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“यानि आप मुझे बेगुनाह मानती हैं ?"'
"पूरी तरह ।"
शेखर मल्होत्रा ने अपने सामने वाले सोफे पर बैठी किरन को इस तरह देखा ---- जैसै किरन को नहीं बल्कि
साक्षात् कुतुबमीनार को अपने कमरे में , अपने सामने वाले सोफे पर बैठी देख रहा हो।
जुबान से बोल तक न फूटा, होंठ फ़ड़फड़ाकर रह गये ।
हां आंखें जरूर भर जाई थीं ।
और उन भरी हुई आंखों को देखकर किरन ने कहा-----"त-तुम रो रहे हो ?"
"न-नहीं.......नहीं तो ?" बोखलकर शेखर ने अपनी दोनों आंखे हथेलियों से ढक लीं ।
फिर स्वयं को संयत करने के लिए एक सिगरे सुलगाई ।
किरन समझ सकती थी कि पल-मर के लिए झिलमिलाने वाले वे आँसू अचानक मिली असीमित खुशी के आंसू थे, विषय चेंज करने की गरज से वह बोली----"मगर जैसा कि तुम जानते हो, मात्र मेरे बेगुनाह समझ लेने से स्थिति में कुछ चेंज आंने वाला नहीं है----चेंज तब आयेगा जव मैं कोर्ट में बेगुनाह साबित करने में कामयाब होऊंगी !"
"म-मेरे ख्याल में ऐसा नहीं हो सकेगा किरन जी ।"
“क्यों नहीं हो सकेगा ?"
"जो चक्रव्यूह मेरे चारों तरफ़ रची गया है वह इतना चक्करदार है कि जिसे अपके पापा, अक्षय श्रीवास्तव, शहजाद राय और स्वयं जज साहब तक नहीं समझ सके, उसे भला हम--------जो कि बौद्धिक स्तर पर उनके सामने बहुत 'बोने' हैं, क्या समझ सकेंगे----चक्रव्यूह के अन्दर घुसकर इसे तोडने की तो बात ही दूर, लाख प्रयत्न करने बावजूद मैं इतना तक नहीं जान पाया हूं कि यह चक्रव्यूह रचा किसने है ?"
"तुम्हें फंसाने की इतनी जबरदस्त योजना वही बना सकता हैं, जिसे तुम्हारे फंसने पर जबरदस्त लाभ हो ।"
"जाहिर-सी बात है ।"
"तो सोचो, तुम्हारे फंसने से किसे लाम है सकता है ।"
"लाख दिमाग घुमाने के बावजूद मैं किसी ऐसे व्यक्ति का नाम नहीं सोच पाया हू।"
“सीधा-सीघा लाभ तो संगीता के चाचा को पहुंचा है ।"
"क्या नाम है उनका !"
"अतर जैन ।"
" पत्नी, बेटी और दोनों बेटों के नाम भी बताओ ।"
"पत्नी का नाम सुमित्रा है, वेटी का नाम संगम, छोटे लड़के का राकेश और बड़े लड़के का कमल मगर------
"मगर !"
“ये लोग भला संगीता की हत्या कैसे कर सकते हैं ?"
"क्यों नहीं कर सकते ?"
"संगीता की मौत से पहले ये अमीनाबाद में रहते थे--- यहाँ अाते-जाते तक नहीं थे , अतर जैन को या तो मैंने तब देखा था जव बाबूजी की मृत्यु हुई थी या संगीता के बाद देखा है ।"
" शेखर की आखों में आँखें डालकर सवाल किया किरन ने-----"गुलाब चन्द की मौत कैसे हुई थी ?"
"उनकी मृत्यु हिल एरिया में कार ड्राइव करते हुई थी--- ब्रेक फेल हो जाने की वजह से उनकी फियेट एक खाई में जा गिरी थी---लाश गद्दी और स्टेयरिंग के बीच फंसी मिली थी,आग भी लग गई थी कार मे----बुरी तरह जल गए थे वे----इतने ज्यादा कि लाश पहचान तक में नहीं अा रही थी---अंगुठी के वेस पर ही मैं और संगीता ने उनकी शिनाख्त कर सके थे ।"
शेखर को बडी गहरी नजरों से देखती हुई किरन ने एक सवाल और किया-----"'क्या गुलाब चन्द जी संगीता को बहुत चाहते थे ?"
“यह भी कोई पूछने वाली बात है, संगीता उनकी बेटी थी ।"
"तब तो तुम्हें भी उतना ही चाहते होंगें आखिर तुम उनकी इकलोती और प्यारी बेटी के पति थे ?"
"अ-अ...आं ।" हिचका शेखर !
किरन ने तुरन्त पूछा----"हिचक क्यों रहे हो ?"
"बाबू जी मुझसे कुछ चिड़े-चिड़े से रहते थे ।"
" क्यों ?"
"दरअसल संगीता और मैंने लव-मैंरिज की थी------लव-मैरिज भी ऐसी कि बाबूजी जिसके सख्त खिलाफ थे, जाने क्यों मैं उनकी नजर में कभी अच्छी छबि न वना पाया---वे हमेशा मुझे गुन्डा-लफंगा और पैसे का लालची समझते रहे----खैर अब उन बातों को दोराने से क्या लाभ ?"
"तो अतर जैन एन्ड फैमिली को तुमने सबसे पहले तब देखा जब गुलाब चन्द के अन्तयेष्टि हुई थी ?
"फेमिली को नहीं, सिर्फ 'अंकल' को---वे अकेले आये थे, अन्त्येष्टि उन्होंने ही की थी ।"'
"बीबी-बच्चे नहीं आए थे ?"
"नहीं ?"
" क्यों ?"
"दरअसल इन तीनों भाइयों के सम्बन्थ आपस में ठीक नहीं थे ।"
"तीन भाई ?"
"हां...........हालांकि तीसरे को मैंने कभी देखा नहीं और बकौल संगीता के उसने भी बचपन में ही देखा था ----उसका नाम सुब्रत जैन था---तीनों भाइयों में सबसे बड़ा था वह उस वक्त संगीता केवल चार वर्ष की थी जब वह घर से रूठकर बल्कि लड़-झगड़कर चला गया था ।"
"लड़-झगड़कर ?"
"संगीता वताया करती थी कि मूल रूप से ये लोग हस्तिनापुर के निवासी हैं-----तीनों भाइयों के पिता हस्तिनापुर के सबसे सम्भ्रांत व्यक्ति थे । बड़ा लडका यानि सुब्रत गंदी सोसायटी में उठने-बैठने लगा था । गुन्डो-लरफगों के साथ रहकर वह भी गुन्डागर्दीं करने लगा था-------सबसे छोटा यानि अतर भी फुछ-कुछ उसी के रंग जैसा था जबकि बाबूजी दोनों से बिल्कुल अलग अपने पिता के रंग में रंगे हुए थे---धीरे - धीरे सुब्रत और अतर की 'आवारगियां और बदतमीजियां इतनी बढ़ गई कि उनके पिता ने दोनों को चेतावनी दे दी कि अगर नहीं सुधरेंगे तो वे उन्हें अपनी सम्पूर्ण जायदाद से बेदखल कर देगे-इस चेतावनी का थोड़ा सा असर अतर पर पड़ा किन्तु सुब्रत की बदतमीजियां कुछ और बढ़ गई बार-बार की चेतावनी के बावजूद उसने एक न सुनी और एक दिन ऐसा आ गया कि उनके पिता ने अखवार में इस आशय, की विज्ञप्ति निकाल थी कि सुब्रत से उनका कोई सम्बन्थ नहीं है और. उनकी सम्पत्ति में भी उसका कोई हिस्सा नहीं है वकौल संगीता के उस दिन परिवार में मानो तूफान आ गया था ----घर में कदम रखते ही सुब्रत सब पर बरस पड़ा----सबसे ज्यादा अपने पिता और बाबूजी पर भड़का था।"
" गुलाब चन्द पर क्यों ?"
सुब्रत का कहना था कि सव कुछ उसी का करा-धरा है-बाबूजी पर यह आरोप लगाया कि पिता पर उसने जादु कर दिया है----वह उसी दिन अपनी पत्नी और दस वर्षीय बेटे को लेकर हस्तिनापुर से निकल गया-जाता-जाता बाबूजी को धमकी दे गया, कह गया कि अगर उसका मौका लगा तो बाबूजी से और उनके पूरे परिवार से बदला लेगा ।
"फिर ?"'
“वह अन्तिम दिन था जव इन लोगों ने सुब्रत की शक्ल देखी यी-बाबूजी और संगीता का कहना यह था कि पता नहीं सुब्रत को धरती निगल गई या आसमान खा गया ---पता नहीं कहाँ जाकर बस गया था वह ?"
"और अतर ?"'
"सुब्रत का अंजाम देखकर अतर सम्भल तो गया किन्तु खुद को इतना कभी न सुधार सका कि अपने पिता
की नजरों में चढ जाए-उनका चहेता बेटा हमेशा बाबूजी ही रहे इसी का परिणाम था कि उनकी मौत के बाद जब वसीयत खोती गई तो पता लगा कि सम्पत्ति का नब्बे प्रतिशत भाग उन्होंने बाबूजी को दिया था और कुल दस प्रतिशत अतर को----झगड़ा होना था सो हुआ---- मगर झगड़े से अब हो क्या सकता था, अतर ने भी बाबूजी पर वहीँ आरोप लगाये जो घर छोड़ते वक्त सुब्रत ने लगाए थे, मगर वैसी कोई धमकी नहीं दी जैसी सुव्रत ने थी --- जो सम्पत्ति बाबूजी के हिस्से में आयी उसके बूते पर उन्होंने इस शहर में असली घी की फैकट्री लगा ली और अतर ने अमीनाबाद में रेडीमेड कपडों की दुकान खोल ली-----अब ये लोग उसे वेच-वाचकर यहां आ गए है मगर------
" मगर ?"
"आपने मुझसे इस परिवार की हिस्ट्री क्यों पूछी ?"
"हत्या के अधिकांश मामलों में कई पीढियों पहले हुए पारिवारिक कलह महत्वपूर्ण होते हैं ।" किरन ने कहा…"खेर, मतलब यह हुआ कि गुलाब चन्द और अतर के बीच न रंजिश जैसी बात थी न मुहब्बत जैसी, एक खिंचाव-सा था और उसी खिंचाव के कारण अपने आई की मृत्यु पर अतर अकेला आया , फैमली नहीं आई थी ?"
"हां !"
"खैर हत्यारा जो भी है, सामने तो अब उसे आना ही पड़ेगा ! आखें शून्य में केन्दित किए किरन अजीब-भी दृढ़ता के साथ कहती चली गई…"मैं उसके रचाए गए चक्रव्यूह के अन्दर घुस चुकी हूं ---इस चक्रव्यूह को तोडकर रख दूंगी मैं---चक्रव्यूह एक - एक 'जाले' की धज्जियां उड़ाकर रख दूंगी !"
"अ---अाप-आप-सेन्टीमेन्टल हो रही हैं किरन जी ।"
"ओह !" किरन चौंकी----" शायद हां-----शायद मैं सेन्टीमेन्टल ही हो उठी थी--खैर अतर एन्ड फैमिली के बीच मैं एक "शगूफा छोड़ अाई थी-अगर उनके दिल में जरा भी 'मैल' है तो उस "शगूफे’ के परिणाम सामने आने चाहिये ।"
“कैसे ?"
" मैंने उसे बता दिया कि शीघ्र ही तुम्हें बेगुनाह साबित कर दूगी।" किरंन ने कहा----"अगर वे अपराधी हैं तो ये खबर उनके लिए "शगूफा होगी और यह शगूफा ऐसा है जो उनके बीच जबरदस्त खलबली मचा देगा ।"
और !!!
खलबली मच गयी थी ।