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“अब ?”–कार की स्टेयरिंग को थपथपाता हुआ राज बोला।
तभी राज वापस आया।
“अच्छा वृन्दा जी अब इजाज़त दीजिए। फिर मुलाकात होगी आपसे।”–राज डॉली को चलने का इशारा करता हुआ बोला।
वृन्दा ने एक गहरी नजर राज पर डाली और उठ कर हाथ जोड़ दिए।
“अपना ध्यान रखिएगा वृन्दा जी। खतरा अभी टला नहीं है।”
“जी मैं ध्यान रखूँगी।”–वृन्दा के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई। राज और डॉली रवाना हो गए।
*********************
“अब ?”–कार की स्टेयरिंग को थपथपाता हुआ राज बोला।
“कहाँ चलें ?”–डॉली बोली।
“अरे मैं भी तो यही पूछ रहा हूँ।”
“यहाँ से निकलिये। फिर सोचते हैं।”–डॉली बोली।
राज ने सहमति में सिर हिलाया और कार स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी।
“अब ?”–मेन रोड पर आते ही राज बोला।
“सर जी, दो ही रास्ते हैं। लेफ्ट को चले तो मवाना पहुँचेंगे। आपको मवाना जाना है ?”
“नहीं।”
“तो ऑप्शन बचा ही क्या ? चलो दाहिने हाथ को।”
“डॉली कुछ ज्यादा ही स्मार्ट टॉक नहीं करने लगी है तू आजकल मेरे साथ ?”–राज दाईं तरफ कार मोड़ता हुआ बोला।
“अरे सर हम गरीबों की ऐसी मजाल कहाँ ?”
“गरीब ! अभी-अभी पाँच मिनट पहले पाँच लाख कमाये हैं। काहे की गरीब है तू ?”
“अब कमाये हैं तो उन पैसों का हक अदा करने की भी सोचो।”
“मतलब ?”
“मतलब यू–टर्न लो। अब आये हैं तो इंचौली थाने में आई०ओ० से ही मिलते चलें। क्या पता कुछ नया जानने को मिल जाये ?”
राज ने कार रोड के किनारे कर के रोक दी और कुछ देर सोचने के बाद सहमति में सर हिलाते हुए यू–टर्न लिया और वापस चल पड़ा। पंद्रह मिनट बाद कार थाने के बाहर खड़ी थी। रास्ते मे राज ने अनिल को फोन करके आई०ओ० का नाम पूछ लिया था। दोनों कार से उतर कर थाने में पहुँचे। बाहर ही एक सिपाही से सब इन्स्पेक्टर संजय सिंह के बारे में पता किया और सिपाही के बताए कमरे में पहुँचे। संजय सिंह कोई बत्तीस तैंतीस साल का स्मार्ट सा नौजवान था। गिरीश दुबे गुमशुदगी केस की तफ्तीश वही कर रहा था। संजय बड़े प्रेमभाव से उनसे मिला। उसके पास अनिल का फोन आ गया था।
“अनिल का फोन आया था। कह रहा था कि आप लोगों की मदद करने के लिए। बताइए क्या मदद कर सकता हूँ आपकी ?”–उसने अपनी टेबल के सामने पड़ी कुर्सियों पर बैठने का इशारा करते हुए कहा।
डॉली और राज बैठ गए तो वह भी अपनी कुर्सी पर बैठ गया।
“बताइए क्या कर सकता हूँ मैं आपके लिए ?”–उसने दोबारा पूछा।
राज ने अपना और डॉली का परिचय दिया और आने का मकसद बताया।
“हम्म।”–वह कुछ सोचने लगा। “देखिए वकील साहब, अनिल मेरा बहुत अच्छा दोस्त है। लेकिन ये नियम विरुद्ध है। तफ्तीश के दौरान जाँच शेयर करना तो गलत होगा।”
“अरे इंस्पेक्टर साहब हम वकील हैं। आप पुलिस हो। हमारा आपका रोज का साथ है। छोड़िये ना ये नियम कानून की बातें। सब चलता है।”
“वकील साहब ! मैं कहूँगा तो आप यकीन नहीं करोगे। फिर भी कहता हूँ। मैं पुलिस में हूँ, पर आज तक ना तो एक रुपया रिश्वत ली और ना ही कोई नियम विरुद्ध काम किया है।”–संजय के स्वर में गर्व का पुट था।
राज हँसा।
“मैं सच कह रहा हूँ वकील साहब। बहुत ही धनाड्य परिवार से बिलोंग करता हूँ। नौकरी तो मैं अपने शौक के लिए करता हूँ।”–संजय थोड़े रुष्ट स्वर में बोला।
“वाह।”–डॉली प्रशंसामिश्रित निगाहों से संजय को देखते हुए बोली।
“जी।”–संजय ने उसकी तरफ देखा।
“सर हम फिल्मों के नायकों को नायक मानते हैं, लेकिन असली नायक तो आप हैं।”
“अरे आप तो शर्मिंदा कर रही हैं।”–संजय के चेहरे पर कोमलता के भाव आ गए।
“नहीं सर, मैं सच कह रही हूँ। आज के जमाने में कितने होंगे अपने फर्ज के प्रति ईमानदार पुलिस अफसर ?”
“और भी होंगे। कई होंगे। पर चाहे कोई एक भी ना होता, तो भी मैं जरूर होता।”
“अब मुझे भरोसा हो गया है कि इस केस में अपराधी का बचना असंभव है।”
“यकीन रखिये नहीं बचेगा।”–संजय अधिकाधिक गंभीर दिखने का प्रयास करते हुए बोला।
“मुझे यकीन है सर।”
“आप चाय लेंगी ?”–संजय मीठे स्वर में बोला।
“अरे नहीं सर, आप क्यों नाहक तकलीफ करते हैं।”
“कोई तकलीफ नहीं होगी। यकीन मानिये मुझे खुद नहीं बनानी पड़ेगी।”–संजय बोला, फिर खुद ही अपने घटिया पंच पर हँसा। उससे भी तेज खिलखिलाई डॉली ।
राज ने हैरानी से डॉली की तरफ देखा। डॉली ने हँसते हँसते राज की तरफ अपनी बाईं आँख हल्की सी दबा दी। संजय ने मेज पर पड़ी घंटी दबाई। घंटी के जवाब में आये सिपाही को चाय के लिए बोला और फिर डॉली की तरफ मुखातिब हो गया। “वैसे ये काम वकीलों का तो है नहीं।”
“जी सही बताऊँ तो इस काम का वकालत से कुछ लेना देना है भी नहीं। दरअसल मैं एक किताब लिख रही हूँ जो एक कर्तव्यनिष्ठ ईमानदार पुलिस अफसर पर आधारित है। तो मैं पुलिस के बारे में जानना चाह रही थी कि वह कैसे अपराधी का पता लगा लेते हैं। कैसे वह कड़ी दर कड़ी सबूतों को इक्कठा करके अपराधी को दबोच लेते हैं।”
“ओह्ह तो इसमें क्या है ? ये तो मैं ही आपको बता दूँगा। इसमें तो कोई हर्ज नहीं।”–संजय मीठे स्वर में बोला।
“ओह्ह थैंक यू सर। सर एक बात और थी।”
“जी डॉली जी कहिए।”
“सर क्या मैं अपनी किताब के हीरो का नाम आपके नाम पर संजय रख सकती हूँ ?”–डॉली ने हौले से पूछा।
“जी बिल्कुल। नाम पर किसी का क्या कॉपीराइट। पर आप मुझे कुछ ज्यादा ही मान दे रही हैं।”–संजय का स्वर कोमलता, मिठास और सज्जनता के चरम तक आ पहुँचा था।
“थैंक यू सर।”–डॉली ने बच्चों की तरह खुश होकर दिखाया। संजय मंत्रमुग्ध सा उसे देखता रह गया। तभी सिपाही ने चाय लाकर टेबल पर रख दी। संजय ने तत्काल एक चाय का गिलास उठाया और डॉली की तरफ बढ़ाया।
“थैंक्स।”–डॉली मुस्कुरा कर बोली और चाय का गिलास थाम लिया।
संजय ने दूसरा गिलास उठाया और अपनी कुर्सी पर बैठ गया। इस दरम्यान एक पल के लिए भी उसकी निगाह डॉली के चेहरे से हटी नहीं थी। तीसरा गिलास उपेक्षित सा मेज पर रखा था जिसे उठाने के प्रयास में राज को करीब करीब मेज पर लेट सा जाना पड़ा।
“तो सर, जैसे आपके पास किसी गुमशुदगी की रिपोर्ट आती है तो सबसे पहले पुलिस क्या करती है ?”–डॉली ने चाय में चुस्की मारते हुए सहज भाव से पूछा।
“हम पहले घर वालों को उसे तलाश करने के लिए बोलते हैं। अगर चौबीस घंटे तक भी उसका कोई पता नहीं चलता तो एफ०आई०आर० लिख कर कार्यवाही शुरू कर देते हैं।
“गिरीश दुबे के मामले में भी आपने यही किया होगा ?”
“नहीं, ये मामला थोड़ा अलग था। एक तो ये एक बड़े उद्योगपति का मामला था, दूसरे उसकी कार सड़क किनारे लावारिस खड़ी बरामद हो गई थी जिससे उसके खुद कहीं जाने की संभावना कम थी। हालाँकि हमने एफ०आई०आर० तो अगले रोज ही लिखी थी, लेकिन अपनी कार्यवाही तुरंत ही शुरू कर दी थी।”
“और कुछ बताइए ना इसके बारे में। फिर आपने क्या किया, कैसे खोजबीन शुरू की।”–डॉली ने दोनों कोहनियाँ टेबल पर टिका कर हथेलियों पर चेहरा रख कर संजय के चेहरे पर नजरें टिका लीं।
जवाब में वह कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार, उसूलों का पक्का युवा इंस्पेक्टर गा गा कर सारा किस्सा सुनाने लगा। चेहरे पर प्रशंसा के अपरिमित भाव लिए डॉली सुनती रही।
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तभी राज वापस आया।
“अच्छा वृन्दा जी अब इजाज़त दीजिए। फिर मुलाकात होगी आपसे।”–राज डॉली को चलने का इशारा करता हुआ बोला।
वृन्दा ने एक गहरी नजर राज पर डाली और उठ कर हाथ जोड़ दिए।
“अपना ध्यान रखिएगा वृन्दा जी। खतरा अभी टला नहीं है।”
“जी मैं ध्यान रखूँगी।”–वृन्दा के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई। राज और डॉली रवाना हो गए।
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“अब ?”–कार की स्टेयरिंग को थपथपाता हुआ राज बोला।
“कहाँ चलें ?”–डॉली बोली।
“अरे मैं भी तो यही पूछ रहा हूँ।”
“यहाँ से निकलिये। फिर सोचते हैं।”–डॉली बोली।
राज ने सहमति में सिर हिलाया और कार स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी।
“अब ?”–मेन रोड पर आते ही राज बोला।
“सर जी, दो ही रास्ते हैं। लेफ्ट को चले तो मवाना पहुँचेंगे। आपको मवाना जाना है ?”
“नहीं।”
“तो ऑप्शन बचा ही क्या ? चलो दाहिने हाथ को।”
“डॉली कुछ ज्यादा ही स्मार्ट टॉक नहीं करने लगी है तू आजकल मेरे साथ ?”–राज दाईं तरफ कार मोड़ता हुआ बोला।
“अरे सर हम गरीबों की ऐसी मजाल कहाँ ?”
“गरीब ! अभी-अभी पाँच मिनट पहले पाँच लाख कमाये हैं। काहे की गरीब है तू ?”
“अब कमाये हैं तो उन पैसों का हक अदा करने की भी सोचो।”
“मतलब ?”
“मतलब यू–टर्न लो। अब आये हैं तो इंचौली थाने में आई०ओ० से ही मिलते चलें। क्या पता कुछ नया जानने को मिल जाये ?”
राज ने कार रोड के किनारे कर के रोक दी और कुछ देर सोचने के बाद सहमति में सर हिलाते हुए यू–टर्न लिया और वापस चल पड़ा। पंद्रह मिनट बाद कार थाने के बाहर खड़ी थी। रास्ते मे राज ने अनिल को फोन करके आई०ओ० का नाम पूछ लिया था। दोनों कार से उतर कर थाने में पहुँचे। बाहर ही एक सिपाही से सब इन्स्पेक्टर संजय सिंह के बारे में पता किया और सिपाही के बताए कमरे में पहुँचे। संजय सिंह कोई बत्तीस तैंतीस साल का स्मार्ट सा नौजवान था। गिरीश दुबे गुमशुदगी केस की तफ्तीश वही कर रहा था। संजय बड़े प्रेमभाव से उनसे मिला। उसके पास अनिल का फोन आ गया था।
“अनिल का फोन आया था। कह रहा था कि आप लोगों की मदद करने के लिए। बताइए क्या मदद कर सकता हूँ आपकी ?”–उसने अपनी टेबल के सामने पड़ी कुर्सियों पर बैठने का इशारा करते हुए कहा।
डॉली और राज बैठ गए तो वह भी अपनी कुर्सी पर बैठ गया।
“बताइए क्या कर सकता हूँ मैं आपके लिए ?”–उसने दोबारा पूछा।
राज ने अपना और डॉली का परिचय दिया और आने का मकसद बताया।
“हम्म।”–वह कुछ सोचने लगा। “देखिए वकील साहब, अनिल मेरा बहुत अच्छा दोस्त है। लेकिन ये नियम विरुद्ध है। तफ्तीश के दौरान जाँच शेयर करना तो गलत होगा।”
“अरे इंस्पेक्टर साहब हम वकील हैं। आप पुलिस हो। हमारा आपका रोज का साथ है। छोड़िये ना ये नियम कानून की बातें। सब चलता है।”
“वकील साहब ! मैं कहूँगा तो आप यकीन नहीं करोगे। फिर भी कहता हूँ। मैं पुलिस में हूँ, पर आज तक ना तो एक रुपया रिश्वत ली और ना ही कोई नियम विरुद्ध काम किया है।”–संजय के स्वर में गर्व का पुट था।
राज हँसा।
“मैं सच कह रहा हूँ वकील साहब। बहुत ही धनाड्य परिवार से बिलोंग करता हूँ। नौकरी तो मैं अपने शौक के लिए करता हूँ।”–संजय थोड़े रुष्ट स्वर में बोला।
“वाह।”–डॉली प्रशंसामिश्रित निगाहों से संजय को देखते हुए बोली।
“जी।”–संजय ने उसकी तरफ देखा।
“सर हम फिल्मों के नायकों को नायक मानते हैं, लेकिन असली नायक तो आप हैं।”
“अरे आप तो शर्मिंदा कर रही हैं।”–संजय के चेहरे पर कोमलता के भाव आ गए।
“नहीं सर, मैं सच कह रही हूँ। आज के जमाने में कितने होंगे अपने फर्ज के प्रति ईमानदार पुलिस अफसर ?”
“और भी होंगे। कई होंगे। पर चाहे कोई एक भी ना होता, तो भी मैं जरूर होता।”
“अब मुझे भरोसा हो गया है कि इस केस में अपराधी का बचना असंभव है।”
“यकीन रखिये नहीं बचेगा।”–संजय अधिकाधिक गंभीर दिखने का प्रयास करते हुए बोला।
“मुझे यकीन है सर।”
“आप चाय लेंगी ?”–संजय मीठे स्वर में बोला।
“अरे नहीं सर, आप क्यों नाहक तकलीफ करते हैं।”
“कोई तकलीफ नहीं होगी। यकीन मानिये मुझे खुद नहीं बनानी पड़ेगी।”–संजय बोला, फिर खुद ही अपने घटिया पंच पर हँसा। उससे भी तेज खिलखिलाई डॉली ।
राज ने हैरानी से डॉली की तरफ देखा। डॉली ने हँसते हँसते राज की तरफ अपनी बाईं आँख हल्की सी दबा दी। संजय ने मेज पर पड़ी घंटी दबाई। घंटी के जवाब में आये सिपाही को चाय के लिए बोला और फिर डॉली की तरफ मुखातिब हो गया। “वैसे ये काम वकीलों का तो है नहीं।”
“जी सही बताऊँ तो इस काम का वकालत से कुछ लेना देना है भी नहीं। दरअसल मैं एक किताब लिख रही हूँ जो एक कर्तव्यनिष्ठ ईमानदार पुलिस अफसर पर आधारित है। तो मैं पुलिस के बारे में जानना चाह रही थी कि वह कैसे अपराधी का पता लगा लेते हैं। कैसे वह कड़ी दर कड़ी सबूतों को इक्कठा करके अपराधी को दबोच लेते हैं।”
“ओह्ह तो इसमें क्या है ? ये तो मैं ही आपको बता दूँगा। इसमें तो कोई हर्ज नहीं।”–संजय मीठे स्वर में बोला।
“ओह्ह थैंक यू सर। सर एक बात और थी।”
“जी डॉली जी कहिए।”
“सर क्या मैं अपनी किताब के हीरो का नाम आपके नाम पर संजय रख सकती हूँ ?”–डॉली ने हौले से पूछा।
“जी बिल्कुल। नाम पर किसी का क्या कॉपीराइट। पर आप मुझे कुछ ज्यादा ही मान दे रही हैं।”–संजय का स्वर कोमलता, मिठास और सज्जनता के चरम तक आ पहुँचा था।
“थैंक यू सर।”–डॉली ने बच्चों की तरह खुश होकर दिखाया। संजय मंत्रमुग्ध सा उसे देखता रह गया। तभी सिपाही ने चाय लाकर टेबल पर रख दी। संजय ने तत्काल एक चाय का गिलास उठाया और डॉली की तरफ बढ़ाया।
“थैंक्स।”–डॉली मुस्कुरा कर बोली और चाय का गिलास थाम लिया।
संजय ने दूसरा गिलास उठाया और अपनी कुर्सी पर बैठ गया। इस दरम्यान एक पल के लिए भी उसकी निगाह डॉली के चेहरे से हटी नहीं थी। तीसरा गिलास उपेक्षित सा मेज पर रखा था जिसे उठाने के प्रयास में राज को करीब करीब मेज पर लेट सा जाना पड़ा।
“तो सर, जैसे आपके पास किसी गुमशुदगी की रिपोर्ट आती है तो सबसे पहले पुलिस क्या करती है ?”–डॉली ने चाय में चुस्की मारते हुए सहज भाव से पूछा।
“हम पहले घर वालों को उसे तलाश करने के लिए बोलते हैं। अगर चौबीस घंटे तक भी उसका कोई पता नहीं चलता तो एफ०आई०आर० लिख कर कार्यवाही शुरू कर देते हैं।
“गिरीश दुबे के मामले में भी आपने यही किया होगा ?”
“नहीं, ये मामला थोड़ा अलग था। एक तो ये एक बड़े उद्योगपति का मामला था, दूसरे उसकी कार सड़क किनारे लावारिस खड़ी बरामद हो गई थी जिससे उसके खुद कहीं जाने की संभावना कम थी। हालाँकि हमने एफ०आई०आर० तो अगले रोज ही लिखी थी, लेकिन अपनी कार्यवाही तुरंत ही शुरू कर दी थी।”
“और कुछ बताइए ना इसके बारे में। फिर आपने क्या किया, कैसे खोजबीन शुरू की।”–डॉली ने दोनों कोहनियाँ टेबल पर टिका कर हथेलियों पर चेहरा रख कर संजय के चेहरे पर नजरें टिका लीं।
जवाब में वह कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार, उसूलों का पक्का युवा इंस्पेक्टर गा गा कर सारा किस्सा सुनाने लगा। चेहरे पर प्रशंसा के अपरिमित भाव लिए डॉली सुनती रही।
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