रान्झणा के गाने सुन रहे हो।"

" क्यों ज़रूरी है प्यार में पड़ने पर रान्झणा के गाने ही सुने जाये।।"

" नही बिल्कुल नही!! मैं तो ब्रेकअप के बाद ' लम्बी जुदाई' सुनने लगा तो एक दोस्त ने कहा ,कौन से जमाने में जी रहे हो यार,मैने कही क्यों__ तो कहता है आजकल लड़कियाँ ब्रेकअप के बाद दिल पे पत्थर रख के मुहँ पे मेक'प कर लेती हैं,और तुम्हारा बावरा मन जाने क्या चाह रहा,सम्भालो यार खुद को।मैनें संभाल लिया और तबसे जस्टिन बीबर सुनने लगा।।"

" वो क्या गाता है गुरू??"

" पता नही भाई!! मैं तो फैशन के मारे सुनता हूं, लोगो को भले गाने का एक शब्द ना समझ आये पर बनेंगे ऐसे जैसे बहुत बड़े अन्ग्रेजी संगीत के ज्ञाता हो, आस पास इम्प्रेशन मारने एक आध गाना पता होना चाहिये ना।"

कुछ देर पहले अपने दिल से दुखी राज के मन का कुहासा बन्टी की बातों से छन्ट गया,अपनी पूरी ऊर्जा के साथ वो गाड़ी भगाता अगले ही पल प्रिया के दरवाजे खड़ा था।।

दरवाजे को शर्मिला ने खोला,और पूरे आदर के साथ दोनो लड़कों को अन्दर बिठाया।।।

अपने पापा के ऑफिस निकलते ही माँ बेटी में सारी बातें

हो चुकी थी,प्रिया ने पापा की नाराजगी का कारण माँ को बता ही दिया था,शर्मिला को वैसे भी पहले से ही राज पसंद था पर पति की खिलाफत करने की उस भारतीय नारी ने आज तक।कल्पना भी नही की थी,इसीसे अपनी सोच में गुम शर्मिला ने प्रिया को आवाज़ लगाई।।

इस वक्त पे माँ और बेटी दोनो यही चाहती थी की कोई भी बाहरी व्यक्ति ना आये और वो लोग राज के साथ बैठ कर आगे क्या करना है कैसे करना है कि रूपरेखा पर चर्चा कर सकें . पर भगवान को भी कभी कभी अपने प्रियजनों से हँसी मजाक करने का मन करता है इसिलिए वो बुआ जी जैसे लोगों की सृष्टि करतें हैं ।।

प्रिया अपने कमरे से उतर कर आयी ही थी कि दरवाजे को भड़भड़ाती बुआ जी का आगमन हुआ।।

" अरे कौन मेहमान बैठे हैं परमिला?"

बुआ जी का अक्समात आगमन सभी को चकित कर गया।।

"राधेश्याम जी गैस वाले हैं ना,, उन्ही के लड़कें हैं जिज्जी राजकुमार!! "

" हाँ हाँ!! मिले रहे उस दिन !! याद आ गया । औ बेटा कहो कैसन आना हुआ,सब कुसल मंगल घर में,कभी ऐसने अपन अम्मा को भी ले के आओ, शर्मान का भी चरन धूलि पड़े घर मा, ये कौन लड़का है जो साथ मे बैठा है।।"

" प्रणाम बुआ जी,ये हमारे भाई हैं मौसी के लड़के _ रविवर्मा नाम है।"

" हैं,तुम्हरी मौसी का सादी(शादी) वर्मा में हुआ रहा का,कायस्थों को ब्याह दिये लड़की।"

" नही नही बुआ जी इनका नाम ही रविवर्मा है सरनेम उपाध्याय लिखते हैं ।"

" तो बेटा तुम ऐसा उजबक नाम काहे रक्खे।"

" बुआ जी अब क्या बताएँ,ऐसे ही उटपटांग शौक हैं हमारे।"

बुआ जी ने बहुत ही बुरा सा मुहँ बना के मुहँ फेर लिया __" परमिला चाय वाय पिलाओगी कि खुदै आके बना लें।।"

वापस मुहँ घुमा के बन्टी से पूछा__" पढ़ते लिखते भी हो कुछ??"

" जी दिल्ली में नौकरी करते हैं ।"

नौकरी की बात सुनते ही बुआ जी की आंखों में चमक आ गयी,उन्हें प्रिया के लिये घर बैठे चमचमाता रिश्ता दिखने लगा।।

" अरे वाह बचुआ!! कितना नोट कमा लेते हो ।।"

" बस बुआ जी आपके आशीर्वाद से अस्सी हज़ार महीना

बना लेते हैं ।"

बन्टी भी बुआ जी की गिद्ध दृष्टी को ताड़ चुका था इसिलिए वो भी मज़े लेने लगा

" और कौन कौन है घर में,मतलब भाई बहन ,दादी चाचा??"

" बस हम ,मम्मी और पापा!! इकलौते हैं ।।"

बुआ जी के चेहरे पे बिल्कुल ऐसे भाव थे जैसे कई दिनो से खिचड़ी का पथ्य सेवन करते पीलिया के रोगी के सामने छप्पन व्यंजनों से सजी थाल परोस दी गयी हो।।हर एंगल से देखने पर भी इस सजीले नौजवान मे उन्हें कोई कमी नज़र नही आयी।।

वो अभी अपनी बात आगे बढ़ाती कि राज ने अपनी बात कहनी शुरु की__

" बुआ जी ,हमें जादा घुमा फिरा के कहने की आदत तो है नही,हम साफ साफ ही कहेंगे।"

अभी तो बस मन में आया था कि इस दिल्ली वाले से बात चलाऊँ और ये राज समझ भी गया,जो दहेज की बात शुरु कर रहा,बुआ जी ऐसा सोच ही रही थी कि राज ने विस्फोट कर दिया__

" हम प्रिया से शादी करना चाहते हैं ।"

शर्मिला और प्रिया चुप बैठे रहे पर बुआ जी पर जैसे बिजली सी गिरी

" हैं!! क्या करना चाहते हो??"

" शादी करना चाहतें हैं प्रिया से।"

बुआ जी कभी राज को कभी प्रिया को देखने लगी, उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास ही नही आ रहा था,जिस छोरी को उसके सांवले रंग के लिये आज तक वो माफ नही कर पाई थी आज उसके लिये साक्षात रामरतन पंचाग के श्री राम की छवि सा सुन्दर लड़का बाहें पसारे खड़ा था।

बोलो इसे कहतें है किस्मत!! है क्या इस छोकरी मे,भले ही अपने सगे भाई की बेटी है पर ना रूप ना रंग,पर इसे ही किस्मत कहते हैं ।।

बुआ जी को अपने रूप रंग पे इस बुढऊती आने तक भी नाज़ था,उनके अनुसार उनकी शादी किसी कलेक्टर से होनी थी ,वो तो कंजूस भाई ने दहेज बचाने को ऐसी सुन्दर गुलाब की कलि को एक अदना से क्लर्क से ब्याह दिया।।

अपने सारे भावों को समेट कर उन्होनें राज से पूछा __" काहे राज बाबू तुम्हरे घर सब तैयार है का?

" नही अभी तो नही,पर हो जायेंगे।।"

" पर बेटा तुम ठहरे कान्यकुब्ज,हम सरजूपारी !! बडी

मुस्किल आयेगी।।

बुआ जी की बात पर बन्टी उचक पड़ा __" बुआ जी मुश्किल सलटाने के लिये आप हैं ना,,देखिए बुआ जी,अब आपको ही तारणहार बन कर इन दोनो की नैया को पार लगाना पड़ेगा,,चाहे जो हो जाये।"

" हम !! हम ठहरे अनपढ़ ,तुम पढ़ो लिखो के बीच हम का बोलेंगे बेटा ।।"

" अरे बुआ जी खुद को कम ना समझिये . आप जितनी सुन्दर है उससे कहीं ज्यादा आप सुलझी हुई और समझदार लगती हैं हमे।।

" कह तो ठीके रहे हो बेटा पर प्रिया का बाप भी कम ज़ीद्दी नही है,बचपन से अपने छोटे होने का फायदा उठाता रहा है,और आज तक उठा रहा है,एक बार उसने कह दी फिर कोई उसकी बात नही काट सकता।।"

" वो बाद में निबटाएंगे बुआजी,पहले ऐसा किजीये ना एक बार आप और आंटी जी चल कर राज की अम्मा यानी हमारी मौसी से मिल लेते,देखिए शादी ब्याह तो असल में घर की औरतों को ही तय करना होता है,,है ना . जब घर में दामाद आता है सेवा जतन कौन करता है सास . बहू जब ससुराल जाती है,किसके साथ सबसे अधिक समय बिताती है,सास के साथ ना!! दोनों तरफ ही औरतों को ही सब बखेड़ा देखना समझना है तो सही यही रहेगा की एक बार आप लोग आपस

में मिल लो,, फिर यदि आप लोगों को सही ना लगे तो ना करना दोनो का ब्याह।।

" ठीक है बेटा तो यहाँ लेते आओ अपनी मौसी को भी।"

" नही बुआ जी घर पर नही,,कल घाट वाले शिव मन्दिर पर आप दोनों आ जाईये प्रिया को लेकर, हम दोनों आ जायेंगे मौसी जी को लेकर।।पूरी बात वहीं तय कर लेंगे,,एक बार आप लोगों का मन मिल जाये,फिर तो जय शिव शंभू!!भोलेनाथ चाहेंगे तो भाई की बारात मे नागिन डांस करने के बाद ही अब दिल्ली जाऊँगा।।"

बन्टी की बात पर सभी खिलखिला उठे . शर्मिला हँसते हुए मिठाई लेने अन्दर चली गयी और राज और बन्टी वापस जाने उठ खड़े हुए।।

प्रिया दोनों को दरवाजे तक छोड़ने आयी।।मुस्कुराती हुई दरवाजे को पकड़ी खड़ी प्रिया को देख राज ने पूछा __

" क्या हो गया!! बहुत मुस्कुरा रही हो।"

" हम्म बना दिया ना अपने जैसा,कहाँ हम सोचते थे तुम्हें पढना लिखना सीखा देंगे उल्टा तुमने ही हमे हमारी पढ़ाई से दूर कर दिया।।"

" ऐसे काहे बोल रही हो,हमने कब मना किया पढ़ने से।।"

" जब दिमाग से बाहर जाओगे तब तो पढ़ पायेंगे, अगले हफ्ते पेपर है हमारा,सेलेक्शन हो गया तो एक महीना ट्रेनिंग करने बाहर चले जायेंगे यहाँ से।"

" ओह हो एक मिनट ,ये नया पेंच क्या है भाई!! प्रिया नौकरी भी करने की सोच रही हो क्या!! लगता है राज ने तुम्हें बताया नही,मैं बता देता हूँ,हमारी मौसी जी औरतों की नौकरी के तो सख्त खिलाफ हैं,तो कल जब मन्दिर आना अपनी पढ़ाई नौकरी पेपर इत्यादी से सम्बंधित कोई चर्चा वहाँ ना करना,वर्ना बनती बात बिगड़ जायेगी।।

यार देखो !! तुम लोग ना धीरे धीरे घर में विस्फोट करो,ऐसा ना कर देना कि सब घनघोर विरोधी हो जायें तुम्हारे।"

" अच्छी बात है रविवर्मा जी,हम कल कुछ नही कहेंगे।।" प्रिया और राज फिर मुस्कुराने लगे।

" बना लो बेटा!! मेरे नाम का तुम भी मजाक बना लो, पर यही नाम तुम दोनो के शादी के कार्ड मे शुभाकांक्षी में छपने वाला है,समझे।।"

" समझ गये गुरदेव,चलें अब।।

मैं ना मांगूंगा धूप धीमी धीमी .

मैं ना मांगू चाँदनी

मेरे जीने में तुझसे हो इश्क दी चाशनी।।

दोनों भाई गाड़ी में गाने को ट्यून करते हँसते मुस्कुराते घर की ओर चल पड़े ।
 
भाग 12

तेरे बिना चांद का सोना खोटा रे

पीली पीली धूल उड़ावे रे

तेरे संग सोना पीतल

तेरे संग कीकर पीपल

आजा कटे ना रतिया

ओ हम दम बिन तेरे क्या जीना

तेरे बिना बेस्वादी बेस्वादी रतिया ओ सजना .

" लगे रहो बेटा . सही जा रहे हो,,एक एक लक्षण प्रेम मे पागल प्रेमी का दिख रहा तुममे।"

" क्या यार बन्टी,,अब ऐसा क्या देख लिये तुम?"

" जैसे गाने सुन रहे हो ना आजकल बेटा मैं ही क्या कोई अन्धा भी तुम्हारी आंखों में देख पढ लेगा कि बच्चा प्यार में है,,,मैं तो फिर भी पढा लिखा हूँ,और वो भी अच्छी खासी दिल्ली युनिवर्सिटी से . तुमने ये तो ना सोच लिया कि झुमरितलैया से पढ कर भाई इतना ज्ञान बघार रहा है . " अपनी ही बात पे बन्टी ज़ोर ज़ोर से हंसने लगा

" पता है एक बार हमारा बॉस अड़ गया कहता है __ लड़कों कुछ अच्छा करना है मुझे,जिससे मेरे बाद मेरा नाम हो,मैनें धीरे से कहा _ ट्रेन के टॉयलेट में अपना नाम नम्बर लिख आईये,,सदियों तक लोग गंदे टॉयलेट की फ्रस्ट्रेशन में गालियाँ आपके नाम की निकालेंगे।।"

" तुमने ऐसा कह दिया बॉस से।"

" अबे नही यार!! ऐसी पते की बातें तो मेरे मन में ही दफन रह जाती हैं,ऊपर से मैनें कहा __ क्या सोच रहे हैं आप बताइये सर जिससे आपकी कुछ मदद की जा सके,,कम्बख्त कहता है बाइजूज़ जैसा कोई काम का एप बनाना चाहता हूँ कि लोग उसमें बच्चों को पढ़ा कर मेरा नाम लें लाइक ' साहूज़' ।।

मैनें कहा सर एप सही नही है, मैनें एक बार बाईजूज में इतिहास पढ़ना चाहा,कम्बख्त इतना अनाप शनाप हड़प्पा की खुदाई में निकलवा दिया इन लोगों ने कि 'साहनी साहब' की आत्मा भी कलप गयी कि यार ये सब इन लोग कहाँ से निकाल निकाल ला रहे मुझे तो ना मिला आज तक .

" फिर मान गया बॉस??"

" जो अपने मातहत की बात मान जाये वो बॉस ही कैसा?? उसके बाद एप का भूत उतरा तो अब अपने क्लाइंट और खुद की प्रोजेक्ट डिस्कशन की विडियो यू ट्यूब पे लॉन्च करने की प्लान कर रहा है कमीना।।कुल मिला के ना खुद चैन से

जियेगा,ना हमे जीने देगा . खैर मेरी बातें छोड़ और जल्दी से तैयार हो जा फिर मौसी को लेकर मन्दिर भी तो जाना है।"

दोनों भाई बातों में लगे थे कि सुशीला एक बड़ी सी ट्रे में दो प्लेट में नाश्ता और चाय लिये ऊपर चली आयी।।

" अरे मौसी जी हम नीचे ही आ रहे थे,आप यहाँ नाश्ता क्यों ले आईं ।"

" 9 बज गया अभी तक तुम लोग नीचे आये नही तो हम यहीं ले आये,चलो जल्दी से नाश्ता कर लो,तुम्हारी पसंद का आलू का पराठा और मूँग की दाल का हलुआ बनाये हैं बन्टी।।"

" अरे वाह!! मौसी जी इसी बात पे चलिये मन्दिर घूम आते हैं ।"

" मन्दिर?? अभी !! मतलब सुबह सुबह।।"

" मन्दिर तो सुबह सुबह ही जाया जाता है ना मौसी।"

इतनी देर से चुप बैठे राज ने अपनी माँ का हाथ पकड़ कर उन्हें कुर्सी पर बैठाया और माँ की आंखों में देखते हुए अपनी बात उनके सामने रख दी__

" माँ आज प्रिया और उसकी माँ तुमसे मिलने आने वाली हैं शिव मन्दिर मे!! एक बार मिल लो उन लोगों से।"

सुशीला कभी राज कभी बन्टी को भौचक नजरों से देखने लगी

" कर ली आखिर अपने मन की,जब हमसे पूछे बिना ही मिलनी तय कर आये तो टीका बरिक्षा भी तय कर आओ।।"

" अम्मा नाराज काहे हो जाती हो . बिना तुम्हरी मर्ज़ी कुछ नही करेंगे भई ,,कम से कम एक बार मिल तो लो,।।"

" का फायदा मिलने जुलने का ,जब हमरी राय कोनो मायने ही नही रखती तो का फायदा बोलो।"

" कैसी बात कर रही हो मौसी,राज को बचपन से देखे हैं,आज तक आपसे पूछे बिना तो पानी भी नही पीता लड़का,शादी तो बहुत दूर की बात है।"

" पानिये भर नही पीता है,बाकी सलगे काम अपन मर्ज़ी का ही कर रहा आजकल।"

" एक बार मिलने में कोई बुराई नही मौसी,मिल तो लो पहले,बाद की बाद में देखी जायेगी।"

आखिर दोनो लड़कों की बहुतेरी जद्दोजहद ने सुशीला को मिलने जाने की हामी भरने मजबूर कर ही दिया .

सभी समय से तैयार हो कर मन्दिर पहुंच गये।।

" कहाँ हैं भई तुम्हरे मेहमान ?? अभी तक मन्दिरे नई पहुँचे,

बड़ा लड़की ब्याहने चले हैं ।।"

सुशीला की बड़बड़ जारी थी कि बुआ जी मन्दिर के अन्दर से निकल वहाँ उन लोगों के बीच धम्म से कूद पडीं .

" कैसन हो सुसीला, पहले पहल तो मोहल्ले के सब कार्यक्रम में दिख भी जाती थी,आजकल तो दरसनों दुर्लभ है,अब तो बहु वाली हो फिर भी बाहर फिरे को टैम नही निकाल पाती ।"

" अरे हम बाहर घूमै फिरै लागें तो हुई जाये सब काम धाम।।बहु तो आन गयी पर आजकल की छोरियां ना काम की ना काज की . अपने मरे बिना सरग कहाँ दिखता है जिज्जी,लगे रहत हैं दिन भर काम मा, हम ना सकेलें तो पूरा घर पड़ा रहे,बचपना से एही करते आ रहे बस,अपनी मर्ज़ी से तो आज तक एक साड़ी भी नही ली,अब आजकल के बच्चे हैं सादी ब्याह भी अपनी मर्ज़ी से करना चाहतें हैं ।"

" का कहें सुसीला,आज कल के बच्चो में लाज शरम तो रह नही गया,एक हमारा जमाना था,हम सास के भी सामने अपने इनसे बात नही कर पाते थे,और आजकल के लड़िका लोग पहले ही कहे देते हैं ए अम्मा इन संग हमर फेरे फिरा,लुगाई बना दो।"

" खाली लड़कों को काहे दोस दे रहीं,लड़कियाँ कम है का आजकल की,ऐसा तो चटक मटक बनी घूमेन्गी ,और फिर कहीं कोनो लड़का कुछ बोल भर दे तो उसके सर जूतियाँ बरसायेंगी . आजकल की लड़कियाँ बड़ी जब्बर हैं,इनसे पार

पाना मुस्किल है बल्कि लड़के सीधे हो गये है इनके सामने।"

प्रिया ने राज को देखा,वो सर नीचे किये जमीन पर पड़े छोटे से पत्थर के टुकड़े को अपने पैरों से इधर उधर करता बैठा था,बन्टी ने प्रिया को देखा फिर उसकी माँ को और आखिर बीच बचाव करने कूद पड़ा .

" इस चर्चा का तो कोई उपाय और कोई फल नही मौसी जी,,आप दोनो विदुषीयां जब बात कर रहीं तो मुझे बीच मे बोलना तो नही चाहिये,पर मैं कहना चाह रहा था कि राज और प्रिया के बारे में अगर बात कर लेते तो . "

" तो और किसके बारे में बात कर रहे।" मौसी के कठोर जवाब पे बन्टी एक बार फिर मुखर हो उठा

" नहीं मेरा मतलब कि,इनकी शादी के बारे में बात कर लेते तो . "

" अब यही तो तुम बच्चों के दिमाग मे नही आता, कैसे ये ब्याह सम्भव है?? कोई मेल मिलाप ही नही है दोनों घरों का,, आप ही बताइये जिज्जी!! आप बड़ी हैं घर की,,आप ठहरे सरजूपारी हम के के,,कैसे हो पायेगा,नही नही राज के बाबूजी बिल्कुल नही मानेंगे।"

" देखो दुल्हीन हम का कह रहे कि एक बार दुनो के बाबूजी लोगो को बात करने देते हैं,हम भी जानते हैं, की रीत रीवाज, दान दहेज,मिलनी पूछनी सब अलग है ,पर हैं तो दुनो परिवार

ब्राम्हण ।।तो एक बार बात बढाने मे हर्ज का है।"

" बुज़ुर्गवार हो कर कैसी बात कर रही जिज्जी,,पूरा समाज थू थू करेगा,कहेगा हमारे पास नही रही का लड़की जो बाहर से धरे लायी,और सही बोले अब कोई दुराव छिपाव भी नही रह गया,हमारे राज के लिये 50-50 लाख का भी रिस्ता आ रहा है।।"

बहुत देर से चुप बैठी शर्मिला ने अपनी बात रखी__

" मैं कह रही थी,हमाई भी तो अकेली ही लड़की है अब शादी के लिये,इसके पापा ने जो जोड़ जाड़ के रखा है,सब इसी का तो है,हमलोग भी अपनी तरफ से बहुत अच्छी शादी ही करेंगे दीदी।"

" देखो मैं किसी को कम जादा नही आंक रही भाई,,बुरा मत मान जाना पर हमरे बड़के के में भी बिना मांगे पूछे ही सब कुछ आ गया था,अब ये हमारा आखिरी लड़का है,रुखा सूखा ब्याह देंगे तो समाज ताना मारेगा_ कहेगा लड़के में कोनो खोट रहा होगा जभी बिना लेन देन के हो गयी सादी।"

शर्मिला- हम पूछ तो रहे जिज्जी,आप अपनी बात रखिये ना ,हम कोसिस पूरी करेंगे कि आपको कोई असुविधा ना हो।

सुशीला- अरे का का करेंगी?? बरीक्षा ही सात आठ लाख की पड़ जायेगी,फिर तिलक कम से कम इक्कीस का तो चढायेंगी,जेवर जट्टा आप अपन बिटिया को जो दे वो आपकी

मर्ज़ी पर पांव पखारते समय दामाद को चेन तो पहनाएंगी की नही .

फिर तिलक बारात हर मौके पे मेहमानों को लिफाफ़ा पकडायेंगी,अब आजकल 20-50 रुपया का लिफाफ़ा भी तो नही चलता ,कम से कम 100 रुपैय्या तो डालना ही पड़ेगा और लड़के के ताऊ ,चाचा फूफा मौसा लोगो को 500 का ।।सास की पिटरिया रीति तो ना भेज देंगी,रूपा 3 तोले का हार लायी रही ,आप उतना ना सही पर कुछ तो डालेंगी,फिर सास के साथ जेठानि को एक आध कर्णफूल अँगूठी कुछ तो पकड़ाना पड़ेगा ही।।

सामान के लिये चलो हम मना भी कर देंगे पर पार्टी तो देंगे ना आप लोग,कम से कम ग्यारह सौ बराति का खाना खरचा हो जायेगा ।।

शर्मिला- हाँ अब इतना तो करना ही पड़ेगा,,लड़की हमारी है आखिर।।

शर्मिला के धीमे से शब्द जैसे गले में ही रुंध गये

प्रिया- इतना कुछ नही करना पड़ेगा मम्मी ।।माफ कीजियेगा आँटी जी,पर बेटी पैदा करने का जो पाप हमारी मम्मी ने किया उसकी अच्छी खासी सज़ा आपने सुना दी,पर हमे ये सज़ा मंजूर नही है।

राज तुम अच्छे तो बहुत हो,हमे बहुत प्यारे भी हो पर अब हम तुमसे शादी नही कर पायेंगे ,चलिये मम्मी।।

और आँटी आपको एक बात और बता दें,हम आगे पढ़ाई और नौकरी दोनो करना चाहतें हैं,पर शायद आपको ये भी पसंद नही आयेगा,वैसे आपकी पसंद का हममे कुछ भी नही

है,आपको यहाँ आकर हमारे कारण जो भी परेशानी उठानी पड़ी उसके लिये माफी चाहतें हैं ।नमस्ते।।

बन्टी- अरे ऐसे कैसे!! प्रिया बड़ों की बात चीत अभी चल रही है,ऐसे बीच मे तुम्हारा बोलना ठीक नही है,,ये सब तो शुरुवाती बाते हैं,धीरे धीरे सब सुलटाएंगे,तुम काहे इतना टेंशन ले रही हो।

प्रिया- नही बन्टी भैय्या,जहां बातों की शुरुवात ही गलत नींव पर हो वहाँ हमारा सपनों का महल खड़ा नही हो पायेगा,चलिये मम्मी।

प्रिया को जाने कौन सी बात इतनी परेशान कर गयी,राज की अम्मा का हद से ज्यादा बोलना या राज की गम्भीर चुप्पी !! पर इसके बाद बिना रुके वो अपनी माँ का हाथ पकड़े मन्दिर से बाहर निकल गयी,उनके पीछे बुआ जी अपने पुरखों को कोसती दहेज लोभियों पे भाषण देती धीरे धीरे चल पडी,जाते जाते उन्होनें आखिरी व्यंग सुशीला पे भी दे मारा_

" अच्छा नही किया दुल्हिन!! जितना तुमने कहा उतनी सब की तैयारी रही हमारे भाई की,पर ऐसे इस ढंग से बच्चो के सामने . का सोच रही अब खुस रह पाओगी तुम?? कर सकती हो तो हमरी प्रिया के पहले राज का ब्याह कर के दिखा दो, बड़ी खुसी से तुम्हरे द्वारे आयेंगे तुम्हरे राजकुमार के ब्याह का लड्डू खाने,और हम भी तुम्हें न्योत रहे एक महीना के अन्दर अन्दर तुम्हे प्रिया के ब्याह का लड्डू खिला के रहेंगे।।"

आंखों से आग बरसाती बुआ जी अपने घुटने संभालती चली गयी।।

एक सौ सोलह चाँद की रातें,

एक तुम्हारे काँधे का तिल

गीली मेहंदी की खुशबू,

झूठमूठ के शिकवे कुछ

झूठमूठ के वादे भी, सब याद करा दो

सब भिजवा दो, मेरा वो सामान लौटा दो .

रेडियो पर बजते गाने के बोल सुन अनजाने ही दो आंसू प्रिया के गालों पे लुढ़क आये,,खिड़की पर खड़ी वो अपनी सोच में गुम कहीं खो गयी।।

क्रमशः

aparna..

आँधी की तरह उड़कर इक राह गुज़रती है

शरमाती हुई कोई क़दमों से उतरती है

इन रेशमी राहों में इक राह तो वो होगी

तुम तक जो पहुंचती है इस मोड़ से जाती है इस मोड़ से जाते हैं .

कुछ सुस्त कदम रस्ते,कुछ तेज़ कदम राहें .

अपने कमरे में बैठी प्रिया को समझ ही नही आ रहा था कि उसने सही किया या गलत . अपनी माँ का मुरझाया चेहरा वो कभी भी सहन नही कर पाती थी,उस समय भावावेश में आकर उसने राज की अम्मा को खरी खोटी सुना तो दी पर अब रह रह के राज का बुझा बुझा सा चेहरा ,जाते समय उसे रोकती हुई राज की आंखें सब याद आ रहा था, प्रिया जैसे खुद से ही बातें कर रही थी__ अच्छे से जानती हूँ,मेरे सामने तक तो मुहँ खोल नही पाता अपनी अम्मा के सामने क्या बोलेगा,बस नाम का राज बाबू है,सारी होशियारी प्रिंस और प्रेम तक ही सीमित है,,बातें इनकी निकलेंगी जब वसूली करने जातें हैं,बाकी समय तो बस सर हिला के ही काम चला लेंगे . अरे पर एक बार तो अपनी अम्मा को टोक सकता था।"

प्रिया का मन राज से बात करने के लिये व्याकुल हो उठा,

पर हाय रे मन!! मन की भी शायद अपनी आत्मा होती है, देह होता है ,तभी तो हर बड़ी छोटी बात को खुद से लगा लेता है,हाड़ मांस से बने शरीर को जितनी चोट नही पहुंचती उससे कहीं अधिक मन चोटिल हो जाता है .

ऐसे समय जब कोई अपने प्रेम को सर्वोपरी रख अपनी या सामने वाले की गलती पे झुक जाना चाहे ये मन देवदार बन जाता है,अकड़ के तन जाता है,और हर एक इच्छा को अपने नैनों से तोल कर निर्णय लेता है।।

यही प्रिया के साथ हुआ!!उसे मन्दिर में जो सही लगा उसने कर दिया पर अभी उसका मन राज के लिये रो पड़ा,कैसे भी किसी भी हाल में उससे मिलने को वो तड़प उठी . पर जैसे ही उसे मेसेज करने उसने फोन उठाया उसके अन्दर से एक आवाज़ आयी __ वो भी तो कर सकता है फ़ोन,,ठीक है शायद हमने बात बिगाड़ दी पर शुरु तो उसी की अम्मा ने किया था,और दोनो भाई मुहँ में कुल्फ़ी जमाये बैठे थे,हम भी आखिर क्या करते।। हम जाने लगे तब आगे बढ़ कर रोक भी तो सकता था,ठीक है अपनी अम्मा के सामने नही बोल सकता पर हमें तो बोलते समय रोक सकता था,हमे भी कोई शौक तो है नही की दूसरों का अनादर करें,बस हो गया जो होना था,अब एक बार फोन तो कर ले ,पूछ तो ले ,कैसी हो प्रिया ।।पर नही जनाब तो अकड़ के बैठे होंगे,ये विचार आते ही प्रिया का दिल कसमसा के रह गया, उसे राज का मासूम सा चेहरा याद आ गया,भला आज तक कब और किस बात पे वो अकड़ के खड़ा रहा था,वो तो बेचारा फलों से लदा ऐसा तमाल तरु था जिसकी छाँव से

उसकी पूरी बिरादरी सुवासित थी।।

प्रिया ने फ़ोन करने को फ़ोन उठाया ही था की राज के नम्बर से कॉल आ गया,थोड़ी देर पहले का क्षुब्ध स्वाभिमान एक बार फिर करवट ले खड़ा हो गया,प्रिया ने तुरंत उचक कर फोन नही उठाया __ वो भी तो जाने हम प्रिया है।।

हाय रे ये मिथ्या अभिमान!! जिसके लिये दिल टूक टूक रो रहा था,सामने से उसे ही उद्विग्न देख अपनी रोग और पीड़ा भूल गया,और उसके घावों पे मलहम देने की जगह नमक की बोरी उठा ली।।

प्रिया जब तक फोन उठाती फोन कट गया, उसके चेहरे पर एक मुस्कान खिल गयी__ अब, आया ऊंट पहाड़ के नीचे,अच्छा मज़ा चखाया!

एक बार फिर फोन घनघना उठा__

प्रिया- हेलो

राज- प्रिया!!

अपना नाम राज के मुहँ से सुनना था की रहा सहा धैर्य गुस्सा सब भाटे की तरह उतर गया,वेगवती नदी सा बह गया।।

प्रिया-" इत्ती देर से याद आयी हमारी,सुबह से कहाँ मर रहे थे,एक बार को नही सोचा कि हम कैसे जी रहे होंगे।"

राज- अरे सोचा नही होता तो अभी फ़ोन क्यों करते, सुबह से मौका ही नही मिला,सब हमी को घेरे खड़े थे,मन्दिर से आने के बाद अम्मा ने घर पर सब को सब बता दिया है,घर में कर्फ्यू वाली स्थिति हो गयी है।

प्रिया- तो हमारे घर कौन सा हालात कन्ट्रोल में हैं, मन्दिर से आने के बाद बुआ ने ऐसा हंगामा मचाया है कि हमारे घर में भी इमरजेन्सी के से हालात हो गये हैं,,राज एक बात बोलें

राज- घर से भाग चलने बस मत बोलना।

प्रिया- हम वही बोलने वाले थे जादुगर सैंया।।

राज- हम दोनो तरफ सब कुछ संभाल लेंगे बस तुम अपने आप को संभाले रखना,हमे ती समझ नही आता की हम किसे किसे देखे,बाकी सब को या तुम्हें ।कभी भी तमक जाती हो।।

प्रिया-- क्या करें?? हम अपनी अम्मा के लिये कुछ भी सुन नही पाते,,पर अब ध्यान रखेंगे,अच्छा सुनो!! कल कहीं मिल सकते हैं क्या?? अकेले?

राज- क्या हो गया,अकेले काहे मिलना चाह रही??

प्रिया- ऐसा कुछ नही,जैसा तुम सोच रहे,और सुनो!! सोचना भी मत!! हम तो प्लान बनाना चाह रहे कि आखिर ऐसा क्या हो सकता है कि तुम्हारी अम्मा की बात माननी भी ना पडे

और पूरी भी हो जाये।

राज- वही तो हम भी सोच रहे,क्या ऐसा किया जाये कि सब सही हो जाये और किसी को तकलीफ भी ना हो,चलो फिर यही ठीक रहा,कल रॉयल पेलेस चलते हैं,वहाँ बैठ के सोचेंगे ।।

प्रिया- सुनो,एक बात बोलें ।

राज- मना कर देंगे तो नही बोलोगी।

प्रिया- तब तो और ज़ोर से चिल्ला के बोलेंगे,कान फाड़ के बोलेंगे,तुम्हें सता के बोलेंगे।।

राज- तो बोलो ना,पूछती क्या रहती हो,सुनो सुनो सुनो!! जैसे बड़ा सम्मान दे देती हो।।

प्रिया-- कल तुम अपनी नीली शर्ट पहन के आना और हम भी अपनी नीली कुर्ती ही पहनेंगे,ठीक है।

राज प्रिया की बात पर खिलखिला के हँस दिया, तभी अचानक किसी के आने की आहट से दोनो ही चौकन्ने हो गये_

राज- प्रिया बन्टी ऊपर आ रहा है,हम फोन रखते हैं ।।

प्रिया- अरे रुको !! सुनो तो .

राज-- अरे रख रहे हैं यार,तुम तो पिटवा कर ही मानोगी लग रहा।।

हँसते हुए दोनो ने अपना अपना फोन रख दिया।।

पास बुला के गले से लगा के

तुने तो बदल डाली दुनिया

नए हैं नजारे नए हैं इशारे

रही ना वो कल वाली दुनिया

सपने दिखाके ये क्या किया

ओ रे पिया

तुने ओ रंगीले कैसा जादू किया

पिया पिया बोले मतवाला जिया।।

रेडियो पे बजते गाने ने प्रिया के चेहरे पे एक लाज भरी मुस्कान बिखेर दी।।

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अगले दिन दोनो परिवार अपनी अपनी दिनचर्या में लीन थे,सुशीला जहां खुश थी कि चलो उस लड़की से पीछा तो छूटा वही अपनी लाड़ली के दुख से शर्मिला दुखी थी,पर दोनो ही महिलाओं ने आम हिन्दुस्तानी औरतों की तरह ही अपने मन को पूर्ण रूपेण अपने नियन्त्रण में रखा हुआ था,एक दुखी थी एक सुखी थी पर दोनो में से किसी की दिनचर्या में

कोई व्यवधान नही था।।

घर के किसी सदस्य की किसी भी आवश्यकता को अधूरा नही रखा गया था,सब समुचित व्यवस्था थी।।

प्रिया कुछ गुनगुनाती सीढियों से नीचे उतरी, रसोई की खिड़की से झांक लगा के शर्मिला ने उसे आवाज़ लगायी

शर्मिला- लाड़ो!! नाश्ता ले आऊँ तेरा!!

प्रिया- नही मम्मी ,हम कुछ काम से बाहर जा रहे हैं, वापस आकर खा लेंगे

शर्मिला- अरे कम से कम दो पूड़ी तो खा ले।

प्रिया ने मुस्कुराते हुए शर्मिला को देखा,__"पूड़ी तो हमने कब से खाना छोड़ रखा है मम्मी ,भूल जाती हो ,अभी 2 किलो और कम करना है,चलो हम जा रहे वर्ना देर हो जायेगी।।"

" अरे पर जा कहाँ रही छोरी?"

" कहीं नहीं बुआ,जल्दी आ जायेंगे।।

प्रिया के निकलते ही बुआ जी ने शर्मिला को पृश्नवाचक निगाहों से भेद दिया__" परमिला कहीं उस रजुआ का बुखार फिर तो नही चढ़ गया छोरी को,कल तो बड़ा पांव पटकती निकली रही मन्दिर से।।

शर्मिला-- नही पता जिज्जी,वैसे प्रिया ऐसी है तो नही,ज़बान की बड़ी पक्की है मेरी बेटी।।

यही तो लोग नही समझ पाते कि ना प्यार का भरोसा,ना प्यार करने वालों का।।जब एक बार इन्सान प्यार में पड़ जाये तब वो सिर्फ एक ही काम सलीके से और शिद्दत से कर सकता है वो है प्यार,

इसके अलावा हर एक काम बेमानी हो जाता है, ना तो फिर अपना वचन याद रहता है और ना मान सम्मान।।

रॉयल पैलेस जाते हुए प्रिया ने निरमा को भी साथ ले लिया,वहाँ पहुंचने पे देखा राज और, बन्टी पहले से बैठे उनका रास्ता देख रहे थे।।

प्रिया को देखते ही राज की आंखे मुस्कुरा पड़ी,

बन्टी ने आगे बढ़कर दोनो को अपने सामने की कुर्सियों पर बैठा दिया।।

बन्टी- देखो प्रिया और राज,तुम दोनो को ऐसा कोई हल निकालना पड़ेगा जिससे सांप भी मर जाये और लाठी भी ना टूटे।।

प्रिया-- भैय्या हम तो चाहतें हैं,ना सांप ही मरे ना लाठी ही टूटे,क्यों राज!!

राज-- तो क्या सोचा ?? ऐसा क्या करें कि सब मान जायें,

बोलो प्रिया!!

प्रिया- राज तुम हमारे तुम्हारे बारे में सब कुछ अपने पापा को बता दो,हमे यकीन है वो मान जायेंगे।

बन्टी- इत्ता आसान नही है प्रिया पण्डित जी को भोग लगाना,वो भी परले दर्जे के जट्ठर हैं,बल्कि मौसी ही कुछ मुलायम हैं,जब वही इत्ती भरी बैठी हैं तो मौसा जी का सोचो भी मत,उसपे इनके घर के सब पुरखे अमृत पीकर आये हैं,90 की हो चुकी दादी अब तक अपने पसंद की मोहनथाल बनवाती है बहुओं से।।

राज- फिर करें तो क्या करें बन्टी,हमे तो समझ ही ना आ रहा??

प्रिया-- तुम्हें कभी कुछ आसानी से समझ आया भी है? भला हो ये समझ आ गया कि हमसे प्यार है।

बन्टी- देखो बिना दान दहेज ये शादी ना हो पायेगी, प्रिया तुम भी अच्छे से जानती हो,कुछ काम समाज और दुनिया को दिखाने भी किया जाता है,है ना?

प्रिया- हाँ तो?

बन्टी- तो ये कि मौसी जी ने जितना बोला उतना तो करना ही पड़ेगा,अब कुछ तो अंकल जी की भी तैयारी होगी ही,बाकी कमी बेसी को हम पूरा कर देंगे, मतलब हम नही हमारा भाई

राज!! क्यों राज?

राज ने बन्टी की बात पर प्रिया को देखा,उसके चेहरे पर भी कोई भाव नही था,जैसे उसे समझने में दिक्कत आ रही थी कि ऐसा करना सही रहेगा या नही।।

प्रिया-- हमारे पापा को शायद अच्छा नही लगेगा राज

बन्टी- लेकिन कुछ तो रास्ता निकालना ही पड़ेगा ना

तुम अपने पापा को समझा भी तो सकती हो।

प्रिया- हां समझा सकते हैं,पर एक बात बताइये भैय्या ,हम पापा को ये समझायें की राज से रुपये उधार ले कर हमारी शादी उसी से करा दे इससे कहीं ज्यादा आसान ये नही रहेगा कि राज अपनी अम्मा को ये समझा दे कि वो दहेज नही लेना चाहता।

राज- प्रिया तुम्हें क्या लगता है हमनें अम्मा से बात नही की,जितना कह सकते थे कह चुके हैं,,अब देखो यार अम्मा भी अपनी जगह कहाँ गलत है बताओ।

प्रिया- तुम्हारी आँख मे ना तुम्हारी अम्मा भक्ति का चश्मा चढ़ा है,उस चश्मे को उतारो तब नज़र आयेगा की कौन गलत है और कौन सही,,हमे बन्टी भैय्या की बात अच्छी नही लगी।

भले ही एक साधारण नौकरी में हैं हमारे पापा पर आज तक हमे किसी चीज़ की कमी नही महसूस होने दी,राजकुमारी बना के पाला पोसा,और आज हम अपने

स्वार्थ के लिये अपने पापा के आत्मसम्मान को आग लगा दे,ये नही हो पायेगा राज।।

तुमसे प्यार करते हैं इसिलिए तुम्हारे आगे हमारा मान अपमान हम नही देखते पर अपने पापा को तुम्हारे पैरों में रुपयों के लिये झुकते नही देख पायेंगे।

राज- यार तुम बात को कहाँ से कहाँ मोड़ दी,,काहे तुम्हारे पापा झुकेंगे?? हम चुपचाप जितने की उन्हें ज़रूरत होगी लाएंगे और तुम्हारे घर छोड़ जायेंगे। अब कल को हम उनके दामाद बन जायेंगे तो एक तरह से उनके बेटे जैसे हुआ ना,बेटे से कुछ लेने में कैसा संकोच?

प्रिया- सही कह रहे हो ,बेटे से कैसा संकोच?? फिर चुपचाप आने का संकोच काहे कर रहे,डंके की चोट पे आना,अपने अम्मा बाऊजी को बोल कर आना की अपने होने वाले ससुर के लिये रुपये लिये जा रहे, उनके ज़रूरत है।।

राज-प्रिया तुम कोनो कसम खा कर आयी हो का कि लड़े बगैर नही जायेंगे

प्रिया- हाँ बिल्कुल!! वैसे ही जैसे कल तुम्हारी अम्मा कसम खा के आयी रही ।।

राज -- प्रिया!! हम कुछ कहते नही इसका मतलब ये नही कि तुम कुछ भी कहती जाओगी,,अम्मा है हमारी,उन्होनें जितना सहा है ना तुम उनकी पैर की धूल बराबर भी नही हो।। एक बात तो सुन के सही नही जाती तुमसे अम्मा से

बराबरी करने चली हो। अरे बचपन से अपने घर परिवार पड़ोस समाज सब जगह उन्होनें जो देखा है वही उनके दिमाग में बैठा है।। तुम्हारी तरह पढ़ी लिखी होती तब तो उनकी अपनी समझ होती ना,उनके खुद के ब्याह में दहेज मिला,सभी मौसियों का ब्याह ,चाचा का ब्याह फिर बुआ का ब्याह सभी जगह यही देखी है हमरी अम्मा इसे ही सही समझती है,तो इसमे उनकी क्या गलती।।

जिस उम्र में तुम अपनी माँ के आंचल में दुबकी पड़ी थी उस उमर से घर गृहस्थी का बोझ उठा रही हमारी अम्म्मा।।बारह साल की उमर से ददिया सास चचिया सास और खुद की सास की सेवा में प्राण दिये जा रही हैं,और आज तक उनके सर का पल्लू कभी खिसका तक नही और तुम उनकी दो बातें सुन उन्हें पलट के चार बातें सुना गयी।।

मजाल है जो आज तक हमारी अम्मा ने दादी को कभी पलट के जवाब दिया हो,ऐसा तो नही है कि हर बार बड़े बूढ़े सही बात ही बोलतें हों,पर जो भी बोला सुनाया हो दादी ने हमारी अम्मा ने उन्हें या बाऊजी को कभी जवाब नही दिया।।

प्रिया-- हम क्या बोल रहे और तुमने क्या समझ लिया।।

राज- क्या समझ लिया,सही ही समझा।। हमारी ही आँख में चश्मा चढ़ा था,पर अम्मा का नही तुम्हरा,अब उतार फेंकने पर साफ साफ दिख रहा कि तुम्हारा ज्ञान कितना कोरा और उथला है प्रिया ।।

एक बात और कह दें,जो लड़की हमारी अम्मा का सम्मान नही करेगी ,इज्जत नही करेगी हम किसी जनम में उससे शादी नही करेंगे।।

प्रिया-- राज तुम धमकी दे रहे हो हमे।।

राज-- हम सच बोल रहें हैं,,हमारी अम्मा से ज्यादा हम किसी से प्यार नही कर सकते,,तुम अपनी बताओ ,हमारी अम्मा के हिसाब से ढल सकती हो।तो ठीक है वर्ना जाओ,हमें भी तुम्हारी कोई ज़रूरत नही है।

बन्टी और निरमा चुपचाप बैठे दोनो की बातें सुन रहे थे,कुछ देर पहले की साधारण बातें अचानक ही ऐसे मोड़ ले लेंगी किसी ने सोचा भी ना था।।

किसी ने सही कहा है__ बन्दूक से निकली गोली और ज़बान से निकली बात कभी वापस नही हो सकती।।

काश दोनो में से एक ने भी अपनी जिह्वा पे समय रहते नियन्त्रण पा लिया होता तो स्थिति इतनी विकट ना होती।यहाँ गलती किसकी थी किसकी नही ये पक्ष विचारणीय रह ही नही गया,दोनों में से किसी ने उस समय झुकना अपनी शान के खिलाफ समझा।।
 
इस पूरे वाकये को कई दिन बीत गये।। प्रिया ने इम्तिहान पास कर लिया और एक महीने की ट्रेनिंग के लिये पुणे आ गयी,बन्टी भी वापस दिल्ली लौट गया, सभी अपने अपने कामों मे लग गये,जीवन का नाम ही चलना है,वो कभी किसी के लिये रुकता कहाँ है।।

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प्रिया की ट्रेनिंग पूरी हो गयी और पहली नियुक्ति में उसे अम्बा जी गढी जाना पड़ा, उसने अपना कार्यभार संभाल लिया,कभी कुछ दिनों के लिये उसकी अम्मा या बुआ जी आ जाते हैं ।

बन्टी की जिंदगी में एक बार फिर कोई लड़की आ गयी,वो अपने जीवन अपने बॉस और नयी नयी बनी गर्लफ्रैंड में व्यस्त रहने लगा।

सभी का जीवन व्यस्त था,सभी अपने आप में लगे थे,बस एक राज था जिसका जीवन उस शाम रुक गया,,उसने पहले की तरह जिम जाना छोड़ दिया, भैय्या के वसूली के काम में भी अब प्रिंस और प्रेम ही जाते ।।

घर के लोग जैसे अम्मा,बाऊजी बड़े भैय्या चाचा जी सभी अपने लाड़ले के व्यवहार से क्षुब्द थे दुखी थे,पर वो खुश था अपने आप मे,अपने कमरे में अपनी किताबों के साथ।।

अम्मा को लगा प्रिया का भूत उतर गया,अम्मा को इस बात का कई एक बार प्रमाण भी मिल चुका था,, आखिर माँ थी कैसे अपने बेटे के जीवन से अनभिज्ञ रहती,उन्हें समझ आ चुका था की अब प्रिया और राज की हल्की फुल्की भी बातचीत नही होती।।

खूब खोद कुरेद के उन्होनें बन्टी से भी सारी सच्चाई उगलवा ली थी,कि उस शाम के बाद दोनों में कभी कोई बात नही हुई ।।

उस शाम को बीते पूरे तीन साल गुज़र गये . प्रिया चली गयी सिर्फ राज के जीवन से ही नही उसके शहर से भी दूर ।।

पर जब वो चली ही गयी थी राज के जीवन से तो ऐसा क्या था जो राज ने खुद को किताबों में इस कदर गुम कर लिया था।

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समय . समय को किसी से लेना देना नही होता, उसे सिर्फ चलना है ,चाहे कोई लाख चाहे की वो रुक जाये ठहर जाये ,पर नही समय अपनी गति से ही भागेगा।।

इन तीन साढ़े तीन सालों में राज और प्रिया के घरों में परिवारों में मुहल्ले में बहुत कुछ बदल गया।

युवराज भैया ने दो नयी एजेंसी डाल दी,सिर्फ रुपयों पैसों मे ही उनका रुतबा नही बढ़ा बल्कि घर परिवार में भी बढ़ गया,जहां पहले वो घर के सबसे बड़े लड़के थे अब एक छोटे से बालक के पिता हो गये, रूपा पहले ही अभिमानिनी थी अब पुत्र की जननी होकर उस अभिमान के सोने पे सुहागा चढ़ गया।।

खाता पीता परिवार सदा मधुमक्खियों के छत्ते सा होता है,छत्ते में एकत्र मधु के लालच में जैसे मक्खियां भिनकती हैं ऐसे ही नाते रिश्तेदार घेरे रहते हैं ।।

राधेश्याम जी के घर पर भी बेला कुबेला कुछ ना कुछ होता ही रहता था,कोई तीज त्योहार,मुंडन छेदन,सीक सुहागिल हो,इसी बहाने घर परिवार की औरतों को बहाना

मिल जाता,पहले तो सब दबी ढकी आवाज़ में ही राज के ब्याह के प्रगति पत्र का जायजा लेती थी,पर अब वही ज़बान खुलने लगी थी।।

जब घर की माल्किन ही मुहँ मे दही जमा के बैठी हो तो बोलने वालियों को मौका तो मिल ही जायेगा ना।।

" काये हो सुशीला बहन?? कब खिला रही हो रजुआ के ब्याह का लड्डू।"

पड़ोस की बिन्नी काकी अपनी मित्र मंडली में अपने मुहँफट स्वभाव के लिये जानी जाती थी

" अरे बिन्नी जिज्जी हम तो सुन रहे रजुआ कहीं का बड़ा आफीसर बन गया है,,क्यो सुसीला तुम नही बताई कभी ,अरे कहाँ का लार्ड कमिस्नर हो गया है राज।"

" अरे तुम लोग भी ना!! अपने अपने कोच के पेड़े को निहारो ना,सुहागिल तो निबटने दो तब हम बताएंगे कहाँ का लार्ड गवर्नर बना है हमारा राज।"

"चाची जी!! लल्ला जी के लाने ही तो अम्मा जी सुहागिल खिला रही हैं,जो मन्नत मानी थी वो पूरी जो हो गयी।।"

" हां भई रूपा !! अब तो जैसे तुम्हरे कन्हैय्या को गोद खिला रही ऐसे ही एक और बहुरिया आ जाये उसका भी एक आध लड़का लड़की कुछ हो जाये बस फिर तो सुसीला और भाई साहब के सब तीरथ हुई जायें।"

" तुम्हरे मुहँ मा घी सक्कर।।"

जी में आता है, तेरे दामन में सर झुका के हम

रोते रहें, रोते रहें .

तेरी भी आँखों में, आंसूओं की, नमी तो नहीं

तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई, शिकवा, तो नहीं..

तेरे बिना ज़िन्दगी भी लेकिन, ज़िन्दगी, तो नहीं

ज़िन्दगी नहीं, ज़िन्दगी नहीं, ज़िन्दगी नहीं .

माला-- ओ मैडम !! और कोई गाना नही है आपके पास!!क्या यार,सुबह सुबह यही मनहूस गाना बजा देती हो।।

माला की बात पर प्रिया मुस्कुरा के वापस तैयार होने लगी .

माला-- बस यही तो है!! आपसे हम कुछ भी कह लें आप बस अपनी कातिल मुस्कान फेंक दीजिये हम पे

प्रिया- चलो चलो जल्दी से तुम भी तैयार हो जाओ, आज बॉस ने तो सुबह सुबह ही मीटिंग बुलाई है।

माला- हाँ जी मुझे पता है, सुनने में आ रहा था की आर.बी.आई. की टीम आने वाली है।।

प्रिया ने हाथ पे घड़ी बांधते हुए हामी में सर हिला दिया।।

अम्बा जी गढी से एक साल पहले ही प्रिया को अपनी दुसरी पोस्टिंग पुणे में मिल गयी थी, पहले पहल वर्किंग वीमेंस हॉस्टल मे रहने के कुछ समय बाद सदाशिव पेठ में प्रिया अपने ऑफिस की कुलीग माला के साथ शेयरिंग फ्लैट में रहने चली आयी थी .

दोनों सखियाँ साथ ही ऑफिस आती जाती,

मस्तमौला और हंसमुख स्वभाव की माला बेहद बातूनी थी इसीसे उसके स्कूल कॉलेज घर परिवार ,पास के दूर के नाते रिश्तेदार हर किसी के बारे में प्रिया को सब कुछ पता था,पर माला के बार बार पूछने पता करने पर भी जाने क्यों प्रिया ने उससे उतनी ही बातें बताईं जितनी ना बताती तो भी कोई फर्क नही पड़ता।।

प्रिया का अपने घर जाना बहुत कम हो गया था,हर रविवार वो अपनी मम्मी को फोन कर घर परिवार का हाल समाचार लेती रहती थी, गाहे बगाहे बड़ी बहन वीणा भी उसे फोन कर शादी कर लेने का उलाहना सुनाती रहती थी।।

मम्मी पापा से बात कर घर की ,अपने मोहल्ले की अपने शहर की याद जब हद से ज्यादा सताने लगती तब वो अपनी छोटी सी टाउनशिप में बने बड़े से जिम पहुंच जाती,माला इस बात पे अक्सर उसे आड़े हाथों लिया करती __ ' अरे कभी समय भी तो देख लिया कर,,रोज़ तो सुबह सुबह जिम पहुंच ही जाती है,फिर अचानक क्या होता है तुझे जो कभी शाम मे कभी रात में 9 बजे जिम भाग जाती है, यार फिटनेस फ्रीक होना अच्छी बात है पर तू तो साइको होती जा रही है,अपने

आप को देख . बिल्कुल जीरो फिगर हो गयी है,कहीं कुछ समय बाद गायब ना हो जाना।।

" तेरी तो हर बात अजीब ही लगती है बन्सी!! अब इस मोबाइल के ज़माने में चिट्ठियां कौन लिखता है तुझे,,किसी दिन तेरे इस पेन फ्रेंड को पकड़ के रहूंगी।"

पर माला बस ताने मार के अपनी बात खुद भूल जाती,इतने महिनों से आने वाली चिट्ठियों को ना कभी उसने पढ़ने की कोशिश की और ना चिट्ठी भेजने वाले को पकड़ने की।।

हर पन्द्रह बीस दिन में आने वाली इन चिट्ठियों में जैसे प्रिया की जान बसती थी,, बुआ की लिखी इन चिट्ठियों में सारे रिश्तेदारों का हाल समाचार रहता था,पर कहीं किसी कोने में बुआ हमेशा उसके बारे में भी एक लाइन लिख ही जाती थी और उसी एक नाम की अमृत बूंद पूरे महीने के लिये प्रिया को जीने का बहाना दे जाती।।

" क्या बताऊँ छोरी!! तेरे पीछे से रजुआ ने तो घर से निकलना ही छोड़ दिया है।।"

" बिटिया सुनने मे आ रहा सुसीला का छोरा भी कोई परीक्षा दे रहा।।"

ऐसे ही समय समय पर बिना प्रिया के पुछे भी बुआ जी राज के बारे में यत्न पूर्वक हर खबर उसे दे जाती।

"कितना दुबला गया है का बताएँ लाड़ो,लम्बा तो पहले ही भतेरा था,अब तो पूरा ताड़ लगने लगा है।"

" सुना है सुसीला ने जहर खाने की भी धमकी दे डाली सादी कराने,,,पर मजाल लड़के के कान में जूं भी रेंग जाये।"

"बिटिया कोई कोई तो जे भी कह रहा की रजुआ दीछा उक्छा (दीक्षा) लेने वाला है।"

" मुझे तो कभी कभी डर लागे है छोरी,जे छोरा किसी कनफड़े गुरू की शरण में हिमालय ना निकल जाये।"

ऐसे ही बताने योग्य-अयोग्य हर बात बुआ जी बिना किसी आडम्बर के लिख जाती और मात्र उस एक पंक्ति में छिपे अपने जीवन की सार्थकता को बड़े यत्न से प्रिया अपनी इत्र से सुवासित हाथी दांत की बनी डिबिया में सहेज लेती ।

जैसे उसके जीवन में अब दो ही महत्वपूर्ण बातें बची थी,एक रोज़ का जिम और दूसरा बुआ जी की चिट्टीयां।।

दोनों भागती दौड़ती स्टॉप पे लगभग समय से पहुंच ही जाती थी,उनके बैंक की गाड़ी उन्हें लेने और छोड़ने आया करती जिसमें उनके अलावा आस पास के और भी एम्प्लायी हुआ करते।

और दिनों की तरह उस दिन भी गाड़ी में सब होने वाली मीटिंग की चर्चा में लगे थे।।

" प्रिया यार तू संभाल लियो ज़रा।। उस बड़बोले सिद्धार्थ

की तेरे सामने ही बस बोलती बन्द रहती है,वर्ना हम सब को तो वो आंखो से ही गोली मार देता है हिटलर!।।

" शट अप राहुल!! फिजूल में प्रिया को परेशान ना करो,और बॉस के बारे में ऐसा बोलते शरम नही आती।।"

" नो माला!! बिल्कुल शरम नही आती,उस खबीस बॉस को शरम आती है,इतनी सारी लड़कियों के सामने मुझ जैसे हैण्डसम बन्दे को यूँ लताड़ देता है, फिर . मुझे तो उसे कमीना बोलने मे भी शरम नही आती।।

" कम ऑन राहुल!! जब तुम बॉस बनोगे तब तुम भी ऐसे ही हो जाओगे,क्यों है ना प्रिया ।।"

प्रिया मुस्कुरा के रह गयी

" प्रिया यार कहाँ खोयी रहती है तू,बस हर बात का एक ही जवाब,तेरी स्माईल !! कोई लड़की इतना कम भी बोल सकती है मैनें कभी सोचा भी ना था,चलो यार भागे,,जल्दी से तैयारी कर लेते हैं,सिद्धार्थ आता ही होगा।।"

कॉर्पोरेट जगत को कई मायनों में अन्ग्रेजी सभ्यता का अनुगामी माना जा सकता है,व्यवसायिक पाठ्यक्रमों में जहां सीनियर्स के लिये सर और मैडम बोलना प्रारंभ हुआ वही कॉरपोरेट में चाहे आपका सीनियर आपसे 30 साल भी बड़ा हो पूरे आदर के साथ उनका भी नाम ही लिया जाता है।

प्रिया के बैंक में भी कई सहकर्मी थे हर आकार प्रकार के,अलग अलग धर्म -जाति और उम्र के।।

प्रिया का ऑफिस का कार्य लोन इत्यादी से सम्बंधित था जहां उसे सिद्धार्थ को रिपोर्ट करना होता था,सिद्धार्थ 29-30 साल का नौजवान था जिसने बैंकिंग में कई श्रेणियाँ उत्तीर्ण कर अपने लिये यथोचित स्थान और सम्मान कमा लिया था।।

सिद्धार्थ- हेलो फ्रेंड्स ,जैसा की आप सभी जानतें हैं, आर बी आई का दौरा होने वाला है,और हमे इस बार उनकी हर बात उनकी हर चुनौती के लिये तैयार रहना है।।

उनकी सबसे ज्यादा नज़र लोनधारकों से जुड़ी है,तो मैं चाहता हूँ प्रिया,राहुल और नेहा आप तीन लोग टीम बनाकर इस काम में लग जायें।

किसी भी खाता धारक के पेपर्स अधूरे नही होने चाहिये,कोई भी रैंडम पेपर्स वो लोग मांग सकते हैं।

बड़ी सरकारी डील्स,एन जी ओ के साथ हुई डील्स और बड़ी ज़मीनों के लीज वगैरह के कोई पेपर कच्चे ना रहे,और हो सके तो आप लोग एक बार क्या क्या पूछा जा सकता है उनके जवाबों की रिहर्सल भी कर लेना,,ओके गाईज़।"

इसी तरह की कई अति महत्वपूर्ण चर्चाओ को निबटा कर सिद्धार्थ अपने केबिन में चला गया।।

" भई हम तो सिर्फ टाईम पास कर रहे यहाँ,काम तो बस दो ही बन्दे करते हैं एक सिद्धार्थ दूसरा प्रिया।"

" क्यों राहुल,ऐसा क्यों बोल रहे।"

'" और क्या ,सही तो कह रहा हूँ,बन्दे को और कोई तो नज़र ही नही आता,सारी प्लानिंग्स बस एक, ही को बताईं जाती हैं प्रिया मैडम को,अमा यार हम भी खड़े हैं,जब हमारा नाम ले रहे हो तब तो हमें देख लो, यार प्रिया इसने तुझे अब तक प्रपोज़ कैसे नही किया।।"

प्रिया- बकवास मत करो राहुल!! सिद्धार्थ को लगता है कि हमें जल्दी से कुछ समझ नही आता इसिलिए हमे ही सब कुछ एक्सप्लेन करते हैं।"

राहुल- वॉव ग्रेट!! अच्छी जोड़ी है तुम दोनो की,सच कहता हूँ प्रिया तुम सोच सकती हो बन्दे के बारे में,अरे दक्षिण भारतीय है तो क्या हुआ है तो वेदुला ब्राम्हण।।नार्थ वेद्स साऊथ,बेहतरीन जोड़ी जमेगी।"

राहुल की बात अनसुनी कर प्रिया अपने डेस्क पे चली गयी,राहुल की हमेशा की ही आदत थी जिसे प्रिया ही क्या कोई भी गम्भीरता से नही लेता था, पर यही हँसी मजाक की बातें सिद्धार्थ के कानों में भी पहुंचने लगी थी।।

29 साल का सिद्धार्थ तेलुगू ब्राम्हण परिवार का इकलौता लड़का था,इंजिनीयरिंग की पढ़ाई के दौरान ही विदेशों में आगे की पढ़ाई के लिये की जाने वाली टफेल में सफल नही हो पाने के बाद उसने प्रथम प्रयास में ही बैंक पी.ओ.का इम्तिहान पास कर लिया था,और उसके बाद सिलसिलेवार अपनी मेहनत और बुद्धि के बल पर अच्छे खासे सिनियर्स को

पीछे छोड़ते हुए वो उच्च पद पर आसीन था।

पढ़ा लिखा नये ज़माने का सिद्धार्थ जो पहले बात बात पे शादी का माखौल उडाया करता था,उसके लिये उसके कैरियर से अधिक कोई बात महत्वपूर्ण नही रही थी,पर अब इधर कुछ दिनो से शादी ब्याह को लेकर गम्भीर होने लगा था,एक दिन हँसी मजाक में उसने अपनी माँ से पूछ भी लिया__ कि अगर वो किसी उत्तर भारतीय कन्या से विवाह करना चाहे तो क्या उसकी माँ को आपत्ति हो सकती है के जवाब में उसकी माँ ने आगे बढ़कर अपने बेटे का माथा चूम लिया और उसकी खुशी में ही अपनी खुशी का ठप्पा लगा दिया था।।

दुबली पतली सांवली सलोनी चुप चाप अपने काम में लगी रहने वाली प्रिया पहली ही नज़र में उसे बहुत भा गयी थी,पर आज तक किसी बहाने भी सिद्धार्थ उससे अपने दिल की बात नही कह पाया था .

नये साल की पार्टी में जब उसे जबर्दस्ती माईक पकड़ा दिया गया था तब कितने मन से उसने प्रिया की तरफ देखते हुए गाया था__

एक अजनबी हसीना से यूँ मुलाकात हो गयी

फिर क्या हुआ ये ना पूछो कुछ ऐसी बात हो गयी।

उसी के बाद से राहुल और ऑफिस के कुछ एक उसके हमउम्र सहकर्मी प्रिया को उसके नाम से छेड़ने लगे थे,उसे अपने केबिन से ये सब हल्की फुल्की गपशप सुनना बड़ा

पसंद आता था पर आज तक उसके नाम पे प्रिया को चहकते उसने कभी नही देखा था,बल्कि नये साल की पार्टी वाले दिन भी जब सबने उसे गाने का इसरार किया तब भी कैसा तो मनहूस सा गाना गाया था उसने__

तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नही .

पर जो भी हो ,उसे धीर गम्भीर सी चुप चाप सी रहने वाली प्रिया ने मोह लिया था। इसिलिए इतना ध्यान रखने पर भी कोई ना कोई चूक उससे हो ही जाती थी, जब कभी प्रिया के साथ बाकी लोगो को वो काम के बारे में कुछ भी बताया करता उसकी नज़रे सिर्फ और सिर्फ प्रिया पर ही टिकी होती।

आज की इतनी महत्वपूर्ण मीटिंग में भी यही हुआ।

इस मीटिंग के पूरी होते ही सारे लोग अपने अपने क्यूबिक पे जाकर काम पर जुट गये।।

वैसे तो आर बी आई की टीम इसके पहले भी विज़िट पे आ चुकी थी,पर वो विजिट तकरीबन 8 साल पहले हुई थी,इसीसे इस बार तैयारियाँ कुछ अधिक ही उफान पर थी,इस बार 3 लोगों की टीम आ रही थी जो पूरे पांच दिन रह कर अलग अलग विषयों पर बैंकर्स को ट्रेनिंग देकर और उनका ऑडिट कर जाने वाली थी,जिनमें शुरु के दो दिन ऑडिट के थे और बाकी के दिन ट्रेनिंग के।।

सभी को ऑडिट का ही डर सता रहा था,जितनी भी

इमानदारी बरती जाये कही ना कहीं कोई ना कोई फाइल ऐसी कच्ची रह ही जाती है जिसपे ऑडिटर की पैनी नज़र पड़ ही जाती है।

अपना काम जल्दी निपटा कर प्रिया माला के क्यूबिक में पहुंची__

प्रिया-" क्या हुआ माला मैडम?? अभी तक समेटा नही ,सब का सब फैला पड़ा है।।"

माला- अरे नही यार!! ये कहाँ कहाँ से आते है धारक!!बोल बोल के हम बैंकर्स मर जायेंगे पर मजाल है जो ये लोग सारे के सारे पेपर्स एक बार में जमा कर दें,खैर तूने कर लिया क्या सारा काम।

प्रिया- हाँ डाटा हैंडलिंग तो कर ली सारी,बाकी भी फाइल्स कर ली है ,कुछ थोड़ा सा चेक करना है वो रूम पे हम कर लेंगे,तुम्हें और कितना समय लगेगा।

माला- क्यों तुझे निकलना है क्या??

प्रिया- हां . वो आज मंगल है ना हमे मन्दिर जाना है।

माला- अरे हाँ यार!! मैं भूल कैसे गयी?? तेरा तो हर मंगलवार एपॉइंटमेंट रहता है ना हनुमान जी के साथ, तो तू निकल ले,मैं सीधे रूम पे ही पहुंचती हूँ ।।और बन्सी यार आज कुछ अच्छा सा पका लेना खाने में,बॉस ने आज कुछ

ज्यादा ही पका दिया ऑफिस में ।

प्रिया- नाम भी बता दो डिश का ,क्या खाना है।।

हँसते हुए प्रिया अपना बैग लटकाये माला से विदा लेकर मन्दिर के लिये निकल गयी।।

ऑफिस से मन्दिर दूर था,जल्दी जल्दी भागती दौड़ती प्रिया ने बस पकड़ी और आरती शुरु होने के पहले पहुंच गयी।।

मंदिर की भीड़-भाड़ में उसे आज काफ़ी पीछे खड़े होना पड़ा,अपनी जगह पर खड़ी दोनो हाथ जोड़े वो वापस अपने शहर पहुंच गयी थी।

इसिलिए तो शायद हर मंगलवार वो यहाँ आया करती थी,यहाँ पहुंचते ही कितना सुकून मिलता था, सब कुछ सिलसिलेवार याद आने लगता था,हर मंगल के लिये एक ही स्मृति उसके मानस पटल पर अंकित थी,पर वही एक स्मृति हर बार उसे पुलकित कर जाती थी,जब वो राज के पीछे उसकी बुलेट पे बैठी पहली बार बड़े हनुमान मन्दिर गयी थी, दोनो ने साथ ही हाथ जोड़े थे और उसके बाद लगभग दस मिनट तक आँख बन्द किये राज के होंठ धीरे धीरे कुछ बुदबुदाते रहे थे और वो निर्निमेष उसे देखती खड़ी थी।।

लोग कहतें हैं वस्तुएं बेजान होती हैं,पर वही किसी की स्मृति से जुड़ कर कैसी सजीव हो उठती हैं।

इसी मन्दिर से पहली बार निकलते समय बाहर की छोटी सी फूलों की गुमटी में लटकी रुद्राक्ष की माला उसे कैसे मोह गयी थी,और उसने झट उसे खरीद लिया था,वैसा ही रुद्राक्ष तो वो सदा अपने दायें हाथ में पहना करता था।

गोरे चौड़े से मणिबंध में कसा रुद्राक्ष कितनी ही बार उसकी धड़कनों में उथल पुथल मचा चुका था।।

राडो की उसकी घड़ी,रे बैन के ग्लास ऐसा कौन सा उसका स्मृति चिह्न था जो प्रिया ने सहेज के ना रखा हो,ये सारी वस्तुएं अपनी कमाई से खरीद खरीद कर उसने अपनी आलमारी के एक हिस्से में ऐसे सजा रखी थी जैसे खुद राज ही उस हिस्से में आकर बस गया था।

अपने विचारों मे मगन प्रिया ने आंखें खोली तो एक बारगी उसका दिल धक से रह गया .

उसके सामने खड़े लोगों में थोड़ा आगे राज से डील डौल वाला कोई खड़ा था ।।

हाँ वही तो लग रहा है,वही चौड़े कंधे,वही घने बाल!! फिर अपनी ही सोच पे प्रिया को हँसी आ गयी__ 'वो आकृति हृदय में ऐसी छप गयी है कि हर जगह वही नज़र आता है' यहाँ कहाँ से राज प्रकट हो जायेगा।।

तीन साल से अधिक समय बीत चुका उसे देखे ,,उस शाम के बाद तो गुस्से में उसका नम्बर भी फ़ोन से हटा दिया था,पर दिल से कहाँ हटा पायी।।

इसिलिए कभी कहीं कोई छै फुटिया गोरा चिट्टा नज़र आता तो मुस्कुरा के रह जाती,अपने आप को समझा के __ नही ये वो नही है।।

उसके यहाँ दूध देने आने वाला गोपाल अलाहाबाद का ही तो है,उसकी आवाज़ और बोलने का तरीका कितना मिलता

है राज से,, इसिलिए आगे पीछे जब समय मिल जाये प्रिया उससे दो बातें कर ही लेती है।।

कई बार अपने मन को समझा चुकी,इतना सब उसके लिये कर के भी उसी से बात करने में इतना संकोच क्यों।।

उस शाम के बाद कितना इन्तजार किया था प्रिया ने कि एक बार वापस राज फोन कर ले,तुरंत दौड़ कर उसके पास चली जाऊंगी ,उसकी माँ के भी

पांव पकड़ लूंगी . पर वो राह तकती रह गयी,कोई फ़ोन नही आया,और फिर इम्तिहान पास कर वो दूसरे शहर चली आयी ,,पर हर दफा उसकी आंखे और कान फोन की रिंग पर ही बने रहे।।

एक फ़ोन तक करना राज ने ज़रूरी नही समझा।।

अपने मन को कितना मारा था उसने और आखिर अपनी सारी हिम्मत जुटा के अपनी पहली पोस्टिंग के बारे में बताने राज को खुद ही फ़ोन लगा लिया।

पर हाय री किस्मत!! फोन उठाया भी किसने, रूपा भाभी ने,,कैसी कड़वी थी वो बात चीत __ " अच्छा तो नौकरी लग गयी तुम्हारी,चलो अच्छा हुआ, वर्ना जैसा रंग है ऐसे में लड़का मिलना बहुते मुस्किल होता,है ना प्रिया . अब वहीं अपने बैंक में ही कोई ठीक ठाक छोकरा पकड़ ब्याह कर लेना,तुम्हारे लिये भी वही अच्छा रहेगा।"

" हमारे ब्याह की चिंता करने की आप को ज़रूरत नही है भाभी,हमारे मम्मी पापा हैं ये सब देखने के लिये।"

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" मम्मी पापा को भी कहाँ मौका दे रही हो,तुम तो खुदे खोजे पड़ी हो,सोभा देता है का लडकियों का ऐसे उज्जडपना ,आप ही बता रहीं कि अम्मा हमारे फेरे फिरा दो अब . अब हमें मायके में नींद नही आती, वैसे तुम्हें बता दे कि हमारे लल्ला जी ने तो अम्मा के चरणों की सौगन्ध उठा ली है कि उनकी पसंद की लड़की से ही ब्याह करेंगे चाहे भले कानी लूली क्यों ना हो।।"

अपमान से प्रिया के कान जलने लगे .

" आपकी रेखा से तो ठीक ही हैं,उसने तो बताने की भी ज़रूरत ना समझी ,खुद ही मन्दिर में माला बदल आयी,और सीधे आशीर्वाद लेने पहुंच गयी।"

बोल कर तड़ाक से फोन काट दिया था उसने, बिस्तर पर पड़ी कितनी देर तक रोती रह गयी थी .

पता नही रूपा भाभी की बात में कितनी सच्चाई थी पर उस दिन के बाद से उसने कभी राज को फ़ोन नही लगाया,,बहुत बार उठा कर फिर वापस रख दिया था।।

आज, मन्दिर में उस लड़के को पीछे से देख बिल्कुल ऐसा लगा जैसे मानो राज ही दोनो हाथ जोड़े आंखे बन्द किये होंठो में कुछ बुदबुदाता खड़ा है,एक बार को मन किया कि उस तक पहुंच जाये,बाजू में जाकर कम से कम चेहरा तो देख ही सकती है,पर फिर अपनी ही बुद्धि पे हँसी आने लगी, कैसी बचकानी हरकत होगी ये,कहीं वो कोई और निकला तो?? क्या कहेगी ,कि क्यों उसे देख रही थी।।और चलो मान लिया कहीं राज ही निकल गया तो3 Question mark

इस तो का कोई जवाब प्रिया के पास नही था, ऐसा

होना सर्वथा असम्भव था,मुस्कुरा के एक बार और प्रणाम कर वो मन्दिर से बाहर निकल गयी।।
 
रोज़ सुबह 9 बजे खुलने वाला बैंक आज सुबह 6 बजे से ही खुल गया था,पूरे बैंक को झाड़ पोंछ कर चमका दिया गया था,बैंक ऐसा दिख रहा था जैसे ताजी बनी काजू कतली पे लगा चांदी का वर्क।

और दिनों की तरह सरकारी बैंक वाला ठप्पा आज यहाँ कही नज़र नही आ रहा था,बिल्कुल किसी शानदार प्राईवेट मल्टीनेशनल बैंक की तरह चमकते अपने बैंक को देख प्रिया और माला की आंखें भी खुशी से चमक उठी थी।।

वैसे उन लोगो का कोई फॉर्मल ड्रेस कोड नही था,पर आज सारे ही लोगों को समरसता दिखाने की ताकीद की गयी थी,इसीसे सभी पुरूष सफेद शर्ट में और महिलाएं केरला ओणम वाली क्रीम कलर की साड़ी में थी।।

आर बी आई की आने वाली टीम के दो सीनियर मेंबर चेन्नई से आ रहे थे और एक मेंबर कोच्ची से था।।

अपने निर्धारित समय से दस मिनट पहले ही टीम वहाँ पहुंच गयी, सभी कर्मचारी अपने क़्युबिक में अपने अपने काम पर लगे हुए थे, लोगों की भी भीड़-भाड़ बढ़ चुकी थी,ऐसे में टीम धीरे-धीरे सब जायजा लेती एक से दूसरी जगह तफरीह कर रही थी,पहले बताया गया था 3 लोग आने वाले हैं,पर कुल 4 लोग आये थे,जिनमें से 2 अन्दर वाले हॉल में ऑडिट शुरु करने चले गये थे . बाकी दो लोग कर्मचारियों

से मिलते जुलते उनकी डेस्क पर ही किसी भी फाइल को पूछ ले रहे थे।।

कुछ थोड़ी ही देर में सिद्धार्थ हडबडाया सा प्रिया के डेस्क पे आया__" प्रिया वो लीज़ वाली फाइल ले कर तुम आ जाओ ,एक्सप्लेन करना पड़ेगा,असल में वो काम मैनें देखा ही नही था,और उसीकी फाइल मांग रहे हैं,तुम आ जाओ जल्दी!!

प्रिया फाइल लिये सिद्धार्थ के केबिन में पहुंची ही थी कि टीम में से किसी ने कॉफ़ी की फरमाइश कर दी __" हमें तो सिद्धार्थ जी चाय ही पिलवाइये, कल जब से पुणे आये हैं,ढंग की एक भी चाय नही मिली।"

प्रिया का दिल उछल कर मुहँ को आ गया,ये आवाज़ तो राज की थी,हाँ उसी की थी . अपनी आखिरी सांस तक भी कभी इस गहरी आवाज़ को भूल पायेगी क्या, आवाज़ की तरफ उसने मुड़ कर देखा, रिवॉलविंग चेयर पे वही तो बैठा था,अपनी सफेद कमीज की बाहों को कुहनीयों तक मोड़ कर दाहिने हाथ मे ऑडिटर वाली पेन्सिल पकड़े टेबल पर पड़ी फाइल को देखता,,बिल्कुल वैसे का वैसा।। पर बुआ सही कह रही थी ,कुछ दुबला हो गया था,और ये चश्मा कब लग गया जनाब को।।

अपने इस अवतार में तो और भी लुभावना हो गया था राज!!

राज को देख ही रही थी कि राज से उसके किसी साथी ने कुछ कहा,जिसे सुन वो खिलखिला के ज़ोर से हँसा और

तभी उसकी नज़र दरवाजे पे खड़ी प्रिया पर पड़ गयी।।

रिवॉलविंग चेयर पे वही तो बैठा था, अपनी सफेद कमीज की बाहों को कुहनीयों तक मोड़ कर दाहिने हाथ मे ऑडिटर वाली पेन्सिल पकड़े टेबल पर पड़ी फाइल को देखता,,बिल्कुल वैसे का वैसा।। पर बुआ सही कह रही थी ,कुछ दुबला हो गया था,और ये चश्मा कब लग गया जनाब को।।

अपने इस अवतार में तो और भी लुभावना हो गया था राज!!

राज को देख ही रही थी कि राज से उसके किसी साथी ने कुछ कहा,जिसे सुन वो खिलखिला के हँस पड़ा और तभी उसकी नज़र दरवाजे पे खड़ी प्रिया पर पड़ गयी।।

कितनी दुबली हो गयी थी प्रिया!! पहले से कुछ अलग भी लगने लगी थी,अपने लम्बे बालों को सदा बांधे रखने वाली प्रिया के बाल कितने करीने से कटे संवरे उसने खुले छोड़ रखे थे,एकदम एक सीधी लाइन मे सतर सीधे बाल ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने गर्म लोहा चला दिया हो ,उसपर सामने की कुछ लटें हवा से उड़ कर बार बार ,

आंखों के आसपास आ उसे परेशान कर रही थी,जिन्हें उतनी ही शालीनता से अपनी उंगलियों से कान के पीछे संवारती प्रिया कितनी प्यारी लग रही थी .

खुले बाल ,आंखों मे लगा काजल,कानों में छोटे-छोटे हीरे के कर्णफूल,और गले में सोने की पतली सी चेन,उसी से मैच करती रागा की घड़ी, स्मार्ट तो पहले ही थी अब महानगरीय छवि को इतनी आसानी से आत्मसात कर और भी मोहक हो चली थी .

दोनों ने अभी एक दूसरे को भर नज़र देखा भी नही था कि सिद्धार्थ की आवाज़ उनके कानों में पड़ी

सिद्धार्थ -"सर ये मेरी एम्प्लायी हैं प्रिया!!,ये आपको इस फाइल की सारी डिटेल्स समझा देंगी, कम प्रिया!!"

राज-" हेलो!! प्लीज़ बी सीटेड!!

प्रिया- " थैंक यू" बोल कर प्रिया राज की सामने की कुर्सी पर बैठ तो गयी पर उसे खुद अपने आप पर बड़ी शर्मिंदगी सी हो रही थी,,राज को देखने के बाद उसकी हृदय गति जिस तीव्रता से बढ़ती चली जा रही थी ,ऐसा लग रहा था शताब्दी से होड़ लगा रही है।।

कांपते पैरों को यथासम्भव संयत कर उसने झुक कर फाइल उठा ली,,ऑफिस की सबसे होनहार एम्प्लायी का सारा तेज़ आज चूक गया,वहाँ की सबसे धुरंधर खिलाडी का हर दांव टेढ़ा पड़ गया.. प्रिया उसे देख चकित थी,उसे बार बार देखने का मोह त्याग नही पा रही थी,लेकिन वो अपने पूरे

आत्मविश्वास के साथ मुस्कुराता उसके सामने बैठा एक के बाद एक हर साल का हिसाब उससे बड़े आराम से मांगता चला जा रहा था।

इसी हड़बड़ी में किसी एक जगह पे गलती से छूट गये दस्तखत करने जैसे ही प्रिया ने टेबल से पेन उठानी चाही,वहीं रखा पानी का गिलास लुढ़क गया, वो ज़मीन पे गिर के चकनाचूर होता उसके पहले ही राज ने उसे पकड़ लिया __

राज-- रिलैक्स प्रिया!! आराम से बताती जाओ ,हमें कोई जल्दी नही है,हम पूरे पांच दिन यहाँ रुकने वाले हैं।।

पूरे पांच दिन पर राज ने सच में ज़ोर दिया था या प्रिया के ही मन का वहम था,पर जो भी था उसका दिल तो बार बार यही कह रहा था कि ये पांच दिन उसके जीवन से कभी समाप्त ना हों।।

इसके बाद करीबन तीन घन्टे दोनो फाइलों पर सर गड़ाये काम करते रहे,बीच में जितनी भी बातें हुई सिर्फ बैंक और बैंक के काम को लेकर ही हुई।।

ऑडिटर टीम का लंच फाईव स्टार होटल में प्रस्तावित था,जहां सिद्धार्थ उन सब को लेकर जाने वाला था,पर टीम के सीनियर के साथ अन्य लोगों ने भी वही बैंक के कैन्टीन में ही खाने की इच्छा जाहिर की जिससे एक पल को सिद्धार्थ भी सोच में पड़ गया कि कहीं ये भी टीम की इंटर्नल ऑडिट

का हिस्सा तो नही?

पूरी टीम को लिये सिद्धार्थ कैन्टीन में पहुंच गया, वहाँ पहले से बैठे सभी कर्मचारी सतर हो गये, पर टीम पूरी तन्मयता से मेन्यू देखने में ही व्यस्त थी,जब सभी को समझ आ गया कि ये उनके काम का हिस्सा नही है तब एक बार फिर सभी अपने खाने पीने और बातों में लग गये ।।

उसकी टेबल से कुछ दूर हट कर जिस टेबल पर सिद्धार्थ ने सब को बैठाया वहाँ जान बूझ कर राज ने ऐसा किया या अनजाने में प्रिया समझ नही पायी पर जिस कुर्सी को सिद्धार्थ ने राज के बैठने के लिये खोला उसे छोड़ राज उस कुर्सी पे जा बैठा जिससे वो ठीक प्रिया के आमने सामने पड़ गया।।

वो तो बड़े मज़े से सबसे हँसता बोलता खाता रहा पर प्रिया के गले से फिर एक निवाला भी नीचे नही उतरा . सभी का साथ देने वहाँ बैठना भी ज़रूरी था,पर अपनी प्लेट और चम्मच से निरर्थक खेलती प्रिया को बार बार यही लग रहा था की सामने बैठे वो उसे देख रहा है,और इत्तेफाक से जब जब प्रिया की नज़र राज पर पड़ी हर बार उसने उसे खुद को देखता हुआ ही पाया . शरमा कर कभी बाल ठीक करती कभी पहले से जमे आंचल को सही करती प्रिया वहाँ से निकल भागने को तड़प उठी।।

इतने सालों में मन ही मन जिसका नाम जपती चली जा रही थी ,आज उसी से ऐसे आमना सामना हो गया कि सारा प्रेम सरल संकोच में बदल गया।।

लंच समाप्त कर टीम वापस अपने काम में लग गयी,उन लोगो के रुकने की व्यवस्था बैंक की तरफ से मैरियट में की गयी थी।।

लंच के बाद प्रिया वापस अपने डेस्क पर आ गयी थी,कुछ थोड़े बहुत काम निपटा के टीम वहाँ से निकल गयी तब एक बार फिर सिद्दार्थ ने मीटिंग बुला ली।।

"गाईज़ आज का तो काम निबट गया,पर कल ये लोग सारे इंटरनल आडिट शुरु करेंगे, कल का दिन हमारे लिये थोड़ा मुश्किल हो सकता है ,सो बी रेडी"

सिद्धार्थ के जाते ही माला दो कॉफ़ी के कप पकड़े प्रिया की डेस्क पर आ गयी।।

" प्रिया !! यार देखा तूने क्या हैंडसम बंदा आया है, हाय . ऐसे बंदे आयें तो मैं रोज़ ऑडिट करा लूँ ।"

राहुल- " सुना है ग्रेड बी क्लियर किया है उसने ,वो भी एक बार में।।सही है बॉस . भगवान जिसे देतें हैं छप्पर फाड़ के देतें हैं ।"

माला- " सही है . क्रीम जॉब है,फुल ऐश!! बंदा शकल से ही पैदाईशी ब्रिलीयन्ट दिख रहा,स्कूल कॉलेज टॉपर टाईप,है ना प्रिया ।।

माला की बात सुन प्रिया को ज़ोर की हँसी आ गयी,वो

कैसे मुहँफट होकर राज को गधा बोल देती थी ,और आज देखो उसके ही ऊपर पहुंच गया।।

माला-- नाम क्या था राहुल ,उस बंदे का?? और है कहाँ का??

'राजकुमार ' बोलते बोलते प्रिया चुप रह गयी

राहुल- तुझे बड़ी माख लगी है पता करने की,,शादी करने का विचार है क्या??

माला-- और क्या ? ऐसा सही प्रपोसल मिले तो क्यों ना शादी कर लूँ,तेरे जैसे बन्दर से तो फार बेटर है।

राहुल- आर के बोल रहे थे सब के सब ,हम तो भाई आर. बी.आई. वालों को सर ही बोलतें हैं,क्या पता कल को आठ दस साल बाद ये गवर्नर बन जायें और इनके दस्तखत वाले नोट से हम अपना राशन खरीदें ।

माला-- हम्म पर जो भी हो,बंदा तो दिल ले गया मेरा, चल यार प्रिया अब घर चलें,आज तो थकान भी बड़ी मीठी सी लग रही।।

सब के सब हँसते हुए घर को निकल पड़े ।।

प्रिया बाथरूम से हाथ मुहँ धो कर निकली तब तक में ,

माला चाय बना कर ले आयी और रेडियो ट्यून करने लगी__

मन ये साहेब जी, जाणे हैं सब जी

फिर भी बनाए . बहाने

नैना नवाब जी, देखें हैं सब जी

फिर भी न समझे . इशारे

मन ये साहेब जी, हाँ करता बहाने

नैना नवाब जी, न समझे इशारे

धीरे-धीरे नैनों को धीरे-धीरे

जीया को धीरे-धीरे

भायो रे साएबों

धीरे धीरे कहाँ वो तो बहुत तेज़ी और मजबूती से हृदय में अपना आसन जमाये बैठा है .

प्रिया एक बार फिर सोच मे पड़ गयी__ इतना लम्बा समय तो नही बीत गया था फिर ये कैसा संकोच दोनो के बीच पसर गया था।

"चलो मैं तो लड़की हूँ,लड़कियाँ स्वभाव से ही संकोची होती हैं,पर वो तो आगे बढ कर बात कर सकता था,पूछ सकता था__ कैसी हो प्रिया ?

पर उसने भी कहाँ ज़रूरत समझी हालचाल पूछने की,अरे इतने साल कहाँ रही,कैसे रही,कुछ जानने का मन नही किया??

कैसे बना रहा जैसे कोई जान पहचान नही ,सारा वक्त बस फाइल्स और बैंक की ही बातें करता रहा, जैसे बहुत ही गम्भीर हो अपने काम के लिये, क्या मै नही जानती,एक एक ,

रग से वाकिफ हूँ,और मेरे सामने ही इतना दिखावा!!"

दिखावे वाली बात सोच प्रिया को खुद पर ही हँसी आ गयी__ कहाँ किया उसने दिखावा?? कोई दिखावा बनावटीपन ना उसे पहले कभी छू पाया था ना अभी!! वो तो बिल्कुल सामान्य बना हुआ था, ना उसे प्रिया से कोई शिकवा था ना शिकायत!!

और शायद इसी बात से प्रिया ज्यादा परेशान हो उठी थी।।

अगर कभी भी दोनो के बीच प्रेम था तो उसे वापस मिलने के बाद शिकायत करनी चाहिये थी ना, पूछना चाहिये था मुझे अकेला छोड़ कर कहाँ चली गयी थी प्रिया पर नही वो तो बिल्कुल तटस्थ बना हुआ था,ऐसे मुस्कुरा रहा था जैसे असल में उसे अब कोई फर्क ही नही पड़ता प्रिया रहे या ना रहे।।

पर जब फर्क ही नही पड़ता तो ऐसे घूर घूर के देख क्यों रहा था।।

माला- मैडम जी कहाँ खोयी हुई हो . इतनी देर से देख रही हूं बाई गॉड,खुद से बातें कर रही हो, क्या हो गया भई ,,सिद्धार्थ की याद सता रही क्या??

माला प्रिया को देख ज़ोर से हंसने लगी

माला-- नही नही अच्छा है,लगे रहो!! बेटा शादी तो करनी ही है एक दिन,और बॉस अगर आप पे फिदा है तो इससे अच्छा तो कोई ऑप्शन हो ही नही सकता ।।।

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प्रिया- चुप करो यार!! ऐसा कुछ नही है,हम तो कुछ और सोच रहे थे .

माला -- अब तो लग रहा जैसे इस आर.के. के चक्कर में मुझे भी तेरे जैसे सोचने की आदत पड़ जायेगी।।

क्या महक रहा था यार बंदा ,जाने कौन सा पर्फ्यूम लगाया था उसने।

प्रिया-- डेविडॉफ

माला-- क्या?? क्या कहा तूने,,तुझे कैसे पता??

प्रिया-- हमें कैसे पता होगा,तुम खुद ही सोचो . अरे यार हमने तो ऐसे ही मजाक मे कह दिया,और तुम सीरियस होकर बैठ गयी।।

माला-- हम्म सही कहा ,पर यार राहुल कह रहा था बंदा तेरे ही शहर का है . यार इसी बहाने बात करवा दे मेरी ,कुछ तू अपने शहर की बात पूछ लियो और उसी बहाने मैं उसे ताड़ लूंगी।।

प्रिया मुस्कुरा कर रसोई में चली गयी__" पुलाव बनाने जा रही हूँ,चलेगा ना।"

माला- दौड़ेगा मेरी जान!! तेरे हाथ के मटर पुलाव पर तो ' मैं वारी जावाँ,'।।

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अगले दिन सुबह से ही बैंक में अफरा तफरी मची थी, सभी टीम मेंबर्स बहुत गम्भीरता से हर एक फाइल का मुआयना कर रहे थे।।

टीम के सीनियर तीनो लोग ऑडिट में व्यस्त थे , सभी किसी ना किसी काम को करने में लगे थे बस एक वो ही कहीं नही था।।

चारों तरफ बार बार देखने पर भी प्रिया को राज नज़र नही आ रहा था,पहले उसे लगा शायद सिद्धार्थ की केबिन में होगा इसिलिए एक बार वो बहाने से वहाँ भी हो आयी,पर वहाँ भी नदारद।।

दूसरे ऑफिस रूम में भी नही था,यहाँ तक की हार कर प्रिया एक बार लॉकर रूम भी झांक आयी, आखिर आज गायब कहाँ हो गया??

अपने डेस्क पे वापस आ कर प्रिया ने फाइल खोली ही थी कि उसे अपने पीछे से वही आवाज़ सुनाई दी__ " हमें ढूँढ रही थी??"

चौंक कर प्रिया ने पीछे देखा,,,राज खड़ा मुस्कुरा रहा था,वो भी मुस्कुरा उठी .

सिद्धार्थ-- सर!!आईये आईये ,आप ही का वेट कर रहे थे,,अब तबीयत कैसी है आप की,is, everything ,

alright?"

राज- yeah everything is fine,,चलिये आगे का काम देखा जाये।।

प्रिया पे एक के बाद एक बम फोड़ा जा रहा था, पहले आर.बी.आई. की टीम के हिस्से के रूप मे, फिर ऐसी धुआँधार अन्ग्रेजी बोल के .

कितना बदल गया था वो,,पर मन से आज भी वही कानपुर का अपने मोहल्ले का राज भैय्या ही था

जी में तो आ रहा कि एक बार गले से लग के इतने दिनों के सारे ताने उलाहने माफ कर लिये जाये,पर सामने पड़ने पर तो हाथ भी मिलाने की हिम्मत नही हो रही थी।।

लंच के समय एक बार फिर प्रिया ने सोचा __ "अगर आज सामने की कुर्सी पर बैठा तो बिना किसी लाज शरम के मैं भी आँखे खोल के देखूँगी . कुछ ज्यादा ही फ्रैंक हो रहे हैं जनाब!!

पर हाय रे मन!! जो सब सोच सोच के भावी रूपरेखा तैयार की जाती है ,ज़रूरी नही कि ये मन उस समय आपका साथ दे और आपको सब अपने मन का पूरा करने दे।।

प्रिया का मन खुद हर बार उसे धोखे पे धोखे दिये जा रहा था,बेचारी कुछ सोच के रखती पर राज के सामने पड़ते ही हो कुछ जाता।।

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एक बार फिर वही हुआ!!,वो बड़ी शान से अपनी टीम के साथ आया और ठीक उसके सामने की कुर्सी खींच बैठा गया . एक बार फिर प्रिया कट के रह गयी,ना उसके बाद वो माला से कोई बात कर पायी और ना ही ढंग से कुछ खा पायी।।

टीम के सदस्यों के खाने की व्यवस्था देख सिद्धार्थ प्रिया की टेबल पे चला आया ,और एकदम उसकी कुर्सी के पास ही खड़ा हो कर उन लोगों को आगे के बारे में कोई जानकारी देने लगा .

सिद्धार्थ पहले भी ऐसा करता था या आज ही कर रहा था पर प्रिया को उसका इतना घुल मिल के बात करना रास नही आ रहा था .

बात करते करते सिद्धार्थ ने प्रिया की प्लेट से एक इडली उठा ली और बड़े मज़े से चटनी लगा कर खाने लगा,पर उसकी इस हरकत पर प्रिया तिलमिला कर रह गयी,मन ही मन प्रार्थना करती हुई कि राज ने ना देखा हो उसने जब राज की तरफ देखा तो वो उसे ही देख रहा था।।

अब इतनी दूर से वो उसे समझाती भी कैसे कि सिद्धार्थ की इस हरकत में प्रिया की कोई जिम्मेदारी नही थी . पता नही आज ही वो क्यों इतना फ्रेंडली हो रहा था।।

प्रिया ने अपने सूखते गले को तर करने पानी पीकर गिलास नीचे रखा और सामने देखा तब तक राज वहाँ से जा चुका था।।

,
 
राज को सिद्धार्थ का इस तरह प्रिया से घुलना मिलना पसंद तो नही आ रहा था,पर वो भी कॉरपोरेट जगत की सभ्यता को समझता था,इस बात को जानने लगा था कि साथ काम करते हुए अक्सर ऐसे रिश्ते बन जाते हैं ।।

तभी राज को फोन बजने लगा उसे उठाये वो बाहर निकल गया।।

प्रिया ने जब राज को अपनी कुर्सी पर नही पाया तो वो भी लपक के बाहर निकल गयी .

माला-- क्या हुआ प्रिया ?? कहाँ चल दी तुम?

प्रिया-- बस अभी आयी . बिना उन लोगो की तरफ देखे वो जल्दी से कैन्टीन से निकल ही रही थी कि बाहर गैलरी में इधर से उधर घूमते हुए फोन पर बात करते राज पर उसकी नज़र पड़ गयी,राज ने भी उसे देख लिया,वो मुस्कुराते हुए उसकी तरफ बढ़ आया__

" बन्टी का फोन था,उसकी पोस्टिंग मुम्बई में ही है, आज शाम, मुझसे मिलने पुणे आ रहा है।।

" अच्छा" प्रिया को इससे अधिक कुछ सूझा ही नही कि क्या कहे।।

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राज-- तुम भी चलोगी डिनर पर?? यहीं कहीं आस पास चले जायेंगे जिससे तुम्हें लौटने मे देर ना हो।।

उफफ!! कितना औपचारिक निवेदन था ये,,अरे पूरे रौब से भी तो कह सकता था,कि प्रिया रात मे हमारे साथ तुम भी डिनर पर चलना पर नही .

प्रिया को अपने विचारों में खोये देख राज कुछ बोलने ही जा रहा था की उसने तुरंत ही हामी भर दी,प्रिया को लगा अगर उसने जल्दी से जवाब नही दिया तो कहीं राज अपनी योजना ही ना बदल दे।।

" हाँ हम आ जायेंगे,पर आना कहाँ हैं??"

" रुके तो हम मैरियट में हैं,, चाहें तो वहाँ डिनर कर सकते है पर वापसी में तुम्हें थोड़ा दूर पड़ेगा।।"

" कोई बात नही,हम आ जायेंगे।।

" ठीक है ,ऐसा करना अपनी सहेली को भी लेते आना जिससे अकेले ना लौटना पड़े ।।"

प्रिया ने हाँ में सर हिलाया और मुस्कुरा के वापस चली गयी पर ये आखिरी बात दिल में फांस की तरह चुभ गयी . माला को लेकर आने क्यों बोला आखिर राज ने??

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वैसे हमेशा सिर्फ दस मिनट में झट से तैयार होने वाली प्रिया को आज क्या पहनूँ क्या ना पहनूँ सोचने में ही आधा घंटा लग गया .

आधे घन्टे से तैयार हो कर बैठी माला ने जब हर एंगल से अपनी सेल्फी खींच ली तब झल्ला के उसने ही आलमारी से एक मैरून कुर्ता निकाल उसके हाथ में पकड़ा दिया__

" बन्सी अब और देर की ना तूने,तो मैं अकेली ही चली जाऊंगी।"

प्रिया तैयार होकर, आयी तो माला उसे देखती ही रह गयी__

" क्या बात है बन्सी!! आज तो मतलब खूब जम रही हो ,,दिन भर जिसके गाने सुनती हो ना तुम्हारी प्यारी सुचित्रा सेन उनकी नवासी रायमा जैसी ही लग रही हो, भई अब तो बता दो ,हम जा कहाँ रहे हैं ।।

" सरप्राइस है आपके लिये,चलिये तो सही।।"

मुस्कुराती हुई प्रिया दरवाजा खोल बाहर निकल आयी।

दोनों के वहाँ पहुंचने तक राज और बन्टी भी हॉल में आ चुके थे,और उन्हीं दोनो का इन्तजार कर रहे थे।।

माला--उफ अल्ला!! बन्सी तू वापस चल घर,फिर बताती हूँ तुझे,,एक बार तो बताती की हम आर के से मिलने आ रहे हैं,यार मैं भी कुछ ढंग का पहन लेती, कैसी बेकार सी जीन्स डाल ली मैंने।।

दोनों को देखते ही राज ने खड़े होकर दोनो का मुस्कुरा के अभिवादन किया और माला का बन्टी से परिचय करवा दिया_

" ये मेरे कजिन है रविवर्मा,मुम्बई एक्सेंचर में काम कर रहे हैं,मेरा काम पुणे में है पता चला तो मुझसे मिलने आ गये।।

और बन्टी ये हैं माला जी,ये भी उसी बैंक में काम करती हैं जहां प्रिया ।।

बन्टी-- हेलो जी!! आप दोनो से मिल कर बड़ी खुशी हुई,,क्या हाल है प्रिया !!तुम तो यार और दुबली हो गयी हो,वैसे अच्छी लग रही हो।।

माला को कुछ भी समझ नही आ रहा था वो कभी प्रिया को देखती कभी अपने सामने बैठे दोनो लड़कों को।।

प्रिया ने दो दिन से राज को फॉर्मल कपडों में ही देखा था,उसे अभी ब्लू डेनिम और टी शर्ट में देख थोड़ा संकोच कम होने लगा।।

इत्तेफ़ाक़ से राज ने भी मैरून टी शर्ट ही पहनी थी

प्रिया-- कैसे हैं आप बन्टी भैया,क्या हाल चाल हैं ।

बन्टी--हाल तो फिलहाल ए सी है,और चाल चलन के तो हम बचपन से बड़े पक्के हैं।।

राज-- हाँ ये मुझसे बेहतर कौन जानता है,,अरे बन्टी अकेले ही आये तुम रानी को भी लेते आना था।।

बन्टी-- मैं ले तो आता लेकिन उनका चौथा महीना चल रहा है,इसिलिए इतनी लम्बी ड्राइव के लिये उसने मना कर दिया।।

प्रिया-- एक मिनट !! किसने मना कर दिया?? क्या चल रहा है?? मुझे कुछ समझ नही आ रहा ,साफ साफ बताईये।।

राज-- अरे तुम्हें पता नही शायद!! हमारे बन्टी भाई की शादी हो चुकी है,पूरे दो साल हो गये शादी को।।

ये सुनकर प्रिया ने बन्टी की तरफ खुशी से चहक के देखा कि बन्टी पहले ही बोल उठा__

बन्टी-- यार बन्सी तुम ना तो एफ बी पे हो ना इंस्टा पे , मैं ढूँढता भी कैसे,वैसे मैने राज को बोला था,तुम्हे बताने के लिये . पता नही इस नामुराद ने बताया क्यों नही।।

प्रिया-- वो सब बाद में,पहले आप अपनी शादी की कहानी तो बताइये।।

बन्टी-- हाँ बिल्कुल!! वो तो सबसे ज़रूरी है।।

देखो भई हुआ ये कि दिल्ली में मेरी एक नई गर्लफ्रैंड बन गयी,जिसको खाने का बड़ा शौक था,वो रोज़ सुबह फोन पे यही प्लान करती की किस नये रेस्तराँ को आबाद किया जाये,और बस इतने से पेट नही भरता था उसका,,मेरा ,

दिमाग भी बराबर खाती थी, जाने उसे कौन सी ऐसी गलतफहमी थी कि अंबानी मेरे बाप का नौकर है।।रोज़ नही फरियाद,रोज़ नयी गुजारिश ,अच्छा और फोन इत्ते प्यार से करती ' हेलो बाबू' की मैं एकदम पिघल जाता था।।

वैसे घंटो बात करती फिर जब उसका रखने का मन करता तो बहाना मार देती ' बेबी मॉम आ रही है'

पहले तो साला मैं गधे पे गधा बनता गया,फिर, एक दिन शाम को जब हम लौट रहे थे मैनें कहा घर तक छोड़ देता हूँ,कम्बख्त कहती है-' नो बेबी !! होस्टल वॉर्डन ने देख लिया तो मुसीबत हो जायेगी!!

मैं सोच में पड़ गया कि होस्टल में मम्मी कैसे आ जाती है पर मैनें कुछ कहा नही।।

फिर बाद में समझ आया मम्मी वम्मी नही आती वो तो उसके दूसरे बॉयफ्रेंड का फोन आता था,,बेमुराद, बेमुरव्वत, बेवफा !! मैनें लाखों उड़ा दिये उसके गोलगप्पो के पीछे।।

उसी चक्कर में तो रानी से मिलना हुआ।।

प्रिया-- अच्छा कैसे??

बन्टी-- मेरी एक्स को एक दिन गोलगप्पे की तलब लगी,जो उसे हर दो दिन के बाद लग ही जाती थी,तो हम दोनो गली मुहल्ले ढूँढ ढाँढ के उसके पसंदीदा गोलगप्पे वाले तक पहुंच गये . अब इनका शुरु हुआ ,एक पे एक खाना और उसपे तुर्रा देखो__" भैय्या मिर्ची तो डाली ही नही,थोड़ा और तीखा करो ना" वो गोलगप्पे वाला बेचारा कई बार मिर्ची डालने के बाद अपना एवरेस्ट का पैकेट निकाल चेक करने लगा __ साले टी वी पे बोलते हैं सही तीखा सही लाल ।।और ये ,

धुरंधर यहाँ ' ना ही तीखा ना ही लाल' कर रही है।।

भर पेट खाने के बाद जब आगे बढ़े तो उसकी पेट में कोहराम मच गया,,एवरेस्ट के तीखालाल ने अपना कमाल दिखाया।।

मैं उसको लेकर सीधा एम्स भागा,वहाँ मैडम को तुरंत ऐडमिट कर लिया गया .

वहीं हमारी मुलाकात हुई रानी से!! रानी को तो जानती हो ना??

प्रिया ने राज की तरफ प्रश्न पूछती निगाहों से देखा उसने आंखों से ही हाँ कह कर समाधान कर दिया

बन्टी-- रानी वहाँ सर्जरी में एम एस, कर रही थी,मैने उसे प्रिया से मिलवाया और दोस्ती का वास्ता देकर प्रिया की एक्स्ट्रा केयर लेने को कह ऑफिस निकल गया।

अब जब जब मैं ऑफिस से फोन करुँ प्रिया का फोन बिज़ी आये,बाद मे उसने कहा मम्मी से बात कर रही थी।।

पर डिस्चार्ज के समय प्रिया को बाहर भेज रानी ने मुझे सारी सच्चाई बता दी उसके दूसरे बॉय फ्रेंड के बारे में ।।

बस यही से रानी से दोस्ती शुरु हुई और घर वालों के आशीर्वाद से दो साल पहले शादी भी हो गयी।।

माला-- वॉव मज़ा आ गया सुन के!! अब प्लीज़ कोई मुझे ये बतायेगा कि आप सब एक दूसरे को कैसे जानते हैं ।।

बन्टी-- क्यों इन दोनों ने तुम्हे कुछ बताया नही।।

प्रिया ने घबरा के बन्टी की तरफ देखा ही था की राज की आवाज़ कानों में पड़ी __

राज- हम दोनो एक ही शहर से हैं,बल्कि एक ही मोहल्ले के हैं,इसिलिए अच्छी जान पहचान है!!बस!!

मैरियट के बड़े से हॉल में एक तरफ गज़ल सन्ध्या का आयोजन किया गया था,जहां कोई एक साहब गुलाम अली जी की गज़ल गा रहे थे__

इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटी महफिलें

हर शख़्स तेरा नाम ले, हर शख़्स दीवाना तेरा।

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा।

कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा।।
 
डिनर होते होते ग्यारह बज चुके थे ,,इतना समय हो गया देख कर राज थोड़ा परेशान होने लगा__

राज -- हम साथ चलें क्या प्रिया,तुम लोगों को वहाँ ड्रॉप कर हम वापस आ जायेंगे।।

प्रिया-- नही नही !! आप परेशान मत होईये,,पुणे तो जागता शहर है,वैसे भी सदाशिव पेठ में भीड़ भाड़ रहती है।।

राज ने उनके लिये कैब बुक करी और प्रिया के

बार बार मना करने के बावजूद गाड़ी में उन दोनों को पीछे ,

बैठा कर खुद ड्राईवर के बाजू वाली सीट पर बैठ गया,दुसरी कैब लेकर बन्टी भी मुम्बई निकल गया।।

उनकी कैब सदाशिव पेठ की तरफ भाग चली, एफ एम में चलते गाने के साथ प्रिया एक बार फिर कानपुर की गलियों में और राज में खो के रह गयी .

मेरी साँस साँस महके

कोई भीना भीना चन्दन

तेरा प्यार चाँदनी है

मेरा दिल है जैसे आँगन

हुयी और भी मुलायम

मेरी शाम ढलते ढलते

हुयी और भी मुलायम

मेरी शाम ढलते ढलते

ये कहाँ आ गये हम

यूँ ही साथ साथ चलते

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दो दिन कब पलक झपकते बीत गये प्रिया को पता भी नही चला,तीसरे दिन से टीम द्वारा एक ट्रेनिंग सेशन का आयोजन किया जाना था जिसमें

टीम के अलग अलग सदस्यों द्वारा विभिन्न विषयों पर व्याख्यान दिया जाना था,हालांकि बैंक के रूटीन कार्य में व्यवधान ना हो इसलिये कुछ चुने हुए बैंक कर्मियों को ही इस ट्रेनिंग सेशन का हिस्सा बनाया जाना था।

प्रिया बस इसी चिंता में थी कि उसे इसका हिस्सा बनने मिलेगा या नही।।

टीम के द्वारा बैंक के सीनियर कर्मचारियों की लिस्ट तैयार कर सिद्धार्थ को दे दी गयी थी जिनमें प्रिया का नाम नही था ,,पर सिद्धार्थ चाहता था कि प्रिया भी इस प्रशिक्षण का हिस्सा बने।।बाकी तीन मेंबर्स काफी सीनियर थे इसलिये उसने राज से ही बात करने की सोची

" सर आपकी लिस्ट से मेरी सबसे अच्छी एम्प्लायी का नाम गायब है,,,आप एक बार फिर से देख लेते तो अच्छा रहता।।"

" सिद्धार्थ साहब!! ये लिस्ट नायर सर ने बनाई है और मैं उनके निर्णय के खिलाफ नही जा सकता , हमसे काफी सीनियर हैं वो।।"

" मैं समझ सकता हूँ,,पर क्या आप एक बार ट्राई कर सकते हैं प्लीज़,असल मे प्रिया बहुत कुशल कर्मी है,उसे ये ट्रेनिंग मिलेगी तो वो और चमक जायेगी।

राज-- समझा सकता हूँ,लेकिन .

राज ने अपनी बात पूरी भी नही की थी कि सिद्धार्थ फिर शुरु हो गया।।

सिद्धार्थ-- वो सर बात दरअसल ये है, की असल में हम शादी करने वाले हैं,,क्या है उसकी भी ट्रेनिंग हो जाये तो हम दोनो के लिये ही अच्छा रहेगा।।

राज के हाथ से चाय उसके कपडों पर छलक गयी,उसने सिद्धार्थ की तरफ देखा__

राज -- कब ?? I mean कब करने वालें हैं??

,

सिद्धार्थ- बस जल्दी ही!! हमारी तरफ से तो सब ओके ही है,मेरी माँ को तो प्रिया बहुत पसंद भी है, जल्दी ही वो शुभ दिन भी आ जायेगा।।

गलतफहमी . ऐसी ही जटिल वस्तु होती है,जिसे हो जाती है वो फिर सामने वाले की प्रत्येक बात को अपने विशिष्ट चश्में से देखने लगता है।।

हमारी तरफ से सब ओके है में सिद्धार्थ का तात्पर्य उसके और उसकी माँ की तरफ से था,पर राज ने सोच लिया प्रिया और सिद्धार्थ की तरफ से।।

इस चर्चा के बाद उसे सिद्धार्थ से कोई बात करने का मन नही किया।।

क्या क्या नही किया था उसने प्रिया के लिये .

उस शाम के बाद पलट के देखा भी नही प्रिया ने , कितनी देर वहाँ बैठा रह गया था,वो तो बाद में बन्टी जबर्दस्ती उठा कर घर ले गया,,पूरे दो दिन ना कुछ खाया ना पिया।।

तीसरे दिन कैसा तेज़ बुखार आ गया था उसे . सारा सारा दिन एक ही बात तो दिमाग मे चल रही थी,माँ को समझाए या प्रिया को!!

दोनो में से एक ने भी उसका साथ दे दिया होता तो क्या ऐसे घुल घुल के रोग पाल लिया होता उसने।।

इसके बावजूद उसने प्रिया के इम्तिहान वाले दिन एक चिट्ठी देकर प्रेम को उसके पास भेजा था, फोन करने का तो सवाल ही नही था,ऐसे बुखार मे तप रहा था कि माँ सारा समय उसके सर के पास ही बैठी थी।।।

,

प्रेम को कैसा खोटे सिक्के सा फिरा दिया था प्रिया ने,ना ही उसके खत को पढ़ा और ना जवाब ही भेजा।।

वो तो उसे खुद को पता भी नही चल पाया था कि ज्वर की तीव्र पीड़ा में वो रात भर प्रिया का नाम जपता रहा था,और उसकी उसी तड़प ने आखिर अम्मा का कलेजा भी मरोड़ के रख दिया था।।

बेचारी दिन निकलते ही बन्टी को साथ लिये अपने सारे मान को ताक पर रख प्रिया के घर भी पहुंच गयी,पर क्या लाभ हुआ आखिर??

वहाँ उसकी बुआ ने क्या क्या नही सुनाया था अम्मा को3 Underscore

" माफ करना दुल्हीन हमरी प्रिया की तो नौकरी लग गयी, पढ़ी लिखी जो ठहरी।।देखो बुरा ना मान जाना पर सिर्फ सकल सूरत ही सब कुछ ना होवे है,सोने की प्रतिमा को घर मे सजाया जा सकता है पेट की आग नही बुझाई जा सकती।।छोरी ने तो कह दिया है . सादी करेगी तो अपने जैसे पढ़े लिखे लड़के से वर्ना कन्वारी रह जायेगी।।

अम्मा-- क्या सच!! उसने खुद ऐसा कहा??

बुआ-- हाँ तो,जो हम झूठ बोलेंगी तो जे जीभ अभी के अभी गल के गिर जाये .

जाते जाते एक बात और सुन लो दुल्हीन ,जितना दहेज का लिस्ट तुमने हमे थमाया था ना उतना तो छोरी दो साल में कमा के तुम्हारे चरणों में डाल देती पर सबर कहाँ था ,

तुममें,जाओ अब सम्भालो अपने लल्ला को,कहीं ज़हर वहर ना खा ले।।

ये सारी बातें और किसी ने कही होती,तो एक बार को राज अविश्वास कर भी लेता पर वापस लौटने के बाद अम्मा ने ही बन्टी के सामने हर एक बात उसे बता दी थी,,कितना रोयी थी अम्मा उसे गले से लगा के .

जिस लाड़ले के लिये अम्मा ने अपने स्वाभिमान को नही देखा उस माँ के लिये फिर बेटा कैसे इतना निष्ठुर हो सकता था।।

उसे भी समझ आ गया था,प्रिया कभी उसके जैसे अनपढ़ गंवार से ब्याह नही कर सकती।।

प्रिया से ब्याह का उसे भी कहाँ कोई उत्साह रह गया था,बस उसके पीछे से रह गयी थी अम्मा के अपमान की कड़वी घूंट।।

वो भी पढ़ा लिखा होता बड़के भैया की तरह तो मजाल थी कि बुआ उसकी अम्मा पर इतना कीचड़ उछाल पाती।।

ठीक है बुआ जी ने जो कहा वो उनकी बुद्धि के हिसाब से कहा __ पर पढ़ी लिखी समझदार प्रिया को क्या हो गया था,मान लिया की जब बुआ और अम्मा की भेंट हुई तब वो वहाँ नही थी,नौकरी करने दूसरे शहर चली गयी थी,पर क्या उसकी मां या दीदी ने उसे इस बार में कुछ भी नही बताया,, और अगर बता दिया तो क्या दोस्ती के नाते भी एक बार प्रिया का फर्ज नही बनता था कि हमें फोन कर ले,अम्मा के अपमान के लिये माफी मांग ले।।

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कौन सा पहाड़ टूट जाता,इसे स्वाभिमान नही अभिमान कहा जाता है।।

ये भी मान लिया कि हो सकता है उसकी माँ और बहन ने ना बताया हो,तो क्या इतना प्रेम भी दोनो के बीच नही था कभी,कि एक बार खुद ही हाल चाल पूछ ले।।

उसने प्रिया से जुड़ी किस वस्तु को खुद से अलग किया था . ना उसने अलग होने की कोशिश की और ना हो पाया।।

उसे पढाते समय के सारे छोटे छोटे नोट्स जो प्रिया ने अपनी लेखनी से उकेरे थे,आज भी उसकी कॉपी में वैसे के वैसे दबे पड़े थे।।

उसे याद है प्रिया हर दिन पढ़ाना शुरु करने के पहले पन्ने पर सबसे ऊपर 'राम ' लिखा करती थी, क्या उसकी वही आदत आज राज के जीवन का हिस्सा नही हो गयी थी।।

उसे खुद को चाय कभी पसंद नही थी,वो तो घर पे हमेशा दूध लस्सी या छांछ ही पिया करता था,वो तो प्रिया की संगत में चाय की ऐसी लत लगी कि आज तक नही छूटी और ना वो छोड़ना चाहता है।।

उसे आज भी याद है ,जब पहली बार प्रिया को अपनी बुलेट पे बैठाए वो हनुमान जी के मन्दिर गया था,,वहाँ मन्दिर से बाहर निकलते समय एक बूढ़ी अम्मा ने कुछ प्रसाद और फूल के साथ एक रक्षा सूत्र भी उसके हाथ में रख दिया था,उस रक्षासूत्र को प्रिया ने उसकी कलाई पर बड़े प्यार से बांध दिया था .

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आज इतने सालों में भी रोज़ रोज़ अपने खुशबूदार साबुन से उसे सुवासित कर उसके जीर्ण शीर्ण कलेवर के बावजूद अपने हाथ में बांधे रखा है।

एक से एक महंगी ब्रांडेड कमीज़ों से होड़ लगाता वह धागा आज भी उसके हाथ में वैसे ही बंधा है जैसा वो बांध गयी थी।।

उस शाम के बाद सिर्फ उसी के बारे में सोच सोच के कैसा भयानक राज रोग पाल लिया था उसने .

दस दिन के ज्वर ने बुरी तरह से तोड़ कर रख दिया था,जब कुछ स्वस्थ अनुभव हुआ तो धीरे धीरे उसने अपने आसपास की दुनिया पर गौर करना शुरु किया,वापस अपना काम शुरु किया ,हालांकि मन तो किसी काम में नही लग रहा था,उस पर सदा सर्वदा बने रहने वाला गरदन का दर्द .

पूरे छह महिनों तक उसने अपने दर्द को नज़र अंदाज कर दिया था .

नज़र अंदाज किया या शायद समझ ही नही पाया कि दर्द शारीरिक अधिक है या मानसिक!! उस पर उसके जाने के बाद किताबों से मोहब्बत सी हो गयी थी,,हर किताब में वही तो नज़र आने लगी थी, चाहे इतिहास हो या भूगोल,उससे इतर कुछ भी कहाँ दिखता था .

पता नही उसे भूलने के लिये या उसकी यादों में और ज्यादा डूब जाने के लिये वो किताबों में समाता चला गया।।
 
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