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Thriller तबाही

रेणु बहुत बेचैन थी ... लगबग ग्यारह बजे उसे पड़ोसी की लड़की ने आकर खबर दी- " दीदी , आपके फ्रेंड का फोन है । "

रेणु लपककर पड़ोस में आ गई - इस समय फ्लैट की मालकिन भी वहां नहीं थी ... उसने रिसीवर उठाकर कहा - ' ' हैलो ! "

' ' रेणु ! ' '

' हां संजय भैया , मैं ही हूं । ' '

' ' क्या अकेली हो ? ' '

' ' हां । "

" सरोज के बारे में कोई खबर नहीं मिली । "

' ' खबर अच्छी नहीं है । ' '

चौंककर पूछा गया-- ' ' क्या मतलब ? '

' ' डिटेल नहीं मिल पाई ... विजय तुमसे मिलना चाहता है । "

,

" नहीं - मैं किसी से मिलने का खतरा मोल नहीं ले सकता । "

' ' पागल मत बनो भैया ! विजय तुम्हारी मदद और बयान के बगैर ज्वाला प्रसाद के असल कातिल को नहीं पकड़ सकता । '

।।

" वह सरकारी अफसर है ... क्या पता वह पहले ही मेरे गले का नाप ले ले । ' '

' ' नहीं भैया ! उन्हें विश्वास है कि तुम ज्वाला प्रसाद के असल कातिल नहीं हो । तुमने जो कुछ मुझे बताया , वह सब मैंने उसको बता दिया था - उसे तुम्हारे बयान पर पूरा भरोसा है । '

" मगर उसे विश्वास कैसे आ गया ? ' '

" एक बहुत बड़े और ठोस प्रमाण के आधार पर

' ' वह क्या ? "

" ज्वाला प्रसाद के बाथरूम में एक जूते के तले का निशान पाया गया था , जो कातिल के जूते का था .... वह निशान नौ नम्बर के जूते का है जबकि तुम्हारे जूते का नम्बर आठ है । ' '

कुछ देर मौन रहा तो रेणु ने कहा- । ' ' हैलो ! "

' ' मैं सुन रहा हूं । ' '

' ' भैया ! तुम्हें मेरे ऊपर भरोसा नहीं ? ' '

" भला तुम पर भरोसा नहीं करूंगा तो और किस पर करूगा

"

" तो फिर विजय से मिल लो - मेरी जिम्मेदारी है ... वह तुम्हारी जरूर मदद करेंगे - वह बहुत जिम्मेदार , शरीफ और ईमानदार , बहादुर ऑफिसर हैं । ' '

" ठीक है - मगर शकीला ! ' '

" दोनों मिल लो । वह शकीला से भी मिलना चाहते हैं - तुम्हारे ऊपर शकीला के कत्ल का भी आरोप है - शकीला को देखकर विजय को यह तो विश्वास हो जाएगा कि तुमने ( उसे नहीं मारा , बल्कि निरपराध पकड़े जाने से बचाया है । ' '

" ठीक है । '

।।

" कब ? और कहां ? ' '

कुछ देर मौन रहा , फिर आवाज आई

" तुम विजय को साथ लेकर जुहू बीच पर रात के दस बजे आ जाना । "

" किस जगह ? ' '

" हाली डे इन के पास जो गली साहिल पर आती है , उसके पास ही गाड़ी रोक लेना ... मैं उचित मौका देखकर खुद ही मिलने चला आऊंगा । "

फिर दूसरी ओर से डिस्कनेक्ट हो गया । इस समय रेणु कमरे में अकेली थी - उसने जल्दी से मोबाइल पर विजय सरदाना का नम्बर मिलाया और हैलो की आवाज पहचानकर बोली- ' ' विजय सरदाना , मैं रेणु बोल रही हूं ... अभी - अभी संजय से बात हो गई है । ' '

' क्या कह रहा था ? ' '

" कल रात को दस बजे जुहू बीच पर । "

' ' क्या शकीला भी साथ होगी ? "

' हां । ' ' फिर रेणु ने सिचुएशन के बारे में बताया जहां उन्हें पहुंचना है ।

" ठीक है - मैं गाड़ी लेकर आ जाऊंगा - तुम कहां मिलोगी ? "



' तुम गजेबो के सामने वाले स्टॉप पर मिल लेना ... मैं ठीक नौ बजे वहां पहुंच जाऊंगी । ' '

" ठीक है - लेकिन क्या तुम मां को कुछ बताए बिना रात को घर से निकल सकोगी ? "

' आज मां किसी लड़के को देखने रतलाम गई हुई है - उन्हें लौटने में चंद दिन लग जाएंगे । ' '

' तब ठीक है । ' '

फिर दोनों ओर से डिस्कनेक्ट हो गया ।

विजय ने अब्दुल रहमान के गैरेज से अपनी खास गाड़ी निकाली ... यह एक बंद , काले रंग की टू - सीटर गाड़ी थी - देखने में बड़ी मामूली - सी दिखती थी , मगर जासूसी और सुरक्षा के अनोखे छिपे ढंके औजारों से लैस - विजय इसे किसी खास मौके पर ही निकालता था ... रहमान को भी इस गाड़ी के अंदर का कुछ ज्ञान नहीं था ।

लिंकिंग रोड के बस स्टॉप पर उसे रेणु नजर आ गई - चूंकि वह गाड़ी को पहचानती नहीं थी इसलिए जब गाड़ी उसके सामने आकर रुकी तो वह चौक पड़ी .... लेकिन जब विजय ने दरवाजा खोला तो वह पास आ गई । गाड़ी में बैठकर उसने दरवाजा बंद किया तो गाड़ी अंदर से ठंडी थी । उसने बैठते हुए पूछा- ' ' यह कैसी गाड़ी है ? ' '

' ' खास मौके के लिए । ' '





।।

' आज क्या खास मौका था ? ।।

' ' संजय से मुलाकात क्या खास मौका नहीं , अगर मैं अपनी टाटा सूमो पर आता तो मेरे जानने वाले समज जाते कि मैं हूं और ऐसे रात में संजय से मुलाकात करना क्या अच्छा होता ? ' '

गाड़ी बिल्कुल बे आवाज थी और स्मूथली चल रही थी - कुछ देर बाद रेणु ने पूछा- ' ' अरे ... हां ... सरोज के बारे में कुछ पता चला ? "

' ' हां ! चल गया । ' '

' ' कहां है ? कैसी है ? '

' ' मर गई ... अब तो लाश भी जला दी गई होगी । ' '

' ' नहीं ... ! ' ' रेणु सन्नाटे में रह गई - उसकी कल्पना में सरोज का हंसमुख चेहरा घूम गया और उसने सुधे गले से कहा- ' ' लाश मिली कहां ? ' '

' ' मेरे फ्लैट में - मेरे ही बेडरूम में - मेरे ही बैड पर । ' '



" तुम्हारे फ्लैट में - तुम्हारे बिस्तर पर ? नहीं ! ' '

विजय ने विस्तार से सब कुछ बताकर कहा- ' ' लोग मुझे फंसाने की चालें चलने लगे हैं और इसका मतलब यह है कि साजिश का जाल पूरी तरह से फैला हुआ है

' ' फ ... फ ...

फिर ... क्या करोगे तुम ? "

-

" जो अब तक करता रहा हूं । कोई नई बात थोड़ी है ... जाने कितनी बार ऐसे हालात से दो - चार हुआ हूं

कुछ देर बाद गाड़ी हॉली डे इन के साथ वाली गली में पहुंचकर रुक गई ... विजय ने घड़ी देखी ... नौ बजकर बीस मिनट हो गए थे

उसने कहा- ' ' दस बजे आएगा संजय ? "

' ' हां । "

' ' मगर वह मेरी गाड़ी को कैसे पहचानेगा ? ' '

' ' ऐसी कोई बात तो हुई नहीं थी - उन्होंने कहा था - मैं खुद ही मौका देखकर आ जाऊंगा । ' '

" तो फिर तुम्हें बाहर निकलना पड़ेगा । "

' ' मैं भी यही सोच रही हूं । ' '



' साहिल पर जाओ और ऐसे बैठ जाओ जैसे किसी का इन्तजार कर रही हो - इस तरह मैं भी अंदाजा लगा लूंगा कि किसी ने पीछा तो नहीं किया । ' '

" ठीक है । "

और एक माउजर उसे देकर बोला- ' ' यह मुठ्ठी में आ जाएगा । "

' ' क्या है ? "

' ' छोटा रिवाल्वर ! कभी चलाया है ? ' '

' ' मैं स्काउटिंग में थी - राइफल शूटिंग में एक बार फर्स्ट भी आई थी । "



" मगर इसकी रेंज ज्यादा नहीं है - दस मीटर ही है - याद रखना । "

' ' ठीक है । '

' ' किसी भी एमरजेंसी में बेधडक गोली चला देना - मैं संभाल लूंगा । ' '



" ठीक है । ' '

रेणु उतरकर साहिल पर चली गई - विजय दरवाजा बंद किए उसे देखता रहा , फिर उसने डैश बोर्ड से एक छोटी - सी चिपटी शीशी निकाली और चंद बूंदे जबान पर डालकर शीशी बंद करके रख दी ।
 
कुछ देर बाद उसने रेणु के इर्द - गिर्द दाढ़ी - मुंछों वाले सरदार को मंडराते देखा - उसके साथ एक सुन्दर सरदारनी भी थी - वह समझ गया वही लोग संजय और शकीला होंगे - फिर उसने देखा - वह तीनों बातें कर रहे हैं - विजय कार से निकल आया - उसी वक्त रेणु ने उसकी ओर देखा था ।

विजय उनकी ओर देखे बगैर आगे बढ़ता चला गया ... वे लोग भी समझ गए और उसके पीछे चल दिए ... काफी दूर अंधेरे में निकल आने के बाद वह एक चट्टान के पास आकर रुक गया ... कुछ देर बाद वे तीनों भी वहीं पहुंच गए और रेणु ने विजय की ओर इशारा करके संजय से कहा- ' ' भैया ! यह विजय हैं । ' '



" हैलो ! ' ' विजय ने संजय से हाथ मिलाया ... और संजय ने सरदारनी बनी हुई शकीला की तरफ इशारा करके कहा- ' ' शकीला । '

" बताने की जरूरत नहीं है ... मैं समझ गया था । ' '

।।

" आपके बारे में रेणु ने बड़ी तारीफ की थी । "

।।

' अगर मैं तुम्हारे लिए कुछ कर सका तो अपने आपको खुशनसीब समझूगा । ' '

' ' मगर मुझे सरकारी अफसरों पर आसानी से भरोसा नहीं होता । "

' ' यह अच्छी बात है , हर समझदार आदमी को किसी भी अजनबी सरकारी आदमी पर एकदम भरोसा नहीं कर लेना चाहिए - यह हमारी कौमी कमजोरी है ... हमारे देश के सरकारी आदमी जनता के दिलों में अपने प्रति हित और विश्वास पैदा ही नहीं कर सके , अगरचे उनका मुख्य काम आम नागरिकों की रक्षा और भलाई करना है - लेकिन इसमें आम सरकारी

आदमियों का भी दोष नहीं ... उन्हें करप्ट नेताओं ने बिगाड़ दिया है ... या घूस देने वालों ने उनमें लालच भर दिया है । '

और फिर अचानक विजय का रिवाल्वर निकल आया - संजय उछलकर पीछे हट गया - शकीला भी बौखला गई और रेणु ने हड़बड़ाकर कहा- ' ' विजय ! यह क्या कर रहे हो ? "

विजय ने कोई उत्तर नहीं दिया - उसके बेआवाज रिवाल्वर ने एक शोला उगला और कुछ दूर पर एक चीख की आवाज सुनाई दी - उन लोगों ने हड़बड़ाकर देखा ... विजय उनसे कुछ कहे बगैर आगे बढ़ गया ।

पचास मीटर की दूरी पर काले लबादे वाला वह अजनबी अपनी जांघ दबाए झुका हुआ खड़ा था - हुलिए से वह मछेरा मालूम होता था । संजय , शकीला और रेणु भी पास आ गए थे ... वह हैरानी से अजनबी को देख रहे थे ।

विजय ने संजय से कहा- ' ' इसका गला घोंटकर मार डालो । '

अजनबी अचानक गिड़गिड़ाया- ' ' नहीं ... नहीं ... भगवान के लिए नहीं ! "

।।

विजय ने संजय और शकीला की तरफ इशारा करके कहा

' ' कब से पीछा कर रहे थे इन दोनों का ? ' '

' ' अ ... अ ... आपको गलतफहमी हुई है । ' '

अचानक विजय के उलटे हाथ का झापड़ अजनबी के गाल पर पड़ा और वह लड़खड़ाकर पीछे हट गया - उसका एक दांत खून के साथ गिर पड़ा था ... वह कराह उठा - विजय ने कड़े स्वर में कहा- " दूसरा घूसा नाक पर पड़ सकता | अगर नाक चिपटी हो गई तो परिवार वाले भी पहचानने से इंकार कर देंगे ।

' कौन हो तुम ? ' ' विजय ने फिर पूछा ।

' ' म ... म ... मैं । ' '

विजय ने संजय से कहा- ' ' गला घोंट डालो न ... मैं संभाल लूंगा । "

अजनबी हड़बड़ाकर बोला-- ' ' ब ... ब ... बताता हूं । ' ' उसने हथेली की उलटी तरफ से नाक का खून पोंछा और कराहता हुआ बड़ी मुश्किल से बोला

मैं क ... क ... क्राइम ब्रांच का सार्जेन्ट हूं । "

' म ... म ...

" व्हाट ? ' '

।'जी ... सार्जेन्ट चमनलाल । ' '

' ' आइडेंटिटी .. । '

अजनबी ने काले शलाके के अन्दर हाथ डाला और आई कार्ड निकालकर विजय की ओर बढ़ा दिया - विजय ने कार्ड देखा और बड़बड़ाया

सार्जेन्ट चमनलाल फ्रॉम क्रिमिनल इन्वेस्टीगेशन डिपार्टमेंट ' ' -फिर उसने सार्जेन्ट को घूरकर कहा ' ' यहां क्या कर रहे हो ? "

सार्जेन्ट चमनलाल ने संजय और शकीला की तरफ इशारा करके कहा- ' ' इनके पीछे यहां तक आया हूं - इन दोनों की निगरानी कर रहा था । "

' ' किसलिए ? '

ये दोनों मछेरों के रूप में एक किश्ती में मड के साहिल से कुछ फासले पर ... I ' "

विजय ने संजय और शकीला की तरफ देखा तो संजय ने कहा- ' ' हां , यह सच है । ' '

" क्या तुम दोनों ने इसकी निगरानी को नोट नहीं किया ? ' '

" बिल्कुल नहीं । "

.

" तुम्हें इनकी निगरानी पर किसने लगाया था ? ' ' ' ' मुझे इनकी निगरानी पर नहीं लगाया गया । "

' ' फिर ?

' ' वो ... सरकारी राज है । ' '

' मगर जो गोली तुम्हारी खात्मा कर सकती है वह सरकारी नहीं होगी । "

" नहीं ... नहीं ... मैं तो ऊपर वालों के आर्डर से

मजबूर हूं । "

" क्या ऊपर वालों को मछेरों की निगरानी के सिवा कोई काम नहीं है । ' '

' ' मैंने कहा न कि इनकी निगरानी का काम नहीं मेरा । "

' ' फिर ? "

' दरअसल , उधर मड के साहिल से दूर शाहीन नाम का जहाज लंगर डाले है कई दिनों से । ' '

विजय ने उसे घूरकर करा- " फिर ? ' '

" उस जहाज के मालिक की तरफ से शिकायत की गई है कि कुछ अज्ञात लुटेरे जहाज पर हमला करने की ताक में हैं - बस , शाहीन की सिक्योरिटी के लिए खास फोर्स तैयार की गई हसे -- उन्हीं में से एक मैं हूं । "

विजय ने हल्की सांस ली और बोला- ' ' खूब ! कितने लोग लगाए गए हैं ? "

" लगभग पचास । ' '

" क्या सब मछेरों के रूप में हैं ? ' '

' ' जी नहीं , कुछ मछेरों के रूप में है , कुछ छोटी मोटरबोटों के ड्राइवर के रूप में , कुछ साहिल पर थ्री - व्हीलर ड्राइवर्ज और कुछ टैक्सी ड्राइवरों का रूप धारण किए हैं । ' '

विजय ने संजय की तरफ इशारा करके कहा ' तुम इनके पीछे क्यों लग गए थे ? ' '

" जब से मेरी ड्यूटी लगी है , मैंने इनकी नाव मड के उसी इलाके में देखी है ... और ये लोग सूरतों से भी मछेरे नहीं मालूम हो रहे थे । मुझे सन्देह हुआ कि कहीं यह उन लुटेरों के लिए जासूसी कर रहे हो । '

' ' और तुम इनकी निगरानी करने लगे । "



' ' जी हां - आज ये लोग अपनी नाव पर से उतरे रे - चट्टान के पीछे आकर इन लोगों ने अपने हुलिए बदले - मेरा सन्देह विश्वास में बदल गया और मैं इनके पीछे लगकर इस तरफ चला आया । "

" चलो अच्छा हुआ । तुमने अपने फर्ज को पहचाना और पूरा किया - गलतफहमी दूर हो गई तुम्हारी तरफ से । ' '

" जी ... ! "

विजय ने अपना आई . कार्ड . निकालकर दिखाया " लो देखो । "

चमनलाल ने आई . कार्ड देखा और बड़बड़ाया " सुपरिन्टेंडेंट विजय सरदाना फ्रॉम सी . बी . आई . । ' '

दूसरे ही क्षण वह जांघ के घाव की परवाह किए बगैर चौंककर एकदम अटेंशन होकर सैल्यूट करके बोला - ' ' आई एम सॉरी सर ! ' '

" डोंट वरी ... सॉरी मुझे बोलना चाहिए .... जो कुछ तुम मेरे आदमियों को समझे वही मैं तुम्हें समझा ।

' ' ओहो ... तो आप भी ! ' '

' हां । ' ' विजय ने अपना आई कार्ड जेब मे रखकर कहा - ' ' अब यह भेद तुम पर खुल ही गया है तो ध्यान रखना ...

सिक्योरिटी के लिए सारे विंग्स काम कर रहे हैं - सी . आई . डी . भी सी . बी . आई . भी और हायर अथॉरिटीज ने एक - दूसरे को , एक - दूसरे से बेखबर रखा है । ' '

' ' जी सर ! ' '

" लेकिन यह राजदारी बनी रहनी चाहिए ... यह भेद सिर्फ तुम पर खुला है , अगर यह लीक आउट हुआ तो तुमसे डिपार्टमेंटल जवाब - तलबी हो सकती है ।

' ' मैं समझ गया सर । "

दूसरी बात , ये दोनों मेरे आदमी है - मेरे लिए काम कर रहे हैं ... इसलिए तुम इन दोनों से दूर ही रहोगे । "

' यस सर ! "

' जरूरत होने पर तुम इनकी मदद करोगे । ' '



" यस सर ! ' '

' ' जाओ ! अपनी पोजीशन पर रहो ... ये लोग कुछ देर बाद अपनी पोजीशन पर पहुंच जाएंगे । ' '

" यस सर ! '

।।

" और हां , गोली अंदर तो नहीं रह गई ? ' '

।।

" नो सर ! "

' बैंडेज कर लेना - मुझे अफसोस है , थोड़ी - सी गलत - फहमी से तुम्हें तकलीफ पहुंची । ' '

" नेवर माइण्ड सर ! "

फिर चमनलाल लड़खड़ाता हुआ चला गया । विजय के होठों पर एक वहशियाना मुस्कराहट नजर आई - संजय ने आश्चर्य से कहा

" यह हम दोनों की निगरानी कर रहा था । "

" खैरियत हो गई कि सिर्फ निगरानी ही कर रहा था

' मगर - समुद्री जहाज शाहीन की निगरानी क्यों हो रही है ? "

" उसकी रक्षा के लिए ... तुमने सुना नहीं था । ' ' ' ' इतने बड़े जहाज को लुटेरों से कैसा खतरा हो सकता है ? "

विजय फिर मुस्कराया और बोला- ' ' यह सिक्योरिटी इन लोगों को मेरे डर से दी गई है । ' '

" क्या मतलब ? ' '

' मतलब फिर विस्तार से फिर बताऊंगा - मगर यह अच्छा हुआ कि तुम लोगों का पीछा करता हुआ वह आ गया और मुझे हकीकत का पता चल गया , मगर मैं शायद अंधेरे ही में रहता और अपने उद्देश्य में सफल न होता । "

" कैसा उद्देश्य ? ' '

.

' ज्वाला प्रसाद जी के खून की साजिश में शामिल लोगों के हरों से नकाब उठाना और उनकी गर्दनों का नाप - तोल । तुम अपने पर लगे आरोप से मुक्त हो जाओगे । "

" आई एम सॉरी विजय , मैंने आपको गलत समझ लिया था । ' '

" डोंट वरी ... इस प्रकार की गलतफहमियां आदमी को चौकन्ना रखती हैं । ' '

.

' अब मैं सन्तुष्ट हूं ... मेरा दिल कहता है कि आप द्वारा मुझ पर लगा आरोप झूठा सिद्ध होगा और मैं आजादी से फिर सकूँगा । ' '

विजय सरदाना ने कहा- ' ' मैं उस वारदात के बारे में सबकुछ जानना चाहता हूं । "

' उस दिन ज्वाला प्रसाद जी के पर्सनल सैक्रेटरी ने फोन पर कहा था ,

किसी बहुत ही शानदार चीज की जरूरत है ... ज्वाला प्रसाद जी मानसिक रूप से बहुत परेशान हैं । कालीचरण की लिस्ट में सबसे खूबसूरत लड़कियों में शकीला भी एक है । '

-

' शकीला जहां कहीं भी भेजी जाती है तुम उसके साथ जाते हो । '

' ' जी हां । '

' ' शकीला का नाम किसने सजैस्ट किया था । ' '

संजय ने बताया , किसने उसका नाम सजैस्ट किया था और फिर बोला- ' ' जब मैं शकीला को लेकर निकला तो रास्ते ही में मुझे कालीचरण का टेलीफोन मिला । ' '

' ' कि तुम्हारी जगह किसी और को लेनी है ? ' '

' ' जी हां । "

" तुमने कारण नहीं पूछा ? "

" हम सबमें इतनी अण्डरस्टैंडिंग है कि हर ऐसी तब्दीली का कोई कारण जरूर होता है - मैंने भी यही सोचा कि मेरी जगह लेने वाला कालीचरण का कोई ज्यादा विश्वसनीय हो सकता है - हमें चूं - चरा की आजादी नहीं । "

" और उसने तुम्हारी जगह ले ली ? "

" हां , मैं निश्चित स्थान पर ठहर गया , जहां मुझसे इन्तजार करने के लिए कहा गया था । "

संजय ने शकीला की तरफ देखते हुए कहा- ' '

' ' इससे आगे यह बताएंगी । "

विजय ने प्रश्नसूचक नजरों से शकीला को देखा - और शकीला ने आगे की घटना विस्तार से दोहरा दी जिसे विजय बड़े ध्यान से सुनता रहा - शकीला के चुप होने के बाद उसने कहा

" तुमने इस बात पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की कि वह अजनबी ज्वाला प्रसाद का खून कर रहा है । ' '

' ' मैं समझ रही थी कि वह कालीचरण की कोई स्कीम है और उसकी स्कीम का ज्ञान संजय को भी होगा ... इसीलिए संजय ने अपनी जगह आसानी से दे दी थी । "

' शायद इसलिए कि संजय की जगह किसी ने ली थी , इस बात का कोई गवाह न रहे । ' '

' स्पष्ट है । ' '

विजय ने फिर संजय से पूछा- " फिर क्या हुआ ? ' '

' ' मैंने कालीचरण को मोबाइल पर बताया तो कालीचरण ने इस बात से साफ इंकार कर दिया कि उसने किसी को मेरी जगह लेने का आदेश दिया था

। ' '

" तुमने कालीचरण की आवाज पहचान ली थी । ' ' " बिल्कुल । "

" तुम्हे संदेह था कि वह हरकत कालीचरण की ही है ? ' '

" जी ... शत - प्रतिशत । "

" फिर तुम वापस नहीं गए ? I ' ' ' ' नहीं - मैं शकीला को साथ लेकर भगोड़ा हो गया ... जो वैन हमारे पास थी उसे वहीं सड़क पर छोड़ दिया और वेश बदलकर ओझल हो गए । '

' ' वह वैन शायद पुलिस को पड़ी मिली और कालीचरण तक पहुंच गई । ' '

' ' जी , मुझे नहीं पता । "

।।

" क्या तुमने बाद में कालीचरण से सम्पर्क नहीं किया ? ' '

' ' नहीं । "

" इसलिए कि उससे तुम्हारा भरोसा उठ गया था ? ' '

' ' जी हां ।

" तभी से तुम दोनों उस नाव में मछेरे बनकर रह रहे हो ?

' ' जी । "

' ' रेणु के सिवा तुमने किसी और से भी टेलीफोन से काटेक्ट नहीं किया ? "

" जी नहीं । '

।।

' ' मुझे उस अजनबी का हुलिया एक बार फिर बताओ । "

संजय और शकीला ने बारी - बारी उस अजनबी का हुलिया विस्तार से बताया जो ज्वाला प्रसाद का कातिल था । विजय ने ध्यान से सुना और बोला

" तुमने उसमें कोई ऐसी अनोखी असाधारण बात या हरकत नोट नहीं की जो आम आदमी में नहीं होती

शकीला ने कहा - ' ' मेरे साथ वह ज्यादा रहा है इसलिए मैंने महसूस किया है । ' '



।'बताओ । "



" उसकी नाक असाधारण थी जैसे उसके चेहरे से असली नाक अलग करके कोई नकली नाक लगा दी गई हो । ' '

' ' हूं ... और मूंछे ? "



" वह तो सेंट - परसेंट नकली लगती थीं । ' '
 
विजय ने दोनों को सम्बोधित करके कहा- ' ' क्या विचार है ? उसके चेहरे पर किसी दूसरे का मास्क नहीं हो सकता था - उस समय ? "

' शायद हो । '

" ओह ! लगता है वह उसका असली चेहरा नहीं

था ।

' शायद । ' '

विजय ने संजय से कहा - ' " एक बात और बताओ ... क्या चलते समय उसका दायां हाथ बाएं हाथ के मुकाबले में कुछ कम हरकत करता था । "

संजय अनायास चौंक पड़ा और बोला- ' ' हां , यह बात तो मैंने देखी है , मगर इसे कोई महत्व नहीं दिया - आपके एहसास दिलाने के बाद अब लग रहा है कि यह सच है- उसका एक हाथ ज्यादा हिलता था ,

दूसरा कम । "

" और कम हिलने वाला दायां हाथ था । ' '

" बिल्कुल । "

विजय के होंठ भिंच गए - रेणू ने उसे ध्यान से देखा और बोली

" कहीं आप जाबर के बारे में तो नहीं सोच रहे हैं

| "

विजय ने चौककर उसे देखा और बोला- " तुम्हारा क्या ख्याल है जाबर की चाल - ढाल और उसके हुलिए पर तुमने ध्यान दिया था ... उसकी नाक ... एक हाथ का कम हिलना । ' '

रेणु ने कहा- " नाक में तो मुझे कोई खास बात मुझे नहीं लगी , हां - एक हाथ के कम हिलने के बारे में कुछ - कुछ याद है । "

" वह इसलिए कि उसके चेहरे पर नकली मास्क लगा हुआ था ... स्पष्ट है कि नकली नाक उसकी असली नाक से ज्यादा बड़ी होगी - तभी असली नाक पर वह फिट हो सकी होगी । ' '

" ओ गॉड ! तो वह जाबर ही था - ज्वाला प्रसाद का असली कातिल । '

।।

' अब तो यही सन्देह होता है । ' '

" वही सरोज को मारने के लिए डॉक्टर बनकर आया था । ' '

" हां ! "

संजय और शकीला चौंक पड़े । संजय ने कहा " सरोज को मारने ? ' '

विजय ने कहा- ' ' हां ! सरोज ... उसे तो तुम जानते ही होगे ? "

' ' जी - उस जमाने से जब वह हीरोइन नहीं बनी थी

| "

' ' मैं भी उसे जानता हूं - उस दिन मुझे कालीचरण के यहां काम करने वाले विशनु नाम के एक आदमी की तलाश थी जिसके बारे में इतना ही मालूम हो सका था कि वह सेंट सीरियल रोड पर आर्च - वे नाम की बिल्डिंग में रहता है । "

' फिर ? "

' ' मैं और रेणु उसकी तलाश में थे - अचानक सेंट सीरियल रोड पर सरोज मिल गई थी - उससे विशनु का पता मिला था ...

..विशनु तब तक जान दे चुका था ... उसने या तो तीसरे माले से कूदकर आत्महत्या कर ली थी या उसे किसी ने मारकर फेंक दिया था । ' '

।।

" ओह ! ' '

' वह सरोज से हमारी आखिरी मुलाकात थी - फिर तुमने सरोज के बारे में रेणु को फोन किया था । ' '

' ' हां । "

' ' क्या हुआ था ? ' '

' ' हम लोग किश्ती पर थे - उस समय हम सोच भी नहीं सकते थे कि शाहीन किसी प्रकार की बड़ी साजिश का अड्डा है । हमारे सामने एक मोटरबोट उधर से गुजरी थी - पहले हम लोग डर गए थे - मगर वह मोटरबोट गुजर गई तो हमें सन्तोष हुआ ... वह मोटरबोट शाहीन की तरफ गई थी । ' '

" फिर ? "

" फिर वही मोटरबोट शाहीन से बड़ी अफरा - तफरी में लौट पड़ी ... एक सफेद मोटरबोट उसका पीछा कर रही थी ... वह काली मोटरबोट जब हमारी किश्ती के पास से गुजरी तो उससे कोई कूदा और बोट आगे बढ़ती गई - सफ़ेद बोट उसका पीछा करती रही - काली बोट से उतरने वाली सरोज थी जिसे हमने ऊपर चढ़ा लिया । "

" फिर ? "

" फिर सफेद बोट ने काली बोट को डूबो दिया ... सरोज समझी कि सफेद बोट वालों ने उसे भी मुर्दा समझ लिया है और वह हमारी मदद से किनारे पर पहुंच गई जहां उसकी कार खड़ी थी ... उस कार में पहले ही से उसका दुश्मन बैठा था जिसने अचानक कार स्टार्ट करके सरोज पर चढ़ा दी - हमारे चिल्लाने पर सरोज बची , मगर उसकी दोनों टांगे कुचल गई । "

" फिर ? "

' ' वह बेहोश हो गई थी ... कार में सवार आदमी उसे कुचलकर मार देना चाहता था , मगर मैंने कार का शीशा तोड़ दिया ... इसके बाद वह शकीला के जोर से फेंके गंडासे से मारा गया । "

" फिर तुमने रेणु को फोन किया ? "

" जी हां ... रेणु ने आपको सहायता के लिए बुला लिया ... हम खुद तो सरोज को अस्पताल नहीं ले जा सकते थे । "

' ' सरोज ने तुम्हें क्या बताया था ? ' '

.

" कुछ भी नहीं - मैं पूछ भी नहीं पाया - वैसे उसे अपने पर्सनल सेक्रेटरी शाहिद की मौत का बहुत गम था । "

" सरोज रेणु को पहचानती थी ? "

' हां - उसने बताया था कि वह कल ही मेरी बहन से मिल चुकी है - सेंट सीरियल रोड पर । ' '

' हूं । ' '

' अब सरोज कहां है ? ' '

' स्वर्गलोक में । ' '

शकीला और संजय उछल पड़े- ' ' क्या मतलब ? ' '

संजय ने पूछा ।

" उसे पहले एक नकली डॉक्टर ने जहर का इंजेक्शन देकर मारने की कोशिश की थी जिसे मैंने ट्रैप कर लिया था । ' ' विजय ने विस्तार से बताकर कहा ' वापसी पर रेणु बेहोश मिली और सरोज को कुछ लोग उठाकर ले गए थे । "

.

" ओह ! ' '

" फिर सरोज की लाश मेरे बैडरूम में पहुंच गई । ' '



" नहीं .... ! ' ' ' ' मैंने उसकी लाश को कमिश्नर के बैडरूम में पहुंचा दिया ... अब तो उसका दाह - संस्कार भी हो चुका होगा । "



" माई गॉड ! इतनी खूरबसूरत औरत जो अभी - अभी नई हीरोइन बनी थी - हंसमुख भी बहुत थी ... जरूर टॉप की हीरोइन बनती ... और उसका अंत इतना दुःख भरा । मगर उसका जाबर के जहाज से क्या सम्बन्ध था ? ' '

" यह तो वही जानती होगी या जाबर । "

' ' अब क्या करना है ? ' '

विजय सरदाना कुछ देर तक सोचता रहा , फिर हल्की सांस लेकर बोला

' ' मेरा ख्याल है , अब संजय और शकीला का किश्ती पर रहना उचित नहीं । ' '

रेणु ने कहा- ' मैं भी यही सोच रही हूं । ' '

विजय ने संजय से कहा- ' ' तुम्हारी कोई ऐसी चीज किश्ती पर तो नहीं है जो तुम्हारी और शकीला की निशानदेही करने की सबब बन सके । ' '

' ' नहीं - सिर्फ चंद बर्तन है , छोटा गैस सिलेंडर और स्टोव इत्यादि - और कुछ मछेरों के कपड़े व जाल । ' '

" वह किश्ती और मछलियां पकड़ने का सामान तुमने कहां से लिया था ? ' '

" वहीं बरसोवा की बस्ती में मिल जाता है - खरीदा भी जा सकता है और किराए पर भी मिल जाता है । "

' और यह तुम्हारे पहने हुए कपड़े ? ' '

' बस एक - एक जोड़ा ही था जो चट्टानों के पीछे छुपा रखा था । अब वहां चट्टानों के पीछे मछेरों वाले कपड़े हैं । "

' ' हूं - और तुम्हारा मोबाइल ? ' '

' मेरे पास है । ' '

' ' चलो ... अब तुम एक दूसरे सुरक्षित स्थान पर रहोगे । "

वे लोग विजय के साथ उसकी टू - सीटर गाड़ी के पास आ गए ... अंदर बैठकर विजय ने एक बटन दबाया और वह गाड़ी दो - सीटर से फोर - सीटर बन गई - उन लोगों ने आश्चर्य से देखा और अंदर बैठ गए - संजय ने कहा- ' ' आपकी टू - सीटर गाड़ी तो कमाल की है ।



" अभी तुमने इसके पूरे कमाल देखे ही कहां हैं । "

" वैसे हमें कब तक छुपा रहना पड़ेगा ? ' '

" जब तक तुम कत्ल के आरोप से मुक्त नहीं हो

जाते । "

फिर मौन छा गया । थोड़ी देर बाद संजय और विजय के अभी बोले डायलॉग गूंजे - और संजय , शकीला और रेणु तीनों बुरी तरह उछल पड़े ... संजय ने हैरानी से पूछा- ' ' इसका क्या मतलब हुआ ? ' '

विजय ने कहा- ' ' यह कार का दूसरा कमाल है - अपने साथ बैठे किसी की भी बातें मैं टेप कर सकता हूं - और यह आवाज तब तक टेप रहेगी जब तक मैं खुद इसे स्क्रेप न कर दूं । ' '

कार बिल्कुल बे - आवाज सड़क पर दौंडे जा रही थी ।

कार एक ग्राउंड फ्लोर के कॉटेज के सामने रुक गई - यह कॉटेज का छोटा - सा कम्पाउंड था - वे चारों कार से उतर आए -दरवाजे बंद कर दिए गए और विजय ने उन्हें बताया कि- ' ' इस कार के दरवाजे किसी बड़े - से - बड़े चोर से नहीं खुल सकते , न तुम लोग ही इन्हें चाबी से खोल सकते हो ... और मैं जब चाहूं चुटकी बजाकर खोल सकता हूं । ' '

" खूब " मैकेनिज्म हैं । "

फिर विजय ने कॉटेज का दरवाजा खोला ... वे लोग अंदर दाखिल हो गए और दरवाजा बंद हो गया । कॉटेज का ड्राइंगरूम छोटा था , मगर सुन्दर ढंग से सजा हुआ था ... सामने ही बैडरूम का दरवाजा था - एक ओर बार - काउंटर बना हुआ था ।

' ' उधर किचन है । ' ' विजय ने इशारे से बताया ।

' ' तो हम लोग यहां रहेंगे । ' '

' ' नहीं - अंदर आओ । "

वे चारों बैडरूम में आ गए - बैडरूम में एक जगह दीवार से लगा हुआ एक बड़ा - सा वार्डरोब खड़ा था । विजय ने वार्डरोब का दरवाजा खोला उसमें लाइन से कपड़े लटके हुए थे ।

विजय ने पता नहीं कौन - सा बटन दबाया कि वार्डरोब का अंदर का पूरा भाग खटाक से नीचे गायब हो गया और वे तीनों उछल पड़े । विजय ने उन लोगों को बताया

" यह अंडरग्राउंड घर की सीढ़ी हैं - पीछे से बाहर जाने का गुप्त रास्ता भी है , आओ । '

वे लोग सीढ़ियां उतरे तो सामने की तरफ खुला आसमान नजर आ रहा था ... ताजी हवा आ रही थी । सीढ़ियों से नीचे उतरने के बाद बह लोग जिस जगह पहुंचे वह बिल्कुल ऊपर वाले बैडरूम की नकल थी ... ऊपर का दरवाजा अपने आप ही बंद भी हो गया था ... पता नहीं कैसे ?

विजय ने बताया- " जैसा कॉटेज ऊपर है उसी डिजाइन का रहने का स्थान नीचे भी है । अब जब हम लोग यहां पहुंच गए हैं - तो ऊपर वाले कॉटेज की रोशनियां अपने आप बुझ जाएंगी - देखने वाला यही समझेगा कि कॉटेज खाली पड़ा है । "



" खूब ! "

" ऊपर या पिछवाड़े बाहर जाने का दरवाजा किसी बटन से नहीं खुलता ... बस , दूसरी सीढ़ी पर कदम रखोगे तो खुद खुल जाएगा और ऊपर से आते हुए तीसरी सीढ़ी पर कदम रखते ही बंद हो जाएगा । ' '

' ' कमाल का मैकेनिज्म है । "

' ' मेरे एक फौजी इंजीनियर की मेहरबानी है - जब भी मुझे अंडरग्राउंड होना पड़ता है तो मैं यहीं आराम करता हूं और यहां से मैं अपने आल्म ऑफिसरों पर भी नजर रख सकता हूं । "

' ' वह किस तरह ? "

' ' यह देखो । "

विजय ने टी . वी . की तरफ इशारा किया । रिमोट उठाकर एक बटन दबाया और टी . वी . पर क्लोज सर्किट टी . वी . के समान एक दृश्य उभर आया । उसमें विजय ने आई . जी . को देखा जो किसी से फोन पर बात कर रहा था और उसका मूड बहुत खराब था । उसकी आवाज गूंज रही थी

" सरोज एक मामूली फिल्म एक्ट्रेस है - उसे ढूंढना सी . बी . आई . का काम नहीं है ... यह सी . आई . डी . का काम है । "

फिर उसने कॉल की आवाज सुनी और बोला ' कब देखी गई थी ? "

जवाब सुनने के बाद बोला- " परसों रात सेंट सीरियल रोड पर अगर वह सुपर विजय सरदाना के साथ देखी गई थी तो इसका यह मतलब नहीं कि विजय सरदाना ही ने उसे गायब किया है - या वह गुम है तो उसको ढूंढने की जिम्मेदारी सी . बी . आई . पर हो , क्योंकि विजय सरदाना सी . बी . आई . ऑफिसर है । ' '

फिर उसने कुछ सुना और बुरा - सा मुंह बनाकर बोला - ' ' सरोज अगर इतने बड़े और जिम्मेदार

ऑफिसर की चहेती बनी है तो हम क्या कर सकते हैं - इतनी बड़ी हस्ती को खुद अपनी जिम्मेदारी का एहसास होना चाहिए - कहां वह और कहां सरोज । ' '

फिर कुछ सुनने के बाद आई . जी . ने रिसीवर रख दिया , लेकिन उसका मूड बहुत खराब था ।

विजय ने गहरी सांस ली और उन लोगों से बोला

" सुना तुम लोगों ने ? सरोज की कितनी तलाश हो रही है - इसलिए कि सरोज की लाश को मुझे फांसने का चारा बनाने में वे असफल होकर झल्ला रहे हैं । "

" तो क्या उन्हें पता नहीं होगा कि सरोज मर चुकी

" उन्हें सब पूरी तरह पता होगा । ' '

' ' फिर यह बावेला क्यों ? ' '

" उन्हें यह नहीं पता कि उस बेचारी की लाश को किसी लावारिस की एक्सीडेंट में मरने वाली की लाश घोषित करके जला दिया गया है ... वे तो सोच रहे हैं कि लाश मिल जाए तो उसका खून मेरे सिर मंढ़ दिया जाए , क्योंकि परसों वह रेणु और मेरे साथ सेंट सीरियल रोड पर देखी गई थी - और परसों वह जाने किन - किन लोगों के साथ देखी गई होगी । "

फिर विजय ने बटन दबाकर दृश्य बदल दिया ... अब पुलिस कमिश्नर का बंगला नजर आ रहा था जो किसी से फोन पर कह रहा था

" सिविल पुलिस और क्राइम ब्रांच ने सारा शहर छान मारा है , मगर अभी तक संजय का कोई पता नहीं

चला । ' '
 
' ' नहीं ... शकीला के बारे में कोई पक्की सूचना नहीं - अगर उसे संजय ने मार भी डाला है तो उसकी लाश कहीं से नहीं मिली । ' '

' ' अब हम लोग जादूगर तो हैं नहीं कि आंखें बंद करके संजय का पता लगा लें ... वैसे भी ज्वाला प्रसाद मर्डर केस अब हमारे पास नहीं सी . बी . आई . के पास चला गया है । "

फिर कुछ सुनने के बाद कमिश्नर की झुंझलाई हुई - सी आवाज आई- ' ' कालीचरण के विरुद्ध क्या प्रमाण है ? कैसे गिरफ्तार कर लिया जाए उसे ? वारदात वाली रात वह दिल्ली में था और एक दिन पहले गया था । "

' अब मैं होम सैक्रेटरी का आदेश कैसे टाल सकता हूं - मैं सिविल पुलिस द्वारा भी कोशिश कर रहा हूं ...

... हर नाके पर सादा लिबास वाले लगे हैं । ' '



" ओ . के . सर ! ' ' फिर उसने पटकने के ढंग से रिसीवर रख दिया और मुंह ही मुंह कुछ बड़बड़ाने लगा । विजय ने बटन ऑफ करके कहा

" यह होती है सरकारी अफसरों की हालत । ये नेता लोग उन्हें कठपुतलियां बनाकर रखते हैं ... पूरी ट्रेनिंग लेकर आए हुए ऑफिसर इन लोगों के विरुद्ध कलम से अनफिट लिखकर जहां और जब चाहें गिरा सकते हैं । "

फिर उसने रिमोट रख दिया और रेणु से बोला " तुम तो आज रात यहां रह सकती हो ? "

" मैं आपको बता चुकी हूं ... मम्मी आउट ऑफ स्टेशन हैं ... बाकी बहनें ... मेरे और भैया के लिए कुछ भी कर सकती हैं । ' '

" अच्छा ठीक है ... अभी डिनर नहीं लिया गया ... तुम और शकीला मिलकर इन्तजाम करो - यहां किचन में सब कुछ मौजूद है - मैं संजय को लेकर जा

रहा हूं । "

रेणु ने घबराकर पूछा- ' ' क्यों ? ' ' ' ' घबराओ मत ... हम लोग एक - डेढ़ घंटे में लौट आएंगे - संजय की रक्षा की जिम्मेदारी मुझपर है । "

" जी - मुझे आप पर पूरा विश्वास है । ' ' फिर संजय को लेकर विजय बाथरूम में आ गया । कुछ देर बाद जब दोनों बाहर निकले तो दोनों सरदारों के गैटअप में थे ... खुद शकीला और रेणु उन्हें देखकर उछल पड़ी थीं ।

दोनों बाहरी दरवाजे से ऊपर आकर पिछवाड़े की तरफ निकले - विजय ने कॉटेज के बाहर अंदर जाने वाले दरवाजे पर ताला डाल दिया - अब वहां ऐसा सन्नाटा था जैसे कॉटेज खाली पड़ा हो ।

कुछ देर बाद उनकी कार सड़क पर दौड़ रही थी ।

8

" बस , बस - यही जगह थी । "

संजय के कहने पर विजय ने कार गली में मोड़कर रोक ली । संजय ने मुड़कर इशारे से बताया- ' ' वैन वहां रोकी गई थी - मुझे इस गली में अंदर जाना पड़ा था



| "

।।

" आओ । ' '

वे दोनों कार से उतर आए - संजय के साथ विजय आगे बढ़ता रहा - एक जगह रुककर संजय ने कहा - ' ' वह मुझे ठीक इस जगह मिला था । ' ' फिर उसने सामने इशारा करके कहा- " मैंने उसकी कार में बैठकर उसका इन्तजार किया था । ' '

" फिर ? "

" वह बताए हुए समय में लौट आया , तब तक मैं यहां आकर खड़ा हो चुका था । उसने बताया कि वैन की चाबी उसी में लगी है और शकीला वैन में मेरा इन्तजार कर रही है । ' '

" तुम्हें विश्वास है कि ठीक इसी जगह छोड़ा था तुमने उसे ? ' '

" हां ... मगर अब यहां क्या मिलेगा ? "

" कभी - कभी अनहोनी भी हो जाती है - यूं भी हम जादूगर नहीं हैं - हम संभावनाओं पर काम करते हैं । विजय ने जेब से एक पतली - सी लकीर टॉर्च निकाली ... वह इधर - उधर रोशनी डालकर धीरे - धीरे चल रहा था । संजय ने जिस जगह की निशानदेही की थी । उस समय रुककर किसी का इन्तजार तो किया जा सकता था - मगर वह आम चालू रास्ते पर नहीं था ।

विजय ने कहा- " यहां कोई खोमचेवाला भी खड़ा होना पसंद नहीं करता होगा , क्योंकि सड़क के साथ ही नाला है । "

' ऑफकोर्स । '

एक जगह विजय ने झुककर कहा- ' ' यह देखो , तुम्हारे ही जूते का निशान है ना ! ' '



संजय धीरे से झुक गया और आश्चर्य से बोला " हां - मेरे ही जूते का निशान है । "

" और यह दूसरा निशान ? "

' ' यह जरूर उसके जूते का होगा । "

' ' संयोग की बात है , इस जगह न आम आना - जाना है , न रोज सफाई होती है । ' '

फिर विजय ने एक छोटा - सा कैमरा निकाला और कुछ पीछे हटकर दोनों निशानों को इस तरह फोकस में लिया कि थोड़ी - सी आस - पास की बैक ग्राउंड की भी फोटोग्राफी हो गई । दो - तीन फोटो उतारने के बाद उसने कहा- ' ' यह इस बात का प्रमाण है कि वह तुमसे यहां मिला था । "

" फिर उसने जेब से फीता निकाला और दोनों निशानों को नापकर बोला- ' ' यह निशान नौ नम्बर के

जूते का है और दूसरा आठ नम्बर के शूज का । बिल्कुल ऐसा ही नौ नम्बर का निशान ज्वाला प्रसाद के बैडरूम के बाथरूम में पाया गया है । "

फिर वे लोग आगे बढ़ते रहे ... विजय टॉर्च की पतली लकीर वाली रोशनी से नाले के आस - पास का निरीक्षण करता रहा ।

अचानक एक जगह ठिठककर वह नाले के पास उकडूं बैठ गया । संजय ने झुककर पूछा- " क्या है ? "

विजय ने कहा- “ यह नाले मे देखो ... यह झिल्ली - सी । "

" क्या चीज है ? ' '

' ' किसी डंडी से उठाओ ... इसे निकालकर देखें तो

। "

संजय ने इधर - उधर ढूंढकर डंडी उठाकर दी - विजय ने डंडी से वह झिल्ली निकाल ली ... और संजय उछल

पड़ा ।

" यह तो किसी का फेस मास्क है । ' '

विजय ने कहा- ' ' और इस पर मूंछे भी हैं । ' '

" ओह - ओह ! ' ' संजय ने बेचैनी से कहा - ' ' हां , यही उस आदमी का फेस मास्क है - मैं अब अच्छी तरह पहचान गया हूं । ' '

' अब तुम्हारी समझ में आया कि अनुमान और सम्भावनाएं जासूसी के लिए कितनी जरूरी हैं - इनकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए । "

" आप ठीक कहते हैं । "

विजय ने वह फेस मास्क एक कागज में रख लिया और बोला- ' ' आगे बढ़ो । ' '

वे लोग आगे बढ़े - फिर एक जगह रोशनी की लकीर पतली झिल्ली के ऐसे दस्तानों पर जाकर रुक गई जो पहन लिए जाएं तो नजर न आएं , क्योंकि वह हाथों ही के रंगत के थे ।

संजय ने आश्चर्य से कहा- ' ओहो ... यह तो ग्लब्स

विजय ने कहा- " स्किन कलर के ग्लब्स हैं । इन ग्लब्स पर तुम्हारे ही हाथों के निशान होंगे और ज्वाला प्रसाद की लाश पर भी तुम्हारे हाथों के निशान पाए

गए हैं । "

' ' न ... न ... नहीं ! ' '

" अगर यह दस्ताने न मिलते तो तुम्हारी निर्दोषता सिद्ध करने में काफी अड़चनें पड़ सकती थीं । ' '

" ओह विजय ... विजय तुम ... I ' '

" आओ चलें । ' ' विजय ने दस्ताने जेब में रखते हुए कहा- " कॉटेज में चलकर इन्हें चैक करेंगे कि मेरा अनुमान ठीक सिद्ध होता है या नहीं । "

फिर वे दोनों कार में सवार हो गए । अभी विजय ने दरवाजा बंद किया ही था कि गश्ती पुलिस की एक गाड़ी ने उनका रास्ता रोक लिया - उसमें से एक सब - इंस्पेक्टर कूदकर उतरा ।

खिड़की के पास आकर उसने शीशे पर डंडे से बजाते हुए रौब से कहा- " दरवाजा खोलो । "

विजय ने दरवाजा खोलकर कहा - ' ' की गल ऐ बादशाओ । "

" गाडी की तलाशी लेनी है । ' '

" ओ बादशाहो ... साडे कोल कोई बम शम नहीं ए

" तुम लोग नीचे उतरते हो या नहीं ? ' '

विजय ने संजय से कहा- " उतर आ पुत्तर ! ऐ मुंडे मनन वाले नहीं । "

संजय भी उतर आया तो विजय ने कहा " लोजी ... तलाशी लैलो । '

एस . आई . ने अंदर झांककर देखा - इधर - उधर ताक - झांक करता रहा - फिर विजय से बोला- " तुम लोग भी तलाशी दो । "

' ' ओह ... किस खुशी बिच ? "

" शटअप ... तलाशी तो देनी ही पड़ेगी । "

इस बार विजय ने आंखें निकालकर कहा- “ ओ काका तू जानदा नहीं अस्सी कौन हैं । ' '

' होंगे कोई तोप - तलाशी तो देनी ही पड़ेगी । ' '

।।

' अस्सी प्रताप सिंह भोगल दे साले हैं । ' '

" प्रताप सिंह भोगल ! "

' ' होर की हरयाना दे सी . एम . नूं नहीं जान दे । "

" ओहो ...

... सॉरी ... वैरी सॉरी । "

" दैट इज आल राइट । ' ' फिर विजय ने संजय से कहा- " बैठ मुंडे । "

वह दोनों गाड़ी में बैठ गए ... और गाड़ी चल पड़ी - पैट्रोल कार सामने से हट गई । विजय ने कहा- " देखा तुमने ? यह हालत है हमारे सरकारी डिपार्टमेंट की ... प्रताप सिंह भोगल ... हरयाने का चीफ मिनिस्टर । ' '

संजय मुस्कराकर रह गया - विजय ने कहा इसी तो हमारा देश इतनी उन्नति कर रहा है । ' '

' ' यह फेस मास्क , यह घटनाएं ... ? ' '



" तुम्हारे निर्दोष होने का खुला हुआ परवाना है मेरे पास ... जबसे रेणु द्वारा तुम पर बीती बातों की जानकारी मिली , मैं इस जगह का निरीक्षण करना चाहता था । "
 
कुछ देर बाद कार कॉटेज पहुंचकर रुक गई ... विजय और संजय अभी तक सरदारों के गैटअप में थे - दोनों उसी गैट अप में पिछवाड़े के रास्ते से अंडरग्राउंड रिहायशगाह में पहुंच गए जहां रेणु और शकीला खाना तैयार कर चुकी थीं । ' '

जब शकीला ने फेस मास्क देखा तो वह उछल पड़ी

' ' ओ ... बाई गॉड - यह तो बिल्कुल वही मास्क है - उसके चेहरे पर यही था ... मैं बहुत समय तक उसके साथ थी । "

फिर जब विजय ने दस्ताना पहनकर एक गिलास पकड़ा और उस पर आ जाने वाले निशान देखे तो वह शत - प्रतिशत संजय के हाथ के निशान थे ... वे लोग सन्नाटे में रह गए - संजय भी सन्नाटे में रह गया और बोला- ' ' ओ ... यह तो मेरे ही हाथों के निशान हैं , कैसे आ गए ? ' '

शकीला ने कहा- " यानी संजय के गले में बाकायदा फांसी का फंदा तैयार कर लिया गया था । "

विजय ने कहा- " बेशक - अगर तुम मर गई होती तो तुम्हारी गर्दन पर भी संजय के ही हाथों के निशान होते

" माई गॉड ! ' '

' लेकिन इतने काम एक दिन में नहीं हो सकते - जरूर कालीचरपा के यहां कोई ऐसा आदमी मौजूद था जो यह सब करता रहा था । "

संजय ने कहा- " विशनु के बारे में तुम्हारा क्या विचार है ? "

" विशनु ही हो सकता है , लेकिन उसने अपने बयान में ऐसा कुछ बताया नहीं था । ' '

' शायद जान - बूझकर । ' '

" नहीं , उस समय जो कुछ वह बता रहा था बिल्कुल सच बोल रहा था । "

" कालीचरण खुद भी हो सकता है । "

" शायद ! ' '

फिर वे लोग डिनर से पहले पैग लेने लगे ।

9

विजय सरदाना ने अपनी गाड़ी रॉकी सिनेमा हॉल के पार्किंग में छोड़ी और एक थ्री - व्हीलर में सवार होकर कालीचरण के ऑफिस में पहुंचा ... थ्री - व्हीलर का किराया चुकाकर वह गेट पर पहुंचा । गेट पर सशस्त्र पहरेदार ने उसे रोका - ऊपर से नीचे तक देखा और सन्देह भरे स्वर में बोला

" किससे मिलना है ? ' '

विजय इस समय एक स्मार्ट नौजवान नजर आ रहा था । उसने दांत निकालकर जवाब दिया - ' ' किसी से भी , मिला दो । '

" क्या मतलब ? ' '

विजय ने सौ रुपए का एक नोट निकालकर पहरेदार की जेब में ठूस दिया - पहरेदार के जबड़ों का तनाव कुछ कम हो गया और उसने थोड़े नम्र स्वर में कहा- ' ' पहले काम बताओ । "

' ' वो ... मेरी एक गर्ल फ्रेंड है । ' '

' ' कहां है ? ' '

' ' होटल में - उसकी फोटोज दिखानी हैं । ' '

" किसलिए ? "

" सुना है कालीचरण जी की कम्पनी में काम करने वालियों को मॉडलिंग के साथ ही फिल्मों में भी चांस मिल जाता है । "

" खाली सौ रुपयों में किसी को चांस नहीं मिलता । "

" लौटकर आने दो - हां हो गई तो जेब भर दूंगा । ' '

' नाम क्या है ? '

।।

" छनन मिर्जा..मुगल खानदान का हूं ... हम मुगलों के नाम ऐसे ही होते हैं । "

' ठहरो । ' ' पहरेदार ने फोन पर किसी से सम्पर्क किया , फिर कोठरी से निकलकर बोला- " अंदर जाओ ... दरबान को अपना नाम बता देना । ' '

" बहुत धन्यवाद । ' '

उसने फाटक की निचली खिड़की खोल दी । विजय ने महसूस किया कि अब यहां पहले से ज्यादा निगरानी कड़ी हो गई है ... अंदर भी ऑफिस की बिल्डिंग के सामने एक सशस्त्र पहरेदार और एक दरबान खड़े थे ।

विजय ने अपना वही नाम बताया जो उसने पहले गेट पर पहरेदार को बताया था । दरबान ने कहा - ' ' आ जाओ । "

विजय दरबान के साथ चल पड़ा - उसका ढंग बड़ा आम आदमी का था ... स्टाफ के लोगों ने उसकी ओर ध्यान भी नहीं दिया ।

दरबान ने उसे एक केबिन पर रोक दिया- ' ' यहीं ठहरो ! ' ' फिर अंदर चला गया - कुछ देर बाद वापस आकर बोला- ' ' जा सकते हो अंदर । ' '

विजय दांत निकालता हुआ अंदर दाखिल हो गया और दरवाजा बंद हो गया ... वागले फोन पर किसी से कह रहा था

' ' कालीचरण साहब बहुत बिजी हैं ... किसी से नहीं मिल सकते । ' '

कुछ सुनने पर उसने फिर कहा- ' ' नहीं , कोई बुकिंग नहीं हो रही आजकल । "

" लाख कोई पूंजीपति हो या मिनिस्टर ... बुकिंग बिल्कुल बंद है । ' ' फिर उसने बुरा - सा मुंह बनाया और रिसीवर पटक दिया ... फिर विजय से बोला- " बैठो । ' '

विजय बैठ गया - अब उसका चेहरा बदला हुआ था । वागले ने कहा

" फोटो लाए हो ? "

" जी हां । '

" लाओ ... दिखाओ ।

विजय ने जेब से अपना कार्ड निकालकर उसकी तरफ बढ़ा दिया तो वागले ने कार्ड लेते हुए पूछा- ' ' यह क्या है ? "

' ' देख लीजिए । ' '

वागले ने कार्ड देखा और बड़बड़ाया- ' सुपरिन्टेंडेंट विजय सरदाना फ्रॉम सी . बी . आई .। ' ' दूसरे ही क्षण उसका मुंह फटा रह गया - हाथों में हल्की - सी कम्पन नजर आई । विजय ने उसके हाथ से कार्ड लिया तो वह जल्दी से खड़ा होता हुआ कंपकंपाती आवाज में बोला

' ' अ ... अ ... आप ... ! ' '

" बैठ जाइए । "

वागले बैठ गया और बोला - ' " आपको इस तरह आने की क्या जरूरत थी ? ' '

' ' मैं किस तरह आया हूं , आपको इससे कोई गरज नहीं होनी चाहिए ... और आपके स्टाफ को यही नहीं मालूम होना चाहिए कि आपसे कोई सी . बी . आई . ऑफिसर मिलने आया है । ' '

' ' यस ... यस सर ! ' '

" मैं मिस्टर कालीचरण से मिलना चाहता हूं । ' '

' ' वह आधे घंटे में मिल जाएंगे । ' '

" आई डोंट माइण्ड - मैं इन्तजार कर लूंगा । ' '

" आपके लिए क्या मंगवाऊं ? ' '

" कुछ नहीं । "

" क्या ज्वाला प्रसाद मर्डर केस सी . बी . आई . में चला गया है ? ' '

' ' हां । '

" हम लोग कमिश्नर साहब को तो बयान दे चुके है

" कमिश्नर साहब की पूछ - गछ अलग होती है - हम लोग दूसरे ढंग से तफ्तीश करते हैं । ' '

' ' यस सर ! ' '



" आपकी कम्पनी में कितनी लड़कियां हैं ? ' '

। "

' ' पचास !

।।

' आजकल वे क्या कर रही हैं ? ' '

" सिर्फ मॉडलिंग या घरों में बैठी हैं । ' '

" उनके रक्षक कितने हैं ? "

' ' कई हैं ... मगर जो खालिस प्रोफेशनल हैं , उनके साथ रक्षक के जाने की जरूरत नहीं पड़ती ! "



' खास - खास से अभिप्राय ? "

" ऐसी जो शरीफ घरानों की हैं और फाइनेंशियल मजबूरियों की वजह से राजदारी से धंधा करती हैं । ' '

' शकीला भी ऐसी ही लड़की थी ? ' '

' ' जी हां । उसके घर वालों तक को यह मालूम नहीं था ... उसका बाप कर्नल आफरीदी तो ऐसा खतरनाक ऑफिसर है कि वह शकीला को गोली ही मार दे ... अगर उस पर यह राज खुल जाए । ' '

" उसका रक्षक संजय था ? ' '

' ' हां ! सबसे ज्यादा भरोसे का वही रक्षक है - मगर उसने बड़ा धोखा दिया है । "

" विशनु के बारे में क्या ख्याल है ? " " विशनु ! वह तो मर चुका है । "

" क्यों मरा ? "

" पता नहीं ... बस एक रात तीसरे माले से कूदकर उसने बेवजह अपनी जान दे दी । ' '



" क्या वह संजय की तरह भरोसे का आदमी नहीं था ? "

" भरोसा का था लेकिन के . सी . साहब संजय पर उससे ज्यादा भरोसा करते थे , क्योंकि संजय ज्यादा शरीफ , खानदानी आदमी था - शायद उसे बहुत बड़ी रकम का लालच दिया गया था । ' '

' ' यह आप कैसे कह सकते हैं ? ' '

' ' इसलिए कि वह छोटी - मोटी रकम से बिक नहीं सकता था । ' '

' ' संजय के बारे में मैं पूरी रिपोर्ट चाहता हूं । ' '

वागले ने संजय के बारे में वही सब कुछ बताया जो उसे संजय की मां से पहले ही मालूम हो चुका था - और सब रस्मी बातें थीं , क्योंकि विजय को तो दरअसल कालीचरण के आने तक समय गुजारना था । अचानक

विजय ने पूछा

' ' आपकी कम्पनी में मुलाजिम लड़कियों का खास निगरानी कौन हैं ? "

" जहूर राजा । "

' ' क्या काम करता है वह ? ' '

" लड़कियों के नाम और पते उसके पास रहते हैं । कौन लड़की किसके साथ कहां गई ? यह सब वह नोट करता है । "

' ' मैं जहूर राजा से मिलना चाहता हूं । ' '

" जरूर मिलिए ... मगर पहले मैं उसकी एक कमजोरी बता देना चाहता हूं । "

" क्या कमजोरी ... ? "

" वह काम कुछ भी करता है - यह उसकी रोजी - रोटी है ... मगर वह जबान का थोड़ा अक्खड़ है ... खुद्दार भी है ... बदतमीजी उसने डी . सी . पी . की भी सहन नहीं की ... उसे थप्पड़ तक मारने की कोशिश की

' ' मैं ऐसे लोगों की स्टडी करना चाहता हूं । ' '

' ' उसे यहीं बुलाऊं या आप उसके पास जाएंगे । "

" मैं उसके पास जाऊंगा ... लेकिन जिसके साथ जाऊंगा , उसे मेरी असलियत नहीं मालूम होनी चाहिए । ' '



' ' जी ... आप सन्तुष्ट रहिए । ' ' फिर उसने इन्टरकॉम का रिसीवर उठाकर बटन दबाया और रिसीवर कान से लगा लिया - दूसरी ओर से उखडी - सी आवाज आई- " मैं बिजी हूं । ' '

" मिस्टर राजा ! आपके पास एक साहब को भेज

रहा हूं । '

।।

' ' मैंने कहा न , मैं काम कर रहा हूं । ' '

' ' मगर इन साहब से मिलना जरूरी है - के . सी . साहब के खास मुलाकातियों में से हैं । ' '

" तो के . सी . साहब से मिलें- मुझसे क्या काम ? ' '

' काम आप ही से है । "

' ' मैं सिर्फ पांच मिनट ही दे सकता हूं । ' '

' ' पांच मिनट ही सही । '

' ' भेज दीजिए । ' '

वागले ने रिसीवर रखकर घंटी बजाकर चपरासी को बुलाया और विजय की ओर इशारा करके बोला ' ' इन्हें जहूर राजा के पास ले जाओ । "

।।

" आइए साहब ! "

विजय उठकर चपरासी के साथ चल पड़ा । चपरासी उसे आखिरी केबिन के सामने लाया और बोला - ' ' आप खुद दस्तक देकर चले जाइए । ' '

" क्यों ? ' '

" साहब ! पता नहीं किस मूड में हों - मैं दिन भर में चालीस - पचास गालियां हजम कर लेता हूं । ' '

विजय ने दस्तक दी तो अंदर से आवाज आई जैसे किसी से लड़ाई हो रही हो - ' ' आ जाओ । ' '

विजय ने दरवाजा खोला और अंदर दाखिल हो गया । जहूर राजा जो कुछ लिखने में व्यस्त था ... उसने नजर उठाकर भी नहीं देखा ।

विजय ने कुर्सी सरकाई ... तब जहूर इस तरह चौंक पड़ा जैसे बिच्छू ने डंक मारा हो । उसने खूखार नजरों से विजय को घूरा और उठने का इशारा करता हुआ गुस्से से बोला

" उठो ! खड़े हो जाओ । "

विजय आराम से उठा और खड़ा हो गया । जहूर राजा ने वैसे ही घूरकर उसे कहा- ' ' किसकी इजाजत से बैठे थे ? "

विजय ने उसी आराम से कहा- " यहां ऐसा कोई नोटिस नहीं लगा कि बगैर इजाजत बैठना मना है । ' '

जहूर राजा कलम रखकर उसे घूरने लगा और फिर गुर्राकर बोला

-

" जानते हो किसका केबिन है ? '

" जहूर राजा का । ' '

" मैं ही जहूर राजा हूं । "

' ' वह तो बाहर लगी नेम प्लेट और आपके शाहाना तेवर ही बता रहे हैं । ऐसे तेवर तो सिर्फ शाही खानदान वालों ही के होते हैं । ' '

जहूर राजा के जबड़े ढीले पड़ गए ... उसने कुर्सी की तरफ इशारा किया और कहा- " बैठ जाओ । ' ।

" शुक्रिया । "

' ' मैं दो मिनट में जरा काम खत्म कर लूं । ' '

" आप दस मिनट लगाइए , मैं खड़ा रहकर भी इन्तजार कर सकता हूं । "

जहूर राजा ने कलम चलाते हुए कहा- ' खानदानी आदमी मालूम होते हो । "

' ' आपकी दुआ से राजा मानसिंह से सीधा खानदानी शजरा मिलता है । ' '

' ' बहुत खूब ! तुम्हारी तहजीब और जवाब बता रहे

फिर उसने कलम रख दिया और रजिस्टर बंद करके बोला- " हां बोलो , क्या काम है ? ' '

" मुझे संजय के बारे में कुछ मालूम करना है । ' ' जहूर राजा चौंककर बोला - ' ' संजय के बारे में ? तुम कौन हो ? "

विजय ने अपना आई कार्ड निकालकर उसे दिखाया । जहूर राजा का मुंह भाड़ - सा खुला रह गया

और उसकी आंखों में से आश्चर्य झलकने लगा - फिर मुंह बंद हो गया ... उसने कार्ड वापस किया और बोला

।।

" आप इतने बड़े ऑफिसर हैं ? ' '

जी ... ऑफिसर हूं । ' '

' ' ताज्जुब है ... हमारे यहां मामूली दरोगा भी इस तरह धौंस जमाते हुए आता है जैसे आई . जी . हो ... मगर आप तो । "

' ' मैं अपने काम से काम रखता हूं । ' '

" लगता है , आप ज्वाला प्रसाद जी के खून की तहकीकात कर रहे हैं । ' '

" जी हां ... वह केस मुझे ही सौंपा गया है । "

' ' बहुत अच्छा । "

" बहुत सारे लोगों के बयानात में ले चुका हूं । मैं जानता हूं - फिर भी आपको तकलीफ दे रहा हूं - मजबूर हूं - मेरी ड्युटी है । "

" कोई बात नहीं ... आप जो पूछना चाहते हैं पूछिए

। ' '

" आपके ख्याल में क्या मिस्टर संजय ज्वाला प्रसाद जी का खून कर सकते हैं ? ' '

' ' एक परसेंट भी नहीं । ' '

' आप इतने यकीन के साथ कैसे कह सकते हैं ? "

" तजुर्बा है मुझे आदमी की परख करने का - संजय जैसा आदमी ऐसे खतरनाक जुर्म की योग्यता ही नहीं रखता । "

" हो सकता है वह किसी बड़ी कीमत पर बिक गया हो । "

" मुझे यकीन नहीं आता - वह खानदारी आदमी है ... परेशान हाल है - मगर खुद्दारी है उसमें - इसीलिए के . सी . साहब सबसे ज्यादा भरोसा उसी पर करते हैं । ' '

" और शकीला के बारे में आपकी क्या राय है ? ' '

जहूर राजा की आंखों में दुःख नजर आने लगा ... उसने कहा

" उस लड़की की एंट्री इस लाइन में होने पर मुझे बहुत दुःख है ... मेरा बस चलता तो मैं उसे लौट देता ... वह भी एक खानदानी लड़की है - एक रिटायर्ड कर्नल की पोती है । '

' ' सुना है उसकी मां दूसरे मजहब की थी । ' '

जहूर राजा ने बुरा - सा मुंह बनाकर कहा - ' ' आप सरकारी लोग भी धर्म की बातें करते हैं । ' '

' ' क्या संजय उससे मुहब्बत करता था ? ' '

' ' वो दोनों शादी करने वाले थे । "



" लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक संजय ने शकीला को राजदारी के लिए जान से ही मार डाला है । ' '

' हूं ... किस बात की राजदारी ? सारी दुनिया तो संजय को ज्वाला प्रसाद का कातिल समझ रही है ... फिर वह किससे छुपाने के लिए अपनी महबूबा का कत्ल करता ? मैं नहीं मानता । ' '

' ' संजय ही ज्वाला प्रसाद का कातिल है - इसकी अकेली गवाह शकीला थी और कोई नहीं था । ' '

' ' संजय ज्वाला प्रसाद का कातिल है ही नहीं । ' '

' ' तो फिर वह मुंह छुपाए कहां और क्यों बैठा है

? "

" गिरफ्तार हो गया होता तो आपके विभाग पर बात बाद में पहुंचती - संजय से पहले ही अपराध स्वीकार करने का बयान लिखवा लिया होता । "

" इन्वेस्टीगेशन के अनुसार तो संजय और शकीला ही ज्वाला प्रसाद के पास थे जब उनका खून हुआ । ' '

' ' यह सब सफेद झूठ है । ' '

" वे दोनों यहां से कितने बजे गए थे ? ' '

' ' जिस वक्त भी गए हों , मगर संजय खून नहीं कर सकता ... क्या आप जानते हैं संजय असलियत में कौन था ? "

" कौन था ? "

' ' मिलिट्री इंटेलीजेंस के ऋषिराज चौहान का बेटा ... जिन्होंने अपना जीवन देश के लिए बलिदान कर दिया । "

विजय हल्की सांसें लेकर बोला- ' ' मुझे लगता है आप भी कोई एक्स - आर्मी ऑफिसर हैं । ' '

जहूर राजा चुप रहा ... जब विजय ने दोबारा यही सवाल किया तो जहूर राजा कुर्सी से टेक लगाकर बैठ गया और बोला- ' ' बंटवारे के वक्त मेरी उम्र अठ्ठाइस बरस थी और मैं अंग्रेजों के जमाने का सिविल पुलिस सुपरिन्टेंडेंट था । '

" ओहो ! "

" बटवारे के बाद आबादी के अदल - बदल में मुझे पाकिस्तान के लिए ऑफर मिली थी जहां मुझे पुलिस में कोई बड़ी पोस्ट मिलती , मगर मैंने अपना वतन छोड़ने से इंकार कर दिया । ' '

' ' और पुलिस की नौकरी ? ' '

' ' मैंने उस समय की मार - काट के दर्दनाक हालात देखे थे - आदमी जानवर बन गया था - मेरे लिए रिजाइन के अलावा कोई रास्ता था - ऐसा लगता था कि अब दोनों मुल्कों में कभी समझौता नहीं हो पाएगा । "
 
" फिर तो आपको बहुत स्ट्रगल करनी पड़ी होगी । "

" जाहिर है - जायदाद बिक गई ... बीवी अपने भाई के साथ कराची चली गई ... एक बेटी , एक बेटे को साथ ले गई । "

' ' क्यों ? ' '

" उसे अपनी जान बहुत प्यारी थी ... मगर वहीं अपनी इज्जत गंवाकर कत्ल हो गई और मैं चैन से यहां बैठा हुआ हूं । "

। " और आपके बेटा - बेटी ? ' '

' ' पता नहीं - न उन लोगों ने मेरी खबर ली - न मैंने कभी मालूम

करने की कोशिश की थी । "

' ' आप के . सी . फाइनेंस से कब से जुडे हैं ? ' '

" लगभग पच्चीस बरस से । "

' ' क्या तब भी यह कम्पनी इतनी ही बड़ी थी ? ' '

' ' नहीं - तब कालीचरण एक मामूली फाइनेंस ब्रोकर था - छोटे - मोटे प्रोड्यूसरों और उठते हुए नेताओं और मारवाड़ियों को लड़कियां सप्लाई करके फिल्मों के लिए फाइनेंस दिलवाता था । ' '

" फिर ... ? "

" बाद में मॉडलिंग एजेंसी खोल ली जिसके बहाने सुन्दर और ऊंचे घराने की लड़कियां आने लगीं । "

" उन्हें धंधे पर किस तरह लगाया गया ? ' '

" जबरदस्ती किसी को नहीं ... अंगर कोई लड़की हजार रुपया महीना चाहती तो उसे इसकी ऑफर की गई ... जो लालच में आ गई वह धंधे में आ गई जो नहीं आई वह सिर्फ मॉडलिंग ही करती रही । ' '

" और अब ? ' '

' अब बड़े - बड़े घरानों की लड़कियां होटलों में रातें गुजारती हैं वह भी बिना कुछ कैश लिए - हौले - हौले यह एक पेइंग इंडस्ट्री बन गई है ... आजकल पश्चिमी देशों से इतनी सैक्स यहां इम्योर्ट हो चुकी हैं कि बूढ़ियों के भी पर निकल आए हैं ... वह लाल लगामें लगाए , लिपिस्टिक पाउडर थोपे और खुश्बुएं लगाए नौजवानों का मुकाबला करती हैं । समाज का खासकर सैक्स का और ऊंचे घरानों का ढर्रा बदल गया है ... न जाने कौन - सी होड़ लगी है । "

' ' खैर ... कालीचरण साहब के बारे में आपका क्या ख्याल है ? "

" किस बारे में ? ' '

" क्या कालीचरण खुद किसी बड़े रैकिट के हाथों नहीं बिक सकते ... किसी बहुत बड़ी रकम पर । "

अचानक जहूर राजा खड़े होकर दरवाजे की तरफ हाथ उठाकर गुस्से से बोला- ' ' आउट ... गैट आउट । ' '

" जी ! "

' आई सेड गेट आउट । ' '

विजय बड़े आराम से उठ गया ... वह जैसे ही बाहर निकला । वही चपरासी खड़ा नजर आया जो मुस्कराकर बोला - ' ' पड़ गई न झाड़ । "

विजय ने अनसुनी करके कहा- " कालीचरण साहब आ गए ? ' '

" जी ! उन्होंने आपको अपने केबिन में आने के लिए भेजा था ... मैं आप ही के बाहर आने का इन्तजार कर रहा था । "

विजय चपरासी के साथ कालीचरण के केबिन के पास आ गया और चपरासी उसे बाहर खड़ा रहने को कहकर अंदर केबिन में जाकर विजय के आने की सूचना देने चला गया , फिर बाहर आकर बोला

' ' जाइए साहब ! '

विजय अंदर गया तो कालीचरण ने उठकर हाथ मिलाया और सामने की कुर्सी की तरफ हाथ उठाकर बोला- ' ' बिराजिए । "

विजय बैठ गया तो कालीचरण बोला- ' ' मुझे आते ही वागले साहब ने बताया था कि आप कौन हैं । आप जहूर राजा साहब के साथ उनके केबिन में थे ... वहां से किसी से बात करते हुए आदमी को अचानक उठाकर बुला लाना हल्की - सी कयामत लाना है । ' '

' ' मैं समझ गया । "

।।

। "

' आप कुशलता से बाहर आए थे ? '

' ' फटकार खाकर । ' '

" मुझे अफसोस है - बहुत पुराने साथी हैं - मेहनती हैं ... ईमानदार हैं ईसलिए बर्दाश्त करना पड़ता है । "



" आई डोंट माइण्ड । आई लाइक हिज सिन्सअर्टी

' हां ! तो आप ज्वाला प्रसाद मर्डर केस के बारे में इन्वेस्टीगेशन के लिए आए हैं ? ' '

' ' जी हां । ' '

" आपको तो मालूम होगा , सबसे पहले मेरे ही गिरफ्तारी के वारंट इश्यू हुए थे । ' '

' ' मालूम है ... आप दिल्ली गए थे एक दिन पहले । ' '

' ' अशोका होटल में ठहरा था ... मेरे पास कमरे के किराए की रसीदें और बिल भी मौजूद हैं । "

विजय मुस्करा पड़ा और बोला- " और यह सारे इंतजाम आपने बहुत तेजी से कर लिए । ' '

" क्या मतलब ? "

' ' आपको संजय ने दो बजे रात के बाद खबर दी थी कि ज्वाला प्रसाद का खून हो गया है और वह रूपोश हो रहा है । ' '

कालीचरण सन्नाटे में रह गया ... फिर संभलकर बोला- " किसी ने गलत खबर दी है आपको । '

" मिस्टर कालीचरण , आप जैसी हैसियत और पोजीशन वाले आदमी के लिए ऐसा कोई भी काम न मुश्किल है न नामुमकिन । '

कालीचरण विजय को घूरने लगा । विजय ने फिर कहा " आप सोच रहे होंगे कि यह सब मुझे कैसे मालूम हुआ ? ' '

" मैं सोच रहा हूं आपको किसने मेरी तरफ से बहकाया । "

" आपके यहां विशनु नाम का एक आदमी करता

था । '

।।

" और वह तीन माले से छलांग लगाकर मर गया

था । "

" उसने छलांग क्यों लगाई , या उसे क्यों गिराकर मारा गया - क्या यह बात आपको मालूम है ? "

' ' मैं समझा नहीं । ' '

' जब मैंने इन्वेस्टीगेशन शुरू की थी तो विशनु ने मेरी निगरानी करानी शुरू कर दी थी । "

' ' नहीं ... ! ' '

" बहरहाल , मैं उसी आदमी के द्वारा विशनु तक पहुंच गया था और विशनु ने मुझे पूरा बयान दे दिया

था । "

" ओह ! ' '

' ' बस , इसी बात ने विशनु की जान ले ली । ' '

-

" तो क्या विशनु ने मेरा नाम ... ? ' '

।।

" उसने आप पर शुब्हा जाहिर किया था । ' '

" ओहो ! मगर शुब्हा का इजहार यकीन का सबब नहीं न सकता - मैं किसी हद तक जानता हूं कि विशनु का शुब्हा गलत भी हो सकता है लेकिन उसके लिए असल अपराधी की गर्दन तक हाथ पहुंचना जरूरी है ... और वह तभी हो सकता है जब आपकी तरफ से मुझे को - ऑपरेशेन मिले । देखिए ... आप मुझे सच - सच बता दीजिए कि आपने अपने बचाव के लिए दिल्ली में अपनी मौजूदगी के जो प्रमाण दिए - वह विशेष अपने बचाव के लिए बनवाए । "
 
कालीचरण संभल गया और बोला- " हां , यह सच है ... मगर आप मेरे इस सच को अदालत में चैलेंज नहीं कर सकते , क्योंकि मैं अदालत में यही कहूंगा कि मैं एक दिन पहले ही दिल्ली चला गया था और अशोका होटल में ठहरा था । "

' ' संजय ने आपको रात में ज्वाला प्रसाद के मर्डर की खबर दी थी या नहीं दी थी ? "

" दी थी - मैंने उसे कहा था कि वह कानून के सामने बयान दे दे । "

" और उसने क्या बताया था ? ' '



" उसने बताया था कि जब वह शकीला के साथ जा रहा था , मोबाइल पर उसे मेरे नाम से किसी ने फोन करके बताया कि उसे रास्ते में एक खास जगह रुककर अपनी जगह उसको दे देनी । ' '

" फिर ? ' '

" संजय मेरा बहुत वफादार और काम का आदमी है - मैं उसकी बहुत कद्र करता हूं - उसने समझा कि मैंने ही यह ऑर्डर दिया है ... और उसने मेरा हुक्म माना । ' '

" मतलब , उसने अपनी जगह किसी और को दे दी

' ' हां । "



" और जो भी शकीला के साथ गया , उसने ज्वाला प्रसाद का खून कर दिया । ' '

" स्पष्ट है , यही हुआ होगा । ' '

" फिर संजय ने आपको खबर दी । ' '

" हां । "

" और आपने अपने बचाव का इन्तजाम कर लिया

" हां - वरना मैं इस समय कानून के शिकंजे में बुरी तरह से कसा हुआ होता । "

" और खुद संजय शकीला के साथ रूपोश हो गया - जाने कहां छुपा है । ' '

" हां ... उसने वैन सड़क पर छोड़ दी थी जो पुलिस द्वारा दूसरे दिन यहां पहुंच गई । "

" और रिपोर्ट है कि संजय ने शकीला को राजदारी के लिए मार डाला । ' '

..

" हर्गिज नहीं , संजय किसी का भी खून नहीं कर सकता और फिर वह शकीला से मुहब्बत करता था ... शादी भी करने वाला था । ' '

" आपने संजय को ऑर्डर नहीं दिया कि वह अपनी जगह किसी और को दे दे ? ' '

" बिल्कुल नहीं । "

' ' देखिए ... उ

र ... उस रात ज्वाला प्रसाद के यहां शकीला का बुलावा आया था ... यह बात किस - किसको मालूम

थी ? "

' ' मेरे पर्सनल सैक्रेटरी और जहूर को । ' '

' बस ...

। "

" हां ... बड़े आदमियों के मामलात होते हैं तो राजदारी बहुत जरूरी हो जाती है । "

' ' और किसी बाहर के आदमी को यह मालूम हो गया कि शकीला ज्वाला प्रसाद के यहां जा रही है - और वह यह भी जानता था कि संजय साथ जाएगा । '

" बेशक ! "

" और वह आपको इतना करीब से जानता था कि उसने बड़ी आसानी से आपकी आवाज की नकल कर ली । "

' ' मैं खुद हैरान हूं । "

' ' आपका क्या ख्याल है ? क्या वागले या जहूर राजा में से कोई इस साजिश में शामिल नहीं हो सकता । ' '

' ' नहीं ... मैं नहीं मानता ... दोनों भरोसे के आदमी हैं

। "

" तो फिर आपने ही संजय को हुक्म दिया कि वह अपनी जगह किसी अजनबी को दे दे । ' '

" मैं ऐसा क्यों करने लगा ? "

' ' तो फिर किसी चौथे आदमी का नाम बता दें जो इस राज को जानता हो कि उस दिन शकीला किसके लिए ऐंगेज थी और उसके साथ कौन जाने वाला था । '

कालीचरण सन्नाटे में रह गया । विजय ने उसे ध्यान से देखते हुए आराम से कहा

' आपका जवाब बहुत जरूरी है वरना आपके विरुद्ध अपराध का आरोप लगाने में कोई रुकावट नहीं होगी - आप दिल्ली गए हैं । रात उसी जिस रात मर्डर हुआ था ... और उस दिन के लिए आपने बुकिंग करा ली होगी ... एक दिन पहले की फ्लाइट का क्या प्रमाण

" म ... म ...

मैं ... ! "

' आप अशोका में ठहरे थे , वहां एक रात पहले की रसीदें और बिल बनवाना कोई मुश्किल काम नहीं और मैं आसानी से आपको झूठा सिद्ध कर सकता हूं ... इस तरह इस साजिश का बोझ आप पर आन पड़ेगा । ' '

' ' मगर यह गलत है - मेरे हाथ बिल्कुल साफ हैं । ' '

' ' अगर आप नहीं हैं तो वागले और जहूर राजा के सिवा कौन हो सकता है ? ' '

' ' संजय भी हो सकता है । ' '

.

" अभी तो आपने कहा था कि आप संजय को अपराधी मानने के लिए तैयार नहीं हैं । ' '

कालीचरण अपना माथा रगड़ने लगा - विजय उसे ध्यान से देख रहा था - कालीचरण ने नजरें उठाकर कहा ' यह हकीकत है कि मेरा दिमाग कुछ भी काम नहीं कर रहा ... आप चाहें तो मुझे गिरफ्तार कर सकते हैं । ' '

' ' मिस्टर वागले या जहूर राजा क्यों नहीं । "

' ' मैं इन दोनों पर कोई आरोप नहीं लगा सकता ... लेकिन अपराध तो हुआ ही है और कोई ऐसा आदमी इसमें शामिल है जो हमारी कम्पनी की गुप्त रही बातों को भली - भांति जानता है । ' '

।।

" और आपके अलावा केवल दो ही व्यक्ति हैं , वागले और जहूर राजा । ' '

" अब आप ही मेरा मार्गदर्शन करें । "

।।

' आप वागले को फोन मिलाएंगे ? ' '

' ' क्यों ? "



" जैसा मैं कहूं वैसा कीजिए । ' ' विजय ने अपना मोबाइल देकर कहा - ' ' इसी पर वागले के मोबाइल पर बातचीत कीजिए । "

कालीचरण ने फोन ले लिया ।

वागले ने मोबाइल का बजर सुनकर उठाकर कहा " हैलो ! "

" वागले ! मैं कालीचरण हूं । ' ' दूसरी ओर से कालीचरण की घबराई हुई आवाज आई- " गजब हो

गया भई । "

" क्या हुआ ? "

' सुपरिन्टेंडेंट विजय सरदाना को पता चल गया है कि ज्वाला प्रसाद के कत्ल की रात में आपने मेरी आवाज बनाकर संजय को फोन किया था और कहा था कि अपनी जगह किसी और को दे दे - जिसने ज्वाला प्रसाद का खून किया है । ' '

वागले ने आश्चर्य से कहा- " मैंने अपनी आवाज बनाकर फोन किया था ? यह आप क्या कह रहे हैं सर ! ' '

' ' मैं नहीं कह रहा ... सुपर विजय सरदाना का ख्याल है । '

“ क्या वह चले गए ? "

' ' नहीं - मेरे पास बैठे हैं । "

' ' मैं अभी आ रहा हूं । ' '

वागले तेजी से उठा और अपने केबिन से निकलकर वह कालीचरण के केबिन के बाहर रुककर इजाजत लेकर अंदर चला आया जहां कालीचरण और सरदाना बैठे कोई और बात कर रहे थे ।

वागले के होंठों के कोने फड़फड़ा रहे थे - उसने कालीचरण से कहा

' क्या कहा था आपने सर ! ' '

कालीचरण ने उसे हैरानी से देखकर कहा- " क्या मतलब ? ' '



" अभी आपने मुझे फोन किया था । '

। "

' ' नहीं तो ! "

" फिर वह कौन कमीना था ? ' '

" क्या हुआ ? बताइए तो सही । ' '

वागले ने बताया कि उसे किस किस्म का फोन मिला था । कालीचरण ने विजय की ओर देखा और कहा- " क्या हम लोगों में से कोई ऐसी बात हुई है ? "

" बिल्कुल नहीं । ' '

कालीचरण ने वागले की ओर देखकर कहा

' आपको गलतफहमी हुई है मिस्टर वागले । "



" सर ! अभी मेरे फोन पर फोन आया था । ' '

" आपने स्क्रीन पर चैक किया , किन नम्बरों से फोन किया गया था ? "

' ' नहीं..चैक नहीं कर पाया । ' '

" खैर ... हम दोनों के बीच ऐसी कोई बात नहीं हुई

वागले ने विजय की तरफ देखा तो विजय ने कहा " मिस्टर वागले , कालीचरण साहब अभी कह रहे थे कि आप उनके सबसे बढ़कर विश्वसनीय साथी हैं । ' '

" थैक्स गॉड ! मैं सोच रहा था कि मेरा मुंह व्यर्थ ही क्यों काला किया जा रहा था ? ' '

" अब कोई फोन आए तो मोबाइल पर नम्बर जरूर चैक कर लें । "

" यस सर ! ' ' कहकर वागले चला गया ।

कालीचरण ने विजय की ओर देखते हुए उससे पूछा

' ' अब क्या ख्याल है ? "

' ' वागले पर शुब्हा नहीं किया जा सकता - अब जरा जहूर राजा को फोन कर लीजिए । ' '

कालीचरण ने विजय ही के मोबाइल पर जहूर राजा के नम्बर मिलाए और आवाज आई- " हैलो ! ' '

कालीचरण ने कुछ घबराए - से स्वर में कहा " मिस्टर राजा , मैं हूं के . सी . । "

“ फरमाइए । '

' ' गजब हो गया है मिस्टर राजा । सुपर विजय को मालूम हो गया है कि जिस रात ज्वाला प्रसाद का खून हुआ ... उस रात आपने मेरी आवाज बनाकर संजय को आदेश दिया था कि वह रास्ते में एक खास जगह पर गाड़ी रोककर अपनी जगह किसी और को दे दे । "

" व्हाट ! "

' ' और उसने जिसे अपनी जगह दी थी , वही ज्वाला प्रसाद का कातिल है । "

' नॉनसेंस ! मैंने आपकी आवाज बनाई थी ? "

" उसका यही कहना है । ' '

' ' सुपर विजय है कहां ? "

" अंदर बाथरूम में । "

' ' मैं आ रहा हूं । "

' आ जाइए , जल्दी से वरना बड़ी गड़बड़ हो जाएगी ... अभी उसने पुलिस नहीं बुलाई - मैं मामला रफा - दफा करने की कोशिश कर रहा हूं । ' '

' आता हूं , सिर्फ दो मिनट उसे रोकिए - मेरे हाथ में एक कॉल है । "
 
फिर दूसरी ओर से डिस्कनेक्ट हो गया ।

कालीचरण ने विजय की ओर देखकर पूछा - ' ' अब क्या ख्याल है ? "

' अभी सामने आ जाता है । ' '

लगभग पांच मिनट गुजरने के बाद विजय बड़ी तेजी से उठा - उसके साथ कालीचरण भी उठता हुआ

हड़बड़ाकर बोला

' ' क्या हुआ मिस्टर विजय ? ' '

" वह गया । "

विजय तेजी से बाहर निकला ... सबसे पहले वह जहूर राजा के केबिन की तरफ गया , लेकिन केबिन खाली पड़ा था । उसे इस तरह बेधड़क केबिन का दरवाजा खोलते हुए चपरासी ने तेज आवाज में पूछा

' ' यह क्या हो रहा है ? ' '

विजय उसे एक ओर धकेलता हुआ बाहर दौड़ा ... कालीचरण भी उसके पीछे था ... नौकर हैरान था ... दोनों बाहर आ गए - कालीचरण से विजय ने तेजी से पूछा- " उसकी गाड़ी कौन - सी थी । "

कालीचरण ने तेज - तेज सांसों के साथ इशारा किया और बोला- " गाड़ी तो वह खड़ी है । ' '

विजय होठ भींचकर बोला- ' ' तब तो वह निकल

गया । "

फिर कालीचरण खुद विजय के साथ फाटक तक आया तो सशस्त्र पहरेदार हड़बड़ा गए - उनके पीछे अंदर वाला दरबान और पहरेदार भी थे । कालीचरण ने पहरेदार से पूछा - ' ' जहूर राजा बाहर गया है ? "

' ' नहीं ... साहब ! ' '

" विजय ने कालीचरण से पूछा- ' ' बाहर जाने का कोई और रास्ता भी है ? ' '

" हां - एक है । ' '

वे लोग दौड़कर दूसरे रास्ते तक आए - यह रास्ता केवल स्टाफ के आने - जाने के लिए था । जो एक तंग गली में खुलता था - यहां भी सशस्त्र पहरेदार मौजूद था - इस रास्ते से बाहर गली में रेस्टोरेंट - बॉर वगैरा थे । वहां के पहरेदार ने पूछे जाने पर बताया

' ' जी हां ! राजा साहब लगभग दस मिनट पहले इधर से निकले थे - वह बता रहे थे कि बॉर में जा रहे हैं

। '

विजय ने कहा - ' ' बेकार है - अब वह हाथ नहीं

आएगा आसानी से । "

पीछे से वागले भी आ गया - उसके चेहरे से आश्चर्य झलक रहा था ... उसने पूछा- " क्या हुआ ? क्या मामला है ? "

" आइए ...

... अंदर चलकर बात करेंगे । ' '

वे लोग वापस अंदर आ गए - पूरे स्टाफ में हलचल - सी थी - और कोई भी समझ नहीं पाया था कि मामला क्या है ? ' '

कुछ देर बाद विजय , कालीचरण और वागले मीटिंग - रूम में थे ।

जो कुछ हुआ था वह सब विजय ने वागले को बता दिया और वागले की आंखें हैरानी से फैली रह गई । विजय ने कहा - ' ' आपको मोबाइल से मैंने ही के . सी . साहब से फोन कराया था ... आप बिफरकर आ गए थे । ऐसा फोन जहूर राजा को भी कराया गया और जहूर राजा " अभी आता हूं " कहकर गायब हो गए । ' '

" ओहो ! "

' इस भयानक साजिश में के . सी . फाइनेंस का कोई न कोई आदमी जरूर था - वह खुद के . सी . हो सकते हैं , आप हो सकते हैं या जहूर राजा - क्योंकि यहां की राजदारी की बातें आप ही में से किसी द्वारा बाहर पहुंच सकती हैं । "

कालीचरण ने कहा - ' ' जहूर राजा के बारे में तो मैं सोच भी नहीं सकता था - वह पूरे पच्चीस बरस से इस कम्पनी में हैं । "

" के . सी . साहब ! वफादारी बदलते देर नहीं लगती - हो सकता है छोटी - मोटी साजिशें पहले ही से चल रही हों - जैसे हल्की - फुल्की विदेशी जासूसी - राजदारी की ... स्मगलिंग ... ऐसे कामों के लिए उन जैसे आदमी बहुत मुनासिब होते हैं ... वैसे भी इस तरह का काम जहूर राजा ही के हाथों में रहता था । ' '

" बेशक ! "

" यही मालूम होने के बाद मुझे सबसे पहले जहूर राजा पर शुब्हा हुआ था और मेरा शुब्हा ठीक निकला । "

" लेकिन ज्वाला प्रसाद मर्डर केस ? ' '

" इसका जाल दूर तक फैला हुआ है - अच्छे से अच्छा आदमी अपने काम के लिए खरीदा जा सकता है ... और जहूर राजा पच्चीस साल आपके साथ वफादारी के बाद बिक गया । ' '

" मगर जहूर राजा ने संजय की जगह किसको भेजा होगा ? '

" उन लोगों का ही कोई आदमी होगा ... जहूर राजा उस रैकिट को अपने काम का आदमी नजर आया होगा .... उन लोगों ने उसे खरीद लिया । ' '

' लेकिन मेरी आवाज किसने बनाई होगी ? ' '

' ' जहूर राजा ही ने बनाई होगी , क्योंकि एक आदी मुजरिम और पुलिस अफसर होने के नाते उसमें असाधारण योग्यता होगी ... और दूसरे किसी व्यक्ति की आवाज बनाना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं । मैं भी आपकी आवाज बना सकता हूं । ' '

विजय ने कालीचरण और वागले दोनों की आवाजें बनाकर सुनाई तो दोनों हैरान रह गए । विजय ने कहा - ' ' जब मैं विशनु से पूछ - गछ कर रहा था , तब इसी आवाज में किसी ने विशनु को फोन किया था और मैंने वह आवाज सुनी थी । ' '

" विशनु जहूर राजा से मिला हुआ था । ' '

" वह जहूर राजा के लिए ही काम करता था , मगर उसे नहीं मालूम था कि वह जहूर राजा के लिए काम कर रहा है । "

" क्या मतलब ? ' '

विजय ने बताया कि जहूर राजा ने किस तरह विशनु को भयभीत कर रखा था ।

" विशनु को अपनी पत्नी और बेटी से बहुत प्यार था ... वह सिर्फ उन दोनों की रक्षा के लिए ही जहूर राजा के लिए काम करने पर सहमत हुआ था । ' '

" आपने उसे कैसे ट्रेस किया ? ' '

।।

" जब यह केस मेरे सुपुर्द किया गया तो मैंने छानबीन शुरू की - पहले मैं शकीला के घर गया , फिर संजय के घर - संजय की बहन रेणु मुझसे कुछ बात करना चाहती थी ... मैंने उसे मजेबो बुलाया ... वहां मैंने चैक किया कि एक वेटर हम दोनों की निगरानी कर रहा था ... मैंने उस वेटर को जबान खोलने पर मजबूर किया तो उसने मुझे जिस आदमी को दिखाया , उसने मेरी निगरानी के लिए वेटर को हजार रुपये में खरीदा था - वह विशनु ही था ... फिर टैक्सी में हम बैठे ... उसका ड्राइवर भी विशनु का ही आदमी था - मैंने उसकी जबान खुलवाई - उसने कोड लैंग्वेज में विशनु को खबर की और मर गया । ' '

" ओह ! "

' ' फिर मैं विशनु तक पहुंच गया ... विशनु ने बताया कि किस तरह वह एक गुमनाम आदमी के हाथ की कठपुतली बना हुआ है जिसकी बात उसने न मानी तो वह उसकी पत्नी और बेटी को मार डालेगा - जब मैं वहां से निकला तो विशनु ऊपर से गिरकर मर गया या मार डाला गया । "

II

" और उसकी पत्नी और बेटी ? "

" वे लोग पुलिस प्रोटेक्शन में सुरक्षित हैं ... उन्हें मालूम नहीं कि उनके साथ कितनी बड़ी ट्रेजिडी हो चुकी है । अब मैं जहूर राजा के ऑफिस और घर की तलाशी लूंगा - और हां , स्टाफ के किसी भी आदमी को बाहर न जाने दिया जाए - गार्डों को सक्त आर्डर दे दें । ' '

गार्डों को कड़ा आदेश दे दिया गया और स्टाफ के लोगों में घबराहट की लहर दौड़ गई । विजय ने जहूर राजा के ऑफिस की तलाशी ली । उसकी अल्मारियों के गुप्त खानों से कई ऐसी फाइलें मिलीं जिनमें विदेशी जासूसों के कागजात मिले । स्टाफ के जी आदमी या मॉडल लड़कियां उनमें शामिल थी ... उनके नाम और पते भी थे ।

विजय ने उनकी गिरफ्तारी के लिए आई . जी . को फोन करके ऑर्डर जारी करने की दरख्वास्त की , लेकिन बहुत राजदारी के साथ । कम्पनी के स्टाफ में सिर्फ सात आदमी पकड़ में आए , लेकिन वह सब लिखा - पढ़ी करते थे ... जो मॉडल लड़कियां जहूर राजा के आदेश पर अफसरों , नेताओं और मिनिस्टरों से राज लेती थीं वे सभी प्रोफेशनल थीं और उनकी गिरफ्तारी के वारंट भी जारी हो गए ।

कालीचरण ने रुआंसी आवाज में कहा- " मगर मेरी फाइनेंस कम्पनी का क्या होगा ? ' '

" के . सी . साहब ! अपराध दुनिया के किस देश में नहीं होते ? लेकिन वहां किसका , कौन - सा काम रुक जाता है ? "

' ' मेरे हाथ तो साफ हैं ना ! ' '

" बेशक ... आपके स्टाफ के जो लोग पकड़े गए हैं ... उन पर बंद कमरों में अलग - अलग मुकद्दमे चलेंगे ... मैं कोशिश करूंगा कि आपकी कम्पनी पर किसी प्रकार का दाग भी न लगने पाए । ' '

' ' मैं आपका बहुत आभारी होऊंगा - मगर संजय , शकीला वगैरा ? "

" संजय , शकीला सुरक्षित हैं और मेरा आपसे निवेदन है कि आप अब संजय को अपनी कम्पनी में कोई रेस्पेक्टेबल जॉब दे ... शकीला और संजय की शादी में उनकी मदद करें ... जिन लड़कियों की अभी बदनामी नहीं हुई ..उनकी अगली नस्लें दागदार होने से बच जाएं । "

' ' मगर वह हैं कहां ? "

' केस फाइनल होते ही वे लोग भी आ जाएंगे । ' '

फिर वह चुप हो गए , लेकिन विजय का दिमाग बड़ी तेजी से काम कर रहा था , क्योंकि जहूर राजा अभी हाथ नहीं आया था ... वैसे विजय को यह भी यकीन नहीं था कि जहूर राजा ही मुख्य अपराधी है । ' '
 
विजय की जबानी पूरी कार्यवाही जानने के बाद आई . जी . के माथे पर बल पड़ गए ।

विजय ने कहा - ' ' जब तक हम अपराध की बुनियाद तक न पहुंच जाएं , यह इन्वेस्टीगेशन अखबारों तक नहीं पहुंचनी चाहिए । यह अखबार वाले हमारे काम में बहुत बड़ी रुकावटें डाल सकते हैं । "

-

' ' मगर जहूर राजा को आप कहां ढूंढेंगे ? ' '

' ' वह एक ऐसा खरगोश है जो अपने बॉस शेर की गोद में छुपा बैठा होगा । "

" और उसका बॉस ? "

' ' जो कोई भी हो , उसका गहरा रिश्ता शाहीन से है

।।

" फिर आप क्या करेंगे ? ' '

" मैं कानून अनुसार तो शाहीन तक पहुंच नहीं सकता । "

" तो क्या ... ? "

' सर ! इसके सिवा कोई चारा नहीं है..शाहीन ही वह हैड ऑफिस है जहां से इस वक्त भी उसके डेली वर्करों को आदेश जारी हो रहे हैं । ' '

।।

" और शाहीन को पूरी सिक्योरिटी मिली हुई है । " ' ' आप सिक्योरिटी की परवाह मत कीजिए ... बस मुझे उन लोगों की लिस्ट चाहिए जिन लोगों ने शाहीन को सिक्योरिटी प्रदान करने की सिफारिश की हो और सिक्योरिटी का आदेश मिला है । ' '

' ' भई तुम ... ! "

अचानक विजय ने हाथ उठाकर कहा- " बस सर ! अब मुझे किसी गाइडेंस की जरूरत नहीं ... मैं उन सबको जानता हूं और अब जो कुछ मैं करूंगा , अपनी जिम्मेदारी और अपने ही बलबूते पर करूगा । ' '

" विजय ... वे लोग बहुत मजबूत हैं ... मैं और हम तुम उनके सामने ऐसे हैं जैसे तूफानी झक्कड़ों के सामने कमजोर पेड़ । "

" सर ! आप यह क्यों नहीं कहते कि हम दोनों ऐसे चिराग हैं जो घोर काली आंधी में भी स्थिर रोशनी बिखेर रहे हैं । ' '

आई . जी . ने गहरी सांस ली और कहा- “ बहुत जिद्दी हो तुम । ' '

फिर आई . जी . ने विजय को उन बड़े आदमियों की लिस्ट दे दी जिनके आदेश पर शाहीन को पूरी सिक्योरिटी मिली हुई थी । विजय के होंठों पर एक व्यंग्य भरी मुस्कराहट फैल गई ... उसने कहा

" वही पचास बरस पुरानी जहरीली शराब ...

... वही नशा ... सिर्फ बोतलें और लेबल बदले गए हैं । ' '

आई . जी . कुछ नहीं बोला ।

विजय के शरीर पर मैकेनिकों का - सा लिबास था जिस पर काले धब्बे पड़े हुए थे और आंखें शराबियों जैसी , हीरोकट नाइट कैप का छज्जा पीछे की तरफ था और होंठों पर घनी मूंछे ।

वह एक बहुत पुरानी मोरिस माइनर में था जो लहराती हुई बंगले के फाटक पर रुक गई तो गार्डों ने उसे घूरा ... एक गार्ड पास आकर बोला



' क्या काम है ? ' '

' ' साहब ! काम के लिए तो अपने को बुलाया गया है । ' '

" कौन - से गैरेज से ? ' '

विजय ने उसे गैरेज का नाम बताया जहां यहां की गाड़ियां जाती थीं । गार्डों ने फाटक खोल दिया । मोरिस माइनर लहराती हुई अंदर घुसी और बड़ी मुश्किल से रुकी और एक नौकर ने उसे उस शानदार कीमती कार तक पहुंचा दिया । विजय ने उसे चैक किया और बोला- " बैटरी डाउन है ... धक्का लगाकर स्टार्ट होएगी । "

' यह गाड़ी थोड़ी देर बाद नेताजी को लेकर जानी है

। "

" फिर तो एक ही रास्ता है ... मेरी गाड़ी की बैटरी लगा लीजिए ... आपकी बैटरी मैं चार्ज के लिए ले जाता

' इस गाड़ी की बैटरी ? ' '

' ' साहब , बूढ़ी घोड़ी है तो क्या हुआ ? लगाम तो एकदम लाल है । "

नौकर मुस्करा पड़ा ... बैटरी बदल गई- “ मोरिस को माली ने धक्का लगाया जो हल्के - से स्टार्ट हो गई और फिर बाहर चली गई ।

इतने में एक सूटिड - बूटिड आदमी आकर बोला- “ गाड़ी का क्या हुआ ? "

" साहब बैटरी डाउन थी - मैकेनिक बदल गया है । ' '

" स्टार्ट करके देखो ... नेताजी को फौरन मीटिंग में पहुंचना है । "

नौकर ने खुद ही बैठकर इग्नीशन में चाबी घुमाई और दूसरे ही क्षण एक जोरदार धमाके के साथ कई चीखें गूंजी ... कार के आधे भाग के परखच्चे उड़ गए थे ... नौकर मामूली - सा घायल हुआ था ... जलते हुए टुकड़े चारों तरफ फैल गए थे



थोड़ी देर में सारे बंगले में कोहराम मच गया ... जिस गाड़ी में मैकेनिक गया था वह गाड़ी बंगले से कुछ

ही दूर सड़क पर खड़ी मिल गई - जब गैरिज को कान्टैक्ट किया गया तो पता चला कि उन्होंने कोई मैकेनिक नहीं भेजा - मैकेनिक के हुलिए के आदमी की तलाश शहर भर में शुरू हो गई - शाम तक यह खबर एक बहुत बड़ा नेता बाल - बाल बच गया है , रेडियो , टेलीविजन और अखबारों में आ गई - दूसरी तरफ नेता का सेक्रेटरी अफसरों पर बरस रहा था ।

अब विजय के शरीर पर एक कीमती सूट था ... आंखों पर मोटे फ्रेम की ऐनक थी - वह एक कीमती मर्सिडीज कार में सवार था - जब उसकी गाड़ी बंगले के फाटक पर रुकी तो गार्डों ने शिष्टता से झुककर सलाम किया ... एक खास गार्ड ने आगे बढ़कर पूछा - फरमाइए । "

' आजाद साहब तो होंगे । ' '

।।

" आपकी तारीफ ? "

' ' मैं नौशाद हूं ... आजाद जानते हैं ... उनकी बेगम साहिबा मेरी खाला जात बहन हैं ... मैं अपना और उन लोगों का फोटो दिखाता हूं अभी । ' '

फिर वह ब्रीफकेस उठाने लगा तो गार्ड ने जल्दी से कहा- " नहीं , नहीं रहने दीजिए । ' '

फिर फाटक खुल गया और कार पोर्च ही में रुक गई । दरवाजा खोलते हुए वह उतरा तो एक नौकर ने सलाम किया ... विजय ने उतरते हुए कहा- “ पहले जल्दी से मुझे आउट हाउस का पता बताओ । ' ' यह कहते हुए उसने दो उंगलियों का इशारा किया और नौकर मुस्करा पड़ा । वह विजय को आउट हाउस की तरफ ले आया । दरवाजा खोलकर विजय ने कहा

' ' बाजी को खबर कर देना ... मेरा नाम शौकत है । "

फिर अंदर से दरवाजा बंद करके वह आउट हाउस के टॉयलेट में आया जिसका दरवाजा बाहर भी खुलता था जो सफाई वाले के लिए था - इस वक्त वह दरवाजा अंदर से बंद था । विजय ने जल्दी - जल्दी सूट उतारा ... सूट के नीचे दूसरे कपड़े निकल आए ... ऐनक उतारकर वहीं रखी ... और पिछला दरवाजा खोलकर बाहर निकल ही रहा था कि अचानक जोरदार धमाके से पूरा बंगला हिलकर रह गया ... चारों तरफ दहशत फैल गई - शोर मच गया ... यह क्या हो गया ?

विजय बड़े आराम से सड़क पर राह - रवों के साथ आम आदमियों की तरह भीड़ में चल रहा था और थोड़ा आगे जाकर एक थ्री - व्हीलर में सवार आगे जा रहा था ।

दो रोज में पांच धमाके ।

पांच बड़ी हस्तियां मौत के मुंह से बाल - बाल बचीं ।

अभी तक धमाकों की जिम्मेदारी किसी आतंकवादी दल ने स्वीकार नहीं की थी ।

ज्वाला प्रसाद के खून के बाद आतंक का यह तूफान ... जनता में घबराहट तो थी ही , मगर ज्यादा घबराहट उन लोगों को थी जिनके बंगलों में विस्फोट हुए थे और वह बाल - बाल बचे थे - पूरे शहर में खुफिया वालों का जाल फैल गया था ... सारे बड़े आदमियों के बंगलों पर फौज का पहरा लगा दिया गया था ... लोग डर रहे थे कि यह आग फैल गई तो कयूं लग जाएगा , सारा कारोबार चौपट हो जाएगा ।

और ... इन घटनाओं से निश्चिन्त विजय आई . जी . के सामने बैठा हुआ था और आई . जी . कुछ भर्राई आवाज में कह रहा था

" यह सब क्या कर रहे हो तुम ? ' '

" वही जो यह लोग जनता के साथ करते हैं । "

' ' मगर इसका फायदा ही क्या होगा ? ' '



' सर ! फायदा भी जल्दी ही सामने आ जाएगा । "

' ' मेरा तो भेजा भी चाट लिया गया है ... सब यही कह रहे हैं कि जिन लोगों का हाथ ज्वाला प्रसाद जी के खून में था , वही लोग इन बड़े नेताओं और समाज के प्रभावशाली लोगों की जानों के पीछे पड़े हैं । "

" मैं भी यही चाहता था सर । ' '

" मगर मैं क्या जवाब दूं ? "

।।

' आराम से रहिएगा । "

" क्या खाक आराम से रहूं - यह केस हमारे डिपार्टमेंट को सौंपा गया है इसलिए हमीं पर फटकारें पड़ रही हैं - प्रेस चीख - चीखकर कह रहा है कि हमारे महकमे के अफसर नाकारा हो गए हैं । ' ' फिर पूछा " जहूर राजा का कुछ पता चला । '

" चूहा जब बिल में घुस जाए तो क्या आसानी से हाथ आ जाता है ? "

.

' ' मेरी समझ में नहीं आता तुम्हारी स्कीम क्या है ? ' '
 
अचानक टेलीफोन की घंटी बजी और आई . जी . ने रिसीवर उठाकर कान से लगा लिया और माउथपीस में बोला - ' ' हैलो ! ' '

दूसरी तरफ से ऐसी आवाज आई जैसे कोई आवाज बदलकर कह रहा हो

' ' आई . जी .... सी . बी . आई ... ? ' '

" स्पीकिंग । ' '

" आपके डिपार्टमेंट को उस आदमी की तलाश होगी जिसने ज्वाला प्रसाद जी के खून की साजिश रचाई थी और अब दूसरे जाने - माने इज्जतदारों के जीवन के पीछे पड़ा हुआ है ? ' '

" ऑफकोर्स ! मगर आप कौन हैं ? ' '

' ' आप आम खाइए ... पेड़ मत गिनिए । ' '

" क्या आप किसी ऐसे आदमी को जानते हैं ? "

' जी हां ! और अगर उसे फौरन गिरफ्तार न किया गया तो वह एक - डेढ़ घंटों में फ्लाई करने वाला है । ' '

" जल्दी बताइए ... कहां है वह ? ' '

दूसरी तरफ से कुछ बताया गया और फिर डिस्कनेक्ट हो गया । आई . जी . ने वही विजय को बताया तो विजय अनायास हंस पड़ा । आई . जी . ने उसे घूरकर कहा

' इसका क्या मतलब हुआ ? ' '

.

.

" सॉरी सर ! आप ही अभी फरमा रहे थे कि मैं क्या करता फिर रहा हूं ? इसका नतीजा क्या होगा ? नतीजा आ गया न सामने । '

" तुम्हारी यह बात मेरी समझ में नहीं आई , मिस्टर विजय । "

' सर ! जिन लोगों ने जहूर राजा को मुहरा बनाकर ज्वाला प्रसाद जी का खून कराया है ... अब वे लोग जहूर राजा के दुश्मन हो गए हैं । '

' ' ओहो ! '

" दगाबाजों का भरोसा तो अपनों से भी उठ जाता है । ' '

' ' तुम्हारा मतलब है यह फोन ... ? ' '

" उन्हीं में से किसी का हो सकता है । जहूर राजा के कम्पनी से फरार के वक्त उसे पनाह भी इसी फोन करने वाले ने दी होगी और अब वही जहूर राजा को पकड़वाना चाहता है । "

' ' ओ गॉड ! विजय सचमुच तुम ... I ' '

" बस सर ! अब मैं पूरा एक्शन में आ रहा हूं । ' '

.

" तुम्हें फोर्स के साथ जाना चाहिए । ' '

" नो सर । फोर्स काम बिगाड़ देगी ... मुझे खुद पर भरोसा है । "

' ' बैस्ट ऑफ लक । ' '

रात के लगभग दस बजे होंगे । विजय ने आई . जी . का बंगला साढ़े नौ बजे छोड़ा था .... और इस समय वह उस छोटे - से बंगले से काफी फासले पर अपनी खास काली कार में बैठा था , जिसका पता गुमनाम आदमी ने बताया था ।

लगभग सवा दस बजे उस छोटे - से बंगले से एक काली एम्बेसडर कार निकली - विजय की कार भी बिना आवाज किए स्टार्ट हो गई - उसने अपनी कार की बत्तियां बुझा रखी थीं ।

अगली कार सुनसान रास्तों से गुजरकर साहिल पर एक सुनसान जगह पर रुक गई ... यहां पहले ही से एक हैलीकॉप्टर खड़ा था और उसमें कोई मौजूद था - विजय ने दूरबीन से देखा , हैलीकॉप्टर पर एक पड़ोसी देश का निशान था ... न जाने किस तरह वह बिना रोक - टोक भारत की समुद्री गश्ती पुलिस और इंटेलीजेंस पोस्टों से बचकर आ यहां पहुंचा था ।

विजय ने कार की पिछली सीट से रए.के. - 47 उठाई - यह राइफल उसने डिफेंस के उस विभाग से हासिल की थी जो पड़ोसी देश के भगोड़े फौजियों से जब्त किए गए हथियारों में से मिली थी ।

विजय अब कार से बाहर था , उसने काली एम्बेसडर से काला सूट पहने और हाथ में एक ब्रीफकेस लिए एक आदमी को उतरते देखा - वह हैलीकॉप्टर की ओर बढ़ा । हैलीकॉप्टर से पायलट ने उतरकर उसके हाथ से ब्रीफकेस ले लिया और फिर दोनों हैलीकॉप्टर पर चढ़ने ही जा रहे थे कि विजय की राइफल से एक सनसनाती हुई गोली निकली ... दूसरे ही क्षण लहरों के शोर में पायलट की चीख गूंजी और गिरकर तड़पने लगा - काले सूटवाला हड़बड़ाकर पलटा

और जल्दी से एम्बेसडर में घुस गया - जल्दी में वह ब्रीफकेस उठाना भी भूल गया था ।

विजय की कार स्टार्ट होकर फर्राटे से आगे बढ़ी और उसने आमने - सामने में एम्बेसडर में टक्कर मारी ... विजय की कार का कुछ नहीं बिगड़ा मगर एम्बेसडर का अगला हिस्सा बिल्कुल दबकर कार का रेडिएटर टूट गया और वह अपनी जगह से हिलने के योग्य भी नहीं रही ।

एम्बेसडर से अंधाधुंध फायरिंग होने लगी - मगर विजय आराम से बैठा रहा । लगभग पन्द्रह मिनट की फायरिंग के बाद खामोशी छा गई - विजय ने फिर कार स्टार्ट की - अब उसकी कार एम्बेसडर को रगेदती हुई लिए जा रही थी ... कई जगह वह हटते - हटते बची थी ।

एक जगह विजय ने कार रोक ली और काले सूट वाला निकलकर भाग खड़ा हुआ ... विजय ने उसके पैरों के पास गोलियां चलाई तो वह रुककर हांफने लगा । विजय ने उसके पास पहुंचकर कहा - ' ' बस राजा साहब आपका खेल खत्म हो गया है । ' '

' ' मेरा , मेरा खेल तुम जैसे लौंडे क्या खत्म कर सकते हैं । "

विजय धीरे से हंसकर बोला- ' ' राजा साहब , आप पच्चीस बरस से जिन लोगों के लिए काम कर रहे थे , आज वही लोग आपको अपना दुश्मन समझकर आपकी मौत चाहते हैं । "

' ' नहीं ... ! ' '

' ' आपने ज्वाला प्रसाद जी के कत्ल की साजिश में हिस्सा लिया था ... क्या यह बात झूठ है । ' '

' नहीं .. ! "

" जिन लोगों ने आपको यह काम सौंपा था , उन्होंने ही आपको के . सी . फाइनेंस से भागने पर पनाह देनी थी । "

" हां । "

' आपके सुरक्षा स्थान का पता और कौन - कौन जानता था ? ' '

" सिर्फ एक आदमी है । "

" जिन लोगों के यहां बमों के हमले हुए हैं उन्हीं में से एक है न ? ' '

" हां । "

" और उसने आपके छुपाव के ठिकाने का पता दिया है - साथ ही यह भी बताया था कि आप एक - डेढ़ घंटे में मुल्क छोड़कर भाग रहे हैं । ' '

' ' सूअर का बच्चा है वह । '

' ' सूअर के बच्चे तो वह सभी होते हैं जो अपने वतन के वफादार नहीं होते , क्योंकि उनकी आंखों में सूअर का बाल होता है - आप भी तो अपने मुल्क के गद्दार हैं । "

" हां ! मैं गद्दार हूं इसलिए कि मैंने यह मुल्क अपना वतन समझकर नहीं छोड़ा था , मगर फिर भी मेरे पूरे खानदान का खात्मा इसलिए कर दिया गया था कि मेरे मजहब के नाम पर दूसरा मुल्क बना था । ' '

" और आपने झूठ बोला कि बच्चे - बीवी रिफ्यूजी बनकर चले गए हैं । "

' ' हां - मैंने इसलिए झूठ बोला था कि अपने खानदान की बर्बादी और कत्लेआम का बदला लेकर अपना कलेजा ठंडा कर सकू । "

" राजा साहब ! सीमा पार से आने वाले आदमियों की गिनती आपको मालूम है जिनके पूरे परिवारों का नामो - निशान तक मिटा दिया गया था ... और वह सब खाली हाथ यहां आए थे - आंखों में खून के आंसू और पेट में भूख की आग लेकर । "

" मुझे उनसे कोई गरज नहीं । ' '

" होनी चाहिए क्योंकि वह फैसला आपने किया था - अगर वह लोग भी यही फैसला करके आते तो आप पचास बरस भारत में बा - इज्जत जिन्दगी न गुजारते - आप जिन लोगों साथ काम करते थे..वह आपके मजहब के नहीं थे ... मगर फिर भी आपकी इज्जत इसलिए करते थे कि आप खानदानी आदमी हैं ... और आपका खानदान सदियों से यहां रहा था - आप पुराने फौजी हैं । "

जहूर राजा चुप रहा तो विजय ने कहा - ' ' बताइए , आपने ज्वाला प्रसाद जी का खून क्यों कराया ? इस वक्त देश भर में वही सबसे महत्वपूर्ण नेता थे । ' '

जहूर राजा ने व्यंग्य भरी मुस्कराहट के साथ कहा - ' ' मेरी उनसे कोई निजी दुश्मनी नहीं थी । "

" मैं जानता हूं । ' '



' तब यह भी जानते होंगे कि ज्वाला प्रसाद जी के धर्म के लोगों ने ही यह साजिश रचाई थी इसलिए कि वह लोग कुर्सी पर कब्जा करने के सपने देख रहे थे

। '

।।

" और उन्हें मदद पड़ोसी देश से मिली । "

' ' बेशक ! "



" वह मुल्क तो जब बना है हमारे विरुद्ध साजिशों का जाल बिछाए हुए है । '

" उस मुल्क से मदद लेने वाले भी तो तुम्हारे ही देशवासी कुर्सियों के भूखे हैं । ' '

' ' मैं जानता हूं ... झूठे मान - सम्मान , शक्ति और दौलत की भूख दुनिया के किस देश में नहीं होती ... मगर तुम्हें तो न मान - सम्मान चाहिए था , न दौलत ... तुमने तो केवल बदले की आग ही में जलकर अपने ही घर को आग लगाई ... अपने ही देशवासियों को धोखा दिया - आप जरा सोचें तो - अगर .. अगर यह सब न करते तो भी आपकी उम्र आराम से कटती ।

' ' यह सब करके आपको क्या मिला ? क्या दिमागी सुकून मिला ? आप पर मुकदमा चलेगा ... आप देशद्रोही घोषित किए जायेंगे । क्या आपका रक्षक आपके लिए कोई वकील - सफाई भेजेगा ? बल्कि वह लोग तो इस बात को स्वीकार ही नहीं करेंगे कि उनका कोई सम्बन्ध आपसे है ... आप जेल में सड़ते चले जायेंगे और आपके मालिक फिर से हमारी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाएंगे - एक नया जहूर राजा ढूंढकर उसे उसकी जगह दे देंगे ... मगर आपको क्या मिलेगा ? जिल्लत और रुसवाई - जो इज्जत आपको के . सी . कम्पनी में मिली थी वह नहीं मिलेगी । "

अचानक जहूर राजा दोनों हाथों से मुंह छुपाकर रोने लगा और बोला - ' ' मार डालो मुझे ... गोली मार दो । यह क्या हो गया ? तुम्हारी तरह मेरी आंखें खोलने वाला कोई क्यों नहीं मिला ? "

विजय ने बढ़कर उसके कंधे पर थपकी दी और बोला

' टेक इट ईजी , जो कुछ हो चुका उसे बदला नहीं जा सकता , लेकिन किसी भूल या गुनाह का एहसास सबसे बड़ा प्रायश्चित है । अब आप मुझे सिर्फ इतना बता दें कि यहां पर आपका गाइड कौन था ? और आपने संजय की जगह ज्वाला प्रसाद का खून करने के लिए किसको जगह दी थी ? ' '

' ' संजय की जगह शेख अब्दुल जब्बार - अल - जाबर गया था ... वह एक ट्रेंड जासूस है ... अच्छी हिन्दुस्तानी बोल सकता है ... उसका जन्म दुबई में हुआ है ... उसकी मां भारत की थी और बाप दुबई का शेख था - वह शुरू ही से हथियारों का स्मगलर और सप्लायर रहा उसके यहां आने का खास मकसद यही है ... आर . डी . एक्स . का भण्डार उसने यहां छुपा रखा है जो उसके एजेंटों द्वारा दंगे - फसादों में भारत को उलझाए रखने के काम आता है । "

" और यहां आपका मुकामी मालिक ? ' '

जहूर राजा ने जो भी नाम बताया उसे सुनकर विजय के मस्तिष्क में जबर्दस्त धमाका - सा हुआ और उसके होंठ सिकुड़ गए । विजय की इस जरा - सी गफलत से फायदा उठाकर जहूर राजा ने झपटकर रिवाल्वर छीना और अपनी कनपटी में कई गोलियां उतार लीं । फिर वह एक तरफ गिर गया ... विजय निचला होंठ दांतों में दबाए खड़ा रह गया ।
 
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