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Thriller तबाही

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Guest
तबाही

ज्वाला प्रसाद ने अपने बैडरूम में आकर सबसे पहले मोबाइल उठाकर किसी से सम्पर्क किया ... दूसरी ओर से आवाज आने पर उन्होंने कहा

" अब हम सुबह तक के लिए फ्री हैं । "

" ठीक है हुजूर अपने बॉडीगार्ड को बता दीजिए । पन्द्रह मिनट के बाद आप बैडरूम में अकेले नहीं होंगे

। "

" दैट्स गुड ... आज का कोड है ' ब्लैक मून ' । "

" जी सरकार ! ' '

ज्वाला प्रसाद ने मोबाइल बंद करके रख दिया और बाथरूम में घुस गए । बाथरूम के इन्टरकॉम से उन्होंने पर्सनल बॉडी गार्ड को सम्बोधित करके बताया कि पन्द्रह मिनट बाद उनके पास कौन आएगा ।

फिर कुछ देर बाद ही वह ' बाथ टब ' में थे ... साथ छोटी तिपाई पर स्कॉच की बोतल खुली रखी थी जिससे चूंट भी भरते जाते थे ।

बंगले के फाटक पर जब वह वैन आकर रुकी तो उसे सशस्त्र पहरेदारों ने चारों ओर से घेर लिया ... मशीनगन वालों ने गनें तान लीं । वैन के अंदर रोशनी हुई और पिछली सीट पर एक चौबीस - पच्चीस बरस की अत्यन्त सुन्दर लड़की बैठी नजर आई ... ड्राइविंग सीट पर बैठे बड़ी मूंछों वाले नौजवान ने शीशा नीचे कर लिया और धीरे से कहा- " ब्लैक मून

सशस्त्र गार्ड इधर - उधर हट गए - फाटक खुल गया और बंदूकधारी गार्ड नीचे उतर आया । कुछ देर बाद वैन बरामदे में खड़ी थी ... मूंछों वाले नौजवान ने उतरकर पिछला दरवाजा खोला ... बरामदे की मद्धिम रोशनी में ऊपर खड़ा बंदूकधारी गार्ड नीचे आया और उसने लड़की को ऊपर से नीचे तक इस तरह टटोला कि लड़की के उभरे हुए सीने कहीं नकली तो नहीं हैं ... और वह वास्तव में ही लड़की ही है - फिर वह उस लड़की को बरामदे में लाया और दरवाजा खोलकर बोला

" सीढ़ियां चढ़कर राहदारी में बायीं ओर का चौथा कमरा । "

लड़की आराम से अंदर चली गई ... पहरेदार दरवाजे पर बैठ गया ... और अचानक ही उसकी कनपटी पर जैसे प्रलय टूट पड़ी ... बिना आवाज निकाले वह मूंछों वाले नौजवान की बांहों में झूल गया और वह बिजली की - सी फुर्ती से उसे वैन तक लाया ।

अंदर घुसकर उसने पहरेदार के कपड़े पहने और पहरेदार को अपने कपड़े पहना दिए । उसके होंठों पर अपनी ही जैसी नकली मूंछे चिपकाई और उसे पिछली सीट पर अधलेटा बिठाकर उसकी गोद में बोतल रख दी और नाइट कैप आगे से इस तरह झुका दी कि आधी नाक तक चेहरा ढंक गया ।

मूंछों वाला नौजवान पहरेदार के रूप में बाहर आया । बरामदे में पहुंचा तो चलते - फिरते पहरेदार के जूतों की आहटें गूंजी जो कम्पाउंड में घूमता था ।

घूमने वाला पहरेदार रुक गया ... पहले उसने वैन को देखा , फिर सशस्त्र नौजवान से बोला- " एवरी थिंग इज ओ.के. ? "

“ यस ... ! "

घूमने वाला पहरेदार आगे बढ़कर बाई ओर के कम्पाउण्ड की तरफ मुड़ गया ... मूंछों वाला नौजवान कुछ देर सुनगुन लेता रहा ... फिर अंदर दाखिल हुआ - हॉल में सन्नाटा था - रोशनियां भी मद्धिम थीं ।

मूंछों वाला नौजवान दबे पांव चलता हुआ ऊपर आ गया ... ऊपर पहुंचकर उसने दरवाजे पर हल्का - सा दबाव डाला , दरवाजा अन्दर से बंद था ।

नौजवान ने अपने जूते के तले में से एक कील जैसा औजार निकाला जो आगे से मुड़ा हुआ था ... फिर उसने वह औजार ताले के छेद में डाला और दूसरे ही क्षण दरवाजा खुल गया । नौजवान ने अंदर दाखिल होकर दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया ... अपनी गन उसने बैड पर रख दी । बाथरूम में से ऐसी आवाजें आ रही थीं जैसे टब में छपाछप हो रही हो ।

नौजवान अन्दर घुस गया । ज्वाला प्रसाद और लड़की के कपड़े खूटियों पर थे ... वे दोनों टब में थे - ज्वाला प्रसाद की पीठ दरवाजे की ओर थी और लड़की का चेहरा उधर था ।

उसने नौजवान को देखा जरूर मगर इस तरह जैसे कुछ देखा ही न हो । नौजवान बिल्कुल दबे पांव आगे बढ़ा ... फिर उसके दायें हाथ की हथेली ज्वाला प्रसाद की गर्दन पर पूरे जोर से पड़ी और ज्वाला प्रसाद के गले से ' हुच्च ' की आवाज आई ।

नौजवान ने ज्वाला प्रसाद को झुकने से रोका और लड़की से बोला- “ मेक हेस्ट आउट । "

लड़की जल्दी से टब से निकल आई - नौजवान ने कहा- " फुर्ती से कपड़े पहनो । " -और लड़की तौलिए से बदन सुखाकर कपड़े पहनने लगी ।

उधर नौजवान ने ज्वाला प्रसाद को चित्त किया और उनका चेहरा पानी में डुबोकर दबाए रखा - इस समय उसके हाथों पर पतली झिल्ली जैसी रबड़ के दस्ताने थे ।

ज्वाला प्रसाद थोड़ी देर बाद ही ठंडे पड़ गए । उनकी सांसों से उठते हुए बुलबुले बंद हो गए थे । नौजवान ने उनको ऊपर सरकाकर इस तरह बिठा दिया जैसे वह नहा रहे हों ।

मूंछों वाला नौजवान लड़की के साथ बाहर निकल आया - इससे पहले ही उसने टब में से सारे निशान मिटा दिए थे । नीचे आकर पहले नौजवान बाहर निकला - फिर उसने रास्ता साफ देखा तो लड़की को भी बुला लिया ... मशीनगन वह साथ उठाता लाया था



दोनों वैन में घुस गए - पांच ही मिनट में उसका असली लिबास उसके बदन पर था ... उसने सशस्त्र पहरेदार को उसका लिबास पहनाकर बाहर खींचकर बरामदे में एक अंधेरे कोने में डाल दिया और वापस आकर वैन में बैठ गया ।

कुछ देर बाद वैन बाहर निकल आई और सड़क पर दौड़ने लगी । लड़की पिछली सीट पर गुमसुम - सी बैठी थी , मगर वह भयभीत नहीं लगती थी । नौजवान ने बैक - व्यू मिरर में उसे देखकर पूछा

" तुम ठीक तो हो ? "

" बिल्कुल ... मगर वहां कोई निशान तो नहीं छोड़ा ? "

" नॉट एट ऑल । "

" यह स्कीम क्या कालीचरण की थी ? "

" हां । "

" लेकिन उसने मुझे तो कुछ नहीं बताया नहीं था । "

" कालीचरण अपने प्रोग्राम धंधे वाली लड़कियों को पहले ते नहीं बताते । "

" कितनी रकम मिली होगी उसको इस काम के बदले में ? "

" हमें और तुम्हें सिर्फ अपने हिस्से से गरज होनी चाहिए । "

" फिर भी मेरा और तुम्हारा हिस्सा करोड़ो में तो होगा ही ... ज्वाला प्रसाद अपनी पार्टी के बहुत बड़े

आदमी थे ... उनकी बे - वक्त मौत से उनकी पार्टी तो बिखर जाएगी ... बहुत बड़ा धक्का लगेगा । "

" देखो शकीला , हम इस शतरंज के केवल पैदल मुहरे हैं और पैदल मुहरों को अपनी सीमा से आगे नहीं निकलना चाहिए ... वैसे भी हम राजनीति ओर उसकी चालों से कोई वास्ता नहीं रखते । "

शकीला कुछ नहीं बोली ... वैन दौड़ती रही ... कुछ देर बाद शकीला को ख्याल आया और उसने कहा " मगर मैं और तुम दोनों बॉडीगार्डों की नजर में आ गए हैं ... क्या यह हमारे लिए ठीक है ? ' '

" इसका इन्तजाम भी कालीचरण ने कर दिया है । "

" क्या ? "

" बताता हूं । "

फिर एक जगह वैन रुक गई तो शकीला ने पूछा- " क्या हुआ ? "

। '

" इंजन में गड़बड़ मालूम होती है । "

" आती बार भी तुमने इसी जगह वैन रोकी थी उतरकर कहीं चले गए थे पांच मिनट के लिए । "

' नम्बर एक के लिए गया था । "

फिर नौजवान उतरा और दरवाजा खोलता हुआ बोला- " टूल बॉक्स पीछे रखा है । "
 
वह अन्दर आ गया और फिर इससे पहले कि शकीला संभलती , अचानक नौजवान ने उसकी गर्दन पकड़ ली ... दूसरा हाथ मुंह पर रख दिया । शकीला ने बिलबिलाकर अपने आपको छुड़ाने की कोशिश की , मगर व्यर्थ , नौजवान की अंगुलियां फौलादी शिकंजों से कम नहीं थीं ।

कुछ देर बाद शकीला के हाथ - पांव ढीले पड़ गए । नौजवान ने उसे संभालकर बिठाया और उसके बाल

और लिबास ठीक करके नीचे उतर आया और दरवाजा बंद करके एक गली में मुड़ गया । कुछ दूर चलकर उसने एक जगह रुककर मोबाइल निकाला - नम्बरों के बटन दबाकर हैंडपीस कान से लगा लिया । ' हैलो ' की आवाज पर नौजवान अपनी आवाज बदलकर बोला- " संजय । "

" मैं ही हूं । "

" शकीला वापस जा रही है । "

" कहां है ? "

" जहां तुमने उसे जाते समय छोड़ था । " " मगर यह क्या चक्कर है ? जाते समय मुझे यहां से क्यों उतार दिया गया ? और तुम्हें मेरी जगह क्यों दी गई ? "

नौजवान ने बड़े रूखे ढंग से कहा- " क्या तुम्हें कालीचरण ने कारण नहीं बताया ? "

" नहीं , मुझे तो रास्ते में मैसेज मिला था कि मैं किस जगह वैन छोड़कर , किस जगह वापसी का इन्तजार करू और शकीला को अपने जाने का कारण भी मैं न बताऊं । "

" मतलब , कालीचरण तुम्हें बताना नहीं बताना नहीं चाहता था । "

I

" शायद । "

' शायद नहीं ... वास्तव में तुम इस किस्म के सवाल न ही करो तो तुम्हारी सेहत के लिए अच्छा होगा । " और फिर मूंछों वाले ने फोन बंद कर दिया ।

अंधेरे में चलते हुए उसने अपने हाथों से ' स्किन कलर ' के पतली झिल्ली के दस्ताने उतारकर नाले में डाल दिए - थोड़ा और आगे जाकर उसने अपने चेहरे से मूंछों वाला मास्क उतारकर एक जगह डाला और उस पर तेजाब छिड़क दिया । फिर आगे बढ़ गया ।

संजय वैन के पास आकर रुक गया - उसने पिछली सीट पर देखा ... शकीला बैठी हुई थी । संजय ने ड्राइविंग सीट संभालकर वैन स्टार्ट की और उसे आगे बढ़ाता हुआ शकीला से बोला

" मेरी जगह किसने ली थी ? "

शकीला की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला । संजय ने फिर पूछा

" क्या तुम्हें भी नहीं मालूम कि कालीचरण का प्रोग्राम क्या है ? "

फिर भी कोई जवाब नहीं मिला तो संजय ने कहा- " तुम खामोश क्यों हो ? "

फिर भी जवाब नहीं मिला तो संजय ने बैक - व्यू मिरर सैट किया और चौंक पड़ा , क्योंकि उसे शकीला नजर नहीं आई ... ब्रेक लगाकर उसने मुड़कर देखा तो शकीला सीट पर लुढ़की पड़ी थी ।

संजय ने हड़बड़ाकर शकीला का कंधा हिलाकर पुकारा

' ' शकीला ... शकीला ! ' ' कोई जवाब नहीं , संजय ने उसकी नाड़ी टटोली ... बहुत धीमी नब्ज चल रही थी । घबराकर उसने शकीला के सीने पर हाथ रखकर दिल की धड़कनें चैक की - दिल की धड़कनें भी बहुत कमजोर थीं ।

संजय के मस्तिष्क में कई प्रकार की शंकाएं जागी | जल्दी से उतरकर वह पिछली सीट पर आ गया - उसने शकीला को पूरी तरह टटोल डाला - उसे लगा जैसे शकीला दम तोड़ रही हो - उसने जल्दी से शकीला का सिर गोद में रखा और उसके होंठों से होंठ मिलाकर - माउथ टू माउथ ऑक्सीजन पहुंचाने लगा ।

थोड़ी देर बाद शकीला के शरीर में हलचल हुई और सांसें भी तेज - तेज चलने लगीं । संजय ने उसके कंधे पकड़कर हिलाते हुए पुकारा

" शकीला ... शकीला ... आंखें खोलो शकीला । "

शकीला ने आंखें खोल दीं - चंद क्षण पलकें झपकाने के बाद वह पूरी तरह होश में आ गई और उसके होंठों से कंपकंपाती आवाज निकली- " संजय ... ! "

दूसरे ही क्षण वह संजय से लिपटी हुई थर - थर कांप रही थी - संजय ने उसे सांत्वना दी और कंधा थपकते हुए कहा- " तुम्हें क्या हो गया था ? "

' ' वो ... वह ... मुझे गला घोंटकर मार डालना चाहता था । "

" कौन ... ? "

" जो तुम्हारी जगह आया था । "

" नहीं ... ! "

" कौन था वह आदमी ? ' '

" मुझे क्या मालूम ? क्या तुम उसे नहीं जानते ? "

" नहीं तो ? "

" फिर तुम वैन छोड़कर क्यों गए थे और फिर किसी ने तुम्हारी जगह क्यों ली ? "

" मुझे कालीचरण ने फोन किया था कि एक स्थान पर कार रोक लेना ... वहां तुम्हें एक मूंछों वाला अजनबी मिलेगा और वह जैसा कहे , वह तुम करना



" ओहो ! "

" मुझे वापसी तक वहीं इन्तजार करना था - मगर तुम्हें उसने मारने की कोशिश क्यों की थी ? "

" मुझे कुछ नहीं मालूम । ' ' फिर कुछ हड़बड़ाकर बोली

' इसका मतलब है कि तुम्हें यह भी मालूम नहीं होगा कि उस आदमी ने तुम्हारी जगह क्यों ली ? "

" नहीं । "

" उसने ज्वाला प्रसाद का खून कर दिया है । " संजय अनायास उछल पड़ा- " यह क्या कह रही हो

तुम ? "

" तुम्हारी जगह आने के बाद ड्राइव करते हुए उसने मुझे बताया था कि कालीचरण की स्कीम है ... ज्वाला प्रसाद का कत्ल ... जिसके लिए उसे किसी विदेशी शक्ति से बहुत बड़ी रकम मिली है जिसमें हम दोनों का हिस्सा भी करोड़ों में होगा । "

" माई गॉड ... ! फिर ...

? "

शकीला ने ज्वाला प्रसाद के खून होने तक की पूरी घटना के बारे में सुनाकर कहा- " जहां से उसने तुम्हारी जगह ली थी ... वहां पर कार रोककर उसने मेरा गला घोंट दिया ... पता नहीं मेरी जान कैसे अटकी रह गई वरना अपनी समझ में तो उसने मुझे मार ही डाला था

। "

" यानी तुम्हें मारने का उद्देश्य अज्ञात है ? ' '

" तो फिर उसने तुम्हें क्यों नहीं मार डाला ? तुम भी तो इस भेद भरे षड्यंत्र में शामिल हो गए हो कि कालीचरण ने ज्वाला प्रसाद का खून कराया है । "

" समझ में नहीं आता ... वैसे मुझे विश्वास नहीं आ रहा कि कालीचरण ऐसी साजिश में शामिल ही सकता है , क्योंकि उसे वैसे ही दौलत की क्या कमी है ... करोड़ों रुपयों की आमदनी है उसको इस धंधे में ... सारे मिनिस्टर , बड़े - बड़े नेता , धनवान उद्योगपति उसके ग्राहक हैं । वह क्यों अपनी रेपुटेशन खराब करने की साजिश में शामिल होगा ? "

" फिर क्या हो सकता है ? "

" ठहरो ! तुम कालीचरण से बात करो । "
 
" मैं ... ? "

" हां तुम - इसलिए कि वह मूंछों वाला तुम्हारे साथ था ... मैं उसके साथ नहीं था ... तुम कालीचरण पर यह जाहिर करना कि मुझे इस घटना की जानकारी नहीं है

" लेकिन , अगर यह साजिश कालीचरण ही की हुई तो वह अपनी समझ में मुझे तो मार ही चुका है । ' '

" तुम इसकी चिन्ता मत करो ... तुम्हारी सुरक्षा की जिम्मेदारी अब मेरे ऊपर है ... अगर तुम्हें खत्म कराना भी उसी साजिश की कड़ी है तो मैं उस तक तुम्हें पहुंचने ही नहीं दूंगा । "

" ठीक है । "

फिर शकीला ने संजय से मोबाइल लेकर नम्बर मिलाए और हैंडपीस कान से लगा लिया और ' हैलो ' की आवाज आने पर उसने कहा- " के . सी.साहब , मैं हूं शकीला । "

" हां बोलो शकीला , कहां हो तुम ? "

" रास्ते में । "

" ज्वाला प्रसाद जी तो बहुत खुश हुए होंगे - इस समय तुम हमारे पास सबसे बढ़कर सुन्दर और सबसे छोटी उम्र की लड़की हो । "

शकीला की आखों में हल्का - सा असमंजस नजर आया - संजय उसे ध्यान से देख रहा था । आवाज फिर आई- " हैलो शकीला । ' '

" मैं सुन रही हूं । "

" तुम चुप क्यों हो गई - क्या ज्वाला प्रसाद जी तुमसे पूरी तरह प्रसन्न नहीं हो पाए ? "

शाहीन की तबाही शकीला को लग रहा था कि कालीचरण के स्वर में बनावट नहीं है - इसका मतलब है कि इस भयानक साजिश का रचयिता कोई और है - उसने कहा- " के . सी . साहब ! जिस काम के लिए आपने हमें भेजा था , वह काम हो गया है । "

" कौन - सा काम ? "

" जिसके लिए हमें आपने दोनों को भेजा था । "

" सिर्फ तुम्हें भेजा था सेठ ज्वाला प्रसाद की फरमायश पर - संजय ऐसे कामों में मेरा विश्वसनीय सहायक है । "

अचानक शकीला ने बटन दबाकर मोबाइल बंद कर दिया और संजय की ओर देखा तो संजय ने पूछा " क्या हुआ ? "

" मुझे नहीं लगता कि कालीचरण ने यह षड्यंत्र रचा है । "

" क्या कह रहा था वह ? "

' शकीला ने बताया कि कालीचरण क्या कह रहा था ? संजय की आंखों से संशय झलक रहा था ।

" और वह मूंछों वाला कौन था ? "

" कोई खतरनाक रहस्यमयी व्यक्ति । "

" लाओ , मोबाइल देना । ' ' उसने शकीला से मोबाइल लेकर कालीचरण के नम्बर मिलाए और कालीचरण की आवाज आई

" संजय ! "

" मैं ही हूं । " " अभी तुम्हारे सैट पर शकीला ने मुझसे कुछ बात की है - और बीच ही में बंद कर दिया । "

" के . सी . साहब ! एक बहुत बड़ी गड़बड़ हुई है । "

" कैसी गड़बड़ ? "

' आपने किसी मूंछों वाले अजनबी को ज्वाला प्रसाद की ओर जाते समय मेरी जगह लेने को कहा था । "

" नहीं तो ...

। "

" तब तो बहुत बड़ा गजब हो गया । "

" साफ - साफ बताओ क्या बात है ? "

संजय ने पूरी घटना के बारे में विस्तार से बताया और बोला- " फिर उसने शकीला का भी गला घोंटकर उसे मारने की कोशिश की । ' '

कालीचरण जैसे दीवानों की तरह चिल्ला पड़ा " क्या तुम ... तुम बहुत ज्यादा पी गए हो ? "

" के . सी . साहब , मैंने बस दो पैग लिए हैं - जो रुटीन से भी कम हैं - मैं पूरी तरह होश में हूं । "

" मैं पूछता हूं , तुमने अपनी जगह किसी अजनबी को दी ही क्यों ? जबकि मैंने शकीला को तुम्हारी जिम्मेदारी पर भेजा था । "

" ज्वाला प्रसाद के बंगले की ओर जाते हुए रास्ते में मुझे कॉल मिली थी ... आवाज बिल्कुल आपकी थी इसलिए मुझे विश्वास हो गया कि आप ही हैं ... और मैंने आपके हुक्म पर अमल किया । ' '

" और वह तुम्हारी जगह शकीला के साथ ज्वाला प्रसाद के बंगले में चला गया ? "

" जी हां । जो कुछ हुआ शकीला के सामने हुआ और फिर उसने राजदारी के लिए शकीला को भी मारने की कोशिश की । "

" मगर तुम्हें जिन्दा छोड़ गया ? " " इसी बात पर तो मुझे आश्चर्य है । "

" मगर मुझे बिल्कुल नहीं । "

" क्यों ? "

" क्योंकि तुम्ही ज्वाला प्रसाद के खूनी हो और मुझे बेबकूफ बना रहे हो । ”

" क्या अभी आपने शकीला का बयान नहीं सुना

? "

" शकीला हमारे ग्रुप में नई है - तुम कई बरस से पुराने और भरोसे के आदमी थे । "

" और आपको मुझ पर भरोसा नहीं ? "

" भरोसे खरीदे भी जा सकते हैं ... जरूर तुम किसी के हाथों बिक गए हो । "

संजय कुछ नहीं बोला । आवाज फिर आई " हैलो ... ! "

" मैं सुन रहा हूं । " " तुमने मेरा कारोबार डुबोकर रख दिया - समझो , सी . बी . आई . वाले किस तरह पेश आते हैं ? "

" मुझे तो शायद इनाम मिलेगा इस कारनामे पर । "



" तुम फौरन अपने आपको कानून के हवाले कर दो और अपराध स्वीकार कर लो । मैं वचन देता हूं कि चाहे मुझे करोड़ो खर्च करने पड़े , मैं तुम्हें बचा लूंगा । "

" वही करोड़ों आप अपने लिए भी खर्च कर सकते

" मैं पकड़ा गया तो तुम्हें बचाने वाला कोई नहीं रहेगा । "

" के . सी . साहब , अब मेरी समझ में आ रहा है । "

" क्या ? "

" आपने किसी ऐसे आदमी से काम लिया है जो मुझसे ज्यादा आपके लिए काम कर सकता है और आप मेरी गर्दन फंसवाना चाहते हैं । "

' ' क्या बकवास कर रहे हो ? "

" मैं अब आपके ऊपर भरोसा नहीं कर सकता । "

" संजय ! क्या तुम सच कह रहे हो ? "

" के . सी . साहब ! आपने मुझे उस समय सहारा दिया था जब मैं अपनी मां की बीमारी से निराश होकर होकर आत्महत्या करने वाला था । आपके लिए काम करके मैंने अपनी मां की जिन्दगी बचा ली - और अब कार , बंगले का मालिक हूं - जिन्दगी का हर ऐश मेरे पास है - फिर क्या जरूरत है मुझे डबलक्रास करने की । "

" क्या तुम उस मूंछों वाले को अच्छी तरह पहचानते हो ? "

" आप गंभीरता से पूछ रहे हैं ? "

झुंझलाकर कहा गया- " मेरी बात का जवाब दो ? "

" अब मुझे सन्देह है कि उसकी मूंछे भी नकली थीं और शायद उसके चेहरे पर मास्क लगी थी । "

" ओहो ! संजय , वह कोई ऐसा ही आदमी है जो हमारे कामकाज को पूरी तरह जानता है ... ज्वाला प्रसाद इस समय अपनी पार्टी की रीढ़ की हड्डी थे - रीढ़ की हड्डी टूट जाए तो आदमी किसी काम का नहीं रह जाता ... उनका अपना व्यक्तित्व प्रशंसनीय था - अब उनका साया उठ तो गया सब छिन्नभिन्न हो जाएगा । "

" मैं क्या करु ? आपने तो मुझसे दगा की । " " मगर तुम हो कहां ? "

' ' मैं नहीं बता सकता - मेरे साथ शकीला भी है - और वह इस धंधे मे अपनी खुशी से नहीं आई - उसकी मजबूरियां उसे खींचकर लाई हैं ... उसकी और अपनी रक्षा करना मेरी जिम्मेदारी है । "

' ' क्या तुम्हें मेरे ऊपर भरोसा नहीं ? "

' ' मैं मजबूर हूं ... हालात ही ऐसे हैं । "

" खैर , जहां भी रहो - मुझसे जरूर कान्टैक्ट रखना

" वचन नहीं देता - क्योंकि आपकी गिरफ्तारी यकीनी है । "

' अब कालीचरण को गिरफ्तार कर लेना इतना आसान भी नहीं । "



संजय ने डिस्कनेक्ट कर दिया । शकीला सहमी और घबराई बैठी थी । उसने कहा



' अब क्या होगा ? "

" देखेंगे ... आओ उतरो । पैदल चलना पड़ेगा ... अब यह गाड़ी हमारे लिए खतरनाक है ... कालीचरण के आदमी चारों ओर फैल जाएंगे । "

" तो क्या सचमुच कालीचरण ... ? "

जब तक उस अजनबी का मामला स्पष्ट नहीं होता , तब तक सन्देह कालीचरण पर ही होगा । ' '

दोनों वैन से उतर आए । संजय शकीला का हाथ पकड़कर तेजी से सामने वाली गली में घुस गया ।

शकीला ने पूछा

" मगर हम जाएंगे कहां ? " " अभी मुझे भी कुछ मालूम नहीं ... कुछ भी हो , जल्दी से जल्दी से कहीं अंडर ग्राउण्ड होना ही पड़ेगा | ' '

2

ज्वाला प्रसाद के पर्सनल सैक्रेटरी की कार बरामदे के नीचे रुक गई - वह कार से उतरा तो एक नौकर परेशान - सा बाहर निकलता नजर आया ।

विक्रम सिंह ने नौकर से पूछा- " सर तैयार हैं ? "

" वह तो अभी जागे भी नहीं । ' '

" ओहो ... उन्हें तो ग्यारह बजे सैक्रेटेरियट पहुंचना है और अब साढ़े दस बज रहे हैं - और तुम परेशान क्यों हो ? "

" सिकन्दर की वजह से । "

" क्या हुआ उसे ? "

" पता नहीं ... आज सुबह उधर कोने में बेहोश पड़ा मिला था - डॉक्टर ने चैक करके बताया कि किसी अंदर की चोट से दिमाग पर धक्का लगा है । बेहोशी लम्बी भी हो सकती है । "

' ' रात वही ड्यूटी पर था - और तुम लोगों ने अभी तक सर की खबर नहीं ली । "

नौकर कुछ और भी घबराया नजर आने लगा ।

विक्रम सिंह तेजी से अंदर दाखिल होता हुआ बोला " सर की फैमिली भी आऊटिंग पर है - तो क्या सर रात अकेले सोए थे ? "

नौकर ने झिझकते हुए उत्तर दिया- " ज ... ज ... जी ... नहीं । "

" तो क्या कालीचरण ने .... ? "

" जी हां । "

" ऐसी बातें किसी दिन सर को परेशानी में डाल सकती हैं । " फिर वह अंदर हॉल से गुजरकर सीधा ऊपर बढ़ता चला गया - नौकर भी उसके पीछे था - विक्रम ने नौकर से पूछा- “ बैड टी कितने बजे दी गई है ? "

।।

' आज सर ने बैड टी मांगी ही नहीं । "

" फिर भी तुमने ... I " कहते - कहते वह रुक गया । ज्वाला प्रसाद के दरवाजे पर जाकर उसने दस्तक दी , मगर जवाब नहीं मिला , फिर कई बार दस्तक दी , लेकिन अंदर मौत की - सी खामोशी थी । विक्रम दूसरे कमरे में आया और वहां से कमरे के इन्स्टूमेंट से सम्पर्क करने की कोशिश की , मगर घंटी बजती रही ... कोई जबाब नहीं मिला । विक्रम सिंह ने इन्स्टूमेंट रखकर चिन्ता व्यक्त की- " जरूर कोई गड़बड़ है । "

नौकर की घबराहट बढ़ गई । विक्रम सिंह ने जल्दी से नीचे आकर फोन पर पुलिस स्टेशन के नम्बर मिलाए और बात करने लगा ।

कमिश्नर की गाड़ी रुकी तो विक्रम सिंह बरामदे में खड़ा हुआ था । लगभग सारे नौकर अंदर - बाहर मौजूद थे और परेशान भी ... फटक पर भी हलचल - सी मची हुई थी ।

कमिश्नर खन्ना की गाड़ी के साथ दो गाड़ियां और भी थीं जिनमें दूसरे पुलिस अफसर थे । विक्रम सिंह से हाथ मिलाते हुए कमिश्नर ने पूछा- " कुशल तो है ? "

" यह पता लगाना तो आपका काम है । "



" क्या मतलब ? "

जवाब में विक्रम ने पूरी बात बता दी ... कमिश्नर के माथे पर बल पड़ गए ... उन्होंने पूछा- " सिकंदर कहां है ? "

' ' हस्पताल में- ' कोमा में , बेहोश है अभी । "

" मिनिस्टर साहब को चैक किया ? ' '

" मैंने दरवाजे पर दस्तक जरूर दी थी , मगर न चटखनी को हाथ लगाया और न दरवाजा खोला । '

" किसी नौकर ने ...

? "

' ' मैंने चैक कर लिया है किसी ने नहीं खोला । "

" बैड टी ? "

" सर जागने के बाद खुद इंटरकॉम पर कहते हैं ... उन्हें जगाया नहीं जाता - मगर आज ऐसा नहीं हुआ

फिर वे लोग ऊपर आ गए । कमिश्नर ने इलाके के डी . सी . पी . को इशारा किया । डी . सी . पी . ने रूमाल से हैंडल पकड़कर घुमाया - अंदर से लॉक नहीं था और दरवाजा खुल गया । विक्रम सिंह और कमिश्नर अंदर दाखिल हुए । बैडरूम के फर्श पर मोटे रोएं का कालीन बिछा था - मगर बैडरूम में कोई नहीं था । कमिश्नर ने बैड को देखा और चौंककर बोला- " लगता है बैड पर कोई सोया ही नहीं । "

" ओहो ! " विक्रम चिन्तित ढंग में बोला ।

कमिश्नर ने विक्रम की ओर देखकर कहा ' ' मिनिस्टर साहब अकेले ही थे रात को या कोई खास मिलने वाला या मेहमान । ' '

" रात भर का कोई मेहमान नहीं था । "

" मगर बैड तो इस्तेमाल नहीं किया गया - वह कितनी देर रही ? "

“ यह तो नौकर ही बता सकते हैं ... मैं तो सुबह ही आया था - मैंने सर के न जागने का कारण पूछा था - बस

" इसका मतलब है मिनिस्टर - साहब ... ! " फिर कमिश्नर ने आगे बढ़कर खुद बाथरूम का दरवाजा खोला - दरवाजे का पट भी अंदर से बंद नहीं था । कमिश्नर , विक्रम सिंह और डी . सी . पी . अंदर दाखिल हुए और ठिठक गए ।
 
बाथ टब में ज्वाला प्रसाद बैठे थे आंखें फुटी हुई और दरवाजे की तरफ थीं - मुंह भी पूरी तरह से बंद नहीं था ।

' ' सर तो खत्म हो गए । ” विक्रम बहुत दुःख से बोला ।

" टेक इट ईजी ... मिस्टर विक्रम । "



विक्रम के चेहरे पर भूचाल - सा नजर आया ... उसे डी . सी . पी . ने बाहर भेज दिया । कमिश्नर और डी . सी . पी . अन्दर रह गए ... वे लोग टब के चारों ओर का निरीक्षण करने लगे - और फिर बाहर आकर कमिश्नर ने डी . सी . पी . से कहा- ' ' आप सैन्ट्रल इंटेलिजेंस को खबर करें । "

" यस सर ! ' '

" और हां ... पहले कालीचरण के नान - बेलेबल वारंट इश्यू कराने का इन्तजाम कीजिए । "

' यस सर । "

डी . सी . पी . के जाने के बाद कमिश्नर विक्रम की ओर देखता हुआ बोला - ' ' आपको किस नौकर ने सिकन्दर की खबर की थी - उसे बुलाइए । "

थोड़ी देर बाद तिवारी कमिश्नर के सामने खड़ा था | कमिश्नर ने उसे बड़े ध्यान से देखा और बोला " काफी पुराने मालूम होते हो । ”

तिवारी की आंखें भींग रही थीं , वह रुधे गले से बोला

' ' जब मालिक एक स्कूल के प्रिंसिपल थे , तब से मैं इस परिवार का नमक खाता रहा हूं । "

" मिनिस्टर साहब का परिवार कहां है ? "

" छुट्टियां हैं , इसलिए वे लोग ऊटी गए हैं ... एक हफ्ता पहले । "

" कब तक लोटेंगे ? "

" महीने भर बाद । "

" मिनिस्टर साहब को भी जाना था ? "

" जी नहीं- क्योंकि पार्टी की गतिविधियां बढ़ गई

" उनकी दिन भर की गतिविधियां साधारणतया क्या होती हैं ? "

" सुबह सात बजे बैड टी मांग लेते थे - साढ़े आठ आठ बजे तक नीचे आ जाते थे- दस बजे तक मुलाकातियों से मिलते थे और उसके बाद सैक्रेटेरियट चले जाते । "

" वापसी के बाद ? "

' आजकल बंगले पर ही रहकर काम कराते थे या कभी किसी फंक्शन में चले जाते थे । "

" यहां कितने मुलाकाती आते थे ? "

" बहुत । "

" कल रात ? "

" आखिरी मुलाकाती कोई विदेशी संवाददाता था

" उसके बाद ? "

" मालिक ने कालीचरण को फोन कराया था मुझसे

" फिर ? "

" दो बजे के लगभग ' वह ' गाड़ी में आई थी । "

" अकेली ? "

" जी , ड्राइवर छोड़कर चला गया । "

" फिर ? "

" मैं तो क्वार्टर में चला गया था । "

" किसी ने दोनों को देखा था ? "

" फाटक पर पहरेदार ही ने देखा होगा । "

कमिश्नर ने पहरेदार को बुलाया जिसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं ... कमिश्नर के पूछ - गछ करने पर पहरेदार ने कालीचरण द्वारा लड़की और उसके साथ आने वाले ड्राइवर का हुलिया बताया जिसे नोट कर लिया गया- फिर दूसरी रस्मी कार्यवाही शुरू कर दी गई ।
 
3

कालीचरण स्पष्टतया एक बहुत बड़ा फाइनैंस ब्रोकर था जो बड़े - बड़े फिल्म प्रोड्यूसरों , बिल्डरों और नेताओं मिनिस्टरों इत्यादि की बड़े - बड़े धनवानों , साहूकारों से फाइनैंस दिलवाता था और कमीशन में करोड़ो कमाता था ।

इसीलिए कालीचरण के कान्टैक्ट मे ऐसी सुन्दर लड़कियां और फिल्मी हीरोइनें तक थी जो खुले तौर पर धंधा नहीं करती थीं- बहुत सारे इज्जतदार घरानों की लड़कियां भी थी ... कम उम्र की शौकीन औरतें भी

कालीचरण वरसोवा में एक शानदार बंगले में रहता था ... उसके पास कई गाड़ियां भी थीं ... जिनमें इम्र्पोटिड भी और हिन्दुस्तानी भी थीं - उसके ठाठ राजाओं - महाराजाओं जैसे थे- वह पचास पचपन बरस का एक स्मार्ट आदमी था जिसने अपनी फिगर मेन्टेन कर रखी थी और तीस - बत्तीस बरस से अधिक का मालूम नहीं होता था । उसका विशेष पहनावा काली जीन्स और काली शर्ट थी- कलाई पर एक काली इम्र्पोटिड घड़ी थी- गले में खालिस सोने की मोटी जंजीर थी ।

रात को लगभग तीन साढ़े तीन बजे टेलीफोन पर उसकी बात संजय से हुई थी और उसने उसी समय अपने बचाव के प्रबंध करने शुरू कर दिए थे ।

अंधेरी इलाके का डी . सी . पी . जब फोर्स लेकर कालीचरण को गिरफ्तार करने के लिए पहुंचा तो कालीचरण के पर्सनल सेक्रेटरी वागले ने उसे बताया कि कालीचरण तो कल से दिल्ली गए हुए हैं ।

" कल किस समय ? "

" शाम को छ : -सात बजे की फ्लाइट से , दिल्ली से अचानक उन्हें ट्रंककॉल आया था । "

" कोई कारोबारी जरूरत थी ? "

" जी नहीं , वह दिल्ली ही के रहने वाले हैं । "

" कल रात उसकी जगह किसने संभाली थी ? "

" मैंने ... मैं उनका पर्सनल सेक्रेटरी हूं । "

" कल रात , सर ज्वाला प्रसाद के यहां किस लड़की को भेजा गया था ? "

" एक मिनट ... मालूम करके बताता हूं- इस काम के इंचार्ज जहूर राजा हैं । " फिर जहूर राजा नाम के आदमी को बुलवाया गया

यह एक अधेड़ उम्र का मोटे पेट और फूले हुए चेहरे वाला सूटिड - बूटिड आदमी था जिसकी आंखो के नीचे गढ़े अधिक शराबी होने के साक्षी थे ।

डी . सी . पी . ने बडे ध्यान से जहूर राजा को नीचे से ऊपर तक देखा । सैक्रेटरी ने कहा- “ जहूर राजा- डी . सी . पी . साहब आपसे कुछ पूछना चाहते हैं । "

जहूर राजा डी . सी . पी . को देखता हुआ बोला " पूछिए । "

जहूर राजा का मूड और ढंग ऐसा था कि डी . सी . पी . को गुस्सा आ गया ... उसने एक सब - इंस्पेक्टर से कहा- " इन्हें हिरासत में ले लो । "

जहूर राजा पर इस धमकी का कोई प्रभाव नहीं हुआ- उसने बड़े साधारण ढंग में बिना घबराए कहा " पहले वारंट दिखाइए और अपराध बताइए । "

" व्हाट ! हमें कानून सिखाते हो ? "

“ एम . ए . एल . एल . बी . हूं- प्रैक्टिस नहीं की- डिग्री तो है । "

“ एम . ए . एल एल . बी . होकर दलाली करते हो ? "

जहूर राजा की आंखें लाल हो गई ... उसने गुस्से से कहा- " अगर इस वक्त तुम वर्दी में न होते तो मुंह तोड़ जवाब देता- लेकिन कानूनदान हूं और जानता हूं कि कानून के रक्षकों पर जब वह वर्दी पहने हों , हाथ नहीं उठाना चाहिए । "

वागले ने भी अप्रिय स्वर में कहा- " डी . सी . पी . साहब ! आपको जो कुछ पूछना है पूछिए - किसी पर अकारण निजी चोट मत कीजिए- इस वक्त कौन है जो किसी न किसी ढंग से दलाली नहीं करता । "

डी . सी . पी . ने कहा- " मैं इन्हें हवालात में ले जाकर जांच कराऊंगा । "

" तो वारंट लेकर आइए । "

" देखिए मिस्टर ... ! "

" मैं वागले हूं , कालीचरण साहब का पर्सनल सेक्रेटरी ... मुझे इस वक्त आप कोई जवाब देने पर मजबूर नहीं कर सकते । "

डी . सी . पी . ने नथुने फुलाकर कहा- " आप जानते हैं , किस सम्बन्ध में यह छानबीन हो रही है ? "

" नहीं ...

... हम कुछ नहीं जानते । "

" अभी थोड़ी देर बाद अखबार बेचने वाले सड़कों पर चिल्लाते नजर आएंगे- टी . वी . पर बार - बार बुलेटिन टैलीकास्ट होंगे । "

" किस ससम्बन्ध में ? "

" ऑनरेबल ज्वाला प्रसाद जी के खून के सिलसिले

में । "

" नहीं ... ! "

वागले के मस्तिष्क में जैसे धमाका - सा हुआ और वह झट कालीचरण की अनुपस्थिति का और उसके यहां न होने का कारण जान गया ।

' अब बताइए । ” डी . सी . पी . ने कहा ।

जहूर राजा अब भी शांत था । उसने कहा- " हमारा उनके मर्डर से क्या सम्बन्ध ? "

" जिस समय उनका मर्डर हुआ है , उस समय यहां की भेजी हुई एक लड़की उनके साथ थी । "

" कब हुआ है उनका मर्डर ? "

" रात में किसी समय । "

" किसी समय से कुछ नहीं कहा जा सकता- ठीक टाइम मालूम हुए बगैर आप हमारी किसी लड़की पर

शाहीन की तबाही कैसे शक कर सकते हैं ? "

" आप सीधी तरह जवाब क्यों नहीं देते ? "

" आपने सीधी तरह कोई सवाल ही कब किया है ? "

डी . सी . पी . उसे घूरता रहा तो जहूर राजा ने कहा " डी . सी . पी . साहब ! के . सी . साहब की एप्रोच कहां तक हैं यह आप जानते हैं और हम लोग ऐसी किसी साजिश में शामिल नहीं हो सकते ... यह भी आप समझते हैं- हो सकता है हमारे यहां की कोई लड़की किसी ऐसी खतरनाक साजिश की लपेट में आ गई हो जिसकी हमें कोई जानकारी नहीं , क्योंकि हम अपना काम बिगाड़ना पसंद नहीं करेगें और अपनी साख नहीं गिराना चाहेंगे । "

" क्या कहना चाहते हैं आप ? "

“ यही कि इतनी बड़ी वारदात बेशक पुलिस और कानून के लिए सिरदर्द बनेगी .. इसलिए हमारा फर्ज बनता है कि हम आपकी इन्वेस्टीगेशन में मदद करें । "

" मैं भी तो यही कह रहा हूं ... चलिए , बताइए कौन लड़की गई थी रात को ज्वाला प्रसाद जी के यहां ? "

जहूर राजा ने कहा- " मेरे साथ अंदर आ जाइए ...

मगर अकेले । "

डी . सी . पी . बनावटी गुस्से के साथ अंदर आ गया कमरे मैं बिठाकर जहूर राजा ने डी . सी . पी . से कहा " ऐसे समय में ऑनरेबल ज्वाला प्रसाद जैसे बड़े लोगों की पोजीशन कितनी नाजुक होती है , इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि अगर आप मुझे कोई दफा लगाकर गिरफ्तार कर लेते हैं ... और वागले साहब प्रेस वालों को बयान दे दें कि मुझे क्यों गिरफ्तार किया गया है ... तो आप कहां होंगे ? "

डी . सी . पी . सन्नाटे में रह गया । जहूर राजा ने फिर कहा

" मैंने शादी नहीं की- मगर बारातें बहुत देखी हैं । "

" कौन - सी लड़की भेजी थी ? "

" शकीला नाम की एक चौबीस - पच्चीस साला लड़की है । "

डी . सी . पी . ने चौंककर कहा- " शकीला ! "

" किसी गलतफहमी में मत पड़े- वह बिल्कुल प्रोफेशनल नहीं है- अगर मामला इतना गम्भीर न होता तो हम उसका नाम कभी जुबान पर न लाते । "
 
" कितने बजे गई थी वह ? "

जहूर ने रजिस्टर देखा और बोला- “ यहा से ठीक एक बजकर दस मिनट पर निकली थी ... वहां कितनी देर में पहुंची होगी , आप अंदाजा लगा सकते हैं । "

" कौन - सी गाड़ी में और उसके साथ कौन था ? "

जहूर ने फिर रजिस्टर देखकर कहा- सफेद मारुति वैन- उसके साथ संजय नाम का एक नौजवान था । "

" यह संजय क्या करता है ? "

" के . सी . साहब के यहां काम करता है- खूबसूरत है और जूडो - कराटे का माहिर है इसीलिए उसे रखा गया है- ईमानदार है । "

" पहले क्या करता था ? "

" बेकार था ... मारवाड़ी सेठों की बीवियां उसे बहुत पसंद करती हैं- बहादुर है और मौका पहचानता है इसलिए नॉन प्रोफेशनल लड़कियों की रक्षा और राजदारी के लिए खास तौर पर उसे साथ भेजा जाता

" वह है कहां ? "

" अभी मालूम करता हूं । ” जहूर ने इन्टरकॉम का रिसीवर उठाकर बटन दबाया और रिसीवर कान से लगा लिया । "

कुछ देर बाद आवाज आई- " जी साहब ! "

" संजय को भेज दो । "

" संजय साहब तो हैं नहीं । "

" कहां गए है ? "

" पता नहीं ... बता कर नहीं गए । "

" रात को गए थे और अभी लौटे भी नहीं । "

" नहीं ...। "

" और शकीला ? "

" जी- वह भी नहीं । "

" अच्छा बस । ” जहूर राजा ने रिसीवर रख दिया तो डी . सी . पी . ने पूछा

" क्या हुआ ? "

" एक मिनट । " जहूर ने मोबाइल से संजय के मोबाइल नम्बर मिलाए - नम्बर मिलने के तुरन्त बाद आवाज आई- हुक्म , जहूर साहब । "

" संजय ! तुम कहां हो ? "

" क्या पुलिस पहुंच गई ? "

" तुम कहां हो ? "

" बता नहीं सकूँगा । "

" शकीला कहां है ? "

" वह भी अपने घर नहीं मिलेगी । "

" तो क्या तुम लोग ... ? "

" नहीं ... हम दोनों में से कोई नहीं- कालीचरण साहब

को हम दोनों ने सब कुछ बता दिया था । "

" तुम पुलिस को बयान दे दो आकर । "

" हमें पकड़े नहीं जाना चाहते । "

फिर दूसरी ओर से डिस्कनेक्ट हो गया । जहूर राजा की आंखों में चिन्ता की झलक नजर आई । उसने मोबाइल बंद करके डी . सी . पी . की तरफ देखा , जो उसको बड़े ध्यान से देख रहा था ।

" क्या संजय और शकीला दोनों फरार हैं ? " डी . सी . पी . ने

पूछा

" फरार ही कहा जा सकता है । "

" आपसे क्या बात हुई ? "

" संजय पूछ रहा था , क्या पुलिस पहुंच गई है ? "

" ओह ! इसका मतलब है ... कत्ल की साजिश में दोनों शामिल हैं । '

" मैं नहीं समझता कि संजय और शकीला के दिमागों में इतनी योग्यता है कि दोनों लोग इतनी बड़ी साजिश में शामिल हो । "

" तो फिर दोनों फरार क्यों है ? "

" सम्भव है , वे लोग खून की साजिश के बारे में रात ही को जान गए हो और उन्होंने असल खूनी की गिरफ्तारी तक छुपे रहने का फैसला किया हो । "

" यह तो आपका अपना विचार है..जरूरी नहीं कि यह सच ही हो और पुलिस आपके विचार से सहमत हो- उन दोनों की गिरफ्तारी बहुत जरूरी है । "

" बेशक ... आप उन दोनों को गिरफ्तार कीजिए ... हम लोगों को कोई आपत्ति नहीं होगी , बल्कि हम आपको पूरी मदद देंगे । "

" पहले हमें संजय और शकीला के पते दीजिए । "

जहूर राजा ने दोनों के पते लिखकर दिए और बोला- " शकीला एक बिल्कुल नौजवान , सुन्दर , अनब्याही लड़की है - उसकी गिरफ्तारी की कोशिश के समय उसका सम्बन्ध कालीचरण फाइनेंस कारपोरेशन से न जाहिर हो तो अच्छा है । "

" क्यों ? "

" वह प्रोफेशनल नहीं है- मजबूरियां उसे इस लाइन में लाई है- हम नहीं चाहते कि इस मामले मे उसकी बदनामी हो । ”

डी . सी . पी . ने रुखाई से कहा- " पुलिस अपनी जिम्मेदारियां जानती है । "

फिर वे लोग चले गए । उसके जाने के बाद वागले अंदर आया , लेकिन जहूर राजा यूं ही बैठा रहा ।

वागले ने कहा

" डी . सी . पी . , सी . आई . डी . लगा गया है । "

" वह तो ऐसा करेगा ही । "

" संजय और शकीला से कान्टैक्ट हुआ ? "

जहूर राजा ने उसे विस्तार से बताया और बोला संजय कह रहा था कि उसने कालीचरण को रात ही खबर कर दी थी । "

" मैं समझ रहा हूं , के . सी . साहब ने अचानक ऐसा प्रोग्राम बना लिया ... मैं तभी समझ गया था कि दाल में कुछ काला है । "
 
" क्या सचमुच संजय और शकीला इतनी बड़ी साजिश में शामिल हो सकते हैं ? "

" कुछ कहा नहीं जा सकता , धन - दौलत अच्छे - अच्छों के ईमान डगमगा देती है । "

कुछ देर मौन रहा ... फिर वागले ने कहा- “ अगर शकीला की बदनामी हुई तो मुझे दुःख होगा । "

" मैं खुद उसके बारे में सोच रहा हूं ... वह लड़की बहुत ही अच्छी है ... मुझे तो इस बात का दुःख है कि वह ऐसे धंधे में क्यों आ गई ? "

" पता नहीं , पुलिस की प्रतिक्रिया क्या होगी ? "

" हो सकता है , दोनों के घरों पर छापा मारा जाए

फिर दोनों चुप हो गए ।

4

पूरी राजदारी की कोशिश करने पर भी ज्वाला प्रसाद के खून की खबर जंगल की आग की तरह शहर में फैल गई- बंगले पर जैसे प्रेस और टी . वी . वालों ने धावा बोल दिया ... ज्वाला प्रसाद के समर्थकों की इतनी भीड़ इकट्ठी हो गई कि बंगले की सुरक्षा के लिए सी . आर . पी . की मदद लेनी पड़ी । एक - दो घंटे के अंदर अखबारों के बुलेटिन छपकर मार्केट में आ गए ... दूरदर्शन और प्राइवेट चैनल बुलेटिन टेलीकास्ट करने लगे ... उनके विरोधी दल वालों में खुशी की लहर दौड़ गई , लेकिन रस्मी शोक प्रस्ताव भी पास होने लगे

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सेंट्रल इंटेलीजेस डिपार्टमेंट पूरी तरह से हरकत में आ गया था- केस का चार्ज सी . बी . आई . सुपरिन्टेंडेंट विजय सरदाना को सौंपा गया था जो काफी समय से फौज की इंटेलीजेंस में भी रह चुके थे ।

विजय सरदाना ने प्रारम्भिक रिपोर्ट कमिश्नर और सम्बन्धित पार्टियों से इकट्ठी की जिनके द्वारा उनके सामने कालीचरण का नाम आया , साथ ही संजय और शकीला के नाम मुख्य पात्रों के रूप में आये ।

शकीला और संजय के बारे में डी . सी . पी . की रिपोर्ट थी कि वे दोनों अपने ठिकानों पर नहीं थे ... मगर ठिकानों की निगरानी पर सादा लिबास वाले निगरानी पर मुकर्रर थे- कालीचरण कारपोरेशन से सम्बन्धित सारी इमारतों पर सादा लिबास वाले निगरानी कर रहे हैं ।

विजय सरदाना ने पहले खुद ज्वाला प्रसाद के बारे में छानबीन जरूरी समझी ... एक साधारण मुलाकाती

और दूर के रिश्तेदार के नाते उन्होंने इन्वेस्टीगेशन शुरू की ।

पहले वह उनके बंगले पर पहुंचे , जहां बाहर जनता की भीड़ ज्वाला प्रसाद के लिए नारे लगा रही थी और उनके दुश्मनों के पुतले जला रही थी । उनके एक जोशीले हितैषी ने अपने ऊपर तेल छिड़ककर आत्मदाह की कोशिश की थी , जिसे सिविल पुलिस वालों ने दबोचकर रोक रखा था । एक ओर औरतों की भीड़ धाड़ें मार - मारकर रो रही थी ... कुछ समर्थकों ने भूख हड़ताल कर रखी थी कि कातिल का जल्दी से जल्दी से पता लगाकर उसको मौत की सजा दी जाए ।

दिखाने पर

अखबार वाले फोटोग्राफरों के फ्लैश के झमाके हो रहे थे । विजय सरदाना यह सारे तमाशे देखते हुए किसी तरह फाटक तक पहुंचे ... अपना आई कार्ड

अंदर दाखिला मिल गया ... वहां पहले से पहुंचे सरकारी अफसरों को पहले ही सूचना मिल चुकी थी कि यह केस विजय सरदाना को सौंप दिया

गया है ।

विजय सरदाना साहब ने सबसे पहले पुराने नौकर को पूछगछ के लिए बुलाया और अलग कमरे में ले गए । नौकरों की आंखे रोते - रोते सूज गई थीं ।

विजय सरदाना ने उसे ध्यान से देखकर अचानक कहा

' अगर तुम बता दो कि तुमने इस खून की साजिश में अपने मालिक के दुश्मनों का साथ क्यों दिया था तो मैं तुम्हे वायदा माफ गवाह बना लूंगा । "

नौकर भौंचक उसे देखता रहा और सरदाना उसकी आंखें और चेहरा पढ़ता रहा , जिनमें से भीतर की घबराहट झलक रही थी ... वह बड़ी मुश्किल से थूक निगलकर बोला- “ हुजूर ! मैं तो मालिक का बीस बरस पुराना नौकर हूं । "

" देखो शंकर ! समय चाहे बीस दिन का हो या बीस बरस का , आदमी की नीयत बदलने में देर नहीं लगती सोने - चांदी की खनक और चमक बाप को बेटे और बेटे को बाप का दुश्मन बना देती है । "

" म ... म ... मगर साहब , मैं धन - दौलत का क्या

करूगा ? "

" तुम्हारे परिवार में कौन - कौन है ? "

" अनाथ था , शादी भी नहीं की । "

" उम्र ? "

" पैंतालीस बरस । "

" यानी जवानी की उम्र ... इस उम्र में आदमी को धन मिल जाए तो हर तरह के ऐश कर सकता है । "

" नहीं साहब , मेरे पास कुछ भी नहीं । "

" मालिक के लिए जो लड़कियां यहां आती थी कभी उनमें से किसी से कभी ऐसा सम्बन्ध जुड़ा हो ... आखिर इंसान हो तुम भी , देवता नहीं । "

नौकर ने अपने गाल पीटकर कहा- " तौबा - तौबा , यह आप क्या कह रहे हैं साहब ? "

“ शंकर , हम अपनी जैसी बात कह रहे हैं । "

" क्या मतलब ? "

" अरे ! हमें मौका मिले तो हम भी कभी नहीं छोड़ते । ”

" नहीं साहब ! यह गलत है । "

विजय सरदाना मुस्कराया- " मैं तो दोस्ताना तौर पर पूछ रहा हूं ... सच बताओ । "

" साहब ! मै सौगंध खा सकता हूं । "

" किसकी ? "

" जिसकी आप कहें । "

" मैं तो सौगंधों में विश्वास ही नहीं रखता । "

" साहब ... ! "

' अच्छा शंकर , मान लो तुम्हें गिरफ्तार करके हवालात ले जाया जाए तो ? वहां स्पेशल इन्वेस्टीगेशन रूम है ... जहां हम थर्ड डिग्री प्रयोग करते हैं ... अपने शिकार का हवाई जहाज बनाते है , बर्फ की सिल्ली पर नंगा करके लिटाया भी जाता है- और जरूरत पड़े तो गलत जगह में डंडा भी लूंस देते हैं । "

" नहीं .. ! " शंकर हड़बड़ाकर खड़ा हो गया- उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थी- उसने होठों पर जबान फेरी ! विजय सरदाना ने इस बार गम्भीरता से कहा- " बैठ जाओ । "

शंकर सहमा - सा बैठ गया- विजय सरदाना ने मोबाइल निकालकर नम्बर मिलाए । दूसरी ओर से आवाज आई- “ यस । "

" आई जी सर ! "

" स्पीकिंग । "

इससे पहले कि बात आगे बढ़ती , शंकर जल्दी से हाथ उठाकर कांपती आवाज में बोला- " ठहरिए साहब , क्या कर रहे है ? "

विजय सरदाना ने हाथ रोक लिया और बोला " पुलिस बुला रहा हूं । "

" क ... क ... क्यों ? "

" तुम मजबूर कर रहे हो तो क्या करू ? " " नहीं ...

... नहीं साहब । "

विजय सरदाना ने शंकर की ओर देखकर कहा " हां ! तुम तैयार हो ? "

" ज ... ज ... जी ... ! "

" तुम ज्वाला प्रसाद के रोजमर्रा के कामकाज को पूर्ण रूप से जानते थे ? "

" जी हां । "

" तो क्या उसकी विलासमयी जीवन यात्रा में कुछ तुम्हें भी मिलता था ? "

" जी ... कभी - कभार लुके - छिपे कि मालिक को

मालूम न हो । "

" तुम्हे किसी लड़की ने अलग बुलाने का निमंत्रण भी दिया था ? "

" जी ... कोई नई बनने वाली हीरोइन । "

" नाम ... पता ? "

" नाम नहीं मालूम ... सूरत से पहचानता हूं । " " कैसे सम्बन्ध जुड़ा उससे ? "

" मालिक उसके साथ एन्ज्वॉय करके बेसुध हो गए तो फिर वह लड़की खुद मेरे पास आ गई । कहने लगी , तुम मर्दो के मर्द हो- उसने मुझे अलग मिलने का निमंत्रण दिया । "

" फिर ? "

" साहब ! मैं बहक गया ... नीयत फिसल गई ... वह मुझे किसी खास जगह बुलाती और अपने साथ ले जाती ... साहब ! मुझे लगा वह मुझे मुहब्बत करने लगी है- मैं उसका दीवाना - सा हो गया था । "

" और वह तुमसे ज्वाला प्रसाद की रोजमर्रा की कार्यवाही के बारे में पूछती रहती होगी ? "

“ जी हां साहब ! मैं मालिक का खास नौकर था - उनके सुबह जागने से लेकर रात सोने के बीच की उनकी सारी व्यस्तता के बारे में वह बड़ी रुचि से पूछती थी । कहती थी , वह मालिक की बहुत बड़ी फैन है..और उन पर एक पुस्तक लिख रही है । "
 
" कभी उसने ज्वाला प्रसाद जी के ऑफिस की भी तलाशी ली ? "

" जी हां - कई बार ... जब मालिक बेहोशी की नींद सो जाते तो वह मेरे साथ उनके ऑफिस में आ जाती ... उसने उनकी कई फाइलों को देखा , नोट किया

और फोटोग्राफी भी ... उसके पास एक बहुत छोटा - सा एक - डेढ़ इंच के साइज का कैमरा था जिसे आंख से लगाकर क्लिक करती और पूरा पत्र उसमें आ जाता जिसे वह बाद में एनलार्ज करा लेती । "

विजय सरदाना ने गहरी सांस लेकर कहा- " वह लड़की क्या कालीचरण द्वारा यहां भेजी गई थी ? "

" जी नहीं ... उसका ब्रोकर उसका पति ही था जो नौकरी की तलाश में यहां आया था ... किसी की सिफारिश लेकर ... मालिक के पास । "

" लड़की साथ थी ? "

" जी हां - पता नहीं क्या बातें हुई - लड़की आने - जाने लगी- उसका पति फिर नजर नहीं आया । लड़की ने बताया था कि उसे मालिक की सिफारिश पर किसी विदेशी दूतावास में नौकरी मिल गई है । "

" दोनों के नाम ? "

" साहब ! नाम कभी पूरा नहीं सुना- लड़की को मोनी करके बुलाते थे ... मर्द का नाम कभी मेरे सामने नहीं आया । "

" वह तुम्हें एन्ज्वॉय करने के लिए कहां बुलाती थी ? "

" किसी भी बाहरी जगह .... जैसे जुहू , मेरीन ड्राइव , गेटवे ऑफ इण्डिया ... इत्यादि । कभी किसी होटल में , कभी किसी किराए पर मिलने वाले कॉटेज में । "

" मतलब यह कि तुम्हे दोनों का पता नहीं मालूम ? "

" जी नहीं । "

" उनके हुलिए ? "

" मुझे सिर्फ लड़की का हुलिया याद है । "

फिर उसने लड़की का हुलिया बताया जो विजय सरदाना ने दिमाग में बिठा लिया और बोला- " अब बताओ ! तुम किसी अनदेखी गोली का शिकार होना चाहते हो ... या जिन्दा रहना पसंद करते हो ? "

शंकर का चेहरा सफेद पड़ गया..उसने थूक निगलकर कहा- " क्या मतलब ? "

" ज्वाला प्रसाद के खून की साजिश के जिम्मेदार इतने बेखबर नहीं हो सकते कि अपने विरुद्ध इतना ठोस बयान देने वाले के बारे में न जान सके इसलिए तुम सिर्फ हवालात या जेल में सुरक्षित रह सकते हो । "

शंकर की आंखें जैसे एकदम बुझ गई ।

जिस कमरे में ज्वाला प्रसाद का खून हुआ था , वही सील्ड था ... विजय सरदाना ने कमरा खुलवाया और अंदर घुसकर बंद करके बड़ी बारीकी से पूरे कमरे और बाथरूम का निरीक्षण करने लगा ।

बाथ टब के बिल्कुल पास उसे बहुत हल्का - सा जूते के तले का निशान नजर आया , उसने जेब से खास , शीशा निकाला और बड़े ध्यान से जांच करने लगा ... बड़ा मद्धिम - सा निशान था जो बहुत ध्यान से देखने से नजर आ सकता था । विजय सरदाना ने उसका नाप लिया और फिर किसी कैमरे से उसका फोटोग्राफ भी ले लिया ... काफी छानबीन के बाद भी उसे बाथरूम से उस निशान के सिवा कुछ नहीं मिला ।

वह बाहर कमरे में आ गया । काफी देर की तलाश के बाद अचानक उसकी नजर बैड़ के सिरहाने के जरा से कटाव में एक छोटे - से छेद पर पड़ी- उसने जेब से चाकू निकाल लिया - थोड़ा चाकू की नोक से छीलने पर एक शीशा निकला ... जब उसने छेद को और बड़ा किया तो उसमें से एक बहुत छोटा टी . वी . कैमरा मिला जो बहुत छोटा था ।

' इसका मतलब है । ' उसने सोचा- ' जो कुछ इस बैड पर होता था , वह इस कैमरे की आंख द्वारा कहीं

और रिले हो जाता था- अर्थात् ज्वाला प्रसाद की ब्ल्यू फिल्में बनाई जाती थी । '

उसने कैमरा संभालकर रख लिया और बाहर आ गया । कमरा दोबारा सील कर दिया गया ।

फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट विजय सरदाना के सामने था ... विजय सरदाना ने उससे पूछा- “ ऑनरेबल ज्वाला प्रसाद के बैडरूम के फोटो तो उतारे गए होंगे ? कोई खास निशान ? "

" सिर्फ एक जूते का निशान मिला है जो शायद ज्वाला प्रसाद जी को पानी में डुबोते समय पांव पर दबाव डालने से पड़ गया होगा । "

" जरा प्रिंट दिखाइए । "

एक्सपर्ट ने प्रिंट दिखाया । सरदाना ने पूछा " आपके अंदाजे से क्या नम्बर होगा ? "

" नौ नम्बर ... चैक कर लिया गया है । "

" तले से तो लगता है किसी ऐकल - शू के तले का निशान है । "

" जी हां । "

" सेंट - परसेंट । प्रसाद जी के पर्सनल बाथरूम में सिवा उनके नौकर के दूसरा मर्द जा ही कैसे सकता है ? "

" नौकर ? नौकर क्या ऐंकल - शूज पहनकर जाएंगे ? "

विजय सरदाना हंस पडा और बोला- " सनिफर डाग्स से कोई मदद मिल सकती है ? "

" जी हां , वह एक खास बू पर झपटते हैं । "

" कैसी बू ? "

" आमतौर पर इंसानी शरीरों से अलग - अलग बू आती है- मगर यह एक ऐसी बू है जिसमें मछली की - सी गंध होती है- यह बू ऐसे मर्दो के बदन से आती है जो छोटी उम्र ही से हाजमे की किसी बीमारी के रोगी हों- आंतों की बीमारी में । "

" हूं ... ऐसी बू का कोई कपड़ा मिला है ? "

" जी नहीं । "

" वह बू किसी औरत के शरीर की हो सकती है । "

" जी नहीं ... औरतें अपने शरीर की बू के मामले में बहुत भावुक होती हैं ... विशेषत : प्रोफेशनल औरतें । "

" और कोई खास बात ? "

" बस ... | "

" ओ . के .... थेंक्यू । " और विजय सरदाना उठ गया

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फ्लैट की घंटी का बटन देर तक दबाना पड़ा , तब कदमों की आहटें सुनाई दी ... फिर किसी ने मैजिक आई से बाहर झांका और दरवाजा खुल गया ।

विजय सरदाना के सामने एक ऐसा बुढ़ा खड़ा था जिसकी गर्दन इतनी झुकी थी कि कुबड़ा नजर आता था , कंधे भी झुके हुए थे ... सिर पर सफेद रूई जैसे बाल और मोटे शीशों की ऐनक । शरीर पर स्लीपिंग सूट और गाऊन थे । उसने गर्दन उठाकर विजय सरदाना को देखा और बलगम भरी आवाज में बोला



“ फरमाइए । "

" मेरा नाम विजय है । "

" काम बताइए । "

" क्या शकीला जी ने कभी मेरा जिक्र नहीं किया ? "

बूढ़े ने चौंककर ऐनक ठीक की और उसे ऊपर से नीचे तक देखा और बोला

' आप शकीला को कैसे जानते हैं ? "

" जी , वह मेरे यहां पार्टटाइम जॉब करती है । मैं एक फर्म का मालिक हूं । "

" कैसी फर्म ? "

" एक्सपोर्ट , इम्पोर्ट का ठेका लेता हूं । "

" शकीला वहां क्या काम करती है ? "

' ऑफिस वर्क में असिस्टेंट है । "

" कितना टाइम ? "

" दो घंटे लगभग । "

" तनख्वाह क्या देते हैं ? "

" सात हजार रुपए महीना । "

" सिर्फ दो घंटे के ? "

" जी हां । "

" अंदर आ जाइए । "

विजय ने अंदर दाखिल होते हुए कहा- " मुझे शकीला से जरूरी काम है । "

" बैठ जाओ । " उसने एक सोफे की तरफ इशारा किया और विजय बैठ गया ।

बूढे ने अलमारी खोली और उसमें से रिवाल्वर निकालकर विजय की ओर तानकर अचानक फायर कर दिया । गोली सरदाना के कान के पास से गुजरकर सोफे में घुस गई । सरदाना भौंचक्का - सा रह गया और बोला

" यह आप क्या कर रहे हैं ? "

" यह गोली तुम्हारी कनपटी में भी छेद कर सकती थी ... मैंने जान - बूझकर निशाना नहीं लगाया । रिटायर्ड कर्नल हूं- कर्नल आफरीदी । "

" जी मगर ...

! "

" दो घंटे का काम - पार्ट टाइम और सात हजार रुपए महीना । कहां है शकीला ? "

" जी - उन्हीं को तो मैं पूछने आया था । "

आफरीदी ने फिर फायर कर दिया और गुर्राया " शकीला कहां है ? "

" जी ... वह तो कल रात लौट आई थी । "

" और कल ही से वह गायब है । "

" गायब ... ! " विजय ने आश्चर्य जताया ।

" बताओ , मेरी पोती कहां है ? वरना ... । " उसने फिर फायर कर दिया और गोली अबके विजय के दूसरे कान के पास से सोफे में धंस गई ।

विजय सरदाना आराम से बैठा रहा और हल्की मुस्कराहट के साथ बोला- " कर्नल साहब ! आप मुझे गोली मार दीजिए ... आपको शकीला मिल जाएगी । "

कर्नल आफरीदी उसे घूरता रहा ... विजय ने कहा

" क्या हम लोग चैन से बैठकर बात नहीं कर सकते ? "

" मुझे अपनी पोती की खबर चाहिए । "

' आप बैठिए तो सही । "

" मैं खड़ा हुआ ही ठीक हूं । "

" यह रिवाल्वर लाइसेंस्ड है ? "

आफरीदी को गुस्सा आ गया , उसने मुंह से थूक उड़ाते हुए गुस्से से भरे शब्दों में कहा- “ मैंने तुमसे कहा जो है । मैं रिटायर्ड कर्नल हूं ... मेरे पास लाइसेंस राइफलें भी है । "

" रिटायर्ड कर्नल के नाते आप कानून का आदर तो करते होंगे ? "

" क्यों नहीं करूंगा । "

" तो जिस तरह आपने एक शरीफ नागरिक पर बेवजह गोलियां चला दीं , क्या यह कानूनी आदर है ? "

" कानून अपनी जगह मगर मुझे अपनी पोती ज्यादा प्यारी है- मेरे मरहूम बेटे और बहू की इकलौती निशानी है वह- मैं जानता हूं वह बहुत खूबसूरत है तुम्हारे जैसे गुंडे अक्सर उसके पीछे लगे रहते हैं । "

" क्या मैं आपको सूरत से गुंडा नजर आता हूं ? "

' आजकल के गुंडे भी सफेदपोश होते हैं- तुम्हारे पास अपने शरीफ होने का क्या सबूत है ? "

विजय ने जेब में हाथ डालना चाहा तो कर्नल

आफरीदी दहाड़ा

" हाथ नीचे । "

" जनाब ! मैं अपनी शराफत का सर्टिफिकेट निकाल रहा हूं । "

" निकालो । मगर याद रखो , मैं पिचहत्तर बरस की उम्र में भी चालीस बरस के जवान की तरह फुर्तीला हूं

" याद रखूगा । "

विजय सरदाना ने अपनी जेब से अपना आई कार्ड निकालकर उसकी ओर बढ़ा दिया ।

कर्नल आफरीदी ने उलटे हाथ से आई . कार्ड लेकर देखा ... फिर उसकी आंखे गोल हो गई- विजय ने कहा ' अब आपको मेरी शराफत पर विश्वास आया । "

" मगर इसका क्या मतलब है ? "

“ यही कि मैं एक सरकारी ऑफीसर हूं ... और ड्यूटी पर हूं । "

" और थोड़ी देर पहले ? "

" जनाब ! मैं आपको एक आम आदमी समझ रहा था , मगर यह नहीं मालूम था कि आप वह कर्नल आफरीदी हैं जिनका नाम वर्ल्ड वार में बहुत मशहूर

हुआ था । "
 
कर्नल का गुस्सा एकाएक जैसे हवा में उड़ गया ... उसने विजय सरदाना का आई कार्ड लौटा दिया जिसे उसने जेब में रख लिया और कर्नल आफरीदी ने खखारकर कहा

" 1945 में जर्मन फ्रंट पर पहला ऑफिसर था जिसने हिटलर के एक मिसाइल का मुंह तोप के गोले से मोड़कर उसको पानी में गिरा दिया था और उस मिसाइल पर ब्रिटिश , रूसी और अमरीकी वैज्ञानिकों ने मिलकर रिसर्च करके उसका तोड़ तलाश किया था । "

" याद आ गया । "

" तुमने कैसे सुन लिया ? "

" मैं सी . बी . आई . में आने से पहले आर्मी इंटेलीजेंस में था ... ऐसे कारनामों के बारे में पढ़ चुका हूं । "

" बहुत खूब ... मगर तुम्हें शकीला से क्या काम पड़ गया ? क्या तुम उसे पहले ही से जानते थे ? "

" नहीं साहब ! मैंने शकीला को कभी आमने - सामने नहीं देखा । "

" और वह पार्ट टाइम जॉब ? "

" वह तो यह जानने का बहाना था कि शकीला कहां है ? "

इस पर कर्नल आफरीदी चौंक पड़ा और बोला

" शकीला के बारे में यह इन्वेस्टीगेशन इतने बड़े पैमाने पर क्यों हो रही है ? "

" आपके सवाल का सन्तोषजनक जवाब मैं फिर दूंगा , पहले मुझे कुछ जानने का मौका दें । "

" पूछो । "

" शकीला क्या काम करती है ... घर से बाहर कोई सर्विस ... कब बाहर जाती है- कब लौटती है ? "

कर्नल आफरीदी ने कहा- “ उसके कंधों पर इन दिनों सारी गृहस्थी का बोझ है- काफी कर्जा भी है जिसे पूरा करने का कोई रास्ता नहीं । "

" ओहो ... मगर आप तो ... । "

" ऑफिसर- अब रिटायर होने पर पहली - सी बात कहां ... फ्लैट का किराया - खाना - पीना और दूसरी घरेलू जरूरतों के अलावा मुझे एक बोतल स्कॉच की रोज चाहिए ... एक ही बेटा था , एकदम गधा .. .मैं उसे फौज में ऑफिसर बना देखना चाहता था , मगर उसे फिल्मों ने डुबो दिया- मेरी सारी कमाई एक फिल्म प्रोड्यूस करने में झोंक दी । "

" ओहो ! "

" कालीचरण नाम के एक दलाल ने उसे फाइनेंस करने का वायदा किया था ... उसकी शादी भी ऐसी हीरोइन से करा दी जो फिल्मों में आते ही फ्लॉप होकर घर बसाने की सोच रही थी । "

" शकीला उसी हीरोइन की बेटी है ? "

" हां । "

" और आपका बेटा ... बहू ... ? "

" वे लोग एक फिल्म की शूटिंग में कश्मीर बॉर्डर पर हैलीकॉप्टर पर गए थे- लोकेशन देख रहे थे कि उधर के आतंकवादियों ने मार गिराया - लाशों का भी पता नहीं चल सका । "

" माई गॉड ! "

" बस कर्जदार मुझ पर चढ़ दौड़े- बंगला , कार , बैंक बैलेंस और दूसरा कीमती सामान सब उनकी भेंट चढ़ गया ... आखिर फाकों की नौबत आ गई तो शकीला को नौकरी करनी पड़ी । "

' क्या नौकरी करती है वह ? "

" बताती है , किसी ऑफिस में पार्ट टाइम जॉब करती है ... सात हजार रुपए महीना ... लेकिन ऊपर की इन्कम अच्छी है । "

" ऊपर की इन्कम ? "

" मैंने पूछने की कोशिश की थी , मगर लेकिन कोई तसल्लीबख्श जवाब नहीं मिला - मगर मुझे सन्देह है वह कोई अच्छा काम नहीं कर रही । "

" किस आधार पर आप यूं सोचते हैं ? "

" उसके साथी को देखकर । "

" कौन है वह ? "

" संजय नाम का कोई लड़का है - दोनों काफी क्लोज हैं ... लगता है वह कोई शरीफाना काम नहीं करता । "

" शकीला और संजय क्लोज का मतलब ? "
 
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